फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
दूसरा अध्याय : ग्रह भेद ३७ पड़ा है तो वह पचास वर्ष की अवस्था में भी ३० वर्ष के समान प्रतीत होगा ॥ १० ॥ अब बुध का स्वरूप तथा प्रकृति बतलाते हैं। बुध के शरीर की कान्ति नवीन दूब के समान है। इसमें वात, पित्त, कफ, त्रिदोषों का सम्मिश्रण है। इसका आशय यह है कि जन्मकुण्डली में बुध यदि पीड़ित हो तो अपनी दशा-अन्तर्दशा में वायु से उत्पन्न, कफ से उत्पन्न तथा पित्त से उत्पन्न तीनों प्रकार के रोग उत्पन्न कर सकता है। यह नसों से युक्त हैं (कहने का तात्पर्य यह है कि शरीर में जो स्नायु मंडल है—जिसे अंग्रेजी में नर्वस सिस्टम कहते हैं उसका अधिष्ठाता बुध है। यदि बुध पीड़ित होतो नर्वस सिस्टम में खराबी होगी।) बुध स्वभाव से मधुर वाणी बोलने वाला होता है। इसके शरीर के अंग बराबर हैं अर्थात् सुडौल हैं। जो जितना बड़ा होना चाहिये वह अंग वैसा ही है। बुध मज़ाकपसंद है। जिन स्त्रियों या पुरुषों की कुण्डलियों में बुध चन्द्रमा से युक्त होता है वे मज़ाकपसंद होते हैं। कोई-न-कोई तमसखुर की बात बोलते रहते हैं। जिस प्रकार मंगल में मज्जा प्रधान है इसी प्रकार बुध त्वचा प्रधान है। त्वचा शरीर के सबसे ऊपर की जिल्द (खाल) को कहते हैं। बुध अच्छा होने से त्वचा अच्छी होगी, बुध पापाक्रान्त होने से त्वचा के रोग होंगे। बुध के नेत्र लंबाई लिये हैं और वह हरे वस्त्र धारण करता है। यह बुध का स्थूल परिचय है; अब बृहस्पति के विषय में कहते हैं ॥ ११ ॥ बृहस्पति का पीला वर्ण है किन्तु नेत्र और सिर के बाल कुछ भूरापन लिये हुए हैं। इसकी छाती पुष्ट और ऊंची है और बड़ा शरीर है। यह कफ प्रधान है। वैद्यक शास्त्र में कफ प्रकृति वालों में जो लक्षण बताये गये हैं, वे उस व्यक्ति में घटित होंगे जिसकी कुण्डली में बलवान् बृहस्पति लग्न में होगा या बलवान् होकर नवांश का स्वामी है। बृहस्पति बलवान् होने से मनुष्य बहुत बुद्धिमान् होता है; बुध से भी बुद्धि देखी जाती है और बृहस्पति से भी। तब दोनों से ही बुद्धि का विचार किया जावे तो तारतम्य क्या होगा ? बुध से किसी बात को शीघ्र समझ लेना, किसी विषय का
४० फलदीपिका प्रकार सकेत मात्र से श्लोकों में बातें बतायी गई हैं । जन्मकुण्डली में या प्रश्नकुण्डली में अपनी बुद्धि से ऊहापोह द्वारा इन बताई हुई बातों का उपयोग करना चाहिये । चन्द्रमा के स्थान निम्नलिखित हैं :—दुर्गा जी का मन्दिर, जिस कमरे में स्त्री या स्त्रियां रहती हों, ऐसा स्थान जहाँ जल, औषधि (जड़ी, बूटी आदि) शहद, या शराब हो । चन्द्रमा पश्चिमोत्तर (वायव्य) दिशा का स्वामी है । अब मंगल के विषय में कहते हैं कि युद्ध भूमि, जहां अग्नि हो, या जहां चोर और म्लेच्छ रहते हों, इनका आधिपत्य मंगल का है। मंगल दक्षिण दिशा का स्वामी है । बुध निम्नलिखित स्थानों का अधिपति है :—जहां विष्णु मन्दिर हो, जहां विद्वान् लोग बैठते हों, आमोद-प्रमोद का स्थान, जहां ज्योतिषी या गणित कर्ता बैठते हों । बुध की दिशा उत्तर है । अब बृहस्पति के स्थान बताते हैं । खजाना, पीपल का वृक्ष, देवताओं और ब्राह्मणों के रहने का स्थान—इनका अधिपति बृहस्पति है । यह ईशान (पूर्वोत्तर) दिशा का स्वामी है । अब शुक्र के विशेष स्थान बताते हैं—वेश्याओं के घर, जहां पर्दे में स्त्रियों को रखा जाता हो, शयन स्थान, नाचने की जगह । शुक्र आग्नेय (पूर्व-दक्षिण) दिशा का स्वामी है । शनि के स्थान निम्नलिखित हैं—जहां नीची श्रेणी के लोग रहते हों, शास्ता१ का मन्दिर, अपवित्र स्थान, यह शनि के रहने के स्थान हैं। यह पश्चिम दिशा का स्वामी है । अब राहु, केतु के स्थान बताते हैं । वल्मीक (दीमक के कीड़ों द्वारा बनाया हुआ जंगल में उच्च स्थान) जहां सांप रहते हों, ऐसे छिद्र जिनमें अन्धेरा हो, राहु केतु पश्चिम- दक्षिण (नैऋत्य) दिशा के स्वामी होते हैं ॥ १५ ॥ १६ ॥ शैवो भिषङ्नृपतिरध्वरकृत्प्रधानी व्याघ्रो मृगो दिनपतेः किल चक्रवाकः शास्ताङ्गनारजककर्षकतोयगाः स्यु- रिन्दोः शशश्च हरिणश्च बकश्चकोरः ॥१७॥ १. देवता विशेष ।
? मेंढ़ा. In Hindi, मेंढ़ा.
Line 24:
बुध—ग्वाला, विद्वान् आदमी, शिल्पी, उत्तम हिसाब करने वाला
Wait, विद्वान् has halanta: विद्वान्.
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या ज्योतिषी विष्णु भक्त, गरुड़, चातक, तोता तथा बिल्ली ।
Wait, विष्णु भक्त or विष्णुभक्त?
There is a space: विष्णु भक्त.
Let's double-check all line numbers and exact lines from top to bottom.
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दूसरा अध्याय : ग्रह भेद ४१
भौमो महानसगतायुधभृत्सुवर्ण-
˙काराजकुकुटशिवाकपिगृध्रचोराः ।
Wait, L3: is there a quote mark or apostrophe or dot?
It looks like ' or ˙. In printing, sometimes a stray mark or opening quote: ‘काराज.... But often it's an ink speck. Let's look at other places. There are a few tiny ink specks (like on L11 near स्युः).
Wait, could it be an avagraha? No, सुवर्ण- ends L2, L3 starts with काराज... because the word was सुवर्णकाराज....
Wait, why would there be a mark? In some books, a hyphen is at the
४२ फलदीपिका बृहस्पति—ज्योतिषी, मन्त्री, गुरु, ब्राह्मण, सन्यासी¹, मुख्य पुरुष, कबूतर, घोड़ा, हंस । शुक्र—गाने वाला, धनी, वैश्य (सौदागर), व्यभिचारी या कामी पुरुष, नट, कपड़ा बुनने वाला, वेश्या, मोर, गाय, भैंस, तोता । शनि—तेल बेचने व खरीदने वाला, नौकर, नीच पुरुष, शिकारी, लुहार, हाथी, कौआ, कोयल । राहु केतु—बौद्ध, सांप पकड़ने वाला, गधा, मेंढ़ा, भेड़िया, ऊंट, सांप, मच्छर, खटमल, कीड़े मकोड़े, उल्लू, ऐसा स्थान जहां अन्धेरा रहता हो । ऊपर जो विविध ग्रहों से सम्बन्धित जानवर, पदार्थ, व्यवसाय, वस्त्र या स्थान का उल्लेख किया गया है इसको विस्तारपूर्वक समझाने के लिये बहुत स्थान चाहिये केवल एक उदाहरण देकर इसका उपयोग बताया जाता है । मान लीजिये किसी व्यक्ति की जन्मकुण्डली में बलवान् शुक्र की महादशा प्रारंभ हो रही हो तो ऊपर जो शुक्र से सम्बन्धित--शुक्र के व्यक्ति किंवा वस्तु का निर्देश किया गया है उनसे लाभ होगा । अनेक वस्तुओं में से किस से ? यदि देहात का रहने वाला खेतिहर है तो सम्भवतः गायों से लाभ हो जाय—यदि बम्बई में रहने वाला सिनेमा लाइन का बड़ा डाइरेक्टर है तो वेश्याओं को नौकर रखकर नवीन चलचित्र बनाने से लाभ हो जावे । यह सब ग्रह के साथ-साथ परिस्थिति और सम्भावना देखकर कहना चाहिये ॥ १७-२० ॥ सौम्यः समोऽर्कजसितावहितौ खरांशो- रिन्दोर्हितौ रविबुधावपरे समाः स्युः । भौमस्य मन्दभृगुजौ तु समौ रिपुर्ज्ञः सौम्यस्य शीतगुररिः सुहृदौ सितार्कौ ॥२१॥ १. बहुत-से टीकाकार मुख्य सन्यासी यह अर्थ करते हैं परन्तु हम उनसे सहमत नहीं ।
दूसरा अध्याय : ग्रह भेद ४३ सुरेद्धिषौ कविबुधौ रविजः समः स्या- न्मध्यौ कवेर्गुरुकुजौ सुहृदौ शनिज्ञौ । जीवः समः सितविदौ रविजस्य मित्रे ज्ञेया अनुक्तखचरास्तु तदन्यथा स्युः ॥२२॥ इन दो श्लोकों में यह बताया गया है कि किस ग्रह के कौन मित्र हैं; कौन शत्रु हैं और कौन से न शत्रु न मित्र । जो न मित्र होते हैं न शत्रु होते हैं उन्हें ज्योतिष में "सम" कहते हैं ।
| ग्रह | मित्र | सम | शत्रु |
|---|---|---|---|
| सूर्य | चं० मं० वृ० | बु० | शु० श० |
| चन्द्र | सू० बु० | मं० वृ० शु०श० | |
| मंगल | सू० चं० वृ० | शु० श० | बु० |
| बुध | सू० शु० | मं० वृ० श० | चं० |
| बृहस्पति | सू० चं० मं० | श० | बु० शु० |
| शुक्र | बु० श० | मं० वृ० | सू० चं० |
| शनि | बु० शु० | वृ० | सू० चं० मं० |
| यह नैसर्गिक मैत्री चक्र है अर्थात् स्वभाव से कौन ग्रह किसका मित्र | |||
| होता है कौन किसका शत्रु आदि । अब आगे के श्लोक में यह बतावेंगे कि | |||
| किसी जन्मकुण्डली में कोई दो ग्रह आपस में मित्र हैं या शत्रु यह कैसे | |||
| देखना ॥ २१-२२ ॥ | |||
| अन्योन्यं त्रिसुखस्वलान्त्यभवगास्तत्कालमित्राण्यमी | |||
| तन्नैसर्गिकमप्यवेक्ष्य कथयेत्तस्यातिमित्राहितान् । | |||
| शौर्याज्ञे रविजो गुरुर्गुरुसुतौ भौमश्चतुर्थाष्टमौ | |||
| पूर्णं पश्यति सप्तमं च सकलास्तेष्वंध्रिवृद्ध्या क्रमात् ॥२३॥ | |||
| ऊपर नैसर्गिक या स्वाभाविक मैत्री बतलाने के बाद अब तात्कालिक |
४४ फलदीपिका
मैत्री बताते हैं। जिस ग्रह का विचार करना हो उससे द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ, दशम, एकादश, द्वादश स्थान में जो ग्रह होते हैं वे उसके मित्र होते हैं तथा विचारणीय ग्रह से जो ग्रह प्रथम (उसी राशि में) पाँचवें, छठ, सातवें, आठवें, नवें, घर होता है वह उसका शत्रु होता है। यह दो प्रकार की मैत्री देखने के बाद यह नतीजा निकालना चाहिये कि परिणामतः वे मित्र हुए, सम या शत्रु । (१) जो नैसर्गिक तथा तात्कालिक दोनों प्रकार से मित्र हों वे अधिमित्र (अत्यन्त मित्र) हुए । (२) जो दोनों प्रकार से शत्रु हुए वे अधिशत्रु (अत्यन्त शत्रु) हुए। (३) जो एक जगह मित्र और एक जगह शत्रु, वे सम (न शत्रु न मित्र ) हुए । (४) जो एक जगह मित्र और दूसरी जगह सम वे मित्र हुए । (५) जो एक जगह शत्रु और दूसरी जगह सम वे शत्रु हुए। इस प्रकार जन्मकुण्डली में मित्रामित्र चक्र बनाकर देखना चाहिये। इसका प्रयोजन क्या ? जो अधिमित्र या मित्र के घर में होता है वह शुभ फल देता है। क्रूर हो तो भी उतना खराब फल नहीं देता। जो शत्रु या अधिशत्रु के घर में हो वह अच्छा फल नहीं देता, वह यदि शुभ ग्रह हो तो भी उतना अच्छा फल नहीं देता। क्रूर ग्रह हो तो भी बहुत ही खराब फल देगा।
ग्रहों की दृष्टि—कौन-सा ग्रह किस स्थान को किस दृष्टि से देखता है यह नीचे के चक्र में बताया जाता है।
दृष्टिचक्र पूर्ण त्रिपाद आधी चौथाई सूर्य ७ ४, ८ ५, ९ ३, १० चन्द्र ७ ४, ८ ५, ९ ३, १० मंगल ४, ८, ७ ५, ९ ३, १०
दूसरा अध्याय : ग्रह भेद ४५ पूर्ण त्रिपाद आधी चौथाई बुध ७ ४, ८ ५, ९ ३, १० बृहस्पति ५, ७, ९ ४, ८ ३, १० शुक्र ७ ४, ८ ५, ९ ३, १० शनि ३, १०, ७ ४, ८ ५, ९ सूर्य की सातवें स्थान पर पूर्ण दृष्टि होती है ; चौथे और आठवें स्थान पर तीन चौथाई, पांचवें और नवें स्थान पर आधी तथा तीसरे और दसवें स्थान पर एक चौथाई । इसी प्रकार दिये गये चक्र के अनुसार अन्य ग्रहों के विषय में समझना चाहिये ॥ २३ ॥ सूर्यादेरयनं क्षणो दिनमृतुर्मासश्च पक्षः शर- द्विप्रौ शुक्रगुरू रविक्षितिसुतौ चन्द्रो बुधोऽन्त्यः शनिः । प्राहुः सत्त्वरजस्तमांसि शशिगुर्वर्काः कविज्ञौ परे ˙ ग्रीष्मादर्ककुजौ शशी शशिसुतो जीवः शनिर्भार्गवः ॥२४॥ ग्रहों के स्वरूप और लक्षण कुछ तो पहले बताये गये हैं और कुछ नीचे बताये जाते हैं । प्रत्येक ग्रह कितने काल का अधिष्ठाता है उसकी जाति क्या है; सतोगुणी है या रजोगुणी या तमोगुणी और किस ऋतु के वे अधिष्ठाता हैं यह नीचे के चक्र से स्पष्ट होगा । ग्रह काल जात¹ गुण ऋतु सूर्य आधा वर्ष क्षत्रिय सात्विक ग्रीष्म चन्द्र २ घड़ी वैश्य सात्विक वर्षा मंगल एक दिन क्षत्रिय तामसिक ग्रीष्म बुध दो महीना शूद्र राजसिक शरद् बृहस्पति एक महीना ब्राह्मण सात्विक हेमन्त शुक्र १५ दिन ब्राह्मण राजसिक वसन्त शनि १ वर्ष म्लेच्छ तामसिक शिशिर १. बहुत-से ज्योतिष ग्रन्थ चन्द्रमा को ब्राह्मण, बुध को वैश्य मानते हैं ।
४६ फलदीपिका ताताम्बे रविभार्गवौ दिवि निशि प्राभाकरीन्दू स्मृतौ तद्व्यस्तेन पितृव्यमातृभगिनीसंज्ञौ तदा तत्क्रमात् । वामाक्षीन्दुरिनोऽन्यदक्षि कथितो भौमः कनिष्ठानुजो जीवो ज्येष्ठसहोदरः शशिसुतो दत्तात्मजः संज्ञितः ॥२५॥ अब यह बताते हैं कि किस-किस ग्रह से क्या-क्या और विचार करना चाहिये । सूर्य—यदि दिन में जन्म हो तो पितृ कारक, यदि रात्रि में जन्म हो तो चाचा का कारक । शरीर में दक्षिण नेत्र पर इसका विशेष अधिकार है । चन्द्रमा—यदि रात्रि में जन्म हो तो मातृ कारक, यदि दिन में जन्म हो तो चन्द्रमा से मौसी का विचार करें । शरीर में, बायें नेत्र पर इसका विशेष अधिकार है । मंगल—मंगल से छोटे भाई का विचार करना चाहिये । बुध—गोद लिया हुआ पुत्र (दत्तक पुत्र) । वृहस्पति—बड़ा भाई । शुक्र—यदि दिन में जन्म हो तो मातृ कारक, यदि रात्रि में जन्म हो तो इससे मौसी का विचार करे । शनि—यदि दिन में जन्म हो तो चाचा का विचार इससे करे और यदि रात्रि में जन्म हो तो इससे पिता का विचार करे ॥ २५ ॥ देहो देही हिमरुचिरिनस्त्विन्द्रियाण्यारपूर्वा आदित्यद्विड्गुलिकशिखिनस्तस्य पीडाकराः स्युः । गन्धः सौम्यो भृगुजशशिनौ द्वौ रसौ सूर्यभौमौ रूपौ शब्दो गुरुरथ परे स्पर्शसंज्ञाः प्रदिष्टाः ॥२६॥ प्रत्येक ग्रहों से अनेक बातों का विचार किया जाता है । यहां कुछ और विषय बताये जाते हैं कि किसका विचार किससे किया जाय । सूर्य आत्मा है, चन्द्रमा शरीर है, मंगल आदि पांचों ग्रहों का पांचों
दूसरा अध्याय : ग्रह भेद ४७ ज्ञानेन्द्रियों पर अधिकार है। सूर्य और मंगल तेज के अधिष्ठाता हैं और दृष्टि (देखने की शक्ति) पर इनका अधिकार है । चन्द्रमा और शुक्र का रसनेन्द्रिय पर विशेष अधिकार है क्योंकि यह दोनों जल तत्व के अधिष्ठाता हैं । बुध घ्राणेन्द्रिय का अधिष्ठाता है । क्योंकि इसमें पृथ्वी तत्व अधिक है। बृहस्पति आकाश तत्व प्रधान होने से श्रवणेन्द्रिय का अधिष्ठाता है। शनि, राहु और केतु वायु के अधिष्ठाता हैं और इनसे स्पर्श का विचार करना चाहिये । प्रयोजन क्या ? यदि बृहस्पति पीड़ित होगा तो मनुष्य बहरा हो जावेगा या कम सुनेगा। राहु, गुलिक और केतु सूर्य के शत्रु हैं इस कारण मनुष्य की आत्मा और शरीर को कष्ट पहुंचाते हैं ॥२५॥ क्षीणेन्द्वर्ककुजाहिकेतुरविजाः पापाः सपापश्च वित् क्लीबाः केतुबुधार्कजाः शशितमःशुक्राः स्त्रियोऽन्ये नराः । रुद्राम्बागुहविष्णुधातृकमलाकालाह्वजा देवताः सूर्यादग्निजलाग्निभूमिखपयोवाय्वात्मकाः स्युर्ग्रहाः ॥२७॥ क्षीण चन्द्रमा सूर्य, मंगल, राहु, केतु और शनि पाप ग्रह हैं। यदि बुध पाप ग्रहों के साथ बैठा हो तो पापी; यदि शुभ-ग्रह के साथ बैठा हो तो शुभ। ऊपर जो क्षीण चन्द्रमा, सूर्य आदि जिस क्रम से ग्रहों का नाम लिखा गया है उसी क्रम से उन्हें क्रमशः अधिकाधिक पापी समझना चाहिये । यह ग्रन्थकार का अभिप्राय मालूम होता है। बहुतों के मत से पापी केवल मंगल, शनि, राहु, केतु होते हैं। सूर्य क्रूर होता है पापी नहीं। बुध और चन्द्रमा स्वभावतः शुभ ग्रह हैं। बुध केतु और शनि नपुंसक हैं। चन्द्रमा राहु और शुक्र स्त्री ग्रह हैं । सूर्य, मंगल और बृहस्पति पुरुष ग्रह हैं। सूर्य का अग्नि तत्व है, इसका अधिष्ठाता देवता रुद्र है। चन्द्रमा का १. गुलिक शनि का बेटा है, यह कोई ग्रह नहीं है। इसका स्थान बदलता रहता है ।
४८ फलदीपिका जल तत्व । इसकी अधिष्ठात्री देवी अम्बा (पार्वती) । मंगल का अग्नि तत्व और देवता कार्तिक स्वामी । बुध का पृथ्वी तत्व और इसके अधिष्ठाता देव विष्णु हैं । बृहस्पति का आकाश तत्व और ब्रह्मा देवता । शुक्र का जल तत्व और अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी । शनि का वायु तत्व और देवता यम । राहु का अधिष्ठाता आदि शेष और केतु का ब्रह्मा है । राहु और केतु चमकने वाले ग्रह नहीं हैं; ये केवल स्थान विशेष हैं इस कारण इनके तत्व का निर्देश नहीं किया । वैसे शनि की तरह वात प्रभाव दिखाने के कारण वायु तत्व माना जा सकता है । ग्रहों के अधिष्ठाता देवता बताने का तात्पर्य यह है कि जिस ग्रह का नवें या पांचवें घर से सम्बन्ध हो उस ग्रह से सम्बन्धित देवता में भक्ति होगी । देखिये कल्याण वर्ष २८ संख्या ४ में हमारा लेख भगवद्भक्ति और नवग्रह । जिस ग्रह की महादशा अन्तर्दशा में रोग या पीड़ा हो उस ग्रह से सम्बन्धित देवता की आराधना से पीड़ा शीघ्र शान्त होगी । गोधूमं तण्डुलं वै तिलचणककुलुत्थाढकश्याममुद्गा निष्पावा माष अर्केन्द्वसितगुहशिखिक्रूरविद्भूग्वहीनाम् । भोगीनाक्यर्जरिजोवज्ञशशिशिखिसितेष्वम्बराख्यं कलिङ्गं सौराष्ट्रावन्तिसिन्धून्सुमगधयवनान्पर्वतान्कीकटाइंच ॥२८॥ माणिक्यं तरणेः सुधायममलं मुक्ताफलं शीतगो- र्माहेयस्य च विद्रुमं मरकतं सौम्यस्य गारुत्मतम् । देवेड्यस्य च पुष्परागमसुरामात्यस्य वज्रं शने- र्नीलं निर्मलमन्ययोश्च गदिते गोमेधवैदूर्यके ॥२९॥ इसे श्लोकों में किस ग्रह का किस अन्न पर विशेष प्रभाव है और किस देश या प्रान्त विशेष पर विशेष अधिकार है—आदि बताते हैं ।
दूसरा अध्याय : ग्रह भेद ४९ सूर्य गेहूँ कलिंग माणिक चन्द्रमा चावल यवन स्वच्छ मोती मंगल मसूर अवन्ती मूंगा बुध मूंग मगध पन्ना बृहस्पति चना सिन्धु पुखराज शुक्र श्याम मूंग¹ कीकट हीरा शनि तिल सौराष्ट्र नीलम राहु उड़द अम्बर गोमेद केतु कुल्थी पर्वत लहसनिया भारतवर्ष एक महान् देश है, देश के किस भाग में मनुष्य की उन्नति होगी ? जो ग्रह कुण्डली में बलवान् हो वह जिस प्रदेश का, अधिष्ठाता है उसमें विशेष अभ्युदय की आशा है। जो ग्रह कुण्डली में निर्बल या पीड़ित है, उससे सम्बन्धित देश में मनुष्य का उत्थान नहीं होगा। अन्न विशेष का फलित में उपयोग यही होता है कि पीड़ा कारक ग्रह की दशा-अन्तर्दशा या अनिष्ट गोचर काल में उस ग्रह से सम्बन्धित अन्न का दान करना चाहिये ॥ २८-२९ ॥ ताम्रं कांस्यं धातुताम्रं त्रपु स्यात् स्वर्णं रौप्यं चायसं भास्करादेः । वस्त्रं तत्तद्वर्णयुक्तं विशेषाज्जीर्णं मन्दस्याग्निदग्धं कुजस्य ॥३०॥ भानोः कटुर्भूमिसुतस्य तिक्तं लावण्यमिन्दोरथ चन्द्रजस्य । मिश्रीकृतं यन्मधुरं गुरोस्तु शुक्रस्य चाम्लं च शनेः कषायः ॥ अब ग्रहों के धातु, वस्त्र विशेष तथा भोजन के किस प्रकार के स्वाद का कौन-सा ग्रह अधिष्ठाता है, यह बताया जाता है। १. श्याम मूंग या काले मूंग से किस अन्न से तात्पर्य है यह समझ में नहीं आता। अन्य ज्योतिष के ग्रंथों में शुक्र का अन्न श्वेत चावल लिखा है।
५० फलदीपिका ग्रह धातु वस्त्र स्वाद सूर्य तांबा केसरिया कड़वा चन्द्रमा कांसा सफेद नमकीन मंगल तांबा लाल (जला हुआ) तिक्त (तीखा) बुध सीसा हरा मिला-जुला बृहस्पति सोना पीला मीठा शुक्र चाँदी सफेद या धब्बेदार खट्टा शनि लोहा काला (पुराना) कसैला विशेष यह है कि मंगल से—अग्नि से जला हुआ कपड़ा तथा शनि से पुराना जीर्ण वस्त्र समझना चाहिये। सूर्य का स्वाद कड़वा और मंगल का तिक्त या तीखा बताया गया है। भारतीय पद्धति में मधुर कटु, अम्ल, तिक्त, कषाय और लवण ये छः रस माने गये हैं सो छः ग्रहों के छः रस अलग-अलग बताये गये हैं। बुध का मिला जुला। भास्वग्दीष्पतिचन्द्रजक्षितिभुवां स्याद्दक्षिणे लाञ्छनं शेषाणामितरत्र तिग्मकिरणात्कट्यां शिरःपृष्ठयोः। कक्षेंऽसे वदने च सक्थिचरणे चिह्नं वयांस्यर्कतो नेमे नाथ तटं नखं नग सनि ज्ञानाढ्य नग्नाटनम् ॥३२॥ अब ग्रहों के चिह्न स्थान किस ओर (दाहिनी ओर या बायीं ओर), तथा ग्रहों की अवस्था (उम्र) बतायी जाती है। सूर्य दाहिनी ओर कूल्हे पर या कमर पर उम्र ५० वर्ष चन्द्र बायीं ओर सिर पर ,, ७० ,, मंगल दाहिनी ओर पीठ पर ,, १६ ,, बुध दाहिनी ओर १बगल में ,, २० ,, बृहस्पति दाहिनी ओर कंधे पर ,, ३० ,, शुक्र बायीं ओर चेहरे पर ,, ७ ,, शनि बायीं ओर पैर (टांग) में ,, १०० ,, १. बगल—कांख।
दूसरा अध्याय : ग्रह भेद ५१ राहु की भी अवस्था १०० कही गयी है। जहां सौ वर्ष की संख्या बतायी गई.है वहां पूरे सौ वर्ष न समझकर अति वृद्ध समझना चाहिये । चोरी आदि के प्रश्न के फलादेश में जो चिह्न (लाँछन या लहसन) शरीर का भाग और अवस्था आदि बतायी गई है उससे सहायता मिल सकती है । नीलद्युतिर्दीर्घतनुः कुवर्णः पामी सपाषण्डमतः सहिक्कः । असत्यवादी कपटो च राहुः कुष्ठी परान्निन्दति बुद्धिहीनः ॥३३॥ रक्तोग्रदृष्टिर्विषवागुदग्रदेहः सशस्त्रः पतितश्च केतुः । धूम्रद्युतिर्धूमप एव नित्यं व्रणाङ्किताङ्गश्च कृशो नृशंसः ॥३४॥ सीसं च जीर्णवसनं तमसस्तु केतो- मृद्भाजनं विविधचित्रपटं प्रदिष्टम् । मित्राणि विच्छनिसितास्तमसोर्द्वयोस्तु भौमः समो निगदितो रिपवश्च शेषाः ॥३५॥ अब राहु केतु का कुछ विशेष परिचय देते हैं । राहु का दीर्घ शरीर है, नीला रंग है, इसकी म्लेच्छ जाति, शरीर में खुजली या चर्म रोग है यह अधार्मिक, पाखण्डमति है । इसको हिचकियां आती हैं, झूठ बोलता है । कपटी है, कोढ़ी है, बुद्धिहीन है और दूसरों की निन्दा करता है । केतु की आंखें लाल और उग्र हैं, उसकी वाणी में विष है, ऊंचा शरीर, शस्त्र धारण किये है, धुयें का-सा उसके शरीर का रंग है और सदैव धूम्रपान, (सिगरेट पीना) आदि करता रहता है । उसके शरीर में व्रणों (घावों) के निशान हैं। शरीर से कृश है परन्तु स्वभाव से क्रूर और अत्याचार करने वाला है । यह जाति से भी पतित है । इन लक्षणों का प्रयोजन क्या ? यदि किसी मनुष्य के द्वितीय स्थान में केतु हो तो वह कठोर वचन बोलने वाला होगा । यदि राहु की अन्तर्दशा में किसी व्यक्ति
५२ फलदीपिका का अहित हुआ है तो आप कह सकते हैं कि "दूसरे की निन्दा करने के कारण" यह अनिष्ट हुआ है। जब अनेक लक्षण बताये जाते हैं तो परिस्थिति का विचार कर लक्षण विशेष से फलादेश का विचार किया जाता है यह ज्योतिषियों का सम्प्रदाय है । राहु का धातु सीसा है और पुराने (जीर्ण) कपड़ों पर इसका आधिपत्य है। केतु का मिट्टी का बर्तन और धब्बेदार कपड़ा। केतु, राहु के मित्र बुध, शुक्र, शनि हैं। मंगल न मित्र है और न शत्रु । सूर्य, चन्द्र, बृहस्पति इनके शत्रु हैं। मूढोऽपि नीचरिपुगोऽष्टमषड्व्ययस्थो दुःस्थः स्मृतो भवति सुस्थ इतीतरः स्यात् । यदि कोई ग्रह अस्त हो, नीच राशि में या नीच अंश (नवांश) में हो, शत्रु राशि में हो या लग्न से छठे, आठवें, बारहवें स्थान में हो तो उसे दुःस्थ (ख़राब जगह में स्थित) कहते हैं। यदि ऊपर जो स्थान बताये गये हैं उनके अलावा स्थानों में हो तो उसे सुस्थ (अच्छी जगह वाला) कहते हैं। चन्द्रे व्ययायतनुषट्सुतकामसंस्थे तोयाभिवृद्धिमिह शंसति वृद्धिकार्ये॥३६॥ यदि जल¹ के विषय में कोई प्रश्न किया और चन्द्रमा प्रथम, पञ्चम, छठे, सातवें, ग्यारहवें या बारहवें स्थान में हो तो जल वृद्धि होगी । यह फलादेश करना चाहिये । १. बांध बंधवाना, कुंआ खुदवाना आदि । अस्त—जब कोई ग्रह सूर्य के इतने समीप हो कि सूर्य के प्रकाश के कारण दिखलाई न दे तो उसे अस्त कहते हैं। चन्द्रमा सूर्य से १२ अंश दूर तक (सूर्य के अंश चन्द्रमा के अंशों से १२ अंश कम हों या अधिक) तक अस्त रहता है यह अमावस्या तथा शुक्ल पक्ष की पड़वा को होता है । मंगल सूर्य से १७ अंश की दूरी तक अस्त रहता है। यदि बुध मार्गी हो तो सूर्य से १४
दूसरा अध्याय : ग्रह भेद ५३ अन्तः सारसमुन्नतद्रुररुणो वल्ली सितेन्दू स्मृतौ गुल्मः केतुरहिश्च कण्टकनगौ भौमार्कजौ कीर्तितौ । वागीशः सफलोऽफलः शशिसुतः क्षीरप्रसूनद्रुमौ शुकेन्दू विधुरोषधिः शनिरसारागश्च सालद्रुमः ॥३७॥ किस ग्रह का किस प्रकार के वृक्षों पर विशेष आधिपत्य है, यह नीचे बताया जाता है। जो वृक्ष ऊँचे हों और अन्तःसार (जिनके भीतर कठोरता या दृढ़ता हो) उन पर सूर्य का विशेष अधिकार होता है। लता, वल्ली आदि पर चन्द्रमा और शुक्र का, गुल्मों और झाड़ियों पर राहु और केतु का विशेष अधिकार है। कांटेदार वृक्षों पर शनि और मंगल का। फलदार वृक्ष बृहस्पति के वर्ग में हैं। बिना फल के वृक्षों पर बुध का अधिकार है। जितने वृक्ष पुष्पों से युक्त हों या जिनमें रस हो (वृक्षों से जो दूध निकलता है) उनको शुक्र और चन्द्रमा के हिस्से में समझना चाहिये। औषधियों (जड़ी बूटियों का) का स्वामी चन्द्रमा है। जिन वृक्षों में रस विशेष न हों और कमजोर हों उन पर शनि का विशेष प्रभाव समझिये। साल के वृक्षों पर राहु का आधिपत्य है। किसी-किसी का ऐसा भी मत है कि फल वाले वृक्षों पर बृहस्पति का, पुष्प बहुल वृक्षों पर शुक्र का और पत्र बहुल वृक्षों पर बुध का आधिपत्य समझना चाहिए। वैसे तो प्रत्येक वृक्ष में पत्र, पुष्प, फल आदि होते हैं परन्तु उस वृक्ष में प्रधानता किसकी है यह देखना चाहिये। कटहल में फलों की प्रधानता है, मौलश्री में पुष्प की प्रधानता है और अशोक में पत्ते की प्रधानता है। अंश की दूरी तक अस्त रहता है! यदि बुध वक्री हो तो १२ अंश की दूरी तक अस्त होता है। बृहस्पति सूर्य से ११ अंश दूर तक अस्त होता है। शुक्र यदि मार्गी हो तो सूर्य से १० अंश तक अस्त; किन्तु यदि शुक्र वक्री हो तो सूर्य से ८ अंश तक अस्त। सूर्य के जितने अंश हो उनसे १५ अंश पहिले और १५ अंश बाद तक शनि अस्त होता है।
तीसरा अध्याय वर्ग-विभाग क्षेत्रत्रिभागनवभागदशांशहोराँत्रिंशांशसप्तलवषष्टिलवाः कलांशाः। ते द्वादशांशसहिता दशवर्गसंज्ञा वर्गोत्तमो निजनिजे भवने नवांशः ॥१॥ दशांशषष्ट्यंशकलांशहीनास्ते सप्तवर्गाश्च विसप्तमांशाः । षड्वर्गसंज्ञास्त्वथ राशिभावतुल्यं नवांशस्य फलं हि केचित् ॥२॥ क्षेत्रेषु पूर्णमुदितं फलमन्यवर्गे- ष्वर्द्धं कलादशमषष्टिलवेषु पादम् । बालः कुमारतरुणौ प्रवया मृतः षड् भागः क्रमाद्युजि विपर्ययमित्यवस्थाः ॥३॥ क्षेत्रस्यार्द्धं हि होरा त्वयुजि रविसुधांश्वोः समे व्यस्तमेतद् द्रेष्काणेशास्त्रिभागैस्तनुसुतशुभपा द्वादशांशस्तु लग्नात् । भौमार्कीड्यज्ञशुक्राः शिशुजसमलवा ह्योजभे युग्मभे तद्- व्यस्तं त्रिंशांशनाथाः क्रियमकरतुलाः कर्कटाद्या नवांशाः ॥४॥ यज्ञं रत्नं जनं धनं नय पटं रूपं शुकं चेटीना नागं योगं खगं बलं भग शिला धूलिर्नवं प्रस्वनम् । लाभं विश्वं दिवं कुशं रम धमं षष्ट्यंशकाश्चौजभे क्रूराख्याः समभे विपर्ययमिदं शेषास्तु सौम्याह्वयाः ॥ ५ ॥ स्वात् सप्तांशदशांशकौ तु विषमे युग्मे तु कामाच्छुभात् स्वादीशाश्च कलांशपा विधिहरीशार्काः समर्क्षेऽन्यथा ।
तीसरा अध्याय : वर्ग विभाग ५५ ख्यातैः कोणयुतैस्त्रिकोणभवनस्वर्क्षोच्चकेन्द्रोत्तमै- र्वर्गाः सप्त दश त्रयोदशमिता वर्गाः प्रदिष्टाः परैः ॥ ६ ॥ प्रथम अध्याय में विविध भावों का परिचय कराया; द्वितीय अध्याय में ग्रहों का परिचय दिया और अब तृतीय अध्याय में वर्गों का परिचय देते हैं। वर्ग का अर्थ है हिस्से। यदि सम्पूर्ण राशि को एक माना जाय और उसके दो हिस्से किये जायें तो प्रत्येक आधा हिस्सा होरा कहलाता है। यदि राशि के तीन बराबर हिस्से किये जायें तो प्रत्येक भाग द्रेष्काण कहलाता है। इसी प्रकार पांच हिस्से, सात हिस्से, दस हिस्से, बारह भाग, सोलह भाग--साठ भाग तक करने से जो विभाग उपस्थित होते हैं उन्हें वर्ग कहते हैं। (१) १ भाग—राशि प्रत्येक—३०° (२) दो भाग—होरा ,, १५ अंश का (३) तीन भाग—द्रेष्काण—१० अंश का (४) पाँच भाग—त्रिंशांश* ५, ७, या ८ अंश का (५) सात भाग—सप्तमांश— ४°—१७'—८" अंश का (६) नौ भाग—नवांश प्रत्येक ३°—२०' अंश का (७) दस भाग—दशमांश— ३ अंश का (८) बारह भाग—द्वादशांश—२°—३०' अंश का (९) षोडश भाग—षोडशांश— १—१६'—५२" अंश का (१०) साठ भाग—षष्ट्यंश— ३० कला का इन दस वर्गों में से जब केवल राशि, होरा, द्रेष्काण, नवांश, द्वादशांश और त्रिंशांश का विचार किया जाता है तो इसे षड्वर्ग कहते हैं। यदि षड् वर्ग के साथ सप्तमांश का भी विचार किया जावे तो इसे सप्त वर्ग विचार कहते हैं। यदि ऊपर जो दस वर्ग दिये गये हैं सब का विचार १. कोई भाग पाँच अंश का, कोई सात का, कोई आठ का होता है। सब त्रिंशांश बराबर नहीं होते ।
५६ फलदीपिका किया जाय तो इसे दश वर्ग विचार कहते हैं। नीचे दसों वर्गों के चक्र दिये जाते हैं जिससे स्पष्ट होगा कि किस राशि में किस अंश, कला' विकला तक किस राशि का वर्ग रहता है।
होरा चक्र
| मे० | बृ० | मि० | क० | सिं० | क० | तु० | बृ० | ध० | म० | कु० | मी० | रा० | |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सू० | चं० | सू० | चं० | सू० | चं० | सू० | चं० | सू० | चं० | सू० | चं० | अं० | १५ |
| चं० | सू० | चं० | सू० | चं० | सू० | चं० | सू० | चं० | सू० | चं० | सू० | अं० | ३० |
द्रेष्काण चक्र
| मे० | वृ० | मि० | क० | सिं० | क० | तु० | वृ० | ध० | म० | कुं० | मी० | रा० |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ से १० अंश |
| ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३ | ४ | ११ से २० अंश |
| ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | २१ से ३० अंश |
सप्तमांश चक्र
| भाग | मे. | वृ. | मि. | क. | सिं. | क. | तु. | वृ. | ध. | म. | कुं. | मी. | अंश |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्रथम भाग | १ | ८ | ३ | १० | ५ | १२ | ७ | २ | ९ | ४ | ११ | ६ | ४-१७-८ |
| द्वितीय ,, | २ | ९ | ४ | ११ | ६ | १ | ८ | ३ | १० | ५ | १२ | ७ | ८-३४-१७ |
| तृतीय ,, | ३ | १० | ५ | १२ | ७ | २ | ९ | ४ | ११ | ६ | १ | ८ | १२-५१-२५ |
| चतुर्थ ,, | ४ | ११ | ६ | १ | ८ | ३ | १० | ५ | १२ | ७ | २ | ९ | १७-८-३४ |
| पंचम ,, | ५ | १२ | ७ | २ | ९ | ४ | ११ | ६ | १ | ८ | ३ | १० | २१-२५-४२ |
| षष्ठ ,, | ६ | १ | ८ | ३ | १० | ५ | १२ | ७ | २ | ९ | ४ | ११ | २५-४२-५१ |
| सप्तम ,, | ७ | २ | ९ | ४ | ११ | ६ | १ | ८ | ३ | १० | ५ | १२ | ३०-०-० |
| यदि तीस अंशों को ७ से भाग दिया जावे तो ४ अंश १७ कला ८ | |||||||||||||
| विकला ३४ विकला आदि आता है परन्तु व्यावहारिक दृष्टि से ४-१७-८ | |||||||||||||
| लिखा है। विकला के भाग छोड़ दिये हैं क्योंकि स्पष्ट ग्रह विकला तक | |||||||||||||
| ही किये जाते हैं। |
तीसरा अध्याय : वर्ग विभाग ५७ पराशर होरा में इन सात भागों को क्रमशः (१) क्षार (२) क्षीर, (३) दधि, (४) आज्य, (५) इक्षुरस, (६) मद्य, (७) शुद्ध जल कहा गया है। नवांश चक्र
| भाग | मे. | वृ. | मि. | क. | सिं. | क. | तु. | वृ. | ध. | म. | कुं. | मी. | अंश |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्रथम भाग | १ | १० | ७ | ४ | १ | १० | ७ | ४ | १ | १० | ७ | ४ | ३-२० |
| द्वितीय ,, | २ | ११ | ८ | ५ | २ | ११ | ८ | ५ | २ | ११ | ८ | ५ | ६-४० |
| तृतीय ,, | ३ | १२ | ९ | ६ | ३ | १२ | ९ | ६ | ३ | १२ | ९ | ६ | १०-० |
| चतुर्थ ,, | ४ | १ | १० | ७ | ४ | १ | १० | ७ | ४ | १ | १० | ७ | १३-२० |
| पंचम ,, | ५ | २ | ११ | ८ | ५ | २ | ११ | ८ | ५ | २ | ११ | ८ | १६-४० |
| षष्ठ ,, | ६ | ३ | १२ | ९ | ६ | ३ | १२ | ९ | ६ | ३ | १२ | ९ | २०-० |
| सप्तम ,, | ७ | ४ | १ | १० | ७ | ४ | १ | १० | ७ | ४ | १ | १० | २३-२० |
| अष्टम ,, | ८ | ५ | २ | ११ | ८ | ५ | २ | ११ | ८ | ५ | २ | ११ | २६-४० |
| नवम ,, | ९ | ६ | ३ | १२ | ९ | ६ | ३ | १२ | ९ | ६ | ३ | १२ | ३०-० |
| दशमांश चक्र | |||||||||||||
| मे. | वृ. | मि. | क. | सिं. | क. | तु. | वृ. | ध. | म. | कु. | मी. | अंश | |
| :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | |
| १ | १० | ३ | १२ | ५ | २ | ७ | ४ | ९ | ६ | ११ | ८ | ३ | |
| २ | ११ | ४ | १ | ६ | ३ | ८ | ५ | १० | ७ | १२ | ९ | ६ | |
| ३ | १२ | ५ | २ | ७ | ४ | ९ | ६ | ११ | ८ | १ | १० | ९ | |
| ४ | १ | ६ | ३ | ८ | ५ | १० | ७ | १२ | ९ | २ | ११ | १२ | |
| ५ | २ | ७ | ४ | ९ | ६ | ११ | ८ | १ | १० | ३ | १२ | १५ | |
| ६ | ३ | ८ | ५ | १० | ७ | १२ | ९ | २ | १० | ४ | १ | १८ | |
| ७ | ४ | ९ | ६ | ११ | ८ | १ | १० | ३ | १२ | ५ | २ | २१ | |
| ८ | ५ | १० | ७ | १२ | ९ | २ | ११ | ४ | १ | ६ | ३ | २४ | |
| ९ | ६ | ११ | ८ | १ | १० | ३ | १२ | ५ | २ | ७ | ४ | २७ | |
| १० | ७ | १२ | ९ | २ | ११ | ४ | १ | ६ | ३ | ८ | ५ | ३० |
५८ फलदीपिका द्वादशांश चक्र राशि | मे. | वृ. | मि. | क. | सिं. | क. | तु. | वृ. | ध. | म. | कुं. | मी. | अ. क. | | प्रथम भाग | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | २-३० तक | | द्वितीय भाग | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | ५-० " | | तृतीय भाग | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | ७-३० " | | चतुर्थ भाग | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३ | १०-० " | | पंचम भाग | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३ | ४ | १२-३० " | | षष्ठ भाग | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३ | ४ | ५ | १५-० " | | सप्तम भाग | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | १७-३० " | | अष्टम भाग | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | २०-० " | | नवम भाग | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | २२-३० " | | दशम भाग | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | २५-० " | | एकादशभाग | ११ | १२ | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | २७-३० " | | द्वादश भाग | १२ | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | ३०-० " | षोडशांश चक्र राशि | भाग | मे. | वृ. | मि. | क. | सिं. | क. | तु. | वृ. | ध. | म. | कुं. | मी. | अं.क. वि. | | प्रथम भाग | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १-५२-३० | | द्वितीय भाग | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | ३-४५- ० | | तृतीय भाग | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ५-३७-३० | | चतुर्थ भाग | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ७-३०- ० | | पंचम भाग | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ९-२२-३० | | षष्ठ भाग | ६ | १० | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | २ | ११-१५- ० | | सप्तम भाग | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | १३- ७-३० | | अष्टम भाग | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | १५- ०- ० | | नवम भाग | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | १६-५२-३० | | दशम भाग | १० | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | २ | ६ | १८-४५- ० | | एकादशभाग | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | २०-३७-३० | | द्वादश भाग | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | २२-३०- ० | | त्रयोदशभाग | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | २४-२२-३० | | चतुर्दश भाग | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | २६-१५- ० | | पंचदश भाग | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | २८- ७-३० | | षोडश भाग | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ३०- ०- ० |