रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
चतुर्विंशस्तरङ्गः ७०१ वक्तव्य—अहिफेनासव को (Tincture opium) कहते हैं और इसको अहिफेनवारुणीसार या अहिफेनासुत भी कह सकते हैं । मृतसञ्जीवनी सुरा का योग और निर्माण भैषज्यरत्नावली में विस्तृत रूप से लिखा हुआ है । उसके अभाव में रेक्टीफाइड स्प्रिट में भी इसको बनाया जा सकता है । अस्य गुणाः विविधोत्थानसम्भूतातीसारविनिषूदनः । कर्णशूलप्रशमनो दन्तशूलनिबर्हणः ॥२६०॥ अस्थिभग्नादिसम्भूतां तथास्थिच्युतिसम्भवाम् । वेदनां बहुहेतूत्थां विनिहन्त्यतिसत्वरम् ॥२६१॥ विविधोत्थानजातानां वेदनानां निवृत्तये । महौषधमिदं ख्यातं रसतन्त्रविचक्षणैः ॥२६२॥ भा.टी.—उक्त अहिफेनासव विधि कारणजन्य अतीसार को दूर करता है । कानकी पीड़ा तथा दांत की पीड़ा को इसके सेवन से आराम आता है । इसी तरह हड्डी टूटने या हड्डी के अपने स्थान से हटने पर होनेवाली पीड़ा तथा अन्यान्य कारणों से होनेवाली पीड़ा में अहिफेनासव सेवन से शीघ्र आराम आता है । इसी तरह शरीर के किसी स्थान पर किसी कारण होनेवाली वेदना को शान्त करने के लिए रसशास्त्र में अहिफेनासव उत्तम औषधि है ॥२६०-२६२॥ अस्य मात्रा आरभ्य शरबिन्दुभ्यस्तिथिबिन्दुमितं परम् । अहिफेनासवं युञ्ज्यात् बलकालाद्यपेक्षया ॥२६३॥ भा.टी.—इस अहिफेनासव की पूर्ण मात्रा पाँच बूँद से लेकर पन्द्रह बूँद तक समझनी चाहिए ॥२६३॥ अहिफेनासवस्य आमयिकः प्रयोगः अहिफेनासवोऽयन्तु मात्रया परिशीलितः । विविधोत्थानसम्भूतं नूतनं वा पुरातनम् ॥२६४॥ सुदारुणमतीसारमतीसारैकलक्षणम् । विषूचीं च निहन्त्याशु यथा सूर्यस्तमस्ततिम् ॥२६५॥ बिन्दुत्क्षेपकयन्त्रेण निक्षिप्तः कर्णयोरयम् । अत्यल्पमात्रयैवेह कर्णशूलं व्यपोहति ॥२६६॥ अहिफेनासवे सक्तं तूलं तु कृमिदन्तके । न्यस्तं नातिचिरादेव वेदनां हन्ति तद्भवाम् ॥२६७॥
अस्य च रोगयोग्यः प्रयोगः-अतीसारैकलक्षणामिति विषूचीविशेषणं प्रयोग- योग्यतानिर्देशार्थम् । निगदव्याख्यातमन्यत् ॥२६४-२६७॥ भा.टी—उक्त अहिफेनासव को मात्रापूर्वक सेवन करने से विविध कारणों से उत्पन्न पुरातन अथवा नूतन भयंकर अतीसार तथा तीव्र एवं एकमात्र अतीसार लक्षणयुक्त विसूचिका रोग शीघ्र नष्ट हो जाते हैं । बिन्दुक्षेपक यन्त्र के द्वारा इसको बहुत थोड़ी मात्रा में कान में डालने से कान की पीड़ा शान्त हो जाती है । अहिफेनासव में रूई को तर करके कीड़ा लगे हुए दाँत के छेद में भरने से उसकी वेदना शीघ्र शान्त हो जाती है ॥२६४-२६७॥ मंगलोदया वटी फणिफेनं सुविमलं माषकैकमितं शुभम् । उत्तमं घनसारं च सप्तमाषकसंमितम् ॥२६८॥ सम्पेष्य वारिणा यत्नाद्गुटिका रक्तिकोन्मिता । कारयेद्भिषजां वर्यो रसतन्त्रविचक्षणः ॥२६९॥ नामतस्तु समाख्याता वटिका मङ्गलोदया । प्रलापाक्षिप्रणुत्त्यर्थं सता हिततमा परम् ॥३००॥ मङ्गलोदया वटी-अहिफेनं शुद्धं १ मा०, घनसारं कर्पूरम् ७ मा०,स्पष्टमन्यत्॥ भा.टी.—शुद्ध अफीम एक मासा, उत्तम कपूर सात मासा लेकर दोनों को एकत्र जल से पीसकर एक-एकरत्ती की गोलियाँ बना लें । इन गोलियों को मंगलोदया वटिका कहते हैं । सन्निपातज्वरादि में प्रलाप, निद्रानाश आदि उपद्रव तीव्र होने पर इस वटी के प्रयोग से उत्तम लाभ होता है ॥२६८-३००॥ वेदनान्तकमलहरः सिक्थतैलं सुविमलं ग्रहतोलकसंमितम् । फणिफेनञ्च विमलं ग्रहमाषकसंमितम् ॥३०१॥ फणिफेनमितञ्चैव खलु हेरम्बभूषणम् । समादाय भिषग्वर्यः खल्वे सम्मेलयेत्ततः ॥३०२॥ काचकुप्यां निधायाथ पिधानेन निरोधयेत् । मतो मलहरोऽयं तु वेदनान्तकसंज्ञकः ॥३०३॥ वेदनां शमयत्याशु गुदाङ्कुरसमाश्रयाम् । पायुस्थविद्रदोद्भूतां वेदनाञ्चातिदारुणाम् ॥३०४॥
गुदांकुरप्रशमनः पायुस्थविदरान्तकः । मतो मलहरोऽयं तु वेदनान्तकसंज्ञकः ॥३०५॥ वेदनान्तकमलहरः—सिक्थतैलं पूर्वोक्तपरिभाषं नवतोलकम्, शुद्धमहि- फेनञ्च ६ मा०, हेरम्भभूषणं सिन्दूरम् ६ मा०, विदरश्रीरः ॥३०१-३०५॥ भा.टी.—स्वच्छ मोम का तेल नौ तोला, शुद्ध अफीम नौ मासे, सिन्दूर नौ मासे, सबको एकत्र एक खरल में मिला लें। अब इसको एक कांच की शीशी में भरकर डाट लगा दें। इसको वेदनाहर मलहम नाम से कहा जाता है। यह मलहम लेप करने से बवासीर के मस्सों का पीड़ा को शान्त करता है। गुदा फटने के कारण होनेवाली भयंकर पीड़ा में भी यह लेप करने से बहुत लाभ करता है। यह मलहम महषों पर लेप करने से उनको सुखा देता और गुदविकार को भर देता है ॥३०१-३०५॥ अथ जयपालस्य नामानि जयपालश्च जेपालो रेचकः सारकस्तथा । विभेदनो मलद्रावी स एव परिकीर्तितः ॥३०६॥ भा.टी—जयपाल, जेपाल, रेचक, सारक, विभेदन, मलद्रावी, ये सब नाम जमाल गोटे के कहे जाते हैं ॥३०६॥ जयपालस्य परिचयः नात्युच्छ्रितो नातिह्रस्वो दन्तीजातीयकस्तरुः । अधुना तु विशेषेण देशे पञ्चनदाह्वये ॥३०७॥ तथैव सिंहलद्वीपे द्वीपेष्वन्येषु जायते । बीजं तस्य भिषग्वर्यैर्जयपाल इति स्मृतः ॥३०८॥ दन्तीबीजात् क्षुद्रतरं बीजमस्य तु यद्यपि । परं तीव्रतरा शक्तिर्दृश्यते मलभेदने ॥३०९॥ जयपालपरिचयः “जयपालो दन्तबीजम्” इति भावप्रकाशीयनिघण्टु- व्यवहारभ्रान्तिनिरासाय । तदेतदाह “दन्तजातीयकस्तरुः इति । अपि च “दन्तीबीजात् क्षुद्रतरं बीजमस्य” इत्यपि भेदकं लक्षणमस्य दन्तीबीजात् । केचित्तु बृहद्दन्तीबीजं जयपालमाहुः । वस्तुतस्तु जयपालो दन्तीबीजात् भिन्न एवेति जयपालनाम्नैव प्रसिद्ध्यति वर्तमाने जगति ॥३०७-३०९॥ भा.टी.—जमालगोटा न बहुत बड़ा और न बहुत छोटा दन्ती जाति का एक वृक्ष होता है, जो आजकल पञ्जाब प्रान्त में अधिकतर पाया जाता है।
इसके अतिरिक्त यह सिंहलद्वीप तथा अन्य द्वीपों में भी पाया जाता है । इसी वृक्ष के बीजों को जयपाल नाम से कहा जाता है । यद्यपि जयपाल के बीज बड़ी दन्तीबीजों की अपेक्षा छोटे होते हैं । परन्तु इसमें बड़ी दन्तीबीजों की अपेक्षा दस्त लाने की शक्ति बहुत तेज होती है ॥३०७-३०६॥ वक्तव्य— जयपाल को इंगलिश में Corlan और लेटिन में Croton Tiglium कहते हैं । यह एक छोटा सदा हरा प्रायः सर्वत्र पाया जानेवाला वृक्ष है । इसके पत्र २ से ४ इञ्च लम्बे, आगे से नुकीले तथा कुछ-कुछ दन्तुर होते हैं । फूलों के गुच्छे २ से ३ इञ्च लम्बे, शाखाओं के सिरों पर होते हैं । इसका फूल १ इञ्च व्यास का, बीज आधा से ३/४ इञ्च लम्बे अण्डाकार के होते हैं । जयपाल के बीजों में हरा, पीला, दाहक, गन्धयुक्त ३० से लेकर ४०% तैल होता है । इसे Croton oil कहते हैं । यह ईथर, मद्यसार, क्लोरोफार्म तथा जैतून के तेल में घुलनशील होता है तथा तीव्र क्षोभक और रेचक ( दस्तावर ) होता है । जयपालस्य प्रथमः शोधनप्रकारः जयपालस्य बीजानि नवानि तु समाहरेत् । बाह्यत्वचमपाकृत्य द्विधा खलु विभेदयेत् ॥३१०॥ हरिद्वर्णां नातिदीर्घां रसनां तु परित्यजेत् । पोट्टल्यामथ विन्यस्य दोलायन्त्रे विधानतः ॥३११॥ गव्यदुग्धे प्रयत्नेन यामैकं स्वेदयेत्ततः । एवं त्रिवारं सुस्विन्नो जयपालो विशुद्ध्यति ॥३१२॥ अस्य प्रथमे शोधनप्रकारे—त्रिवारं स्वेदनविधानं स्नेहाधिक्यनिवृत्तये ॥ भा.टी.— जमालगोटे के नूतन बीजों को लेकर उनके बाहरी छिलके अलग करके बीच से निकलनेवाली मींगी को चाकू से बीच में फाड़ लें । फाड़ने पर मींगी के बीच में से एक छोटी सी हरे रंग की जीभ सी होगी उसे अलग फेंक दें । अब इस जीभरहित जयपाल बीज मज्जा को एक कपड़े में बाँध पोटली बनाकर दोलायन्त्र में गाय का दूध डालकर एक पहर तक पकायें । इस प्रकार तीन बार गोदुग्ध में दोलायन्त्र द्वारा स्वेदन करने से जयपाल शुद्ध हो जाता है ॥३१०-३१२॥ द्वितीयः शोधनप्रकारः त्वग्रसज्ञाविरहितं जयपालस्य बीजकम् । वस्वंशटङ्कणोपेतं पोट्टल्यां रोधयेद् दृढम् ॥३१३॥
४५ चतुर्विंशस्तरङ्गः ७०५ स्वेदयेद् दोलिकायन्त्रे द्वियामं गव्यदुग्धतः । इत्थं स्विन्नस्तु जैपालः शुद्धिमभ्यात्यनुत्तमाम् ॥३१४॥ द्वितीयः प्रकारः-अष्टमांशटङ्कणेनेपयुक्तः, टङ्कणं हि रूक्षत्वात् स्नेहाधिकम- पाकरोति । रसज्ञेति बीजदलमध्यस्थितः हरिद्वर्णाऽङ्कुरः जिह्वाकृतिमत्त्वात् तदर्था- भिधायकैः शब्दैरभिधीयते ॥३१३, ३१४॥ भा.टी.—छिलका और जिह्वा रहित जमालगोटे के बीजमज्जा में उससे आठवाँ भाग सुहागा मिलाकर उसको कपड़े में बाँधकर पोटली बना लें, अब इस पोटली को दोलायन्त्र में गोदुग्ध डालकर छः घण्टे तक स्वेदन करें। इस विधि से भी जयपाल अच्छी तरह शुद्ध हो जाता है ॥३१३, ३१४॥ तृतीयः शोधनप्रकारः जयपालं त्वग्रसज्ञारहितं पोट्टलीगतम् । दोलायन्त्रे तु यामैकं स्वेदयेद् गव्यदुग्धतः ॥३१५॥ सम्पेष्य खल्वे मूलेषु खर्परेषु प्रलेपयेत् । विज्ञाय विगतस्नेहं जयपालं समाहरेत् ॥३१६॥ न्यसेद्वा यत्नतो मध्ये मषीशोषकपत्रयोः । एवं तु विगतस्नेहो रेचकः शुद्धिमाप्नुयात् ॥३१७॥ तृतीयः प्रकारः-नूतनखर्परेषु लेपाद् विगतस्नेहम् । स्नेहापनयनञ्च विरेकाति- योगदाहोत्क्लेशादिराहित्याय । मषीशोषकपत्रं "Blotting paper" इत्याङ्ग- लभाषाप्रसिद्धं मषीशोषणायोपयुज्यमानं कागजम् । रेचकः जयपालः ॥३१५-३१७॥ भा.टी.—जयपाल बीजों के छिलके और जिह्वा निकालकर एक कपड़े में बाँधकर दोलायन्त्र में गोदुग्ध के साथ तीन घंटे तक पकायें। तीन घंटे के बाद पोटली को खोलकर उसकी मज्जा को खरल अथवा सिल पर अच्छी तरह बारीक पीसकर पीठी-सी बना लें। अब पीठी को एक नये कोरे घड़े के बाहरी पेंदे पर पतला-पतला लेप कर दें। जब इसका तेल सूख जाय तो इसे खुरचकर इकट्ठा कर लें। अथवा कोरा घड़ा न मिल सके तो उक्त पीठी को दो ब्लाटिंग पेपर (Blotting paper) के बीच में एक दिन रखें। जब चिक- नाहट रहित हो जाय तो निकालकर काम में लायें। यदि स्नेह बहुत मालूम पड़े तो पुनः ब्लाटिंग पेपरों के बीच में रख तेल को खुशक कर लें। इस तरह भी जयपालबीज शुद्ध हो जाते हैं ॥३१५-३१७॥
७०६ रसतरङ्गिणी जयपालस्य गुणाः जयपालो मतस्तिक्तो विरेचनकरः परम् । जलोदरप्रशमनो नवज्वरनिबर्हणः ॥३१८॥ कृमिहारी कुष्ठहरो वातश्लेष्मनिषूदनः । वान्तिकृत्पित्तजननो वृश्चिकादिविषप्रणुत् ॥३१६॥ भा.टी.—जयपालबीज रस में कड़वे होते हैं । इसके सेवन से दस्त आते हैं । इसको जलोदर में सञ्चित जल को निकालने के लिए सेवन कराया जाता है । इसी तरह नव ज्वरों में इसको देने से विरेचन होकर ज्वरविष निकल जाने से ज्वर कम हो जाता है । उदरकृमियों को मारने के लिए इसको दिया जाता है जिससे वे मरकर विरेचन द्वारा बाहर निकल आते हैं । कुष्ठ रोगों में पित्त- जन्य रक्तविकृति को इसके द्वारा नष्ट करने से आराम आता है । यह बाह्य प्रयोग में वात तथा कफप्रकोप शामक है । इसकी अधिक मात्रा वमन ले आती है । इसके प्रयोग से पित्त अधिक मात्रा में निकलता है और बिच्छू आदि के दंश- स्थान पर इसको लगाने से उसका जहर नष्ट हो जाता है ॥३१८, ३१६॥ जयपालस्य मात्रा अष्टमांशाद्रक्तिकाया रक्तिकाचरणांशिकम् । जयपालं प्रयुञ्जीत भेषजैः सह योजितम् ॥३२०॥ जयपालमात्रा—रक्तिकाया अष्टमांशात् चतुर्थांशपर्यन्तम् । जयपालो हि प्रायशो न केवलमुपयुज्यते दाहशूलादिव्यापत्तिकरत्वात् । अतस्तदुत्थविकारानु- त्पत्त्यर्थं टङ्कणशुण्ठ्यादिभिर्भेषजैः सहोपयोज्यः । अत एवोक्तं भेषजैः सह योजितमिति ॥३२०॥ भा.टी.—शुद्ध जयपालबीजमज्जा को अन्य औषधियों के साथ मिलाकर रत्ती का आठवां भाग लेकर रत्ती के चतुर्थांश भाग तक की मात्रा में प्रयोग करना चाहिए ॥३२०॥ जयपालस्थ आमयिकः प्रयोगः । इच्छाभेदी रसः टङ्कणं मरिचं सूतं गन्धकं विश्वभेषजम् । समाहरेद्भिषग्वर्यस्तोलकैकमितं पृथक् ॥३२१॥ विशुद्धं जयपालं च तोलकत्रयसंमितम् । समादाय सुमम्पेष्य सार्द्धगुञ्जैकसंमिताः ॥३२२॥ वटिकाः कारयेद्वैद्यो द्विगुञ्जाप्रमितास्तथा ।
चतुर्विंशस्तरङ्गः ७०७ इच्छाभेदी रसोऽयं तु नामतः परिकीर्तितः ॥३२३॥ शीततोयेन वटिकां सार्द्धगुञ्जैकसंमिताम् । मृदुकोष्ठे नागरिके सितया विनियोजयेत् ॥३२४॥ क्रूरकोष्ठेषु शूरेषु ग्रामीणेषु तु कोविदः । प्रयुञ्जीत सितोपेतां वटीं गुञ्जाद्वयोन्मिताम् ॥३२५॥ वटीं भुक्त्वा जलं शीतं यावद्वारं तु पीयते । तावद्वारं विरिच्यन्ते मनुजा नात्र संशयः ॥३२६॥ विरेचननिवृत्यर्थं काममुष्णोदकं पिबेत् । विरेकान्ते प्रयोक्तव्यं पथ्यं तक्रोदनं खलु ॥३२७॥ प्रशान्तरेचनः पुमान् प्रयत्नतस्तु यामकम् । पिबेन्न शीतलं जलं विरिच्यते पुनर्यतः ॥३२८॥ इच्छाभेदी रसः—विश्वभेषजं शुण्ठी । नागरिके नगरनिवासिनि । यावद्- वारन्तु शीतं जलं पीयते तावद्वारं विरेकः प्रभावात् । कामं यथेष्टम् ॥ ३२१–३२८ ॥ भा.टी.—शुद्ध सुहागा, कालीमिर्चचूर्ण, शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, सोंठ चूर्ण, प्रत्येक एक-एक तोला लेवें और शुद्ध जयपालबीजमज्जा तीन तोला लेवें । पहिले पारद गन्धक को कज्जली बनाकर उसमें शेष द्रव्यों को डाल- कर जल के साथ घोटकर इसकी दो-दो रत्ती की गोलियाँ बना लें । इसको इच्छाभेदी रस नाम से कहा जाता है । मृदु कोष्ठवाले नागरिक मनुष्य को इस रस की डेढ़ रत्ती मात्रा खांड और शीतल जल के साथ देवें । क्रूर कोष्ठी ( सख्त मेदावाला ) और बलवान ग्रामीण मनुष्य को इसकी दो रत्ती मात्रा खांड मिलाकर देनी चाहिए । इस रस की गोली खाकर ठंडा पानी जितनी बार पिलाया जायगा उतनी ही बार मनुष्य को दस्त आते हैं। यदि दस्त रोकने हों तो रोगी को पर्याप्त गरम जल पिला देना चाहिए । इसके द्वारा विरेचन पर पथ्य में तक्र के साथ भात खिलाना चाहिए । विरेचन आने और बन्द होने के बाद तीन घण्टे तक शीतल जल पीने में पूर्ण परहेज करना चाहिए; अन्यथा फिर दस्त होने का भय रहता है ॥३२१–३२८॥ जलोदरारिरसः सुमृतं रविलोहञ्च पिप्पली रसगन्धकम् । मरिचं रजनी चूर्णं पृथक् तोलकसंमितम् ॥३२६॥
७०८ रसतरङ्गिणी नवं विशुद्धं जैपालं युगतोलकसंमितम् । आदाय वारत्रितयं त्रिवृत्क्वाथेन भावयेत् ॥३३०॥ निर्मापयेत्प्रयत्नेन वटिका रक्तिकोन्मिताः । जलोदरारिर्नाम्नायं रसः ख्यातो भिषग्वरैः ॥३३१॥ रसोऽयं रेचनकरो जलोदरहरस्तथा । विरेकस्तम्भनार्थञ्च हितं दध्योदनं मतम् ॥३३२॥ अथ जलोदरारिः—रविलोहं ताम्रम् । जयपालं युगतोलकसम्मितमिति द्वितोलकम् ॥ ३२६-३३२ ॥ भा.टी.—पञ्चामृतीकरण क्रिया युक्त ताम्रभस्म, पिप्पलीचूर्ण, शुद्ध पारद, शुद्ध गन्धक, कालीमिर्चचूर्ण, हरिद्राचूर्ण, प्रत्येक एक-एक तोला लेवें । नूतन और शुद्ध जयपालमज्जा दो तोला लेकर पहिले पारद गन्ध की कज्जली बना लें । फिर इसमें अन्य द्रव्य मिलाकर त्रिवृत्क्वाथ की तीन भावना देवें । अन्त में गोली बनाने योग्य होने पर एक-एक रत्ती की गोली बना लें । इसको वैद्य लोग जलोदरारि रस कहते हैं । इस रस के सेवन करने से विरेचन होकर जलोदर रोग नष्ट होता है । यदि इसके सेवन से अधिक दस्त आ रहे हों और उनको रोकना हो तो रोगी को दही और भात पथ्य में देना चाहिए ॥३२६-३३२॥ ज्वरारिरसः हिंगुलं पिप्पली शुण्ठी मरिचं विश्वभेषजम् । सौभाग्यममृतं धात्री पृथक् तोलकसंमितम् ॥ ३३३ ॥ जयपालं पलमितं नवं सुविमलीकृतम् । सम्पेण्यार्द्रकयोगेन वटीं गुञ्जैकसंमिताम् ॥ ३३४ ॥ निर्मापयेत्प्रयत्नेन ज्वरारिर्नामतो मतः । समाख्यातो विशेषेण नवज्वरनिबर्हणः ॥ ३३५ ॥ ज्वरारिरसः—सौभाग्यं टङ्कणम् , अमृतं वत्सनाभः, धात्री आमलकी । नव जयपालमिति पुरातनं हि न तथा गुणकरम् ॥ ३३३-३३५ ॥ भा.टी.—शुद्ध हिंगुल, पिप्पलीचूर्ण, शुण्ठीचूर्ण, मरिचचूर्ण, सोंठचूर्ण, सुहागा, शुद्ध वत्सनाभ, आँवलाचूर्ण प्रत्येक एक-एक तोला लें । शुद्ध जयपाल- बीजचूर्ण एक पल मात्रा में लेवें । इन सबको एकत्र खरल में अदरक के साथ पीसकर एक-एक रत्ती की गोलियाँ बना लें । इसको ज्वरारिरस कहा जाता है । यह रस नवज्वर को नष्ट करता है ॥ ३३३-३३५ ॥
चतुर्विंशस्तरङ्गः ७०९ अञ्जनभैरवरसः सूतगन्धकणाटङ्कं पृथगेकैकभागिकम् । जयपालं सुविमलं सर्वषामर्द्धभागिकम् ॥ ३३६ ॥ आद्राय निम्बुकद्रावैः पेषयेदतियत्नतः । छायायामथ संशोष्य काचकूप्यान्तु विन्यसेत् ॥ ३३७ ॥ रसोऽयं तु समाख्यातो नाम्ना ह्यञ्जनभैरवः । अञ्जनाद्विनिहन्त्याशु सन्निपातं सुदारुणम् ॥ ३३८ ॥ भा.टी.—शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, पिप्पलीचूर्ण, सुहागा; प्रत्येक एक-एक भाग लें । शुद्ध जयपालबीजचूर्ण सबका आधा भाग लेवें । पहिले पारे और गन्धक की अच्छी तरह कज्जली बनायें, फिर इसमें अन्यद्रव्यों को मिला- कर निम्बूस्वरस के साथ खूब अच्छी तरह से मर्दन करके छाया में सुखाकर इस चूर्ण को एक कांच की शीशी में भरकर रख लें । इसका नाम अञ्जनभैरव रस कहा जाता है । इस रस को सन्निपात रोगी के नेत्रों में अञ्जन करने से सन्निपात में आराम आता है ॥ ३३६-३३८ ॥ वृश्चिकविषहरः प्रलेपः जलपिष्टस्तु जैपालो यत्नतः परिलेपितः । विषं वृश्चिकदंशोत्थं विनिहन्ति विशेषतः ॥ ३३६ ॥ वृश्चिकविषहरः प्रलेपः—यत्नतः परिलेपित इति यावत् दंशस्थानं तावदेव प्रदेशमभिव्याप्येत्यर्थः ॥ ३३६ ॥ भा.टी.—जयपालबीज को पत्थर में जल के साथ घिसकर इसका वृश्चिक ( बिच्छू ) दंश पर लेप करने से दंश की पीड़ा मिट जाती है ॥ ३३६ ॥ जयपालयुक्तयोगानां निषेधः बाले वृद्धे कृशे क्षीणे गर्भिण्याञ्च गुदामये । प्रवाहिकायां शोथे च त्वामपक्वाशयाश्रिते ॥ ३४० ॥ गुदभ्रंशे चान्त्रशोथयुते बद्धगुदोदरे । तथान्त्रच्छ्रदशोथे च जयपालं न योजयेत् ॥ ३४१ ॥ जयपालयुक्तयोगानां विशेषतो निषेधः प्रचीनानुक्तोऽपि अज्ञमतिमलमोषाय मान्यैराम्नातः, मा भूद् बालादिषु जयपालयोगात् व्यापद्भयमिति ॥३४०, ३४१॥ भा.टी.—जयपाल अथवा जयपाल के योगों को छोटे-छोटे बच्चे, बूढ़े, कृश तथा क्षीण मनुष्यों को, गर्भिणी स्त्री, बवासीर, प्रवाहिका पीड़ितों को तथा
७१० रसतरङ्गिणी आमाशय तथा पक्वाशयशोथ पीड़ितों को और गुदभ्रंश, आँतों में शोथयुक्त बद्ध- गुदोदर, आन्त्रावरककलाशोथ रोग में सेवन नहीं कराना चाहिए ॥३४०, ३४१॥ अथ धत्तूरस्य नामानि धत्तूरः कितवोन्मत्तौ धूर्तश्च कनकाभिधः । शठश्च कण्टकफलः कीर्तितः शिवशेखरः ॥ ३४२ ॥ भा.टी.—धत्तूर, कितव, उन्मत्त, धूर्त, स्वर्ण-नामयुक्त, शठ, कण्टक- फल तथा शिवशेखर, ये सब नाम धत्तूरे कहे जाते हैं । धत्तूरस्य परिचयः धत्तूरः क्षुपजातीयः सेकण्टकफलस्तथा । सुलभो, भिद्यते चायं पुष्पवर्णविभेदतः ॥ ३४३ ॥ धत्तुराः सर्व एवैते मताः समगुणान्विताः । विशेषतस्तु सर्वेषु कृष्णपुष्पो गुणाधिकः ॥ ३४४ ॥ पत्रं मूलं फलं बीजं तथा मृदुदलद्रवः । प्रयुज्यते विशेषेण धत्तूरस्य भिषग्वरैः ॥ ३४५ ॥ अयन्तूत्तरोपक्रमः—कनकाभिधः सुवर्णनामा । शिवशेखरः शिवपूजासु तद्व्यवहारात् ॥ ३४३–३४५ ॥ भा.टी.—धत्तूरा क्षुप जाति की औषधि है । इसके फलों पर काँटे से उगे होते हैं और यह प्रायः सर्वत्र पाया जाता है । फूलों के रंग में भिन्नता के कारण इसके कई भेद होते हैं । परन्तु प्रायः सभी प्रकार के धत्तूरे एक ही गुण- वाले होते हैं, किन्तु काले फूलवाला धत्तूरा अन्यों की अपेक्षा अधिक गुण- वाला होता है । औषधिकार्य में वैद्य लोग धत्तूरे के पत्र, मूल, बीज तथा कोमल पत्रस्वरस को विशेष रूप से काम में लेते हैं ॥ ३४३–३४५ ॥ वक्तव्य—धत्तूरा गरम प्रदेशों में उगनेवाला १ से २ फुट ऊँचा वार्षिक एक क्षुप है । इसके पत्ते ३ से ६ इंच लम्बे, त्रिकोण, अण्डाकृति, मूल पर गोल, दोनों पार्श्वविषम, पूर्णाधार या कुछ दन्तुर होते हैं । इसके फूल सफेद या काले बड़े-बड़े घंटाकार, फल छोटे सेव जितने, काँटों से ढके हुए, बीज फल में बहुत भरे हुए होते हैं । इसका एक भेद बेलेडोना है । बेलेडोना तथा Hysocyamus के पत्तों से धत्तूर के पत्र बहुत मिलते हैं । इसमें भेद इतना है कि बेलेडोना का पत्ता कम झुर्रियों वाला तथा Hysocyamus का पत्ता लोमश होता है ।
विश्लेषण—धतूरे Hysocpamine, Hysocine तथा Atropine तीन क्षारीय तत्त्व होते हैं। ये तत्त्व अन्य भागों की अपेक्षा बीज में अधिक पाये जाते हैं। उक्त तीन तत्त्वों में से Atropine नामक तत्त्व मद्यसार, क्लोरोफार्म, ईथर में घुल जाता है, किन्तु जल में नहीं घुलता है। धत्तूरबीजानां प्रथमः शोधनप्रकारः धत्तूरबीजान्यदाय पोट्टल्यां रोधयेत्ततः । स्वेदयेद्दोलिकायन्त्रे गव्यदुग्धेन यामकम् ॥३४६॥ संस्वेद्य क्षालयेदुष्णतोयेन तु ततो भिषक् । इत्थं शुद्धानि बीजानि वीतशङ्कः प्रयोजयेत् ॥३४७॥ गोदुग्धे गोमूत्रे वा यामैकं दोलया स्वेदनाच्छुध्यन्ति धत्तूरबीजानि । “धत्तूर- बीजं गोमूत्रे चतुर्र्यामोषितं पुनः कथितं निस्तुषं कृत्वा शुद्धं योगेषु योजयेत्” ऽइति हि स्मरन्ति प्राञ्चः ॥३४६, ३४७॥ भा.टी.—धतूरे के बीजों को एक कपड़े की पोटली में बांधकर दोलायन्त्र में गोदुग्ध भरकर उसमें तीन घंटे तक स्वेदन करें। तीन घंटे के बाद पोटली से धत्तूरबीजों को निकाल गरम पानी से धो लें। इस विधि से शुद्ध धत्तूरबीजों को निःशंक काम में ला सकते हैं ॥३४६, ३४७॥ द्वितीयः शोधनप्रकारः नवानि धूर्त्तबीजानि दोलिकायन्त्रयोगतः । स्वेदयेद् गव्यमूत्रेण यामैकं पोट्टलीगतम् ॥३४८॥ खल्वेऽथ खलु सम्पेष्य वस्त्रपूतं तु कारयेत् । इत्थं शुद्धानि बीजानि वीतशङ्कः प्रयोजयेत् ॥३४६॥ भा.टी.—नूतन धत्तूरे को लेकर गोमूत्र में दोला विधान से पकाकर धूप में सुखा कपड़े में छानकर रख लें। फिर इसे निर्भय होकर प्रयोग करें ॥३४८, ३४६॥ धत्तूरस्य गुणाः धत्तूरः कटुकश्चोष्णस्तथा शोथनिषूदनः । कृमिघ्नः कुष्ठशमनो विशेषाज्ज्वरनाशनः ॥३५०॥ परं त्वग्दोषशमनस्तथा कण्डूतिकापहः । भ्रमकृन्मोहजननः समाख्यातो भिषग्वरैः ॥३५१॥ धत्तूरगुणाः—मोहजनकः, मोहो वैचित्यं तज्जनकः। स्पष्टमन्यत् ॥३५०, ३५१॥
७१२ रसतरङ्गिणी भा.टी.—धतूरा रस में कटु, गुणों में गरम प्रकृति का होता है। यह बाह्याभ्यन्तर द्विविध शोथ को नष्ट करता है। उदरकृमि तथा बाह्यकृमियों को नष्ट करता है। कुष्ठ रोगों को शान्त करता और विशेषतः ज्वर को नष्ट करता है। त्वचा के रोगों को शान्त करने में उत्तम औषधि है और शरीर की कण्डू को मिटाता है। इसको कुछ अधिक मात्रा में खाने से शिर में चक्कर आते हैं और बेचैनी होने लगती है ॥३५०, ३५१॥ धत्तूरस्य विशिष्टा गुणाः धत्तूरः श्वासशमनः कफसंशोषणः परम् । आक्षेपोन्मादहरणः स्तम्भनो हर्षवर्द्धनः ॥३५२॥ अभिष्यन्दप्रशमनः कर्णशूलनिबर्हणः । सवेदनार्बुदहरो लसीकाग्रन्थिशोथहृत् ॥३५३॥ कृमिदन्तव्यथाहारी त्वामवातव्यथाहरः । स्तनशोथप्रशमनः प्रलापपरिकृन्तनः ॥३५४॥ भूतापहस्तथोन्मत्तसारमेयविषापहः । कटिव्यथाहरः कान्ताकामोन्मादविनाशनः ॥३५५॥ निम्ननिर्दिष्टरोगेषु धत्तूरोऽत्यल्पमात्रया । विशेषेण प्रयोक्तव्य इति सद्भिषजां मतम् ॥३५६॥ विविधस्थानसम्भूतां खलु शोथसमुत्थिताम् । वेदनां विविधाकारां विनिहन्ति विशेषतः ॥३५७॥ प्रासूतिकाज्वरोत्थं वा सन्निपातसमुत्थितम् । भृशदुर्गन्धपीताभकृष्णावर्णमलान्वितम् ॥३५८॥ सलिनाभं विशेषेण विनिहन्त्यतिसारकम् । कण्ठशुण्डीञ्च हन्त्याशु भृशदारुणवेदनाम् ॥३५६॥ मसूरिकादौ स्फोटानामस्फुटोद्गमहेतुजम् । आक्षेपं च प्रलापं च शमयत्यविकल्पतः ॥३६०॥ विसर्पोत्थं ज्वरोत्थं वा सन्निपातसमुत्थितम् । विनिहन्ति विशेषेण प्रलापादीनुपद्रवान् ॥३६१॥ सन्निपातसमुद्भूतां शय्यातः खलु रोगिणाम् । पलायनात्मिकां चेष्टां विनिवारयति द्रुतम् ॥३६२॥
चतुर्विंशस्तरङ्गः ७१३ प्रसवोत्तरकाले वा सन्निपातज्वरे खलु । मूत्रानुत्पत्तिहेतूत्थं मूत्ररोधं व्यपोहति ॥ ३६३ ॥ नाडीदौर्बल्यजनितं वक्षस्याकुञ्चनान्वितम् । तारालापयुतं हन्ति श्वासं तु तमकाभिधम् ॥ ३६४ ॥ कफजान् कफपित्तोत्थान् रोगान् वा कफवातजान् । विनिहन्ति विशेषेण ह्यूर्ध्वजत्रुसमाश्रितान् ॥ ३६५ ॥ ग्रन्थिकज्वरसम्भूतं कक्षवङ्क्षणकण्ठजम् । ग्रन्थीनां श्वयथुं हन्ति ज्वरञ्चैव तदाश्रितम् ॥ ३६६ ॥ अथैतस्य गुणविशेषाः तन्त्रान्तरनिर्दिष्टाः अनुभूतचराः प्रकटीक्रियन्ते जगतो हिताय श्वासशमन इत्यादिना । आक्षेपो वातव्याधिविशेषः । अत्यल्पमात्रयेति गुञ्जापादांशादप्यत्यन्तं हीनया । कण्ठशुण्डी गलरोगविशेषः । तारालापयुतमिति तारः सुदीर्घोच्चो य आलापः तद्युतम् । जत्रूर्ध्वसमाश्रितानिति जत्रुः ग्रीवासन्धिः, तदूर्ध्वदेशाश्रितान् । ग्रन्थिकज्वरः ‘Plague’ इति ख्यातः ॥ ३५२–३६६ ॥ भा.टी.—धतूरा श्वास रोग को शान्त करता और कफ को सुखाने में उत्तम गुण रखता है। शरीर में होनेवाले आक्षेप और उन्माद रोग को नष्ट करता है। शरीर से होनेवाले स्रावों को रोकता और रतिशक्ति को बढ़ाता है। बाह्य- योग से नेत्राभिष्यन्द रोग, कर्णशूल, वेदनासहित अर्बुद रोग तथा लसीका-ग्रन्थियों के शोथ को मिटाता है। दाँतों में कीड़ा लगने से होनेवाली व्यथा को कम करता और आमवात रोग को नष्ट करता है। स्तनों में होनेवाले शोथ को शान्त करता और प्रलाप सन्निपात आदि को शान्त करता है। जीवाणुनाशक है और पागल कुत्ते के विष को नष्ट करता है। कमर की पीड़ा को कम करता है और स्त्री के कामोन्माद रोग को नष्ट करता है। उक्त गुण युक्त धतूरा को निम्नलिखित रोगों में वैद्य को विशेष रूप से बहुत ही अल्प मात्रा में प्रयोग करना चाहिये। धतूरा विशेष रूप से, शोथ के कारण होनेवाली शरीर के विविध प्रदेश की और विविध प्रकार की वेदना को शान्त करता है। सन्निपात ज्वर के कारण अथवा प्रसूति ज्वर के कारण होनेवाले अत्यन्त दुर्गन्धित पीत और कृष्णवर्ण मलमिश्रित जल सदृश पतले दस्तोंवाले अतीसार में धतूरा विशेष रूप से लाभ करता है। अत्यन्त भयंकर वेदनायुक्त कण्ठशुण्डी रोग को शीघ्र नष्ट करता है, मसूरिका आदि स्फोटज्वरों में दानों के न निकल सकने के कारण होनेवाले आक्षेप और प्रलाप को शीघ्र धतूरा शान्त करता है। इसी तरह वीसर्पजन्य, ज्वरजन्य
७१४ रस्तरङ्गिणी अथवा सन्निपातजन्य आक्षेप तथा प्रलाप में इसके सेवन से आराम आता है। सन्निपात ज्वर की अवस्था में जब रोगी बिछौने से उठ-उठकर भागने की चेष्टा करता है तो ऐसी दशा में धतूरा अथवा धतूरे के योग शीघ्र लाभ करते हैं। स्त्री को प्रसव होने के बादवाले मूत्ररोध अथवा सन्निपात ज्वर में होनेवाले मूत्ररोध में धतूरा योगों से शीघ्र लाभ होता है। वातिकनाड़ियों की दुर्बलता के कारण उत्पन्न तमकश्वास में जब श्वास लेने में रोगी की छाती में संकोच हो रहा हो और रोगी जोर-जोर से कराह रहा हो तो धत्तूरयोगों से शीघ्र लाभ दिखाई देता है। इसके अतिरिक्त धत्तूर कफप्रकोपजन्य अथवा कफपित्तप्रकोपजन्य अथवा वातकफजन्य ऊर्ध्व जत्रु रोगों को विशेष रूप से नष्ट करता है। धतूरा ग्रन्थिक- ज्वर-( Plague ) जन्य, कक्ष-( बगल )-वंक्षण तथा कण्ठस्थ ग्रन्थियों की शोथ और ग्रन्थिकज्वर में बाह्याभ्यन्तर प्रयोग से लाभ करता है ॥ ३५२-३६६ ॥ वक्तव्य—यदि त्वचा पर धत्तूर के लेप लगाये जावें तो स्थानिक शूल और शोथ कम हो जाते हैं। इसके लगाने से स्थानिक स्राव भी सूख जाते हैं। स्तनों पर इसके लगाने से स्तनों से दूध निकलना बन्द हो जाता है या कम हो जाता है। जिस स्थान पर स्वेद अधिक आता हो इसका लेप लगाने से स्वेद बन्द हो जाता है। शूल तथा स्रावों को कम करने का कारण यह है कि ये धत्तूरलेप संज्ञावाहिनियों तथा स्रावों को उत्तेजक वातनाड़ियों के सिरों को निश्चेष्ट कर देते हैं। ये यूका लिक्षा तथा दद्रु आदि कृमियों को भी नष्ट करते हैं। मुख द्वारा धत्तूर का प्रयोग करने से शरीर की सब्र संज्ञावाहिनियों के सिरे कुछ निःसंज्ञ हो जाते हैं। अतः यदि शरीर के किसी भाग पर शूल हो तो वह मन्द हो जाता है अर्थात् यदि आंत, मूत्रमार्ग आदि में किसी प्रकार की शूल हो तो वह मन्द हो जाती है। मुख द्वारा अन्तः प्रयोग में धत्तूर या धत्तूर के योग स्रावों को भी सुखाते हैं। मुख और गला सूख जाता त्वचा तथा शुक्र का स्राव भी बन्द हो जाता है। श्वासनलियों का उद्धर्त अर्थात् दमा हो तो वह शान्त हो जाता है। इसके देने से हृदय तथा नाड़ी की प्रतिमिनट शक्ति बढ़ती है तथा इनकी शक्ति भी कुछ बढ़ जाती है। अतः धत्तूर हृद्य है। धतूरे को नेत्रों में डालने से नेत्र का शूल शान्त होता है और पुतलियाँ फैल जाती हैं। धत्तूर का विष- मज्वर पर विशेष प्रभाव होता है। धत्तूर के अधिक मात्रा में खाये जाने पर मुख सूख जाता है। निगलने में कठिनता होती है, त्वचा सूख जाती और मूत्र का स्राव बन्द हो जाता है। पुतली
चतुर्विंशस्तरङ्गः ७१५ फैल जाती है। अत्यधिक मात्रा में खाये जाने पर रोगी प्रलाप करता लड़-खड़ा कर चलता है और उसकी नाड़ी तथा हृदय भी तीव्रता से चलते हैं। इसके लिए प्रथम वमन करा दें। वमन के बाद रोगी को चाय या काफी का तीव्र घोल पिला दें। यदि विष का वेग अधिक हो जिससे हृदय तथा नाड़ी अत्यधिक तेज चले और मृत्यु का डर हो तो रोगी को उत्तेजनाशामक द्रव्य जैसे अफीम या अफीम के योग जैसे Morphine का सूचीवेध कर दें। मूत्र बन्द होने पर मूत्रशलाका से मूत्र को निकाल लें। धत्तूरस्य मात्रा आरभ्य गुञ्जापादांशाद् गुञ्जार्धं तु विशोधितम् । धत्तूरबीजचूर्णन्तु प्रयुञ्जीत विधानवित् ॥३६७॥ गुञ्जार्द्धतः समारभ्य सार्द्धगुञ्जैकसंमितम् । चूर्णं धत्तूरपत्राणां प्रणाचार्यः प्रयोजयेत् ॥३६८॥ धत्तूरबीजमात्रा गुञ्जाचतुर्थांशात् गुञ्जार्धं यावत् । चूर्णमात्रा तु गुञ्जार्धतः सार्धगुञ्जम् ॥३६७, ३६८॥ भा.टी.—शुद्ध धत्तूरबीजचूर्ण की मात्रा चौथाई रत्ती से लेकर आधी रत्ती तक समझनी चाहिए। यदि धत्तूरपत्रचूर्ण का प्रयोग करना हो तो इसकी मात्रा आधी रत्ती से लेकर डेढ़ रत्ती तक समझनी चाहिए। ३६७, ३६८॥ धत्तूरस्य आमयिकः प्रयोगः धत्तूरमूलं पत्रं वा सम्पेष्य विम्लाम्भसा । कवोष्णस्तूपनाहेन ब्रध्नशोथं व्यपोहति ॥३६६॥ धूर्तपत्रद्रवे पिष्टं निफेनं सरसाञ्जनम् । विनिहन्ति विशेषेण नेत्राभिष्यन्दमुल्बणम् ॥३७०॥ धत्तूरपत्रस्वरसः कवोष्णः स्वल्पमात्रया । निक्षिप्तं नाशयत्याशु कर्णशूलमसंशयम् ॥३७१॥ धूर्तबीजानि सम्पेष्य वटिका खलु निर्मिता । कृमिदन्तस्थरन्ध्रस्थां वेदनां हन्ति दारुणाम् ॥३७२॥ धूर्तपत्रं निशाफेनयुतं पिष्ट्वाम्लाम्भसा । प्रलेपान्नाशयत्याशु स्तनश्वयथुवेदनाम् ॥३७३॥ धत्तूरदलकल्केन तैलपाकविधानतः । साधितं सार्षपं तैलं हन्ति पेशीगतानिलम् ॥३७४॥
कटिवातव्यथां चैव सन्धिवातभवां व्यथाम् । यूकालिक्षादिकं चैव हन्ति केशेषु मर्दनात् ॥३७५॥ धत्तूरफलचूर्णं तु काकोदुम्बरिकान्वितम् । शीलितं तण्डुलाम्भोभिः सारमेयविषं हरेत् ॥३७६॥ सगुडः सार्कदुग्धश्च कृष्णधूतदलद्रवः । शीलितो विनिहन्त्येव सारमेयविषं द्रुतम् ॥३७७॥ धूर्तपत्रं साहिफेनं जलेन परिपेषितम् । लेपनान्नाशयत्याशु सर्वश्वयथुवेदनाम् ॥३७८॥ धत्तूरस्य रोगयोग्यः प्रयोगः—ब्रध्नशोथं वंक्षणसन्धिग्रन्थिशोथम् । तन्नि- दानादि यथा—“अत्यभिष्यन्दिगुर्वन्नसेवनान्निचयं गतः । करोति ग्रन्थवच्छोथं दोषो वंक्षणसन्धिषु । ज्वरशूलाङ्गसादाढ्यं तं ब्रध्नमिति निर्दिशेत्” ॥ चरके तूक्तं “यस्य वायुः प्रकुपितः शोफशूलकरश्चरन् । वंक्षणाद् वृषणौ याति ब्रध्नस्त- स्योपजायते” । निफेनं अहिफेनम् , निशाफेनयुतमिति निशा हरिद्रा, अफेनम् अहिफेनमिति च्छेदः । निगद्व्याख्यातमन्यत् ॥३६६–३७८॥ भा.टी.—धतूरे की जड़ अथवा पत्तों को जल के साथ खूब पीसकर गरम करके पोलटिस बाँधने से ब्रध्नशोथ नष्ट हो जाती है । धतूरे के पत्तों के स्वच्छ रस में रसौंत और अफीम घोंटकर नेत्रों में डालने से भयंकर नेत्राभिष्यन्द में आराम आता है । कान के शूल में थोड़ा सा धतूरपत्रस्वरस को गरम करके कान में डालने से दर्द बन्द हो जाता है । धतूरे के बीजों को जल के साथ खूब पीस कर बनायी गोलियों को कृमिदन्त के छिद्र (खोड़) में रखने से दाँत की पीड़ा नष्ट हो जाती है । स्तनों में शोथ के कारण होनेवाली वेदना को शान्त करने के लिए धतूरे के पत्तों को हरिद्रा तथा अफीम के साथ जल से पीसकर लेप करने से शीघ्र आराम आता है । मांसपेशीगत वातप्रकोप को शान्त करने के लिये धतूर- पत्रकल्क से सिद्ध सरसों के तेल की मालिश से आराम आता है। इसी तैल को कमर की वातपीड़ा, सन्धिवातपीड़ा में भी मालिश करने से आराम आता है । यदि शिर में जूं और लीख हो गयी हों तो इसे शिर के बालों में लगाने से जूं और लीख मर जाती हैं । पागल कुत्ते के विष प्रभाव को नष्ट करने के लिए धतूरपत्रचूर्ण को काकोदुम्बरिकाचूर्ण में मिला चावलों के साथ सेवन कराया जाता है । इसी तरह काले धतूरे के पत्तों के स्वरस में आक का दूध तथा गुड़ मिलाकर कुछ काल उचित मात्रा में सेवन कराने से कुत्ते के विष का प्रभाव
चतुर्विंशस्तरङ्गः ७१७ नष्ट हो जाता है । किसी प्रकार की बाह्यशोथजन्य पीड़ा को शान्त करने के लिए धत्तूरपत्र तथा अफीम को जल से पीसकर शोथ के ऊपर लेप करने से शीघ्र शान्त हो जाता है ॥ ३६६-३७८ ॥ प्रलापान्तकरसः धत्तूरबीजं विमलं नवमाषकसंमितम् । रसेश्वरं गन्धकं च पृथक् तोलकसंमितम् ॥ ३७९ ॥ कटुत्रिकं च सौभाग्यं पृथक् तोलकसंमितम् । आदाय पेषयेद्यत्नात् कामं निम्बूकवारिणा ॥ ३८० ॥ निर्मापयेत्ततो युक्त्या वटिका रक्तिकोन्मिताः । रसोऽयं तु समाख्यातः प्रलापान्तकसंज्ञकः ॥ ३८१ ॥ विशेषतो मतोऽयं तु प्रलापपरिकृन्तनः । दीपनः पाचनश्चैव वह्निमान्द्यप्रणाशनः ॥ ३८२ ॥ भा.टी.—शुद्ध धत्तूरबीजचूर्ण नौ मासा, शुद्ध पारद छः मासा, शुद्ध गन्धक छः मासा, त्रिकटुचूर्ण तथा सुहागाचूर्ण पृथक्-पृथक् एक तोला लेकर पहिले पारे और गन्धक की कज्जली बना लें, फिर इसमें अन्य द्रव्यों के चूर्ण मिला नींबू स्वरस के साथ अच्छी तरह मर्दन करें। जब गोली बनने योग्य हो जाय तो इसकी एक-एक रत्ती की गोलियाँ बना लें। इसको प्रलापान्तक-रस कहते हैं। यह रस विशेष रूप से प्रलापोपद्रव को नष्ट करता है और दीपन- पाचन करता है तथा अग्निमान्द्य को भी नष्ट करता है ॥ ३७६-३८२ ॥ उन्मादगजांकुशः धूर्तबीजं रसं गन्धं वङ्गं रौप्यं च मारितम् । समाहरेद्भिषग्वर्यः सर्वं तु समभागिकम् ॥ ३८३ ॥ कन्याम्भसा विमर्द्याथ वटिका रक्तिकोन्मिताः । निर्मापयेत्प्रयत्नेन रसतन्त्रविशारदः ॥ ३८४ ॥ रसोऽयं तु समाख्यातो ह्युन्मादद्विरदांकुशः । हन्त्युन्मादं विशेषेण तथा ज्वरनिबर्हणः ॥ ३८५ ॥ उन्मादगजांकुशरसे—रौप्यं रजतम् , कन्याम्भसा कुमारीरसेन । उन्माद- द्विरदांकुश इति उन्माद एव द्विरदो हस्ती, तस्य वशीकरणाय अङ्कुश इवेति भावः ॥ ३८३-३८५ ॥ भा.टी.—शुद्ध धत्तूरबीजचूर्ण, शुद्ध पारद, शुद्ध गन्धक, वंगभस्म, रजत- भस्म, प्रत्येक समभाग में लेवें। पहिले पारे और गन्धक की कज्जली बनायें, फिर इसमें अन्य द्रव्यों के चूर्ण मिला घीकुंआर के स्वरस से अच्छी तरह मर्दन
७१८ रसतरङ्गिणी करके एक-एक रत्ती की गोलियाँ बना लें। इसको उन्मादगजांकुश रस कहते हैं। यह रस विशेष रूप के उन्मादरोग में काम आता है और ज्वरों को भी नष्ट करता है ॥ ३८३-३८५ ॥ ग्रन्थिशोथनिवारिका वर्तिका धत्तूरस्य फलं त्वेकं तथैत्र विषतिन्दुकम् । तोलकं प्रमितञ्चैव चूर्णितं कृष्णजीरकम् ॥ ३८६ ॥ सह्रासारं मोचरसं कृष्णजीरकभागिकम् । समादाय स्नुहीपत्ररसन परिमर्दयेत् ॥ ३८७ ॥ वर्तिकाः कारयेद्वैद्यो माषकत्रयसंमिताः । ग्रन्थिकज्वरसम्भूतग्रन्थिशोथनिवारिकाः ॥ ३८८ ॥ वर्तिकैका शिलायां तु सङ्घृष्य विमलाम्भसा । प्रलिप्ता शमयत्याशु ग्रन्थिशोथं सुदारुणम् ॥ ३८९ ॥ दिने वारद्वयं वापि वारत्रयमथापि वा । सङ्घृष्य वर्तिकामेकां लेपयेद्विषजां वरः ॥३९० ॥ ग्रन्थिशोथनिवारिका वर्तिः—तथैवेत्येकसङ्ख्याकमेव । सहसारः कुमारीसारः “मुसव्वर” इति ख्यातः ॥ ३८६-३९० ॥ भा.टी.—धतूरे का एक फल, कुचलाबीज एक, कालाजीराचूर्ण एक तोला, एलुआ (मुसव्वर), मोचरस, प्रत्येक को एकं तोला लेकर सबको एकत्र सेहुँड़ के दूध के साथ खूब मर्दन करें। जब बत्ती बनाने योग्य हो जाय तो इसकी तीन-तीन मासे की बत्तियाँ लें। इसको ग्रन्थिशोथहर वर्तिका कहते हैं। एक बत्ती को लेकर साफ पत्थर में स्वच्छ जल के साथ घिसकर इसका लेप करने से शीघ्र ही भयंकर ग्रन्थिशोथ मिट जाता है। दिन में दो बार अथवा तीन बार एक बत्ती को जल से घिसकर लेप करना चाहिए ॥ ३८६-३९० ॥ वक्तव्य—धतूरबीज, कालीमिर्च, कपूर, अफीम तथा सोयाबीज, प्रत्येक समभाग में लेकर एकत्र खरल में बकरी के दूध से मर्दन करें। इसकी मोटी गाढ़ी पीठी सी बनाकर इसको बार-बार शिर के आधे भाग में लेप करने से भयंकर अर्धावभेदक शूल शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। अथ भंगाया नामानि भङ्गा भङ्गी मातुलानी मादिनी मातिका तथा । मातुली विजया तन्द्राकारिणी बहुवादिनी ॥ ३९१ ॥
चतुर्विंशस्तरङ्ग ७१६ भा.टी.—भंगा, भंगी, मातुलानी, मादिनी, मातिका, मातुली, विजया, तन्द्राकारिणी तथा बहुवादिनी, ये सब नाम भांग के कहे जाते हैं ॥३६१॥ वक्तव्य—भांग का काश्मीर और पश्चिमी हिमालय में तथा सर्वत्र मैदानों में होनेवाला एक ऊंचा सीधा वार्षिक क्षुप होता है। इसका तना ४ से ८ फुट लम्बा, पत्ते सात अंगुलियोंवाले होते हैं। इनका प्रत्येक पद्म लम्बा, दन्तुर और नोकीला होता है। फूल छोटे पत्तों के पद्म में लगते हैं जिन में छोटे-छोटे फल लगते हैं। एक-एक फल में एक-एक बीज होता है। फूल तथा फलों की मञ्जरी, बीज, पत्र या इन पर लगा हुआ Resin काम आता है। मादाक्षुप के Resin से युक्त अपक्वपुष्पों को "गांजा" कहते हैं। अपक्वपुष्पों में मादकपदार्थ अधिक रहता है और पक जाने पर कम हो जाता है। गांजे में Cannabis Resin २०% होता है। क्षुप के तरुण पत्रों और फलों को "भांग" कहते हैं। भांग में Resin १०% होता है। पत्तों और फलों पर स्वभावतः उत्पन्न हुए Resin को इकट्ठा किया जाता है और इसे "चरस" कहते हैं। यह Resin प्रायः ६००० फुट ८००० फुट की ऊंचाई पर होनेवाले क्षुपों पर अधिक आता है। इस चरस में Cannabine Resin ४०% होता है। इसे तम्बाकू के साथ मिलाकर कई साधु और गृहस्थ लोग पीते भी हैं। भांग में एक Resin होता है जो इसका क्रियाशील तत्व है और Can- nabis Resin कहाता है। भांग की अधिक मात्रा खायी जाने पर रोगी का शरीर शिथिल हो जाता है और वह बेहोश हालत में पड़ा रहता है। इसके लिए निम्बू का रस या और कोई वानस्पतिक खटाई खिलानी चाहिए। तीव्रावस्था में कुचला, Stri Chinine आदि उत्तेजक औषधियाँ देनी चाहिए। भङ्गायाः परिचयः भङ्गा तु क्षुपजातीया सर्वत्र सुलभा मता । अतः परिचयस्तस्या विस्तरान्न प्रदर्शितः ॥३६२॥ दलद्रवो दलं बीजं मातुलान्या विशेषतः । प्रयुज्यते भेषजेषु कामं रसचिकित्सकैः ॥३६३॥ भा.टी.—भांग एक क्षुप जाति का पौधा है, प्रायः सभी देश में पाया जाता है, इसीलिए इसका विस्तार नहीं बताया गया है। इसकी पत्ती का रस, पत्ती और बीज का व्यवहार प्रायः वैद्यसमुदाय करता है ॥३६२, ३६३॥
७२० रसतरङ्गिणी भङ्गायाः प्रथमः शोधनप्रकारः मातुलानीं शुष्कपत्रां सलिले तु निमज्जयेत् । निष्पीड्य शुष्कां गव्याज्ये भर्जयेन्मन्दवह्निना ॥३६४॥ सुभृष्टामथ विज्ञाय सत्वरं तु समाहरेत् । इत्थं विशोधितां भङ्गां सर्वत्र विनियोजयेत् ॥३६५॥ भा.टी.—सूखी हुई भांग के पत्रों को जल में भिगोकर निचोड़ लें । अब इन पत्तों को धूप में सुखाकर गोघृत में मन्द-मन्द अग्नि से भून लें । जब अच्छी तरह भुन जायँ तो इन्हें नीचे उतार रख लें । इस तरह भांग के पत्ते शुद्ध हो जाते हैं । इन्हें सर्वत्र भांग के प्रयोगों में काम लायें ॥३६५॥ द्वितीयः शोधनप्रकारः भङ्गां विशुष्ककामादाय बब्बूलत्वक्कषायतः । स्वेदयेद् घटिकार्द्धं तु मध्यमप्रानलयोगतः ॥३६६॥ विज्ञाय विजयां स्विन्नां घर्मे खलु विशाषयेत् । एवं संस्वेदिता भङ्गां शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥३६७॥ एवं विशोधितां भङ्गां पिष्ट्वा गोदुग्धयोगतः । कामोद्दीपनयोगेषु विशेषेण नियोजयेत् ॥३६८॥ भङ्गा तिक्ता लघुस्तीक्ष्णा ग्राहिणी कफहारिणी । दीपना पाचनी चैव पित्तला मदकारिणी ॥३६९॥ भा.टी.—सूखे हुए भांग के पत्तों को लेकर उन्हें बबूर की छाल के क्वाथ में २५ या तीस मिनट तक मध्यम अग्नि में स्वेदन करें । जब अच्छी तरह से उबल जायँ तो क्वाथ से निकालकर धूप में सुखा लें । इस प्रकार बबूर के क्वाथ में उबाली हुई भांग उत्तम रूप से शुद्ध हो जाती है । उक्त विधि से शुद्ध की हुई भांग को गोदुग्ध के साथ पीसकर कामोद्दीपक योगों में विशेष रूप से प्रयोग किया जाता है । भांग के पत्ते रस में कड़वे, लघुगुण और तीव्र प्रभावक होते हैं । इसका शरीर में, विशेषतः महास्रोतों में ग्राही प्रभाव होता है । इसके सेवन से कफप्रकोप शान्त हो जाता है, अग्नि दीप्त होती तथा आमरस का परिपाक होता है । इसके सेवन से शरीर में पित्त की वृद्धि होती है और नशा आता है ॥३६६–३६६॥ भङ्गाया विशिष्टगुणाः भङ्गा ह्युद्दीपनी चैव ध्वजभङ्गहरा परम् ।