राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
४२८ राजतरंगिणी नवराजोचिताचारे न स शिक्षामपैक्षत । दृढकर्मा समस्तास्तु निस्तुषाः प्रक्रिया व्यधात् ॥ ११८ ॥ ११८. अनुभवी उसने नये नृप के उचित आचार हेतु शिक्षा की अपेक्षा नहीं की, उसने समस्त प्रक्रियाओं को सरल कर दिया। स राजोचितनेपथ्यः पौराशीर्घोषशोभिनीम् । सौधोन्मिपल्लाजवर्षां ससैन्यः प्राविशत्पुरीम् ॥ ११९ ॥ ११९. राज्योचित परिधानयुक्त उसने सेना के साथ, पुरवासियों के आशीर्घोष से रम्य एवं सौधों से उन्मिषित लाजवृष्टि पूर्ण पुरी में प्रवेश किया। तस्मिन्विरजसि प्राज्यमाक्रामति नृपासनम् । आचक्राम प्रजा व्यापन्न दैवी न च मानुषी ॥ १२० ॥ १२०. महान् नृपासन पर रजोगुण रहित उसके आसीन होने के पश्चात् प्रजा पर दैवी एवं मानुषी आपत्ति नहीं आयी। अहरन्हृदयं तस्य शृङ्गारहितविभ्रमाः । नितम्बिन्यो वनभुवः शमिनो न तु योषितः ॥ १२१ ॥ १२१. शमी उसके हृदय को शृङ्गार हित विभ्रम शालिनी एवं नितम्बिनी¹ वनभूमियों ने अपहरण किया, न कि (एवंभूत) योषिताओं ने। श्री एस. पी. पण्डित ने यह समय ईशा पूर्व २४ (१) नितम्ब : इस श्लोक में नितम्ब एवं वर्ष तथा राज्य काल ४७ वर्ष माना है। शृंगारहित विभ्रम श्लिष्ट है। श्री स्टीन ने अभिषेक का समय लौकिक संवत् नितम्ब का अर्थ पर्वत का निम्न प्रदेश तथा ३०४१ तथा राज्य काल ४७ वर्ष माना है। रमणी का नितम्ब अर्थात् कटि प्रदेश का निम्न श्री शास्त्री ने यह समय सप्तर्षि संवत् ३९४२ भाग होता है। तथा सन् १७५ ई० दिया है। शृंगारहितविभ्रम का एक अर्थ शृंगो से पाठभेद : शोभमान और अपर अर्थ शृंगार के लिये विलास- श्लोक संख्या ११८ में 'पैक्षत' का पाठभेद शालिनी रमणी होता है। 'पेक्षत' मिलता है। शृंगार एवं शान्त रस परस्पर विरोधी है। श्लोक संख्या ११९ में 'सौधोन्मि' का 'सौधोमि' परन्तु यहाँ कल्हण ने दोनो के अपुष्ट रूप का एक तथा 'ससैन्य' का पाठभेद 'ससैन्या' मिलता है। साथ चित्रण किया है। इसी प्रकार भर्तृहरि ने पादटिप्पणियां : निम्नलिखित श्लोक में इसको अभिव्यक्त किया है। १२१ : इस श्लोक का एक अर्थ यह भी होता है— "मात्सर्यमुत्सार्य विचार्यकार्य- "शमी उसके हृदय को शृंगों से शोभायमान सुन्दर मार्याः समर्यादमिदं वदन्तु। उपत्यका वाली वनभूमियों ने अपहृत किया न कि सेव्या नितम्बा किमु भूधराणामुत शृंगार के लिये विलासवती नितम्बिनी योषिताओने।" स्मितस्मेरविकासिनीनाम् ॥"
द्वितीय तरंग ४२९ वनप्रसूनसंपर्कपुण्यगन्धैस्तपस्विनाम् । कर्पूरधूपसुरभिः करैः स्पृष्टः स पिप्रये ॥ १२२ ॥ १२२. कर्पूर १ एवं धूप २ से सुरभित वह, तपस्वियों के वनपुष्प संपर्क से पुण्यगन्ध- शाली करों का स्पर्श प्राप्तकर, प्रसन्न हुआ । भूतेशवर्धमानेशविजयेशादपश्यतः । नियमो राजकार्येषु तस्याऽभूत्प्रतिवासरम् ॥ १२३ ॥ १२३. भूतेश १, वर्धमानेश २, तथा विजयेश ३ का जब दर्शन नहीं करता था, उस समय प्रति दिन राज्य कार्य ही उसका नियम हो गया था ।
पाठभेद : श्लोक संख्या १२२ में 'स्पृष्टः' का पाठभेद 'पृष्टः' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : १२२ (१) कपूर—कपूर का शिव की पूजा में बहुत महत्व है । कर्पूर से भगवान् के वर्ण की उपमा दी गयी है । कपूर से आरती करने की प्रथा सर्वत्र भारत में प्रचलित है । कपूर का गुण शीतलता है । वह सुगन्धित होता है । उसकी सुगन्धि सात्त्विक होती है । कुछ विचित्र गति है । कपूर शीतल होते हुए भी गुणकारी होते हुए भी अपने में अग्नि छिपाये बैठा रहता है । अग्निस्पर्श से वह ज्योतिर्मय हो जाता है । स्पर्श गुण से कितना अन्तर वस्तु परिस्थितियों में हो जाता है । कपूर उसका ज्वलन्त उदाहरण है । शीतल होते हुए भी दाहक हो जाता है । इस समय कपूर के तीन वर्ग हैं । जापानी और चीन का बना भीमसेनी अथवा बरास द्वारा निर्मित और भारतीय अथवा पत्री कपूर । यह उड़नशील वनस्पति से बना पदार्थ है । जापानी नाम से प्रसिद्ध कपूर का पौधा चीन, जापान, फारमूसा तथा दक्षिण पूर्व एशिया के देशों में मिलते हैं । इसका पौधा देहरादून, सहारनपुर, नीलगिरि तथा मैसूर में मिलता है । नेपाल में भी इसके वृक्ष होते हैं । भारत में यह कपूर की पत्तियों तथा जापानादि में पचास वर्ष के ऊपर के वृक्षों के काष्ठ के आसवन से निकाला जाता है । भीमसेनी कपूर सुमात्रा तथा बोर्नियो ( वरुण द्वीप ) में होता है । इसको पहचान यह है कि जल में डालने से यह डूब जाता है । आज कल कृत्रिम कपूर का व्योहार बढ़ गया है । कपूर का गुण वातनाशक होता है । कफघ्न भी होता है । विसूचिका तथा त्वचा रोग में विशेष लाभकारी और कृमी नाशक होता है । काश्मीर उपत्यका में कपूर का बाहर से ही आयात होता था । ( २ ) धूप-देव निमित्त सुगन्धि के लिये जलाये जाने वाले सभी पदार्थों का समावेश धूप शब्द में हो जाता है । धूप गन्ध का प्रयोग प्रायः एक साथ मिलता है । धूप के पाँच भेद—निर्यास, चूर्ण, गन्ध, काष्ठ एवं कृत्रिम होता है । काश्मीर में सूखे पर्वतीय पादपों की जड़ तथा देवदार काष्ठ का चूर्ण आदि मिला कर बनाया जाता है । पर्वतीय एक पादप का नाम ही काश्मीर में धूप या धूप है । धूपवत्ती, अगरबत्ती विभिन्न सुगन्धियाँ इसी वर्ग में आती हैं । १२३ ( १ ) भूतेश : टिप्पणी पृष्ठ १४९ द्रष्टव्य है । ( २ ) वर्धमानेश : स्थानीय जनश्रुति के अनुसार यह स्थान वितस्ता नदी के दक्षिण तट पर है । श्रीनगर का गणपतयार मुहल्ला या गणेश घाट है । वितस्ता माहात्म्य में इसका उल्लेख है । माहात्म्य के अनुसारवर्धमानेश्वर गणपति तीर्थ के समीप था । सन् १८८८ में पड़ोस के रहने वाले पुरोहितों ने मल्यार
४३० राजतरंगिणी
हरायतनसोपानक्षालनाम्भःकणाञ्चितैः । संस्पृष्टः पवनैः सोऽभूदानन्दास्पन्दविग्रहः ॥ १२४ ॥ १२४. हरायतन सोपानों के धोने वाले (समुत्थित) जल कण से व्याप्त पवन के संस्पर्श से उसका शरीर आनन्द के कारण स्पन्दित हो जाता था ।
पूर्वपूजापनयने निराडम्बरसुन्दरः । तेनैव द्रष्टुमज्ञायि स्नापितो विजयेश्वरः ॥ १२५ ॥ १२५. उसने पूर्व पूजा सम्भार को हटने पर बिना आडम्बर के सुन्दर स्नापित विजयेश्वर दर्शन को दर्शन माना ।
लिङ्गपीठलुठत्स्नानकुम्भाम्भःक्षोभभूध्वनिः । शयानस्याऽप्यभूत्तस्य वल्लभो वल्लकीद्विपः ॥ १२६ ॥ १२६. शयन करते हुए भी उस वीणा द्वेषी को लिङ्ग पीठ पर लुंठित होते स्नान कुंभ जल के क्षोभ¹ की प्रचुर ध्वनि प्रिय हुई ।
घाटके निकट मन्दिर का निर्माण कराया । इस मन्दिर में स्थापित शिव लिंग प्राचीन मन्दिर का ही शिव लिंग है । वह एक मस्जिद के शमादान अर्थात् दीवट के काम में लाया जाता रहा । मस्जिद की दीवार प्राचीन वर्धमानेश्वर मन्दिर के अलंकृत शिलाखण्डों तथा भग्नावशेषों से बनायी गयी है । पश्चिम बंगाल वर्धमान का शुद्ध नाम वर्द्धमान है । यह रेलवे का बहुत बड़ा जंकशन तथा आसनसोल कलकत्ता के बीच है । (३) विजयेश : टिप्पण पृष्ठ ४ विजयेश द्रष्टव्य है । पाठभेद : श्लोक संख्या १२५ में 'निराडम्बर' का 'विरा- डम्बर,' 'निजडम्बर' तथा 'स्नपितो' का पाठभेद 'स्नापितो' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : १२५ उक्त श्लोक का भावानुवाद श्री स्तीन तथा श्री पण्डित ने किया है । अन्य अनुवादकों ने भी उक्त दोनों अनुवादकों का ही अनुकरण किया है । कश्मीर में यह प्रथा है कि पहले दिन के चढ़े हुए फूल पत्तो शृंगारादि को दूसरे दिन अति प्रातः काल में उतार लेते हैं ।
आडम्बर शब्द का प्रयोग कल्हण ने पुनः तरंग ८:२७२६ में किया है । पाठभेद : श्लोक संख्या १२६ में 'वल्लभो' का पाठभेद 'वल्लभी' तथा 'वल्लभा' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : १२६(१) क्षोभ : कल्हण ने इस शब्द का तथा आर्य राज के इस पुण्य भावना का उल्लेख राजा जयसिंह के सन्दर्भ में किया है । आसीद्यार्यरराजस्य शयानस्याप्यतिप्रियः । कामं लिङ्गाभिषेकाम्भःसंक्षोभप्रभवो ध्वनिः ॥ ८:२३९८ ॥ शिव लिंग को स्नान कराया जाता है तो दृश्य दिखायी पड़ सकता है । कल्हण की दृष्टि का यह एक उदाहरण है । काशी विश्वनाथ में तथा उदयपुर के एक लिंग की जब आरती एवं शृंगार के पूर्व स्नान कराया जाता है तो लिंग की मूर्धा से जल अरघा पर गिरता है । अरघा से पुनः जल लुढ़कता नीचे गिरता है । इस समय जल से एक प्रकार का कल- कल शब्द उद्भूत होता है । कल्हण ने उसी का आंखो देखा वर्णन किया है।
द्वितीय तरंग ४३१ तापसैर्भस्मरुद्राक्षजटाजूटाङ्कितैर्बभौ । तस्य माहेश्वरो पर्षदिव भूमिपतेः सभा ॥ १२७ ॥ १२७. भस्म, रुद्राक्ष एवं जटाजूट युक्त तपस्वियों में उस पृथ्वोपत्ति की सभा शिव की सभा तुल्य शोभित हुई। शिवलिङ्गसहस्रस्य प्रतिष्ठाक्रमेणि प्रभोः । प्रतिज्ञा प्रत्यहं तस्य नाऽभूद्विघटिता क्वचित् ॥ १२८ ॥ १२८. उसकी प्रति दिन सहस्रों' शिवलिङ्ग प्रतिष्ठा कर्म की प्रतिज्ञा कहीं भी विघटित (भंग) नहीं हुई। प्रमादात्तदनिर्वृत्तौ शिलामुत्कीर्य कल्पिता । सहस्रलिङ्गी तद्भृत्यैः सर्वतोऽद्याऽपि दृश्यते ॥ १२९ ॥ १२९. प्रमाद से कभी उसके न होने पर भृत्यों द्वारा शिला पर' उत्कीर्ण सहस्र शिव लिंग चारों ओर आज भी दिखायी पड़ते हैं। लिंग पूजा अत्यन्त प्राचीन है। मोहेन्दो जोरो में मृत्तिका टेबलेट् पर लिंग, शक्ति तथा पृथ्वी उत्कीर्ण प्राप्त हुए हैं। विश्व में लिंग पूजा चार हजार वर्षों से भी प्राचीन है। पाठभेद : श्लोक संख्या १२९ में 'प्रमादा' का पाठभेद 'प्रसादा' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : १२९ (१) शिला—शिव लिंग = कश्मीर में शैव सम्प्रदाय प्रचलित था। शिव की पूजा का वहाँ के जीवन में प्रमुख स्थान था। आज भी कश्मीरी शिव भक्त हैं। आधुनिक काल में स्वर्गीय महाराज रणवीर सिंह कश्मीर नरेश ने ईशावर में एक सहस्र पाषाण शिव लिंग स्थापित करने तथा जम्मू में रण-वीरेश्वर मन्दिर में कोटि लिंग विभिन्न रूपों के स्थापित करने का विचार किया था। शिव लिंग गंगा की मिट्टी अथवा चींटी द्वारा चाली हुई मिट्टी अथवा शुद्ध मिट्टी से बनाते हैं। पार्थिव पूजा करने वाले पूजन के व्रत का आजन्म पालन करते हैं। पूजन के पूर्व अन्न ग्रहण अथवा किसी प्रकार का कार्य नही करते। महेन्दो जोरो में भी मिट्टी के वस्तु पर लिंग- शक्ति तथा पृथ्वी उत्तीर्ण मिले हैं। स्पष्ट है कि शिव लिंग पूजा अत्यन्त प्राचीन है। १२८ (१) सहस्र लिंग—कश्मीर में सहस्र लिंग प्रतिष्ठा तथा पूजा का विशेष महत्व प्राचीन काल से ही रहा है। यह प्रथा अब भी प्रचलित है। पूर्णिमादि पर एक सहस्र लिंग मृत्तिका के बनाये जाते हैं। और शंकराचार्य पर्वत की मूल से प्राप्त मिट्टी से शिव लिंग प्रातः काल प्रतिष्ठित किये जाते हैं। सायं काल वितस्ता किंवा समीपस्थ स्रोतस्विनियों अथवा सरोवरों में उनका विसर्जन कर दिया जाता है। शिवरात्रि के दिन काशी में कुछ लोग अब भी एक सहस्र शिव लिंग गंगा की मिट्टी से बनाते हैं। तथा पूजन पश्चात् उनका गंगा में विस- र्जन किया जाता है। यहाँ पर अर्थ पार्थिवपूजन ही लगाना चाहिए। सहस्र लिंग की प्रति दिन राजा प्राण-प्रतिष्ठा करता था। पूजन करता था। वह दृढ़ निश्चयी था। कभी प्रतिज्ञा भंग नहीं हुई।
४३२ राजतरंगिणी तासु तासु स वापीषु लिङ्गव्याजादरोपयत् । स्वपुण्यपुण्डरीकाणां जन्मनेऽक्षपरम्पराम् ॥ १३० ॥ १३०. उसने अनेक वापियों में लिंग व्याज से स्वपुण्य पुण्डरीकों की अक्ष १ (बीज) परम्परा आरोपित की। स्थाने स्थाने जलान्तश्च बहुसंख्यैर्निवेशितैः । अनयन्नर्मदाभङ्गिं शिवलिङ्गैस्तरङ्गिणीः ॥ १३१ ॥ १३१. स्थान स्थान पर जल मध्य प्रचुर संख्या में सन्निवेशित शिव लिंगो से तरंगि- णियों को उसने नर्मदा १ सदृश बना दिया। लिदर पर स्थित खोवर पुर परगना के शिलगाम लिंग सदृश शिलाखण्ड मिलते हैं। प्रायः भारतवर्ष में एक शिला सहस्र लिंग कही जाती है। वह में सर्वत्र वहीं से लिंग स्थापनार्थ जाते हैं। नर्मदा में सहस्र शिव लिंग तुल्य प्रतीत होती है। वह सहस्र जिस प्रचुरता से शिव लिंग जल में पड़े मिलते हैं शिव लिंग शिला सन्धिमति की है अथवा दूसरे की उसी प्रकार सरिताओं में लिंग की प्रतिष्ठा कर निश्चय पूर्वक कहना कठिन है। सन्धिमान ने कश्मीर की सरिताओं को ही नर्मदा नीलमत पुराण शिव पूजा के महत्त्व तथा उसका का रूप दे दिया था। कश्मीर के धार्मिक जीवन में क्या स्थान था इस पर कश्मीर की यात्रा में प्रायः प्रत्येक पवित्र प्रकाश डालता है। सरोवरों तथा नागों में मैने जल के अन्दर शिव- पक्षिस्ने शकात्स्वेको नापरोऽभ्विरितस्ततः। लिंग रखा देखा। यह प्रथा कश्मीर की विशेषता सिन्धुसंगमगेनाशु प्रस्रस्य स्वपिंतं शिवम् ॥३१६॥ प्रतीत होती है। जल में लिंग कश्मीर में इस प्रकार भुक्त्वा रात्री ततः कार्यं नृत्यगीतैः प्रजागरम् । मैंने रखे देखा कि वे ऊपर से दिखायी पड़ते हैं। श्रोतव्यः शिवधर्मश्च प्रादुर्भावश्च तद्भूतः ॥५॥ उन पर पुष्पादि भी चढ़ाया जाता है। श्रीनगर के पाठभेद : घाटों पर भी इस प्रकार के जलस्थ लिंग दिखाई पड़ जाते हैं। श्लोक संख्या १३० में 'स्वपुण्य' का 'स पुण्य' कल्हण इस प्रकार के लिंग का पुनः उल्लेख 'सुपुण्य' तथा 'वाप्यां' का पाठभेद 'पुण्डरीकाक्ष' (रा. त. ७ : १८४) करता है : 'क्षानां' मिलता है। पत्युर्नार्याऽप्यपहारात् प्रवृदावमरेश्वरे । पादटिप्पणियाँ : त्रिशूलवागलिङ्गादिप्रतिष्ठाश्च विनिर्ममे ॥ १३० (१) अक्ष : कमल का बीज शिव लिंग नर्मदा में शिव लिंग की अधिकता से मिलने का तुल्य होता है। शिव लिंग स्वरूप कमल बीजो को कारण है। नर्मदा मारबल रोक्स से बढ़ती आती जलाशयों में आरोपित कर करोड़ों शिव लिंग स्वरूप है। मारबल के पत्थर लुढ़कते-लुढ़कते और जल- कमल बीज उत्पन्न करने की विराट कल्पना राजा ने प्रवाह के कारण लिंग स्वरूप हो जाते हैं। हरद्वार की। कमल बीज की माला बनायी जाती है। से ऊपर भी शिव लिंगाकार पत्थर दिखाई देते हैं। होम में इसकी हवि भी दी जाती है। कश्मीर म किन्तु वे सुन्दर नहीं होने। इसकी सुमरनी बनायी जाती है। शालिग्राम के रूप में विष्णु रूप से उनकी १३१ (१) नर्मदा : शिव लिंग-नर्मदा में शिव पूजा की जाती है।
द्वितीय तरंग ४३३ प्रतिलिङ्गं महाग्रामाः प्रत्यपाद्यन्त तेन ये । पर्षदामद्य तद्भोगः कालेनान्तर्धिमागतः ॥ १३२ ॥ १३२. उसने पर्षदों को प्रति लिंग पर जिन महाग्रामों को चढ़ाया था काल वस उनका भोग आज नष्ट हो गया है । अकरोत्स महाहर्म्यैर्महालिङ्गैर्महावृषैः । महात्रिशूलैर्महतीं महामाहेश्वरो महीम् ॥ १३३ ॥ १३३. उस महा माहेश्वर ने इस पृथ्वी को महा भवनों, महा लिंगों, महा वृषों एवं महा त्रिशूलों से महान् बनाया ।१ १३२ ( १ ) पर्षद्, परिषद् : परिषद् वैदिक शब्द है । इसका शाब्दिक अर्थ चारों ओर बैठना होता है । उपनिषदों में दार्शनिक विचारों के लिये होने वाली गोष्ठी को परिषद् कहा गया है । उपनिषद् का उपदेश नितरां निकटवर्ती लोगों को ही देते थे । उपनिषद् का एक अर्थ रहस्य होता है । इस रहस्य को अत्यन्त निकटवर्ती परिषद् किंवा पर्षद् में देते थे । उस चर्चा एवं ज्ञान का नाम ही उपनिषद् हो गया । ( बृ० उ. ६ : १ : १, जै० श्रौ० २ : ११ : १३, १४ तथा गो० गृ० सू० ३ : २ : ४०, आचार्यों के साथ उनकी परिषद् का उल्लेख सर्वत्र मिलता है । पर्षद् शब्द का अर्थ सभा तथा धर्मोपदेशक पण्डितों का समाज होता है । हिन्दी में परिषद् तथा पर्षद् को समानार्थक मानते हैं । परन्तु उनके भाव तथा अर्थ में किंचित् भेद हैं । यहाँ पुरोहित किंवा ब्राह्मणों के समूह अथवा समाज के अर्थ में ही कल्हण ने पर्षद् शब्द का प्रयोग किया है । पुरोहितों की परिषद् थी । कल्हण के अनुसार परिषद् के पुरोहितगण दान का स्वयं उपभोग करने लगे थे । परिषदों की उपयोगिता समाप्त हो गयी थी । आगे चलकर ब्राह्मणों तथा पुरोहितों की इन परिषदों ने प्रायोपवेशन द्वारा राजा तथा मन्त्रियों से कार्य निकालने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है । मन्दिरों तथा तीर्थों के पुरोहितगण परिषद् बनाते थे । परिषद् के सदस्यों को पारिसद्य किंवा पारिषद कहा जाता था । इस प्रकार के पारिषद जहाँ एक ही मन्दिर से सम्बन्धित अनेक कुटुम्ब वंश के होते हैं वे अबतक अपना अस्तित्व रखती हैं । हरपर्वत पर शारिका देवी, क्षुव को ज्वालामुखी, अनन्तनाग, विजयेश्वर वीरनाग, मत्तार मूला, कोटि तीर्थ बारहमूला में पुरोहितों के कुल रहते हैं । उन्हें कल्हण के शब्दों में स्थानपाला कहते थे । ( रा० त० ८।८११) पुरोहित दक्षिणा यात्रियों से जो लेते हैं । यह एक साथ मिलाया जाता है । भवनों तथा मन्दिरों के प्रबन्ध के लिये खर्च काटकर वे परस्पर बांट लिया करते हैं । उनके द्रव्य विभाजन का भाग निश्चित रहता है । इसी प्रकार अग्रहार द्वारा प्राप्त सम्पत्ति का भी प्रबन्ध तथा विभाजन परिषद् करती थी । उनका राजनीति पर विशेष प्रभाव था । कल्हण के वर्णन ( रा० त० ५ : ४६५ तथा ८ : ९०० ) से प्रकट होता है । १३१ ( १ ) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह ५१ वाँ श्लोक है । ५५
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द्वितीय तरंग ४३५ थेदां च भीमादेवीं च देशांश्चान्यान्पदे पदेः । स मठप्रतिमालिङ्गैर्हर्म्यैनिन्ये महार्घताम् ॥ १३५ ॥ १३५. उसने थेदा१, भीमा देवी२ एवं अन्य देशों (स्थानों) को पद-पद पर मठों, प्रतिमा-लिंगों एवं हर्म्यों में महार्घ बनाया।
[बायाँ स्तम्भ] कही जाती हैं। यहाँ पर प्राचीन मन्दिर का अवशेष केवल उक्त नाम मात्र के टूहे के अतिरिक्त और कुछ नहीं मिलता। श्रीनगर के समीप तथा मुख्य चलती सडक पर होने के कारण स्थान की उन्नति तथा विकास किया जा सकता है। मैंने पता लगाना आरम्भ किया यहाँ पर कौन पूजा वगैरह करता है। मुसलमान दूकानदार कुछ बता नहीं सके। ईशावर के समीप ही एक बाल ब्रह्मचारी श्री लक्ष्मण जी का स्थान। सड़क के पार्श्व में हैं। उनका यहाँ पर आश्रम है। साधना करते हैं। सप्ताह में रविवार के दिन प्रातः ८ बजे से ११ बजे तक त्रिक तथा शैव दर्शन पर विचार विनिमय तथा सिद्धान्तो पर प्रकाश डालते हैं। मैं उनके पास दो बार गया था। स्थान तथा आश्रम सुन्दर हैं। ईशावर स्थान प्राचीन काल में सुरेश्वरी के समान पवित्र माना जाता रहा है। वर्तमान ईशावर नाम पुराने नाम इशेश्वर का बिगड़ा रूप हैं। श्वोर शब्द देवी के अर्थ में कश्मीर में प्रयुक्त होता रहा हैं। पाठभेद : श्लोक संख्या १३५ में 'येदा' का 'ध्वेदा' तथा 'महार्घ' का पाठभेद 'महार्क' का मिलता है। पादटिप्पणियाँ : १३५ (१) येदा-थेदा : इसे थेदा देवी भी कहते हैं। वर्तमान थीड ग्राम डल के उत्तर तटपर जेथर से एक मील उत्तर है। अबुल फजल लिखता है—'थिड गाँव बड़ा रमणीक ग्राम है। वहीं सात स्रोत आकर मिलते हैं। उनके चारों ओर पत्थरों की इमारतें प्राचीन काल के गौरव का स्मरण दिलाती हैं।'
[दायाँ स्तम्भ] इस तीर्थ को सप्त पुण्यकरिणी तीर्थ कहा गया गया है हरचरित चिन्तामणि (४:४०) में उल्लेख है कि यहाँ पार्वती ने तपस्या की थी। श्रो स्तीन ने यहाँ की यात्रा उन्नीसवीं शताब्दी में की थी। परन्तु अबुल फजल वर्णित प्राचीन देवस्थान के टूटे शिलाखण्ड एवं मन्दिर किंवा भवनों के आकार श्रोस्तीन को नहीं मिले। वहाँ सातों जल- स्रोत अभी भी चलते हैं। मैंने यहाँ जलस्रोतों को चलते देखा। क्योंकि उन्हें समाप्त करना सम्भवतः मानवीय शक्ति एवं विध्वंस के परे की बात थी। यह स्थान श्रीनगर से जो सड़क डल लेक के तट से होती शालीमार की तरफ जाती है उसी के समीप चश्मा शाही से थोड़ी दूर उत्तर-पश्चिम की तरफ पड़ता है। (२) भीमा देवी : भीमा देवी का स्थान वर्तमान 'ब्रान' ग्राम माना गया है। डल के तट से १ १/२ मील और उत्तर जाने पर मिलता है। नील- मत पुराण इस स्थान का पता बताता है। इस समय बाबा गोलम दीन के जियारत के उत्तर पश्चिम है। भीमा देवी के उत्तर पश्चिम ईशेश्वर अर्थात् ईशावर पड़ता है। ईशेश्वर से उत्तर- पूर्व शुतेश्वरी तथा भीमा देवी के मध्य प्राचीन श्री- द्वार का क्षेत्र है। भीमादेवीं तथा दृष्ट्वा प्रियमाप्नोत्यनुत्तमाम् । तथा कापिंजलीं देवीं तथा देवीं सुरेश्वरोम् ॥११८४॥ हरचरित चिन्तामणि के अनुसार भीमा देवी में पार्वती ने तपस्या की थी। (४:४७) भीमा देवी का तीर्थ अब प्रायः लुप्त हो गया है। यह स्थान एक सुन्दर जलस्रोत जो दामपोर गाँव के
४३६ राजतरंगिणी स्वयंभूमिश्च तीर्थैश्च पूतं भक्तिविभूषितः । स एव भोक्तुमज्ञासीत्प्राज्ञः कश्मीरमण्डलम् ॥ १३६ ॥ १३६. स्वयं भू¹ एवं तीर्थों से पवित्र कश्मीर मण्डल का उपभोग भक्ति विभूषित केवल वही जानता था। स्नातस्य निर्झराम्भोभिः पुष्पलिङ्गार्चनोत्सवैः । राज्ञस्तस्य वनोर्वीषु मासः पुष्पाकरो ययौ ॥ १३७ ॥ १३७. स्नात उस राजा का वसन्त¹ मास निर्झर जलों एवं पुष्ट लिंगार्चनोत्सवों² द्वारा वनभूमि में व्यतीत होता था।
समीपस्थ पर्वत से निकलता है, उसके पास माना जा सकता है। यहाँ अब एक मुस्लिम ज़ियारत है। दुर्गा सप्तशती में भीमा देवी के नाम की व्युत्पत्ति दी गयी है। देवी ने जब भीम रूप धारण कर मुनियों की रक्षा के लिए हिमालय पर रहने वाले राक्षसों का भक्षण किया, उस समय देवी का नाम भीमा पड़ गया। दुर्गा देवीति विख्यातं तन्मे नाम भविष्यति : पुनश्चाहं यदा भीमं रूपं कृत्वा हिमाचले ॥११:५०॥ रक्षांसि भक्षयिष्यामि मुनीनां त्राणकारणात् । तदा मां मुनयः सर्वे स्तोष्यन्त्यानम्रमूर्तयः॥११:५१॥ भीमा देवीति विख्यातं तन्मे नाम भविष्यति । यदा रुणारूपस्त्रैलोक्ये महाबाधां करिष्यति ॥११:५२॥ पाठभेद : श्लोक संख्या १३६ में 'विभूषितः' का 'विशेषितः' 'विशेषतः'; 'एव' का 'एवं;' 'प्राज्ञः' का 'प्राज्या' 'प्राप्य.' और 'कश्मीर' का पाठभेद 'काश्मीर' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : १३६ (१) स्वयंभू : स्वयंभू तथा तीर्थों में अन्तर है। अपने रूप एवं विचित्रताओं के कारण पूजनीय माने जाते हैं। स्वयंभू प्रकृति द्वारा बन गये लिंगाकार शिलाखण्डादि माने जाते हैं। वे जलस्रोत भी स्वयंभू माने जाते हैं जिनमें कोई विशेषता एवं विचित्रता होती है। उन्हें भी स्वयंभू मानकर पूजा की जाती है। तीर्थस्थान मानव कृत होते हैं। कल्हण ने स्वयंभू लिंग का पुनः वर्णन रा० त० ८:२४३० में किया है। १३७ (१) वसन्तः : कल्हण इस श्लोक से षट् ऋतुओ मे होती हुई राजा की दिन चर्या का वर्णन आरम्भ करता है। वसन्त ऋतु प्रारम्भ होता है। पादपों में पत्तियां लगने लगती हैं। हिम तथा तुषार गल जाता है। पृथ्वी श्वेत चादर के स्थान पर हरी चादर ओढ़ने लगती हैं। निर्झर चलने लगते हैं। सूर्य किरण सुखदायी लगती है। अन्धड़ तथा पश्चिमी वायु का वेग कम हो जाता है। कलियाँ लगने लगती हैं। वृक्ष निखर आते हैं। कल्हण यहाँ कश्मीर के वसन्त का सर्वांगीण वर्णन नही करता। वह इतिहास लिख रहा था। प्रसंग के कारण उसने सन्धिमान आर्य राज की ऋतुचर्या का उल्लेख किया है। (२) लिंगार्चनोत्सव : कल्हण सन्धिमान के समय वसंत ऋतु में प्रचलित लिंगार्चनोत्सव का उल्लेख करता है। माघ मास के उत्तरार्ध में माघ शुक्ल फाल्गुन कृष्ण को १३ को महाशिवरात्रि का व्रत एवं उत्सव होता है। शिवरात्रि के समय उत्तरी भारत में आम में मञ्जरियां लग जाती हैं। नव चेतना का
द्वितीय तरंग ४३७ स चातिरम्यः काश्मीरो ग्रीष्मस्त्रिदिवदुर्लभः । हिमलिङ्गार्त्चनैः प्रायाद्वनान्तेषु कृतार्थताम् ॥ १३८ ॥ १३८. त्रिलोक दुर्लभ अति रम्य कश्मीर की ग्रीष्म ऋतु को उसने वनान्तों १ में हिम लिंग की अर्चनाओं द्वारा कृतार्थ किया । फुल्लाब्जषण्डरुद्धाशाः प्राप्य पुष्करिणीतटीः । लक्ष्मीसखः स खण्डेन्दुचूडध्यानपरोऽभवत् ॥ १३९ ॥ १३९. लक्ष्मी-सखा वह प्रफुल्लित कमल दल से रुद्ध दिशाओं वाली पुष्करिणी तट पर जाकर खण्डेन्दुचूड के ध्यान में मग्न हो जाता था ।१ अनुभव होता है । यद्यपि कल्हण स्पष्ट नही कहता कि किस तिथि को यह उत्सव होता था । मेरा अनुमान है कि यह उत्सव शिवरात्रि को मनाया जाता रहा है। शैव तथा शिव भक्तो का यह सबसे बड़ा पर्व होता है । शिवरात्रि के दिन स्नान तथा शिवलिंग पर जल एवं पुष्प चढ़ाने का बड़ा महत्व होता है । धर्मप्राण प्राणी इस दिन निराहार व्रत रखते है । वसन्त की चर्चा सन्धिमान संगीत, नाटक, तथा वसन्त ऋतु के साथ काम का पुष्प बाण के साथ आगमन रूप में वसन्तोत्सव नहीं मनाता था । उसने काम तथा उत्सव के भौतिक रूप को आधा- त्मिक रंग में रंग दिया था। वह वन में जाता था । पुष्प उद्यानो में जाता था । निर्झरों में स्नान करता था । किन्तु देवार्चन हेतु करता था । उसने मदनोत्सव को शिवोत्सव में परिणत कर दिया था । मदन का नहीं अपितु मदन दाहक शिव की उपासना में जनता को लगा दिया था । पाठभेद : श्लोक संख्या १३८ में 'काश्मीरो ग्रीष्मस्त्रिदिव' का पाठभेद 'काश्मीरोऽग्रीष्मस्त्रिदिव' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : १३८ (१) वनान्तः : वनान्त से अर्थ उपत्यका के सीमावर्ती वन प्रान्त है । राजा के समान सन्धिमति मृगया के लिये वनों में, वन प्रान्त मे, वनान्त में नहीं जाता था । अपितु वह हिमलिंग की अर्चना हेतु भ्रमण करता था । शाब्दिक अर्थ वन का अन्त होता है । ग्रीष्म ऋतु कश्मीर की अत्यन्त सुहावनी होती है । पुष्प खूब खिल जाते हैं। भूमि सुरम्य हरियाली पूर्ण हो जाती है। सभी जलस्रोतों में जल उछलने लगते हैं। इस समय उपत्यका के मैदान में हिम लिंग मिलना कठिन हो जाता है । सन्धिमान वनान्त में जाता था । जहाँ हिम मिलता था। ग्रीष्म ऋतु में हिम दुर्लभ हो जाता है। उस दुर्लभ काल में वह जहाँ हिम सुलभ होता था वहाँ जाता था। हिम का लिंग बनाकर पूजा करता था। अथवा जहाँ हिमस्वरूप शिवलिंग प्रकृति बना देती थी वहाँ पूजा करता था । यह स्थान लगभग १० हजार फिट की ऊँचाई पर होता था । कल्हण ने वनान्त का प्रयोग साभिप्राय किया है । ग्रीष्म ऋतु तक वरफ गल जाती है। मार्ग चारो ओर का खुल जाता है। कश्मीर दर्शन का यह सबसे अच्छा काल है। इसी काल में सन्धिमान अपनी राजकीय यात्रा कश्मीर मण्डल के सुदूर स्थानों में करता था । जनता का दुःख-सुख इस व्याज से जानता था । सैनिक स्थान जो वनों के अन्त में थे । वहाँ पहुँचता था । राज्य कार्य तथा राजधानी के बाहर तुषारपात हीन ऋतु शिविर लगाने के लिए उत्तम था । इसका उपयोग सन्धिमान ने आधा- त्मिक तथा भौतिक दोनो कार्यों के लिये किया । पाठभेद : श्लोक संख्या १३९ में 'फुल्लाब्ज' का 'पुल्ला- ब्जर' 'षण्ड' का पाठभेद 'रांड' मिलता है ।
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द्वितीय तरंग ४३९ सार्धं तपोघनैस्तैस्तैर्भजतो जागरोत्सवान् । तस्याऽभूवन्भुवो भर्तुरमोघा माघरात्रयः ॥ १४१ ॥ १४१. उन उन तपोनिधियों के सङ्ग में जागरगोत्सव मनाते उस पृथ्वीपति की माघ रात्रियाँ निष्फल नहीं हुईं । अत्यद्भुतं राज्यलाभमित्थं सफलयन्कृती । पञ्चाशतं त्रिवर्षोनामत्यक्रामत्स वत्सरान् ॥ १४२ ॥ १४२. कृती यह (नृप) अत्यद्भुत राज्य लाभ को इस प्रकार सफल करता हुआ तीन कम पचास (४७) वर्ष व्यतीत किया । शमव्यसनिनस्तस्य राज्यकार्याण्यपश्यतः । तस्मिन्काले प्रकृतयो विरागं प्रतिपेदिरे ॥ १४३ ॥ १४३. उस समय राज्य कार्य न देखने के कारण उस शान्ति प्रेमी से प्रजा विरक्त हो गया । अन्वैष्यत नृपस्ताभिः कश्चिद्राज्याय शुश्रुवे । राजपुत्रो जिगीषुश्च श्रीमान्यौधिष्ठिरे कुले ॥ १४४ ॥ १४४. उन लोगों ने राज्य के लिये किसी नृपका अन्वेषण किया, तब सुना कि युधिष्ठिर के कुल में एक विजयच्छुक श्रीमान् पुत्र है । आते ही भूमि पर तुषार पात होने लगता है । पौष और माघ मासो में सम्पूर्ण पर्वतमाला तुषार मण्डित हो जाती है । वृक्ष ठूंठे दिखायी पड़ते हैं । पुष्करिणियाँ, डल और उलर झीलें जम जाती हैं । कश्मीर मण्डल की भूमि कश्मीरियों के गौर वर्ण से स्पर्धा करने लगती है । पादपों की शाखायें श्वेत तुषार मण्डित हो जाती है । एक भी पत्ती दिखाई नहीं पड़ती । आकाश पक्षी शून्य, वन पशुशून्य ओर भूमि जनशून्य दिखायी पड़ती है । कश्मीर का यह काल दुःखप्रद होता है । साधा- रण जनता अपने घरों में बन्दी बन जाती है । यदि अधिक तुषार पात हो गया तो द्वार खुलना कठिन हो जाता है । इस समय केवल कांगड़ी एक- मात्र सहायक होती हैं । रात दिन घर में रहने के कारण जैसे दोनो में कोई अन्तर नहीं रह जाता । यह अवस्था फाल्गुन मास तक चलती है । कल्हण ने पाँच ऋतुओ का वर्णन किया है । शिशिर तथा शीत ऋतु के चार मास का एक ऋतु रूप दिया है । एतदर्थ उन्होंने शिशिर तथा शीत ऋतु का नाम लेकर उल्लेख नही किया है । यह चार मास कश्मीर के जीवन का अत्यन्त कष्ट साध्य मास है । ग्रीष्म, वर्षा तथा शरद ऋतु जितनी सुहावनी होती है वैसा ही कष्टप्रद शीत के चार मास होते हैं । इस कष्ट काल में जब बाहर निकलना कठिन हो जाता है । रात दिन तुहिन वर्षा होती रहती है । सन्धिमान बाहर निकलने में असमर्थ होकर अपने भवन में भगवान् के ध्यान में ही मग्न बिता देता था । उसकी रात्रियाँ निष्फल नहीं हुईं । जब कि शेष जनता तुहिमपात से पीड़ित तुषार के मध्य में पंगु तुल्य वै वसन्त के आगमन की कामना करती है । पाठभेद : श्लोक संख्या १४३ में 'शम' का पाठभेद 'सम' मिलता है ।
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४४० राजतरंगिणी जुगोप गोपादित्याख्यं कश्मीरेन्द्रजिगीषया । युधिष्ठिरप्रपौत्रं हि गान्धाराधिपतिस्तदा ॥ १४५ ॥ १४५. उस समय गान्धाराधिपति ने कश्मीरेन्द्र को जीतने की इच्छा से ही युधिष्ठिर के प्रपौत्र गोपादित्य को अपने यहाँ संरक्षित किया । वसन्नप्राप्तसाम्राज्यः स तत्र तनयं क्रमात् । अवाप लक्षणैर्दिव्यैरमोघं मेघवाहनम् ॥ १४६ ॥ १४६. बिना साम्राज्य प्राप्त किये, यहाँ निवास करते समय, उसने दिव्य लक्षण युक्त, अमोघ मेघवाहन नामक पुत्र प्राप्त किया । स युवा पितुरादेशाद्वैष्णवान्वयजन्मनः । राष्ट्रं प्राग्जोतिपेन्द्रस्य ययौ कन्यास्वयंवरे ॥ १४७ ॥ १४७. वह युवक पिता के आदेश पर, वैष्णव¹ कुलोत्पन्न, प्राग्ज्योतिपेन्द्र² के राष्ट्र में उसकी कन्या के स्वयंवर में गया । पाठभेद : श्लोक संख्या १४५ में 'दित्याख्यं' का 'दित्याख्यः' और 'कश्मीरेन्द्र' का 'वाश्मीरेन्द्र' पाठभेद मिलता है। पादटिप्पणियाँ : १४५ ( १ ) गान्धारः परिशिष्ट द्रष्टव्य है । पाठभेद : श्लोक संख्या १४६ में 'प्राप्त' का पाठभेद 'पास्त' मिलता है । श्लोक संख्या १४७ में 'युवा' का पाठभेद 'तत्र' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : १४७( १ ) वैष्णव : वैष्णव प्रभाव मणिपुर आसाम में था और आज भी है । कल्हण के समय में भी भारत के इस धुर पूर्वीय अंचल में वैष्णव सम्प्र- दाय प्रबल था । आज भी वहाँ प्रबल है । यद्यपि ईसाई मिशनरियों के कारण नागा, नेफा, आदि क्षेत्रों में ईसाई धर्म का प्राबल्य हो गया है । गरीब पर्वतीय जाति को ईसाई धर्म को दीक्षित करने में विदेशी मिशनरी सफल हुई है । मणिपुर, त्रिपुरा तथा आसाम के हिन्दू बहुल क्षेत्रों में वैष्णव प्रभाव आज भी दिखायी पड़ता है । कल्हण को तत्कालीन भारतीय स्थिति का ज्ञान था । उसके इस वर्णन से स्पष्ट होता है । ( २ ) प्राग्ज्योतिष : एक प्राच्य जनपद था । यह अति प्राचीन जनपद था । महाभारत में कुछ स्थानों पर इसको म्लेच्छ स्थान कहा गया है । वामन पुराण के अनुसार यह पूर्व का एक जनपद है । ( वा. पु. १३:४५ ) वहाँ का राजा भगदत्त था। उसकी प्रशंसा की गयी है। इसे दानवराज नरकासुर का देश कहा गया है । नरकासुर का नाम भौम भी था । उसका पुत्र भगदत्त था । नरक राजा का उल्लेख कल्हण ने ( रा. त. २:१५० में ) उल्लेख किया है । विष्णु पुराण के अनुसार यह राजधानी थी । ( वायु : ४५ : १२२, मार्कण्डेय : ५७ : ४४, मत्स्य ११४ : ४४ भाग० १० : ५९ रा : २, ३१; वामन : ८:१२, ४३:५९ ) महाभारत में प्राग्ज्योतिष का उल्लेख मिलता है । उसे एक अति प्राचीन नगर कहा गया है । भौमासुर की राजधानी था । ( म. स : ३८) भौमा- सुर के पश्चात् उसका पुत्र भगदत्त वहाँ का राजा हुआ था । यहाँ पर नरकासुर निवास करता था ।
द्वितीय तरंग १४१ तत्र तं वारुणं छत्रं छायया राजसंनिधौ । भेजे वरस्रजा राजकन्यका चामृतप्रभा ॥ १४८ ॥ १४८. वहाँ राजा की संनिधि में उसे वरुण छत्र¹ ने छाया से और राजकन्या अमृत- प्रभा² ने वरमाला से सम्मानित किया ।
( म० उद्योग ४८:८० ) भगदत्त के पश्चात् यहाँ का राजा वज्रदत्त हुए थे । ( म. आश्वः ७५:१ ) ( ३ ) कन्यास्वयंवर : भारतीय एकता भारत की भिन्नता में अभिन्नता का बड़ा ही उत्तम उदाहरण मेघवाहन का स्वयंवर उपस्थित करता है । मेघवाहन गान्धार अर्थात् सीमान्त पश्चिमोत्तर प्रदेश जो काबुल उपत्यका तक फैला था वहाँ से भारत के धुर पूर्वीय प्रदेश प्राग्ज्योतिष पहुँचता है। स्वयंवर में भारतीय राजा आमन्त्रित किये जाते थे । भारत को एक ईकाई के रूप में भारतीय देखते थे । स्मरणीय बात है। स्वयंवर में केवल हिन्दू ही भाग लेते थे । भारत की सीमा पर स्थित यवन म्लेच्छ राजा भाग नहीं लेते थे । हिन्दुओं एवं भारत की एकता का यह सजीव उदाहरण है । भारत के किसी कोने में रहनेवाला भारतीय अपने को एक ही कुल की सन्तान समझता था । एक दूसरे को भाई मानता था । मेघवाहन २ हजार मील की यात्रा कर प्राग्- ज्योतिष पहुँचा था । गान्धार की भाषा एवं आसाम की भाषा में जमीन आसमान का अन्तर था । एक दूसरे की भाषा नहीं समझते थे । एक दूसरे का रंग नहीं मिलता था । अंग विन्यास नहीं मिलता था, खानपान नहीं मिलता था । रहन सहन नहीं मिलता था । जलवायु नहीं मिलती थी । तथापि जैसे उनमें भिन्नता नहीं थी । सब एक परिवार के प्राणी थे । वह परिवार विशाल भारत था । वह परिवार रक्त से नहीं अपितु धर्म, संस्कृति एवं सभ्यता से जुड़ा था । घुल मिल गया था । सुदूर पूर्व के मनीषियों की यह कल्पना थी । जो साकार थी । गान्धार के होते भी वह आसाम में अपरिचित समझा गया । राजकन्या ने दो हजार मील दूर रहने वाले को चुनने में किंचित् मात्र संकोच नहीं किया । उसके पिता ने संकोच नहीं किया कि मेघवाहन एक राज्यच्युत वंश का वंशज मात्र था । वह राजा किंवा राज्य का उत्तराधिकारी नहीं था। राजा ने उसे राजकन्या देने में किंचित् मात्र संकोच नहीं किया । वह दूर जाने वाली थी। उसका पुनः दर्शन दुर्लभ हो सकता था । कन्या अमृतप्रभा ने भी निसंकोच मेघवाहन का वरण किया । वह था आदर्श । यह थी भारतीय संस्कृति की अमोघ शक्ति जिसने भारत को अनेक आघातों, ताड़नाओं के होते भी एक में बाँध रखी थी । कल्हण भारत की इस सांस्कृतिक एकता की अविच्छिन्न धारा से परिचित था । और उसने बड़ी सुन्दरता से उसे वहाँ उदाहरण स्वरूप उपस्थित कर दिया है । १४८ ( १ ) वरुण छत्र : वरुण छत्र किस प्रकार प्राग्ज्योतिष के राजा के पास आया इसका उल्लेख कल्हण ने स्वयं तरंग ३ के श्लोक ५३ से ७० तक में किया है । उस वर्णन से प्रतीत होता है कि मेघवाहन ने अमृतप्रभा तथा वरुण का छत्र दोनों प्राप्त किया था । मेघवाहन ने यह छत्र वरुण के माँगने पर पुनः लौटा दिया था । वैदिक साहित्य में वरुण सृष्टि के नैतिक एवं भौतिक प्रतिपालक रूप में चित्रित किये गये हैं । वैदिकोत्तर साहित्य में वरुण का श्रेष्ठत्व क्रमशः क्षीण होता गया है। उसका प्रभुत्व केवल जल ही पर शेष माना जाने लगा है। वह सहस्र नेत्रों से मानव जाति का अवलोकन करते हैं। (ऋ० ७:२४:८८ )
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४४२ राजतरंगिणी
[बायाँ स्तम्भ] अतएव वरुण को 'सूर्यनेत्री' की संज्ञा दी गयी है। (ऋ. ७:६६) यह सुपाणि है। स्वर्णद्वायि एवं द्युतिमत् वस्त्र धारण करते हैं। (ऋ. १०:२५) इनका रथ सूर्य के समान द्युतिमान है। उसमे स्तम्भो के स्थान पर नाधियां लगी है। (ऋ. १:१२२) ब्राह्मण ग्रन्थ रचना काल मे इसके रूप की कल्पना श्वेत वर्णं, गंजा, पीत नेत्र, वृहद् पुरुष रूप में की गयी है। वरुण का भवन स्वर्ण निर्मित है। द्युलोक मे है। गृह में सहस्र द्वार है। वह भवन में बैठकर समस्त सृष्टि का अवलोकन करता है। (५:६७-६८, १:२५) सर्वदर्शी सूर्य अपने गृह से उदित होकर मानवों के कृत्यो की सूचना वरुण को देता है। (ऋ.:७:६०) ऋग्वेद में इसे सम्राट् कहा गया है। यह उपाधि इन्द्र को दी गयी है परन्तु इन्द्र से भी अधिक वरुण को प्रदान की गयी है। इसके सार्वभौम सत्ता किंवा छत्र का एवं शासक के नाते निर्देश किया गया है। (ऋ० १:१:१३२; ५: ८५) वरुण प्रकृति के नियमों का महान् अधिपति है। उसके कारण द्युलोक एवं पृथ्वी अलग अलग हुई। (ऋ० : ६: ७०; ८: ४२) इसने अग्नि की जल मे, सूर्य को आकाश में, एवं सोम की पर्वतों मे स्थापना की है। (ऋ. ५:८५) वायु मण्डल में भ्रमणशील वायु वरुण का श्वास है। (ऋ० :७.८) ऋग्वेद मे कितनी ही बार वरुण को असुर किंवा रहस्यमय व्यक्ति कहा गया है। (ऋ० : १: ३५ : ७; २ : ७ : १०, ७ : ६५ : २; ८ : ४२ : १) यह अपनी आसुरी माया के कारण मनुष्यो का सम्राट् बन गया था। उसे यक्षिन् भी कहा गया है। (ऋ० : ७: ८८.६) अथर्व वेद काल में वरुण की वह सत्ता नहीं मानी गयी है जो ऋग्वेद काल में थी। उसे केवल जल का नियंत्रक माना गया है। (अ. वे ३:३) ब्राह्मण ग्रंथों में उसे जल देवता रूप में चित्रित किया गया है। (तै. सं. २:१:२:१; श. ब्रा.
[दायाँ स्तम्भ] ४:४५:११; ऐ. ब्रा. ७:१५) वरुण शब्द की व्युत्पत्ति की गयी है। उसके अनुसार पापियों को परिवेष्टिन करने वाला कहा गया है। (१:८९) पापियो को अन्धकार की भांति आच्छादित करनेवाला भी कहा गया है। (तै० सं० २:१:७) महाभारत काल में वरुण के रूप मे और परि- वर्तन होता दिखायी पड़ता है। उसे अदिति का पुत्र तथा चौथा लोकपाल कहा गया है। जल निवासी देवता उसे बना दिया गया है। (म० आ० ५९:१५) इसको पश्चिम दिशा, जल एवं नागलोक का अधिपति कहा गया है। (म. स. ९:७; म. उ.:८६ : २०) देवताओ ने जलेश्वर रूप मे इसका अभिषेक किया था। वरुण का पुत्र श्रुतायुध था। उसे गदा प्रदान किया था। (म. द्रो. ६७:४९) इसकी ज्येष्ठ पत्नी का नाम ज्येष्ठा था। यह शुक्राचार्य की कन्या थी। उससे बल, अधर्म एवं पुष्कर नामक तीन पुत्र तथा सुरा नामक एक कन्या उत्पन्न हुई थी। (म. आ. ६०:५१-५२; म. उ. ९६:१२) इसकी एक ओर पत्नी थी। उसका नाम वारुणी था। उसे गौरी भी कहते हैं। उसे शौ नामक पुत्र उत्पन्न हुआ था। (म. स. ९:१०८) इसकी तृतीय पत्नी का नाम चीत-तोया था। जनक सभा का सुविख्यात ऋषि वन्दिन् भी इसका पुत्र था। (म. व. १३४:२४) रुद्र के यज्ञ से उत्पन्न हुए भृगु, अंगिरस एवं कवि नामक तीन पुत्रो में से इसने भृगु को अपने पुत्र रूप में स्वीकार किया था। यह भृगु वारुणी नाम से प्रसिद्ध हुआ। (म० अनु० : १३२ । ३६) वरुण की पूजा का कश्मीर के धार्मिक जीवन में महत्वपूर्ण स्थान रहा है। नीलमत पुराण (श्लोक 809-810) में वरुण का उल्लेख विष्णु, शक्र, सविता, ब्रह्मा एवं रुद्र के साथ किया गया है। वरुण का नीलमत पुराण में आदित्य, मरुत् तथा जलाधिपति के रूप में वर्णन किया गया
द्वितीय तरंग ४४३ तेन तस्य निमित्तेन वृद्धिमागामिनीं जनाः । अजानन्नम्बुवाहस्य पाश्चात्येनेव वायुना ॥ १४९ ॥ १४९. इन लक्षणों से जनता ने उसके उन्नत भविष्य को पश्चिमी वायु चलने पर जलद आने के समान जान लिया । राज्ञा हि नरकेणैतद्वरुणादुष्णवारणम् । आनीतमकरोच्छायां न विना चक्रवर्तिनम् ॥ १५० ॥ १५०. राजा नरक द्वारा वरुण से लाया गया वह छत्र चक्रवर्ती के अतिरिक्त और किसी पर छाया नहीं किया था।
है। ये नरक देवता रूप में भी चित्रित किये गये हैं। (श्लोक 619, 607, 384, 1381 तथा 1004- 1006)। कातिक में वरुण पूजा का विधान भी नीलमत पुराण करता है। वरुण पंचमी पूजा का मुख्य दिन रखा गया है (श्लोक 755) नीलमत वरुण लोक का भी उल्लेख करता है। (868, 282-284, 1262,676,1001,1232,1221, 1286, 1299) (२) अमृतप्रभा—विर्दउद्दीन मेघवाहन की प्राग्ज्योतिष को राजकन्या का नाम 'खोता' देता है। पुनः कहता है कि वह खोत के राजा की कन्या थी। लेखक का आधार केवल परसियन अनुवाद राजतरंगिणी का है। मेघवाहन की दूसरी रानी खादना को ही शायद खोता लिखा है। कल्हण ने किसी खोता रानी का वर्णन नहीं किया है यद्यपि उसने मेघवाहन की पाँच रानियों का नाम दिया है। ये अमृतप्रभा, यूक देवी, इन्द्र देवी, खादना तथा सम्मा है। (रा. त. ३:१०) १४९ राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह ५२ वा श्लोक है। (१) पश्चिमी वायु : पश्चिमी यहाँ दो अर्थ उपस्थित करता है। कश्मीर में पश्चिमी वायु चलने पर वर्षा होती है। उत्तर भारत में भी पुरवा हवा अर्थात् पूर्वीय वायु चलने के पश्चात् जब पछुआ अर्थात् पश्चिमो वायु चलने लगती है, तो ग्रामीण समझ जाते हैं कि वर्षा होगी। उत्तर भारत में आसाम से लेकर हिमाचल तक वर्षा ऋतु में मानसून से वर्षा होने का यही लक्षण माना जाता है। बंगाल की खाड़ी से मानसून उठता है। वह पश्चिम उत्तर की ओर चलता है। वहाँ हिमालय उसे तिब्बत में तथा और आगे बढ़ने से रोक देता है। वह वायु टक्कर खाकर लौटती है। उसकी गति पश्चिम से, पूर्व उत्तर से पूर्व और दक्षिण की ओर हो जाती है। इसी से वृद्धि होती है। आसाम के लोगों ने मेघवाहन को पश्चिम से आया जानकर उसकी उपमा पश्चिमी वायु जनता के लिये वर्षा सहित उज्ज्वल भविष्य उपस्थित करती है। उसी प्रकार पश्चिम का मेघवाहन अपने उज्ज्वल भविष्य के साथ पूर्व आसाम में आया था। उसका लक्षण देखकर लोगों ने उसका भविष्य आँका था। १५० (१) नरकः राजा नरक प्राग्- ज्योतिष का राजा था। पृथ्वी का पुत्र होने के कारण इसकी संज्ञा भौम भी थी। इसकी माता भू देवी ने तपस्या की थी। विष्णु ने प्रसन्न होकर उसे वैष्णवास्त्र दिया था। उस अस्त्र के कारण यह अजेय हो गया था। इस अस्त्र को उसने अपने पुत्र भगदत्त को दे दिया था। (म० द्रो० २८) नरक का राज नोल समुद्र के तट पर था।
४४४ राजतरंगिणी तमन्तिकं पितुः प्राप्तं पत्न्या लक्ष्म्या च संश्रितम् । भुवा निमन्त्रयामासुर्मन्त्रिणो वंशयोग्यया ॥ १५१ ॥ १५१. पत्नी एवं लक्ष्मी से युक्त वह जब पिता के पास पहुँचा तब उसे मन्त्रियों ने वंशानुरूप भूमि द्वारा आमन्त्रित किया ।
उसकी राजधानी प्राग्ज्योतिष थी । इसका नाम मूर्ति लिंग भी आया है। इसके पाँच राज्यपाल 'हयग्रीव, निशंभु, पंचजन, विरूपाक्ष एवं मुर ये । यह इतना प्रबल हो गया था कि इन्द्र से उच्चैःश्रवा अश्व एवं ऐरावत हाथी छीन लाया था। देवमाता आदि के कुण्डलों का भी हरण कर लिया था । (म. स. ३८) माता अदिति के कुण्डल को प्राप्ति का देवताओं ने प्रयास किया । किन्तु विफल हो गये। प्राग्ज्योतिष में असुरों का एक सुदृढ़ दुर्ग था। अजेय था। नर- कासुर यहाँ निवास करता था। निर्मोचन नगर में नरक तथा श्री कृष्ण का युद्ध हुआ। नरक पराजित हो गया । (म. उ. ४८:८०-८४) कृष्ण ने उसके पुत्र को राज्यसिंहासन पर बैठाया (भा०:१०:५९) नरक ने पृथ्वी का अपहरण किया था । उसने सम्पत्ति तथा अपहृत नारियों को मणिपर्वत पर औदका नामक स्थान में रखा था । श्री कृष्ण तथा नरक की कथा हरिवंश पुराण में दूसरे ढंग से दी गयी है। युद्ध प्रारम्भ पूर्व श्री कृष्ण ने पांचजन्य शंख घोष किया । शंख घोष सुनते ही नरक क्रुद्ध हो गया । क्रोध पूर्वक सर्वग युद्धार्थ रथारूढ़ हो निकला । नरक का रथ अत्यन्त विस्तृत मूल्यवान तथा अजय था । नरक का मस्तक चक्र से भगवान् ने काट दिया । अदिति का कुण्डल तथा प्राग्ज्योतिष का राज्य दोनों मुक्त हुए । (ह० प० २:६३, भा० १०:५९) श्री कृष्ण ने बन्दी रखी नारियों को मुक्त किया (पद्म : उ० : २८८) पद्म पुराण में भी यह कथा दी गयी है । उसमें 'नरक चतुर्दशी' का विशेष वर्णन किया गया है । यह दिन कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को पड़ता है। उसने कृष्ण से वर माँगा था। उसको मृत्यु के दिन अर्थात् नरक चतुर्दशी को सूर्योदय के पूर्व जो मंगल स्नान करे उन्हें नरक की यातना न दी जाय । नीलमत पुराण में यह कथा अत्यन्त संक्षेप में दी गयी है। वरुण की सभा में नरकासुर को अत्यंत सम्माननीय स्थान प्राप्त था। उसे वहाँ पर पृथ्वीपति कहा गया है। (म. स. ९:१२) नरक को यहाँ पर छत्र प्राप्त हुआ था। उसी वरुण के छत्र का उल्लेख कल्हण यहाँ करता है। प्राग्- ज्योतिष में वह छत्र आया था। प्राग्ज्योतिष का राजा उसका वंशज था। अतएव उसके कुल में वह छत्र था। पाठभेद : श्लोक संख्या १५१ में 'वंश' का 'वंग्य' तथा 'योग्यया' का 'योग्य वा' और 'योग्यवान' पाठभेद मिलता है। पादटिप्पणियाँ : १५१ ( १ ) मन्त्री-शक्ति—कल्हण यहाँ एक और उदाहरण कश्मीर की शक्तिशाली मन्त्री परिषद् किंवा मन्त्री मण्डल का देता है। सन्धिमान राजा था। उसके राजा रहते हुए कश्मीर के मन्त्रियों ने मेघवाहन को कश्मीर की भूमि देने का निश्चय किया। उसे कार्यान्वित भी किया। औपचारिक रूप से मन्त्रियों ने उसे उसके पूर्वजों के राज्य ग्रहण करने का निवेदन किया । मन्त्रिपरिषद् की शक्ति कश्मीर में कितनी शक्ति- शाली थी यह इसी से प्रकट होता है। उन्हें किंचित् मात्र संकोच नहीं हुआ कि सन्धिमान के मन्त्री होते भी वे उसे राज्यच्युत करने का प्रयास कर रहे थे । मन्त्रियों के सम्मुख जनता हित तथा राज्य
द्वितीय तरंग ४४५ अथाऽऽर्यराजो विज्ञाय स्वराज्यं भेदजर्जरम् । प्रतिचक्रे न शक्तोऽपि तस्थौ तु त्यक्तुमुत्सुकः ॥ १५२ ॥ १५२. भेद से जर्जरित अपने राज्य को जानकर, उसे त्यागने के लिये उत्सुक वह आर्य राज समर्थ होते हुए भी प्रतिरोध न कर, स्थिर हो गया । की व्यवस्था का प्रश्न था । सन्धिमान इतना अधिक धर्म की ओर झुक गया था कि वह राज कार्य की ओर उतना ध्यान नहीं दे सका । जितनी की अपेक्षा हो सकती थी । उसे परलोक की चिन्ता हो गयी थी । मन्त्री लोक के थे । उन्हें लोक की चिन्ता थी । परलोक की चिन्ता सन्तों, साधुओ, महात्माओ तथा ब्राह्मणों को हो सकती थी । सन्धिमान ४७ वर्ष राज्य कर चुका था । उसके पूर्व वह मन्त्री रह चुका था । दश वर्ष जेल में था । जो कारावास तथा राज्य काल का समय जोड़ा जाय तो वही ५७ वर्ष का हो जाता है । यदि मान लिया जाय कि वह पचीस या तीस वर्ष की आयु में मन्त्री हुआ था तो राज्य त्याग के के समय उसकी आयु ८२ या ८७ वर्ष होनी चाहिए । वृद्धावस्था के कारण उसका झुकाव परलोक की ओर हो जाना स्वाभाविक था । वह ९६ वर्ष की अवस्था में दिवंगत हुआ था । इस प्रकार राज्य त्याग के पश्चात् ९ या १४ वर्ष तक जीवित रहा । पाठभेद : श्लोक संख्या १५२ मे 'तु' का पाठ भेद 'तत्' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : १५२ (१) भेद जर्जरित : राज्य कार्य की व्यवस्था ठीक से देखने के कारण मन्त्रियों तथा भृत्यो का प्रबल होना स्वाभाविक था । राजा जब शक्ति हीन होता है तो उसके पार्षद, मन्त्री तथा भृत्यों की शक्ति वृद्धि होती जाती है । मन्त्री, पार्षद, भृत्य एवं अन्य लोग परस्पर स्पर्धा शक्ति प्राप्ति के लिये करते हैं । इस स्पर्धा के कारण परस्पर अविश्वास तथा भेद उत्पन्न होता है । राजा के कुछ निर्णायक निश्चय न लेने पर वह और बढ़ता जाता है । यही अवस्था सन्धिमान के राज्य यन्त्र की हुई थी । दुर्बल राजा के कारण राज यन्त्र शिथिल हो गया था । यन्त्र ढीले हो गये थे । उन्हें कसने के अभाव में राज्य शरीर जर्जरित हो गया था । वह जर्जरता पारस्परिक भेदो में प्रकट होती है । एतदर्थ कल्हण यहाँ ठीक ही कहता है कि राजा भेद जर्जरित हो गया था । कल्हण सन्धिमान का चरित्र और महान् बना देता है । राजा अपनी स्थिति सम्हाल सकता था । उसके विरुद्ध आचरण दोष भ्रष्टाचार का दोष नहीं आरोपित किया जा सकता था । जनता में उसके अलौकिक शक्ति की धाक थी । प्रतिरोध करना चाहता तो वह कर सकता था । किन्तु यह दार्शनिक, आध्यात्मिक, निस्पृह राजा था । उसने राज्य की याचना नहीं की थी । राज्य जाने लगा उस समय भी चिन्ता नहीं की । वह अनायास मिला था । अनायास जा रहा था । राज्य के प्रति उसे इस लिये भी मोह नही रह गया था कि उसे कोई सन्तान नहीं थी । कल्हण के वर्णन से प्रकट नहीं होता कि उसे स्त्री था । रक्तज उत्तराधिकारी के अभाव में उसे यह कामना नही रह गयी थी कि राज्य उसके सन्तान किंवा वंशज को मिले । वह जनता का राज्य था । जनता से मिला था । जनता चाहे उसे ले ले । सन्धिमान ने वह दृष्टिकोण अपनाया था । सन्धिमान निस्सन्देह साधु राजा था । उसके समान विश्व इतिहास में शायद ही कोई उदाहरण मिल सके ।
तमन्तिकं पितुः प्राप्तं पत्न्या लक्ष्म्या च संश्रितम् । भुवा निमन्त्रयामासुर्मन्त्रिणो वंशयोग्यया ॥ १५१ ॥
१५१. पत्नी एवं लक्ष्मी से युक्त वह जब पिता के पास पहुँचा तब उसे मन्त्रियों ने वंशानुरूप भूमि द्वारा आमन्त्रित किया ।
उसकी राजधानी प्राग्ज्योतिष थी । इसका नाम मूर्ति लिंग भी आया है । इसके पाँच राज्यपाल 'हयग्रीव, निशंभु, पंचजन, विरूपाक्ष एवं मुर थे । यह इतना प्रबल हो गया था कि इन्द्र से उच्चैःश्रवा अश्व एवं ऐरावत हाथी छीन लाया था । देवमाता आदि के कुण्डलों का भी हरण कर लिया था । ( म. स. ३८ ) माता अदिति के कुण्डल को प्राप्ति का देवताओं ने प्रयास किया । किन्तु विफल हो गये । प्राग्ज्योतिष में असुरों का एक सुदृढ़ दुर्ग था । अजेय था । नर- कासुर यहाँ निवास करता था । निर्मोचन नगर में नरक तथा श्री कृष्ण का युद्ध हुआ । नरक पराजित हो गया । ( म. उ. ४८:८०—८४ ) कृष्ण ने उसके पुत्र को राज्यसिंहासन पर बैठाया ( भा०:१०:५९ ) नरक ने पृथ्वी का अपहरण किया था । उसने सम्पत्ति तथा अपहृत नारियों को मणिपर्वत पर औदका नामक स्थान में रखा था । श्री कृष्ण तथा नरक की कथा हरिवंश पुराण में दूसरे ढंग से दी गयी है । युद्ध प्रारम्भ पूर्व श्री कृष्ण ने पांचजन्य शंख घोष किया । शंख घोष सुनते ही नरक क्रुद्ध हो गया । क्रोध पूर्वक संवेग युद्धार्थ रथारूढ़ हो निकला । नरक का रथ अत्यंत विस्तृत मूल्यवान तथा अजय था । नरक का मस्तक चक्र से भगवान् ने काट दिया । अदिति का कुण्डल तथा प्राग्ज्योतिष का राज्य दोनों मुक्त हुए । ( ह० व० २:६३, भा० १०:५९ ) श्री कृष्ण ने बन्दी रखी नारियों को मुक्त किया (पद्म : उ० : २८८) पद्म पुराण में भी यह कथा दी गयी है । उसमें 'नरक चतुर्दशी' का विशेष वर्णन किया गया है । यह दिन कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को पड़ता है । उसने कृष्ण से वर माँगा था । उसकी मृत्यु के दिन अर्थात् नरक चतुर्दशी को सूर्योदय के पूर्व जो मंगल स्नान करे उन्हें नरक की यातना न दी जाय । नीलमत पुराण में यह कथा अत्यन्त संक्षेप में दी गयी है । वरुण की सभा में नरकासुर को अत्यंत सम्माननीय स्थान प्राप्त था । उसे वहाँ पर पृथ्वीपति कहा गया है । ( म. स. ९:१२ ) नरक को यहीं पर छत्र प्राप्त हुआ था । उसी वरुण के छत्र का उल्लेख कल्हण यहाँ करता है । प्राग्- ज्योतिष में वह छत्र आया था । प्राग्ज्योतिष का राजा उसका वंशज था । अतएव उसके कुल में वह छत्र था । पाठभेद : श्लोक संख्या १५१ में 'वंश' का 'वंश्य' तथा 'योग्यया' का 'योग्य या' और 'योग्यवान' पाठभेद मिलता है । पादटिप्पणियाँ : १५१ ( १ ) मन्त्री-शक्ति—कल्हण यहाँ एक और उदाहरण कश्मीर की शक्तिशाली मन्त्री परिषद् किंवा मन्त्री मण्डल का देता है । सन्धिमान राजा था । उसके राजा रहते हुए कश्मीर के मन्त्रियों ने मेघवाहन को कश्मीर की भूमि देने का निश्चय किया । उसे कार्यान्वित भी किया । औपचारिक रूप से मन्त्रियों ने उसे उसके पूर्वजों के राज्य ग्रहण करने का निवेदन किया । मन्त्रिपरिषद् की शक्ति कश्मीर में कितनी शक्ति- शाली थी यह इसी से प्रकट होता है । उन्हें किंचित् मात्र संकोच नहीं हुआ कि सन्धिमान के मन्त्री होते भी वे उसे राज्यच्युत करने का प्रयास कर रहे थे । मन्त्रियों के सम्मुख जनता हित तथा राज्य
द्वितीय तरंग ४४५ अथाऽऽर्यराजो विज्ञाय स्वराज्यं भेदजर्जरम् । प्रतिचक्रे न शक्तोऽपि तस्थौ तु त्यक्तुमुत्सुकः ॥ १५२ ॥ १५२. भेद से जर्जरित¹ अपने राज्य को जानकर, उसे त्यागने के लिये उत्सुक वह आर्य राज समर्थ होते हुए भी प्रतिरोध न कर, स्थिर हो गया ।
की व्यवस्था का प्रश्न था। सन्धिमान इतना अधिक धर्म की ओर झुक गया था कि वह राज कार्य की ओर उतना ध्यान नहीं दे सका । जितनी की अपेक्षा हो सकती थी । उसे परलोक की चिन्ता हो गयी थी। मन्त्री लोक के थे। उन्हें लोक की चिन्ता थी। परलोक की चिन्ता सन्तो, साधुओं, महात्माओं तथा ब्राह्मणों को हो सकती थी । सन्धिमान ४७ वर्ष राज्य कर चुका था । उसके पूर्व वह मन्त्री रह चुका था । दश वर्ष जेल में था । जो कारावास तथा राज्य काल का समय जोड़ा जाय तो वही ५७ वर्ष का हो जाता है । यदि मान लिया जाय कि वह पचीस या तीस वर्ष की आयु में मन्त्री हुआ था तो राज्य त्याग के के समय उसकी आयु ८२ या ८७ वर्ष होनी चाहिए । वृद्धावस्था के कारण उसका झुकाव परलोक की ओर हो जाना स्वाभाविक था। यह ९६ वर्ष की अवस्था में दिवंगत हुआ था। इस प्रकार राज्य त्याग के पश्चात् ९ या १४ वर्ष तक जीवित रहा । पाठभेद : श्लोक संख्या १५२ में 'तु' का पाठ भेद 'तत्' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : १५२ (१) भेद जर्जरित : राज्य कार्य की व्यवस्था ठीक से देखने के कारण मन्त्रियों तथा भृत्यों का प्रबल होना स्वाभाविक था। राजा जब शक्ति हीन होता है तो उसके पार्षद, मन्त्री तथा भृत्यो की शक्ति वृद्धि होतो जाती है। मन्त्री, पार्षद, भृत्य एवं अन्य लोग परस्पर स्पर्धा शक्ति प्राप्ति के लिये करते हैं। इस स्पर्धा के कारण परस्पर अविश्वास तथा भेद उत्पन्न होता है। राजा के कुछ निर्णायक निश्चय न लेने पर वह और बढ़ता जाता है। यही अवस्था सन्धिमान के राज्य यन्त्र की हुई थी। दुर्बल राजा के कारण राज यन्त्र शिथिल हो गया था। यन्त्र ढीले हो गये थे। उन्हें कसने के अभाव में राज्य शरीर जर्जरित हो गया था। वह जर्जरता पारस्परिक भेदों में प्रकट होती है। एतदर्थ कल्हण यहाँ ठीक ही कहता है कि राजा भेद जर्जरित हो गया था। कल्हण सन्धिमान का चरित्र और महान् बना देता है। राजा अपनी स्थिति सम्हाल सकता था। उसके विरुद्ध आचरण दोष भ्रष्टाचार का दोष नहीं आरोपित किया जा सकता था। जनता में उसके अलौकिक शक्ति की धाक थी। प्रतिरोध करना चाहता तो वह कर सकता था। किन्तु यह दार्शनिक, आध्यात्मिक, निस्पृह राजा था। उसने राज्य की याचना नहीं की थी। राज्य जाने लगा उस समय भी चिन्ता नहीं की। वह अनायास मिला था। अनायास जा रहा था । राज्य के प्रति उसे इस लिये भी मोह नहीं रह गया था कि उसे कोई सन्तान नहीं थी। कल्हण के वर्णन से प्रकट नहीं होता कि उसे स्त्री था। रक्तज उत्तराधिकारी के अभाव में उसे यह कामना नहीं रह गयी थी कि राज्य उसके सन्तान किंवा वंशज को मिले। वह जनता का राज्य था। जनता से मिला था। जनता चाहे उसे ले ले। सन्धिमान ने वह दृष्टिकोण अपनाया था। सन्धिमान निसन्देह साधु राजा था। उसके समान विश्व इतिहास में शायद ही कोई उदाहरण मिल सके ।