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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ
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ओर से कुछ जोड़ने का प्रयास नहीं किया है। अर्थ खोलने के लिये जहाँ शब्दों की आवश्यकता पड़ी है वहाँ उन्हें कोष्ठ में दे दिया है। रचनासौष्ठव अक्षुण्ण रखने के लिये कल्हण की रचना-शैली का अनुकरण किया है। प्रसाद गुण को यथावत रखने का प्रयास किया है। प्रसाद गुण का अनुवाद में महत्वपूर्ण स्थान है। दुरूह स्थल तथा जहाँ भाव एवं अर्थ समझने में कठिनाई हुई है अथवा जिस पद के दो अनुवाद हो सकते थे, उन्हें भी पाद टिप्पणी में दिया है। मै स्वयं संस्कृत का अधिकारी विद्वान नहीं हूँ। कठिनता का बोध होने पर संस्कृत के विद्वानों से सहायता ली है। अनुवाद तथा मूल संस्कृत श्री विश्वबन्धु के सम्पादकत्व में हुये राजतरंगिणी के होशियारपुर संस्करण (सं० १९६० ई०) पर आधारित है। पाठभेद भी उसी संस्करण से लिये गये हैं।

संक्षेप में, पाद टिप्पणी में हमने पाठ भेद देने के बाद ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्त्व की सभी सामग्रियों का विवेचन किया है। प्रयुक्त शब्द का अर्थ, उसकी उत्पत्ति एवं अन्य ग्रन्थों में उसके उपयोग के विवरण देने के बाद हमने उनके वर्तमान रूप तक का इतिहास प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया है। इस संबंध में हमने पुरातत्व की सामग्री, स्थानीय परंपराओं एवं अन्य प्रामाणिक ग्रन्थों का विधिवत उपयोग किया है। इन विवरणों में हमने सदैव ही ऐतिहासिक एवं तुलनात्मक दृष्टिकोण को अपनाने का प्रयत्न किया है। जिन विषयों के विवेचन में विस्तार की अपेक्षा थी उन्हें सुविधा की दृष्टि से हमने परिशिष्ट में रख दिया है।

आभार प्रकाश

इस शोध प्रबन्ध के लिये अनेक महानुभावों और पुस्तकालयों की सहायता प्राप्त हुई है। उनके प्रति कृतज्ञता प्रकाश आवश्यक है। संसदीय पुस्तकालय, नयी दिल्ली ने काश्मीर सम्बन्धी पुस्तकों का संग्रह किया है। कितनी ही अप्राप्य पुस्तकें हमारे सुझाव पर विदेशों से मँगायी गयी हैं। कांग्रेस संसदीय दल के पुस्तका- लय में प्रायः सभी आधुनिक पुस्तकें खरीदी गयी हैं। उनसे विशेष सहायता मिली है। काशी हिन्दू विश्व- विद्यालय पुस्तकालय तथा संस्कृत विश्व विद्यालय, काशी में पुरानी तथा हस्तलिखित पुस्तको को देखने तथा अध्ययन करने का अवसर मिला है। मै सप्ताह में दो दिन कलकत्ता रहता था। उस समय वंग परिषद् पुस्त- कालय में राजतरंगिणी के बंगला मूल तथा अनुवादों के साथ ही पुराणों के भी मूल तथा अनुवाद देखने तथा अध्ययन करने का अवसर मिला है। 'बम्बई सेन्ट्रल लाइब्रेरी' में राजतरंगिणी की मराठी अनुवाद के साथ काश्मीर सम्बन्धी कुछ पुस्तकें मिली। वहाँ मास में एक बार नेशनल शिपिंग बोर्ड तथा मझगांव डाक के सम्बन्ध में जाने का अवसर मिलता था। इस अवसर को मैने उक्त पुस्तकालय में लगाया है।

नेशनल लाइब्रेरी कलकत्ता, एशियाटिक सोसाइटी लाइब्रेरी में बंगला, अंग्रेजी तथा हिन्दी में काश्मीर सम्बन्धी पुस्तकों का अध्ययन किया है। उक्त स्थानों के अतिरिक्त श्री काशी विद्यापीठ पुस्तकालय में कुछ दुर्लभ पुस्तकें प्राप्त हुई । अडयार लाइब्रेरी अडयार, मद्रास में भी कुछ पुस्तकें देखने को मिली हैं। उदयपुर विश्वविद्यालय पुस्तकालय में भी, जहाँ हिन्दुस्तान जिंक का चेयरमैन होने के कारण जाना पड़ता था, पुस्तकों का अध्ययन किया है। रघुनाथ मन्दिर पुस्तकालय में काश्मीर सम्बन्धी हस्तलिखित ग्रन्थों का उत्तम संग्रह है। वहाँ से तथा श्रीनगर राजकीय रिसर्च विभाग के संग्रह से भी सहायता ली है। काश्मीर सम्बन्धी ग्रन्थों का वहाँ उत्तम संग्रह है। प्रताप सिंह संग्रहालय, श्रीनगर में काश्मीर में उत्खनन कार्य में प्राप्त मूर्तियों का अच्छा संग्रह है। वहाँ की मूर्तियों के अध्ययन से काश्मीर की मूर्तिकला पर प्रकाश पड़ता है। श्री टी. एन. खजांची, पुरातत्व विभाग श्रीनगर का सहयोग प्राप्त होता रहा है।

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संकेत-सूची अ० = अध्याय नागरी अंक = जादू संस्करण अ० = वेद; अथ० = अथर्ववेद रोमन अंक = ग्रोज संस्करण अनु० = अनुशासन पर्व ( महाभारत ) पद्म० = पद्म पुराण अग्नि = अग्निपुराण पंच विंश = पंच विंश ब्राह्मण अर० = अरण्य काण्ड ( रामायण ) पण्डित० = रणजीत सीताराम पण्डित कृत रा० अ० अलवेरुनी = अलवेरुनीज इण्डिया, पाणिनी = अष्टाध्यायी आ० = आदि पर्व ( महाभारत ) वन० = वनपर्व ( महाभारत ) आश्व० = आश्वमेधिक पर्व ( महाभारत ) बर्नियर = बर्नियर कृत ट्रेवेल्स इन मोगल इम्पायर उ० = उद्योग पर्व ( महाभारत ) वा० रा० = वाल्मीकीय रामायण ऋ० = ऋग्वेद अ० = अरण्यकाण्ड क० = कर्ण पर्व ( महाभारत ) उ० = उत्तरकाण्ड कनिंघम = कनिंघमकृत एन्शेन्ट ज्योग्राफी कि० = किष्किन्धा काण्ड कि० = किष्किन्ध्या काण्ड ( रामायण ) यु० = युद्ध काण्ड कोल्स० = कोलकृत इलस्ट्रेशन आफ एन्शेन्ट बिल्डिंग वाइन० = वाइन कृत ट्रेवेल इन कश्मीर लद्दाख इस्काई ऑफ काश्मीर बेट्स० = वेट्स कृत ए गजेटियर आफ काश्मीर कोवो० = नोट्स ऑन– टेम्पूल्स ऑफ काश्मीर ब्रह्म० = ब्रह्म पुराण गणेश० = गणेश पुराण ब्रह्म० वै० = ब्रह्म वैवर्त पुराण गो० गृ० = गोभिल गृह्य सूत्र, बृ० उ० = बृहदारण्यकोपनिषद् जादू० = नीलमत पुराण जादू, संस्करण, लाहौर भ० = भविष्य पुराण जोन० = जोन राजतरंगिणी भा० = भागवत पुराण जैन = जैन राजतरंगिणी ( श्रीवर कृत ) भी० = भीष्म पर्व ( महाभारत ) जै० ब्रा० = जैमिनीय ब्राह्मण म०; महा० = महाभारत ट्रोयर = ट्रोयरकृत राजतरंगिणी अनुवाद मनु० = मनुस्मृति ड्रयू = ड्रयूकृत दी जम्मू एण्ड काश्मीर माहा० = माहात्म्य तीर्थ० = तीर्थ संग्रह ( साहिबरामकृत ) मार्क० = मार्कण्डेय पुराण तै० आ० = तैत्तिरीय आरण्यक मूर क्राफ्ट० = मूर क्राफ्ट कृत ट्रेवेल इन हिमालयन तै० सं० = तैत्तिरीय संहिता प्रोविन्सेज ऑफ हिन्दुस्तान दत्त० = जोगेशचन्द्र दत्त कृत किंग्स ऑफ काश्मीर मौ० = मौसल पर्व ( महाभारत ) दे० भा० = देवी भागवत् याज्ञ० = याज्ञवल्क्य स्मृति द्रो० = द्रोण पर्व ( महाभारत ) योग० = योग वाशिष्ठ रामायण नन्दि० = नन्दि पुराण रा० त० = राजतरंगिणी ( कल्हण कृत ) नील० = नीलमत पुराण लारेंस० = लारेन्सकृत दी वैली आफ काश्मीर

  • ज -

[बायाँ स्तम्भ] लिं० = लिंग पुराण वराह = वराह पुराण वा० सं० = वाजसनेयिसंहिता वायु० = वायु पुराण विलसन० = विलसनकृत हिन्दू हिस्ट्री आव काश्मीर ब्रीज० = नीलमत पुराण रोमन, ब्रीज संस्करण विष्णु० = विष्णु पुराण विष्णु० ध० = विष्णु धर्मोत्तर पुराण ब्यूलर० = रिपोर्ट जर्नल आफ दि रायल एशियाटिक सोसाइटी आफ बाम्बे सं० १४:१८७७ श० = शल्यपर्व ( महाभारत ) श० ब्रा० = शतपथ ब्राह्मण शा० = शान्तिपर्व ( महाभारत ) शि० = शिवपुराण

[दायाँ स्तम्भ] शि० सं० = शिव शत रुद्र संहिता शु० = शुक्रनीति शु० = स० = सभापर्व ( महाभारत ) सं० गृ० = सांख्य गृहोक्त नाटक संहिता० = बृहत् संहिता स्कन्द० = स्कन्द पुराण स्टीन० = स्टीन एम० ए० द्वारा अनूदित कल्हण की राजतरंगिणी हरिवंश० = हरिवंश पुराण हि० = हिस्ट्री ह्यूगेल० = ह्यूगेल कृत काश्मीर एण्ड दण शेष दर ग्रीक हुयेनसांग० = दी लाइफ आफ हुयेनसांग

कल्हण रचना : कल्हण के सम्बन्ध में जो कुछ सामग्री बीसवीं शताब्दी के प्रथम दशक तक प्राप्त हुई है, उससे अधिक इस दिशा में प्रगति नहीं हो सकी है। राजतरंगिणी, अर्धनारीश्वर स्तोत्र तथा जय- सिंहम्युदय काव्य कल्हण से सम्बन्धित किये जाते हैं। राजतरंगिणी निस्सन्देह कल्हण की रचना है। अर्ध- नारीश्वर स्तोत्र के १८ श्लोकों में सात श्लोक राजतरंगिणी के सात तरंगों के मंगलाचरणों से लिये गये हैं। जयसिंहम्युदय काव्य अभी तक प्रकाश में नहीं आया है। राजतरंगिणी के इतिपाठ तथा स्तोत्र के इतिपाठ में मौलिक अन्तर है। राजतरंगिणी के इतिपाठ में कल्हण ने अपने को महाकवि नहीं लिखा है। केवल अष्टम तरंग के इतिपाठ में महाकवि शब्द आता है। परन्तु इसका पाठभेद अनेक प्राचीन प्रतियों में मिलता है। जिनमें महाकवि शब्द नहीं दिया गया है। प्रतीत होता है किसी श्रद्धालु लिपिक ने महाकवि शब्द उसके काव्य के विशाल रूप को देखकर अन्त में दे दिया है। सुयोग्य, विनयी एवं प्रतिभाशाली कवि चाहे कितना ही बड़ा क्यों न हो, वह अपनी लेखनी से अपने लिए महाकवि पद का प्रयोग नहीं करेगा। यह आत्मश्लाघा हो जाती है। अर्धनारीश्वर स्तोत्र उसकी स्वतन्त्र रचना है अथवा उसके श्लोकों का संग्रह मात्र है अथवा किसी ने उसके पदों का संकलन कर उसे अर्धनारीश्वर स्तोत्र की संज्ञा दे दी है। यह विचारणीय विषय है। जयसिंहम्युदय काव्य उपलब्ध नहीं है। केवल रत्नाकर के सार-समुच्चय में कल्हण की इस रचना का उल्लेख मिलता है। कल्हण की सूक्तियों के संग्रह का भी उल्लेख मिलता है। किन्तु वह राजतरंगिणी के आठों तरंगों के सुभाषितों का संग्रह मात्र है। यदि जयसिंहम्युदय काव्य प्रकाश में आ जाय तो कल्हण के जीवन पर और प्रकाश पड़ सकता है। स्तोत्र तथा सूक्ति संग्रह का मूल स्रोत राजतरंगिणी है। स्तोत्र में दिये गये इतिपाठ में चम्पक महामात्य का नाम नहीं है। राजतरंगिणी के आन्तरिक लेखों के आधार पर अनुमान एवं निष्कर्ष निकाल कर, कल्हण के जीवन पर कुछ और प्रकाश डाल सकते हैं। वंश : राजतरंगिणी के इतिपाठ से कल्हण के पिता का नाम महामात्य चम्पक प्रभु होना सिद्ध होता है। यद्यपि अर्धनारीश्वर स्तोत्र के इतिपाठ में कल्हण के वंश, पिता, पद, देशादि का नाम नहीं दिया गया है। इतिपाठ के अतिरिक्त कल्हण के वर्णन (रा० त० ७ : ९५४, १११७, १११८, ८ : २३६५) से प्रमाणित हो जाता है कि चम्पक कल्हण का पिता था। वह महामात्य था। राजमन्त्री था। समाज में उच्च स्थान प्राप्त था। कल्हण अपने चाचा कनक के विषय में भी सूचना देता है। (रा० त० १११७-१११८) वह चम्पक का कनिष्ठ भ्राता था। कनक काश्मीर राज हर्ष का प्रियपात्र था। शिष्य था। राजा से सपरिश्रम गान विद्या सीखा था। राजा हर्ष सर्वश्रेष्ठ गायक, गीतकार एवं संगीत शास्त्र पारंगत था। कनक के परिश्रम एवं संगीत में श्रेष्ठता प्राप्त करने के कारण, राजा हर्ष ने उसे एक लाख स्वर्ण मुद्रा दिया था। कनक का राजा पर स्नेहयुक्त प्रभाव था। कल्हण का गृह, गान-वादन, राग-रागिनी, ताल-लय समन्वित पदों एवं गीतों से गुंजित रहता था। कल्हण के पदों में माधुर्य एवं ताल-लय की एक अविच्छिन्न धारा प्रवाहित मिलती है। उसका पद

[ २ ] कहीं भी पद लालित्य से रहित नही है। उसके शब्दों का चयन, संकलन, निवन्धन एवं उनकी ध्वनि श्रोत- प्रिय है। कही भी इस गति में अवरोध किंवा विश्रृंखलता नहीं मिलती । जन्मस्थान : कल्हण का जन्म परिहासपुर में हुआ था । उसका कुल परिहासपुर निवासी था । कल्हण ने इसका स्पष्ट उल्लेख किया है। जिस समय राजा हर्ष परिहासपुर के प्रसिद्ध विहार-स्थित बुद्ध की विशाल प्रतिमा खण्डित करना चाहता था, तो परिहासपुर के कनक तथा एक श्रमण कुशलस्थो के कारण अपने अनुचित कार्य से विरत हो गया । प्रतिमा की रक्षा हो गयी । ( रा० त० ७ : १०९७ ) इससे दो बातें स्पष्ट होती हैं। कनक परिहासपुर निवासी था । कल्हण का कुटुम्ब परिहासपुर में रहता था । अतएव कल्हण का जन्म परिहासपुर में होना मानना उचित होगा । कल्हण ने परिहासपुर का स्पष्ट और विस्तृत प्राकृतिक वर्णन किया है। यह वर्णन वहाँ का निवासी ही कर सकता है। परिहासपुर समीपस्थ वितस्ता-सिन्धु संगम प्रयाग ( वाग्दीपुर ) का विशद वर्णन भाव- मयी भाषा में कल्हण ने किया है। वहाँ के स्थान, मन्दिर आदि का सुस्पष्ट, वास्तविक विस्तृत वर्णन प्रसंग आते ही किया है। दूसरों के लिये यह सम्भव नहीं था । ( रा० त० ४ : १६४, २०४; ७ : १३२६, १३४४; ५ : ९७-१०० ) परिहासपुर, प्रयाग तथा वाग्दीपुर में बार बार जा चुका हूँ। वहाँ का जो वर्णन राज- तरंगिणी में मिलता है वह अक्षरशः सत्य है । जाति : कल्हण की जाति ब्राह्मण थी । उसे अपने ब्राह्मणत्व का गर्व था । कल्हण ने अपनी जाति स्वयं कही नहीं लिखी है। वह ब्राह्मण था । यह प्रश्न विवादास्पद इसलिए नही रह जाता कि द्वितीय राजतरंगिणी के लेखक जोनराज ने उसे 'कल्हण द्विजः' लिखा है । ( जो० रा० ५ ) जोनराज ने कल्हण के वंशजों के लिए पुनः 'ब्राह्मणान्' 'ब्राह्मण्यान्' 'ब्राह्मण्यात्' विभिन्न पाठभेदों के साथ उल्लेख किया है । ( जो० रा० ९९ ) शुक ने अपनी राजतरंगिणी में 'श्री कल्हण द्विज' लिखा है । ( शुक : रा० ५ ) कल्हण ने सन् ११५० ई०, जोनराज ने सन् १४४६ ई०, तथा शुक ने सन् १५८६ ई० में अपनी रचनाओ का लेखन- कार्य समाप्त किया था । इस प्रकार कल्हण के रचना काल से आगामी ४३६ वर्षों तक कल्हण तथा उसके वंशजो को द्विज किंवा ब्राह्मण माना जाता रहा है। द्विज शब्द ब्राह्मण, क्षत्री तथा वैश्य यज्ञोपवीतधारी के लिए निर्देश किया गया है। किन्तु द्विज के साथ ब्राह्मण शब्द का प्रयोग कल्हण की जाति निश्चित कर देता है। आजकल द्विज शब्द ब्राह्मणो के लिए रूढ़ हो गया है। कल्हण को काश्मीरी ब्राह्मण होने का इतना गर्व था कि ( रा० १ : १६० ) उसने गान्धार ब्राह्मणों को द्विजाधम तक लिखा है ( रा० १ : ३०७, ४३६, ११५० ) तथापि उसने आर्यदेशीय ब्राह्मणो के लिए आदरसूचक शब्दों का प्रयोग किया है। वह ब्राह्मणों को पवित्र तथा सनातनी देखना पसन्द करता था। ब्राह्मणो के अनुचित कार्यों की उसने निन्दा की है। ( १ : १५८ ) जन्म वर्ष : कल्हण के पिता चम्पक का सन् ११३६ ई० तक जीवित रहना सिद्ध होता है । कल्हण ने सन् ११४८-११४९ ई० में राजतरंगिणी की रचना प्रारम्भ किया था। कल्हण ने स्वयं, अथवा मंख अथवा किसी अन्य तत्कालीन अथवा परवर्ती लेखक ने इस विषय पर प्रकाश नही डाला है। राजतरंगिणी के आन्तरिक साक्ष्य से ही उसका सम्भाव्य जन्म वत्सर निकालना होगा । कल्हण की शैली से प्रकट होता है, वह तरंगिणी रचना काल में प्रौढ़ व्यक्ति था । उसरा मस्तिष्क प्रौढ़ था । उसका विचार प्रौढ़ था। उसका शरीर प्रौढ़ था। राजा सुस्सल के पुनराज्य प्राप्ति के पूर्व

[ ३ ] भिक्षाचर के सैनिकों के विश्वासघातक कार्यों का प्रत्यक्षदर्शी था । यह घटना सन् ११२१ ई० की है। ( रा० ८ : ९४१ ) उसने राजा सुस्सल ( सन् १११२-११२० ई० ) के पूर्ववर्ती तीन राजाओं का आँखो देखा वर्णन किया है । यहाँ उसकी शैली घटना-क्रमों को एक के पश्चात् दूसरे को इस द्रुत गति से रखती है, जैसे कोई उन घटनाओं को स्वतः देखकर लिख रहा था । वह किंचित् मात्र कहीं भी अपनी लेखनी को ठहरने नही देता । शब्द नही खोजता । कड़ी नही जोड़ता । वह शीघ्रातिशीघ्र सब कुछ वर्णन कर देने के लिए उतावला हो उठता है । घटनायें जैसे स्वतः एक के पश्चात् दूसरी उसकी लेखनी से प्रसूत होती गयी हैं । घटना-क्रमों के मूल को जान लेता है । परिस्थितियों का रहस्य समझ जाता है । कल्हण का पिता चम्पक सन् १०९८ ई० में० द्वारपति के पद पर था । राजा हर्ष ने उसे मण्डलेश भी बनाया था । निःसन्देह चम्पक इस समय प्रौढ़ व्यक्ति था । दोनों पद काश्मीर में सर्वश्रेष्ठ उत्तरदायित्व के थे । वे अनुभवी तथा प्रौढ बुद्धि वाले व्यक्ति को दिये जाते थे, जो उनकी गुरुता का अनुभव कर सकता था । यदि चम्पक का अवसान काल सन् ११३६ ई० मान लिया जाय तो यह समय सन् १०९८ ई० के लगभग पड़ता है । अर्थात् वह ३८ वर्ष की आयु तक द्वारपति एवं मण्डलेश हो चुका था । श्री स्टीन का मत है कि कल्हण का जन्म ग्यारहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में रखा जा सकता है । चम्पक किसी युद्ध में हत नही हुआ था । यदि वह अकाल मृत्यु किंवा किसी संघर्ष में हत किंवा आहत होता तो कल्हण उसका अवश्य वर्णन करता; क्योकि कल्हण ने उसे राजनीति एवं संघर्षों में सक्रिय भाग लेते हुए चित्रित किया है । निश्चय ही चम्पक अपनी मृत्यु से दिवंगत हुआ था । यदि सन् १०९८ ई० में उसकी आयु ३८ वर्ष कम से कम मान ली जाय तो सन् ११३६ ई० में उसकी आयु ६८ वर्ष की ठहरती है । इस आन्तरिक साक्ष्य के अनुसार कल्हण का जन्म सन् १०९८ ई० के समीप रखा जा सकता है । श्री स्टीन के मत में तथ्य है कि कल्हण का जन्म ग्यारहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में रखा जा सकता है । कनक : उच्चल तथा सुस्सल भ्राता द्वय काश्मीर राज्य प्राप्ति हेतु कृत-संकल्प हो गये थे । उच्चल के कारण राजा हर्ष की अमानुषिक क्रूरता को भी लज्जित करने वाली हत्या की गयी । ( रा० ७ : १७११, १७१२ ) राजा हर्ष का मुण्ड काटकर उच्चल के पास भेजा गया । मुण्ड को लगुडा पर खोसकर चारो ओर घुमाया गया । ( रा० ७ : १७२१, १७२३ ) राज्य प्राप्ति के प्रश्न को लेकर दोनो भाई उच्चल तथा सुस्सल में भी संघर्ष आरम्भ हो गया । उस समय सभी अनुचर सात दिनों तक मार्ग में रोक दिये गये । कल्हण का संगीतज्ञ चाचा कनक भी उसी रुके समुदाय मे था । अवसर पाते ही वह समुदाय से निकल भागा । कनक अपने गुरु तथा राजा हर्ष के दुःखद अन्त से इतना खिन्न हो गया कि काश्मीर मण्डल त्याग दिया । वाराणसी में काशीवास करने लगा ! ( रा० ८ : १२, १३ ) काशी किंवा वाराणसी के इस सम्बन्ध के कारण कल्हण ने राजतरंगिणी में काशी का अत्यधिक वर्णन किया है । चम्पक : प्रथम तरंग से षष्ठ तरंग के इतिपाठ के अतिरिक्त कल्हण ने प्रथम बार चम्पक का सहसा उल्लेख नन्दि क्षेत्र यात्रा के प्रसंग में किया है । कल्हण की यह शैली है । जब वह किसी व्यक्ति का उल्लेख करता है तो उसके पद, वंश आदि का उल्लेख करता है । यहाँ चम्पक का बिना किसी पक्ष आदि के वर्णन करना महत्त्व रखता है । वह मान लेता है कि लोग उसके पिता के सम्बन्ध में जानकारी रखते थे । कुछ विद्वानों का यह मत है कि यह वर्णन इस बात का प्रतीक है कि उसने अपने समय के लोगों के लिए राज- तरंगिणी लिखी थी ।

[ ४ ] कल्हण स्वयं अपने पिता के साथ नन्दि क्षेत्र की यात्रा में प्रतिवर्ष जाता था । ( रा० ७ : १५४ ) यहाँ उसके पिता प्रचुर धन दान करते थे । ( रा० ८ : २१६५ ) कल्हण के पिता निस्सन्देह सन् ११३६ ई० तक जीवित थे । कल्हण ने जून सन् ११४८ ई० में रचना-कार्य आरम्भ किया था । सन् ११५० ई० में राजतरंगिणी का रचना-कार्य समाप्त किया । मालूम होता है, पिता की मृत्यु के पश्चात् उसने रचना में हाथ लगाया था । कल्हण ने तरंग सात की सामग्री पिता चम्पक तथा चाचा कनक से प्राप्त की थी । ये तत्कालीन घटनाओं के प्रत्यक्षदर्शी थे । राजा जयसिंह ने सन् ११२८ से ११५६ ई० तक राज्य किया था । राजा जयसिंह के जीवन काल में उसने रचना समाप्त की थी। ( रा० ८ : ३४४४-३४४६ ) वह स्वयं २२ वर्षों के राज्य काल तथा घटनाओं का प्रत्यक्षदर्शी था । वह उस समय युवक नही था । उसने रचना-काल स्वयं शक सम्वत् १०७१ दिया है । यह काल समाप्ति किया लौकिक सम्वत् से ४२२४ वर्ष होता है । इसी से शक तथा लौकिक सम्वत् की गणना का सूत्र मिलता है । सन् ईस्वी के अनुसार यह समय सन् ११४८ ई० आता है । लेखन समाप्ति लौकिक सम्वत् ४२२५ में किया था । यह समय सन् ११४६-११५० ईस्वी होता है । ( रा० त० १ : ४४-५३; ८ : ३४०४ ) कल्हण ने जिस समय रचना-कार्य समाप्त किया था, उस समय राजा जयसिंह के राज्यकाल का २२ वाँ वर्ष था । राजा जयसिंह के शेष ९ वर्षों का वर्णन द्वितीय राज- तरंगिणी के लेखक जोन राजा ने किया है। जयसिंह फाल्गुन वदी १५ लौकिक सम्वत् २४०३ में राज्या- रोहण किया था । मान लिया जाय कि रचना के समय कल्हण की आयु ४० वर्षों की थी, तो निस्सन्देह उसने तरंग आठ की घटनाओं का आँखो देखा वर्णन किया है । तरंग आठ का समय केवल ४८ वर्षों का है । तरंग सात का काल लौकिक संवत् ४०७९ से आरम्भ होकर लौकिक संवत् ४१७७ में समाप्त होता है । यह मध्यवर्ती समय ६८ वर्ष होता है । कल्हण ने पिता चम्पक का वर्णन राजा हर्ष के काल में सक्रिय कार्य करते हुए किया है । इसी समय कनक भी राजनीति में सक्रिय दिखाई देता है । तरंग सात की समस्त सामग्री उसने पिता चम्पक तथा कनक तथा तत्कालीन जीवित प्रत्यक्षदर्शी वृद्धों से लिया है । यही कारण है कि तरंग सात में वह छोटी-छोटी घटनाओ का क्रमबद्ध इतिहास प्रस्तुत करता है । तरंग आठ में और भी छोटी-से छोटी घटनाओं और सूक्ष्म से भी सूक्ष्म बातो का विस्तृत वर्णन करता है । तरंग सात के ९८ वर्षों का इतिहास कल्हण ने १७३२ श्लोको में किया है, किन्तु तरंग आठ के ४८ वर्षों का इतिहास ३४४९ श्लोको में करता है । राजतरंगिणी में कुल ७८२६ श्लोक है । इसमें प्रथम से षष्ठ तरंगों का वर्णन ३०४५ श्लोको में किया गया है । केवल दो तरंगो सात एवं आठ का वर्णन ५१८४ श्लोकों में किया जाता है । महाभारत काल से षष्ठ तरंगो का वर्णन उसने तत्कालीन प्राप्य ग्रन्थों प्रशस्ति पत्रों, जन-श्रुतियों, प्राचीन कथानको, परम्पराओं आदि के आधार पर किया है । चम्पक साधारण व्यक्ति नही था । यह महामात्य था । द्वारपति था । मण्डलेश था । अपने उत्तरदायित्वो का जिम्मेदारी के साथ निर्वाह किया था । दुग्धघात दुर्ग दरदो के अधिकार में था । दरदों ने दुर्ग को केन्द्र बनाकर काश्मीर मण्डल के अनेक ग्रामों पर अधिकार कर लिया था । महत्तम सहेल ने राजा को सलाह दिया कि दुर्ग घेर लिया जाय । द्वारपति चम्पक को दुर्ग घेरने और विजय करने का भार सौंपा गया । चम्पक प्रस्थान करने ही वाला था कि वातगण्ड, जिसे राजा ने द्वारपति के पद से हटा दिया था और जो चम्पक से ईर्ष्या करता था राजा हर्ष को अभियान से विरत कर दिया । तथापि चम्पक ने मधुमती नदी पार कर अपने सैनिकों को दुर्ग में प्रवेश करा दिया । ( रा० त० ७ : ११७६-११७६ )

[ ५ ] अन्य स्थान पर राजा हर्ष को मन्त्रणा देते हुए चम्पक का उल्लेख किया गया है । उसने राजा हर्ष को सलाह दिया—'या तो युद्ध कीजिये अन्यथा लोहर रक्षा की दृष्टि से चले जाइये ।' राजा के अनुचर प्रयाग ने राजा को मन्त्रणा दी कि वह युद्ध की अपेक्षा लोहर रक्षा हेतु चला जाय । राजा हर्ष स्वयं उच्चल से युद्ध करता वीरगति प्राप्त करना चाहता था । राजा के कायर पदाति सैनिक राजा के इस विचार के विरोधी थे । अनन्तपाल आदि राजपुत्रों की मन्त्रणा पर राजा अग्रसर होता था परन्तु दण्डनायक मार्गविरोध कर देते थे । चम्पक युद्ध का पक्षपाती था । राजभक्त था । चंपक की बात राजा ने नहीं मानी । परिणाम राजा का दुःखद अन्त हुआ । युवराज भोजदेव जब प्रस्थान कर गया तो राजा उसके वियोग में दुःखी हो गया । राजा हर्ष ने चंपक को युवराज का पता लगाने के लिए कहा । राजा का आदेश सुनकर चंपक स्तब्ध हो गया । लंबी साँस लेकर कहा—'मेरे चले जाने पर आपका एकमात्र अनुचर प्रयाग आपके साथ रह जायगा । ऐसी परिस्थिति में आप मुझे अपने पास अपनी रक्षा के लिए रहने दीजिये ।' राजा ने अश्रुपूर्ण नेत्रों से चंपक की ओर देखा । राजा जानता था । चंपक एवं युवराज भोजदेव में एक अश्वनी को लेकर विवाद हो गया था । राजा ने व्यंगपूर्वक—उत्तर दिया—'चंपक तुम कृतघ्न नहीं हो । ऐसे काल में तुम मेरी आज्ञा का उल्लंघन क्यों करते हो ?' इस स्थान पर राजा ने चंपक का संबोधन मंत्री रूप से किया है । इससे प्रतीत होता है कि चंपक ने मंत्री पद पर भी कार्य किया था । राजा की बात सुनकर चंपक लज्जित हो गया । उदास मन युवराज भोज का पता लगाने के लिए चल पडा । चंपक ने जिस समय प्रस्थान किया उस समय उसके साथ दो भाई, भृत्य, शेपराज आत्मज के साथ पचास अश्वारोही थे । किन्तु नदी पार पहुँचते-पहुँचते यह संख्या केवल पाँच रह गयी । उसके दोनों भाई शेपराज आत्मज तथा अश्ववार सडक पर घोड़ो के मरने के कारण गिर गये । यहाँ चंपक केवल धानक के साथ घूमने लगा । युवराज भोजदेव का बिना पता लगाये वह लौटना नही चाहता था । वह भ्रमण करता सायंकाल वितस्ता सिन्धु के संगम पर पहुँच गया । इस उद्धरण से दो बातें स्पष्ट होती हैं । चम्पक के दो भाई थे । वह मन्त्री था । कुशल सैनिक था । साहसी था । राजा का विश्वासपात्र था । कृतघ्न नहीं था । कल्हण ने अपने पिता चम्पक के दोनों भाइयों का नाम नहीं दिया । केवल कनक का अपनी रचना में उल्लेख किया है । श्रीनगर का राज्य हर्ष ने त्याग किया तो उसके साथ उसका पुराना भृत्य प्रयाग रह गया था । राजा के शरीर पर केवल एक वस्त्र था । वह अत्यन्त हीन एवं विपन्नावस्था में था । राजा की यह करुण ने स्थिति देखकर, चम्पक का भृत्य जेल्क भी राजा के साथ हो गया । राजा के अन्तिम काल में स्वामिभक्त चम्पक क्यों नही उपस्थित था इसका स्पष्टीकरण कल्हण ने स्वयं किया है । राजा ने उसे युवराज को खोजने के लिए भेज दिया था । जेल्क के उद्धरण से यह बात प्रकट होती है । कल्हण का समस्त परिवार सभृत्य स्वामिभक्त था । उसके कुटुम्ब तथा राजा के कुटुम्ब का घर जैसा पारस्परिक व्यवहार था । वे एक कुटुम्ब के प्राणी दुःख- सुख दोनों में थे । ( रा० त० ७ : १५८६-१५६२ ) कल्हण का कुल अभिजात था । राज्य में प्रतिष्ठा प्राप्त था । राजवंश का विश्वासपात्र था । अतएव तरंग सात में वर्णित राजाओं का इतिहास सप्रमाण है । चम्पक, कनक तथा उसका कुटुम्ब उसके प्रत्यक्षदर्शी थे । इतिहास लिखने की समग्र सामग्री उसे राज्य के कागज-पत्रों के साथ सरलता पूर्वक उपलब्ध थी । इति- हास लिखने के लिए साधन सम्पन्न था । उसने अपने को इस प्रकार उस समय का व्यक्ति प्रमाणित किया है ।

[ ६ ] धर्म : कल्हण शैव था । शिव भक्त था। काश्मीरी सामान्यतः शिव उपासक एवं पूजक होते हैं। कल्हण उसका अपवाद नही था । किन्तु बौद्ध धर्म का भी यह प्रशंसक था। बुद्ध-दर्शन का उसपर प्रभाव था । शिव भक्ति तथा मत का अत्यधिक वर्णन कल्हण ने किया है । उसके पश्चात् उसने बुद्ध धर्म को ही स्थान दिया है । उसके पिता प्रतिवर्ष नन्दिक्षेत्र की तीर्थ यात्रा के लिए जाते थे । कल्हण भी पिता के साथ जाता था । यहाँ नन्दि पुराण भक्ति के साथ सुनता था । भूतेश्वर के पवित्र वातावरण में, मन्दिरों की सुन्दर श्रृंगलाओ के मध्य, सोदर तीर्थ का जल सेवन करते, प्रकृति के शान्त, गम्भीर, सुरम्य, हरित वाता- वरण में यह शैवदर्शन एवं शिव सम्बन्धी कथादि सुनता था । इस वातावरण का संस्कार बाल्यकाल से ही उस पर पडा था । उसने शैव दर्शन के आचार्य भट्ट मल्लट का नाम आदर एवं श्रद्धा के साथ लिया है । कल्लट ने काश्मीर में शैव शास्त्र का प्रचार किया था । ( रा० ५ : ६६ ) शिवभक्त राजाओ का जहाँ भी कही कल्हण ने वर्णन किया है उसकी लेखनी से उनके लिए श्रद्धा- भक्ति प्रकट हुई है । जलोक ( रा० त० : ३३५-३३८ ) विजय ( रा० २ : १ ) सन्धि मति ( रा० २ : ६५ ) इसके ज्वलन्त उदाहरण हैं। उन्होने शैव मत का प्रचार किया था । शिव-पूजक थे । कल्हण ने स्वर्ग प्राप्ति किंवा किसी पुण्य लोक में जाने की अपेक्षा शिव सायुज्यता को प्राथमिकता दी है । ( रा० १:१५२ ) शिव मन्दिरो में शिव के सम्मुख नृत्य-गान का वर्णन ललित पदों में किया है । ( रा० : १ : १५१, १५४, २७६, २८० ) रावण शिव भक्त था । शेष भारत में यह अत्याचारी, कुमार्गी एवं राक्षस रूप में चित्रित किया गया है । किन्तु कल्हण शिव भक्त होने के कारण रावण के लिए अशोभनीय शब्दों का प्रयोग नहीं करता । भारत में शायद ही कोई रावण नाम अपने पुत्र का रखता है । काश्मीर में रावण नाम के अनेक राजा हुए हैं । शिव उपासक होने के कारण रावण के प्रति शिवभक्त काश्मीर की जनता ने घृणा नही प्रकट किया है । शिव की रावण पर कृपा थी । इस मान्यता की वृद्धि के लिए रामायण कालीन रावण द्वारा पूजित शिव- लिंग काश्मीर में स्थापित करने की चर्चा कल्हण करता है । ( रा० ३ : ४४, ) शिव का प्रतीक शिव लिंग हैं। शिवलिंगों की स्थापना एवं उनकी पूजा का उल्लेख करते, कल्हण थकता नही । राजा सन्धि मति ने महालिंगो, महा वनों, महा वृक्षों तथा महा त्रिशूलों से काश्मीर मण्डल को आच्छादित कर दिया था । इस स्थल का वर्णन अतीव श्रद्धा एवं वन्दनामय वाणी में किया गया है । ( रा० २ : १३३ ) । शिव भक्त का रूप भी कल्हण ने खींचा है । भस्मस्मेर जटाजूट धारी, अक्ष सूत्र धारी, एवं रुद्राक्ष अंकित उन्हें चित्रित किया है । ( रा० २ : १२७-१७६ ) स्मशानेश्वर शिव है । योगीश्वर शिव है । कल्हण स्मशान का वर्णन करते हुए वहाँ सन्धीश्वर स्थापना का उल्लेख करता है । ( रा० २ : १३४ ) प्रतिमा लिंगों की स्थापना की भी चर्चा करता है । ( रा० २ . १३५ ) शिव की अर्चना ( रा० २ : ११४, १३८ ) भूतभावन की प्रसन्नता ( रा० २ : १५१ ) भूतभर्ता अर्थात् भूतेश किंवा नन्दीश पूजा तथा उनके प्रति श्रद्धा प्रकट करता है । ( रा० २ : १६६ ) शिव- भक्तो के वर्णन में वह तल्लीन हो जाता है । वह कहता है—'पशुपति के पाद मूल में जो जाता है, उसे भस्म मिलता है । और जो शिव उपासक वृषभ की सेवा करता है, उसे सुवर्ण की प्राप्ति होती है।' कल्हण यहाँ पर शिवभक्तो का स्थान बहुत ऊपर उठा देता है । ( रा० ३ : १९९ ) कल्हण ने सम्पूर्ण राजतरंगिणी में भगवान् बुद्ध के प्रति अनुपम आदर एवं श्रद्धा प्रदर्शित की है । अशोक से लेकर उसके काल तक जिन राजाओं ने बुद्ध विहार, स्तूप तथा चैत्यादि निर्माण कराया था उनका

[ ७ ]

नाम एवं स्मरण श्रद्धा-भक्ति के साथ कल्हण ने किया है। उसने रक्त, निर्माणों को कश्मीर मण्डल में खोज- खोजकर, शिव मन्दिरों के समान लिखा है। राजाओं के अतिरिक्त यदि किसी अन्य व्यक्ति ने भी विहार, चैत्य, स्तूपादि का निर्माण कार्य किया था तो उसका भी सादर उल्लेख किया है। उनपर चढ़ाये अग्रहारों एवं दान कर्मों की मुक्त कण्ठ से प्रशंसा की है। धर्म विश्वास में कल्हण ने कट्टरता वहीं नहीं प्रदर्शित की है। उसने शैव एवं बौद्ध धर्म को परस्पर विरोधी नहीं माना है। दोनों का उपासक होने के कारण उन्हें एक दूसरे का पूरक माना है। सहायक माना है। बुद्ध को अन्य अवतारों के समान अवतार मान कर वन्दना की है। बौद्धों के प्राबल्य को रोककर जलौक ने शैव धर्म के पुनर्स्थापन के लिए प्रयास करते हुए विहारों तथा बौद्ध धर्म-स्थानों को क्षति पहुँचाने का प्रयास किया तो जलौक का विचार नाटकीय ढंग से कल्हण बदल देता है। उसने शिव के साथ बोधि- सत्व के प्रति भी रुचि राजा में उत्पन्न होने की कथा कही है। जलौक से विहार-निर्माण भी करा देता है। धार्मिक रुचि कल्हण की इससे प्रकट होती है कि वह मेघवाहन को आदर्श किंवा अनुकरणीय राजा मानता है। मेघवाहन विश्वविजय द्वारा अहिंसा का प्रचार करना चाहता था। उसने धुर दक्षिण भारत तक विजय कर राजाओं से अहिंसक होने की प्रतिज्ञा करायी थी। दिग्विजय के स्थान पर मेघवाहन धर्म- विजय किया था। मेघवाहन पशुबलि के स्थान पर, पशु की रक्षा के लिए स्वयं अपनी बलि चढ़ाने के लिए वारंवार उद्यत हो गया था। कल्हण ने अहिंसा व्रत का ओजमयी भाषा में वर्णन किया है। कल्हण प्रतीत होता है, शाकाहारी था। उसने प्याज तथा लहसुन भोजी ब्राह्मणों की निन्दा की है। अहिंसा व्रत एवं अहिंसक भावना का अवसर मिलते ही सबल भाषा में उल्लेख करता है। भगवान् बुद्ध की प्रतिमा राजा हर्ष जिस समय परिहासपुर में खण्डित करना चाहता था तो उसके चाचा कनक ने राजा को इस अनुचित कार्य से विरत किया था। बौद्धमतानुयायी दूसरों का मारा मांस निःसंकोच खा लेते हैं। परन्तु कल्हण इसको उचित नहीं मानता। वह एक शुद्ध ब्राह्मण के समान शाकाहारी था। यद्यपि काश्मीर में आमिष भोजियों की संख्या सर्वाधिक सर्वदा से रही है। कल्हण ने बौद्ध धर्म सम्बन्धी अनेक पारिभाषिक शब्दों का प्रयोग किया है। इससे प्रकट होता है कि उसने त्रिपिटकों का अध्ययन किया था। कल्हण ने बौद्ध दर्शन, परम्परा, शासन तथा उसकी पद्धतियों का पूर्णतया अध्ययन किया था। अन्यथा वह साधिकार विश्वास के साथ लिखने में सफल न होता। समकालीन व्यक्ति : कल्हण ने तत्कालीन समाज तथा व्यक्तियों का वर्णन बड़ी निष्ठा के साथ किया है। रिल्हण राजा जयसिंह का अमात्य था। (रा० ८ : २४०३) वह राजा सुस्सल का भी विश्वासपात्र था। कल्हण राजा जयसिंह को विद्या का संरक्षक कहता है। रिल्हण, उसके भ्राता, उसकी पत्नी के दान तथा स्थान-स्थान पर उसके सैन्य चातुर्य और वीरता का वर्णन किया है। (रा० ८ : २४०५-२४१८) सुरेश्वरी क्षेत्र में रिल्हण ने अनेक पुण्य-कार्य किये थे। कल्हण उसका विशद वर्णन करता है। उसकी प्रशस्ति सरल भाषा में किया है। प्रतीत होता है कल्हण का उससे व्यक्तिगत स्नेह था। (रा० ८ : ३३६४-७०)। दूसरा प्रमुख व्यक्ति अलंकार था। वह राजा जयसिंह के उत्तरार्ध राज्य काल में गंजाधिप था (रा० ८ : २४२३)। उसका भी कल्हण ने आदर के साथ उल्लेख किया है। कवि मंख का वर्णन कल्हण ने एक काव्यकार की दृष्टि से नहीं बल्कि राजा जयसिंह के सन्धि-विग्रहक के रूप में किया है। (रा० ८ : ३३५४)

[ ८ ]

गंजाधिप अलंकार का मंख भ्राता था। मंख ने अपने काव्य में अपने भाई को विद्वानों तथा कलाविदों का संरक्षक कहा है। मंख का केवल एक बार उल्लेख कल्हण ने किया है। यह भी श्रीकण्ठचरित काव्य के रचनाकार के रूप में । ( रा० ८: ३३५४ ) कल्हण ने द्वारपति उदय का भी उल्लेख किया है। किन्तु उसके प्रति विशेष आदर प्रकट नही करता। एक व्यक्ति का नाम उसने और आदर के साथ लिया है। उसका नाम है, राज वदन । ( ग० ८ : २६९८ ) राज वदन ने राजा जयसिंह के विरुद्ध विद्रोह किया था। अन्य नामों का भी उसने उल्लेख किया है, परन्तु उनका विशेष महत्व नही है। कल्हण और मंख : तत्कालीन लेखकों में कल्हण का उल्लेख केवल मंख ने कल्याण नाम से किया है। जबकि कल्हण ने 'मंख' शुद्ध और प्रचलित नाम लिखा है। यह एक विचित्र बात है। लेखकों, कवियों तथा विद्वानों का उनके जीवन-काल में कम आदर-सत्कार देखा गया है। कल्हण इसका अपवाद नहीं था। डाक्टर व्हूलर के अनुसार मंख ने श्रीकण्ठचरित महाकाव्य की रचना सन् ११२८-११४४ ई० के मध्यवर्ती काल में किया था। सन् ११४४ ई० के दो प्रमाणों से निश्चित हो जाता है। अलंकार के निवास- स्थान पर एक सभा हुई थी। अतिथियों में कन्नौज के राजा गोविन्द चन्द्र का दूत सुहले भी उपस्थित था। राजा गोविन्द चन्द्र का काल सन् ११२०-११४४ ई० है। कल्हण ने अलंकार का उल्लेख दो स्थानों पर राज स्थानीय पदाधिकारी के रूप में किया है। ( रा० ८ : २५५७, २६१८ ) उसने अलंकार का उल्लेख पुनः बृहद्गंज के रूप में किया है। (रा० ८ : २४२३ ) मंख ने भ्राता अलंकार को राज्य का सन्धि-विग्राहक लिखा है। इससे कोई उलझन नही पैदा होती। मंख ने स्वयं लिखा है। राजा सुस्सल ने अलंकार को सन्धि विग्राहक पद पर रखा था। उसका द्वितीय पद 'स्थानीय' तथा 'बृहद् गंज' राजा जयसिंह के काल का हो सकता है। कल्हण स्वयं लिखता है। मंख ने अपने भाई अलंकार के सन्धि विग्राहक पद को प्राप्त किया था। ( रा० : ८ : ३३५४ ) मंख ने जयसिंह को अपना राजा स्वीकार किया है। मंख ने कोंकन के राजा अपरादित्य का उल्लेख किया है। वह सन् ११८६ ई० तक राज्य करता रहा। इससे इस बात की पुष्टि होती है। काश्मीर के लेखकों को तत्कालीन भारतीय राजाओ एवं देश-काल का ज्ञान था। कल्हण का घटना-क्रम वर्णन एवं नामों का उल्लेख मंख के श्रीकण्ठचरित से मिलता है। वह कल्हण की सत्यता प्रमाणित करता है। यदि सन् ११४४ ई० श्रीकण्ठचरित की रचना का काल मान लिया जाय तो राजतरंगिणी की रचना के पूर्व मंख अपना महाकाव्य समाप्त कर चुका था। श्रीकण्ठचरित में मुख्यतः पच्चीसवाँ अध्याय उच्चकोटि की काव्य रचना है। मंख अपने भाई अलंकार के निवास-स्थान पर हुई सभा का उल्लेख करता है। उस सभा में उसने अपने काव्य को विद्वानों के सम्मुख उपस्थित किया था। उपस्थित व्यक्तियों तथा विद्वानों का परिचय उनके पदो के साथ दिया है। उसमें ३० कवियों एवं विद्वानों का उल्लेख है। इस तालिका में कल्हण का नाम नही है। यद्यपि कल्हण ने अलंकार एवं मंख दोनों का नाम सादर लिया है। मंख ने कल्याण के सन्दर्भ में तीन पद लिखे हैं। उसमें उल्लेख किया गया है कि अलक दत्त ने कवि के रूप में कल्याण को चुना था। वह उसके मनोवाञ्छित कार्य को पूरा कर सकता था। उसने पुनः लिखा है कल्याण की कविता महाकवि विल्हण की प्रतिबिम्ब प्रतीत होती है। राजतरंगिणी सन् ११४६-११५० ई० में समाप्त हुई थी। श्रीकण्ठ- चरित सन् ११४४ ई० में समाप्त हुआ था। अतएव श्रीकण्ठचरित में राजतरंगिणी का उल्लेख नहीं हो सकता। मंख के श्रीकण्ठचरित का इसलिए उल्लेख राजतरंगिणी में है कि वह उस समय लिखी जा चुकी थी। उपलब्ध थी।

[ ९ ] कल्हण और कल्याण : द्वितीय राज तरंगिणी के रचनाकार जोन राज ने मंख के श्रीकण्ठ चरित पर बातिक लिखा है । उसने लिखा है अलक दत्त कल्याण का संरक्षक था । वह सन्धिविग्राहक के पद पर था । किन्तु कल्याण के विषय में जोन राज कुछ प्रकाश नहीं डालता । उसने भाष्य किंवा वातिक लिखते समय यह नहीं लिखा है कि मंख वर्णित कल्याण ही कल्हण है । जोन राज अपनी रचना में कल्हण का उल्लेख करता है । कल्हण के छोड़े कार्य को वह अपने समय तक के राजाओं एवं बादशाहों का वर्णन कर पूरा करता है । आश्चर्य है उसने मंख एवं स्वतः वर्णित कल्याण को कहीं कल्हण नहीं माना है । कल्हण ही मंख वर्णित कल्याण है ? अथवा और कोई व्यक्ति है ? इस पर विचार करना आवश्यक है । श्री स्टीन का मत है कि कल्हण शब्द प्राकृत 'कल्लाण' तथा 'संस्कृत' 'कल्याण' का अपभ्रंश है । स्टीन अपने मत की पुष्टि में जयापीड की रानी का उदाहरण उपस्थित करते हैं । जयापीड की रानी का नाम 'कल्याण' देवी था । 'कल्याण', 'कल्लणा' तथा 'कल्हणिका' एक ही शब्द किंवा नाम के भिन्न रूप हैं । 'कल्हणिका' शब्द संस्कृत 'कल्याणिका' है । राजवंश एवं अभिजात कुल की महिलाओं के लिये नाटकों तथा उपाख्यानों में इस शब्द का प्रयोग किया गया है । राजवंश की स्त्रियां राजा कलश तथा जयसिंह के समय तक इसी सम्बोधन से सम्बोधित की जाती थीं । संस्कृत नाटकों तथा काव्यों में सम्भ्रान्त महिलाओं तथा रानियों के लिये 'कल्याणी' शब्द का प्रयोग सम्बोधन के लिये किया जाता रहा है । ( रा० ४:४६१, ४६७, ७:२६३, ८:१६४८, ३०६९ ) कल्हण ने स्वयं राज तरंगिणी में सहदेव के राजपुत्र कल्हण का उल्लेख किया है । ( रा० ८ : ६२६ ) इससे स्पष्ट प्रतीत होता है कल्हण नाम उस समय प्रचलित था । लोगों का नाम कल्हण रखा जाता था । सल्हण, रल्हण, विल्हण, मल्हण आदि नाम तुल्य ध्वनि करते हैं । प्रश्न है । मंख ने प्रचलित नाम कल्हण न देकर उसका शुद्ध संस्कृत अप्रचलित नाम 'कल्याण' क्यों दिया ? कल्हण ने स्वतः कहीं भी अपने कल्याण नाम की ओर गौण रूप से भी संकेत नहीं किया है । मंख ने राजतरंगिणी में वर्णित अनेक नामों को अक्षरशः रूप अपने काव्य में दिया है । क्या कारण है कि कल्हण का नाम ही बदलकर उसने कल्याण क्यों लिख दिया ? आदर के लिये कल्हण का शुद्ध संस्कृत नाम कल्याण मंख ने दिया है । यह एक तर्क उपस्थित किया जाता है । कल्हण ने राजतरंगिणी में सर्वथा प्रचलित नाम दिया है । शुद्ध संस्कृत रूप में नाम देने का प्रयास नहीं किया है । कल्हण ने प्रचलित नाम 'गग्ग' 'गर्ग' के स्थान पर 'गगन चन्द्र' देने का प्रयास नहीं किया है । उसने व्यक्तिवाचक संज्ञा के रूप को परिवर्तित करने का प्रयास नहीं किया है । ( रा० ८ : ३३, ३८, ४३, १८४, १९६, ३४८, ३७६, ३८०, ३९०, ४१५, ४३०, ५०२, ५१५, ५८१, ५६५, ६०५, ६१५, ३४४४ ) दूसरा उदाहरण 'लोठन' नाम है । कल्हण ने 'लोठन', 'लोठक' आदि प्रचलित अपभ्रंश शब्दों का प्रयोग किया है । उसने शुद्ध 'लोष्ठक' शब्द नहीं दिया है । 'लोष्ठक' शब्द का प्रयोग एक स्थान पर किया है । ( रा० ८ : २०२ ) मंख का वर्णित कल्याण ही कल्हण है इस पर और अनुसन्धान की आवश्यकता है । श्री जोनराज का कल्याण शब्द के साथ कल्हण न लिखना, शान्त रह जाना, जबकि वह स्वयं कल्हण के छोड़े कार्य को पूर्ण कर रहा था विषय को सन्देहास्पद बना देता है । सम्भव है । मंख के समय कल्याण नाम का ही कोई कवि रहा हो जिसका ग्रन्थ लुप्त हो गया है । क्योकि जिस समय मंख ने अपना काव्य लिखकर समाप्त किया उसके ४ वर्ष पश्चात् कल्हण ने लिखना और ६ वर्ष पश्चात् रचना समाप्त किया २

[ ८ ]

गंजाधिप अलंकार का मंख भ्राता था। मंख ने अपने काव्य में अपने भाई को विद्वानों तथा कलाविदों का संरक्षक कहा है। मंख का केवल एक बार उल्लेख कल्हण ने किया है। यह भी श्रीकण्ठचरित काव्य के रचनाकार के रूप मे। (रा० ८: ३३५४) कल्हण ने द्वारपति उदय का भी उल्लेख किया है। किन्तु उसके प्रति विशेष आदर प्रकट नही करता। एक व्यक्ति का नाम उसने और आदर के साथ लिया है। उसका नाम है, राज बदन। (रा० ८ : २६९८) राज बदन ने राजा जयसिंह के विरुद्ध विद्रोह किया था। अन्य नामों का भी उसने उल्लेख किया है, परन्तु उनका विशेष महत्व नही है। कल्हण और मंख : तत्कालीन लेखको में कल्हण का उल्लेख केवल मंख ने कल्याण नाम से किया है। जबकि कल्हण ने 'मंख' शुद्ध और प्रचलित नाम लिखा है। यह एक विचित्र बात है। लेखकों, कवियों तथा विद्वानो का उनके जीवन-काल में कम आदर-सत्कार देखा गया है। कल्हण इसका अपवाद नही था। डाक्टर बूह्लर के अनुसार मंख ने श्रीकण्ठचरित महाकाव्य की रचना सन् ११२८-११४४ ई० के मध्यवर्ती काल में किया था। सन् ११४४ ई० के दो प्रमाणो से निश्चित हो जाता है। अलंकार के निवास- स्थान पर एक सभा हुई थी। अतिथियों में कन्नौज के राजा गोविन्द चन्द्र का दूत सुहले भी उपस्थित था। राजा गोविन्द चन्द्र का काल सन् ११२०-११४४ ई० है। कल्हण ने अलंकार का उल्लेख दो स्थानों पर राज स्थानीय पदाधिकारी के रूप में किया है। (रा० ८ : २५५७, २६१८) उसने अलंकार का उल्लेख पुनः वृहदगंज के रूप में किया है। (रा० ८ : २४२३) मंख ने भ्राता अलंकार को राज्य का सन्धि-विग्राहक लिखा है। इससे कोई उलझन नहीं पैदा होती। मंख ने स्वयं लिखा है। राजा सुस्सल ने अलंकार को सन्धि विग्राहक पद पर रखा था। उसका द्वितीय पद 'स्थानीय' तथा 'बृहद् गंज' राजा जयसिंह के काल का हो सकता है। कल्हण स्वयं लिखता है। मंख ने अपने भाई अलंकार के सन्धि विग्राहक पद को प्राप्त किया था। (रा० : ८ : ३३५४) मंख ने जयसिंह को अपना राजा स्वीकार किया है। मंख ने कोंकन के राजा अपरादित्य का उल्लेख किया है। यह सन् ११८४ ई० तक राज्य करता रहा। इससे इस बात की पुष्टि होती है। काश्मीर के लेखकों को तत्कालीन भारतीय राजाओं एवं देश-काल का ज्ञान था। कल्हण का घटना-क्रम वर्णन एवं नामों का उल्लेख मंख के श्रीकण्ठचरित से मिलता है। यह कल्हण की सत्यता प्रमाणित करता है। यदि सन् ११४४ ई० श्रीकण्ठचरित की रचना का काल मान लिया जाय तो राजतरंगिणी की रचना के पूर्व मंख अपना महाकाव्य समाप्त कर चुका था। श्रीकण्ठचरित में मुख्यतः पच्चीसवाँ अध्याय उच्चकोटि की काव्य रचना है। मंख अपने भाई अलंकार के निवास-स्थान पर हुई सभा का उल्लेख करता है। उस सभा में उसने अपने काव्य को विद्वानों के सम्मुख उपस्थित किया था। उपस्थित व्यक्तियों तथा विद्वानों का परिचय उनके पदों के साथ दिया है। उसमें ३० कवियों एवं विद्वानो का उल्लेख है। इस तालिका में कल्हण का नाम नहीं है। यद्यपि कल्हण ने अलंकार एवं मंख दोनों का नाम सादर लिया है। मंख ने कल्याण के सन्दर्भ में तीन पद लिखे हैं। उसमें उल्लेख किया गया है कि अलक दत्त ने कवि के रूप में कल्याण को चुना था। वह उसके मनोवाञ्छित कार्य को पूरा कर सकता था। उसने पुनः लिखा है कल्याण की कविता महाकवि विह्लण की प्रतिबिम्ब प्रतीत होती है। राजतरंगिणी सन् ११४६-११५० ई० में समाप्त हुई थी। श्रीकण्ठ- चरित सन् ११४४ ई० में समाप्त हुआ था। अतएव श्रीकण्ठचरित में राजतरंगिणी का उल्लेख नहीं हो सकता। मंख के श्रीकण्ठचरित का इसलिए उल्लेख राजतरंगिणी में है कि वह उस समय लिखी जा चुकी थी। उपलब्ध थी।

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कल्हण और कल्याण : द्वितीय राज तरंगिणी के रचनाकार जोन राज ने मंख के श्रीकण्ठ चरित पर वार्तिक लिखा है । उसने लिखा है अलक दत्त कल्याण का संरक्षक था । वह सन्धि विग्राहक के पद पर था । किन्तु कल्याण के विषय में जोन राज कुछ प्रकाश नहीं डालता । उसने भाष्य किंवा वार्तिक लिखते समय यह नहीं लिखा है कि मंख वर्णित कल्याण ही कल्हण है । जोन राज अपनी रचना में कल्हण का उल्लेख करता है । कल्हण के छोड़े कार्य को वह अपने समय तक के राजाओं एवं बादशाहों का वर्णन कर पूरा करता है । आश्चर्य है उसने मंख एवं स्वतः वर्णित कल्याण को कहीं कल्हण नहीं माना है । कल्हण ही मंख वर्णित कल्याण है ? अथवा और कोई व्यक्ति है ? इस पर विचार करना आवश्यक है । श्री स्टीन का मत है कि कल्हण शब्द प्राकृत 'कल्लाण' तथा 'संस्कृत' 'कल्याण' का अपभ्रंश है । स्टीन अपने मत की पुष्टि में जयापीड की रानी का उदाहरण उपस्थित करते हैं । जयापीड की रानी का नाम 'कल्याण' देवी था । 'कल्याण', 'कल्लणा' तथा 'कल्हणिका' एक ही शब्द किंवा नाम के भिन्न रूप हैं । 'कल्हणिका' शब्द संस्कृत 'कल्याणिका' है । राजवंश एवं अभिजात कुल की महिलाओं के लिये नाटकों तथा उपाख्यानों में इस शब्द का प्रयोग किया गया है । राजवंश की स्त्रियाँ राजा कलश तथा जयसिंह के समय तक इसी सम्बोधन से सम्बोधित की जाती थीं । संस्कृत नाटकों तथा काव्यों में सम्भ्रान्त महिलाओं तथा रानियों के लिये 'कल्याणी' शब्द का प्रयोग सम्बोधन के लिये किया जाता रहा है । (रा० ४:४६१, ४६७, ७:२६३, ८:१६४८, ३०६९) कल्हण ने स्वयं राज तरंगिणी में सहदेव के राजपुत्र कल्हण का उल्लेख किया है । (रा० ८ : ६२६) इससे स्पष्ट प्रतीत होता है कल्हण नाम उस समय प्रचलित था । लोगों का नाम कल्हण रखा जाता था । सल्हण, रल्हण, विल्हण, मल्हण आदि नाम तुल्य ध्वनि करते हैं । प्रश्न है । मंख ने प्रचलित नाम कल्हण न देकर उसका शुद्ध संस्कृत अप्रचलित नाम 'कल्याण' क्यों दिया ? कल्हण ने स्वतः कहीं भी अपने कल्याण नाम की ओर गौण रूप से भी संकेत नहीं किया है । मंख ने राजतरंगिणी में वर्णित अनेक नामों को अक्षरशः रूप अपने काव्य में दिया है । क्या कारण है कि कल्हण का नाम ही बदलकर उसने कल्याण क्यों लिख दिया ? आदर के लिये कल्हण का शुद्ध संस्कृत नाम कल्याण मंख ने दिया है। यह एक तर्क उपस्थित किया जाता है । कल्हण ने राजतरंगिणी में सर्वदा प्रचलित नाम दिया है । शुद्ध संस्कृत रूप में नाम देने का प्रयास नहीं किया है । कल्हण ने प्रचलित नाम 'गग' 'गर्ग' के स्थान पर 'गगन चन्द्र' देने का प्रयास नहीं किया है । उसने व्यक्तिवाचक संज्ञा के रूप को परिवर्तित करने का प्रयास नहीं किया है । (रा० ८ : ३३, ३८, ४३, १८२, १९६, ३४८, ३७६, ३८०, ३९०, ४१५, ४३०, ५०२, ५१५, ५८१, ५६४, ६०५, ६१५, १४४४) दूसरा उदाहरण 'लोठन' नाम है । कल्हण ने 'लोठन', 'लोठक' आदि प्रचलित अपभ्रंश शब्दों का प्रयोग किया है । उसने शुद्ध 'लोष्टक' शब्द नहीं दिया है । 'लोष्टक' शब्द का प्रयोग एक स्थान पर किया है । (रा० ८ : २०२) मंख का वर्णित कल्याण ही कल्हण है इस पर और अनुसन्धान की आवश्यकता है । श्री जोनराज का कल्याण शब्द के साथ कल्हण न लिखना, शान्त रह जाना, जबकि वह स्वयं कल्हण के छोड़े कार्य को पूर्ण कर रहा था विषय को सन्देहास्पद बना देता है । सम्भव है । मंख के समय कल्याण नाम का ही कोई कवि रहा हो जिसका ग्रन्थ लुप्त हो गया है । क्योंकि जिस समय मंख ने अपना काव्य लिखकर समाप्त किया उसके ४ वर्ष पश्चात् कल्हण ने लिखना और ६ वर्ष पश्चात् रचना समाप्त किया २

था। कल्याण चाहे कल्हण हो या नहीं कल्हण की ऐतिहासिकता जोनराज, श्रीवर, शुक आदि राजतरंगिणी- कारों के कारण प्रमाणित है। यह ऐतिहासिक व्यक्ति है। कल्हण वंशज : कल्हण की ख्याति राजतरंगिणी लेखक के रूप में दिन पर दिन बढ़ती गयी। काश्मीर में दूसरे इतिहास के अभाव में कल्हण का एकमात्र इतिहास शेष रह गया था। अतएव हिन्दू तथा मुसलमान दोनों ने कल्हण के इतिहास का अध्ययन किया। इस अध्ययन के कारण उसकी ख्याति बढ़ती गयी। उसके वंशजों का नाम 'काल्हण' तथा 'कल्हणेय' पड़ गया। जोनराज ने उसके वंशजों को 'कल्हण नन्दन' लिखा है। (जो० रा० ९४)। जोनराज ने उसके वंशजों को पुनः 'काल्हणीन' लिखा है। (जो० रा० ६६)। इसका पाठभेद 'काल्हणान' तथा 'कल्हणीन' भो मिलता है। (जो० रा० १०१)। जोनराज ने 'काल्हण' तथा 'कल्हणात्मजे' शब्द का प्रयोग उसके वंशजों के लिए किया है। (जो० रा० १०२) श्रीवर ने 'कल्हण' शब्द का प्रयोग किया है। (जैन० राज : २ : १४९) अन्य स्थानों पर कल्हण के सम्बन्ध में और उल्लेख नहीं मिल सका है। अध्ययन : कल्हण पुरातन शैली का विद्वान् था। उसका पठन-पाठन अभिजात कुलीन ब्राह्मण बालक के समान हुआ था। उसने महाभारत और रामायण की घटनाओं का अत्यधिक उल्लेख किया है। दोनों ग्रन्थों के कथानकों का प्रचुर वर्णन राजतरंगिणी में मिलता है। उनकी घटनाओं की तुलना राज- तरंगिणी की घटनाओं से किया है। कल्हण ने पुराण विशेषकर नन्दी और नीलमत पुराण का अध्ययन किया था। उसने कालिदास के रघुवंश, मेघदूत, बाण के हर्ष चरित, तथा वराह मिहिर के बृहद् संहिता का अध्ययन किया था। वेद, योग वाशिष्ठ रामायण और विष्णु धर्मोत्तर पुराण भी पढ़ा था। पुरानी शैली के पण्डित किंवा ब्राह्मण ज्योतिष, वेद, पुराण, इतिहास, व्याकरण, साहित्य, अर्थशास्त्र, स्मृति, आयुर्वेद का एक साथ अध्ययन करते थे। कल्हण ने स्मर शास्त्र, कामशास्त्र, कुट्टनीमतम् तथा भरत के नाट्य शास्त्र का अध्ययन किया था। उसने विज्ञान का भी अध्ययन किया था। उसने सूर्य ज्योति (रा० ३ : ४९२) तथा जल (रा० ३ : २०२) का वर्णन एक वैज्ञानिक की तरह किया है। कल्हण सर्वतन्त्र स्वतन्त्र विद्वान् था। इस प्रकार के विद्वानों को यह उपाधि दी जाने लगी थी। ज्योतिष का उसने ज्ञान प्रकट किया है। उसने हर्ष की कुण्डली भी राजतरंगिणी में दे दिया है। उसके ग्रहों की तुलना धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन से करता है। उसके लेख से प्रकट होता है उसने पतंजलि के महाभाष्य का विशद अध्ययन किया था। चान्द्र व्याकरण भी उसने पढ़ा था। रस, छंद, अलंकार आदि के समस्त अंगो में पारंगत था। (रा० २ : ८९, ३ : ४४०) बाण के हर्ष चरित का उसने अध्ययन ही नही किया था बल्कि उसके २६ श्लोकों का उद्धरण राजतरंगिणी में दिया है। राजतरंगिणी लेखन में वह बाण के हर्षचरित तथा विल्हण के दशकुमार चरित से अत्यधिक प्रभावित था। कल्हण ने लौकिक रीति-रिवाज, संस्कार, कुसंस्कार, अन्धविश्वास, जनश्रुतियों, परम्परा, शुभ- अशुभ, शकुन-अपशकुन, आदि का उल्लेख प्रसंग आते ही किया है। उसकी प्रतिभा सर्वतोमुखी थी। उसने शुभाशुभ लक्षणों से, शकुन-अपशकुन से भविष्य की घटनाओं की ओर संकेत किया है। इस प्रकार प्रकट होता है, उसे फलित ज्योतिष का गहन अध्ययन था। दैव विद् तुल्य उसकी लेखनी चली है। (रा० २ : १४९; १ : ५५; ७ : १७२०; ८ : ७१५; ३ : ४३३ तथा ३ : ४४०)। कल्हण ने भवभूति एवं वाक्पति राज का उल्लेख आदर के साथ किया है। (रा० ४ : १४४) उसने इसी सन्दर्भ में यशो वर्मा का उल्लेख किया है जहाँ कवियों का आदर एवं सत्कार होता था।

[ ११ ]

कल्हण का समय : कल्हण तथा राजतरंगिणी के समझने के लिए कल्हणकालीन परिस्थितियों का अध्ययन आवश्यक है । वह काल भारतीय तथा कश्मीर राजनीति में उथल-पथल का समय रहा है । लेखक पर उसकी परिस्थितियों, वातावरणों एवं घटना-क्रमो का जाने-अनजाने प्रभाव पड़ता रहता है । वह प्रभाव उसकी रचना में परिलक्षित होता है । राजतरंगिणी के रचना-काल से ४३६ वर्ष पूर्व सन् ७१२ ई० में सिन्ध पर प्रथम मुसलिम आक्रमण हो चुका था । मुहम्मदबिन कासिम मुलतान तक पहुँच गया था । सन् १००० ई० अर्थात् राजतरंगिणी के रचना-काल से १४८ वर्ष पूर्व महमूद गजनो का भारत पर आक्रमण हो चुका था । महमूद गजनी ने सन् १०१५ ई में कश्मीर पर आक्रमण किया था । सन् १०२६ ई० तक सोमनाथ पहुँच गया था । सन् १०३० ई० में अलबेरूनी स्पष्ट लिखता है 'मुसलिम आक्रमणों के कारण हिन्दू काश्मीर चले गए । उन दिनों वाराणसी तथा काश्मीर हिन्दू विद्या के सर्वश्रेष्ठ स्थान थे ।' ( पृष्ठ १७६-१७७ ) काश्मीर में विद्वानों का भाग कर आने का एक कारण और था । काशी अलप्तगीन के आक्रमण से लूटी जा चुकी थी । जीवन भयापन्न हो गया था । मन्दिर टूट चुके थे । विद्वानों ने काशी को सुरक्षित नही समझा, किन्तु काश्मीर में महमूद गजनी दो बार हार चुका था । काश्मीर में मुसलमानो का प्रवेश नही हो सका था । काश्मीर की उत्तरी एवं पश्चिमी सीमा पर मुसलिम राज्य स्थापित हो चुके थे । प्रबल हो गए थे । धर्म-प्रचार का उन्माद व्याप्त था । इसलाम की ताकत के सम्मुख जनता इसलाम कबूल कर अपने पुरातन बौद्ध तथा हिन्दू धर्म को परित्याग कर चुकी थी । तथापि अभी तक भारत पर मुसलिम राज नहीं स्थापित हो सका था । सन् १११४ ई० में कन्नौज में गहड़वाल राजाओं का राज था । सन् ११४८ ई० तक सोलंकी राजा कुमार पाल शक्तिशाली था । महमूद गजनी एक आँधी की तरह आया और चला गया । सन् ११६२ ई० में अर्थात् राजतरंगिणी की रचना के ४४ वर्ष पश्चात् मुहम्मद गोरी ने भारत पर आक्रमण कर मुसलिम राज स्थापित किया । कल्हण के काल में भारत पर मुसलिम राज्य स्थापित नही हुआ था । परन्तु कल्हण ने तरंग ६ से ८ तक गौण रूप से मुसलिम प्रभाव का उल्लेख किया है । काश्मीर पर मुसलिम संस्कृति का प्रभाव पड़ने लगा था ( रा० ७ : ११४९ ) । भारत पर मुसलिम आक्रमण का परिणाम भयावह हुआ । धर्म तथा जीवन की रक्षा के लिए ब्राह्मण तथा विद्वान, नैपाल, काश्मीर तथा दक्षिण भारत भागने लगे । काश्मीर में उत्तर-पश्चिम भारत से पण्डितो का समूह पहुँच गया । वे अपने साथ ग्रन्थों का भण्डार लेते आये । उस समय काश्मीर मण्डल विद्वानों से भर गया था । मुसलिम आक्रमण की एक और प्रतिक्रिया हुई । गुरुकुल टूटने लगे । आश्रमों का लोप हो गया । वेद पूर्व काल में लिपिबद्ध नही थे । गुरुकुल तथा आश्रमों में वे स्मरण रखे जाते थे । उनको लुप्त होने से बचाने के लिए सर्वप्रथम काश्मीर में वे लिपिबद्ध किए गए । अलबेरूनी के अनुसार वे बारहवी शताब्दी में लिपिबद्ध किए गए थे । काश्मीरी ब्राह्मण तथा शुक ने लिखने तथा व्याख्या का कार्य किया था । ( पृष्ठ १०७ ; १ : १२६-१२७ ) बारहवी शताब्दी का पूर्वार्ध काश्मीर मे वंशानुगत संघर्षों, विद्रोहों, षड्यन्त्रों, क्रान्तियो एवं रक्त- रंजित घटनाओ का काल था । उनके कारण काश्मीर मंडल की प्रगति अवरुद्ध हो गयी थी । काश्मीर

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दुर्बल हो गया था। राजा हर्ष (सन् १०८९-११०१ ई०) के जीवन, उसके दुःखद अन्त, विश्वासघात, नैतिक पतन का जो चित्रण कल्हण ने किया है, उसे पढ़कर रोमाञ्च हो जाता है। जमीन्दार तथा जागीर- दारों के समान काश्मीर में कुलीन डामरो का एक वर्ग विशेष अस्तित्व में आ गया था। उनके रक्तरंजित कार्यों से भविष्य की चार शताब्दियाँ त्रस्त रही हैं। उच्चल तथा सुस्सल के नेतृत्व में डामरो ने राजा हर्ष को त्रस्त करना आरम्भ किया। हर्ष ने उनके कारण राज त्याग दिया। फिर भी उसकी क्रूरतापूर्वक हत्या की गई। उच्चल और सुस्सल ने काश्मीर राज्य को संघर्ष से बचाने के लिए परस्पर बाँट लिया। ज्येष्ठ भ्राता उच्चल काश्मीर तथा सुस्सल ने लोहर का राज लिया। उच्चल डामरो को परस्पर लड़ाता उनकी शक्ति क्षीण करने लगा। कुछ समय तक गर्गचन्द्र, जो लहर का सरदार था राजसूत्र हाथ में रखने में सफल रहा। उसका राज्यकाल (सन् ११०१- ११११ ई०) सर्वदा हर्ष के उत्तराधिकारी राज लोलुपो तथा भाई सुस्सल के भय के कारण संघर्ष मय रहता था। अन्ततोगत्वा अपने पदाधिकारियों के षड्यन्त्र का शिकार बन कर मार डाला गया। तत्पश्चात् रड्ड एक दिन के लिए राजा बन बैठा। (सन् ८-१२-११११ ई०) गर्ग चन्द्र विद्रोहियों को दबाकर शक्तिशाली हो गया। वह राजाओं को बनाने और बिगाड़ने वाला बन गया। (रा० ८: ४२५) सल्हण गर्ग चन्द्र की सहायता से राजा बन गया। इसके पश्चात् काश्मीर के अत्यन्त दुःखान्त रक्तपात पूर्ण इतिहास का अध्याय खुलता है। सुस्सल का भिक्षाचर आदि के साथ गृह युद्ध सन् १११२ से ११२८ ई०) तक चलता रहा। अन्त मे राजा जयसिंह सन् ११२८ ई० में राजा बनकर काश्मीर में शान्ति स्थापित करने में सफल हुआ। चम्पक, कनक तथा कल्हण का काल इन भयंकर परिस्थितियों में व्यतीत हुआ था। क्रान्तियों, रक्तपातों, अराजकताओ, गृह-कलहो, संघर्षों, राज विप्लवों मे काश्मीर भस्म हो रहा था। उसका सामा- जिक ढाँचा बिगड़ रहा था। वैदिक, सनातन, पौराणिक, बौद्ध धर्मों के स्थान पर तन्त्रो का प्राबल्य हो रहा था। काश्मीर मण्डल स्वतः विघटित हो रहा था। इन सबका प्रभाव कल्हण पर पड़ना स्वाभाविक था। राज्य प्रासादीय षड्यन्त्र, अकाल, जलप्लावन, अग्निदाह, जनपीड़ा, मूर्तियों-मन्दिरों, विहारों का नाश करना आदि दुःखद घटनायें कल्हण को दुःखित कर रही थी। वह स्वयं कुछ कर नही सकता था। परिस्थितियाँ उसे एकाकी बना दी थी। वह अपने देश की भयावह परिस्थितियो से दुःखी था। उसने अपना समय काटने, कुछ करने, अपने देशवासियों के चरित्र को उठाने तथा राजाओ को शिक्षा देने लिए काव्य को साधन बनाया। उसी साधन का फल राजतरंगिणी है। उसमें उस काल की झलक मिलती है। कवि कल्हण की मानसिक वेदनाओं का उसके पदो में दर्शन मिलता है। राजतरंगिणी तत्कालीन सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक स्थितियों का सजीव चित्रण है। यह चित्रण सप्रमाण है। सत्य है। विषम परिस्थितियों, मानवीय दुर्बलताओ, घृणास्पद कर्मों को देखकर कल्हण की भाषा उपदेशात्मक हो गयी। परिस्थितियो ने उसमें नैराश्य एव विराग उत्पन्न कर दिया था। जयसिंह के काल में स्थिति अधिक सुधरी नही। द्वेष बीज अंकुरित होता गया। वह अंकुर ही कालान्तर में वृद्धि करता महान पादप बना। उस पादप का फल राजतरंगिणी की रचना है। हर्ष के पतन के कारण कल्हण का कुल प्रभावित हुआ था। राजा हर्ष के प्रिय पात्र उसके पिता तथा चाचा थे। हर्ष के विश्वासपात्र होने के कारण हर्ष के पश्चात् हुए अन्य राजाओ के प्रिय पात्र कल्हण,

उसके कुल के लोग नहीं हो सके । कुल का जीवन एकाकी हो गया था । कल्हण तथा उसके कुल का कोई व्यक्ति राज अनुग्रह प्राप्त दिखायी नहीं पड़ता । कल्हण के पूर्व तथा परकालीन वंशजों का आठवें तरंग में उल्लेख बिल्कुल नहीं मिलता । राजा जयसिंह के सुझाव पर कल्हण की लेखनी उठी थी, इसकी झलक कहीं नहीं मिलती । समुद्र-ज्ञान : कल्हण ने काश्मीर मण्डल तथा समीपवर्ती स्थानों का भ्रमण किया था। वह काश्मीर के कण-कण से परिचित था । उसका भौगोलिक ज्ञान अद्भुत है । जिस प्रकार उसने भूगोल उपस्थित किया है, उससे प्रतीत होता है कि उसने भारत का भ्रमण किया था। समुद्र तट तक पहुँचा था। उसने समुद्र का जो वर्णन उपस्थित किया है, उसे बिना समुद्र देखे, कोई कवि केवल पुस्तक-ज्ञान से नहीं लिख सकता । ताल वृन्त, नारियल वृक्ष की छाया, डाभ, आदि का पान, अनेक बातें ऐसी हैं, जिनसे प्रकट होता है कि इतिहास लिखने के पूर्व उसने इतिहास-सामग्री एकत्रित करने के लिए भारत-भ्रमण किया था । आधुनिक वैज्ञानिकों के समान कल्हण पृथ्वी को समुद्र मेखला धारिणी लिखता है । पृथ्वी समुद्र से वेष्टित है। यह निर्विवाद है। कल्हण समुद्र की मर्यादा का उल्लेख करता है । यह बात समुद्र तटवर्ती निवासी या वहाँ गया पर्यटक ही समझ सकता है । (रा० १ : १५३, १ : २६६ ) कल्हण दक्षिण समुद्र, पश्चिम समुद्र, पूर्व समुद्र आदि (रा० ३ : ४७९, ४८०) तथा लवण समुद्र का उल्लेख करता है । भारत के. दक्षिण में भारतीय सागर, पूर्व में बंगाल की खाड़ी तथा पश्चिम में अरब सागर है । काश्मीर समुद्र से सहस्त्रों मील दूर पर्वत-मालाओं से वेष्टित है । कल्हण ऐसा सप्रमाण ऐतिहासिक ग्रन्थ विना भारत-भ्रमण, काश्मीर के राजाओं के दिग्विजय-मार्ग तथा उनके द्वारा विजित प्रदेशों को देखे नहीं लिख सकता था । मेघवाहन की सेना दक्षिण भारतीय समुद्र तट पर विश्राम कर रही थी । उस पार द्वीप था । (रा० ३ : ३०) यह स्थान रामेश्वरम् तथा धनुष्कोटि है । चारो धाम की यात्रा करना पुनीत कर्म माना गया है । पुरी, रामेश्वरम् तथा द्वारिका समुद्र तट पर है। कल्हण ने उत्कल किंवा कलिग, कर्नाट एवं सौराष्ट्र का उल्लेख किया है । वहाँ का वर्णन भी किया है। उसने या तो यात्रा अथवा ज्ञानार्जन के लिए भारत-भ्रमण किया था । वह काश्मीर से कन्नौज, काशी, गया होते पुरी, वहाँ से रामेश्वरम् और लौटते समय गोकर्ण, द्वारका सौराष्ट्र होता अवन्ति से उत्तरापथ में प्रवेश कर, काश्मीर लौटा होगा । कल्हण ने चार समुद्रो का उल्लेख किया है (रा० ४ : ३१०) सप्त-सिन्धु की पुरानी धारणा है। कल्हण ने उसे न मानकर शिव की चार भुजाओं की उपमा चार समुद्रो से दी है । आजकल पाँच महा समुद्रो की गणना की जाती है । प्राचीन काल में भी चार ही महा समुद्र की गणना की जाती थी । भारतीय सागर वाद का दिया गया नाम है । भारतीय सागर प्रशान्त तथा अटलांतिक के मध्य तथा अण्टार्कटिक के उत्तर में पड़ता है । यदि भारतीय समुद्र को उन समुद्रो का मध्यवर्ती स्थान मान ले तो कल्हण का वर्णन ठीक बैठता है । भारत महा- सागर को उसने दक्षिण सागर कहा है जो दक्षिण ध्रुव तक चला गया है । (रा० ३ : १२६) रघुवंश में कालिदास ने भी चार समुद्रों का ही उल्लेख किया है । राजा रणादित्य के सन्दर्भ में कल्हण ने चोल राजा रतिसेन को समुद्र की पूजा करते हुए चित्रित किया है । चोल राज्य सुदूर दक्षिण में पूर्वोय तथा मौराष्ट्र पश्चिमी समुद्रतट पर था । कल्हण का यह वर्णन सत्य है । (रा० ३ : १२६) भारत पर्यटन : काशी, कन्नौज, अवन्ति, मथुरा के अतिरिक्त और जिन स्थानों का कल्हण

[ १४ ] उल्लेख करता है, वे ठीक अपने स्थानों पर मिल जाते हैं। इनमें गलती नहीं हो सकी है। उसके वर्णनों से उनका ठीक पता लग जाता है । कल्हण का महत्वपूर्ण योगदान पुरातन भूपरिचय वर्णन है । पुराण, महाभारत, रामायण एवं कल्हण की वर्णन-शैली में अन्तर है । पुराण केवल नामों का उल्लेख कर छोड़ देते हैं । उनका भौगोलिक परिचय नहीं देते । महाभारत तथा रामायण कहीं-कहीं दिशाओ का भी संकेत करते हैं । यह संकेत रामा- यण में मुख्यतः सुग्रीव के सम्वाद और महाभारत में रण अभियान एवं दिग्विजयो के सन्दर्भ में मिलता है। परन्तु कल्हण पता एक भौगोलिक की तरह देता है। भारतीय पुराकालीन लेखकों में कल्हण सबसे अधिक सच्चा भौगोलिक स्थिति का वर्णन करता है। भारत के क्षेत्रों का इस प्रकार सर्वांगीण ज्ञान किसी रचना- कार ने उपस्थित नहीं किया है। उसने सिन्धु तट, कालिन्दी पुलिन (रा० १ : ६०) का वास्तविक रूप प्रस्तुत किया है । कल्हण ने देशों का भी वर्णन किया है। जिन देशों तथा नगरों का उसने उल्लेख किया है, उनको सम्भवतः उसने यात्रा भी की थी। काश्मीर के अतिरिक्त शेष भारतवर्ष को उसने आर्य देश की संज्ञा दी है । गान्धार देश, त्रिगर्त देश (रा० ३ : १००) दर्वाभिसार (रा० १ : १८०) चोल, कर्णाट, लाट सीमान्त, दरद देश, भोट्ट, आदि का उल्लेख किया है। उसने सिंहल (रा : १ : २९४) लंका (रा : १ : २६८) प्राग् ज्योतिष (रा० २ . १५२) गौड़ बंगाल आदि का भी उल्लेख किया है। राजाओं में उसने कन्नौज नरेश यशोवर्मन्, सिंहल नरेश विभीषण, अवन्ति नरेश विक्रमादित्य, एवं प्राग ज्योतिषेन्द्र का वर्णन किया है। उसने चन्द्रभागा, गंगा, यमुना, नर्मदा का दर्शन तथा उनमें स्नान अवश्य किया था। इसी प्रकार उत्तर मानस की यात्रा की भी ध्वनि उसके लेख से निकलती है। ईक्षुरस तथा इक्षु में फल न होना वही जान सकता है, जिसने काश्मीर के बाहर जाकर उसका रसास्वादन किया होगा। (रा० : २ : ५८) दिग्विजय-स्थान निरूपण : कल्हण ने राजा जलोक मिहिर कुल, मेघ वाहन, प्रवरसेन, ललिता- दित्य के दिग्विजय का विस्तृत वर्णन किया है। जलोक ने कान्यकुब्ज अर्थात् कन्नोज विजय किया था । काश्मीर के बाहर श्रीकृष्ण के मथुरा तथा गान्धार में हुए संघर्षों के लगभग ग्यारह सौ वर्षों के पश्चात् प्रथम बार काश्मीरी सेना काश्मीर के बाहर निकली थी (रा १ : ११७, ३३६) । दूसरी बार काश्मीर से मिहिर कुल के नेतृत्व में दक्षिण समुद्र तक पहुँची थी । समुद्र तट से लौटते हुए उसने चोल, कर्णाट, लाट आदि देशो का अतिक्रमण किया था । तीसरे दिग्विजय का अभियान मेघवाहन ने किया था। मिहिर कुल के समान यह भी श्रीलंका समुद्र-तट तक पहुँचा था (रा : २७, ७२) । चौथों दिग्विजय प्रवर सेन ने किया था । अवन्ति में प्रवेश कर राजा विक्रमादित्य द्वारा अपहृत काश्मीर का राज सिंहासन पुनः लौटा लाया था । पाँचवी दिग्विजय ललितादित्य ने किया था। उसने वाक्पति राजा एवं भवभूति सेवित कन्नौजपति यशोवर्मन् को जीता था। कन्नौज के दक्षिण में प्रवाहित एवं गंगा से मिलने वाली कालिका नदी और यमुना के मध्यवर्ती भूखण्ड को घर के प्रांगण सदृश बना लिया था। (रा० ४ . १४४, १४६) यह भौगोलिक वर्णन सत्य है । अनन्तर वह कलिंग, गौड, कर्नाटक पहुँचता है। इस स्थल पर कल्हण ने 'दक्षिणापथ' शब्द का उल्लेख किया है। पुरातन काल से दक्षिणापथ से जिन क्षेत्रों का सम्बोधन होता था, उन्हें ही कल्हण ने लिखा है । ललितादित्य ने मलय पर्वत, कोकण, द्वारिका, अवन्ति के पश्चात उत्तरा पथ में प्रवेश किया था ।