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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

६९४ राजतरंगिणी
मिलता है। कश्मीर के दक्षिण पश्चिम में दार्वा-
भिसार का स्थान है। इस मत से पश्चिमोय-
उत्तरीय पंजाब में इनका निवास प्रकट होता
है। पुराणों में एक स्थान पर हूणों का और
उल्लेख आता है।
मा (म) रुका माल्वाश्चैव पारियात्रनिवासिनः ।
सौवीराः सैन्धवा हूणा शाल्वाः शाकलवासिनः ॥
विष्णु पुराण तथा कूर्म पुराण में 'सौवीरा
सैन्धवा हूणाः' का उल्लेख आया है। यह भी इस
बात की ओर संकेत करता है। पश्चिमी उत्तरी
भारत में हूण रहते थे। उनका स्थान सिन्धु नदी
से पश्चिम था।
क्षोभा तन्त्र ५६ देशों की एक तालिका देता
है। उसमें हूणों का उल्लेख है। उन्हें पुलिन्द, कौरव
तथा गान्धार के साथ रखा है। संकेत मिलता है।
वे पश्चिमोय उत्तरी भारत की तरफ रहते थे ।
मलाईचैव पामाराः पाषायान्यक (१) पुलिन्द (काः) ।
हु(हू)ण कौरवगान्धारविदर्भाः सविदेहकाः ॥४४।२ः४
शक्ति संगम तन्त्र ३।७।४३ में हूणों के देश का
उल्लेख है।
कामगिरिं समारभ्य द्वारकान्तं महेश्वरि ।
श्रीकुन्तलाभिधो देशो हूणो भृगु महेश्वरि ॥४३॥
यहाँ पर हूण देश कामगिरि के दक्षिण में तथा
मरुदेश के उत्तर में रखा गया है। श्रो कुन्तल नाम के
कई क्षेत्रों का वर्णन मिलता है। अतएव इस कुन्तल
का निर्धारित करना कठिन है। यह कौन कुन्तल
है। कामगिरि मरुस्थल के उत्तर में था। सिन्ध
राजस्थान तथा पंजाब का दक्षिणी भाग मरुस्थल
है। अतएव यहाँ कुन्तल से तात्पर्य उत्तर पश्चिमो
भारत में लगाना चाहिए। काम देश का नाम सन्
११७६ ई० के एक अभिलेख में मिला है। जिसमें वहाँ
के राजा को सपादलक्ष (सेवालिक) पर्वत के राजा
के अन्तर्गत कहा गया है।
हूणों को एक जाति के रूप में महाभारत ने
चित्रित किया है। उनकी उत्पत्ति नन्दिनी गौ के
फेन से हुई थी । गाथा का वर्णन महाभारत
आदि पर्व (६५ : ५१) तथा वन पर्व (४३:१४)
में किया गया है। हूणों के देश को हूण देश कहा
गया है। उनका स्थान पश्चिम दिशा निर्धारित
किया गया है। उन पर नकुल ने विजय प्राप्त
की थी ! (सभा पर्व ३२ : १३) । हूण देश तथा
जाति के राजागण युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में भेंट
लेकर आए थे ! (सभा पर्व ५१:३४)
(२) मिहिरकुल : आइने अकबरी में नाम
'मेरह कुल' तथा राज्यकाल ७० वर्ष दिया गया
है। राज्यकाल लौकिक वर्ष ३१७२ से आरम्भ
माना जाता है। कुछ ऐतिहासिक इसका सन् ५१५-
५५० ई० मानते हैं।
मिहिरकुल इफवेलाइट अथवा श्वेत हूण था।
हूणों ने बौद्धों के विरुद्ध जिहाद बोला था। उनके
विहारों तथा चैत्यों को नष्ट किया था। भिक्षुओं को
तलवार की घाट उतारा था। ह्वेनसांग लिखता है-
मिहिरकुल अपने अजेय साहस तथा प्रलोभनीय प्रकृति
के कारण धूर्त्त व्यक्ति था। पड़ोसी राजाओं में
ऐसा कोई नहीं था। जो सकम्पित उसके आदेशों
का पालन न करता रहा हो।'
आमू दरया से चलकर हूणों ने हिन्दूकुश पर्वत
पार किया। गान्धार लिया। आगे बढ़ना चाहते
थे। सन् ४६० ई० में स्कन्दगुप्त ने उनकी बाढ़
रोक ली । ईरान में हूण सफल हुए। ईरान ने
हथियार रख दिया। सन् ४८४ ई० में ईरान
के राजा को मारकर राज्य पर अधिकार कर
लिया। पांचवीं शताब्दी के अन्त तक उनका राज्य
बल्ख तक फैल गया ।
पाँचवीं शताब्दी में तोरमाण ने पंजाब पर
अधिकार कर लिया। एक मत है। मालवा के
राजा यशोवर्मा ने सन् ५३०-५४५ ई० के बीच
हूणों पर विजय प्राप्त की थी। यह भी एक
मत है। वे बालादित्य नरसिंह गुप्त से पराजित
हो गये थे। इस पराजय के पश्चात् मिहिरकुल
ने भारत कश्मीर विजय किया। वहाँ से उसने
गान्धार पर आक्रमण किया। वहाँ के राजवंश

प्रथम तरंग २९५

को समाप्त किया। स्तूप, चैत्य तथा विहारों को
नष्ट किया। देश को लूटा। अपनी लूट तथा
युद्धबन्दियों के साथ कश्मीर लौट पड़ा। मार्ग में
उसने बन्दियों को सिन्धु तट पर मार डाला।
अन्ततोगत्वा भारत से हूण लोग थानेश्वर के
हर्षवंशीय राजाओं द्वारा निकाल बाहर किये गये।
हूण बौद्धों के विरोधी थे। वे शिव के उपासक
थे। उन्होंने शिव मन्दिर निर्माण कराया था।
वे शैव मत के समर्थक थे।

मिहिरकुल तोरमाण का पुत्र था। तोरमाण
की मुद्राओं से पता चलता है कि उसने मध्य
प्रदेश से इरन सागर तक अधिकार कर लिया
था। उससे यह भी पता चलता है कि वह उत्तर
प्रदेश, पंजाब और कश्मीर तक पहुँच गया था।
तोरमाण ने जैन धर्म जैन श्रुति के अनुसार स्वीकार
कर लिया था। पव्वैया में रहने लगा था। यह
स्थान चन्द्रभागा अर्थात् चनाब नदी के तट पर
पंजाब में है। तोरमाण का उत्तराधिकारी मिहिर-
कुल सन् ५१५ ई० में राज्यसिंहासन पर बैठा।

यशोवर्मा तथा बालादित्य से हार कर वह
कश्मीर राजा के आश्रय में आया। राजा ने उसे
कश्मीर में एक जागीर दी। किन्तु वह कश्मीर
के राजा को हटा कर स्वयं राजा बन गया।
उसने कन्धार पर आक्रमण कर विजय किया।
अनेक लोगों को सिन्धु में डुबाकर मार डाला।

गया है। मिहिरकुल ने नरसिंहगुप्त बाला-
दित्य (सन् ४८५-५३० ई०) को पराजित करने
का निश्चय किया। परन्तु अपने साथियों के साथ
बन्दी बना लिया गया। बालादित्य उसका वध
करना चाहता था। परन्तु उसकी मां ने उसे मुक्त
कर देने के लिए कहा। बालादित्य ने एक राज-
कन्या से उसका विवाह कर दिया।

कश्मीरी इतिहासकारों तथा भारतीय इतिहास-
कारों के पाठ में मेल नहीं खाता। मन्दसौर के

शिलालेख से पता चलता है। शैव यशोधर्मन के
सम्मुख मिहिरकुल का मस्तक झुक गया था।

कोसमस ने इंडिको प्लुस्तस में मिहिर-
कुल (कोसमस : इण्डिको प्लुतस) को गोला
नाम से सम्बोधित किया है। चीनी पर्यटक सुंग-
युन ने इसे गान्धार का शासक 'येथा' कहा है।
मिहिरकुल की राज्य सभा में सन् ५२० ई० में
अपना जाना वर्णन करता है।

ह्वेनसांग ने मिहिरकुल को मोह-हिस लो-बुलो
लिखा है। उसे महान् साहसी लिखा है। कोई भी
ऐसा पड़ोसी राजा नहीं था जो उसका आदेश
नहीं मानता था। उसने मिहिरकुल को बौद्धों के
एक बड़े भारी पीड़क के रूप में प्रस्तुत किया है।
गाया है कि मिहिरकुल ने बौद्धों से एक उपदेशक
मांगा। भिक्षुगण उसके भय किंवा स्वल्प ज्ञानी
होने के कारण कुछ निश्चय न कर सके। अन्त
में उन्होंने राजा के राजभवन के एक भृत्य बौद्ध
को धर्मज्ञानी के रूप में चुना। राजा ने अपना
अपमान समझा। क्रुद्ध होकर उसने बौद्ध संघ के
नाश का आदेश दिया। इससे प्रकट होता है।
उस समय बौद्ध संघ निष्क्रिय, प्राणहीन एवं अश्र
हो गया था।

राजतरंगिणी का वर्णन तोरमान तथा मिहिर-
कुल के भारतीय ऐतिहासिक वर्णन से मेल नहीं
खाता। राजतरंगिणी के अनुसार तोरमाण तथा
मिहिरकुल के समयों में अन्तर पड़ता है।

चीनी राजदूत सुंगयुन ने सन् ५२० ई० में
गान्धार की सीमा के शिविर में राजा मिहिरकुल
से भेंट की थी। उसने उस समय के इतिहास
पर प्रकाश डाला है। वह अपने समय से दो
पीढ़ी पूर्व का इतिहास देकर तत्कालीन समय का
वर्णन करता है। वह मिहिरकुल से उसके राज्य
के प्रारम्भिक काल में सम्भवतः मिला था।
वह लिखता है—उत्तर भारत में श्वेत हूण रहते

है। उनमें एक नाम गोला (मिहिरकुल) है। वह
युद्ध के समय २ हजार हाथी तथा विशाल अश्वा-
रोही सेना के साथ चलता है। यह भारत का
राजा है। वह लोगों को नष्ट करता है। लोगों
को सम्पत्ति भेंट करने के लिए बाध्य करता
है। फितन नदी (सिन्धु) हूणों के देश को
भारत से अलग करती है। यह उल्लेख सन् ५२५-
५३५ ई० का है। इससे दो बात सिद्ध होती हैं।
तोरमाण भानुगुप्त से पराजित हो गया था। हूणों
का राज्य सिन्धु नदी के पश्चिमी क्षेत्र तक सीमित
रह गया था।
तोरमाण के पश्चात् मिहिरकुल ने राज्य विस्तार
का विचार किया। उसने उत्तरी भारत पर
आक्रमण किया। सन् ५३० ई० के शिलालेख से
प्रकट होता है वह उसके राज्य का १५वां वर्ष
था। उस समय उसका राज्य ग्वालियर तक
विस्तृत था।
मिहिरकुल के यशोधर्मन तथा नरसिंह गुप्त के
कारण उत्तरी भारत का त्याग करना पड़ा। उसने
सन् ५४४-५५० ई० के बीच सिन्धु नदी के अधो-
भाग स्थित राज्य प्राप्त करने का पुनः प्रयास
किया, जिसे खो चुका था।
यशोधर्मन महाप्रतापी राजा था। उसके
चरणों पर अपमानित राजा मिहिरकुल का मस्तक
झुका था। मिहिरकुल शिव के अतिरिक्त और
किसी के सम्मुख मस्तक झुकाने में सर्वथा अशक्य
था। जिसकी भुजाएं तुषार पर्वत का आलिंगन
करती थीं। उसे अपने राज्य के दुर्दम्य होने का
दम्भ उत्पन्न हो गया था।
यहां तुषार पर्वत से अर्थ हूणों का उस
समय हिमालय के पर्वतीय खण्ड में रहना सिद्ध
करता है। सुंग-युन ने स्पष्ट कहा है कि हूण
राज का कश्मीर के राजा से संघर्ष हुआ था।
तुषारपात कश्मीर के अतिरिक्त पश्चिम दिशा में
और कहीं नहीं होता अतएव कश्मीर में हूणों का
रहना लक्ष्य करता है। मिहिरकुल जब भारत
के भीतरी भागों में घुसने का प्रयास कर रहा था।
तो मालवा के राजा यशोधर्मन ने उसका सामना
किया था। यशोधर्मन के पश्चात् मिहिरकुल का
पुनः शक्तिशाली हो जाना मालूम होता है।
मिहिरकुल अत्यन्त क्रोधी स्वभाव का था।
पर्यटक ह्वेनसांग के अनुसार उसने स्यालकोट तथा
समीपवर्ती भूभागों पर अधिकार स्थापित कर लिया
था। किसी समय बौद्ध भिक्षुक से रुष्ट हो गया
था। उसने अपने अधिकारियों को आज्ञा दी।
हिन्दुस्तान के बौद्धों का नाश कर दिया जाय।
बुद्ध अनुशासन समाप्त कर दिया जाय। बुद्ध सङ्घ
से सम्बन्धित कोई चीज शेष न रह जाय।
इसने कश्मीर पर अधिकार करने के पश्चात्
वहां बौद्ध विहारों तथा स्तूपों को नष्ट करा
दिया। सम्पत्तियां जप्त कर लीं।
हूण बौद्ध नहीं थे। वे पिशाचों की पूजा
करते थे। हूण राज्य के साथ किपिन अर्थात् कश्मीर
का सीमावर्ती विवाद हुआ था। कश्मीर तथा हूण
राज में ३ वर्ष तक युद्ध चलता रहा।
स्कन्दरिया निवासी एक यूनानी ने हूणों के
समय के गुप्तवंशीय राजा का नाम नरसिंह बाला-
दित्य दिया है। वह यशोधर्मन तथा हूणों के
आक्रमणों से त्रस्त हो गया था। गुप्त साम्राज्य की
शक्ति क्षीण होती देखकर हूणों ने अपनी शक्ति
बढ़ा ली। वह मिहिरकुल को भेंट भी देने लगा।
बालादित्य के साथ हुए युद्ध का वर्णन ह्वेन-
सांग करता है—बालादित्य भगवान् बुद्ध के प्रति
श्रद्धा-भक्ति रखता था। मिहिरकुल के अत्याचार
की बात सुनी तो उसने भेंट भेजना बन्द कर
दिया। मिहिरकुल ने उसके राज्य पर आक्रमण
कर दिया। बालादित्य ने एक द्वीप पर शरण
ली। सूचना प्राप्त होने पर नाव द्वारा मिहिर-
कुल ने द्वीप पर आक्रमण किया। द्वीप पर उसकी

प्रथम तरंग २९७

[बायाँ स्तम्भ]
सेना उतरी। उसने अपनी सेना का मुख्य भाग
अपने कनिष्ठ भ्राता के नेतृत्व में पीछे छोड़ दिया।
वह एक संकीर्ण दर्रा से गुजर रहा था। बाला-
दित्य की सेना ने उस पर आक्रमण किया।
मिहिरकुल बन्दी बना लिया गया। बालादित्य
उसका वध करना चाहता था। परन्तु उसकी
माता ने उसे रोका। उसे मुक्त कर दिया।
छूटने पर मिहिरकुल ने सुना कि उसका भाई
लौट गया है। स्वयं राजसिंहासन पर बैठ गया
है। उसने कश्मीर के राजा के यहाँ शरण ली।
कश्मीर में मिहिरकुल ने एक विद्रोह आयोजित
किया। कश्मीर के राजा को हटाकर स्वयं राजा
बन बैठा। उसने गान्धार के राजा को भी मार
कर, उसके वंशजों को समाप्त किया। वहाँ का
भी राजा बन गया। स्तूपों तथा संघारामों को
खूब लूटा। देश को भी लूटा। लौटने के एक
वर्ष पश्चात् मर गया। सन् ५६३-५६७ ई० में
मध्य भारत में हूणों का लोप हो गया। तुर्क
तथा ईरानियों ने भी आमू दरया की उपत्यका के
निवासी हूणों का संहार कर हूण शक्ति नष्ट
कर दी।
मिहिरकुल ने साकल अर्थात् स्यालकोट तथा
उसके समीपवर्ती भूखण्डों पर अपना अधिकार कर
लिया था।
मिहिरकुल की मुद्रा पर-'जयतु वृष' 'जयतु वृष
ध्वज' टंकित है। उसकी मुद्राओं पर चन्द्रकला,
वृषभ, त्रिशूल, सूर्य का चक्र तथा शैव चिन्ह टंकित
हैं। 'मिहिर' का अर्थ सूर्य होता है। यह संस्कृत शब्द
है। ईरानी अवेस्ता उल्लिखित मिहिर शब्द मिथ्र
अर्थात् 'मित्र' है। ईरान तथा मन्दसौर के अभिलेख
मिहिरकुल के इतिहास पर यथेष्ट प्रकाश डालते हैं।
प्रश्न उपस्थित होता है कि मिहिरकुल का
क्या कोई शिलालेख आदि भी प्राप्य है। जिसके
कारण कल्हण की बात की पुष्टि हो। यह सिद्ध माना
जाय कि कश्मीर में मिहिरकुल का शासन था। हूण
३८

[दायाँ स्तम्भ]
नरेश मिहिरकुल का ग्वालियर का शिलालेख तिथि
शासन-काल १३, इस विषय पर प्रकाश डालता है।
नाना धातु विचित्रे 'गोपाह्वय नाम्नि भूधरे रम्ये'
कारितवान् शैलमयं भानोः प्रासादवरमुख्यम् ॥ ९
पुण्याभिवृद्धि हेतोर्मातापित्रोरात्मनश्चैव।
धम्मता च गिरिवरे ( ) स्मि (न) राज्ञः ॥१०
'गोपाह्वय नाम भूधरे' यहाँ गोपा का अर्थ मे
गोपाद्रि गिरि अर्थात् गोप पर्वत लगाता हूँ। गोपाद्रि
वर्तमान शंकराचार्य पर्वत है। शंकराचार्य पर्वत के
मूल में डललेक के तट पर गुपकर जिसका प्राचीन
नाम गोपा अग्रहार था, स्थित है। वन, शैल तथा
पुण्य की वृद्धि के लिए वह इस शिखर में निवास
करता है। यह स्थान पुराधिष्ठान है। पुराधिष्ठान
जैसा मैं लिख चुका हूँ गोपाद्रि अर्थात् शंकराचार्य
पर्वत के वाम पार्श्व में है। मिहिरकुल के समय में
कश्मीर की राजधानी था। अतएव गिरिवर पर बनाने
की ओर संकेत शिलालेख में किया गया है।
मिहिरकुल बौद्ध धर्म विरोधी हो गया था।
उसके शिलालेख से प्रकट होता है कि वह द्विजगणों
के प्रति आस्था रखता था। यथा—
( यतो ) (नि) र्ममले भाति ॥ ६
द्विजगण मुख्यैरभि संस्तुते च पुण्याह नाद घोषेण।
तिथि नक्षत्र-मुहूर्ते संप्राप्ति सुप्रशस्त (दिने) ७
मातृ तुलस्य तु पौत्रः पुत्रश्च मातृदासस्य ।
नाम्ना च मातृचेटः पष्वं—
( त दुर्गे ( गु वास्तव्यः ) ॥८॥
इसी शिलालेख से तोरमाण और मिहिरकुल का
सम्बन्ध सिद्ध होता है कि मिहिरकुल ऐतिहासिक
प्राणी था। तोरमाण का पुत्र था। कल्हण का वर्णन
वास्तव में कश्मीर में किसी प्रचलित इतिहास के
आधार पर दिया गया है। कल्हण मिहिरकुल को
वसुकुल का पुत्र बताता है। वह मिहिरकुल की
वंशावली ५ पीढ़ियों तक की देता है। कल्हण
मिहिरकुल के पुत्र बक का भी उल्लेख करता है।

२९८ राजतरंगिणी
जो उसके पश्चात् कश्मीर का राजा हुआ था। बक
के पश्चात् सीधी वंश परम्परा का लोप होता है।
उसी के एक वंश का क्षितिनन्द राजा होना कल्हण
लिखता है। एक ओर कल्हण स्पष्ट वर्णन करता है
तथा दूसरी तरफ तोरमाण तथा मिहिरकुल के
शिलालेखो में कश्मीर का उल्लेख नहीं मिलता।
'गोपाद्ध्य' शब्द से उसका सम्बन्ध खींच तानकर
जोड़ा जाता है। अशोक के समान मिहिरकुल के
कश्मीर सम्बन्ध पर सन्देह किया जा सकता है।
अशोक के सम्बन्ध में यही बात राजतरंगिणी में पाई
जाती है जिसमे उसके दादा का नाम शकुनी दिया
गया है। अशोक की वंशावली दी गयी है। उसमें
गोधर, उसके पश्चात् उसका पुत्र सुवर्ण, उसके
पश्चात् उसका पुत्र जनक तथा उसके पश्चात् शचीनर
और उसके पश्चात् राजा शकुनी का प्रपौत्र अशोक
राजा हुआ। जिस प्रकार कल्हण को दी गयी अशोक
की वंशावली भारतीय इतिहास से मेल नही खाती
उसी प्रकार मिहिरकुल की दी गयी कल्हण की
वंशावली भारतीय इतिहास से मेल नहीं खाती।
ग्वालियर का शिलालेख इस विषय में स्पष्ट है:
श्री तोर (माण इ) ति पः प्रथितो (भू चक्र) यः
प्रभूत-गुणः ।
सत्य प्रदान शौय्यांधेन मही न्याय तः शास्ता ॥ ३
तस्योदित कुल कीर्तेः पुत्रो ( ) तुल विक्रमः
पतिः पृथ्व्याः ।
मिहिर कुले तिख्यातो ( ) भटगो यः पशुपतिम ॥ ४
यह मिहिरकुल या तो भारतीय राजा मिहिरकुल
या अथवा वह कश्मीर का भिन्न राजा था। हसन
ने रत्नाकर पुराण का उल्लेख बहुत किया है किन्तु
उसने वही वंशावली दी है जो कल्हण की है।
नीलमत पुराण हूण राजाओं, हूण जाति, तथा
मिहिरकुल आदि किसी का उल्लेख नाममात्र के लिए
नहीं करता। चीनी लेखकों ने मिहिरकुल के पिता
का नाम नहीं दिया है। भारतीय इतिहास लेखको
ने कल्हण तथा चीन पर्यटकों द्वारा कश्मीर राजा
मिहिरकुल को एक मे मिलाने का प्रयास किया है।
इन नामों की समता विशेष रूप से आधार मानी
गयी है। इस विषय पर अभी घोर अनुसंधान तथा
गवेषणा की आवश्यकता है।
ग्वालियर का शिलालेख मिहिरकुल को वसुकुल
का पुत्र बताता है। यह एक विचित्र पहेली
है। ग्वालियर के शिलालेख तथा कल्हण के काल में
६०० वर्षों का अन्तर है। अतएव 'ग्वालियर का
शिलालेख मिथ्या नहीं हो सकता। सम्भव है कि
मिहिरकुल को कश्मीर राज्य की परम्परा में जोड़ने
का प्रयास किया गया है। उसे ५ पीढ़ी से 'कुल'
पदीयराजाओ के साथ कर दिया गया हो। तोरमाण
और मिहिरकुल नाम में साम्य नही है परन्तु वसुकुल
तथा .मिहिरकुल के नामो में साम्य है और वे एक-
वंशीय मालूम होते हैं।
यशोधर्मन के मन्दसोर प्रशस्ति में उल्लेख मिलता है:
आ लोहित्योपकण्ठा त्तलवन गह(नो)
पत्यकादा महेन्द्रादा
गंगाश्लिष्टसानोस्तुहिनशिखरणि
पश्चिमादापयो धेः ।
सामन्तैर्यस्य बाहु द्रविण-हृत-म (दै):
पादयोराननमद्भि
श्चूडा-रत्नां शु-राजि व्यतिकर शवला
भूमि भागा क्रियन्ते ॥५॥
स्थाणो रन्यत्रेण ऽणति कृपणतां
प्रापितं नोत्तमाङ्गं
यस्याश्लिष्टो भुजाभ्यां वहति हिमगिरि
र्दुगि-शब्दाभिमान (म्) ।
नीचैस्तेनापि यस्य प्रणति भुजबला-
वर्ज्जन क्लिष्ट मूर्ध्ना
(चू) डा पुष्पोपहारेर्मिहिरकुल नृपे
णार्चिचता (.) पादयुग्मं ॥६॥
३

प्रथम तरंग ३६०
दक्षिणां सान्तक्रामाशां स्पर्धया जेतुमुद्यता ।
यन्निषादुत्तरहरिद्विभारान्यमिवान्तकम् ॥ २६० ॥
२९०. उत्तर १ दिशा ने, दक्षिण दिशा २ पर विजय प्राप्त करने के लिए दक्षिण के देवता काल
की स्पर्धा में मिहिरकुल को यमराज तुल्य उपस्थित किया ।
सान्निध्यं यस्य सैन्यान्तर्हन्यमानाशनोत्सुकान् ।
अजानन्गृध्रकाकादीन्दृष्ट्वाऽग्रे धावतो जनाः ॥ २९१ ॥
२९१. राजा के समीप आने की सूचना लोग उसकी सेना द्वारा मारे जाने वालों के मांस
उत्सुक गृध्र, काकादि पक्षियों को उसके आगमन के पूर्व मँडराते हुए देखकर पा जाते थे ।
दिवारात्र हतप्राणिसहस्रपरिवारितः ।
योऽभूद् भूपालवेतालो विलासभवनेष्वपि ॥ २९२ ॥
२९२. रात दिन सहस्रों हत प्राणियों से परावृत वह भूपाल अपने विलासभवन में भी
वेताल १ था ।
बालेषु करुणा स्त्रीषु घृणा वृद्धेषु गौरवम् ।
न बभूव नृशंसस्य यस्य घोराकृतेर्ध्नतः ॥ २९३ ॥
२९३. घोर आकृति, नृशंस और मानव द्रोही इस राजा में बालकों के प्रति करुणा, स्त्रियों
के प्रति घृणा तथा वृद्धों के प्रति गौरव भाव नहीं था ।
( १ ) उत्तर दिशा : चारों दिशाओं के चार
दिक्पाल किंवा देवता है । इन्द्र पूर्व दिशा, वरुण
पश्चिम दिशा, कुबेर उत्तर दिशा तथा यम दक्षिण
दिशा के देवता हैं। कुबेर धन के स्वामी हैं। उनके
कारण लक्ष्मी प्राप्त होती है । वे पालक हैं । सम्पत्ति
प्रदायक है । नाशक नहीं है । विष्णु भी रक्षक हैं ।
विष्णु मन्दिर का मुख इस लिये उत्तर तथा पूर्व
दिशा रखा जाता है । उत्तर जिस प्रकार दक्षिण
दिशा के ठीक विरोधी दिशा में है । उसी प्रकार
दोनों दिशाओं के देवता तथा कर्म भी परस्पर विरोधी
हैं । कल्हण इसी ओर संकेत करता है । उत्तर दिशा
ने दक्षिण दिशा पर विजय प्राप्ति निमित्त दक्षिण
दिशा के संहारक यम तुल्य मिहिरकुल स्वरूप यम-
राज उत्पन्न किया था ।
( २ ) दक्षिण दिशा : मृत्यु की दिशा है ।
उसका देवता यम है । शिव संहार के देवता है ।
अतएव शिव मन्दिर का द्वार दक्षिण तथा पश्चिम
होता है । पश्चिम में सन्ध्या जन्म लेती है । व
जीवन सन्ध्या की दिशा है । वहाँ अन्धकार उत्पन्न
होता है । पूर्व दिशा उदय की दिशा है । वहाँ से
सूर्य ज्योति अन्धकार को तिरोहित करती उठती है ।
और पश्चिम में जाकर लुप्त हो जाती है । उत्तर तथा
पूर्व दिशा की ओर मुख कर उत्तम तथा पवित्र कार्य
किये जाते हैं । मृत्यु के पश्चात् मनुष्यों का पद
दक्षिण दिशा की ओर कर दिया जाता है । मुसलमान
भी अपने शव का पद दक्षिण की ओर करके
गाड़ते हैं ।
२९२ ( १ ) वेताल : पिशाचों का एक समूह
वेताल कहा जाता है । रुद्र गणों में वेताल सम्मिलित
है । रणभूमि में उपस्थित रहते हैं । वहाँ के मानव
रक्त एवं मांस भक्षण करते हैं । ( भा०२:१०:३९ )
इनकी देवता मानकर भी पूजा की जाती है। इन्हें
सर्वत्र शिव का उपासक माना गया है । ( मत्स्य

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प्रथम तरंग ३०१
तथा गोपी चन्दन से लगवाते हैं । अनेक भक्त
उनका गुदना गुदवा लेते हैं।
पैर का चिन्ह वस्त्र पर छपवाने का कोई
तुक नहीं मालूम होता । वह मनुष्य पादांकित
वस्तु अपवित्र मानी जायगी । यह सम्भव नहीं था
कि तत्कालीन हिन्दू किंवा बौद्ध जनता पादांकित
वस्त्र अपनी महिलाओं से हृदय पर धारण करवाती ।
मै समझता हूं। सिंहल भगवान् के पद
चिन्ह के कारण तीर्थ था । उसे देखने तथा
पूजा करने के लिए हिन्दू तथा बौद्ध दोनों जाते
थे । भगवान् का पद पवित्र था । अतएव
उसे वस्त्र पर स्वर्ण सूत्र अर्थात् जरी से अंकित
कर दिया जाता था । उसी प्रकार शिव विष्णु
के शंख, चक्र, गदा, पद्म, त्रिशूल वस्त्रो, उत्तरीय
आदि पर अंकित कर दिये जाते है । सिंहल का
यही पादांकित वस्त्र कश्मीर में आया रहा होगा ।
किन्तु कल्हण यहां 'राजा' शब्द पादांकित के
लिए प्रयोग करता है। उसका स्पष्ट अर्थ राजा
का पद है। यहां पर दो बातें सम्भव हो सकती
हैं । मिहिरकुल बौद्ध धर्म विरोधी था । वह शिव
भक्त था । उसने यदि जाना होगा कि उसकी
हृदयेश्वरी हृदय पर बुद्ध पादांकित वस्त्र पति के
शिव भक्त होते हुए भी धारणा करती है, तो वह
क्रोधित हो उठा होगा। वह सिंहल राज के इस
धर्म प्रचार को बुरा मानकर उसे दण्ड देने के
.. उस स्वभावानुकूल अभियान किया होगा ।
... राज के पादांकित वस्त्र विक्रय करने का
... समझ में नहीं आता। उसने भगवान् का
वस्त्र सिंहल के गौरव स्वरूप बेचने का
ने पादांकित वस्त्र के स्थान
वस्त्र लाया । कल्हण ने
। सूर्य की उपासना आर्य
। सूर्य की उपासना का
। यमुपदेव वस्त्र भी
सिंहल में तैयार होता था। हिन्दू धर्म का प्रतीक
सूर्य तथा बुद्ध का प्रतीक चरण दोनों से अंकित
वस्त्र बनते थे ।
गया में चरण पादुका पर पूजा होती है ।
दिल्ली में कुतुब मीनार स्थान का नाम विष्णु पद
पर्वत था । मन्दिर विष्णु का था । हिन्दुओं में
पादुका पूजा एवं चरण पूजा का विशेष महत्त्व है ।
प्रत्येक मन्दिर में चरणपादुका पत्थर पर बनी
होती है । उस पर पुष्प, दक्षिणादि चढाया जाता
है। बौद्धों में भी हिन्दुओं की देखादेखी चरण
पूजा प्रारम्भ हो गयी थी । बौद्ध मन्दिर में भी
चरण पादुका रखी जाने लगी ।
राजा मिहिरकुल ने बौद्धो के इस प्रचार प्रकार
को, हैंमपादांकित वस्त्र के स्थान पर अपने अभि-
यान के फलस्वरूप यमुपदेव हिन्दुओं के प्रतीक
चिन्ह को मान्यता दिया । सिंहल राजा पादांकित
वस्त्र की यह कल्पना सर्वथा ठीक नही उतरती । वे
पद के शौर्य तथा पद की पवित्रता के महत्त्व को
भूल गये होगे ।
कल्हण यहां कंचुकी के मुख से कहलाता है
कि सिंहल राज के पद का अंकित वस्त्र था ।
कंचुकी का अन्तःपुर में स्थान एक पार्षद का था ।
वह वृद्ध रूप में सर्वदा एवं सर्वत्र चित्रित किया
है । वह नारद का भी कार्य करता चित्रित किया
गया । राजा के क्रोध को देखकर परिहास किंवा
राजा की चाटुकारिता के लिये 'पद' देख कर दो
राजाओं में लडाई हो जाय, कटुता बडे इस प्रयो-
जन से सिंहलराज का नाम ले लिया होगा ।
सिंहल का वह वस्त्र था । यह सब जानते थे ।
सब प्रयोग करते थे । किसी ने पद की ओर ध्यान
भी नहीं दिया होगा । यदि कभी किसी ने जिज्ञासा
की भी होगी तो सिंहल के व्यापारी भगवान्
का पद है कह दिये होंगे ।
कंचुकी को तुरन्त उत्तर देना था । परिहास
एवं पिशुनता के कारण सिंहल के राजा के वस्त्र

३०० राजतरंगिणी
स जातु देवीं संवीतसिंहलांशुककञ्चुकम् ।
हैमपादाङ्कितकुचां दृष्ट्वा जज्वल मन्युना ॥ २९४ ॥
२९४. किसी समय रानी को 'हैमपादांकित' सिंहल देशीय कंचुकी धारण किये देखकर,
जिसका अंकित पद रानी के कुच पर पड़ता था, वह क्रोध से प्रज्वलित हो उठा।

२५९:२४) पार्वती के शाप के कारण मृत्यु लोक में
इसने मनुष्य योनि प्राप्त की थी। बेताल की
भक्ति देखकर शिव एवं पार्वती भी महेश एवं
शारदा नाम से पृथ्वी पर अवतीर्ण हुए थे। (शिव०
शत १४)।
कालिका पुराण में बेताल के भाई का नाम
भैरव दिया गया है। वे राजा चन्द्रशेखर तथा रानी
तारा के पुत्र थे। वे पूर्व जन्म में भृङ्गी एवं महा-
काल नामक शिवदूत थे। भृङ्गी बेताल हुआ था।
महाकाल ने भैरव का रूप लिया था। कामाख्या
देवी की उपासना द्वारा उन्हें शिव गणों का नेतृत्व
प्राप्त हुआ था। इनके वंशजों को 'वैताल वंश'
कहते हैं। वैताल जननी स्कन्द की एक अनुचर
मातृका थी। (म० शा० ४५:१३) प्रेत का एक
प्रकार भी बेताल कहा जाता है। शव पर अधिकार
कर लेता है।
पाठभेद :
श्लोक संख्या २९४ में 'सिंहलां' का 'सिङ्घाल
द्वीप' तथा 'हैम' का पाठभेद 'हेम' मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
२९४ (१) हेमपादांकित : कंचुकी महि
लायें पहनती हैं। पुराने समय में चोली पहनती थीं।
स्तन के भीतर से रूमाल और आजकल पेटी कोट
से कसती हैं। उसपर कंचुकी अथवा चोली या
जंपर पहनती हैं। कुच स्थान पर किमी पुष्प
गोलाकार आकृति किया कुछ न कुछ बेल बूटा
बना देती हैं। इसी प्रकार स्वर्ण पाद अंकित चिन्ह
कुच स्थल पर बन जाता था।
आज कल भी बेल-बूटों में उँगलियां, हाथ,
पंजा, मुखाकृत, मनुष्याकृति, पशु पक्षी की आकृति,
बनायी जाती हैं। कुछ इसी प्रकार का स्वर्ण जरी
का ब्लाउज कंचुकी अथवा चोली का कपड़ा उन
दिनों श्री लंका किंवा सिंहल में बनता रहा होगा।
इस वर्णन से एक बात का और पता लगता
है। सिंहल से कश्मीर का व्यापार होता था। सिंहल
के व्यापारी कश्मीर तथा कश्मीर के व्यापारी सिंहल
को वस्तुओं का व्यापार करते थे। अन्यथा श्रीनगर
से श्री लंका अथवा सिंहल दो हजार मिल दूर पड़ता
है। वहाँ का वस्त्र कैसे कश्मीर में उपलब्ध हो
सकता है। निःसन्देह मिहिरकुल तथा प्राचीन काल
मे कश्मीर का व्यापार समृद्ध था। कश्मीर में भारत
के कोने कोने से व्यापारी आते थे और कश्मीर से
भी चारों ओर जाते रहे होंगे।
पादांकित शब्द एक अनुमान की ओर अनायास
ले जाता है। मिहिरकुल के समय मे सिंहल के
सभी लोग बुद्धमतावलम्बी हो चुके थे। आज भी
वे बौद्ध हैं। सिंहल अर्थात् श्री लंका मे आदम पीक
अर्थात् शिखर है। उस पर चरण चिन्ह है:
बौद्ध उसे बुद्ध, हिन्दू विष्णु तथा ईसाई महात्मा
आदम का चरण चिन्ह मानते हैं। बाइबिल गाथा
के अनुसार वे मानवों के आदि पुरुष थे। उन्ही से
जगत् के मानवों की सन्तति हुई है। वे चाहे
आज विभिन्न वर्ण, रूप, जाति एवं भाषाभाषी
क्यों न हों।
वैष्णव बैरागी लोग रामनामी ओढ़ते हैं।
वह कई प्रकार की होती हैं। किसी पर राम,
किसी पर शिव का नाम छुपा रहता है। इसी
प्रकार भगवान् विष्णु का यह चिन्ह, शंख, गदा,
चक्र तथा पद्म भी छपे रहते हैं। ललाट बाहु
हृदय पर विष्णु पद छाप चन्दन, कस्तूरी, रोरी

तथा गोपी चन्दन से लगवाते है। अनेक भक्त
उनका गुदना गुदवा लेते हैं।
पैर का चिन्ह वस्त्र पर छपवाने का कोई
तुक नहीं मालूम होता। वह मनुष्य पादांकित
वस्तु अपवित्र मानी जायगी। यह सम्भव नही था
कि तत्कालीन हिन्दू किंवा बौद्ध जनता पादांकित
वस्त्र अपनो महिलाओं से हृदय पर धारण करवाती।
मै समझता हूँ। सिंहल भगवान् के पद
चिन्ह के कारण तीर्थ था। उसे देखने तथा
पूजा करने के लिए हिन्दू तथा बौद्ध दोनों जाते
थे। भगवान् का पद पवित्र था। अतएव
उसे वस्त्र पर स्वर्ण सूत्र अर्थात् जरी से अंकित
कर दिया जाता था। उसी प्रकार शिव विष्ण
के शंख, चक्र, गदा, पद्म, त्रिशूल वस्त्रों, उत्तरीय
आदि पर अंकित कर दिये जाते हैं। सिंहल का
यही पादांकित वस्त्र कश्मीर मे आया रहा होगा।
किन्तु कल्हण यहाँ 'राजा' शब्द पादांकित के
लिए प्रयोग करता है। उसका स्पष्ट अर्थ राजा
का पद है। यहाँ पर दो बातें सम्भव हो सकती
हैं। मिहिरकुल बौद्ध धर्म विरोधी था। वह शिव
भक्त था। उसने यदि जाना होगा कि उसको
हृदयेश्वरी हृदय पर बुद्ध पादांकित वस्त्र पति के
शिव भक्त होते हुए भी धारणा करती है, तो वह
क्रोधित हो उठा होगा। वह सिंहल राज के इस
धर्म प्रचार को बुरा मानकर उसे दण्ड देने के
अपने उप स्वभावानुकूल अभियान किया होगा।
सिंहलराज के पादांकित वस्त्र विक्रय करने का
कुछ अर्थ समझ में नही आता। उसने भगवान् का
पादांकित वस्त्र सिंहल के गौरव स्वरूप बेचने का
प्रयास किया।
मिहिरकुल ने पादांकित वस्त्र के स्थान
पर यमुपदेव वस्त्र लाया। कल्हण ने
उल्लेख किया है। सूर्य की उपासना आर्य
धर्मावलम्बी करते है। सूर्य की उपासना का
स्थान बौद्ध धर्म में नहीं है। यमुपदेव वस्त्र भी
सिंहल में तैयार होता था। हिन्दू धर्म का प्रतीक
सूर्य तथा बुद्ध का प्रतीक चरण दोनों से अंकित
वस्त्र बनते थे।
गया में चरण पादुका पर पूजा होती है।
दिल्ली में कुतुब मीनार स्थान का नाम विष्णु पद
पर्वत था। मन्दिर विष्णु का था। हिन्दुओं में
पादुका पूजा एवं चरण पूजा का विशेष महत्त्व है।
प्रत्येक मन्दिर में चरणपादुका पत्थर पर बनी
होती है। उस पर पुष्प, दक्षिणादि चढ़ाया जाता
है। बौद्धों में भी हिन्दुओं की देखादेखी चरण
पूजा आरम्भ हो गयी थी। बौद्ध मन्दिर में भी
चरण पादुका रखी जाने लगी।
राजा मिहिरकुल ने बौद्धों के इस प्रचार प्रकार
को, हंसपादांकित वस्त्र के स्थान पर अपने अभि-
यान के फलस्वरूप यमुपदेव हिन्दुओं के प्रतीक
चिन्ह को मान्यता दिया। सिंहल राजा पादांकित
वस्त्र की यह कल्पना सर्वथा ठीक नही उतरती। वे
पद के तीर्थ तथा पद की पवित्रता के महत्त्व को
भूल गये होंगे।
कल्हण यहाँ कंचुकी के मुख से कहलाता है
कि सिंहल राज के पद का अंकित वस्त्र था।
कंचुकी का अन्तःपुर में स्थान एक पार्षद का था।
वह वृद्ध रूप में सर्वदा एवं सर्वत्र चित्रित किया
है। यह नारद का भी कार्य करता चित्रित किया
गया। राजा के क्रोध को देखकर परिणाम किया
राजा की चाटुकारिता के लिये 'पद' देख कर दो
राजाओं में लड़ाई हो जाय, कटुता बढ़े इस प्रयो-
जन से सिंहलराज का नाम ले लिया होगा।
सिंहल का वह वस्त्र था। यह सब जानते थे।
सब प्रयोग करते थे। किसी ने पद की ओर ध्यान
भी नहीं दिया होगा। यदि कभी किसी ने जिज्ञासा
की ना होगी तो सिंहल के व्यापारी भगवान्
का पद है यह दिये होंगे।
कंचुकी को तुरन्त उत्तर देना था। परिहास
एवं विदूषकता के कारण सिंहल के राजा के वस्त्र

३०२ राजतरंगिणी

में सिंहलराज के अतिरिक्त और किस का पद
हो सकता है। इस विचार से अनायास सिंहलराज
का हेमांकित पद कह दिया । राजा मिहिरकुल के
उग्र स्वभाव को देखकर किसी को प्रतिवाद करने
का साहस न हुआ होगा ।
सिंहल का प्राचीन नाम श्री लंका तथा अर्वा-
चीन नाम सिलोन है। अरबो ने इसका नाम
'सैलान' रखा था। अंग्रेजों ने उसी सैलान नाम के
आधार पर इसे सीलोन कहना आरम्भ किया
और अन्तर्राष्ट्रीय जगत् में यही नाम प्रचलित
हो गया ।
सिंहल में रावण की ख्याति एक वैद्य तथा
विद्वान् के रूप में है। विभीषण की मान्यता देवता
तुल्य है। श्रीलंका में अशोक वाटिका आज भी
है। उसकी पुरानी राजधानी का नाम 'सीता यक'
है। विजय सिंह गुजरात से श्री लंका गये थे।
अतएव उनके नाम पर सिंहल नाम पड़ने की
एक गाथा है।'
प्राचीन समय में भगवान् बुद्ध की प्रतिम'
नही बनती थी। उनके श्रीपद ही की पूजा होती
थी। यह पद सीधा है। साधारण मनुष्यों का
पद किंचित् घुमा हुआ रहता है। पद चिन्ह में
महापुरुषों के लक्षण है।
श्री लंका में प्राचीन भित्तिचित्रों मे कंचुकी के
स्थान पर गोलाकार वृत्त बने दिखाये गये हैं।
यह वृत्ताकार चिन्ह बौद्ध जगत् का तथा धर्म
चक्र प्रवर्तन का प्रतीक है। सम्भव है। भगवान् का
चरण हृदय देश पर स्थित रहे अतएव हेम पादांकित
चिन्ह वक्षस्थल पर कंचुकी में बनाया जाता रहा
होगा। हेम शब्द यहाँ महत्त्व रखता है। क्योकि
भगवान् का वर्ण स्वर्ण अर्थात् हेम तुल्य था।
कश्मीर के इतिहास तथा उसके स्थानों पर
जिस प्रकार मुसलमानो धार्मिक रंग चढाने का
प्रयास किया गया है उसी प्रकार श्रीपाद पर्वत
पर भी हिन्दू तथा बौद्ध परम्पराओ पर परदा
डाल कर उसे मुस्लिम धार्मिक सांचा में ढालने
का प्रयास किया गया है।
श्रीशंकराचार्य पर्वत का नाम जिस प्रकार
कश्मीर में तख्ते सुलेमान दे दिया गया है।
वही प्रक्रिया श्री लंका में श्रीपाद पर्वत के साथ
हुई। उसका नाम बाबा आदम की चोटी तथा
पोह का नाम 'सोह खिज्र' रख दिया है।
श्रीपाद पर पहुँचने वाले रास्तो का कुल
नाम बदल कर एक मार्ग को 'बाबा आदम' तथा
दूसरा 'मामा' (होवा) नाम रख दिया गया है।
श्रीपाद तक पहुँचने के लिए श्री लंका के राजाओ
ने लोहे की सिकड़ी अथवा जंजीरें लगवा दी थी।
यात्री उन्हें पकड़कर श्रीपाद तक पहुँचता है। उसे
सिकन्दर का लगवाया प्रसिद्ध किया गया ।
प्रसिद्ध ईरानी कवि अशरफ ने अपने ग्रन्थ
सिकन्दरनामा में लिखा है कि सिकन्दर जब लंका
पहुँचा तो जंजीरो को आदम के कदम तक पहुँचने
के लिए लगवा दिया था ।
इब्नबतूता एक कदम और आगे बढ़ जाता
है। वह कहता है द्वार सिकन्दर का निर्माण कराया
हुआ है। यहाँ पर लाल गुलाब का फूल हथेली भर
का होता है। उस पर 'अल्लाह और 'मुहम्मद' का
नाम प्रकृति ने स्वयं लिख दिया है। जंजीर का भी
नामकरण कर दिया गया है। दसवी जंजीर को
जंजीरे शहादत की संज्ञा दे दी गयी है। दसवी
जंजीर से सोह खिज्र तक की दूरी दस मील
है। उसमें एक स्रोत है। उस स्रोत को हज़रत
खिज्र से सम्बन्धित कर दिया गया है। जंजीर
शहादत पकड़ने पर 'कलम शहादत' पढ़ने की
हिदायत की गयी है।
इब्नबतूता ने चरण चिन्ह का परिमाण
ग्यारह बालिश्त और सुलेमान सौदागर ने सत्तर
हाथ लम्बा बताया है। इसका स्पष्टीकरण इस
प्रकार किया है कि मन की भावना के अनुसार
वह किसी को बालिश्तों में और किसी को हाथो

प्रथम तरंग
३०३


[बायाँ स्तम्भ]

में बहुत लम्बा और छोटा दिखाई देता है। यह सब वास्तविक इतिहास पर दूसरा रंग चढ़ाने के लिए किया गया है।

यह तथ्य है कि सिकन्दर कभी लंका में पैर भी नहीं रखा था। वह ईसा पूर्व ३२७ वर्ष में भारत आया और सिन्ध के मार्ग से अपने देश की ओर लौट गया और मार्ग में ही उसका देहावसान सूसा में हो गया। हजरत खिज्र का पैगम्बर मुहम्मद के बहुत बाद का है। पैगम्बर साहब का जन्म ही सन् ५७० ई० में हुआ था।

श्रीपाद पर्वत का अस्तित्व हजरत शिख्र के जन्म से हजारों वर्ष पूर्व था। बौद्ध धर्म अशोक के काल अर्थात् ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में पहुँच चुका था। देश बौद्ध हो चुका था।

श्रीपाद श्री लंका का श्रेष्ठ पूजनीय स्थान था। श्रीपाद धर्म चिन्ह था। सिंहल के हेमांकित पाद-चिन्ह वस्त्र का वही अर्थ था कि वह वस्त्र जहां जाता था वह भगवान् बुद्ध के पद चिन्ह के कारण रामनामी वस्त्र के समान पवित्र तथा श्रेष्ठ माना जाता था। पाद चिन्ह का इतना महत्त्व था कि उसे विश्व में चार स्थानों में बौद्धों ने माना है। जहाँ भगवान् बुद्ध ने अपना पद रखा था। यद्यपि यह भी सत्य है कि भगवान् बुद्ध अपने भौतिक जीवन काल में मध्य देश से कभी बाहर नहीं गये। श्री लंका तो भारत के बाहर था। पाद चिन्ह के विषय में कहा गया है। एक पाद चिन्ह नर्मदा के तट पर था। दूसरा सत्य, वध्य पर्वत की चोटी पर था। तीसरा श्रीलंका में कूट पर था। चौथा यवन देश में था। बुद्ध जगत् निम्नलिखित पद पढ़कर चरण चिन्ह की वन्दना करता है।

यं नम्मदाय नदिया पुलिने च तीरे
यं सच्चयद्धगिरिके सुमनां च लग्गे।
यं तथ्य यौनक पुरे सुनिनीं च पादं,
तं पाद लच्छनमहं सिरसा नमामि ॥


[दायाँ स्तम्भ]

सुमन कूट पर श्रीपाद है। पवनपुर में चौथे श्रीपाद का होना कहा गया है। मैंने बहुत वृद्ध भिक्षुओं से पूछा। उनका कहना है कि चौथा पाद मक्का में था। काबा जिसे बुतखान कहा गया है वह वास्तव में बुद्ध स्थान था। वहाँ सैकड़ो से ऊपर मूर्तियां थी। बुत शब्द बुद्ध का अपभ्रंश है। यह अब प्रमाणित हो चुका है कि बुद्ध शब्द का बुत अपभ्रंश है। काबा में ३०० से ऊपर मूर्तियाँ थी। सबकी पूजा होती थी। इस विवाद में न पड़ कर यही कहना अलम् होगा कि मिहिरकुल के समय तक बौद्धधर्म भारत तथा बाहर था। श्रीपाद का हेम पादांकित रूप पूज्य था। क्योकि उस समय बुद्ध प्रतिमा की पूजा प्रचलित नही थी।

सुमनकूट पहुँचने के लिये हेटन पहुंचना चाहिए। हेटन से मसकेलिय जाना पड़ता है। वहाँ से ११ मील दूर पड़ता है। मसकेलिय से श्रीपाद पर्वत दिखाई पड़ता है। शिखर पर पहुंचने पर चट्टान काटकर सीढ़ियाँ बनायी गयी है। जंजीर तथा धड़ पकड़कर श्रीपाद तक पहुँचते हैं।

श्रीपाद के समीप सुमन देव का मन्दिर है। यह स्थान समुद्र की सतह से ७३६० फिट ऊंचाई पर है। भगवान् सुमन देव की प्रार्थना पर तीसरी बार लंका आये थे।, सुमन कुटी पर उनका आगमन हुआ। यहाँ पर वैशाख पूर्णिमा के दिन अपराह्न काल में अपने वाम पद का चिन्ह अंकित किया था। (सुमन्त कूट वर्णना ७७९) इस पाद की महिमा में सुमन्त कूट वर्णना में कहा गया है—'ऐसे द्वेष रिपुरहित मनुष्यों के हित-साधक उस धर्मराज ने लंका की लक्ष्मी के रम्य सुमनगिरि पर जिस-जिस चरण चिन्ह को दिया वह चित्त मात्र के प्रसन्न होने से तुम्हे बुद्ध के समान स्वर्गापवर्ग देगा। अतएव हे लोगो ! प्रसन्न मन होकर सज्जनो से प्रशंसित उसे नमन करो। उसकी पूजा करो।'

उसकी महत्ता का वर्णन उसी ग्रन्थ में और किया गया है —वहाँ सर्वदा वृक्ष एवं लताएं नत

An accurate line-by-line transcription of the page:

३०४ राजतरंगिणी
सिंहलेषु नरेन्द्राह्रिमुद्राङ्कः क्रियते पटः ।
इति कञ्चुकिना पृष्टेनोक्तो यात्रामरात्ततः ॥ २६५ ॥
२६५. जिज्ञासा पर कंचुकी ने बताया 'सिंहल में बने वस्त्र पर राजा का पद चिन्ह अंकित
किया जाता है।'— राजा ने अभियान का आदेश दिया।
तत्सेनाकुम्भिदानाम्भोनिस्सङ्गाकृतसंगमः ।
यमुनालिङ्गनप्रीतिं प्रपेदे दक्षिणार्णवः ॥ २६६ ॥
२६६. उसकी सेना के गजों के गण्डस्थल से उद्भूत मद धार मिलन से दक्षिण समुद्र ने
यमुना' मिलन सुख का अनुभव किया।


[बायाँ स्तम्भ / Left Column]

मस्तक श्रीपाद का नमस्कार करती है। उस पर्वत
पर जहाँ पदचिन्ह है, मनुष्यसंकुल होने पर भी स्थान
हो जाता है। जब एकत्रित मनुष्य पूजा कर निकलते
हैं तो उस पवित्र चरण चिन्ह को मेघ धो डालते
हैं।'
प्रामाणिक रूप से यह मान्यता है कि श्रीपाद
५ फिट लम्बा है। वह स्पष्ट नहीं है। केवल लम्बा
गड्ढा मालूम पड़ता है। राजा निःशंक मल्ल ( सन्
११९३-१२०७ ) श्रीपाद को एक बड़े शिला खण्ड से
ढकवा दिया था। ढके पत्थर पर नवीन चिन्ह मूल
के समान बनवा दिया गया। स्थान छाया हुआ है।
समीप ही पुष्पासन है। वहाँ पूजा निमित्त पुष्पांजलि
दी जाती है। श्रीपाद इस समय सिमेण्ट की रेलिंग से
घेर दिया गया है। वह स्थान समुद्र तट से ६५ मील
दूर है। नव मिल दूर से ७३६४ फिट की ऊँची
चढ़ाई चढ़नी पड़ती है। मार्ग घने वन श्री से होकर
जाता है। मार्ग में धर्मशालाएँ बनी हैं। छः मिल
तक मूल शिखर दिखाई नहीं पड़ता। तीन मिलकी
चढ़ाई शेष रह जाने पर श्रीपाद शिखर का दर्शन
होता है। तत्पश्चात् सीधी चढ़ाई पड़ती है। पहाड़ काट
कर सीढ़ियाँ बनायी गयी हैं। सीढ़ियों के पश्चात्
जंजीरों का सहारा लेना पड़ता है। जंजीरों तक
पहुँचने के पूर्व यात्री को खूब समझा दिया जाता है
कि वह नीचे की ओर न देखे। नीचे देखने पर
भयंकर खाई मालूम पड़ती है। मस्तक घूमने लगता
है। किंचित् मात्र पैर फिसलने पर शरीर का पता


[दायाँ स्तम्भ / Right Column]

नहीं चलेगा : सब कुछ चकनाचूर हो जायगा। इसके
पश्चात् ४० फिट ऊँची लोहे की सीढ़ी है। इसके
पश्चात् श्रीपाद का चबूतरा मिलता है। मैं श्री लंका
की यात्रा दो बार कर चुका हूँ। मेरा निश्चित मत
है कि कल्हण वर्णित पाद हेमांकित चिन्ह इस श्रीपाद
का प्रतीक था जो कंचुकी पर इस प्रकार बनाया
जाता था कि वह हृदय स्थल पर भगवान् का पद
स्पर्श करता है।
पाठभेद :
श्लोक संख्या २६५ में 'नोक्तो' का 'नोक्ता'
तथा 'मदात्ततः' का 'मधात्ततः' पाठभेद मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
२९५ ( १ ) कंचुकी : इसका शाब्दिक अर्थ
चोली, अंगिया स्त्री लिंग रूप में तथा पुंलिंग रूप में
अन्तःपुर रक्षक, द्वारपाल, रनिवास में दास दासियों
का अध्यक्ष माना गया है। अन्तःपुर के राज्य
अधिकारियों में इसका बड़ा महत्त्व रहा है। संस्कृत
नाटकों में यह पात्र विशेष रूप से चित्रित किया
गया है। राजाओं के गार्हस्थ्य जीवन के स्वरूप को
प्रकट करता है।
२९६ ( १ ) यमुना : गंगा-यमुना का प्रायः
एक साथ वर्णन मिलता है। गंगा का जल उज्ज्वल
तथा यमुना का नीला माना गया है। और है भी।
इसका स्पष्ट दर्शन प्रयाग संगम पर मिलता है। जहाँ
यमुना तथा गंगा का जल आकर मिलता है। यहाँ

प्रथम तरंग ३०५
दोनों जलों में भिन्नता प्रकट होती है। संगम के
पश्चात् काशी पहुँचने पर गंगा जल उतना उज्ज्वल
नहीं रह जाता, जितना हरद्वार तथा प्रयाग में दिखाई
देता है। हरद्वार से प्रयाग तक गंगा की धारा में
तेजी रहती है। प्रयाग के पश्चात् वेग का लोप हो
जाता है। स्थिरता आती है।
हिमालय से गंगा तथा यमुना दोनों नदियाँ
निकलती हैं। दोनों का जल सदृश होना चाहिए।
परन्तु भिन्नता दिखाई पड़ती है। इस पर कुछ
प्रकाश डालना आवश्यक है।
गंगा में हरद्वार से प्रयाग तक मिलने वाली
सब नदियों का स्रोत हिमालय है। सब हिमालय का
जल लाकर गंगा में डालती हैं। अतएव गंगा का
जल एक ही हिमालय एवं हिम गलने के कारण एक
रूप रहता है।
यमुना के साथ ठीक उलटी बात होती है।
यमुना में मिलने वाली सब नदियाँ विन्ध्याचल,
अरावली आदि से निकलती हैं। दक्षिण दिशा किंवा
दक्षिण पथ से आकर यमुना में मिलती हैं। वे मैदानी
क्षेत्र तथा विन्ध्य के उज्ज्वल वर्ण हीन पत्थरों का
टकराया हुआ जल यमुना में लाती हैं। यमुना का
जल हिमानी, हिम गलन उसके स्रोत के पश्चात्
पुनः उसमें नहीं आता। किन्तु गंगा का जल हिमालय
पर्वत के पत्थरों से, जो अपेक्षाकृत विन्ध्य के पत्थरों
से अधिक उज्ज्वल हैं, टकराता बलुई भूमि से बहता
आता है। वह अपनी उज्ज्वलता स्थिर रखता है।
यमुना में आनेवाला जल दक्षिण की नदियों
का जल है। ये नदियाँ बलुई भूमि से न होकर कुछ
काली मिट्टी से बहती आती हैं। वह मिट्टी लसदार
होती है। वह उत्तर प्रदेश के गंगा और हिमालय के
मध्य भागोय क्षेत्र की मिट्टी की तरह भूरी तथा
बलुआ नहीं है। स्पर्शस्पर्श एवं भौगोलिक स्थिति
के कारण जल के रूप में परिवर्तन हो जाता है।
जैसे एक ही पिता के दो पुत्र एक ही वर्ण एवं रूप
के होते हुए भी यदि एक रूस में तथा दूसरा कांगो
अथवा मद्रास में निवास करे तो कुछ समयपश्चात्
दोनों के वर्ण में अन्तर पड़ जायगा। एक अधिक
शीत के कारण गोरा ही रहेगा। दूसरा अल्पाधिक
गरमी के कारण झाँवर होता जायगा। यही बात
गंगा तथा यमुना के जलों के विषय में कही जा
सकती है।
सिंहल (श्रीलंका) तथा भारत अर्थात् रामेश्वर
के बीच मनार की खाड़ी है। दोनों के मध्य पतला
समुद्र भाग है जो भारत तथा सिंहल को अलग
करता है। भगवान् रामचन्द्र ने पम्बन के पास सेतु
बाँधा था। रामेश्वर का मन्दिर तथा स्थान पम्बन
सेतु पार कर जाना पड़ता है। पम्बन से धनुषकोटि
तथा रामेश्वर दो तरफ रेलवे लाइन गयी हैं।
धनुषकोटि तथा रामेश्वर एक द्वीप पर हैं। धनुषकोटि
से आज भी जहाज तथा नावें श्री लंका को
जाती हैं।
सन् १९६४-१९६७ ई० भारतीय नौपरिवहन
मण्डल के अध्यक्ष होने के कारण मैं यहाँ कई बार
आ चुका हूँ। सेतुम् समुद्र एक विशाल योजना
है। उसके द्वारा बड़े जहाजों को भारतीय समुद्र में
होकर आवागमन के लिये नहर बनाने की योजना
है। इस समय जहाज भारत के पश्चिमी तट से
पूर्वीय तट पर आने के लिये श्री लंका की परिक्रमा
करते हैं। इस योजना के बनने पर ये सीधे भारतीय
क्षेत्रीय जल सीमा के अन्दर ही पूर्व से पश्चिम
तथा पश्चिमी से पूर्वीय तट पर पहुँच जायेंगे। लगभग
४०० मील की लम्बी यात्रा बच जायगी।
उस समय मैंने यहाँ की भौगोलिक स्थिति
आदि का विशेष अध्ययन किया। निस्सन्देह मिहिर-
कुल धनुषकोटि अंचल पर अपना शिविर लगाया
होगा। यहीं से सबसे संकीर्ण समुद्र पार करने का
मार्ग हैं।
समुद्र का जल यदि शीशे के गिलास में रख दिया
जाय तो वह उतना नीला नहीं लगेगा। जल को
गहराई, समुद्र अथवा नदी में जल का बाहरी
१९

३०६. राजतरंगिणी:
स सिंहलेन्द्रेण समं संरम्भादुदपाटयत् ।
चिरेण चरणस्पृष्टप्रियालोकनरूजां रुषम् ॥ २९७ ॥
२९७. उसने सिंहल नरेश को पदाक्रान्त करने तथा हेम पादांकित प्रिया के कंचुकी द्वारा
उद्भूत क्रोध को शान्त किया ।
दूरात्तत्सैन्यमालोक्य लङ्कासौधैर्निशाचराः ।
भूयोऽपि राघवोद्योगमाशङ्क्य प्रचकाम्परे ॥ २९८ ॥
२९८. जब लंका के सौधों से निशाचरों ने उसकी सेना का दूर से ही अवलोकन किया, तो
'राघव' के आक्रमण की पुनः आशंका हुई ।

रूप तथा वर्ण बनाती है । हवाई जहाज में यात्रा
करने पर यह बात स्पष्ट दिखायी पड़ती है । तट-
वर्ती समुद्र का पानी भूरा तथा गदला लगेगा ।
तट से जितना ही दूर जाय, उतना ही जल का
रंग गाढा नीला हो जायेगा । समुद्र में जहाँ
नदियां आकर मिलती हैं वहां दो तीन मील
तक का जल गदला रहता है । गंगा सागर के
पास यह बड़ी अच्छी तरह दिखाई देता है । प्रशान्त,
अटलांटिक महासागर, तथा भूमध्य महासागर का
जल अत्यन्त नीला मिलेगा । इसी प्रकार बंगाल
की खाड़ी के मध्य पहुँचने पर भी जल की नीलिमा
बढ़ जाती है । तटवर्तीय जल होने के कारण समुद्री
जल का वर्णन नीलजा यमुना के जल के समीप
रंग रूप में पहुँच जाता है ।
कल्हण ने बड़ी ही उत्तम उपमा यहां दी है ।
नील समुद्र में नीलजा का जल मिलना प्रिय
तथा प्रिय के मिलन तुल्य है । नील जल युक्त
समुद्र पुल्लिंग है और नील जल के साथ नीलजा
अर्थात् यमुना स्त्रीलिंग है । नर-नारी का मिलन
ही प्रेम है । वही काम की चरम सीमा है । निस्सन्देह
कल्हण की उपमा की जितनी प्रशंसा की जाय वह
थोड़ी मानी जायगी ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या २९७ में 'रुषम्' का पाठभेद
'दृशम्' मिलता है ।

पादटिप्पणियाँ :
२९७ (१) सिंहल आक्रमण : मुजम्मुल तुल
तवारीख में लगभग इसी प्रकार का वर्णन दिया गया
है । कश्मीर के एक राजा ने सिंघ पर आक्रमण किया
था । कश्मीर के राजा का नाम नहीं दिया है ।
सिंघराज हाल ने मिहिरकुल को सन्धि करने
के लिए बाध्य कर दिया था ।
(२) क्रोध : कल्हण यहां दोनों क्रोधों की
शान्ति का उल्लेख करता है । प्रथम क्रोध हेम-
पादांकित कंचुकी देखने के कारण उसमें उत्पन्न
हुआ था । दूसरे क्रोध का उदय सिंहल आक्रमण काल
में शत्रु को पराजित करने के लिए हुआ था ।
सिंहल विजय के कारण हेम पादांकित वस्त्र के
स्थान पर यमुपदेव वस्त्र प्राप्त किया था । इस
प्रकार उसके प्रथम क्रोध की शान्ति हुई । दूसरे
क्रोध की शान्ति सिंहलराज को सिंहासन च्युत
कर किया था ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या २९८ में 'सौधैर्न' का पाठ-
भेद 'सौधान्नि' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
२९८ (१) राघव : यहा पर राघव शब्द भग-
वान् श्री रामचन्द्र जी के लिये आया है । श्री लंका
पर ऐतिहासिक किंवा गाथा के आधार पर सर्व
प्रथम श्री राम की सेना ने सफल आक्रमण कर
विजय प्राप्त की थी ।

[पृष्ठ शीर्ष]
प्रथम तरंग
३०७

[बायाँ स्तम्भ]
कल्हण मिहिरकुल के लंका आक्रमण की तुलना
भगवान् श्री राम के आक्रमण से करता है। लंका
पति रावण से राम की सेना देखकर भयग्रस्त
राक्षसों ने संवाद कहा था। अन्धकारमय भविष्य
कहा था। राम की सेना से उत्पन्न भय कहा था।
यही अवस्था मिहिरकुल की सेना देखकर राक्षसों
की हुई थी। वे भयभीत हो गये थे।
(२) सौध से सेना अवलोकन : लंका
का जैसा सर्वनाश बन्दरो तथा राम की सेना द्वारा
हुआ था। कहीं उसी की पुनरावृत्ति न हो जाय।
इसे स्मरण कर लंका वासी आशंकित हो गये थे।
लंका के सौधों अर्थात् प्रासादों से उन्होंने
मिहिरकुल की सेना देखी। इसी प्रकार सेना देखने
का वर्णन वाल्मीकि ने रामायण में किया है।
'लंका सौध से सेना अवलोकन क्या सम्भव
था ?' प्रश्न उपस्थित होता है। क्या भारतीय तट
पर पड़ी सेना लंका के सौधों से रामायण तथा
मिहिरकुल काल में देखी जा सकती थी। मैं इसका
यही उत्तर दे सकता हूँ कि यह सम्भव था।
मण्डपम स्टेशन से रेलगाड़ी रामेश्वर द्वीप की
ओर बढ़ती है तो बीच में सागर मिलता है। यह
बंगाल की खाड़ी तथा मन्नार की खाड़ी के जल
को मिलाता है। जल डमरूमध्य है। इस पर
लम्बा रेलवे का पुल बना है। रेल गाड़ी बहुत धीरे
धीरे चलती है।
समुद्र का जल जिस दिन भाटा के कारण
नीचे आ जाता है तो लहरें नहीं उठतीं। जल
स्थिर हो जाता है। यही समय है। जब निश्चय
किया जा सकता है कि भारतीय भूखण्ड और
पम्बन को जोड़ने के लिए कभी सेतु वहाँ बाँधा
गया था या नही। ज्वार के समय जल बहुत
ऊपर उठ जाता है। पम्बन के पुल के नीचे वेग से
लहर उठती है।
मैने यही समय इस स्थान को देखने का
निश्चय किया। अपने साथ सिविल विभाग के
एक इंजीनियर को भी ले लिया।

[दायाँ स्तम्भ]
पहली वस्तु ध्यान आकर्षित करने वाली समुद्र
तल में पड़ी विशाल चट्टानें हैं। दोनों भूखण्डो
के मध्य विशाल शिलाखण्ड समुद्र तल में पड़े
हैं यह केवल वहीं मिलते हैं। समीप पर्वत
नही है। जहाँ से विशाल शिलाखण्ड लाया
जा सके।
यह शिला खण्ड इतने विशाल हैं कि
उन्हें मानवी शक्ति द्वारा उठाना सम्भव नही हैं।
उन्हें उठाने के लिये क्रेन अथवा कल्हण वर्णित
यन्त्र की आवश्यकता पड़ सकती है। वाल्मीकि
रामायण में उल्लेख मिलता है। नल तथा नील
तत्कालीन अभियन्ताओं के निरीक्षण में सेतु बाँधा
गया था। विशाल शिलाखण्ड बन्दर लाते थे और
समुद्र में छोड़ते थे। यन्त्र का प्रयोग किया गया था।
पम्बन पुल के मोचे के विशाल शिलाखण्ड और
कश्मीर के भूतेश्वर, मार्तण्ड, परिहासपुरादि में लगे
विशाल शिलाखण्डों को देखकर अनायास प्रश्न
उठता है। उनका लाना कैसे मानवीय शक्ति के
सामर्थ्य की बात हो सकती थी ?
कल्हण इसका उत्तर देता है। कल्हण ने शिला-
खण्डों को उठाने के लिए 'यन्त्र' शब्द का प्रयोग
किया है। यह यन्त्र क्रेन थे। वह स्पष्ट उपमा
देते हुए कहता है कि 'यन्त्र' से गिरे शिला
तुल्य, अर्थात् यन्त्र शिला को क्रेन की तरह
ऊपर उठाता था। वह किसी समय गिरती थी
तो राज्यच्युत होते राजा के समान उसे रोकना
कठिन था। यही बात क्रेन के सम्बन्ध में कही
जायगी। क्रेन से गिरते सामान को किसी प्रकार
भी रोका नहीं जा सकता। वह गिर कर
ही रहेगा।
रामायण ने इसका उत्तर बन्दरों की अलौकिक
शक्ति का वर्णन कर दिया है। इससे प्रतीत होता
है। प्राचीन काल में कश्मीर से रामेश्वरम् तक
'यन्त्र' अर्थात् क्रेन का शिलाओं के उठाने तथा
निर्माण कार्य में प्रयोग किया जाता था। यद्यपि वे क्रेन

३०८
राजतरंगिणी
आज के समान विद्युत भाप तथा मशीन परिचालित
नही थे। प्रारम्भ मे क्रेन भी हाथ से ही चलते थे।
कल्हण ने भी सेतु शब्द का उल्लेख शुद्ध सेतु के संदर्भ
में किया है। भगवान् राम निर्मित सेतु ठोस था
अथवा पावों पर बनाया गया था, स्वतः एक
गवेषणा का विषय है। जैसा कि गूढ़ सेतु के
सम्बन्ध में लिखा जा चुका है। विशेषज्ञों की
यह धारणा पुष्ट हो गयी है कि सेतु सम्भवतः ठोस
था। पाँवों पर नहीं बना था।
मुझे एक रोमन कैथोलिक आयरिश इंजिनी-
यर मिल गये। वे विश्व पर्यटन निमित्त निकले थे।
उन्हें भी स्थान देखकर कौतूहल हुआ। चर्चा प्रसंग में
उन्होंने कहा—'मैं रोमन कैथोलिक हूँ। बाइबिल
में विश्वास करता हूँ। रामायण की चाहे जो
गाथा हो। परन्तु मै इतना निश्चय रूप से कह
सकता हूँ। यह विशाल शिलाखण्ड यहाँ बाहर
से लाये गये थे। दोनो समुद्री तटों को सेतु से
जोड़ने का प्रयास किया गया था।' (वाल्मीकि
रामायण लंका काण्ड सर्ग २२ द्रष्टव्य है)
मैं हिन्दू हूँ। अतएव राम तथा राम गाथा पर
स्वभावतः विश्वास करता हूं। परन्तु अभियन्ताओं
का यह मत स्थिर हो चला है। किसी समय
यहा सेतु था। भारतीय भूखण्ड को रामेश्वर द्वीप
से मिलाता था।
वर्तमान सेतुबन्ध रामेश्वरम् मन्दिर का
स्थान दो हजार वर्ष से पुराना किसी भी प्रकार
नहीं हो सकता । अतएव निश्चयपूर्वक नहीं
कहा जा सकता। रामायण वर्णित रामेश्वर की
स्थापना किस स्थान पर की गयी थी। रामेश्वर
शब्द से स्पष्ट है। राम ने रामेश्वर की स्थापना
की थी। ईश्वर शब्द इस बात का द्योतक है कि
शिव की स्थापना भगवान् राम ने की थी।
उन्हों के नाम पर रामेश्वर शिवलिंग का नाम
रखा गया। कल्हण ने राजतरंगिणी में सर्वत्र शिव
मन्दिरों के लिए नाम के अन्त में ईश्वर या ईश
तथा विष्णु मन्दिर के लिये स्वामी शब्द का प्रयोग
किया था। यह नामकरण पद्धति समस्त भारत मे
प्रचलित हो गयी थी।
सेतुबन्ध शब्द से प्रतीत होता है कि रामेश्वर का
सेतुबन्ध ठोस था। इस सेतु को पार कर राम की
सेना लंका के समीप पहुँच गयी थी।
यदि धनुषकोटि के पास खड़ा हो कर देखा
जाय तो दूसरी ओर श्रीलंका का तट स्थान
धुंधला दृष्टिगोचर होगा। लंका और भारत के बीच
वह सबसे संकीर्ण स्थान है। दोनो के मध्य छिछला
जल है। उसमें कुछ द्वीपो की श्रृंखला मिलेगी जो
लंका और भारत के बीच है इस छिछले पानी के
कारण बंगाल की खाड़ी से अरब सागर जाने वाले
जहाज सरल और नजदीक के मार्ग से न जा कर
श्री लंका की परिक्रमा कर जाते हैं। इस संकीर्ण
स्थान को आज कल की प्रचलित भाषा में 'आदमस्
ब्रिज' कहते हैं। पूर्व काल मे रामेश्वरम् द्वीप से लंका
तट स्थान भूखण्ड से मिला रहा होगा।
मिहिरकुल की सेना सेतु किंवा नाव से श्री
लंका पहुंची थी या कोई और उपाय निकाला था।
इस विषय पर कल्हण शान्त है। रामायण का वर्णन
अधिक पूर्ण तथा विस्तार से वस्तु स्थिति पर प्रकाश
डालता है।
कल्हण ने स्वयं श्री लंका किंवा रामेश्वर की
यात्रा नहीं की थी। उसने पूर्व श्रुत अथवा किसी
पूर्व कृति पर अपना वर्णन लिखा है। यदि वह
रामेश्वरम् की यात्रा किया होता तो उसका वर्णन
अधिक सारगर्भित, पूर्ण और समुद्री दृश्यों के बखान
से भरा होता।
कल्हण ने केवल 'राघव' की सेना से उपमा
यहाँ दी है। श्री राम की सेना ने जहाँ शिविर
डाला था वहाँ मिहिरकुल की सेना का शिविर
पड़ना सम्भव तथा कठिन दोनो हो सकता है। इस
स्थान की भौगोलिक स्थिति में आमूल परिवर्तन हो
चुका है। साइक्लोन, रीण्ड डून तथा तूफानों से स्थान

प्रथमं तरंगं ३०६
[बायाँ स्तम्भ]
आक्रान्त रहता है। सन् १९६५ ई० के साइक्लोन में
पम्बन सेतु वह गया था। अनेक मकानों की छतें
साइक्लोनो में उड़ गयी थीं। भूमि कही समुद्र में धंस
गयी, कुछ लोप हो गयी, कुछ निकल आयी थी।
बड़े-बड़े वृक्ष जड़ से उखड़ कर तृण के समान उड़ गये
थे। अतएव लगभग दो हजार वर्ष पूर्व अथवा
रामायण काल में क्या भौगोलिक स्थिति थी। इस
पर स्वतः एक ग्रन्थ तैयार हो सकता है।
सबसे आश्चर्य जनक बात यहाँ के समुद्र तट
पर मीठा पानी मिलता है। श्री राम तथा मिहिर-
कुल की सेना के लिये जल की आवश्यकता पड़ी
होगी। यहाँ कोई नदी नहीं है। सरोवर नहीं है।
इस एक बात के अनुसन्धान में उलझन उत्पन्न कर
दी थी।
जिस समय मन्नार के गल्फ तथा बंगाल की
खाड़ी मिलाने के लिए ड्रिलिंग का कार्य नहर के
सर्वेक्षण के लिये आरम्भ हुआ तो दो बातें विशेष
महत्त्वपूर्ण मिलीं। जिनसे रामायण की सत्यता तथा
कल्हण के वर्णन का मेल खाता है।
समुद्र तट से २०० गज दूर पर ड्रिलिंग करते
समय जो पानी निकला वह मीठा था। मन्नार की
खाड़ी तथा उसके दूसरे तट बंगाल की खाड़ी तक के
मध्यवर्ती भूभाग में कहीं भी ३०० फिट गहराई तक
भूमि में पहाड़ अथवा चट्टानें नहीं मिली। बलुई भूमि
ही मिलती गयी। जल कही भी किंचित् मात्र खारा
नही मिला। इससे दो तथ्यों की पुष्टि होती है।
श्रीराम तथा मिहिरकुल की सेना को मीठा जल
समुद्र तट पर मिल गया था। वहाँ शिविर स्थापित
करने योग्य स्थान था। दूसरी बात भी प्रमाणित
होती है कि सेतु बंध के लिए शिलाखण्ड कहीं बाहर
से लाये गये थे। जो पम्बन सेतु के नीचे विशाल-
काय पड़े है। क्योंकि यहाँ भूमि के ऊपर तथा भूमि
के नीचे पत्थर नहीं मिलते।
मैने इस विषय में कोचीन बन्दरगाह के बनाने
वाले श्री वेंकटेश्वरम् मुख्य अभियन्ता जो इस समय
[दायाँ स्तम्भ]
सेतु समुद्रम् योजना में रामेश्वर में कार्य कर रहें हैं।
विस्तार से विचार विमर्श किया। उनका भी वही
मत है। किसी समय थी लंका तथा भारत में स्थल
तथा जल दोनों माध्यमों से आवागमन रहा।
कालान्तर में हजारो वर्ष के भूकम्पों साइक्लोन
समुद्र के तूफान के कारण यह भूमार्ग या तो समुद्र
गर्भ मे चला गया है, अथवा टूटा फूटा 'आदम ब्रिजस'
के रूप में उसकी छाया रूप वर्तमान है।
राघव तथा मिहिरकुल दोनों की सेनाओं का
शिविर लंका से बाहर था। उनके मध्य समुद्र था।
उसे ही देखकर राक्षसों को लंका पर आक्रमण का
भय, श्री राम की सेना को देखकर हुआ था। और
मिहिरकुल के समय उस आशंका की पुनरावृत्ति हुई।
समुद्र दोनों तटो के मध्य इतना संकीर्ण है कि
संका के सौधो अर्थात् प्रासाद किंवा उच्च स्थान से
भारतीय तट पर होती घटनायें, सेना का शिविर,
सेना का परिचालन तथा सेना का प्रकार देखा और
समझा जा सकता है।
मिहिरकुल ने किस प्रकार लंका पर आक्रमण
किया, युद्ध में क्या गति हुई ? युद्ध का क्या रूप
था ? इन सब महत्त्वपूर्ण घटनाओं तथा उनके वर्णन
के सर्वथा अभाव में कुछ तत्त्व'पूर्ण निश्चित अनुमान
लगाना कठिन है। वाल्मीकि लंका काण्ड (सर्ग
४,२०) द्रष्टव्य है।
रामेश्वर सेतुबन्ध के सम्बन्ध में रामायण का
उद्धरण यहाँ ठीक होगा। पत्थरों से जल स्थान पाट
दिया गया था। रामायण में कही ताखा अथवा
खम्भा बनाने का उल्लेख नहीं आता। वहाँ यही
उल्लेख मिलता है कि शिलाखण्ड फेंक जल मे
गिराये गये। वे शिलाखण्ड हाथियों जैसे विशाल
थे। पर्वतों से लाते थे। वे बाहर से समुद्र तट पर
लाये जाते थे।
ते नगाम् नगसंकाशाः शाखामृगगणर्षभाः ।
अभ्रम्वुः पादपांस्तत्र प्रचकंपुश्च सागरम् ॥
(रा० प्र० २२:५५।)

३०८ राजतरंगिणी

आज के समान विद्युत भाप तथा मशीन परिचालित
नहीं थे । प्रारम्भ में क्रेन भी हाथ से ही चलते थे ।
कल्हण ने भी सेतु शब्द का उल्लेख गूढ़ सेतु के संदर्भ
में किया है । भगवान् राम निर्मित सेतु ठोस था
अथवा पाँवों पर बनाया गया था, स्वतः एक
गवेषणा का विषय है। जैसा कि गूढ़ सेतु के
सम्बन्ध में लिखा जा चुका है। विशेषज्ञों की
यह धारणा पुष्ट हो गयी है कि सेतु सम्भवतः ठोस
था । पाँवों पर नहीं बना था ।
मुझे एक रोमन कैथोलिक आयरिश इजीनी-
यर मिल गये। वे विश्व पर्यटन निमित्त निकले थे ।
उन्हें भी स्थान देखकर कौतूहल हुआ । चर्चा प्रसंग में
उन्होंने कहा—'मैं रोमन कैथोलिक हूँ । बाइबिल
में विश्वास करता हूँ । रामायण की चाहे जो
गाथा हो । परन्तु मैं इतना निश्चय रूप से कह
सकता हूँ । यह विशाल शिलाखण्ड यहाँ बाहर
से लाये गये थे । दोनों समुद्रों तटों को सेतु से
जोड़ने का प्रयास किया गया था ।' (वाल्मीकि
रामायण लंका काण्ड सर्ग २२ द्रष्टव्य है )
मैं हिन्दू हूँ । अतएव राम तथा राम गाथा पर
स्वभावतः विश्वास करता हूँ। परन्तु अभियन्ताओं
का यह मत स्थिर हो चला है । किसी समय
यहाँ सेतु था । भारतीय भूखण्ड को रामेश्वर द्वीप
से मिलाता था ।
वर्तमान सेतुबन्ध रामेश्वरम् मन्दिर का
स्थान दो हजार वर्ष से पुराना किसी भी प्रकार
नहीं हो सकता । अतएव निश्चयपूर्वक नहीं
कहा जा सकता । रामायण वर्णित रामेश्वर की
स्थापना किस स्थान पर की गयी थी । रामेश्वर
शब्द से स्पष्ट है । राम ने रामेश्वर की स्थापना
की थी । ईश्वर शब्द इस बात का द्योतक है कि
शिव की स्थापना भगवान् राम ने की थी ।
उन्हीं के नाम पर रामेश्वर शिवालय का नाम
रखा गया । कल्हण ने राजतरंगिणी में सर्वत्र शिव
मन्दिरों के लिए नाम के अन्त में ईश्वर या ईश
तथा विष्णु मन्दिर के लिये स्वामी शब्द का प्रयोग
किया था। यह नामकरण पद्धति समस्त भारत में
प्रचलित हो गयी थी ।
सेतुबन्ध शब्द से प्रतीत होता है कि रामेश्वर का
सेतुबन्ध ठोस था । इस सेतु को पार कर राम की
सेना लंका के समीप पहुँच गयी थी ।
यदि धनुषकोटि के पास खड़ा हो कर देखा
जाय तो दूसरी ओर श्रीलंका का तट स्थान
धुँधला दृष्टिगोचर होगा । लंका और भारत के बीच
यह सबसे संकीर्ण स्थान है । दोनों के मध्य छिछला
जल है । उसमें कुछ द्वीपों की श्रृंखला मिलेगी जो
लंका और भारत के बीच है इस छिछले पानी के
कारण बंगाल की खाड़ी से अरब सागर जाने वाले
जहाज सरल और नजदीक के मार्ग से न जा कर
श्री लंका की परिक्रमा कर जाते हैं। इस संकीर्ण
स्थान को आज कल की प्रचलित भाषा में 'आदम्स
ब्रिज' कहते हैं । पूर्व काल में रामेश्वरम् द्वीप से लंका
तट स्थान भूखण्ड से मिला रहा होगा ।
मिहिरकुल की सेना सेतु किंवा नाव से श्री
लंका पहुँची थी या कोई और उपाय निकाला था ।
इस विषय पर कल्हण शान्त हैं। रामायण का वर्णन
अधिक पूर्ण तथा विस्तार से वस्तु स्थिति पर प्रकाश
डालता है ।
कल्हण ने स्वयं श्री लंका किंवा रामेश्वर की
यात्रा नहीं की थी। उसने पूर्व श्रुत अथवा किसी
पूर्व कृति पर अपना वर्णन लिखा है । यदि वह
रामेश्वरम् की यात्रा किया होता तो उसका वर्णन
अधिक सारगर्भित, पूर्ण और समुद्री दृश्यों के वर्णन
से भरा होता ।
कल्हण ने केवल 'राघव' की सेना से उपमा
यहाँ दी है । श्री राम की सेना ने जहाँ शिविर
डाला था वहाँ मिहिरकुल की सेना का शिविर
पड़ना सम्भव तथा कठिन दोनो हो सकता है । इस
स्थान की भौगोलिक स्थिति में आमूल परिवर्तन हो
चुका है । साइक्लोन, सैण्ड डून तथा तूफानों से स्थान

प्रथम तरंग ३०९
आक्रान्त रहता है। सन् १९६५ ई० के साइक्लोन में
पम्बन सेतु बह गया था। अनेक मकानों की छतें
साइक्लोनों में उड़ गयी थीं। भूमि कहीं समुद्र में धंस
गयी, कुछ लोप हो गयी, कुछ निकल आयी थी।
बड़े-बड़े वृक्ष जड़ से उखड़ कर तृण के समान उड़ गये
थे। अतएव लगभग दो हजार वर्ष पूर्व अथवा
रामायण काल में क्या भौगोलिक स्थिति थी। इस
पर स्वतः एक ग्रन्थ तैयार हो सकता है।
सबसे आश्चर्य जनक बात यहाँ के समुद्र तट
पर मीठा पानी मिलता है। श्री राम तथा मिहिर-
कुल की सेना के लिये जल की आवश्यकता पड़ी
होगी। यहाँ कोई नदी नहीं है। सरोवर नहीं है।
इस एक बात के अनुसन्धान में उलझन उत्पन्न कर
दी थी।
जिस समय मन्नार के गल्फ तथा बंगाल की
खाड़ी मिलाने के लिए ड्रिलिंग का कार्य नहर के
सर्वेक्षण के लिये आरम्भ हुआ तो दो बातें विशेष
महत्त्वपूर्ण मिलीं। जिनसे रामायण की सत्यता तथा
कल्हण के वर्णन का मेल खाता है।
समुद्र तट से २०० गज दूर पर ड्रिलिंग करते
समय जो पानी निकला वह मीठा था। मन्नार की
खाड़ी तथा उसके दूसरे तट बंगाल की खाड़ी तक के
मध्यवर्ती भूभाग में कहीं भी ३०० फिट गहराई तक
भूमि में पहाड़ अथवा चट्टानें नहीं मिलीं। बलुई भूमि
ही मिलती गयी। जल कहीं भी किंचित् मात्र खारा
नही मिला। इससे दो तथ्यों की पुष्टि होती है।
श्रीराम तथा मिहिरकुल की सेना को मीठा जल
समुद्र तट पर मिल गया था। वहाँ शिविर स्थापित
करने योग्य स्थान था। दूसरी बात भी प्रमाणित
होती है कि सेतु बंध के लिए शिलाखण्ड कहीं बाहर
से लाये गये थे। जो पम्बन सेतु के नीचे विशाल-
काय पड़े हैं। क्योकि यहाँ भूमि के ऊपर तथा भूमि
के नीचे पत्थर नहीं मिलते।
मैंने इस विषय में कोचीन बन्दरगाह के बनाने
वाले श्री वेंकटेश्वरम् मुख्य अभियन्ता जो इस समय
सेतु समुद्रम योजना में रामेश्वर में कार्य कर रहे हैं।
विस्तार से विचार विमर्श किया। उनका भी वही
मत है। किसी समय श्री लंका तथा भारत में स्थल
तथा जल दोनों माध्यमों से आवागमन रहा।
कालान्तर में हजारों वर्ष के भूकम्पों साइक्लोन
समुद्र के तूफान के कारण यह भूमार्ग या तो समुद्र
गर्भ में चला गया है, अथवा टूटा-फूटा 'आदम ब्रिजस'
के रूप में उसकी छाया रूप वर्तमान है।
राघव तथा मिहिरकुल दोनों की सेनाओं का
शिविर लंका से बाहर था। उनके मध्य समुद्र था।
उसे ही देखकर राक्षसों को लंका पर आक्रमण का
भय, श्री राम की सेना को देखकर हुआ था। और
मिहिरकुल के समय उस आशंका की पुनरावृत्ति हुई।
समुद्र दोनों तटों के मध्य इतना संकीर्ण है कि
लंका के सौधों अर्थात् प्रासाद किंवा उच्च स्थान से
भारतीय तट पर होती घटनायें, सेना का शिविर,
सेना का परिचालन तथा सेना का प्रकार देखा और
समझा जा सकता है।
मिहिरकुल ने किस प्रकार लंका पर आक्रमण
किया, युद्ध में क्या गति हुई ? युद्ध का क्या रूप
था ? इन सब महत्त्वपूर्ण घटनाओं तथा उनके वर्णन
के सर्वथा अभाव में कुछ तत्त्व'पूर्ण निश्चित अनुमान
लगाना कठिन है। वाल्मीकि लंका काण्ड (सर्ग
४,२०) द्रष्टव्य है।
रामेश्वर सेतुबन्ध के सम्बन्ध में रामायण का
उद्धरण यहाँ ठीक होगा। पत्थरों से जल स्थान पाट
दिया गया था। रामायण में कहीं लाक्षा अथवा
खम्भा बनाने का उल्लेख नहीं आता। वहाँ यही
उल्लेख मिलता है कि शिलाखण्ड फेंक जल में
गिराये गये। वे शिलाखण्ड हाथियों जैसे विशाल
थे। पर्वतों से लाते थे। वे बाहर से समुद्र तट पर
लाये जाते थे।
ते नगांन् नगसंकाशाः शाखामृगगणर्षभाः।
बभन्जुः पादपांस्तत्र प्रचकर्षुश्च सागरम् ॥
(रा० प्र० २२:५५।)