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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

३०८ पृथ्विीराजरासो । [ आठवां समय १० कवित्त ॥ जग्गि सूर सोमेस । सेन सज्यौ हयगय नर ॥ राका निसि जनु उदधि । चढैं छल्लोर चंद पर ॥ सुन्यौ श्रवन दृढ बैन । लरचि प्रथिराज जलनदछ ॥ पुच्छ चांपि जनु सिंघ । दिषि प्रजल्यौ नयन झल ॥ दडू बंब दृतिय जनु गगन रव । छुटि चंदुन गज गुरि चलिय ॥ दीसंत मत्त छहैं नयन । मनौं प्रबत पंषछ चलिय ॥ छं० ॥ ४४ रू०॥२७॥ दूहा ॥ ठनक घंट घुघ्घर धमक, धमक धरनि बर पाहू ॥ झमकत सुंड लपेट भट, भरत देत गिर राहू ॥ छं० ॥ ४५ ॥ रू० ॥ २८ ॥ दूहा ॥ पग लंगर जंजीर जरि, कज्जल गिरवर चंग ॥ दिघदंत बग घन बरन । झरत मदंग छहंग ॥ छं० ॥ ४६ ॥ रू० ॥ २९ ॥ दूहा ॥ पब्बय कै पावस जलद, दल दाढन उठि कोर । दिषावत दल बहलन, भर घर परत अघोर ॥ छं० ॥ ४७ ॥ रू० ॥ ३० ॥ दूहा ॥ दंति पंक्ति कज्जल बरन, दिषि ढलमल ढाल ॥ करछरंत बैरष लषी, दल सोमेस भुआल ॥ छं ० ॥ ४८ ॥ रू० ॥ ३१ ॥ दूहा ॥ उठी कोर हथ गय प्रवल, दिठ दुअन कुटि धीर ॥ दिषि धनु धर हथनारि धरि, भरकि अरहरी भीर ॥ छं० ॥ ४९ ॥ रू० ॥ ३२ ॥ छंद विराज* ॥ कियं चित्त पंगे । घटं घट भंगे ॥ उमंगे सुअग्गे । मनौं बीर जग्गे ॥ छं० ॥ ५० ॥ २७ पाठान्तरा-रन । चढै । सून्यो । बैनं । पृथीराज । पुछ । दिषि । प्रज्जरै । दई । दहूय । चंदून । छहै । छकैं । मनो । पंषकि ॥ २८ पाठान्तर-ठनक । घुघर । धमकि । पाय । राय ॥ २९ पाठान्तर-कजल । दिग्ध । दिघ । सदंग ॥ ३० पाठान्तर-दिषावत । दिषावै । दल बल दलन ॥ ३१ पाठान्तर-दंत पंत । दिषि । ढल मल । वैरषलकी ॥ ३२ पाठान्तर-हय दल । देखि धनुष हथ नारि धरि । फरकि ॥

  • इसी समय के रूपक २२ की टिप्पण के साथ इस रूपक को भी ध्यान में लेना चाहिए ॥

ग्यारहवां समय ११ ] पृथ्वीराजरासो । ३०६ देखे वीर लग्गे । बढै चारु अग्गे ॥ डितैं नाचि डिग्गे । मचा सोर अग्गे ॥ छं० ॥ ५१ ॥ परैंके अहग्गे । न वैरीन सग्गे ॥ तजै नाम पग्गे । ... ... ... छं० ॥ ५२ ॥ रु० ॥ ३३ ॥ गाथा । जग्गेयं जुध वानं । कुंभे यनं कंकालं कार्यं ॥ दंतं मुप्प करेयं । वाछंतं वीर सुभटायं ॥ छं० ॥ ५३ रु० ॥ ३४ ॥ रन में मरे और घायल कैसे पड़े दीखते थे और कौन कौन योद्धा किस किस से घायल हुए और मारे गए ॥ कवित्त ॥ हय हिंसहिं गज चिक्कारि । भगर सम दिषि हुन्नाचल ॥ वखि पंपिनि बेताल । नंदि नंदिय ओन्नाचल ॥ गिद्धि सिद्धि किल्लकांत । ईस सुंडावलि संधय ॥ चकि कैमंध पर त्रुटि । चढी देवी दल संधय ॥ उपमान तास कवि चंद कहि । सुभत सनाह सुकाञ्चनिय ॥ जाने कि कृष्ण वृंदावनह । रास रमै निसि ग्वाखिनिय ॥ छं० ॥ ५४ ॥ रु० ॥ ३५ ॥ कवित्त ॥ * जच्चैं बाजीद पठान । सघन पुरसांन पांन तहँ । हय कटि दुव तंडीर । उभय कम्भान तांनि सच ॥ उंच कछर कंधान । छोट गिरि दांन लव भुच्च ॥ रक्त त्रांन सुष चप्पु । कांक अनसंक अवनि धुच्च ॥ ३३ पाठान्तर-इतर पुस्तकों में इस छंद का नाम रसावल वा रसावला लिखा है परन्तु हमारी सं० १६४७ की पुस्तक में शुद्ध नाम विराज है वह हमने प्रयोग में लिया है क्योंकि यहां पर उसका ही लक्षण मिलता है अर्थात् वह दो लघुगु का होता है और रसावल दो गुलगु का होता है ॥ घट । मनों । बढ़े । आगें । अग्रे । अग डिगें । नांहि । सोर बग्गे । फरेंके अछगे । सगे । तजै । नांम ॥ ३४ पाठान्तर-कुंभेयन कंफलं कादं । दंदं मुप । सुभटादं ॥ ३५ पाठान्तर-हिंसहिं । हिंसहि । दिपि । पंषिन । गिड्डु । सिड्डु । संघिय । कमंध । परि । तिहि उपमान । उपमांना । निकि ग्वालिनोय ॥

३८० पृथ्वीराजरासो । [ आठवां समय १२ भरि बांच कान निक्खि लोच मुठि । दिष्षि षवासति ओट करि ॥ ओडन समेत संनाच षस । सर सुविधि फुट्टिग निकरि ॥ छं० ॥ ५५ ॥ रु० ॥ ३६ ॥ कवित्त ॥ धुक्कत धरनि षवास । कोपि कयमास काज कर ॥ वज्ज्र घात बख्खिबंड । छन्निग तरवारि टोप पर ॥ टोप तुट्टि सिर फुट्टि । सम सुसंनाच चीर छुच्च ॥ बख्खर पख्खर तुट्टि । तुट्टि द्वय खंड परिय जुच्च ॥ जय जया सद्द आकास छुच्च । सुमन सघन उप्पर झरिग ॥ देष्षंत कछर करिबार बर । स्सेन सघन बिंदुंरि उरिग ॥ छं० ॥ ५६ ॥ रु० ॥ ३७ ॥ जहँत देन धर धरन । तहँत बड गुज्जर रामच ॥ तहँ मुंगल रषन समर । संग घत्तिय सिर सामच ॥ तुरखबोंध सिर टोप । फुट्टि छुप्परि रत बुद्धिय ॥ तहां उठंग ढूक बीर । जानि जमराँन सुरुट्टिय ॥ तरवारि तेज नारेन छन्नि । धर असंध तुद्दिग धरट्ट ॥ अनभूत दृस्ट अवसान बढि । करच्चि देव बंदन बरट्ट ॥ छं० ॥ ५७ ॥ रु० ॥ ३८ ॥ कवित्त ॥ जहां अंगद मरदांन । कन्ह तहां जांनि नाग भुच्च ॥ मिल्ले तक्किक तरवार । झारि उब्भारि सीस दुच्च ॥ मेक्विय मांगद्द सीस । टोप कहिय सिर धारिय ॥ नर बांधै झटि कहि । अद्ध अद्धं करि डारिय ॥ ३६ पाठान्तर-जहां । बांणीद पठांन । तहं । तहां । दुच्च । चत्रु । भिरि । मिलि क्रोह । दिषि । ३७ पाठान्तर-केमास । बलिचंड । जुट्टि । बषर । पषर । जुट्टि । जुट्टि कैं षंड परिय जुग्र । जै जया । हुय । दिष्यंत । बिंदुंरि डरिग । ३८ पाठान्तर-जहांन । जहंन । धरत । तहांत । तहत । गुजर । रांम । तहां । मुंगल । रषन । घत्तिय । सांमह । विधि । सेर । बुट्टिय । उठग । ईक । जांनि । यमरांन । जमरांन । जुट्टिग । अवसांन ॥

पाठवां समय १३ ] पृथ्वीराजरासो । ३८१ घर गिरत मंत साहू सरद्द । धय पंक्षां असिवर जरिय । जै जया सद्द सुरपुर अच्यौ । इम सुकन्द वै धर परिय ॥ छं० ॥ ५८ ॥ रु० ॥ ३९ ॥ कवित्त ॥ कन्द कटत वै धरनि । करनि जित मित सारं सचि बहै दुग्ध तरवारि । कंहू कवि लप्पटाइ नचि ॥ उडतहि धथ पग न्यार । सीस हक्कारि घर धावहिँ ॥ हंस हंस के मिलहि । माल अच्छारि के नावहिँ ॥ अद्धभूत भयानक भगर सुम । नगर लाग लग्यिय रनच ॥ झंकार चक्र काच कूच सचि । जयं सबद मचिय घनच ॥ छं० ॥ ५९ ॥ रु० ॥ ४० ॥ जयजयकार का उपमान्रों के सहित वर्णन ॥ कवित्त ॥ मुषनि वट्ठि झंकारि । तलव टंकार लाग लगि ॥ वजि भेरी झंकार । धार झंकार पाग पगि ॥ छुहि सीर संकार । लुहि भंडार धीर मुति ॥ धुकाहि धज्ज भंडार । झुकहि संडार सार धुति ॥ अचरिज्ज अवनि संमर चरनि । वरनि कवि कहा सब सक्राय ॥ समरंग दुदछ पिख्खिय सुभट । जकाय कोय दुनकुय चक्राय ॥ छं० ॥ ६० ॥ रु० ॥ ४१ ॥ छंद तोटक* ॥ भ्रमरावति छंदय चंद कहं । पढि पिंगल अच्छिर जे निमखं ॥ बजई झनकार सुझस्स्रिस घनं । धच तुंबर रिक्खिय नाद धुनं ॥ छं० ॥ ६१ ॥ ३९ पाठान्तर-जहां । मरदांन । तहां नर नाह कंन्हक । कमकि बाहि पग भ्रट्ट । भारि उभारि सीस दुम । मेल्हिय । मंगदं । शीश । धारीय । नर नांहे असि कट्टि । यदु अड्डु करि डारीय । जरिय ॥ ४० पाठान्तर-मार मचि । उड़हि । हक्कहि । अछरि । भयानक । लगिय । जय ॥ ४१ पाठान्तर-बढि । धंज ॥

३८२ पृथ्वीराजरासो । [ आठवां समय १४ झननं कढ़ि षग्ग कला दुसरी । प्रगटे जनु बिज्ज घणं पसरी ॥ उपमा निसरी असि बैठि चयं । फिर नागनि नाग सनौं भचयं ॥ छंदं० ॥ ६२ ॥ जु करै दल दोइय तीर मरं । वच्चै जनु टिड्डिय खेत परं ॥ दुतिई उपमा कवि यौं मनयी । किय अंगन चंद निसा जगयी ॥ छंदं० ॥ ६३ ॥ जु चहं चह चंबक बञ्जि घनं । कि नचै उपमा अग ईस जनं ॥ जु फिरै गज गुंजत रोस चढ़ं । षग्ग बहन्न जानि किवाइ बढ़ं ॥ छंदं० ॥ ६४ ॥ किस्सु रोपिय झुंडय सूर रनं । कि सुभै सुवसंत षजूरि जनं ॥ जुबरै बरनो घन अच्छ वरं । खुलरै चिय चांपि विपिट्ठ करं ॥ छंदं० ॥ ६५ ॥ रू० ॥ ४५ ॥ जु बहै सिर उप्पर राम सरं । सु मनौं अरिविंदन स्रौंर अरं ॥ गज सीस सिरीन जु छिंक परी । कच अंगन इंद वधू बिथुरी ॥ छंदं० ६६ ॥ रू० ॥ ४६ ॥ कुटि चक्र लगे गज कुंभ जिसे । मनु बह्वल पै सतू चंद जिसे ॥ दुअ छद्य गुरु जन सीस जरो । दधि भाजन ग्वालिन कोरि घरी ॥ छंदं० ॥ ६७ ॥ रू० ॥ ४७ ॥ जु कियौ दल दोडन दुंद जुधं । मिलअंत सुझंषिन दिष्षि उधं ॥ बिसयौ दल मुंगल मार मरं । बढिई प्रथिराज नरिंद कुरं' ॥ छंदं० ॥ ६८ ॥ रू० ॥ ४२ ॥ ४२ पांठान्तर- * इस छंद का नाम इतर पुस्तकों में भ्रमरावली लिखा है सो अशुद्ध है किन्तु वह तोटक वा त्रोटक नामक है-इनमें इतना ही अंतर है कि तोटक चार ललगु का होता है और भ्रमरावली पांच का ॥ अच्छिर । बजी । रिभिय ॥ ६१ ॥ फिरै । नागसि । मनौं ॥ ६२ ॥ तीरन मार । वहै । अपार ॥ दुती उपमा कवि यौं मन लगि । कि अंगन चंद्र निसा महि जगिग ॥ ६३ ॥ चहं चहं । चढंत । जांनि । बढंत ॥ ६४ ॥ कि रोपिय । अच्छ ॥ ६५ ॥ उपर । मनो ॥ ६६ ॥ मनो । हथ । गुरजन ॥ ६७ ॥ सुजुद्धु । मिलंत । रंषिनि । दिषिय । उड्डु । षिस्यौ । मरोर । बढी । नरिंदह । कोर ॥ ६८ ॥

आठवां समय १५] | पृथ्वीराजरासो । ३८३ पृथ्वीराज की विजय ॥ दूहा ॥ भई जीत सोमेस सुअ, लियौ मुगत्न गज मेलि । देखि षेत सब दिग्ध बहु, बोर वरंनिय केलि ॥ छं० ॥ ६९ ॥ रू० ॥ ४३ ॥ रन सुद्दिप क्रुद्दिप तजिय, घाइल लीन उठाइ ॥ भये सूखट जे अंत तन, दाघ दिग्ध तन ताई ॥ छं० ॥ ७० ॥ रु० ४४ ॥ हुच्च डेरा नौवति विहसि, पंच सबद दरवार ॥ जिन भट लग्गे सस्त्र तन, तिन तन कीनिय सार ॥ छं० ॥ ७१ ॥ रू० ४५ ॥ इति श्री कविचंद विरचिते पृथिराजरासके मेवाती मुगल कथा नाम अष्टम प्रस्तावः ॥ ८ ॥ ४३ पाठान्तर-जीति । दिघ ॥ ४४ पाठान्तर-दाघ दिघ ॥ ४५ पाठान्तर-निहसि । कीनीय ॥

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अथ हुसेन कथा लिख्यते ॥ (नवां समय) संभरिनरेश (पृथ्वीराज) और गज़नी के शाह (शाहबुद्दीन) से कैसे बैर हुआ इसका वर्णन ॥ दूहा ॥ संभरि वै चहुआन कै, अरु गज्जन वै साच ॥ कहौं आदि किम वैर हुव, अति उतकंठ कथाह ॥ छं० ॥ १ ॥ रू० ॥ १ ॥* शहाबुद्दीन के भाई मीर हुसेन के गुणों और उसकी वीरता की प्रशंसा ॥ कवित्त ॥ बंधय साचि सचाव । मीर हुस्सेन वान धर ॥ निज्ज वान सु प्रमान । वान नीसान बधै सुर ॥ गान तान सुज्जान । बाहु अज्जान वान वर ॥ भेव राज परवान । उच्च जस थान जुमरू भर ॥ उदार चित्त दातार अति । तेग एक वंदै विसव ॥ संकंत साचि साचाव तिन । तेज अजै जयमंत अव ॥ छं० ॥ २ ॥ रू० ॥ २ ॥ १ पाठान्तर–चहुआन । गजन । साहि ॥

  • हमारे पास की सं० १६४७ वाली पुस्तक में इस प्रथम रूपक के नीचे तो इसमें लिखा दूसरा रूपक ही लिखा हुआ है परंतु उसके किनारे पर यह दोहा और लिखा हुआ है सो हम को क्षेपक दीखता है –दूहा ॥ आनंदिय गंधर्व तब, अहो सुनहि द्रिग जेन । अति दिवार कथन कथा, विबर कहै। बर बेन ॥ २ पाठान्तर–साहाब । हुसेन । वान । निज । बांन । प्रमांन । बांन नीसांन बंधे । गांन । तांन । तौन । सुज्जांन । सुज्जांन । आञ्जांन । वांन । परमांन । परखांन । उंच । थांन । जुझ । उदार । संकतं । अजे ॥ ३

३८६ पृथ्वीराजरासो । [ नवाँ समय २ शाहाबुद्दीन की पातुर चित्ररेखा की प्रशंसा, शहाबुद्दीन का उस पर प्रेम, और हुसैन का भी उस पर आसक्त होना और चित्ररेखा का भी मीर को चाहना ॥ कवित्त ॥ दृषि बधु आचार । मीर उमराव जंपि जस ॥ एक पाच साहाब । चित्ररेषा सु नाम तस ॥ रूप रंग रति अंग । गान परमान विचछन ॥ बीन जान बाजान । आनि बतीसइ लच्छन ॥ दस पंच बरष वाचा सुवच । सुप्रसाद साहाब अति ॥ आसिक्क तास हुस्सेन बुच्च । प्रीति परस्पर प्रान गति ॥ छं० ॥ ३ ॥ रु० ॥ ३ ॥ शाह का यह समाचार सुनकर क्रोध करना ॥ कवित्त ॥ एक सुदिन सुविचांन । साह हुस्सेन सुबुद्धिग ॥ वे काफ़र आतस्स उतँग । दह दिसि नह दुद्धिग ॥ पैसंगी पासंग । लष लप्पां नलवाही ॥ सांई सौं संग्राम । ढक्कि दैवर गुरदाही ॥ गर्दन गुराव मचि मचि मषां । षांषवास अषिय घरह ॥ अन छह नाज लब्भय रवन । करौं तुच्छ तुक्की बरह ॥ छं० ४ ॥ रु० ॥ ४ ॥ हुसैन का शाह की बात न मानना और शाह का आज्ञा देना कि या तो मेरा राज्य छोड़ दो नहीं मारे जाओगे ॥ दूहा ॥ सुनिअ बैन साहाब तब । प्रीत न इंडी बाम ॥ कोपि कह्यो सुरतान तब । छनौ कि इंडौ यांम ॥ छं० ॥५॥ रु० ॥ ५ ॥ ३ पाठान्तर-दृषि । बंध । स नांम । अति अंग । गांन । परमान । विचत्तन । जांन । बाजांन । आनि । लछन । लत्तन । आसिक । हुसेन । प्रांन ॥ ४ पाठान्तर-सदिन । हुसेन । आतस । उतंग । पासंगं । लष । लषां । सांई । सो । गद्द । अनहल । लभ्भेय । लभय । तुझीप ॥ ५ पाठान्तर-सुनिग । इंडिय । वांम । सुरतान । क । यांम ॥

नवां समय ६ ] पृथ्वीराजरासो : ३८० मीर हुसैन का देश छोड़ कर परिवार आदि के साथ नागौर की ओर आना ॥ कवित्त ॥ सुनिय वृत्त हुस्सेन । खेत अप्पन साधारिय ॥ छंडि नयर निस्संक । संक मन साह नसारिय ॥ निसा जाम इक आदि । लई सो पाच परस गुन ॥ तरुनि पुत्र परिवार । सजि सब साज सु अप्पन ॥ परिग्रह सुअप्प अग्गैं करिय । पांन पांन बंधी सिलह ॥ संचह्यौ नैर नागौर इह । तजिय देस निज गंठ गृह ॥ कं० ॥ ६ ॥ छ० ॥ ६ ॥ मीर हुसेन का पृथ्वीराज के यहां आना ॥ दूहा ॥ लै परिगह हुस्सेन गय । दिसि प्रथिराज नरिंद ॥ संभरि वै संभारि कैं । मनु आयौ अह्रदंद ॥ कं० ॥ ७ ॥ छ० ॥ ७ ॥ मीर हुसैन को आदर के साथ पृथ्वीराज का बुलाना और मीर का आकर सलाम करना ॥ कवित्त ॥ पातिसाहि तहिन * नरिंद । साहि पांरोज प्रसन्नौ ॥ घर घर साहि घरंन । छित्ति नीसान दिवन्नौ ॥ पर पठान उंचीगु । मान अगिवान अगन्नौ ॥ तिन में रख्यौ स.हि । आन गज्जन धर थन्नौ ॥ लब्भै सुमीर जंमी जहर । दुनियां दिन लगि दुअन थां ॥ हुस्सेन मीर सलाम करि । गौ चहुआनह पास थां ॥ कं० ॥ ८ ॥ छ० ॥ ८ ॥ ६ पाठान्तर-हुसेन । छंडिय । निसंक । सारोय । जांम । सादिल्लीय पात्र परम गुन । सथि । परगह । बंधिय ॥ ७ पाठान्तर-हुसेन । प्रथीराज । मनो ॥ ८ पाठान्तर-पातसाहि । * अधिक पाठ है । नौसांन । पठांन । गुमांन । मांन । अंगांनौ । अगानौ । मैं । रखै । यांनौ । लभै । जु । दुनी । हुसेन सलांम ॥

३८८ पृथ्वीराजरासो । [ नवां समय ४ पृथ्वीराज का शिकार खेलना और मीर हुसैन का सुन्दर दास को पृथ्वीराज के पास भेजना ॥ कवित्त ॥ पारधि पहु पृथिराज । रमै षहू पुर पासह ॥ बहिल चीस चिचक्क । ससिष रेसम धर रासह । ह्वै कुरंग फंदेत्त । डोरि बहु बंधि विनानिय ॥ जाम एक दिन आदि । मध्य खेलै मृगयानिय ॥ आयौ बसारि हुस्सेन तहैं । सुन्यौ राज मृगया समय । बुलाय दास सुंदर बिखिय । पठ्यौ प्रत्ति चहुआन तय ॥ छं० ॥ ९ ॥ रू० ॥ ९ ॥ सुन्दर छाया का स्थान देख कर मीर का डेरा डालना ॥ दूहा ॥ उत्तम ठाम सु छांह जड़, करि मुकाम बलवीर ॥ बुलि डेरां विधि विधि बरन, तहां बयट्ठौ मीर ॥ छं० ॥ १० ॥ रू० ॥ १० ॥ हरम (स्त्रियों) का डेरा पीछे की ओर डाला । दूहा ॥ डेरा हरम सुपिठ रखि, चहु पष्यां बर मीर ॥ पासवांन कुल सील सम, पास राखि बर नीर ॥ छं० ॥ ११ ॥ रू० ॥ ११ ॥ सुन्दर दास का पृथ्वीराज के पास जाना, पृथ्वीराज का मीर का कुशल समाचार पूछना और उसका सब हाल कहना ॥ दूहा ॥ सुंदर दास सुपास गय, जहां राज पृथिराज ॥ मिलिय विविधि पुच्छै कुसल, कह्यौ मीर सब साज ॥ छं० ॥ १२ ॥ रू० ॥ १२ ॥ ९ पाठान्तर–पारिधिरा । पृथीराज । षटूपूर । तीस । फंदैत । विनानीय । जांम मधि हुसैन । तहां । बुलाय । सुंदरि । पिन्नौय । चहुआन । रय ॥ १० पाठान्तर–उत्तिम । ठांम । मुकांम । बर वीर । बयठौ ॥ ११ पाठान्तर–पिठि । चहुं । पषां । पासवांन । शील । रखि ॥ १२ पाठान्तर–सु पास । राजन । पूंछै । पुछी ॥

नवां समय ५ ] पृथ्वीराजरासो । ३८६ मंत्री, कैमास, चन्द, पुंडीर आदि को बुलाकर पृथ्वीराज का पूछना कि क्या करें क्योंकि दोनों तरफ विपत्ति है एक शाह का कोप दूसरे शरण आए को न रखना धर्म विरुद्ध है ॥ दूहा ॥ बोलि संचि कैमास बर, बोलि चंद पुंडीर ॥ राव पजून प्रसंग नर, गोयँद रा गुन नीर ॥ कूं० ॥ १३ ॥ रु० ॥ १३ ॥ दूहा ॥ नेह मुष देखे न नृपति, विपति परी दुहु क्रम । इक सरना इक रयद्दन, इक धर रय्यन भ्रम ॥ कूं० ॥ १४ ॥ रु० ॥ १४ ॥ चन्द का सलाह देना कि जैसे शरणागत होने पर विष्णु भगवान ने मत्स्य रूप धर कर पृथ्वी को अपनी सींग पर रक्खा था वैसे ही आप भी कीजिए ॥ गाथा ॥ मनसा धारि विरंचं । दच्छिन पग अंगुरी नषयं ॥ संभू मंन नरिंदं । सत जुगं आदि कीन पैदासं ॥ कूं० ॥ १५ ॥ रु० ॥ १५ ॥* कवित्त ॥ संभू मन बरदान । खियै तप जोर ब्रह्म पढि ॥ सरन रखि वसुमती । होत कलपंत काल मचि ॥ नारद धरत बताइ । मच्छ रूपं जगदीसं ॥ दस हजार जोजनं । सृंग रचि ऊरध सीसं ॥ १३ पाठान्तर—मंत्र । पुंरीर । रा पजूंन । गोविंद ॥ १४ पाठान्तर—यक । रखन ॥ १५ पाठान्तर—* यह रूपक और इसके आगे वाले १६ और १७ रूपक संवत १६४७ की प्राचीन पुस्तक में नहीं हैं किन्तु इतर आधुनिक पुस्तकों में हैं ॥ १६ पाठान्तर—रषि । मद्ध । श्रग ॥

३६० पृथ्वीराजरासो । [ नवां समय ६ करि सत्त नाव तिष्ठि पर धरे । अनक्रांपित जिम गैन धुअ ॥ ऐसेऊ चंद कहि पीथ सम । गरुअ तन नृप अरग हुअ ॥ छं० ॥ १६ ॥ रु० ॥ १६ ॥ * जैसे शिवजी गले में विष धारण किए हैं वैसे ही मीर को आप भी रखिए यह चन्द ने कहा ॥ दूहा ॥ संकर गर विष कंद जिम । बडवा अगनि समंद ॥ तै रषहु चहुआन तिम । षां हुसेन कहि चंद ॥ छं० ॥ १७ ॥ रु० ॥ १७ ॥ * सुन्दरदास से पूछना कि सब स्त्रियां तो सुख से हैं और शाह से झगड़ा होने की बात क्या सच है ? दूहा ॥ मिलिय सु सुंदर दास तँहँ । पुच्छिय विधि विधिवत्त ॥ कहौ सुषी त्रिय सब विवरं । विरस साचि सैं सत्तू ॥ छं० ॥ १८ ॥ रु० ॥ १८ ॥ सुन्दरदास का कहना कि हूर की ऐसी एक पातुर शहाबुद्दीन के पास थी उसको लेकर हुसैन यहां चौहान की शरण में आया है ॥ दूहा ॥ पांच एक्क साचाब संग । हूर नूर गुन गान । वै आयौ हुस्सेन इत । सरन तक्कि चहुआन ॥ छं० ॥ १९ ॥ रु० ॥ १९ ॥ चन्द का पृथ्वीराज की प्रशंसा करना कि जैसे मोरध्वज के यहां अर्जुन ब्राह्मण बन कर शरण गया, भगवान ने सिंह बन कर मांस मांगा, शरणागत द्रोपदी का चीर बढ़ाया, वैसे ही तुमने शरणागत को रखकर क्षत्रिय धर्म की रक्षा की तुम्हारे माता पिता धन्य हैं ॥ १७ पाठान्तर-ते । रख्खौ । चहुआन ॥ १८ पाठान्तर-तहां । पुछिय । सुषि । त्रीय । विसर । सों ॥ १९ पाठान्तर-संग । गांन । हुसेन तब । तकि । चहुआन ॥

नवं समय २ ] पृथ्वीराजरासो । ३६१ कवित्त ॥ सोरन्नज दै सरन । गयौ दुज दोइ सु अर्जुन । सिंच रूप धरि कन्ह । संस संस्यौ करि गर्जन ॥ दैन चीर अरधंग । नृपति सिर कर वन धाख्यौ ॥ देखि महा सतवंत । प्रगट गोविंद उच्चायौ ॥ धनि धंनि मात पित धंनि तुअ । सरनागत भ्रम तैं रखिय ॥ पिछी कहंत कविचंद सौं । संभरि वै निचि सम उषिय ॥ छं० ॥ २०॥ रू० ॥ २०॥ शाहहुसैन का पृथ्वीराज से मिलना, पृथ्वीराज का आदर देना ॥ दूहा ॥ गयो राज सामंत सम । मिलिग साह हुसैन ॥ आदर नृप किन्नौ अदब । विवच प्रसंनिय वैनं ॥ छं० ॥ २१ ॥ रू० ॥ २१ ॥ हुसैन को दक्षिण की ओर नागौर की जागीर देना । दूहा ॥ लिये सथ्य पृथिराज पहुं । गयौ सुपुर नागौर ॥ धरमायन कारथ†धवल । दिसि दच्छिन दिय ठौर ॥ छं० ॥ २२ ॥ रू० ॥ २२ ॥ पृथ्वीराज का हुसैन को घोड़े हाथी आदि देना और दोनों का परस्पर प्रेम बढ़ना ॥ दूहा ॥ भोजन भष्ये विविध वर, बहु आदर विधि कीन । मान सचातम रखि रज, राज उभय हय दीन ॥ छं० ॥ २३ ॥ रू० ॥ २३ ॥ दूहा ॥ धरिय डोरि हुस्सेन सिर, है बंधिय चैसाल । २० पाठान्तर-देन । धंनि धंनि । धंम । सों ॥

  • यह रूपक हमारी सं० १६४७ वाली प्राचीन पुस्तक में नहीं है पर आधुनिक पुस्तकों में है ॥ २१ पाठान्तर-नृप । प्रसंनीय ॥ २२ पाठान्तर-सथ । प्रथीराज । पहुं । धूंमाइन कायथ । दछिन । दषन । दै ॥ † धर्मोयन कायथ = पृथ्वीराज का दरबार मुंशी था । उसका काम है कि जो जो दरबार में आवें उनको उनकी नियत की हुई ठौर पर बैठावे । ऐसा बरताव अभी तक राजपुताने में प्रचलित है ॥ २३ पाठान्तर-भष । मांन । रखि ॥ उभै ॥

अप्प सु चिन्द्यि अवर दिन, रज पठवै रसाल ॥ छं० ॥ २४ ॥ रु० ॥ २४॥ कवित्त ॥ तरकंस पंच गिरंभ । तीन प्रति षगत तीन सच ॥ खुरासान कंमांन । पंच परमान मान जह ॥ गज सु एक सिंघ लीय । श्वेत तन मह रत्ति चह ॥ गुंजते मधुप कपोल । गज्ज भज्जै प्रेमल सच ॥ हय पंच साजि साकति सुनग । ऐराकी कुल उच्च जिहि ॥ अंमोल बज्र इक लाल दोय । रिंझ समिप्पय राज सचि ॥ छं० ॥२५॥॥२५॥ दूहा ॥ राजन रषिय सब्ब इह, प्रनवेज प्रति मंत । उभै परस्पर गंठि परि, संचिय पेम सुमंत ॥ छं० ॥ २६ ॥ रु० ॥ २६ ॥ शहाबुद्दीन का चार दूत अजमेर भेजना ॥ दूहा ॥ च्यारि दूत अजमेर पुर, थिर मुक्केसु विहान । आखेटक बन देषि कै, तक्कि गए चहुआन ॥ पृथ्वीराज का हुसैन को कैथल, हासी, हिसार का पर्गना देना और शिकार में साथ रखना, यह सब समाचार दूतों का शहाबुद्दीन से कहना ॥ कवित्त ॥ आखेटक चहुआन । पास हुस्सेन संपत्तौ ॥ बार आइ चहुआन । भाइ घन ताहि दिषत्तौ ॥ नीति राव कुटवाल । तास अच राज सु अप्पिय ॥

  • वर कैथल हंसि हिंसार । राजपहो दै थप्पिय ॥ इह चरित देषि सब दूत तब । जाइ संपते साहि दर ॥ चरावर चरित जुग्गिनी पुरह । कत्थिय बत्त सें मुष्षंधर॥ छं० ॥२८॥ रु०॥२८ २४ पाठान्तर-धरी । हुसेन । चीन्हे । पठवै ॥ २५ पाठान्तर-तीन । पतंग । खुरासांन । कंमांन । पच परमांन मांन जिहि । सिंघलीय । मद रति । गज । भंजे । परिमल । है । उंच जिहि । दुइ । रोज ॥ २६ पाठान्तर-रषिय । घन । २७ पाठान्तर-यिह । मुके । मुक्कै । विहान । चहुआन ॥ २८ पाठान्तर-चहुआन । हुसेन । संपत्तौ । आय । भाद्र । दिर्षंतौ । नीतिराज । कुटं- बार । * अधिक पाठ है ॥ कैथल । हांसी । हिंसार । पटो । थपीय । जाय । साहिवर । चवर । चरित । जुगिनी । सुष ॥

नवां समय ६] पृथ्वीराजरासो । ३६३ साहाबुद्दीन का क्रोध करना और अरब खां को पृथ्वीराज के पास भेजना कि भला चाहो तो हुसैन को निकाल दो ॥ छंद पद्धरी ॥ संभरिय बत्त साहाव दीन । उच्चरिय बैन अति कोप कीन ॥ मुक्कौँ दूत चहुआन पास । कढौ हुसैन जो जीव आस ॥ छं० २९ ॥ बेखियौ पांन तातार तव्व ॥ संजाव पांन उमराव सव्व ॥ पुच्छी सु बत्त किय दूत सार । थप्पी सु बत्त पुरमान वार ॥ छं० ३० ॥ आरव्व सेष लीनौ बुलाइ । बैब्रद्ध वृद्ध बुद्धी सुनाइ ॥ बंछै सुप्रेम सक लेहिं साचि । लज्जी अनंत आदब्ब थाचि ॥ छं० ॥३१॥ उच्चर्र्यौ बैन साहाव भास । आरब्य जाहु चहुआन पास ॥ अरबखाँ से कहना कि पहिले हुसैन के पास जाना जो वह पातुर को दे दे तो हम क्षमा कर देंगे, जो वह गर्व करके न मानै तो पृथ्वीराज के पास जाकर हमारा पत्र देकर समझाना ॥ अप्पै जु पाच हुस्सैन जाम । जैखाउ सम्भ हुसेन ताम ॥ छं० ॥ ३२ ॥ मुक्कों सुगुनह कीनौ पसाव । मैं दीन पच्छ करि खिमा दाव ॥ छंडै न पाच हुस्सेन गव्व । चहुआन भिज्जै सामंत सव्व ॥ ३३ ॥ जंपियै वयन चहुआन साइ । कढौ हुसेन नागौर थाइ ॥ अज़ीज पांव तुम सच उच्च । लिप्यौ सु पच हम परम रुच ॥ ३४ ॥ कढौ हुसेन तुम देस अंत । बंकै जो पेम सानौँ सुसंत ॥ रख्या हुसेन जो असु परेस । चतुरंग सेन सज्जीं विसेस ॥ छं० ॥ ३५ ॥ २९ पाठान्तर—उच्चरीय । मुक्तों । कढौ । हुसेन । नौं ॥ २९ ॥ ततार । तब । सब । पुछी । कीय । पुरसांन ॥ ३० ॥ आरब शेष । वृद्ध वृद्ध । बुद्धीय । बछै । पिम्म । लेहिं । बज्जी । चांदब । थाहिं ॥ ३१ ॥ उच्चर्यौ । वैनं । आरब । हुसैनं । जांम । संम्प । हुसेन । तांम ॥ ३२ ॥ मुक्क्यो । मैं । पछ । हुसेन । यब । सब । अंब ॥ ३३ ॥ बैन । सांइ । धाइ । अज़ीजखांन । संच उच्च । लिप्यै । रुच ॥ ३४ ॥ बक्कौ । जौ । यु । मांनौँ । रखौ । जौँ । तौ चतुरंग । सज्जी ॥ ३५ ॥ करौ । ॥ ३६ ॥ उच्चरि । गुंमांन । कहै । मांनौ । जाहु । शीघ्र । बांम । करौं । निस्मांम ॥ ३७ ॥ सथ । असहनन । नरयान । रथ । आरब । दोय । पष ॥ ३८ ॥ ४

२६४ पृथ्वीराजरासो । [ नवां समय १० भंजौं सुनै नागौर ढेस । जीवंत बंदि बंधौं नरेस ॥ सामंत सूर सब करौं अंत । बंधौ सुबंध सा तहनि कंत ॥ छं० ॥ ३६ ॥ उच्चरि गुमान तन बत्त सूल । संक्षेप कहै मानौं स धूल ॥ तुम जाउ सिघ्र नागौर बाम । मति करौ एक छिन घर विश्राम ॥ ३७ ॥ तीन सौ सवार और रथ देकर अरब ख़ां को रवाना करना ॥ सै तीन दीन असवार सथ्थ । आरुढन दीन नरयान रस्थ ॥ एक महिने में अरब ख़ां का नागौर पहुंचना ॥ संच्यो शेष आरब्ब राह । दो पख पत्त नागौर थ्राह ॥ छं० ॥ ३८ ॥ रु० ॥ २८ ॥ अरब ख़ां का हुसैन से मिलकर समझाना, हुसैन का न मानना ॥ दूहा ॥ गय आरब नागौर धर । मिल्यौ साह हूसेन ॥ भोजन भष्प सुभाव किय । विविध प्रसन्नीय बैन ॥ छं० ॥ ३९ ॥ रु० ॥ ३० ॥ दूहा ॥ कही बत्त हूसेन सम । जो कहि साच सहाब ॥ नह मंनिय सोमंत दिय । दिय आरब्ब जबाब ॥ छं० ॥ ४० ॥ रु० ॥ ३१ ॥ अरब ख़ां का पृथ्वीराज के पास जाना ॥ दूहा ॥ गयो शेष आरब्ब दर । लही षवर प्रथ्रिराज ॥ बोलि मक्तू संडिय सज्ज । सामंतन सब साज ॥ छं० ॥ ४१ ॥ रु० ॥ ३२ ॥ पृथ्वीराज का सुलतान की कुशल पूछना ॥ दूहा ॥ मंझ सल्ल आरब्ब गय । मिंल्ल मंनिय सनमान ॥ दै आसन पुच्छिय कुसल । चाहुआन सुलतान ॥ छं० ॥ ४२ ॥ रु० ॥ ३३ ॥ ३० पाठान्तर-हुसैन । भप । बिबह । प्रसंचे । बैन ॥ ३१ पाठान्तर-हुसेन । साहाब । नंह । आरब ॥ ३२ पाठान्तर-आरब । पबरि । पृथीराज । मक्ल । सांमंतां । सम राज ॥ ३३ पाठान्तर-आरख । सनमांन । पुछिय । कुशल । चाहुवांन । सुरतान ॥

नवां समय ११ ] पृथ्वीराजरासो । ३६५ अरब खां का कहना कि हुसैन खां को निकाल देने के लिये सुलतान ने कहा है ॥ छंद पद्धरी ॥ उच्चरौ वैन आरब्ब सेष । सल्लाम बहुत पनि एक एष ॥ कढ्ढौ हुसेन तुम देस अंत । साचाव साचि वंकौ सुसंत ॥ इं० ॥ ४३ ॥ जुगमीत अच्छिय उवरै न आदि । इस ताउ आउ बहु वैन सादि ॥ जंपे सुं दैल जे कहे साचि । कढ्ढो न वत्त गंभीर आचि ॥ ळं० ॥ ४४ ॥ शहाबुद्दीन का संदेसा सुनकर पृथ्वीराज का मुख लाल हो गया, भौहें चढ़ गईं ॥ संभखिय वत्त प्रथिराज संत । त्रिकुटी कङ्कर द्विग रक्त जंत ॥ आरक्त मुष्प स्तुत ओन बुंद । कनमन्तिय कोप रोमांच जिंद ॥ इं० ॥ ४५ ॥ कैमास ने डपट कर कहा कि आर्य लोगों का धर्म सुलतान नहीं जानता इससे ऐसा कहता है, हुसैन पृथ्वीराज के शरणागत है, छत्री का धर्म उसे छोड़ने का नहीं है ॥ उच्चरौ कोपि कैमास वानि । अतासनि आर्य सिंचौ सुजानि ॥ आरब्ब बोल दोल्यौ विरूर । सुरतान जानि जंप्यौ गहूर ॥ इं० ॥ ४६ ॥ पनि वुद्ध खच्चौ प्रथिराज तूर । ऋतुवित्त जुद्ध सामंत सूर ॥ हुस्सेन आइ प्रथिराज थान । जोधांन भ्रम पचीय आन ॥ ळं० ॥ ४७ ॥ कन्ह चौहान, सूरसिंह, गोयंदराज, चन्द, पुंडीर आदि का भी यही कहना और सुलतान से लड़ने को हम प्रस्तुत हैं यह कहना ॥ जंपै सुवैन चहुभ्रंनि कन्ह । द्विग पनि रक्त रोमांच तंन ॥ रज भ्रम विषम बुझक्कै न साच । अनि राच्च जेम जंपै विराह ॥ इं० ॥४८॥ गज्जै न लज्ज कोपैं मृगिंद्र । उत्कृष्ट सूर सिर सहि न निंद्र ॥ गुरु तज्जि जंपि गोइंद राज । लग वैन गीर गरु वत्त साज ॥ इं० ॥४९॥ संज्वान तेज सम तेज बान । निरभै सुतासु चंपै पयान ॥ उच्चल्यौ चंद पुंडीर कोप । आदीत भाज रस दून छोर ॥ इं० ॥ ५० ॥

३४६ पृथ्वीराजरासो । [ नवां समय १२ गज्जनै कांन केतुक सहाब । गरु अत्त वत्त जंपै कहाव ॥ हुस्सैन आइ प्रथिराज थान । सरनै सुकांन कढ्ढै नियान ॥ कूं० ॥ ५१ ॥ दल सज्जि सीम चंपै सुसाद्दि । दल भंजि ग्रहै प्रथिराज नाद्दि ॥ अरब खां का अपना निरादर होता देख उठ आना और ग़ज़नी को कूच करना तथा शहाबुद्दीन से सब समाचार कहना ॥ मानी न खेष आरब्ब बत्त । सामंत सूर देषे विरत्त ॥ कूं० ॥ ५२ ॥ आदरह मंद तजि उठ्यौ खेष । अंधार बदन द्रिग बहि तेष ॥ पुच्छीय जुगति नृप मचल जानि । उठि गर्व दुष्प मन छीन मानि ॥ कूं० ॥ ५३ ॥ चढि चल्यौ खेष रह साद देस । गज्जनै गयै। मन मानि रेस ॥ गय मचल साद्दि मिल्लि कहिय बत्त । सिर धूनि रीस करि नैन रत्त ॥ कूं० ॥ ५४ ॥ उठि गयौ साह बद्दल मछल्ल । आसंन साजि बैठो सथल्ल ॥ छं० ॥ ५५ ॥ रु० ॥ ३४ । दर्बार करके शहाबुद्दीन का तातार ख़ां, अरब ख़ां, मीर जलाम, कासाम, खुरासा ख़ां, रहन मन्जन ख़ां, रुस्तम ख़ां, हाजी ख़ां, ग़ाज़ी ख़ां, जस्मन ख़ां, गज़नी ख़ां, सुहब्बत ख़ां, मीर ख़ां, आदि सरदारों को बुला कर सलाह करना ॥ कवित्त ॥ सजि आसन साचाव । साह काजी मत बैठा ॥ बोलि मक्कू तत्तार । बोलि आरबू दिन जेठा ॥ ३४ पाठान्तर-उचस्यौ । वैन । आरब । शेष । संलाम ॥ ४३ ॥ युगमौत । अथि । उवरें । वैन । जंपै । कहै । भाह । नाह । ॥ ४४ ॥ तथ्य । तथ । प्रथौराज । भृकटी । आरक्त । मुष्य । श्रुत्ति । कलि ॥ ४५ ॥ उचस्यौ । बांनि । आरन्य । संच्यौ । जांन । आरब । सुरतांन । जांनि ॥ ४६ ॥ प्रथीराज । अतुलित । युद्ध । हुसैन । यांन । जोधांन । बिब्रीय । आंन ॥ ४७ ॥ जंपै । चहुवांन । बुझै ॥ ४८ ॥ गर्जे । कोपें । मृगेंद्र । मृगेंद्र । उतकृष्ट । नरिंद्र । तजि । जपि । गोयंद । बैन ॥ ४८ ॥ तेज़वांन । निरभैं । सतास । पयांन । उचस्यौ । उप ॥ ५० ॥ गजनौ । केतक । जंपे । हुसेन । प्रथोराज । यांन । कांन । नियान ॥ ५१ ॥ सजि । सीस । प्रथौराज । मांनी । आरब । शेष । विरत्त । शेष । पुक्किय । नृप । जांनि । दुष । मांनि ॥ ५३ ॥ गजनैं । मांनि । धुनि । नैन ॥ ५४ ॥ मद्दल । सुथल्ल ॥ ५५ ॥

नवां समय १३ ] · पृथ्वीराजरासो । ३६० मीर जमांम कमांम । षांन षुरसांन न्यांन वर ॥ षांन रहंनं महंनं । षांन रुस्तंम मचा भर ॥ हाजीय षांन गाजीय षां । षांन जर्मन बंधव सुचिय ॥ गजनौय षांन महुवत्ति षां । मीर षांन सब बोलि लिय ॥ कूं० ॥ ५६ ॥ रु० ॥ ३५ ॥ तातार ख़ां का कहना कि तुरन्त पृथ्वीराज पर चढ़ाई करनी चाहिए ॥ कवित्त ॥ कहै साचि साहाब । अहो तत्तार षांन सुनि ॥ जिन जुमत्ति उपज्जै । कहै सब षांन जानि मन ॥ गौ आरब चहुआन । फेरि आयौ सु सुनिय सब ॥ रुस्त रप्पि हुस्सेन । बोलि सामंत राज अब ॥ जंपिय तत्तार संजो सयन । छनै राज प्रथ्रिराज रन ॥ है गै सुबंध बंधौ रिनच । मेरे कि गहि कुद्है सुतन ॥ कूं० ॥ ५७ ॥ रु० ॥ ३६ ॥ खुरासान ख़ां का तातार ख़ां से कहना कि उसके बल को भी विचार लो जल्दी न करो ॥ दूहा ॥ कहै षांन षुरसांन तब । अहो षांन तत्तार ॥ चाहुआन सामंत बल । चिंति सुधिविधि विचार ॥ कूं० ॥ ५८ ॥ रु० ॥ ३७ ॥ अरब ख़ां का कहना कि उसका बल अतुल है तुम लोगों ने देखा नहीं है इससे ऐसा कहते हो ॥ दूहा ॥ कहै सेष आरब अतुल । बल सामंत नरिंद ॥ अबे न तुम दिषिय नयन । सजो सैन बिन बंध ॥ कूं० ॥ ५८ ॥ रु० ॥ ३८ ॥ शाह का बल पराक्रम का हाल पूछना ॥ दूहा ॥ कहै साचि आरब्ब तुम । कहौ सूर सामंत ॥ कछा क्रांति प्राक्रम कहा । सत्ति पयं पहु तंत ॥ कूं० ॥ ६० ॥ रु० ॥ ३९ ॥ ३५ पाठान्तर-बोल । मरु । जिठै । जमांम । कमांम । षुरसांन । न्यांन । महंनं ॥ ३६ पाठान्तर-मति । ऊपजै । जांनि । चहुआन । स सुनिय । हुसेन । सजौ । हनै । मेरै ॥ ३७ पाठान्तर-कहें । चित्त सुबुद्धि विचार ॥ ३८ पाठान्तर-जै । शेष । दिषिय ॥ ३९ पाठान्तर-आरब । तुत्र । क्रांति । सत्य ॥