राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
५८ राजतरंगिणी का चिह्न है। कमल पद्मनाग का चिह्न है। कल्हण इन चिन्हो की उपमा देकर कश्मीर में नागों के महत्त्व की ओर संकेत करता है। राजधानी अहिच्छत्र नगर के संबंध में शंका की जाती है। विदेशी विद्वानो ने नाना प्रकार की कल्पना इस संबंध में की है। मेरा विचार है—'अहि' शब्द नाग के लिए प्रयुक्त किया गया है। शंखपाल नाग का छत्र चिह्न है। अहिच्छत्र नाग राजा की राजधानी था। 'छत्र' का अर्थ छाता है। परंतु यह प्रतीक भी है। 'अहिच्छत्र' का शाब्दिक अर्थ नाग का छत्र होता है। यहाँ एक किला है। उसे आदिछोट कहते हैं। यह पांचाल देश का एक नगर था। नीलमत के अनुसार द्वीपो का निम्नांकित विभा- जन किया गया है। इन्द्रद्युम्नः कशेरुश्च ताम्रवर्णो गभस्तिमान् । नागद्वीपस्तथा सौम्यो गन्धर्वो वारुणस्तथा ॥ 591 : ७१२ अयं च मानवो द्वीपस्तथा सागरसम्भृतः । चत्वारः सागराः पूज्यास्तथा पातालसप्तकम् ॥ -512 : ७१३ नीलमत पुराण के अनुसार ९ द्वीप, ४ सागर तथा ७ पाताल है। द्वीप—इन्द्रद्युम्न, कशेरुमान्, ताम्रवर्ण, गभस्तिमान्, नागद्वीप, सौम्य, गंधर्व, वरुण तथा मानव हैं। सात पाताल—एवम भौम, शिला भौम, नील मृत्तिका, समभोम, पीतभौम, श्वेत तथा कृष्णक्षिति है। ४ नीलनाग : जनश्रुति है। काश्मीर की जनता का विश्वास है। काश्मीर के नागों, अर्थात् जलस्रोतो, प्रपातो एवं निर्झरो के इष्टदेव नाग हैं। वे किसी न किसी रूप में जीवित हैं। नीलमत पुराण उनको विशेष पूजा का उल्लेख करता है। एतेषां पूजनं कृत्वा पूजनीया विशेषतः। ग्रहो नागस्तथा मासः यः स्यात्संवत्सरः प्रभुः । ग्रहो भविष्यद्दर्पज्ञश्च तथा मासस्य वारकः ॥ 625 : ७४६,७४७ नील नाग पौराणिक गाथाओं के अनुसार प्रजा- पति कश्यप' का पुत्र है। उसका निवास स्थान समीपस्थ वेरी नाग ग्राम स्थित नील कुंड है। यह वितस्ता का मूल स्रोत है। यह कुंड बनिहाल पास के पर्वत मूलमें है। शाहाबाद परगना में है। वितस्ता का उद्गम है। पर्यटकों का पर्यटन, यात्रियो की यात्रा बिना इस क्षेत्र के दर्शन के अधूरी रहेगी। जहाँगीर ने कुंड को अठपहला पक्का निर्माण कराया था। कुंड का जल स्थिर है। वेग से उद्यान में नहर के द्वारा निकलता है। जल का रंग नीला प्रतीत होता है। किंतु नहर में जहाँ गिरता है यहाँ उज्ज्वल तथा निर्मल दिखाई देता है। यह जल की गंभीरता तथा स्थान की हरियाली का प्रभाव है। कुंड पर बनी इमारत की छत पर देखने पर प्रतीत होता है, जैसे अष्टकोणीय नीलम का एक बडा टुकड़ा भूमि पर पड़ा है। काश्मीर उपत्यका से सतीसर का जल बाहर निकालने के लिए नीलमत पुराण के अनुसार भगवान् विष्णु ने सर्वप्रथम हल का प्रयोग किया था। भगवान् शिव के त्रिशूल के आघात से भगवती पार्वती सरिता वितस्ता के रूप में प्रकट हुई थी। नीलमत में वितस्ता के उद्भव का सुंदर वर्णन मिलता है : रसातलेनादिरूपं करिष्यामि जगद्गुरो । कुरु शूलप्रहारं त्वं नीलवेश्मसमीपतः ॥ 248 : ३३६,३३७ यत्रासील्लांगलमुखं प्राग्प्रभो शैलदारणे । तेन शूलप्रहारेण निष्क्रम्याहं रसातलम् ॥ 249 : ३३६,३३८ शूलमार्गेण यास्यामि यावत्सिन्धुर्महानदः । तत्र चक्रे हरो देवस्तथा चक्रे सती शुभा ॥ 250 : ३३८,३३९ तस्या नाम वितस्तेति कृतवान् शंकरः स्वयम् । वितस्तिमात्रं गतं तु शूलेन कृतवान् हरः । 251 : ३३९,३४०
प्रथम तरंग ५९ रसातलंगता येन निष्क्रान्ता सा सरिद्वरा । तस्माद्वितस्तेति कृतं नामैतस्याः स्वयंभुवा ॥ 252 : ३४०,३४१ हरिचरितामृत अध्याय १२ में वितस्ता अव- तरण का वर्णन किया गया है। इस तीर्थ का तीन नाम नील कुंड, वितस्ता तथा शूलघाट प्रसिद्ध हैं। वितस्ता माहात्म्य इस विषय पर यथेष्ट प्रकाश डालता है। नीलमत पुराण इसके माहात्म्य के विषय में उल्लेख करता है। अक्षयं सर्वमुद्दिष्टं दानं श्राद्धं तथा तपः । वितस्तोन्मज्जने स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् ॥ 1290 : १५०१,५१०२ ततस्तु सर्वदेशेषु जनः शुश्राव पार्थिव । सती देवी नदी भूत्वा काश्मीराया विनिर्गता ॥ 253 : ३४२,३४३, महापातकसंयुक्तस्तस्यां स्नातुं तदा जनः । आजगाम भयात्तेषां शूलघातनियोजनात् ॥ 254 : ३४४,३४५ मैं जिस समय प्रथम बार यहाँ आया तो इसकी अनुपम भव्य सुंदरता देखकर स्तब्ध हो गया था। निर्देशक जहाँगीर तथा शाहजहाँ का नाम लेकर उनके निर्माण की प्रशंसा कर रहा था। मेरी धारणा हो रही थी। कुंड का पुरा काल में अवश्य अस्तित्व रहा होगा। जीर्ण हो जाने पर जहाँगीर ने उसे मुगल स्थापत्य का जामा पहना दिया है। नीलमत के कुंड शब्द के प्रयोग से स्पष्ट है। इसमे पक्का घाट या पक्का पहल बना था। हिंदुओं का तीर्थ था। हिंदू मुसलमान हो गये। उनके लिए स्थान महत्त्वहीन हो गया। बिना मरम्मत गिरता पड़ता खँडहर बन गया। जहाँगीर सहिष्णु था। कट्टर मुस्लिम धर्मा- नुयायी नहीं था। उसने यहाँ की शोभा देख हिंदुओं का तीर्थ होने पर भी जीर्णोद्धार कराया। आइने अकबरी में अबुलफजल, जिसने जहाँगीर के वर्तमान इमारत बनाने के पूर्व वीर नाग को देखा था, वर्णन करता है, वीर सर बेहत अर्थात् वितस्ता का उद्गम स्थान है। इसके कुंड का क्षेत्रफल एक जरीब होगा। बहुत गहरा है। इससे जल जोर से आवाज के साथ निकलता है। इसका नाम वीरसर है। इसमें पत्थर के बार्डर लगे हैं। इसके पूर्व दिशा में मन्दिर है। जिस समय इस कुंड पर मैं आया था, उस समय कश्मीर के इतिहास लिखने की कल्पना मैंने नहीं की थी। इस ओर अभिरुचि नहीं थी। नील कुंड के प्रथम दर्शन से प्रथम प्रतिक्रिया जो हुई उसका वर्णन किया है। कश्मीर के इतिहास के संबन्ध में गवेषणा करना प्रारम्भ किया तो मेरी धारणा को बल मिलता गया। इसी स्थान के विषय में नहीं अन्य स्थानों को देखकर प्रथम प्रतिक्रियाएँ जो होती रहीं वे प्रायः ठीक उतरती हैं। बर्नियर यहाँ आया था। जहाँगीर ने यहाँ का बाग सन् १६१२-१६१६ ई० के बीच में बनवाया था। वह लिखता है :- 'कहा जाता है कि नूर महल अर्थात नूरजहाँ के इच्छानुसार यह बाग बनवाया था। यहाँ के कुंड की पाली गई मछलियाँ इतनी सोधी हैं। पुकारने पर अथवा रोटी का टुकड़ा कुंड में छोड़ देने पर पास आ जाती हैं।' औरंगजेब के समय जैसा बर्नियर के लेख से प्रकट होता है वहाँ किसी प्रकार का मन्दिर अथवा उसका ध्वंसावशेष नहीं रह गया था। किंतु जहाँगीर अपने पिता के साथ कश्मीर आया था। उस समय उसने कश्मीर के दर्शनीय स्थानों को देखा था। द्वितीय जुलूस वर्ष अर्थात् सन् १६०७ ई० में यहाँ जहाँगीर आया था। वह अपनी आत्मकथा में लिखता है- 'झेलम नदी का स्रोत काश्मीर में वीर नाग नामक एक चश्मा है। हिंदीभाषा में नाग सर्प को कहते हैं। ज्ञात होता है उस स्थान में पहले सर्प रहा
६० राजतरंगिणी
होगा। अपने पिता के जीवन काल मे हम दो बार उस चश्मे तक गये थे। काश्मीर नगर से बीस कोस पर है। यह चश्मा चौकोर है पर २० गज लम्बा और २२ गज चौड़ा है। इसके आस पास तपस्वियों के बहुत से आश्रम अवशेष हैं। पत्थरों की अनेक गुफायें हैं। इसका जल अत्यन्त निर्मल है। यद्यपि इसकी गहराई का हम अनुमान नहीं कर सके पर यदि एक पोस्ते का दाना उसमें छोड़ा जाय तो वह जब तक तह तक नहीं पहुँच जाता तब तक दिखलाई पड़ता है। इसमे मछलियाँ बहुत हैं। हमने सुना है कि इसकी गहराई अगाध है। पत्थर बाँध कर डोरी डालने की आज्ञा दी। डोरी के नापने पर केवल डेढ़ पूरसा निकला। अपनी गजनशीं के अनन्तर हमने आज्ञा दी कि उस चश्मे के किनारो को पत्थर से बाँध दिया जाय। इसके चारों ओर उद्यान लगाकर नहर निकालें। साथ ही उसके आस पास प्रासाद तथा गृह निर्माण कर उसे ऐसा स्थान बना दें जैसा सायंकाल संसार भर घूमने पर भी उसके जैसा दूसरा न बतला सकें।" पृष्ठ १६९। 'गहराई चौदह गज था। इसका जल पहाड़ की हरियाई तथा पौधों की छाया से हरित रंग का ज्ञात होता था। इसमें मछलियां बहुत थी। इसके चारों ओर दालान बुर्जियां सहित बन थे। इसके आगे उद्यान निर्मित किया गया था। तालाब के किनारे से उद्यान के फाटक तक एक नहर चार गज चौड़ी, एक सो अस्सी गज लम्बी तथा दो गज गहरी बनाई गई। इस तालाब के चारों ओर प्रस्तर निर्मित मार्ग बना था। इस नहर का जल इतना साफ था कि चार गज की गहराई होने भी अगर एक दाना गिरे तो दिखाई पड़े। पानी के नीचे उगी हुई घास आदि से वह ऐसा सुशोभित था कि क्या लिखा जाय। यहाँ अनेक प्रकार की सुगन्धित जड़ी बूटियाँ तथा पौधे ... हुए थे। और इसमें एक बूटा ऐसा दिखलाई पड़ता था जो ठीक मोर की पूँछ की तरह रंजित न ही धारा में दिखता था। फूल भी स्थान स्थान पर खिले हुए थे। संक्षेप में सारे कश्मीर में ऐसा रमणीक तथा चित्ताकर्षक स्थान दूसरा नहीं था। हमें ऐसा प्रतीत होता है। कश्मीर के ऊपरी भाग का दृश्य निम्न भाग की तुलना में बढ़कर है। हर एक को इस देश में कुछ दिन ठहरकर तथा चारों ओर भ्रमण कर यहाँ का दृश्य देखकर खूब आनंद लेना चाहिए। 'हमने आज्ञा दी कि नहर के दोनों तरफ चिनार के वृक्ष लगाए जायें।'-पृष्ठ ६७७, ६८२, ६८३। जहाँगीर पन्द्रहवें जलूसी वर्ष में पुनः कश्मीर गया। उसने वीर नाग के विषय में दिनांक सोमवार १२ को लिखा है- 'इसका (वितस्ता) स्रोत बोर नाग कहलाता है। जो चौदह कोस (श्रीनगर से) दक्षिण है। हमारी आज्ञा से सोते के पास एक इमारत तथा उद्यान निर्मित हुआ है।'-पृष्ठ ६५२ उसने दिनांक शुक्रवार २७ को बीर नाग की यात्रा के लिए प्रस्थान किया था। उसके संदर्भ में लिखता है- 'पाँच कोस ऊपर (नदी से) जाकर हम नाव से पामपुर में उतरे। शनिवार २८ को को हमने साढ़े चार कोस कूच किया। कानापुर से आगे बढ़कर हम नदी के तट पर पहुँचे। कानापुर की भांग प्रसिद्ध है। वह नदी के किनारे स्वतः पैदा होती रहती है। रविवार २९ को प्रजबरोर (विजयेश्वर) पहुँचे। सोमवार ३० को दूध का जलप्रपात देखा। यह ग्राम हमारे पिता (अकबर) ने रामदास कछवाहा को दिया था। उसने यहाँ इमारत और जलाशय बनवाया है। गुरुवार २८ को मिल को बार नाग के जलाशय के किनारे पड़ाव डाला। गुरुवार २ को इसी जलाशय के तट पर मदिरात्सव मनाया गया। यह सोता झेलम नदी का स्रोत है। यह एक पहाड़ के नीचे है। जिसकी भूमि वृक्षों थी
अधिकता, हरियाली तथा घास होने कारण दिखाई नहीं देती। जब हम शाहजादा थे तभी हमने आज्ञा दी थी कि इस स्थान के उपयुक्त यहाँ एक इमारत बने। वह अब पूरी हो गयी है। इसमे एक अठपहला तालाब बना था।' कद्रू : दक्ष प्रजापति की एक कन्या का नाम कद्रू था। वे नाग जाति को जननी थी। प्रजापति कश्यप की पत्नी थी। कथा है। कश्यप के वरदान के कारण कद्रू ने एक सहस्र नाग पुत्रों को जन्म दिया था। वर प्राप्ति के लगभग पाँच सौ वर्ष के पश्चात् कद्रू को एक पुत्र प्राप्त हुआ। कश्यप की दूसरी पत्नी विनता को अरुण तथा गरुड दो पुत्र हुए। सूर्य के रथ का अश्व किस रंग का है? इस प्रश्न पर कद्रू तथा विनता में विवाद हो गया। विनता ने अश्व का रंग श्वेत बताया। कद्रू ने अश्व की पूँछ काले रंग की बतायी। दोनो ने एक दूसरी की दासी होने का शर्त लगाया। कद्रू ने अपने नाग पुत्रो को आदेश दिया। वे अश्व की पूँछ में लिपट जाएं। पूँछ का रंग काला दिखाई पड़े। कुछ नागो ने माता का आज्ञा स्वीकार नही की। उन्हें जनमेजय के नागयज्ञ में भस्म होने का माँ ने शाप दिया। भुजंग कर्कोट ने माता को आश्वासन दिया। वह पूँछ में लिपट जायगा। रंग काला प्रतीत होगा। माता जीतेंगी। विमाता को हारकर दासत्वव्रत स्वीकार करना होगा। काश्मीर के कर्कोट वंश के राज्य का यथास्थान वर्णन किया जायेगा। महाभारत आदिसर्व के ३५ वें अध्याय में कद्रू के प्रमुख नाग संतानों की नामावली दी गयी है। कपटाचार के कारण कद्रू की विजय हुई। विनता ने दासी वृत्ति स्वीकार की। छल द्वारा विजय प्राप्त करने तथा माता को सपत्नी अर्थात् सौत की दासी होने के कारण विनता का यशस्वी पुत्र गरुड क्रुद्ध हो गया। कद्रू संतान नाग तथा विनता के संतान गरुड में संघर्ष आरंभ हो गया। इस संघर्ष की मेरी समझ में धार्मिक पृष्ठभूमि और है। कश्यप की कद्रू से उत्पन्न नाग जाति शिव की उपासक थी। विनता की संतान गरुड विष्णु के उपासक थे। शिव मंदिर में नाग पूजा तथा विष्णु मन्दिर में गरुड़ पूजा होती थी। उनको मूर्तियाँ मंडप अथवा गर्भगृह के बाहर प्रतिमा के सम्मुख रखी जाने लगी। शैव तथा वैष्णव संप्रदायो के संघर्ष का वह एक कारण बन गया। कालान्तर में एक पिता की सन्तान होने पर भी वे विभिन्न शाखाओ में विभाजित हो गये। नील एक पर्वत है। यह पर्वत उत्तर दिशा में गंधमादन तथा मदराचल पर्वतो के वाद पडता है। नील नाग इन्हीं नागों में से एक था। (वनपर्व १८८.११३) नील पर्वत का उल्लेख नीलमत पुराण में मिलता है। एकार्णवं जगत् सर्वं तदा भवति भूपते। हिमवान् हेमकूटश्च निषधो नीलपर्वतः॥ ३४: ५५, ५६ गंगाद्वारं कुशावर्त्तं विल्वकं नीलपर्वतम् । तथा कनखलं तीर्थं तीर्थान्यन्यानि पार्थिव । १५,१३ श्वेतश्च शृङ्गवांनेष माल्यवान् गन्धमादनः। महेन्द्रो मलयः सह्यः शक्तिमान् ऋक्षवानपि ॥ ३५ : ५६,५७ पुण्यं च नैमिषारण्यं गंगाद्वारमतः परम्। स्थानेश्वरात्कुरुक्षेत्रं ततो विष्णुपदं शुभम् ॥ 1054 : १२३८ विष्णुपद— दिल्ली की कुतुबमीनार एक पहाड़ी पर बनी है। उस पहाड़ी का नाम विष्णुपद था। वहाँ पर विष्णु का मंदिर था। विष्णुपद पर स्थित विष्णु
६२ राजतरंगिणी गुहोन्मुखा नागमुखापोतभूपिया रुचिम् । गौरा यत्र वितस्तात्वं याताऽप्युज्झति नोचिताम् ॥ २६ ॥ २६. उसका छत्र नीलकुण्ड तथा दंड वितस्ता नदी है। १ गुहाश्रिता देवी गुहोन्मुखी नागों को जलपान करानेवाली नागपीत पयःस्वरूप गौरी ने अपने दोनों कार्य गुणों तथा नागपीत पय को त्यागकर गुहोन्मुखत्व तथा नागपीत पयत्व दोनों धर्मों का पालन करती है।
मंदिर तोड़कर मस्जिद कुव्वते इस्लाम कुतुबुद्दीन ऐबक के समय बनाई गई थी। उसे अल्तमश ने और बढ़ाया था। अलाउद्दीन खिलजी ने इस मस्जिद को और बड़ा रूप देने का प्रयास किया था। उसके ठीक दूसरी तरफ मस्जिद के वाम पार्श्व में कुतुबमीनार जैसी मीनार बनाना चाहता था। उसका नाम अलाई मीनार है। यह पूरी बन नहीं सकी। ध्वंसावस्था में आज भी देखी जा सकती है। अलाउद्दीन ने यहाँ पर अलाई दरवाजा भी बनवाया है। यह आज तक सुरक्षित है। अलाउद्दीन खिलजी तथा अल्तमश दोनों की मज़ारें यहाँ पर बनी हैं। चंद्रगुप्त के लौहस्तम्भ पर खुदे अभिलेख से पता लगा है कि वही स्थान नीलमतवर्णित विष्णुपद है। यहाँ गंगाद्वार का उल्लेख हरिद्वार के समीप- वर्ती क्षेत्र के लिये किया गया है। कनखल का उल्लेख नील पर्वत तथा गंगाद्वार का स्थान स्पष्ट कर देता है। गंगाद्वार में एक नील पर्वत का वर्णन मिलता है। कहा गया है कि वहाँ स्नान करने पर मनुष्यों के पाप नष्ट हो जाते हैं गंगाद्वारे कुशावर्ते विल्वके नीलपर्वते । तथा कनखले स्नात्वा धूतपाप्मा दिवं व्रजेत् ॥ —म० अनुशासन पर्व २५:१३ जैन उत्तराध्ययन सूत्र (११:२८.४९) के अनुसार सीता नदी का उद्गम स्थान नील पर्वत है। नील पर्वत के दक्षिण में हिमालय पर्वत का स्थान माना गया है। इस नदी को गंभीर अर्थात् गहरी तथा दुरतिक्रम मार्कंडेय पुराण ने बताया है। कुछ विद्वान् सीता नदी को क्षारमंद किंवा अरफया नदी बताते हैं। सीता नदी वास्तव में सीर दरया है। सीता नदी का प्राचीन भौगोलिक वर्णन सीर दरया से मिलता है। आधुनिक विद्वानों ने सीर दरया को सीता नदी माना है। विष्णु पुराण (२:२:१०) के अनुसार नील पर्वत की गणना वर्ष पर्वत में की गई है। उसकी स्थिति सुमेरु के उत्तर में है। उत्तर में ही श्वेत शृंगी वर्ष को बताया गया है। तेनायं प्रणिधाय भूमिपतिना भावेन विष्णोः मतिम् । प्रांशुर्विष्णुपदे गिरौ भगवतो विष्णोर्ध्वजः स्थापितः ॥ आश्चर्य है कि नीलमत पुराण में मुझे इंद्रप्रस्थ तथा हस्तिनापुर का नाम नहीं मिला। विष्णुपद पर्वत के वर्णन से प्रतीत होता है कि नीलमत पुराण- कार को इंद्रप्रस्थ किंवा दिल्ली का ज्ञान था। पांडवों का वर्णन, कृष्ण का वर्णन, मथुरा आदि का नाम आने पर भी इंद्रप्रस्थ तथा हस्तिनापुर का न होना इस बात का प्रमाण है कि दिल्ली का महत्त्व केवल विष्णुपद पर्वत के कारण था। द्वितीय चंद्र- गुप्त के कुतुबमीनार किंवा महरौली के विष्णो- ध्वज स्तम्भ में इन्द्रप्रस्थ आदि का नाम नहीं दिया गया है। पाठभेद : श्लोक २६ में 'नागमुखा' का नागमुखी' पाठभेद मिलता है। पादटिप्पणियाँ : २६ : १) छत्र और दंड : कल्हण ने यहाँ पुनः सुंदर तथ्यपूर्ण उपमा दी है। यदि नीलकुण्ड की इमारत के ऊपर खड़ा होकर प्राकृतिक दृश्य देखें तो अठपहला नीलकुण्ड वास्तव में छत्र तुल्य तथा
प्रथम तरंग ६३ शङ्खपद्ममुखैर्नागैर्नानारत्नावभासिभिः । नगरं धनदस्येव निधिभिर्यन्निषेव्यते ॥ ३० ॥ ३०. विविध रत्नभांडों से विभूषित शंख पद्मादि नागों का कश्मीर मंडल कुबेर पुरी तुल्य आश्रय स्थान है । उससे समुद्रयात्रा निमित्त निकली जल स्रोत रेखा छत्रदंड तुल्य लगेगी । इस समय नील कुंड किंवा वेरीनाग का जल जहाँगीर तथा शाहजहाँ द्वारा निर्मित सोधी नहर जैसा बहता निकलता है । प्राचीन काल में जल निकलने की अवश्य कोई नहर किंवा प्रणाली रही होगी । कल्हण उसी जल रेखा का दंड तथा अष्टको णों में नील कुंड की उपमा छत्र से यहाँ देता है । ( २ ) नाग : कश्मीर में नाग जलस्रोत तथा जलप्रपात को कहते हैं । कश्मीर के जलस्रोतों तथा सरोवरों का देवता नाग तथा नागी है । ये देवता जलाशयों तथा जलस्रोतों में निवास करते हैं । बड़े जल स्रोत को नाग तथा छोटे को नागी कहा जाता है । नीलमत पुराण में अत्यधिक देवस्थानों तथा तीर्थों का स्थान जलस्रोतों तथा जलाशयों के समीप है । उनसे संबंधित है । नामरूप से उनकी पूजा अनादि काल से होती आई है । कश्मीर उपत्यका की मुस्लिम जनता में विश्वास व्याप्त है। नाग जलस्थानों में रहते हैं । मुसलमान होने पर भी वे नागों के प्रति आदर प्रकट करते हैं । चाहे उसकी पूजा करने से विरत भले ही हो गये हैं । निर्झरों तथा चश्मों से निकलती टेढी मेढी उज्ज्वल जल धारा नागों के रेंगने की तरह लगती है । अतएव उनके देखने से अनायास नागकी कल्पना मन में उठ जाती है । आइने अकबरी से प्रकट होता है कि जिस समय अकबर १६ वीं शताब्दी में आया था कश्मीर में ७०० स्थानों में नागपूजा होती थी । इस समय तक यह विश्वास तथा संस्कार लोगों में जमा है कि नाग सर्प के रूपमें निवास करते हैं। वे जल- स्रोतों अथवा जलाशयों में रहते हैं । जलाशयों की रक्षा करते हैं । राजतरंगिणी के वर्णन ( ४:६०१, ७:१७१ ) से प्रकट होता है कि हजारों वर्षों से इस प्रकार का संस्कार लोगों के हृदयो में बैठ गया था । यह भी धारणा व्याप्त थी । नाग मानवरूप धारण कर प्रकट होते थे । राजतरंगिणी में नाग सुश्रुवा तथा उसकी कन्या के कथानक से यह बात सिद्ध होती है । वे मेघ, महाशिला किंवा हिमवृष्टि का रूप ( रा० त० १.१७९, २२९, २.१६ ) धारण कर लेते थे । लोगों को त्रस्त करते थे । भयभीत करते थे । पादटिप्पणियाँ : ३० ( १ ) शंख तथा पद्म नाग का वर्णन नील- मत पुराण में किया गया है । कश्मीर के नागानों की महत्त्वपूर्ण स्थान नहीं रखते हैं । परम्परा से नीलमत पुराण में नागाओं की तालिका के क्रम में उनका १२ वाँ स्थान आता है । शंखाक्षः कमलाक्षश्च मणिनागो वहैवकाः ॥ ९१४ : १०९१ पद्म नाग का नीलमत पुराण ( श्लोक 884: १०५४ ) में दो बार उल्लेख आया है । दो महापद्म नागों के अतिरिक्त इनकी क्रमसंख्या २६ वीं आती है । शंख नाग का स्थान कश्मीर में कहाँ पर है उसका वर्तमान परिवर्तित नाम क्या है ? अभी तक पता नहीं चल पाया है । शंखपाल नाग शंखनाग से भिन्न है । पद्म नाग को प्रोफेसर बह्लर महा- पद्म नाग मानते हैं । यह ऊलर लेक का नामधारी देवता है । इसका उल्लेख राजतरंगिणी ( ४:५९३ )
६४ राजतरंगिणी में आया है। श्रीकण्ठचरित (३.६) तथा जोन- राज ने महापद्म नाम से ही ऊलर लेक का सम्बो- धन किया है। स्टीन ने पद्म नाग को महापद्म नाग माना है। वह प्रमाण देते हैं। श्रीवर ने (१ ३३५) क्रमराज के बाढ़ के समय पद्मनगर से पानी प्राप्त करने का उल्लेख किया है। यह पद्मनगर ऊलर लेक के अतिरिक्त दूसरा कोई भिन्न सर नहीं हो सकता है। राजतरंगिणी, तरंग ४, श्लोक ८५ में पद्मनाग का उल्लेख भवतुंग के समीप हुए युद्ध के प्रसंग मे आया है। भवतुंग ग्राम बोतुंग गाँव है। जैनगिर परगना मे ऊलर लेकके पश्चिमी तट पर स्थित है। वितस्ता माहात्म्य (१४ ३५) में रत्नचूड़ नाग का उल्लेख है। पद्म सर के समीप आर्येस के पास है। यह सुक्रहोम परगना में अलुस ग्राम से ऊलर लेक के उत्तर-पश्चिम स्थित है। ऊलर लेक को महापद्म सर कहते हैं। भविष्य पुराण के ब्राह्म खण्ड मे नाग जाति का उल्लेख है। महापद्म नाग तथा पद्मनाग दो भिन्न नाग हैं। दोनो के रंग, दृष्टि, दशा तथा चिह्नों मे भिन्नता है। उनके कारण दोनो को पहचाना जा सकता है। महापद्म नाग का वर्ण वैश्य है। रंग पीत है। दृष्टि खाली है। दिशा वायव्य है। उसका चिह्न शूल है। पद्म नाग का वर्ण शूद्र है। रंग कृष्ण है। दृष्टि चंचल है। दिशा पश्चिम है। चिह्न पद्म है। शंखपाल किंवा शंखनाग का वर्ण क्षत्रिय है। रंग श्यामल है। दृष्टि निश्चेष्ट है। दिशा उत्तर है। चिह्न छत्र है। महापद्म तथा पद्म सर दोनों शब्दो का प्रयोग कालांतर में ऊलर लेक के लिये किया जाने लगा। कद्रू तथा विनता के पारस्परिक संघर्ष के कारण कद्रू की नाग संतानों ने विनता के पुत्र गरुड़ के भय से सतीसर में जाकर शरण ली। भगवान् विष्णु ने उन्हें शरण दी। काश्मीर उपत्यका के उत्तरी तथा दक्षिणी पर्वतमालाओं को उपमा नागो के बाहुओं से दी गई है। विशेष विवरण परिशिष्ट में द्रष्टव्य है। शंख नाग : फणिं वृश्चिं तथा निद्रां धनेशां नदकृद्वगम् । शंखपद्मौ निधी पूज्यौ भद्रकाली सरस्वती ॥ —585 : ७०६ पुत्निका शंखसख्यो च पालाशः रोदिमो यदिः । —889 हिलिहालः शंखपालो नागो चन्दननन्दनौ ॥ —883 : १०५३ शंख, शंखपाल तथा शंखाक्ष तीनो नाग भिन्न हैं। द्वौ पद्मौ द्वौ महापद्मौ द्वौ कालो द्वौ च कर्कोटकौ । द्वौ समुद्रौ समुद्राणौ द्वौ गर्तो द्वौ च तक्षकौ ॥ —884 : १०५४, १०५५ कश्यप तथा कद्रू द्वारा शंख नाग की उत्पत्ति हुई थी। सुमनाख्यो दधिमुखस्तथा विमलपिण्डकः । आप्तः करोटिरुद्दैश्च शंखः कालशिरस्तथा ॥ —आदिपर्व ३५ : ८ भगवान् नारद ने मातलि को शंख नाग का परिचय दिया था। सुमनो मुखो दधिमुखः शंखो नन्दोपनन्दकौ । आप्तः कोटरकश्चैव शिखि निष्ठुरिकस्तथा ॥ —उद्योगपर्व १०३ : १२ बलराम के स्वर्ग गमन के अवसर पर शंख नाग के आने का उल्लेख मिलता है। कर्कोटको वासुकिस्तक्षकश्च पृथुश्रवा अरुणः कुंजरश्च । मिश्रीशंखकुमुदः पुण्डरीकस्तथा नागो धृतराष्ट्रो महात्मा॥ —म० मौसलपर्व ४ : १७५ शंख तीर्थ : सरस्वती नदी के तट पर एक प्राचीन तीर्थ था। कश्मीर मे लार परगना के धरिन्छ लेक के समीप शंख नाग का स्थान माना गया है।
प्रथम तरंग ६५ उच्चावचांस्तथा भक्ष्यान् विप्रेभ्यो विप्रदाय सः । नीलवासास्तथा गच्छेदृक्षलतीर्थं महायशाः ॥१९ तत्रायच्छन्महाशंखं महामेरुमिवोच्छ्रितम् । श्वेतपर्वतसंकाशं ऋषिगन्धैर्निषेवितम् ॥२० सरस्वत्यास्तटे जातं नगं तालध्वजो बली । यक्ष विद्याधराश्चैव राक्षसाश्चाभितौजसः ॥२१ —म० शल्यपर्व ३७ : १९-२६ योगवासिष्ठ रामायण में महापद्म सर का उल्लेख कश्मीर के संदर्भ में किया गया है। कल्हण ने महापद्मसर अर्थात् उलर लेक का उतना सुन्दर वर्णन नहीं किया है जितना योगवासिष्ठ जैसे महान् ग्रन्थ में उपलब्ध है । जिन लोगों ने महापद्मसर को देखा है, यदि वे योगवासिष्ठ का वर्णन पढ़ें तो उन्हे प्रतीत होगा, जैसे कोई लेखक आज के लेक का आँखों देखा वर्णन लिख रहा है । वर्णन किया गया है : 'महापद्मसर कमल दल द्वारा पूर्ण रहता है। उसमें मछलियाँ होती हैं । ग्रीष्म काल में सारस विहार करते हैं ।' योगवासिष्ठ में महापद्म के साथ ही साथ पद्मसर की भी संज्ञा महापद्म के लिये दी गयी है । महापद्म तथा पद्मसर दोनों एक ही हैं । स्टीन का अनुमान सत्य है महापद्म सर पद्मसर है । स्टीन योगवासिष्ठ नही देखा था । 'अन्यथा उसका उल्लेख करता । स्टीन ने कितना गहन अध्य- यन कश्मीर के सम्बन्ध में किया था । यह इसी एक बात से अनुमान लगाया जा सकता है । महर्षि वाल्मीकि योगवासिष्ठ में महापद्मसर का वर्णन करते हैं, "पद्मसर श्वेत कमल पंक्तियों की माला से युक्त है । शेवाल, तरंगों से अत्यन्त सुशो- भित है। नील कमल की लताओं से पूर्ण है। आश्चर्य शीतल है ।" ( योगवासिष्ठ स्थिति प्रकरण ३२ : ५०१० ) निस्संदेह यह वर्णन आज भी महापद्मसर का जीता जागता रूप उपस्थित करता है। पद्मसर में सारस, नील कमल, उज्ज्वल कमल तथा पर्वती ९ शीतल मंद मंद समीरण में, हल्की लहरें, कश्मीर की अभिरामता बढ़ा देती हैं जिसे कोई पर्यटक भूल नहीं सकता । नाग एक जाति थी । वे मनुष्य थे । उनका यथास्थान विस्तृत वर्णन परिशिष्ट में किया गया है। भारतवर्ष में नागों के दो राज्य थे । मथुरा में सात नाग राजाओं ने राज्य किया था । इसी प्रकार चम्पावती में नव नाग राजाओं ने राज्य किया था । —वायु पुराण: ९८ : ४५३, ९९ : ३८२; ब्रह्माण्ड पुराण ३ : ७४ : १९४-५ २६७ । नवद्वीपों में इंद्रद्वीप, कसेरुमान, ताम्रवर्णी, गभस्तिमान, नागद्वीप, सौम्य द्वीप, गन्धर्व द्वीप तथा कुमारी द्वीप हैं। इसमें नाग द्वीप का उल्लेख किया गया है । इससे प्रकट होता है। नाग जाति का एक देश था। वहाँ उनकी आबादी थी । राजशेखर ने काव्य मीमांसा में सम्राट् तथा चक्रवर्ती के अवधारणा के संदर्भ में विचार करते हुए नाग द्वीप का उल्लेख किया है । नागद्वीप का उल्लेख महाभारत ( भीष्मपर्व ६ : ५५ ) में है । उसे सुदर्शन द्वीप के अन्तर्गत एक द्वीप माना गया है । वह शशिमंडल की शशाकृति में कानस्वरूप दृष्टिगोचर होता है। नागद्वीप का उल्लेख पुराणों में विस्तृत रूप से देखा जा सकता है। ( भागवत ५:१६:२६; पद्मपुराण, सृष्टिखंड ३१ ) विष्णुपुराण अंश ४६३ में पद्मवतीपुरी में नाग लोगों के उपभोग करने का वर्णन किया गया है। अमरकोशकार ने नाग शब्द की परिभाषा की है—'अधो भुवनं पाताल-बलिसद्म-रसातलम् । नाग- लोकोऽथ कुहरं सुषिरं विवरं बिलम् ।' पाताल, रसातल और बलि का घर नाग लोकांतर्गत हैं । अमेरिका को कुछ लेखक पाताल देश मानते हैं । इस विवाद में न पड़कर यही कहना अलम् होगा । अमेरिका के मूल निवासी रेड इंडियनों में नाग पूजा प्रचलित थी । नाग की आकृतियाँ शिलाओं पर उत्कीर्ण मिली हैं ।
६६ राजतरंगिणी यत्तार्क्यभीत्या प्राप्तानां नागानां गुप्तये ध्रुवम् । प्रसारितभुजं पृष्ठे शैलप्राकारलीलया ॥३१॥ ३१. काश्मीर मंडल की प्राकार-स्वरूप पर्वतमालाएं जैसे भुजाएँ उठाये गरुड़ द्वारा ताड़ित शरणागत नागों की रक्षा कर रही हैं। भुक्तिमुक्तिफलप्राप्तिः काष्ठरूपमुमापतिम् । पापसूदनतीर्थान्तर्यत्र संस्पृशतां भवेत् ॥३२॥ ३२. पापसूदन१ तीर्थ में काष्ठ-स्वरूप उमापति के दर्शन एवं स्पर्श द्वारा भोग तथा मोक्ष दोनों फलों की प्राप्ति होती है। अफगानिस्तान का एक वर्ग नागवंशी कहा जाता है। बंगाल में एक वंश का पदगौरव नाग है। वे अपने को नागवंशीय कहते हैं। बंगाल के नाग महाशयों का गोत्र वासुकी नाग है। वासुकी नाग का स्थान कश्मीर का भद्रवा अंचल है। विशेष अध्ययन के लिए 'नाग' परिशिष्ट द्रष्टव्य है। पाठभेद : श्लोक संख्या ३२ में 'काष्ठरूपम्' का 'कप- टेश्वरम्' पाठभेद मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ३२ (१) पापसूदन तीर्थ : वेरी नाग के लग- भग १० मील दूर अरपथ उपत्यका में पापसूदन तीर्थ स्थित है। पापसूदन तीर्थ का पवित्र जलकुंड कप- टेश्वर नाम से पूजित होता है। काकर ग्राम के निकट, परगना कुयर अर्थात् कपटेश्वर में एक अत्यन्त निर्मल जलपूर्ण कुंड है। वह एक जलस्रोत को बाँध- कर बनाया गया है। भगवान् शिव की कपटेश्वर नाम से यहाँ पूजा होती है। ये यहाँ कपट अर्थात् लकड़ी के रूप में जल पर तैरते प्रकट होते हैं। कप- टेश्वर के सम्बन्ध में एक पुरानी गाथा है— 'शिव दर्शन के इच्छुक ऋषि तथा मुनिगण दृषद्वती नदी के किनारे कुरुक्षेत्र में प्रस्थान किए। रात्रि में उन्हें शिव ने स्वप्न दिया। झील के निकास स्थान कश्मीर में वे जाँय। आनेपर उन लोगों ने वहाँ केवल लकड़ी के टुकड़े देखे। उसे उन्होंने इधर उधर फेंक दिया। कुछ समय पश्चात् कपटेश्वर में जल वेग से निकलने लगा। उन्होंने उसमें स्नान किया। स्नान करते ही ऋषि रुद्र हो गये। केवल वसिष्ठ अर्थात् गोरपराशर को कुछ कौतूहल हुआ। उन्होंने स्नान नही किया। वे उप- वास करने लगे। उनका शरीर सूख गया। शिव ने स्वप्न में उन्हें दर्शन दिया। उनसे वर माँगने के लिये कहा। वसिष्ठ ने निवेदन किया— 'आप सर्वदा इस पवित्र जलाशय में काष्ठ के टुकड़े तथा जल के रूप में निवास कीजिए। कलियुग में लोग काष्ठ रूप आपका दर्शन तथा स्नान कर पाप मुक्त हो जाँय।' शिव ने वर दिया। उसीके फल स्वरूप कपटेश्वर में जल पूर्ण रहता है और काष्ठ रूप में भगवान् प्रकट होते रहते हैं। मालवराज राजा भोज ने पुष्कल धन व्यय कर कपटेश्वर के कुंड का निर्माण कराया था। राजा यहाँ के पवित्र जल द्वारा नित्य मार्जन करते थे। उनकी यह प्रतिज्ञा थी। काँच कलश में कपटेश्वर का जल प्रतिदिन कश्मीर से मालवा भेजा जाता था। तत्कालीन कुंड निर्माण के भग्न विशाल शिला खंड यहाँ यत्र-तत्र पड़े है। गोलाकार कुंड है। शिला प्राकार द्वारा परि- वेष्टित है। उन्नीस वर्गगज क्षेत्रफल होगा। इस तीर्थ का उल्लेख नीलमत पुराण तथा हरिवरितामृत दोनो मे है। उसी के आधार पर कपटेश्वर माहात्म्य की रचना की गई है।
प्रथम तरंग ६७ अलवेरूनी कुंड के विषय में अपनी पुस्तक दृष्ट्वा धनेश्वरं देवं वितस्ताहासमीपतः । ( भाग २ पृष्ठ १८१ ) में एक गाथा का उल्लेख कपटेश्वरपार्श्वे च दृष्ट्वाऽगस्त्येन निर्मितम् ॥ करता है। कश्मीरियों से सुनकर लिखा था। उसने —100 : १७७८ स्वयं इस स्थान की यात्रा नहीं की थी। अन्यथा वह अपनी नैसर्गिक प्रतिभा से यहाँ के प्राकृतिक तोयमप्यगतं दृष्ट्वा संप्राप्तं कपटेश्वरम् । दृश्य का इतना सुन्दर वर्णन करता कि वह स्वयं गोसहस्रमवाप्नोति संपूज्याभीप्सतां गतिम् ॥ एक ऐतिहासिक काव्य हो जाता। वह कहता है— 920—१०२९:१२०२ 'महादेव द्वारा प्रेषित लकडी के टुकडे प्रतिवर्ष कुंड में उतराते हैं। इस कुंड का नाम कुंडैशह किंवा कपटेश्वर इत्युक्तं देवदेवस्य शूलिनः । कवडेइवर है। यह वितस्ता नदी के उद्गम स्थल के पुण्यमायतनं तस्य समुत्पत्तिं वदस्व मे ॥ वाम दिशा में स्थित है। यह आश्चर्यजनक घटना —1125 : १३२९ वैशाख मास के मध्य काल में होती है।' रुद्रलोकमवाप्नोति स्नात्वा तु कपटेश्वरे । हरचरितामृत (अध्याय १४:१२२) में इस विश्वलिंगह्रदे स्नात्वा रुद्रलोके महीयते ॥ स्थान का उल्लेख मिलता है। यहाँ का वर्णन तथा —1302 : १५१६ तीर्थ यात्रा का जो समय अलवेरुनी ने दिया है वह माहात्म्य में दिये गये समय तथा वर्णन से मिलता नीलमत पुराण में कपटेश्वर माहात्म्य के है। अलवेरुनी ने जिन सूत्रों के आधार पर यहाँ का विषय में निम्नलिखित वर्णन मिलता है। वर्णन लिखा है वह सत्य प्रतीत होता है। गौरपाराशर उवाच : अबुल फजल आइने अकबरी में कपटेश्वर के वरश्च दीयते देव मम कामांगनाशन । विषय में लिखता है-'अलवेरनी का कवडेइवर शब्द ऋषिभिस्त्वं यथा दृष्टः काष्ठरूपी महेश्वरः ॥ कपटेश्वर का अपभ्रंश है। कोटेहर ग्राम में एक —1143 : १३४८, १३४९ गहरा झरना है। उसके चारों ओर मंदिर बने हैं। इसका पानी जब घटता है तो चंदन की लकड़ी के महेश्वर उवाच : रूप में महादेव प्रकट होते हैं।" द्रक्ष्यन्ति ये जनाः सर्वे काष्ठरूपं समास्थितम् । कदाचिद् द्विजशार्दूल सर्वकालं तु न द्विज ॥ कल्हण ने (रा० त० ७:१९०) कपटेश्वर का —1143 : १३५०, १३५१ उल्लेख किया है। राजा मुचकुंद यहाँ के जल से स्वस्थ हो गये थे। स्थानीय जनश्रुति है। जल में अयं च सततं नन्दी काष्ठरूपी गणो मम । विलक्षण स्वास्थ्यदायक शक्ति है। कथासरित्सागर दर्शनं दास्यते नृणां तदनुग्रहकाम्यया ॥ में सोमदेव भट्ट ने कश्मीर में जाकर शिव पूजा —1144 : १३५३ के माहात्म्य का वर्णन किया है। कपटेश्वर में शिव पूजा का उल्लेख करते हुए लिखता है— मां च दृष्ट्वा न यास्यन्ति स्वशरीरेण रुद्रताम् । 'सुरेश्वर्याद्रिपु तया विजये कपटेश्वरे' कपटेन च दास्यामि नराणां दर्शनं यदा (९:१:४८) —1145 : १३५४, १३५५, नीलमत पुराण में कपटेश्वर के संबंध में निम्न- तदा संज्ञामवाप्स्यामि कपटेश्वर इत्यतः । लिखित उल्लेख मिलता है— तोयस्य बहुलीभावो देशेऽस्मिन् ब्राह्मणोत्तम ॥ —1146 : १३५५, १३५६
इस चित्र में कोई पाठ या सामग्री उपलब्ध नहीं है (चित्र रिक्त/खाली है)।
प्रथम तरंग ६९
कपटेश्वर तीन ओर से अत्यन्त हरित उत्तुंग देवदार तथा चीड़ वृक्षों की अवलियों से आवृत है। उत्तुंग हरित सुन्दर शिखर हैं। ऊपर निर्मल नील गगन है। गांव की दिशा की ओर पृष्ठ भागों में बहुत दूर हिमाच्छादित शिखर सूर्य किरणों के प्रतिबिम्ब में रंग बदलता दिखाई पड़ता है। यदि आँखें नीचे उठ गयीं, तो विस्तृत हरी-भरी उपत्यका, उनमें यत्र-तत्र बिखरे ग्राम छाया तुल्य दिखाई देते हैं।
स्थान की परिकल्पना अद्भुत है। विचित्र है। आज खंडहर हैं। इन खंडहरो में किंचित् कल्पना का आश्रय लेने पर स्थान की भव्यता का अनुभव होगा। मध्य में वृत्ताकार कुंड के चारों ओर पत्थर की सीढ़ियाँ हैं। जल के नीचे तक सीढ़ियाँ चली गयी हैं। जल के स्तर से दो-तीन फीट ऊपर २० छोटी-छोटी मन्दिराकार मड़ियाँ कुंड के तटपर बनी हैं। चारो दिशाओ से चार सीढ़ियाँ भूमि स्तर से जल तक आती हैं। प्रत्येक दो सीढ़ियों के मध्य उल्लिखित ५ मड़ियाँ मन्दिरा- कार बनी हैं। मडियों की छतें प्रस्फुटित कमल के चौकोर पत्थर से ढँकी हैं। मड़ियाँ चौकोर हैं। इस प्रकार की मड़ियों के निर्माण की प्रथा काशी तथा अन्य तीर्थ स्थानों में जलाशयों के तटों पर हैं। उनमें विभिन्न देवताओं की मूर्तियाँ स्थापित की जाती हैं। कहीं-कही मड़िया स्नान के पश्चात् वस्त्र परिवर्तन करने, साधुओं के निवास किंवा पूजापाठ करने के लिए काम में लाई जाती हैं। कपटेश्वर की मड़िया लगभग ३ फुट ऊँची तथा उतनी ही चौड़ी होंगी। प्रायः वर्गाकार हैं।
मड़िया केवल देवस्थान एवं मूर्ति स्थापन के लिए बनाई गई थी। एक मढ़ी में पत्थर का सिंहा- सन नष्ट होने से बच गया है। गाँववालों से मड़ियों के विषय में पूछने पर पता चला। उन्होंने अपने पूर्वजों से सुना था। मड़ियों में विभिन्न देवताओं की मूर्तियाँ थीं। मुस्लिम काल में उन्हें उठाकर फेंक
दिया गया। मन्दिर गिरा दिए गए। इस प्रकार कुफ्र एक का गढ़ नष्ट हो गया। ईमान की विजय हुई।
मड़ियों के ऊपर भूमि का विस्तृत ऊपरी स्तर है। यह चौड़ा स्तर चारों ओर चौकोर हैं। स्तर के मूल से भूमि बांध की तरह उठती गयी है। उस ऊँची भूमि पर चारो दिशाओ में चार भव्य मन्दिरों का निर्माण कराया गया था। इस समय केवल एक का आकार शेष रह गया है। शेष तीन मंदिर तोड़ दिए गए हैं। खँड़हर बन गए हैं। उनके पत्थर ग्रामीण उठा ले गये हैं। जारी चारों मन्दिरों के द्वार से जल तक पहुँचने के लिए चारो दिशाओं से उतरती सीढ़ियाँ कुंड में जाकर लीन हो जाती हैं। ऊपरी मंदिर जलस्तर से लगभग एक सौ फुट ऊँचाई पर होगा।
ग्राम की तरफ जल एक प्रणाली से निकलता है। प्रणाली के तल में कुछ खंडित देवताओं की मूर्तियाँ तथा शिवलिंग रखे हैं। वे तोड़कर छोड़ दिये गये थे उनकी दयनीय स्थिति जगत् को दिखाने के लिए उन्हें मारियों में ईंटों की तरह रख दिया गया है। इस स्थान से जल लेकर आचमन किया जाता है।
ग्राम तथा कुंड की मध्यवर्ती भूमिपर इस समय मंदिरों के विशाल ध्वंसावशेष मिलेंगे। एक छोटा मंदिर गांव की ओर वाली ऊँची भूमि तथा सरोवर की दीवार के मध्य स्थित है। तीनों मंदिरों के मुख किंवा द्वार सरोवर की तरफ हैं। दोनों विशाल मन्दिरों का अधिष्ठान भूमि से १५ फुट ऊँचाई पर है। मन्दिर के अन्तराल तक पहुँचने के लिए ९ सीढ़ियाँ चढ़नी होंगी। उन्नत दोनों विशाल मन्दिरो की पट्टिका के ऊपर का ढांचा बिल्कुल लोप हो गया है। भित्तियों का कहीं पता नहीं है। केवल चारों भित्तियों का मूल आकार मात्र शेष रह गया है।
मन्दिरों के पत्थर ग्रामीण तोड़-तोड़कर उठा ले गये हैं। केवल भूमि से अन्तराल तक पहुँचनेवाली
६८ राजतरंगिणी
दर्शनस्य मदीयस्य पूर्वजं भविष्यति । इत्येतत्कथितं गुह्यं कपटेश्वरसंज्ञकम् ॥ —1147 : १२५९, १२६०,
कपटेश्वर प्रत्यक्ष होकर जाना चाहिए। वैरी- नाग से होते हुए कपटेश्वर जाना पहले चाहे सुविधा- जनक रहा हो, परन्तु सड़कों तथा परिवहन के साधना के कारण, अनन्त नाग तथा अनवल होकर जाना अधिक सरल तथा सुविधाजनक हो गया है। अनवल के डाक बंगला के दक्षिण पार्श्व में एक पक्की सड़क कपटेश्वर जाती है। उससे कुछ आगे जाने पर एक कच्ची सड़क मिलती है। संभव है कुछ समय पश्चात् यह सड़क भी पक्की बन जाय। यह सड़क देवदार के सुरम्य वनों द्वारा कोठर ग्राम पहुँचती है। मार्ग की वन-श्री सुन्दर है। मन करता है। चुप-चाप यहाँ बैठकर प्रकृति की अभिरामता दखते रहें।
सड़क चढ़ाव-उतार से होकर गुजरती है। कुछ आगे जाने पर दूसरी ओर की उपत्यका का मनोरम प्राकृतिक दृश्य मिलता है। पगडण्डी कोठर गाँव तथा कपटेश्वर पर्वत के पादमूल तक पहुँच जाती है। ग्राम से सड़क के दाहिनी तरफ अखरोट, विलों की हरित झूमती सघन तरु पंक्तियाँ मिलेंगी। ऊपर से किंचित् कल-कल ध्वनि के साथ उतरता निर्झर दिखाई देगा। यह जल पापसूदन कुंड द्वारा निकला निर्मल उज्ज्वल शीतल जल है। निर्झर प्रणाली पर दो एक लकड़ी के बने स्नानकुट अर्थात् 'स्नान गृह' रखे थे। काश्मीरी जलाशयों के समीप सर्वत्र लकड़ी निर्मित महिलाओं के स्नान निमित्त स्नानकुट रखे मिलते हैं।
सड़क त्यागकर पगडण्डी पकड़नी पड़ती है। लगभग २ फर्लांग की सरल चढ़ाई है। पाँच मिनट की चढ़ाई के पश्चात् पापसूदन तीर्थ का मनोरम दर्शन मिलता है।
वैरीनाग अर्थात् नीलकुण्ड के समान यहाँ एक विस्तीर्ण कुण्ड दियां गया सा है। वैरीनाग से बहुत बड़ा है। जल वैरी नाग की तरह स्थिर, शान्त तथा औषम शय है। जल में एक प्रकार की चंचलता दिखाई पड़ती है। जैसे कुंड की पाषाण जल स्तर पर फिर रही हो। एक श्रोता से जल गोमुख सदृश द्वारा बाहर निकलता रहता है। नदी के जल त्रिविद् प्रवाह का रूप धारण करता है। ग्राम के जल प्रणाली का रूप ले लेता है। ग्राम की स्तर से लगभग २०० फीट की ऊँचाई पर पापसूदन तीर्थ का पवित्र कुंड स्थित है।
स्थान शान्त है। चारों ओर वन देखकर मन पुलकित हो जाता है। यहाँ की प्रकृति सुषमा में जीवन है। चेतना का अनुभव होता है। बहुधा स्थानों के सुन्दर होने पर भी उनमें चेतना का अनुभव नहीं होता। यहाँ मुझे जीवन तथा चेतना का योग प्रकृति के शान्त वातावरण में होने लगा। जिस समय यह स्थान अपनी पूर्ण गरिमा में रहा होगा उस समय वैरीनाग इसके सम्मुख तुच्छ प्रतीत होता होगा। इसकी सुन्दरता की कल्पना में नील नाग दिया वैरी नाग की सुन्दरता नगण्य मालूम होगी।
कपटेश्वर धार्मिक तीर्थ था। मन्दिरों का अद्भुत समूह था। बुतपरस्ती का एक बड़ा मरकज होने के कारण इसके विनाश अथवा इसे सुन्दर बनाने का प्रयास हिन्दू राजाओं के पश्चात् मुस्लिम राजाओं ने नहीं किया। यह स्थान श्रीनगर से दूर है। मुख्य राजपथ से दूर है। यहाँ आना कठिन है। अतएव इसका महत्त्व घटता गया। वैरीनाग सुगम होने के कारण महत्त्व प्राप्त करता गया। मुगलों के कारण, राजकीय संरक्षण के कारण, विकास की सुनियोजित योजना के कारण, वैरीनाग ने सुन्दरता का परिधान पहन लिया है। वितस्ता का उद्गम स्थान होने के कारण साधारण जनता की दृष्टि में इसका मान बढ़ता गया। चाहे वे हिन्दू हों अथवा मुसलमान।
प्रथम तरंग ६९ [स्तम्भ १] कपटेश्वर तीन ओर से अत्यन्त हरित उत्तुंग देवदार तथा चीड वृक्षों की अवलियों से आवृत है। उत्तुंग हरित सुन्दर शिखर हैं। ऊपर निर्मल नील गगन है। गाँव की दिशा की ओर पृष्ठ भागों में बहुत दूर हिमाच्छादित शिखर सूर्य किरणों के प्रतिबिंब में रंग बदलता दिखाई पड़ता है। यदि आँखें नीचे उठ गयीं, तो विस्तृत हरी-भरी उपत्यका, उनमें यत्र-तत्र बिखरे ग्राम छाया तुल्य दिखाई देते हैं। स्थान की परिकल्पना अद्भुत है। विचित्र है। आज खंडहर हैं। इन खंडहरों में किंचित् कल्पना का आश्रय लेने पर स्थान की भव्यता का अनुभव होगा। मध्य में वृत्ताकार कुंड के चारो ओर पत्थर की सीढ़ियाँ हैं। जल के नीचे तक सीढ़ियाँ चली गयी हैं। जल के स्तर से दो-तीन फीट ऊपर २० छोटी-छोटी मन्दिराकार मढ़ियाँ कुंड के तटपर बनी हैं। चारों दिशाओं से चार सीढ़ियाँ भूमि स्तर से जल तक आती हैं। प्रत्येक दो सीढ़ियों के मध्य उल्लिखित ५ मढ़ियाँ मन्दिरा- कार बनी हैं। मंडयों की छतें प्रस्फुटित कमल के चौकोर पत्थर से ढँकी हैं। मढ़ियाँ चौकोर हैं। इस प्रकार की मढ़ियों के निर्माण की प्रथा काशी तथा अन्य तीर्थ स्थानों में जलाशयों के तटों पर है। उनमें विभिन्न देवताओं की मूर्तियाँ स्थापित की जाती हैं। कहीं-कहीं मढ़िया स्नान के पश्चात् वस्त्र परिवर्तन करने, साधुओं के निवास किंवा पूजापाठ करने के लिए काम में लाई जाती हैं। कपटेश्वर की मढ़िया लगभग ३ फुट ऊँची तथा उतनी ही चौड़ी होंगी। प्रायः वर्गाकार हैं। मढ़िया केवल देवस्थान एवं मूर्ति स्थापन के लिए बनाई गई थीं। एक मढ़ी में पत्थर का सिंहा- सन नष्ट होने से बच गया है। गाँववालों से मढ़ियों के विषय में पूछने पर पता चला। उन्होंने अपने पूर्वजों से सुना था। मढ़ियों में विभिन्न देवताओं की मूर्तियाँ थीं। मुसलिम काल में उन्हें उठाकर फेंक [स्तम्भ २] दिया गया। मन्दिर गिरा दिए गए। इस प्रकार कुफ़्र एक का गढ़ नष्ट हो गया। ईमान की विजय हुई। मढ़ियों के ऊपर भूमि का विस्तृत ऊपरी स्तर है। यह चौड़ा स्तर चारों ओर चौकोर है। स्तर के मूल से भूमि बाँध की तरह उठती गयी हैं। उस ऊँची भूमि पर चारों दिशाओं में चार भव्य मन्दिरों का निर्माण कराया गया था। इस समय केवल एक का आकार शेष रह गया है। शेष तीन मंदिर तोड़ दिए गए हैं। खँडहर बन गए हैं। उनके पत्थर ग्रामीण उठा ले गये हैं। चारो चारों मन्दिरों के द्वार से जल तक पहुँचने के लिए चारों दिशाओं से उतरती सीढ़ियाँ कुंड में जाकर लोप हो जाती हैं। ऊपरी मंदिर जलस्तर से लगभग एक सौ फुट ऊँचाई पर होगा। ग्राम की तरफ जल एक प्रणाली से निकलता है। प्रणाली के तल में कुछ खंडित देवताओं की मूर्तियाँ तथा शिवलिंग रखे हैं। वे तोड़कर छोड़ दिये गये थे उनकी दयनीय स्थिति जगत् को दिखाने के लिए उन्हें नारियों में ईंटों की तरह रख दिया गया है। इस स्थान से जल लेकर आचमन किया जाता है। ग्राम तथा कुंड की मध्यवर्ती भूमिपर इस समय मंदिरों के विशाल ध्वंसावशेष मिलेंगे। एक छोटा मंदिर गाँव की ओर वाली ऊँची भूमि तथा सरोवर की दीवार के मध्य स्थित है। तीनो मंदिरों के मुख किंवा द्वार सरोवर की तरफ हैं। दोनों विशाल मन्दिरों का अधिष्ठान भूमि से १५ फुट ऊँचाई पर हैं। मन्दिर के अन्तराल तक पहुंचने के लिए ९ सीढ़ियाँ चढ़नी होंगी। उक्त दोनों विशाल मन्दिरों की पट्टिका के ऊपर का ढाँचा बिल्कुल लोप हो गया है। भित्तियों का कहीं पता नहीं है। केवल चारों भित्तियों का मूल आधार मात्र शेष रह गया है। मन्दिरों के पत्थर ग्रामीण तोड़-फोड़कर उठा ले गये हैं। केवल भूमि से अन्तराल तक पहुँचनेवाली
७० राजतरंगिणी सीढियां शेष रह गयी हैं। यह दोनों मन्दिर दीवार तथा कुंड के मध्यवर्ती भूमि की सीढ़ियों के दक्षिण में स्थित हैं। लघु मन्दिर वाम पार्श्व में हैं। लघु मन्दिर में दो साधू अपना सामान रखते हैं। उसमें प्रतिमा किंवा शिवलिंग नही है। लगभग तीन वर्षों से वे यहाँ निवास करते हैं। समीप फौज की छावनी है। फौज के सिपाहियों ने अपने प्रयास से एक तिरपाल डालकर अस्थायी टेंट बना दिया है। टेंट में बाबाजी भोजन बनाते हैं। रात्रि में सोते हैं। उनमें एक हरिद्वार तथा दूसरा प्रयाग का साधु था। बाहरी दीवाल की मध्यवर्ती सीढ़ियों के दोनों पार्श्व में १० गवाक्ष की तरह मढ़ियाँ बनी हैं। इस प्रकार एक दिशा की दीवाल में २० ताखा थे। चारो ओर की दीवालो में कुल ८० मढ़ियाँ रही होंगी। शेष तीन तरफ की दीवालों में कोई मढ़ी शेष नहीं रह गयी है। दीवालों का आकार तथा रूप समाप्तप्राय हैं। इन मढ़ियों की छतें पत्थर पर खुदे उत्फुल्ल कमल की बनी हैं। एक ओर लघु मन्दिर उक्त छोटे मन्दिर के सम्मुख कुछ हटकर हैं। भग्ना- वस्था में हैं। दोनों छोटे मन्दिर ऊँचे अधिष्ठान पर बने हैं। मैंने साधुओ से बहुत देर तक बातें कीं। उनका कहना था। दो वर्ष पूर्व तक यहाँ बहुत पत्थर थे। शनैः शनैः सब चोरी हो गये हैं। लोग उठा ले गये। गाँववाले मकान बनाने तथा कब्रों में लगाने के लिए ले जाते हैं। रक्षा के अभाव में प्रतीत होता हैं, यहाँ के सब ध्वंसावशेष समाप्त हो जाएँगे। उसी भूमि पर एक ओर एक और मन्दिर शेष रह गया है। मैंने गाँववालो से यहाँ की बातें जाननी चाही। पूछने पर पता चला। पचास-साठ वर्ष पूर्व उनका चिह्न था। किंतु वे गिरते ही गए। कोई मरम्मत नहीं होती थी। मंदिरों में देवता नहीं थे। अतएव हिंदू डोगरा राज काश्मीर में होने पर भी उनकी ओर ध्यान नहीं दिया गया। पत्थर ले जाने वालों को कोई रोकने वाला नहीं था। इसलिए पत्थर आदि गायब होने लगे। मन्दिरों के स्थान पर मढ़ियों के ढूहे रह गये है। कुछ समय पश्चात् ढूहे जो पुराने चूनों और सुर्ख़ियों के अवशेष थे, उन्हें गधों तथा छतों में लगाने के लिए लोग ढो ले गये। चैत्र तृतीया को यहाँ मेला लगता हैं। स्थानीय मुसलमानों से इस मन्दिर तथा स्थान के विषय में सर्वदा कुछ न कुछ विवाद रहता है। ग्राम में पीने तथा सिंचाई का एक मात्र स्रोत इस तीर्थ का जल है। जब से यहाँ साधु लोग रहने लगे हैं, स्थान की सुरक्षा होने लगी है। टेंट लगने के पहले साधु लोग वृक्षों के नीचे बैठकर तुषारपात जैसे भयंकर काल को काट देते थे। साधुओं की कोई आमदनी नहीं है। मुसलमान कभी कुछ देते नहीं। यात्री आते नहीं। कभी कोई भूला भटका आ गया तो दो-चार पैसा दे दिया। लकड़ियाँ वृक्षों से तोड़ लेते हैं। धूनी सतत जलती रहती है। साग-पात मिल गया। पका लिया। नहीं मिला तो चुपचाप पड़े रहे। उनका सन्तोष, उनकी शांति मुझे पसन्द आई। इस विरोधी वाता- वरण में, आकाश के नीचे, बिना किसी साधन के, बिना किसी आशा के, अपने घरों से हजारों मील दूर पड़े रहना, उनकी धार्मिकता, उनकी कठोर लगन का ज्वलन्त उदाहरण था। मेरा मन यहाँ उदास हो गया। स्थान जितना सुन्दर था, उतना ही उपेक्षित था। प्रकृति ने उसे सुषमा दी। मनुष्यो ने उसे सजाया। और मनुष्यो ने ही उसे नष्टकर खंडहर बना दिया। मानव कंकाल- तुल्य अपनी करुण गाथा सुनाने के लिए उसे छोड़ दिया। मैं मन मारे चुपचाप कल-कल नाद करते जल प्रणाली के साथ गाँव की ओर उतर चला। इस स्थान को सर्वदा के लिए नमस्कार कर, इसके रचनाकारों के प्रति श्रद्धा प्रकट कर, और इसके नष्ट करने वालों की मानवीय दुर्बलता पर अफसोस करते।
प्रथम तरंग ७१ सन्ध्यादेवी जलं यस्मिन् धत्ते निस्सलिले गिरौ । दर्शनं पुण्यपापादामन्वयव्यतिरेकयोः ॥ ३३ ॥ ३३. काश्मीर मण्डल के निःसलिल गिरि पर सन्ध्या देवी के जल धारण द्वारा प्रत्यक्ष प्रकट होता है कि वहाँ पुण्य का अस्तित्व तथा पाप का अभाव है ।
[बायाँ स्तम्भ] मैं गाँव में आकर ठहर गया । इन ग्रामीणों के पूर्वज कभी इन मंदिरों के उपासक थे । उनके पुरोहित लेकिन आज उस ओर उलट कर देखने में हिचकते हैं । उपासकों के वंशज कहलाने में संकोच करते हैं । बल्कि नापसन्द करते हैं । स्त्रियाँ काम कर रही थीं । मैं खड़ा हो गया । वे मक्के की वालों में दाने निकाल रही थी । ओखली होती है । लम्बे मूसल होते हैं । ओखली में बाल डालकर कूटती हैं । मक्के के दाने तथा खुखडी अलग हो जाते हैं । वे हमें चकित होकर देखने लगी । खेलते बच्चे कुछ सहम कर खड़े हो गए । हमारा मन यहाँ से हट जाने के लिये कहने लगा । गाँव में अखरोट के वृक्षों की बहुलता है । ग्रामीणों का सीधा सादा सरल जीवन अच्छा लगा । वे शहरी वातावरण से दूर थे । उनकी जीविका अखरोट, शाली तथा मक्का की उपज पर निर्भर थी । अखरोट का मौसम था । अखरोट घाम में सूखने के लिये फैलाए गए थे । मुझे देखकर बच्चे अखरोट के पास खड़े हो गये । बालजन्य दुर्बलता उनमें आ गई । कहो मैं अखरोट, उनकी एकमात्र सम्पत्ति उठा न लूँ । मैं उन्हें देखकर मुस्कराया । चुपचाप उन्हें देखने लगा । मूसल चलाती स्त्रियाँ जैसे कुछ समझ न पाकर मूसल चलाना रोक कर मेरी ओर देखने लगी । मैं कुछ बोलना चाहा । बोल न सका । अपनी राह पकड़ा । स्थान रम्य है । सुहावना.है । विकास करने पर आदर्श पर्यटन केन्द्र बन सकता है । केन्द्र होने पर स्थानीय निर्धन ग्रामीणों की आर्थिक दशा सुधर सकती है । पर्यटकों को कश्मीर का, कभी का भूला, एक तीर्थस्थान दर्शनार्थ मिलेगा ।
[दायाँ स्तम्भ] पाठभेद : श्लोक ३३ में 'धत्ते' की जगह 'दत्ते' पाठ भेद मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ३३ (१) सन्ध्या देवी : सन्ध्या देवी ब्रह्मा की मानस कन्या कही जाती हैं । यहाँ सन्ध्या देवी प्रसिद्ध त्रिसन्ध्या निर्झर रूप में प्रकट होती है । वह उप- त्यका के एक तरफ है । देवल गोम ग्राम के दक्षिण दिशा में यह निर्झर है । यहाँ के एक लघु ग्राम का नाम मुन्दब्रार है । ब्रार का अर्थ देवी होती है । यह शब्द सन्ध्या का अपभ्रंश है । ग्राम अब निर्झर के निकट है । इस निर्झर के समीप ही एक छोटा और झरना सप्तर्षियों के नाम से सम्बन्धित है । किन्तु चमत्कार के कारण त्रिसन्ध्या को ही विशेष महत्त्व दिया गया है । सन्ध्या माहात्म में वर्णन मिलता है कि भद्रेश्वर वतु के पुत्र माया वतु ने सन्ध्या गंगा को अपने आश्रम देवल ग्राम के समीप लाया था । चमत्कार : यह निर्झर ज्येष्ठ तथा आषाढ मास में तीन बार दिन तथा तीन बार रात्रि में चलता है । त्रैकालिक सन्ध्या की उपमा झरने से दी गई है । निर्झर का त्रिसन्ध्या नामकरण किया गया है । अत्यन्त प्राचीन काल से यह कश्मीर का पवित्र तीर्थस्थान रहा है । इसका उल्लेख नीलमत पुराण में किया गया है । त्रिसन्ध्या माहात्म्य में उत्पत्ति उद्ग- मादि का वर्णन मिलता है । झरना वर्ष में अधिक दिनों तक सूखा रहता है । कश्मीर उपत्यका में यह एक आश्चर्यजनक चमत्कार माना जाता है । कल्हण कपटेश्वर के पश्चात् इसका वर्णन करता है ।
यहाँ पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण प्रस्तुत है:
७२ राजतरंगिणी [बायाँ स्तम्भ] डाक्टर श्री वरनियर ने सन् १६६५ ई० में अपने संरक्षक दानिशमन्द खां के साथ यहाँ की यात्रा की थी। उनका वर्णन प्राचीन शास्त्रीय वर्णन से मिलता है। उसने यहाँ की भौगोलिक स्थिति का अध्ययन किया था। इस चमत्कार के कारण देने का भी प्रयास किया है। वह लिखता है—"मई मास मे जब बर्फ गलती है तो वह झरना ५ दिन तक दिन मे तीन वार चल कर बन्द हो जाता है। वह उषाकाल, मध्याह्नकाल तथा सायंकाल चलता है। लगभग ४५ मिनट झरना चलता है। उसमे से काफी पानी निकलता है। वह १० या १२ फुट वर्गाकार और उतने ही गहरे कुण्ड को भरने के लिए काफी होता है। वह झरना बन्द हो जाता है। वर्षा ऋतु मे अन्य झरनो के समान निस्सन्देह इसमे पानी आ जाता है।" कुण्ड के समीप हिन्दुओं का एक मंदिर है। उसमे देवी की मूर्ति है। अतएव इस स्थान को संड कहते है। लोग पूजा निमित्त आते हैं। यहाँ के सम्बन्ध मे अनेक गाथाएँ तथा कपोल कल्पनाएँ हैं। बर्नियर लिखता है। मै यहाँ ६ दिन इस चमत्कार को देखने के लिए रहा। मैने यहाँ के पर्वत का अच्छी तरह अध्ययन किया। पर्वत मूल मे वह झरना स्थित है। मै इस चमत्कार का कारण जांचने के के लिए चारों तरफ कदम कदम देखता पर्वत के ऊपर पहुँचा। यह पर्वत उत्तर से दक्षिण फैला है। दूसरे पहाड़ो मे अलग है। इसका रूप गधे की पीठ की तरह है। यह लम्बा अधिक है। चोटी कठिनाई से १०० पद चौडी होगी। पूर्व की तरफ यह पहाड़ घासों से ढंका है। पश्चिम की तरफ वृक्ष तथा झाड़ियाँ हैं। दूसरी तरफ पहाड़ होने के कारण सूर्य की रोशनी इस पर आठ बजे प्रातः काल के पहले नही पड़ती। मैने विचार किया। संभव है। सूर्य की गरमी के कारण यह चमत्कार उत्पन्न होता है। मै समझता हूँ। शीत काल में समस्त भूमि तुषाराच्छादित हो
[दायाँ स्तम्भ] जाती है। पर्वत के उस भागमें जम जाती है जहां प्रातः कालीन उगते सूर्य की किरणें पड़ती है। वरफ पिघलती है। जल झरने मे जाता है। इसी प्रकार मध्याह्न काल में बर्फ पिघल कर धीरे-धीरे झरने में पहुँच जाती है। इसी प्रकार सूर्य की किरण जब पश्चिम की ओर झुकती हैं तो बर्फ गल कर दूसरे स्रोत से पहुँचती है। इस प्रकार सायंकालीन जल झरने मे आ जाता है। सायंकालीन जल झरने मे इसलिए कम आता है कि पश्चिमी तरफ वाले पहाड़ पर वृक्ष तथा झाडियाँ लगे हैं। उसके कारण सूर्य की किरणें इस तरफ वरफ पिघलाने के लिए अधिक नहीं पहुँच सकती। पानी पन्द्रह दिनों में इसलिए समाप्त होकर बन्द हो जाता है कि पहले दिनों मे पानी ज्यादा चलता है। धीरे-धीरे कम होता हुआ पन्द्रहवें दिन बन्द हो जाता है। बर्फ जो पर्वत मे जमी रहती है वह धीरे-धीरे गलकर समाप्त होती रहती है। जल का आना एक-सा नही रहता। कभी दोपहर में अधिक आता है। कभी देखा गया है कि प्रातः काल अधिक आता है। कभी प्रातः काल अधिक तथा मध्याह्न काल में कम हो जाता है। इसका कारण यह है कि किसी दिन ज्यादा ठंडक होती है और किसी दिन कम। किसी दिन बादल आ जाने के कारण ठंडक बढ़ जाती है। और गर्मी असमान रूप से पड़ने लगती है।"—Berneirs Travels in the Mogul Empire, द्वितीय संस्करण, पृष्ठ ४१०-४१३ हरचरितचिन्तामणि मे वर्णन मिलता है। यदि कोई पापी इस स्थान पर आ जाय तो उसे निर्झर का आश्चर्यजनक कार्य नहीं दिखाई पड़ेगा (४ ५०)। सिख गवर्नर कर्नल मियान सिंह यहाँ आये थे। निर्झर का चलना बंद हो गया था। उन्होंने लम्बा उपवास किया। विचित्र निर्झर पुनः चलने लगा। नीलमत पुराण में संध्या शब्द एक स्थान पर नदी और दूसरे पर पुष्करिणी के लिए व्यवहृत किया गया है। अतएव उन्हें एक नहीं मानना
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प्रथम तरंग ७३ स्वयम्भूर्यत्र हुतभुक् भुवो गर्भात् समुन्मिषन् । जुह्वतां प्रतिगृह्णाति ज्वालाभुजवनैर्हविः ॥ ३४ ॥ ३४ स्वयम् अग्निज्वाला पृथ्वी गर्भ से निकल कर जैसे अपनी भुजाओं द्वारा होताओं की हवि प्रतिग्रहण करती है ।
[बायाँ स्तम्भ] चाहिए । नीलमत पुराण उनमें स्पष्ट भेद करता है । सन्ध्या नदी : भव्यायां नरः स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् । सन्ध्याम् नाम नदीम् दृष्ट्वा मुच्यते सर्वकिल्विषैः ॥ —1252 : १४०१ सन्ध्या पुष्करिणी : सन्ध्या पुष्करिणी त्वन्या पूर्वतुल्यफलप्रदा । अवगाह्य नरो भक्त्या पुण्याम् माह्मणकुण्डिकाम् ॥ —1287 : १४९९ पादटिप्पणियाँ : ३४ (१) स्वयंभू—यह ब्रह्मा के पुत्र हैं । इनसे प्रजा की उत्पत्ति हुई है । ( मत्स्य पुराण : ३:३१ ) इनका शरीर धर्धनारी का था । एक भाग नारी तथा दूसरा नर का था । ब्रह्मा ने एक ही शरीर के दोनों भागों को अलग करने का आदेश दिया । उन्ही से मानव जगत् में नर एवं नारी का सृजन हुआ है । नारी शरीर से सतरूपा तथा नर शरीर से स्वयंभू हुए हैं । (मार्कण्डेय पुराण - ५०; विष्णु ' ७:६; भागवत : ३:१२:५३ ) बाइबिल में वर्णित आदम तथा हौवा की कथा इसमें मिलती है । उसमें भी वर्णन मिलता है । भगवान् ने पहले आदम को पैदा किया । आदम की एक पसली से हौवा स्त्री पैदा हुई । इस प्रकार आदम नर तथा हौवा अर्थात् ईव नारी हुई ! उन्हीं से सृष्टि चली । स्थानीय ग्रामीण स्थान को 'सुयम' कहते हैं । यह स्थान 'नीच होम' ग्राम से आधा मील दक्षिण पश्चिम दिशा में स्थित है । मच्छीपुर परगना में है । यहाँ पर ज्वालामुखी का प्रतिभास एक नीची भूमि में बालू तथा भूमि के मध्य होता है । किसी १०
[दायाँ स्तम्भ] वर्ष इसमे से उष्ण वाष्प निकलने लगती है । स्थान इतना गरम हो जाता है कि यात्री खाद्य की वस्तु उस पर रख देते हैं । वह पक जाती है । श्री स्टीन सन् १८९२ में इस स्थान पर आये थे । वहाँ वालों से उन्हें मालूम हुआ कि वाष्प अथवा ज्वाला गत १५ वर्षों से नहीं निकली है । श्री स्टीन ने देखा । वहाँ के छिछले स्थान की भूमि ईंट की तरह चमकीली तथा लाल थी । वह जली मिट्टी की तरह थी । वह संकोर्ण विवर हल चला जैसा मालूम होता था । सन् १८७६ में पण्डित गोविन्द कौल यहाँ की तीर्थ यात्रा करने आये थे । उस समय इसकी यह क्रिया लगभग दस मास तक चलती रही । वाइन ने अपने यात्रा विवरण में लिखा है । यह आश्चर्यजनक प्रतिभास इस शताब्दी के आरम्भ में देखा गया था । अबुलफजल ने आइने अकबरी ( २.३६५ ) में लिखा है—पुरंगो के समीप एक दर्रा है । उसे सोयुम कहते हैं । उसके छोर पर एक स्थान लगभग १० जरीब के क्षेत्रफल में होगा । जिस समय बृहस्पति सिंह राशि में प्रवेश करता है उस समय लगभग एक मास तक भूमि इतनी गरम हो जाती है कि समीपवर्ती वृक्ष सूख जाते हैं । यदि कोई पशु या पक्षी इस भूमि पर रख दिया जाय तो भुन जायगा । इस स्थान के समीप आबादी है । कमराज से जो दर्रा इस तरफ आता है वह दूसरी तरफ कासगर से जाकर मिल जाता है । इसके पश्चिम तरफपक्तहे है जहाँ सोना मिलता है । मैं सन् १९६४ में इस स्थान पर आया था । उस समय यहाँ की भूमि गरम नहीं थी । स्थानीय लोगों में यहाँ के सम्बन्ध में अनेक किंवदन्तियाँ हैं ।
७२ राजतरंगिणी
डाक्टर श्री बरनियर ने सन् १६६५ ई० मे अपने संरक्षक दानिशमन्द खां के साथ यहाँ की यात्रा की थी। उनका वर्णन प्राचीन शास्त्रीय वर्णन से मिलता है। उसने यहाँ की भौगोलिक स्थिति का अध्ययन किया था। इस चमत्कार के कारण देने का भी प्रयास किया है। वह लिखता है—"मई मास मे जब बर्फ गलती है तो वह झरना ५ दिन तक दिन मे तीन बार चल कर बन्द हो जाता है। यह उषाकाल, मध्याह्नकाल तथा सायंकाल चलता है। लगभग ४५ मिनट झरना चलता है। उसमे से काफी पानी निकलता है। वह १० या १२ फुट वर्गाकार और उतने ही गहरे कुण्ड को भरने के लिए काफी होता है। वह झरना बन्द हो जाता है। वर्षा ऋतु में अन्य झरनों के समान निस्सन्देह इसमें पानी आ जाता है।" कुण्ड के समीप हिन्दुओ का एक मंदिर है। उसमे देवी की मूर्ति है। अतएव इस स्थान को संड कहते हैं। लोग पूजा निमित्त आते है। यहाँ के सम्बन्ध में अनेक गाथाएँ तथा कपोल कल्पनाएँ हैं। बरनियर लिखता है। मैं यहाँ ६ दिन इस चमत्कार को देखने के लिए रहा। मैने यहाँ के पर्वत का अच्छी तरह अध्ययन किया। पर्वत मूल में यह झरना स्थित है। मैं इस चमत्कार का कारण जांचने के के लिए चारों तरफ कदम कदम देखता पर्वत के ऊपर पहुँचा। यह पर्वत उत्तर से दक्षिण फैला है। दूसरे पहाड़ो से अलग है। इसका रूप गधे की पीठ की तरह है। यह लम्बा अधिक है। चोटी कठिनाई से १०० पद चौड़ी होगी। पूर्व की तरफ यह पहाड़ घासों से ढँका है। पश्चिम की तरफ वृक्ष तथा झाड़ियाँ हैं। दूसरी तरफ पहाड़ होने के कारण सूर्य की रोशनी इस पर आठ बजे प्रातः काल के पहले नही पड़ती। मैने विचार किया। संभव है। सूर्य की गरमी के कारण यह चमत्कार उत्पन्न होता है। मैं समझता हूँ। शीत काल में समस्त भूमि तुषाराच्छादित हो जाती है। पर्वत के उस भागमें जम जाती है जहाँ प्रातः कालीन उगते सूर्य की किरणें पड़ती हैं। बर्फ पिघलती है। जल झरने में जाता है। इसी प्रकार मध्याह्न काल में बर्फ पिघल कर धीरे-धीरे झरने में पहुँच जाती है। इसी प्रकार सूर्य की किरण जब पश्चिम की ओर झुकती है तो बर्फ गल कर दूसरे स्रोत में पहुंचती है। इस प्रकार सायंकालीन जल झरने में आ जाता है। सायंकालीन जल झरने मे इसलिए कम आता है कि पश्चिमी तरफ वाले पहाड़ पर वृक्ष तथा झाड़ियाँ लगीं है। उसके कारण सूर्य की किरणें इस तरफ बर्फ पिघलाने के लिए अधिक नही पहुँच सकतीं। पानी पन्द्रह दिनों में इसलिए समाप्त होकर बन्द हो जाता है कि पहले दिनों में पानी ज्यादा चलता है। धीरे-धीरे कम होता हुआ पन्द्रहवें दिन बन्द हो जाता है। बर्फ जो पर्वत में जमी रहती है यह धीरे-धीरे गलकर समाप्त होती रहती है। जल का आना एक-सा नही रहता। कभी दोपहर में अधिक आता है। कभी देखा गया है कि प्रातः काल अधिक आता है। कभी प्रातः काल अधिक तथा मध्याह्न काल में कम हो जाता है। इसका कारण यह है कि किसी दिन ज्यादा ठंडक होती है और किसी दिन कम; किसी दिन बादल आ जाने के कारण ठंडक बढ़ जाती है। और गर्मी असमान रूप से पड़ने लगती है।"—Berneirs Travels in the Mogul Empire, द्वितीय संस्करण, पृष्ठ ४१०-४१३. हरचरितचिन्तामणि मे वर्णन मिलता है। यदि कोई पापी इस स्थान पर आ जाय तो उसे निर्झर का आश्चर्यजनक कार्य नही दिखाई पडेगा (४:५०)। सिख गवर्नर कर्नल मियान सिंह यहाँ आये थे। निर्झर का चलना बंद हो गया था। उन्होने लम्बा उपवास किया। विचित्र निर्झर पुनः चलने लगा। नीलमत पुराण मे संध्या शब्द एक स्थान पर नदी और दूसरे पर पुष्करिणी के लिए व्यवहृत किया गया है। अतएव उन्हें एक नही मानना
प्रथम तरंग ७३ स्वयम्भूर्यत्र हुतभुक् भुवो गर्भात् समुन्मिषन् । जुह्वतां प्रतिगृह्णाति ज्वालाभुजवनैर्हविः ॥ ३४ ॥ ३४ स्वयम् अग्निज्वाला पृथ्वी गर्भ से निकल कर जैसे अपनी भुजाओं द्वारा होताओं की हवि प्रतिग्रहण करती है । चाहिए । नीलमत पुराण उनमें स्पष्ट भेद करता है । सन्ध्या नदी : मडवायां नरः स्नात्वा गोसहस्रम् फलम् लभेत् । सन्ध्याम् नाम नदीम् दृष्ट्वा मुच्यते सर्वकिल्विषैः ॥ —1252 : १४७१ सन्ध्या पुष्करिणी : सन्ध्या पुष्करिणी त्वन्या पूर्वतुल्यफलप्रदा । अवगाह्य नरो भक्त्या पुण्याम् ब्राह्मणकुण्डिकाम् ॥ —1287 : १४९९ पादटिप्पणियाँ : ३४ (१) स्वयंभू—यह ब्रह्मा के पुत्र हैं । इनसे प्रजा की उत्पत्ति हुई है । ( मत्स्य पुराण : ३:३१ ) इनका शरीर अर्धनारी का था । एक भाग नारी तथा दूसरा नर का था । ब्रह्मा ने एक ही शरीर के दोनों भागों को अलग करने का आदेश दिया । उन्ही से मानव जगत् में नर एवं नारी का सृजन हुआ है। नारी शरीर से सतरूपा तथा नर शरीर से स्वयंभू हुए हैं । (मारकण्डेय पुराण : ५०; विष्णु ' ७:६; भागवत : ३:१२:५३ ) बाइबिल मे वर्णित आदम तथा होवा की कथा इसमें मिलती है। उसमें भी वर्णन मिलता है। भगवान् ने पहले आदम को पैदा किया । आदम की एक पसली से होवा स्त्री पैदा हुई । इस प्रकार आदम नर तथा होवा अर्थात् ईव नारी हुई । उन्ही से सृष्टि चली । स्थानीय ग्रामीण स्थान को 'सुयम' कहते हैं । यह स्थान 'नीच होम' ग्राम से आधा मील दक्षिण पश्चिम दिशा में स्थित है । मच्छीपुर परगना में है । यहाँ पर ज्वालामुखी का प्रतिभास एक नीची भूमि में बालू तथा भूमि के मध्य होता है। किसी १० वर्ष इसमें से उष्ण वाष्प निकलने लगती है । स्थान इतना गरम हो जाता है कि यात्री श्राद्ध की वस्तु उस पर रख देते हैं । वह पक जाती हैं । श्री स्टीन सन् १८९२ में इस स्थान पर आये थे । वहाँ वालों से उन्हें मालूम हुआ कि वाष्प अथवा ज्वाला गत १५ वर्षों से नहीं निकली है । श्री स्टीन ने देखा । वहाँ के छिछले स्थान की भूमि ईंट की तरह चमकीली तथा लाल थी । वह जली मिट्टी की तरह थी । वह संकीर्ण विवर हल चला जैसा मालूम होता था । सन् १८७६ में पण्डित गोविन्द कौल यहाँ की तीर्थ यात्रा करने आये थे । उस समय इसकी यह क्रिया लगभग दस मास तक चलती रही । वाइन ने अपने यात्रा विवरण मे लिखा है । यह आश्चर्यजनक प्रतिभास इस शताब्दी के आरम्भ मे देखा गया था । अबुलफजल ने आइने अकबरी ( २:३६५ ) मे लिखा है—गुरंगो के समीप एक दर्रा है। उसे मोयुम कहते हैं । उसके छोर पर एक स्थान लगभग १० जरीब के क्षेत्रफल में होगा । जिस समय बृहस्पति सिंह राशि में प्रवेश करता है , समय लगभग एक मास तक भूमि इतनी गरम होती है कि समीपवर्ती वृक्ष सूख जाते है । यदि पशु या पक्षी इस भूमि पर रख दिया जाय तो भुन जाय । इस स्थान के समीप आबादी है। कमरा जो दर्रा इस तरफ आता है वह दूसरी तरफ जाकर मिल जाता है । इसके पश्चिम यहाँ सोना मिलता है । मै सन् १९६४ में पर आया था । उस समय यहाँ की भूमि ठण्डी थी । स्थानीय लोगों में यहाँ के सम्बन्ध में अनेक चर्चाएँ है ।