राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
प्रथम तरंग ३५३ तेन क्रमागतं राज्यं सावधानेन शासता । अनुजग्मे मितं कालं पूर्वभूपालपद्धतिः ॥३५१॥ ३५१. उसने क्रमागत राज्य का सावधानी पूर्वक शासन करता हुआ कुछ दिन तक पूर्ववर्ती राजाओं की पद्धति¹ का अनुकरण किया । काले कियत्यपि ततो यात्यभाग्यवशादसौ । सिषेवे श्रीमदक्षीबो यत्किञ्चनविधायिताम् ॥३५२॥ ३५२. कुछ समय पश्चात् अभाग्य वश श्रीमद से उन्मत्त वह यत्किंचनविधायी¹ हो गया । नान्वग्रहीदनुग्राह्यान्न संजग्राह धीमतः । न प्रवृत्तोपचाराणां प्रागिवासीत्प्रियकरः ॥३५३॥ ३५३. वह अनुग्रह पात्रों पर अनुग्रह, धीमानों का संग्रह, तथा सेवारत सेवकों का पूर्ववत् प्रियकर्त्ता नहीं रह गया था । दुर्विद्यपर्षदा सार्कं निर्विशेषं सभाजितैः । परिजह्रे स दुर्जातो जाततेजोवधैर्बुधैः ॥३५४॥ ३५४. दुर्विद्य गण के साथ, निर्विशेष रूप से सम्मानित तथा अपमानित विद्वानों ने उस दुर्जात राजा का त्याग कर दिया । सर्वत्र समदृष्टित्वं गुणोऽयं खलु योगिनः । अकीर्तिहेतुः स महान्दोषस्तु पृथिवीपतेः ॥३५५॥ ३५५. सर्वत्र समदर्शिता योगियों के लिये गुण है किन्तु वह पृथिवीपति की अकीर्ति का हेतु तथा महान् दोष है ।
[बायाँ स्तम्भ] उसकी फ़ौज और रैयत उससे मुतनफर हो गयी । आसपास के हुक्काम जो दिल और जान से राजा के मतोअ और फरमांबरदार थे, एक एक करके इसके बागी होने लगे । हकूमत के महल हल व अकदीद जवान इसकी मजवली पर मुताफिक हो गये । अह्ल जमाना की यह बेमुरव्वती देखकर युधिष्ठिर दो-तीन रफ़ीकों के हमराह हिन्दुस्तान की तरफ भाग गया । यहाँ एक राजा ने उसे पकड़कर जान से मार डाला । इसकी मुद्दत हकूमत बावन बरस और आठ माह थी ।' पृष्ठ ५० पाठभेद : श्लोक संख्या ३५१ में 'अनुजग्मे' का 'मनुजने' तथा 'मितं' का पाठभेद 'सितं' मिलता है । ४५
[दायाँ स्तम्भ] पादटिप्पणियाँ : ३५१ (१) पद्धति : यहाँ शासन पद्धति अर्थ लगाना चाहिए । पूर्ववर्ती राजाओं की शासन पद्धति का अनुकरण कुछ दिन तक राजा करता रहा । ३५२ (१) यत्किंचनविधायी : राजा स्वेच्छाचारी, उद्दण्ड, अकर्मण्य, उच्छृंखल, निरंकुश तथा अविहित, अकरणीय कर्म करने वाला हो गया था । कल्हण का यही तात्पर्य यहाँ प्रकट होता है । पाठभेद : श्लोक संख्या ३५४ में 'परिजह्रे' का पाठभेद 'परिजह्वे' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ३५५. (१) समदर्शी : योगियों तथा सज्जनों के
३५२ राजतरंगिणी भूत्वा षट्त्रिंशतं वर्षान् शतं चाह्नां विभुर्भूवः । स दीघैरनघाँल्लोकानासदत्सुकृतैः कृती ॥ ३४६ ॥ ३४९. उस पुण्यात्मा ने छत्तीस वर्ष सो दिन पृथ्वी का स्वामी रहकर अत्यधिक सुकृतों के कारण पुण्य लोक प्राप्त किया। युधिष्ठिराभिधानोऽभूदथ राजा तदात्मजः । यः सूक्ष्माक्षतया लोकैः कथितोऽन्धयुधिष्ठिरः ॥ ३५० ॥ युधिष्ठिर : ३५०. अनन्तर युधिष्ठिर नामक उसका पुत्र राजा हुआ, जिसे सूक्ष्माक्ष होने के कारण, लोग अन्ध युधिष्ठिर कहते थे१।
[बायाँ स्तम्भ / Left Column] तक नहीं मिल सका है। सम्भव है कल्हण के समय तक इनके विषय में कुछ साहित्य प्राप्त रहा हो। कल्हण ने स्वयं इनका इतना संक्षिप्त वर्णन किया है कि कुछ अनुमान लगाना कठिन है। (२) उग्रेश : ऋग्वेद में 'उग्रदेव' का उल्लेख मिलता है । (ऋ० १:३६ : १८; पं०ब्रा. १४. ३ : १७; २३.१६ - ११७) इनका पैतृक नाम तैत्तिरीय आरण्यक में राजनि दिया गया है। (तै०- आ०; ५.४-१२ ) यहाँ पर सरल अर्थ यही अभिहित है कि उग्र ने अपने नाम पर उग्रेश शिव की स्थापना की । (३) मातृ चक्र : टिप्पणी मातृचक्र पृ० १८१ ( १.२२ ) द्रष्टव्य है । पाठभेद : श्लोक संख्या ३४६ में 'शतं' का 'शंति' पाठभेद मिलता है। श्लोक सख्या ३५० में 'सूक्ष्माक्षतया' का पाठभेद 'सूक्ष्माक्षितया' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ३५० (१) आइने अकबरी में 'जेवादिस्तर' लिखा है। राज्य काल ४८ वर्ष १० दिन दिया गया है। राजतरंगिणी में इस राजा का राज्य काल नहीं दिया गया है। आइने अकबरी में युधिष्ठिर के शासन के विषय में लिखा है- राजा
[दायाँ स्तम्भ / Right Column] युधिष्ठिर ने न्यायपूर्ण शासन आरम्भ किया। किन्तु कालान्तर में वह कामी हो गया। वह इतना क्रूर हो गया था कि हिन्दुस्तान तथा तिब्बत के राजाओं ने उसके खिलाफ मिलकर आवाज उठायी। इससे उत्साहित होकर कश्मीर के सरदारों ने विद्रोह किया। राजा को बन्दी-गृह में डाल दिया। श्री स्टीन इस राजा का राज्याभिषेक लौकिक वर्ष २९६१ वर्ष आठवा मास उनतीसवाँ दिन मानते हैं। प्रो एस. पी. पण्डित यह समय ईसा पूर्व २१७ वर्ष देते हैं। हसन के अनुसार 'फ. २८२८ में उसका (नरेन्द्रा- दित्य का) बेटा राजा अन्ध युधिष्ठिर बाप का जानशीन हुआ। उसकी आँखें बड़ी छोटी थी। यही वजह था कि यह बीनाई पूरी नहीं रखता था। इस बिना पर इसे लोगों ने अन्ध यानी कोर का लकब दिया हुआ था। शुरू-शुरू में अदल व इन्साफ सखावत व रैयत परवरी में मसरूफ रहा। लेकिन बिल आखिर कमीनों और बदकारों की सुहबत में पडकर जुल्म और सख्ती का पेशा अख्तियार कर लिया। हर किस्म के बुरे काम मसलन शराबनोशी ओर बदकारी अपना शआर बना लिया। लोगों की औरतें और बीवियां जबर्दस्ती ले जाने लगा। अकलमन्दो और सल रसीदा लोगों से नफरत अख्तियार करके कमीनों और आ- वारों को अपना मुसाहब बना लिया। बेरहमी और खूंरेजी में कोई कसर बाकी न रखो। यह देखकर
प्रथम तरंग ३५३ तेन क्रमागतं राज्यं सावधानेन शासता । अनुजग्मे मितं कालं पूर्वभूपालपद्धतिः ॥३५१॥ ३५१. उसने क्रमागण राज्य का सावधानी पूर्वक शासन करता हुआ कुछ दिन तक पूर्ववर्ती राजाओं की पद्धति का अनुकरण किया । काले कियत्यपि ततो यात्यभाग्यवशादसौ । सिषेवे श्रीमदद्वीवो यत्किञ्चनविधायिताम् ॥३५२॥ ३५२. कुछ समय पश्चात् अभाग्य वश श्रीमद से उन्मत्त वह यत्किंचनविधायी' हो गया । नान्वग्रहीदनुग्राह्यान संजग्राह धीमतः । न प्रवृत्तोपचाराणां प्रागिवासीत्प्रियंकरः ॥३५३॥ ३५३. वह अनुग्रह पात्रों पर अनुग्रह, धीमानों का संग्रह, तथा सेवारत सेवकों का पूर्ववत् प्रियकर्त्ता नहीं रह गया था । दुर्विद्यपर्षदा सार्कं निर्विशेषं सभाजितैः । परिजह्ने स दुर्जातो जाततेजोवधैर्बुधैः ॥३५४॥ ३५४. दुविद्य गण के साथ, निर्विशेष रूप से सम्मानित तथा अपमानित विद्वानों ने उस दुर्जात राजा का त्याग कर दिया । सर्वत्र समदृष्टित्वं गुणोऽयं खलु योगिनः । अकीर्त्तिहेतुः स महान्दोषस्तु पृथिवीपतेः ॥३५५॥ ३५५. सर्वत्र समदर्शिता योगियों के लिये गुण है किन्तु वह पृथ्वीपति की अकीर्ति का हेतु तथा महान् दोष है ।
उसकी फौज और रैयत उससे मुतनफर हो गयी । आसपास के हुक्काम जो दिल और जान से राजा के मतीअ और फरमांबरदार थे, एक एक करके इसके बागी होने लगे । हकूमत के महल हल व अकदीद जवान इसकी मजवलो पर मुताबिक हो गये । अहले जमाना की यह बेमुरव्वती देखकर युधिष्ठिर दो-तीन रकीबो के हमराह हिंदुस्तान की तरफ भाग गया । यहाँ एक राजा ने उसे पकड़कर जान से मार डाला । इसकी मुद्दत हकूमत बावन बरस और आठ माह थी ।' पृ० ५० पाठभेद : श्लोक संख्या ३५१ में 'अनुजग्मे' का 'मनुजग्मे' तथा 'मितं' का पाठभेद 'सितं' मिलता है । ४५
पादटिप्पणियाँ : ३५१ (१) पद्धति : यहाँ शासन पद्धति अर्थ लगाना चाहिए । पूर्ववर्ती राजाओं की शासन पद्धति का अनुकरण कुछ दिन तक राजा करता रहा । ३५२ (१) यत्किंचनविधायी : राजा स्वेच्छाचारी, उद्दण्ड, अकर्मण्य, उच्छृंखल, निरंकुश तथा प्रविहित, अकरणीय कर्म करने वाला हो गया था । कल्हण का यही तात्पर्य यहाँ प्रकट होता है । पाठभेद : श्लोक संख्या ३५४ में 'परिजह्ने' का पाठभेद 'परिजिल्हे' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ३५५. (१) समदर्शी : योगियों तथा सज्जनों के
३५२ राजतरंगिणी भूत्वा षट्त्रिंशतं वर्षान् शतं चाह्नां विभुर्भूवः । स दीर्घैरनघैर्लोकानासदत्सुकृतैः कृती ॥ ३४६ ॥ ३४९. उस पुण्यात्मा ने छत्तीस वर्ष सौ दिन पृथ्वी का स्वामी रहकर अत्यधिक सुकृतों के कारण पुण्य लोक प्राप्त किया। युधिष्ठिराभिधानोऽभूदथ राजा तदात्मजः । यः सूक्ष्माक्षतया लोकैः कथितोऽन्ध्ययुधिष्ठिरः ॥ ३५० ॥ युधिष्ठिर : ३५०. अनन्तर युधिष्ठिर नामक उसका पुत्र राजा हुआ, जिसे सूक्ष्माक्ष होने के कारण, लोग अन्ध युधिष्ठिर कहते थे १ । तक नहीं मिल सका है। सम्भव है कल्हण के समय तक इनके विषय में कुछ साहित्य प्राप्त रहा हो। कल्हण ने स्वयं इनका इतना संक्षिप्त वर्णन किया है कि कुछ अनुमान लगाना कठिन है। (२) उग्रेश : ऋग्वेद में 'उग्रदेव' का उल्लेख मिलता है। (ऋ० १:३६ : १८; पं०ब्रा. १४: ३ : १७; २३:१६ · ११७) इनका पैतृक नाम तैत्तिरीय आरण्यक में राजनि दिया गया है। (तै०- आ०; ५.४-१२) यहाँ पर सरल अर्थ यही अभिप्रेत है कि उग्र ने अपने नाम पर उग्रेश शिव की स्थापना की। (३) मातृ चक्र : टिप्पणी मातृचक्र पृष्ठ १८१ ( १ २२ ) द्रष्टव्य है। पाठभेद : श्लोक संख्या ३४६ में 'शतं' का 'शति' पाठभेद मिलता है। श्लोक संख्या ३५० में 'सूक्ष्माक्षतया' का पाठभेद 'सूक्ष्माक्षितया' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ३५० (१) आइने अकबरी में 'जेवादिस्तर' लिखा है। राज्य काल ४८ वर्ष १० दिन दिया गया है। राजतरंगिणी में इस राजा का राज्य काल नहीं दिया गया है। आइने अकबरी में युधिष्ठिर के शासन के विषय में लिखा है-राजा युधिष्ठिर ने न्यायपूर्ण शासन आरम्भ किया। किन्तु कालान्तर में वह कामी हो गया, वह इतना क्रूर हो गया था कि हिन्दुस्तान तथा तिब्बत के राजाओ ने उसके खिलाफ मिलकर आवाज उठायी। इससे उत्साहित होकर कश्मीर के सरदारों ने विद्रोह किया। राजा को बन्दी-गृह में डाल दिया। श्री स्टीन इस राजा का राज्याभिषेक लौकिक वर्ष २९६१ वर्ष आठवा मास उनतीसवाँ दिन मानते हैं। प्रो एस. पी. पण्डित यह समय ईसा पूर्व २१७ वर्ष देते हैं। हसन के अनुसार 'क. २८२८ में उसका (नरेन्द्रा- दित्य का) बेटा राजा अन्ध युधिष्ठिर बाप का जानशीन हुआ। उसकी आँखें बड़ी छोटी थी। यही वजह था कि यह बीनाई पूरी नहीं रखता था। इस बिना पर इसे लोगों ने अन्ध यानी कोर का लकब दिया हुआ था। शुरू-शुरू में अदल व इन्साफ सखावत व रैयत परवरी में मसरूफ रहा। लेकिन बिल आखिर कमीनों और बदकारों की सुहबत में पड़कर जुल्म और सख्ती का पेशा अख्तियार कर लिया। हर किस्म के बुरे काम मसलन शराबनोशी और बदकारी अपना शभार बना लिया। लोगों की औरतें और बीवियां जबर्दस्ती ले जाने लगा। अकलमन्दों और सन रसीदा लोगों से नफरत अख्तियार करके कमीनों और भा- वारों को अपना मुसाहब बना लिया। बेरहमी और खूँरेजी में कोई कसर बाकी न रखी। यह देखकर
प्रथम तरंग ३५५ वाक् मर्म्मच्छेदिनी दीर्घं नर्म शश्वत्कथा विटैः । अनीश्वरोचिता तस्य क्रीडाऽपि भयदाऽभवत् ॥३५७॥ ३५७. राजा के लिये अनुचित उसकी मर्मभेदी वाणी, विटों के साथ लम्बी मनोरञ्जन वार्ता तथा क्रीड़ा भी भयदायक हो गयी थी । पुरो मिथ्यागुणग्राही परोक्षं दोषदर्शकः । असुस्थिरादरो भूसूत्सोऽभूद् द्वेष्योऽनुजीविनाम् ॥३५८॥ ३५८. प्रत्यक्ष मिथ्या गुणग्राही, परोक्ष में दोष दर्शक, और असुस्थिर आदर प्रदर्शक, वह राजा अनुजीवियों के द्वेष का पात्र बन गया था। मनागनवधानेन स्खलतस्तस्य भूपतेः । इत्थं राज्यस्थितिरगादचिरेण विसूत्रताम् ॥३५६॥ ३५६. नितान्त असावधानी के कारण स्खलित, उस राजा की राज्यस्थिति शीघ्र ही इस प्रकार विशृंखलित हो गयी । गीत प्रिय और दक्ष होता है। समयानूसार पदों का उल्लेख करता है। कामुक रसमय गीतो से उत्तेजित करता है। वाक् प्रलोभन से चित्त को हरने की कोशिश करता है। उसका तीसरा गुण ऊहा-पोह में दक्ष होना है। चौथा गुण उसका वाग्मी होना है। वह शब्दजाल में फँसा कर अपनी रुचि के अनुसार काम करवा लेता है। पवित्र-से-पवित्र व्यक्ति को वह अपवित्र करने में सफल होता है। किसी को पतित करने में उत्साहित होता है। विट कामतन्त्र कला कोविद नायक एवं नायिका का सन्देश वाहक होता है। विट का लक्षण साहित्य दर्पण में दिया गया है। वेश्योपचारकुशलो मधुरो दक्षिणः कविः । ऊहापोहक्षमो वाग्मी चतुरश्च विटो भवेत् ॥ ॥ २४ : १०४ ॥ (२) स्त्रैण : स्त्रियों की मन्त्रणा पर चलनेवाले व्यक्तियों के अर्थ में यहाँ इस शब्द का प्रयोग किया गया है। यह शब्द राजा का विशेषण है। लौकिक भाषा मे इस शब्द का अर्थ मेहुरा होता है। इसका अर्थ नारीसुलभ, स्त्री द्वारा शासित, स्त्रीत्व, नारीत्व स्त्रीस्वभाव तथा दौर्बल्य भी होता है। कल्हण का यहाँ तात्पर्य यह प्रतीत होता है कि राजा रमणियो में इतना रम गया था कि उसका पुरुषोचित व्यवहार एवं आचरण जैसे लुप्त हो गया था। स्त्रैण शब्द का शुक्र ने राजा के सन्दर्भ में कल्हण के समान ही प्रयोग किया है। जायते राष्ट्रदासश्च शत्रुवृद्धिर्धनक्षयः । सुराप्यपि वरो राजा न स्त्रैणो नातिकोपवान् ॥ ४ : ५९ ॥ लोकांश्चण्डस्तापयति स्त्रैणो वर्णान्विलुम्पति । मद्यप्येकश्च भ्रष्टः स्याद् बुद्ध्या च व्यवहारतः ॥ ॥ ४ : ६० ॥ पाठभेद : श्लोकसंख्या ३५७ में 'दीर्घं नर्म शश्वत्कथा' का पाठभेद 'दीर्घनर्म चासत् तदा' मिलता है। श्लोकसंख्या ३५८ में 'असुस्थिरादरो' का पाठभेद 'अस्वस्थिरादरो' मिलता है। श्लोकसंख्या ३६० में 'उपेक्षितस्य' का 'उपेक्षितास्य' तथा 'द्रोहि' का 'निज', और 'द्रोणि' पाठभेद मिलता है
३५४ राजतरंगिणी नयद्भिर्गुणतां दोषान्दोषतां च गुणान्विटैः । स लुप्तप्रतिभश्चक्रे शनकैः स्त्रीजितोपमः ॥३५६॥ ३५६. दोषों को गुण एवं गुणों को दोष बताने वाले विटों¹ द्वारा प्रतिभाहीन, वह राजा शनैः शनैः स्त्रैण² तुल्य हो गया । लिये समदर्शी होना गुण कहा गया है। योगी तथा ॥ १:६०॥ राजा में अन्तर है। राजा के लिए समदर्शी होना दमो दण्ड इति ख्यातस्तस्माद्दण्डो महीपतिः । उसी प्रकार गुण है, जिस प्रकार उपदण्ड दायक । तस्य नीतिर्दण्डनीतिर्नयनान्नीतिरुच्यते ॥१:१८६॥ राजा सभी गुणों का समन्वय है। दुष्टों को दण्ड, राज्ञां स दण्डनीत्या हि सर्वे सिध्यन्त्युपक्रमाः । कण्टकशोधन, आततायियों का नाश, शत्रुओं का दण्ड एव हि धर्माण रक्षां परमं स्मृतम् ॥४:४७॥ संहार, युद्ध में विजय, समय पर तेजस्वी, समय पर अहिसंकौ साधुहिंसा पशुवच्चे तिचोदनात् । सरल, समय पर दानी, जनता के उपकार के लिये दण्ड्यस्यादण्डनान्नित्यमदण्डस्य च दण्डनात् ॥ जब जिस समय जिन गुणों की अपेक्षा हो ग्रहणकारी । ॥४:४९॥ होना चाहिए । युद्ध में शत्रु पर दया राजा के नाश भगवान् श्री रामचन्द्र ने भी राजा के लिये एवं पराजय का कारण होती है। आततायियों पर सामनीति को अनुचित कहा है। करुणा समाज में अशान्ति उत्पन्न करती है। अवां- न साम्ना शक्यते कीर्तिर्न साम्ना शक्यते यशः । छनीय तत्त्वों के प्रति उपेक्षा देश को अराजकता की प्राप्तुं लक्ष्मण लोकेऽस्मिञ्जयो वा रणमूर्धनि ओर ले जाती है । योगी एवं पण्डित जो अपने ही —वा० रा० २:१:१६ में लीन रहते हैं, उनके लिये समदर्शिता गुण है। पाठभेद : ये पशु पक्षी में भी मैत्री भावना रख सकते श्लोक संख्या ३५६ में 'जितोपमः' का पाठभेद हैं। किन्तु सर्वसाधारण में यह मैत्री भावना तथा 'जितोपमाम्' मिलता है । समदर्शिता प्रचुरता से प्राप्त नहीं होती । योगी के पादटिप्पणियाँ : साथ सर्प बैठता है। सिंह देखकर चला जाता है। ३५६. (१) विट : इस शब्द का अर्थ कामुक, परन्तु एक साधारण मनुष्य को विषधर क्रूद्ध सर्प लंपट, वेश्यागामी होता है। विषय भोग में विट काट सकता है, मनुष्यभक्षी सिंह उसकी हत्या कर अपनी समस्त सम्पत्ति का नाश कर देता है। और सकता है। ऐसी स्थिति में सर्प पर तथा सिंह पर अन्त में धूर्त बन जाता है। दया करना मानवहत्या में सहायक होना होगा । 'कुट्टनीमतम्' में विट का विशद वर्णन किया उस समय सर्प तथा सिंह को मार देना हिंसा नहीं गया है। वह तत्कालीन कश्मीर के सामाजिक अहिंसा होगी । एक के मरने से अनेकों की रक्षा जीवन पर प्रकाश डालता है। उसमे विट को सन्देश- होगी । इसी सिद्धान्त का प्रतिपादन शुक्रनीति वाहक चित्रित किया गया है। वह वेश्या तथा सुन्दरी में किया गया है। राजा को बात का वारग, दण्ड- स्त्रियों से उनके प्रेमियों के मध्य सन्देश वाहक का स्वरूप एवं क्रूर आदि सद्गुणों से युक्त होना कहा कार्य करता है। प्रेमी तथा प्रेमिका को एक दूसरे के गया है। दुर्बलों की हिंसा का समर्थन किया गया है। साथ पहुँचाने की व्यवस्था करता है। अभिगमन के राजा सम्पूर्ण धमों का रक्षण है । लिये प्रेरित करता है । दण्डस्य कारणं राजा सदसद्वर्त्मदर्शकः । विट के चार मुख्य लक्षण कहे गये हैं। वह स्वधर्मेणानुरञ्जयो स्वधर्मे स्थापयेत् प्रजाः ॥ वेश्योपचार में कुशल होता है । मधुरभाषी कविना-
प्रथम तरंग ३५५ वाक् मर्मच्छेदिनी दीर्घं नर्म शश्वत्कथा विटैः । अनीश्वरोचिता तस्य क्रीडाऽपि भयदाऽभवत् ॥३५७॥ ३५७. राजा के लिये अनुचित उसकी मर्मभेदी वाणी, विटों के साथ लम्बी मनोरंजन वार्ता तथा क्रीडा भी भयदायक हो गयी थी । पुरो मिथ्यागुणग्राही परोक्षं दोषदर्शकः । असुस्थिरादरो भूमृत्सोऽभूद् द्वेष्योऽनुजीविनाम् ॥३५८॥ ३५८. प्रत्यक्ष मिथ्या गुणग्राही, परोक्ष में दोष दर्शक, और असुस्थिर आदर प्रदर्शक, वह राजा अनुजीवियों के द्वेष का पात्र बन गया था । मनागनवधानेन स्खलतस्तस्य भूपतेः । इत्थं राज्यस्थितिर्गादचिरेण विसूत्रताम् ॥३५६॥ ३५६. नितान्त असावधानी के कारण स्खलित, उस राजा की राज्यस्थिति शीघ्र ही इस प्रकार विशृंखलित हो गयी । गीत प्रिय और दक्ष होता है। समयानुसार पदों का उल्लेख करता है। कामुक रसमय गीतों से उत्तेजित करता है। चाक् प्रलोभन से चित्त को हरने की कोशिश करता है। उसका तीसरा गुण ऊहा-पोह में दक्ष होना है। चौथा गुण उसका वाग्मी होना है। वह शब्दजाल में फँसा कर अपनी रुचि के अनुसार काम करवा लेता है। पवित्र-से-पवित्र व्यक्ति को वह अपवित्र करने में सफल होता है। किसी को पतित करने में उत्साहित होता है। विट कामतन्त्र कला कोविद नायक एवं नायिका का सन्देश वाहक होता है। विट का लक्षण साहित्य दर्पण में दिया गया है। वेश्योपचारकुशलो मधुरो दक्षिणः कविः । ऊहापोहक्षमो वाग्मी चतुरश्च विटो भवेत् ॥ ॥ २४ : १०४ ॥ (२) स्त्रैण : स्त्रियों की मन्त्रणा पर चलनेवाले व्यक्तियों के अर्थ में यहाँ इस शब्द का प्रयोग किया गया है। यह शब्द राजा का विशेषण है। लौकिक भाषा में इस शब्द का अर्थ मेहरा होता है। इसका अर्थ नारीसुलभ, स्त्री द्वारा शासित, स्त्रैणत्व, नारीत्व स्त्रीस्वभाव तथा दौर्बल्य भी होता है। कल्हण का यहाँ तात्पर्य यह प्रतीत होता है कि राजा रमणियों में इतना रम गया था कि उसका पुरुषोचित व्यवहार एवं आचरण जैसे लुप्त हो गया था। स्त्रैण शब्द का शुक्र ने राजा के सन्दर्भ में कल्हण के समान ही प्रयोग किया है। जायते राष्ट्रनाशश्च शत्रुवृद्धिर्धनक्षयः । सुराप्यपि वरो राजा न स्त्रैणो नातिकोपवान् ॥ ४ : ५९ ॥ लोकाँश्चण्डस्तापयति स्त्रैणो वर्णान्विलुम्पति । मद्यप्येकश्च भ्रष्टः स्याद् बुद्ध्या च व्यवहारतः ॥ ॥ ४ : ६० ॥ पाठभेद : श्लोकसंख्या ३५७ में 'दीर्घं नर्म शश्वत्कथा' का पाठभेद 'दीर्घनर्म जासत् तथा' मिलता है। श्लोकसंख्या ३५८ में 'असुस्थिरादरो' का पाठभेद 'अस्वस्थिरादरो' मिलता है। श्लोकसंख्या ३६० में 'उपेक्षितस्य' का 'उपेक्षितास्य' तथा 'द्रोहि' का 'निज', और 'द्रोणि' पाठभेद मिलता है
३५६ राजतरंगिणी उपेक्षितस्य निर्दोषैरयतन्ताऽजितात्मनः । अथ लब्धबलास्तस्य नाशाय द्रोहिन्मन्त्रिणः ॥३६०॥ ३६०. शुभचिन्तकों द्वारा उपेक्षित एवं स्वच्छन्द इस राजा के नाशहेतु शक्तिशाली द्रोही मन्त्रियों ने यत्न किया । पादटिप्पणियाँ : ३६० (१) राजतन्त्र : प्राचीन भारत में राज- तन्त्र, कहीं वंशपरम्परागत उत्तराधिकार द्वारा ज्येष्ठ पुत्र अथवा प्रचलित हिन्दू उत्तराधिकार नियमानुसार सगोत्र सपिण्डादि को राज्य मिलता था । उनके अभाव में बन्धुओं को जाता था ; अथवा उसका निर्वाचन जनता किंवा मन्त्री एवं परिषदादि करती थी । कल्हण ने निर्वाचित राजा का वर्णन राज- तरंगिणी (७:७०३ ) में किया है । किस प्रकार परिषद् ने मिलकर कश्मीर के राजा का निर्वाचन किया था । कश्मीर राजा को कल्हण ने महाशान्त की उपमा दी ( त० १:१४१ ) है । श्री रणजीत सीताराम पण्डित राजतरंगिणी के अनुवाद में इस पर टिप्पणी लिखते हुए कहते हैं- 'इससे प्रकट होता है कि कश्मीर में राजाओं का मूलस्वरूप निर्वाचनीय था । उत्तराधिकार निर्वाचन पर निर्भर था ।' सम्भवतः बौद्धों के संघ प्रथा का प्रभाव था । संघ में निर्वाचन द्वारा कार्य सम्पन्न होता था । संघ में पद निर्वाचन द्वारा प्राप्त होते थे । प्राचीन भारत में जनता दुर्बल राजाओं की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली थी । अतएव प्राचीन संस्कृत वाङ्मय में राजाओं के राज्यच्युत, निर्वासित करने की अनेक घटनाएं मिलती हैं । शतपथ ब्राह्मण में उल्लेख मिलता है । धिज्यराज को जनता ने राज्यच्युत कर दिया था । उसके वंश ने दस पीढ़ियों तक राज्य किया था । पंचविंश ब्राह्मण में राजाओं के हटाने के दो उदा- हरण मिलते हैं । ये दीर्घश्रव तथा सिन्धुक्षित थे । ( १२:१२, ६ तथा १५:३, २५ ) । विष्णुपु[राण में] राजा वेणु की कथा प्रसिद्ध है । वह राज्यच्यु[त कर] मार डाला गया [। विष्णु] पुराण अध्याय १३ ) । भारतीय राजनीति के सिद्धान्त का जहाँ तक मैं अध्ययन कर सका हूँ, वह जनता के विप्लव, एवं विद्रोह के अधिकार को, दुराचारी, आततायी, क्रूर, एवं प्रजाभक्षक, शोषक राजा के विरुद्ध स्वीकार करता है । यद्यपि यह सिद्धान्त भी स्वीकार करता है कि राजा देवता का अंश है। किन्तु यह भी साधिकार घोषणा करता है । देवता बुरे कर्मों से राक्षस हो जाता है । ऋषि पुलस्त्य का नाती रावण था । ऋषि कुल में जन्म लेने पर भी बुरे कार्यों द्वारा राक्षस हो गया था । देवता उसी समय तक देवता है, जब तक उसमें देवत्व गुण वर्तमान रहता है । सद्गुण के कारण देवता होता है । देवत्व प्राप्त करता है । सद्गुण के अभाव से, प्रजा रंजक के अभाव में, न्याय प्रिय शासन के अभाव में, राष्ट्रसुरक्षा के अभाव में, राजा का सद्गुण और दैवी गुण लुप्त हो जाता है । पर- पीडा, परशोषण, दुराचार, एवं दूषित विचारों का आश्रय ग्रहण करते ही, उसका देवस्वरूप तथा देवत्व तिरोहित हो जाता है । अतएव उसे राज्यच्युत करना, उसे हटा देना, उसका वध कर देना, देव विरोधी कार्य नहीं कहा जायेगा । उसे असुर विरोधी कार्य, धर्म एवं शास्त्र सम्मत, कहकर पापहीन कहा गया है । जनता के कल्याण निमित्त इस प्रकार के राजा से पिण्ड छुड़ाना देशभक्ति की गणना में गिना जायेगा । शुक्राचार्य ने शुक्रनीति में स्वच्छन्द देशभक्ति किंवा स्वतन्त्र राजा के विषय में जो कहा है वही घटना इस राजा के सम्बन्ध में घटी । स्वातन्त्र्यमापन्नो ह्यनर्थायैव कल्पते । न भवेत्स्ववशो भिन्नप्रकृ[तिः] [१] ॥ २:४ ॥
प्रथम तरंग ३५७ प्रभोः संकोचिताज्ञैस्तैश्चरद्भिनिरवग्रहम् । राज्यं जिहीर्षवो भूपाश्चक्रिरे भूम्यनन्तराः ॥३६१॥ ३६१. प्रभु की आज्ञा संकुचित करने वाले तथा स्वच्छन्द, उन मन्त्रियों ने पार्श्ववर्ती भूपों को राज्य हरण हेतु उत्सुक कर दिया । तदनुप्राणिताः सर्वे ते ते नानादिगाश्रयाः । आसन्नाम्यामिपं प्राप्तुं श्येना इव ससंभ्रमाः ॥३६२॥ ३६२. मन्त्रियों द्वारा प्रोत्साहित, नाना दिशाओं के वे सब नृप, बाज की भांति राज्य रूप मांस की प्राप्ति हेतु समुद्यत हो गये थे । अथोत्पन्नभयो राजा न शशाक निजस्थितिम् । व्यवस्थापयितुं यन्त्रच्युतां कारुः शिलामिव ॥३६३॥ ३६३. भयभीत राजा अपनी स्थिति को यन्त्र¹ च्युत शिला को शिल्पी की तरह व्यवस्थित रखने में असमर्थ हो गया । पाठभेद : श्लोकसंख्या ३६१ में 'संकोचिता' का पाठभेद 'संकुचिता' मिलता है । श्लोकसंख्या ३६२ में 'तदनुप्राणिताः सर्वे ते ते' का पाठभेद 'तदनुप्राणिता वैरि नृपा' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ३६३ (१) यन्त्र : कश्मीर के मन्दिरों में लगे विशाल शिलाखण्डों को उठाने के लिए किसी प्रकार के यन्त्र का प्रयोग होता था । अन्यथा बड़े-बड़े शिलाखण्डों को कैसे उठाकर एक दूसरे पर रखा गया होगा । यह बात मन्दिरों के ध्वंसावशेषों के देखने से मालूम होती है । कल्हण इसी शिला उठाने वाले यन्त्र की उपमा यहाँ पर देता है । घिरारी किंवा चर्खा बड़े शहतीर में लगाकर शिला उठाने की क्रिया मन्दिरों के निर्माण निमित्त कश्मीर में प्रचलित थी । यह यन्त्र, आधुनिक शब्दावली में क्रेन था । श्री आर. एस. पण्डित इस यन्त्र का यहाँ अर्थ पानी उठाने वाले यन्त्र, अर्थात् ढेकली जिसके बाँस के एक छोर में पत्थर दूसरे में बाल्टी की लम्बी रस्सी बंधी रहती है, और हाथ से पानी खींचते और सिंचाई करते हैं, लगाया है । यह ढेकली प्रथा बिहार, बंगाल, आसाम तथा कश्मीर में कुछ प्रचलित रही है । यहाँ पत्थर गिरने से सन्तुलन बिगड़ जायेगा इस ओर उक्त मत से संकेत किया गया है । कल्हण ने यहाँ - 'यन्त्रयुता कारुः शिलामिव' लिखा है । कारुः का अर्थ कारीगर होता है । 'कारुः' का अर्थ शिल्पी होता है । (अमर कोश २:१०:५ ) शिल्पी के साथ कारु का प्रयोग स्पष्ट प्रकट करता है कि कारु का अर्थ कारीगर से है । यह यन्त्र पत्थर उठाने वाला यन्त्र है। न कि रणजीत सीताराम पण्डित के शब्दों में ढेकली । ढेकली कृषक चलाता है । यदि यन्त्र का सम्बन्ध जल उठाने से होता है, तो कृषक अथवा कृषिसम्बन्धी शब्द का प्रयोग किया जाता । कारु शब्द के प्रयोग से मैं इसी निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ। यह पत्थर उठाने का यन्त्र था । जिसके भार के सन्तुलन के लिए यन्त्र के चर्खी अथवा घिरारी के रस्सा या डोरी में एक तरफ पत्थर लगा रहता था । इस प्रकार का यन्त्र स्टेशनों पर कोयला ऊँचाई पर ले जाकर रखने और वहाँ से इंजन में डालने के लिए मैने पश्चिमी रेलवे में देखा है ।
३५६ राजतरंगिणी उपेक्षितस्य निर्द्रोहैर्यतन्ताऽजितात्मनः । अथ लब्धबलास्तस्य नाशाय द्रोहिमन्त्रिणः ॥३६०॥ ३६०. शुभचिन्तकों द्वारा उपेक्षित एवं स्वच्छन्द इस राजा के नाशहेतु शक्तिशाली द्रोही मन्त्रियों ने यत्न किया । पादटिप्पणियाँ : ३६० (१) राजतन्त्र : प्राचीन भारत में राज- तन्त्र, कहीं वंशपरम्परागत उत्तराधिकार द्वारा ज्येष्ठ पुत्र अथवा प्रचलित हिन्दू उत्तराधिकार नियमानुसार सगोत्र सपिण्डादि को राज्य मिलता था । उनके अभाव में बन्धुओं को जाता था ; अथवा उसका निर्वाचन जनता किंवा मन्त्री एवं परिषदादि करती थी । कल्हण ने निर्वाचित राजा का वर्णन राज- तरंगिणी (७:७०३) में किया है । किस प्रकार परिषद् ने मिलकर कश्मीर के राजा का निर्वाचन किया था । कश्मीर राजा को कल्हण ने महाशार्वय की उपमा दी (८० १:१४१) है । श्री रणजीत सीताराम पण्डित राजतरंगिणी के अनुवाद में इस पर टिप्पणी लिखते हुए कहते हैं- 'इससे प्रकट होता है कि कश्मीर में राजाओं का मूलस्वरूप निर्वाचनीय था । उत्तराधिकार निर्वाचन पर निर्भर था।' सम्भवतः बौद्धो के संघ प्रथा का प्रभाव था । संघ में निर्वाचन द्वारा कार्य सम्पन्न होता था । संघ में पद निर्वाचन द्वारा प्राप्त होते थे । प्राचीन भारत में जनता दुर्बल राजाओं की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली थी । अतएव प्राचीन संस्कृत वाङ्मय में राजाओं के राज्यच्युत, निर्वासित करने की अनेक घटनाएं मिलती हैं । शतपथ ब्राह्मण में उल्लेख मिलता है । धिज्यराज को जनता ने राज्यच्युत कर दिया था । उसके वंश ने दस पीढ़ियों तक राज्य किया था । पंचविंश ब्राह्मण में राजाओं के हटाने के दो उदा- हरण मिलते हैं । वे दीर्घश्रव तथा सिन्धुक्षित थे । (१२:१२, ६ तथा १५:३, २५) । विष्णुपुराण में राजा वेणु की कथा प्रसिद्ध है । वह राज्यच्युत कर मार डाला गया था । (विष्णु पुराण अंश १ अध्याय १३) । भारतीय राजनीति के सिद्धान्त का जहाँ तक मैं अध्ययन कर सका हूँ, वह जनता के विप्लव, एवं विद्रोह के अधिकार को, दुराचारी, आततायी, क्रूर, एवं प्रजाभक्षक, शोषक राजा के विरुद्ध स्वीकार करता है । यद्यपि यह सिद्धान्त भी स्वीकार करता है। राजा देवता का अंश है। किन्तु यह भी साधिकार घोषणा करता है। देवता बुरे कर्मों से राक्षस हो जाता है । ऋषि पुलस्त्य का नाती रावण था। ऋषि कुल में जन्म लेने पर भी बुरे कार्यों द्वारा राक्षस हो गया था । देवता उसी समय तक देवता है, जब तक उसमें देवत्व गुण वर्तमान रहता है । सद्गुण के कारण देवता होता है । देवत्व प्राप्त करता है । सद्गुण के अभाव में, प्रजा रंजन के अभाव में, न्याय प्रिय शासन के अभाव में, राष्ट्रसुरक्षा के अभाव में, राजा का सद्गुण और दैवी गुण लुप्त हो जाता है । पर- पीडा, परशोषण, दुराचार, एवं दूषित विचारों का आश्रय ग्रहण करते ही, उसका देवस्वरूप तथा देवत्व तिरोहित हो जाता है । अतएव उसे राज्यच्युत करना, उसे हटा देना, उसका वध कर देना, देव विरोधी कार्य नहीं कहा जायेगा । उसे असुर विरोधी कार्य, धर्म एवं शास्त्र सम्मत, कहकर पापहीन कहा गया है । जनता के कल्याण निमित्त इस प्रकार के राजा से पिण्ड छुड़ाना देशभक्ति की गणना में गिना जायेगा । शुक्राचार्य ने शुक्रनीति में स्वच्छन्द देशभक्ति किंवा स्वातन्त्र्य राजा के विषय में जो कहा है वही घटना इस राजा के सम्बन्ध में घटी । प्रभुः स्वातन्त्र्यमापन्नो ह्यनर्थायैव कल्पते । भिन्नराष्ट्रो भवेत्सद्यो भिन्नप्रकृतिरेव च ॥ २:४ ॥
प्रथम तरंग ३५७ प्रभोः संकोचिताज्ञैस्तैश्चरद्भिनिरवग्रहम् । राज्यं जिहीर्षवो भूपाश्चक्रिरे भूम्यनन्तराः ॥३६१॥ ३६१. प्रभु की आज्ञा संकुचित करने वाले तथा स्वच्छन्द, उन मन्त्रियों ने पार्श्ववर्ती भूपों को राज्य हरण हेतु उत्सुक कर दिया । तदनुप्राणिताः सर्वे ते ते नानादिगाश्रयाः । आसन्नाज्यामिषं प्राप्तुं श्येना इव ससंभ्रमाः ॥३६२॥ ३६२ मन्त्रियों द्वारा प्रोत्साहित, नाना दिशाओं के वे सब नृप, बाज की भांति राज्य रूप मांस की प्राप्ति हेतु समुद्यत हो गये थे । अथोत्पन्नभयो राजा न शशाक निजस्थितिम् । व्यवस्थापयितुं यन्त्रच्युतां कारुः शिलामिव ॥३६३॥ ३६३. भयभीत राजा अपनी स्थिति को यन्त्र च्युत शिला को शिल्पी की तरह व्यवस्थित रखने में असमर्थ हो गया ।
पाठभेद : श्लोकसंख्या ३६१ में 'संकोचिता' का पाठभेद 'संकुचिता' मिलता है । श्लोकसंख्या ३६२ में 'तदनुप्राणिताः सर्वे ते ते' का पाठभेद 'तदनुप्राणिता वैरि नृपा' मिलता है।
पादटिप्पणियाँ : ३६३ (१) यन्त्रः कश्मीर के मन्दिरों में लगे विशाल शिलाखण्डों को उठाने के लिए किसी प्रकार के यन्त्र का प्रयोग होता था । अन्यथा बड़े-बड़े शिलाखण्डों को कैसे उठाकर एक दूसरे पर रखा गया होगा । यह बात मन्दिरों के ध्वंसावशेषों के देखने से मालूम होती है । कल्हण इसी शिला उठाने वाले यन्त्र की उपमा यहाँ पर देता है। घिरारी किंवा चर्खी बड़े शहतीर में लगाकर शिला उठाने की क्रिया मन्दिरों के निर्माण निमित्त कश्मीर में प्रचलित थी । यह यन्त्र, आधुनिक शब्दावली में क्रेन था । श्री आर. एस. पण्डित इस यन्त्र का यहाँ अर्थ पानी उठाने वाले यन्त्र, अर्थात् ढेकली जिसके बांस के एक छोर में पत्थर दूसरे में बालटी की लम्बी रस्सी बंधी रहती है, और हाथ से पानी खींचते और सिंचाई करते हैं, लगाया है। यह ढेकली प्रथा बिहार, बंगाल, आसाम तथा कश्मीर में कुछ प्रचलित रही है । यहाँ पत्थर गिरने से सन्तुलन बिगड़ जायेगा इस ओर उक्त मत से संकेत किया गया है । कल्हण ने यहाँ-'यन्त्रच्युता कारुः शिलामिव' लिखा है। कारुः का अर्थ कारीगर होता है। 'कारुः' का अर्थ शिल्पी होता है। (अमर कोश २:१०:५) शिल्पी के साथ कारु का प्रयोग स्पष्ट प्रकट करता है कि कारु का अर्थ कारीगर से है। यह यन्त्र पत्थर उठाने वाला यन्त्र है। न कि रणजीत सीताराम पण्डित के शब्दों में ढेकली। ढेकली कूपक चलाता है। यदि यन्त्र का सम्बन्ध जल उठाने से होता है, तो कूपक अथवा कूपिसम्बन्धी शब्द का प्रयोग किया जाता। कारु शब्द के प्रयोग से मैं इसी निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ। यह पत्थर उठाने का यन्त्र था। जिसके भार के सन्तुलन के लिए यन्त्र के चर्खी अथवा घिरारी के रस्सा या डोरी में एक तरफ पत्थर लगा रहता था। इस प्रकार का यन्त्र स्टेशनों पर कोयला ऊँचाई पर से जाकर रखने और वहाँ से इंजन में डालने के लिए मैंने पश्चिमी रेलवे में देखा है ।
३५८ राजतरंगिणी चिरक्षुण्णे क्षमाभर्तुस्तस्मिन्राज्ये विसंस्थुले। उपायोऽस्य स्थितेर्हेतुर्नैकः कश्चन पप्रथे ॥३६४॥ ३६४. बहुत दिनों से उस राज्य के विश्रृंखालत होने पर, उसके स्थायित्व हेतु कोई उपाय उस राजा को नही सूझा । दृष्टदोषान्स्थितिं प्राप्तो हन्यादस्मानसंशयम्। विचिन्त्येति न सामास्य जगृहुर्निजमन्त्रिणः ॥३६५॥ ३६५. उसके अपने मन्त्रियों ने राजा की सन्धि को यह सोचकर स्वीकार नहीं किया कि; राजा ने उनके दोषों को देख लिया है, अतएव स्थिति सुदृढ़ होने पर, उन्हें निश्चय ही मरवा डालेगा । अथ निरुन्धुस्ते संनद्धा बलैर्नृपमन्दिरं व्यवहितजनाक्रन्दं भेरीरवैर्तिभैरवैः । मदकरिघटाकेतुच्छायानिरुद्धरविप्रभा भवनवलभीः संतन्वन्तो दिवाऽपि तमोवृताः ॥३६६॥ ३६६. उन सन्नद्ध मन्त्रियों ने सेनाओं से राजभवन घेर लिया। उस समय अति भयंकर भेरी ध्वनि से जन-क्रन्दन दब गया। मदमत्त गजसमूह की पताकाओं की छाया से सूर्य-प्रकाश अवरुद्ध हो गया और अट्टालिकायें दिन में भी तमोवृत हो गयीं ।
कल्हण ने यन्त्र शब्द का प्रयोग क्रेन जैसे यन्त्र बड़ी शिलाओ ओर पर्वतों को उखाड़कर यन्त्रों द्वारा के लिये यहाँ किया है। वह शिला उठाने के काम समुद्र तट पर लाते थे । ] में आता है। आज कल भी इमारत बनाने में ऊँचे क्रेन का प्रयोग शिला, ईंटा आदि उठाने के लिये श्लोक संख्या ३६४ में 'चिर' का 'चिरं' किया जाता है । 'कश्चन' का 'कस्य न' तथा 'पप्रथे' का पाठभेद 'प्रपथे' मिलता है । इस प्रकार के यन्त्र भारत मे कश्मीर से लेकर धुर दक्षिण रामेश्वरम् तक सुदूर प्राचीन काल से श्लोक संख्या ३६५ में 'प्राप्तो' का 'प्राप्तान्', प्रचलित थे । वाल्मीकीय रामायण में सेतु बाँधने के 'प्राप्ते' तथा 'प्राप्ता' और 'स्मान' का पाठभेद 'स्माद' समय इस प्रकार के यन्त्रों का प्रयोग किया गया था। तथा 'स्मान्न' मिलता है । हस्तिमात्रान् महाकायाः पाषाणांश्च महाबलाः । श्लोक संख्या ३६७ मे 'रजोद्धूराज' का 'रजोद्भू पर्वतांश्च समुत्पाट्य यन्त्रैः परिवहन्ति च ॥२२:९०॥ राज', 'रजोद्धाराज'; 'नाधु' का 'नायु', 'नासु', [ महाकाय महाबली वानर हाथो के समान बड़ी और 'राजाध्यना' का पाठभेद 'राजाधुना' मिलता है ।
प्रथम तरंग ३५९ तैर्गन्तुं स्वभुवो निवारितरणैर्दत्तेऽवकाशे तत- स्त्यक्तश्रीनगरात्तरात्स नृपतिस्तात्पर्यतो निर्ययौ । आजानेयरजोऽङ्कुराजललनाप्रस्थानसंदर्शन- क्षुभ्यत्पौरजनाश्रुलाजकणिकाकीर्णेन राजाध्वना ॥३६७॥ ३६७. उन लोगों के, स्वभूमि से जाने हेतु युद्ध बन्द कर अवकाश प्रदान करने पर, वह राजा सम्पत्ति त्याग कर, राजमार्ग द्वारा नगर से निकल गया । उस समय उत्तम अश्व की धूल में राज ललनाओं का प्रस्थान देखकर, दुखित होते पुरजनों की अश्रु रूपी लाज¹ कणिका से वह राजमार्ग व्याप्त हो गया था । राज्याच्च्युतस्य बहुशः परिचाररामा- कोशादि तस्य रिपवो व्रजतोऽपजहुः । उर्वारुहो विगलितस्य नगेन्द्रशृङ्गा- द्वल्लीफलादि रभसादिव गण्डशैलाः ॥३६८॥ ३६८. राज्यच्युत एवं गमनशील उस राजा के बहुत से परिवार, कामिनियां और धनादि को शत्रुओं ने उसी प्रकार हरण कर लिया, जैसे गण्डशैल, पर्वत शिखर से पतित वृक्ष को उसके लताफलादि से वेगपूर्वक वंचित कर देता है । रम्यैः शैलपथैर्व्रजञ्छ्रमवशाच्छायां श्रितः शाखिना- मासीनप्रचलायितेन सुमहद् दुःखं विसस्मार सः । दूरात्पामरपूत्कृतैः श्रुतिपथप्राप्तैः प्रबुद्धस्त्वभूद् दृष्टो निर्झरवारिभिः सह मनाक् श्वभ्रे निमज्जन्निव॥३६६॥ ३६९. रम्य शैल पथ पर गमन करते हुए, क्लान्ति वश वृक्षों की छाया का आश्रय लेकर बैठने और पुनः चलने से, उसने महान् दुःख को विस्मृत कर दिया । दूर से सुने गये पामरों के कोलाहलो से, प्रबुद्ध राजा निर्झर वारि के साथ गर्त में डूबता हुआ सा देखा गया ।
पादटिप्पणियाँ : ३६७. (१) लाज : धान का भुना लावा तथा पुष्प का राजपथ तथा राजा की शोभा-यात्रा के समय अथवा शुभ अवसरों पर वर्षा किया जाना पुरानी परंपरा है। प्रायः समस्त भारतवर्ष में यह प्रचलित है। बंगाल में मृतकों की शव-यात्रा के समय लाज- वर्षा की जाती है। विवाह के समय भी लावा परछने की क्रिया हमारी तरफ प्रचलित है।
पाठभेद : श्लोकसंख्या ३६८ में 'रामा' का रामाः', 'दजहुः' का 'विजहुः', 'विगलितस्य' का 'विच- लितस्य' पाठभेद मिलता है । श्लोक संख्या ३६९ में 'मासीनप्रचलायितेन' का 'मासीनः प्रचलायिलेन' 'मासिन प्रचलायितेन' 'मामीनः प्रलयायितेन' 'मासीनप्रल्यायितेन' 'मासीन
३६० राजतरंगिणी नानाविरुत्तृणपरिमलैरुरुगन्धा वनोर्वी- रम्भःक्षोभप्रतिहतशिलाः पिच्छिलाश्चाद्रिकुल्याः । क्रान्त्वा श्रान्तैर्बिसकिसलयच्छायमुग्धाङ्गलेखै- रध्युत्सङ्गं निहिततनुभिर्मूच्छितं तस्य दारैः ॥३७०॥ ३७०. नाना प्रकार के वीरुत तृणों के परिमल से उग्र गन्धवती वनभूमि, जल के ठोकरों से प्रतिहत शिलाओं और फिसलों से युक्त कुल्याओं को पार करके, मृणाल सदृश मुग्ध अंगलेखाओं एवं उत्संग में निहित शरीरों वाली श्रान्त उसकी स्त्रियां मूच्छित हो गयीं । पर्यन्ताद्रितटाद्विलोक्य सुचिरं दूरीभवन्मण्डलं द्रागामन्त्रयितुं क्षिपत्सु नृपतेर्दारेषु पुष्पान्जलीन् । क्षोणीपृष्ठविकीर्णपक्षति नमतुण्डं स्वनीडस्थितैः सावेगं गिरिकन्दरासु पततां वृन्दैरपि क्रन्दितम् ॥३७१॥ ३७१. सीमान्त पर्वत तट से दूर होते मण्डल को देर तक देखकर शीघ्र विदा लेने के लिये नृपस्त्रियों के पुष्पांजलियों गिराने पर, वेग के साथ नीचे उतरते हुए, गिरिकन्दराओं के, स्वनीड स्थित पक्षिवृन्दों ने भी पृथ्वो तल पर पंख फैला, नमित चंचु हो क्रन्दन १ किया ।
प्रचलायितेन,' 'सुमहद्दुःख' का 'स्वमहद्दुःखः' जहाँ न जाने कितनी मिलनयामिनियों में अपनो महद्दुखः', 'पूत्कृतैः' का, पुत्कृतैः', 'फुत्कृतैः', 'हुत्कृतैः' सुखमय, रसमय, उल्लासमय समय व्यतीत किया तथा 'मनाक् श्वभ्रे' का पाठभेद 'मनः श्वभ्रे' 'पुनः था, उन सबको नमस्कार कर, उन्हें स्मृति के धवल श्वभ्रे' 'गवा श्वभ्रे' 'मनाः श्वभ्रे' 'मानाः श्वभ्रे' पटपर केवल लिखकर विदा हो रही थी । उस 'मनःश्वभ्रे' 'महच्छुव्वश्वभ्रे' पाठभेद मिलता है । कश्मीर मण्डल को उन्हो ने नमस्कार किया जहाँ श्लोकसंख्या ३७० में 'रध्युत्सङ्गं' का पाठभेद वे एक दिन रानी थी । आज रंक थी । करू ओर- 'रप्युत्सङ्गे' तथा 'रध्युरसङ्गे' मिलता है । छोर अज्ञात जगत् मे अनजाने भटकनेवाली थीं उस श्लोकसंख्या ३७१ में 'पर्यन्ताद्रि' का 'पर्य- पवित्र मातृभूमि का जिसे वे पुनः नही देख सकेंगी स्ताद्रि' तथा 'क्षिपत्सु' का पाठभेद 'जहत्सु' और जो केवल उनकी स्मृति मे शेष रह जायगी अन्तिम 'जहत्सु' मिलता है ।
विषयटिप्पणियाँ : इस ३१ (१) नमितं चंचु : कल्हण ने करुण धुर दक्षिण २.को यहाँ पराकाष्ठा कर दी है। मूल प्रचलित ये । वाल समझने पर ही पदलालित्य का रस समग्र इस प्रकार के ३ । हस्तिमात्रान् महाकायाःरन्त करुण दृश्य कल्हण ने पर्वतांश्च समुत्पाटय यन्त्रैः अपनो जन्मभूमि जहाँ उन [ महाकाय महाबली कां। जहाँ युवती हुई थी । वोल घोरज देन करुणा दृश्य का हो गया । वे बैठे- गये । अपने घोपलों से रामाः', का 'विच- 'मासीनप्रचलायितेन' 'मासिन प्रचलायितेन' 'सासीनप्रल्यायितेन' 'मासीन सम्मुख पंख फैलाकर नमस्कार किया ।
प्रथम तरंग ३६१ स्तनयुगललग्नस्रस्तमूर्धांशुकानां त्रिकवलनविलोलं वीक्ष्य दूरात्स्वदेशम् । अवहत रुदतीनां मौलिविन्यस्तहस्तं पथि नृपवनितानामश्रुभिर्निर्झराम्भः ॥३७२॥ ३७२. पीछे मुड़कर दूर से स्वदेश को देखकर, शिर से गिरे वस्त्र को स्तन युगल पर सम्हालती, तथा मस्तक पर हाथ रख कर रुदन करती, नृपवनिताओ के अश्रुओं से, मार्ग में निर्झर जल बहने लगा । प्रीतिस्थैर्यैरुचितवचनाप्तिभया शोकशान्त्या निर्व्याजाज्ञाग्रहणगुरुभिस्तैश्च तैश्चोपचारैः । तस्य स्नेहादुपगतवतो राज्यविभ्रंशदुःखं मन्दीचक्रुः स्वभुवि सुजना भूपतेर्भूमिपालाः ॥३७३॥ ३७३. स्थिर प्रीतियों से, उचित वचन प्रयोग से, शोक शान्ति से, अकारण आज्ञा ग्रहण करने की गम्भीरता से, स्नेह से तथा और भी उन-उन उपचारों द्वारा अपनी भूमि में आये इस भूपति के राज्य विभ्रंश के दुःख को सज्जन भूमिपालों ने मन्द कर दिया। दी और स्वयं नमित चंचु होने लगे किन्तु दैव का हृदय उनके दुर्दिन को देखकर भी नहीं पसीजा। मानव हृदय उनके भाग्य विपर्यय पर इस विदाई के समय उन्हें बिदाकर दो बूँद आँसू भी नही बहा सका । वह काम किया पक्षियों ने। पाठभेद : श्लोकसंख्या ३७२ ये 'तलनग्न' का 'बलनद्ध'; 'विलोलं' की 'विलोमं'; 'नृपवनितानां' का 'प्लवलानां वलं कृत' पाठभेद मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ३७२ (१) श्लोक संख्या ३६८ से ३७८ तक करुण रस से ओत प्रोत संस्कृत साहित्य एवं काव्य में उत्कृष्ट माने जायेगा। कल्हण करुण रस व्यक्त करने की प्रतिभा का स्वयं एक उदाहरण उपस्थित करता है । इसी प्रकार का उदाहरण स्पेन के इतिहास में मिलता है । स्पेन का अन्तिम मूर राजा बोअबदिल को सन् १४९२ ई० में फेस्टिलियन ने निर्वासित कर दिया। वह जब अपने राज परिवार के साथ ४६ पदुल पर्वत पर पहुँचा तो अन्तिम बार उसने करुण दृष्टि से ग्रनडा को देखा । जहाँ पर बोअबदिल ने पर्वत पर अन्तिम बार ग्रनडा को देखा था और स्पेन से विदाई ली थी उसे आज भी 'एल डलटियों सीसपिरो-डेल-मोरो' अर्थात् 'मूर की अन्तिम आह' कहते हैं । राजा युधिष्ठिर किस दिशा में गया था, किस मार्ग, संकट किंवा द्वार से कश्मीर का त्याग किया था, किस स्थान से रानियों ने अपनी मातृभूमि कश्मीर मण्डल का अन्तिम दर्शन कर उसे पुष्पांजलि अर्पित की थी । पता नही चलता । कल्हण इस घटना स्थल के विषय में शान्त है । उसको यह शान्ति इस बात को प्रकट करती है। उसने किसी प्रचलित श्रुति के आधार पर अथवा पूर्व इतिहासकारों के अत्यन्त गूढम सूत्र के आधार- पर उक्त वर्णन लिखा है । राजा युधिष्ठिर तथा उसके राज्य की परिस्थिति, विद्रोह, भ्रष्टशासन, मन्त्रियों के कुमन्त्र आदि घटनाओं का वर्णन 'दशकुमारचरित' में कवि
३६२ राजतरंगिणी
दण्डो ने अवन्तिवर्मा तथा अश्मकदेशाधिपति के सन्दर्भ में किया है। (८:५-३०) पाठभेद : श्लोक संख्या २७३ में 'शान्त्या' का 'कान्त्या' पाठभेद मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ३७३. (१) भूमिपाल और अलकसुन्दर (सिकन्दर) : हसन लिखता है कि अन्धयुधिष्ठिर बाहर जाने पर बाहरी राजाओं द्वारा मार डाला गया था। यह नितान्त कपोलकल्पना है। कल्हण इसका ठीक उलटा वर्णन करता है। बाहरी राजाओं के सुव्यवहार के कारण वह अपने राज्य त्याग का दुःख भूल गया था। (२) राज्यपाल : कल्हण ने राजतरंगिणी में इस राजा का राज्यकाल नहीं दिया है। किन्तु उसने प्रथम तरंग के राजाओं के राज्यकाल का कुल योग गोनन्द (प्रथम) से युधिष्ठिर (प्रथम) तक २२६८ वर्ष दिया है। उसके अनुसार गणना करने पर युधिष्ठिर का राज्यकाल ३४ वर्ष ३ मास १ दिन आता है। आईने अकबरी ने राज्यकाल ४८ वर्ष १० दिन दिया है। यह काल गलत गणना के कारण त्रुटिपूर्ण है। पाठभेद के आधार पर गणना की जाय तो ३३ वर्ष ९ मास तथा ७ दिन आता है। गोनन्द तृतीय से युधिष्ठिर प्रथम तक २१ राजाओं का वर्णन कल्हण करता है। गोनन्द तृतीय का राज्याभिषेक लौकिक संवत् १८१४ में हुआ था। गोनन्द तृतीय से नरेन्द्रदित्य अर्थात् २० राजाओं का राज काल ९६७ वर्ष ८ मास तथा २३ दिन होता है। श्लोक संख्या ३४५ में ६ मास के स्थान पर ६ दिन की गणना करने से अवश्य अन्तर पड़ जाता है। वह होता है। ९६८ वर्ष २ मास २३ दिन। गोनन्द प्रथम का राज्याभिषेक लौकिक संवत् ६२८ में हुआ था। गोनन्द से लेकर अभिमन्यु तक के राजाओं का राज्य काल १२६६ वर्ष होता है। अर्थात् लौकिक संवत् ६२८ से १८९४ है। श्लोक संख्या ४८ में कल्हण लिखता है-'गोनन्द प्रथम तथा उसके उत्तराधिकारियों ने २२६८ वर्ष कलियुग में शासन किये। यह गणना कुछ लेखकों के मत से त्रुटिपूर्ण लगती है। उन्होंने माना है कि भारत युद्ध द्वापर के अन्त में हुआ था। श्लोक संख्या ५४ में कल्हण कुल ५२ राजाओं का राज्य काल १२६६ वर्ष देता है। इस प्रकार २२६८ में से यदि १२६६ वर्ष घटा दिया जाय तो केवल १००२ वर्ष बचता है। यह काल गोनन्द तृतीय से युधिष्ठिर तक का होता है। गोनन्द तृतीय से नरेन्द्रदित्य का शासन काल ९६७ वर्ष ८ मास २३ दिन होता है। यदि इस काल को १००२ वर्ष में से घटा दिया जाय तो युधिष्ठिर प्रथम का राज्यकाल ३४ वर्ष ३ मास १ दिन आता है। श्री एस. पी. पण्डित ने गोनन्द वंश के प्रथम तरंग के राजाओं के राज्यकाल की गणना १०१४ वर्ष ६ मास ९ दिन दी है। इसमे राजा युधिष्ठिर का राज्य काल न दिया गया है केवल लिख दिया गया कोई समय नहीं दिया गया है। गोनन्द तृतीय का राज्याभिषेक ईसापूर्व ११८४ वर्ष दिया गया है। युधिष्ठिर का राज्याभिषेक ईसा पूर्व २१७ वर्ष दिया है। युधिष्ठिर का राज्यकाल का समय न सम्मिलित करने पर इस गणना के अनुसार ९६७ वर्ष आता है। यदि प्रत्येक राजा का, शासन काल का समय गोनन्द तृतीय से नरेन्द्रदित्य अर्थात् युधिष्ठिर के राज्याभिषेक दिन तक का समय जोड़ा जाय तो ९६६ वर्ष १६ दिन होता है। गोनन्द वंश के प्रथम तरंग के राजाओं का जो जोड़ दिया गया है वह १०१४ वर्ष ९ माह ९ दिन दिया गया है। यदि १०१४ वर्ष ९ माह ९ दिन मे से ९६६ वर्ष १६ दिन निकाल दिया जाय तो ४८ वर्ष ८ मास २३ दिन बचता है। किन्तु श्री स्टीन की कल्हण आधारित गणना मानी जाय तो वास्तव में ३४ वर्ष ३ मास १ दिन आता है। श्री एस. पी. पण्डित के अनुसार ईसा पूर्व २१७ वर्ष में युधिष्ठिर सिंहासन पर बैठा था। श्री स्टीन के अनुसार यह दिन लौकिक संवत् २८६१ वर्ष ८ मास २९ दिन होना चाहिए।
हसन—'अन्ध युधिष्ठिर के राज्यकाल में सिकन्दर का आना हसन लिखता है। मै उसे यहां उद्धृत इसलिए करना चाहता हूँ कि कम से कम इस एक घटना के उल्लेख के कारण रत्नाकर पुराण, उसके मुतरजम तथा हसन तीनो को इतिहास के साक्षियों तथा प्रमाणों के सम्मुख कही खड़े होने की जगह नही मिल सकेगी। हसन—'मुतरजम रत्नाकर लिखता है कि अन्ध युधिष्ठिर के आखिर दौर हकूमत के सिकन्दर फील कौस जिसे मशरिके वाशिन्दे महायोन कहते थे, बड़ी भारी लश्कर के साथ हिंदुस्तान की तसखीर के लिए आया । जब दरिया नीलाब से गुजरा तो हिंदुस्तान के तमाम राजे-महाराजाओं में जलजला पड गया। राजा युधिष्ठिर का भाई जिसका नाम अभीसतर और कश्मीर के बाहर वाले कोहिस्तानी इलाके का हुक्मरां था सिकन्दर की खिदमत मे तोहफे ले जाकर मुअजिज व मुकरम हुआ । सिकन्दर से अपने भाई के बर खिलाफ मदद मांगी । चुनाचः सिकन्दर ने एक भारी फौज उसकी इमदाद के लिए मुकर्रर कर दी । अन्ध युधिष्ठिर मुकाबला की नाव न लाकर हिन्दुस्तान की तरफ भाग खडा हुआ और उसकी जगह अभीसतर मुल्क कश्मीर का हाकिम क़रार पाया। दूसरी तरफ अन्ध युधिष्ठिर ने भी राजा पूरन से इमदाद मांगी। चूंकि पूरन खुद सिकन्दर के साथ मसरूफ जंग था। इस बिना पर युधिष्ठिर की इमदाद से कासिर रहा । यह देखकर अन्य युधिष्ठिर पूरन की तरफ से सिकन्दर के साथ मसरूफ पैकार हुआ । और नतीजतन दौरान जंग मारा गया। इस वाकया के बाद ही सिकन्दर ने कश्मीर के जनूबी पहाड़ी इलाके से खुद कश्मीर मे नजूल किया और कुछ अरसा सैल-शिकार में मसरूफ रहा । एक दिन खुदा के करने से मौक़ा पर एक तीर सिकन्दर के बाजू पर लगा । जब तीरन्दाज को गिरफ्तार कर लाये तो मालूम हुआ कि यह अबेस्तर का पढ़ाया आदमी था । और सिकन्दर के मारने पर मुतमइन था । सिकन्दर पर जब यह हाल खुला तो उसकी आतिश गजब की कोई हद न रही। और उसने जुर्म की पादाश मे अभीसतर को मय उसके रिश्तेदारों के क़तल कर डाला । इसके बाद मुल्क की हकूमत राजा परताप को जो मालवा के राजो में से था और राजा विक्रमाजीत अजदाद में से है अता करके खुद अपने मुल्क को वापस चला गया । वाल्हा आलम । सिकन्दर कश्मीर में नही आया था । (पृष्ठ ५० तथा ५१ ) इस विषय पर भारतीय इतिहासकारों की आलोचना करता हुआ हसन लिखता है : हिन्दुस्तानी तारीखदाँ लिखते है कि सिकन्दर फिलकोश ईसा की पैदा build-up/पैदाइश से साढ़े तीन सो साल कबल रूम के दारुल खलाफा से निकला और थोडे से मुद्दत में इराक, रूम, अरब और फिदगिस्तान वगैरह मुमालिक फतह कर लिए । ईसा से ३३१ साल पेस्तर फारस पर फ़तह करने की गरज से हमला किया और तीसरे हमले में वहाँ के बादशाह दारासन, दाराव बिन बहमन को क़तल करके ईरान और खुरासान की सलतनतें अपने क़ब्जा इकतदार में ले आया । और चूंकि हिन्दुस्तानी राजे-महाराजे दाराव के अहद हकूमत में सल्तनत ईरान के बाज गुजार थे इस ख़याल के पेश नजर सिकन्दर ने फतह हिन्द भी लाजमी और जरूरी समझे । चुनांचे : ३२७ क़बल मसीह में एक भारी लश्कर के हमराह दरयाए नीलम अबूर करके हिन्दुस्तान हुक्मरान राजे-महाराजों में संहलक मचा दिया । अरसा चार साल से सिकन्दर की शाही फौजो ने बर्फानी पहाड़ो में सफर की सख्तियां बरदास्त की थीं। इसके साथ ही लड़ाइयो और मुसलसल जंग व जदाल के बाथश थककर, चूर हो गयी थीं, और गरमियों में पंजाब में रहने की वजह से उनमें से अक्सर बुखार में मुवतिला हो गये थे । इस वजह से उन्होने हिन्दुस्तान पर हमला करने में जल्दी न की । उन दिनों हिन्दुस्तान में तीन राजे मशहूर थे । अभीसतर कश्मीर और उसके आसपास के पहाड़ी
३६४ राजतरंगिणी
इलाके का फरमान रहा। दूसरा दोआब सिन्धु और झेलम का महाराजा टेकसिला। तीसरा हस्तिनापुर का राजा पोर। अबीसतर ने बेशुमार तोहफे व तहायक के जरिये सिकन्दर का इस्तकबाल किया। राजा टेकसिला ने सिर्फ बारयाबी हासिल करके सिकन्दर की अपने घर दावत की और पूरी शान व शौकत से दावत फराज बजा लाया। बादशाह ने अपनी थकी हुई फौजों को वहाँ छोड़कर खुद दरयाए झेलम के किनारे डेरे डाल दिये। लेकिन उस तरफ से राजा पौर एक भारी फौज के साथ आया और दरया के उस किनारे मोरचा बना लिया। इन दिनों दरया झेलम शिद्दत बरसात के बाइस तफ पानी पर था। सिकन्दर के लिए दरया का अबूर करना बहुत मुश्किल हो गया। आखिरकार दस मील ऊपर की तरफ जाकर रात को दरया पार किया। राजा पोर एक जबरदस्त लड़ाई के बाद सिकन्दर के हाथ कैदी हुआ। लेकिन सिकन्दर ने इन्तहाई रहम से काम लेकर राजा पोर को उसका मुल्क मौरूशी वापस कर दिया। बाद भजोई वकील मुसन्निफ वकाअ कश्मीर को सैर को रवाना हुआ। लेकिन हिन्दुस्तानी वकाअ निगार सिकन्दर के कश्मीर जाने के मुतल्लिक बिलकुल खामोश हैं। लेकिन वकाअ काश्मीर के मुसन्निफ का बयान हकीकत से खाली नहीं है। मुख्तसर यह कि सिकन्दर दोआब व चज का मुल्क राजा पोर को सौंप दिया और खुद रावी और चिनाव को पार करके मुकाम सागला में कौम तातार के १९ हजार आदमी मौत के घाट उतार दिये। यहाँ से मुल्क बिहार के फतह करने का इरादह उसके दिल में था लेकिन उसके सिपाही हिन्दुस्तान में मजीद आगे बढ़ने से मुनकर हो गये। इसलिए लाचार सिकन्दर को हिन्दुस्तान के मुकम्मल तसखीर दूसरे मौका पर छोड़नी पड़ी। और अपने मुल्क के वापस का इरादह कर लिया। दो हजार किश्तियाँ फिल अल फौरन बनवाई गईं। एक लाख बीस हजार पैदल सिपाही। दो सौ हाथी किश्तयो में बैठाकर दरियाए सिन्धके जरिये रवाना कर दिये। बाकी फौज दरया के दोनों किनारे खुश्की से चलती रही। पांच सौ कोस तै करने के बाद यह तमाम किश्तियां समुन्दर के दहाना पर पहुँच गयीं। वहाँ से सिकन्दर जो खुश्की के रास्ते रवाना हुआ था और नयारकंस ने जो उसके बाहरी बेड़े का अफसर था दरया का सफ़र कुल सात महीने में तै किया। सिकन्दर ने ३२३ बरस कब्ल मसीह के वफ़ात पायी। (पृष्ठ ५१-५२।) हसन तथा वकाअ कश्मीर के लिखने का कुल तात्पर्य यह है कि कश्मीर के इतिहास पर एक खास रंग चढ़ाने के लिए सिकन्दर को 'कश्मीर के अन्दर दाखिल' करते हैं। हज़रत नूह, हज़रत सुलेमान तथा हज़रत ईसा का नाम कश्मीर के इतिहास से जोड़कर उस पर विदेशी रंग चढ़ाने की कोशिश की गयी है। सिकन्दर को काश्मीर जैसे दुर्गम स्थान में आना, उसकी यात्रा तथा कश्मीर का वर्णन यूनानी इतिहासकारों का नहीं करना, जब कि उन्होंने छोटी-से-छोटी बातें लिखी हैं, आश्चर्यजनक तथा असम्भव कही जायेगी। हसन तथा वाकए कश्मीर के लेखकने कुछ नही बताया है कि उन्होंने सिकन्दर के कश्मीर में दाखिल करने की बात कहाँ से पाई है। यदि सिकन्दर कश्मीर में प्रवेश किया होता तो उसका समय अशोक के काल के पूर्व हसन की गणना तथा राजाओं की तालिका के अनुसार होना चाहिए। राजा शचीनर का काल हसन के अनुसार क० संवत् १२३३ बैठता है। राजा स्वर्ण का समय क० संवत् ११६६ होता है। हसन राजा शचीनर का राज्यकाल नही देता। परन्तु तीनों का समय मिलाकर १०४ वर्ष अर्थात् कलयुग १२७३ होता है। हसन राजा शचीनर के पश्चात् राजा गल- गन्दर जिसे शचीनर का भतीजा कहता है कलि संवत् १३४३ मे राज्य करना बताता है। राजा अशोक का राज्यकाल क० संवत् १६५५ लिखता है यह भी लिखता है कि अशोक राजा शचीनर वल्द
प्रथम तरंग ३६५ इति श्रीकाश्मीरकमहामात्यचम्पकप्रभुसूनोः कल्हणस्य कृतौ राजतरङ्गिण्यां प्रथमस्तरङ्गः ॥ इस प्रकार श्री कश्मीर के महामात्य चम्पक प्रभु के पुत्र कल्हण कृत राजतरंगिणी में प्रथम तरंग समाप्त हुआ ।
शकुनी के पोतों में से था । हसन ने इसी प्रकार अशोक के पूर्व राजा भगवन्त का कलि संवत् १६४१ में होना बताया है । इतिहास सिकन्दर का आक्रमण काल ३२७ वर्ष पूर्व ईसा देता है । यह समय अनेक साक्षियों से प्रमाणित हो चुका है । ईरान का काल उक्त संवतो के कारण उलझन में पड़ जाता है। सिकन्दर का आना अशोक के पूर्व होता है । हसन रत्नाकर पुराण के आधार पर उसका उल्लेख कर अशोक के पश्चात् ३५ राजाओं के वर्णन के पश्चात् सिकन्दर का कश्मीर मे आना लिखता है। अशोक का काल हसन ने १२५५ क० संवत् तथा राजा अन्ध युधिष्ठिर का समय कलि संवत् २८२८ देता है । बात यही नही समाप्त होती । उसने मिहिरकुल तथा सम्राट् कनिष्क के पश्चात् अन्ध युधिष्ठिर का समय रखता है । तथा उसी के समय सिकन्दर का आना लिखता है । कनिष्क के पूर्व वर्ष, मिहिरकुल के पूर्व वर्ष सिकन्दर का आना प्रमाणित हो चुका है। अतएव हसन का संवत्, उनका दिया काल, राजाओ की तालिका आदि भ्रामक अनुमान पर आधारित, इतिहास को एक विशेष जमाना देने की गरज से लिखा गया है । हसन ने पुनः अपने पुराने सिद्धान्त की पुनरावृत्ति की है कि उसका आधार रत्नाकर पुराण का अनुवाद है। वह अनुवाद जैनुल आबदीन के समय में किया गया था। उसे अनुवाद मिला । वितस्ता में वहू यात्रा कर रहा था । नाव डूब गयी ।
रत्नाकर पुराण भो डूब गया । मैं कह सकता हूँ कि या तो रत्नाकर पुराण मिथ्या है अथवा इतिहास को अपने रंग में रंगने के लिए रत्नाकर पुराण का सहारा लिया गया है । यदि कभो कोई रत्नाकर पुराण था भी तो वह तर्क के आधार पर मिथ्या प्रतीत होता है । प्रमाणों की कसौटी पर हसन तथा मटरजप रत्नाकर पुराण तथा पुराण तीनो ही सत्य नहीं उतरते । पुराणों का मैने अध्ययन किया है। पुराण गणना में भूल नही करते । असंगत बात नही लिखते । प्रमाण के लिए किसी ऋषि आदि के वाक्यौ का आश्रय लेते हैं। उनको वर्णन शैली मौलिक और निराली होती है । रत्नाकर पुराण का वर्णन केवल कपोलकल्पना मात्र है । पाठभेद : इति पाठ में 'काश्मीरक' का 'काश्मीरिक' 'चम्पक' का 'श्री चापाकं' पाठभेद मिलता है । इतिपाठ : पादटिप्पणी : 'इति' पाठ के पश्चात् पाण्डुलिपियों में निम्न- लिखित श्लोक लिखा मिलता है : 'चतुर्दशाधिकं वर्षं सहस्रं नव वासराः । मासाश्च विगता ह्यस्मिन्नेकविंशतिराजसु ॥ पाठभेद : उक्त श्लोक में 'चतुर्दशाधिकं' का 'चतुर्विशा- धिकं' तथा 'ह्येकविशति' का 'भ्रष्टान्विशति' पाठभेद मिलता है । इससे कल्हण के यह लिखने का समय स्थिर हो जाता है ।
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