राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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अथ
श्री कल्हण कृतायां
राजतरङ्गिण्याम्
तृतीयस्तरङ्गः
तृतीय तरंग के राजा
गोनन्द वंश पुनरस्थापित
नाम राजा राज्यकाल वर्ष लौकिक संवत्
( १ ) मेघवहन ३४ ३०८८
( २ ) श्रेष्ठसेन-प्रवरसेन (तुञ्जीन द्वितीय) १२
( ३ ) हिरण्य-तोरमाण
( ४ ) मातृ गुप्त २-०
( ५ ) प्रवरसेन द्वितीय १-११
( ६ ) युधिष्ठिर द्वितीय १-१
( ७ ) लग्न नरेन्द्रादित्य -१
( ८ ) रणादित्य (तुंजीन तृतीय)
( ९ ) विक्रमादित्य
( १० ) बालादित्य
अथ
तृतीयस्तरङ्गः
मुञ्चेभाजिनमस्य कुम्भकुहरे मुक्ताः कुचाग्रोचिताः
किं भालज्वलनेन कज्जलमतः स्वीकार्यमक्ष्णोः कृते ।
संधाने वपुरर्धयोः प्रतिवदन्नेवं निषेधेऽप्यहेः
कर्तव्ये प्रियोत्तरानुसरणोद्युक्तो हरः पातु वः ॥ १ ॥
१. 'गज चर्म त्याग दे' इसके कुम्भ कुहर में (तुम्हारे) कुचाग्रोचित मुक्ता होते हैं,'
'भालस्थ' ज्वलन (अग्नि) से क्या लाभ ?" 'इससे नेत्रों के लिये कज्जल प्राप्त होते हैं।'
अर्धाङ्ग विषयक प्रश्न का उत्तर देकर, इसी प्रकार प्रिया के अहि का निषेध करने पर, उत्तर
अन्वेषण में उद्यत, शिव आप लोगों की रक्षा करें।'
अथोल्लसत्पृथुश्लाघमानिन्युर्मेघवाहनम् ।
गान्धारविषयं गत्वा सचिवाधिष्ठिताः प्रजाः ॥ २ ॥
मेघवाहन१
२. मन्त्रियों के नियन्त्रण में प्रजा गान्धार देश२ जाकर, मेघवाहन को ले आयी,
जिसकी प्रचुर प्रशस्ति फैल रही थी ।
पाठभेद :
(१) २ श्री विलसन मेघवाहन का अभिषेक
'श्री गणेशाय नमः' से भी तरंग का आरम्भ काल सन् २३ ई० ३ मास तथा राज्य काल ३४
होता है । वर्ष देते है ।
पादटिप्पणियाँ :
श्री एस पी. पण्डित यह समय सन् २४ ई०
(१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह ५३ वाँ तथा राज्यकाल ३४ वर्ष देते हैं।
श्लोक है। उक्त पद का भावार्थ निम्नलिखित होगा ।
थोस्तोन अभिषेक काल लौकिक संवत् ३०८८
देहार्ध द्वय मिलन समय पार्वती ने जिज्ञासा की तथा राज्यकाल ३४ वर्ष देते हैं ।
'गजाजिन परित्याग कर दीजिये ।' महादेव ने श्री वाली ने यह काल सप्तर्षि संवत् ३९७९
उत्तर दिया-'इसके कुम्भ के मध्य में तुम्हारे तथा सन् २०६ ई० देते हैं।
पयोधर भूषण के उपयुक्त मुक्ता राशि निहित है।
अबुल फजल आइने अकबरी में मेघवाहन का
पार्वती ने पुनर्जिज्ञासा की-ललाट स्थित अनल नाम मगदहन देता है ।
का प्रयोजन क्या है ? महादेव ने उत्तर दिया-
ट्रापर यह समय सन् २४ ईस्वी तथा ९ मास
'वहाँ से तुम्हारा लोचन भूषण कज्जल प्राप्त होगा।' देते हैं। कनिघम यह समय सन् ३८३ ई. मानते हैं।
इस प्रकार प्रत्युत्तर देकर प्रियतमा के सर्प निषेध हसन लिखता है-'राजा मेघवाहन राजा
सूचक प्रश्न के चिन्तन अनुसरण उद्यत हर आप अरीराय (सन्धिमत) के इस्तीफा देने के बाद
लोगो की रक्षा करें ।
संवत् ३४ में तुरन्त सल्तनत पर अलवागर
५८
तृतीय तरंग के राजा
गोनन्द वंश पुनरस्थापितः
नाम राजा राज्यकाल वर्ष लौकिक संवत
( १ ) मेघव हन ३४ ३०८८
( २ ) श्रेष्ठसेन-प्रवरसेन (तुञ्जीन द्वितीय) ३० ३१२२
( ३ ) हिरण्य-तोऱमाण ३०-२-० ३१५२
( ४ ) मातृ गुप्त ४-९-१ ३१८२-२-०
( ५ ) प्रवरसेन द्वितीय ६० ३१८६-१-११
( ६ ) युधिष्ठिर द्वितीय ३९-२-० ३२४६-११-१
( ७ ) लखन नरेन्द्रदित्य १३ ३२८६-२-१
( ८ ) रणादित्य ( तुञ्जीन तृतीय) ३०० ३२९९-२-१
( ९ ) विक्रमादित्य ४२ ३५९९-२-१
( १० ) बालादित्य ३६-८-० ३६४१-२-१
५८६-१०-१
अथ
तृतीयस्तरङ्गः
मुञ्चेभाजिनमस्य कुम्भकुहरे मुक्ताः कुचाग्रोचिताः
किं भालज्वलनेन कज्जलमतः स्वीकार्यमक्ष्णोः कृते ।
संधाने वपुरर्धयोः प्रतिवदन्नेवं निषेधेऽप्यहेः
कर्तव्ये प्रियोत्तरानुसरणोद्युक्तो हरः पातु वः ॥ १ ॥
१. 'गज चर्म त्याग दे' इसके कुम्भ कुहर में ( तुम्हारे ) कुचाग्रोचित मुक्ता होते हैं'
'भालस्थ' ज्वलन ( अग्नि ) से क्या लाभ ?' 'इससे नेत्रों के लिये कज्जल प्राप्त होते हैं।'
अर्द्धाङ्ग विषयक प्रश्न का उत्तर देकर, इसी प्रकार प्रिया के अहि का निषेध करने पर, उत्तर
अन्वेषण में उद्यत, शिव आप लोगों की रक्षा करें ।'
अथोल्लसत्पृथुरलाघमानिन्युर्मेघवाहनम् ।
गान्धारविषयं गत्वा सचिवाधिष्ठिताः प्रजाः ॥ २ ॥
मेघवाहन१
२. मन्त्रियों के नियन्त्रण में प्रजा गान्धार देश२ जाकर, मेघवाहन को ले आयी,
जिसकी प्रचुर प्रशस्ति फैल रही थी ।
पाठभेद :
'श्री गणेशाय नमः' से भी तरंग का आरम्भ
होता है ।
पादटिप्पणियाँ :
(१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह ५३ वाँ
श्लोक है। उक्त पद का भावार्थ निम्नलिखित होगा ।
देहार्ध द्वय मिलन समय पार्वती ने जिज्ञासा की
'गजाजिन परित्याग कर दीजिये।' महादेव ने
उत्तर दिया—'इसके कुम्भ के मध्य में तुम्हारे
पयोधर भूषण के उपयुक्त मुक्ता राशि निहित है ।
पार्वती ने पुनजिज्ञासा की—ललाट स्थित अनल
का प्रयोजन क्या है ? महादेव ने उत्तर दिया—
'वहाँ से तुम्हारा लोचन भूषण कज्जल प्राप्त होगा।'
इस प्रकार प्रत्युत्तर देकर प्रियतमा के सर्प निषेध
सूचक प्रश्न के चिन्तन अनुसरण उद्यत हर आप
लोगों की रक्षा करें ।
५८
( १ ) २ प्रो विल्सन मेघवाहन का अभिषेक
काल सन् २३ ई० ३ मास तथा राज्य काल ३४
वर्ष देते हैं ।
श्री एस. पी. पण्डित यह समय सन् २४ ई०
तथा राज्यकाल ३४ वर्ष देते हैं ।
थोस्तीन अभिषेक काल लौकिक संवत् ३०८६
तथा राज्यकाल ३४ वर्ष देते हैं ।
श्री बालो ने यह काल सप्तर्षि संवत् ३९७९
तथा सन् २०६ ई० देते हैं ।
अबुल फजल आइने अकबरी में मेघवाहन का
नाम मगदहन देता है ।
ट्रायेर यह समय सन् २४ ईस्वी तथा ९ मास
देते हैं । कनिंघम यह समय सन् ३८३ ई. मानते हैं ।
हसन लिखता है—'राजा मेघवाहन राजा
प्ररोराय (सन्धिमत) के इस्तीफा देने के बाद
संवत् ३४ में तुरन्त सल्तनत पर जलवागर
४५८ तृतीय तरंग
हुआ। और इन्तहाई अदल और इन्साफ़ के साथ कश्मीर के चमन को तर व ताज़गी बख्श दी। आस पास के मुमालिक को अपने क़ब्ज़ा इक़्तदार में ले आया। परिन्दों हैवानों के गोश्त के खाने वालो को नाहक़ खून बहाने की कत्तईयन मुमानियत कर दी। शिकारियो और कसाबों को गुज़र औकात के लिये जागीरें दी। उसकी हकूमत में किसी जानवर को तकलीफ़ नही पहुँची। बल्कि उसकी हुस्ननबीयत के पेश नज़र हशरात-भी आपस में एक दूसरे को एज़ार सानी पर क़ादिर न हुए। रात को भेष बदल कर शहर की गश्त किया करता था। फ़क़ीरों और बे वसीला लोगों को चोरी छिपे घर पर माल व दौलत भेजा करता। मंगावन, मनोया गाय और मेघमठ के दिहात आबाद किये। इसी असना में खबर सुनी कि हिन्दुस्तान में जानदारों को एज़ाज़ पहुँचाते हैं। चुनांचे ऐसा करने से रोकने के लिये एक बड़ी भारी फ़ौज इस तरफ रवाना की। हिन्दुस्तान के बहुत से राजों को अपना मतीय व फ़रमा वरदार बना लिया। जिसके नतीजे में उन्होंने जानदारों के इज़ाए तकलीफ़ की दस्तबरदारी अख्तियार कर ली। जिसने उसके हुक्म की तामील से सरताबी की उसकी हकूमत तबाह व बरबाद हो गयी। आहिस्ता आहिस्ता यह राजा फ़तह करते करते दरियाये शोर पर पहुँच गया।
एक दिन अपने अराकीने सल्तनत माय दरयाए शोर के अहूर करने पर मशविरा कर रहा था कि एकाएक दूर से यह आवाज़ सुनायी दी कि राजा मेघवाहन की अमलदारी में लोग मुझे मार रहे हैं। राजा इस फ़रियाद को सुनते ही ग़ैज़ व ग़ज़ब से भर गया। इस सदा की तलाश में दूर तक दौड़ कर गया। क्या देखता है कि एक आदमी है जिसे पाँच छः आदमी ज़ोर से जकड़ा हुआ ले जा रहे हैं। राजा ने हक़ीक़त हाल पूछा। उनमें से एक बोला कि हमारा एक प्यारा बेटा है। बीमारी के बायस क़रीबुल मर्ग है। इसके साथ हमारे पड़ोस में एक मन्दिर है। जहाँ से लोग ग़ैब की बातें सुनते हैं। वहाँ हमने अपनी बीमारी के मुताल्लिक सुना है कि इसके खातिर जब तक इन्सानी कुरबानी न दी जायगी तब तक वह अच्छा न होगा। अब यह अज़ल रशीदह हमारे पास पहुँचा है। इसको जान हम अपने लड़के के लिये कुरबान करेंगे।
राजा ने कहा मेरे अहद हकूमत में जब हैवानो का क़त्ल ममनू है। तो तुम्हारी क्या ताक़त है कि तुम बेगुनाह आदमी को क़त्ल करो। उन आदमियों ने जवाब दिया कि उस लड़के के वफ़ात से लोग बे जान होजायेंगे। जब आपको एक आदमी का मरना पसन्द नहीं है तो इतने आदमियों का मरना आपको किस तरह पसन्द होगा। और फिर ख़ुदा को आप क्या जवाब देंगे। राजा बोला कि यह मुसाफ़िर है। बे गुनाह है। इसको छोड़ दो। इसके बदले मेरी जान अपने बेटे पर कुरबान कर दो।
लोगों ने इसे मजाक समझा। लेकिन राजा ने अमलन तलवार निकाल कर अपने मार डालने का इकद्दाम किया। उसी वक्त राजा पर फूल आसमान से बरसने लगे। अचानक ग़ैब से एक रूहानी इन्सान नमूदार हुआ। और राजा का हाथ पकड़ कर उसे खुदकशी से रोका। उस वक्त तमाम लोग राजा की नज़रों से गायब हो गये। राजा हैरत के भँवर में फँस गया। और उस फ़िरिश्ता से इस जमायत की कैफ़ियत दरियाफ्त की। वह बोला कि यह जमायत ग़ैब से तेरी आज़माइश के लिये आयी थी। मैं समुद्रों और लहरों का मोकल हूँ। तेरा ख़ल्क खुदा पर तेरी शुजाअत और शफ़क़त देखकर मैं तेरा मुती व फ़रमा बरदार होता हूँ। और अब अपना मतलब मुझसे कह। राजा ने कहा। मैं तुझसे जज़ीरा सिंहल द्वीप और ज़ज़ीरा लंका की फ़तह में मदद माँगना चाहता हूँ। उस शख़्स ने जवाब दिया कि मैं ख़ुदा की बारगाह से तेरी मआनु-मत के लिये मुक़र्रर किया गया हूँ। इसके बाद मेघ गशलत बादशाह एक अज़ीमुशान फ़ौज के हमराह
राजतरंगिणी ४५९
रक्तप्रजस्य भर्त्तुः पश्चाल्लोकानुरञ्जनम् ।
तस्याज्ञायि जनैर्धौतक्षौमक्षालनसंनिभम् ॥ ३ ॥
३. प्रजानुरक्त उस राजा के लोकानुरंजन को स्वच्छ क्षौम वस्त्र के क्षालन सदृश
तत्पश्चात् ( प्रजा ने ) जाना। १
स पुनर्बोधिसत्त्वानामति सत्त्वानुकम्पिनाम् ।
चर्यामुदात्तचरितैरत्यशेत् महाशयः ॥ ४ ॥
४. उस महाशय ने अपने उदात्त चरितों से प्राणियों पर अनुकम्पा करने वाले बोधि
सत्त्वों १ की चर्या का भी अतिक्रमण कर दिया ।
जिसमे बहुत से घोड़े और हाथी भी थे गैबी मोकल
को इजाज़त समुन्दर को पार कर गया और बहुत
जल्द ही जज़ीरा सिंहल द्वीप को फतह कर लिया ।
वहाँ के राजा विभीषण ने फरमा बरदारी का तौक
गले में डाल लिया । और हैवानों को न क़त्ल
करने का हुक्म अपनी तमाम क़लमरो में दे दिया ।
और अपने मुल्क के बहुत से तोहफे, तहायफ़ के
साथ राजा मेघवाहन को रुखसत किया । राजा
मज़कूर कमाल शान व शौकत से अपने वतन कश्मीर
फरमा हुआ ।”
२ (२) गान्धार देश : पृष्ठ १०६ टिप्पणी
गान्धार, ३०७ १:६८, ३०७, ३१४, २: १४४
द्रष्टव्य है ।
( १ ) ३ राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह
५४ वाँ श्लोक है ।
इसका भावार्थ यह भी हो सकता है। 'जिस
प्रकार स्वच्छ क्षौम वस्त्र के घुल जाने पर
उसका स्वच्छ रूप प्रकट होता है, उसी प्रकार
प्रजानुरक्त उस राजा के लोकानुरंजन को प्रजा ने
उसके कार्यों से बाद में जाना ।'
इसका एक और भावार्थ निम्नलिखित हो
सकता है :
'जिस प्रकार विशुद्ध क्षौम का वर्ण धोने पर
जाना जा सकता है, उसी प्रकार जनगण प्रजानुरक्त
नृपति का लोकानुराग तत्पश्चात् लोगो ने जाना।'
४(१) बोधिसत्त्व : बादशाह जैनुल आबदीन
(सन् १४२० ई.) के समय तक भगवान् बुद्ध तथा
उनका उल्लेख तत्कालीन साहित्य में श्रद्धापूर्वक
किया गया है । श्रीवर ने जैन राजतरंगिणी
१:२६ में भगवान् बुद्ध का उल्लेख किया है। इससे
प्रकट होता है । बौद्ध धर्म तथा बुद्ध को शेष भारत
में प्रायः लोग भूल गये थे । उस समय भी किसी
न किसी रूप में उनका कश्मीर में अस्तित्व था ।
विशेष रा. त. १.१३४, १३५, १३७, १३८,
पृष्ठ १९४-१९५ द्रष्टव्य है ।
बोधिसत्त्व की धर्मता के विषय में मिलिन्द
प्रश्न में कहा गया है—बोधिसत्त्वों के माता पिता,
किस वृक्ष के नीचे तपस्या करेंगे-स्थान, प्रधान
शिष्य, पुत्र, भिक्षु सेवक पूर्व से ही निश्चित रहते
हैं । तुषित लोक में निवास करते समय आठ बातो
को देख लेते हैं, (१) जन्म का उचित काल (२)
जन्मस्थान द्वीप (३) जन्मस्थान (४) कुल (५)
माता (६) गर्भ रहने का समय (७) जन्म का
मास तथा (८) महाभिनिष्क्रमण काल ।
(मिलिन्द प्रश्न : ४:४:३५) बोधिसत्त्व चार बातों
में एक दूसरे से भिन्न होते हैं—(१) कुल (२)
स्थान, समय (३) आयु तथा ४ ऊँचाई में । किन्तु
सभी बोधिसत्त्व रूप, शील, समाधि, प्रज्ञा, विमुक्ति
४६० [विशेष: मध्य-संरेखित] तृतीय तरंग
तस्याभिषेक एवाज्ञां धारयन्तोऽधिकारिणः ।
सर्वतोऽमारमर्यादः पटहानुदघोषयन् ॥ ५ ॥
५. उसके अभिषेक काल में ही, आज्ञाकारी अधिकारियों ने अहिंसा मर्यादा का
पटह¹ घोष करवा दिया ।
विमुक्ति ज्ञान या साक्षात्कार, चार वैशारद्य, दश
बुद्ध बल, छः असाधारण ज्ञान, चौदह बुद्ध ज्ञान,
अठारह बुद्ध, धर्म, तथा बुद्ध को दूसरी बातों में
समान होते हैं । सभी बुद्ध, बुद्ध के गुणों में बराबर
होते हैं । ( मिलिन्द प्रश्न ४:८:७३ )
भगवान् बुद्ध के सम्बन्ध में अशोक से ललिता-
दित्य तक प्रायः एक विचारधारा थी । ललिता-
दित्य के समय में भगवान् बुद्ध के सम्बन्ध में जो
श्रद्धा भक्ति तथा उनके विचारों के प्रति आदर था
वह क्रमशः भविष्य में कम होता गया । भगवान्
बुद्ध का तत्कालीन विचार हिन्दू धर्म विरोधी नहीं
माना जाता था । क्षेमेन्द्र, वरदराज, जयस्थ और
कल्हण का बुद्ध के प्रति यह भाव प्रगट नहीं होता
जो नीलमत पुराण में प्रतिपादित है । शंकरा-
चार्य के पश्चात् तो पूर्व विचारों में आमूल परिवर्तन
हो गया । इस परिप्रेक्ष्य में कश्मीर में बुद्ध प्रभाव
का विश्लेषण करना चाहिए । भगवान् बुद्ध की
उषाकर आदि की जो मूर्तियाँ प्राप्त हुई है उनका
काल चौथी तथा पांचवी शताब्दी है । उनमें एक
आसनस्थ, दूसरी दो खड़ी हैं। इसी प्रकार पण्डरेथन
अर्थात् पुराणाधिष्ठान से बोधिसत्त्व, अवलोकितेश्वर,
भगवान् बुद्ध के जन्म का दृश्य आदि उपस्थित करती
मिली है । जिनका काल छठी शताब्दी पूर्व कहा
जाता है ।
स्कन्द पुराण काशी खण्ड में भगवान् बुद्ध का
रूप खींचा गया है उसमे जटा-जूट एवं गैरिक
परिधान धारी वह दिखाये गये है। स्कन्द पुराण
का वर्णन भगवान् बुद्ध के परम्परा गत बनती
मूर्तियों से नहीं मिलता । कश्मीर में अब तक
जटाजूट, एवं गैरिक वस्त्र धारी मूर्तियाँ नहीं
मिली हैं ।
नीलमत पुराण बुद्ध को विष्णु का अवतार
मानता है तथा उनके जन्म दिवस पर उत्सव की
विधि उपस्थित करता है । बुद्ध जन्म एक पर्व की
तरह मनाया जाता था । यह दिवस वैशाख मास
की पूर्णिमा को मनाया जाता था । आज भी
विश्व में बुद्ध पूर्णिमा इसी दिन को कहते हैं ।
इस दिन भगवान् बुद्ध की मूर्ति को स्नान,
आभूषण आदि से अलंकृत, तापसी के स्थान, घोर,
चैत्यों के दीवारों, की सफेदी कर उन्हें पवित्र
करना चाहिये । बौद्धों को पुस्तक, वस्त्र, खाद्य
पदार्थों का दान और नर्तकियों तथा वादकों से
समन्वित उत्सव मनाना चाहिये । भगवान् बुद्ध की
पूजा नैवेद्य, वस्त्र, दरिद्रों को दान देकर तीन
दिन तक करना चाहिये । ( नी० 684-692 )
पाठभेद :
श्लोक संख्या ५ में 'मार' का पाठभेद 'सार'
तथा 'मान' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
५ (१) पटहः इस शब्द का अर्थ नगाड़ा,
डंका, ढोल, ढुग्गी होता है। जैसे, प्राचीन पटह
घोष अर्थात् ढुग्गी पीटने के अर्थ में प्रयोग किया
गया है । ढुग्गी पीटने वाले को पटह घोषक कहते
थे । शहनाई के साथ भी कश्मीर में इसे बजाते
हुए हमने देखा है।
वेद तथा जातक कथाओ में पटह का उल्लेख
नहीं मिलता । महाभारत में कहीं-कहीं इसका
उल्लेख बहुत कम मिलता है । रामायण (५:१०:अ)
में निसन्देह इसका बहुत उल्लेख किया गया है ।
वीणा वादन के प्रसंग में नीलमत पुराण ने इसका
उल्लेख किया है । यथा 'वीणापटहनादितम्' । ( नी०
३२) तथा 'वीणापटह शब्देश्च' ( नी० 413)
राजतरंगिणी ४६१
कल्याणिना प्राणिवधे तेन राष्ट्रान्निवारिते ।
निष्पापां प्रापिता वृत्तिं स्वकोशात्सौनिकादयः ॥ ६ ॥
६. राष्ट्र में प्राणी वध बन्द हो जाने पर, उस कल्याणी नृप ने स्व कोश से सौनिक
(कसाई) आदि को निष्पाप वृत्ति प्रदान की ।
तस्य राज्ये जिनस्येव मारविद्वेषिणः प्रभोः ।
ऋतौ घृतपशुः पिष्टपशुर्भूतबलावभूत् ॥ ७ ॥
७. जिन (बुद्ध) तुल्य मार१ (हिंसा) विद्वेषी उस प्रभु के राज्य में घृत पशु एवं पिष्ट
पशु की बलि२ यज्ञ में होती थी ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ६ मे 'निष्पापा'का; निष्पाया'
'निष्पापा' 'निष्पापं' 'प्रापिता' का 'प्रापिता' तथा
'शार्सौ' का पाठभेद'शात्सो' 'पात्शो' तथा 'शात्सो'
मिलता है ।
श्लोक संख्या ७ में 'राज्ये' का पाठभेद 'राज्यं'
मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
७ (१) मार : मार तीन प्रकार के होते हैं—(१)
क्लेश मार (२) मृत्यु मार (३) देव पुत्र मार ।
क्लेश दश हैं—(१) लोभ (२) द्वेष (३) मोह (४)
मान (५) दृष्टि (६) विचिकित्सा (७) स्त्यान (८)
औद्धत्य (९) अह्री (१०) अन्—अपत्रपा अर्थात्
असंकोच । इनको क्लेश मार कहा जाता है ।
जिस समय तथा जिस हेतु से प्राणियों की मृत्यु
होती है उसे मरण मार कहते हैं । देवपुत्र मार
कामावचर के छठे देवलोक पर निर्मित वशवर्ती में
रहता है । द्रोही राजकुमार की भाँति यहाँ एक
प्रादेशिक शासक होता है । उससे सब भयभीत
रहते हैं । क्योंकि यह कुशल कर्मों का विरोधी है ।
अधिकांश मार देवपुत्र च्युत होकर नरक में पडते
है । दूपी आदि मारा की दुर्गति यहाँ द्रष्टव्य है ।
(२) बलि : कल्हण ने यहाँ 'क्रतो' शब्द
का प्रयोग किया है । ऋतु का अर्थ यज्ञ होता है ।
वेद में उल्लेख मिलता है —आनो भद्राः क्रतवो
यन्तु विश्वतः । अहिंसा के प्रचार के पश्चात्
पुराण तथा स्मृति वर्णित विहित पशु बलि के स्थान
पर घृतादि या पिष्ट पशु बनाकर उनकी बलि की
जाने लगी थी । पंच यज्ञ का पुराणों तथा स्मृतियों
में प्रचुर उल्लेख मिलता है । भूत बलि दिवंगत
के लिये दी जाती है । कश्मीरी शैव मतानुयायी
आज भी आटा अन्न तथा घृतादि की पशु प्राकृति
बनाकर बलि देते हैं । यह है पुरानी प्रथा की स्मृति,
बलि प्रथा को हिंसक रूप दिया गया है ।
बलि एवं उपहार : कल्हण ने बलि एवं
उपहार दोनों शब्दों का प्रयोग किया है । दोनों में
अन्तर है । बलि का अर्थ आत्मसमर्पण होता है ।
बलि कर्त्ता स्वयं अपना बलि न कर, अपने प्रतिनिधि
स्वरूप मनुष्य, पशु, पक्षी, फल आदि की बलि
चढ़ाता है । परन्तु उपहार में प्रतिनिधित्व का
प्रश्न नहीं उत्पन्न होता । किसी भी वस्तु को
उपहार, भेंट, पूजा स्वरूप इष्ट देव को चढ़ाया जाता
है । यह नैवेद्य स्वरूप प्रसाद हो जाता है । दोनों
की प्रक्रियाओं में अन्तर है ।
४६२ तृतीय तरंग
स मेघवननामानमग्रहारं विनिर्ममे ।
मयुष्टग्रामकृत्पुण्यज्येष्ठं मेघमठं तथा ॥ ८ ॥
८. मयुष्टग्राम निर्माता, उसने मेघवन नामक अग्रहार एवं पुण्य में अग्रणी मेघमठ१
का निर्माण किया (कराया)।
भोगाय देश्यभिक्षूणां वल्लभाऽस्याऽमृतप्रभा ।
विहारमुच्चैरमृतभवनाख्यमकारयत् ॥ ९ ॥
९. उसकी प्रियतमा अमृतप्रभा ने देशीय१ भिक्षुओं के भोग हेतु अमृत भवन२
नामक उच्च विहार बनवाया।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ८ में 'मयुष्ट' का 'सयुष्ट' 'ज्येष्ठं
का 'ज्येष्ठो' और 'तथा' का पाठभेद 'तदा'
मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
८ (१) मयुष्ट, मेघवन, मेघमठ : इन
तीनों स्थानो का निश्चित पता नहीं चलता। उक्त
तीनों स्थानो का उल्लेख पुनः नहीं मिलता।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ९ में 'देश्य' का पाठभेद 'चैत्य'
मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
९ (१) देशीय : राजतरंगिणी में कश्मीर
मण्डल के बाहर के रहने वालो के लिये देश्य,
दैशिक, दैशिका, शब्दों का व्यवहार किया गया है।
दैशिक : देशीय भिक्षु भी इसी अर्थ में प्रयुक्त
किया गया है। कश्मीरी भिक्षुओं के लिये देशीय
शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है। यह गैर
कश्मीरी भिक्षुओं के लिये व्यवहृत किया गया है।
जोन राज ने श्रीकण्ठ चरित का ग्रंथ के भाष्य में
(१५:१०२) उल्लेख किया है।
(२) अमृत भवन : इसका पाली एवं
प्राकृत नाम अपभ्रंश होकर वर्तमान बिगड़ा नाम
अमित भवन था आमित भवन हो गया था। इसका
वर्तमान बिगडा अन्त भवन अन्त भवन अथवा
अन्तभवन है। यह श्रीनगर से तीन मील दूर उत्तर
दिशा में विचार नाग के समीप है।
श्री स्टीन ने इस स्थान की यात्रा जून सन्
१८९५ ई० में की थी। वहाँ पर उन्हें एक खुले
मैदान और लक्षम कुल (लक्ष्मी कुल्या) के मध्य
एक ध्वन्सावेषोप स्थान मिला था। यह अमृत
भवन विहार का अवशेष था। एक ठोस गोलाकार
टीला लगभग २० फिट ऊँचा था। उसकी बनावट
स्तूप से मिलती थी। एक आयताकार शिलाखण्ड
से टूटा घिरा स्थान भी वहाँ था। यहाँ से ३० गज
के अन्तर पर पूर्व तरफ सरोवर जैसा छिछला
कुण्ड प्राचीन शिलाबण्डीय प्राकार से घिरा है।
वहाँ के स्थानीय निवासी कहते हैं कि महाराज के
राज्य काल में मन्दिर तथा भवन बनवाने के लिये
यहाँ के शिलाखण्ड उठवा लिये गये थे। ग्राम के
अनेक मकानों में यहाँ के अलंकृत पत्थरो का उपयोग
किया गया है।
चीनी पर्यटक ओ कुग ने इस विहार का
वर्णन "ओमितियो वान" विहार नाम से किया है।
विचार नाग तथा श्रीनगर के मध्य मन्दिरो तथा
विहारों की श्रृंखला थी। उन्हें ज़ियारत तथा
इमारतों में परिणत कर लिया गया है।
राजतरंगिणी ४६३
देशैकदेशाल्लोर्नाम्नः प्राप्तस्तस्याः पितुर्गुरुः ।
स्तुन्पा तद्भाषया प्रोक्तो लोस्तोन्पास्तूपकार्यभूत् ॥ १० ॥
१०. देश के एकदेश ( भाग ) जिसका नाम लोह¹ था, उसके पितृ गुरु, जिन्हें
उनकी भाषा में स्तुन्पा² कहते थे, आये और स्तूप लोस्तोन्पा बनवाया ।
चक्रे नडवने राज्ञो यूकदेव्यभिधा वधूः ।
विहारमद्भुताकारं सपत्नोस्पर्धयोग्यता ॥ ११ ॥
११. राजा की यूक देवी नाम्नी वधू ने सपत्नी की स्पर्धा से नडवन¹ में अद्भुत
आकार वाला भवन निर्माण कराया ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या १० में 'देशैक' का 'देशक';
'स्तुन्पा' का 'स्तुत्या' 'स्तुम्पा' 'स्तन्पा' का 'लोस्तोन्पा'
का 'लोस्तोन्था' 'लोस्तुन्व' और 'र्यंभूत्' का पाठभेद
'र्यकृत्' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
१० ( १ ) लोह : वर्त्तमान लेह अंचल है ।
महाभारत में उत्तर दिशा के विजय में अर्जुन ने
इसे जीता था ।
( २ ) स्तोन्पा : यह शब्द तिब्बती स्तोन-
पा है । इसका मूल संस्कृत शाष्टा किंवा उपदेश है ।
तिब्बत में इसका शाब्दिक अर्थ उपदेशक अथवा
शिक्षक होता है । यह शब्द बुद्ध के लिये प्रयुक्त
किया जाता है ।
लद्दाख में इसका उच्चारण तोन्पा किया जाता
है । तिब्बत के नगर लासा में लोम वा कहते हैं ।
दक्षिणी तिब्बत को अब भी लोह कहते हैं ।
अमृतप्रभा प्राग्ज्योतिष के राजा की कन्या थी ।
उसके गुरु अल्लोर थे । वह तिब्बत के थे । इससे
दो बातें प्रकट होती हैं । प्रथम तिब्बत तथा आसाम
का घनिष्ठ सम्बन्ध प्रकट होता है । दूसरी बात
यह प्रकट होती है कि बुद्ध धर्म का प्रचार उस
समय तक सामाम में हो गया था ।
रानी अमृतप्रभा का गुरु बौद्ध था । पिता
तथा कन्या दोनों का बुद्ध तथा बौद्ध धर्म की ओर
झुकाव होना स्वाभाविक था ।
राजा मेघवाहन पर रानी अमृतप्रभा के
कारण बौद्ध धर्म का प्रभाव पड़ा होगा । राजा की
प्रवृत्ति अहिंसक हो गयी ।
लोह, लोहर, लोह कोट, तीनों स्थान भिन्न-
भिन्न हैं। उनका यथा स्थान वर्णन किया गया है।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ११ में 'यूक' का पाठभेद 'मूष'
दिया गया है ।
पादटिप्पणियाँ :
११ (१) नडवन : यह वर्त्तमान नरवोर स्थान
है। श्रीनगर के उत्तर-पश्चिम संगीन दरवाजा
तथा ईदगाह के बीच स्थित है। इसका एक पुरातन
नाम नाद्रवाट था । वाट शब्द महत्वपूर्ण है।
थाईलैंड, कम्बोडिया आदि स्थानों में वाट का
अर्थ बौद्ध विहार होता है। वाट का अर्थ बाग
भी होता है। वाटिका शब्द उपवन के लिये आज
भी प्रचलित है। वोर शब्द इसी वाट एवं वाटिका
का अपभ्रंश है। कश्मीर के स्थानीय नामों के अन्त में
'वोर' शब्द प्रायः मिलता है। भू ओर वाटिका, (रा.
त. १:३४२) राजन वाटिका (रा. त. ८: ७५६) तथा
रंग वाटिका (रा. त. ७:१६५३) प्रचलित शब्द थे ।
४६४ तृतीय तरंग
अर्धे यद्भिक्षवः शिष्टाचारारतस्तत्राऽर्पितास्तया ।
अर्धे गार्हस्थ्यगर्ह्याश्च सस्त्रीपुत्रपशुश्रियः ॥ १२ ॥
१२. वहाँ अर्ध भाग में शिष्टाचार¹ रत भिक्षुओं² तथा अर्ध (अपरार्ध) भाग में
स्त्री पुत्र पशु धन वाले गर्ह्य गृहस्थों के लिये व्यवस्था की ।
नरबोर के कब्रिस्तान तथा ज़ियाराते कश्मीर
के अन्य कब्रिस्तानों के और ज़ियारातों के समान
प्राचीन भवनों के ध्वंसावशेषों से पूर्ण है । भूमि
के अन्दर कितने अलंकृत शिला खण्ड एवं मूर्तियाँ
होंगी कौन जाने भूमि की सतह से प्राप्त शिलाओं
आदि के देखने से वास्तविक अनुमान लगाना
कठिन है ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या १२ में 'यद्भिक्ष' का 'यद्विप्र' तथा
'श्रियः' का 'स्त्रियः' पाठभेद मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
१२ (१) शिष्टाचार : बौद्ध धर्मावलम्बियों
में एक प्रव्रज्या लेने वाले चीवरधारी भिक्षु होते हैं।
दूसरे गृहस्थ उपासक होते हैं । भिक्षु गृह त्यागी
होता है । गृहस्थ सकुदुम्ब भगवान् का उपासक
मात्र होता है । वह घर त्यागता नहीं ।
कल्हण दोनों प्रकार के बुद्ध धर्मावलम्बियों
की व्यवस्था का उल्लेख करता है । गृहस्थ भी
कुछ समय के लिये भिक्षु होकर विहार में निवास
करते हैं । बौद्ध देशों में प्रत्येक व्यक्ति को
कम से कम तीन
नेपाल में विवाहित भिक्षु जन साधारण की
तरह कार्य करते हैं । व्यापार करते हैं । खेती
करते हैं । प्रायः बुद्ध धर्म के कठोर शासन का
व्यवहार नहीं करते ।
प्रतीत होता है । उस समय कश्मीर में इस
प्रकार के भिक्षुओं की परम्परा तथा वर्ग रहा होगा ।
अतएव रानी ने दोनों प्रकार के भिक्षुओं के लिये
व्यवस्था की थी ।
(२) भिक्षु : इस शब्द का शाब्दिक अर्थ भिक्षुक
भिखारी होता है । यह शब्द बौद्ध भिक्षुओं के
लिए रूढ हो गया है । अतएव इसका अर्थ बौद्ध
संन्यासी होता है । भिक्षु चर्या अर्थात् भिक्षा वृत्ति
ही भिक्षुओं को जीवन-यापन का एक मात्र साधन
हैं। भिक्षुओं के वस्त्र को संघाटी तथा चीवर कहते
हैं । विशेष द्रष्टव्य हैं रा. त. १:१८४, १८९ पृष्ठ
२५२-२५३,
प्रव्रज्या प्राप्त करने पर भिक्षु श्रामणेर कहा
जाता है । उसे एक उपाध्याय किंवा आचार्य के
निश्चय में रहना होता है । उसके शील में १०
विरतियाँ वर्जनीय हैं—प्राण घात, चोरी, अब्रह्मचर्य,
मिथ्याभाषण, मद एवं नशा विकाल भोजन, नृत्य-
गान-वाद्य, तमाशा माला-गंध-विलेपन-अलंकरण; ऊँची
बहुमूल्य शय्या सुवर्ण रजत ग्रहण ।
भिक्षुओं का चार निश्चय-पिण्डपात, चीवर,
शयनाशन, ग्लान प्रत्यय, भेषज हैं भिक्षु उपोसोष
के लिये प्रति पक्ष एकत्र होते थे । इस अवसर पर
प्रतिमोक्ष का पाठ किया जाता था । प्रतिमोक्ष के
आठ विभाग—पाराजिक, संघावशेष, अनियत,
नैसर्गिंक, पातयंतिक, प्रतिदेशनीय, शैक्ष एवं
अधिकरण दामय हैं । अपराधी भिक्षु अपने व्यतिक्रम
देते हैं । वर्मा
चीवर धारक
देखा है कि
भिक्षु बनकर
गार का निर्वाह
हर्तव्य को दृष्टि
कश्मीरिका
जोन रा० अन्त में
(१५:१०२, टिका, (रा.
(२) अर्द्ध: ७५६) तथा
प्रचलित शब्द थे।
प्राकृत नाम अपभ्र
तृतीय तरंग ४६५
अथेन्द्रदेवीभवनपेन्द्रदेव्यभिधा व्यधात् ।
विहारं सचतुःशालं स्तूपं भूपप्रियाऽपरा ॥ १३ ॥
१३. राजा की अपरा (दूसरी) इन्द्र देवी नाम्नी प्रिया ने इन्द्रदेवी भवन नामक
चतुःशाल युक्त विहार तथा एक स्तूप बनवाया ।
अन्याभिः खादनासम्माप्रमुखाभिर्निजाख्यया ।
देवीभिस्तस्य महिता विहारा बहवः कृताः ॥ १४ ॥
१४. उसकी अन्य खादना १, सम्मा आदि प्रमुख देवियों ने अपने अपने नामों से
अनेकों दिव्य विहारों को बनवाया ।
की आदेशना करते थे, और उन पर उचित प्राय-
श्चित्त एवं दण्ड की व्यवस्था की जाती थी । वर्षा
वास के नियम थे। उसके अनंतर प्रवारणा नामक
पर्व होता था । एकत्रित भिक्षु संघ में एकमत,
उद्ग्राहिका, शलाका ग्रहण, किंवा बहुमत से किसी
निश्चय पर पहुँचा जाता था ।
ईसाई रहते थे । उनके ग्रन्थों के पढ़ने से पता चलता
है कि दासी तथा बहु पत्नी रखने का उनमें आम
रिवाज् था । कुराम शरीफ के पढ़ने से उस समय
की सामाजिक स्थिति का जो ज्ञान प्राप्त होता है
उससे प्रकट होता है कि अनेक विवाह करना तथा
छोडना साधारण बातें थीं। दासी को पत्नीवत्
रखना फैशन था । इन व्याप्त कुरीति को दूर करने के
लिये पैगम्बर मुहम्मद साहब ने विवाहित स्त्री
रखने की सीमा चार कर दी थी । हिन्दुओं में
बहुपत्नी प्रथा वर्जित नहीं थी तथापि एक पत्नी से
अधिक रखना अच्छा नहीं समझा जाता था ।
पादटिप्पणियाँ :
१३ ( १ ) इन्द्रदेवी भवन विहार : इसका
उल्लेख कल्हण ने पुनः भिक्षाचर के संघर्ष के सम्बन्ध
में किया है। (रा. त. ८:११७२ ) यह स्थान
श्रीनगर में होना चाहिए । कयूत अर्थात् काठिला
जिसका उल्लेख कल्हण ने (राः तः ८:११६० ) में
किया है उसके समीप इसकी स्थिति प्रतीत होती है।
( २ ) बहुपत्नी प्रथा : अब तक कश्मीर के
राजा प्रतीत होता है एक पत्नी प्रथा का पालन
करते थे । मेघवाहन पहला राजा है जिसकी ५
पत्नियों का उल्लेख कल्हण करता है ।
मेघवाहन के पश्चात् होने वाले राजाओं की
बहुपत्नियों का उल्लेख मिलने लगता है। बहु पत्नी
प्रथा मैं समझता हूँ मेघवाहन के समय कश्मीर
में प्रचलित हुई और जड़ जमाती चली गयी ।
मैं समझता हूँ यह पश्चिम के शामी अर्थात्
सेमैटिक जाति का प्रभाव था । मेघवाहन गान्धार
तथा अफगानिस्तान में रहा था । अफगानिस्तान
से सीरिया अर्थात् भूमध्य सागर तक यहूदी और
५९
पाठभेद :
श्लोक संख्या १४ में 'सम्मा' का 'मम्मा',
'भस्मा' तथा 'महिता' का पाठभेद 'सहिता
मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
१४ ( १ ) खादना तथा सम्मा : इन दोनो
विहारों के निश्चित स्थान का पता नही मिलता ।
खादन पार स्थान बारहमूला के ४ मिल वितस्ता
के अधोभाग में दक्षिण तट पर इस स्थान की
सम्भावना की जाती है । वितस्ता माहात्म्य में इस
स्थान को 'खादना हार' कहा गया है।
किन्तु सम्मा विहार कहाँ था ? इस पर
गवेषण की आवश्यकता है ।
खादना तथा सम्मा शब्द अप्रचलित प्रतीत होते
४६६ राजतरंगिणी
अर्वाक्कालोद्भवस्यापि राज्यकालोऽस्य भूपतेः ।
न्यक्कतादिनृपोदन्तैर्वृत्तान्तैरद्भुतोऽभवत् ॥ १५ ॥
१५. अर्वाक् कालीन (परवर्ती) भी इस नृपति का राज्य काल आदि कालीन नृप
कथाओं को तिरस्कृत करने वाले वृत्तान्तों के कारण अद्भुत हो गया था ।
स बहिर्विहरञ्जातु भृशमुद्वीतैरुदीरितम् ।
चौरश्चौरोऽयमित्यारादशृणोत्क्रन्दितध्वनिम् ॥ १६ ॥
१६. कदाचित् बाहर विहार करते हुए उस राजा ने समीप में "यह चोर है, यह
चोर है" ऐसी भीतोक्त क्रन्दन ध्वनि सुनी।
कः कोऽत्र बध्यतां चौर इत्युक्ते तेन सक्रुधा ।
शशामाक्रन्दितध्वानो न च चौरो व्यभाव्यत ॥ १७ ॥
१७. 'क कोऽत्र'-यहाँ कौन है ? चोर को बाँध लो' क्रोध पूर्वक राजा के कहने
पर, आक्रन्दित ध्वनि शान्त हो गयी । किन्तु कोई चोर दिखायी नहीं दिया ।
है। खादन शब्द संस्कृत अवश्य है जिसका अर्थ खाना,
भोजन करना, भोज्य पदार्थ तथा दाँत है। परन्तु यहाँ
सम्मा के साथ प्रयुक्त होने पर ऐसी ध्वनि निकलती
है जैसे दोनों शब्द मेघवाहन की अभारतीय रानियों
के लिये प्रयुक्त किये गये हैं। समा शब्द अरबी है।
उसका अर्थ आकाश होता है। सम्म अरबी शब्द है
उसका अर्थ विष है। शमा और समा शब्द के अर्थों
में भेद है। शमाका अर्थ मोमबत्ती । अरबी-फारसी
में शमा उसे भी कहते हैं जिसका मुखमण्डल
शमा के समान प्रकाशमान होता है। शम्मा अरबी
शब्द है। उसका अर्थ हलका सुगन्ध होता है। मेघ-
वाहन अफगानिस्तान के एक अंचल अर्थात् गन्धार
में बाल्यावस्था व्यतीत किया था। वहीं से काश्मीर
आया था। अतएव संभव है खादना तथा सम्मा
उसकी रानियां अफगानिस्तान अथवा उसके पड़ोस
ईरान, तुर्किस्तान या अफगानिस्तान में ही निवास
करने वाली किसी अरबी अथवा ईरानी जाति की
कन्या हों । अफगानिस्तान तथा तुर्किस्तान
में उस समय बौद्ध धर्म का प्राबल्य था। दोनों
रानियों का बौद्ध विहार बनवाना इस बात को
प्रमाणित करता है कि वे बौद्ध धर्मानुरक्त थीं। मैं
समझता हूँ कि दोनों रानियाँ तुर्किस्तान, अफगानि-
स्तान किंवा ईरानी रक्त की थीं।
१५ (१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह
५५ वा श्लोक है ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या १७ में 'सक्रुधा' का पाठभेद
'भूभुजा' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
१७ (१) कः कोऽत्र : कोई है इस अर्थ में यह
शब्द उस समय भी व्यवहृत होता था। अंग्रेजी
में 'हू इज देय' इसी प्रकार का सम्बोधन है जो सेना
तथा सशस्त्र पुलिस द्वारा किसी को जानने के लिये
सम्बोधित किया जाता है।
तृतीय तरंग ४६७
पुनर्द्वित्रैर्दिनैस्तस्य निर्गतस्याग्रतस्ततः ।
अभवन्नभयार्थिन्यो द्वित्रा दिव्यप्रभाः स्त्रियः ॥ १८ ॥
१८. पुनः दो या तीन दिन पश्चात् जब वह ( राजा ) बाहर जा रहा था, सम्मुख
अभयार्थिनी एवं दिव्य प्रभामयी दो या तीन स्त्रियां उपस्थित हो गयीं ।
ताः संश्रुतेप्सितास्तेन रुद्धाश्वेन कृपालुना ।
अभ्यभाषन्त सीमन्तपुञ्जिताञ्जलयो वचः ॥ १९ ॥
१९. कृपालु उस ( राजा ) ने अश्व रोक कर, उन्हें अभय दान दिया । अभीप्सित को
सुनकर, वे शिर पर बद्धांजलि करके बोलीं—
देव दिव्यप्रभावेन भुवने भवता धृते ।
अपरस्माद्भयं जातु कस्य स्यात्करुणानिधे ॥ २० ॥
२०. “देव ! करुणानिधे ! ! आपके दिव्य प्रभाव से भुवन को धारण करते, दूसरो से
किसी को भय कैसे होगा ? ”
तदानीं तोयदा भूत्वाच्छादयन्तो नभस्तलम् ।
अकाण्डकरकापातशङ्किभिः कार्पकैर्मृषा ॥ २१ ॥
२१. “उस समय नाग¹ मेघ होकर, नभस्थल को आच्छादित कर लिया, तब कृषकों
को असमय में करकापात² की मिथ्या शंका हुई ।³
पाठभेद :
श्लोक संख्या २० मे 'वेन' का पाठभेद 'वेण'
मिलता है ।
श्लोक संख्या २१ मे 'भूत्वाच्छा' का 'भूत्वा छा'
तथा 'कार्पकै' का पाठभेद 'कृपकै', और 'कार्षिकै'
मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
२१ ( १ ) नाग : पृष्ठ ४३ से ६३ तक द्रष्टव्य
है । वृष्टि के सम्बन्ध में नाग का एक अर्थ मेघ
होता है ।
नागों का नीलमत पुराण के अनुसार वर्षा पर
नियन्त्रण एवं अधिकार था । उनका तूफानों
तथा हिमपात पर भी अधिकार था । ( नी० 351,
985-986 ) पुरातन भारतीय साहित्य में जल पर
नागों का नियन्त्रण था इससे सम्बन्धित अनेक आख्यान
तथा प्रसंग मिलते हैं । 'सर्पबलि' पर्व वर्षा ऋतु
के प्रथम मास से आरम्भ होकर अन्तिम मास तक
चलता है। महा० आदि० २१: ६; भविष्यत्
पुराण: २२;
( २ ) करका : उपल किंवा ओला वृष्टि को
करकापात कहते हैं। तुहिन तथा करकापात में
अन्तर है । तुहिनपात बर्फ गिरने को कहते हैं ।
तुहिनपात अस्पष्ट शीत काल में होता है । करका-
पात किसी भी ऋतु में हो सकता है। यह भारत
के किसी भाग में वर्षा और अन्धड़ के साथ हो सकता
है। परन्तु तुहिनपात केवल शीत कटिबन्ध और
हिमालय में तापमान की न्यूनता जहाँ होती है वहीं
होता है ।
( ३ ) श्री स्टीन तथा श्री रनजीत सीताराम
पण्डित तथा प्रायः सभी अनुवादकर्ताओं ने चार
श्लोकों ( २१-२४ ) का अनुवाद एक साथ ही किया
है । कल्हण इन्हें कुलकम् में नही रखा है किन्तु कुछ
पाण्डुलिपि में इसके लिये 'चवरूलक' शब्द का प्रयोग
किया गया है। श्री स्टीन द्वारा वीना की राजकीय
४६८ राजतरंगिणी
पक्वशालिवनस्फीतिरक्षाक्षुभितमानसैः ।
नागास्त्वत्कोपसंरम्भभूमितां गमिताः प्रभो ॥ २२ ॥
२२. “पके शालियों से परिपूर्ण क्षेत्रों की रक्षा हेतु उनका मन क्षुभित था, अतएव
प्रभो ! ( वे ) नाग झूठे ही आपके क्रोधावेश के पात्र हो गये ।
तेऽस्माकं पतयश्चौरश्चौर इत्यार्तभाषितम् ।
श्रुत्वा देवेन बध्यन्तामित्यवादि यदा क्रुधा ॥ २३ ॥
२३. "उन लोगों ने मेरे पतियों को जब 'चोर चोर' ऐसा आर्तनाद किया, तब
( उसे ) सुनकर, आप क्रोध से-'बाँध लो-बोले ।
तदा त्वदाज्ञामात्रेण न्यपतन्पाशवेष्टिताः ।
प्रसादः क्रियतां तेषामस्मत्करुणयाऽधुना ॥ २४ ॥
२४. "उस समय आपकी आज्ञा मात्र से पाश वेष्टित कर ( वे ) लाये गये । अधुना,
हम लोगों पर करुणा कर, उन्हें प्रसन्न ( मुक्त ) करें ।"
तदाकर्ण्याऽवदद्राजा प्रसादविशदाननः ।
सर्वे ते बन्धनान्नागास्त्यज्यन्तामिति सस्मितः ॥ २५ ॥
२५. इसको सुनकर, सस्मित एवं प्रसादोञ्ज्वल आनन राजा बोले-“वे सब नाग
बन्धन मुक्त कर दिये जाँय,"
तथा तस्याज्ञया राज्ञो नागा विधुतबन्धनाः ।
प्रणम्य चरणौ तूर्णं प्रययुः सपरिग्रहाः ॥ २६ ॥
२६. राजा की आज्ञा से नाग बन्धन रहित हो गये । वे सपरिवार चरणों में प्रणाम
कर, शीघ्रता पूर्वक चले गये ।
अथ ग्राहयितुं भूपानाज्ञां हिंसानिवृत्तये ।
स दिग्विजयाय निर्व्याजधर्मचर्यो विनिर्ययौ ॥ २७ ॥
दिग्विजय
२७. निर्व्याज धर्माचारी वह ( नृप ) राजाओं को हिंसा निवृत्ति हेतु आज्ञा पालन
कराने के लिये दिग्विजय निमित्त निकल पड़ा।"
पुस्तकालय में रखी गयी प्रति में इसका उल्लेख मिलता पादटिप्पणियाँ :
है। मैंने सबको भिन्न भिन्न मानते हुए प्रत्येक श्लोकों २४ ( १ ) श्लोक में 'चतुर्भिः कुलकम् चक्कलं-
का अनुवाद अलग अलग किया है। निस्सन्देह अलग कम्' जोड़ने का सुझाव है।
अलग अनुवाद करने में कुछ कठिनाई का अनुभव पाठभेद :
अवश्य होता है। श्लोक संख्या २७ में 'धर्म' का पाठभेद 'धर्म्मा'
पाठभेद : मिलता है।
श्लोक संख्या २२ में 'स्फीति' का 'स्फाति' पादटिप्पणियाँ :
तथा 'भूमि ता' का पाठभेद 'भूमि ते' मिलता है। २७ ( १ ) दिग्विजय : पण्डित जवाहर ला..
तृतीय तरंग ४६९
अभूद्भीतजनतावेक्षणश्लाघ्यविक्रमः ।
स्पृहणीयो जिनस्यापि तदीयविजयोद्यमः ॥ २८ ॥
२८. उसका यह विजयोद्यम जिन१ ( बुद्ध ) के लिये भी स्पृहणीय था, क्योंकि उसने
अपने प्रशंसनीय विक्रम एवं निरीक्षण से जनता को निर्भय रखा ।
प्रभावविजितान्कृत्वा सोऽहिंसादीक्षितान्नृपान् ।
अर्णसां पत्युरभ्यर्णमगापावर्णवजितः ॥ २९ ॥
२९. निष्कलंक उस राजा ने अपने प्रभाव से विजित नृपों को अहिंसा व्रत में दीक्षित
कर, अर्णस्पति१ ( सागर ) के समीप पहुँचा ।
तत्र तालीवनच्छायासुखविश्रान्तसैनिकः ।
युक्तिं द्वीपान्तराक्रान्तौ क्षणमन्तर्व्यचिन्तयत् ॥ ३० ॥
३०. वहाँ पर उसके सैनिक ताल वन की छाया में सुखपूर्वक विश्राम कर रहे थे ।
द्वीपान्तर ( अन्य द्वीप पर ) आक्रमण करने के लिये क्षण भर ( उसने ) मनमें विचार किया ।
अथ वेलावनोपान्ताच्चेनार्ताक्रन्दितध्वनिः ।
मेघवाहनराज्येऽपि हतोऽद्यमिति शुश्रुवे ॥ ३१ ॥
३१. अनन्तर उसने तटवर्ती वन की छोर से आर्त क्रन्दित ध्वनि सुनी—"मेघवाहन
के राज्य में भी यह ( मैं ) मारा गया ।"
नेहरू मेघवाहन के इस महाप्रयास के सम्बन्ध
में धीरणजीत सीताराम पण्डित की भूमिका में
लिखते हैं : अहिंसा द्वारा विचित्र प्रयास—'हम पढ़ते
हैं—मेघवाहन का विजय द्वारा अहिंसा का विचित्र
प्रयास—।'
पाठभेद :
श्लोक संख्या २८ में 'अभूद' का 'अभून'; 'जिन-
स्यापि' का 'जनस्यापि' तथा 'तदीय' का पाठभेद
'स्वदीय' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
( १ ) जिन : अनेक लेखको ने जिन और जैन
शब्द को मिलाकर भ्रम उत्पन्न कर दिया है । इसका
शाब्दिक अर्थ जीतने वाला होता है । बुद्ध ने स्व
विजय किया था । अतएव उनका नाम जिन हो
गया था । जैन भी अपने तीर्थंकरो को विजेता
किंवा जीतने वाले कहते हैं । अल्बेरूनी ने १:२४३
में इसी मत का प्रतिपादन किया है ।
जिन शब्द का उल्लेख कल्हण ने रा० त०
१:१०२ ३:७,२८; ४:२००, २११, २६१; ८:
२२३४ में किया है । विशेष द्रष्टव्य पृष्ठ १३६ हैं ।
२९( १ ) अर्णस्पति का अर्थ यहाँ समुद्र
है । नदियो का स्वामी समुद्र संस्कृत काव्य में कहा
गया है । कल्हण उसी काव्य परम्परा का यहाँ
पालन किया है ।
पाठभेद :
श्लोक सख्या ३० में 'सैनिक:' का 'सैनिकै:'
तथा 'क्रान्तौ' का पाठभेद 'क्रान्त्यै' मिलता है ।
श्लोक संख्या ३१ में 'पान्तात्ते' 'पाग्ते ते' तथा
'हतोऽद्य' का पाठभेद 'हतोऽह' मिलता है ।
४६८ राजतरंगिणी
पक्वशालिवनस्फीतिरक्षाक्षुभितमानसैः ।
नागास्त्वत्कोपसंरम्भभूमितां गमिताः प्रभो ॥ २२ ॥
२२. "पके शालियों से परिपूर्ण क्षेत्रों की रक्षा हेतु उनका मन क्षुभित था, अतएव
प्रभो ! ( वे ) नाग झूठे ही आपके क्रोधावेश के पात्र हो गये ।
तैऽस्माकं पतयश्चौरश्चौर इत्यार्तभाषितम् ।
श्रुत्वा देवेन बध्यन्तामित्यवादि यदा क्रुधा ॥ २३ ॥
२३. "उन लोगों ने मेरे पतियों को जब 'चोर चोर' ऐसा आर्तनाद किया, तब
(उसे) सुनकर, आप क्रोध से -'बाँध लो-बोले ।
तदा त्वदाज्ञामात्रेण न्यपतन्पाशवेष्टिता ।
प्रसादः क्रियतां तेषामस्मत्करुणयाऽधुना ॥ २४ ॥
२४. "उस समय आपकी आज्ञा मात्र से पाश वेष्टित कर ( वे ) लाये गये । अधुना,
हम लोगों पर करुणा कर, उन्हें प्रसन्न ( मुक्त ) करें ।"
तदाकर्ण्याऽवदद्राजा प्रसादविशदाननः ।
सर्वे ते बन्धनान्नागास्त्यज्यन्तामिति सस्मितः ॥ २५ ॥
२५. इसको सुनकर, सस्मित एवं प्रसादोज्ज्वल आनन राजा बोले-"वे सब नाग
बन्धन मुक्त कर दिये जाँय ।"
तथा तस्याज्ञया राज्ञो नागा विधुतबन्धनाः ।
प्रणम्य चरणौ तूर्णं प्रययुः सपरिग्रहाः ॥ २६ ॥
२६. राजा की आज्ञा से नाग बन्धन रहित हो गये । वे सपरिवार चरणों में प्रणाम
कर, शीघ्रता पूर्वक चले गये ।
अथ ग्राहयितुं भूपानाज्ञां हिंसानिवृत्तये ।
स दिग्विजयाय निर्व्याजधर्मचर्यो विनिर्ययौ ॥ २७ ॥
दिग्विजय'
२७. निर्व्याज धर्माचारी वह (नृप) राजाओं की हिंसा निवृत्ति हेतु आज्ञा पालन
कराने के लिये दिग्विजय निमित्त निकल पड़ा।"
पुस्तकालय में रखी गयी प्रति में इसका उल्लेख मिलता पादटिप्पणियां :
है । मैने सबको भिन्न भिन्न मानते हुए प्रत्येक श्लोको २४ (१) श्लोक में 'चतुर्भिः कुलकम् चवक्त-
का अनुवाद अलग अलग किया है। निस्सन्देह अलग कम्' जोड़ने का सुझाव है।
अलग अनुवाद करने में कुछ कठिनाई का अनुभव पाठभेद :
अवश्य होता है। श्लोक संख्या २७ में 'धर्म' का पाठभेद 'धर्मा'
पाठभेद : मिलता है।
श्लोक संख्या २२ में 'स्फीति' का 'स्फाति' पादटिप्पणियां :
तथा 'भूमि ता' का पाठभेद 'भूमि तं' मिलता है। २७ (१) दिग्विजय : पण्डित जवाहर ला..
तृतीय तरंग ४६९
अभूद्भीतजनतावेक्षणश्लाघ्यविक्रमः ।
स्पृहणीयो जिनस्यापि तदीयविजयोद्यमः ॥ २८ ॥
२८. उसका यह विजयोद्यम जिन' (बुद्ध) के लिये भी स्पृहणीय था, क्योंकि उसने
अपने प्रशंसनीय विक्रम एवं निरीक्षण से जनता को निर्भय रखा ।
प्रभावविजितान्कृत्वा सोऽहिंसादीक्षितान्नृपान् ।
अर्णसां पत्युरभ्यर्णमवापावर्णवर्जितः ॥ २९ ॥
२९. निष्कलंक उस राजा ने अपने प्रभाव से विजित नृपों को अहिंसा व्रत में दीक्षित
कर, अर्णस्पति' (सागर) के समीप पहुँचा ।
तत्र तालीवनच्छायासुखविश्रान्तसैनिकः ।
युक्तिं द्वीपान्तराक्रान्तौ क्षणमन्तर्व्यचिन्तयत् ॥ ३० ॥
३०. वहाँ पर उसके सैनिक ताल वन की छाया में सुखपूर्वक विश्राम कर रहे थे ।
द्वीपान्तर (अन्य द्वीप पर) आक्रमण करने के लिये क्षण भर (उसने) मनमें विचार किया ।
अथ वेलावनोपान्तात्तेनार्ताक्रन्दितध्वनिः ।
मेघवाहनराज्येऽपि हतोऽद्यमिति शुश्रुवे ॥ ३१ ॥
३१. अनन्तर उसने तटवर्ती वन की छोर से आर्त क्रन्दित ध्वनि सुनी—"मेघवाहन
के राज्य में भी यह (मैं) मारा गया ।"
नेहरू मेघवाहन के इस महाप्रयास के सम्बन्ध किवा जीतने वाले कहते हैं । अल्बेरुनी ने १:२४३
में श्रीरणजीत सीताराम पण्डित की भूमिका में में इसी मत का प्रतिपादन किया है ।
लिखते हैं : अहिंसा द्वारा विचित्र प्रयास—'हम पढ़ते जिन शब्द का उल्लेख कल्हण ने रा० त०
हैं—मेघवाहन का विजय द्वारा अहिंसा का विचित्र १:१०२ ३:७,२८; ४:२००, २११, २६१; ८:
प्रयास--।' २२३४ में किया है । विशेष द्रष्टव्य पृष्ट १३६ हैं ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या २८ में 'अभूद' का 'अभूत'; 'जिन- २९ ( १ ) अर्णस्पति का अर्थ यहाँ समुद्र
स्यापि' का 'जनस्यापि' तथा 'तदीय' का पाठभेद है । नदियों का स्वामी समुद्र संस्कृत काव्य में कहा
'त्वदीय' मिलता है । गया है । कल्हण उसी काव्य परम्परा का यहाँ
पादटिप्पणियाँ : पालन किया है ।
( १ ) जिन : अनेक लेखकों ने जिन और जैन पाठभेद :
शब्द को मिलाकर भ्रम उत्पन्न कर दिया है । इसका श्लोक संख्या ३० में 'सैनिकः' का 'सैनिकैः'
शाब्दिक अर्थ जीतने वाला होता है । बुद्ध ने स्व तथा 'क्रान्तौ' का पाठभेद 'क्रान्त्यै' मिलता है ।
विजय किया था । अतएव उनका नाम जिन हो श्लोक संख्या ३१ में 'पान्तात्ते' 'पान्ते ते' तथा
गया था । जैन भी अपने तीर्थंकरों को विजेता 'हतोऽद्य' का पाठभेद 'हतोऽह' मिलता है ।