भारतकोश
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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

विजय कर्ताओ का कार्य क्षेत्र काश्मीर तक सीमित था। किन्तु पंडित मोतीलाल, उनके पुत्र पंडित जवाहरलाल और जवाहरलाल की पुत्री इन्दिरा गांधी का कार्य क्षेत्र समस्त भारतवर्ष था। वे भारत के भाग्य विधाता बने हैं। नि.सन्देह काश्मीर भूमि उनके जैसी दूसरी सन्तान उत्पन्न नही कर सकी है। भारतवर्ष का तिलक काश्मीर है। उस काश्मीर को शत-शत प्रणाम। कल्हण ने किसी राजाश्रय में किसी संरक्षण में किसी प्रश्रय में किया अर्थलाभ की दृष्टि से राजतरंगिणी की रचना नही की थी। मैने भी किसी राजाश्रय, किसी-संरक्षण तथा किसी प्रश्रय, अर्थ लोभ किंवा किसी भी स्वार्थ लोभ से यह पुस्तक नही लिखी है। अपनी अभिलाषा केवल इतनी ही है कि मेरा प्रयास कुङ्कुम-केसर की उत्पत्ति भूमि काश्मीर की मञ्जुल यशः सुगन्धि का अनुभव सहृदयजन को कराने में सफल हो। अपने परिश्रम, अपने अर्जित धन से पुस्तक संग्रह कर लिखा है। कल्हण की वाणी को प्रकाश में लाने का प्रयास किया है। यदि मै अर्थ लोभ किंवा किसी भी प्रकार की मुरापेक्षी भावना से लिखता तो मेरी लेखनी कुण्ठित हो जाती। मैं शब्दजाल का व्यापारी हो जाता। मेरा पुरस्कार अथवा सन्तोष इसी में है कि मैं यह कार्य कर सका। मै केवल इतने का ही आकाङ्क्षी हूँ कि सहृदयजन इसे समझने की कृपा करें। यह कार्य ज्ञात अज्ञात काश्मीर की उन महाविभूतियों के बिना आशीर्वाद के सफल नही होता जिनकी सुरभि से काश्मीर एवं जगत् आज भी सुरभित हैं। काश्मीर के उन महात्माओं तथा जनता को अंजली बद्ध नमस्कार करता हूँ। धर्म के प्रति आस्था होने के कारण कहना चाहता हूँ—ॐ नमः शिवाय—नमो बुद्धाय !! काश्मीरमयान्तः करण —रघुनाथ सिंह

प्राक्कथन भारत विभाजन के पश्चात् भारत एवं पाकिस्तान के बीच काश्मीर विवाद का विषय बन गया । काश्मीर का प्रश्न अन्तर्राष्ट्रीय जगत तथा संयुक्त राष्ट्र संघ में चर्चा का विषय हो गया । काश्मीर विधान- सभा तथा भारतीय संसद में भी विभिन्न दलों द्वारा यह प्रश्न उठाया जाता रहा है। अतएव उसका व्यापक अध्ययन अनिवार्य हो गया था। मुसलमानों के कादयान सम्प्रदाय ने कश्मीर का सम्बन्ध हजरत मूसा, सुलेमान, ईशा आदि बाइबिल एवं कुरान वर्णित धार्मिक महात्माओं से जोड़ कर काश्मीर को भारतीय संस्कृति, सभ्यता, धर्म एवं इतिहास से अलग करने का प्रयास आरम्भ किया। काश्मीर का नाम बदल कर 'बाग़-ए-सुलेमान' रख दिया गया। पाकिस्तानी लेखकों ने यह प्रतिपादित करने के लिए पुस्तक ही लिख डाली कि वास्तव में नाम 'कशीर' है न कि 'काश्मीर' । काश्मीर शब्द का पुराण, महाभारत तथा अन्य प्राचीन प्रामाणिक इतिहास ग्रन्थों में उल्लेख है, अतएव पुरातन परम्परा से काश्मीर को अलग करने का अथक परिश्रम किया जाने लगा । इस विषय पर पुस्तकें तथा पैम्फलेट लिखे गये । शंकराचार्य पर्वत का नाम 'तख्ते-सुलेमान' तथा अनन्त नाग का नाम 'इस्लामाबाद' रख दिया गया । इसी प्रकार पुराने स्थानों के नाम बदल कर उनके स्थान पर जियारत शरीफ, मजार पीर आदि रख दिये गये । काश्मीर के काँग्रेस संसदीय दल ने काश्मीर प्रश्न का अध्ययन करने के लिये दल के संसद सदस्यों का एक स्टडी ग्रुप बनाया। मैं इस स्टडी ग्रुप का दस वर्षों तक संयोजक रहा। इस काल में काश्मीर में अनेक बार जाने का अवसर मिला । सुरक्षा विभाग के क्षेत्रों में जो स्थान पड़ गये थे वहाँ सुरक्षा विभाग की सहायता से पहुँच कर उनका अध्ययन किया । संसद में भाषणों, चर्चाओं तथा बाहर काश्मीर इतिहास सम्बन्धी विवादों का उत्तर-प्रत्युत्तर तथा वास्तविकता पर प्रकाश डालने के लिए हमें वक्तव्य देना पड़ा है। संसद तथा बाहर आक्षेपों एवं विवादो का उत्तर देने के लिये काश्मीर के प्राचीन इतिहास एवं भू- परिचय का ज्ञान आवश्यक हो गया । काश्मीर की यात्रा प्रतिवर्ष अध्ययन तथा जानकारी प्राप्त करने के लिये आवश्यक हो गयी थी। इस काल में पाँच बार संसदीय सदस्यों के शिष्टमण्डल के नेता के रूप में काश्मीर जाना पड़ा । किन्तु काश्मीर का बड़ा भूभाग अनधिकृत रूप से पाकिस्तान के पास है। काश्मीर की उत्तरीय एवं पश्चिमीय सीमा पर भारतीय सेनाएँ पड़ी है। उन स्थानों का हमने प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त किया है। सैनिक छावनी तथा सैनिक प्रभाव क्षेत्र में जाने की सुविधा हमें मिल गयी थी । अतएव हमने उस क्षेत्र के स्थानों तथा जातियों का वर्णन किया है। तरंगिणी काश्मीर का भूगोल उपस्थित करती है। उसमें वर्णित स्थानों तथा जातियों के क्षेत्र में गया हूँ। उनमें जिनका वर्णन नही है उन्हें भी देखा है। काश्मीर के पुराने लोगो तथा विद्वानों से सम्पर्क स्थापित कर सन्देहास्पद प्रश्नों के हल करने का प्रयास किया है । श्री स्टीन के समय और आज के समय में बहुत अन्तर पड़ गया है। स्थानों का रूप बदल गया है। उन्हें पहचानना भी कठिन है। पुराने स्थानों पर नवीन निर्माण हो गये हैं। मैं प्रत्येक वर्णित स्थानों पर गया हूँ। उनमें श्री स्टीन काल से अब तक जो परिवर्तन हो गया है उनका उल्लेख किया है ताकि उनके पहचानने में कठिनता उत्पन्न न हो सके । ध्वंशावशेषो के शिला एवं प्रस्तर खण्ड उठाकर नवीन निर्माणों में लगा दिये गये हैं। कितने ही तोड़कर गिट्टी बनाने के काम में लाये गये हैं। परिहासपुर, कल्हण की जन्मभूमि का ध्वंसावशेष इसका

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ज्वलन्त उदाहरण है। साम्प्रदायिक उत्तेजना मे कितनी ही मूर्तियां हटा दी गयी है। कितने ही स्थानों पर कब्ज़ा कर उनके अस्तित्व का लोप कर दिया गया है। डोगरा राज्य काल में पुराने स्थानो के संरक्षण में जो प्रगति हुई थी उसका आजादी के पश्चात् लोप हो गया। कुछ स्थानों को पुरातत्व विभाग के आधीन कर उनकी रक्षा का प्रबन्ध निस्सन्देह किया गया है। अनेक स्थानो से शिला खण्ड तथा प्राचीन ईंटें निकाल ली गयी हैं। श्री स्टीन वर्णित परिचय में और वस्तुस्थिति में अन्तर मिलने का यही कारण है। तथापि हमने स्थानो पर जाकर अध्ययन कर वास्तविक स्थिति पर प्रकाश डाला है। स्थानों के निवासी वृद्धों के द्वारा कुछ बातें मालूम हो सकी हैं। उन्हें यथास्थान लिख दिया है। दशवर्ष के संयोजकत्व काल तथा लम्बे काल तक कांग्रेस संसदीय दल के मन्त्री होने के कारण काश्मीर की दैनिक घटनाओं तथा अनुसन्धानों से सम्पर्क रखना पड़ा है। पाश्चात्य लेखकों ने काश्मीर के भूरिचय तथा स्थानों के विषय मे बहुत कुछ लिखा है। जिस समय उन्होंने लिखा था उस समय साधन कम थे। उनमे तथा प्रस्तुत वर्णन में क्या अन्तर है, तथा वास्तविक स्थिति क्या है, उस पर प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त कर हमने प्रकाश डाला है। कई स्थलों पर हमने नवीन स्थानो की खोज एवं निष्कर्षो का प्रमाण भो उपस्थित किया है। पाद-टिप्पणियों में स्थानों का परिचय उनका मूल तथा विकृत दोनो रूप दिया है। यह कार्य बिना स्थानों का प्रत्यक्ष दर्शन किये सम्भव नही था। जिस समय का इतिहास है उस समय काश्मीर की सम्पूर्ण जनता हिन्दू थी। उनके धार्मिक एवं दैनिक जीवन से स्थानों का सम्बन्ध था। स्थानों का इतिहास वहाँ के निवासियों के वंशीय इतिहास से मिल गया था। आज काश्मीर की ९० प्रतिशत जनता मुस्लिम है। जो हिन्दू हैं वे प्रायः नगरों के निवासी है। वे स्वयं काश्मीर के अनेक स्थानो का इतिहास एवं नाम भूल गये हैं। गुफायें, मन्दिर, मठ, शाला, जनाथय, विहार आदि जियारत, मस्जिद, मज़ार तथा अन्य स्थानो में प्रायः परिणत कर लिये गये हैं। वे कभी हिन्दू स्थान थे, यह विचार वहाँ के लोगों को पसन्द नहीं आते। इसका मैने पद-पद पर अनुभव किया है। वहाँ की मुस्लिम जनता की प्रतिक्रिया अच्छी नहीं होती। प्राचीन गाथाओं के स्थान पर नवीन गाथायें उनके साथ जोडकर, उनके पुराने रूप को बदलकर, उन्हें नवीन जामा पहना दिया गया है। उनके मूल रूप का पता संस्कृत-साहित्य से ही मिलता है। इस समय रहन-सहन, समाज एवं रुचि इतनी शीघ्रता से बदलती जा रही है कि लोग कुछ दिनों में बहुत कुछ भूल जायेंगें; अतएव उन्हें लिपिबद्ध कर देना ऐतिहासिक शोध की दृष्टि से परम आवश्यक है। काश्मीर की सीमा पर, रामायण, महाभारत, पुराण, नीलमत तथा राजतरंगिणी में वर्णित अनेक जातियां रहती थी। उन्हें कालान्तर में लोकोत्तर जातियां किंवा व्यक्ति मान लिया गया। यहाँ हमने प्राचीन ग्रन्थों के आधार पर उनका स्थान निर्णय तथा परिचय दिया है। उनका उल्लेख परिशिष्ट में किया गया है। ये जिन क्षेत्रों में रहते थे वहाँ मै गया हूँ। उनमें समय व्यतीत किया है। परन्तु धर्म परिवर्तन के साथ अपना इतिहास भूल गया है। अभी तक प्रचलित कुछ रीति-रिवाजों के आधार पर हमने उनकी जानकारी प्राप्त की है। पाकिस्तान अधिकृत भू-भाग का प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं हो सका है। उसका वर्णन ग्रन्थों के आधार पर किया गया है। यह ज्ञान अप्रत्यक्ष है। मुझे प्रस्तुत शोध ग्रन्थ के औचित्य के विषय में अधिक कहने की आवश्यकता नहीं है। स्टीन ने भौगोलिक नामों एवं ऐतिहासिक उल्लेखों को स्पष्ट करने का प्रयास किया था किन्तु सांस्कृतिक सामग्री के तुलनात्मक अध्ययन को भी समुचित महत्त्व तथा अवसर न दे सके। आश्चर्य है कि स्टीन के बाद भी किसी ने

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राजतरंगिणी की सांस्कृतिक सामग्री के भंडार का समुचित शोधपूर्वक अध्ययन नहीं किया। इस प्रकार सभी दृष्टिकोणों को लेकर एक समग्र अध्ययन की आवश्यकता थी। इसीलिये मैने यह ऐतिहासिक, सांस्कृतिक एवं तुलनात्मक अध्ययन किया है। कल्हण को पूर्ण जीवनी नहीं मिलती। 'कल्हण' शीर्षक विवरण में हमने कल्हण की जीवनी उप- स्थित करने का प्रयास किया है। इसी सन्दर्भ में हमने कल्हण के कवि और इतिहासकार दोनों रूपों का विवेचन भी किया है। इन दोनों रूपों में ही किन पुराकालीन प्रभावों की छाप उन पर पडी, कल्हण का आदर्श एवं लक्ष्य क्या था और उन्हें इन क्षेत्रों में कितनी सफलता मिली आदि प्रश्नों का भी विचार हुआ है। प्राचीन भारत में ऐतिहासिक साहित्य की परम्परा में राजतरंगिणी का स्थान और महत्त्व निर्धारित करने का भी प्रयास हुआ है। राजतरंगिणी के तरंग प्रथम, द्वितीय तथा तृतीय जिसे गाथा कालीन काल कहते हैं उनका यहाँ समावेश किया गया है। रामायण, महाभारत, पुराण, तथा तत्कालीन ग्रन्थों के आधार पर राजतरंगिणी के वर्णित इतिहास को क्रमबद्ध करने का प्रयास किया है। कल्हण का प्राचीन कालीन वर्णन रामायण, महाभारत, पुराण एवं अन्य प्राप्य ग्रन्थों से कहाँ तक मेल खाता है और कहाँ तक प्रामाणिक है इसका विवेचन पाद-टिप्पणी में किया गया है। सांस्कृतिक जीवन के विभिन्न क्षेत्रों से सम्बन्धित सामग्री और ऐतिहासिक एवं भौगोलिक सूचनाओं की अद्भुत रत्नराशि राजतरंगिणी में मिलती है। पाद-टिप्पणी में इनका यथास्थान विशद विवेचन किया गया है। भूमिका रूप वाले इस अंश में हमने इस अमूल्य सामग्री को विषय-क्रम से एकत्रित किया है जिससे कि इस अमूल्य ज्ञान-भण्डार का कुछ आभास हो सके और राज- तरंगिणी के ऐतिहासिक महत्त्व को प्रस्तुत किया जा सके। रत्नाकर पुराण की कपोल-कल्पना जो हसन की तारीख तथा लुप्त राजाओं की तालिका का आधार है, उसे तर्क की तुला पर तौल कर उसकी अप्रामाणिकता सिद्ध की है। काश्मीर के इतिहास के सम्बन्ध में हिन्दू राज्य की समाप्ति से अब तक जो भ्रान्तियाँ उत्पन्न की गयी हैं, और इतिहास को एक नया रंग क्यों दिया गया है, इसका स्पष्टीकरण करते हुए वास्तविकता को प्रकट किया है। कल्हण द्वारा वर्णित घटनाओं के साथ धार्मिक विकास, ह्रास, क्रान्ति, विप्लवों आदि का संक्षिप्त वर्णन कर, यह दिखाने का प्रयास किया गया है कि घटनायें तत्कालीन जनता की मानसिक स्थिति को प्रकट करती हैं तथा जनता की मनःस्थिति के कारण किस प्रकार घटनायें घटती है। भावानुवाद, छायानुवाद, सारानुवाद, शब्दानुवाद, अर्थानुवाद, भाषान्तर, रूपान्तर, अनुकरण, पुनर्सर्जन आदि अनेक अनुवाद की शैलियाँ प्रचलित हैं। हिन्दी में प्रथम अनुवाद 'प्रबोध चन्द्रोदय' (सन् १५४४) मल्हू कवि का मिलता है। यह सारकथन एवं आख्यान शैली का अनुवाद है। मध्ययुग के परवर्ती अनुवाद भाषान्तर है। आधुनिक काल में कतिपय अनुवादों में मूल रचना का रूपान्तर किया गया है। स्व० श्री भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने 'कर्पूर मंजरी' (सन् १८७६ ई०) का साधारण रूपान्तर किया है। पराश्रयी रचनायें भी हिन्दी में की गयी हैं। यथा हृदयराम कृत 'हनुमन्नाटक' (सन् १६२३ ई०) तथा बद्रीनाथ भट्ट का 'कुरुवन दहन' (सन् १९१२ ई०) है। यूरोप में मध्ययुग में शब्दानुवाद शैली प्रचलित थी। बाइबिल का अनुवाद इसका एक उदाहरण है। अंग्रेजी के कवि श्री जान ड्राइडन ने शब्दानुवाद, भावानुवाद तथा अनुकरण (इमिटेशन) अनुवादो का वर्गी- करण किया है। महा कवि गेटे ने अनुवादों को परिचयात्मक (लूथर कृत बाइबिल) रूपान्तर (एडाप्टेशन) तथा पुनः सर्जन तीन वर्गों में विभाजित किया है। समीक्षक बेनेडेट्टे क्रोचे का कहना है कि कामिनी के

  • घ - समान यदि अनुवाद सुन्दर है तो सच्चा नहीं हो सकता और सच्चा है तो सुन्दर नहीं हो सकता । उसने उत्तम अनुवाद को मौलिक रचना के समान माना है। यह मौलिकता फिट्जेराल्ड के रुबाइयात उमर खय्याम में परिलक्षित होती है। इसी प्रकार स्वर्गीय रामचन्द्र शुक्ल द्वारा अनूदित राखाल दास वन्द्यो- पाध्याय के 'कंकणा' में मौलिकता का दर्शन होता है। श्री रामचन्द्र वर्मा का अनुवाद हिन्दू राजतन्त्र' श्री जायसवाल की प्रसिद्ध पुस्तक 'हिन्दू पोलिटी' का अनुवाद है । श्री जायसवाल ने स्वयं स्वीकार किया था कि अनुवाद उनकी मूल पुस्तक से भी उत्तम है। क्रोचे कहता है कि अनुवाद मूल का पुनः सर्जन नहीं है; किन्तु मूल की अभिव्यक्ति के सदृश अभिव्यक्ति का सृजन हो सकता है। विश्व में सबसे अधिक अनूदित पुस्तक बाइबिल है। उसका अनुवाद दूसरी शताब्दी ईसवी से अब तक विश्व की अनेक भाषाओं में होता चला जा रहा है। बाइबिल की शैली धार्मिक ग्रन्थों में अपनायी जा सकती है। परन्तु राजतरंगिणी महा- काव्य है, ऐतिहासिक ग्रन्थ है। इसके अनुवाद की शैली काव्यमय एवं ऐतिहासिक होनी चाहिये । स्वर्गीय सर्वश्री योगेशचन्द्र दत्त, स्तीन तथा रणजीत सीताराम पण्डित का अंग्रेजी अनुवाद उपलब्ध है । श्री योगेश दत्त का अनुवाद सारानुवाद है। सर्वश्री स्तीन तथा पण्डित ने प्रत्येक श्लोक का अलग- अलग अनुवाद किया है। कहीं-कहीं अनुवाद को स्पष्ट करने के लिये तीन-चार श्लोकों का अनुवाद एक साथ कर दिया है। श्री स्तीन का अनुवाद शब्दानुवाद तथा अर्थानुवाद के साथ बोधगम्य है। श्री पण्डित का अनुवाद साहित्यिक है। उसमें भाषा का प्रवाह है। कल्हण के अलंकारों, उपमा एवं रसों को अंग्रेजी भाषा में व्यक्त करने का प्रयास किया गया है । प्रस्तुत अनुवाद शैली में प्रत्येक पद जिसमें क्रिया मिल गयी है उसका अनुवाद एक ही पद में किया गया है। यदि क्रिया दूसरे पद में मिली है तो पद तोड़कर अनुवाद किया गया है। जहाँ कल्हण ने युग्मम्, तिलकम् एवं कुलकम् लिखा है वहाँ दो, तीन तथा चार श्लोकों का भाव, अर्थ एवं अनुवाद एक साथ रखने का प्रयास किया गया है। उसमें भी प्रायः प्रत्येक श्लोक का अनुवाद अलग ही रखने का प्रयास किया गया है। श्लोक संख्या ६३ तक भावानुवाद, शब्दानुवाद तथा अर्थानुवाद का मिश्रण मिलेगा। उसके पश्चात् अनुवाद की शैली बदल दी गयी है। शब्दों के क्रिया, वचन एवं लिंग का मूल रूप ही अनुवाद में रखा गया है। प्रत्येक शब्द का अर्थ भाव के साथ किया गया है। अनेक संस्कृत शब्द जिनका हिन्दी में अनुवाद सम्भव नहीं था उन्हें यथावत रखकर उसका अर्थ पाद-टिप्पणी में स्पष्ट किया गया है । भारतीय भाषाओं की जननी संस्कृत है। कितने ही संस्कृत शब्द अप्रचलित हो गये हैं। कितनों का अर्थ आज वह नहीं है जो पूर्व काल में था। कितने ही अप्रचलित शब्दों का प्रयोग कल्हण ने किया है। शब्दों का अर्थ जो कल्हण के रचना काल में था उन्हें रखने का प्रयास किया है। किसी भी मौलिक ग्रन्थ के अनुवाद के लिये लेखक के वातावरण, निवास स्थान, समाज, तत्कालीन भूपरिचय, इतिहास, कुल, विचार तथा कथा-प्रसंग का ज्ञान होना आवश्यक है। इनका अध्ययन करने पर ही लेखक के मूल भाव की झलक मिल सकती है, उसकी आत्मा का दर्शन हो सकता है। कल्हण के निवास स्थान एवं जिन स्थानों का उसने वर्णन किया है उन्हें हमने स्वयं देखा है। वहाँ का अध्ययन किया है। अतएव अनुवाद करते समय सरलता का बोध हुआ है । जिन स्थलों पर सर्वश्री स्तीन तथा पण्डित के अनुवादों से अनुवाद भिन्न किया है अथवा शब्दों का अर्थ भिन्न किया है, उसका उल्लेख पाद टिप्पणी में कर दिया है। इस प्रकार यह अनुवाद अर्थानुवाद, भावा- नुवाद तथा शब्दानुवाद के साथ वाक्यार्थ प्रधान हो गया है। अनुवाद की रोचकता बढ़ाने के लिये अपनी
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ओर से कुछ जोड़ने का प्रयास नहीं किया है। अर्थ खोलने के लिये जहाँ शब्दों की आवश्यकता पड़ी है वहाँ उन्हें कोष्ठ में दे दिया है। रचनासौष्ठव अक्षुण्ण रखने के लिये कल्हण की रचना-शैली का अनुकरण किया है। प्रसाद गुण को यथावत रखने का प्रयास किया है। प्रसाद गुण का अनुवाद में महत्वपूर्ण स्थान है। दुरूह स्थल तथा जहाँ भाव एवं अर्थ समझने में कठिनाई हुई है अथवा जिस पद के दो अनुवाद हो सकते थे, उन्हें भी पाद टिप्पणी में दिया है। मै स्वयं संस्कृत का अधिकारी विद्वान नहीं हूँ। कठिनता का बोध होने पर संस्कृत के विद्वानों से सहायता ली है। अनुवाद तथा मूल संस्कृत श्री विश्वबन्धु के सम्पादकत्व में हुये राजतरंगिणी के होशियारपुर संस्करण (सं० १९६० ई०) पर आधारित है। पाठभेद भी उसी संस्करण से लिये गये हैं।

संक्षेप में, पाद टिप्पणी में हमने पाठ भेद देने के बाद ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्त्व की सभी सामग्रियों का विवेचन किया है। प्रयुक्त शब्द का अर्थ, उसकी उत्पत्ति एवं अन्य ग्रन्थों में उसके उपयोग के विवरण देने के बाद हमने उनके वर्तमान रूप तक का इतिहास प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया है। इस संबंध में हमने पुरातत्व की सामग्री, स्थानीय परंपराओं एवं अन्य प्रामाणिक ग्रन्थों का विधिवत उपयोग किया है। इन विवरणों में हमने सदैव ही ऐतिहासिक एवं तुलनात्मक दृष्टिकोण को अपनाने का प्रयत्न किया है। जिन विषयों के विवेचन में विस्तार की अपेक्षा थी उन्हें सुविधा की दृष्टि से हमने परिशिष्ट में रख दिया है।

आभार प्रकाश

इस शोध प्रबन्ध के लिये अनेक महानुभावों और पुस्तकालयों की सहायता प्राप्त हुई है। उनके प्रति कृतज्ञता प्रकाश आवश्यक है। संसदीय पुस्तकालय, नयी दिल्ली ने काश्मीर सम्बन्धी पुस्तकों का संग्रह किया है। कितनी ही अप्राप्य पुस्तकें हमारे सुझाव पर विदेशों से मँगायी गयी हैं। कांग्रेस संसदीय दल के पुस्तका- लय में प्रायः सभी आधुनिक पुस्तकें खरीदी गयी हैं। उनसे विशेष सहायता मिली है। काशी हिन्दू विश्व- विद्यालय पुस्तकालय तथा संस्कृत विश्व विद्यालय, काशी में पुरानी तथा हस्तलिखित पुस्तको को देखने तथा अध्ययन करने का अवसर मिला है। मै सप्ताह में दो दिन कलकत्ता रहता था। उस समय वंग परिषद् पुस्त- कालय में राजतरंगिणी के बंगला मूल तथा अनुवादों के साथ ही पुराणों के भी मूल तथा अनुवाद देखने तथा अध्ययन करने का अवसर मिला है। 'बम्बई सेन्ट्रल लाइब्रेरी' में राजतरंगिणी की मराठी अनुवाद के साथ काश्मीर सम्बन्धी कुछ पुस्तकें मिली। वहाँ मास में एक बार नेशनल शिपिंग बोर्ड तथा मझगांव डाक के सम्बन्ध में जाने का अवसर मिलता था। इस अवसर को मैने उक्त पुस्तकालय में लगाया है।

नेशनल लाइब्रेरी कलकत्ता, एशियाटिक सोसाइटी लाइब्रेरी में बंगला, अंग्रेजी तथा हिन्दी में काश्मीर सम्बन्धी पुस्तकों का अध्ययन किया है। उक्त स्थानों के अतिरिक्त श्री काशी विद्यापीठ पुस्तकालय में कुछ दुर्लभ पुस्तकें प्राप्त हुई । अडयार लाइब्रेरी अडयार, मद्रास में भी कुछ पुस्तकें देखने को मिली हैं। उदयपुर विश्वविद्यालय पुस्तकालय में भी, जहाँ हिन्दुस्तान जिंक का चेयरमैन होने के कारण जाना पड़ता था, पुस्तकों का अध्ययन किया है। रघुनाथ मन्दिर पुस्तकालय में काश्मीर सम्बन्धी हस्तलिखित ग्रन्थों का उत्तम संग्रह है। वहाँ से तथा श्रीनगर राजकीय रिसर्च विभाग के संग्रह से भी सहायता ली है। काश्मीर सम्बन्धी ग्रन्थों का वहाँ उत्तम संग्रह है। प्रताप सिंह संग्रहालय, श्रीनगर में काश्मीर में उत्खनन कार्य में प्राप्त मूर्तियों का अच्छा संग्रह है। वहाँ की मूर्तियों के अध्ययन से काश्मीर की मूर्तिकला पर प्रकाश पड़ता है। श्री टी. एन. खजांची, पुरातत्व विभाग श्रीनगर का सहयोग प्राप्त होता रहा है।

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संकेत-सूची अ० = अध्याय नागरी अंक = जादू संस्करण अ० = वेद; अथ० = अथर्ववेद रोमन अंक = ग्रोज संस्करण अनु० = अनुशासन पर्व ( महाभारत ) पद्म० = पद्म पुराण अग्नि = अग्निपुराण पंच विंश = पंच विंश ब्राह्मण अर० = अरण्य काण्ड ( रामायण ) पण्डित० = रणजीत सीताराम पण्डित कृत रा० अ० अलवेरुनी = अलवेरुनीज इण्डिया, पाणिनी = अष्टाध्यायी आ० = आदि पर्व ( महाभारत ) वन० = वनपर्व ( महाभारत ) आश्व० = आश्वमेधिक पर्व ( महाभारत ) बर्नियर = बर्नियर कृत ट्रेवेल्स इन मोगल इम्पायर उ० = उद्योग पर्व ( महाभारत ) वा० रा० = वाल्मीकीय रामायण ऋ० = ऋग्वेद अ० = अरण्यकाण्ड क० = कर्ण पर्व ( महाभारत ) उ० = उत्तरकाण्ड कनिंघम = कनिंघमकृत एन्शेन्ट ज्योग्राफी कि० = किष्किन्धा काण्ड कि० = किष्किन्ध्या काण्ड ( रामायण ) यु० = युद्ध काण्ड कोल्स० = कोलकृत इलस्ट्रेशन आफ एन्शेन्ट बिल्डिंग वाइन० = वाइन कृत ट्रेवेल इन कश्मीर लद्दाख इस्काई ऑफ काश्मीर बेट्स० = वेट्स कृत ए गजेटियर आफ काश्मीर कोवो० = नोट्स ऑन– टेम्पूल्स ऑफ काश्मीर ब्रह्म० = ब्रह्म पुराण गणेश० = गणेश पुराण ब्रह्म० वै० = ब्रह्म वैवर्त पुराण गो० गृ० = गोभिल गृह्य सूत्र, बृ० उ० = बृहदारण्यकोपनिषद् जादू० = नीलमत पुराण जादू, संस्करण, लाहौर भ० = भविष्य पुराण जोन० = जोन राजतरंगिणी भा० = भागवत पुराण जैन = जैन राजतरंगिणी ( श्रीवर कृत ) भी० = भीष्म पर्व ( महाभारत ) जै० ब्रा० = जैमिनीय ब्राह्मण म०; महा० = महाभारत ट्रोयर = ट्रोयरकृत राजतरंगिणी अनुवाद मनु० = मनुस्मृति ड्रयू = ड्रयूकृत दी जम्मू एण्ड काश्मीर माहा० = माहात्म्य तीर्थ० = तीर्थ संग्रह ( साहिबरामकृत ) मार्क० = मार्कण्डेय पुराण तै० आ० = तैत्तिरीय आरण्यक मूर क्राफ्ट० = मूर क्राफ्ट कृत ट्रेवेल इन हिमालयन तै० सं० = तैत्तिरीय संहिता प्रोविन्सेज ऑफ हिन्दुस्तान दत्त० = जोगेशचन्द्र दत्त कृत किंग्स ऑफ काश्मीर मौ० = मौसल पर्व ( महाभारत ) दे० भा० = देवी भागवत् याज्ञ० = याज्ञवल्क्य स्मृति द्रो० = द्रोण पर्व ( महाभारत ) योग० = योग वाशिष्ठ रामायण नन्दि० = नन्दि पुराण रा० त० = राजतरंगिणी ( कल्हण कृत ) नील० = नीलमत पुराण लारेंस० = लारेन्सकृत दी वैली आफ काश्मीर

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[बायाँ स्तम्भ] लिं० = लिंग पुराण वराह = वराह पुराण वा० सं० = वाजसनेयिसंहिता वायु० = वायु पुराण विलसन० = विलसनकृत हिन्दू हिस्ट्री आव काश्मीर ब्रीज० = नीलमत पुराण रोमन, ब्रीज संस्करण विष्णु० = विष्णु पुराण विष्णु० ध० = विष्णु धर्मोत्तर पुराण ब्यूलर० = रिपोर्ट जर्नल आफ दि रायल एशियाटिक सोसाइटी आफ बाम्बे सं० १४:१८७७ श० = शल्यपर्व ( महाभारत ) श० ब्रा० = शतपथ ब्राह्मण शा० = शान्तिपर्व ( महाभारत ) शि० = शिवपुराण

[दायाँ स्तम्भ] शि० सं० = शिव शत रुद्र संहिता शु० = शुक्रनीति शु० = स० = सभापर्व ( महाभारत ) सं० गृ० = सांख्य गृहोक्त नाटक संहिता० = बृहत् संहिता स्कन्द० = स्कन्द पुराण स्टीन० = स्टीन एम० ए० द्वारा अनूदित कल्हण की राजतरंगिणी हरिवंश० = हरिवंश पुराण हि० = हिस्ट्री ह्यूगेल० = ह्यूगेल कृत काश्मीर एण्ड दण शेष दर ग्रीक हुयेनसांग० = दी लाइफ आफ हुयेनसांग

कल्हण रचना : कल्हण के सम्बन्ध में जो कुछ सामग्री बीसवीं शताब्दी के प्रथम दशक तक प्राप्त हुई है, उससे अधिक इस दिशा में प्रगति नहीं हो सकी है। राजतरंगिणी, अर्धनारीश्वर स्तोत्र तथा जय- सिंहम्युदय काव्य कल्हण से सम्बन्धित किये जाते हैं। राजतरंगिणी निस्सन्देह कल्हण की रचना है। अर्ध- नारीश्वर स्तोत्र के १८ श्लोकों में सात श्लोक राजतरंगिणी के सात तरंगों के मंगलाचरणों से लिये गये हैं। जयसिंहम्युदय काव्य अभी तक प्रकाश में नहीं आया है। राजतरंगिणी के इतिपाठ तथा स्तोत्र के इतिपाठ में मौलिक अन्तर है। राजतरंगिणी के इतिपाठ में कल्हण ने अपने को महाकवि नहीं लिखा है। केवल अष्टम तरंग के इतिपाठ में महाकवि शब्द आता है। परन्तु इसका पाठभेद अनेक प्राचीन प्रतियों में मिलता है। जिनमें महाकवि शब्द नहीं दिया गया है। प्रतीत होता है किसी श्रद्धालु लिपिक ने महाकवि शब्द उसके काव्य के विशाल रूप को देखकर अन्त में दे दिया है। सुयोग्य, विनयी एवं प्रतिभाशाली कवि चाहे कितना ही बड़ा क्यों न हो, वह अपनी लेखनी से अपने लिए महाकवि पद का प्रयोग नहीं करेगा। यह आत्मश्लाघा हो जाती है। अर्धनारीश्वर स्तोत्र उसकी स्वतन्त्र रचना है अथवा उसके श्लोकों का संग्रह मात्र है अथवा किसी ने उसके पदों का संकलन कर उसे अर्धनारीश्वर स्तोत्र की संज्ञा दे दी है। यह विचारणीय विषय है। जयसिंहम्युदय काव्य उपलब्ध नहीं है। केवल रत्नाकर के सार-समुच्चय में कल्हण की इस रचना का उल्लेख मिलता है। कल्हण की सूक्तियों के संग्रह का भी उल्लेख मिलता है। किन्तु वह राजतरंगिणी के आठों तरंगों के सुभाषितों का संग्रह मात्र है। यदि जयसिंहम्युदय काव्य प्रकाश में आ जाय तो कल्हण के जीवन पर और प्रकाश पड़ सकता है। स्तोत्र तथा सूक्ति संग्रह का मूल स्रोत राजतरंगिणी है। स्तोत्र में दिये गये इतिपाठ में चम्पक महामात्य का नाम नहीं है। राजतरंगिणी के आन्तरिक लेखों के आधार पर अनुमान एवं निष्कर्ष निकाल कर, कल्हण के जीवन पर कुछ और प्रकाश डाल सकते हैं। वंश : राजतरंगिणी के इतिपाठ से कल्हण के पिता का नाम महामात्य चम्पक प्रभु होना सिद्ध होता है। यद्यपि अर्धनारीश्वर स्तोत्र के इतिपाठ में कल्हण के वंश, पिता, पद, देशादि का नाम नहीं दिया गया है। इतिपाठ के अतिरिक्त कल्हण के वर्णन (रा० त० ७ : ९५४, १११७, १११८, ८ : २३६५) से प्रमाणित हो जाता है कि चम्पक कल्हण का पिता था। वह महामात्य था। राजमन्त्री था। समाज में उच्च स्थान प्राप्त था। कल्हण अपने चाचा कनक के विषय में भी सूचना देता है। (रा० त० १११७-१११८) वह चम्पक का कनिष्ठ भ्राता था। कनक काश्मीर राज हर्ष का प्रियपात्र था। शिष्य था। राजा से सपरिश्रम गान विद्या सीखा था। राजा हर्ष सर्वश्रेष्ठ गायक, गीतकार एवं संगीत शास्त्र पारंगत था। कनक के परिश्रम एवं संगीत में श्रेष्ठता प्राप्त करने के कारण, राजा हर्ष ने उसे एक लाख स्वर्ण मुद्रा दिया था। कनक का राजा पर स्नेहयुक्त प्रभाव था। कल्हण का गृह, गान-वादन, राग-रागिनी, ताल-लय समन्वित पदों एवं गीतों से गुंजित रहता था। कल्हण के पदों में माधुर्य एवं ताल-लय की एक अविच्छिन्न धारा प्रवाहित मिलती है। उसका पद

[ २ ] कहीं भी पद लालित्य से रहित नही है। उसके शब्दों का चयन, संकलन, निवन्धन एवं उनकी ध्वनि श्रोत- प्रिय है। कही भी इस गति में अवरोध किंवा विश्रृंखलता नहीं मिलती । जन्मस्थान : कल्हण का जन्म परिहासपुर में हुआ था । उसका कुल परिहासपुर निवासी था । कल्हण ने इसका स्पष्ट उल्लेख किया है। जिस समय राजा हर्ष परिहासपुर के प्रसिद्ध विहार-स्थित बुद्ध की विशाल प्रतिमा खण्डित करना चाहता था, तो परिहासपुर के कनक तथा एक श्रमण कुशलस्थो के कारण अपने अनुचित कार्य से विरत हो गया । प्रतिमा की रक्षा हो गयी । ( रा० त० ७ : १०९७ ) इससे दो बातें स्पष्ट होती हैं। कनक परिहासपुर निवासी था । कल्हण का कुटुम्ब परिहासपुर में रहता था । अतएव कल्हण का जन्म परिहासपुर में होना मानना उचित होगा । कल्हण ने परिहासपुर का स्पष्ट और विस्तृत प्राकृतिक वर्णन किया है। यह वर्णन वहाँ का निवासी ही कर सकता है। परिहासपुर समीपस्थ वितस्ता-सिन्धु संगम प्रयाग ( वाग्दीपुर ) का विशद वर्णन भाव- मयी भाषा में कल्हण ने किया है। वहाँ के स्थान, मन्दिर आदि का सुस्पष्ट, वास्तविक विस्तृत वर्णन प्रसंग आते ही किया है। दूसरों के लिये यह सम्भव नहीं था । ( रा० त० ४ : १६४, २०४; ७ : १३२६, १३४४; ५ : ९७-१०० ) परिहासपुर, प्रयाग तथा वाग्दीपुर में बार बार जा चुका हूँ। वहाँ का जो वर्णन राज- तरंगिणी में मिलता है वह अक्षरशः सत्य है । जाति : कल्हण की जाति ब्राह्मण थी । उसे अपने ब्राह्मणत्व का गर्व था । कल्हण ने अपनी जाति स्वयं कही नहीं लिखी है। वह ब्राह्मण था । यह प्रश्न विवादास्पद इसलिए नही रह जाता कि द्वितीय राजतरंगिणी के लेखक जोनराज ने उसे 'कल्हण द्विजः' लिखा है । ( जो० रा० ५ ) जोनराज ने कल्हण के वंशजों के लिए पुनः 'ब्राह्मणान्' 'ब्राह्मण्यान्' 'ब्राह्मण्यात्' विभिन्न पाठभेदों के साथ उल्लेख किया है । ( जो० रा० ९९ ) शुक ने अपनी राजतरंगिणी में 'श्री कल्हण द्विज' लिखा है । ( शुक : रा० ५ ) कल्हण ने सन् ११५० ई०, जोनराज ने सन् १४४६ ई०, तथा शुक ने सन् १५८६ ई० में अपनी रचनाओ का लेखन- कार्य समाप्त किया था । इस प्रकार कल्हण के रचना काल से आगामी ४३६ वर्षों तक कल्हण तथा उसके वंशजो को द्विज किंवा ब्राह्मण माना जाता रहा है। द्विज शब्द ब्राह्मण, क्षत्री तथा वैश्य यज्ञोपवीतधारी के लिए निर्देश किया गया है। किन्तु द्विज के साथ ब्राह्मण शब्द का प्रयोग कल्हण की जाति निश्चित कर देता है। आजकल द्विज शब्द ब्राह्मणो के लिए रूढ़ हो गया है। कल्हण को काश्मीरी ब्राह्मण होने का इतना गर्व था कि ( रा० १ : १६० ) उसने गान्धार ब्राह्मणों को द्विजाधम तक लिखा है ( रा० १ : ३०७, ४३६, ११५० ) तथापि उसने आर्यदेशीय ब्राह्मणो के लिए आदरसूचक शब्दों का प्रयोग किया है। वह ब्राह्मणों को पवित्र तथा सनातनी देखना पसन्द करता था। ब्राह्मणो के अनुचित कार्यों की उसने निन्दा की है। ( १ : १५८ ) जन्म वर्ष : कल्हण के पिता चम्पक का सन् ११३६ ई० तक जीवित रहना सिद्ध होता है । कल्हण ने सन् ११४८-११४९ ई० में राजतरंगिणी की रचना प्रारम्भ किया था। कल्हण ने स्वयं, अथवा मंख अथवा किसी अन्य तत्कालीन अथवा परवर्ती लेखक ने इस विषय पर प्रकाश नही डाला है। राजतरंगिणी के आन्तरिक साक्ष्य से ही उसका सम्भाव्य जन्म वत्सर निकालना होगा । कल्हण की शैली से प्रकट होता है, वह तरंगिणी रचना काल में प्रौढ़ व्यक्ति था । उसरा मस्तिष्क प्रौढ़ था । उसका विचार प्रौढ़ था। उसका शरीर प्रौढ़ था। राजा सुस्सल के पुनराज्य प्राप्ति के पूर्व

[ ३ ] भिक्षाचर के सैनिकों के विश्वासघातक कार्यों का प्रत्यक्षदर्शी था । यह घटना सन् ११२१ ई० की है। ( रा० ८ : ९४१ ) उसने राजा सुस्सल ( सन् १११२-११२० ई० ) के पूर्ववर्ती तीन राजाओं का आँखो देखा वर्णन किया है । यहाँ उसकी शैली घटना-क्रमों को एक के पश्चात् दूसरे को इस द्रुत गति से रखती है, जैसे कोई उन घटनाओं को स्वतः देखकर लिख रहा था । वह किंचित् मात्र कहीं भी अपनी लेखनी को ठहरने नही देता । शब्द नही खोजता । कड़ी नही जोड़ता । वह शीघ्रातिशीघ्र सब कुछ वर्णन कर देने के लिए उतावला हो उठता है । घटनायें जैसे स्वतः एक के पश्चात् दूसरी उसकी लेखनी से प्रसूत होती गयी हैं । घटना-क्रमों के मूल को जान लेता है । परिस्थितियों का रहस्य समझ जाता है । कल्हण का पिता चम्पक सन् १०९८ ई० में० द्वारपति के पद पर था । राजा हर्ष ने उसे मण्डलेश भी बनाया था । निःसन्देह चम्पक इस समय प्रौढ़ व्यक्ति था । दोनों पद काश्मीर में सर्वश्रेष्ठ उत्तरदायित्व के थे । वे अनुभवी तथा प्रौढ बुद्धि वाले व्यक्ति को दिये जाते थे, जो उनकी गुरुता का अनुभव कर सकता था । यदि चम्पक का अवसान काल सन् ११३६ ई० मान लिया जाय तो यह समय सन् १०९८ ई० के लगभग पड़ता है । अर्थात् वह ३८ वर्ष की आयु तक द्वारपति एवं मण्डलेश हो चुका था । श्री स्टीन का मत है कि कल्हण का जन्म ग्यारहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में रखा जा सकता है । चम्पक किसी युद्ध में हत नही हुआ था । यदि वह अकाल मृत्यु किंवा किसी संघर्ष में हत किंवा आहत होता तो कल्हण उसका अवश्य वर्णन करता; क्योकि कल्हण ने उसे राजनीति एवं संघर्षों में सक्रिय भाग लेते हुए चित्रित किया है । निश्चय ही चम्पक अपनी मृत्यु से दिवंगत हुआ था । यदि सन् १०९८ ई० में उसकी आयु ३८ वर्ष कम से कम मान ली जाय तो सन् ११३६ ई० में उसकी आयु ६८ वर्ष की ठहरती है । इस आन्तरिक साक्ष्य के अनुसार कल्हण का जन्म सन् १०९८ ई० के समीप रखा जा सकता है । श्री स्टीन के मत में तथ्य है कि कल्हण का जन्म ग्यारहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में रखा जा सकता है । कनक : उच्चल तथा सुस्सल भ्राता द्वय काश्मीर राज्य प्राप्ति हेतु कृत-संकल्प हो गये थे । उच्चल के कारण राजा हर्ष की अमानुषिक क्रूरता को भी लज्जित करने वाली हत्या की गयी । ( रा० ७ : १७११, १७१२ ) राजा हर्ष का मुण्ड काटकर उच्चल के पास भेजा गया । मुण्ड को लगुडा पर खोसकर चारो ओर घुमाया गया । ( रा० ७ : १७२१, १७२३ ) राज्य प्राप्ति के प्रश्न को लेकर दोनो भाई उच्चल तथा सुस्सल में भी संघर्ष आरम्भ हो गया । उस समय सभी अनुचर सात दिनों तक मार्ग में रोक दिये गये । कल्हण का संगीतज्ञ चाचा कनक भी उसी रुके समुदाय मे था । अवसर पाते ही वह समुदाय से निकल भागा । कनक अपने गुरु तथा राजा हर्ष के दुःखद अन्त से इतना खिन्न हो गया कि काश्मीर मण्डल त्याग दिया । वाराणसी में काशीवास करने लगा ! ( रा० ८ : १२, १३ ) काशी किंवा वाराणसी के इस सम्बन्ध के कारण कल्हण ने राजतरंगिणी में काशी का अत्यधिक वर्णन किया है । चम्पक : प्रथम तरंग से षष्ठ तरंग के इतिपाठ के अतिरिक्त कल्हण ने प्रथम बार चम्पक का सहसा उल्लेख नन्दि क्षेत्र यात्रा के प्रसंग में किया है । कल्हण की यह शैली है । जब वह किसी व्यक्ति का उल्लेख करता है तो उसके पद, वंश आदि का उल्लेख करता है । यहाँ चम्पक का बिना किसी पक्ष आदि के वर्णन करना महत्त्व रखता है । वह मान लेता है कि लोग उसके पिता के सम्बन्ध में जानकारी रखते थे । कुछ विद्वानों का यह मत है कि यह वर्णन इस बात का प्रतीक है कि उसने अपने समय के लोगों के लिए राज- तरंगिणी लिखी थी ।

[ ४ ] कल्हण स्वयं अपने पिता के साथ नन्दि क्षेत्र की यात्रा में प्रतिवर्ष जाता था । ( रा० ७ : १५४ ) यहाँ उसके पिता प्रचुर धन दान करते थे । ( रा० ८ : २१६५ ) कल्हण के पिता निस्सन्देह सन् ११३६ ई० तक जीवित थे । कल्हण ने जून सन् ११४८ ई० में रचना-कार्य आरम्भ किया था । सन् ११५० ई० में राजतरंगिणी का रचना-कार्य समाप्त किया । मालूम होता है, पिता की मृत्यु के पश्चात् उसने रचना में हाथ लगाया था । कल्हण ने तरंग सात की सामग्री पिता चम्पक तथा चाचा कनक से प्राप्त की थी । ये तत्कालीन घटनाओं के प्रत्यक्षदर्शी थे । राजा जयसिंह ने सन् ११२८ से ११५६ ई० तक राज्य किया था । राजा जयसिंह के जीवन काल में उसने रचना समाप्त की थी। ( रा० ८ : ३४४४-३४४६ ) वह स्वयं २२ वर्षों के राज्य काल तथा घटनाओं का प्रत्यक्षदर्शी था । वह उस समय युवक नही था । उसने रचना-काल स्वयं शक सम्वत् १०७१ दिया है । यह काल समाप्ति किया लौकिक सम्वत् से ४२२४ वर्ष होता है । इसी से शक तथा लौकिक सम्वत् की गणना का सूत्र मिलता है । सन् ईस्वी के अनुसार यह समय सन् ११४८ ई० आता है । लेखन समाप्ति लौकिक सम्वत् ४२२५ में किया था । यह समय सन् ११४६-११५० ईस्वी होता है । ( रा० त० १ : ४४-५३; ८ : ३४०४ ) कल्हण ने जिस समय रचना-कार्य समाप्त किया था, उस समय राजा जयसिंह के राज्यकाल का २२ वाँ वर्ष था । राजा जयसिंह के शेष ९ वर्षों का वर्णन द्वितीय राज- तरंगिणी के लेखक जोन राजा ने किया है। जयसिंह फाल्गुन वदी १५ लौकिक सम्वत् २४०३ में राज्या- रोहण किया था । मान लिया जाय कि रचना के समय कल्हण की आयु ४० वर्षों की थी, तो निस्सन्देह उसने तरंग आठ की घटनाओं का आँखो देखा वर्णन किया है । तरंग आठ का समय केवल ४८ वर्षों का है । तरंग सात का काल लौकिक संवत् ४०७९ से आरम्भ होकर लौकिक संवत् ४१७७ में समाप्त होता है । यह मध्यवर्ती समय ६८ वर्ष होता है । कल्हण ने पिता चम्पक का वर्णन राजा हर्ष के काल में सक्रिय कार्य करते हुए किया है । इसी समय कनक भी राजनीति में सक्रिय दिखाई देता है । तरंग सात की समस्त सामग्री उसने पिता चम्पक तथा कनक तथा तत्कालीन जीवित प्रत्यक्षदर्शी वृद्धों से लिया है । यही कारण है कि तरंग सात में वह छोटी-छोटी घटनाओ का क्रमबद्ध इतिहास प्रस्तुत करता है । तरंग आठ में और भी छोटी-से छोटी घटनाओं और सूक्ष्म से भी सूक्ष्म बातो का विस्तृत वर्णन करता है । तरंग सात के ९८ वर्षों का इतिहास कल्हण ने १७३२ श्लोको में किया है, किन्तु तरंग आठ के ४८ वर्षों का इतिहास ३४४९ श्लोको में करता है । राजतरंगिणी में कुल ७८२६ श्लोक है । इसमें प्रथम से षष्ठ तरंगों का वर्णन ३०४५ श्लोको में किया गया है । केवल दो तरंगो सात एवं आठ का वर्णन ५१८४ श्लोकों में किया जाता है । महाभारत काल से षष्ठ तरंगो का वर्णन उसने तत्कालीन प्राप्य ग्रन्थों प्रशस्ति पत्रों, जन-श्रुतियों, प्राचीन कथानको, परम्पराओं आदि के आधार पर किया है । चम्पक साधारण व्यक्ति नही था । यह महामात्य था । द्वारपति था । मण्डलेश था । अपने उत्तरदायित्वो का जिम्मेदारी के साथ निर्वाह किया था । दुग्धघात दुर्ग दरदो के अधिकार में था । दरदों ने दुर्ग को केन्द्र बनाकर काश्मीर मण्डल के अनेक ग्रामों पर अधिकार कर लिया था । महत्तम सहेल ने राजा को सलाह दिया कि दुर्ग घेर लिया जाय । द्वारपति चम्पक को दुर्ग घेरने और विजय करने का भार सौंपा गया । चम्पक प्रस्थान करने ही वाला था कि वातगण्ड, जिसे राजा ने द्वारपति के पद से हटा दिया था और जो चम्पक से ईर्ष्या करता था राजा हर्ष को अभियान से विरत कर दिया । तथापि चम्पक ने मधुमती नदी पार कर अपने सैनिकों को दुर्ग में प्रवेश करा दिया । ( रा० त० ७ : ११७६-११७६ )

[ ५ ] अन्य स्थान पर राजा हर्ष को मन्त्रणा देते हुए चम्पक का उल्लेख किया गया है । उसने राजा हर्ष को सलाह दिया—'या तो युद्ध कीजिये अन्यथा लोहर रक्षा की दृष्टि से चले जाइये ।' राजा के अनुचर प्रयाग ने राजा को मन्त्रणा दी कि वह युद्ध की अपेक्षा लोहर रक्षा हेतु चला जाय । राजा हर्ष स्वयं उच्चल से युद्ध करता वीरगति प्राप्त करना चाहता था । राजा के कायर पदाति सैनिक राजा के इस विचार के विरोधी थे । अनन्तपाल आदि राजपुत्रों की मन्त्रणा पर राजा अग्रसर होता था परन्तु दण्डनायक मार्गविरोध कर देते थे । चम्पक युद्ध का पक्षपाती था । राजभक्त था । चंपक की बात राजा ने नहीं मानी । परिणाम राजा का दुःखद अन्त हुआ । युवराज भोजदेव जब प्रस्थान कर गया तो राजा उसके वियोग में दुःखी हो गया । राजा हर्ष ने चंपक को युवराज का पता लगाने के लिए कहा । राजा का आदेश सुनकर चंपक स्तब्ध हो गया । लंबी साँस लेकर कहा—'मेरे चले जाने पर आपका एकमात्र अनुचर प्रयाग आपके साथ रह जायगा । ऐसी परिस्थिति में आप मुझे अपने पास अपनी रक्षा के लिए रहने दीजिये ।' राजा ने अश्रुपूर्ण नेत्रों से चंपक की ओर देखा । राजा जानता था । चंपक एवं युवराज भोजदेव में एक अश्वनी को लेकर विवाद हो गया था । राजा ने व्यंगपूर्वक—उत्तर दिया—'चंपक तुम कृतघ्न नहीं हो । ऐसे काल में तुम मेरी आज्ञा का उल्लंघन क्यों करते हो ?' इस स्थान पर राजा ने चंपक का संबोधन मंत्री रूप से किया है । इससे प्रतीत होता है कि चंपक ने मंत्री पद पर भी कार्य किया था । राजा की बात सुनकर चंपक लज्जित हो गया । उदास मन युवराज भोज का पता लगाने के लिए चल पडा । चंपक ने जिस समय प्रस्थान किया उस समय उसके साथ दो भाई, भृत्य, शेपराज आत्मज के साथ पचास अश्वारोही थे । किन्तु नदी पार पहुँचते-पहुँचते यह संख्या केवल पाँच रह गयी । उसके दोनों भाई शेपराज आत्मज तथा अश्ववार सडक पर घोड़ो के मरने के कारण गिर गये । यहाँ चंपक केवल धानक के साथ घूमने लगा । युवराज भोजदेव का बिना पता लगाये वह लौटना नही चाहता था । वह भ्रमण करता सायंकाल वितस्ता सिन्धु के संगम पर पहुँच गया । इस उद्धरण से दो बातें स्पष्ट होती हैं । चम्पक के दो भाई थे । वह मन्त्री था । कुशल सैनिक था । साहसी था । राजा का विश्वासपात्र था । कृतघ्न नहीं था । कल्हण ने अपने पिता चम्पक के दोनों भाइयों का नाम नहीं दिया । केवल कनक का अपनी रचना में उल्लेख किया है । श्रीनगर का राज्य हर्ष ने त्याग किया तो उसके साथ उसका पुराना भृत्य प्रयाग रह गया था । राजा के शरीर पर केवल एक वस्त्र था । वह अत्यन्त हीन एवं विपन्नावस्था में था । राजा की यह करुण ने स्थिति देखकर, चम्पक का भृत्य जेल्क भी राजा के साथ हो गया । राजा के अन्तिम काल में स्वामिभक्त चम्पक क्यों नही उपस्थित था इसका स्पष्टीकरण कल्हण ने स्वयं किया है । राजा ने उसे युवराज को खोजने के लिए भेज दिया था । जेल्क के उद्धरण से यह बात प्रकट होती है । कल्हण का समस्त परिवार सभृत्य स्वामिभक्त था । उसके कुटुम्ब तथा राजा के कुटुम्ब का घर जैसा पारस्परिक व्यवहार था । वे एक कुटुम्ब के प्राणी दुःख- सुख दोनों में थे । ( रा० त० ७ : १५८६-१५६२ ) कल्हण का कुल अभिजात था । राज्य में प्रतिष्ठा प्राप्त था । राजवंश का विश्वासपात्र था । अतएव तरंग सात में वर्णित राजाओं का इतिहास सप्रमाण है । चम्पक, कनक तथा उसका कुटुम्ब उसके प्रत्यक्षदर्शी थे । इतिहास लिखने की समग्र सामग्री उसे राज्य के कागज-पत्रों के साथ सरलता पूर्वक उपलब्ध थी । इति- हास लिखने के लिए साधन सम्पन्न था । उसने अपने को इस प्रकार उस समय का व्यक्ति प्रमाणित किया है ।

[ ६ ] धर्म : कल्हण शैव था । शिव भक्त था। काश्मीरी सामान्यतः शिव उपासक एवं पूजक होते हैं। कल्हण उसका अपवाद नही था । किन्तु बौद्ध धर्म का भी यह प्रशंसक था। बुद्ध-दर्शन का उसपर प्रभाव था । शिव भक्ति तथा मत का अत्यधिक वर्णन कल्हण ने किया है । उसके पश्चात् उसने बुद्ध धर्म को ही स्थान दिया है । उसके पिता प्रतिवर्ष नन्दिक्षेत्र की तीर्थ यात्रा के लिए जाते थे । कल्हण भी पिता के साथ जाता था । यहाँ नन्दि पुराण भक्ति के साथ सुनता था । भूतेश्वर के पवित्र वातावरण में, मन्दिरों की सुन्दर श्रृंगलाओ के मध्य, सोदर तीर्थ का जल सेवन करते, प्रकृति के शान्त, गम्भीर, सुरम्य, हरित वाता- वरण में यह शैवदर्शन एवं शिव सम्बन्धी कथादि सुनता था । इस वातावरण का संस्कार बाल्यकाल से ही उस पर पडा था । उसने शैव दर्शन के आचार्य भट्ट मल्लट का नाम आदर एवं श्रद्धा के साथ लिया है । कल्लट ने काश्मीर में शैव शास्त्र का प्रचार किया था । ( रा० ५ : ६६ ) शिवभक्त राजाओ का जहाँ भी कही कल्हण ने वर्णन किया है उसकी लेखनी से उनके लिए श्रद्धा- भक्ति प्रकट हुई है । जलोक ( रा० त० : ३३५-३३८ ) विजय ( रा० २ : १ ) सन्धि मति ( रा० २ : ६५ ) इसके ज्वलन्त उदाहरण हैं। उन्होने शैव मत का प्रचार किया था । शिव-पूजक थे । कल्हण ने स्वर्ग प्राप्ति किंवा किसी पुण्य लोक में जाने की अपेक्षा शिव सायुज्यता को प्राथमिकता दी है । ( रा० १:१५२ ) शिव मन्दिरो में शिव के सम्मुख नृत्य-गान का वर्णन ललित पदों में किया है । ( रा० : १ : १५१, १५४, २७६, २८० ) रावण शिव भक्त था । शेष भारत में यह अत्याचारी, कुमार्गी एवं राक्षस रूप में चित्रित किया गया है । किन्तु कल्हण शिव भक्त होने के कारण रावण के लिए अशोभनीय शब्दों का प्रयोग नहीं करता । भारत में शायद ही कोई रावण नाम अपने पुत्र का रखता है । काश्मीर में रावण नाम के अनेक राजा हुए हैं । शिव उपासक होने के कारण रावण के प्रति शिवभक्त काश्मीर की जनता ने घृणा नही प्रकट किया है । शिव की रावण पर कृपा थी । इस मान्यता की वृद्धि के लिए रामायण कालीन रावण द्वारा पूजित शिव- लिंग काश्मीर में स्थापित करने की चर्चा कल्हण करता है । ( रा० ३ : ४४, ) शिव का प्रतीक शिव लिंग हैं। शिवलिंगों की स्थापना एवं उनकी पूजा का उल्लेख करते, कल्हण थकता नही । राजा सन्धि मति ने महालिंगो, महा वनों, महा वृक्षों तथा महा त्रिशूलों से काश्मीर मण्डल को आच्छादित कर दिया था । इस स्थल का वर्णन अतीव श्रद्धा एवं वन्दनामय वाणी में किया गया है । ( रा० २ : १३३ ) । शिव भक्त का रूप भी कल्हण ने खींचा है । भस्मस्मेर जटाजूट धारी, अक्ष सूत्र धारी, एवं रुद्राक्ष अंकित उन्हें चित्रित किया है । ( रा० २ : १२७-१७६ ) स्मशानेश्वर शिव है । योगीश्वर शिव है । कल्हण स्मशान का वर्णन करते हुए वहाँ सन्धीश्वर स्थापना का उल्लेख करता है । ( रा० २ : १३४ ) प्रतिमा लिंगों की स्थापना की भी चर्चा करता है । ( रा० २ . १३५ ) शिव की अर्चना ( रा० २ : ११४, १३८ ) भूतभावन की प्रसन्नता ( रा० २ : १५१ ) भूतभर्ता अर्थात् भूतेश किंवा नन्दीश पूजा तथा उनके प्रति श्रद्धा प्रकट करता है । ( रा० २ : १६६ ) शिव- भक्तो के वर्णन में वह तल्लीन हो जाता है । वह कहता है—'पशुपति के पाद मूल में जो जाता है, उसे भस्म मिलता है । और जो शिव उपासक वृषभ की सेवा करता है, उसे सुवर्ण की प्राप्ति होती है।' कल्हण यहाँ पर शिवभक्तो का स्थान बहुत ऊपर उठा देता है । ( रा० ३ : १९९ ) कल्हण ने सम्पूर्ण राजतरंगिणी में भगवान् बुद्ध के प्रति अनुपम आदर एवं श्रद्धा प्रदर्शित की है । अशोक से लेकर उसके काल तक जिन राजाओं ने बुद्ध विहार, स्तूप तथा चैत्यादि निर्माण कराया था उनका

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नाम एवं स्मरण श्रद्धा-भक्ति के साथ कल्हण ने किया है। उसने रक्त, निर्माणों को कश्मीर मण्डल में खोज- खोजकर, शिव मन्दिरों के समान लिखा है। राजाओं के अतिरिक्त यदि किसी अन्य व्यक्ति ने भी विहार, चैत्य, स्तूपादि का निर्माण कार्य किया था तो उसका भी सादर उल्लेख किया है। उनपर चढ़ाये अग्रहारों एवं दान कर्मों की मुक्त कण्ठ से प्रशंसा की है। धर्म विश्वास में कल्हण ने कट्टरता वहीं नहीं प्रदर्शित की है। उसने शैव एवं बौद्ध धर्म को परस्पर विरोधी नहीं माना है। दोनों का उपासक होने के कारण उन्हें एक दूसरे का पूरक माना है। सहायक माना है। बुद्ध को अन्य अवतारों के समान अवतार मान कर वन्दना की है। बौद्धों के प्राबल्य को रोककर जलौक ने शैव धर्म के पुनर्स्थापन के लिए प्रयास करते हुए विहारों तथा बौद्ध धर्म-स्थानों को क्षति पहुँचाने का प्रयास किया तो जलौक का विचार नाटकीय ढंग से कल्हण बदल देता है। उसने शिव के साथ बोधि- सत्व के प्रति भी रुचि राजा में उत्पन्न होने की कथा कही है। जलौक से विहार-निर्माण भी करा देता है। धार्मिक रुचि कल्हण की इससे प्रकट होती है कि वह मेघवाहन को आदर्श किंवा अनुकरणीय राजा मानता है। मेघवाहन विश्वविजय द्वारा अहिंसा का प्रचार करना चाहता था। उसने धुर दक्षिण भारत तक विजय कर राजाओं से अहिंसक होने की प्रतिज्ञा करायी थी। दिग्विजय के स्थान पर मेघवाहन धर्म- विजय किया था। मेघवाहन पशुबलि के स्थान पर, पशु की रक्षा के लिए स्वयं अपनी बलि चढ़ाने के लिए वारंवार उद्यत हो गया था। कल्हण ने अहिंसा व्रत का ओजमयी भाषा में वर्णन किया है। कल्हण प्रतीत होता है, शाकाहारी था। उसने प्याज तथा लहसुन भोजी ब्राह्मणों की निन्दा की है। अहिंसा व्रत एवं अहिंसक भावना का अवसर मिलते ही सबल भाषा में उल्लेख करता है। भगवान् बुद्ध की प्रतिमा राजा हर्ष जिस समय परिहासपुर में खण्डित करना चाहता था तो उसके चाचा कनक ने राजा को इस अनुचित कार्य से विरत किया था। बौद्धमतानुयायी दूसरों का मारा मांस निःसंकोच खा लेते हैं। परन्तु कल्हण इसको उचित नहीं मानता। वह एक शुद्ध ब्राह्मण के समान शाकाहारी था। यद्यपि काश्मीर में आमिष भोजियों की संख्या सर्वाधिक सर्वदा से रही है। कल्हण ने बौद्ध धर्म सम्बन्धी अनेक पारिभाषिक शब्दों का प्रयोग किया है। इससे प्रकट होता है कि उसने त्रिपिटकों का अध्ययन किया था। कल्हण ने बौद्ध दर्शन, परम्परा, शासन तथा उसकी पद्धतियों का पूर्णतया अध्ययन किया था। अन्यथा वह साधिकार विश्वास के साथ लिखने में सफल न होता। समकालीन व्यक्ति : कल्हण ने तत्कालीन समाज तथा व्यक्तियों का वर्णन बड़ी निष्ठा के साथ किया है। रिल्हण राजा जयसिंह का अमात्य था। (रा० ८ : २४०३) वह राजा सुस्सल का भी विश्वासपात्र था। कल्हण राजा जयसिंह को विद्या का संरक्षक कहता है। रिल्हण, उसके भ्राता, उसकी पत्नी के दान तथा स्थान-स्थान पर उसके सैन्य चातुर्य और वीरता का वर्णन किया है। (रा० ८ : २४०५-२४१८) सुरेश्वरी क्षेत्र में रिल्हण ने अनेक पुण्य-कार्य किये थे। कल्हण उसका विशद वर्णन करता है। उसकी प्रशस्ति सरल भाषा में किया है। प्रतीत होता है कल्हण का उससे व्यक्तिगत स्नेह था। (रा० ८ : ३३६४-७०)। दूसरा प्रमुख व्यक्ति अलंकार था। वह राजा जयसिंह के उत्तरार्ध राज्य काल में गंजाधिप था (रा० ८ : २४२३)। उसका भी कल्हण ने आदर के साथ उल्लेख किया है। कवि मंख का वर्णन कल्हण ने एक काव्यकार की दृष्टि से नहीं बल्कि राजा जयसिंह के सन्धि-विग्रहक के रूप में किया है। (रा० ८ : ३३५४)

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गंजाधिप अलंकार का मंख भ्राता था। मंख ने अपने काव्य में अपने भाई को विद्वानों तथा कलाविदों का संरक्षक कहा है। मंख का केवल एक बार उल्लेख कल्हण ने किया है। यह भी श्रीकण्ठचरित काव्य के रचनाकार के रूप में । ( रा० ८: ३३५४ ) कल्हण ने द्वारपति उदय का भी उल्लेख किया है। किन्तु उसके प्रति विशेष आदर प्रकट नही करता। एक व्यक्ति का नाम उसने और आदर के साथ लिया है। उसका नाम है, राज वदन । ( ग० ८ : २६९८ ) राज वदन ने राजा जयसिंह के विरुद्ध विद्रोह किया था। अन्य नामों का भी उसने उल्लेख किया है, परन्तु उनका विशेष महत्व नही है। कल्हण और मंख : तत्कालीन लेखकों में कल्हण का उल्लेख केवल मंख ने कल्याण नाम से किया है। जबकि कल्हण ने 'मंख' शुद्ध और प्रचलित नाम लिखा है। यह एक विचित्र बात है। लेखकों, कवियों तथा विद्वानों का उनके जीवन-काल में कम आदर-सत्कार देखा गया है। कल्हण इसका अपवाद नहीं था। डाक्टर व्हूलर के अनुसार मंख ने श्रीकण्ठचरित महाकाव्य की रचना सन् ११२८-११४४ ई० के मध्यवर्ती काल में किया था। सन् ११४४ ई० के दो प्रमाणों से निश्चित हो जाता है। अलंकार के निवास- स्थान पर एक सभा हुई थी। अतिथियों में कन्नौज के राजा गोविन्द चन्द्र का दूत सुहले भी उपस्थित था। राजा गोविन्द चन्द्र का काल सन् ११२०-११४४ ई० है। कल्हण ने अलंकार का उल्लेख दो स्थानों पर राज स्थानीय पदाधिकारी के रूप में किया है। ( रा० ८ : २५५७, २६१८ ) उसने अलंकार का उल्लेख पुनः बृहद्गंज के रूप में किया है। (रा० ८ : २४२३ ) मंख ने भ्राता अलंकार को राज्य का सन्धि-विग्राहक लिखा है। इससे कोई उलझन नही पैदा होती। मंख ने स्वयं लिखा है। राजा सुस्सल ने अलंकार को सन्धि विग्राहक पद पर रखा था। उसका द्वितीय पद 'स्थानीय' तथा 'बृहद् गंज' राजा जयसिंह के काल का हो सकता है। कल्हण स्वयं लिखता है। मंख ने अपने भाई अलंकार के सन्धि विग्राहक पद को प्राप्त किया था। ( रा० : ८ : ३३५४ ) मंख ने जयसिंह को अपना राजा स्वीकार किया है। मंख ने कोंकन के राजा अपरादित्य का उल्लेख किया है। वह सन् ११८६ ई० तक राज्य करता रहा। इससे इस बात की पुष्टि होती है। काश्मीर के लेखकों को तत्कालीन भारतीय राजाओ एवं देश-काल का ज्ञान था। कल्हण का घटना-क्रम वर्णन एवं नामों का उल्लेख मंख के श्रीकण्ठचरित से मिलता है। वह कल्हण की सत्यता प्रमाणित करता है। यदि सन् ११४४ ई० श्रीकण्ठचरित की रचना का काल मान लिया जाय तो राजतरंगिणी की रचना के पूर्व मंख अपना महाकाव्य समाप्त कर चुका था। श्रीकण्ठचरित में मुख्यतः पच्चीसवाँ अध्याय उच्चकोटि की काव्य रचना है। मंख अपने भाई अलंकार के निवास-स्थान पर हुई सभा का उल्लेख करता है। उस सभा में उसने अपने काव्य को विद्वानों के सम्मुख उपस्थित किया था। उपस्थित व्यक्तियों तथा विद्वानों का परिचय उनके पदो के साथ दिया है। उसमें ३० कवियों एवं विद्वानों का उल्लेख है। इस तालिका में कल्हण का नाम नही है। यद्यपि कल्हण ने अलंकार एवं मंख दोनों का नाम सादर लिया है। मंख ने कल्याण के सन्दर्भ में तीन पद लिखे हैं। उसमें उल्लेख किया गया है कि अलक दत्त ने कवि के रूप में कल्याण को चुना था। वह उसके मनोवाञ्छित कार्य को पूरा कर सकता था। उसने पुनः लिखा है कल्याण की कविता महाकवि विल्हण की प्रतिबिम्ब प्रतीत होती है। राजतरंगिणी सन् ११४६-११५० ई० में समाप्त हुई थी। श्रीकण्ठ- चरित सन् ११४४ ई० में समाप्त हुआ था। अतएव श्रीकण्ठचरित में राजतरंगिणी का उल्लेख नहीं हो सकता। मंख के श्रीकण्ठचरित का इसलिए उल्लेख राजतरंगिणी में है कि वह उस समय लिखी जा चुकी थी। उपलब्ध थी।

[ ९ ] कल्हण और कल्याण : द्वितीय राज तरंगिणी के रचनाकार जोन राज ने मंख के श्रीकण्ठ चरित पर बातिक लिखा है । उसने लिखा है अलक दत्त कल्याण का संरक्षक था । वह सन्धिविग्राहक के पद पर था । किन्तु कल्याण के विषय में जोन राज कुछ प्रकाश नहीं डालता । उसने भाष्य किंवा वातिक लिखते समय यह नहीं लिखा है कि मंख वर्णित कल्याण ही कल्हण है । जोन राज अपनी रचना में कल्हण का उल्लेख करता है । कल्हण के छोड़े कार्य को वह अपने समय तक के राजाओं एवं बादशाहों का वर्णन कर पूरा करता है । आश्चर्य है उसने मंख एवं स्वतः वर्णित कल्याण को कहीं कल्हण नहीं माना है । कल्हण ही मंख वर्णित कल्याण है ? अथवा और कोई व्यक्ति है ? इस पर विचार करना आवश्यक है । श्री स्टीन का मत है कि कल्हण शब्द प्राकृत 'कल्लाण' तथा 'संस्कृत' 'कल्याण' का अपभ्रंश है । स्टीन अपने मत की पुष्टि में जयापीड की रानी का उदाहरण उपस्थित करते हैं । जयापीड की रानी का नाम 'कल्याण' देवी था । 'कल्याण', 'कल्लणा' तथा 'कल्हणिका' एक ही शब्द किंवा नाम के भिन्न रूप हैं । 'कल्हणिका' शब्द संस्कृत 'कल्याणिका' है । राजवंश एवं अभिजात कुल की महिलाओं के लिये नाटकों तथा उपाख्यानों में इस शब्द का प्रयोग किया गया है । राजवंश की स्त्रियां राजा कलश तथा जयसिंह के समय तक इसी सम्बोधन से सम्बोधित की जाती थीं । संस्कृत नाटकों तथा काव्यों में सम्भ्रान्त महिलाओं तथा रानियों के लिये 'कल्याणी' शब्द का प्रयोग सम्बोधन के लिये किया जाता रहा है । ( रा० ४:४६१, ४६७, ७:२६३, ८:१६४८, ३०६९ ) कल्हण ने स्वयं राज तरंगिणी में सहदेव के राजपुत्र कल्हण का उल्लेख किया है । ( रा० ८ : ६२६ ) इससे स्पष्ट प्रतीत होता है कल्हण नाम उस समय प्रचलित था । लोगों का नाम कल्हण रखा जाता था । सल्हण, रल्हण, विल्हण, मल्हण आदि नाम तुल्य ध्वनि करते हैं । प्रश्न है । मंख ने प्रचलित नाम कल्हण न देकर उसका शुद्ध संस्कृत अप्रचलित नाम 'कल्याण' क्यों दिया ? कल्हण ने स्वतः कहीं भी अपने कल्याण नाम की ओर गौण रूप से भी संकेत नहीं किया है । मंख ने राजतरंगिणी में वर्णित अनेक नामों को अक्षरशः रूप अपने काव्य में दिया है । क्या कारण है कि कल्हण का नाम ही बदलकर उसने कल्याण क्यों लिख दिया ? आदर के लिये कल्हण का शुद्ध संस्कृत नाम कल्याण मंख ने दिया है । यह एक तर्क उपस्थित किया जाता है । कल्हण ने राजतरंगिणी में सर्वथा प्रचलित नाम दिया है । शुद्ध संस्कृत रूप में नाम देने का प्रयास नहीं किया है । कल्हण ने प्रचलित नाम 'गग्ग' 'गर्ग' के स्थान पर 'गगन चन्द्र' देने का प्रयास नहीं किया है । उसने व्यक्तिवाचक संज्ञा के रूप को परिवर्तित करने का प्रयास नहीं किया है । ( रा० ८ : ३३, ३८, ४३, १८४, १९६, ३४८, ३७६, ३८०, ३९०, ४१५, ४३०, ५०२, ५१५, ५८१, ५६५, ६०५, ६१५, ३४४४ ) दूसरा उदाहरण 'लोठन' नाम है । कल्हण ने 'लोठन', 'लोठक' आदि प्रचलित अपभ्रंश शब्दों का प्रयोग किया है । उसने शुद्ध 'लोष्ठक' शब्द नहीं दिया है । 'लोष्ठक' शब्द का प्रयोग एक स्थान पर किया है । ( रा० ८ : २०२ ) मंख का वर्णित कल्याण ही कल्हण है इस पर और अनुसन्धान की आवश्यकता है । श्री जोनराज का कल्याण शब्द के साथ कल्हण न लिखना, शान्त रह जाना, जबकि वह स्वयं कल्हण के छोड़े कार्य को पूर्ण कर रहा था विषय को सन्देहास्पद बना देता है । सम्भव है । मंख के समय कल्याण नाम का ही कोई कवि रहा हो जिसका ग्रन्थ लुप्त हो गया है । क्योकि जिस समय मंख ने अपना काव्य लिखकर समाप्त किया उसके ४ वर्ष पश्चात् कल्हण ने लिखना और ६ वर्ष पश्चात् रचना समाप्त किया २

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गंजाधिप अलंकार का मंख भ्राता था। मंख ने अपने काव्य में अपने भाई को विद्वानों तथा कलाविदों का संरक्षक कहा है। मंख का केवल एक बार उल्लेख कल्हण ने किया है। यह भी श्रीकण्ठचरित काव्य के रचनाकार के रूप मे। (रा० ८: ३३५४) कल्हण ने द्वारपति उदय का भी उल्लेख किया है। किन्तु उसके प्रति विशेष आदर प्रकट नही करता। एक व्यक्ति का नाम उसने और आदर के साथ लिया है। उसका नाम है, राज बदन। (रा० ८ : २६९८) राज बदन ने राजा जयसिंह के विरुद्ध विद्रोह किया था। अन्य नामों का भी उसने उल्लेख किया है, परन्तु उनका विशेष महत्व नही है। कल्हण और मंख : तत्कालीन लेखको में कल्हण का उल्लेख केवल मंख ने कल्याण नाम से किया है। जबकि कल्हण ने 'मंख' शुद्ध और प्रचलित नाम लिखा है। यह एक विचित्र बात है। लेखकों, कवियों तथा विद्वानो का उनके जीवन-काल में कम आदर-सत्कार देखा गया है। कल्हण इसका अपवाद नही था। डाक्टर बूह्लर के अनुसार मंख ने श्रीकण्ठचरित महाकाव्य की रचना सन् ११२८-११४४ ई० के मध्यवर्ती काल में किया था। सन् ११४४ ई० के दो प्रमाणो से निश्चित हो जाता है। अलंकार के निवास- स्थान पर एक सभा हुई थी। अतिथियों में कन्नौज के राजा गोविन्द चन्द्र का दूत सुहले भी उपस्थित था। राजा गोविन्द चन्द्र का काल सन् ११२०-११४४ ई० है। कल्हण ने अलंकार का उल्लेख दो स्थानों पर राज स्थानीय पदाधिकारी के रूप में किया है। (रा० ८ : २५५७, २६१८) उसने अलंकार का उल्लेख पुनः वृहदगंज के रूप में किया है। (रा० ८ : २४२३) मंख ने भ्राता अलंकार को राज्य का सन्धि-विग्राहक लिखा है। इससे कोई उलझन नहीं पैदा होती। मंख ने स्वयं लिखा है। राजा सुस्सल ने अलंकार को सन्धि विग्राहक पद पर रखा था। उसका द्वितीय पद 'स्थानीय' तथा 'बृहद् गंज' राजा जयसिंह के काल का हो सकता है। कल्हण स्वयं लिखता है। मंख ने अपने भाई अलंकार के सन्धि विग्राहक पद को प्राप्त किया था। (रा० : ८ : ३३५४) मंख ने जयसिंह को अपना राजा स्वीकार किया है। मंख ने कोंकन के राजा अपरादित्य का उल्लेख किया है। यह सन् ११८४ ई० तक राज्य करता रहा। इससे इस बात की पुष्टि होती है। काश्मीर के लेखकों को तत्कालीन भारतीय राजाओं एवं देश-काल का ज्ञान था। कल्हण का घटना-क्रम वर्णन एवं नामों का उल्लेख मंख के श्रीकण्ठचरित से मिलता है। यह कल्हण की सत्यता प्रमाणित करता है। यदि सन् ११४४ ई० श्रीकण्ठचरित की रचना का काल मान लिया जाय तो राजतरंगिणी की रचना के पूर्व मंख अपना महाकाव्य समाप्त कर चुका था। श्रीकण्ठचरित में मुख्यतः पच्चीसवाँ अध्याय उच्चकोटि की काव्य रचना है। मंख अपने भाई अलंकार के निवास-स्थान पर हुई सभा का उल्लेख करता है। उस सभा में उसने अपने काव्य को विद्वानों के सम्मुख उपस्थित किया था। उपस्थित व्यक्तियों तथा विद्वानों का परिचय उनके पदों के साथ दिया है। उसमें ३० कवियों एवं विद्वानो का उल्लेख है। इस तालिका में कल्हण का नाम नहीं है। यद्यपि कल्हण ने अलंकार एवं मंख दोनों का नाम सादर लिया है। मंख ने कल्याण के सन्दर्भ में तीन पद लिखे हैं। उसमें उल्लेख किया गया है कि अलक दत्त ने कवि के रूप में कल्याण को चुना था। वह उसके मनोवाञ्छित कार्य को पूरा कर सकता था। उसने पुनः लिखा है कल्याण की कविता महाकवि विह्लण की प्रतिबिम्ब प्रतीत होती है। राजतरंगिणी सन् ११४६-११५० ई० में समाप्त हुई थी। श्रीकण्ठ- चरित सन् ११४४ ई० में समाप्त हुआ था। अतएव श्रीकण्ठचरित में राजतरंगिणी का उल्लेख नहीं हो सकता। मंख के श्रीकण्ठचरित का इसलिए उल्लेख राजतरंगिणी में है कि वह उस समय लिखी जा चुकी थी। उपलब्ध थी।

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कल्हण और कल्याण : द्वितीय राज तरंगिणी के रचनाकार जोन राज ने मंख के श्रीकण्ठ चरित पर वार्तिक लिखा है । उसने लिखा है अलक दत्त कल्याण का संरक्षक था । वह सन्धि विग्राहक के पद पर था । किन्तु कल्याण के विषय में जोन राज कुछ प्रकाश नहीं डालता । उसने भाष्य किंवा वार्तिक लिखते समय यह नहीं लिखा है कि मंख वर्णित कल्याण ही कल्हण है । जोन राज अपनी रचना में कल्हण का उल्लेख करता है । कल्हण के छोड़े कार्य को वह अपने समय तक के राजाओं एवं बादशाहों का वर्णन कर पूरा करता है । आश्चर्य है उसने मंख एवं स्वतः वर्णित कल्याण को कहीं कल्हण नहीं माना है । कल्हण ही मंख वर्णित कल्याण है ? अथवा और कोई व्यक्ति है ? इस पर विचार करना आवश्यक है । श्री स्टीन का मत है कि कल्हण शब्द प्राकृत 'कल्लाण' तथा 'संस्कृत' 'कल्याण' का अपभ्रंश है । स्टीन अपने मत की पुष्टि में जयापीड की रानी का उदाहरण उपस्थित करते हैं । जयापीड की रानी का नाम 'कल्याण' देवी था । 'कल्याण', 'कल्लणा' तथा 'कल्हणिका' एक ही शब्द किंवा नाम के भिन्न रूप हैं । 'कल्हणिका' शब्द संस्कृत 'कल्याणिका' है । राजवंश एवं अभिजात कुल की महिलाओं के लिये नाटकों तथा उपाख्यानों में इस शब्द का प्रयोग किया गया है । राजवंश की स्त्रियाँ राजा कलश तथा जयसिंह के समय तक इसी सम्बोधन से सम्बोधित की जाती थीं । संस्कृत नाटकों तथा काव्यों में सम्भ्रान्त महिलाओं तथा रानियों के लिये 'कल्याणी' शब्द का प्रयोग सम्बोधन के लिये किया जाता रहा है । (रा० ४:४६१, ४६७, ७:२६३, ८:१६४८, ३०६९) कल्हण ने स्वयं राज तरंगिणी में सहदेव के राजपुत्र कल्हण का उल्लेख किया है । (रा० ८ : ६२६) इससे स्पष्ट प्रतीत होता है कल्हण नाम उस समय प्रचलित था । लोगों का नाम कल्हण रखा जाता था । सल्हण, रल्हण, विल्हण, मल्हण आदि नाम तुल्य ध्वनि करते हैं । प्रश्न है । मंख ने प्रचलित नाम कल्हण न देकर उसका शुद्ध संस्कृत अप्रचलित नाम 'कल्याण' क्यों दिया ? कल्हण ने स्वतः कहीं भी अपने कल्याण नाम की ओर गौण रूप से भी संकेत नहीं किया है । मंख ने राजतरंगिणी में वर्णित अनेक नामों को अक्षरशः रूप अपने काव्य में दिया है । क्या कारण है कि कल्हण का नाम ही बदलकर उसने कल्याण क्यों लिख दिया ? आदर के लिये कल्हण का शुद्ध संस्कृत नाम कल्याण मंख ने दिया है। यह एक तर्क उपस्थित किया जाता है । कल्हण ने राजतरंगिणी में सर्वदा प्रचलित नाम दिया है । शुद्ध संस्कृत रूप में नाम देने का प्रयास नहीं किया है । कल्हण ने प्रचलित नाम 'गग' 'गर्ग' के स्थान पर 'गगन चन्द्र' देने का प्रयास नहीं किया है । उसने व्यक्तिवाचक संज्ञा के रूप को परिवर्तित करने का प्रयास नहीं किया है । (रा० ८ : ३३, ३८, ४३, १८२, १९६, ३४८, ३७६, ३८०, ३९०, ४१५, ४३०, ५०२, ५१५, ५८१, ५६४, ६०५, ६१५, १४४४) दूसरा उदाहरण 'लोठन' नाम है । कल्हण ने 'लोठन', 'लोठक' आदि प्रचलित अपभ्रंश शब्दों का प्रयोग किया है । उसने शुद्ध 'लोष्टक' शब्द नहीं दिया है । 'लोष्टक' शब्द का प्रयोग एक स्थान पर किया है । (रा० ८ : २०२) मंख का वर्णित कल्याण ही कल्हण है इस पर और अनुसन्धान की आवश्यकता है । श्री जोनराज का कल्याण शब्द के साथ कल्हण न लिखना, शान्त रह जाना, जबकि वह स्वयं कल्हण के छोड़े कार्य को पूर्ण कर रहा था विषय को सन्देहास्पद बना देता है । सम्भव है । मंख के समय कल्याण नाम का ही कोई कवि रहा हो जिसका ग्रन्थ लुप्त हो गया है । क्योंकि जिस समय मंख ने अपना काव्य लिखकर समाप्त किया उसके ४ वर्ष पश्चात् कल्हण ने लिखना और ६ वर्ष पश्चात् रचना समाप्त किया २