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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

५२० राजतरंगिणी शतद्रुं च ततस्तीर्त्वा ऋषिगंगो च निम्नगाम् । तच्च भक्तस्य विप्रस्य नित्यं धर्मानुनिष्ठतः । भर्तृनाथमथासाद्य देवसुन्दरमेव च ॥132:१०५॥ मोक्षदं मुनयः स्नानं गंगायां स्वर्गदं विदुः ॥ × × × ॥ 311:४१२ ॥ मकरेण ययौ गंगा कूर्मेण यमुना नदी। × × × वृषारूढा शतद्रुश्च महिषेण सरस्वती ॥153:२०५॥ स्वैराजिकानां मन्थेन मात्राणां चैव भागशः । × × × भोगप्रस्थमतिक्रम्य गंगया सह संगता ॥320:४२१॥ कथं सती शची गंगा अदितियँमुना दितिः । × × × सरिद्रूमिह संप्राप्ता या च देवी करीषिणी॥238:३१५॥ अदितिश्च दितिश्चैव शची च मनुजेश्वर । × × × सपत्न्य सुता या च या च गंगा सरिद्वरा॥322:४२३॥ अदितिश्च दितिश्चैव शची गंगा च निम्नगा । × × × एवमस्त्वित्यथारूढवन्तः गोमान् च करीषिणी॥241:३१९ सीता वंक्षुश्च सिन्धुश्च सप्तगंगाश्च मानद । ३२० ॥ सुप्रभा काञ्चनाक्षी च विशाला मानसा हृदा ॥ × × × ॥ 599:७२० ॥ शक्ता हि पावने ब्रह्म त्रैलोक्यस्यापि सा भवेत् । × × × अदितिश्च दितिश्चैव या च गंगा महानदी ॥ गंगा सपूजनं कार्यं तस्मिन्नहनि काश्यप । एवं क्रमेण सा देवी गृह्णात्यथ सरिद्वरा । ब्रह्मलोकात्त्रिपथगा पृथिव्यामवतारयत् ॥681:८०६, जगाम गंगया सार्धं संयोगं सिन्धुना सह॥290:३८८- ८०७ ॥ ३८९ ॥ × × × × × × नमः शशांकलेखांकजटाभार महेश्वर । तस्यस्य सुता देवी गंगास्नेहेन मन्त्रिता । गंगारंगनिर्धूत जटामार नमोऽस्तु ते॥1091:१२८९॥ यदुमानान्मुनेर्भक्त्या स्वेनांशेन व्यवर्धत॥294:३९३॥ × × × वितस्तां तु सरिच्छ्रेष्ठां सर्वकल्मषनाशिनीम् । तत्र गंगा सरिच्छ्रेष्ठा चन्द्रभ्रष्टा प्रतिष्ठिता । × × × यस्यां स्नातस्य पूयन्ते सर्वपापान्संशयम् ॥ गंगा सिन्धुस्तु विज्ञेया वितस्ता यमुना तथा ॥295: ॥ 1243:१४५६-१४५७ ३९४ ॥ × × × × × × राजसूयमवाप्नोति गंगामानुषसंगमे । स प्रयागसमो देशस्तयोर्यत्र तु संगमः । देवतीर्थे नरः स्नात्वा भवत्यमरपूजितः ॥ गंगातोयमथादाय गंगो तु यमुनाऽब्रवीत् ॥296:३९५ ॥ 1244:१४५७-१४५८॥ ३९६ ॥ × × × × × × गंगोद्भेदे नरः स्नात्वा भेदादेवीसमीपतः । तामब्रवीत्ततो गंगा भूय एव मया तव । गंगास्नानफलं प्राप्य स्वर्गलोके महीयते ॥ हनंश्यं नाम सुभगे यदाऽहं सिन्धुसंगिता॥298:३९७- ॥ 1309:१५२२-१५२३ ॥ ३९८ ॥ × × × × × ×

तृतीय तरंग ५२१ क्रमवर्ताभिधाने स प्रदेशे प्राप्तवांस्ततः । ढक्कं काम्बुवनामानं योऽद्य शूरपुरे स्थितः ॥ २२७ ॥ २२७. तदनन्तर वह क्रमवर्त नामक प्रदेश में काम्बुव १ संज्ञक ढक्क २ पहुँचा जो आज शूरपुर ( सोपुर ) में स्थित है । वितस्तातो महीनाथ न गंगा व्यतिरिच्यते । कश्मीर में ढक्क सैनिक चौकी अथवा वाच केवलं जाह्नवीतोये पुरुषस्यास्थिसंभवः ॥ स्टेशन को कहते हैं। कश्मीर के इतिहास में ढक्क ॥ 1373:१५८७ ॥ के प्रबन्ध तथा रक्षा पर राजाओं ने बहुत जोर दिया x - x x है। ढक्क के कारण कश्मीर में अवाञ्छनीय तत्त्वों वितस्तातोऽधिको राजन् स्नानाद्यं तुल्यमेव च । का प्रवेश नही हो सकता था। ढक्क प्रायः दर्रों, भागीरथेन संगत्यं पुरा राज्ञाऽवतारिता ॥ 1374:१५९०॥ प्रवेश स्थान तथा सैनिक महत्त्व के स्थान पर सुरक्षा तथा नियन्त्रण की दृष्टि से बनाये गये थे । x x x अवन्तिवर्मा के मन्त्री शूर ने क्रमवर्त स्थि । गंगानदी शंभुजटाकलापं, चंद्रेण देवेन तथा विभिन्ना । ढक्क को शूरपुर में स्थापित किया था। शूरपुर प्रोक्ता नृलोके नृप चन्द्रभागा, वर्तमान हूरपुर किंवा होरपुर है। रामब्यार नदी आयाति पुण्यं विततां वितस्ताम् ॥ 1391 ॥ की हरी भरी सुहावनी उपत्यका में स्थित है। पाठभेद : ढक्क किंवा द्रंग पर्वतीय दर्रों के प्रवेश मुख पर श्लोक संख्या २२७ में 'वर्ता' का पाठभेद सुरक्षा निमित्त निर्मित किये जाने थे। इसका काम 'वत्ता' मिलता है । बाहर से आने वाले सामान से चुंगी वसूल करना तथा पादटिप्पणियाँ : देश की सुरक्षा दोनों से होता था। शूरपुर के चुंगी २२७ ( १ ) क्रमवर्त : वर्तमान कमेंवन कोठ, का यह स्थान उस जगह देखा जा सकता है जहाँ पीर पंतसल मार्ग पर है । बादशाह ज़ैनुल आबदीन ने अभिसार से आने वालों के लिये शिविर किंवा पड़ाव अथवा छाउनी ( २ ) काम्बुव : वह ढक्क का नाम है। पीर- बनवाया था। पंतसल मार्ग पर है । द्रंग का अर्थ रक्षा स्थान होता है। श्रीवर ढक्क : इस शब्द का अर्थ रणजीत सीताराम ने उसे गुल्म भी कहा है। द्रंगिका, द्रामिका, पण्डित ने डमस्टेशन (नगाड़ा की चौकी ) लगाया द्रंगिन आदि समानार्थक शब्द वल्लभी राजाओं के है। उसे विरोचन किंवा अवलोकन चौकी कहा है। ताम्रपत्रों में प्रयुक्त किया गया है। पुराने मुग़ल स्टीन ने इसका अर्थ सैनिक चौकी किया है। ढक्क बादशाही मार्ग पर यात्री के लिए बाज़ार, निवास शब्द प्राचीन है। नीलमत पुराण में ढक्क शब्द आदि की सुविधा प्राप्त होती थी। यह पर्वतीय मिलता है। वह एक नाग है। उस स्थान पर धुक्क व्यवधान पार करते ही किञ्चित् मैदान के पश्चात् के स्थान पर धुक्क का भी पाठभेद मिलता है। मिलता है। कल्हण ने राजतरंगिणी में इसका वीरभद्रात्तनी नागौ नागौ सारमपुक्ककौ । कई बार उल्लेख किया है। रक्ताकश्च तथा चक्को गौशो चंड जगस्तथा ॥ मंख के कोश में द्रंग रक्षा स्थान का समानवाचक 221 : १०८७-१०८८ कहा गया है। द्रंग का कहीं-कहीं मार्गेश अर्थात् ६६

५२० राजतरंगिणी शतद्रू ं च ततस्तीर्त्वा कपिगंगां च निम्नगाम् । तव नस्तस्य विप्रस्य नित्यं धर्मानुतिष्ठतः । अनुनाथमथायाय देवसुन्दं तथैव च ॥ 132:१०५॥ मोक्षदं मुनयः स्नानं गंगायां स्वर्गदं विदुः ॥ × × × ॥ 311:४१२ ॥ मकरेण ययौ गंगा कूर्मेण यमुना नदी। × × × वृषारूढा शतद्रुश्च महिषेण सरस्वती ॥ 153:२०५॥ स्वैराजिकानां मध्येन मात्राणां चैव भागशः । भोगप्रस्थमतिक्रम्य गंगया सह संगता ॥320:४२१॥ × × × कथं सती शची गंगा अदितियैमुना दितिः । × × × मरिचिमिसंप्राप्ता या च देवी करीपिणी॥238.३१५॥ अदितिश्च दितिश्चैव शची च मनुजेश्वर । तपनन्य सुता या च या च गंगा मरिद्वरा॥322:४२३॥ × × × अदितिश्च दितिश्चैव शची गंगा च निम्नगा । × × × एवमस्त्वित्यथःपन्त नोमान च करीपिणी॥241:३१९ सीता वंक्षुश्च सिन्धुश्च सप्तगंगाश्च मानद । ३२० ॥ सुप्रभा काञ्चनाक्षी च विशाला मानसा हृदा ॥ × × × ॥ 599:७२० ॥ शक्ता हि पावने यज्ञा त्रैलोक्यस्यापि सा भवेत् । × × × अदितिश्च दितिश्चैव या च गंगा महानदी । गंगा सपूजनं कार्यं तस्मिन्नहनि काश्यप । एवं क्रमेण सा देवी गृहात्यथ सरिद्वरा । ब्रह्मलोकात्त्रिपथगा पृथिव्यामवतारयत् ॥681:८०६, जगाम गंगया सार्धं संभोगं सिन्धुना सह॥290:३८८- ८०७ ॥ ३८९ ॥ × × × × × × नमः शशांकलेखांकजटाभार महेश्वर । तस्य सुता देवी गंगास्नेहेन मन्त्रिना । गंगारंगनिर्घूष जटाभार नमोऽस्तु ते॥1091:१२८९॥ बहुमानान्मुनेर्भक्त्या स्वेनांशेन व्यवर्धत॥294:३९३॥ × × × वितस्तां तु सरिच्छ्रेष्ठां सर्वकल्मषनाशिनीम् । तत्र गंगा सरिच्छ्रेष्ठा चन्द्रभ्रष्टा प्रतिष्ठिता । यस्यां स्नातस्य पूयन्ते सर्वपापान्‍यसंशयम् ॥ × × × गंगा सिन्धुस्तु विज्ञेया वितस्ता यमुना तथा ॥ 295: ॥ 1243:१४५६-१४५७ ३९४ ॥ × × × × × × राजसूयमवाप्नोति गंगायानुससंगमे । स प्रयागसमो देशस्तयोर्यत्र तु संगमः । देवतीर्थे नरः स्नात्वा भवत्यमरपूजितः ॥ गंगानोयमथादाय गंगां तु यमुनाऽब्रवीत् ॥296:३९५ ॥1244:१४५७-१४५८॥ ३९६ ॥ × × × × × × गंगोद्भेदे नरः स्नात्वा भेदादेवीसमीपतः । तामब्रवीत्ततो गंगा भूय एव मया तव । गंगास्नानफलं प्राप्य स्वर्गलोके महीयते ॥ हर्षार्थं नाम सुभगे यदाऽहं सिन्धुसंगिता॥298:३९७- ३९८ ॥ ॥ 1309:१५२२-१२२३ ॥ × × × × × ×

तृतीय तरंग ५२१ क्रमवर्ताभिधाने स प्रदेशे प्राप्तवांस्ततः । ढक्कं काम्बुवनामानं योऽद्य शूरपुरे स्थितः ॥ २२७ ॥ २२७. तदनन्तर वह् क्रमवर्त नामक प्रदेश में काम्बुव १ संज्ञक ढक्क २ पहुँचा जो आज शूरपुर ( सोपुर ) में स्थित है । वितस्तातो महीनाथ न गंगा व्यतिरिच्यते । केवलं जाह्नवीतोये पुरुषस्यास्थिसंभवः ॥ ॥ 1373:१५८७ ॥ × × × वितस्तातोऽधिको राजन् स्नानाद्यं तुल्यमेव च । भागीरथेन गंगेयं पुरा राजाऽवतारिता॥1374:१५९०। × × × गंगानदी शंभुजटाकलापे, चंद्रेण देवेन तथा विमिश्रा । प्रोक्ता नृलोके नृप चन्द्रभागा, आयाति पुण्यं विततां वितस्ताम् ॥ 1391 ॥ पाठभेद : श्लोक संख्या २२७ में 'वर्ता' का पाठभेद 'वत्ता' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : २२७ (१) क्रमवर्त : वर्तमान कमेनन कोट, पीर पंतसल मार्ग पर है । (२) काम्बुव : वह ढक्क का नाम है । पीर- पंतसल मार्ग पर है । ढक्क : इस शब्द का अर्थ रणजीत सीताराम पण्डित ने डमस्टेशन ( नगाड़ा की चौकी ) लगाया है । उसे निरीक्षण किंवा अवलोकन चौकी कहा है । स्टीन ने इसका अर्थ सैनिक चौकी किया है । ढक्क शब्द प्राचीन है । नीलमत पुराण में ढक्क शब्द मिलता है । वह एक नाग है । उस स्थान पर धुक्क के स्थान पर धुक्क का भी पाठभेद मिलता है । वीरमद्राशनी नागौ नागौ सारसमुक्ककौ । रक्काकश्च तथा ढक्को गोशो वंश नगस्तथा ॥ 221 : १०८७-१०८८ ६६ कश्मीर में ढक्क सैनिक चौकी अथवा वाथ स्टेशन को कहते हैं । कश्मीर के इतिहास में ढक्क के प्रबन्ध तथा रक्षा पर राजाओं ने बहुत जोर दिया है । ढक्क के कारण कश्मीर में अवाञ्छनीय तत्त्वों का प्रवेश नहीं हो सकता था । ढक्क प्रायः दर्रों, प्रवेश स्थान तथा सैनिक महत्त्व के स्थान पर सुरक्षा तथा नियन्त्रण की दृष्टि से बनाये गये थे । अवन्तिवर्मा के मन्त्री शूर ने क्रमवर्त स्थित ढक्क को शूरपुर में स्थापित किया था । शूरपुर वर्तमान हूरपुर किंवा होरपुर है । रामण्यार नदी की हरी भरी सुहावनी उपत्यका में स्थित है । ढक्क किंवा द्रंग पर्वतीय दर्रों के प्रवेश मुख पर सुरक्षा निमित्त निर्मित किये जाते थे । इसका काम बाहर से आने वाले सामान से चुंगी वसूल करना तथा देश की सुरक्षा दोनों से होता था । शूरपुर के चुंगी का यह स्थान उस जगह देखा जा सकता है जहाँ बादशाह जैनुल आबदीन ने अभिसार से आने वालों के लिये शिविर किंवा पड़ाव अथवा छावनी बनवाया था । द्रंग का अर्थ रक्षा स्थान होता है । श्रीवर ने उसे गुल्म भी कहा है । द्रंगिका, द्रांगिका, द्रविण आदि समानार्थक शब्द वल्लभी राजाओं के ताम्रपत्रों में प्रयुक्त किया गया है । पुराने मुगल बादशाही मार्ग पर यात्री के लिए बाजार, निवास आदि की सुविधा प्राप्त होती थी । यह पर्वतीय व्यवधान पार करते ही किंचित् मैदान के पश्चात् मिलता है । कल्हण ने राजतरंगिणी में इसका कई बार उल्लेख किया है । मंख के कोष में द्रंग रक्षा स्थान का समान वाचक कहा गया है । द्रंग का कहीं-कहीं मार्गेश अर्थात्

५२२ राजतरंगिणी नानाजनपदाकीर्णे स्थाने तत्राथ शुश्रुवान् । काश्मीरिकान्महामात्यान्स्थितान्केनापि हेतुना ॥ २२८ ॥ २२८. वहाँ उसने सुना कि नाना जनपदाकीर्ण स्थान पर किसी कारण से काश्मीरी महामात्य स्थित हैं । ततोऽपनीतप्राग्वेषः प्रावृतो धवलांशुकैः । स जगामान्तिकं तेषां दातुं नृपतिशासनम् ॥ २२६ ॥ २२९. तदनन्तर पूर्ववस्त्र बदल धवल वस्त्र¹ धारण कर वह नृपति शासन देने के लिये उन लोगों के समीप गया । तं प्रयान्तं समुद्यद्भिः शकुनैः सूचितोदयम् । पान्थाः केऽप्यन्वयुर्दृष्टुं निमित्तानां फलोद्गमम् ॥ २३० ॥ २३०. गमन करते इसका कुछ पथिकों ने निमित्तों का फलोद्भव देखने हेतु अनुगमन किया , जिसका प्रकट होते शकुनों से उदय ( उत्थान ) ज्ञात था । मार्ग का अधिकारी के रूप में प्रयोग किया गया है। सम्राट् अकबर के काल में मार्गेश को मलिक कहते थे। कालान्तर में यह अधिकार मौसी अर्थात् आनुवंशिक उत्तराधिकार के रूप में हो गया था। उन्हें जागीर मिलती थी। कश्मीर में सिक्ख राज स्थापित होने पर जागीरें जब्त कर ली गयी थी। इस प्रकार के पूर्व जागीरदारों का पता सुपियान (हूरपुर के नीचे) शाहाबाद आदि स्थानों में मिलता है। क्रमवर्त के प्राचीन ढंग अथवा ढक्क स्थान का पता निश्चयात्मक रूप से मिल गया है। उसका नाम बिगड़कर कमेलन कोठ हो गया है। यह स्थान लगभग साढ़े पाँच मिल हूरपुर से दूर एक अलग पहाड़ी पर जहा पीर पंजाब की स्रोतस्विनियां तथा रूपरी दर्रा मिलता था। यहाँ पहाड़ी बड़ी लगभग दो सौ फिट ऊँची होगी। पहाड़ी पर २००x५० फिट की अधित्यका अर्थात् प्लेटो है। यहा पर दो अष्टपहले बुर्ज बने हैं जो सामरिक प्रकार से सम्बन्धित हैं। इस समय गिर गये हैं। ढक्क को पुलिस चौकी मानने का कुछ लेखकों ने प्रयास किया है। यह ठीक नहीं होगा। "क्रमवर्ताना कोट्टाः" का ही अपभ्रंश 'कमेलन कोठ' हो गया है। पाठभेद : श्लोक संख्या २२८ में 'श्मीरि' का पाठभेद 'श्मोर' मिलता है। श्लोक संख्या २२९ में 'प्रावृतो' का पाठभेद 'प्रवृत्तो' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : २२९ (१) धवल वस्त्र : यह प्राचीन आचार एवं परम्परा है कि देवस्थान, यात्रा एवं राजसभा में धवल किंवा नवीन अथवा स्वच्छ वस्त्र धारण कर लोग जाते थे। अन्यधर्मावलम्बियों में भी यही बात देखी जाती है। रविवार के दिन चर्च में ईसाई तथा शुक्रवार के दिन मुसलमान जुमा की नमाज़ में धुला किया स्वच्छ वस्त्र ऋतु के अनुसार धारण कर जाते हैं। पाठभेद : श्लोक संख्या २३० में 'फलोद्गमम्' का पाठभेद 'फलोद्गमे' मिलता है।

तृतीयः तरंग ५२३ श्रुत्वाऽथ विक्रमादित्यदूतः प्राप्त इति द्रुतम् । द्वाःस्थाः काश्मीरमन्त्रिभ्यस्तमासन्नं न्यवेदयन् ॥ २३१ ॥ २३१. 'विक्रमादित्य के दूत का आगमन सुनकर द्वारपालों ने उसकी उपस्थिति शीघ्र ही काश्मीरी मन्त्रियों से निवेदित की। 'आगच्छत प्रविशतेत्युच्यमानोऽथ सर्वतः । स तान्समस्तसामन्तानाससादानिवारितः ॥ २३२ ॥ २३२. 'आइये, प्रवेश कीजिये'—इस प्रकार सब ओर से लोगों ने कहा। बिना अवरोध वह उन समस्त सामन्तों के पास पहुंचा। यथाप्रधानं सचिवैर्विहितोचितसत्क्रियः । ततः पराध्येमध्यस्त तन्निदर्शितमासनम् ॥ २३३ ॥ २३३. प्रधानतानुसार सचिवों के उचित सत्कार प्राप्त कर (वह) उन लोगों से निर्दिष्ट सर्व श्रेष्ठ आसनपर बैठा। कृताहं गैरथामात्यैराज्ञां पृष्टो महीभुजः । शनैस्तच्छासनं तेभ्यो लज्जमान इवार्पिपत् ॥ २३४ ॥ २३४. सम्मानकारी अमात्यों के पूछने पर 'राजा की क्या आज्ञा है'—लज्जित तुल्य वह धीरे से शासन उन्हें अर्पित किया। तेऽभिवन्द्य प्रभोर्लेखमुपांशु मिलितास्ततः । उन्मुच्य वाचयित्वैतमवोचन्वि नयानताः ॥ २३५ ॥ २३५. उन्होंने प्रभु लेख उपांशु का अभिनन्दन किया। एकान्त में मिले। उसे खोला। और वाँचकर विनयावनत बोले— मातृगुप्त इति श्लाघ्यं भवतामेव नाम किम् । एवमेवैतदित्यूचे सोऽपि तान्विहितस्मितः ॥ २३६ ॥ २३६. 'श्लाघ्य मातृगुप्त' आपही हैं क्या ? सस्मित उनसे कहा—'एवमेव' (ऐसा ही)। पादटिप्पणियाँ : पाठभेद : २३२ (१) बाण के हर्ष चरित में इससे मिलता श्लोक संख्या २३४ में 'वार्पिप' का पाठभेद पद मिलता है— 'वार्पप्' मिलता है। श्लोक संख्या २३५ में 'नातः' का पाठभेद 'सविनयं अभाषत आगच्छत प्रविशत'— 'न्विताः' मिलता है।

५२४ राजतरंगिणी कः कोऽत्र संनिधातृणामित्यश्रूयत वाक्कतः । राज्याभिषेकसंभारो दृश्यते स्म च संभृतः ॥ २३७ ॥ २३७. यह वाणी सुनायी पड़ी, "सन्निधाताओं में कौन है ?" तदनन्तर राज्याभिषेक संभार वहाँ पर दिखायी दिया । ततः कलकलोत्तालभूरिलोकसमाकुलः । प्रदेशः क्षणमात्रेण सोऽभूत्क्षुभ्यन्निवाणर्वः ॥ २३८ ॥ २३८. क्षणमात्र में उत्ताल कोलाहल करते लोक समाकुल से व्याप्त वह स्थान क्षुब्ध समुद्र तुल्य हो गया । अथ प्राङ्मुखसौवर्णभद्रपीठप्रतिष्ठितः । संनिपत्य प्रकृतिभिर्मातृगुप्तोऽभ्यषिच्यत ॥ २३९ ॥ मातृगुप्त का अभिषेक १ : २३९. पूर्वाभिमुख २ सुवर्णभद्र पीठ पर बैठे मातृगुप्त को समागत प्रकृतियों ३ ने अभि- षिच किया । तस्य विन्ध्यतटव्यूढवक्षसः परिनिर्लुठत् । सशब्दमभिषेकाम्बु रेवास्रोत इवाबभौ ॥ २४० ॥ २४०. उसके विशाल वक्षस्थल पर लुठित होते सशब्दपूर्ण अभिषेक जल विन्ध्याटट ४ के ढालपर गिरती रेवा ( नर्मदा ) स्रोत तुल्य सुशोभित हुआ । श्लोक सख्या २३७ में 'स्म' का पाठभेद 'स' ( २ ) पूर्वाभिमुख : पूर्व मुख बैठकर मिलता है। प्रातः कालीन सन्ध्या तथा पूजा आदि किया जाता पादटिप्पणियाँ : है । यह शुभ माना गया है । सूर्योदय की दिशा २३९ (१) श्री विल्सन ने राज्याभिषेककाल पूर्व है अतएव पवित्र कार्यों एवं सब प्रकार के सन् ११७ ई० ५ मास तथा समीकृत काल सन् सस्कारों के लिये उत्तम माना गया है। पूर्व के ४०१ ई० एव राज्यकाल ४ वर्ष ९ मास दिया है। अभाव में उत्तर दिशा का स्थान माना गया है। श्री एस. पी. पण्डित ने वह समय सन् ११८ ई० पूर्व दिशा शक्ति प्रद, शुभ उत्थान तथा उदय का तथा राज्य काल ४ वर्ष ९ मास १ दिन दिया है। द्योतक है । सूर्य का उदय पूर्व में होता है अतएव श्री स्टीन ने अभिषेक काल लौकिक संवत् वह दिशा जागृत अवस्था की, उदय की उत्थान की, ३१८४ और २ मास तथा राज्य काल ४ वर्ष ९मास प्रतीक है । १ दिन दिया है। (३) प्रकृतियों : यहाँ पर इसका गज प्रकृतियो श्री वाओ सप्तर्षि संवत् ४०४४ तथा तथा साधारण प्रकृति जनो दोनों हो सकता है । सन् २६९ ई० देते हैं। कलिगताब्द ३२१८ वर्ष ३ मास ड्रायर के मत से सन् ११७ वर्ष ११ मास पाठभेद : तथा कनिघम के अनुसार सन् ४३० ई० आता है । श्लोक सख्या २४० मे 'स्रोत' का पाठभेद प्रबुरुत्रल नाम मेठर वृत्त देता है। 'स्रोता' मिलता है।

तृतीय तरंग ५२५ अथ स्नातानुसिक्ताङ्गं सर्वाङ्गामुक्तभूषणम् । व्यजिज्ञपस्तं राजानं क्रान्तगजासनं प्रजाः ॥ २४१ ॥ २४१. स्नान एवं अनुलेपन के पश्चात, सर्वांग भूषण भूषित हो सिंहासनारूढ़ होने पर, प्रजा ने उस नृपति को ज्ञात कराया । अर्थितेन स्वयं त्रातुं विक्रमादित्यभूभुजा । निर्दिष्टः स्वसमानस्त्वं शाधि नः पृथिवीमिमाम् ॥ २४२ ॥ २४२. 'रक्षा हेतु प्रार्थित स्वयं भूभुज विक्रमादित्य ने आपको स्व तुल्य निर्दिष्ट किया है । हम लोगों की पृथिवी पर शासन करें' । मण्डलानि विलभ्यन्ते येनानेन प्रतिक्षणम् । मा मंस्था मण्डलं राजन्विलब्धं तदिदं परैः ॥ २४३ ॥ २४३. 'हे राजन् ! इस मण्डल को दूसरों से प्राप्त होना मत जानिये, क्योंकि इस राज्य के द्वारा प्रतिक्षण मण्डल प्राप्त होते रहते हैं । कर्मभिः स्वैरवाप्तस्य जन्मनः पितरौ यथा । राज्ञां तथाऽन्ये राज्यस्य प्रवृत्तावेव कारणम् ॥ २४४ ॥ २४४. "जिस प्रकार स्वकर्मों से प्राप्त जन्म के प्रति माता-पिता कारण होते हैं, उसी तरह राजाओं के राज्य प्रवर्तन में अन्य लोग कारण होते हैं । पादटिप्पणियाँ : २४० (१) विन्ध्या : नीलमत पुराण सात कुल पर्वतों में एक विन्ध्या की भी गणना करता है। नी० ५९६-६०० २४२ (१) श्लोक संख्या २४२-२४५ तक स्वागत श्लोक है। कश्मीर में राजा तथा अभ्यागतों के स्वागत की सुनिश्चित सुसंस्कृत एक शैली थी। ओरंगजेब के कश्मीर आगमन काल में भी कश्मी- रियो ने इसी प्रकार का स्वागत किया था। उसका वर्णन थी बर्नियर करते है। उनकी समानता हजारो वर्ष व्यतीत हो जाने पर भी मिलती है। हम लोगों के कश्मीर पहुँचते ही भाटो से बादशाह औरंगजेब ने कश्मीर के इस प्रिय भूमि की स्तुति में कविता पाठ किया । बादशाह ने कविता लेकर उन्हें मिहरबानी दिखाते इनाम दिया । जहाँ तक मुझे स्मरण है उनमें एक ने परावृत मालाओ की अपेक्षाकृत अधिक ऊँचाई में आकाश को आभूर्ण रूप में परावृत कर दिया था जिसे हम देखते हैं। प्रकृति ने अपनी पूरी शक्ति कश्मीर मण्डल को सजाने मे समाप्त कर दी थी । उसे शत्रु सैन्यों से आक्रमण हेतु दुर्भेय बना दिया था। पृथ्वी की राजधानियो में रानी होने के कारण यह उचित ही था कि उसे पूर्ण शान्ति तथा सुरक्षा युक्त रखा जाय। इस प्रकार वह सार्वभौम राज सत्ता का उपयोग करती रहे बिना कभी किसी के पराधीन बनकर'। पाठभेद : श्लोक संख्या २४३ में 'विलभ्यन्ते' का 'विदीयन्ते'; 'येनानेन' का 'येनैतेन' तथा 'विलब्धं का पाठभेद 'विलक्षं' मिलता है। श्लोक संख्या २४४ में 'पितरो' का 'पितरौ' तथा 'राज्ञा' का पाठभेद 'राज्ञां' मिलता है।

५२६ राजतरंगिणी इत्थं स्थिते परं कंचित्त्वदीयोऽस्मीति शंसता । न नेया भवता राजन्वयमात्मा च लाघवम् ॥ २४५ ॥ २४५. 'ऐसी स्थिति में हे राजन् ! किसी अन्य से 'तुम्हारा हूँ' यह कहकर आप स्वयं तथा हम लोगों का गौरव लाघव न करें।' इति तैस्तथ्यमुक्तोऽपि संस्मरन्स्वामिसत्क्रियाम् । मातृगुप्तो महीपालः क्षणमासीत्कृतस्मितः ॥ २४६ ॥ २४६. इस प्रकार उनके यथार्थ कहने पर भी महीपाल मातृगुप्त स्वामी के समादर को स्मरण करते हुए क्षण भर सस्मित रहा। दानेन सुदिनं कुर्वन्नवराज्योचितेन सः । तत्रैव मङ्गलोदग्रं तदहो निरवर्तयत् ॥ २४७ ॥ २४७. उसने नव राज्योचित प्रचुर दान द्वारा मंगलमय उस दिन को सुदिन करते हुए (उसे) वहीं व्यतीत किया। पुरप्रवेशायान्त्येद्युरर्थ्यमानोऽथ मन्त्रिभिः । अद्भुतप्राभृतं दूतं राज्यदातुर्व्यसर्जयत् ॥ २४८ ॥ २४८. दूसरे दिन मन्त्रियों ने पुर प्रवेश हेतु प्रार्थना की। अद्भुत भेंट के साथ दूत को राज्यदाता (विक्रमादित्य) के पास भेजा। देशोन्नत्यानुसारेण स्पर्धामिव च तां विदन् । स्वामिनो मनसि हीतः सागसं स्वममन्यत ॥ २४९ ॥ २४९. देश की समृद्धि के अनुसार उसे स्वामी की स्पर्धा तुल्य जानते हुये, मन में लज्जित हुआ और अपने को अपराधी समझा। अथाहूयपरान्भृत्यान्वक्तु सेवास्मृतिं प्रभोः । अल्पार्घाण्यपि सात्म्यानि प्राहिणात्प्राभृतानि सः ॥ २५० ॥ २५०. उसने प्रभु की सेवा स्मृति को कहने के लिये दूसरे भृत्यों को बुलाकर स्वल्प मूल्यों के भी (नृप के) तदनुरूप भेंट भेजीं


श्लोक संख्या ४ 'अपरं', 'वे' संख्या २५० में ' - ण्य' का 'अल्पा- का 'कश्चित्' 'किंचि' भेद 'राज र्घिय' तथा ' का पाठभेद मिलता है। 'स्वात्म्यानि'

तृतीय तरंग ५२७ असामान्यान्गुणांस्तस्य स्मरन्पर्यश्रुलोचनः । स्वयं लिखित्वा श्लोकं च स्वकमेकं व्यसर्जयत् ॥ २५१ ॥ २५१. असामान्य उसके गुणों का स्मरण करते हुये उसके नेत्र अश्रुपूर्ण हो गये। स्वयं लिखकर उसने अपना एक श्लोक भेजा। नाकारमुद्वहसि नैव विकत्थसे त्वं दित्सां न सूचयसि मुञ्चसि सत्फलानि । निःशब्दवर्षणमिवाम्बुधरस्य राज- न्संलक्ष्यते फलत एव तव प्रसादः ॥ २५२ ॥ २५२. "हे राजन् ! आप अपना आकार नहीं बदलते, आत्म श्लाघा नहीं करते, दान करने की इच्छा बिना प्रकट किये फल प्रदान करते हैं। जलद के निःशब्द वर्षण तुल्य फलित ही आपकी कृपा दिखायी पड़ती है।" ततः प्रविश्य नगरं सैन्यैः पिहितदिक्तटैः । क्रमागतामिव महीं यथावत्पर्यपालयत् ॥ २५३ ॥ २५३. तदनन्तर दिक्तट को आच्छादित करनेवाले सैनिकों के साथ नगर प्रवेश कर परम्परा प्राप्त तुल्य पृथिवी का यथावत् परिपालन किया। त्यागे वा पौरुषे वापि तस्यौचित्योन्नतात्मनः । क्ष्माभुजस्तर्कुक¹स्येव नाभूत्परमितेच्छता ॥ २५४ ॥ २५४. त्याग या पौरुष में भी औचित्य से उन्नतात्मा वह; याचक (तर्कुक १) के तुल्य परिमित (इच्छा) आकाङ्क्षी नहीं हुआ। यष्टुं यज्ञान्धृतोद्योगस्त्यागी विततदक्षिणान् । पशुबन्धमनुध्याय करुणाकूर्णितोऽभवत् ॥ २५५ ॥ २५५. (उस) त्यागी ने प्रचुर दक्षिणा वाले यज्ञ करने के लिये उद्योग किया किन्तु पशुवध का ध्यान कर करुणापूर्ण हो गया। पादटिप्पणियाँ : २५२ ( १ ) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह ६८ वा श्लोक है। पाठभेद : श्लोक संख्या २५४ में 'चित्योन्नतात्मन :' का 'नत्योचित्वात्मनः' तथा 'तर्कुकस्येव' का पाठभेद 'याचकस्येव' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : २५४ ( १ ) तर्कुक : कुछ अनुवादकों में तर्कुक का अर्थ तकुवा लगाया है। परन्तु यह अर्थ यहाँ नही बैठता है। इसका पाठभेद 'याचकस्येव' भी मिलता है। वह यहा पर संगत है। पाठभेद : श्लोक संख्या २५५ में 'कूर्णितो' का पाठभेद 'कुञ्चितो' तथा 'कूजितो' मिलता है।

५२६ राजतरंगिणी इत्थं स्थिते परं कंचिच्चदीयोऽस्मीति शंसता । न नेया भवता राजन्वयमात्मा च लाघवम् ॥ २४५ ॥ २४५. 'ऐसी स्थिति में हे राजन् ! किसी अन्य से 'तुम्हारा हूँ' यह कहकर आप स्वयं तथा हम लोगों का गौरव लाघव न करें।' इति तैस्तथ्यमुक्तोऽपि संस्मरन्स्वामिसत्क्रियाम् । मातृगुप्तो महीपालः क्षणमासीत्कृतस्मितः ॥ २४६ ॥ २४६. इस प्रकार उनके यथार्थ कहने पर भी महीपाल मातृगुप्त स्वामी के समादर को स्मरण करते हुए क्षण भर सस्मित रहा । दानेन सुदिनं कुर्वन्नवराज्योर्जितेन सः । तत्रैव मङ्गलोदग्रं तदहो निरवर्तयत् ॥ २४७ ॥ २४७. उसने नव राज्योचित प्रचुर दान द्वारा मंगलमय उस दिन को सुदिन करते हुए ( उसे ) वहीं व्यतीत किया । पुरप्रवेशायान्थेद्युरभ्यर्थ्यमानोऽथ मन्त्रिभिः । अद्भुतप्राभृतं दूतं राज्यदातुर्व्यसर्जयत् ॥ २४८ ॥ २४८. दूसरे दिन मन्त्रियों ने पुर प्रवेश हेतु प्रार्थना की। अद्भुत भेंट के साथ दूत को राज्यदाता (विक्रमादित्य) के पास भेजा । देशौन्नत्यानुसारेण स्पर्धामिव च तां विदन् । स्वामिनो मनसि हीतः सागसं स्वममन्यत ॥ २४९ ॥ २४९. देश की समृद्धि के अनुसार उसे स्वामी की स्पर्धा तुल्य जानते हुये, मन में लज्जित हुआ और अपने को अपराधी समझा । अथाहूयपरान्भृत्यान्वक्तुं सेवास्मृतिं प्रभोः । अल्पार्घाण्यपि सात्म्यानि प्राहिणोत्प्राभृतानि सः ॥ २५० ॥ २५०. उसने प्रभु की सेवा स्मृति को कहने के लिये दूसरे भृत्यों को बुलाकर स्वल्प मूल्यों के भी (नृप के) तदनुरूप भेंट भेजा । श्लोक संख्या २४५ में 'परं' का 'अपरं'; 'कंचि' श्लोक संख्या २५० में 'अल्पार्घाण्य' का 'अल्पा- का 'क्वचि' 'किंचि' तथा 'राजन्' का पाठभेद 'राजा' र्ध्याण्य, 'अनर्घ्याण्य' तथा 'सात्म्यानि' का पाठभेद मिलता है । 'साद्यानि' तथा 'स्वात्म्यानि' मिलता है।

तृतीय तरंग ५२७ असामान्यगुणस्तस्य स्मरन्पर्यश्रुलोचनः । स्वयं लिखित्वा श्लोकं च स्वकमेकं व्यसर्जयत् ॥ २५१ ॥ २५१. असामान्य उसके गुणों का स्मरण करते हुये उसके नेत्र अश्रुपूर्ण हो गये। स्वयं लिखकर उसने अपना एक श्लोक भेजा। नाकारमुद्वहसि नैव विकत्थसे त्वं दित्सां न सूचयसि मुञ्चसि सत्फलानि । निःशब्दवर्षणमिवाम्बुधरस्य राज- न्संलक्ष्यते फलत एव तव प्रसादः ॥ २५२ ॥ २५२. "हे राजन् ! आप अपना आकार नहीं बदलते, आत्म श्लाघा नहीं करते, दान करने की इच्छा बिना प्रकट किये फल प्रदान करते हैं। जलद के निःशब्द वर्षण तुल्य फलित ही आपकी कृपा दिखायी पड़ती है।" ततः प्रविश्य नगरं सैन्यैः पिहितदिक्तटैः । क्रमागतमिव महीं यथावत्पर्यपालयत् ॥ २५३ ॥ २५३. तदनन्तर दिक्तट को आच्छादित करनेवाले सैनिकों के साथ नगर प्रवेश कर परम्परा प्राप्त तुल्य पृथिवी का यथावत् परिपालन किया। त्यागे वा पौरुषे वापि तस्यौचित्योन्नतात्मनः । क्ष्माभुजस्तर्ककस्येव नाभूत्परिमितैच्छना ॥ २५४ ॥ २५४. त्याग या पौरुष में भी औचित्य से उन्नतात्मा वहः याचक (तर्कक) के तुल्य परिमित (इच्छा) आकाङ्क्षी नहीं हुआ। यष्टुं यज्ञान्प्रभूतोद्योगस्त्यागी विनतदिग्गजः । पशुबन्धमनुध्याय करुणापूर्णतामगात् ॥ २५५ ॥ २५५. (उस) त्यागी ने प्रचुर दक्षिणा वाले यज्ञ करने के लिये उद्योगशील होकर भी पशुवध का ध्यान कर करुणापूर्ण हो गया। पादटिप्पणियाँ : २५२ ( १ ) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह ६८ वां श्लोक है। .ठभेद पाठभेद : श्लोक संख्या २५४ में 'चित्योन्नतात्मनः' के स्थान पर लौकिक 'नत्योचितात्मनः' तथा 'तर्ककस्येव' का पाठभेद पर पानी 'माषकस्येव' मिलता है। फिरा जाना

५२८ राजतरंगिणी अमारमादिदेशाथ यावद्राज्यं स्वमण्डले । चूर्णीकृत्य सुवर्णादि प्रददौ च करम्भकम् ॥ २५६ ॥ २५६. अपने सम्पूर्ण ( मण्डल ) राज्य में अहिंसा का आदेश दिया और स्वर्ण चूर्ण आदि करम्भक¹ प्रदान किया । करम्भके कीर्यमाणे मातृगुप्तेन भूभुजा । वैतृष्ण्यमुन्मिषत्पोषो न को नाम न्यपेथत ॥ २५७ ॥ २५७. भूभुज मातृगुप्त के करम्भक प्रदान करने पर सन्तुष्ट हुआ कौन असन्तोष ( वितृष्णा ) को प्राप्त किया । गुणी च दृष्टकष्टश्च वदान्यश्च स पार्थिवः । विक्रमादित्योऽप्यासीदभिगम्यः शुगार्थिनाम् ॥ २५८ ॥ २५८. गुणी, कष्टदर्शी, वदान्य यह नृपति शुभाथियों के लिये विक्रमादित्य से भी अधिक अभिगम्य था । विवेचकतया तस्य श्लाघ्यया सुरभीकृताः । लक्ष्मीविलासाः क्ष्माभर्तुरशोभन्त मनीषिषु ॥ २५६ ॥ २५९. उस राजा की श्लाघ्य विवेकशीलता से सुरभित लक्ष्मी विलास मनीषियों से सुशोभित हुई । हयग्रीववधं मेण्ठस्तदग्रे दर्शयन्नवम् । आसमाप्ति ततो नापत्साध्वसाध्विति वा वचः ॥ २६० ॥ २६०. ( जब ) मेण्ठ उसके समक्ष नवीन हयग्रीववध¹ सुना ( प्रदर्शित कर ) रहा था समाप्ति पर्यन्त उससे "साधु या असाधु" वाणी नहीं सुनी ।


[बायाँ स्तम्भ : पादटिप्पणियाँ] पादटिप्पणियाँ : २५६ ( १ ) करम्भक : इसका अर्थ खिचड़ी होता है। कश्मीर में खिचड़ी ब्राह्मणों को देने का प्राचीन रिवाज था। काशी आदि स्थानों में खिचड़ी दरिद्र नारायण का भोजन माना जाता है। इसी प्रकार पुलाक जिसका अपभ्रंश वर्तमान पुलाव है प्राचीन भारत में प्रिय भोजन था। पुलाव सामिष तथा निरामिष दोनों बनता था। निरामिष में मेवा तथा सब्जी डालकर बनाया जाता था। सामिष पुलाव में भोजनीय मांस डाला जाता था। करम्भक का उल्लेख पुनः रा० त० ५.१६ में भी कल्हण ने किया है।

[दायाँ स्तम्भ : पाठभेद एवं पादटिप्पणियाँ] पाठभेद : श्लोक संख्या २५७ में 'वैतृष्ण्य' का पाठभेद 'वैतृष्य' मिलता है। श्लोक संख्या २५८ में 'वदान्य' का पाठभेद 'वदन्य' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : २६० ( १ ) हयग्रीव वध : हयग्रीव का उल्लेख कुछ स्थानो पर महाकाव्य तथा अनेक स्थानों पर नाटक रूप में किया गया है। वह अत्यन्त सुन्दर काव्य है। अबतक यह काव्य पूर्ण रूप में नहीं प्राप्त हुआ है। इसको उल्लेख कवि राजशेखर न

तृतीय तरंग ५२१ अथ ग्रथयितुं तस्मिन्पुस्तकं प्रस्तुते न्यधात् । लावण्यनिर्याणभिया तदधः स्वर्णभाजनम् ॥ २६१ ॥ २६१. जब वह पुस्तक समेट रहा था—तो उसके नीचे स्वर्णपात्र, लावण्य¹ परिगलन भय से राजा ने रख दिया । अन्तरज्ञतया तस्य तादृश्या कृतसत्कृतिः । भर्तृमेण्ठः कविर्मेने पुनरुक्तं श्रियोऽर्पणम् ॥ २६२ ॥ २६२. नृप की उस प्रकार की अन्तरज्ञता से सत्कृत होकर कवि भर्तृमेण्ठ ने लक्ष्मी का प्रदान पुनरुक्त ( निःप्रयोजन ) माना ।

किया है। उसने अपने पूर्वजन्मों में वाल्मीकि भर्तृमेण्ठ तथा भवभूति होना लिखा है । बभूव वल्मीकभवः पुरा कवि- स्ततः प्रपेदे भुवि भर्तृमेण्ठताम् । स्थितः पुनर्यो भवभूतिरेखया स राजते सम्प्रति राजशेखरः । ( बालरामायण ) विनिर्गतं मानदमात्ममन्दिरा त्स सम्भ्रमेन्द्रद्रुतपातितार्गला । क्षेमेन्द्र ने सुवृत्ततिलक तथा मंख ने श्रीकंठ- चरित ( २:५३ ) में मेण्ठ का उल्लेख किया है। मंख ने उसे सुबन्धु, भारवि तथा बाण के समकक्ष रखा है। सुभाषितावली में मेण्ठ की कविताओं का उद्धरण दिया गया है। हेमचन्द्र ने अलंकार- चूडामणि में हयग्रीव वध को काव्य माना है । काव्यप्रकाश तथा साहित्यदर्पण में मेण्ठ तथा उसके काव्य का उल्लेख मिलता है । डाक्टर श्री भाऊदाजी ने राघव भट्ट के शकुन्तला भाष्य में मेण्ठ के पद्यों को पाया है। कश्मीरी कवियों में मेण्ड अन्यतम कवि हैं । यह प्रबन्ध कवि हैं । राज्यसभा के कवि थे । हयग्रीव वध के श्लोक सूक्ति ग्रन्थों में उद्धृत हैं। राजशेखर ने इन्हें वाल्मीकि का अवतार माना है। अश्वशिरस् तथा हयग्रीव दोनों शब्दों का उल्लेख पुराणों में मिलता है । महाभारत में उल्लेख ६७

आता है कि और्व का क्रोध समुद्र में निक्षेप हुआ तो उसमें हयशिरस् की उत्पत्ति हुई । पुनः उल्लेख मिलता है कि हयग्रीव नरक का सेनापति था। भागवत पुराण के अनुसार विष्णु ने हयग्रीव का वध किया था । ( ११:४:१७ ) विष्णु तथा मारकण्डेय पुराण में उल्लेख है कि भगवान् विष्णु भद्राश्व में हयशिरस् रूप से उत्पन्न हुए थे । ( विष्णु० १:२:५० ; मारक० ५५ ) कालिका पुराण के अनुसार हयग्रीव ने ज्वरासुर को मारा था । ( कालिका० ८१:९६ ) देवी भागवत में विष्णु हयग्रीव ने असुर हयग्रीव का वध किया था ( देवीभागवत १:४ ) । असमी साहित्य में उल्लेख मिलता है कि ऋषि उर्व के कहने पर विष्णु ने हयासुर, जो मणिकूट पर निवास करता था, वध किया था । अन्तिम समय असुर ने प्रार्थना की कि भगवान् स्वयं हयसुर का रूप धारण कर मणिकूट पर निवास करें। नील मत में हयग्रीव अवतार का उल्लेख है । पाठभेद : श्लोक संख्या २६१ में ‘ग्रथयितुं’ का पाठभेद ‘ग्रन्थयितुं’ मिलता है । पादटिप्पणियाँ : २६१ (१) लावण्य—लावण्य का लौकिक अर्थ पानी है। स्त्री पर पानी है। मोती पर पानी है। इसका अर्थ स्त्री पर लावण्य है किया जाता

५३० राजतरंगिणी स मातृगुप्तस्वाम्याख्यं निर्ममे मधुसूदनम् । कालेनादत्त यद्ग्रामान्मम्मः स्वगुरसद्मने ॥ २६३ ॥ २६३. उसने मातृगुप्त स्वामी' नामक मधुसूदन ( मन्दिर ) का निर्माण कराया, उनपर लगे ग्रामों को मम्म² ने कालान्तर में अपने देव मन्दिर हेतु ले लिया । इत्यासादितराज्यस्य शासतः क्ष्मां क्षमापतेः । त्रिमासोना ययुस्तस्य मैकाहाः पञ्च वत्सराः ॥ २६४ ॥ २६४. इस प्रकार राज्य प्राप्त कर पृथ्वी का शासन करते उस नृपति का तीन मास एक दिवस कम पाँच वर्ष व्यतीत हुआ । कृतार्थतां तीर्थतोयैराञ्जनेयो नयन्पितॄन् । जातं तादृशमश्रोपीत्स्वस्मिन्देशे पराक्रमम् ॥ २६५ ॥ २६५. आञ्जनेय ( प्रवरसेन ) ने जो कि, तीर्थों में जल से पित्रों¹ को कृत-कृत्य कर रहा था, इस प्रकार सुना—'स्वदेश पर आक्रमण² हुआ है।'

उचित है । लावण्य सौन्दर्य के अर्थ में प्रयुक्त किया जाता है । शब्दकल्पद्रुम में लावण्य की परिभाषा की गयी है : मुक्ताफलेषु छायायास्तरळत्वमिवान्तरा । प्रतिभाति यदङ्गेषु तल्लावण्यमिहोच्यते ॥ काव्य का यह रस नीचे चू न जाय इसलिए स्वर्णपात्र रख दिया । पाठभेद : श्लोकसंख्या २६३ में 'मम्म' का, 'तन्मः' 'मस्मः', तथा 'श्वसुर' का पाठभेद 'श्वशुर,' तथा 'स्वदेव- गुहाय' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : २६३ (१) मातृगुप्त स्वामी—इस मन्दिर का उल्लेख पुनः कहीं नहीं मिलता । यह मन्दिर कहाँ था इसका पता भी नहीं चलता । (२) मम्म—मम्म ने मन्दिर कहाँ बनवाया था उल्लेख नहीं मिलता । मम्म का यह मन्दिर विष्णु मन्दिर था । यह श्लोक नं० ४:६९८ से प्रगट होता है । यह स्पष्ट निर्देश है कि मम्म ने मम्म स्वामी का मन्दिर निर्माण कराया था । स्वामी एवं ईश्वर शब्दों के साथ विष्णु तथा शिव मन्दिर समझना चाहिये । इसके लिये पृष्ठ १४७ की पाद टिप्पणी द्रष्टव्य है । पाठभेद : श्लोकसंख्या २६५ में 'नयन्' का 'अनयत्' तथा 'पराक्रमम्' का पाठभेद 'पराभवम्' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : २६५ (१) पित्रः यहाँ पित्र तर्पण के अर्थ जो लगाना चाहिये सन्ध्या करते समय तथा श्राद्ध के समय किया जाता है । (२) आक्रमण : कल्हण ने यहाँ पर पराक्रम शब्द का मूलतः प्रयोग किया है । अनुवादको ने उसका अर्थ हरण अर्थात् राज्य का बलात् ले लेना किया है । मैने यहाँ आक्रमण शब्द रखा है । धन, सम्पत्ति, राज्य सभी पर आक्रमण करने के भाव का समावेश हो जाता है ।

तृतीय तरंग ५३१ पितृशोकाद्व्रता तस्य क्रोधेनान्तरधीयत । तरोरिवाऽर्कतापेन नैशाम्बुलवसिक्तता ॥ २६६ ॥ २६६. उसकी पितृशोकार्द्रता क्रोध से वैसे ही अन्तर्हित हो गयी—जैसे रवि ताप से तरु की रात्रि कालीन जलसिक्तता । श्रीपर्वते पाशुपतव्रतिवेषस्तमागतम् । आचख्यावश्वपादाह्यः सिद्धः कन्दाशनं ददत् ॥ २६७ ॥ २६७. जब वह श्री' पर्वत पर आया तब उसे पाशुपत² व्रती वेश अश्वपाद नामक सिद्ध कन्द भोजन देते हुए कहा— २६७ (१) श्रीपर्वत—श्रोपर्वत किंवा श्री शैल के लिये विष्णुपुराण २:१४१ तथा ५:११८ द्रष्टव्य है । (२) पाशुपत : नाट्य शास्त्र के अनुसार इस पंथ का अनुयायी नृत्य एवं गान से अपना भक्ति भाव प्रकट करता है । कालान्तर मे तन्त्र शास्त्र के विकास के साथ शिव पुरुष रूप तथा पार्वती स्त्री शक्ति किंवा प्रकृति रूप में चित्रित गये हैं । श्री शंकराचार्य ने पाशुपत सम्प्रदाय के पाँच सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया है—(१) कार्य, (२) कारण, (३) योग (४) विधि तथा (५) दुःखान्त । कार्य तीन प्रकार के हैं—(१) विद्या (१) अविद्या तथा (३) पशु । विद्या दो प्रकार की है—बोध स्वभावा तथा (२) अबोधस्वभावा । बोध स्वभावा विद्या दो प्रकार का है--(१) व्यक्त तथा (२) अव्यक्त । पशु दो प्रकार का होता है— (१) मलयुक्त तथा (२) निर्मल । (२) कारण—समस्त वस्तुओं की सृष्टि, संहार तथा अनुग्रह करने वाले तत्त्व को कारण कहते हैं । गुण एवं कार्य के भेदों के कारण इसके अनेक रूप हो जाते हैं । (३) योग—ईश्वर के साथ चित्त के सम्बन्ध को जोड़ने वाले साधन को योग कहते हैं । यह दो प्रकार का होता है—(१) क्रिया युक्त तथा (२) क्रियाहीन । (४) विधि—धर्म को सिद्धि करने वाले व्यापार किंवा क्रिया को विधि कहते हैं । विधि दो प्रकार की होती है । (१) प्रधान तथा (२) गौण । इसके भेद—(१) व्रत तथा (२) द्वार हैं ।' भस्म से स्नान, भस्म में शयन, उपहार, जप एवं प्रदक्षिणा व्रत हैं। द्वारचर्या छह प्रकार की होती है (१) क्रायन (२) स्पन्दन (३) मन्दन (४) शृंगारण (५) अवितकरण तथा (६) अविमद् भाषण । चर्या को सहायक विधि गौण विधि कही जाती है । (५) दुःखान्त—दो प्रकार का होता है— (१) अनात्मक तथा (२) सात्मक । अनात्मक दुःखों का पूर्ण क्षय है । सात्मक—जिसमे ज्ञान और कर्म की शक्ति से युक्त ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है । ज्ञान शक्ति पाँच प्रकार की होती है—(१) दर्शन (२) श्रवण (३) मनन (४) विज्ञान तथा (५) सर्वज्ञत्व । क्रिया शक्ति एक होने पर भी त्रिविध है—(१) मनोजवित्व (२) कामरूपित्व (३) विकरणधर्मित्व । शैव सम्प्रदाय के अन्तर्गत चार सम्प्रदाय (१) शैव (२) पाशुपत (३) कारुक सिद्धान्ती तथा (५) कापालिक नामधारी सिद्धान्त आते हैं । पाशुपत सिद्धान्त के प्रतिपादक स्वयं भगवान् पशुपति माने जाते थे । शिवपुराण की वायवीय संहिता (२,२४,१९९ ) द्रष्टव्य है । अन्य ग्रन्थ पंचाध्यायी है। उसका उल्लेख काश्मीर विद्वान् केशव भो करते हैं ।

५३२ राजतरंगिणी जन्मान्तरे लब्धसिद्धिस्त्वामस्म्युपरिगाधकम् । वाञ्छामपृच्छं राज्यार्थमभिलाषस्तु तेऽभवन् ॥ २६८ ॥ २६८. 'जन्मान्तर में तुम मेरे उपरि साधक' (अनुचर) थे। उस समय सिद्धि प्राप्त होने पर मैंने तुम्हारी अभिलाषा पूछी । राज्य की अभिलाषा तुम्हें हुई । सफलं तव कर्तुं तन्मनोरथमनन्यथा । अथ मामित्थमादित्यपारमणशेखरः ॥ २६९ ॥ २६९. 'तुम्हारे मनोरथ की सिद्धि हेतु जब मैं प्रयत्नशील था उस समय क्षपा रमण शेखर (शिव) ने ऐसी दीक्षा दी— गणोऽयं मामकः सिद्धो यस्तवोपरिसाधकः । जन्मान्तरेऽस्य राज्येच्छां कुर्यामहमनान्यथा ॥ २७० ॥ २७०. 'तुम्हारा उपरिसाधक मेरा सिद्ध गण है। जन्मान्तर में इसकी राज्य प्राप्त की इच्छा थी। मैं इसे पूर्ण करूंगा। भावं भवस्तद्भवतो भगवान्दत्तदर्शनः । साफल्यं नेष्यतीत्येवमभिधाय तिरोदधे ॥ २७१ ॥ २७१. 'भगवान् शिव दर्शन देकर तुम्हारा मनोरथ सफल करेंगे'—यह कहकर वह तिरोहित हो गया । साम्राज्येच्छोः समामेकां तत्र तस्य तपस्यतः । लब्धस्मृतिः सिद्धगिरा प्रददौ दर्शनं शिवः ॥ २७२ ॥ २७२. वहाँ एक वर्ष तपस्या करने पर साम्राज्याकांक्षी उसे (शिव ने) सिद्ध वाणी द्वारा स्मरण प्राप्त कर, दर्शन दिया । व्रतिवेषं तमादिष्टवाञ्छितार्थसमर्पणम् । स जगन्निर्जयोन्निद्रं नरेन्द्रत्वमयाचत ॥ २७३ ॥ २७३. वांछित अर्थ समर्पण के लिये कहने वाले उस व्रती वेशधारी (शिव) से जगत् जयसे जागरूक नरेन्द्रता को (प्रवरसेन ने) याचना की। पाठभेद : अलौकिक शक्ति प्राप्ति के लिये जो साधन करता श्लोक संख्या २६८ मे 'साधकम्' का पाठभेद है उसे साधक कहते हैं । 'साधक.' मिलता है । पाठभेद : पादटिप्पणियाँ : श्लोक संख्या २७१ में 'भावं' का पाठभेद २६९ (१) साधक : तन्त्र तथा माहात्म्य से 'भावे' मिलता है ।

तृतीय तरंग ५३३ उपेक्ष्य मोक्षं किं क्ष्माभृद्भोगानिच्छसि भङ्गुरान् । इति जिज्ञासुना भावं शंभुना सोऽभ्यधीयत ॥ २७४ ॥ २७४. 'राजन् ! मोक्ष को उपेक्षित कर क्षण भंगुर भोगों की क्यों इच्छा करते हो ? इस प्रकार भाव जानने के जिज्ञासु शम्भु' ने उससे कहा— स तं बभाषे शंभुं त्वां बुद्ध्वा व्याजतपोधनम् । अभ्यधामिदमद्धा त्वं न स देवो जगद्गुरुः ॥ २७५ ॥ २७५. उसने उनसे कहा—'तुम्हें तपस्वी वेशधारी शम्भु जानकर, यह याचना की थी किन्तु निश्चय ही, वह जगद्गुरु देव तुम नहीं हो। महान्तो ह्यर्थिताः स्वल्पं फलन्त्यल्पेतरत्स्वयम् । उदन्यया वदान्योऽदाद्दुग्धाब्धि स पयोऽर्थिने ॥ २७६ ॥ २७६. स्वल्प पार्थित, महान् जन स्वयं अधिक फल प्रदान करते हैं। उस वदान्य ने पयःप्रार्थी को क्षीरसागर दिया। पादटिप्पणियाँ : २७४ (१) शम्भु : कल्याण सम्पादित करने वाले देव का अर्थ शम्भु होता है। उपक्रमा रुद्र है। शिव कल्याण स्वरूप है। शम्भु रुद्र एवं शिव यद्यपि एक ही शंकर के नाम है, रूप है परन्तु उनका अर्थ भिन्न है। नीलमत पुराण में शम्भु को कालयज्ञोपवीती कहा है। (नी० १०९४, ९००, ९१३, ८८८) पाठभेद : श्लोक संख्या २७६ में 'वदान्ये.' का पाठभेद 'वदन्यो' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : २७६ (१) पयःप्रार्थी : कल्हण ने यहाँ महा- भारत वर्णित उपमन्यु की कथा की ओर संकेत किया है। उपमन्यु की कथा वायुपुराण अध्याय ५६ में दी गयी है—वीतमन्यु नामक एक वेद वेदांग पारग गृहस्थ एवं महाभाग्य शाली श्रेष्ठ ब्राह्मण था। उसकी धर्मशीला नामक पत्नी थी। उस पत्नी से उसे उपमन्यु नामक पुत्र प्राप्त हुआ। दूध के अभाव में माता चावल पीस कर उसे पिलाया करती थी। उसका रंग दूध की तरह उज्ज्वल होता था। एक दिन अपने पिता के साथ किसी द्विज के यहाँ उसने सुस्वादु खीर खाया। माता ने दूसरे दिन दूध के व्याज से उसे पिसा चावल का पानी दिया तो उपमन्यु ने पीने से अस्वीकार कर दिया। बालक असली दूध के लिये रोने लगा। माता ने भी रोते हुए कहा बिना शिव की कृपा से दूध कैसे मिल सकता है ? शिव की कृपा कैसे प्राप्त होगी इसका उत्तर माता ने दिया—'विरूपाक्ष त्रिशूलधारी महादेव की आराधना करो।' उपमन्यु के पूछने पर कि विरूपाक्ष कैसे हैं माता ने उत्तर दिया—प्राचीन काल में धौदाम नाम प्रसिद्ध एक महान् असुरपति था। उसने लक्ष्मी को समस्त जगत् अतिक्रान्त कर वशवर्तिनी बना लिया था। उस असुर ने तत्पश्चात् वासुदेव से श्रीवत्स प्राप्त करने का प्रयास किया। भगवान् विष्णु असुर वध की कामना से शिव के पास गये। शिव उस समय हिमालय शिखर के चिकने भूतल पर बैठे थे। तदनन्तर विष्णु जी जगन्नाथ के समीप गये। और अपने द्वारा स्वयं अपनी आराधना की। वे एक सहस्र वर्ष पैर के अँगूठे पर खड़े रह कर तपस्या करने लगे। महादेव ने प्रसन्न होकर भगवान् विष्णु को सुदर्शन चक्र

५३४ राजतरंगिणी अस्य वैक्लव्यकैवल्यलाभनिश्चलचेतसः । नो चेत्स्यभिजनस्याभिभृतिं मर्मव्यथायहाम् ॥ २७७ ॥ २७७. 'कैवल्य प्राप्ति से भी अशान्त चित्त वाले इसके कुल के मर्म व्यथाकारी तिर- स्कार को क्या आप नहीं जानते ?' जगत्परिवृढः प्रौढप्रीतिस्तं सफलार्थनम् । कृत्व। प्रादुष्कृतवपुस्ततो भूयोऽभ्यभाषत ॥ २७८ ॥ २७८. उसे सफल मनोरथ करके अत्यन्त प्रसन्न जगन्नाथ शरीर धारणकर पुनः बोले- मज्जतो राज्यसौख्येषु सायुज्यावाप्तिदूतिकाप् । मदाज्ञयाऽश्वपादस्ते संज्ञां काले करिष्यति ॥ २७९ ॥ २७९. 'अश्वपाद मेरी आज्ञा से समय पर राज सुखों में निमग्न तुम्हें सायुज्य' प्राप्ति का सन्देश वाहिका-संज्ञा प्रदान करेगा । इत्युक्तवाऽन्तर्हिते देवे स कृतव्रतपारणः । अगच्छदश्वपाद तमापृच्छ्याऽभिमतां भुवम् ॥ २८० ॥ २८०. यह कह कर देव के अन्तर्हित हो जाने पर उसने व्रत का पारण किया और अश्वपाद से आज्ञा लेकर अभिमत भूमि की ओर गया । प्रदान किया। सुदर्शन चक्र द्वादश अरो, छह नाभियों, एवं दो युगों से युक्त था। चक्र को अमोघ शक्ति जानने की जिज्ञासा पर शंकर ने विष्णु से अपने ही ऊपर चलाने के लिये कहा । शंकर पर विष्णु ने चक्र चलाया। शंकर के शरीर के तीन भाग हो गये। प्रथम भाग का नाम हिरण्याक्ष, दूसरे का सुवर्णाक्ष तथा तृतीय का विरूपाक्ष नाम पड़ा। विष्णु ने उस चक्र द्वारा दामा का वध किया । उस असुर के वध के पश्चात् विष्णु ने विरूपाक्ष शंकर की उपासना की। तत्पश्चात् क्षीर सागर चले गये। यदि तुम दूध चाहते हो तो विरूपाक्ष शंकर की उपासना करो। उपमन्यु ने शिव विरूपाक्ष की उपासना कर दुग्ध प्राप्त किया । पाठभेद : श्लोक संख्या २७७ में 'वैक्लव्य' का 'वैक्लप' तथा “कैवल्य” का पाठभेद "कैवल्या" मिलता । श्लोक संख्या २७८ में 'म्यभाषत' का पाठभेद 'व्यभाषत' मिलता है। श्लोक सख्या २७९ मे 'मज्जतो' का 'सजमो' तथा 'सायुज्या' का पाठभेद 'सायुग्या' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : २७९ (१) सायुज्य : पाँच प्रकार की मुक्ति होती है। सायुज्य में आत्मा परमात्मा मे लीन होकर एकाकार हो जाता है। पाठभेद : श्लोक सख्या २८० 'अगच्छ' का पाठभेद 'आगच्छ' मिलता है।

तृतीय तरंग ५३५ ततो विदितवृत्तान्तो मातृगुप्ताभिषेणनात् । निषिध्य सविधायातानामात्यानब्रवीद्वचः ॥ २८१ ॥ २८१. तदुपरान्त (सब) वृत्तान्त जानकर पूजाहेतु उद्यत हो, आये हुये, अमात्यों को निवारित कर बोला- विक्रमादित्यमुत्सिक्तमुच्छेत्तुं यतते मनः । मातृगुप्तं प्रति न नो रोषेणारूषितं मनः ॥ २८२ ॥ २८२. 'मेरा मन गर्वीले विक्रमादित्य को उच्छेद के लिये प्रयत्नशील है, मातृगुप्त के प्रति क्रोध से मेरा मन रूक्ष नहीं है। अप्रियैरपि निष्पिष्टैः किं स्यात्क्लेशासहिष्णुभिः । ये तदुन्मूलने शक्ता जिगीषा तेषु शोभते ॥ २८३ ॥ २८३. क्लेश न सह सकने वाले एवं निष्पिष्ट शत्रुओं में क्या रखा है ? जो अपने उन्मूलन में समर्थ हैं, उन्हीं में विजयेच्छा शोभित होती है । यान्यब्जान्यदयं द्विषन्ति शशिनः कोऽन्यस्ततोऽसंमत- स्तन्निर्माथिकरीन्द्रदन्तदलनं यन्नाम कोऽयं नयः । सामर्थ्यप्रथनाय चित्रमसमैः स्पर्धां विधूयोन्नता ये तेषु प्रभवन्ति तत्रजहति व्यक्तं प्ररूढा रुषः ॥ २८४ ॥ २८४. 'जो कमल' चन्द्रोदय द्वेषी हैं, उनसे बढ़कर असम्यत (शत्रु) दूसरा कौन है ? उनका निर्मन्थन कर्त्ता करीन्द्र (हाथी) के दन्त का दलन जो चन्द्र करता है, यह कौन आश्चर्य है। उन्नत जन सामर्थ्य प्रख्यात करने के लिये, असम जनों के साथ स्पर्धा त्यागकर, जो उनमें समर्थ हैं, वहाँ उग्र क्रोध का प्रदर्शन करते हैं। श्लोक संख्या २८३ में 'क्लेशास' का पाठभेद होने और सूर्योदय के साथ ही उसकी पंखुड़ी बन्द हो 'क्लेशस' मिलता है। जाती है। इस प्रकार शशी कमल का प्रवृत्तितः श्लोक संख्या २८४ में 'विधूय' का पाठभेद शत्रु है । कल्हण यहाँ शशि की उज्ज्वलता को गज- 'विधाय' मिलता है । दन्त अर्थात् हाथी दांत से तुलना करता दांत की पादटिप्पणियाँ : उज्ज्वलता को श्रेष्ठ बताता है। इस प्रकार शशी २८४ (१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह को गज विरोधी चित्रित किया गया है। हाथी दाँत ७०वा श्लोक है । शशि रश्मि से चिनक जाता है। गज कमल का (२) कमलः कमल सूर्योदय के साथ शत्रु माना गया है। वह सरोवर में प्रवेश करता मुकुलित होता है और सूर्यास्त के साथ उसके पटल है और कमल दल को नष्ट कर देता है । तरंग बन्द हो जाते हैं। कुमुदिनी रात्रि में चन्द्रोदय के ७:१०९९ तथा ८:२८५६, २८६५ तथा २१४२ साथ मुकुलित होती है। चन्द्र किरणों के तिरोहित द्रष्टव्य हैं।