पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
अप्प सु चिन्द्यि अवर दिन, रज पठवै रसाल ॥ छं० ॥ २४ ॥ रु० ॥ २४॥ कवित्त ॥ तरकंस पंच गिरंभ । तीन प्रति षगत तीन सच ॥ खुरासान कंमांन । पंच परमान मान जह ॥ गज सु एक सिंघ लीय । श्वेत तन मह रत्ति चह ॥ गुंजते मधुप कपोल । गज्ज भज्जै प्रेमल सच ॥ हय पंच साजि साकति सुनग । ऐराकी कुल उच्च जिहि ॥ अंमोल बज्र इक लाल दोय । रिंझ समिप्पय राज सचि ॥ छं० ॥२५॥॥२५॥ दूहा ॥ राजन रषिय सब्ब इह, प्रनवेज प्रति मंत । उभै परस्पर गंठि परि, संचिय पेम सुमंत ॥ छं० ॥ २६ ॥ रु० ॥ २६ ॥ शहाबुद्दीन का चार दूत अजमेर भेजना ॥ दूहा ॥ च्यारि दूत अजमेर पुर, थिर मुक्केसु विहान । आखेटक बन देषि कै, तक्कि गए चहुआन ॥ पृथ्वीराज का हुसैन को कैथल, हासी, हिसार का पर्गना देना और शिकार में साथ रखना, यह सब समाचार दूतों का शहाबुद्दीन से कहना ॥ कवित्त ॥ आखेटक चहुआन । पास हुस्सेन संपत्तौ ॥ बार आइ चहुआन । भाइ घन ताहि दिषत्तौ ॥ नीति राव कुटवाल । तास अच राज सु अप्पिय ॥
- वर कैथल हंसि हिंसार । राजपहो दै थप्पिय ॥ इह चरित देषि सब दूत तब । जाइ संपते साहि दर ॥ चरावर चरित जुग्गिनी पुरह । कत्थिय बत्त सें मुष्षंधर॥ छं० ॥२८॥ रु०॥२८ २४ पाठान्तर-धरी । हुसेन । चीन्हे । पठवै ॥ २५ पाठान्तर-तीन । पतंग । खुरासांन । कंमांन । पच परमांन मांन जिहि । सिंघलीय । मद रति । गज । भंजे । परिमल । है । उंच जिहि । दुइ । रोज ॥ २६ पाठान्तर-रषिय । घन । २७ पाठान्तर-यिह । मुके । मुक्कै । विहान । चहुआन ॥ २८ पाठान्तर-चहुआन । हुसेन । संपत्तौ । आय । भाद्र । दिर्षंतौ । नीतिराज । कुटं- बार । * अधिक पाठ है ॥ कैथल । हांसी । हिंसार । पटो । थपीय । जाय । साहिवर । चवर । चरित । जुगिनी । सुष ॥
नवां समय ६] पृथ्वीराजरासो । ३६३ साहाबुद्दीन का क्रोध करना और अरब खां को पृथ्वीराज के पास भेजना कि भला चाहो तो हुसैन को निकाल दो ॥ छंद पद्धरी ॥ संभरिय बत्त साहाव दीन । उच्चरिय बैन अति कोप कीन ॥ मुक्कौँ दूत चहुआन पास । कढौ हुसैन जो जीव आस ॥ छं० २९ ॥ बेखियौ पांन तातार तव्व ॥ संजाव पांन उमराव सव्व ॥ पुच्छी सु बत्त किय दूत सार । थप्पी सु बत्त पुरमान वार ॥ छं० ३० ॥ आरव्व सेष लीनौ बुलाइ । बैब्रद्ध वृद्ध बुद्धी सुनाइ ॥ बंछै सुप्रेम सक लेहिं साचि । लज्जी अनंत आदब्ब थाचि ॥ छं० ॥३१॥ उच्चर्र्यौ बैन साहाव भास । आरब्य जाहु चहुआन पास ॥ अरबखाँ से कहना कि पहिले हुसैन के पास जाना जो वह पातुर को दे दे तो हम क्षमा कर देंगे, जो वह गर्व करके न मानै तो पृथ्वीराज के पास जाकर हमारा पत्र देकर समझाना ॥ अप्पै जु पाच हुस्सैन जाम । जैखाउ सम्भ हुसेन ताम ॥ छं० ॥ ३२ ॥ मुक्कों सुगुनह कीनौ पसाव । मैं दीन पच्छ करि खिमा दाव ॥ छंडै न पाच हुस्सेन गव्व । चहुआन भिज्जै सामंत सव्व ॥ ३३ ॥ जंपियै वयन चहुआन साइ । कढौ हुसेन नागौर थाइ ॥ अज़ीज पांव तुम सच उच्च । लिप्यौ सु पच हम परम रुच ॥ ३४ ॥ कढौ हुसेन तुम देस अंत । बंकै जो पेम सानौँ सुसंत ॥ रख्या हुसेन जो असु परेस । चतुरंग सेन सज्जीं विसेस ॥ छं० ॥ ३५ ॥ २९ पाठान्तर—उच्चरीय । मुक्तों । कढौ । हुसेन । नौं ॥ २९ ॥ ततार । तब । सब । पुछी । कीय । पुरसांन ॥ ३० ॥ आरब शेष । वृद्ध वृद्ध । बुद्धीय । बछै । पिम्म । लेहिं । बज्जी । चांदब । थाहिं ॥ ३१ ॥ उच्चर्यौ । वैनं । आरब । हुसैनं । जांम । संम्प । हुसेन । तांम ॥ ३२ ॥ मुक्क्यो । मैं । पछ । हुसेन । यब । सब । अंब ॥ ३३ ॥ बैन । सांइ । धाइ । अज़ीजखांन । संच उच्च । लिप्यै । रुच ॥ ३४ ॥ बक्कौ । जौ । यु । मांनौँ । रखौ । जौँ । तौ चतुरंग । सज्जी ॥ ३५ ॥ करौ । ॥ ३६ ॥ उच्चरि । गुंमांन । कहै । मांनौ । जाहु । शीघ्र । बांम । करौं । निस्मांम ॥ ३७ ॥ सथ । असहनन । नरयान । रथ । आरब । दोय । पष ॥ ३८ ॥ ४
२६४ पृथ्वीराजरासो । [ नवां समय १० भंजौं सुनै नागौर ढेस । जीवंत बंदि बंधौं नरेस ॥ सामंत सूर सब करौं अंत । बंधौ सुबंध सा तहनि कंत ॥ छं० ॥ ३६ ॥ उच्चरि गुमान तन बत्त सूल । संक्षेप कहै मानौं स धूल ॥ तुम जाउ सिघ्र नागौर बाम । मति करौ एक छिन घर विश्राम ॥ ३७ ॥ तीन सौ सवार और रथ देकर अरब ख़ां को रवाना करना ॥ सै तीन दीन असवार सथ्थ । आरुढन दीन नरयान रस्थ ॥ एक महिने में अरब ख़ां का नागौर पहुंचना ॥ संच्यो शेष आरब्ब राह । दो पख पत्त नागौर थ्राह ॥ छं० ॥ ३८ ॥ रु० ॥ २८ ॥ अरब ख़ां का हुसैन से मिलकर समझाना, हुसैन का न मानना ॥ दूहा ॥ गय आरब नागौर धर । मिल्यौ साह हूसेन ॥ भोजन भष्प सुभाव किय । विविध प्रसन्नीय बैन ॥ छं० ॥ ३९ ॥ रु० ॥ ३० ॥ दूहा ॥ कही बत्त हूसेन सम । जो कहि साच सहाब ॥ नह मंनिय सोमंत दिय । दिय आरब्ब जबाब ॥ छं० ॥ ४० ॥ रु० ॥ ३१ ॥ अरब ख़ां का पृथ्वीराज के पास जाना ॥ दूहा ॥ गयो शेष आरब्ब दर । लही षवर प्रथ्रिराज ॥ बोलि मक्तू संडिय सज्ज । सामंतन सब साज ॥ छं० ॥ ४१ ॥ रु० ॥ ३२ ॥ पृथ्वीराज का सुलतान की कुशल पूछना ॥ दूहा ॥ मंझ सल्ल आरब्ब गय । मिंल्ल मंनिय सनमान ॥ दै आसन पुच्छिय कुसल । चाहुआन सुलतान ॥ छं० ॥ ४२ ॥ रु० ॥ ३३ ॥ ३० पाठान्तर-हुसैन । भप । बिबह । प्रसंचे । बैन ॥ ३१ पाठान्तर-हुसेन । साहाब । नंह । आरब ॥ ३२ पाठान्तर-आरब । पबरि । पृथीराज । मक्ल । सांमंतां । सम राज ॥ ३३ पाठान्तर-आरख । सनमांन । पुछिय । कुशल । चाहुवांन । सुरतान ॥
नवां समय ११ ] पृथ्वीराजरासो । ३६५ अरब खां का कहना कि हुसैन खां को निकाल देने के लिये सुलतान ने कहा है ॥ छंद पद्धरी ॥ उच्चरौ वैन आरब्ब सेष । सल्लाम बहुत पनि एक एष ॥ कढ्ढौ हुसेन तुम देस अंत । साचाव साचि वंकौ सुसंत ॥ इं० ॥ ४३ ॥ जुगमीत अच्छिय उवरै न आदि । इस ताउ आउ बहु वैन सादि ॥ जंपे सुं दैल जे कहे साचि । कढ्ढो न वत्त गंभीर आचि ॥ ळं० ॥ ४४ ॥ शहाबुद्दीन का संदेसा सुनकर पृथ्वीराज का मुख लाल हो गया, भौहें चढ़ गईं ॥ संभखिय वत्त प्रथिराज संत । त्रिकुटी कङ्कर द्विग रक्त जंत ॥ आरक्त मुष्प स्तुत ओन बुंद । कनमन्तिय कोप रोमांच जिंद ॥ इं० ॥ ४५ ॥ कैमास ने डपट कर कहा कि आर्य लोगों का धर्म सुलतान नहीं जानता इससे ऐसा कहता है, हुसैन पृथ्वीराज के शरणागत है, छत्री का धर्म उसे छोड़ने का नहीं है ॥ उच्चरौ कोपि कैमास वानि । अतासनि आर्य सिंचौ सुजानि ॥ आरब्ब बोल दोल्यौ विरूर । सुरतान जानि जंप्यौ गहूर ॥ इं० ॥ ४६ ॥ पनि वुद्ध खच्चौ प्रथिराज तूर । ऋतुवित्त जुद्ध सामंत सूर ॥ हुस्सेन आइ प्रथिराज थान । जोधांन भ्रम पचीय आन ॥ ळं० ॥ ४७ ॥ कन्ह चौहान, सूरसिंह, गोयंदराज, चन्द, पुंडीर आदि का भी यही कहना और सुलतान से लड़ने को हम प्रस्तुत हैं यह कहना ॥ जंपै सुवैन चहुभ्रंनि कन्ह । द्विग पनि रक्त रोमांच तंन ॥ रज भ्रम विषम बुझक्कै न साच । अनि राच्च जेम जंपै विराह ॥ इं० ॥४८॥ गज्जै न लज्ज कोपैं मृगिंद्र । उत्कृष्ट सूर सिर सहि न निंद्र ॥ गुरु तज्जि जंपि गोइंद राज । लग वैन गीर गरु वत्त साज ॥ इं० ॥४९॥ संज्वान तेज सम तेज बान । निरभै सुतासु चंपै पयान ॥ उच्चल्यौ चंद पुंडीर कोप । आदीत भाज रस दून छोर ॥ इं० ॥ ५० ॥
३४६ पृथ्वीराजरासो । [ नवां समय १२ गज्जनै कांन केतुक सहाब । गरु अत्त वत्त जंपै कहाव ॥ हुस्सैन आइ प्रथिराज थान । सरनै सुकांन कढ्ढै नियान ॥ कूं० ॥ ५१ ॥ दल सज्जि सीम चंपै सुसाद्दि । दल भंजि ग्रहै प्रथिराज नाद्दि ॥ अरब खां का अपना निरादर होता देख उठ आना और ग़ज़नी को कूच करना तथा शहाबुद्दीन से सब समाचार कहना ॥ मानी न खेष आरब्ब बत्त । सामंत सूर देषे विरत्त ॥ कूं० ॥ ५२ ॥ आदरह मंद तजि उठ्यौ खेष । अंधार बदन द्रिग बहि तेष ॥ पुच्छीय जुगति नृप मचल जानि । उठि गर्व दुष्प मन छीन मानि ॥ कूं० ॥ ५३ ॥ चढि चल्यौ खेष रह साद देस । गज्जनै गयै। मन मानि रेस ॥ गय मचल साद्दि मिल्लि कहिय बत्त । सिर धूनि रीस करि नैन रत्त ॥ कूं० ॥ ५४ ॥ उठि गयौ साह बद्दल मछल्ल । आसंन साजि बैठो सथल्ल ॥ छं० ॥ ५५ ॥ रु० ॥ ३४ । दर्बार करके शहाबुद्दीन का तातार ख़ां, अरब ख़ां, मीर जलाम, कासाम, खुरासा ख़ां, रहन मन्जन ख़ां, रुस्तम ख़ां, हाजी ख़ां, ग़ाज़ी ख़ां, जस्मन ख़ां, गज़नी ख़ां, सुहब्बत ख़ां, मीर ख़ां, आदि सरदारों को बुला कर सलाह करना ॥ कवित्त ॥ सजि आसन साचाव । साह काजी मत बैठा ॥ बोलि मक्कू तत्तार । बोलि आरबू दिन जेठा ॥ ३४ पाठान्तर-उचस्यौ । वैन । आरब । शेष । संलाम ॥ ४३ ॥ युगमौत । अथि । उवरें । वैन । जंपै । कहै । भाह । नाह । ॥ ४४ ॥ तथ्य । तथ । प्रथौराज । भृकटी । आरक्त । मुष्य । श्रुत्ति । कलि ॥ ४५ ॥ उचस्यौ । बांनि । आरन्य । संच्यौ । जांन । आरब । सुरतांन । जांनि ॥ ४६ ॥ प्रथीराज । अतुलित । युद्ध । हुसैन । यांन । जोधांन । बिब्रीय । आंन ॥ ४७ ॥ जंपै । चहुवांन । बुझै ॥ ४८ ॥ गर्जे । कोपें । मृगेंद्र । मृगेंद्र । उतकृष्ट । नरिंद्र । तजि । जपि । गोयंद । बैन ॥ ४८ ॥ तेज़वांन । निरभैं । सतास । पयांन । उचस्यौ । उप ॥ ५० ॥ गजनौ । केतक । जंपे । हुसेन । प्रथोराज । यांन । कांन । नियान ॥ ५१ ॥ सजि । सीस । प्रथौराज । मांनी । आरब । शेष । विरत्त । शेष । पुक्किय । नृप । जांनि । दुष । मांनि ॥ ५३ ॥ गजनैं । मांनि । धुनि । नैन ॥ ५४ ॥ मद्दल । सुथल्ल ॥ ५५ ॥
नवां समय १३ ] · पृथ्वीराजरासो । ३६० मीर जमांम कमांम । षांन षुरसांन न्यांन वर ॥ षांन रहंनं महंनं । षांन रुस्तंम मचा भर ॥ हाजीय षांन गाजीय षां । षांन जर्मन बंधव सुचिय ॥ गजनौय षांन महुवत्ति षां । मीर षांन सब बोलि लिय ॥ कूं० ॥ ५६ ॥ रु० ॥ ३५ ॥ तातार ख़ां का कहना कि तुरन्त पृथ्वीराज पर चढ़ाई करनी चाहिए ॥ कवित्त ॥ कहै साचि साहाब । अहो तत्तार षांन सुनि ॥ जिन जुमत्ति उपज्जै । कहै सब षांन जानि मन ॥ गौ आरब चहुआन । फेरि आयौ सु सुनिय सब ॥ रुस्त रप्पि हुस्सेन । बोलि सामंत राज अब ॥ जंपिय तत्तार संजो सयन । छनै राज प्रथ्रिराज रन ॥ है गै सुबंध बंधौ रिनच । मेरे कि गहि कुद्है सुतन ॥ कूं० ॥ ५७ ॥ रु० ॥ ३६ ॥ खुरासान ख़ां का तातार ख़ां से कहना कि उसके बल को भी विचार लो जल्दी न करो ॥ दूहा ॥ कहै षांन षुरसांन तब । अहो षांन तत्तार ॥ चाहुआन सामंत बल । चिंति सुधिविधि विचार ॥ कूं० ॥ ५८ ॥ रु० ॥ ३७ ॥ अरब ख़ां का कहना कि उसका बल अतुल है तुम लोगों ने देखा नहीं है इससे ऐसा कहते हो ॥ दूहा ॥ कहै सेष आरब अतुल । बल सामंत नरिंद ॥ अबे न तुम दिषिय नयन । सजो सैन बिन बंध ॥ कूं० ॥ ५८ ॥ रु० ॥ ३८ ॥ शाह का बल पराक्रम का हाल पूछना ॥ दूहा ॥ कहै साचि आरब्ब तुम । कहौ सूर सामंत ॥ कछा क्रांति प्राक्रम कहा । सत्ति पयं पहु तंत ॥ कूं० ॥ ६० ॥ रु० ॥ ३९ ॥ ३५ पाठान्तर-बोल । मरु । जिठै । जमांम । कमांम । षुरसांन । न्यांन । महंनं ॥ ३६ पाठान्तर-मति । ऊपजै । जांनि । चहुआन । स सुनिय । हुसेन । सजौ । हनै । मेरै ॥ ३७ पाठान्तर-कहें । चित्त सुबुद्धि विचार ॥ ३८ पाठान्तर-जै । शेष । दिषिय ॥ ३९ पाठान्तर-आरब । तुत्र । क्रांति । सत्य ॥
३६८ पृथ्वीराजरासो । [ नवां समय १४ अरब खां का पृथ्वीराज के बल की प्रशंसा करना ॥ कवित्त ॥ दृष्ट मंच उच्चार । दिष्ट उठ्ठ चित इक्क थर ॥ क्रमत पेषि पच्चीस । भिल्लन सन एक्क दृष्टि पर ॥ सहस सुभर बाधंत । एक्क सामंत पराक्रम ॥ जामच्च दुप्पल्ल करै । ताम बाधंत वीर दस ॥ सिर परै सुचक्कै धर भिरै । परै श्रोन उठ्ठे सधर ॥ असिधार सूर उठ्ठै किलकिकि । एह पराक्रम सूर नर ॥ छं० ॥६१॥ रु० ॥४०॥ तातार खां का अरब खां की बात को हँसी में उड़ा देना, अरब खां का कहना कि अपनी आंख से न देखने से ऐसा कहते है। ॥ कवित्त ॥ हस्यौ षान तातार । एम घाजी सम वदिय ॥ जय रुनची बिन बषत । मरन भै डरै न कहिय ॥ कहि आरब तत्तार । अहो सामंत न दिष्टिय ॥ अतुल तेज बल अतुल । अतुल बल देव सुरषिय ॥ वे साम अंग रत्ते अतुल । अतुल मत्त कैमास भर ॥ उमरा अनंत देषे अनत । अतुल बल पहुचै न नर ॥ छं० ॥६२॥ रु० ॥४१॥ शाह का क्रोध करके तातार खां को चढ़ाई के लिये प्रस्तुत होने की आज्ञा देना ॥ दूहा ॥ कहै साचि गोरी गहअ । अहो षान तत्तार ॥ काल्हि तरीक सुडंच दिन । चढि अरि सद्धौ सार ॥ छं० ॥६३॥ रु० ॥४२॥ दूहा ॥ उठि गोरी दिन्ने बहुरि । गयौ सु अंदर साह ॥ बहुरि षान मीरं बरा । अति चंचल तुर ताह ॥ छं० ॥ ६४ ॥ रु० ॥ ४३ ॥ ४० पाठान्तर--उच्चार । उठ । इक्क । पच्चीस । दृषि । दुप्ल । तांम । परै । सुहक्कै । उठैं । ऊठैं । ४१ पाठान्तर--तत्तार । वदिय । भय । कहिय । काहि । दिषिय । रषिय । सांम । उंमरा । अनंत ॥ ४२ पाठान्तर--काल्हि । तेरीक सुं । सधौ ॥ ४३ पाठान्तर--दिनं ॥
नवां समय १५ ] पृथ्वीराजरासो । ३६६ शाह के जी में रात दिन चौहान की चिंता लगी रहना ॥ दूहा ॥ तपै साचि गोरी सबर । चित सान्नै चहुआन ॥ वैरोचन की साप ज्यौं । कीटी अंग प्रमान ॥ छं० ॥ ६५ ॥ रू० ॥ ४४ ॥ अरिल्ल ॥ जग्गत निसि झंपत सुरतानह । घरी सत्त रहि सेष प्रमानह ॥ जगि आयस दिय दीन निसानह । चिंता साचि चढी चहुआनह ॥ छं० ॥ ६६ ॥ रू० ॥ ४५ ॥ सेना के साथ चढ़ाई के लिये शाह का तयार होना ॥ छंदमोतीदाम ॥ भए सुर तीन धुनक निसान । चल्यौ अश्व सज्जि सिल्है सुरतान ॥ चढे सब पांन सु उम्मर मीर । सजे सचनइ बजे रस बीर ॥ छं० ॥ ६७ ॥ बजे सब बाज भयानक भाइ । चितैं चिय्बुद्धि जिनैं जन नाइ ॥ चल्यौ सब सज्जिय सेन गरिष्ट । परी दस दिग्ग सुध्रुधरि दिष्ट ॥ छं० ॥ ६८ ॥ अशकुन होना सवह सियांन सुसेन कपोत । सनंमुष साचि दिष्यो दज दोत ॥ भयौ दिसि वामिय काग्ग करार । रुक्यौ दिवि धोमय धूम गभार ॥ छं० ॥ ६९ ॥ सनंमुष देषिय जंबुक सेन । विरो मिन्नि चंपचि भग्गचि तेन ॥ क्रमें तस उप्पर गिद्ध असंख । चवै सुर रुद्र पसारिय पंष ॥ छं० ॥ ७० ॥ ४४ पाठान्तर-चहुआन । भृंग । प्रमानं ॥ ४५ पाठान्तर-जगत । जंपत । सुरतानंह । सत्त । रही । प्रमानंह । निसानंह । निसानंह । चहुआनह ॥ ४६ पाठान्तर-मोतीदाम । निसांन । साजि । सित्ल्हे । सुरतांन ॥ ६७ ॥ रजे । चितैं । जिनैं । सज्जिय । गरिद्व । दिग्ध । घुंवरी । दिष्ट ॥ ६८ ॥ सिंचाम । वांमीय ॥ ६९ ॥ ऊपर । पसारीय ॥ ७० ॥ सुरतांन । रहो । कहु । कहैौ । आज । गह्यो चल मंनहु चढि सगुंन ॥ ७१ ॥ भयै भये । प्रथीराज । बलु । सामंत ॥ ७२ ॥ हनों । चहुवांन । गहौं । मुक्क । जुझ ॥ ७३ ॥ चल्यौ । सुरतांन । गजिय । निसांन । जलं थल हूअ थलं जल चार । ७४ ॥ लप । समुझिन । सुरतांन । मिलांन २ । चहुवांन ॥ ७५ ॥
४०० | पृथ्वौराजरासो । | [ नवां समय १६ अरब खां का कहना कि आज ठहर जाइए शकुन अच्छा नहीं है ॥ गही सुरतान सु आरब बग्ग । रहौ दिन आज सगुंन न जग्ग ॥ रहै कुहु अज्ज ततार सुदिन । मची चढि चल्लहु मन्नि सगुन्न ॥ कं० ॥७१॥ सुलतान का कहना कि काफ़िर चौहान को जीतना कौन बड़ी बात है जो इतना बिचार करते हैं ॥ कहै सुरतान अहो तुम क्रूर । भयं भय क्षित्यु सु भंषहु नूर ॥ कहा बल जुद्ध कहै प्रथिराज । कित्तौ बल सामत जुडिच्च साज ॥ कं० ॥७२॥* छनां रन सूर जिके चहुआन । गहैं जुध राज सु छंडिय प्रान ॥ कहा डर काफर दाषहु मुक्झ । कहा भर आवध आंगरि जुक्झ ॥ कं ॥ ७३ ॥ * नसंनि चमंकि च्ल्यौ सुरतान । टमंकिय गज्जिय न्ह निसान ॥ जल व्यल होय थलं जल भार । असमग्गह मग्ग चल्लै गछिन्लार ॥ कं० ॥७४॥ मिल्यौ इक साहन लष समुंद । समुझिकन कंन भयो सुर मुंद ॥ चल्थौ सुरतान मिलान मिलान । बढी अति चिंत दुनी चहुआन ॥ कं० ॥ ७५ ॥ रू० ॥ ४६ ॥ शाह का चौहान की ओर जाना और दूतों का यह समाचार नागौर में हुसैन को देना ॥ दूहा ॥ गयौ साचि चहुआन घर । दिण मिलान मिलान ॥ गए सुचर नागौर पुर । कही षबरि सुरतान ॥ छं० ॥ ७६ ॥ रु० ॥ ५७ ॥ पृथ्वीराज का चढ़ाई का समाचार सुनकर सरदारों को बुला- कर सिंध तक शाह के पहुंचने का हाल कहना ॥ कवित्त ॥ सुनिय षबरि प्र थराज । कचिय जे चरन चरित सद्द ॥ बोलि मंत्रि कयमास । बोलि चामंड गुभक्क गद्द ॥
- यह ७२ और ७३ दो छंद सं० १६४७ वाली पुरानी पुस्तक में नहीं किन्तु इतर में हैं ॥ .४१ पाठान्तर-चहुवान । धर । दीए । मिलांन २ । सुंचर । सुरतांन ॥
नवां समय १० ] पृथ्वीराजरासो । ४०१ बोल्लि चंद पुंडीर । बोल्लि पीची प्रसंग बर ॥ बोल्लि गज्जि गहिल्लोत । बोल्लि काकन्द नाह नर ॥ बोलेति सव्व सामंत भर । कही वत्त सो कहिय चर ॥ सासंत संत भर सव्व मिल्लि । सिंधु सुचंपिय साह घर ॥ छं० ॥ ७७ ॥ रु० ॥ ४८ ॥ लड़ने के लिये प्रस्तुत होने का सब का मत होना ॥ दूहा ॥ कहत सव्व सामंत मति । चढि दल्ल सजौ समंकि ॥ सुनिव मंति कायमास कहि । करहु निसान तमंकि ॥ छं० ॥ ७८ ॥ रु० ॥ ४९ ॥ युद्ध की तयारी होना ॥ गाथा ॥ भय टामंक निसानं । पत्तं निज गेह सूर सामंतं ॥ वाजे वज्जि अनेकं । चय संगे राज चहुआनं ॥ छं० ॥ ७९ ॥ रु० ॥ ५० ॥ गुरुराम ब्राह्मण का आकर आशिर्वाद देना, बहुत कुछ दान कराना और वेद मंत्र से तिलक करना ॥ छंद पद्धरी ॥ आये सुनाम गुर राम राज । पढि पच मंच द्विज बोल्लि साज ॥ ग्रह नव सुदान विधि विद्ध दीन । वेदंत विप्र अभिषेक कीन ॥ छं० ॥ ८० ॥ चव सहस हेम दिय विप्र दान । अस्सेष वेद चय साम गान ॥ दिय दान भूरि पंषी सु चंड । दीनौ सु अध्य जिन हध्य मंडि ॥ छं० ॥ ८१ ॥ जै जया जोच जंपी सु आन । मंगल सुचार चव पढि गान ॥ आसिय दयन चहुआन रान । गुरु राम जज्जि आहुत्त प्रान ॥ छं० ॥ ८२ ॥ ४८ पाठान्तर-प्रथीराज । चरनि । कैमास । भुक्कू । एह । पीचि । गजि । सब । मिल्लि ॥ ४९ पाठान्तर-सुनै । मंत । कैमास । करहु । निसांन ॥ ५० पाठान्तर-पतं । गेह । सामंता । चहुआनं ॥ ५
४०२ पृथ्वीराजरासो । [ नवां समय १८ दिय तिखक पच पढि वेद संच । आरोपि कंठ छन संच जंच ॥ कज दरस वाम चकोर आनि । कब्बूत जानि जंपै सु बानि ॥ छं० ॥ ८३ ॥ षंजन सुषिंड किय दरसि दिस्स । आदरस दिषि किय असिपरस्स ॥ चिंत्यौ सु चित्त जपि उभय कांत । संग्यौ सु हंस हय तेजवंत ॥ छं० ॥ ८४ ॥ बिची सु जाति जोवंन पूर । बंच्यौ कि मनौं नृप रथ्य सूर ॥ भगवान का स्मरण कर यात्रा करना ॥ साकत्ति सब्ब सञ्जी सु बानि । धरि और हेम नृप अग्ग आनि ॥ छं० ॥ ८५ ॥ चंपै सु चढ्यौ नृप वाम पास । जै जया सह आयास आस ॥ चढि चल्यौ बंधि आवड् राज । सामंत सब्ब चढि सूख साज ॥ छं० ॥ ८६ ॥ नीसान ताम बज्जे सु घाव । आकास धरा फुद्दे निघाव ॥ संबत्त तीस अरु पंच माघ । तेरस्स स्वेत सुभ जोग साध ॥ छं० ॥८७॥ * हुसैन का भी अपनी सेना के साथ पृथ्वीराज से आ मिलना ॥ सजि सथ्य चढयौ हुस्सेन सेन । बंधे स तोन भर मीर ऐन ॥ हुस्सेन सथ्यमिलि सक्स एक । उर सामि भ्रम बंधें सुतेक ॥ छं० ८८ ॥ प्रथुिराज आइ किन्हौ सलाम । आदर अदब दिय राज ताम ॥ मिलि चल्यौ सेन अर तेजवंत । बज्जे सुबज्ज जय हेमवंत ॥ छं० ॥ ८९ ॥ दस कोस पर डेरा देना ॥ दस कोस जाइ दिन्नौ मेलान । डेरा सुदीन जनु सुथ्य थान ॥ छं०॥९०॥दू॥३१॥
- इस ५१ रूपक के छंद ८७ के दूसरे पद में इस हुसेन और चित्ररेखा विषयिक शहाबुद्दीन की चढाई का मुकाबिला करने को जाने का सनन्द अर्थात् पृथ्वीराज का तीसरा शाक ११३५ माघशुक्ला १३ शुभ योग कहा है। वह जैसे कि अबतक इस महा काव्य में आए हुए सब सनन्द अर्थात् प्रचलित विक्रमी संवत् से आदिपर्व्व के रूपक ३५५ । में कहे अंतर बर्ष ९० । ९१ के जोड़ने से मिल जाते हैं वैसे मिल जाता है-११३५+९० । ९१-१२२५ । २६ ॥ ५१ पाठान्तर-रांम । दांन ॥ ८० ॥ दांन । असेस । सांग गांन । दांन । स चंड । अथ । हथ । जंपय । आंन । पठि । गांन । आशिष । वैन । चहुवांन । रांम । जजि । प्रांत ॥ ८२ ॥ हुन- मंत । घास । चकोर । आंनि । जांनि । बांनि । दरस्स । दरस । दिस । दिषि । परस । चिंत ॥ ८४ ॥ बंच्यौ सुचि । मनौ । रथ । हाकत । सब । सजी । वांनी । ओर । आंनि ॥ ८५ ॥ स चढ्यौ । सबद । आउहु । सब । सुख ॥ ८६ ॥ नीसांन । तांम । बजै । स्वेत ॥ ८७ ॥ सजि सथ संपत्त हुसेन । सेन । सतीन । एन हुसेन । सथ सांमि । बधै ॥ ८८ ॥ प्रथीराज । आय । कीनौ । सलांम । अदब । तांम । बजे । बज्जय ॥ ८९ ॥ कीनो मिलांन । शुभ । धांन । यांनं ॥ ९० ॥
नवां समय १६ ] पृथ्वीराज रासो । ४०३ दूतों का सुलतान को पृथ्वीराज के चढ़ आने का समाचार देना ॥ दूहा ॥ देखि चरित नृप साह चर । गए पास सुरतान ॥ कहै सेन संमुष रजै । चदि आयौ चहुआन ॥ छं० ॥ ८१ ॥ रु ॥ ५२ ॥ सुलतान का चढ़ाई के लिये धूम धाम से चलना ॥ दूहा ॥ सुनि चलि साहाय चर । दिय निरघोष निसान ॥ चयौ सेन सज्जे सिलह । करिव फौज सुरतान ॥ छं० ॥ ८२ ॥ रु ५३ सुलतान की चढ़ाई का वर्णन ॥ छंद मोतीदाम ॥ चल्यौ सुरतान सुसज्जिय फौज । बजे बर वज्जन बीर असोज ॥ भयौ गज घुंमर घंट निघोर । मनौ झुकिक्रंच भयौ सुर रोर ॥ छं० ॥ ८३ ॥ गजें गज मद् मनौ घन भद्द । चिकार फिकार भए सुर रुद्द ॥ तुरंग मचीस कडक्क लगाम । खरक्किय पप्पर तोन लुतांन ॥ छं० ॥८४॥ * चमंकत तेज सनाह सनाह । करें धर पहर राह बिराह ॥ झनक्कत टोप झुटोप उतंग । मनौ रज जोति उद्योत विहंग ॥ छं० ॥ ८५ ॥ दमंकत तेज कमान कमान । चितं चित मीर रची महमान ॥ भले भर सांइय अंस सगत्ति । खपै धर जीवन जत्तिन गत्ति ॥ छं० ॥ ८६ ॥ नमैं निज सांइय पंच वषत्त । सिपारच तीस पढै दिन रत्त ॥ नमैं निज सेष धरम सरम । फमै रच रीति कुरान करम ॥ छं० ॥ ८७ ॥ दिढंबर बाचरु काकूह मीर । तर्फेनीय एक रत धर बीर ॥ सवध्य वेध करें तम तांह । भ्रमंतिय पंषि इनै छित छांह ॥ छं० ॥ ८८ ॥ धरै इक एक अनेक सुमान । झणक्कत मुंड तवल्लह मान ॥ धरै धर नाहिय स्याहिय सीस । सिरक्कचि चंबर घुमर दीस ॥ छं० ॥८९॥* ५२ पठान्तर-सुरतान । कहै । चहुवांन ॥ ५३ पठान्तर-चरित्र । चरित । सहाब । निसांन । सजे । सज्जेह । सुरतांन ॥ *यह पद Caufield Mss. में नहीं है।
४०४ पृथ्वीराजरासो। [ नवां समय २० अनेक सुथान अनेकह रंग । चढे सब मीरह सेन अभंग ॥ अनेक खुवान अनेकय व्रंन । समुझिन्न न बीय समुझिन्न क्रंन ॥ छं० ॥ १०० ॥ पयं भर अग्ग अनेक सुभार । अनेक सुजाति अनेक सुतार ॥ सिरंकिय मुंडिय मुंड सुअद्ध । जुवहिय उहिय जानि अनद्ध ॥ छं० ॥ १०१ ॥ करं तिय झंडिय रंग अनेक । फुरक्कहि झंपचि झंपच तेग ॥ चले घर बान सुसद्धिय दिठ्ठ । अगें पथ नारि अभूख गरिठ्ठ ॥ छं० ॥ १०२ ॥ अगें किय मद सरक्क सुभार । मनौं पय चल्लत पब्बत चार ॥ ढलैं सिर ढाल अनेक सुरँग । फरैं फरहारि उभारिय अंग ॥ छं० ॥ १०३ ॥ बरंनच झंडय मंडय जुव । मनौं घट रित्ति अनंगच रूप ॥ भई धुर डंबर अंबर रैन । जद्य थल पहरि संक्रमि सेन ॥ छं० ॥ १०४ ॥ रु० ॥ ५४ ॥ खाहुंड अचलपुर में सुलतान का डेरा डालना ॥ दूहा ॥ जध्य तथ्य संक्रमि सयन । उंच थांन जल थांन ॥ दिय खाहूंडप अचल पुर । किय मुकाम सुरतान ॥ छं० ॥ १०५ ॥ रु० ॥५५॥ कैमास का यह समाचार घड़ी रात रहे पृथ्वीराज को देना ॥ दूहा ॥ घरी सुनव निसि सेष चर । आय पास चहुआन ॥ गये पास कैमास जपि । चरित सब्व सुरतान ॥ छं० ॥१०६॥ रु० ॥५६॥ ५४ पाठान्तर-मोत दांम । सुरतान । जुसजिव । बजन । घंटन । कंच ॥ ९३ ॥ गर्नै । मनोँ । भद । रद्ध । रुद्द । सक्कड फल । परकिय । पपर । सतांम ॥ ९४ ॥ *यह तुक ए० सो० की प्रति में नहीं है ॥ करें । झलकत । मनोँ । रजिं ॥ १५ ॥ कमांन २ । मान ॥ लपैं । जतिन । गति ॥ ९६ ॥ बषत । पठै । रत । नमै । जिन । कुरांन । तरुनीय । रतैं । सबदय । करं । तांह । भ्रमंतिय । धरैं । सवांन । झलकत । तबलह । मांन । धरें दृक । धरनाहीय । शीस । कहि । घुंघर ॥ ९६ ॥ बांन । अनेक सु । सेनव मीर । बांन । बृन । समुझि ॥ १०० ॥ हतार । जांनि ॥ १०१ ॥ डंडिय । फरकहि । झंपय । बांन । सधिय ॥ १०२ ॥ मद । सरक । मनोँ । पग । चलत । पब्बत । ढले ॥ १०३ ॥ मनो । रित । अनंगय । डुबरे । रेणु । सेनु । ॥ १०४ ॥ ५५ पाठान्तर-जथ । यांन । जलथांन । सासंडे । मुक्राम । सुरतांन । ५६ पाठान्तर-निशि । सेवचर । आइ । चहुवांन । सब । सुरतांन ॥
नवां समय २१ ] पृथ्वीराजरासो । ४०५ अरिल्ल ॥ जगि संची कैमाम मद्दा अर । गंठिय चित्त चरित्त कहिय बर ॥ जगिय सध्य सज्ज निस सेनं । गयो राज यह सज्जि द्रुगेनं ॥ छं० ॥ १०७ ॥ रु० ॥ ५७ ॥ पृथ्वीराज का उसी समय चढ़ाई करने को तयार होना ॥ गाथा ॥ जग्गिय नृप चहुवानं । कहियं कैमास सज्जि सुरतानं ॥ बज्जि निघाय निसानं । सजि बाधं सेन सुरतानं ॥ छं० ॥ १०८ ॥ रु० ॥ ५८ ॥ चढ़ाई की तयारी, भगवत् स्मरण तथा दान देना ॥ छंद त्रिभंगी ॥ सयनं सव्वानं, किय सज्जानं, बज्जि निषानं, नीसानं । बंधे सिलचानं, निज निज थानं, पष्परि पानं, असगानं ॥ निज किय तं न्हानं, दीन सुदानं, सेष समानं, हंसानं । मंने चिप्पानं, चंडी सानं, आसिष्पानं, जंपानं ॥ छं० १०६ ॥ तुलसी तिन मंजरि, चक्र तनं धरि हरिचरनां चरि, जल सारं । गिजकी सत कांतरि, कृष्ण उरं धरि, साज सर्व करि जूझारं ॥ मौजत्त हलहं धरि, राग तबं परि, सज्जि वगं तरि, करि ढारं । मंगे च्य राजं, साकति सानं, पष्परि आजं सुप राजं ॥ छं० ॥११०॥ हिंदू अंदाजं, तेज सछाजं, कीरति काजं, कुल राजं ॥ नामं जा हंसं, उत्तिम बंसं, धुर गिरि जंसं, रजिमंसं ॥ पड्डु दिय आएषं, सेष नरेस्रं, कस्सेतं सं, उत्तंसं । चढ्ढ्यौ चहुवानं, मंगे जानं, पै वामानं चंपानं ॥ छं० ॥ १११ ॥ चिंते चिंताने, चित्त सुभानं, जग्ग इसानं ईसानं ॥ छं० ॥ ११२ ॥ रु० ॥ ५८ ॥ ५७ पाठान्तर—गढीय । गंठीय । कहीय । नेनं । सजि ॥ ५८ पाठान्तर-चहुवानं । सुरतांनं । संज्जी कै बोध सेन सुरतांनं । सञ्जि कै धांध सेन सुरतांनं । सजि कै बोध । ५६ पाठान्तर-सवानं । कीय । सजानं । बजि । यांनं । पपरि । अस यांनं । तंन्हानं । ईसानं । इसानं । बिपानं । निजपानं ॥ १०६ ॥ तुलसी सिर मंजरि चक्र तनं जारि कर जुझ अंजुरि हरि चरनं । सल । सिवं । जुझारं । मौज । हलं । बगत्तरि । कसि ढारं । है । पपर । सुपराजं ॥ ११० ॥ सदाजं । उतिम । कसेतंमं । उतंसं । चह्रौ । चढियौ । पैश्वामनं ॥ १११ ॥ जग । सानं । इसानं ॥ ११२ ॥
४०६ पृथ्वीराजरासो । [ मघां समय २२ पृथ्वीराज का सवार होना ॥ कवित्त ॥ चितं ईस चहुंआन । चल्यौ हय सज्जि सुआवध ॥ बोलि सूर सामंत । बान सज्जे सुबान जुध ॥ जय हर ! जंपे राज । चल्यौ थप्परि है कंधं ॥ जै मन्त्रिय है राव । करी कसि मुष जरहं ॥ धुंइंत धरा धुर धुर बिछर । करिय लोह दंतै कसक ॥ नाचंत तेन पैरव सुथल । धरनि ध्यंम धुज्जिय धसकि ॥ छं० ॥ ११३ ॥ रु० ॥ ६० ॥ पृथ्वीराज का मीरहुसैन के डेरे में आना, मीरहुसैन का अपने साथियों के साथ तयार होकर पृथ्वी- राज को सलाम करना ॥ कवित्त ॥ गयौ राज चहुआन । साच डेरा हुस्सेनह ॥ सुनी खबरि बर बीर । सज्जि आयौ सध्यै सच ॥ करि गोसल्ल पविच । हेडू चिंत्ते रहमानं ॥ बंधि सिलह है संगि । बीर बज्जे नीसानं ॥ चढि दाह सज्जि सथ्थिय सयन । सीस नम्मि सलाम किय ॥ देषे सुबीर विक्कसे सुमन । बर सनमान अतित किय ॥ छं० ॥ ११४ ॥ रु० ॥ ६१ ॥ पृथ्वीराज और मीरहुसैन के मिलकर चलने का वर्णन ॥ छंद गीता मालती ॥ चढि चल्यौ राजं सेन साजं, बीर बाजं बज्जाए ॥ नहं निसानं सजे बानं, गोम गानं गज्जाए ॥ फौजे छक्ककी बीर बक्की, सूर जक्की जंभरं ॥ बिरदैत बीरं जुद्ध धीरं, आय भीरं धर घरं ॥ छं० ॥ ११५ ॥ ६० पाठान्तर-है। सजि । सूर सब्वान । बांन । सबांन । जुहु । जै । हय । मंत्री । उरधं । करिय । दंत लोहं । पयरख । धरनि ताम । धुजिय ॥ ६१ पाठान्तर-चहुवांन । हुसेनह । सजि । सध्यैं । चिंत्यौ । बजे । निसांनं । सज । सथी । नांमि । सलाम । सनमांन । अतित ॥
नवां समय २३] पृथ्वीराज रासो । ४०७
असमंसं दासं सांइ आसं, उच्च आरुं झंअरं ॥ नीकं सुवच्छं सुद्ध कच्छं, हुअ गच्छं धीढरं । सजि वान पथ्यं दंत अध्यं, राज सथ्यं संभिलं ॥ चल्ले सवल्लं ढाल ढल्लं, गज्ज मल्ल भुकियं ॥ कुं० ॥ ११६ ॥ घंटा सुघोरं भेरि शेरं, तयं तोरं सद्दयँ ॥ रुंधं सवदं नीर नदं, सूर बह्रं बद्द्यं ॥ धर पाडू धक्की है पुरक्की, गैग चक्की पप्परं ॥ उड्डी सुरेनं सुंदि गेनं, आइ सेनं सद्धरं ॥ कुं० ॥ ११७ ॥ गिद्धी सुनय्यं चली सध्यं, सीस रय्यं अच्छरं । निरपैं सुवीरं निज्ज नीरं, अस्स चीरं मच्छरं ॥ पुह्रैं समीरं वच्चि सुधीरं, साह सीरं संझरं । सेनं सहस्सं तेय दसंतं, भुम्झ जस्सं ढिढरं ॥ छं० ॥ ११८ ॥ नारह नई वीर वहं, गोम सईं तहयं । सामंत सूरं चढे नूरं, जुद्ध भूरं जद्द्यं ॥ सथ्यं संगारं मंस चारं, ना उच्चारं जैकरं । श्रोनं सभप्यी भू चरप्पी, पैचरप्पी बेचरं ॥ कुं० ॥ ११८ ॥ ६० ॥ ६२ ॥
सुलतान के चरों का सुलतान को जाकर समाचार देना कि शत्रु की सेना एक योजन पर आ गई ॥
दूहा ॥ चरित लख सादाब चर । गए पास सुरतान ॥ सजी सेन सामंत पति । आयो जोजन थान ॥ कुं० ॥ १२० ॥ ६० ॥ ६३ ॥
६२ पाठान्तर—बजए । नर्दै । निसानं । गजए । ढलक्की । बकी । जब्बी । बिरह्रैत । युद्धु । सांइ । घंघरं ॥ ११५ ॥ साई । उच्च । अझरं । सुबक्कं । कछं । गछं । धिठरं । बांना । पथं । अर्य । सथं । चल्ले । सबलं । ठलं । गज । मलं । भुझयं ॥ ११६ ॥ सदयं । वद्द्यं । धकी । पुरकी । गहक्की । पप्परं । उड़ी । सदेने । आय । सधरं । ॥ ११७ ॥ सतयं । सधं । रथं । अच्छरं । निरयै । निरपै । निज । अस । मछरं । पहुँ । साय । सहसं । दसं । भुझ । जसं । ढिठ्ठरं ॥ ११८ ॥ नारद । तद्यं । तद्दुयं । युध । जद्यं । सथं । शांगारं । संगारं । जैकरं । सभपी । घरपी । पैचरपी ॥ ११८ ॥ ६३ पांठान्तर—* सं० १६४७ की में इसका यह पाठ है—मिलि भूचर पेचर सकति । लप । सुरतांन । यांन ॥
४०८ पृथ्वीराजरासो। [ नवां समय २४ सुलतान की सेना की तयारी का वर्णन ॥ छंद विझांषरी ॥ सुनि चरित्त स'छाव तासचर । बोलि मीर उमराव मछा भर ॥ दिय निरघात घाव नीसानं । चल्यौ सेन सज्जे सव्वानं ॥ छं० ॥ १२०॥ बाजिच वीर अनेक सुबज्जे । धर पडिचाय सुगोमछ गज्जे ॥ डग्यौ सूर चढ्यौ सुरतानं । बज्जि निछाव नाल गिरि वानं ॥ छं० ॥ १२१ ॥ फौज सुं'च सजी साचावं । उलथ्यौ सेन समुद्रह आवं ॥ दच्छिन दिसा सज्जि तत्तारं । दिसि बांईं खुस्सान सुधारं ॥ छं० ॥ १२२ ॥ छाजिय राजिय गाजिय षानं । सनमुख सेन सजी सुरतानं ॥ मीर जमांम षान कंमानं । मछवति मोर पुट्ठि सजि तामं ॥ छं० ॥ १२३ ॥ षान मरुस्तम रुस्तम षानं । मद्धि फौज रज्जे सुल्तानं ॥ सहते वीस वीस सजि फौजं । तुंवा पंच रचे अच्छौजं ॥ छं० ॥ १२४ ॥ चिक्खपष्षां गज घूमहि डंमर । ध्वथ नारि गिर वांन असंवर ॥ रिन रन तूर घोर नीसानं । भेरी शृंग गरुड थन थानं ॥ छं० ॥ १२५ ॥ नफ्फेरी चिय बिध सुर डंडं । जोमष पह बजे घन दंडं ॥ आवत झुझझ डहक्क डहक्किकय । हैबर धींस दरक्क गद्दक्किकय ॥ छं० ॥ १२६ ॥ गज चिक्कार फिकार सबद्दं । तंदुल तबल मृदंग रबद्दं ॥ जंगी वीर गुंडीर अनेकं । बाजिच अनेक गने को बेगं ॥ छं० ॥ १२७ ॥ फौज पंच साजी साचावं । मीर अनेक गने को नावं ॥ देस देस मिलि भाष अनंतं । तबीयन नाम अनेक गनंतं ॥ छं० ॥ १२८ ॥
गवां समय २७ ] पृथ्वीराजरासो .४०६ फौज पंच लजि चल्यो जु साहं । गज्जौ अरनि गैन पुर गाहं ॥ लाहँडै सज्ज्यो दिसि वामं । पहर ल्हर उत्तिम ठामं ॥ छं० ॥ १२९ ॥ रू० ॥ ६४ ॥ लाहँडे के बाईं ओर सजकर सुलतान का खड़ा होना ॥ दूहा ॥ उत्तिम पंथह पुट्ठि जनु । लप्पी जीय सुथान ॥ लाहंडौ दिस्सि बाम है । सजि ठट्ठौ सुरतान ॥ छं० ॥ १३० ॥ रू० ॥ ६५ ॥ उड़ि रैन डंबर अबर । दिप्यौ सेन चहुआन ॥ सुनिगद्रांन वाजिच चक्क । सजे सीस असमान ॥ छं० ॥ १३१ ॥ रू० ॥ ६६ ॥ सुलतान की सेना देखकर पृथ्वीराज का मीर हुसैन की ओर देखना, हुसैन का अपने सरदारों के साथ तयार होकर पृथ्वीराज को सलाम करना ॥ कवित्त ॥ देखि सेन सुरतांन । नैन चहुआन मझार ॥ सज्जि फौज हुस्सेन । सेन सब मीर बीर वर ॥ रूमी पां कंमांमं । वेग हुस्सेन समत्थं पां दलेल दिपिनीय । जुद्ध करि करै अकत्थं ॥ कासिम्म पांन करीम पां । षोजा कासिम काज सुध ॥ लिन है सुसब्ब जिय समथ सजि । करि सलाम किय सीसउध ॥ छं० ॥ १३२ ॥ रू० ॥ ६७ ॥ ६४ पाठान्तर-उमदा । निघात । चढ्यौ । सजै ॥ १२० ॥ बजे । गजे । कथ्यो । वज्जिय ॥ १२१ ॥ समुद्र कि । दपिन । सजि । पुरसांन । सधारं ॥ १२२ ॥ हाजोय । राजोय । गाजोय । सुरतांनं । जमांम । पांन । कमानं । पुठि ॥ १२३ ॥ मधि । रने । तेद्देस । ठुंथा ॥ १२४ ॥ चित्तुं । पां । घुंमर । हथ । बांन । असंवरं । रिनतूर । नीसांनं । नफेरी । त्रिविधि । पट । आवध । भुझ । डहक । डहकिय । हय । गहकिय ॥ १२६ ॥ चिक्कार । फिकार । सबदं । श्यदं । गुंडीर । अनंत ॥ १२७ ॥ सजी । मीर अनेक अनेक सनावं । चाप अनेकं । नांम करे सुविषेकं ॥ १२८ ॥ सु । यु । गजे । सज्यौ । पधर । सधर । ठामं ॥ १२६ ॥ ६५ पाठान्तर-उत्तम थलच्छह । लपी । यांन । वांम । सुरतांन ॥ ६६ पाठान्तर-उडि । मंबर अबर । दिपी । सुने । असमान ॥ ६७ पाठान्तर-सुरतांन नैन । चहुवांन । सजि । हुसेन । कमाम । हुसेन । समर्थ । दपनी । करीय । अकथं । कासम्भ पांन । षोजा काश्यप । सब । सथ सजि । किय सलाम । करि सीस ॥ ६
४१० पृथ्वीराजरासो। [नवां समय २६ मीर हुसैन का कहना कि आपने हमारे लिये कष्ट उठाया है तो हमारा सिर भी आपके लिये तयार है देखिए कैसी लड़ाई लड़ता हूं, पृथ्वीराज का कहना कि इसमें आश्चर्य क्या है मैं भी आज तुम्हें ग़ज़नी का सुलतान बनाता हूं ॥ कवित्त ॥ कचै साच हुस्सेन । सुनौ चहुआन जुझु बत ॥ आज सीस तुम कज्ज । सेन साचाब भैंर्डौ पत ॥ मो कज्जै साहस । करिग प्रथिराज सरन भ्रम ॥ द्यौं उज उसू अज्ज । करौं राजन अकथ कम ॥ जंपै सु राज प्रथीराज तब । कद्य अचिन्ज जंपौ तुमह ॥ अप्पौँ सु छत्र गज्जन पुरह । सहि सेन साचाब गद्य ॥ छं० ॥ १२३ ॥ रू० ॥ ६८ ॥ मीर हुसैन का सलाम करके बाईं ओर सेना सजाना, पृथ्वीराज का अपने सरदारों को आज्ञा देना कि तुम लोग मीरहुसैन की सहायता करो और सामंतों का आज्ञा पालन करना ॥ कवित्त ॥ करि सलाम हुस्सेन । अनी बंधी दिसि बाईं ॥ सज्जरा बंधे कंठ । सहं सज्जे थन थाईं ॥ बोलि राज प्रथिराज । बीर जद्दव जामामी ॥ मच्चन सीच परिहार । सूर गुज्जर राभानी ॥ तीकंम बोलि तारंन भर । बगारीय देवद्य सुअन ॥ मँडलीक बोलि परसंग सुअ । जीचराज जंपै सुगुन ॥ छं० ॥ १२४ ॥ रू० ॥ ६९ ॥ : ६८ पाठान्तर-हुसेन । झुझ । कज । पंडो । कजै । साहस । प्रथीराज । धेमं । हौं उज उसूं आज । करो । राजनं । अकथ्यं । अकथ्य । छंम । अप्पोँ ॥ ६९ पाठान्तर-कियं । सलांम हुसेन । सजे । प्रथीराज । जांमांमी । गूजर । रामांनी । तिक्कंम । सगुन ॥
नवां समय २७ ] पृथ्वीराजरासो । ४११ कवित्त ॥ चवै राज चहुआन । तुम सामंत सूर बर ॥ घर कुनीव दुख लज्ज । जुद्ध श्रान संग अंग भर ॥ तुम सहाय हुस्सेन । सेन सज्जौ दिषि बाईं ॥ तुम अनंत यल तेज । देव घर कंठ सुहाई ॥ नादान दीन सुरतांन लौं । भिरौं चान बंधव विंधसि ॥ सबै हुवलि निज सेन सजि । नाइ सीस रजि बीर रस ॥ छं० ॥ १३५ ॥ रु० ॥ ७० ॥ कैमास आदि सामंतो का चार सहस्र सेना के साथ पृथ्वीराज के दक्षिण ओर सेना सजना ॥ कवित्त ॥ दिसि दच्छिन कैमास । राइ चामंड महाभर ॥ चंद्रसेन पुंडीर । सिंघ पम्मार सुझझ सर ॥ गहग्रधाव गद्दिलौत । निर्भ पति धार भार घन ॥ तँवर राइ परिछार । पित्त अनमंग मोट सन ॥ साहस्स चार सञ्जे सघन । अनी बांध दच्छिन नृपति ॥ रत्ताभि वस्त्र रत्ते सुभर । जै मंनी चहुआन चित ॥ छं० ॥ १३६ ॥ रु० ॥ ७१ ॥ पृथ्वीराज के आगे की ओर गोइंदराय आदि सरदारों का पांच सहस्र सेना के साथ खड़े होना ॥ कवित्त ॥ मद्धि अनी प्रथिराज । अग्ग सजे भर सामत ॥ गरुअ राइ गोइंद । राज मने साह्रस सत ॥ देवराइ बरगारि । कन्ह चहुआन नाह नर ॥ घीची राइ प्रसंग । बीर कन कूबड गूजर ॥ ७० पाठान्तर-चहुवांन। तुम । लज । सहाय । हुसेन । सज्जौ । बांई । सुरतांन । भिरौं । बंधवि । विंदसि । नाई सास ॥ ७१ पाठान्तर-दक्षिन । दषिन । राय । पामार । झुझ । गहिलौत । तोश्रर । राय । पहार ।