राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
[Page Number: १७]
शाला, जनाश्रय, विद्यावेश्म : कल्हण ने आरोग्यशाला ( रा० ३ : ४६१ ) तथा जनाश्रय ( रा० ३ : ४८० ) का उल्लेख किया है । प्रथम वर्त्तमान काल के अस्पतालों तथा द्वितीय धर्मशालाओं के सदृश थे । चतुःशाला ( रा० ३ : १३ ) का भी उल्लेख किया गया है । उसका निर्माण बौद्ध संघ तथा भिक्षुओं के निवास हेतु किया गया था । बौद्ध उपासकों के लिए भी विहार बने थे । विद्यावेश्म आजकल के छात्रावास सहित विद्यालयों के समान थे । वहाँ विद्वानों, विद्यार्थियों के निवास के साथ पढ़ने तथा भोजनादि का प्रबन्ध था । मठ, अक्षयिणी, प्रतिष्ठान, सत्र : कल्हण ने मठों का उल्लेख बहुत किया है । साधु-सन्तों के लिए मठ-निर्माण किया जाता था । शुष्कलेत्र क्षेत्र में मठ ( रा० १ : १७० ), चतुःशाला मठ ( रा० १ : १९१ ) पाशुपत मठ ( रा० ३ : ४६० ) ब्रह्ममठ ( रा० ३ : ४७६ ) मध्यमठ ( रा० १ : ३०० ) सेरी मठ ( रा० १ : ३०० ) खेडा, भीया मठ ( रा० २ : १३५ ) मेध मठ ( रा० ३ : ४६० ) राजाओं द्वारा स्थापित किये गये थे । कालान्तर में मठ बनाने का प्रचलन बहुत हो गया था । दिद्दा मठ आदि अपने समय के प्रसिद्ध मठ थे । मठों के निर्माण का सम्बन्ध तृतीय तरंग तक केवल शैव सम्प्रदाय से था । कल्हण ब्रह्म मण्डप का रानी रण रम्भा द्वारा स्थापित होने का उल्लेख करता है । ( रा० ३ : ४५९ ) यह ब्रह्मविदों के लिए निर्माण किया गया था । राजा तथा धनी जन आप अक्षयिणी ( रा० १ : ३४७ ) प्रतिष्ठान ( रा० १ : ३४७ ) तथा सत्र ( रा० २ : ५८ ) पथिकों, यात्रियों तथा भूखों के लिए स्थापित कराते थे । जीर्णो- द्वार कराने का भी उल्लेख मिलता है । सम्राट् अशोक ने विजयेश्वर के नवीन पाषाण प्राकार का निर्माण कराया था । ( रा० १ : १०५ ), कल्हण ने यागोत्सव ( रा० १ : ३३१ ) तथा लिंग अर्चनोत्सव ( रा० २ : १३५ ) का उल्लेख किया है । नगर निर्माणानि : कल्हण काश्मीर के नगरों तथा ग्रामों का वर्णन कर उनके स्थानों का ठीक पता देता है । तरंग प्रथम से तीन तक कम-से-कम १७ नगर निर्माणों का उल्लेख किया गया है । राजा लव ने लोलोर ( रा० १ : ८६ ) सुरेन्द्र ने सोरक पत्तन, ( रा० १ : ९३ ) अशोक ने श्रीनगर ( रा० १ : १०४ ) जलोक ने उज्जट डिम्ब ( रा० १ : ११६ ) हुष्क ने हुष्कपुर, जुष्क ने जुष्कपुर, जय स्वामीपुर, ( रा० १ : १६९ ), सम्राट कनिष्क ने कनिष्कपुर ( रा० १ : १६८ ), अभिमन्यु ने अभिमन्युपुर, वितस्ता पुलिन में नगर ( रा० १ : १७५-२०२ ), हिरण्याक्ष ने हिरण्याक्षपुर ( रा० १ : २८७ ), मिहिर कुल ने हिरण्यपुर, मिहिरेश्वर ( रा० १ : ३०६ ), बक ने लवणोत्स ( रा० १ : ३२९ ), तुंजीन ने कतिका पत्तन, ( रा० २ : १४ ) विजय ने विजयेश्वर को नगर से घिरवाया था । ( रा० २ : ६२ ) । नगरों के लिए पुर तथा पत्तन शब्द समानार्थक हैं । तीनों शब्दों का प्रयोग कल्हण ने किया है । ग्रामों का भी उल्लेख किया गया है । उनके स्थानों का पता कल्हण के वर्णनों से मिल जाता है । राजा अक्ष ने अक्षबल ( रा० १ : ३३८ ) मेघ वाहन ने मयुष्ट ग्राम ( रा० ३ : ८ ) तथा भेडर ग्राम ( रा० ३ : ४८१ ) का दान किया था । मन्दिरों से काश्मीर मण्डल मण्डित था । प्रत्येक ग्राम तथा जनस्थान में मन्दिर थे । राजा अशोक ने अशोकेश्वर ( रा० १ : १०५ ), जलोक ने ज्येष्ठेश्वर भूतेश ( रा० १ : ४८), अभिमन्यु ने शशांक शेखर, ( रा० १ : १७५ ) मिहिर कुल ने मिहिरेश्वर ( रा० १ : ३०६ ), बक ने वकेश ( रा० १ : ३२६ ), गोपादित्य ने गोपाद्रि पर ज्येष्ठेश्वर, ( रा० १ : ३४१ ) गोकर्ण ने गोकर्णेश्वर ( रा० १ : ३४६ ), उग्र ने उग्रेश ( रा० १ : ३४८ ), तुंग ने तुंगेश्वर ( रा० २ : १४ ), सन्धिमति ने सन्धेश्वर, इष्टेश्वर ३
(रा० २ : १३४), रणादित्य ने माहेश्वर रणेश्वर (रा० : ३ : ४३९-३५४) रानी रणा रम्भा ने रणा स्वा (रा० ३ : ४५४), रानी अमृत प्रभा ने अमृतेश्वर (रा० ४६३) विक्रमादित्य ने विक्रमेडवर (रा० ३ ४७४) एवं उसकी रानी बिम्बा ने बिम्बेश्वर (रा० ३ : ४८२) का निर्माण कराया था। निर्माणकर्त्ताओं ने अपना नाम चिरस्थायी करने के लिए अपने नामों पर मन्दिरों का नाम रखा था। कुछ मन्दिरों के ध्वं सावशेष आज भी दिखायी पड़ते हैं। उनका यथास्थान वर्णन किया गया है। विष्णु मन्दिर : प्रथम तथा द्वितीय तरंग में किसी विष्णु मन्दिर के निर्माण का उल्लेख नहीं मिलता महाभारत काल किंवा लौकिक सम्वत् ६२८ से रणादित्य के काल लौकिक सम्वत् ३२९९ अर्थात् २६७ वर्षों तक विष्णु मन्दिर बनने अथवा पूजा का उल्लेख सार्वजनिक रूप में नहीं मिलता। तृतीय तरंग के अन्ति चरण में रानी रणारम्भा द्वारा विष्णु मन्दिर निर्माण का प्रथम उल्लेख मिलता है। विष्णु प्रतिमा का भी प्रथम बार उल्लेख यहीं किया गया है। (रा० ३ : ४४६) यह विष्णुपूजा एवं विष्णु मन्दिरों के निर्माण के इतिहास की ज्ञात बातों से सर्वथा सम्मत है। रानी रणा रम्भा दक्षिण समुद्र तट से काश्मीर में आयी थी। समुद्र तट पर गम के सेतुबन्ध, लंका विजय तथा रामायण की गाथायें अत्यधिक प्रचलित थी और आज भी हैं। दक्षिण-पूर्व एशिया तक रामायण पहुँच चुकी थी। उसकी गाथायें लोकप्रिय हो गयी थीं। दक्षिण से सम्बन्धित होने के कारण ही रानी रणारम्भा विष्णुपूजा से प्रभावित थी। काश्मीर में विष्णु मन्दिर बना कर उसने अपनी रुचि तथा मत का परिचय दिया। शिवलिंग : कल्हण ने शिव मन्दिरों के साथ ही साथ शिव लिंगों की स्थापना का वर्णन किया है (रा० २ : १२८-१३२)। शिव लिंग के अतिरिक्त प्रतिमा लिंग की भी चर्चा कल्हण करता है। षेडा भेदा, (रा० २ : १३५) हिर्मालग (रा० २ : १३७) शैललिंग (रा० ३ : ४१९) रत्नलिंग (रा० ३ : ४४६) तथा प्रजापति पूजित लिंग (रा० ३ : ४४६) अर्चना का विस्तृत उल्लेख करता है। जातियों का ज्ञान : भारत भ्रमण काल, सीमावर्ती ज्ञान तथा भारत पर मुसलिम आक्रमण होने के कारण अनेक जातियों के काश्मीर में आ जाने के कारण उसमें कल्हण को जातियों के रीति-रिवाज, कर्म आदि का पर्याप्त ज्ञान हो गया था। जो जातियाँ महाभारत पुराण, रामायण में अलौकिक मालूम होती हैं वे वास्तव में मानव जातियाँ थीं। भारत निवासी थी। कल्हण ने इसे अपने उल्लेखों तथा उनके कर्मों से सिद्ध किया है। उनका चित्रण अलौकिक मानव की अपेक्षा चलते-फिरते साधारण जनों के समान दिया है। यक्ष, गन्धर्व, विद्यार, सिद्ध, गुह्यक, शबर किरात, राक्षस को पुरातन ग्रन्थकारों ने जाति लोकोत्तर मान लिया था। महाभारत ने अपने काल तक की ज्ञात जातियों का कल्हण ने उल्लेख किया है। (द्रष्टव्यः परिशिष्ट) दक्षिणा पथ के चोल, कर्णाट, कोंकण, लाट, सौराष्ट्र, जातियों का भी वर्णन किया है। (रा० १ : ३००, ३ : ४३२) कल्हण ने विशेष उल्लेख जमुना से गान्धार प्रदेश तथा काश्मीर की सीमान्त जातियों का दिया है। श्रीकृष्ण-गोनन्द युद्ध के सन्दर्भ में वृष्णि तथा यादवों का उल्लेख किया गया है। काश्मीर की उत्तर दिशा में गुह्यक, यक्ष तथा दरद थे। (रा० १५६, १५६, ३१२) दक्षिण दिशा में गान्धार, गदा एवं दूर्व थे। (रा० १ ६६, ३१७) पूर्व-उत्तर दिशा में भोट्ट थे। (रा० १ ३१२) पूर्व-दक्षिण दिशा में किन्नर थे। (रा० १ १९९) पश्चिम दिशा में यवन, म्लेच्छ एवं आयों के अतिरिक्त अन्य जातियाँ थीं। आर्य का अर्थ कल्हण ने हिन्दुओं से लगाया है। म्लेच्छों में मुसलमानों के साथ ही साथ अफगान, ईरान तथा तुर्किस्तान की जातियाँ थीं। (रा० १ : ३१२) किरात पर्वतीय जंगलों में रहने वाली जाति
[ १९ ]
थे। (रा० ३ : ३९) राक्षस लंका निवासी थे। (रा० ३ : ७४) वे मनुष्यों जैसे थे। स्थापत्य एवं निर्माण कार्यों में चतुर थे। शबर (रा० ३ : ३३) तथा निशाचर (रा० ३ : ३९) जंगली थे। वे पौराणिक जातियाँ थीं। उनके स्थान तथा क्षेत्र विस्मृति-सागर में डूब गए हैं। पिशाच तथा नाग जातियाँ काश्मीर की मूल निवासी थीं। इसी प्रकार सिद्ध गणों (रा० ३ : ४५६) की भी एक जाति थी। खेचर (रा० ३ : ४५०) जाति का भी मालूम होता है पुराणों के आधार पर कल्हण ने वर्णन किया है। (रा० १ : ६३, ६६, ६७, १५३, १५९, १९९, २९८, ३००, ३१२, ३१७, २ : १६५) कल्हण ने बेकाल जाति का भी उल्लेख किया है। (रा० १ : ४८०) एक मत हैं। बंकाल शब्द बंगाल का अपभ्रंश है। धर्म : कल्हण कट्टरपंथी नहीं था। वह उदार था। सहिष्णु था। भारत के अन्य भागों के समान काश्मीर में भी सम्प्रदाय, मत-मतान्तरों तथा पूजा-पाठ की पूर्ण स्वतन्त्रता थी। भारत में बौद्धधर्म का लोप हो चुका था। परन्तु काश्मीर में उसकी मान्यता थी। शैव, वैष्णव, तान्त्रिक सभी बुद्ध को अवतार मानकर पूजा करते थे। बौद्धधर्म काश्मीर में तेरहवीं शताब्दी तक रहा। आज भी काश्मीर के एक सूबा लद्दाख का वह धर्म है। कवि क्षेमेन्द्र ने कल्हण के एक शताब्दी पूर्व बुद्ध को अवतार मानकर वन्दना किया था। काश्मीर की जनता शुद्ध वैदिक धर्म के स्थान पर मत-मतान्तरों-तन्त्रों के चक्कर में पड़ गयी थी। काश्मीर में शैव मत की प्रधानता थी। वह प्रधानता आज भी हिन्दू काश्मीरियों में सर्वत्र दृष्टिगोचर होती है। कल्हण इन सबका अपवाद नहीं था। वह शिव एवं बुद्ध दोनों की वन्दना करता है। महाकवि होते हुए भी कल्हण पुरानी परम्परा का अनुकरण कर मंगलाचरणों में गणेश एवं सर- स्वती की वन्दना नहीं करता। तत्कालीन संस्कृत लेखकों की परम्परा को तोड़कर उसने अपनी मानसिक स्वतंत्रता के साथ प्रगतिशीलता का परिचय दिया है। शिव के उस रूप की वन्दना की है जो एकांगी नहीं है। केवल पुरुष या नारी मात्र नहीं है। केवल पुरुष एवं प्रकृति मात्र दार्शनिक शब्दों में नहीं है। वह पुरुष, प्रकृति, नर-नारी, पिता-माता दोनों का समन्वय है। अतएव वह अर्धनारीश्वर रूप है। अर्धनारीश्वर की कल्पना अद्भुत है। उसका दार्शनिक स्वरूप अत्यन्त भावोत्पादक है। आकर्षक है। सहृदयमय है। जो पुरुष एवं प्रकृति के रूप में जगत को चलाता है, सृजन का जो मूल स्रोत है, जहाँ संहार एवं लय होता है, साथ ही जो माता स्वरूप पार्वती है, पिता स्वरूप शिव हैं, जहाँ शिव का योग है, जहाँ देवी पार्वती का स्नेह है, जहाँ शिव त्रिभुवन गुरु हैं, पार्वती माता है; जहाँ वह शिवभक्ति का वर्णन करता है वहाँ उसकी आन्तरिक भावना, उसकी अटूट श्रद्धा अपनी पूर्ण गरिमा में निखर आती है। (रा० २ : १२१-१७१) तन्त्र : कल्हण प्रत्यभिज्ञा दर्शन का अनुयायी था। वह शैव था। तन्त्र-मन्त्र में विश्वास करता था। किन्तु उसने तत्कालीन तान्त्रिकों की दुष्ट प्रवृत्तियों की आलोचना की है। तन्त्र साहित्य का अध्ययन किया था। सर्व प्रथम उसने मातृ चक्र का उल्लेख जलोक की पत्नी ईशान देवी के सन्दर्भ में किया है। इससे ध्वनित होता है कि कल्हण के अनुसार अशोक के समय में बौद्धधर्म काश्मीर में प्रवेश कर वृद्धि प्राप्त किया और उसके पुत्र के समय में तन्त्रों का भी प्रचार हुआ। इस प्रकार बौद्धधर्म तथा तन्त्र एक साथ काश्मीर में जड़ जमाने लगे। किन्तु ऐतिहासिक दृष्टि से यह दोषपूर्ण है। तंत्र का आरम्भ यद्यपि आधुनिक शोधों की सहायता से बहुत पहले ले जाया गया है किन्तु उसे अशोक के काल से संबंधित करना उचित नहीं लगता। कदाचित् समकालीन बौद्धधर्म में तंत्रों के व्यापक प्रसार के कारण ही कल्हण की ऐसी
[ २० ] धारणा बनी हो । बौद्धधर्म एवं तंत्र दोनो पोदहवीं शताब्दी तक कश्मीर में थे । निःसन्देह तन्त्र का प्रचार बौद्धधर्म की अपेक्षा अधिक हो गया था और हिन्दू राज्य की समाप्ति के साथ दोनों का लोप भी कश्मीर में हो गया । कल्हण ने मातृचक्र का पुनः उल्लेख प्रवरसेन के प्रसंग में पुराधिष्ठान के सन्दर्भ में किया है । ( रा० २ : ९९ ) कृत्या उपासना का भी वह उल्लेख ( रा० १ : १३७, १४७; ३ : ३३ ) करता है । यहाँ यह निर्देश कर देना आवश्यक है कि तन्त्र तथा तन्त्री दो विभिन्न वर्ग थे । तन्त्री काश्मीर का एक सामाजिक वर्ग डामरों के समान था । तान्त्रिक लोग तन्त्र-क्रिया करते थे । तन्त्र की अत्यधिक दुरूह पद्धति मत्स्यायूप याग कल्हण के समय तक प्रचलित था । उसका वर्णन कर तन्त्र ज्ञान का कल्हण परिचय देता है । ( रा० ६ : ११ ) इसी प्रकार वह गुरुदीक्षा प्रथा का उल्लेख करता है : ( रा० ६ : १३ ) राघवानन्द ने पद्धति रत्नमाला में काश्मीरी तान्त्रिकों के इस संस्कार क्रिया पद्धति का उल्लेख किया है । काश्मीर में महिलायें भी तान्त्रिक गुरु होती थी कल्हण ने मत्स्य यज्ञ, अपूप याग विधि के प्रचारकों तथा पोषकों के लिए 'मूर्ख गुरु' शब्द का निन्दनीय प्रयोग किया है । वे आगम ग्रन्थों का कपोल कल्पित अर्थ, भाष्य एवं टिप्पणी करते थे । राजा कलश के गुरु प्रमदकण्ठ ने धार्मिकता की आड लेकर रति सुख की ओर प्रेरित कर उसे कामी बना दिया था । कल्हण ने उसकी खुलकर निन्दा की है । ( रा० ७ : २७८ ) अपने गुरु के साथ तान्त्रिक क्रियाओं में, अर्ध रात्रि में सम्पन्न की जाने वाली 'महासमय रात्रि' में राजा मदपान करता था । ( रा० ७ : ५२३ ) राजा कलश से उसके तान्त्रिक गुरु ने अनुचित कार्य कराया था । ( रा० ७ : ७१- ) कल्हण ने इन तान्त्रिको का उपहास करते हुए उन पर व्यंग किया है । कल्हण अभिचार क्रिया में विश्वास करता था । अभिचार के कारण राजा का देव मोहित होना लिखा है । वह लोगो के अन्ध-विश्वास तथा भूत-प्रेत विश्वास का समर्थक नही था । मन्त्र शक्ति देवी पूजा : तन्त्र के अतिरिक्त देवी एवं शक्ति पूजा का भी प्रचार कल्हण के समय में था । सिंह वाहिनी देवी ( रा० ३ : ४ १२ ) भ्रमर वासिनी देवी ( रा० १ : ४१६ दुर्गा, रा० : ८६- ९३ ) योगिनी ( रा० २ : १०० ) और महायोगिनी ( रा० १ : १३१ ) का उल्लेख कल्हण ने किया है । अशोक ने म्लेच्छों के नाश हेतु तपस्या किया था । तपस्या किया था। तपस्या की शक्ति से उसे जलोक पुत्र प्राप्त हुआ था । ( रा० १ : १०७ ) मन्त्र सिद्धि में कल्हण विश्वास करता था । तारकेश्वर मन्त्र तथा वशी मन्त्र का प्रभाव वर्णन किया गया है । ( रा० ३ : ४६५, ४६६ ) बलि प्रथा : बलि प्रथा काश्मीर में प्रचलित थी । देवी के सम्मुख बलि दी जाती थी । नर बलि भी होती थी । मैं काश्मीर के ग्रामों में घूम रहा था । एक स्थान की ओर संकेत किया गया । बताया गया कि वहाँ नर बलि दी जाती थी । उस गाँव के निवासी सभी मुसलमान थे । पुरातन जनश्रुति लोगों को स्मरण थी । राजा मेघवाहन के सन्दर्भ में नरबलि की बात कही गयी है । ( रा० ३ : : ) चण्डिकापतन में देवी के सम्मुख बलि दी जाती थी । ( रा० ३ : ३३ ) योगेश्वरी भट्टा द्वारा राजा वक तथा उसका समस्त कुटुम्ब देवी चक्र पर उपहार स्वरूप चढ़ा दिया गया था । ( रा० १ . ३३१ ) कल्हण ने उपहार एवं बलि दोनों शब्दो का प्रयोग किया है । दोनों के अर्थों में भेद है । धार्मिक क्रान्तियाँ : राजतरंगिणी काश्मीर में समय-समय पर हुए धार्मिक विकास, परिवर्तन एव
[ २१ ] क्रान्तियों का इतिहास प्रस्तुत करती है। यदि महाभारत काल से बारहवीं शताब्दी तक के काश्मीर राजाओं की राजकथा कल्हण ने लिपिबद्ध की थी तो उसने इसी काल के धार्मिक उथलपुथल तथा उनके जनता, समाज और राज्य पर पड़ते हुए प्रभावों का भी वर्णन किया है। इस दृष्टि से विश्व के किसी भी इतिहास- कार ने इतिहास नही लिखा है। कल्हण ने इतिहास को राजाओं किंवा राज्य के तिथिवार घटना-क्रम का संकलन नही माना है। उसने इतिहास में जनता के मानसिक विचारों, उनके विकास, वृद्धि एव ह्रास की क्रमबद्ध घटनाओ को लिखा है। उनका देश की राजनीति एवं समाज पर क्या प्रभाव पड़ा है और पड़ सकता है, इसका विशद वर्णन किया है। अस्तु राजतरंगिणी का महत्व राजनैतिक इतिहास के साथ-ही- साथ धर्म एवं विचारों के विकास के इतिहास के लिये भी है। विश्व के पुरा कालीन इतिहासकारों ने राजनीति के साथ देश की मनःस्थिति पर कम प्रकाश डाला है। इस दृष्टि से पुरानी शैली के इतिहास- कारों के सम्मुख कल्हण ने नवीन शैली उपस्थित की है जिसमें प्रेरणा है, तथ्य है, स्फूति है। प्रथम धार्मिक क्रान्ति : काश्मीर म चार धार्मिक क्रान्तियाँ हुई है। ये शान्तिपूर्ण थी, अहिंसक थीं, पश्चिम के रक्तमय उन्माद की कहानी उनमे नही मिलेगी। उनका साधन शक्ति नही था। वह वर्ष की ऋतुओं के सदृश आयी और चली गयी। उन्होंने विघटनात्मक, द्वेषात्मक एवं उन्मादात्मक प्रचारात्मक प्रवृ- त्तियों एवं इतिहासों का सृजन नही किया। कल्हण ने इन क्रान्तियो का प्रारम्भ यक्ष विप्लव, भिक्षु विप्लव आदि नामों से अभिहित किया है। उसने क्रान्ति के स्थान पर विप्लव शब्द का प्रयोग किया है। काश्मीर में सर्व प्रथम नील मुनि द्वारा प्रचारित नाग पूजा प्रचलित थी। नील मत पुराण द्वारा प्रतिपादित धर्म काश्मीर का धर्म था, पूजा पद्धति थी। सम्राट अशोक के समय में सर्वप्रथम बौद्ध धर्म का जोर काश्मीर में हुआ। राजाश्रय प्राप्त कर वह वृद्धि कर गया। अशोक ने विहारो, चैत्यो, स्तूपों से काश्मीर- मण्डल को भर दिया था। बौद्ध शासन का प्राबल्य हो गया। काश्मीर का पुरातन सनातन धर्म पीछे पड़ गया। प्रथम क्रान्ति का प्रणेता अशोक का पुत्र जलोक था। उसने भिक्षु विप्लव को रोका। इसका पहला साधन शास्त्रार्थ था। राजा जलोक का गुरु एक अवधूत था। गुरु अवधूत ने बौद्ध विद्वानों को शास्त्रार्थ में पराजित किया। (रा० १ : ११२) राजा जलोक अपने पुण्य-कार्यों एवं पुरातन धर्म की पुनर्स्थापना एवं बौद्धो के दलन के कारण नन्दीश्वर का अवतार काश्मीर में मान लिया गया। (रा० १ : १३०) उस समय काश्मीर मण्डल में बौद्धो का प्राबल्य था। बौद्ध धर्म की मान्यता थी। (रा० १ : १४) कल्हण ने भगवान बुद्ध को उनके मूल वंशीय नाम महाशाक्य से सम्बोधित किया है। (रा० १ : १४१) राजा जलोक के समय मे भी बौद्ध धर्म के दलन की झलक मिलती है। विहारों का निसन्देह दलन किया गया था। (रा० १ : १४०-१४४) राजा जलोक स्वतः अहिंसक था। कृत्या के मांस माँगने पर उसने अपना मास काट कर देना उचित समझा था। उसने बोधिसत्व के शासन एवं कर्मों को स्वयं जिज्ञासा कर शान्ति पूर्वक सुना था। तथापि उसने सहिष्णुता का परिचय दिया था। उसे बोधिसत्व स्वरूप ही मान लिया गया था। ज्येष्ठेश की पूजा के समय नृत्य-गीत कुशल एकसौ अन्त:पुर की महिलाओं को मन्दिर में नृत्य, गान एवं सेवा के लिये नियुक्त किया था। काश्मीर के इतिहास में यह प्रथम अवसर था जब मन्दिरों में नृत्य गान- शील महिलाओं का देव सेविका के रूप में प्रवेश हुआ था। वह प्रथा कालान्तर में देवदासी की कुप्रथा में परिणत हो गयी।
[ २२ ] द्वितीय धार्मिक क्रान्ति : राजा अभिमन्यु के समय में द्वितीय क्रान्ति हुई थी । इस समय भी बौद्ध अत्यन्त प्रवल हो गये थे । ( रा० १ : १७१ ) भिक्षु विप्लव से काश्मीर त्रस्त था। ( रा० १ : १७२- १८१ ) प्रसिद्ध दार्शनिक प्रचारक नागार्जुन इस समय काश्मीर मण्डल में वर्तमान था । उसकी तुलना बोधिसत्त्व से की जाती थी ( रा० १७३-१७७ ) नीलमत विहित कर्मकाण्ड, नाग यात्रा, नाग-पूजा, यज्ञादि जो प्राचीन काल से होते चले आते थे बन्द हो गये । संस्कृत भाषा भी पालि के सम्मुख दब गयी थी । पाली मुसलमानों की अरबी की समान बौद्धो की धार्मिक भाषा थी । बौद्ध वेद द्वेषी थे । उन्होंने शास्त्रार्थ में पण्डितो को परास्त कर नील मत विहित मत का उच्छेद कर दिया था । आतंकित राजा छ मास तक काश्मीर मण्डल त्याग कर, दर्वाभिसार में समय व्यतीत करता था । पुरातन धर्म की रक्षा हेतु काश्यप गोत्रीय चन्द्रदेव ब्राह्मण ने तपस्या की । नील नाग उसकी तपस्या से प्रसन्न हो गये । ( रा १ १८४ ) पुरातन काल में आद्य चन्द्रदेव विद्वान ने यक्ष विप्लव शान्त किया था । दूसरे चन्द्र देव ने बौद्ध विप्लव शान्त किया । ( रा० १ : १८५-१८६ ) तृतीय धार्मिक क्रान्ति : तृतीय क्रान्ति बौद्ध प्राबल्य को पुनः रोकने के लिये राजा किन्नर, सिद्ध, गोपादित्य, सन्धि मति के काल में हुई थी । बौद्ध विहारों को भस्म करने का भी उल्लेख इस समय मिलता है । ( रा० १ : २०० ) राजा सिद्ध ने शैव मत को पुनःस्थापित किया था । ( रा० १ : २७६ ) गोपादित्य ने वर्णाश्रम धर्म परिपालन हेतु ठोस कदम उठाया था । तथापि अहिंसा व्रत का त्याग नहीं किया गया । बलिप्रथा का सक्रिय विरोध होता रहा । ( रा० १ : ३४४ ) सन्धिमत के समय शैव भक्ति का पूर्णरूपेण काश्मीर मण्डल मे प्रचार हो गया । ( रा० २ : १३२ ) कल्हण ने विष्णु का सर्वप्रथम उल्लेख प्राग्ज्योतिष के सन्दर्भ तथा राजा मेघवाहन के विवाह-सम्बन्ध में किया है । ( रा० २ : १४७ ) विष्णु पूजा का प्रवेश बाहरी प्रभाव के कारण काश्मीर में हो सका था । मेघवाहन की रानी अमृतप्रभा थी । बंगाल तथा आसाम में वैष्णव मत का प्रभाव था । एतदर्थ विष्णु का प्रवेश काश्मीर में रानी अमृत प्रभा तथा रानी रणा रम्भा के कारण हुआ । परन्तु वह शिवपूजा तथा उपासना के समान सर्वमान्य नहीं हो सका । चतुर्थ धार्मिक क्रान्ति : चतुर्थ धार्मिक क्रान्ति राजा मेघवाहन के समय में हुई थी । इस काल में बौद्ध मत का प्रचार पुनः हुआ । परन्तु शैव मत का विरोध इस बार नहीं हो सका । शैव तथा बौद्ध मता- वलम्बी समझ गये थे । दोनों को एक साथ काश्मीर में रहना था । अतएव दोनों मत बहुत समीप आने लगे । मेघवाहन ने शैव उपासना का विरोध नहीं किया । उसका एकमात्र उद्देश्य था जगत में भगवान् बुद्ध के आदेशानुसार जीव हिंसा बन्द करना । मेघवाहन अपने उत्तम आचरण तथा कर्मों से बोधिसत्वों के कार्यों से भी आगे बढ़ गया था । उसने भिक्षुओं तथा उपासकों के लिये मद वन विहार स्थापित किया । भगवान् बुद्ध जेतवन, आम्रवन, तथा वेणु वन आदि विहारों में निवास करते थे । प्रतीत होता है उसी का अनुकरण कर मेघवाहन ने नदवन विहार स्थापित किया था । ( रा० ३ : १२ ) उसके समय में अहिंसा मर्यादा का पटह घोष किया गया था । उसकी रानी अमृत प्रभा के पिता का गुरु स्तुन्या था । वह लोट अर्थात् लद्दाख दिशा से आया था । उसने लो स्तुन्या स्तूप स्थापित किया । ( रा० ३ . १० ) राजा ने विश्व के इतिहास का एक अभिनव अभियान आरम्भ किया । उसने दिग्विजय कर विश्व
[ २३ ] में प्राणि हिंसा निषेध करने का निश्चय किया। (रा० ३ : २७) दक्षिण समुद्र तट पर मेघवाहन का शिविर पड़ा था। एक शबर चण्डिकायतन में नरबलि करने के लिये सन्नद्ध था। उस समय राजा ने स्वयं अपना शरीर अर्पित कर हिंसा से शबर को विरत किया था (रा० ३ : ५७) उसने ब्राह्मण बालक की रक्षा के लिये स्वयं अपना शरीर बलि के लिए अर्पित कर प्राणि रक्षा का स्तुत्य प्रयास किया था। (रा : ३ : ८८) राजा ने राक्षसों से भी अहिंसा बल लेकर उन्हें हिंसा कर्म से विरत किया था। (रा० ३ : ७८-७९) राजा ने अपने राज्य तथा भारत वर्ष में महाघोष कराया कि कोई भी प्राणी क्यो न हो वे सब अवध्य हैं। (रा० ३ : ८८) मेघवाहन ने सर्व प्रथम काश्मीर में बुद्ध प्रतिमा अपनी पत्नी भिन्नों के विहार में स्थापित किया था। (रा० ३ : ४६४) मेघवाहन का जन्म गान्धार में हुआ था। गान्धार प्रदेश में महायान सम्प्रदाय का प्राबल्य था। कनिष्क के कारण अफगानिस्तान, तुर्किस्तान तक बौद्ध धर्म पहुँच गया था। गान्धार शैली का स्थापत्य विकसित हो चुका था। मेघवाहन गान्धार में रहने के कारण उनसे प्रभावित था, अतएव मेघवाहन ने भगवान् बुद्ध की प्रतिमा काश्मीर में स्थापित की। इस प्रकार उसने प्रतिमा स्थापन की परम्परा चलायी। वह सम्राट् अशोक तथा कनिष्क के पश्चात् तीसरी महान् भारतीय आत्मा था जिसने बौद्ध धर्म के प्रचार हेतु सक्रिय पग उठाया था। उसने प्रचार के लिए राजशक्ति का आश्रय लिया था। कल्हण ने विस्तार के साथ इस काल के क्रान्तिकारी धार्मिक परिवर्तनों का उल्लेख किया है। बौद्ध धर्म के मूल सिद्धान्तों को भी संक्षेप में देने का प्रयास किया है। कल्हण के इस व्यापक ज्ञान से प्रतीत होता है कि उसने तत्कालीन मत-मतान्तरों एवं सम्प्रदायों का गहन अध्ययन किया था। उसने तन्त्र, योग, धर्म, मतादि के विषय में जहाँ भी लिखा है, साधिकार लिखा है। उसने चार हजार वर्षों के धार्मिक इतिहास को भी राजनीतिक इतिहास के साथ लिपिबद्ध किया है। निरपेक्ष चिन्त विद् - कल्हण रूढ़वादी नहीं था। मौलिकता उसके छन्दों में, उसके विचारों में परिलक्षित होती है। वह लकीर का फकीर नहीं था। वह रचना के लिये रचना नहीं कर रहा था। वह जगत को कुछ नवीन स्फूर्तिदायक, सजीव विचार देना चाहता था। इसमें वह सफल हुआ है। कल्हण ने मंगलाचरणों में अन्य कवियों के समान प्रार्थना किंवा याचना नहीं किया है। उसका मंगलाचरण उसके मौलिक विचारों एवं मनोभावनाओं का परिचायक है। वह कर्म पर विश्वास करना चाहता है। पाठकों को कर्मशील बनाकर उन्हें यशस्वी देखना चाहता है। प्रथम तरंग के मंगलाचरण में वह पाठकों के 'यश' की कामना करता है। द्वितीय तरंग के मंगलाचरण में अर्धनारीश्वर के शरीर निर्माण की 'जय' करता है। तृतीय तरंग में पाठकों की 'रक्षा' की कामना करता है। चौथे तरंग में वह 'कल्याण' की कामना करता है। पंचम तथा षष्ठ तरंग में पुनः पाठकों की 'रक्षा' की कामना करता है। सप्तम तरंग में जगत की 'प्रसन्नता' और अष्टम तरंग में 'पापों के नष्ट' करने की कामना करता है। मंगलाचरणों में उसने अपने लिये कुछ याचना नहीं किया है। वह पाठकों के 'यश', 'जय', 'रक्षा' 'कल्याण', 'प्रसन्नता' एवं 'पापक्षय' की कामना करता है। वह कर्म पर विश्वास करना चाहता है। परन्तु- घटना-क्रमों ने, उसके अनहोनेपन ने, उसे दैववादी बना दिया। वह दैवी शक्ति में, भाग्य में, विश्व के तत्का लीन लेखकों के समान विश्वास करने लगा था। (रा० १ : ३२४, २ : ७६, ७७, ७८, ९२, ९३, ३ : १९६, १९७, ४८७, ४९१, ४९३)
[ २४ ] विधाता के विधान के औचित्य की उसने खुलकर आलोचना की है। वह क्षण मात्र के लिये भी भयभीत नहीं हुआ था कि वह उसी की आलोचना कर रहा था । उसे अप्रसन्न कर रहा था, जो उसका भी विधाता था । विधाता क्यों अन्याय होने देता है ? पुण्यात्मा क्यों कष्ट पाता है ? निर्दोष प्राणी क्यों दुःखों, यातनाओं का पात्र बना दिया जाता है ? मानव क्यों मानव पर क्रूरता करता है ? पाशविक वृत्ति का क्यों आश्रय लेता है ? आदि प्रसंगों को उठाकर भगवान की कटु आलोचना करने में वह संकोच नहीं करता । ( रा० ५ : ५४५; ६ : २७५, २७७, १३२९, १४३९; ८ : १६७, २३७, १२७५, १७९० ) विधाता की आलोचना करते-करते कल्हण की लेखनी उपदेशात्मक हो जाती है। जब वह किसी घटना के औचित्य का कोई कारण नहीं दे सकता है तो यह कह कर छुट्टी ले लेता है कि सब विधाता की इच्छा से होता है । ( रा० २ : ९२; ३ : ४९२; ७ : ९१६, १०७०, १७३९, १६२९; ८ : २२०, ६०७, १०३६, १२७४ ) इन स्थानों पर पुराणों एवं महाभारत में माधोपुर की नाग कन्या, परीक्षित, कच, तार्थ्य, द्रोणपुत्र अश्वत्थामा, आदि का उदाहरण उपस्थित कर, विधाता के विधान की पुष्टि कर देता है । अलौकिक एवं विचित्र घटनाओं के घटना का स्पष्टीकरण शब्द प्रमाण से देता है । भाग्यवादी किन्तु कर्म में विश्वास : कल्हण कर्मवाद का समर्थन करते-करते अन्त में भाग्य- वादी बन जाता है। उसने शुभा-शुभ कर्मों और तदनुसार उनके परिणामों में दृढ़ विश्वास प्रकट किया है। वह कहता है—'प्राणी अपने भाग्य की गति बदलने के लिये जिन साधनों का आश्रय लेता है ये ही उसकी भाग्य गति के साधन हो जाते हैं।' इसका उदाहरण उसने जयसिंह, सन्धियमति, कलश, मिहिर कुल तथा उम्मत वन्ती से दिया है । ( रा० ८ : ३४०५, २ : ७७; २ : ६५; ७ : ५०६, १ : ३२५; ५ : ४४८; ७ : ९५९, १२८८, १३७२ ) कल्हण जिस प्रकार प्राणियों को उनके विपत्तियों का कारण प्राक्तन एवं इस जन्म का किया पाप मानता है, उसी प्रकार देश किंवा जनता पर विपत्ति आने का कारण जनता का पाप कर्म मानता है । ( रा० १ . ८७ ४ ३९ ) तथापि जयापीड का उदाहरण देकर वह यह मत उपस्थित करता है कि पुरुषार्थ एवं आत्मविश्वास द्वारा भाग्य पर, दैव पर विजय प्राप्त किया जा सकता है। ( रा० ४ : ४१३ ) वह इस मत का भी प्रतिपादन करता है 'बली अपने बल पर, विश्वास करता है और उसे करना चाहिये । ( रा० ७ • १२८८ ) कर्म तथा पुनर्जन्म में कल्हण विश्वास करता है। मनुष्य के शरीर का तिल जिस प्रकार उसका साथ शरीर भस्म होने तक नहीं त्यागता उसी प्रकार संस्कार एवं कर्म मानव का साथ नहीं त्यागते । मानव अपने पूर्व जन्म के पाप, पुण्य एवं कृते का फल भोगता है। वह अपने पूर्व कर्म का परिणाम ही है। कर्म के कारण, वासना के कारण मानव पुनर्जन्म ग्रहण करता है । ( रा० ३ : १३१, ४२४, ४३० ) भाग्य, कर्म, पुरुषार्थ, आत्म विश्वास सबका निष्कर्ष निकालकर, कल्हण सन्देश देता है—'चाहे कोई भी भाग्य कैसा क्यों न हो, विधाता ने चाहे जो लिख रखा हो केवल आत्म विश्वासी एवं सबल राजा काश्मीर की रक्षा कर सकता है।' धर्म भीरुता : कल्हण की धार्मिक प्रवृत्ति थी। उसने जहाँ भी वही देव स्थान, पूजा, उपासना, वन्दना, देव शृंगार, अर्चना का वर्णन किया है, वहा उसकी भाषा पवित्र प्रभावोत्पादक तथा साफ सुथरी निखरी है । कल्हण गुरु परम्परा में विश्वास करता है । परन्तु अपने गुरु का नाम नहीं देता । हिन्दू परम्परा
[ २५ ] के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को गुरुमुख, गुरुमन्त्र किंवा गुरु दीक्षा के लिये गुरु चयन कर लेना चाहिए। गुरु- पूर्णिमा का पर्व ही गुरु पूजा के लिये अभिहित है। कल्हण अपने किसी शिक्षक का भी नाम नही देता । किन्तु गुरु शब्द का जहाँ भी कही उसने प्रयोग किया है अत्यन्त श्रद्धा के साथ किया है। बुद्ध, वर्ण, त्रिभु- वन, उग्र, आदि के लिये गुरु का प्रयोग कर अपनी श्रद्धा का परिचय दिया है। कल्हण धर्म भीरु था। परिहासपुर के पवित्र वातावरण, विशाल मन्दिरों की श्रृंखला, परिहास, केशव, बुद्ध मन्दिरों आदि मे होते पूजा-पाठ, राग-भोग, सेवा-शुश्रूषा, संगीत, नृत्य, वन्दना, प्रवचन, कथा, नाटक, उत्सवो एव यात्राओ का उस पर बाल्यावस्था से ही प्रभाव पडता आया था। धार्मिक वातावरण में रहने के कारण उसका संस्कार धार्मिक हो गया था। वह हिन्दू तथा बौद्ध दोनों विद्वानों के सम्पर्क में आया था। साधु-संत, योगियो, भिक्षुओं आदि के सान्निध्य के कारण उसमें जगत के प्रति विराग की भावना परि- लक्षित होती है। वह सर्वदा संसार की निस्सारता की ओर पाठको का ध्यान आकर्षित करता है। कल्हण ने राजाओं को उनके पाप के कारण दण्डित होने का क्रमबद्ध उदाहरण उपस्थित किया है। दण्ड देनेवाले राजा को भी दण्ड देने वाली अव्यक्त शक्ति है, इसका उसने उत्तमता के साथ प्रतिपादन किया है। अधर्म द्वारा अर्जित सम्पत्ति पुण्य कार्यों में व्यय करने पर अधर्म का निवारण होता है, कल्हण ने इसका ध्यान सर्वदा राजा तथा जनता को दिलाया है। (४:७०१) क्षण-भंगुरता : कल्हण के वर्णन में जगत की क्षण-भंगुरता की भावना पद-पद पर परिलक्षित होती है। (रा० १:२३) वह जगत की क्षण भंगुरता के कारण भाग्यवादी बन जाता है। तत्कालीन समाज में सुधार तथा गिरते चरित्र को उठता न देखकर वह निराश हो जाता है। भविष्य की घटनाओं पर नियन्त्रण न होने के कारण ने उसे भाग्यवादी बना दिया था। राजनीतिक उथल-पुथल, उलट-फेर, पद- प्राप्ति एवं पदच्युत होना, सांसारिक वैभवों की असारता ने उसे क्षण भंगुरता के सिद्धान्त की ओर आकृष्ट कर दिया था। राज सुख की अनिश्चितता, लक्ष्मी की चंचलता, मानवों की पराश्रयता, पद लोलुपता, विश्वासघात, कृतघ्नता, अकारण क्रूरता, नैतिक नियमों का किंचित् स्वार्थ के लिये उल्लंघन, स्वार्थसिद्धि हेतु उत्पीड़न, घटनाओं का अनजाने घटना, होनी का अनहोनी होना आदि के उदाहरणों के कारण वह क्षणभंगुरता की ओर खिंचता गया है। जीवन का ठिकाना न होना, अल्पायु, अकाल मृत्यु, स्वस्थ का अकस्मात रोग के कारण कालकवलित होना, सभी वस्तुओ का नाश, उनका क्षण-क्षण परिवर्तन, परिस्थितियों से बाधित समस्याओ का विचित्र रूप से खड़े हो जाना आदि का प्रभाव उसके सरल मस्तिष्क पर उसकी शैली में दिखायी देता है। (रा० ५:७) जगत की क्षणभंगुरता का रहस्य अवसर आते ही पाठक पर प्रकट करता है। भगवान बुद्ध का उपदेश—जिसका जन्म हुआ है उसका अन्त होगा और जिसका यन्त होगा उसका पुनः जन्म होगा, जिसका उदय होता है उसका अस्त होगा और सभी धर्मों का कारण कोई हेतु होता है, गर्भ का बालक, युवा होगा, प्रौढ़ होगा। वृद्ध होगा, जन्म जरा, व्याधि एवं अवसान से कोई बच न सकेगा—उसे विराग के साथ ही साथ क्षण भंगुरता की ओर उन्मुख कर दिया है। क्षण भंगुरता का यह दर्शन कल्हण के तात्कालिक जीवन कठोर जीवन के अनुभवों को बताता है। देश-प्रेम : कल्हण की आत्मा काश्मीर के कण-कण मे व्याप्त थी। उसने जहाँ भी कही कश्मीर का उल्लेख किया है वहाँ देश के प्रति श्रद्धा एवं भक्ति अपनी पूर्ण गरिमा में प्रकट हुई है। जहाँ भी कही उसने सम्राट कनिष्कादि से काश्मीर भूमि को प्रणाम कराया है वह स्थल संस्कृत साहित्य में भाव-व्यंजना की दृष्टि ४
[ २६ ] से अत्यन्त उच्चकोटि का हुआ है । ( रा० १ : २६-७२ ) राजा युधिष्ठिर तथा उसकी रानियाँ कश्मीर भूमि का अन्तिमदर्शन कर विदा होती हैं तो देश प्रेम, देश वियोग का जो करुण चित्रण कल्हण ने किया है वह विश्व-इतिहास के किसी भी साहित्य की अमूल्य निधि मानी जायगी । ( रा० १ : ३६६-६७३ ) कश्मीर के लिये कल्हण ने माता शब्द का प्रयोग किया है । ( रा० ३ : ८६ ) उसने कश्मीर मण्डल के लिये 'काव्य' शब्द का उल्लेख किया है। उसने कश्मीर देश तथा भूगोल वर्णन आख्यान मे मिला दिया है । पुण्यभूमि कश्मीर की गरिमा इतनी श्रद्धाभक्ति के साथ प्रकट की है कि उसे पढ़कर रोमांच हो जाता है । ( रा० १ : ४३ ) उसकी देश भक्ति उस समय पराकाष्ठा पर पहुँच जाती है जब भगवान् श्रीकृष्ण के मुख से एक पुरातन पुराण वचन उद्धृत कराया है—'कश्मीर पार्वती स्वरूप है और यहाँ का राजा हर का अंश है।' ( रा० १ : ७२ ) कृष्ण गोनन्द तथा दामोदर युद्ध का वर्णन, कश्मीर सेना का अभियान प्रेरणा एवं स्फूर्तिप्रद पद कहे जायेंगे । ( रा० १ : ५७-५८ ) । कश्मीर की अजेय शक्ति पर गर्व करता कल्हण कहता है—'कश्मीर पर बल द्वारा नहीं केवल पुण्य द्वारा विजय प्राप्त की जा सकती है । यहाँ के निवासी केवल परलोक से भयभीत होते हैं न कि शस्त्रधारियों से ।' उसने विश्व को चुनौती दी है। चार सहस्र वर्षों से स्वाधीनता का भोग करने वाले कश्मीरी कभी बाहरी शक्ति के सम्मुख न झुकने वाले कश्मीरी, शस्त्रों के सम्मुख कभी मस्तक नहीं झुकाये थे । (रा० १ : ३९)। किन्तु उसने कश्मीरियों के उत्तरकालीन भीरुता, पक्षपात, दुराग्रह, कलह, अर्थहीन, संघर्ष क्षुद्रता, हृदयदौर्बल्य, सैनिकों की कायरता, विश्वासघात आदि का निःसंकोच वर्णन एवं निन्दा की है। ब्राह्मण के दोषों की खुलकर निन्दा तथा राजपूतों के वीरता की प्रशंसा की है । ( रा० ३ : ४२५ ) देश के चरित्र की राष्ट्रीय दुर्बलताओं का ध्यान रखते हुए भी उसे विश्वास था कि उसका काव्यमय इतिहास तत्कालीन एवं भविष्य के राजाओं, देशभक्तों को कश्मीर के महान राजाओं का, महान व्यक्तियो में तथा महान पूर्वजों की श्रेणियों मे बैठाने योग्य बनायेगा । कश्मीर की सुरक्षा भावना के प्रति कल्हण विशेष जागरूक था । उसने यही संदेश दिया था— 'कश्मीर यदि अरक्षित हो गया तो सब कुछ नष्ट हो जायगा।' अशोक जैसे सम्राट ने कश्मीर की म्लेच्छों से रक्षा हेतु जलोक पुत्र की प्राप्ति के लिये तपस्या की थी । ( रा० १ : १०७ ) जलोक ने उज्झट डिम्ब स्थान पर म्लेच्छों का संहार किया था । ( रा० १ : ११६ ) कश्मीर ने यह सतर्कता त्याग दी तो उसे सबकुछ से हाथ धोना पड़ा । इतिहास : इतिहास की महत्ता प्राचीन काल से रही है। वेदो का भाष्य करते समय ऋषियों ने बार-बार प्राचीन 'ऐतिह्यो' पर ध्यान आकृष्ट किया है। विश्व के विद्वानो ने संस्कृत वाङ्मय की सर्वांग परिपूर्णता से प्रभावित होकर उसकी प्रशंसा की है। किन्तु डा० कीथ आदि पाश्चात्य विद्वानो ने 'ऐतिहास' बुद्धि का भारतीयों में अभाव होना लिखा है । उनका मत है, प्राचीन भारत मे इतिहास लिखने की पर- म्परा नहीं थी । इतिहास के रूप में लोग इतिहास से अपरिचित थे । किन्तु भारत मे इतिहास का लक्षण कुछ अपना था । उसके अनुसार इतिहास का प्रणयन होता रहा है । छान्दग्योपनिषद में नारद : सनत्कुमार संवाद में इतिहास, पुराण पंचम वेद है। इस संकेत से इतिहास अध्ययन की बात सुस्पष्ट कही गयी है। यास्क ने निरुक्त में 'इति ऐतिहासिका' कहकर पुरा वृत्तियों का स्मरण किया है ।
[ २७ ]
वेदों के आख्यानों में ऐतिहासिकता है । तिथि तथा वर्ष के अभाव में उसकी उपेक्षा कर दी जाती है । प्राचीन काल में 'ऐतिह्य बुद्धि की सत्ता स्वीकार की गयी है । वही कालान्तर में परिवर्तित होकर इतिहास के रूप में आज वर्त्तमान है । प्राचीन भारत में इतिवृत्त को रस के अनुकूल परिवृत्त कर काव्य के रूप में ग्रथित करने की प्रथा थी । उनके परिणामस्वरूप अनेक ऐतिहासिक नाटक एवं महाकाव्यों की रचना की गयी । कौमुदी महोत्सव से गुप्त कालीन इतिहास पर प्रकाश पड़ता है । बाण प्रणीत हर्षचरित में हर्ष के इतिहास का निर्विवाद निर्णय प्राप्त होता है । प्रवरसेन का प्राकृत भाषा में ग्रथित ऐतिहासिक महाकाव्य सेतुबन्ध प्रख्यात काव्य है । कान्यकुब्जाधिपति आश्रित वाक्पति राज ने ऐतिहासिक काव्य गउडवहो लिखा है। वादिराज ने यशोधर चरित लिखा है । वह ऐतिहासिक एवं धार्मिक दृष्टि से सुन्दर काव्य है । कल्हण ने स्वयं शंखुक कृत भुव- नाभ्युदय का उल्लेख किया है। यह अप्राप्य ग्रन्थ है । उसमे मम्मोट्पल के युद्ध का सुन्दर वर्णन है । पद्मगुप्त परिमल का नव साहसांक चरित ऐतिहासिक दृष्टि से विशेष महत्व रखता है। हेम चन्द्र का 'द्वयाश्रय' काव्य ऐतिहासिक है। मंखक का श्री कंठ चरित तथा जल्हण प्रणीत सोमपाल चरित इतिवृत्त परक काव्य है । रामपाल चरित, विक्रमांकाभ्युदय चरित, पृथ्वीराज विजय, जयन्त विजय, सुकृत संकीर्तन, हम्मीर मद मर्दन, वसन्त विलास, सुरथोत्सव, कीर्ति कौमुदी, भोट्टपराज, चन्द्रप्रभा आदि ग्रन्थो में प्रचुर ऐतिहासिक सामग्री मिलती है । इस प्रकार इतिहास को आधारभित्ति बनाकर काव्य की रचना करने वाले कवियों की एक विशाल परम्परा है । ऐतिहासिक महाकाव्य के प्रणेताओं में महाकवि विल्हण का नाम उल्लेखनीय है । उसने चालुक्य वंशीय विक्रमादित्य षष्ठ को अपने महाकाव्य का नायक बनाकर अमर कर दिया है । इतिवृत्त मिश्रित काव्यकर्ता अनेक हुये हैं । किन्तु इतिवृत्त को प्रधान बनाकर रचना करने वाले और तिथि वर्ष का सम्यक् उल्लेख करने वाले कवियों की परम्परा कुछ क्षीण रही है। जो थे उनके ग्रन्थ अबतक प्रकाश में नहीं आये हैं। उनका केवल नाम मात्र अवशिष्ट है । राजतरंगिणी एक सच्चे इतिहास- कार की कृति है । कल्हण सहृदय कवि है । उसने इतिहास को भी पूर्ण रूपेण काव्यमय बनाने का प्रयास किया और सफल हुआ है। यदि कवि की प्रतिभा का मूल्यांकन किया जाय कि वह कहाँ तक कवि है और कहाँ तक इतिहासकार तो किसी एक निश्चय पर पहुँचना कठिन प्रतीत होता है । कवि एवं इतिहास- कार जिस दृष्टि से विचार किया जाय कल्हण को दोनों में पारंगत पाते हैं। यह ऐतिहासिक एवं महाकाव्य- कार दोनों है । उसका योगदान महत्त्वपूर्ण है । उसने राजाओ के काल, समय एवं स्थानो को जो अस्थिर थे, अनियमित थे, निश्चित नहीं थे, उन्हें निश्चित एवं स्थिर किया है । पाठकों की उदात्त भावनाओं को जागृत किया है। उसने नीति वचनों या प्रयोग कर काव्य को हलका बनाने की अपेक्षा गम्भीर एवं उपदेशात्मक बना दिया है । कल्हण ने वेद की इस महत्त्वपूर्ण परंपरा मे रचना का उत्तरदायित्व उठाया था। उसकी आरम्भ की गयी परम्परा आगामी पाँच शताब्दियों तक चलती रही। उसने जिस तरंगिणी को जीवन दिया था उसे जोनराज, श्रीवर, प्रजाभट्ट एवं शुक काश्मीर में प्रथम बार विदेशी मुगल शासन स्थापित होने तक कायम रखे । विश्व इतिहास में ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलता कि इतिहास लिखने की परम्परा एक ही पुस्तक या लेखन-क्रम पाँच शताब्दियों तक अविच्छिन्न गति से चलता रहा। यह तरंगिणी उसी समय सूखी जब काश्मीर की स्वाधीनता भी सूख गयी । कौटिल्य की परिभाषानुसार राजतरंगिणी इतिहास है। कौटिल्य ने इतिहास में पुराण, इतिवृत्त,
[ २६ ]
से अत्यन्त उच्चकोटि का हुआ है । ( रा० १ : २६-७२ ) राजा युधिष्ठिर तथा उसकी रानियाँ कश्मीर भूमि का अन्तिमदर्शन कर विदा होती है तो देश प्रेम, देश वियोग का जो करुण चित्रण कल्हण ने किया है यह विश्व-इतिहास के किसी भी साहित्य की अमूल्य निधि मानी जायगी । ( रा० १ : ३६६-३७३ ) कश्मीर के लिये कल्हण ने माता शब्द का प्रयोग किया है । ( रा० ३ : ८६ ) उसने कश्मीर मण्डल के लिये 'काम्ब्य' शब्द का उल्लेख किया है । उसने कश्मीर देश तथा भूगोल वर्णन आपस में मिला दिया है । पुण्यभूमि कश्मीर की गरिमा इतनी श्रद्धाभक्ति के साथ प्रगट की है कि उसे पढ़कर रोमांच हो जाता है । ( रा० १ : ४३ ) उसकी देश भक्ति उस समय पराकाष्ठा पर पहुँच जाती है जब भगवान् श्रीकृष्ण के मुख से एक पुरातन पुराण वचन उद्धृत कराया है—'कश्मीर पार्वती स्वरूप है और यहाँ का राजा हर का अंश है ।' ( रा० १ : ७२ ) कृष्ण गोनन्द तथा दामोदर युद्ध का वर्णन, कश्मीर सेना का अभियान प्रेरणा एवं स्फूर्तिप्रद पद कहे जायेंगे । ( रा० १ : ५७-५८ ) । कश्मीर की अजेय शक्ति पर गर्व करता कल्हण कहता है—'कश्मीर पर बल द्वारा नही केवल पुण्य द्वारा विजय प्राप्त की जा सकती है । यहाँ के निवासी केवल परलोक से भयभीत होते हैं न कि शस्त्रधारियों से ।' उसने विश्व को चुनौती दी है। चार सहस्र वर्षों से स्वाधीनता का भोग करने वाले काश्मीरी कभी बाहरी शक्ति के सम्मुख न झुकने वाले काश्मीरी, शस्त्रों के सम्मुख कभी मस्तक नहीं झुकाये थे । (रा० १ : ३९)। किन्तु उसने काश्मीरियों के उत्तरकालीन मोहता, पक्षपात, दुराग्रह, कलह, अर्थहीन, संघर्ष क्षुद्रता, हृदयदौर्बल्य, सैनिकों की कायरता, विश्वासघात आदि का निःसंकोच वर्णन एवं निन्दा की है । ब्राह्मण के दोषों की खुलकर निन्दा तथा राजपूतों के वीरता की प्रशंसा की है । ( रा० ३ : ४२५ ) देश के चरित्र की राष्ट्रीय दुर्बलताओं का ध्यान रखते हुए भी उसे विश्वास था कि उसका काव्यमय इतिहास तत्कालीन एवं भविष्य के राजाओं, देशभक्तों को कश्मीर के महान राजाओं का, महान व्यक्तियों में तथा महान पूर्वजों की श्रेणियों में बैठाने योग्य बनायेगा । कश्मीर की सुरक्षा भावना के प्रति कल्हण विशेष जागरूक था । उसने यही संदेश दिया था— 'कश्मीर यदि अरक्षित हो गया तो सब कुछ नष्ट हो जायगा ।' अशोक जैसे सम्राट ने कश्मीर की म्लेच्छों से रक्षा हेतु जलोक पुत्र की प्राप्ति के लिये तपस्या की थी । ( रा० १ : ७७ ) अलोक ने उज्जाट डिम्ब स्थान पर म्लेच्छों का संहार किया था । ( रा० १ : ११६ ) कश्मीर ने यह सतर्कता त्याग दी तो उसे सबकुछ से हाथ धोना पड़ा । इतिहास : इतिहास की महत्ता प्राचीन काल से रही है । वेदों का भाष्य करते समय ऋषियों ने वार-वार प्राचीन 'ऐतिह्यो' पर ध्यान आकृष्ट किया है । विश्व के विद्वानो ने संस्कृत वाङ्मय की सर्वांग परिपूर्णता से प्रभावित होकर उसकी प्रशंसा की है । किन्तु श्री कीथ आदि पाश्चात्य विद्वानो ने 'ऐतिह्य' बुद्धि का भारतीयों में अभाव होना लिखा है । उनका मत है, प्राचीन भारत में इतिहास लिखने की पर- म्परा नही थी । इतिहास के रूप मे लोग इतिहास से अपरिचित थे । किन्तु भारत में इतिहास का लक्षण कुछ अपना था । उसके अनुसार इतिहास का प्रणयन होता रहा है । छान्दग्योपनिषद में नारद : सनत्कुमार संवाद मे इतिहास, पुराण पंचम वेद है । इस संकेत से इतिहास अध्ययन की बात सुस्पष्ट कही गयी है । यास्क ने निरुक्त में 'इति ऐतिहासिका' कहकर पुरा वृत्तियों का स्मरण किया है ।
[ २७ ] वेदों के आख्यानों में ऐतिहासिकता है । तिथि तथा वर्ष के अभाव में उसकी उपेक्षा कर दी जाती है । प्राचीन काल में 'ऐतिह्य बुद्धि की सत्ता स्वीकार की गयी है । वही कालान्तर में परिवर्तित होकर इतिहास के रूप में आज वर्त्तमान है । प्राचीन भारत में इतिवृत्त को रस के अनुकूल परिवृत्त कर काव्य के रूप में ग्रथित करने की प्रथा थी । उनके परिणामस्वरूप अनेक ऐतिहासिक नाटक एवं महाकाव्यों की रचना की गयी । कौमुदी महोत्सव से गुप्त कालीन इतिहास पर प्रकाश पड़ता है । बाण प्रणीत हर्षचरित में हर्ष के इतिहास का निर्विवाद निर्णय प्राप्त होता है । प्रवरसेन का प्राकृत भाषा में ग्रथित ऐतिहासिक महाकाव्य सेतुबन्ध प्रख्यात काव्य है । कान्यकुब्जाधिपति आश्रित वाक्पति राज ने ऐतिहासिक काव्य गउडवाहो लिखा है । वादिराज ने यशो- धर चरित लिखा है । वह ऐतिहासिक एवं धार्मिक दृष्टि से सुन्दर काव्य है । कल्हण ने स्वयं शंखुकुक कृत भुव- नाभ्युदय का उल्लेख किया है । यह अप्राप्य ग्रन्थ है । उसमे मम्मोटपल के युद्ध का सुन्दर वर्णन है । पद्मगुप्त परिमल का नव साहसांक चरित ऐतिहासिक दृष्टि से विशेष महत्व रखता है। हेम चन्द्र का 'द्वयाश्रय' काव्य ऐतिहासिक है । मंखक का श्री कंठ चरित तथा जल्हण प्रणीत सोमपाल चरित इतिवृत्त परक काव्य है । रामपाल चरित, विक्रमाङ्काभ्युदय चरित, पृथ्वीराज विजय, जयन्त विजय, सुकृत संकीर्तन, हम्भीर मद मर्दन, वसन्त विलास, सुरतोत्सव, कीर्ति कौमुदी, भोट्टपराज, चन्द्रप्रभा आदि ग्रन्थों में प्रचुर ऐतिहासिक सामग्री मिलती है । इस प्रकार इतिहास की आधारभित्ति बनाकर काव्य की रचना करने वाले कवियों की एक विशाल परम्परा है । ऐतिहासिक महाकाव्य के प्रणेताओं में महाकवि विल्हण का नाम उल्लेखनीय है । उसने चालुक्य वंशीय विक्रमादित्य षष्ठ को अपने महाकाव्य का नायक बनाकर अमर कर दिया है । इतिवृत्त मिश्रित काव्यकर्त्ता अनेक हुये हैं । किन्तु इतिवृत्त को प्रधान बनाकर रचना करने वाले और तिथि वर्ष का सम्यक् उल्लेख करने वाले कवियों की परम्परा कुछ क्षीण रही है । जो थे उनके ग्रन्थ अबतक प्रकाश में नहीं आये है । उनका केवल नाम मात्र अवशिष्ट है । राजतरंगिणी एक सच्चे इतिहास- कार की कृति है । कल्हण सहृदय कवि है । उसने इतिहास को भी पूर्ण रूपेण काव्यमय बनाने का प्रयास किया और सफल हुआ है । यदि कवि की प्रतिभा का मूल्यांकन किया जाय कि वह कहाँ तक कवि है और कहाँ तक इतिहासकार तो किसी एक निश्चय पर पहुँचना कठिन प्रतीत होता है । कवि एवं इतिहास- कार जिस दृष्टि से विचार किया जाय कल्हण को दोनो में पारंगत पाते हैं । वह ऐतिहासिक एवं महाकाव्य- कार दोनों है । उसका योगदान महत्त्वपूर्ण है । उसने राजाओं के काल, समय एवं स्थानों को जो अस्थिर थे, अनियमित थे, निश्चित नहीं थे, उन्हें निश्चित एवं स्थिर किया है । पाठकों की उदात्त भावनाओं को जागृत किया है । उसमे नीति वचनों का प्रयोग कर काव्य को हल्का बनाने की अपेक्षा गम्भीर एवं उपदेशात्मक बना दिया है । कल्हण ने वेद की इस महत्त्वपूर्ण परंपरा में रचना का उत्तरदायित्व उठाया था । उसकी आरम्भ की गयी परम्परा आगामी पाँच शताब्दियों तक चलती रही । उसने जिस तरंगिणी को जीवन दिया था उसे जोनराज, श्रोवर, प्रजाभट्ट एवं शुक काश्मीर में प्रथम बार विदेशी मुगल शासन स्थापित होने तक कायम रखे । विश्व इतिहास में ऐसा कोई उदाहरण नही मिलता कि इतिहास लिखने की परम्परा एक ही पुस्तक का लेखन-क्रम पाँच शताब्दियो तक अविच्छिन्न गति से चलता रहा । यह तरंगिणी उसी समय सूखी जब काश्मीर की स्वाधीनता भी सूख गयो । कौटिल्य की परिभाषानुसार राजतरंगिणी इतिहास है । कौटिल्य ने इतिहास में पुराण, इतिवृत्त,
आख्यायिका, उदाहरण, धर्म एवं अर्थशास्त्र का समावेश किया है । जैन आदि पुराण इतिहास की परिभाषा करता है—जो हुआ है वही इतिहास है । हर्ष चरित, गउड वाहो, नव साहसांक चरित, विक्रमांक देवचरित, कुमारपाल चरित आंशिक इतिहास है । कल्हण के पश्चात् पृथ्वीराज विलास, सोमपाल विलास, कृति कौमुदी, प्रभावक चरित, सुकृत संकीर्त्तन तथा प्रबन्ध चिन्तामणि, इसी प्रकार की रचनायें है । इनमे कुमारपाल, वस्तुपाल, रामपाल, विक्रमादित्य, सिन्धुराज का उल्लेख है । हिन्दी ग्रन्थों मे पृथ्वीराज रासो, बीसल देव रासो आदि भी आंशिक इतिहास ग्रन्थ है । पूर्व महाभारत कालीन इतिहास ग्रन्थ नही मिलते । कल्हण इसलिए अपना इतिहास महाभारत काल से आरम्भ करता है । काश्मीर में आर्यों के पूर्व नाग एवं पिशाच रहते थे । कल्हण जलोद्भव असुर के वध की कथा पौराणिक शैली से देकर, काश्मीर उपत्यका को बारहमूला के समीप से जल निकालकर, उसके सूखी भूमि हो जाने के समय तथा तुरन्त उसके पश्चात् गोनन्द प्रथम का उपाख्यान आरम्भ कर देता है । ( रा० १ २६-२७; ५९-७३ ) इतिहास प्रयोजन : कल्हण इतिहास रचना का कारण उपस्थित करता है । पूर्व कालीन इतिहास- ग्रन्थो का नाम नही देता । केवल कहता है--पूर्व कालीन इतिहास ग्रन्थ विस्तृत थे । सुव्रत ने विस्तृत इतिहास ग्रन्थ को संक्षिप्त किया । ( रा १ : ११-१२ ) अतएव प्राचीन इतिहास लुप्त हो गये, छिन्न हो गये । गोनन्द तृतीय के परवर्ती ५२ महीपति, जो कलियुग में कौरव एवं पाण्डवो के समकालीन थे, उनका लेखा लुप्त हो गया है । ( रा० १ : १६, ४४) कवि क्षेमेन्द्र ने नृपावली की रचना की । वह काव्य रचना है । किन्तु अनवधानता के कारण उसमें इतनी त्रुटियाँ रह गयी हैं कि उसका कोई भी अंश निर्दोष नहीं कहा जा सकता था । (रा० १ : १३) यह ग्रन्थ अभी तक प्रकाश में नही आया है । पाशुपत व्रती हेला राज मे १२ सहस्र श्लोकों की 'पार्थिवावली' लिखी । ( रा० १ : १७ ) तत्पश्चात् पद्ममिहिर ने हेलाराज की रचना का अध्ययन कर अशोक के पूर्ववर्ती आठ राजाओ का वर्णन किया है । (रा० १ : १८) इस इतिहास का कल्हण नाम नही देता । श्री छविलाकर ने अशोक के पश्चात् जिन पांच राजाओ का वर्णन किया है वे लुप्त बावन राजाओ में से हैं । (रा० १ : १६) भी छविलाकर के इतिहास का नाम कल्हण नही देता । गोनन्दादि चार राजाओं का वर्णन नीलमत पुराण से लिया गया है । (रा० १ : १६) कल्हण के समय तक राजकथा विषयक ग्यारह ग्रन्थ थे । (रा० १ ० १४) कल्हण उन ग्रन्थो का नाम नही देता । कल्हण ने सुव्रत के इतिहास का भी नाम नही दिया है । कल्हण ने अपने रचना-स्रोत का भी उल्लेख किया है । (रा० १ : १५) प्रारम्भिक तरंग अनुश्रुतियों पर आधारित है । ललितादित्य की मृत्यु का वर्णन उसने अनुश्रुति के आधार पर किया है । (रा० ४ : ३६७- ३७१) यशस्कर की मृत्यु का उल्लेख भी अनुश्रुति के आधार पर किया है । (रा० ६ : ६०, ११३) वह अपने इतिहास लिखने का उद्देश्य स्वयं देता है--'इस ग्रन्थ को लिखने की मेरी यह योजना है कि मैं सर्वांगीण, पूर्ण क्रमबद्ध इतिहास उपस्थित करूँ जहाँ पुरातन इतिहास-लेखको की रचनायें विश्रृंखलित हैं।' (रा० १ : १०) काश्मीर महाभारत काल से कल्हण तथा उसके पश्चात् अकबर के समय तक किसी विदेशी सेना से पदाक्रान्त नही हुआ था । सन् १३२६ ई० में अन्तिम हिन्दू शासिका कोटा रानी को हटाकर शाह मीर काश्मीर का राजा बना, काश्मीर मुसलमान धर्म में परिवर्तित हो गया परन्तु काश्मीर में काश्मीरो मुसल- मानों का ही शासन रहा । काश्मीर प्रकृति की सुषमा में सुरभित रहा । यदि कल्हण के मत में ४२२५ वर्षों
[ २९ ] के गौरवमय इतिहास लिखने की कल्पना उदय हुई तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है। उसने कारण भी दिया है। उसने अनुभव किया था कि कितने ही काश्मीर के राजा विस्मृति सागर में डूब गये थे। कवियों की कृति के कारण कुछ की स्मृति शेष रह गयी थी। कवि या रचनाकार अपनी रचनाओं के कारण स्वयं जीवित रहता है और दूसरों को भी जीवित रखता है। राजकीय पद एवं चकाचौंध में रहने वाले महामात्यों, मन्त्रियों, सेनानायकों की असंख्य संख्या लोप हो चुकी है। किन्तु कल्हण स्वयं जीवित रहना चाहता था। इसमें निःसन्देह वह सफल हो पाया है। वह इसलिये भी जीवित रह पाया है कि संस्कृत साहित्य में सवा चार हजार वर्षों का एक मात्र उसका इतिहास प्राप्य है। उसने विश्व में भारतीयों को इस कलंक से मुक्त किया है कि भारतीयों को इतिहास लिखने का ज्ञान नहीं था। और भारतीय साहित्य में कोई इतिहास नहीं है। कुछ अभाव : कल्हण की राजतरंगिणी में कुछ अभाव खटकता है। आश्चर्य है उसने भारत पर सिकन्दर के आक्रमण, पोरस के साथ युद्ध, चन्द्रगुप्त मौर्य, समुद्र गुप्त, स्कन्द गुप्त, शशांक, नरेन्द्र गुप्त, पुल- केशी तथा नागभट्ट जैसे महान भारतीय आत्माओं का उल्लेख नहीं किया है। दार्शनिकों में शंकराचार्य का भी उसने उल्लेख नहीं किया है। इसी प्रकार लिच्छवी, वज्जी, पंजाब के अनेकानेक गणतन्त्र, मालव, औधेय, आदि का राजतरंगिणी में उल्लेख न होना एक समस्या उपस्थित कर देता है। सीमान्त प्रदेश पर यूनानियों के साथ संघर्ष, अफगानिस्तान आदि में यूनानियों की राज्य स्थापना, ईरान, अफगानिस्तान तथा तुर्किस्तान में पुराने धर्म के स्थान पर मुस्लिम धर्म का उदय, उन देशों में पुरातन राजवंशों का पतन तथा नवीन सल्तनतों का कायम होना, ये ऐसी घटनायें हैं जिनके ज्ञान की अपेक्षा पाठक कल्हण से करता है। ललितादित्य तथा जयापीड ने भारतवर्ष में क्या महत्वपूर्ण कार्य किया, इस पर कल्हण शान्त है। वह अपना ज्ञान अवन्ती तथा कन्नौज के राजाओं तक एक प्रकार से सीमित कर देता है। अन्य राजाओं का केवल उल्लेख मात्र उसने किया है। इसके दो ही स्पष्टीकरण हो सकते हैं : कल्हण को कोई तत्कालीन प्रामाणिक ऐतिहासिक ग्रन्थ प्राप्त नहीं था। काश्मीर में जो लोग मुस्लिम आतंकों से भागकर आये, उनके पास शास्त्रीय एवं काव्य-ग्रन्थ थे। दूसरी बात यह भी हो सकती है कि सहस्रों वर्ष की घटनायें लोग भूल गये थे। वे लिपिबद्ध नहीं थे। इसमें से कुछ घटनाओं एवं व्यक्तियों के विषय में यह कहा जा सकता है कि यद्यपि पूरे भारत के इतिहास के लिए उनका महत्व स्पष्ट है, केवल कश्मीर के सीमित दृष्टिकोण में देखने पर उनका कोई भी स्थान नहीं निर्धारित किया जा सकता। संभवत इसी कारण कल्हण इनके विषय में मौन है। दृष्टिकोणः कल्हण प्रगतिशील था। जड़ता से दूर था। रूढ़ियों में बँधा नहीं था। धार्मिक संकीर्णता, जातीय असहिष्णुता से ऊपर उठा था। उसका दृष्टिकोण आधुनिक जैसा था। उसने एक मनोरंजक काल- क्रम से ऐतिहासिक तालिका प्रस्तुत किया है। उसने घटनाक्रमों से व्यापक निष्कर्ष निकाल कर, व्यापक सिद्धान्तों को काव्यमयी भाषा में प्रस्तुत किया है। कल्हण का दृष्टिकोण स्थानीय लगेगा। यह काश्मीरियों की प्रवृत्ति उनके प्रदेश के एकाकीपन के कारण हो गयी है। काश्मीर का समस्त जीवनक्रम ही जैसे एकाकी जीवनवृत्त है। उसकी दृष्टि जैसे कश्मीर उपत्यका को घेर कर खड़ी पर्वत-मालाओं से बाहर नहीं जाना चाहती। काश्मीरियों की यह मानसिक स्थिति पुराकाल में भी थी और आज भी है। कल्हण की दृष्टि बाहर भी गई है। भारतीय साहित्यिक कृतियों के साथ साथ उसे समकालीन भार- तीय इतिहास का भी ज्ञान था। उसने काश्मीर के बाहर की घटनाओं एवं राजाओं का उल्लेख किया है।
प्रथम तरङ्ग: गोनन्द-१ से अन्ध-गोनन्द तक प्राचीन राजवंश
[ ३० ] उनकी न तो प्रशंसा की है और न आलोचना । यह पुराणों तथा महाभारत के समान समकालीन राजाओं की तुलना नही करता । राजतरंगिणी गिबन के डिक्लाइन एण्ड फाल ऑफ रोमन इम्पायर तथा वाल्टेयर के इतिहास तुल्य नही है । यह काव्य है । होमर वा तथा अश्चाइलस की रचनाओं के तुल्य अमर काव्य है । कल्हण ने काश्मीर को लुप्त होने से बचा लिया है । पुराकालीन इतिहास को लुप्त होने से बचाया । उसने काश्मीर को अन्धकार युग की गाथा मात्र उसी प्रकार होने नही दिया है जिस प्रकार होमर ने यूनान को । उसने पूरा काल को सुनिश्चित इतिवृत्त से मिश्रित किया है । उस दृष्टि से संस्कृत का कोई अन्य लेखक किंवा आलोचक इतिहासकार नही कहा जा सकता । सहस्रो वर्षों के पूर्व कालीन इतिहास को उसने जीवित रखा है। मख के शब्दों में कल्हण कथा उपाख्यान उत्साह से पढ़ता था । उत्साह से उसने उनका वर्णन भी किया है । मम्मट के अनुसार काव्य का उद्देश्य लोगों को व्यवहारविद् बनाना है । काव्य की वाणी आत्मा है । काव्य का भाव रस है । विद्या का प्रयोजन विनय है । कल्हण के पदों में विनय परिलक्षित होता है । उसने अपने इतिहास काव्य में कथा, उपाख्यान, चमत्कारादि का मिश्रण कर महाकाव्य के साथ उसे रोचक बना दिया है । पुरा कालीन लेखक चाहे पश्चिम के हों अथवा पूर्व के वे पुरावृत्त, गाथा, कथाओं तथा इति- हास के बीच कोई विभाजन रेखा नहीं खींच सके थे । कल्हण ने इन बातों से हटकर वैज्ञानिक दृष्टि से इतिहास रचना का प्रयास किया है । वह आधुनिक शैली एवं पुरानी शैली के बीच की कड़ी है । राजतरं- गिणी शुष्क ऐतिहासिक ग्रन्थ नहीं है । वह रसमय है । उसके पढ़ने से मन ऊबता नही । वह घटना-क्रमों का संग्रह मात्र नहीं है। उसमें इतिहास के साथ रामायण, महाभारत जैसे कथा प्रसंगों के सहित पुराणों जैसी धार्मिक झुकान एवं रोचकता है । प्रचार एवं उपदेशात्मक ग्रन्थ : कल्हण ने काश्मीर की शोचनीय दशा एवं अव्यवस्थित व्यवस्था ठीक करने के लिये राजतरंगिणी की रचना की थी । वह लिखता है—यह भूमि जो कुलवधू के समान थी वह वेश्या के समान दुष्टो के हाथो में पड़ गयी है । अब से जो कुचक्रो में निपुण होगा वही इस हतप्रभ राज्य को प्राप्त करने की आशा करेगा । ( रा० ७ : १४१६, १४२० ) वह जब काश्मीर के पुराकालीन इतिहास की तत्कालीन इतिहास से तुलना करता था तो उसका हृदय रो उठता था । अतएव उसने मानव प्रकृति की अप्रत्याशित रूप से चित्रित किया है । ( ७ : ७९२ ) कल्हण अपने इतिहास की परम्परा काश्यप ऋषि से जोड़ता है । उनके समय से अपने समय की तुलना करता है । वह दुःखी होकर कहता है—'यह पृथ्वी काल की बलवत्ता के कारण शीघ्रतापूर्वक संकु- चित हो रही है।' उसका स्वर्ण युग भूतकाल में था । वह करुण शब्दो में कहता है--कोई प्राचीन राजाओ के समान नही हो सकता ।' ( रा० ४ : ४०७ ) कल्हण काश्मीर के राजा को 'दुरात्मज' कह चुका था अत- एव उसने काश्मीर के राजाओं के दोषो का कारण उनके पूर्व जन्म के दोषो को दिया है। (रा० ३ : ४१४) जयसिंह जिसके राज्यकाल में वह अपनी रचना कर रहा था उसे कल्हण ने पुराकालीन राजाओं के तुल्य माना है । कल्हण काश्मीर में शक्तिशाली एवं उदार राजा चाहता था । जो बिगड़े घर को सुधार सके और बने घर को बढ़ा सके । जनता के प्रति स्नेह एवं सहानुभूति प्रदर्शन कर सके । उसने यह विचार देवी वाक्- पुष्टा तुंजीन तथा मेघवाहन के प्रसंग में प्रकट किया है । ( त० २ · ३१-४९ ) वह कहता है, राजाओं को पृथ्वी का पालन नववधू तुल्य करना चाहिए । ( रा० २ : ८ )
[ ३१ ] राजतरंगिणी के विषय में कल्हण स्वयं लिखता है--'राजाओं के विकास एवं ह्रास के समय मेरी कथा देशकाल के अनुसार उनके लिये उत्साह किंवा शान्तिवर्धक तुल्य उपयोगी सिद्ध होगी । कौन ऐसा चेतन हृदय व्यक्ति होगा जो अनंत व्यवहारो से पूर्ण मेरे इस ग्रन्थ को हृदयंगम नही करेगा ।' ( रा० १ : २१, २२ ) उसने अपने समय के लोगो के पठन-पाठन हेतु काव्य लिखा था। जो स्वतः काश्मीर की पर- म्पराओ, घटनाओं, प्रचलनों आदि से परिचित थे । कल्हण ने उनके मार्ग-दर्शन हेतु अपने विचारो को स्वतंत्र रूप से राजनीतिज्ञ राजा, जनता, राजन्य वर्ग, कर्म स्थानीय जन, मंत्री, पुरोहित, अमात्य, सचिव सबके लिए लिखा था । उसे विश्वास था कि उसके इतिहास के पठन-पाठन से भविष्य के राजाओ की परम्परा अच्छी होगी । वे आदर्श राजा होगे । जनता का मनोबल उठेगा । आदर्श सम्राट एवं राजा : कल्हण के आदर्श शासक अशोक, कनिष्क ओर मेघवाहन थे । अशोक उदार सम्राट था । कनिष्क जन हितैषी राजा था । मिहिरकुल क्रूर राजा था । मेघवाहन आदर्श राजा था । भिक्षाचर, कलश तथा हर्ष कल्हण के समय महान पुरुषों के समान स्मरण किये जाते थे । ( ७ : ५६९, १०६६ ) कश्मीर के भूपाल पृथ्वोपति पृथ्वीपाल कल्हण की दृष्टि में सामान्य लघु पर्वतीय राजा नही थे । वे अपने लघु साधनों द्वारा साम्राज्य नही बना सके थे किन्तु कल्हण काश्मीर के राजाओं को शक्तिशाली राष्ट्र का राजा मानता था जिसके राजा पूर्व काल में भारत विजय दिग्विजय किये थे । ( रा० १ : २९७, ३३९, ३ : ३५०, ४ . १३१७ ) कल्हण का आदर्श सार्वभौम राज्य था । ( रा० ३ : ८०, ८१ ) जनता का अधिकार : काश्मीर मे गणतन्त्र नही था । भारत में गणतन्त्रों का लोप अन्ततोगत्वा समुद्रगुप्त के साम्राज्य प्रसार के साथ हो गया था । यूरोप में भी गणतन्त्र उन दिनो नही थे । तथापि राजा निरंकुश नही था, स्वेच्छाचारी नही था । यदि राजा क्रूर, अन्यायी, अत्याचारी एवं दुष्ट था तो जनता को अधिकार था, वह राजा को हटा सकती थी । क्योकि दुष्ट राजा का होना कल्हण की दृष्टि में जनता के भाग्य विपर्यय का कारण था । जनता के कुकर्मों के कारण, नैतिक पतनों के कारण, कायरता के कारण देश मे अवाछनीय राजा राज्य करते है । जिस प्रकार व्यक्ति अपने कर्मों का फल भोगता है, उसी प्रकार जनता भी भोगती है ; कल्हण कहता है-'प्रजा के पुण्य के कारण समय-समय पर ऐसे नृपों का जन्म सम्भव होता है जो अत्यन्त छिन्न-भिन्न हुए राज्यों का योजन करते है। ( रा० १ : १८ ) कर्म गति से यदि व्यक्ति नहीं बच सकता तो जनता भी नही बच सकती । कल्हण का यह अभिनव राजनीति दर्शन है । ( रा० १ : १८७ ) । जनता का राज्य-व्यवस्था में स्थान था । आवश्यकता होने पर जनता राजा का चयन करती थी । काश्मीर की जनता ने सन्धिमति को अपना राजा स्वीकार किया था । (रा० २ : ११६) जनता ने गान्धार से मेघवाहन को लाकर कश्मीर के सिंहासन पर बैठाया था । रा० ३ : २ ) राजा वक को जनता ने राजा चुना था । ( रा० १ : ३२५ ) विक्रमादित्य ने मातृगुप्त को काश्मीर का राजा बनाने का विचार किया तो उसने प्रकृति जनो अर्थात् जनता के पास दूत भेजा था । कोई निश्चय करने के पूर्व वह जनता का मत जान लेना चाहता था । ( रा० ३ : १८८ ) कल्हण ने यूनानी लेखकों के समान नगर की जनता का चित्रण किया है । वह जनता के प्रति, उसकी भावनाओं के प्रति, उसके कल्याण के प्रति अत्यधिक जागरूक था । वह आनुवंशिक राजाओ के परिवर्तनो के प्रति उदासीन था । राजा और प्रजा : कल्हण ने राजा को हरांशज कहा है । परन्तु पश्चिमी राजनैतिक दार्शनिकों के समान वह राजा के दैवी सिद्धान्त में विश्वास नहीं करता । राजा दैव नहीं था । वह सर्वसत्ता सम्पन्न
[ ३२ ] अधिनायक नही था । वह प्रजा के लिए पिता तुल्य था । ( रा० ५ : ३५० ) साधारण व्यक्तियों के समान राजा भी मानवीय दुर्बलताओं का सरलतापूर्वक शिकार हो जाता था । ( रा० ८ : १५५२ ) राज्य के आध्यात्मिक सिद्धान्तो का प्रतिपादन करते हुये कल्हण बलवती भाषा मे कहता है अन्यायी राजा कष्ट पाता है । ( रा० ७ : १५८२; ८ : १९५१ ) दुष्ट राजा को उसकी जीवन काल ही में दुर्गति होती है । राजा को कल्हण प्रजा से सर्वथा भिन्न नही मानता । राजा एवं प्रजा दोनो एक ही शरीर के पुरजे हैं । एक शरीर तुल्य है । उसने यहाँ पर यूनान के नगर राज्यों के दर्शन तुल्य विचार किया है । कल्हण ने राजा को दार्शनिक ढंग से केवल प्रजा से ही नहीं प्राणिमात्र से मिला दिया है । ( रा० : २४६-२६६, ३ : ८१-२, ५० ) कल्हण कहता है—'जो प्रजा पीड़क राजा होते हैं वे कुल सहित नष्ट हो जाते हैं । और जो नष्ट राज्य को सुव्यवस्थित करते हैं उनके वंश की अनुगामिनी श्री होती है ।' ( रा० १ : १८८ ) पुरोहित एवं द्विज परिषद : कल्हण दो परिषदों का उल्लेख करता है । द्विज परिषद का प्रथम उल्लेख राजा लव के सन्दर्भ में किया है । ( रा० १ : ८७ ) मन्दिरों पर चढ़ायी देवोत्तर सम्पत्ति, अग्रहार, ग्राम तथा अन्य दान कालान्तर में परिषद को मिल जाते थे ( रा० २ : १३२ ) राजा का चयन परिषद करती थी । उत्पल वंश का जब अन्त हो गया तो ब्राह्मण एकत्रित हुए । राजा चुनने का उसने निश्चय किया । कमलवर्धन के कहने पर द्विज-मण्डली एकत्रित हुई थी । कमलवर्धन स्वयं राजा बनना चाहता था । द्विज गण कुछ निश्चय न कर सके । इसी समय पुरोहित परिषद ने यशस्कर को राजा घोषित कर दिया । ( रा० ५ : ४५६-४६६ ) इसी प्रकार ब्राह्मण सभासदों ने तुंग के पतन हेतु ब्राह्मण तथा पुरोहित परिषद् को प्रेरित किया । कि वे परिहास पुर मे प्रायोपवेशन आरम्भ करें । ( रा० ७ : १३) कालान्तर में परिषदों का रूप बदल गया था । ब्राह्मण लोग परिषद् तथा प्रायोपवेशन को साधन बनाकर अर्थ सिद्धि करने लगे । ( रा० ७ : १४, २३ ) भीम केशव का मन्दिर बहुत दिनों तक परिषद् के सदस्यों के पारस्परिक संघर्ष के कारण बन्द रहा । (रा० ७ : १०८२) पुरोहित परिषद् ने इसी प्रकार प्रायोपवेशन को साधन बनाकर राजा हर्ष को उन्हें रुढ भारोठी से मुक्त करने लिए बाध्य कर दिया । (रा० : ७, १०८८) इसी प्रकार राजा सुस्सल के समय पुरोहित परिषद् प्रायोपवेशन किये थे । (रा० ८, ७०९) राजा भिक्षाचर के समय में भी पुरोहित परिषद् ने इसी प्रकार प्रायोपवेशन द्वारा अपनी बातें मनवायी थी । पुरोहित एवं द्विज परिषद् चार हजार वर्षों तक राजा लव के समय से कल्हण काल तक दिखायी देती है । विश्व की यह सबसे पुरानी, जागरूक एवं शक्ति सम्पन्न संस्था थी । कल्हण को अपने ब्राह्मणत्व एवं अभिजात कुलोत्पन्न होने का गर्व था तथापि उसने पुरोहित तथा परिषद् के अनुचित व्यवहारों की निन्दा की है। राजा तथा राज्य की स्थिति संकटापन्न होती थी, तो ऐसा ही समय प्रायोपवेशन के लिए अधिक से अधिक उपयुक्त समझा जाता था । प्रायोपवेशन पुरातन काल में एक नैतिक अस्त्र था। दुर्बल सबलों के विरुद्ध उसका प्रयोग करते थे। किन्तु काश्मीर में द्विजों ने उसे उपहासास्पद बना दिया था। राजनीति स्वार्थ सिद्धि एवं धन ऐंठने का साधन हो गयी थी। प्रायोपवेशन का इतना दुरुपयोग होने लगा था कि राज्य ने एक प्रायोपवेशन अधिकारी नियुक्त किया था । (रा० ६ : १४) राजा चन्द्रापीड ने स्वयं मार्गदर्शन के लिए मन्दिर में प्रायोपवेशन किया था । (रा० ४ : ९९) कल्हण ने पुरोहित परिषद् तथा पुरोहितो की खूब खिल्ली उड़ाई है । उनके इस कार्य को कायरता माना है। (रा० ४:८२, ९९; ५:४६८,
[ ३३ ] ६ : २५, ३३६, ३४३, ८ : ५१, ११०, ६०९, ७०७, ७६८, ८८८, ९३९, २२२४, २७३३, २७३९) किन्तु कल्हण ने पुण्यात्माओं द्वारा किये गये प्रायोपवेशन में श्रद्धा प्रकट की है । (रा० ४ : ६३२; ८ : २२४२) मन्त्रि परिषद : काश्मीर की तीसरी प्राचीन मन्त्रि परिषद थी । यह संस्था का महाभारत काल से कोटारानी (सन् १३३६ ई०) तक कायम थी । यह संस्था पुरोहित परिषद से भी पुरातन थी । कम से कम ४ सहस्र वर्षों से इसका अविच्छिन्न अस्तित्व मिलता है । मन्त्रि परिषद एवं द्विज तथा पुरोहित परिषदों में कौन विशेष शक्तिशाली था यह कहना कठिन है । दोनों ने ही समय समय पर राजाओं को चुनकर सिंहा- पर बैठाया और उतारा है । मन्त्रि परिषद का क्षेत्र राजनीतिक था । परन्तु द्विज एवं पुरोहित परिषद का क्षेत्र धार्मिक एवं राज- नीतिक समयानुसार हो जाता था । मन्त्रि परिषद की शक्ति राजबल था । पुरोहित एवं द्विज परिषद की शक्ति उनका आध्यात्मिक बल काश्मीरी जनता की धर्मभीरुता थी । अतएव द्विज एवं पुरोहित परिषद की शक्ति कालानुसार श्रेष्ठ मानी गयी थी । मन्त्रि परिषद भगवान श्री कृष्ण के सम्मुख रानी यशोवती के सन्दर्भ में उपस्थित थी । बाल गोनन्द द्वितीय के समय राजा के नाम से मन्त्रि परिषद शासन करती थी । वह उस समय सर्व सत्ता सम्पन्न थी । (रा० १ : ७८-८१) काश्मीर की मंत्रि परिषद विश्व की सबसे प्राचीन और सबसे अधिक लम्बे जीवन काल की संस्था थी । इसकी धारा कभी सूखी नहीं थी । छिन्न नहीं हुई थी । राजाओं के अभाव एवं अस्तित्व दोनों कालों में यह संस्था अबाध गति से अपना काम करती रही है । मन्त्रि परिषद इतनी शक्तिशाली थी कि सेना से राजभवन तक घेर लेती थी । (रा० १ : ३६६, ३६७) राजा को वन्दी बनाती थी (रा० २ : ४); राजा को पदच्युत कर दूसरे को राजा बनाती थी (रा० २ : ५) । काश्मीर की मन्त्रि परिषद की ख्याति बाहर भी थी । राजा विक्रमादित्य ने मातृगुप्त को राजा बनाने का आदेश मन्त्रिपरिषद को ही दिया था । ( रा० ३ : २२४, २३५) मन्त्रियों ने मेघवाहन को काश्मीर का राज्य सिंहासन ग्रहण करने लिये कहा था । (रा० २ : १५१) राजा दुर्लभ वर्धन को मन्त्रियों ने राजा मनोनीत किया था । (रा० ३ : ५२८) काश्मीर में जनता, मन्त्रि परिषद, पुरोहित एवं द्विज परिषद ने अनेक अवसरों पर बिना एक दूसरे की सलाह लिये स्वयं अपने निर्णय से राजा चुना है । अभिषेक : राजतरंगिणी से हमें काश्मीर के इतिहास में अभिषेक प्रणाली के प्रचलन के कई महत्व- पूर्ण एवं अनोखे उल्लेख मिलते हैं । यह द्विजों, पौर जनों तथा मन्त्रियों द्वारा समयानुसार होता रहा है । भगवान् श्रीकृष्ण ने द्विजों द्वारा रानी यशोवती का अभिषेक कराया था । ( रा० १ : ७० ) राजा गोनन्द द्वितीय का अभिषेक द्विजेन्द्रों ने किया था । ( रा० १ : ७५ ) राजा सन्धिमति का अभिषेक द्विजों ने किया था । ( रा० २ : ११७ ) राजा वक का अभिषेक पौर जनों ने किया था । ( रा० १ : ३२५ ) मातृ गुप्त का अभिषेक प्रकृति अर्थात् प्रजा ने किया था । (रा० ३ : २३९) राज्याभिषेक की प्रक्रिया शास्त्रानुसार होती थी । राजा की मूर्धा पर कनक घट से तीर्थों का जल ढाला जाता था । उसके पश्चात् अन्य औपचारिक क्रियायें होती थी । ( रा० ३ : ५२८ ) ५
[ ३४ ] सभा : काश्मीर में सभा थी । उसके सदस्यों को सभ्य कहा जाता था । ( रा० ३ : १५८ ) सभा का सर्वप्रथम उल्लेख सन्धिमति के समय में मिलता है । ( रा० २ : १२७ ) सन्धिमति राज्य त्याग करने लगा तो उसने सभा एकत्रित की । उसने काश्मीर का राज्य सभा को लौटा कर वनगमन किया । ( रा० २ : १५९ ) कल्हण ने विक्रमादित्य की सभा का उल्लेख मातृगुप्त के प्रसंग में किया है । ( रा० ३ : १३९, १४६ ) मातृगुप्त के प्रसंग में ही कल्हण ने सभा का पुनः उल्लेख किया है । ( रा० ३ : २०४ ) सभा का सभापति होता था । जयापीड की सभा का सभापति भट्टोद्भट था । ( रा० ४ : ४९५ ) सभा में संगीत भी होता था । ( रा० ५ : ३६१ ) काश्मीर की सभा का कार्य क्या था इस पर कल्हण प्रकाश नहीं डालता । शासन पद्धति पर भी कल्हण प्रकाश डालता है । राजा जलोक के पूर्व अन्य राज्यों के समान काश्मीर में व्यवस्था थी । ( रा० १ : ११८ ) राज्य की सप्त प्रकृतियां थीं । ( रा० १ : ११९ ) जलौक ने शासन पद्धति में सुधार किया । उसने महाराज युधिष्ठिर के राज्य में महाभारत के समय की प्रचलित शासन व्यवस्था काश्मीर में चलायी । ( रा० १ : १२० ) दण्ड प्रथा प्रचलित थी । कारागार होते थे । उन्हें कारा वेश्म कहा गया है । राजा युधिष्ठिर दुर्गा गलिका में बन्दी बनाकर रखा गया था । ( रा० २ : ७४ ) राजा हिरण्य ने अपने भ्राता तोरमाण को बन्धन में रख दिया था । ( रा० ३ : १०४ ) शूल देने की प्रथा थी । श्मशान में शूली दी जाती थी । ( रा० २ : ७९ ) समाज में क्रूरता भी होती थी । किन्तु यह अच्छा नहीं समझा जाता था । क्रूरता की कल्हण ने घोर निन्दा की है । क्रूरता के स्थान पर, उदारता, सहिष्णुता, दान, क्षमादि उदात्त गुणों की प्रशंसा की गयी है । न्याय पर कल्हण अत्यधिक बल देता है । उसने स्वयं लिखा है कि तरंगिणी की रचना उसने एक स्थेय किंवा न्यायकर्ता तुल्य सब बातों को तोलकर एक निष्कर्ष पर पहुँचकर लेखनी उठायी है । कल्हण शान्ति प्रिय था । शान्त रस को प्राथमिकता दी है । उसके समस्त काव्य में शान्त रस की धारा अबाध्य गति से प्रवाहित मिलती है । समाज : कल्हण ने तत्कालीन समाज का सजीव चित्रण किया है । उसने अपने समय के नर- नारियों के आहार-विहार, आमोद-प्रमोद, पान-पान, वेश-भूषा, रीति-रिवाज, संस्कार-कुसंस्कार, अन्ध विश्वास, परम्परा, रूढियां उनकी जड़ता, नैतिक चरित्र, सबको एक मनोवैज्ञानिक के समान काव्यमयी भाषा में उपस्थित किया है । नर-नारियों की धार्मिक एवं कामुक प्रवृत्तियो और तज्जन्य समस्याओ के निराकरण का मौलिक हल भी स्थान-स्थान पर दिया है । ग्रामीणों तथा नागरिकों के व्यंग-विनोद, हास- परिहास के वर्णन में उसकी काव्य कला अपनी उच्चतम अभिव्यक्ति पर पहुँच जाती है । इस प्रकार वह प्रमाणित करता है कि वह कवि प्रथम तत्पश्चात् इतिहासकार था । कल्हण लेखन-कला में परिपक्व बुद्धि का प्रौढ व्यक्ति था । युवक लेखक कल्पना सागर में तैरने का अधिक प्रयास करता है । कल्हण ने घटना सागर में गोता लगाकर एक प्रौढ सन्तुलित व्यक्ति के समान रत्नों को निकालकर घटनाओं को क्रमबद्ध किया है । अत्याचार, अनाचार, अव्यवस्था, भ्रष्टाचार, गृहसंघर्ष, अराजकता आदि कटु किन्तु वास्तविक घटनाओं के मध्य गुजरने के कारण उसका उर्वर मस्तिष्क राज- तरंगिणी जैसे काव्य को प्रस्तुत करने के लिए परिपक्व हो गया था । उसने अपने समय की अनुभूतियों को गाथा में पिरो दिया है ।