प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)
Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
विषयोंसे उपरत होकर मन जैसे-जैसे स्थिर होता जाता है,
प्रबोधसुधाकर नादानुसन्धान यावत्क्षणं क्षणार्धं स्वरूपपरिचिन्तनं क्रियते । तावद्दक्षिणकर्णे त्वनाहतः श्रूयते शब्दः ॥१४४॥ जब एक क्षण अथवा आधे क्षणके लिये भी स्वरूपका चिन्तन किया जाता है तब सीधे कानमें अनाहत-शब्द सुनायी देता है । सिद्ध्यारम्भस्थिरताविश्रमविश्वासबीजशुद्धीनाम् । उपलक्षणं हि मनसः परमं नादानुसन्धानम् ॥१४५॥ नादानुसन्धान मनके लिये सिद्धिके आरम्भ, स्थिरता, विश्राम, विश्वास और वीर्य-शुद्धिका बतलानेवाला परम चिह्न है । भेरीमृदङ्गशङ्खाद्याहतनादे मनः क्षणं रमते । किं पुनरनाहतेऽस्मिन्मधुमधुरेऽखण्डिते स्वच्छे ॥१४६॥ मन तो भेरी, मृदङ्ग और शङ्ख आदिके आघातजन्य नादों- में भी एक क्षणके लिये मग्न हो जाता है, फिर इस मधुवत् मधुर, अखण्डित और स्वच्छ अनाहत नादकी तो बात ही क्या है ? चित्तं विषयोपरमाद्यथा यथा याति नैश्चल्यम् । वेणोरिव दीर्घतरस्तथा तथा श्रूयते नादः ॥१४७॥ विषयोंसे उपरत होकर मन जैसे-जैसे स्थिर होता जाता है, वैसे-वैसे ही बाँसुरीके शब्दके समान दीर्घ और स्फुट नाद सुनायी पड़ने लगता है । ४२
मनोलय नादाभ्यन्तरवर्ति ज्योतिर्यद्वर्त्तते हि चिरम् । तत्र मनो लीनं चेन्न पुनः संसारबन्धाय ॥१४८॥ नादके भीतर रहनेवाली जो ज्योति है, उसमें यदि मन चिरकालतक लीन हो जाय तो फिर मनुष्य संसार-बन्धनमें नहीं पड़ता । परमानन्दानुभवात्सुचिरं नादानुसन्धानात् । श्रेष्ठश्चित्तलयोऽयं सत्स्वन्यलयेष्वनेकेषु ॥१४९॥ यद्यपि लयके और भी अनेक उपाय हैं तथापि जो चित्तलय दीर्घ कालतक नादानुसन्धान करते हुए परमानन्दका अनुभव होनेसे प्राप्त होता है वह सर्वोत्तम है ।
मनोलय
संसारतापतप्तं नानायोनिभ्रमात्परिश्रान्तम् । लब्ध्वा परमानन्दं न चलति चेतः कदा क्वापि ॥१५०॥ संसार-तापसे सन्तप्त और नाना योनियोंमें आने-जानेसे श्रान्त ( थका ) हुआ चित्त परमानन्दको प्राप्त करके फिर कभी चञ्चल नहीं होता । अद्वैतानन्दभरात्किमिदं कोऽहं च कस्याहम् । इति मन्थरतां यातं यदा तदा मूर्च्छितं चेतः ॥१५१॥ ४३
प्रबोधसुधाकर अद्वैतानन्दके उद्वेगसे जब 'यह क्या है ? मैं कौन हूँ ! और किसका हूँ ?' ऐसी जिज्ञासासे चित्त सुस्त पड़ जाता है तो [ अन्तमें ] वह मूच्छित हो जाता है । चिरतरमात्मानुभवादात्माकारं प्रजायते चेतः। सरिदिव सागरयाता समुद्रभावं प्रयात्युच्चैः ॥१५२॥ चिरकालतक आत्मानुभव करते रहनेसे चित्त आत्माकार हो जाता है, जिस प्रकार समुद्रको जानेवाली नदी अन्तमें पूर्णतया समुद्ररूप ही हो जाती है । आत्मन्यनुप्रविष्टं चित्तं नापेक्षते पुनर्विषयान् । क्षीरादुद्धृतमाज्यं यथा पुनः क्षीरतां न यातीह ॥१५३॥ आत्मस्वरूपमें लगा हुआ चित्त फिर बाह्य विषयोंकी इच्छा नहीं करता, जैसे दूधमेंसे निकाला हुआ घी फिर दुग्धभावको प्राप्त नहीं हो सकता । दृष्टौ द्रष्टरि दृश्ये यदनुस्यूतं च भानमात्रं स्यात् । तत्रोपक्षीर्णं चेच्चित्तं तन्मूर्च्छितं भवति ॥१५४॥ दृष्टि, द्रष्टा और दृश्यमें जो ज्ञानमात्र तत्त्व अनुस्यूत हो रहा है उसमें यदि चित्त लीन हो जाय तो वह मूर्च्छित हो जाता है । याति स्वसम्मुखत्वं दृङ्मात्रं वा यदा तदा भवति । दृश्यद्रष्टृविभेदो ह्यसम्मुखेऽस्मिन् तद्भवति ॥१५५॥ ४४
प्रबोध जब चित्त आत्माभिमुख रहता है, अथवा यों कहो कि जब वह दृङ्मात्र हो जाता है उस समय दृश्य और द्रष्टाका भेद नहीं रहता। किन्तु उसके आत्माभिमुख न रहनेपर ऐसा नहीं होता। एकस्मिन्दृङ्मात्रे त्रेधा द्रष्ट्रादिकं हि समुदेति । त्रिविधे तस्मिँल्लीने दृङ्मात्रं शिष्यते पश्चात् ॥१५६॥ एक दृङ्मात्रमें ही द्रष्टा आदि त्रिपुटीका उदय होता है, उस त्रिपुटीका लय हो जानेपर पीछे केवल दृङ्मात्र ही रह जाता है। दर्पणतः प्राक्पश्चादस्ति मुखं प्रतिमुखं तदाभाति । आदर्शेऽपि च नष्टे मुखमस्ति मुखे तथैवात्मा॥१५७॥ दर्पणसे पूर्व और उसके पीछे भी मुख होता है तभी उसमें उसका प्रतिबिम्ब पड़ता है। दर्पण यदि टूट जाय तब भी मुख तो ज्यों-का-त्यों ही रहता है, इसी प्रकार आत्मा उपाधिके नष्ट हो जानेपर भी रहता ही है। प्रबोध माधुर्यं गुडपिण्डे यत्तत्तस्यांशकेऽणुमात्रेऽपि । एवं न पृथग्भावो गुडत्वमधुरत्वयोरस्ति ॥१५८॥ गुड़के पिण्डमें जो मधुरता होती है, वह उसके छोटे-से-छोटे कणमें भी होती है, इस प्रकार गुड़त्व और मधुरत्वमें कोई भेद नहीं है। ४५
प्रबोधसुधाकर अथवा न भिन्नभावः कर्पूरामोदयोरेवम् । आत्मस्वरूपमनसां पुंसां जगदात्मतां याति ॥१५६॥ अथवा जिस प्रकार कर्पूर और उसकी सुगन्धमें कोई भेद नहीं है उसी प्रकार जिनका चित्त आत्मस्वरूप हो गया है, उन पुरुषोंके लिये यह संसार आत्मभावको प्राप्त हो जाता है। यद्भावानुभवः स्यान्निद्रादौ जागरस्यान्ते । अन्तः स चेत्स्थिरः स्याल्लभते हि तदाद्वयानन्दम् ॥ निद्राके आरम्भमें और जागृतिके अन्तमें जिस [शुद्ध निर्विषय] भावका अनुभव होता है वह यदि अन्तःकरणमें स्थिर हो जाय तो उससे अद्वयानन्दकी ही प्राप्ति होती है। अतिगम्भीरेऽपारे ज्ञानचिदानन्दसागरे स्फारे । कर्मसमीरणतरला जीवतरङ्गावलिः स्फुरति ॥१६१॥ अति गम्भीर, अपार और विस्तृत सच्चिदानन्द-समुद्रमें कर्म- वायुसे प्रेरित हुई जीवात्मारूपी तरङ्गें उठती रहती हैं। खरतरकरैः प्रदीप्तेऽभ्युदिते चैतन्यतिग्मांशौ । स्फुरति मृषैव समन्तादनेकविधजीवमृगतृष्णा । १६२। अपनी प्रचण्ड किरणोंसे देदीप्यमान अत्यन्त दीप्तिशाली चैतन्य-भास्करके प्रकाशमें ही सब ओर यह अनेक जीवरूप मृग- तृष्णा सर्वथा मिथ्या ही प्रतीत हो रही है। ४६
प्रबोध अन्तरदृष्टे यस्मिञ्जगदिदमारातपरिस्फुरति । दृष्टे यस्मिन्सकृदपि विलीयते क्वाप्यसद्रूपम् ॥१६३॥ बाह्याभ्यन्तरपूर्णः परमानन्दार्णवे निमग्नो यः । चिरमाप्लुत इव कलशो महाह्रदे जह्नुतनयायाः।१६४। जिस चैतन्य-सूर्यको अपने अन्तःकरणमें न देखनेसे ही अपने समीप इस जगत्की स्फूर्ति होती है और जिसे एक बार देख लेनेपर ही यह असत् संसार मानो कहीं लीन हो जाता है, उस परमानन्दरूप समुद्रमें जो पुरुष बाहर-भीतरसे पूर्ण होकर डूब गया है, उसकी दशा ऐसी होती है जैसे गंगाजीके महान् कुण्डमें चिरकालसे डूबा हुआ कोई कलश हो । पूर्णात्पूर्णतरे परात्परतरेऽप्यज्ञातपारे हरौ संवित्स्फारसुधार्णवे विरहिते वीचीतरङ्गादिभिः । भास्वत्कोटिविकासितोज्ज्वलदिगाकाशप्रकाशे परे स्वानन्दैकरसे निमग्नमनसां न त्वं न चाहं जगत् । १६५। जो पूर्णसे भी पूर्ण और परसे भी पर है, जिसके पारका कोई पता नहीं है, जो भँवर और तरङ्गादिसे रहित प्रज्ञारूपी सुधाका महान् समुद्र है तथा जो अपने कोटि-कोटि सूर्योंके सदृश प्रकाशसे दशों दिशाओंको और प्रकाशको प्रकाशित तथा उज्ज्वल कर रहा है, उस निजानन्दमय परब्रह्म परमात्मामें जिनका मन डूबा हुआ है, उनकी दृष्टिमें न मैं हूँ, न तू है और न यह संसार ही है। ४७
प्रबोधसुधाकर द्विधाभक्ति चित्ते सत्त्वोत्पत्तौ तडिदिव बोधोदयो भवति । तर्ह्येव स स्थिरः स्याद्यदि चित्तं शुद्धिमुपयाति ॥१६६॥ चित्तमें सत्त्वगुण उत्पन्न होनेपर ज्ञानका बिजलीके समान उदय तो हो जाता है, परन्तु वह स्थिर तभी रहता है जब चित्त शुद्ध हो जाता है । शुद्धयति हि नान्तरात्मा कृष्णपदाम्भोजभक्तिमृते । वसनमिव क्षारोदैर्भक्त्या प्रक्षाल्यते चेतः ॥१६७॥ किन्तु अन्तःकरण भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रके चरणकमलोंकी भक्तिके बिना कभी शुद्ध नहीं हो सकता । जैसे वस्त्रको खारयुक्त जलसे शुद्ध किया जाता है, उसी प्रकार चित्तको भक्तिसे निर्मल किया जा सकता है । यद्वत्समलादर्शो सुचिरं भस्मादिना शुद्धे । प्रतिफलति वक्त्रमुच्चैः शुद्धे चित्ते तथा ज्ञानम्॥१६८॥ जिस प्रकार राख आदिसे चिरकालतक मार्जन करनेसे मलिन दर्पणके स्वच्छ हो जानेपर उसमें मुखका प्रतिबिम्ब स्पष्ट पड़ने लगता है उसी प्रकार शुद्ध चित्तमें ज्ञानका आविर्भाव हो जाता है । ४८
द्विधाभक्ति जानन्तु तत्र बीजं हरिभक्त्या ज्ञानिनो ये स्युः। मूर्त्तं चैवामूर्त्तं द्वे एव ब्रह्मणो रूपे ॥१६९॥ इत्युपनिषत्तयोर्वा द्वौ भक्तौ भगवदुपदिष्टौ । क्लेशादक्लेशाद्वा मुक्तिः स्यादेतयोर्मध्ये ॥१७०॥ जो लोग हरि-भक्तिसे ज्ञानी हुए हैं, वे अपने ज्ञानका बीज (कारण) समझ लें। 'मूर्त्त (साकार) और अमूर्त्त (निराकार) दोनों ही ब्रह्मके रूप हैं'—ऐसा उपनिषद् कहते हैं; और भगवान्ने भी उन दोनों रूपोंके [ व्यक्तोपासक तथा अव्यक्तोपासक-भेदसे ] दो प्रकारके भक्त बताये हैं। इनमेंसे एक (अव्यक्तोपासक) को क्लेशसे और दूसरे (व्यक्तोपासक) को सुगमतासे मुक्ति मिलती है। स्थूला सूक्ष्मा चेति द्वेधा हरिभक्तिरुद्दिष्टा । प्रारम्भे स्थूला स्यात्सूक्ष्मा तस्याः सकाशाच्च॥१७१॥ भगवान्की भक्ति स्थूल और सूक्ष्म दो प्रकारकी कही गयी है; उनमें पहले स्थूल-भक्ति होती है और फिर उसीमेंसे सूक्ष्म- भक्तिका उदय होता है। स्वाश्रमधर्माचरणं कृष्णप्रतिमार्चनोत्सवो नित्यम् । विविधोपचारकरणैर्हरिदासैः सङ्गमः शश्वत् ॥१७२॥ कृष्णकथासंश्रवणे महोत्सवः सत्यवादश्च । परयुवतौ द्रविणे वा परापवादे पराङ्मुखता ॥१७३॥ ४९
प्रबोधसुधाकर ग्राम्यकथासूद्वेगः सुतीर्थगमनेषु तात्पर्यम् । यदुपतिकथावियोगे व्यर्थं गतमायुरिति चिन्ता॥१७४॥ अपने वर्णाश्रम-धर्मोंका आचरण करना, नित्य भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रकी प्रतिमाका उत्साहपूर्वक विविध सामग्रियोंसे पूजनो- त्सव करना, निरन्तर हरि-भक्तोंका संग करना, भगवत्कथाओंके सुननेमें अत्यन्त उत्साह रखना, सत्य भाषण करना तथा परस्त्री, परधन और परनिन्दासे दूर रहना, अश्लील बातोंसे घृणा करना, पुण्य-तीर्थ-स्थानोंमें जानेके लिये तत्पर रहना तथा 'भगवत्कथा- श्रवणादिके बिना यह आयु व्यर्थ ही बीत गयी'—ऐसी चिन्ता करना—ये सब स्थूल-भक्तिके लक्षण हैं । एवं कुर्वति भक्तिं कृष्णकथानुग्रहोत्पन्ना । समुदेति सूक्ष्मभक्तिर्यस्या हरिरन्तराविशति ॥१७५॥ इस प्रकार स्थूल-भक्तिका अभ्यास करते-करते भगवत्कथाके अनुग्रहसे सूक्ष्म-भक्तिका उदय होता है, जिसके भीतर भगवान्की उपलब्धि होती है । स्मृतिसत्पुराणवाक्यैर्यथाश्रुतायां हरेर्मूर्तौ । मानसपूजाभ्यासो विजननिवासेऽपि तात्पर्यम् ॥१७६॥ सत्यं समस्तजन्तुषु कृष्णस्यावस्थितेर्ज्ञानम् । अद्रोहो भूतगणे ततस्तु भूतानुकम्पा स्यात् ॥१७७॥ ५०
द्विधाभक्ति प्रमितयदृच्छालाभे सन्तुष्टिर्दारपुत्रादौ । ममताशून्यत्वमतो निरहङ्कारत्वमक्रोधः ॥१७८॥ मृदुभाषिता प्रसादो निजनिन्दायां स्तुतौ समता । सुखदुःखशीतलोष्णद्वन्द्वसहिष्णुत्वमापदो न भयम् ॥ निद्राहारविहारेष्वनादरः सङ्गराहित्यम् । वचने चानवकाशः कृष्णस्मरणेन शाश्वती शान्तिः ॥ केनापि गीयमाने हरिगीते वेणुनादे वा । आनन्दाविर्भावो युगपत्स्यादृष्टसात्त्विकोद्रेकः॥ [ उस सूक्ष्म-भक्तिके लक्षण ये हैं— ] स्मृति और पुराणोंके सद्वाक्योंसे सुनी हुई भगवान्की मूर्तिके मानस-पूजनका अभ्यास, एकान्त-सेवनमें तत्पर रहना, सत्य, समस्त प्राणियोंमें श्रीकृष्णचन्द्र- को वर्तमान जानना और सम्पूर्ण प्राणियोंसे अद्रोह । इन साधनोंसे समस्त प्राणियोंपर दया उत्पन्न हो जाती है । इनके सिवा प्रारब्धा- नुकूल स्वल्प लाभमें सन्तोष रखना, स्त्री और पुत्र आदिमें ममता- शून्य होना, अहङ्कार और क्रोधसे रहित होना, मृदु भाषण करना, प्रसन्न-चित्त रहना, अपनी निन्दा और स्तुतिमें समान रहना, सुख- दुःख और शीतोष्णादि द्वन्द्वोंको सहन करना, आपत्तिसे भय न करना, निद्रा, आहार और विहारादिमें अनादर, अनासक्त रहना, व्यर्थ वार्तालापके लिये अवकाश न देना, श्रीकृष्ण-स्मरणसे ५१
प्रबोधसुधाकर निरन्तर शान्त-चित्त रहना तथा कोई भगवत्सम्बन्धी गीतका गान करे अथवा बाँसुरी बजावे तो एक ही समय आनन्दका आविर्भाव और सात्त्विक भावोंका प्रौढ़ उद्रेक हो जाना । तस्मिन्ननुभवति मनः प्रगृह्यमाणं परात्मसुखम्। स्थिरतां याते तस्मिन्याति मदोन्मत्तदन्तिदशाम्॥१८२॥ उस सत्त्वोद्रेकमें रोककर रक्खा हुआ मन परमात्मसुखका अनुभव करता है । फिर उस ( परमात्मसुख ) के स्थिर हो जानेपर चित्तकी अवस्था मतवाले हाथीके समान हो जाती है । जन्तुषु भगवद्भावं भगवति भूतानि पश्यति क्रमशः । एतादृशी दशा चेत्तदैव हरिदासवर्यः स्यात् ॥१८३॥ और वह क्रमशः समस्त प्राणियोंमें भगवान्को और भगवान्में समस्त प्राणियोंको देखने लगता है, यदि ऐसी अवस्था हो जाय तो वह तत्काल भगवद्भक्तोंमें श्रेष्ठ हो जाता है । ध्यानविधि यमुनाटटनिकटस्थितवृन्दावनकानने महारम्ये । कल्पद्रुमतलभूमौ चरणं चरणोपरि स्थाप्य ॥१८४॥ तिष्ठन्तं घननीलं स्वतेजसा भासयन्तमिह विश्वम् । पीताम्बरपरिधानं चन्दनकर्पूरलिप्तसर्वाङ्गम् ॥१८५॥ ५२
श्रीशंकराचे दोन बाल-कृष्ण
चित्र पूर्णतः रिक्त (सफेद) है, इसमें कोई पाठ (टेक्स्ट) उपलब्ध नहीं है।
ध्यानविधि आकर्णपूर्णनेत्रं कुण्डलयुगमण्डितश्रवणम् । मन्दस्मितमुखकमलं सुकौस्तुभोदारमणिहारम्॥१८६॥ वलयाङ्गुलीयकाद्यानुज्ज्वलयन्तं स्वलङ्कारान् । गलविलुलितवनमालं स्वतेजसापास्तकलिकालम् १८७ गुञ्जारवालिकलितं गुञ्जापुञ्जान्विते शिरसि । भुञ्जानं सह गोपैः कुञ्जान्तरवर्तिनं हरिं स्मरत॥१८८॥ श्रीयमुनाजीके तटपर स्थित वृन्दावनके किसी महामनोहर उद्यानमें जो कल्पवृक्षके नीचे पृथिवीपर पाँवपर पाँव रखे बैठे हैं, जो मेघके समान श्यामवर्ण हैं, अपने तेजसे इस निखिल ब्रह्माण्ड- को प्रकाशित कर रहे हैं, सुन्दर पीताम्बर धारण किये हुए हैं, समस्त शरीरमें कर्पूरमिश्रित चन्दनका लेप लगाये हुए हैं, जिनके कर्णपर्यन्त विशाल नेत्र हैं, कान कुण्डलके जोड़ेसे सुशोभित हैं, मुख-कमल मन्द-मन्द मुसका रहा है, तथा वक्षःस्थलमें कौस्तुभ- मणियुक्त सुन्दर हार है और जो [ अपनी कान्तिसे ] कङ्कण और अंगूठी आदि सुन्दर आभूषणोंकी भी शोभा बढ़ा रहे हैं, जिनके गलेमें वनमाला लटक रही है और अपने तेजसे जिन्होंने कलिकालको परास्त कर दिया है तथा जिनका गुञ्जावलिविभूषित मस्तक गूँजते हुए भ्रमर-समूहसे सुशोभित है, किसी कुञ्जके भीतर बैठकर ग्वालबालोंके साथ भोजन करते हुए उन श्रीहरिका स्मरण करो । ५३
प्रबोधसुधाकर मन्दारपुष्पवासितमन्दानिलसेवितं परानन्दम् । मन्दाकिनीयुतपदं नमत महानन्ददं महापुरुषम् ॥ १८९ ॥ जो कल्पवृक्षके पुष्पोंकी गन्धसे युक्त मन्द-मन्द वायुसे सेवित हैं, परमानन्दस्वरूप हैं तथा जिनके चरण-कमलोंमें श्रीगंगाजी विराजमान हैं उन महानन्ददायक महापुरुषको नमस्कार करो । सुरभीकृतदिग्वलयं सुरभिशतैरावृतं सदा परितः । सुरभीतिक्षपणमहासुरभीमं यादवं नमत ॥ १९० ॥ जिन्होंने समस्त दिशाओंको सुगन्धित कर रक्खा है, जो चारों ओरसे सैकड़ों कामधेनु गौओंसे घिरे हुए हैं तथा देवताओंके भयको दूर करनेवाले और बड़े-बड़े राक्षसोंके लिये भयङ्कर हैं उन यदुनन्दनको नमस्कार करो । कन्दर्पकोटिसुभगं वाञ्छितफलदं दयार्णवं कृष्णम् । त्यक्त्वा कमन्यविषयं नेत्रयुगं द्रष्टुमुत्सहते ॥ १९१ ॥ जो करोड़ों कामदेवोंसे भी सुन्दर है, वाञ्छित फलके देने- वाले हैं, दयाके समुद्र हैं, उन श्रीकृष्णचन्द्रको छोड़कर ये नेत्र- युगल और किस विषयको देखनेके लिये उत्सुक होते हैं। पुण्यतमामतिसुरसां मनोऽभिरामां हरेः कथां त्यक्त्वा । श्रोतुं श्रवणद्वन्द्वं ग्राम्यकथामादरं वहति ॥ १९२॥ ५४
सगुण-निर्गुणकी एकता [ अहो ! खेदकी बात है कि ] अत्यन्त पवित्र, अति सुन्दर रसमयी और मनोहारिणी हरिकथाको छोड़कर ये कर्णयुगल अन्य ग्राम्य-वार्ताओंके सुननेमें श्रद्धा प्रकट करते हैं । दौर्भाग्यमिन्द्रियाणां कृष्णे विषये हि शाश्वतिके । क्षणिकेषु पापकरणेष्वपि सज्जन्ते यदन्यविषयेषु ॥ इन्द्रियोंका यह परम दुर्भाग्य ही है कि नित्य विद्यमान श्रीकृष्ण- रूप विषयके रहते हुए भी वे अन्य क्षणिक और पापमय विषयोंमें आसक्त हो जाती हैं । सगुण-निर्गुणकी एकता श्रुतिभिर्महापुराणैः सगुणगुणातीतयोरैक्यम् । यत्प्रोक्तं गूढतया तदहं वक्ष्येऽतिविशदार्थम् ॥१६४॥ श्रुतियों और महापुराणोंने जो सगुण और निर्गुणकी एकता गूढ़भावसे कही है, उसीको मैं स्पष्ट करके बतलाता हूँ । भूतेष्वन्तर्यामी ज्ञानमयः सच्चिदानन्दः । प्रकृतेः परः परात्मा यदुकुलतिलकः स एवायम्॥१६५॥ जो ज्ञानस्वरूप, सच्चिदानन्द, प्रकृतिसे परे परमात्मा सब भूतोंमें अन्तर्यामीरूपसे स्थित हैं यह यदुकुल-भूषण श्रीकृष्ण वही तो है । ५५
विषय हैं ।
प्रबोधसुधाकर ननु सगुणो दृश्यतनुस्तथैकदेशाधिवासश्च । स कथं भवेत्परात्मा प्राकृतवद्रागरोषयुतः ॥१६६॥ [ यदि कहो कि ] यह श्रीकृष्ण तो सगुण है, दृश्य शरीरधारी है, एकदेशी है तथा साधारण पुरुषोंके समान रागद्वेषयुक्त है; यह परमात्मा कैसे हो सकता है ? इतरे दृश्यपदार्था लक्ष्यन्तेऽनेन चक्षुषा सर्वे । भगवाननया दृष्ट्या न लक्ष्यते ज्ञानदृग्गम्यः ॥१६७॥ [ तो इस विषयमें यह विचारना चाहिये कि ] इन चर्म- चक्षुओंसे तो अन्य सब दृश्य-पदार्थ ही जाने जा सकते हैं, इनसे भगवान् दिखायी नहीं दे सकते; वे तो ज्ञान-दृष्टिके ही विषय हैं । यद्विश्वरूपदर्शनसमये पार्थाय दत्तवान्भगवान् । दिव्यं चक्षुस्तस्माददृश्यता युज्यते नृहरौ ॥१६८॥ भगवान्ने अपना विश्वरूप दिखलाते समय अर्जुनको दिव्य- दृष्टि दी थी, इससे उन नररूप हरिकी अदृश्यता सिद्ध ही है; [ क्योंकि चर्म-चक्षुओंसे न देख सकनेके कारण ही तो उन्होंने अर्जुनको दिव्य-दृष्टि दी थी ] । साक्षाद्यथैकदेशे वर्तुलमुपलभ्यते रवेर्बिम्बम् । विश्वं प्रकाशयति तत्सर्वैः सर्वत्र दृश्यते युगपत् ॥ ५६
सगुण-निर्गुणकी एकता जिस प्रकार गोलाकार सूर्य-मण्डल साक्षात् एक देशमें ही दिखायी देता है, किन्तु वह सम्पूर्ण जगत्को प्रकाशित करता है और सबको एक साथ ही सब जगह दीखता भी है । यद्यपि साकारोऽयं तथैकदेशी विभाति यदुनाथः । सर्वगतः सर्वात्मा तथाप्ययं सच्चिदानन्दः ॥२००॥ उसी प्रकार यदुनाथ श्रीकृष्णचन्द्र यद्यपि साकार हैं और एकदेशी-से दिखायो देते हैं तथापि वे सर्वव्यापी, सर्वात्मा और सच्चिदानन्दस्वरूप ही हैं । एको भगवानरेमे युगपद्गोपीष्वनेकासु । अथवा विदेहजनकश्रुतदेवभूदेवयोर्हरिर्युगपत्॥२०१॥ देखो, एक ही भगवान्ने एक साथ अनेक गोपियोंके साथ रमण किया तथा विदेह जनक और श्रुतदेव ब्राह्मण दोनोंके घरोंमें एक ही साथ आतिथ्य ग्रहण किया । अथवा कृष्णाकारां स्वचमूं दुर्योधनोऽपश्यत् । तस्माद्व्यापक आत्मा भगवान्हरिरीश्वरः कृष्णः॥२०२॥ इनके अतिरिक्त दुर्योधनने भी अपनी समस्त सेनाको श्रीकृष्णरूप ही देखा था । इससे विदित होता है कि श्रीकृष्णचन्द्र व्यापक आत्मा ईश्वर हरि ही हैं । ७७
प्रबोधसुधाकर वक्षसि यदा जघान श्रीवत्सः श्रीपतेः स किं द्वेष्यः । भक्तानामसुराणामन्येषां वा फलं सदृशम् ॥२०३॥ जब भृगुजीने भगवान्के वक्षःस्थलमें पाद-प्रहार किया था तो क्या वे उन श्रीपतिके द्वेष्य हो गये थे ? [ नहीं, उन्हें तो सभी समान हैं ] भक्त, असुर और अन्य पुरुषोंको भी वे एक-सा ही फल देते हैं । तस्मान्न कोऽपि शत्रुनों मित्रं नाप्युदासीनः । नृहरिः सन्मार्गस्थः सफलः शाखीव यदुनाथः॥२०४॥ इसलिये भगवान्का न कोई मित्र है, न शत्रु है और न उदासीन है । श्रीनृहरि तो सुन्दर मार्गपर लगे हुए एक फलयुक्त वृक्षके समान हैं । लोहशलाकानिवहैः स्पर्शाश्मनि भिद्यमानेऽपि । स्वर्णत्वमेति लौहं द्वेषादपि विद्विषां तथा प्राप्तिः॥२०५॥ पारसको यदि लोहेकी शलाकाओंसे भेदा भी जाय तो भी उनका लोहा सुवर्ण हो जाता है, इसी प्रकार शत्रुओंको द्वेषसे भी भगवान्की प्राप्ति हो जाती है । नन्वात्मनः सकाशादुत्पन्ना जीवसन्ततिश्रेयम् । जगतः प्रियतर आत्मा तत्प्रकृते नैव सम्भवति॥२०६॥ ५८
सगुण-निर्गुणकी एकता शंका—आत्मासे तो इन समस्त जीवोंकी उत्पत्ति हुई है और संसारमें सबसे अधिक प्रिय भी आत्मा ही है, किन्तु श्री- कृष्णचन्द्रमें यह बात नहीं मिल सकती । वत्साहरणावसरे पृथग्वयोरूपवासनाभूषान् । हरिरजमोहं कर्तुं स वत्सगोपान्विनिर्ममे स्वस्मात्॥२०७॥ समाधान—बछड़ोंको चुरा लेनेके समय ब्रह्माको मोहित करनेके लिये भगवान्ने पृथक्-पृथक् अवस्था, रूप, वासनाओं और भूषणोंसे युक्त गोप और बछड़ोंको अपने आपसे ही बना लिया था । अग्नेर्यथा स्फुलिङ्गाः क्षुद्रास्तु व्युच्चरन्तीति । श्रुत्यर्थं दर्शयितुं स्वतनोरतनोत्स जीवसन्दोहम्॥२०८॥ 'जिस प्रकार अग्निसे छोटी-छोटी चिनगारियाँ निकलती हैं उसी प्रकार आत्मासे विविध प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है'—इस श्रुतिके अर्थको सिद्ध करनेके लिये ही भगवान्ने अपने शरीरसे उस जीव-समूहको रचा था । यमुनातीरनिकुञ्जे कदाचिदपि वत्सकांश्च चारयति । कृष्णे तथार्यगोपेषु च वरगोष्ठेषु चारयत्स्वारात् ॥२०९॥ वत्सं निरीक्ष्य दूराद्गावः स्नेहेन सम्भ्रान्ताः । तदभिमुखं धावन्त्यः प्रययुर्गोपैश्च दुर्वाराः ॥२१०॥ ५९