पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । १०५ दूहा ॥ उचरि मात समंत दूच । जीवन मरन न सिद्ध ॥ दुहुं विधि घर वासन करौ । आराधन कि विरुद्ध ॥ छं० ॥ ५२१ ॥ रू० ॥ २६५ ॥ पुत्त असमंत जु सिप्पयौ । सिष्यौ उरव्ह दहंत ॥ ढूंढौ नर ढुंढै भषन । तू सेवनह कहंत ॥ छं० ॥ ५२२ ॥ रू० ॥ २६६ ॥ ॥ आना का माता से कहना कि या तो मैं सिर समपूंगा वा छत्र धारूंगा ॥ दूहा ॥ तब आनल्ल अैसी कत्थिय । मुचि सुभिक्षय यह वत्त ॥ कै सिर उनहि समप्पि हौँ । कै सिर धरि हौं छत्त ॥* छं० ॥ ५२३ ॥ रू० ॥ २६७ ॥ ॥ आना का माता से कहना कि सेवा ऐसी है कि जिस से सब कार्य सिद्धी होती है ॥ कवित्त ॥ सेव देव रंजियै । सेव रष्षस वसि सव्वह ॥ सेव सिंघ पत्तियै । सेव विष जरै न जल्लह ॥ सेव वैर भंजियै । सेव रच पति पावन ॥ सेव दह्रै नह दहन । सेव बहु द्रव्य उपावन ॥ जिहिं सेव देव रष्षस धरहि ! जियन मात तन जाइ नन ॥ आमूढ ढुंढ धावत भषन । नहि सु देव नहि दानवन ॥ छं० ॥ ५२४ ॥ रू० ॥ २६८ ॥ २६५-६६ उचरि । सु मंत्र । सिद्धि । दुहुँ । बर । करो । करौं ॥ २६५ ॥ पुत । सिपियौ । सिप्यौ । भवन ॥ २६६ ॥
- यह रूपक सं० १६४७ और १७१० की पुस्तकों में नहीं है और जब तक वह किसी और प्राचीन लिखित पुस्तक में न मिले तब तक हम उसे प्रसन्नतापूर्वक क्षेपक संज्ञा नहीं प्रदान कर सक्ते ॥ २६७ पाठान्तर :-सुभिय । वत । कैं । उतहि । हो । हो ॥ २६८ पाठान्तर :-रंजीयै । न सेव सिंघं पत्तियै । जलह । भंजीयै । रचै । सेवव्ह नह दहन । द्विव्य । जिन्हि । नह । सो नह ॥
१०६ [space] पृथ्वीराजरासौ । [space] [ आदि पर्व ॥ आना की माता का तो उसे शत्रु न सेवने को कहना किंतु उस का अजमेर जाना ॥ दूहा ॥ मातं बरज्जत रत्त हुअ । सचु न सेव न खेवं ॥ आइ अनल अजमेर बन । असुर निरष्वन भेव ॥ छं० ॥ ५२५ ॥ रू० ॥ २६९ ॥ ॥ ढुंढा दानव का अजमेर बन में बहुतदिनों तक मन्तु होकर रहना ॥ सो दानव अजमेर बन । रह्यो दीघ घन अंत ॥ सुंन दिसांनन जीव को । थिरं थांवरं जंग मंत * ॥ छं० ॥ ५२६ ॥ रू० ॥ २७० ॥ ॥ अजमेर की नष्ट भ्रष्ट दशा और आना का खड्ग लेकर प्रेत के पास जाना ॥ चोटक ॥ तहँ सिंघ न म्रग्ग न पंषि वनं । दिसि सून भई डर जीव घनं ॥ नव सातव संत अमंत कियं । पिय की धरनी रव तंत लियं ॥ छं० ॥ ५२७ ॥ तहँ ठाम भयानक सोच तयं । तहँ ठाम कलां कल्ल सोधि वयं ॥ तिहँ ठाम भरे नर नारि ननं । तिहँ ठाम न पंथिय पंथ कनं ॥ छं० ॥ ५२८ ॥ तिहँ ठाम गजं वर बाजि ननं । तिहँ ठाम न सिद्धय सांध कनं ॥ तिहँ ठाम न दारिद द्रव्य गनं । हिय मातं न तात न सोच मनं ॥ छं० ॥ ५२९ ॥ लय षग्ग रमक्किये प्रेत दिसं । बर बीर सु मंडिय चित्त रसं ॥ अविलंब करी सक्करं विपिनं । रिपु थान सपंत सु मैं न मनं ॥ छं० ॥ ५३० ॥ नर दिष्यं अचंभ कियौ सु हियं । कचि आज बिधं भल भष दियं ॥ क्षुध प्यास रु निंदयं राज ननं । सु गयौ वर दानव ताप तनं ॥ छं० ॥ ५३१ ॥ रू० ॥ २७१ ॥ २६९-७० पाठान्तरः-बरजत । रत । आंय । अनल । निरषन ॥ २६९ ॥ सून । सुंचा । दधिर ॥ २७० ॥
- हिं० मंत = सं० म॑न्तु = राजाँ से बना है। यहाँ यह मंत्र का अपभ्रंश नहीं है ॥ २७१ पाठान्तर :-तहो । तहं । मृग । डर । वनं । म॑सु । पीयकी । तत । तत्ति । लीयं । तहां । तिह्वां । टांम । भयानक । तहां । ठांम । तिहां । ठांम । तिहां । ठाम । नमं । तिहां रूक्क सु पंथि रु पंथि जनं । तिहां । ठांम । तिहां ठांम । तिहां । ठांम । द्रव । लै । लग । रु । मुकिय । अविलंव । यांन । संपंत । सपत्त । दिषि । कीयौ । कोई । कोई आज भलो इहं भ्रप दियं । बुध । न निद्रय । दांनव ॥
आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । १०७ ॥ आना का अपने मन में विचार कर कहना ॥ श्लोक ॥ मनसाधार्य पुंसा स्याद् । विधिश्चिंतति नान्यथा ॥ ब्रह्माज्ञां लंघनेनापि । स्वयंपूरकमांघवः ॥ क० ॥ ५३२ ॥ रु० ॥ २७२ ॥ कवित्त ॥ सो पूरक माधव्व । जगत जांनन अधिकारिय ॥ थावर जंगम दैन । कठिन चिंता न विचारिय ॥ सरव भूत है जाम । मध्य चरि दैन भूगतिय ॥ किं कारन नर झुरै । देइ मन वंछित बत्तिय ॥ सा पुरस चित्त धरकै नहीं । धरक चित्त कायर करचि ॥ तिन्हि काज देषि दानव वनिय । बज्र बलिष्ट गुन उच्चरचि ॥ क० ॥ ५३३ ॥ रु० ॥ २७३ ॥ २७२ पाठान्तर :- स्यात् । विधिचिंतति । ब्रह्माज्ञां । माधव ॥ हमारे पाठकों को ज्ञात होगा कि इस ग्रंथ को क्रित्रिम बना हुआ कहनेवालों ने ऐसा अत्यन्ताभाव का वचन भी कहा है कि इस महाकाव्य के बनानेवाले को अनुस्वार और विसर्ग तक का भी ज्ञान न था । परंतु हमने इसी ग्रंथ में और इसी आदिपर्व में इस रूपक के पहिले आये हुए संस्कृत भाषा के श्लोक आप की दृष्टि के आगे धरे हैं कि आप न्याय कर सकें और ऐसे श्लोक आगे इस ग्रंथ में बहुत आवेंगे क्योंकि हमने इस महाकाव्य को कई आवृत्ति करके पढ़ा है । वैसे ही इस श्लोक को भी आप पढ़कर देखें कि पढ़ने में तो यह कैसा सरल है और अभिप्राय में कैसा विद्वानों के विचारने योग्य है । साधारण संस्कृत जाननेवाले से यह श्लोक लगना कठिन है अतएव हम उस का अन्वय नीचे संस्कृत भाषा में भी लिखते हैं :- अन्वयः ॥ पुंसा मनसा आंधार्य यत् स्यात् तत् स्वयंपूरक = माधवः, विधिः ब्रह्माज्ञालंघने नांपि चिंतति अन्यथा न चिंतति ॥ अर्थ । पुरुष करके मनसे धारके जो काम हो सकता है उसको स्वयं पूरा करनेवाला परमेश्वर (विधि) दैव विधान वा कर्म ब्रह्मा की आज्ञा को उल्लंघन करके भी सोचता है अन्यथा अर्थात् उस से उलटा नहीं सोचता ॥ सारांश यह है कि उद्योग के अनुसार हीं फल दैव भी देता है चाहे प्रारब्ध उस से उलटा भी हो । इस से केवल उद्योग की प्रधानता कही है ॥ हे पाठको ! क्या आप के अपक्षपात से विभूषित हृदय में यह दोष कुछ भी जंच सकता है कि इस महाकाव्य का ग्रंथकर्त्ता चाहे कोई भी हो ऐसा निर्बोध था कि जिस को अनुस्वार और विसर्ग तक का बोध न था ? २७३ पाठान्तर :- सँ । माधव । जांनन । अधिकारीय । देन । दैन । विचारीय । सर्वे । जांम । दैन । देन । भुंगतिय । दैव । नहीं । तिन्हिं । दांनव । उच्चरहिं ॥
१०८ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व ॥ आना का दानव को कंदरा में देखना और उसको खड्ग मारने पर दानव का गाजना ॥ पद्धरी ॥ दिष्यौ सु बीर कंदला गेह । सैं पंच हथ्थ ता हथ्थ देह ॥ असि असी हथ्थ झारच्चि झनंक्क । मन सदस पाइ तो डर षनंक्क ॥ छं० ॥ ५३४॥ अग्रोष्ट उड्ड जठिय अनंक । उठतै सु रोम रोमनि सनंक ॥ बुल्यौ सु बैन निय सत्त मान । देषंत चष्ष वालल्ल विनान ॥ छं० ॥ ५३५ ॥ अति सुषम वचन मधु मधुर कंत । दिष्यौ सु अंस राजन सुभंत ॥ जंभाइ वीर दसनं लहक्क ॥ उठ्यौ सु रोम रोमच्च पहक्क ॥ छं ॥ ५३६ ॥ उर चंपि भग्ग सिर नाइ राज । गहराय इंद्र दांनव सु गांज ॥ छं० ॥ ५३७ ॥ रू० ॥ २७४ ॥ ॥ इस पर दानव का आना से उसके मा बाप आदि के नाम पूछना ॥ कवित्त ॥ भेद वचन तन भेद । सुनन पंडुर चढि आइय ॥ उष्ट थरहर कंपि । सुनन प्राक्रम जं इय ॥ चरन सु थिर मन लीन । जीव धर धर धर कांतिय ॥ कैन भाव कवि चंद । बलिय सात्वक रस भांतिय ॥ पुच्छन सु बाल बुल्यौ बलिय । करि सु चिंत अतिंत चित ॥ को मात तात कछि नान को । को साँसूँ साधक सु मति ॥ छं० ॥ ५३८ ॥ रू० ॥ २७५ ॥ ॥ ढुंढा दानव का आना के सिर पर हाथ धर गल्ह पूछना ॥ दूहा ॥ खरग हथ्थेनी वाम पर । ढुंढै मेलि अनल्ह ॥ करुना करि सिर हथ्थ धरि । पूछि विवर सब गल्ह ॥ छं० ॥ ५३६ ॥ रू० ॥ २७६ ॥ *
२७४ पाठान्तर :- कंदरा । येह । हथ । हथ । हथ । पाय । टोडर । उठिय । रोमह । बैन । सत । मांति । चषु । विनांन । सुषम । वाचन । करांत । राज राजन । जंभाय । हसनं । लहक । नांइ । गहरा इंद्र द्वा दानव कि माज ॥ २७५ पाठान्तर :- दुर दुर । कंप । प्राकंम । प्राकंप । धरा धर । कांनीय । कौन । भाइ । भांनीय । पुछन । बुल्ल्यौ । चिंत । अत्यंत । चिंत । कुमति ॥
- इस के आगे के अर्थात् रूपक २७६ से २७८ तक सं० १६४७ और १७७० की लिखित
आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । १०६ गाथा ॥ असुर घयेली चंदं । विस्तागं कही यह यवा ईरं ॥ सुकता फन्न परिमानं । ता मध्ये खोचीयं आना ॥ छं० ॥ ५४० ॥ रु० ॥ २७७ ॥ * ॥ आना का मन में चिंता करना कि जो ढूंढा मुझे निगलेगा तौ मैं उस का पेट चीर कर निकलूंगा ॥ दूहा ॥ आंनें चिंतिय रान । जो मुहि ढूंढा निगत्ति है ॥ इंद्र ब्रतासुर जेम । निकसैं उदर छिदारि षग ॥ छं० ॥ ५४१ ॥ २७८ ॥* ॥ आना का उत्तर देना कि जिस से बीसलदेवजी का मन मैन होगया ॥ दूहा ॥ गवरि मात उर उड्डयो । पित वीसल मन मैन ॥ इत आवन मन् तरसयौ । तुअ तन देषन नैन ॥ छं० ॥ ५४२ ॥ रु० ॥ २७९ ॥ साटक ॥ किं दारिद्र सु दुष्ट कुष्ट तनयं । किं भूमि सचू घरं ॥ किं वनिता च वियोग दैव विपदा । निर्वासितां किं नरं ॥ किं जन मानत रुष्ट जुष्ट जुग्ता । किं आपितं सद्गुरं ॥ किं माता म्रित रंग भंग सरसां । आलिंगता सुंदरी ॥ छं० ॥ ५४३ ॥ रु० ॥ २८० ॥ * पुस्तकों में नहीं हैं किन्तु इधर की लिखी पुस्तकों में मिलते हैं। जब तक इन से भी पुरानी पुस्तकों में यह रूपक न मिलें तब तक उन को हम क्षेपक कहना योग्य नहीं समझते हैं ॥ २७६ पाठान्तर :- करग । कर । गह । थैली । मेहि । अनन्त । हथ ॥ २७८ पाठान्तर :- ढुंढा । निकसों । बिहारी ॥ † यह आज कल सोरठा छंद कहलाता है किन्तु प्राचीन समय में हिन्दी भाषा के कवि इस को दोहा भी कहते थे क्योंकि दोहा के जितने भेद भाषा के छंद ग्रंथों में लिखे हैं उन में सोरठा भी है अतएव चंद का यह दूहा संज्ञा. देना कुछ आश्चर्यदायक नहीं है ॥ २७९ पाठान्तर :- वल । मैंन । आवनम । तुम । नैन ॥ २८० पाठान्तर :- सचु । दैवपिवपदा । निर्वासितं । मांस । जुगता । जगता । सतगुरं सरसा । आलिंगिता ॥ यह भी ध्यान में रहने जैसी बात है कि पुरानी हिन्दी भाषा की लिखित पुस्तकों में मृत और नृप जैसे शब्द म्रित और न्रिप लिखे देखने में आते हैं ॥
११० पृथ्वीराजरासो । [ आदि पर्व साटक ॥ नो दारिद्र न कुष्ट दुष्टन तनं । सत्रू धरा नो हरं ॥ नो वनिता च वियोग दैव विपद्दा । निर्वासितो नो नरं ॥ नो सन्मानस रुष्ट जुष्ट जगता । नो आपिता सत् गुरुं ॥ मातुर्नाञ्चित रंग अंग सरसा । ना लिंगिता सुंदरी ॥ छंदं ॥ ५४४ ॥ रू० ॥ २८१ ॥ दूहा ॥ ना दारिद्र न कुष्ट तन । ना मुग्धा रस भेव ॥ नानुरत्त संसार सुख । तो पग रत्तौ खेव ॥ छंदं ॥ ५४५ ॥ रू० ॥ २८२ ॥ साटक ॥ नैवां दुष न सुख साहंस रने । नैवांन कालं कृतं ॥ नैवां मात पिता न चैव धनयं । नैवांन कित्ती रतूं ॥ नैवांनं चित्त मित्त साजन रसं । नैवांन किं रुष्टयं ॥ त्वं देवं तुअ हेव देव सरनं । तोयं जयं राज्यं ॥ छंदं ॥ ५४६ ॥ रू० ॥ २८३ ॥ दूहा ॥ तब लगि कुष्ट दरिद्र तन । तब लगि लघु सुहि गात ॥ जब लगि हैं आयौ नहीं । तो पाहन खेवात ॥ छंदं ॥ ५४७ ॥ रू० ॥ २८४ ॥ ॥ दानव का आना से पूछना कि तू क्यों राज अरत्त है ॥ दूहा ॥ आलिंगन दै हत्थ धरि । अरु पुच्छिय इक बत्त ॥ जा जीवन रत्तौ जगत । तू क्यों राज अरत्त ॥ छंदं ॥ ५४८ ॥ रू० ॥ २८५ ॥ ॥ आना का बीसलदेवजी दानव को उत्तर दै कहना ॥ दूहा ॥ जिय न रत्त नह एन दुष । भूमि न घर मुझ देव ॥ तिन उचाट जिउँ कै मरौं । तुम पय रत्तौ सेव ॥ छंदं ॥ ५४६ ॥ रू० २८६ ॥ २८१ पाठान्तर :- नां । धरा नं । नां । विनता । नां । ना । ता । सन्मांतस । आपितो । गुरुं । मातुर्नाम्रित ॥ २८२ पाठान्तर :-न । न मुगहु । नांनुरत्त । नरतु । तुअ पग रतो सेव ॥ २८३ पाठान्तर :-दुष । सुष । रस । पितं । मितं । सजन । तुं । तुय ॥ २८४-८५ पाठान्तर :-तब । हूं । नहीं । तौ ॥ २८४ ॥ दे । हथ । पुछिय । रत्तौ । सो तू केम आरत्ति ॥ २८५ ॥ २८६ पाठान्तर :-रत । तहि । भूमिंन । तिहिं । जीऊं । जिउं । कि । मरौं । पैं । रत्तौ ॥
आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । १११ दूहा ॥ राजा ज दिन बुलाइ चै । मुह सुझझै इच्छ मत्त ॥ कै सिर तुम द्वि समप्पि हैं । कै सिर धरि हैं कत्त ॥ छं० ॥ ५५० ॥ रु० ॥ २८७ ॥ इच्छ धरनी मुझ पित प्रपित । आदि अनादि सु देव ॥ सो मंगन तुम पाय हैं । आयौ आतुर सेव ॥ छं० ॥ ५५१ ॥ रु० ॥ २८८ ॥ ॥ ढंूढा दानव का प्रसन्न होकर आना को अजमेर का राज देना ॥ चोटक ॥ सु प्रसन्नह देषित ईत तनं । नर रूप धरन्न कियौ सु मनं ॥ तुअ पुत्रह पौत्र बधू उरनं । जन मानस राज करों धरनं ॥ छं० ॥ ५५२ ॥ असि इच्छ जियै असमान गयौ । पग टोडर कंदल छी जु ठयौ । तव पुज्जन कों रवि वार कह्यौ । चहुआन सु आनन राज दयौ ॥ छं० ॥ ५५३ ॥ रु० ॥ २८९ ॥ ॥ ढंूढा का आना को राज देकर गंगा की ओर उड़कर जाना ॥ दूहा ॥ दयौ राज आनल्ल गढ । उड़ि ढुंढा पछ मग्ग ॥ दिसि गंगा तव गमन क्रिय । उच्चर चिषा अति लग्ग ॥ छं० ॥ ५५४ ॥ रु० ॥ २९० ॥ ॥ ढंूढा का नेमऋषि के उपदेश से गंगा की ओर जाते हुए दिल्ली पहुंचना ॥ पद्धरी ॥ नव द्वार रुकि तप पवन जोर । आयौ सु नेम रिष तथ्य ठौर ॥ दिषि रिष्य लग्गि निसच्चर सु पाय । कचि रिष्य कवन तो कवन काय ॥ छं० ॥ ५५५ ॥ बीसल्लह राज कांधि पुब्ब कत्थ । जरौं ताप उघरौं केम नत्थ ॥ तुअ षिचि कौन इच्छ ठांउ धारि । कासी सु जाइ लै तिष्य धार ॥ छं० ५५६ ॥ तें पाप कीन आनन्त मर्म । तिचि डैरि खुब्ब कुद्है सु कर्म ॥ सुनि श्रवन उड़्यौ राषिस अकास । आयौ सु पंथ कमि दिल्ली वास ॥ छं० ॥ ५५७ ॥
२८७-८८ पाठान्तर :- जा । द्विंन । मुहि । सूझै । मसि । कैं । हों । कैं । हूं । हों । कत्र ॥ २८७ ॥ प्रमित । हों ॥ २८८ ॥ २८९ पाठान्तर :- प्रसंवह । धरंन । कीयो । मांस । कहै । हथ । असमांम । कूं । पूजन । को । चहुआंन । चहुवांन । आंनल ॥ २९० पाठान्तर :- दीयो । आंनलहुं । कीय ॥
सुर थान निगम बोधह सुरंङ्ग । जल जमन आइ राखिस सुसंग ॥ कालिंद्र दह सु अति गंहर वारि । पावन परम सीतल सु चारि ॥ छं० ॥ ५५८ ॥ रु० ॥ २८१ ॥ ॥ ढूँढा का हारिफ ऋषि से मिलना, अपनी पूर्व कथा कहना और तीन सौ अस्सी वर्ष महातप करके ऋषि से उपदेश ग्रहण करना ॥ कवित्त ॥ सीतल वारि सु चंग । तहां गय चलि निसाचर ॥ लगि पिपास श्रम अंग । वारि पिन्नौ अंदोलि वर ॥ भौ सीतल सब अंग । करै अति वारि विचारह ॥ रिष हारिफ गुह तपै । छोर सुनि आय निचारह ॥ दिषि प्रबन्न रिष पूच्छौ प्रसंन । कंव रूप कीजै सु जल ॥ निसि मद्धि अद्ध राखिस वचहि । पाइ परस पुव्वह सकल ॥ छं० ॥ ५५९ ॥ रु० ॥ २८२ ॥ दूहा ॥ ढिंग जुग्गिनिपुर सरित तट । अचवन उदक सु आय ॥ तहँ इक तापस तप तपत । ताजी ब्रह्म लगाय ॥ छं० ॥ ५६० ॥ रु० ॥ २८३ ॥ कवित्त ॥ ताकी पुच्छिय ब्रह्म । दिषि इक असुर अदभुत ॥ दिग्ध देह चष सीस । मुष करुना जस जप्पत ॥ तिन रिषि पूच्छिय ताहि । कवन कारन इत अंगस ॥ कवन थान तुम नाम । कवन दिसि करिय सु जंगम ॥ २८१ नैनं । तथ । ठार । रिप । लागि । पाइ । रिषि । बीसलह कथ कथि राज कथ । जोरों । उद्दुरौं । नथ । तुव । कोन । इहि । ठाडं । जाउं । ल्यौ । तिथ । आनंत । आनत । अध्रम्म । तिहिं । ठोरि । सब । ति । क्रम्मं । उड्डो । दिलिं । सुर सुर । यांन । आय । राखिसमंग । कालिंद । पाबन् । परंम । सू सांरि ॥ २८२ पाठान्तर :-तिहां । चलि । सु निसाचर । भ्रम । पीनौ । अंदोलि । भय । सब्ब । देह । करैं । रिषि । पुछ्यो । कीलौ । मंदु । चवहि । पांय परसि गय आप्प सकल ॥ २८३ पाठान्तर :-तहां । आइ । लगाई । लगाइ ॥ २८४ पाठान्तर :-बोलिय । बंम्ह । दिपि । अदभुत । दिग्ध । चषु । रस जंपत् । पुछिय । थांन । नांम । करीय । नांम । नृपति । आप् । लभीय दइत । तजत । कंत ॥
पृथ्वीराजरासौ । ११३ जो नाम ढुंढ वीसन व्रणनि । साप देह जशिय दयत ॥ छुहन सु तेह गंगा दरस । तजन देह जन संत कृत ॥ छं० ॥ ५६१ ॥ रु० ॥ २८४ ॥ दूहा ॥ तजन देह जन संत कृत । सजन अजैपुर राज ॥ निय तन असि वर पंडि हैं। मधि गंगा रिपराज ॥ छं० ॥ ५६२ ॥ रु० ॥ २८५ ॥ तन सु पाप तापह तपन । किम उधार मो होइ ॥ तुम रिषराज वसिष्ट वर । यौ उपदेसह मोहि ॥ छं० ॥ ५६३ ॥ रु० ॥ २८६ ॥ तब मुनि वर हसि यौ कहिय । बिन तप लहिय न राज ॥ अन धन सुत द्वारा मुदित । लहौ सबै सुख साज ॥ छं० ॥ ५६४ ॥ रु० २८७ ॥ तब सु तहां उपदेस किय । लगि धारन हरि ध्यांन ॥ तपत तप्प तिन रिपि गुहा । अंग उपज्यौ ग्यान ॥ छं० ॥ ५६५ ॥ रु० ॥ २८८ ॥ रिष सु उठि तीरथ गयौ । दरी सु दानव खंडि ॥ जौ लौं आऊं निथ्य करि । तौ लौं तू तप मंडि ॥ छं० ॥ ५६६ ॥ रु० ॥ २८९ ॥ गाथा ॥ तपत निसाचर तप्पं । वीते वरष तीन सै असीयं ॥ भय बाधा विण अंगं । लग्यो राम धारना ध्यानं ॥ छं० ॥ ५६७ ॥ रु० ॥ ३०० ॥ दूहा ॥ ढुंढा रिषि उपदेस किय । तिन्हि ढिग दरिय उधोर ॥ वरष तीन सत् असिअ लगि । महा प्रबल तप घोर ॥ छं० ॥ ५६८ ॥ रु० ॥ ३०१ ॥ २८५-६६ पाठान्तरः-कृत । है । हैं। ॥ २८५ ॥ सोह । सोइ ॥ २८६ ॥ यो । लहों । सबै ॥ २८७ ॥ उहां ध्यांन । तप तप्पै । अंग अंग उपज्यौ ग्यांन । अंग उपज्यौ ग्यांन ॥ २८८ ॥ उठि । दानव । लो । आंऊं । तिथ तूं ॥ २८९ ॥ ३०० सनिचर । तांपं । सें । भो । वादक सब अंगं । लग्गों । ध्यानं ॥ ३०१ ' पाठान्तरः - तिहिं । गदरीय । वरष तीन सै असीय लगि । अस अगल ॥ ८
११४ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व ॥ अनंगपाल राजा का दिल्ली बसाना ॥ दूहा ॥ पंडव बंस अनंग नृप । पति हथिनापुर ठाम ॥ एक समै जमुना तटह । वसिय राज तहँ गाम ॥ छं० ॥ ५६६ ॥ रु० ॥ ३०२ ॥ अनंग पाल तूंअर तहां । दिल्लि बसाई आनि ॥ राज प्रजा नर नारि सब । वसे सकल मन मानि ॥ छं० ॥ ५७० ॥ रु० ॥ ३०३ ॥ ॥ अनंगपाल की सुता का निगमबोध कालिंद्री तट पर गौरी पूजने जाना ॥ कवित्त ॥ अनंग पाल तूंअर । नरिंद घरमाधि राइ गुर ॥ सुता तास अति सुभग । बरष अठ्ठह सरूप बर ॥ सषी सु आनि समानि । सीख गुन वर अठ्ठह तर ॥ सावन आवन मास । गवरि नित करै पुज्ज उर ॥ निगम-बोध कालिंदि तट । गई सकल पूजन गवरि ॥ तिह्नि काल मेघ ब्रष्षह प्रबल । * भई लग्गि भींजन कुँअरि ॥ छं० ॥ ५७१ ॥ रु० ॥ ३०४ ॥ ॥ अनंगपाल की सुता का ढंढा को पूजना और उस का कारण पूछना ॥ कवित्त ॥ अनगपाल नृप सुता । संग पुच्ची ति पंच सित ॥ प्रोचित पुची एक । पुचि सा चंडि सेव चित ॥ सब मिलि जमना तीर । गई अस्नान सवारिय ॥ दिषि देवल मृत पिंड । तेह्र ढंढा तप धारिय ॥ ३०२-३ पाठान्तर :-ठांम । यमुना । तहां । गांम । ३०२५ तोअर । दिल्लि । आनि । प्रज । बसे सकल तहां आंनि । मांनि ॥ । * भई लगि भींजन = यह प्राचीन हिन्दी की वाग रीति अर्थात् मुहावरा है ॥ ३०४ पाठान्तर :-तूवर । राय । अठह । सषी आनि समांग । आंनि । समांनि । सीत । अठोतर । सावन । स पुज वर । निगमोघ । कालिदि । गइ । वरसि । लगि । भीजन । कुवरि ॥ ३०५ पाठान्तर :- अनगपाल पुत्री सु एक । सथ साथिणी पंचच सत । पंच सत । ता मइ । मंदि । जमुना । वपु स्रान । मृत । तिह्नि । ढुंढा । धारीय । पूजा । करीय । इय । दैत । पूज्यै । तिनहि ॥
आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । ११५ सब मिलि सु ताहि पुज्जा करिय । वरप पंच दुअ मास दिन ॥ दिन अवधि दइत पूछिय तिनह । को तुम कारन काम किन ॥ छं० ॥ ५७२ ॥ रू० ॥ ३०५ ॥ ॥ अनंगपाल की सुता का ढूंढा को वर चाहने को पूजने का कहना ॥ गाहा ॥ इह सुनि अनंग नरिंदं । पुत्ती सित पंच अवर दुज राजं ॥ वर चाहत तुम पासं । ए वर बीर वास इक ठामं ॥ छं० ॥ ५७३ ॥ रू० ॥ ३०६ ॥ ॥ ढूंढा का राज-स्त्रियों की सेवा से संतुष्ट होना ॥ दूहा ॥ दिल्ली ढिग गहरिय गुफा । ढूंढा तहां वयट्ठ ॥ अठ्ठोत्तर सौ राज त्रिय । सेवा करत सु तुट्ठ ॥ छं० ॥ ५७४ ॥ रू० ॥ ३०७ ॥ ॥ ढूंढा का वर देकर काशी को उड़ जाना ॥ पहरी ॥ दिय वाच वान्ध दानव सु राज । सज्जौ सु अप्प वर वचन साज ॥ उड़ि चल्यौ अप्प कासी समग्ग । आयौ सु गंग तट कज्ज जग्ग ॥ ५७५ ॥ सत अट्ठ पिंड करि अंग अब्बि । होमे सु अप्प वर मझि छब्बि ॥ मंग्यौ सु ईस पहि वर पसाय । सत अट्ठ पुत्र अवतरन काय ॥ ५७६ ॥ तन रह्यौ जोति गय देव थान । मिलि ताहि अक्कूशिय करत गान ॥ छं० ॥ ५७७ ॥ रू० ॥ ३०८ ॥ ॥ ढूंढा का फिर जन्म लेना और उसका वृत्तान्त चंद का वर्णन करना ॥ दूहा ॥ इम आतम उद्धार करि । जनम लियो भुअ आइ ॥ सो वृतंत कवि चंद कहि । बरन्यौ कवित बनाइ ॥ छं० ॥ ५७८ ॥ रू० ॥ ३०९ ॥ ॥ ढूंढा का वर दैना और काशी में यज्ञ कर तन त्यागना ॥ दूहा ॥ तब ढूंढा वर दान दिय । सुति सत अट्ठ प्रसन्न ॥ कासी जाय रु जग्ग किय । सित्त पिंड किय तन्न ॥ छं० ॥ ५७९ ॥ रू० ॥ ३१० ॥ ३०६ पाठात्तर :- अगंग । पुत्ती सय । काम वास ॥ ३०७ पाठान्तर :- ढिल्ली । गुफा । ढूंठा । वयठ । अठोत्तर । सो । तुठ ॥ ३०८ पाठान्तर :- दीय । दानवह । स । अप । पंचन । चल्यौ मग । समग । कज जग । अठ अबि । स । मधि । छवि । सब्ब । स । यसाई । पसाइ । आठ । आठ । अवतार । काइ । ज्योति । थांन । अकुरीस । भ्यांन ॥ ३०९-१० पाठान्तर :- उधार । लीया । भूअ । आइ । वृतांत । चंदनै । वरन्यो सकल बनाय ॥ ३०९.॥ ढुंढै । वरदांन । आठ । कीय । सत्त । कीय ॥ ३१० ॥
९१६ पृथ्थीराजरासौ । [ आदि पर्व ॥ ढूँढा के दानव शरीर का मान और स्वरूप वर्णन ॥ कवित्त ॥ अंगह मान प्रमान । पंच सै हथ्थ उने कह ॥ दूह उंचैा उनमान । विनय लक्ष्किनह विवेकह ॥ हथ्थ षडग विकराल । मुख्य ज्वालंघन सहह ॥ आनळ दिन्नो राज । गयौ राषिस तन महह ॥ जोगिनियं गुफा बोधह निगम । तप आदर किन्नो सु मन ॥ साधंत पवन तप उग्र करि । इस रष्यौ उद्धार मन ॥ छं० ॥ ५८० ॥ रू० ॥ ३११ ॥ ॥ ढूँढा का दिल्ली में पाषाणरूप हो जाना और स्त्रियों का उसे पूजना ॥ कवित्त ॥ असी वरस सत तीन । गुफा किन्नों तप भारिय ॥ बैस वंस षिचिअ भ्रम । भरै जमुना जल नारिय ॥ सारँग बज्यौ वाउ । घटा बंधे जल बुट्टौ ॥ दौरी सब गृह मज्झ । रूप पाषान सु दिट्टौ ॥ मिलि नारि सबन अचरिज्ज करि । जल धोए उज्ज्वल कस्यौ ॥ साषंड धूप दीपक चरिच । सित मन सिद्धौ आवस्यौ ॥ छं० ॥ ५८१ ॥ रू० ॥ ३१२ ॥ ॥ ढूँढा का अनंगपाल की सुता को वीर पुत्र होने का वर देना ॥ कवित्त ॥ दिय वीसल बरदान । कुष उपजै साचा अर ॥ बोरा रस उत्तान । जुद्ध मंडै न कोइ नर ॥ बीर जोति अवतार । भद्द जिह्वा तन भारिय ॥ नयन जोति संजोगि । 'पत्ति कुल पिता सँघारिया ॥ ३११ पाठान्तर :—कहि अंग । मांन । प्रमांन । हथ । उन । लछनह । हथ । मुष । प्रानल । दीनौ । जो गिनीय । कीनौ । पंवच । रक्ष्यौ ॥ ३१२ पाठान्तर :—अशी । बरस । शत । कीनौ । भारीय । पत्री अधम । वित्तीय अधम । वित्तिय अधम । भरे । जमना । भारीय । नारीय । सारंग । बज्यौ । वज्या । वाय । वधे । बुठौ । दोरी । मन्झ । सुदिट्ठौ । दीठौ । अरिज । धोय । उजल । संन मनि सुधि आवस्यौ । तन मन सुधि आवस्यौ ॥ ३१३ पाठान्तर :—दीय । वीशल । वरदांनि । कुष । कुष्य । उपजे । महा । रस । उत्तांन ।
आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । ११७ दिप्पे सु नयन पुछ करि अनघ । कियौ पाप इन ध्रुव करि ॥ उप्यजै नारि अति रूप तिन । तेन खिन्न जाइ सु धर ॥ छं० ॥ ५८२ ॥ रु० ॥ ३१३ ॥
॥ ढूॅंढा का वर देकर कासी जाना, वहां दानव योनि से मुक्त हो अवतार लेना-सोमेसर की परिग्रह के प्रबंध के लिये क्षत्रियों का उत्पन्न होना-जिन में से बीस अजमेर में और अन्य अन्यत्र हुए-सोमेस के वीर पुत्र पृथ्वीराज हुए ॥
कवित्त ॥ वर दिनौ ढुंढा नरिन्द । जाय कासी तट सिद्धौ ॥ अस्त लियौ अवतार । भह रसना रस पिद्धौ ॥ सोमेसर परिगह्र । प्रबंध सित उपने पिच्चि नर ॥ हुण वीस अजमेर । विण उप्यने अपर धर ॥ सोमेस वीर सुत पिथ्थ हुच्च । ठौर ठौर जपजि वलिय ॥ विधि विधि विनान अवलोक गति । अवर सूर आए मिलिय ॥ छं० ॥ ५८३ ॥ रु० ॥ ३१४ ॥
॥ पृथ्वीराज जी के परिग्रह के सामंतों के नाम और जन्म स्थानादि का वर्णन ॥
कवित्त ॥ हुआ निक्खंभर कन्नवज्ज । जैत सन्र्ष अव्बूगढ ॥ मंडोवर परिहार । करण कंगुर चाहुत्ति दिढ ॥ बन्हि भद्र सु नागौर । चंद उप्यजि लाहौरह ॥ दिक्खिय अत्ता ताइ । विया धर सामत सोरह ॥
ज्याति । जीठू । भारीय । पति । संघारिय । संघारीय । देपे । प्रसिद्ध । कीयै । द्रूव । उप्यजी नारी । उपजी । तेन् लिंन जाइ सुधिर । तेन लिंत जासे सुधर ॥* ३१४ पाठान्तरः-दीनौ । दीधौ । सिधौ । सिंधौ । आस्ति । लीयौ । रशना । रश । सोमे- शर । परिग्रह । सिंत । शक्त । उप्पने । पिञ्च । हुए । भये । वीए । वीरा । अपने । अवर । पिद्ध । उपजि । विनांन । आय मिलीय ॥
- पाठकों को इस रूपक से फिर सावधान होकर पढ़ना चाहिये क्योंकि कवि इस रूपक से पृथ्वीराजजी के जन्मादि की कथा की भूमिका बांध कर वृत्त वर्णन करता है ॥
११८ - पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व राम दे राव जालोर धर । गोइंद गढ़ धामनि यसै ॥ दाच्छिम बयानै उप्पन्नौ । प्रित्थियराज परिगह बसै ॥ छं० ॥ ५८४ ॥ रु० ॥ ३१५ ॥ ३१५ पाठान्तर :-निझर । चिनूर । कनवज । जेन सल्तप अधुगठ । दाहुलि । उपजि । अता ताय । समंता रामदे गोइद । गठ । दाहिम । वयाने । प्रियोराज । परिगह ॥ . इस रूपक से कवि ने पृथ्वीराजजी के सामंतो के नाम और उन की उत्पत्ति के स्थानादि का वर्णन करना प्रारंभ किया है। यह विषय पुरातत्त्ववेत्ताओं के ऐतिहासिक शोधों में बहुत उप- योगी होने जैसा है-किन्तु इस ग्रंथ के अकृत्रिम होने में भी एक प्रमाण रूप हो सक्ता है-और यह भी भले प्रकार ध्यान में रखने जैसी बात है कि यहां चंद अपनी उत्पत्ति लाहौर की अर्थात् “चंद उपजि लाहौरह” कहता है । इस महाकाव्य में बहुत से पंजाबी भाषा के शब्द मिलने से पुरातत्ववेत्ता विद्वान चंद की जन्मभूमि के विषय में पंजाब देश का अनुमान किया करते थे और पंजाबी अति वृद्ध यहस्थ भी अपने देश के महाकवि चंद का नाम वंश परंपरा से आज तक सुनते चले आते हैं परंतु अब हमको इस बात का निश्चय हो गया और पंजाब देश हिन्दी भाषा के काव्यों की अनुक्रमणिका में पहिली संख्या पर जाय स्थापन हुआ क्योंकि अब तक इस महाकाव्य से प्राचीन कोई अन्य काव्य नहीं उपलब्ध हुआ है । कोई २ विद्वान जो यह कहते हैं कि चंद कवि का होना केवल इसी महाकाव्य से विदित होता है । उन को अजमेर नगर के कैसरगंज में चांद बावड़ी अपने नेत्रों से देखनी चाहिये और चंद के पुरुषाओं का बनाया हुआ भाटाबाव भी उसी नगर में तारागढ को जाते हुए दृष्टि गोचर करना उचित है कि जो अजमेर के भाटों के कब्जे से निकल कर बहुत समय तक टोंक के नब्वाब साहेब के अधिकार में रहे हैं । फिर उन्होंने एक मोची को चांद बावड़ी दे दियी थी कि अब म्यूनीसीपैल कमैटी ने उस की चारों ओर की दीवार बना दियी है और इस बावड़ी के चारों ओर एक बगीचा भी था कि जिस का हांसल कुछ थोड़े दिनों तक म्यूनीसीपैलीटी में जमा होता रहा है और अब वह बगीचा कट कर वहां बस्ती बसा दियी गई है। चांद बावडी में नीचे उतरते दहिने हाथ की दीवार में प्रशस्ति का स्थान बना है कि जिस के पाषाण लेख को एक ८३ वर्ष का मुसलमान फकीर कर्नल टोड साहब का लेजाना कहता है । इस के महरावदार द्वार के दोनों ओर एक २ पत्थर के फूल खुदे हुए हैं कि जिस को अंग्रेजी में lotus अर्थात् कमल की जाति का फूल कहते हैं । यह फूल शिल्पशास्त्र के सिद्धान्तों में विज्ञ विद्वानों को बावडी की अति प्राचीनता सूचन करने वाला दृष्टि आवेगा । चंद के विषय में कुछ और भी प्रमाण हमारी रचित पृथ्वीराज रासे की प्रथम संस्ता में पाठक देख लें । इस महाकाव्य में प्रायः फारसी शब्द भी प्रयोग हुए हैं उन के विषय में हमने अन्यत्र कई एक प्रमाण प्रकाश किये हैं परंतु यह भी विशेष करके हमारे पाठकों के ध्यान में रहने जैसी बात है कि चंद जिस समय लाहौर में उत्पन्न हुआ था उस के १०० सौ वर्ष पहिले से वहां महमूददी सन्तान का राज्य था । फिर क्या कोई यह अनुमान कर सक्ता है कि उस समय की हिन्दी में एक भी फारसी भाषा का शब्द नहीं मिल सक्ता था ? इन रूपकों में जिन २ सामंतों के नाम आये हैं उन का पूरा २ वर्णन हम ग्रंथ के पूरे छप जाने पर लिखेंगे क्योंकि अभी हमारा काम केवल मूल पाठ शोध कर प्रकाश करने का है ॥
आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । ११६ पहरी ॥ उतपत्ति वास सामंत चंद । पाधरी छंद ब्रनै सु वंद ॥ दस तीन हुए दिल्ली प्रमान । हरिसिंघ वसै गढ़ह बयान ॥ छं० ॥ ५८५ ॥ जैसलहमेर अचलेस भान । पज्जून वसै चीतोर थान ॥ कलि कुंड हुऔ जंघार भीम । चहुआन आन रक्ष्यैत सीम ॥ ५८६ ॥ बउ भ्रात छोरि लग्गो सु पाइ । चहुवान सु वर सामंत राइ ॥ समियांन गढ़ नरासंघ राइ । पित मात छोरि आए सु भाइ ॥ छं० ॥ ५८७ ॥ देवरा धीर रिनधीर सथ्य । पह्विवान देस प्रिथिराज तथ्य ॥ जंघार भीम गढ जून वास । किन्नो सु जुद्ध भीमंग आस ॥ छं० ॥ ५८८ ॥ लग्गो सु लोच लिन्नौ दिलेश । सारंग राइ मोरी नरेश ॥ वारडह राइ सहसी करन्न । असिर वसै गढ आसमन्न ॥ छं० ॥ ५८९ ॥ जुध करै जिन्त कन्हाति राइ । चहुआन सूर उप्पारि घाइ ॥ सेवकक कीन अप्पै सु जोर । तेजङ्ग डोड वासी जुनोर ॥ छं० ॥ ५९० ॥ कैमास सद्धि बलवंत वीर । लग्गो सु पाइ चहुआन धीर ॥ तारन्न सूर भटनेर वास । प्रिथिराज पाइ कीनी सु आस ॥ छं० ॥ ५९१ ॥ भैंचा चंदेल गजनीय सेव । लग्गो सु घाव भूझंत तेव ॥ उप्पारि लियौ सामंत राव । कीनी सु सेव अप्पह सु भाव ॥ छं० ॥ ५९२ ॥ अरसी चंदेल मास्यौ सकज्ज । भै घा चंदेल दीनो सरज्ज ॥ पानीय पंथ उत्तन्न देस । दीनौ सु फेरि दिल्ली नरेश ॥ छं० ॥ ५९३ ॥ कनवज्ज राइ भूझंत ताम । रष्यौ सु अप्प कलि जुग्ग नाम ॥ चालुक्क पाट भोरा भुअंग । रक्ष्यै सु कचरा पिथ्य रंग ॥ छं० ॥ ५९४ ॥ ३१६ पाठान्तर :—उतपति । उत्तपत्ति । वाश । वरनैति । चंद्र वरनैति । बंध । दश । हूए । प्रमांन । गढह । वयांत । जेशलह । जेसल्लह । भांन । पांजुन । पजून । वसे । यांन । कूंढ । हूवो । हुवो । चहुभ्रान । चहुवांन । भ्रांन । रपेति । भ्रानर रपैति । भ्रान्ट । लगा । सू । पाय । चहुवांन । राई । रांय । समोयांत । गढ । राय । छोरि । भाय । निरधीर । रनधीर । पह्निवांन । देश । प्रियोराज । पृथीराज । तथ । जूंन । बाश । कौनौ । सू लिन्नौ । दिलेश । राय । नरेश । राय । सह । सो । कारंन । आसमंन । करे । जित । कन्हानराय । चहुंवान । उपार । उप्पार । सेवक । क्कीन । अपै । ते जल । जुबौर । सहु । लगा । पाय । चहुंवान । चहुवांन । तरंन । बाश । प्रिथीराज । प्रथरीराज । पाय । सू । भोहा । भोंहा । गनीय । बूंदी राज्य के पुस्तकालय की पुस्तक लिखी सं० १६४५ में लगो-तेव के स्थान में "दम आप आपंछ सु भेव" करके पाठ है । और छंद ५९१ पिछली तुक उस में है ही नहीं । लगा । भुझंत । उपारि । लीयौ । किची । चंदेल । सकज । भोहा । भौंहां । चंद्रल । सूरज । सुरंञ्ज । पांनीय । पानीय । उर्तन । उतंन । देश । सू । नरेश । कनवंज राज भुझंत तांम ।
.१२० पृथ्थीराजरासो । [ आदि पर्व जावल्लो जल्ह दषिनी देस । पृथिराज राइ किन्नौ प्रवेस ॥ सतनेज नगर दीनौ उतन्न । पूरन्न माल पृथिराज तन्न ॥ छं० ॥ ५९५ ॥ सूरत्ति वांस चहुआन राइ । कव्यौ सु बात रष्यौ सु दाइ ॥ बडगुज्जरवराम अल्ली नरेस । दिनं प्रति षांन भंजे सदेस ॥ छं० ॥ ५९६ ॥ मुक्कले दूत पृथिराज तथ्य । सेवा सु पाइ उप्परं जु हत्थ ॥ पृथिराज ताचि दो देस दिद्ध । आरूत षांन अल्ली प्रसिद्ध ॥ छं० ॥ ५९७ ॥ करि वास तब्ब गुज्जर निसंक । मारयौ षांन आनोल्ल बंक ॥ छड्ड़ा हमीर नैन वारिड । लग्गे सु पाइ दस देस दिद्ध ॥ छं० ॥ ५९८ ॥ षेता षंगार द्वै भ्रात राइ । परयौ दु कालं देसं सु भाइ ॥ दिल्लीय देस गुट्ठा सु मंडि । रष्यै सु वास भट सुभट झुंड ॥ छं० ॥ ५९९ ॥ परमार कनक जैचंद वास । किन्नौ सु षूंन डूक पाच दास ॥ लिय पांच ग्रह्यो पृथिराज देस । लंग्यौ सु पाइ आयौ नरेस ॥ छं० ॥ ६०० ॥ सांषुलौ सहसमल सात पष । तप करत अनंगच गयौ रष्प ॥ लग्यौ सु पाइ पृथीराज आइ । दीनौ सु देस पट्टय साइ ॥ छं० ॥ ६०१ ॥ अवतार खियो दिल्ही नरेस । तब हुए सत्त सामंत भेस ॥ छं० ॥ ६०२ ॥ रू० ॥ ३१६ ॥ छवित्त ॥ ढुंढा (नाम *) दानव उतंग । दियो फल अंब बिसालं ॥ बंदि लीन नृप राज । आय फिर गेह सु चालं ॥ सत्त भाग कछ अग्र । बेंटि दिय भ्रत्त समानं ॥ तिनह सूर सामंत । किंतित्त रषन चहुवानं ॥ जुंगं । फंगं । नांम । चालूंक्क । रषैं । पिथ । रष्यै सुकंवराषिथ रंग । जांवल्लो जल्ह दिषिनीय । देश । दषनीय । पिथौराजं । राय । कीनौ । दीन्ना । उतंन । पूरन माल । प्रथौराज । तंन । सूर्रति । क्रांत । बडगुज्जर राय । अली । नरेश । सुंदेश । मुकले । पृथौराज । तथ । पांय । सुं । प्रिथीराज । देश । दिंध । अली । प्रसीद्ध । तब । गुजर । मारीयौ । हांडा । हामा । दंमीर । नेनं । लगे । पांय । षेतलं षंगर । परियौ । देसां । भांय । दिल्लियं । दलीय । देश । गूढा । भेंट्ट । जैद । पांचदास । यहैौ । प्रथीरोज । देश । आये । मानि । पंषि । कंरित । रिषि । प्रथौराज । आयं । कीनौ । पहूच । लीयौ । दिली । सित्त ॥ ३१७ पाठान्तर :- ढुंढं (नाम * विशेष है) उतग । विसालं । गेहे । सु बालं । अय । भृत । समानं । चहुंवांनं । अति प्रथुल । अमिय प्रकास । संग्रह । डूक । सवंत । सवत । संघत ॥
आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । १२१ रजसेल चंद फन चमिय ग्रथु । सबर साचि आपन सु गढु ॥ इकदस समंत पंचह समै* । भए थान पंचस सु पहु ॥ छं० ॥ ६०३ ॥ रू० ॥ ३१७ ॥ ॥ आना राजा का उजाड़ी हुई अजमेर को फिर बसाकर राज करना ॥ दूहा ॥ अनल आनि मातह मिल्यो । कहि सब वत्त सुनाइ ॥ लोग महाजन संग लै । भूमि बसाई जाइ ॥ छं० ॥ ६०४ ॥ रू० ॥ ३१८ ॥ पद्धरी ॥ आना नरिंद अजमेर वास । संभरिय कीन सौत्रत्र रास ॥ नियमनाम कन्हा आना नरिंद । अरि धरनि वीर संध्यौ सु दंड ॥ छं० ॥ ६०५ ॥ द्यासान ग्राम तोरन उतंग । बन वढि कढि निधि निधि पुरंग ॥ पसु पंपि सद श्रुत संडलेप्त । जत्न न्हान दान ब्रह्मन सु देस ॥ छं० ॥ ६०६ ॥ हारम्य रम्य फिरि मंडि लोइ । दालिद्र दीन दीसै न कोइ ॥ चौघडि सतं वरषं प्रमान । आना नरिंद तपि चाहुवान ॥ छं० ॥ ६०७ ॥ ॥ जैसींघ जी का गद्दी पर विराज राज करना ॥ पग अम्भ देम दिय पुत्त छथ्य । जैसींघदेव तपि राज तथ्थ ॥ क्रिति छत्र सीस जैसींघ देव । निधि लई वीर बीसल पनेव ॥ छं० ॥ ६०८ ॥ विंटु लीय वीर आना नरिंद । बीसल तडाग मधि द्रव्य कंद ॥ पायौ न वीर तिन द्रव्य केछ । कंचनह काम मंडाय गेह ॥ छं० ॥ ६०८ ॥ सब द्रव्य दीन तिन विप्र हस्त । भंडार धरिय धन अम्म वस्त ॥ श्रुति सुनहि श्रवन जंपत पुरान । साधरम करम चलि चाहुवान ॥ छं० ॥ ६१० ॥ कत्ति नीति गरुअ गचि गरुअ मुक्कि । कुछ रीति चित्त रंचक न चुक्कि ॥ सोऽवरस अष्ट तप राज कीन । आनंद मेव सिर छत्र दीन ॥ छं० ॥ ६११ ॥ * यह पाठ हमने सं० १८४९ की पुस्तक का रक्खा है किन्तु सं० १६४७, सं० १७९० और सं० १८४५ की में "इक दस संवत पंचह समै" है कि इन में से जिसे विद्वान ठीक समझें उसे ग्रहण करें ॥ ३१८ पाठान्तर :- अनिल । अनलि । सुनाय । लोग । वसाईय । धसाइय । आय ॥ ३१९ पाठान्तर :- आनां । नरिद । नरंद । सभरीय । सोवंत्र । राशि । नांम । आंना । मंडीं। तोरन । वढि । कढि । पुरंगं । पंप । सदस्तुत । मंडलेस । न्हान । दांन । हारम्य । मंड । लोई । लोय । दारिद्र । दीन दीन । दीसे । कोई । चौ घड़ी । सत । प्रमानं । नरिंदं । चहुवांन । म्रग । हथ । हथ्थ । तथ । छत्रचीस । जैसीह । निघ । बीर संल । पनैव । बिंदुलीय । विटलीय ।
१२२ पृथ्वीराजरासो । [ आदि पर्व ॥ आनन्दसेवजी का राज करना ॥ तहां तप्पि तेज आनन्द सेव । बाराह रूप दिद्ध्यौसु देव ॥ धरनी विचार आभास साद । मंड्यौ सु राज पहुकर प्रसाद ॥ छं० ॥ ६१२ ॥ सो * वरष राज तप अंत कीन । सिर क्व सोम पुच्च सु दीन ॥ ॥ सोमेश्वरजी का सिंहासन पर विराज राज करना ॥ सोमेस सूर गुज्जर नरेस । मालवी राज सब लग्ग पेस ॥ छं० ॥ ६१३ ॥ मारू बजाडू भहीन थान । घल सोमि लई बल चाहुवान ॥ दिल्लेस व्याह तोवर घरेस । तिह ग्रब्भ भयौ पीथळ नरेस ॥ छं० ॥ ६१४ ॥ आनन्द राज नंदन सु सोम । सोरिया दखनि तिन कियौ होम ॥ निय पुर सु नयर सुर लग्गि धोम । आनन्द केलि अजमेर भोम ॥ छं० ॥ ६१५ ॥ रू० ॥ ३१८ ॥ ॥ सोमेश्वर जी की शूरता का संक्षेप वर्णन ॥ कवित्त ॥ जिहि सोमेसर सूर । सूर जित्ते धुरसानी ॥ जिहि सोमेसर सूर । चढिवि गुज्जर घर आनी ॥ जिहि सोमेसर सूर । लियौ नाहर परिचारिय ॥ बल उप्पम कवि चंद । चंद राहा जिस मारिय ॥ नरिंद । छेह । देह । कांम । गैह । गेह । दिन । भंडारि । अवन सुनहि । जपत । पुत्तान चाहु- वांन । गहव । गहव मुकि । ऊति । रीत । चित्त । रचक्र । चुकि सौ । अठ । तिहां । तपि । रूप । दैध्यौ । सट्ट । प्रसद्द । सौ । सोम । सोमैस । सूर । गुजर । पग । पैस । मारू । वज्ञाय । भट्टी । यांन । लइ । बल । चाहुवांन । दिल्लेस । दिल्लेश । तुंवर । घरेश। गर्भ । यभ । पित्यल । पीथ्यल । नरेश । मोरीयां । दल । दलह । कीयौ । नैर । लगि । कल ॥
- चौघट्टि सत्त = इस के विरुद्ध कोई दूसरा पाठ हमारे पास की पुस्तकों में नहीं मिलता किन्तु कोई २ वृद्ध कवि चौसट्ठि सत्त करके मूल में पाठ होना कहते हैं और उस से ६४+७ = ७१ वर्ष की संख्या निकालते हैं और कोई १०० वर्ष और चार घड़ी और कोई ७ वर्ष और चार घड़ी का वाचक पाठ कहते हैं किन्तु ऐसे सब स्थल पक्षपात रहित विद्वानों के सूक्ष्म विचार करने योग्य हैं ॥
- इस सो शब्द का पाठ किसी २ पुस्तक में सौ भी है कि जिस से वर्ष की संख्या के समझने में बड़ी गड़बड़ हो जाती है । यह स्थल भी विद्वानों की बुद्धि को भ्रम देने जैसे है । यदि कोई शुद्ध अंतःकरण से पूर्वापर का लेखा लगा देखेगा तो वह चंद कवि को संवत संबन्धी कठिनता को जान कर बहुत प्रसन्न होगा ॥ ३२०. पाठान्तर :- जिहिं । सोमेत्थर । जिने । धुरसांनी । चढै । चढे । भांनी । भांती । लीयौ । परिहारी । परिहारीय । बलि । उपम । राहां । सारी । मारोय । बैरन । द्वोरि । रांजोर । बर । पां । मइ । गुजर । गूजर । गज यौ ॥
आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । १२३ बर वीर धीर धारच्च धनी । संभरि वैरिन भंजयौ ॥ इक दौरि गौर राजौर वह । पां वड गुज्जर गंजयौ ॥ छं० ॥ ६१६ ॥ रु० ॥ ३२० ॥ ॥ दिल्ली के राजा अनंगपाल जी पर कमधज्ज का चढना ॥ कवित्त ॥ ढिल्लिवै आनंग । राज राजंग अभंगं ॥ ता उप्पर कमधज्ज । सेन सज्जी चतुरंगं ॥ अग्र आस अभूत । पुट्टि बंधे गज पत्तं ॥ ता पुठ्ठै विजपाल * । सुभर सज्जै रन मत्तं ॥ धजनेज मोज नीसान ढल । मनु बसंत रंज्जय विपन ॥ करि कूच कूच उप्पर धरा । आय वेध अंतर सपन ॥ छं० ॥ ६१७ ॥ रु० ॥ ३२१ ॥ ॥ कमधज्ज की चढाई सुन अनंग का कालिंद्री उतर मुकाम करना ॥ कवित्त ॥ सुनी बत्त आनंग । अंग लग्गो रस वीरच्च ॥ भ्रकुटि वक्र रत द्विग । चित्त जुध रत्त सरीरच्च ॥ बोलि मित्त अप्पान । । कहिय सू बान मंत गुन ॥ चढत राइ दिल्लेस । करिय नीसान वीर धुन ॥ गज वाजि रथ्थ पद भर गद्दर । सजिय सेन सनमुष चलियं ॥ उत्तरि कालिंद्द्रि मुक्काम किय । दस दिसान वत्ती चलिय ॥ छं० ॥ ६१८ ॥ रु० ॥ ३२२ ॥
- स्मरण में रखने की बात है कि संप्रत शोधों के अनुसार भी कनौज़ के राजा विजयपाल जी, दिल्ली के राजा अनंगपालजी और अजमेर के राजा सोमेश्वर जी परस्पर समकालीन थे ॥ ३२१ पाठान्तर :-ढिली । ढिल्लावै । राजग । अभंगम । कनवज । सजी । चतुरंगम । अंग । अग्र । पुठिं । पुढ़ि । बँधे । पंतं । प्रंत । पुठे । पुठिं । विजेपाल । सजे । मंतं । मंत । नीसांन । ढल्ल । मनों । बसंत । रञ्जय । विपण । कूच २ । उपरि । धरहि । धरहिं । आइ । वेद्ध । संपन ॥ ३२२ पाठान्तर :-सुनिग । सूनिग । वत । लगौ । लगे । दश । भृगुटि । चक्र । द्विग रत । चिंत । भृत । अप्पांन । शषांन । स बांन । दिलेश । निसांन । धूंनि । रथ । पथ । मन मुष । संमुख । उतरि । कलिद्रि । मुकांम । दश । दशांन । वती । हलीय ॥
१२४ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व ॥ कमधज्ज की चढाई सुन सोमेस का अनंग की सहायता को दिल्ली जाना और वहां पहुँच अनंगपालजी से एकान्त में मंत्रणा करना ॥ पद्धरी ॥ संभरिय बत्त संभरि नरेस । आभासि खित्त अप्पां असेख ॥ कमधज्ज राज तंवर नरिंद । मत्तौ सु दुनै आवद्ध दंड ॥ छं० ॥ ६१८ ॥ अप्पन सहाय सज्जों सपूर । बैठन्न ग्रेह नह अम्भ सूर ॥ करिकैं सु जीति आवैं अपान । कै सजै वास कैलास थान ॥ छं० ॥ ६२० ॥ मन्नेव सूर भर मंत वाम । घुम्मरे नद्द नीसान ताम ॥ चढि चल्या सेन सजि चाहुवान । उप्पटे जानि सत सिंधु पान ॥ छं० ॥ ६२१ ॥ अग्गे सु सोम दिल्ली सहाय । अग्गेव विष्व हर कंठ लाय ॥ अग्गेव मनी लख्खी फणिंद । अग्गेव सरद निसि उगिग चंद ॥ छं० ॥ ६२२ ॥ अग्गे सु चक्र खिन्ना गुविंद । अग्गै सु वज्र कर चक्की इंद ॥ बिहु बाह सूर सज्जे समंत । बेनै विरद्द बंधे अनंत ॥ छं० ॥ ६२३ ॥ *
- यह छंद सं० १६४७ । १७७० । और १८४५ की पुस्तकों में नहीं है किन्तु सं० १८५९ की लिखी में है ॥ इस छंद की अंत की तुक में “बेनै विरद्द बंधे अनंत” है कि जिसका अर्थ यह होता है कि वेन ने अनेक बिरद बांधे अर्थात् कहे । यह वेन कवि इस महाकाव्य के रचनेवाले चंद का पिता था और वह सोमेश्वर जी के इस समय साथ था । अब तक चंद से पहिले का कोई काव्य किसी भी कवि का किसी के जानने में नहीं है किन्तु हमने जो एक छंद छंद वर्णन की महिमा नामक पुस्तक सं० १६२९ की लिखी शोध कियी है उस के पीछे मेवाड राज के महाराणा जी श्री उदयसिंहजी के महाराज कुमार श्रीसगतसिंहजी के पंडित विष्णुदासजी ने अकबर बादशाह के भाट गंगजी से अजमेर में पटोलावाय के मुकाम पर चंद के बाप कवि राव वेन का नीचे लिखा छप्पय अर्थात् कवित्त लिखा था वह हम प्रकाश करते हैं। इस छप्पय से वेन ने पृथ्वीराजजी के पिता सोमेश्वरजी को आसीस दियी थी :- छप्पय ॥ अटल ठाट महि पाट । अटल तारागढ थानं ॥ अटल नग अजमेर । अटल हिंदव अस्थानं ॥ अटल तेज परताप । अटल लंका गढ डंडिव ॥ अटल आप चहुवान । अटल भूमी जस मंडिव ॥ संभरी भूप सोमेस नृप । अटल छत्र आपै सु सर ॥ कवि राव वेन आसीस दै । अटल जुगां राजेसं कर ॥ १ ॥