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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

३७८ राजतरंगिणी में 'रत्नी' शब्द का उल्लेख मिलता है। (पं०ब्रा० १९ : १ : ४) 'रत्नी' को 'वीर' की पदवी से सम्बोधित किया गया है। कालान्तर में यही 'रत्नी' 'राजरत्न' 'नवरत्न' आदि की सर्व श्रेष्ठ उपाधि रूप से प्रयुक्त होने लगा। वैदिक काल के 'रत्न' परिषद् में—पुरोहित, पट्टरानी, युवराज, राजन्य, अक्षावाप, क्षत्ता, सेनानी, सूत, संग्रहीता, रथकार आदि प्रमुख राज्याधिकारी होते थे। 'रत्नियों' का स्थान बहुत ऊँचा माना जाता था। वाजपेय यज्ञ काल में राजा 'रत्न बलि' प्रदान हेतु स्वयं 'रत्नियों' के निवास स्थान पर जाता था। वैदिक यज्ञों का प्रचार क्षीण होने के साथ ही साथ, रत्नो वर्ग का अन्त हो गया। वायु पुराण में रत्नियों को दो वर्गों में विभक्त किया गया था। उन्हें सजीव तथा निर्जीव की संज्ञा दी गयी थी। सजीव वर्ग में पट्टरानी, पुरोहित, सेनानी, सूत, मन्त्री, आदि का समावेश होता था। निर्जीव वर्ग में मणि, कृपाण, धनुष, भाला, रत्न, पताका एवं कोपादि थे। (वायु० ५७ : ६८-७१) कालान्तर में 'रत्नी' का स्थान एक अत्यन्त प्रभावशाली संस्था ने ग्रहण कर लिया था उसे 'मन्त्रि परिषद्', 'अमात्य परिषद्' एवं 'साँचव परिषद्' कहते थे। मगधराज अजातशत्रु, कोसल- राज प्रसेनजित के समय मन्त्रियों का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। जातक कथाओ में भी इस प्रकार का उल्लेख मिलता है। (जातक स० ५२८ तथा ५५३) मौर्य एवं शुंग राजाओ की 'मन्त्रि परिषद्' थी, (अर्थ शास्त्र : १; अशोक के अभिलेख स० ३ तथा ६ एवं मालविकाग्निमित्र नाटक अंक ५) पश्चिम भारत में शक राजा मन्त्रिपरिषद् की मन्त्रणा से राज्य शासन करते थे। उसके 'मन्त्रि सचिव' तथा 'कर्म सचिव' सदस्य होते थे। (रुद्रदामा का जूनागढ़ शिलालेख) गुप्त राजाओ के अभिलेखों में भी मन्त्रियों का उल्लेख मिलता है। मन्त्रियों का अधिकार असीमित होता गया है। शक्तिशाली राजा का मन्त्रिमण्डल उसका सलाह- कार था। राजा उनकी मन्त्रणा की अवहेलना कर सकता था। दुर्बल राजा पर मन्त्रिपरिषद् हावी हो जाती थी। मौखरि वंश के निस्संतान होने पर, मौखरिसामान्य का सिंहासन मन्त्रियों द्वारा हर्षवर्धन को दिया गया था। मन्त्रि परिषद् की संख्या निश्चित नहीं थी। मनु के मतानुसार मन्त्रियों की संख्या सात या आठ होनी चाहिए। (म० ७ : ५४) महाभारत का मत है कि मन्त्रियों की संख्या आठ होनी चाहिए। 'अष्टानां मन्त्रिणां मध्ये मन्त्रं राजोपधारयेत्।' अर्थशास्त्र में उल्लेख आता है—मानव सम्प्र- दाय १२; बार्हस्पत्य पंथी १६; औशनस पंथी २० मन्त्रियों की संख्या देते हैं। (अ १ : १५) शुक्रा- चार्य १० राज्य की प्रकृति में मन्त्रियों की गणना करते हैं। (शु० २ : ६९-७९) किन्तु मनु एवं कौटिल्य इस विषय पर एक मत हैं कि मन्त्रियों की संख्या देश के विस्तार एवं समय की आवश्यकता- नुसार होनी चाहिए। शुक्राचार्य मन्त्रिमण्डल में पुरोहित का रखना आवश्यक नही मानते हैं। (शुक्र० : २ : ७२) किन्तु शुक्र का कथन है कि पुरोहित का भय प्रदर्शन ही राजा को सुपथ पर लाने के लिये पर्याप्त था। (शुक्र० २ : ९९) अशोक के तृतीय तथा षष्ठ अभिलेखों से 'मन्त्रि परिषद्' की कार्य प्रणाली पर प्रकाश पड़ता है। षष्ठ लेख से स्पष्ट पता चलता है कि अमात्यों के निर्णय पर, मन्त्रि परिषद् पुनर्विचार कर सकती था। सम्राट् के आदेशो में भी परिषद् आवश्यकतानुसार संशोधन करती थी। परिषद् में मत वैभिन्नय होने पर सम्राट् अशोक का निर्णय अन्तिम माना जाता था। एक स्थान पर अशोक के दान पर उसकी मन्त्रि- परिषद् ने सीमा लगा दी थी। युवान च्वांग ने पर्यटन संस्मरण में लिखा है कि श्रावस्ती का राजा

[द्वितीये तरंग] [३७९]

[बायाँ स्तम्भ] विक्रमादित्य ५ लाख मुद्रा दान देना चाहता था। परन्तु मन्त्रि परिषद् ने रोक दिया कि प्रजा का अप- शब्द सुनना पड़ेगा। वार्दजलि जातक में कथा मिलती है कि मन्त्रियों ने वार्दजलि को उसकी मूर्खता के कारण युवराज नहीं बनने दिया। अशोक कश्मीर का राजा था। अतएव कश्मीर के शासन में वह मन्त्रि परिषद् जैसी संस्था को किसी न किसी रूप में अवश्य रखा होगा। शक राजाओं के समय में भी मन्त्रि परिषद् थी। शक राजाओं ने कश्मीर पर शासन किया था। गुप्त काल के पश्चात् उत्तर भारत में मन्त्रि परिषद् का उल्लेख नही मिलता। कल्हण के वर्णन से पता चलता है कि कश्मीर में मन्त्रि परिषद् का कभी लोप नहीं हुआ। वह अत्यन्त शक्तिशाली संस्था थी। निस्सन्देह उत्तर भारत, उत्तर गुप्त काल में, केवल कश्मीर ही अपवाद था। जहाँ मन्त्रि परिषद् सक्रिय थी। शुंग काल में भी राजाओं ने मन्त्रि परिषद् को कायम रखा था। दक्षिण भारत में चोल राज्य में दसवीं शताब्दी तक कश्मीर के समान मन्त्रि परिषद् सक्रिय एवं शक्तिशाली थी। मन्त्रि परिषद् को राजा नियुक्त करता था। नियुक्त मन्त्रियों के समवेत रूप का नाम मन्त्रि- परिषद् था। कश्मीर में राजा ही मन्त्री नियुक्त करते थे। सब मन्त्री मिलकर मन्त्रि परिषद् अर्थात् मन्त्रि मण्डल बनाते थे। मन्त्री राजा के प्रति और अप्रत्यक्ष रूप से जनता के प्रति उत्तरदायी था। मन्त्रियों की शक्ति एवं प्रतिष्ठा उनके व्यक्तित्व पर निर्भर थी। धर्मशास्त्र ही उनका विधि ग्रन्थ था। नीति तथा स्मृतियों का उल्लंघन न तो मन्त्री कर सकता था और न राजा। दोनों ही अपने अधिकार की सीमा तत्कालीन प्रचलित नीति, स्मृति तथा धर्म शास्त्रों से निर्धारित करते थे।

[दायाँ स्तम्भ] राजा के शक्तिशाली होने पर 'राजयत्त तन्त्र' तथा मन्त्रियों के शक्तिशाली होने पर 'सचिवायत्त- तन्त्र' शासन कहा जाता था। सामान्य स्थिति का नामकरण 'उभयायत्त' शासन कहा जाता था। ('मुद्राराक्षसः अंक ३; कथासरित्सागर १ : ५८-५९) कश्मीर में मन्त्रियों ने अनेक राजाओं को राज- सिंहासन पर बैठाया, अनेकों को सिंहासन से उतारा है उनका उल्लेख यथा स्थान किया गया है। मन्त्रियों ने राजा युधिष्ठिर को बन्दी गृह में रखा और इसी वंश के प्रथित को राजसिंहासन पर बैठाया। यह मन्त्रि परिषद् के अधिकार सीमा के अन्तर्गत था। जिसका प्रयोग समय समय पर कश्मीर में होता रहा है। यह नीति, स्मृति व्यवहार एवं न्याय सम्मत था। (२) प्रतापादित्य : श्री विलसन ने अभिषेक का समय ईसापूर्व १६८ वर्ष ९ मास तथा समांकृत काल ईसा पूर्व १० वर्ष तथा राज्य काल ३२ वर्ष माना है। श्री स्टीन ने राज्याभिषेक काल कल्हण के वर्ष गणनानुसार लौकिक संवत् २८९६ वर्ष तथा राज्यकाल ३२ वर्ष रखा है। श्री एस. पी. पण्डित ने यह समय ईसापूर्व १६९ वर्ष रखा है। श्री चन्द्रकान्त बाली ने अपनी ज्योतिषगणना के अनुसार प्रतापादित्य का सप्तर्षि संवत् ३७८५ तथा सन् १५ ई० दिया है। आइने अकबरी में प्रतापादित्य का नाम परतोपदत्त लिखा है। उसमें लिखा है कि वह विक्रमादित्य का वंशज था। उसका राज्यकाल अबुल फजल २३ वर्ष देता है। हसन प्रतापादित्य के सन्दर्भ में लिखता है— राजा प्रतापादित्य २८८६ क० बहुक्म सिकन्दर और महल कश्मीर के इत्तफाक से हुकूमत कश्मीर पर सरफरोज हुआ। और ममलकत और फौज और रैय्यत को आराइश में जान दिल से कोशिश की। तीस साल हुकूमत में गुजरे। (पृ०५२-५३)

३८० राजतरंगिणी शकारिर्विक्रमादित्य इति स भ्रममाश्रितैः । अन्यैरन्यथाऽलेखि विसंवादकदर्थितम् ॥६॥ ६. 'वह शकारि विक्रमादित्य' था'—इस प्रकार विसंवाद कदर्थित को भ्रान्त अन्य लोगों ने अन्यथा लिखा है । इदं स्वभेदविधुरं हर्पादीनां धराभुजाम् । चिरकालमभूद्भोज्यं ततः प्रभृति मण्डलम् ॥७॥ ७. उस समय से पारस्परिक कलह ग्रस्त यह मण्डल१ हर्पादि२ राजाओं का चिर काल तक उपभोग्य बना रहा । श्री विवैउद्दीन तथा श्री नारायण कौल का मत है कि प्रतापादित्य मालवा के राजा विक्रमादित्य से सम्बन्धित था । अभी तक कोई ऐसा आधिकारिक प्रमाण प्राप्त नहीं हो सका है कि निष्कर्ष निकाला जाय कि वास्तव में प्रतापादित्य विक्रमादित्य का सम्बन्धी था । इस पर अभी अनुसन्धान की आवश्य- कता है । पाठभेद : श्लोक संख्या ६ में 'रति सभ्रम' का 'स इति भ्रम', 'डति संभ्रम' तथा 'विसंवादक' का पाठभेद 'विसंवादिक' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ६ (१) विक्रमादित्य : द्वितीय तरंग में वर्णित ६ राजाओं का सम्बन्ध गोनन्द वंश से प्रतीत नहीं होता । शक संवत् का प्रारम्भ सन् ७८ ई० से होता है । किन्तु श्री स्टीन के नोट के अनुसार प्रतापादित्य का राज्यारोहण काल ईसापूर्व १८० वर्ष आता है । इस प्रकार दोनों समयों में २५८ वर्ष का अन्तर हो जाता है । विक्रम संवत् ईसा पूर्व ५७ वर्ष से आरम्भ होता है । यही कारण मालूम होता है जिससे कि इस विक्रमादित्य को शकारि विक्रमादित्य से भिन्न कल्हण मानता है । विक्रमादित्य के सम्बन्ध में अनेक भ्रान्तियां हैं । विक्रम संवत् चलाने वाले विक्रमादित्य कौन ऐति- हासिक व्यक्ति थे, इसका निर्णय इतिहास के विद्वानों ने एक मत से अभी तक नहीं किया है । अनेकवाद तथा सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया गया है । ७(१) मण्डल : मण्डल शब्द का प्रयोग कल्हण ने राज्य के लिये किया है । शुक्र ने (शुक्र नीति १ : १८२-१८६) सामन्त, माण्डलिक, राजन्, महाराज, स्वराज, सम्राज, विराज, सार्वभौम के आधीन राज्य का वर्गीकरण किया है । मण्डल के अधिपति को माण्डलिक कहते थे । सामन्त को आय १ लाख से ३ लाख, मण्डल की आय ४ से ५०; स्वराज की ५१-१००; सम्राज की १ करोड़ से १०; विराज की ११ से ५० तथा सार्वभौम राज की ५१ करोड़ से ऊपर प्रतिवर्ष रजत कर्ष आय रखा है। हर्प को यहाँ मण्डलेश नहीं मानना चाहिये । कल्हण प्रायः कश्मीर राज्य के लिये मण्डल शब्द का प्रयोग कर देता है । लोक प्रकाश में कश्मीर मण्डल के सम्बन्ध में एक श्लोक आता है जिसमें उसके ग्रामों की संख्या दी गयी है । षष्टियामसहस्राणि षष्टियामशतानि च । षष्टिर्मात्रात्रयो ग्रामा ह्येतत्कश्मीरमण्डलम् ॥ —पृष्ठ ७८ श्लोक ४

द्वितीय तरंग ३८१ असपूर्वाऽपि तेनोर्वी सपूर्वेव महीभुजा। लालिता हृदयज्ञेन पत्या नववधूरिव ॥८॥ ८. इस राजा ने परम्परा प्राप्त सदृश अपरम्परा प्राप्त इस पृथ्वी को भी, हृदयज्ञ पति के नववधू तुल्य लालित¹ किया। भुक्त्वा द्वात्रिंशतं वर्षान्भुवं तस्मिन्दिवं गते। जलौकास्तत्सुतो भूमेर्भूषणं समपद्यत ॥६॥ जलोकास्¹ ९. बत्तीस¹ वर्ष पृथ्वी को भोग कर उसके दिवंगत होने पर उसका पुत्र जलौकास्² भूमि भूषण हुआ।

(२) हर्ष : भारतीय इतिहास में कई हर्षों का उल्लेख मिलता है। उज्जैन के एक राजा विक्रमादित्य को भी हर्ष कहा गया है। उसका उल्लेख कल्हण ने तृतीय तरंग के श्लोक १२५ में किया है। यह कश्मीर राजा मातृगुप्त के समय में हुआ था। कल्हण की काल गणना के अनुसार उसका समय २६८ वर्ष पश्चात् पड़ता है। यदि इस हर्ष को कन्नौज का राजा हर्षवर्धन मान लिया जाय, जिसका उल्लेख हुएन सांग करता है, तो उसका समय प्राप्त लेखों के अनुसार सन् ६०६-६५० ई० आयेगा। इस प्रकार कल्हण की काल गणना में, जिस प्रकार मिहिरकुल की गणना में अन्तर पडता है, उसी प्रकार इस काल में भी पड़ जाता है। कन्नौज के हर्ष का काल प्रतापादित्य का समय नहीं हो सकता। अलबेरुनी लिखता है—कश्मीर की समय सारणी के अनुसार श्रीहर्ष ६६४ वर्ष विक्रमादित्य के पश्चात् हुए थे। उस समय देश में श्रीहर्ष, विक्रमादित्य, शक, वल्लभ, तथा गुप्त पांच प्रकार के संवतो का प्रचलन था। विक्रम संवत् मानने वाले दक्षिण, तथा पश्चिमी भारत भूखण्ड मे निवास करते थे। (अलबेरुनी: साचू : २ : ६-९) ८ (१) लालित : लालन-पालन शब्द प्रायः एक साथ आता है। कल्हण ने यहाँपर नववधू और पृथ्वी की तुलना की है। जिस प्रकार अपनी प्रियतमा नव- वधू के प्रति पति हार्दिक प्रेम करता उसका दुलार करता है उसी प्रकार पृथ्वीपति राजा प्रतापादित्य ने पृथ्वी का प्रेम तथा स्नेह से अपने में अभिन्न समझते हुए लालन किया। मनुष्य किसी से प्रेम न करते हुए भी, उसका पालन करता है। राजा प्रजा से अत्यन्त स्नेह न करते हुए भी, प्रजा पालक हो सकता है। परन्तु प्रजा के साथ स्नेह करना, उसे अभिन्न समझना, उसका दुलार करना सर्वथा भिन्न बात है। लालन में पालन शब्द भी समाविष्ट हो जाता है। परन्तु पालन में लालन का अर्थ समाविष्ट नहीं होता। कल्हण ने यहाँ उपमा बहुत ही सुन्दर दी है। उसकी यह नयी सूझ है। ९ (१) श्री विल्सन ने अभिषेक का समय ईसा पूर्व १३६ वर्ष ९ मास तथा समीकृत काल सन् २२ ई० और राज्यकाल ३२ वर्ष दिया है। श्री स्टीन राज्याभिषेक काल कल्हण के गणनानुसार लौकिक संवत् २६२८ वर्ष तथा राज्यकाल ३२ वर्ष दिया है। श्री एस० पो० पण्डित ने यह समय ईसा पूर्व १३७ वर्ष तथा राज्यकाल ३२ दिया है। श्री वाशी ने सप्तर्षि संवत् ३८१७ तथा सन् ४७ वर्ष यह समय दिया है। आइने अक्बरी में जलोक को 'जुलूक' लिखा गया है। राज्यकाल ३० वर्ष दिया गया है।

३८२ राजतरंगिणी पितुरेव समं कालं वृद्धिहेतोः स दिद्युते । विषुवत्पूर्णशीतांशुरिव शीतेतराचिषः ॥१०॥ १०. सूर्य के समकाल¹ तक शरदकालीन पूर्ण शशि तुल्य वह वृद्धि हेतु, पिता के ही बराबर समय तक प्रकाशित रहा । अथ वाक्पुष्टया सार्धं देव्या दिव्यप्रभावया । भुवं तत्प्रभवो भुञ्जंस्तुञ्जीनोऽरञ्जयत्प्रजाः ॥११॥ तुंजीनः ११. तदुपरान्त इसका पुत्र तुंजीन दिव्य प्रभाव युक्त देवी वाक्पुष्टा के साथ पृथ्वी का भोग करता हुआ प्रजारंजन किया । हसन लिखता है—बाद अजई ( प्रतापादित्य ) राजा जलोक शानो ने वादशाहत की पोशाक जैवतन करके ३२ साल हकूमत में गुजारे । ( १ ) जलौक, जलौकस्, जलौकास् : प्रसिद्ध अनुवादकारो ने नाम को भिन्न प्रकार से लिया है । श्री रणजीत सीताराम पण्डित ने अपने अनुवाद में जलौक तथा जलोकाः दिया है । श्री स्टीन ने भूमिका के पृष्ठ १२५ पर 'जलौकस्' दिया है । अनुवाद में पृष्ठ ५७ पर पुनः 'जलौकस्' दिया है । श्री पण्डित ने अनुवाद के पृष्ठ प्रान्त ४२ पर 'जलो- कस्' तथा अनुवाद में 'जलौक' और पुनः पृष्ठ ५८१ पर 'जलौकस्' दिया है। कल्हण ने मूल श्लोक में 'जलोकास्तत्सुतो' दिया है । क्रिया के अनुसार 'जलौकम्' शुद्ध प्रतीत होता है । इसके पूर्व (तरं० १ : १०८) कल्हण ने 'भूभूज्जलोको' का प्रयोग कर अशोक के पुत्र 'जलौक' का वर्णन किया है । प्रतीत होता है कि अशोकपुत्र 'जलोक' तथा प्रतापा- दित्य-पुत्र में भेद जाहिर करने के लिए 'जलौकम्' किंवा 'जलौकास्' नाम दिया है । १० (१) समकाल-ज्योतिष ज्ञान : कल्हण को ज्योतिष का ज्ञान था इस श्लोक से प्रगट होता है । दिन एवं रात्रि वर्ष में २३ सितम्बर तथा २२ मार्च को बराबर होते हैं । इस समय सूर्य निरक्ष पर जाता है । भारतीय माग की गणना से कात्तिक एवं चैत्र विषुव २२ या २३ सितम्बर तथा महा विषुव या हरिद्विष २० मार्च को होता है । चन्द्रमा की वृद्धि तथा ह्रास का कारण विज्ञान के अनुसार सूर्य है । यहाँ पर भी वृद्धि हेतु सूर्य को कहा है । पिता भी पुत्र के लिये वृद्धि का हेतु है । यहाँ पर पिता को सूर्य तथा पुत्र को चन्द्रमा की उपमा दी गयी है । चन्द्रमा का प्रकाश सूर्य का ही प्रति- बिम्ब है और पिता का प्रकाश या प्रतिबिम्ब पुत्र । कल्हण ने यहाँ काव्य एवं ज्योतिष का संक्षेप में समन्वय किया है । ११(१) श्री विल्सन ने अभिषेक का काल ईसा पूर्व १०४ वर्ष ९ मास तथा समीकृत का सन् ५४ ईस्वी तथा राज्य काल ३६ वर्ष दिया है । श्री स्टीन ने राज्याभिषेक का समय लौकिक संवत् २९६० वर्ष तथा राज्य काल ३६ वर्ष दिया है श्री एस. पी. पण्डित ने यह समय ईसा पूर्व १०५ वर्ष तथा राज्य काल ३६ वर्ष रखा है । श्री वाली ने सप्तर्षि सं० ३८५३ तथा सन् ८३ ई. यह काल दिया है । आइने अकबरी में तुंजन राजा को 'थुनजिर' नाम से सम्बोधित तथा राज्य काल ३६ वर्ष दिया गया है । हसन लिखता है—राजा तुंजीन २९५० क० में बाप की जगह सल्तनतनशीन हुआ । उसकी रानी वाक्पुष्ता नाम एक निहायत ही अकलमन्द और दाना औरत थी, उसी की रहनुमाई में फौज और रैयत के खुश करने में मसरूफ रहता । उनके साथ

द्वितीय तरंग ३८३ दम्पतिभ्यामिदं ताभ्यामभृप्यत वसुन्धरा । गङ्गामृगाङ्कखण्डाभ्यां जटाभूरिव धूर्जटेः ॥१२॥ १२. यह वसुन्धरा उस दम्पति द्वारा, गंगा एवं मृगाङ्क खण्ड से शिव-जटा तुल्य शोभित हुई । मण्डलं साध्वधत्तां तौ नानावर्णमनोरमम् । शतह्रदापयोवाहौ माहेन्द्रमिव कार्मुकम् ॥१३॥ १३. उन दोनों ने नाना वर्णों से मनोरम मण्डल को समुचित रूप से उसी प्रकार धारण किया जैसे विद्युत् एवं मेघ नाना वर्ण से मनोरम इन्द्रधनुष को धारण करता है । अदल और इन्साफ से पेश आता । तुंगेश्वर और 'वाक्पुस्ता ने रामू और केमूह के देहात आबाद बैजवरह के पास हरदास का मन्दिर तामीर कराया करके बरहमनों को जागीर के तौर पर बख्श दिये । और एक निहायत ही आलीशान इमारतों वाला यह औरत अपने पेट से कोई औलाद नहीं रखती थी शहर कंग बनवाया । शहर के इर्द गिर्द समाधी का राजा के अन्त काल के वक्त उसकी लाश पर सती मन्दिर बनवाया । इसके शिखर पर एक लाख अशर- हो गयी । राजा तुंजीन की मुद्दत हकूमत ३६ बरस फियों का सोना बतौर मुलम्मा के चढ़वाया । थी।' (पृष्ठ ५३) (पृष्ठ ५३) 'कहते हैं कि मराज की हदूद में बहुत पाठभेद : से पौधे लगवाए जिसमें कि राजा की हुस्न नीयत श्लोक संख्या १३ में 'धत्तां' का 'दत्ता', 'दृप्ता' की बदौलत लगाते ही फल निकल आये । माह तथा 'नाना वर्ण' का 'नानार्णव' पाठभेद मिलता है । भादों में इस कदर बर्फबारी हुई कि फसलें सारी पादटिप्पणियाँ : की सारी तबाह व बरबाद हो गयीं । सख्त क़हत पड़ा । राजा ने अपने खजाने के मुँह खोल दिये । १३ (१) वर्ण : यहाँ 'वर्ण' शब्द श्लिष्ट है । और उनमें जिस कदर भी हीरे जवाहिरात और बह्वण वर्ण का अर्थ अनेक जातियों से पूर्ण कश्मीर सोना चाँदी थे गरीबों और मसकीनों की नज़र कर मण्डल तथा अनेक रंगों अर्थात् वर्णों से युक्त इन्द्र- दी लेकिन इस के बावजूद भी कहत दूर न हुआ । धनुष किया है । 'नेकखसलत राजा यह देखकर सख्त लाचार (२) शतह्रद-इस शब्द को विल्सन ने नदी हुआ और अपने आप को कत्ल करने पर आमादह समझा है तथा पादटिप्पणी में 'शतह्रद' को शतलज हो गया । उसको रानी इस मक़सद से आगाह हो नदी माना है । यह अर्थ गलत है । (पृष्ठ २९) गयी और उसने उसे ऐसा करने से रोका । रात के वक्त दोनों मियाँ बीबी बारगाह रब थाला हज़रत (३) पयोवहा-इसको भी विल्सन ने नदी में आजिजी और इन्कसारी में मसरूफ हुए । उनकी माना है । पादटिप्पणी में पयोवहा को व्यास नदी दुआ की कबूलियत के निशान में दो कबूतर हर सुबह समझाने का प्रयास किया है । यह अर्थ भी गलत आसमान से हरेक आदमी के घर पहुँचते । यहाँ तक है । (पृष्ठ २९) यह अर्थ स्वरसाम्यता के कारण कि क़हत की मुसीबत रफ़ा दफ़ा हो गयी । लगाने का प्रयास किया गया है ।

३८४ राजतरंगिणी चक्राते च महाभागौ विभ्रमाभरणं भुवः । तुङ्गे श्वरं हरावासं कतिकाख्यं च पत्तनम् ॥१४॥ १४. उन दोनों महाभागों ने भूमि विलास आभरण हर का आवास तुङ्गेश्वर १ तथा कतिका २ नामक पत्तन ३ का निर्माण कराया। १४ (१) तुङ्गेश्वर : यह मन्दिर कश्मीर में कहाँ पर है अभी तक पता नही चल सका है। तुङ्गेश्वर मन्दिर का उल्लेख नीलमत पुराण मे मिलता है। उसका वर्णन विष्णु, वाराह, तथा वाराह मूला के सन्दर्भ में किया गया है। देवं नारायणस्थाने पश्चिमे तु वरप्रदम् । गजेन्द्रमोक्षणं देवं वराहस्य समीपगम् ॥ 1158 : १३६९.७० वराहं नरसिंहं च बहुरूपं वरप्रदम् । सप्तर्षीणां तथैवार्थं सुमुङ्गस्य समीपगा ॥ 1159 : १३७०-१३७१ ॥ तुङ्गवासं च परदं च वरदं च स्वयंभुवम् । गुहावासं च योगीशं अनन्तं कपिलं मुनिम् ॥ 1160 : १३७१.७२ कल्हण ने तुंगेश का पुनः वर्णन तरंग ६ मे ‘तुङ्गेश्वरपणोपान्तादुज्जगाम’ किया है। (रा० ६: १९० ) तुङ्गशेष का भी उल्लेख नीलमत पुराण में आया है। यथा— बिन्दुनादेश्वरं तीर्थं सोमतीर्थं पृथूदकम् । तुङ्गेशतीर्थक्षेत्रं तु उतंकस्वामिनं तथा ॥ 1351 : १५६६ ‘तुङ्ग’ शब्द का अर्थ उन्नत, पर्वत, प्रलम्ब, मुख्य आदि होता है। तुंगेश शब्द चन्द्रमा, सूर्य, शिव, कृष्ण के लिये भी प्रयुक्त होता है। तुंगनाथ हिमालय पर स्थित एक शिवलिंग है। उसके कारण वह स्थान तीर्थस्थान माना गया है। इसे भृगुतुंग भी कहते हैं। श्राद्ध तथा पितृ कार्य के लिये पवित्र माना गया है। राजा ययाति ने यहाँ पर तप किया था। तुंगशेखर एक पर्वत है। वनपर्व महाभारत में इसे महागिरि कहा गया है। भृगु महर्षि ने यहाँ तपस्या की थी। तुंगकारण्य का उल्लेख वनपर्व (८५ : ४६) तथा तुंग वेणु एक भारतीय नदी का भीष्म पर्व (७ : २९) में उल्लेख मिलता है। वाराह पुराण तुंगकूट तीर्थ का वर्णन करता है। कोकामुख तीर्थ के सन्दर्भ में इसका उल्लेख किया गया है। वनपर्व (८४ : १५८) में वर्णन मिलना है। तुंग- तीर्थ में स्नान करने पर पूर्व जन्म की स्मृति जागृत होती है। विष्णु के तीन प्रसिद्ध तीर्थ स्थान कहे गये हैं—कोकामुख बद्री नारायण तथा लोहागंल । कोकामुख क्षेत्र को वाराह क्षेत्र कहते हैं, यह नेपाल, में सुवर्ण कोसिशी अर्थात् सुनकोसी नदी के वाम तट पर, ‘वराह छत्र’ नगर अर्थात् वाराह क्षेत्र है। काठमांडू से १२४ मील दक्षिण है। यह धौलागिरि है। (२) कतिका-कतिक—यह वर्तमान ग्राम कई है। उत्तर परगना मे है। वितस्ता के दक्षिण तट पर है। नदी से बहुत दूर नहीं है। चचपोर ग्राम के समीप है। (३) पत्तन—लोक प्रकाश पत्तन की परिभाषा देता है : ग्रामायुतसहस्राणां पत्तनं शस्यते बुधैः । तत्रापि सारं नगरं तत्यौराः पुरवासिनः ॥ पृ० ५९ श्लोक सं० ४ [दस सहस्र ग्राम वाले स्थान को पत्तन कहते हैं उसमें भी मूल (सार) को नगर कहते हैं। वहाँ के रहने वाले को पौर (पुरवासी) कहते हैं।]

द्वितीय तरंग ३८५ क्वचिन्मडवराज्यान्तःस्थाने चण्डात्तपोज्ज्वले । तत्प्रभावेन फलितं वृक्षैस्तत्क्षणरोपितैः ॥१५॥ १५. मडव्य' राज्यान्तर्गत किसी चण्डावतपोज्ज्वल स्थान में उनके प्रभाव द्वारा तत्क्षण-रोपित वृक्ष फल युक्त हुए थे। पाठभेद : श्लोक संख्या १५ में 'मडवराज्या' का 'मडवरप्य', 'मारवराज्या'; 'तपोज्ज्वले' का 'तपोल्वने' तथा 'वेन' का 'प्रभावेण' पाठभेद मिलता है। पादटिप्पणियाँ : १५ (१) मडव राज्य : काश्मीर अत्यन्त प्राचीन काल से दो अंचलों में विभक्त है। उनका आजकल का नाम मराज तथ कमराज है। कामराज्य का अपभ्रंश कमराज तथा मडवराज्य काअपभ्रंश मराज है। श्रीनगर से वितस्ता के अधोभागवर्ती परगने कमराज तथा श्रीनगर से ऊपर वितस्ता के दोनों तटवर्ती परगने मडवराज के काश्मीर उपत्यका के उत्तरी पश्चिमी ७ परगने सुयहोम, जैनगिर, लोलो, उत्तर, मच्छपुर, हमल तथा द्रुहिन हैं। आईने अकबरी में अबुल फजल ने दोनों भागों की सीमा दोनों विभागों का मध्यवर्ती केन्द्र वर्तमान शेर-गढ़ी राज्य भवन का स्थान माना है। मराज कश्मीर उपत्यका का पूर्वीय भाग था। कमराज पश्चिमी भाग था। (आईने अकबरी २: ३६८) अबुल फजल ३८ परगनों में कश्मीर को विभाजित करता है। श्रीनगर मराज में था। उसके ऊपर के सभी परगने भी मराज में थे। हिन्दूराज्य काल में दोनों का प्रशासकीय विभाजन किस प्रकार था। निश्चयात्मक रूप से कहना कठिन है। लोक प्रकाश ने मराज की सीमा दी है : मध्ये मराजमित्युक्तं ग्रामपञ्चसहस्रकम् । धौवन्तकादारभ्य मनुवान्तं स्मृतं बुधैः ॥ ३ ॥ मनुवाराजभित्युक्तः पूतनाख्यस्थले किल । सतीसरसि प्रामाणां यथप्रमाणमुदीरितम् ॥ ४ ॥ —पृष्ठ ७८ ...मध्यस्थित, ५ सहस्र ग्रामों की 'मराज' और ४६ धौवन्तक से लेकर मनुवान्त को पवित्र होने के कारण मनुवाराज कहते हैं। सतीसर (कश्मीर) में ग्रामों का जो प्रमाण कहा गया है वह निम्न है। इसी प्रकार कमराज की भी परिभाषा दी गयी है। खोयाध्र्मिकादारभ्य कामराजं स्मृतं बुधैः । वातूललहरान्तं च नगरैः परिवारितः ॥ १ ॥ —पृष्ठ ७७ इस श्लोक में 'वातूल' का पाठभेद 'चामूल' भी प्राप्त है। यह पाठ समुचित प्रतीत होता है। खोयाध्र्मिक से लेकर लहर के अन्त तक नगरों से परिवृत क्षेत्र को विद्वानों ने कामराज कहा है। इस समय राज्य तीन प्रदेशों में विभक्त है—कश्मीर, जम्मू और लद्दाख। स्वाधीनता पूर्व के कश्मीर राज्य का तृतीयांश भूखण्ड इस समय पाकिस्तान के पास अनधिकृत रूप से हैं। कश्मीर उपत्यका बनिहाल मूल से आरम्भ होकर एक दिशा में लोलाव तथा दूसरी दिशा में बारहमूला तक विस्तृत है। लम्बाई चौरासी मिल तथा चौड़ाई चौबीस मिल है। अनन्त नाग के समीप केवल दस या बीस मील चौड़ी है। यह कश्मीर का हृदय है। डोगरा राज्य काल में जम्मू, कश्मीर तथा सर-हदी इलाकों के सूबों में विभक्त था। जम्मू प्रदेश में; जम्मू, उधमपुर, मीरपुर, कठुआ, पूंछ तथा चनेनी जिले थे। कश्मीर प्रदेश में अनन्त नाग, बारहमूला, मुजफ्फराबाद जिले थे। सरहदी इलाका में लद्दाख, गिलगित, तथा गिलगित आझेन्सी के जिले थे। पाकिस्तान के पास अनधिकृत रूप से मीरपुर जिला की तहसील भीमबर, तथा चार गांव, छम, देवा, चकला, तथा मनावर के अतिरिक्त शेष जिला है। पूंछ जिला में, जागीर पूंछ के बाग की पूरी तहसील, तथा हवेली की आधी तहसील पाकिस्तान

३८६ राजतरंगिणी नाट्यं सर्वजनग्रेक्ष्यं यश्चक्रे स महाकविः । द्वैपायनमुनेरंशस्तत्काले चन्दकोऽभवत् ॥१६॥ १६. उसी के समय जिसने सर्व जन प्रेक्ष्य नाट्य का निर्माण किया, वह द्वैपायन¹ मुनि का अंशभूत महाकवि चन्दक² था ।

के पास है। मुजफफराबाद जिला में मुजफ्फराबाद, उरी की आधी तहसील, और तीन चौथाई करनाट पाकिस्तान के पास है। गिलगित का दूसरा इलाका पहले का हिंदूसीक्षेत्र, लद्दाख सूबा में स्करदा की तहसील, मारवा का थोड़ा भाग तथा करगिल की एक चौथाई तहसील पाकिस्तान के पास है ।

डोगरा राज्य काल के पश्चात अक्तूबर सन् १९४७ से जनवरी सन् १९४६ तक पाकिस्तान से संघर्ष था । जम्मू कश्मीर राज्य इस समय निम्नलिखित विभागो में विभक्त है—जम्मू प्रदेश में शम्मू, कठुआ उधमपुर, डोडा, नव शहर के जिले हैं। कश्मीर प्रदेश में श्रीनगर, अनन्त नाग और बारह मूला है। सरहदी इलाकाजात में लद्दाख का जिला है उसमें करगिल सम्मिलित है। पहली जनवरी सन् १९४९ को युद्ध विराम रेखा के आधार पर विभाग किया गया है। यह युद्ध विराम रेखा मुवावर तहसील भीमवर से आरम्भ हो कर, देवह, और बटाला के बीच होकर नौशेरा और राजोरी के करीब से जाती है। पूंछ का शहर बायीं ओर छोड़कर उसी के दरमियान से झेलम के उस पार से होती हुई काजी नाग तक गयी है। काजी नाग से आगे बढ़कर टिटवल के क्गेव से हो कर धरमर्षा गली के साथ बेरम में जाती है। यहाँ से पूरव तरफ गुरेज से हो कर, करगिल कगया के बीच से होकर, तहसील इस्क-रदू की बाटली तहसील लद्दाख तक चली जाती है।

सन् १९४१ के बाद कश्मीर में जनगणना नहीं हुई। उस समय की जनगणना के अनुसार जम्मू कश्मीर राज्य की आबादी ४०,३४,९८० थी । कश्मीर प्रदेश की आबादी १७,२८,६००, जम्मू प्रदेश की १५,६१, ५८०, सरहदी इलाके अर्थात् लद्दाख करगिल में ३,११,१००, जागीर पूंछ में ५, २१, ७०० और चनेनी में ११,८०० लोग आबाद थे। उसमें मुसलमान ३०, ७३, ५४०, सवर्ण हिन्दू, ५, ८६, ६२१, हरिजन १, १३, ४६४, सिख ६५, ९०३, बौद्ध ईसाई जैन आदि ८८,०८८ थे। पूरा क्षेत्रफल लगभग ८४ हजार वर्ग मील था । प्रति मिल में औसतन ४७ व्यक्ति निवास करते थे । सरहदी क्षेत्र में प्रति मिल ९ व्यक्ति निवास करते थे। भारतीय क्षेत्र अधिक उपजाऊ तथा कम पहाड़ी है। पाकिस्तानी भाग पहाड़ी और वन घन से भरा है।

युद्ध बन्दी के पश्चात् भारतीय कश्मीर की आबादी में ६० प्रतिशत मुसलमान तथा ४० प्रति शत हिन्दू है। पाकिस्तान में अनधिकृत कश्मीर में १३ लाख मुसलमानों की आबादी थी। भारतीय क्षेत्र में १८ लाख मुसलमान हैं। उसमें १६ लाख केवल कश्मीर उपत्यका में हैं। केवल २ लाख सूबा जम्मू में हैं। गैर मुस्लिम जम्मू में १० लाख और कश्मीर सूबा में २ लाख हैं। इस प्रकार १८ लाख मुसलमान तथा १२ लाख गैरमुस्लिम इस समय आबाद हैं। पाकिस्तान में १२ लाख सबके सब मुसलमान हैं। सन् १९६१ की जनगणना के अनुसार जम्मू कश्मीर की भारतीय भाग की आबादी ३५,८३,००० और क्षेत्रफल २२२८०२ वर्ग किलोमीटर है। सन् १६४१ की गणना अनुसार इस क्षेत्र की आबादी ३०,००,००० थी ।

कश्मीर राज्य का विभाजन तथा पुनर्गठन अनेक बार हुआ है। प्राचीन भूगोल तथा विभाग से आज का विभाजन सर्वथा भिन्न है।

पाठभेद : श्लोक संख्या १६ में 'यश्चक्रे' का 'यच्चक्रे'; 'कवि:' का 'कवे;' 'पायन' का 'पायनं' तथा 'चन्दको'

द्वितीय तरंग १३७ का पाठभेद ‘चम्बूको’ और ‘चर्मंको’ मिलता है । पादटिप्पणियाँ : १६( १ ) द्वैपायन : व्यास पाराशर्य का नाम द्वैपायन है । इनका जन्म यमुनाद्वीप में हुआ था । अतएव नाम ‘द्वैपायन’ पड़ा था । (म० आ० ५४:२) इनकी माता का नाम काली था । अस्तु नाम ‘कृष्ण द्वैपायन’ भी रखा गया था । भागवत पुराण में उल्लेख आता है । वह स्वयं कृष्ण वर्ण थे । वर्ण के कारण नाम कृष्ण द्वैपायन पड़ गया था । वैशाख पूर्णिमा इनका जन्म दिन है । आषाढ़ पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा मनायी जाती है । व्यास ने वेदों की पुनर्रचना की थी । इसलिए उन्हें वेदव्यास कहा जाता है । ‘विव्यास वेदान् यस्मात्स तस्माद्व्यास इति स्मृतः।’ ( म० आ० ३७ : ७३ । ) वायु पुराण में इन्हें ‘पुराण प्रवक्ता’ कहा गया है ( वायु ६० : ११-२१; विष्णु धर्म : १७४ ) अत्यन्त कठोर तपस्या करने के कारण अनेकानेक सिद्धियाँ प्राप्त किये थे। इन्होंने दूरश्रवण, दूर दर्शन अनेक विद्याओं में प्रवीणता प्राप्त की थी । ( म० आ० : ३७:१६ । ) कौरव पाण्डवों के पितामह थे । उनके महान् हितचिन्तक रूप में उनका चरित्र चित्रण किया गया है । जनमेजय के यज्ञ मण्डप में सर्प यज्ञ के समय उपस्थित थे । वैशम्पायन ने अपने शिष्य को स्वरचित महाभारत सुनाने का आदेश दिया था । ( म० आ० ५४ ) पाण्डवों के वनवास काल में युधिष्ठिर को ‘प्रतिस्मृति विद्या’ का उपदेश दिया था । ( म० व० ३७:२७-३० ) संजय को दिव्य दृष्टि प्रदान की थी । संजय महाभारत युद्ध का आँखों देखा वर्णन धृतराष्ट्र को सुनाते थे । ( म० भी० २:९ ) संजय की दिव्य दृष्टि युद्ध के पश्चात् नष्ट हो गयी थी । (म० सौ० : ९:५८) घृताची अप्सरा से इनको शुक नामक पुत्र प्राप्त हुआ था । ( म. आ. ५७:७४ ) किन्तु स्कन्द पुराण में शुक को जाबालि ऋषि की कन्या वटिका से उत्पन्न कहा गया है । ( स्कन्द : ६८ : १४७-१४८ ) द्वैपायन चिरंजीवी हैं। वेदरक्षणार्थ उसका विभाजन किये थे । पौराणिक साहित्य तथा महाभारत का निर्माण किया था । (वायु०६०:१-१६) वेद की चार स्वतंत्र संहिताओं को बनाया था । ततः स ऋच उद्धृत्य ऋग्वेदमकल्पयत् । ( वायु० ६०:१९ ब्रह्माण्ड० ३:३४:१९) व्यास की वैदिक शिष्य परम्परा है । ऋग्वेद की शिष्य परम्परा मे, पैल, वाष्कल ( इन्द्रप्रमति ) बोध्य, याज्ञवल्क्य, पराशर, माण्डूकेय; सत्यश्रवस्, सत्यहित, सत्यश्री, शाकल्य, बाष्कलि, शाकपूर्ण, पन्नगारि, शैशिरेय, वत्स, तथा शत बलाक हैं । ऋग् वेद की २१ शाखाएँ हैं । उनमे केवल शाकल, वाष्कल एवं सांख्यायन की संहिताएँ उपलब्ध हैं । शेष दो जिनका निर्देश प्राप्त है आश्वलायन एवं मण्डूकायन है । आश्वलायन एवं सांख्य़ायन शाखाओं के प्रवर्तक कौन आचार्य थे कहना कठिन है । व्यास की यजुर्वेद की वैदिक शिष्य परम्परा में, वैशंपायन, याज्ञवल्क्य, ब्रह्मणति, तित्तिरी, माध्यंदिन, काण्व, श्यामाययाति, आसुरि एवं अलिम्प हैं । कृष्ण यजुर्वेद की ८६ शाखाम्रो में तैत्तिरीय, मैत्रायणी, कठ एव कापिष्ठल की संहिताएँ प्राप्त हैं । शुक्ल यजुर्वेद की १५ शाखाएँ हैं । उनमे केवल काण्व एवं माध्यंदिन उपलब्ध हैं । सामवेद की वैदिक शिष्य परम्परा में, जैमिनि, सुमन्तु—जैमिनि, सुत्वन—जैमिनि, सुकर्मन्—जैमिनि, पौष्पिण्ड्य, लोगाक्षि, कुथुमि, कुनितिन्, लांगलि, राणायनीय, तण्डिपुत्र, पराशर, भागवित्ति, लोम- गायनी, पाराशर्य, प्राचीन योग, आसुरायण, तथा पतंजलि हैं । सामवेद की १०० शाखाएँ हैं । उनमें केवल कौथुम तथा राणायनीय संहिताएँ प्राप्त हैं । अथर्व वेद की शिष्य परम्परा में सुमन्त, कबंध, पथ्य, देवादर्श, पिप्पलाद, जाजलि—शौनक, सैन्ध-

३८६ राजतरंगिणी नाट्यं सर्वजनप्रेक्ष्यं यश्चक्रे स महाकविः । द्वैपायनमुनेरंशस्तत्काले चन्दकोऽभवत् ॥१६॥ १६. उसी के समय जिसने सर्व जन प्रेक्ष्य नाट्य का निर्माण किया, वह द्वैपायन¹ मुनि का अंशभूत महाकवि चन्दक² था। के पास है। मुजफ्फराबाद जिला में मुजफ्फराबाद, उरी की आधी तहसील, और तीन चौथाई करनाट पाकिस्तान के पास है। गिलगित का दूसरा इलाका पहले का रिड्सोक्षेत्र, लद्दाख सूबा में स्करदा की तहसील, मारवा का थोड़ा भाग तथा करगिल की एक चौथाई तहसील पाकिस्तान के पास है। डोगरा राज्य काल के पश्चात् अक्टूबर सन् १६४७ से जनवरी सन् १६४६ तक पाकिस्तान से संघर्ष था। जम्मू कश्मीर राज्य इस समय निम्नलिखित विभागों में विभक्त है—जम्मू प्रदेश में जम्मू, कठुआ उधमपुर, डोडा, नय शहर के जिले हैं। कश्मीर प्रदेश में श्रीनगर, अनन्त नाग और बारह मूला है। सरहदी इलाकाजात में लद्दाख का जिला है उसमे करगिल सम्मिलित है। पहली जनवरी सन् १६४९ को युद्ध विराम रेखा के आधार पर विभाग किया गया है। यह युद्ध विराम रेखा मुनावर् तहसील भीमवर से आरम्भ हो कर, देवह, और बटाला के बीच होकर नौशेरा और राजौरी के करीब से जाती है। पूंछ का शहर बायी ओर छोड़कर उड़ी के दरम्यान से झेलम के उस पार से होती हुई काजी नाग तक गयी है। काजी नाग से आगे बढ़कर टिफवस के करीब से हो कर थरवयाँ गली के साथ केरन में जाती है। यहाँ से पूरव तरफ गुरेज से हो कर, करगिल कसबा के बीच से होकर, तहसील इस्क- रदू को काटती तहसील लद्दाख तक चली जाती है। सन् १६४१ के बाद कश्मीर में जनगणना नहीं हुई। उस समय की जनगणना के अनुसार जम्मू कश्मीर राज्य की आबादी ४०,३४,१८० थी। कश्मीर प्रदेश की आबादी १७,२८,६००, जम्मू प्रदेश की १५,६१, ५८०, सरहदी इलाके अर्थात् लद्दाख करगिल में ३,११,१००, जागीर पूंछ में ५, २१, ७०० और चनेनी में ११,८०० लोग आबाद थे। उसमे मुसलमान ३०, ७३, ५४०, सवर्ण हिन्दू, ५, ८६, ६२१, हरिजन १, १३, ४६४, सिख ६५, ९०३, बौद्ध ईसाई जैन आदि ८८,०८८ थे। पूरा क्षेत्रफल लगभग ८४ हजार वर्ग मिल था। प्रति मिल में औसतन ४७ व्यक्ति निवास करते थे। सरहदी क्षेत्र में प्रति मिल ९ व्यक्ति निवास करते थे। भारतीय क्षेत्र अधिक उपजाऊ तथा कम पहाड़ी है। पाकिस्तानी भाग पहाड़ी और वन धन से भरा है। युद्ध बन्दी के पश्चात् भारतीय कश्मीर की आबादी में ६० प्रतिशत मुसलमान तथा ४० प्रति शत हिन्दू है। पाकिस्तान में अनधिकृत कश्मीर में १३ लाख मुसलमानों की आबादी थी। भारतीय क्षेत्र में १८ लाख मुसलमान है। उसमें १६ लाख केवल कश्मीर उपत्यका में है। केवल २ लाख सूबा जम्मू में है। गैर मुस्लिम जम्मू में १० लाख और कश्मीर सूबा में २ लाख है। इस प्रकार १८ लाख मुसलमान तथा १२ लाख गैरमुस्लिम इस समय आबाद है। पाकिस्तान में १२ लाख सबके सब मुसलमान हैं। सन् १९६१ की जनगणना के अनुसार जम्मू कश्मीर की भारतीय भाग की आबादी ३५,८३,००० और क्षेत्रफल २२२८०२ वर्ग किलोमीटर है। सन् १६४१ की गणना अनुसार इस क्षेत्र की आबादी ३०,००,००० थी। कश्मीर राज्य का विभाजन तथा पुनर्गठन अनेक बार हुआ है। प्राचीन भूगोल तथा विभाग से आज का विभाजन सर्वथा भिन्न है। पाठभेद : श्लोक संख्या १६ में 'यश्चक्रे' का 'यच्चक्रे'; 'कविः' का 'कवेः' 'पायन' का 'पायनं' तथा 'चन्दको'

द्वितीय तरंग : ३८७ का पाठभेद 'चन्द्रको' और 'चर्मको' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : १६( १ ) द्वैपायन : व्यास पाराशर्य का नाम द्वैपायन है । इनका जन्म यमुनाद्वीप में हुआ था । अतएव नाम 'द्वैपायन' पड़ा था । (म० आ० ५४:२) इनकी माता का नाम काली था । अस्तु नाम 'कृष्ण द्वैपायन' भी रखा गया था । भागवत पुराण में उल्लेख आता है । वह स्वयं कृष्ण वर्ण थे । वर्ण के कारण नाम कृष्ण द्वैपायन पड़ गया था । वैशाख पूर्णिमा इनका जन्म दिन है । आषाढ पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा मनायी जाती है । व्यास ने वेदों की पुनर्रचना की थी । इसलिए उन्हें वेदव्यास कहा जाता है । 'विव्यास वेदान् यस्मात्स तस्माद्व्यास इति स्मृतः।' ( म० आ० ५७ : ७३ । ) वायु पुराण में इन्हें 'पुराण प्रवक्ता' कहा गया है ( वायु ६० : ११-२१; विष्णु धर्म : १७४ ) अत्यन्त कठोर तपस्या करने के कारण अनेकानेक सिद्धियां प्राप्त किये थे । इन्होंने दूरश्रवण, दूर दर्शन अनेक विद्याओं में प्रवीणता प्राप्त की थी । ( म० आ० : ३७:१६ । ) कौरव पाण्डवो के पितामह थे । उनके महान् हितचिन्तक रूप में उनका चरित्र चित्रण किया गया है । जनमेजय के यज्ञ मण्डप में सर्प यज्ञ के समय उपस्थित थे । वैशम्पायन ने अपने शिष्य को स्वरचित महाभारत सुनाने का आदेश दिया था । ( म० आ० ५४ ) पाण्डवों के वनवास काल में युधिष्ठिर को 'प्रतिस्मृति विद्या' का उपदेश दिया था । ( म० व० ३७:२७-३० ) संजय को दिव्य दृष्टि प्रदान की थी । संजय महाभारत युद्ध का आंखों देखा वर्णन धृतराष्ट्र को सुनाते थे । ( म० भी० २:९ ) संजय की दिव्य दृष्टि युद्ध के पश्चात् नष्ट हो गयी थी । (म० सौ० : ९:५८) घृताची अप्सरा से इनको शुक नामक पुत्र प्राप्त हुआ था । ( म. आ. ५७:७४ ) किन्तु स्कन्द पुराण में शुक को जाबालि ऋषि की कन्या वटिका से उत्पन्न कहा गया है । ( स्कन्द : ६८ : १४७-१४८ ) द्वैपायन चिरंजीवी हैं । वेदरक्षणार्थ उसका विभाजन किये थे । पौराणिक साहित्य तथा महाभारत का निर्माण किया था । (वायु०६०:१-१६) वेद की चार स्वतंत्र संहिताओं को बनाया था । ततः स ऋच उद्धृत्य ऋग्वेदमकल्पयत् । ( वायु० ६०:१९ ब्रह्माण्ड० ३:३४:१९) व्यास की वैदिक शिष्य परम्परा है । ऋग्वेद की शिष्य परम्परा में, पैल, बाष्कल ( इन्द्रप्रमति ) बोध्य, याज्ञवल्क्य, पराशर, माण्डूकेय, सत्यश्रवस्, सत्यहित, सत्यश्री, शाकल्य, वाष्कलि, शाकपूर्ण, पन्नगारि, शैशिरेय, वत्स, तथा दात बलाक हैं । ऋग् वेद की २१ शाखाएँ हैं । उनमें केवल शाकल, वाष्कल एवं सांख्यायन की संहिताएँ उपलब्ध है । शेष दो जिनका निर्देश प्राप्त है आश्वलायन एवं मण्डूकायन है । आश्वलायन एवं सांख्यायन शाखाओं के प्रवर्तक कौन आचार्य थे कहना कठिन है । व्यास को यजुर्वेद की वैदिक शिष्य परम्परा में, वैशंपायन, याज्ञवल्क्य, प्रजापति, तित्तिरी, माध्यंदिन, काण्व, श्यामाययाति, आसुरि एवं अलिम्प हैं । कृष्ण यजुर्वेद की ८६ शाखाओं में तैत्तिरीय, मैत्रायणी, कठ एवं कापिष्ठल की सहिताएं प्राप्त है । शुक्ल यजुर्वेद की १५ शाखाएँ है । उनमें केवल काण्व एवं माध्यंदिन उपलब्ध हैं । सामवेद की वैदिक शिष्य परम्परा में, जैमिनि, सुमन्तु-जैमिनि, सुत्वन-जैमिनि, सुकर्मन्-जैमिनि, पौष्पिण्ड्य, लोगाक्षि, कुथुमि, कुशीतिन्, लांगलि, राणायनीय, सण्डिवुत्र, पराशर, भागवित्ति, सोम- गायनी, पाराशर्य, प्राचीन योग, आमुरायण, तथा पतंजलि हैं । सामवेद की १०० शाखाएँ हैं । उनमें केवल कौथुम तथा राणायनीय संहिताएँ प्राप्त है । अथर्व वेद की शिष्य परम्परा में सुमन्त, कबन्ध, पथ्य, देवादर्श, पिप्पलाद, जाजलि-शौनक, सैन्ध-

१८४ राजतरंगिणी तयोः प्रभावमाहात्म्यजिज्ञासार्थमिवोद्यता । भयंकर अकाल १ प्रजासु दुस्सहा जातु व्यापद्वैवी व्यजृम्भत ॥१७॥ १७. कदाचित् उन दोनों का प्रभाव माहात्म्य जानने के लिये ही मानो प्रजाओं में दुस्सह दैवी आपत्ति भयंकर रूप से प्रकट हुई ।

वायन, बभ्रु, और मंजुकेश हैं। अथर्ववेद की २ शाखाएं हैं। उनमें दोनों पिप्पलाद तथा शौनक प्राप्त हैं। समस्त पुराणों की श्लोक संख्या ४,२५,००० है। उनमें १० पुराण अपूर्ण हैं। केवल ८ पूर्ण हैं। नृसिंह, भागवत, वायु एवं शिव पुराण को महापुराण नहीं माना जाता। इन पुराणों में अग्नि पुराण के देवता अग्नि हैं। गुण तामस है। स्थल नैमिषारण्य है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के देवता सूर्य हैं। गुण राजस हैं। स्थान नैमिषारण्य है। पद्मपुराण के देवता ब्रह्मान हैं। गुण सात्त्विक है। स्थान नैमिषारण्य है। पाच पुराणों के देवता विष्णु हैं। गुण सात्विक है। उनमे गरुड़ एवं नारद का स्थान नैमिषारण्य, नृसिंह का स्थान प्रयाग, भागवत का स्थान सहस्र वार्षिक सत्र, और विष्णु का स्थान दृषद्वतीतीर दीर्घसत्र है। शेष पुराणों के देवता शिव हैं। उनमें वराह और कूर्म सात्त्विक है। मार्कण्डेय, लिंग, ब्रह्माण्ड, भविष्य, तथा वामन राजसिक है। स्कन्द, मत्स्य, तथा शिव तामसिक हैं। वायु पुराण का क्या प्रधान गुण है। निश्चित नही किया जा सकता। कूर्म, लिंग, स्कन्द, ब्रह्माण्ड तथा मत्स्य का स्थान नैमिषारण्य है। भविष्य का शतानीक नृप सभा, वराह का पृथ्वी और शिव का स्थान प्रयाग है। मारकण्डेय, वायु का स्थान निश्चित नहीं हैं। व्यास का जीवन संदेश था। चतुर्विध पुरुषार्थों में केवल धर्माचरण द्वारा ही अर्थ कामादि पुरुषार्थ प्राप्य हो सकते हैं। केवल धर्म ही शाश्वत है। चिरंतन है। नित्य है। शेष सुखोपभोग एवं पुरुषार्थ अनित्य हैं। वे कितना मार्मिक वचन कहते हैं :— ऊर्ध्वबाहुर्विरौम्येष न च कश्चिच्छृणोति माम् । धर्मादर्थश्च कामश्च स किमर्थं न सेव्यते ॥ (म० स्व० २२४९)

'मैं हाथ उठाकर समस्त विश्व से कहता आ रहा हूँ कि अर्थ एवं काम से भी अधिक धर्म महत्व पूर्ण है। किन्तु कोई भी मनुष्य मेरे इस कथन की ओर ध्यान नहीं देता है।' द्रष्टव्य है पृष्ठ १८३ पादटिप्पणी-व्यास। (२) चन्द्रक : सुभाषितावलो में चन्द्रक चन्द्रगोपी नाम से सम्बोधित किया गया है। पाश्चात्य लेखक साइलवियन लेवी का मत है कि चीनी पर्यटक इत्सिंग द्वारा उल्लिखित चन्द्र ही चन्द्रक कवि हैं। तिब्बती भाषा में एक नाटक मिला है। उसमें चन्द्र- गोपिन का वर्णन है। महाकवि कल्हण ने उसकी तुलना महाभारतकार से की है। सुभाषितावली में उसके पद प्राप्त होते हैं। प्रसीदे चेतस्य प्रकटय मुदं सन्त्यज रुषम् प्रिये क्षुव्यन्त्यङ्गान्यमृतमिव ते सिञ्चतु वचः। निधानं सौख्यानां क्षणमभिमुखं स्थापय मुखं न मुग्धे प्रत्येतुं प्रभवति गतः कालहरिणः॥ ॥ १६२९ ॥ एषा हि मे रणगतस्य दृढा प्रतिज्ञा द्रक्ष्यन्ति यन्न रिपवो जघनं हयानाम्। युद्धेषु भाग्यचपलेषु न मे प्रतिज्ञा दैवं यदिच्छति जयं च पराजयं च ॥२२०५ ॥ पाठभेद : श्लोक संख्या १७ में 'दैवी' का पाठभेद 'देवी' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : १७ (१) अकाल : कल्हण ने कश्मीर के अनेक अकालों का वर्णन किया है। सम्राट् अकबर के समय में भी भीषण अकाल पड़ा था। कल्हण ने अपने काल के समीप पड़ने वाले अकालों का अर्थ भी दिया है। अकबर के समय कश्मीर में पर्यटन करने

द्वितीय तरंग ३८९ पाकोन्मुखशरच्छालीच्छन्नकेदारमण्डले । मासि भाद्रपदेऽकस्मात्पपात तुहिनं महत् ॥१८॥ महा अकाल : १८. भाद्रपद¹ मास में पकते हुए शरद् कालीन शालियुक्त क्षेत्र मण्डल में अकस्मात् महान् तुहिन पात हुआ ।

वाले ईसाई पर्यटकों ने उसका वर्णन किया है। उनके पढ़ने से रोंगटा खड़ा हो जाता है । श्री पिनोइस्ट डी गोइम् जो सम्राट् अकबर के निवेदन पर कश्मीर गये थे, वर्णन करते हैं : कश्मीर में इस अकाल के काल में हमने देखा कि बहुत सी माताएँ बे घर बार की हो गयी थीं । अपने बच्चों को कुछ खिलाने में असमर्थ हो कर उन्हें खुले ग्राम बाजारों में बेचने लगी थीं । बहुत से बालकों को पादरियों ने खरीद कर उनका बपतिस्मा कर उन्हें ईसाई बना लिया । एक मुसलमान अपना एक बच्चा बेचने के लिये लाया । पादरी ने बच्चे की माँ को कुछ धन देकर बच्चा इसलिए वापस कर दिया कि वह बड़े होने पर कश्मीर में ईसाई होकर नहीं रह सकता था । दूसरे दिन लड़के की माँ पुनः पादरी के यहाँ आई । उससे बोली कि बच्चा मरने ही वाला है । उसके घर चलकर उसका बपतिस्मा कर दिया जाय । पादरी कुछ पुर्तगालियों के साथ बच्चे के घर गया । उसके पिता की अनुमति लेकर उसका बपतिस्मा किया । मरने पर लड़के का पिता बच्चे का खतना करना चाहता था परन्तु पादरी ने खतना नहीं करने दिया और ईसाई धर्मानुसार उसे गाड़ दिया । इसी प्रकार कुछ द्रव्य लेकर एक दूसरी स्त्री अपने बच्चे का बपतिस्मा कराने के लिए ले आई । बच्चे का बपतिस्मा ज्यों ही समाप्त हुआ बच्चा मर गया । (अकबर एण्ड जिस्यूस्टा पृष्ठ ७८ ) आइने अकबरी—इस राजा के समय सूर्य जब सिंह राशि में था उस समय इतना हिमपात हुआ कि पूरी फसल नष्ट हो गई । उससे देश में भयंकर अकाल फैल गया ।

पाठभेद : श्लोक संख्या १८ मे 'च्छन्न' का 'छन्ने' तथा 'छत्रे' पाठभेद मिलता है । पादटिप्पणियाँ : १८ (१) भाद्रपद अकाल : काश्मीर का मुख्य अन्न शाली है । भारत में वर्षाकालीन फसल है। धान कई प्रकार के होते हैं । कोई साठ दिन में होता है और कोई भाद्र कार्तिक और अगहन मास तक तैयार होता है। शरद कालीन धान को भारत में अगहनिया धान कहते हैं । कश्मीर में भाद्रपद में शाली पुष्ट होने लगती है। वह पकने लगती है। कार्तिक शुक्ल पक्ष में शाली काटने को अच्छा माना जाता है । सितम्बर अक्टूबर में वह काट ली जाती है । काश्मीर के ग्रामीण क्षेत्रों में जाने का यह सबसे अच्छा समय है । फल भी हो जाते हैं । सेव, बबूगोशा अखरोट से वृक्ष लद जाते हैं । खेतों में सुवर्ण वर्ण शाली अत्यन्त सुहावनी लगती है । काश्मीर उपत्यका की मुख्य उपज शाली है । उष्ण तापमान ९४ डिगरी से ऊपर नहीं जाता । वर्ष में लगभग २६ इंच वर्षा होती है। उत्तर पूर्व का भाग उत्तर पश्चिम की अपेक्षा कम ऊँचा है । दस इंच से कम जहाँ वर्षा होती है, उसे इस समय खुश्क, दस से २५ इंच तक वर्षा वाले को खुश्कवार तथा २५ इंच से अधिक जहाँ वर्षा होती है उसे मरतूब कहते हैं । कश्मीर उपत्यका की जल वायु खुश्कवार प्रचलित कश्मीरी भाषा में कही जायगी । उसे मातदिल भी कह सकते हैं । सूर्य की रश्मि

३९० राजतरंगिणी शीतल वायु के कारण तपती नही। ग्रीष्म ऋतु आने पर फारस की खाड़ी तथा भूमध्य सागर से आती वायु के कारण साइक्लोन, अन्धड़ आता है। वर्षा होती है। फरवरी मार्च तथा माधे अप्रैल तक पानी बरस जाता है। पहाड़ियो पर वर्षा औसतन २६ इंच होती है। शीत काल में कश्मीर उपत्यका मे १६ इंच वर्षा होती है। ग्रीष्म ऋतु मे ८ इंच पानी बरसता है। अप्रैल से अक्टूबर तक तापमान ५५ से ९६ डिग्री तक रहता है। अतएव ग्रीष्म काल में हवा मातदिल और खुशगवार होती है। कश्मीर उपत्यका में केला, बरगद, पीपल, आम, अमरूदादि के वृक्ष नहीं उगते। अखरोट, चिनार, सफेदा, देवदार, वेद तथा चीड़ के वृक्ष खूब दिखाई देते हैं। सेब, नाशपाती, खुबानी, चेरी, सतालू, अखरोट, आलूवा, बादाम तथा शाक भाजी होती है। अन्नों में शाली होती है। शाली मुख्य उपज है। इसके लिये गरम और मरतूब हवा पानी की आवश्यकता होती है। जमीन समतल तथा पानी का उसमें रुकावट होना चाहिए। पहाड़ो पर सीढ़ीनुमा धान की खेती होती है। उप- त्यका के मैदान में खेतो में शाली बोयी जाती है। काश्मीर उपत्यका मे ही शाली की फसल सबसे अधिक होती है। उपत्यका की भूमि समतल तथा उपजाऊ हैं। उपत्यका के लोगों का शाली अर्थात् चावल सर्व- प्रिय भोजन है। कश्मीर राज्य में अब भी चावल- भोजी लोगो की आबादी अधिक है। दक्षिणी भाग में में भूमि समतल है। सिंचाई का सुपास है। यहाँ पर प्राचीन काल से अत्यधिक शाली पैदा होती है। अनेकानेक नागो, सरोवरों, वितस्ता तथा कुओं से सिचाई होती है। कश्मीर उपत्यका में धान बोने का समय चैत्र अर्थात् १३ अप्रैल से आरम्भ होता है। सितम्बर १५ से धान काटने का समय आरम्भ हो जाता है। हिन्दी मास से कार्तिक शुक्ल पक्ष में शाली काटने का मूहूर्त माना जाता है। कल्हण के वर्णन से प्रकट होता है कि उस समय भी खेती का यही प्रकार था। मौसम में भी परिव- र्तन नही हुआ है। शरद् ऋतु कुआर और कार्तिक का महीना होता है। भाद्रपद भादों का महीना होता है। धान कट कर शरद् अर्थात् कुआर कार्तिक में तैयार हो जाता है। भारत में धान की बोआई जुलाई अर्थात् आषाढ़ मास में होती है। विभिन्न प्रकार के धान विभिन्न समयों पर काटे जाते हैं। मुख्य फसल धान की होती है। जुलाई में बोकर अगहन या कार्तिक के अन्त में काटते हैं। कश्मीर में यह समय अप्रैल मई में बोआई तथा सितम्बर अक्टूबर में कटाई का होता है। इस समय कश्मीर राज्य में १९० हजार हेक्टर क्षेत्रफल में शाली बोयी जाती है। इस समय शाली २१० मेट्रिक टन होती है। गेहूँ केवल ६६ हजार, तथा चना ७ हजार मेट्रिक टन होता है। अतएव शाली मुख्य खाद्य पदार्थ है। शाली के बाद मक्का १७० हजार हेक्टर टन १८० हजार मीटर क्षेत्र में बोया जाता है। शरद् कालीन वायु उत्तर पश्चिम से दक्षिण पूरब बहती है। यह हवा झंझावात, साइक्लोन, उपल वृष्टि तथा शीत के साथ प्रायः उम्र होने पर आती है। कश्मीर तथा हिमाचल में तुषारपात एवं शीत- लहरी आने पर उसका तुरन्त प्रभाव दिल्ली, पंजाब तथा पश्चिम उत्तर प्रदेश पर पड़ता है। दक्षिण पूरब से चलने वाली हवा नम तथा गर्म होती है। वह मानसून होती है। उससे वर्षा होती है। कश्मीर में भाद्रपद मास मे वायु उत्तर पश्चिम से चलने लगती है। उत्तर से आने वाली वायु हिमाच्छादित तथा शीत कटिबन्ध से आने के कारण शीतल होती है। वह तापमान घटा देती है। अतएव असमय ही कश्मीर में तुषारपात हो जाता है। कल्हण ने सत्य ही इस भौगोलिक दशा, प्राकृतिक जलवायु तथा उसके प्रभाव की ओर संकेत किया है। भाद्रपद मे प्रायः शाली अधपकी हो जाती है। तुषारपात से शाली लोट जाती

द्वितीय तरंग ३९१- तस्मिन्विध्वंसयोद्धुक्तकालादृट्टहसितोपमे । न्यमज्जन् शालयः साकं प्रजानां जीविताशया ॥१९॥ १९. काल के अट्टहास सदृश, विश्व विनाश हेतु, उत्पन्न उसमें ( तुहिनपात में ) प्रजाओं की जीवित आशाओं के साथ, शालियाँ निमज्जित हो गयीं । अथाऽऽसीत्क्षुत्परिक्षामजनप्रेतकुलाकुलः । प्रकारो निरयस्येव घोरो दुर्भिक्षविप्लवः ॥२०॥ २०. क्षुधा से क्षीण जन-प्रेत-समूह-संकुल वह घोर दुर्भिक्ष विप्लव नरक¹ के प्रकार² तुल्य लगता था । हैं । तुषार के आघात से बालें टूट जाती हैं। शीत के कारण अधपकी शाली का पकना बंद हो जाता है। वह नष्टप्राय हो जाती है। केवल पुवाल तथा जीवनहीन शाली का दर्शन होता है। कश्मीर में उन दिनों कृषी तथा ऊनी वस्त्र के अतिरिक्त और कोई उद्योग-धन्धा नहीं था । शाली, मक्का, तथा फल एकमात्र जीवन यापन के साधन थे । कश्मीर उपत्यका में बाहर से आने वाला मार्ग पंजाब तथा बाहरी क्षेत्रों से दुर्गम है । अन्न यदि बाहर से उन दिनों घोड़ों, बैलों पर लाया भी जाता था, तो बहुत महँगा पड़ता था । गरीबों के साधन के बाहर उनका खरीदना हो जाता था । अन्न सरलतापूर्वक अधिक मूल्य देने पर भी नहीं मिल पाता था । कल्हण इसी ओर इस श्लोक में संकेत करता है । आजकल के विकसित सड़कों, हवाई जहाजों, ट्रकों तथा रेलवे से उस समय की परि- स्थिति पर विचार करना ठीक नहीं होगा । इन साधनों से, वह समय साधनहीन एक प्रकार से हिमालय की कुक्षि में था । जहाँ सभी कुछ कठिनता से प्राप्त हो सकता था । कल्हण ने शाली नष्ट होने पर, जीवन के सहारा न प्राप्त होने पर कश्मीर मण्डल की क्या अवस्था हुई थी उसी पर अगले श्लोकों में अकाल का हृदय- स्पर्शी अत्यन्त कष्टोत्पादक वर्णन किया है । पाठभेद : श्लोकसंख्या २० में 'कुलाकुलः' का 'समाकुलः' तथा 'प्रकारो' का 'प्राकारो' एवं 'प्रकरो' पाठभेद मिलता है । पादटिप्पणियाँ : २०. ( १ ) नरक : निरय शब्द का प्रयोग यहाँ कल्हण ने किया है । उसका अर्थ नरक होता है । स्वर्ग एवं नरक की कल्पना प्रायः सभी धर्मों में प्राप्त होती है । स्वर्ग का विलोमार्थक नाम नरक है । प्राचीन मान्यता के अनुसार मरणोत्तर अधोलोक स्थान में या अवस्था में देव इत्यादि द्वारा पापियों को उनके पाप तथा अपराधों का दण्ड दिया जाता है। शीत प्रधान देशों में नरक की कल्पना प्रायः हिमाच्छादित तथा उष्ण देशों में अग्नितप्त लोकों में की गयी है । भारतीय मान्यता के अनु- सार नरक दक्षिण दिशा अर्थात् यम की दिशा में पाताल के निम्नतम भाग में माना गया है । लगभग २८ नरकों की कल्पना की गयी है । यमराज पाप पुण्य का निर्णय कर पापियों को विभिन्न नरकों में भेजते हैं । ऋग्वेद में नरक का उल्लेख नही मिलता । ब्राह्मण काल में नरक की कल्पना मिलती है । अथर्व वेद में ( २ : १४ : २; ५ : १९ : ३) नरक स्वर्ग के विपरीत यम के क्षेत्र रूप में अभीष्ट है । वहाँ राक्षसियों तथा व्यभिचारिणियों का

३९० राजतरंगिणी शीतल वायु के कारण तपती नहीं। ग्रीष्म ऋतु आने पर फारस की खाड़ी तथा भूमध्य सागर से आती वायु के कारण साइक्लोन, अन्धड़ आता है। वर्षा होती है। फरवरी मार्च तथा आधे अप्रैल तक पानी बरस जाता है। पहाड़ियों पर वर्षा औसतन २६ इंच होती है। शीत काल में कश्मीर उपत्यका में १६ इंच वर्षा होती है। ग्रीष्म ऋतु में ८ इंच पानी बरसता है। अप्रैल से अक्टूबर तक तापमान ५४ से ९६ डिग्री तक रहता है। अतएव ग्रीष्म काल में हवा मातदिल और खुश्कवार होती है। कश्मीर उपत्यका में केला, बरगद, पीपल, आम, अमरूदादि के वृक्ष नहीं उगते। अलरोट, चिनार, सफेदा, देवदार, वेद तथा चीड़ के वृक्ष खूब दिखाई देते हैं। सेब, नासपाती, खुबानी, चेरी, समालू, अलरोट, आलूचा, बादाम तथा शाक भाजी होती है। अन्नो में शाली होती है। शाली मुख्य उपज है। इसके लिये गरम और मरतूब हवा पानी की आवश्यकता होती है। जमीन समतल तथा पानी का उसमें रुकावट होना चाहिए। पहाड़ों पर सीढ़ीनुमा धान की खेती होती है। उप- त्यका के मैदान में खेतों में शाली बोयी जाती है। काश्मीर उपत्यका में ही शाली की फसल सबसे अधिक होती है। उपत्यका की भूमि समतल तथा उपजाऊ है। उपत्यका के लोगों का शाली अर्थात् चावल सर्व- प्रिय भोजन है। कश्मीर राज्य में अब भी चावल- भोजी लोगो की आबादी अधिक है। दक्षिणी भाग में में भूमि समतल है। सिंचाई का सुपास है। यहाँ पर प्राचीन काल से अत्यधिक शाली पैदा होती है। अनेकानेक नागों, सरोवरों, वितस्ता तथा कुओं से सिंचाई होती है। कश्मीर उपत्यका में धान बोने का समय चैत्र अर्थात् १३ अप्रैल से आरम्भ होता है। सितम्बर १३ से धान काटने का समय आरम्भ हो जाता है। हिन्दो मास से कार्तिक शुक्ल पक्ष में शाली काटने का मुहूर्त माना जाता है। कल्हण के वर्णन से प्रकट होता है कि उस समय भी खेती का यही प्रकार था। मौसम में भी परिव- र्तन नहीं हुआ है। शरद् ऋतु कुआर और कार्तिक का महीना होता है। भाद्रपद भादों का महीना होता है। धान कट कर शरद् अर्थात् कुआर कातिक में तैयार हो जाता है। भारत में धान की बोआई जुलाई अर्थात् आषाढ़ मास में होती है। विभिन्न प्रकार के धान विभिन्न समयों पर काटे जाते हैं। मुख्य फसल धान की होती है। जुलाई में बोकर अगहन या कार्तिक के अन्त में काटते हैं। कश्मीर में यह समय अप्रैल मई में बोआई तथा सितम्बर अक्टूबर में कटाई का होता है। इस समय कश्मीर राज्य में १९० हजार हेक्टर क्षेत्रफल में शाली बोयी जाती है। इस समय शाली २१० मेट्रिक टन होती है। गेहूँ केवल ६६ हजार, तथा चना ७ हजार मेट्रिक टन होता है। अतएव शाली मुख्य खाद्य पदार्थ है। शाली के बाद मक्का १७० हजार हेक्टर टन १८० हजार मीटर क्षेत्र में बोया जाता है। शरद् कालीन वायु उत्तर पश्चिम से दक्षिण पूरव बहती है। यह हवा झंझावात, साइक्लोन, उपल वृष्टि तथा शीत के साथ प्रायः उग्र होने पर आती है। कश्मीर तथा हिमाचल में तुषारपात एवं शीत- लहरी आनेपर उसका तुरन्त प्रभाव दिल्ली, पंजाब तथा पश्चिम उत्तर प्रदेश पर पड़ता है। दक्षिण पूरव से चलने वाली हवा नम तथा गर्म होती है। वह मानसून होती है। उससे वर्षा होती है। कश्मीर में भाद्रपद मास में वायु उत्तर पश्चिम से चलने लगती है। उत्तर से आने वाली वायु हिमाच्छादित तथा शीत कटिबन्ध से आने के कारण शीतल होती है। यह तापमान घटा देती है। अतएव असमय ही कश्मीर में तुषारपात हो जाता है। कल्हण ने सत्य ही इस भौगोलिक दशा, प्राकृतिक जलवायु तथा उसके प्रभाव की ओर संकेत किया है। भाद्रपद में प्रायः शाली अधपकी हो जाती है। तुषारपात से शाली लोट जाती

द्वितीय तरंग ३९१ तस्मिन्विध्वंसयोद्युक्तकालाट्टहसितोपमे । न्यमज्जन् शालयः साकं प्रजानां जीविताशया ॥१९॥ १९. काल के अट्टहास सदृश, विश्व विनाश हेतु, उत्पन्न उसमें ( तुहिनपात में ) प्रजाओं की जीवित आशाओं के साथ, शालियाँ निमज्जित हो गयीं । अथाऽऽसीत्क्षुत्परिक्षामजनप्रेतकुलाकुलः । प्रकारो निरयस्येव घोरो दुर्भिक्षविप्लवः ॥२०॥ २०. क्षुधा से क्षीण जन-प्रेत-समूह-संकुल वह घोर दुर्भिक्ष विप्लव नरक¹ के प्रकार² तुल्य लगता था ।

हैं । तुषार के आघात से बालें टूट जाती हैं । शीत के कारण अधपकी शाली का पकना बंद हो जाता है । वह नष्टप्राय हो जाती है । केवल पुवाल तथा जीवनहीन शाली का दर्शन होता है । कश्मीर में उन दिनों कृषि तथा ऊनी वस्त्र के अतिरिक्त और कोई उद्योग-धन्धा नहीं था । शाली, मक्का, तथा फल एकमात्र जीवन यापन के साधन थे । कश्मीर उपत्यका में बाहर से आने वाला मार्ग पंजाब तथा बाहरी क्षेत्रों से दुर्गम है । अन्न यदि बाहर से उन दिनों घोड़ों, बैलों पर लाया भी जाता था, तो बहुत महँगा पड़ता था । गरीबों के साधन के बाहर उनका खरीदना हो जाता था । अन्न सरलतापूर्वक अधिक मूल्य देने पर भी नहीं मिल पाता था । कल्हण इसी ओर इस श्लोक में संकेत करता है । आजकल के विकसित सड़कों, हवाई जहाजों, ट्रकों तथा रेलवे से उस समय की परि- स्थिति पर विचार करना ठीक नहीं होगा । इन साधनों से, यह समय साधनहीन एक प्रकार से हिमालय की कुक्षि में था । जहाँ सभी कुछ कठिनता से प्राप्त हो सकता था । कल्हण ने शाली नष्ट होने पर, जीवन के सहारा न प्राप्त होने पर कश्मीर मण्डल की क्या अवस्था हुई थी उसी पर अगले श्लोकों में अकाल का हृदय- स्पर्शी अत्यन्त कष्टगोलादक वर्णन किया है ।

पाठभेद : श्लोकसंख्या २० में 'कुलाकुलः' का 'समाकुलः' तथा 'प्रकारो' का 'प्राकारो' एवं 'प्रकरो' पाठभेद मिलता है । पादटिप्पणियाँ : २०. ( १ ) नरक : निरय शब्द का प्रयोग यहाँ कल्हण ने किया है । उसका अर्थ नरक होता है । स्वर्ग एवं नरक की कल्पना प्रायः सभी धर्मों में प्राप्त होती है । स्वर्ग का विलोमार्थक नाम नरक है । प्राचीन मान्यता के अनुसार मरणोत्तर अधोलोक स्थान में या अवस्था में देव इत्यादि द्वारा पापियों को उनके पाप तथा अपराधों का दण्ड दिया जाता है। शीत प्रधान देशों में नरक की कल्पना प्रायः हिमाच्छादित तथा उष्ण देशों में अग्नितप्त लोकों में की गयी है । भारतीय मान्यता के अनु- सार नरक दक्षिण दिशा अर्थात् यम की दिशा में पाताल के निम्नतम भाग में माना गया है । लगभग २८ नरकों की कल्पना की गयी है । यमराज पाप पुण्य का निर्णय कर पापियों को विभिन्न नरकों में भेजते हैं । ऋग्वेद में नरक का उल्लेख नहीं मिलता । ब्राह्मण काल में नरक की कल्पना मिलती है । अथर्व वेद में ( २ : १४ : २; ५ : १९ : ३ ) नरक स्वर्ग के विपरीत दम के क्षेत्र रूप में अभीष्ट है । वहाँ राक्षसियों तथा व्यभिचारियों का

३९२ राजतरंगिणी

[बायाँ स्तम्भ] आवास रहता है। जैमिनीय उपनिषद् ब्राह्मण में (४:२६:१) नरक का उल्लेख मिलता है 'मनो नरको वाङ्नरकः प्राणो नरकश्चक्षुर्नरका श्रोत्रं नरकस्त्वङ्नरको हस्तौ नरको गुदं नरकः शिश्नः नरकः पादौ नरकः' पुनः इसी ग्रन्थ में उल्लेख मिलता है (४:२५:६) 'दश पुरुये स्वर्गनरकाणि तान्येनं स्वर्गं गतानि स्वर्गं गमयन्ति नरकं गतानि, नरकं गमयन्ति' । विष्णु तथा भागवत पुराण में नरकों का विशद वर्णन मिलता है। भागवत पुराण (५:२६:५) नरक त्रिलोक में है। दक्षिण दिशा तथा पृथ्वी के नीचे किन्तु जल के ऊपर स्थित है। विष्णु पुराण नरकों की स्थिति जल एवं स्थल दोनों के नीचे मानता है। (२:६:१) नरकों की संख्या निश्चित नहीं है। विष्णु पुराण ७ नरको की कल्पना करता है। किन्तु भागवत में यह संख्या २८ तक पहुँच गयी है। प्रायश्चित स्वरूप यातनाओ के भोगने के स्थान नरक के २८ नाम है (१) तामिस्र (२) अंध तामिस (३) रौरव (४) महारौरव (५) कुंभीपाक (६) काल- सूत्र (७) असिपत्रवन (८) सूकरमुख (९) अंध कूप (१०) कृमि भोजन (११) संदंश (१२) तप्त सूरिम (१३) वज्रकंटक शाल्मली (१४) वैतरणी (१५) पूयोद (१६) प्राणरोध (१७) विशसन (१८) लाला- भक्ष (१९) सारमेयादन (२०) अवीचि (२१) अयः- पान (२२) क्षारकदम (२३) रक्षोगणभोजन (२४) शूलप्रोत (२५) दंदशूक (२६) अवनिरोधन (२७) पर्यावर्तन तथा (२८) सूचीमुख । सूर्यपुत्र यमराज नरक का शासन सूत्र चलाते हैं। मरणासन्न प्राणी को यम के दूत संयमनी पुरी में ले जाते हैं। चित्रगुप्त उनके पाप पुण्य का लेखा जोखा उपस्थित करते हैं। पुण्यात्माओं को उनके पुण्य फल भोगने के लिये स्वर्ग तथा पापियों को नरक में भेजते हैं ।

[दायाँ स्तम्भ] अपने कर्मों के अनुसार जिन्हें मुक्ति नहीं मिलती ये पुण्य का फल स्वर्ग तथा पाप का फल नरक में भोगकर पुनः पुण्य-पाप रूप कर्मों के साथ इस लोक में जन्म लेते हैं। यहूदी लोगों के नरक की कल्पना पुरातन बाइ- बिल में है। उसे 'शिउल' कहते हैं। वह मृतात्माओं का आवास है। ईसाई मान्यता के अनुसार मनुष्यों की रचना से पूर्व भगवान् ने स्वर्गदूतों की सृष्टि की थी। उन स्वर्गदूतों के एक वर्ग ने ईश्वर के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। वे विद्रोही नरकगामी हुए। उनका नेता शैतान बन गया। इस नरक अर्थात् हेल में पापी मनुष्य भी पहुँच जाते हैं। मुसलमान लोग नरक को दोजख कहते हैं। यह शब्द जहन्नुम अरबी शब्द का पर्याय है। यह वह स्थान है जहाँ अग्नि धधकती रहती है। अल्लाह पर विश्वास न लाने वाले तथा उसके आदेश को न मानने वाले, दूसरे देवता की पूजा करने वाले दोजख में जाते हैं। दोजख में दण्ड भोगने के पश्चात् वे एराफ में भेज दिये जाते हैं। पारसी धर्म के नरक की कल्पना के अनुसार यह उत्तर दिशा में अत्यन्त शीतल स्थान है। उसे 'द्रजो देमन' ( द्रुजोश्मन ) कहते हैं। यह अत्यन्त दुर्गंध पूर्ण अन्धकारमय असह्य शीतल क्रन्दनपूर्ण है। (२) प्रकार: यहाँ कल्हण ने 'प्रकार' किंवा 'प्रकारो' शब्द का प्रयोग नरक के विशेषणरूप में किया है। 'प्रकार' का पाठभेद 'प्राकारो' भी मिलता है। श्रो स्टीन ने इसका अनुवाद नरक के एक प्रकार किंवा भेद के अर्थ में किया है। श्रो पण्डित ने प्रकार शब्द का अनुवाद 'स्ट्रोंग होल्ड अर्थात् दुर्ग' किया है। प्राकार का अर्थ नगर की रक्षा के लिये निर्मित परकोटा, चहार दिवारी अथवा शहर पनाह होता है। अनेक अनुवादकों ने इस का विभिन्न अर्थ किया है। मैंने मूल शब्द प्रकार ही रख दिया है। प्रकार शब्द हिन्दी में प्रचलित और बोधगम्य है।

द्वितीय तरंग ३९३ पत्नीप्रीतिं सुतस्नेहं पितृदाक्षिण्यमातुरः । कुक्षिम्भरिः क्षुदुत्तप्तो विसस्माराखिलो जनः ॥२१॥ २१. कुक्षिम्भरि' एवं क्षुधातप्त निखिल आतुर जनों ने पत्नी-प्रेम, सुत-स्नेह तथा पितृ समादर को विस्मृत कर दिया था। क्षुत्तापाद् व्यस्मरल्लज्जामभिमानं कुलोन्नतिम् । अशनाहंक्रियाघ्रातो लोकोऽलक्ष्मोकटाञ्चितः ॥२२॥ २२. दारिद्र्य दृष्टि ग्रस्त एवं अशन हेतु ही क्रिया प्रवृत्त लोक, क्षुधा ताप से लज्जा, स्वाभिमान, एवं कुल गौरव को विस्मृत कर दिया था। क्षामं कण्ठगतप्राणं याचमानं सुतं पिता । पुत्रो वा पितरं त्यक्त्वा चकार स्वस्य पोषणम् ॥२३॥ २३. क्षाम' तथा कण्ठगत प्राण वाले याचना करते पुत्र को पिता ने, क्षामादियुक्त पिता को पुत्र ने त्याग कर, अपना ही पोषण किया। स्नाय्वस्थिशेषे वीभत्से स्वदेहेऽहंक्रियावताम् । अभूद्भोज्यार्थिनां युद्धं प्रेतानामिव देहिनाम् ॥२४॥ २४. स्नायु एवं अस्थि मात्रावशिष्ट वीभत्स स्वदेह निमित्त क्रिया करने वाले भोज्यार्थी प्राणियों का प्रेतों तुल्य युद्ध होता था। रूक्षाभिभाषी क्षुत्क्षामो घोरो दिक्ष्वक्षिणी क्षिपन् । एक एको जगज्जीवैरियेष स्वात्मपोषणम् ॥२५॥ २५. कटुभाषी, क्षुधा-क्षाम एवं भयंकर दिशाओं में दृष्टिपात करने वाला एक-एक व्यक्ति जगत् जीवों से आत्म पोषण की इच्छा करता था। तस्मिन्महाभये घोरे प्राणिनामतिदुस्सहे । ददृशे लोकनाथस्य तस्यैव करुणार्द्रता ॥२६॥ २६. प्राणियों के उस अति दुस्सह एवं घोर महाभय में केवल उसी लोकनाथ (राजा) की करुणार्द्रता देखी गयी। पादटिप्पणियाँ : मिलता है । २१ (१) कुक्षिम्भरि : उदर पूति की चिन्ता पादटिप्पणियाँ : मात्र जिनको रहती है, उनको कुक्षिम्भरि अर्थात् २३ (१) साम : अत्यन्त दुर्बल, भूख से कृश कुक्षि भरने वाला कहा जाता है । हुए, कंकाल मात्र प्राणियों के लिये क्षाम शब्द का पाठभेद : प्रयोग किया गया है । श्लोक संख्या २२ में 'स्मरत्' का 'व्यस्मरन् तथा पाठभेद : 'लोकोऽलद्मी' का पाठभेद 'लोको लदमो' मिलता है। श्लोक संख्या २६ में 'मतिदुःसहे' का पाठभेद : , श्लोक संख्या २३ में 'पुत्रो' का पाठभेद 'गुतो' 'मितिदुःसहे' मिलता है। ५०