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रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

गोलियां बना लें । इसको गुञ्जाजीवन रस कहते हैं । इस रस के प्रयोग से शरीर में बल की वृद्धि होती है और कामोत्तेजना बढ़ जाती है ॥४६४-४६६॥ गुञ्जाभद्ररसः गुञ्जाबीजं सुविमलं रसस्तोलकसंमितम् । जयन्ती निम्बबीजं च रसस्तोलकसंमितम् ॥ ४६७ ॥ तोलकत्रितयं सूतं गन्धं द्वादशतोलकम् । समादाय ततः खल्वे पेषयेदतियत्नतः ॥ ४६८ ॥ काकमाचीजयाधूर्तनिम्बूकद्रवयोगतः । वटिकाः कारयेद्यत्नाद् गुञ्जाद्वितयसंमिताः ॥ ४६९ ॥ रसोऽयं तु समाख्यातो गुञ्जाभद्रसमाह्वयः । ऊरुस्तम्भं महाघोरं विनिहन्ति विशेषतः ॥ ४७० ॥ गुञ्जाभद्ररसे-रसस्तोलकसमितमिति षट्तोलकप्रमितम् । धूर्तः धत्तूरः ॥४७०॥ भा.टी.-शुद्ध गुञ्जाबीजचूर्ण छः तोला, जयन्ती छः तोला, निम्बबीजमज्जा छः तोला, शुद्ध पारद तीन तोला, शुद्ध गन्धक बारह तोला लेवें । पहिले पारद और गन्धक की पृथक् कज्जली कर लें, फिर इसमें अन्य द्रव्यों का चूर्ण मिला- कर इसको एक खरल में मकोय स्वरस, जयास्वरस तथा धतूरस्वरस और नींबू- रस के साथ खूब अच्छी तरह मर्दन करें । जब गोली बाँधने योग्य हो जाय तो इसकी दो-दो रत्ती की गोलियां बना लें । इसको गुञ्जाभद्र रस कहते हैं । यह रस महाभयंकर ऊरुस्तम्भ रोग में विशेष लाभ करता है ॥ ४६७-४७० ॥ अथ भल्लातकस्य नामानि भल्लातकस्तु भल्लातस्तपनोऽरुष्करोऽग्निकः । कृमिघ्नश्चैव वातारिः स एव परिकीर्तितः ॥४७१॥ भा.टी.—भल्लातक, भल्लात, तपन, अग्नि के नामवाला अर्थात् वह्नि, अग्नि, दहन, वायुसखा, आदि नाम युक्त, वातारि, व्रणकृत्, कृमिघ्न, अरु- ष्कर—ये सब नाम भिलावे के कहे जाते हैं ॥ ४७१ ॥ वक्तव्य—हिमालय के गरम प्रदेशों में भिलावे का एक सुन्दर १० से ४० फुट ऊँचा वृक्ष होता है । इसके पत्र बड़े ६ से ३७ इञ्च लम्बे, ५ से १२ इञ्च चौड़े समभाग में गोल होते हैं । इसके फूल हरे श्वेत अथवा हरे-पीले होते हैं । फल एक इञ्च लम्बा, पौन इञ्च चौड़ा, अण्डाकार, लाल, चिकना और इसके ऊपर की त्वचा मोटी होती है । इस फल के अन्दर एक दाहक रस होता है जो

७३४ रसतरङ्गिणी हवा लगने पर या पकने पर काला हो जाता है। इसका बीज मीठा और एक प्रकार के तेल से युक्त होता है। विश्लेषण—फल की बाहरी त्वचा में एक छाला डालने वाला तैल ३२% होता है जो ईथर में घुल जाता है। भल्लातकस्य परिचयः भल्लातकः समाख्यातः शाखिजातीयकस्तरुः । जायतेऽद्रिषु बाहुल्याद् फलं तस्य प्रयुज्यते ॥ ४७२ ॥ भल्लातकपरिचयः—अद्रिष्विति पर्वतेषु । भल्लातकशोधनप्रयोजनं निगद- व्याख्यातम् ॥ ४७२ ॥ भा.टी—भिलावा, एक डाल पत्तीवाला वृक्ष है। प्रायः पर्वतों में पाया जाता है और इसका फल प्रयोग में आता है ॥ ४७२ ॥ ग्राह्यभल्लातकस्य स्वरूपम् भल्लातकानि पक्वानि नीरक्षिप्तानि यानि तु । निमज्जन्ति हि तान्येव ग्राह्याणीह विशुद्धये ॥ ४७३ ॥ भा.टी—औषधिकार्य में शोधन करने योग्य भिलावे के वे फल उत्तम सम- झने चाहिए जो पकने के बाद यदि उन्हें पानी में डाला जाय तो डूब जायें । न डूबनेवाले फलों को शोधन के अयोग्य समझना चाहिए ॥ ४७३ ॥ भल्लातकस्य शोधनप्रयोजनम् भल्लातस्य तु रसः स्वल्पोऽपि पतितस्त्वचि । करोति दारुणं दाहं व्रणं चैवातिदारुणम् ॥ ४७४ ॥ शोथं सञ्जनयत्याशु तीव्रदाहसमन्वितम् । मुखे निपतितो घोरं वीसर्पं प्रकरोति वै ॥ ४७५ ॥ उक्तोपद्रवशान्त्यर्थं फलं भल्लातकोद्भवम् । शोधयेद्भिषजां वर्यः सावधानतया सदा ॥ ४७६ ॥ भा.टी—यदि भिलावे का रस बहुत ही थोड़ी मात्रा में भी शरीर के किसी स्थान पर लग जाय तो वहाँ पर भयंकर दाह और व्रण हो जाता है। यदि वह . मुख में लग जाय तो तीव्र दाहयुक्त शोथ तथा वीसर्पशोथ को उत्पन्न कर देता है। अतः वैद्य को उक्त उपद्रवों से बचने-बचाने के लिए भिलावे के फलों को बड़ी सावधानी से शुद्ध करके काम लाना चाहिए ॥ ४७४-४७६ ॥

चतुर्विंशस्तरङ्गः ७३५ भल्लातकस्य प्रथमः शोधनप्रकारः इष्टकाचूर्णसंयुक्तं फलं भल्लातकोद्भवम् । पोट्टलीमध्यनिहितं घर्षयेन्नातिवेगतः ॥४७७॥ ततः प्रतप्ततोयेन क्षालयेदतियत्नतः । इत्थं तैलत्वचाहीनं भल्लातं शुद्धिमाप्नुयात् ॥४७८॥ भल्लातकशोधनप्रकार आद्यः—त्रिचतुर्गुणवस्त्रकृतपोट्टलिकायां इष्टिकाचूर्णं भल्लातकफलानि च निक्षिप्य औषधनिर्माणकुशलः घर्षयेत् । घर्षणेन तैला- धारत्वचापसारः । निर्यातं तैलं च विशुष्यतीष्टकाचूर्णेषु । तत उष्णैर्जलैः प्रक्षाल्य भेषजेषु योजयेत् । तैलमेवास्य दाहव्रणशोथादिकरम् । शोधनात्प्राक् नारिकेलतैलं हस्तयोर्म्रक्षणीयम् ॥४७७, ४७८॥ भा.टी.—एक कपड़े की दृढ़ पोटली अथवा थैली में भिलावे के फल और ईंट का बारीक चूर्ण भरकर उसको हाथों के सहारे मध्यम दबाव से रगड़ें। जब ईंट का चूर्ण तैल से तर हो जाय अर्थात् जब इसकी त्वचा निकल जाय तो इसको गरम पानी में डालकर अच्छी तरह धोकर साफ कर लें। इस विधि से भिलावे शुद्ध हो जाते हैं ॥४७७, ४७८॥ वक्तव्य—ईंट के चूर्ण में डालने से पूर्व भिलावाफलों की टोपी को चाकू से काट लेना चाहिए और रगड़ने के पूर्व हाथों में नारियल का तैल अच्छी तरह मल लेना चाहिए। द्वितीयः शोधनप्रकारः भल्लातकफलानीह नारिकेलाम्बुयोगतः । स्विन्नानि दोलिकायन्त्रे शुद्धिमायान्त्यनुत्तमाम् ॥४७९॥ द्वितीयः शोधनप्रकारः—नारिकेलजलद्वारा स्वेदनात् साध्यः । स्वेदनञ्च खण्डशः कृतभल्लातकफलानां विधेयम् । तथा सति स्विन्नानि उपभोगयोग्यानि भवन्ति भल्लातकानि ॥४७६॥ भ.टी.—भिलावे के फलों को काटकर दो टुकड़े करलें, अब इनको दोलायन्त्र में डाल उसमें नारियल का जल भर दें और एक दो घण्टे तक उबालें। इस विधि से भी भिलावे शुद्ध हो जाते हैं ॥४७६॥ वक्तव्य — भल्लातकफलों को उक्त विधि से शोधन करने के बाद एक बार दोलायन्त्र द्वारा गोदुग्ध में अच्छी तरह स्वेदन कर लेने से अन्तःप्रयोग में इनके द्वारा कोई हानि होने की सम्भावना नहीं रहती है।

७३६ रसतरङ्गिणी भल्लातकः कटुस्तिक्त अत्युष्णः कृमिनाशनः । रसायनो वलकरो गुल्मार्शोग्रहणीहरः ॥४८०॥ कुष्ठामयप्रशमनः कफवातोदरापहः । विवन्धाध्मानशूलघ्नः श्वासादिगदनाशनः ॥४८१॥ भा.टी.—भिलावे के फल रस में चरपरे (कटु) तथा कड़वे होते हैं । गुणों में यह अत्यन्त उष्ण तथा कृमिनाशक हैं। इनके विधिपूर्वक सेवन करने से शरीर में रसायनगुण उत्पन्न होते हैं और शरीर में वल की वृद्धि होती है । इनको गुल्मरोग तथा अर्शारोग में प्रयोग करने से शीघ्र लाभ होता है । इनके प्रयोग से कुष्ठरोग नष्ट होता है और कफवात-प्रकोपजन्य उदररोग शान्त होते हैं । आँतों की दुर्बलता से होनेवाले विबन्ध तथा आधमान और शूल में इनके प्रयोग से लाभ होता है और श्वास आदि रोगों में भी आराम आता है ॥४८०, ४८१॥ वक्तव्य—भिलावा आमाशय के लिए दीपक,वातनाड़ियों, श्वाससंस्थान, हृदय तथा त्वचा के लिए उत्तेजक और यकृत् के लिए पित्तनिस्सारक है । कहा जाता है कि जो मनुष्य शरद् ऋतु में इसके द्वारा बनाये हुए घृत का सेवन करता है वह रोगों से बचा रहता है। इसके सेवन से वृद्धावस्था देर से आती है । बाल देर तक काले रहते हैं और दाँत भी देर तक दृढ़ रहते हैं । तेल में दग्ध किये हुए भल्लातकचूर्ण में लवण मिलाकर बनाया हुआ मञ्जन दाँतों पर मलने से दाँत स्थिर होते हैं। श्वित्रकुष्ठ (सफेद कोढ़) के चिह्नों पर भल्लातकतैल का लेप लगाने से उनमें छोटे-छोटे छाले पड़ जाते हैं जो सूखकर काला चिह्न छोड़ जाते हैं, फिर ये कृष्णवर्णा चिह्न आपस में मिल कर त्वचा को सवर्ण कर देते हैं। सन्धिशोथों में गहरी शोथ को हटाने के लिए भल्लातक तेल के लेप लगाये जाते हैं। क्लीबरोग के लिए शिश्नेन्द्रिय पर भल्लातकादिलेप लगाने से हलके छाले पड़ जाते हैं और अन्दर का रक्तसञ्चय दूर हो जाता है। भारी चोट लगने से शरीर में तीव्र शोथ हो जाय तो एक शुद्ध भिलावे को तोड़कर घृत में तल करके उस घृत से बनाया हुआ हलवा (गुड़ का) खिलाया जाय तो शोथ को बहुत शीघ्र आराम आता है । चिरस्थायी त्वक्रोगों, फिरंगजन्य व्रणों और अर्बुदों में भिलावे के योग देने से आराम आता है । श्वासरोग, चिरस्थायी कास, प्रतिश्याय आदि में कुछ काल निरंतर भल्लातक घृत या इसके किसी अन्य योग का सेवन करना चाहिए । वात- कफजन्य अजीर्ण और मन्दाग्नि के उपद्रवों तथा अर्शारोग में इसके

४७ चतुर्विंशस्तरङ्गः ७३७ योगों का सेवन शीघ्र लाभ करता है। भल्लातक का प्रयोग उष्णऋतु में नहीं करना चाहिए। इसके प्रयोगकाल में लवण, धूप में भ्रमण और मैथुन अपथ्य समझना चाहिए। पित्तप्रकृति रक्तपित्ती गर्भिणी और वृक्करोगी को इसका सेवन नहीं कराना चाहिए। इसके अधिक मात्रा में खाये जाने पर मूत्र लाल और मात्रा में थोड़ा हो जाता है। त्वचा पर कोठ और स्फोट आदि हो जाते हैं। इन विकारों की शान्ति के लिए नारियल का तैल, तिल तथा हरीतकी का सेवन करना चाहिए। भल्लातकस्य मात्रा गुञ्जैकतः समारभ्य गुञ्जातितयसंमितम्। भल्लातकं प्रयुञ्जीत बलकालाद्यपेक्षया ॥४८२॥ भा.टी—रोगी तथा शरीर का बल और देश-काल, प्रकृति का पूर्ण विचार करके एक रत्ती से लेकर तीन रत्ती तक शुद्ध भिलावे की मात्रा समझनी चाहिए। भल्लातकस्य आमयिकः प्रयोगः हरीतकीतिलगुडयुतं भल्लातकं समम्। निषेवितं प्लीहपाण्डुज्वरघ्नं श्वासकासनुत् ॥४८३॥ भल्लातकस्य रोगयोग्यः प्रयोगः—सममिति हरीतकीतिलगुडभल्लातकाः समाः परिग्राह्याः ॥४६३॥ भा.टी.—शुद्ध भल्लातकचूर्ण, हरीतकीचूर्ण, तिलचूर्ण और गुड़; प्रत्येक समभाग लेकर एकत्र पीसकर बनायी हुई गोलियों का सेवन करने में प्लीहा- वृद्धि, पाण्डुरोग, ज्वर, श्वास और कास में आराम आता है ॥४८३॥ भल्लातकरसायनम् शुण्ठीविडङ्गलौहाढ्यं भल्लातं विमलीकृतम्। मध्वाज्यसंयुक्तं युक्तं मासत्रितयसेवनात् ॥४८४॥ रक्तवृद्धिं करोत्येतद् बलं चैव विवर्द्धयेत्। नवयौवनलावण्यं जनयत्यविकल्पतः ॥४८५॥ समाख्यातमिदं नाम्ना भल्लातकरसायनम्। सेवितव्यं सदा यत्नाद्रक्ताल्पत्वनिवृत्तये ॥४८६॥ भल्लातकरसायनम्-व्याख्यासमपाठम्। यद्यपि तन्त्रान्तरेषु भल्लातकरसायन- प्रयोगो नैकविधः श्रूयते, तथापि स्वल्पव्ययं बहुफलं निरापदमावश्यकगुणयोगिप्रका- रममुमेव समामनन्त्याचार्या इत्यवधेयम्। यत्नात् पथ्यरन्नाद्धारेति भावः ॥४८६॥

७३८ रसतरङ्गिणी भा.टी.—शुण्ठीचूर्ण, विडंगचूर्ण और लोहभस्म तथा भिलावाचूर्ण प्रत्येक समभाग में लेकर एकत्र पीसकर रख लें । इनमें से उचित मात्रा में लेकर घी और शहद को मिलाकर निरन्तर तीन मास तक सेवन करने से शरीर में रक्त की वृद्धि होती है और बल बढ़ता है, जिससे शरीर में नवयौवन की सुन्दरता आ जाती है । इसको भल्लातक रसायन कहते हैं । इसको रक्ताल्पता (खून की कमी) रोग दूर करने के लिए सावधानी के साथ सेवन करना चाहिए ॥४८४-४८६॥ अथ करवीरस्य नामानि करवीरो हयारिश्च हयमारोऽश्वमारकः । अश्वान्तकोऽश्वहाश्वघ्नो मतश्चएडातकस्तथा ॥४८७॥ करवीरः श्वेतपीतरक्तपुष्पविभेदतः । त्रिविधस्तु समाख्यातो वैद्यविद्याविशारदैः ॥४८८॥ भा.टी.—करवीर, हयारि, हयमार, अश्वमार, अश्वान्तक, अश्वहा, अश्वघ्न, चएडातक, ये सब नाम करवीर (कनेर) के कहे जाते हैं । कनेर श्वेतपुष्प, रक्त- पुष्प और पीतपुष्प भेद से तीन प्रकार का माना जाता है ॥४८७, ४८८॥ करवीरस्य परिचयः करवीरः समाख्यातः सर्वत्र सुलभस्तरुः । भिषग्वरैरस्य मूलं मतं तूपविषाह्वयम् ॥४८६॥ करवीरस्य मूलत्वक् तद्रसो वा निषेवितः । करोति हि विशेषेण मोहदाहभ्रमादिकम् ॥४६०॥ करवीरकमूलन्तु बाह्ययोगे प्रयुज्यते । आभ्यन्तरः प्रयोगोऽस्य न कुत्रापि प्रकीर्तितः ॥४६१॥ करवीरपरिचयः—निगदव्याख्यातः । प्रायश्चौषधेषु श्वेतकरवीरस्यैव प्रयोग इति सम्प्रदायः ॥४८६-४६१॥ भा.टी.—कनेर सर्वत्र सुलभ रूप से पाये जानेवाला वृक्ष है । वैद्य लोग इसकी मूल को उपविष मानते हैं । कनेर मूल की छाल अथवा त्वक्रस को अधिक मात्रा में सेवन किये जाने पर विशेष रूप से मोह, दाह तथा भ्रम आदि विकार उत्पन्न होते हैं । कनेर की जड़ की छाल प्रायः बाह्य रोगों में ही काम आती है । आभ्यन्तर प्रयोग के लिए इसका उपयोग विरलावस्था में ही पाया जाता है॥४६१॥ करवीरस्य बाह्यप्रयोगः करवीरकमूलं तु वारिणा परिपेषितम् ।

समाख्यातं प्रलेपेन ह्युपदंशव्रणापहम् ॥४६२॥ करवीरदलद्रावो नेत्रयोर्विनियोजितः । अभिष्यन्दं जलस्रावं व्यपोहति विशेषतः ॥४६३॥ करवीरस्य बाह्यप्रयोगः—उपदंशव्रणहरः नेत्राभिष्यन्दनाशनश्च । अपि च- करवीरमूलत्वक् १ तो०, करवीरपुष्पाणि १ तो०, आफूकम् ३ मा०, अश्वगन्धा १ तो०, धत्तूरबीजानि १ तो०, जले पिष्ट्वा वटिकाः कारयेत् । सेयं करवीरादि- वटी प्रलेपतो ध्वजभङ्गहरी ख्याता इति ॥४६२, ४६३॥ भा.टी.--कनेर की मूलछाल को जल के साथ पीसकर लेप तैयार कर लें । इस लेप को उपदंशव्रणों पर लगाने से उनमें आराम आता है । कनेर के पत्तों का स्वरस नेत्रों में डाला जाय तो नेत्राभिष्यन्द तथा नेत्रों से पानी निक- लना बन्द हो जाता है ॥४६२, ४६३॥ करवीराद्यं तैलम् करवीरशिफाक्वाथविपक्वं तिलतैलकम् । कल्कीकृतविडङ्गाग्नियोगतो गोजलान्वितम् ॥४६४॥ करवीराद्यतैलं तु समाख्यातं भिषग्वरैः । अभ्यङ्गाद्विनिहन्त्याशु त्वग्गतान् विविधान् गदान् ॥४६५॥ करवीराद्यं तैलम्—गोजलं गोमूत्रम् । तैलसाधनाय करवीरमूलक्वाथः ४ प्रस्थमितः, विडङ्गं चित्रकश्च उभयोर्मानं मिलित्वा १ कुडवम्, गोमूत्रं ४ प्रस्थ- मितम्, तिलतैलं १ प्रस्थमितम् ॥४६४, ४६५॥ भा.टी.—कनेर की छाल का क्वाथ चार सेर, वायविडंग तथा चित्रकमू- लत्वक् प्रत्येक दस-दस तोला और गोमूत्र चार सेर लें । पहले विडंग तथा चित्रकछाल को जल से पीसकर इसका कल्क बना लें । अब इस कल्क को एक बड़े पात्र में डालकर इसमें एक सेर तिलतैल और तिलतैल से चौगुना कनेर की छाल का क्वाथ तथा गोमूत्र मिलाकर अग्नि पर तैल सिद्ध कर लें । इसको करवीराद्य तैल कहते हैं । इस तैल को शरीर में मालिश करने से अनेक प्रकार के त्वक् रोग नष्ट हो जाते हैं ॥४६४,४६५ ॥ अथ लांगलिकाया नामानि लाङ्गली हलिनी सीरी विशल्या कलिहारिका । अग्निजिह्वा स्वर्णपुष्पा दीप्ता नक्तेन्दुपुष्पिका ॥४६६॥ विद्युज्ज्वाला वह्निशिखा लाङ्गली गर्भपातिनी । हली लांगलिनी चैव समाख्याता भिषग्वरैः ॥४६७॥

७४० रसतरङ्गिणी भा.टी.—लांगली, हलिनी, सीरी, विशल्या, कलिहारिका, अग्निजिह्वा, स्वर्णपुष्पा, दीप्ता, नक्तेन्दुपुष्पिका, विद्युज्ज्याला, वह्निशिखा, लांगली, गर्भपातिनी, हली, लांगलिनी, ये सब नाम (कलिहारी) के कहे जाते हैं ॥ ४६६,४६७॥ वक्तव्य—संस्कृत में लांगल हलको कहते हैं। क्योंकि इसका कन्द हल के समान आकार का होता है, अतः इसे लांगली आदि नाम दिये जाते हैं। इसका कन्द भी सरलगामी नहीं होता, किन्तु वह भी भूमि में हल की भाँति कुंचित होता है। इसका कन्द श्वेतवर्ण, मृदु, मांसल और तिक्तरस होता है। क्षुप के शिखर पर ५-६ अंगुल लम्बे चौड़े पुष्प लगते हैं, जो पाकानुसार हरित पीत और रक्त हो जाते हैं। इन रक्तवर्ण पुष्पों के कारण ही इसको 'वह्निशिखा' आदि कहा जाता है। लांगली के क्षुप पञ्जाब के पर्वतों और हिमालय के अधस्तरों पर मिलते हैं, परन्तु वंग देश और दक्षिण में बहुतायत से पाये जाते हैं। इसका कन्द प्रायः वर्षार्ऋतु में फूटता है और झाड़ियों के सहारे कार्तिक मार्गशीर्ष तक हरा-भरा पाया जाता है। इसका कन्द दो प्रकार का होता है। १—गोलाकार, २—लम्बा और द्विभाग युक्त। पहिले प्रकार को स्त्री जाति की, दूसरे को पुष्प जाति की लांगली कहा जाता है। लाङ्गलिकायाः परिचयः लाङ्गली स्वर्णकुसुमा लता तु सुमनोहरा । सीरशूला विशेषेण मता नक्तेन्दुपुष्पिका ॥४६८॥ लाङ्गल्या मूलमेवेह मतं तूपविषाह्वयम् । तदेव च विशेषेण योगेषु विनियुज्यते ॥४६६॥ लाङ्गलिकापरिचयः—लता इति प्रायिकम् । क्वचित् दीर्घसरलोर्ध्वकाण्ड- क्षुपरूपेणापि दर्शनात् । एतस्या आभ्यन्तरप्रयोगो न कार्यः । अत्र यद्यपि लाङ्ग- लीशोधनमुपेक्षितं बाह्यप्रयोगैकयोग्यत्वात्, तथापि “लांगली शुद्धिमायाति दिनं गोमूत्रशोधिता” इति प्राचीनोक्तमनुसन्धेयम् ॥४६८, ४६६॥ भा.टी.—कलिहारी का क्षुप हरिद्राक्षुप से बहुत कुछ सादृश्य रखता है, परन्तु उसकी अपेक्षा अधिक ऊँचा होता है और पत्ते बहुत कम चौड़े बाँस की तरह लम्बे काले रंग के होते हैं। इसका काण्ड सीधा नहीं जाता है, प्रत्युत कन्द से निकलते ही एक ओर को कुञ्चित (सिकुड़ता) ही जाता है, जिससे उसकी आकृति हलाकार बन जाती है ॥४६८,४६६॥

चतुर्विंशस्तरङ्गः ७४१ लाङ्गलिकाया आभ्यन्तरप्रयोगे दोषाः शुष्का वार्द्रा लाङ्गलिनी स्वल्पापि परिशीलिता । करोति दारुणं दाहं मोहातीसारविभ्रमम् ॥५००॥ आ.टी.—कलिहारी के कन्द को सूखा या गीला किसी रूप में थोड़ी मात्रा में भी सेवन कराया जाय तो इससे भयंकर दाह, मोह, अतीसार तथा भ्रम उत्पन्न होता है ॥५००॥ लाङ्गलिकाया गुणाः लाङ्गली कटुका चोष्णा कफवातहरा सरा । अपरापातनी चैव सद्यःप्रसवकारिका ॥५०१॥ शोथापहा विशेषेण मता व्रणनिवारिणी । कुष्ठकृमिप्रशमनी विशेषात्परिकीर्त्तिता ॥५०२॥ आभ्यन्तरप्रयोगार्थं लाङ्गलीं न प्रयोजयेत् । बाह्यप्रयोगे युञ्जीत तत्तद्रोगोपनुत्तये ॥५०३॥ आ.टी.—कलिहारीकन्द कटुरस, उष्णगुण होने से वात-कफ के विकारों को नष्ट करता और सारण है। प्रसव के बाद अपरा (नाल) न निकलने पर इसको प्रसूता के शिर और हाथ-पैरों में लेप करने से वह शीघ्र निकल जाती है। विलम्ब-प्रसव में भी इसे स्त्री के हाथ-पैरों तथा शिर में लेप करने से प्रसव जल्दी होता है। शरीर के किसी बाह्य देश में शोथ होने पर इसके लेप से वह शान्त हो जाता है और व्रणों पर इसके योगों का लेप लगाने से वे अच्छे हो जाते हैं। यह विशेष रूप से कुष्ठ तथा कृमियों को मारने में काम आता है। कलिहारी को आभ्यन्तर प्रयोग के लिए काम में नहीं लाना चाहिए। अतः इसको तत्तत् रोगों को नष्ट करने के लिए बाह्यरूप से ही काम में लायें ॥५०१-५०३॥ लाङ्गलिकाया बाह्यप्रयोगाः सुधौतं लाङ्गलीमूलं वारिणा परिपेषितम् । नाभौ योनौ प्रलिप्तं वा सद्यःप्रसवकृन्मतम् ॥५०४॥ लाङ्गली वारिणा पिष्टा करपादप्रलेपिता । अपरां पातयत्याशु न सन्देहोऽत्र कश्चन ॥५०५॥ लाङ्गलीमूलतोयं तु पूरितं कृमिकर्णके । निहन्त्यन्तःप्रविष्टांस्तु शतपाद्यादिकान् कृमीन् ॥५०६॥

७४२ रसतरङ्गिणी सूर्यभक्ताद्रवोपेतः सव्योषो लाङ्गलीद्रवः । विधाय वस्त्रपूतं तु योजयेत् कृमिकर्णके ॥५०७॥ पातयत्यचिरादेव कृमिकीटपिपीलिकाः । तथा कर्णजलौकाञ्च तथैवान्यान् कृमीनपि ॥५०८॥ कङ्कगोधावसोपेतं तुलसीलाङ्गलीद्रवैः । साधितं तैलमभ्यङ्गाद् हन्त्युन्मन्थं विशेषतः ॥५०६॥ लाङ्गल्या बाह्यप्रयोगाः—सूर्यभक्ता “हुरहुर” इति ख्याता। कङ्कः पक्षिविशेषः प्रसिद्धप्रायः । उभयोर्वसया युक्तम् । उन्मन्थः—“कर्णं बलाद् वर्धयतः पाल्यां वायुः प्रकुप्यति । कफं संगृह्य कुरुते शोथं स्तब्धमवेदनम्। उन्मन्थकः सकण्डूको विकारः कफवातजः” इत्युक्तलक्षणः कर्णपालीरोगः ॥५०४-५०६॥ भा.टी.—लांगलीमूल को अच्छी तरह धो साफ करके सिल पर जल के साथ पीसकर इसका नाभि तथा योनि प्रदेश के ऊपर लेप करने से प्रसव शीघ्र हो जाता है । कलिहारी को जल के साथ पीसकर इसका हाथ-पैरों में लेप करने से निश्चित रूप में अपरा निकल आती है । कान के अन्दर कान- खजूरा आदि किसी कीड़े के घुस जाने पर कलिहारीमूल जल से पीसकर इसको कान में डालने से कीड़े मर जाते हैं । कान के अन्दर कीड़े पड़ जाने या बाहरी कीड़ों के पहुँच जाने पर कलिहारीमूल स्वरस और हुलहुल के स्वरस में त्रिकुट चूर्ण घाटकर उसको कपड़े में छान लें । अब इस रस को कान में डालें तो सब कीड़े मरकर बाहर आ जाते हैं । यदि कोई जोंक आदि भीतर चिपकनेवाले कीड़े भी अन्दर गए हों तो वे भी मरकर बाहर आ जाते हैं । कंकपक्षी, गोह की चर्बी, तिलतैल, तुलसीस्वरस तथा लांगलीमूलस्वरस को एकत्र मिलाकर तैल पका लें । इस तैल की मालिश करने से उन्मन्थ (कान की पाली में कफ-वात-प्रकोपजन्य शोथ) रोग शीघ्र शान्त होता है ॥५०४-५०६॥ अथ अर्कक्षीरस्य नामानि अर्कक्षीरं रविीरं सूर्यक्षीरं तथैव च । अर्कदुग्धं सूर्यदुग्धं रविदुग्धं च तन्मतम् ॥५१०॥ भा.टी.—अर्कक्षीर, सूर्यक्षीर, अर्कदुग्ध, सूर्यदुग्ध, रविदुग्ध, ये सब नाम आक के दूध के हैं ॥५१०॥ अर्कक्षीरस्य गुणाः अर्कक्षीरं मतं स्निग्धं तिक्तोष्णं कुष्ठगुल्मनुत् ।

चतुर्विंशस्तरङ्गः ७४३ उदरापहमत्यन्तं रेचनं वान्तिकारकम् ॥५११॥ गुदांकुरप्रशमनं कृमिदन्तव्यथापहम् । क्षारकर्मकरं चैव त्वचि लिप्तं विशेषतः ॥५१२॥ भा.टी.-आक का दूध स्निग्ध, तिक्तरस, उष्णगुण होता है । इसके सेवन से कुष्ठ तथा गुल्म रोग नष्ट होता है और उदररोगों में लाभ करता है । इसके सेवन से अत्यन्त दस्त लगते हैं और वमन होती है । इसको बवासीर के मस्सों के दर्द में, दाँत में कीड़ा लगने से होनेवाले दर्द में प्रयोग किया जाता है । यदि इसको त्वचा पर लेप किया जाय तो यह वहाँ पर क्षार का काम करता है अर्थात् वहाँ पर जला देता है ॥५११, ५१२॥ अर्कक्षीरस्य बाह्यप्रयोगः सक्षौद्रे रविदुग्धे तु तूलमल्पं निषेचितम् । कृमिदन्तस्थरन्ध्रस्थं कृमिदन्तव्यथापहम् ॥५१३॥ त्रिगुणक्षौद्रसंयुक्तं रविदुग्धं प्रलेपितम् । मुखक्षतं शमयति द्रुतं नास्तीह संशयः ॥५१४॥ निशाशिरीषबीजाढ्यं सूर्यदुग्धं विलेपितम् । गुदांकुरान् पातयति चिरोत्थानप्यसंशयम् ॥५१५॥ अर्कक्षीरोपक्रमस्तत्र बाह्ये प्रयोगे—तूलं कार्पासखण्डम् । त्रिगुणेत्यादिलेपनोत्तरं मुखनिष्ठ्यूतं नान्तर्गिलनीयमित्यवधेयम् । निशा हरिद्रा । स्पष्टमन्यत् ॥५१५॥ भा.टी.-आक का दूध तथा मधु समभाग में लेकर एकत्र मिला इसमें एक छोटा-सा रुई का फाहा भिगोकर कीड़ेवाले दाँत के छेद में भर देने से कृमि- दन्त पीड़ा शान्त हो जाती है । आक का दूध एक भाग, शहद तीन भाग लेकर दोनों को एकत्र मिला लें, इसको मुखक्षत में भीतर लेप करने से शीघ्र ही मुख के क्षतों में निःसन्देह आराम आता है । बहुत से पुराने बवासीर के मस्सों को गिराने या निकालने के लिए आक के दूध में हरिद्राचूर्ण और सिरसबीजचूर्ण मिलाकर लेप बना लें। इस लेप को मस्सों में लगाने से मस्से गिर जाते हैं ॥५१३-५१५॥ अथ स्नुहीक्षीरस्य नामानि स्नुहीक्षीरं सुधाक्षीरं सेहुण्डक्षीरकं तथा । स्नुहीदुग्धं सुधादुग्धं स्नुग्दुग्धं च मतन्तु तत् ॥५१६॥ भा.टी.—स्नुहीक्षीर, सुधाक्षीर, सेहुण्डक्षीर, स्नुहीदुग्ध, स्नुग्दुग्ध, ये सब नाम थोहर के दूध के कहे जाते हैं ॥५१६॥

७४४ रसतरङ्गिणी स्नुहीक्षीरस्य शोधनम् पलद्वयं सुधादुग्धं तोलकद्वयसंमिते । चिञ्चादलद्रवे वस्त्रपूते घर्मे विशोषयेत् ॥५१७॥ द्रवं विशुष्कं विज्ञाय सुधादुग्धं समाहरेत् । ततः सर्वत्र योगेषु प्रयुञ्जीत भिषग्वरैः ॥५१८॥ प्रथमशोधनप्रकारे चिञ्चा अम्लिका, तस्याः पत्ररसो ग्राह्यः । केचित्तु “अर्क- सेहुण्डयोर्दुग्धं तत्स्वयं शुद्धमुच्यते” इत्यप्याहुः ॥५१७, ५१८॥ भा.टी.—दो पल थोहर के दूध को, कपड़छान किये इमली के पत्तों के दो तोले रस में धूप में रखकर सुखा लें । जब द्रवांश सूख जाय तो शुद्ध थोहर के दूध को रख लें और सब जगह प्रयोग करें ॥५१७,५१८॥ स्नुहीक्षीरस्य गुणाः सुधादुग्धं वातहरं गुल्मोदरविनाशनम् । विषाध्मानहरं चैव गुदांकुरहरं परम् ॥५१६॥ परं विरेचनकरं पुष्पकृच्चाक्षिमध्यगम् । समाख्यातं विशेषेण क्षारकर्मकरं परम् ॥५२०॥ गुणपाठे—पुष्पकृच्चाक्षिमध्यगमिति । अक्षिमध्यपतितं पुष्पाख्यं "फुला" इतिख्यातं रोगं करोति ॥५१६,५२०॥ भा.टी.—थोहर का दूध वातहर तथा गुल्म और उदररोग नाशक है। विष प्रभाव तथा आध्मान और गुदांकुर (मस्से) को नष्ट करने में उत्तम प्रभाव रखता है । अंतःप्रयोग में यह अत्यन्त विरेचक है। यदि यह आँख में पड़ जाय तो इससे आँख में फूला पड़ जाता है और बाहर किसी स्थान पर लगाने पे क्षारकर्म (जलानेवाला) करता है ॥५१६, ५२०॥ अस्य आमयिकः प्रयोगः सुधादुग्धं निशाकोषातकी सैन्धवसंयुतम् । गोमूत्रेण प्रलिप्तं तु पातयेद् गुदजांकुरान् ॥५२१॥ भा.टी.—हरिद्रा, खेखसा, सेंधानमक के साथ थूहर का दूध गोमूत्र में मिलाकर अर्श पर लेप किया जाय तो अर्शाङ्कुर दूर होता है ॥५२१॥ क्षारवर्तिका चूर्णं दारुहरिद्रायास्तोलकैकमितं हरेत् । मासाद्धं पेषयेद्द्वारा निदाघे खलु शोषयेत् ॥५२२॥

चतुर्विंशस्तरङ्गः ७४५ समांशिके सुधादुग्धे रविदुग्धे च तन्मिते । निक्षिप्य खलु खल्वेऽथ पेषयेदति यत्नतः ॥५२३॥ विज्ञाय वर्तिकायोग्यं रसतन्त्रविशारदः । दीर्घा एषणिकाकारा वर्तिकाः कारयेत्ततः ॥५२४॥ समाख्याता भिषग्वर्यैर्नामतः क्षारवर्तिकाः । भगन्दरमहाघोरनाडीव्रणविशोधिकाः ॥५२५॥ वर्तिकेयं सुविन्यस्ता प्रयत्नेन भगन्दरे । नाडीव्रणान्तराले च खलु शोधयति द्रुतम् ॥५२६॥ रोगयोग्यप्रयोगे क्षारवर्तिका—मासार्धे पञ्चदशदिनानि । एतावत्कालं पेष- णञ्च सुश्लक्ष्णतासम्पादनाय । निगदव्याख्यातमन्यत् ॥५२२-५२६॥ भा.टी.—दारुहल्दी का चूर्ण एक तोला लेकर इसको खरल में डालकर जल के साथ पन्द्रह दिन तक अच्छी तरह मर्दन करके धूप में सुखा लें। अब इसमें एक तोला थोहर का दूध और एक तोला आक का दूध मिलाकर खरल में फिर मर्दन करें, जब बत्ती बनाने योग्य हो जाय तो इसकी लम्बी-लम्बी सींक की तरह की बत्तियाँ बना लें। इनको क्षारवर्ति कहा जाता है और ये भग- न्दर तथा भयंकर नाड़ीव्रण को शुद्ध करने के काम आती हैं। इन वर्त्तियों की भगन्दर में अथवा नाड़ीव्रण के भीतर अच्छी तरह रखा जाय तो इससे शीघ्र ही व्रण शुद्ध हो जाते हैं ॥५२२-५२६॥ क्षारसूत्रम् सुधादुग्धे वस्त्रपूतहरिद्राचूर्णसंयुते । निक्षिप्तेन तु तूलेन स्वल्पेन खलु यत्नतः ॥५२७॥ प्रलिप्तं सुदृढं सूत्रं छायायामथ शोषयेत् । विलिप्य सप्तधा ह्येवं शोषयेद् भिषजां वरः ॥५२८॥ सूत्रमेतत्समाख्यातं क्षारसूत्रं तु नामतः । गुदांकुरच्छेदनार्थममोघास्त्रमिदं मतम् ॥५२६॥ भगन्दरच्छेदनार्थमप्येतद्विनियुज्यते । प्रयोक्तव्यं क्षारसूत्रं सावधानतया सदा ॥५३०॥ क्षारसूत्रम्—वस्त्रपूतहरिद्राचूर्णाक्ते सेहुण्डदुग्धे सिक्तेन स्वल्पेन तूलकेन सुदृढं तनु वर्तितं सूत्रमादाय लेपयेत् । एवं सप्तधा शुष्कं तच्छेदने-समर्थं भवति । प्रयोगकाले सावधानता न्यूनाधिकच्छेदभयात् । क्षारसूत्रबन्धनं च यावच्छेदो न

७४६ रसतरङ्गिणी स्यात् तावत् प्रतितृतीयमहः ईषद्गाढतरीक्रियते ॥५२७-५३०॥ भा.टी.—थोहर के दूध में कपड़छन हल्दी का चूर्ण मिलाकर इसमें एक दृढ़ सूत्र (तागा) भिगोकर छाया में सुखा लें, जब अच्छी तरह सूख जाय तो इसे फिर उक्त हरिद्राचूर्ण युक्त थोहर के दूध से लेप करके छाया में सुखा लें। इस प्रकार सात बार लेपकर सुखा लें। इसे क्षारसूत्र के नाम से कहा जाता है। बवासीर के मस्सों को काटने के लिए यह अचूक साधन है। इसी को भगन्दर के छेदन करने के लिए भी काम में लाया जाता है। परन्तु इसके प्रयोग में बड़ी सावधानी से काम लेना चाहिए ॥५२७-५३०॥ अथ कृष्णसर्पविषस्य नामानि कृष्णसर्पविषं चैव गरलं दारदं तथा। जङ्गमविष इत्येते नामख्याता भिषग्वरैः ॥५३१॥ भा.टी.—कृष्णसर्पविष, गरल, दारद तथा जंगमविष, ये सब नाम साँप के विष के कहे जाते हैं ॥५३१॥ कृष्णसर्पविषस्य आहरणविधिः शुक्तिकां तालपत्रेण खर्जूरस्य दलेन वा। आच्छाद्य सर्वतो दीर्घयष्टिकायां तु बन्धयेत् ॥५३२॥ कृष्णसर्पो यथा रोषात् तालपत्रे दशेत्तथा। विदध्यात् कृष्णसर्पस्य सन्मुखं यष्टिकामिमाम् ॥५३३॥ निदध्यात्तावदेवं तु बहुवारं दशेद्यथा। शुक्तिकासञ्चितं सर्पविषं त्वथ समाहरेत् ॥५३४॥ पुनः पुनः कृष्णसर्पं रोषयन् भिषजां वरः। समाहरेद्विषं त्वेवं सावधानतया सदा ॥५३५॥ विषाहरणप्रकारः शिष्यबुद्धिवैशद्याय। वाग्भटस्तु प्रकारान्तरमामम्नौ। तत्तु बहुलमनुपयुक्तत्वात् उपेक्षितम्। नवीनोद्भावितञ्च बहुगुणसुलभं प्रकटितमिति ॥५३२-५३५॥ भा.टी. - एक शुक्ति (सीप) को ताड़ के पत्ते अथवा खजूर के पत्ते से अच्छी तरह चारों तरफ से ढक कर बाँध लें। अब इस सीप को एक लम्बी लाठी या बाँस में बाँध लें। इस शुक्तिका युक्त लाठी के सामने आने और बँधी हुई सीप को देखने से काला साँप जैसे क्रोध में आवे उसी तरह इस लाठी को साँप के मुख के आगे कर दें। इस तरह जितनी बार काला साँप क्रोध में आकर इस सीप के ऊपर अपना डंक मारे उतनी ही बार इसको उसके आगे कर देना चाहिए।

चतुर्विंशस्तरङ्गः ७४७ इस तरह करने से सीप में सर्प का विष सञ्चित पाया जायगा। इस विष को बड़ी सावधानी के साथ लेकर सुरक्षित कर लें ॥ ५३२-५३५ ॥ वक्तव्य—फण वाले या दर्वीकर सर्प की विषैली दाढ़ में से विष को निकाल कर सुखा लिया जाता है। इसके निकालने की क्रिया सपेरे या गारुड़िये या कञ्जर लोग अच्छी तरह जानते हैं। यह विषद्रव कुछ पीला भूरा-सा होता है। सुखाने पर इसमें से ५० या ७५% प्रतिशत जल का भाग उड़ जाता है और पहिले भूरे रंग का चूर्ण-सा रह जाता है जो कभी नहीं बिगड़ता है। कृष्णसर्पविषस्य शोधनम् तैलाक्तशुक्तिकामध्येसञ्चिते जङ्गमे विषे । पादांशं सार्षपं तैलं न्यस्य घर्मे विशोषयेत् ॥ ५३६ ॥ जायते पीतवर्णं तन्निदाघे परिशोषितम् । कृष्णसर्पविषं त्वेवं शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥ ५३७ ॥ भा.टी.—एक सीप में थोड़ा-सा तेल चुपड़कर उसमें उक्त प्रकार से सञ्चित सर्पविष डाल दें और उसमें सर्पविष के चतुर्थांश सरसों का तैल मिलाकर धूप में सूखने को रख दें। धूप में सूखने पर यह पीले रंग का हो जाता है। इसको सावधानी से रख लें। इस विधि से कृष्णसर्प का विष उत्तम रूप से शुद्ध हो जाता है ॥ ५३६, ५३७ ॥ कृष्णसर्पविषस्य गुणाः कृष्णसर्पविषं तीक्ष्णं महोष्णमतिदारुणम् । पित्तप्रकोपणकरं तथा दाहकरं परम् ॥ ५३८ ॥ आसन्नमृत्युकालोत्थं संज्ञालोपप्रणाशनम् । श्वासकृच्छ्रप्रशमनं तथा श्लेष्मविशोषणम् ॥ ५३६ ॥ हृद्दौर्बल्यसमुद्भूतं महात्ययिक लक्षणम् । अवसादं निहन्त्याशु निश्चितं करणाश्रितम् ॥ ५४० ॥ प्रणश्यन्नाडिकां घोरां शीतपादकरान्विताम् । श्वासकृच्छादिसंयुक्तां विनिहन्ति विषूचिकाम् ॥ ५४१ ॥ निरुक्तलक्षणोपेतं सन्निपातं व्यपोहति । शीतांगसन्निपातोत्थं हृदुत्तेजनकृत्परम् ॥ ५४२ ॥ शीतगात्रश्वासकृच्छ्रप्रणाश्यन्नाडिकादिषु ।

सन्निपातसमाकारलक्षणेषु भवत्सु तु ॥ ५४३ ॥ अन्येष्वपि च रोगेषु नूत्नेष्वात्ययिकेषु च । कारस्करसमायुक्तैः प्रयोगैर्विविधैस्तथा ॥ ५४४ ॥ कस्तूरीभैरवाद्यैश्च न सिद्ध्यन्ति गदा यदा । निष्फला स्याद् यदा चैव मृतसञ्जीवनी सुरा ॥ ५४५ ॥ तदैव कृष्णसर्पस्य विषं योगेषु योजितम् । प्रयुञ्जीत भिषग्वर्यः सावधानतया सदा ॥ ५४६ ॥ कृष्णसर्पविषगुणाः-आसन्ने मृत्युकाले समुत्थो यः संज्ञालोपः तस्य प्रणा- शनम् । करणाश्रितम् इन्द्रियाश्रयम्, निरुक्तलक्षणमिति संज्ञालोपश्वासकृच्छ्रेन्द्रि- यावसादप्रणाश्यन्नाडिकादिकम् । कस्तूरीभैरवस्तन्त्रान्तरेषु प्रसिद्धः । तदैवेति नियमः प्रयोगयोग्यकालनियमज्ञापनार्थ । शिष्टं निगदव्याख्यातम् ॥ ५३८-५४६ ॥ भा.टी.-कृष्णसर्प का विष अत्यन्त तेज और महान् उष्ण (गरम) होता है। यह अन्तःप्रयोग में पित्तप्रकोप तथा अत्यन्त दाहकारी होता है। मृत्यु के समय जब रोगी का संज्ञानाश (बेहोश) होने लगता है तो इसके प्रयोग से वह पुनः चैतन्य लाभ करता है। श्वास निकलने में होनेवाली कठिनाई को शान्त करता और बढ़े हुए कफ को सुखा देता है। हृदय की दुर्बलता के कारण उत्पन्न अत्यन्त भयानक इन्द्रियों के अवसाद (शिथिलता) अर्थात् हृदयकावरोध को वह शीघ्र ही दूर करता है। विसूचिका में जब नाड़ी नहीं चलती हो और हाथ- पैर बिलकुल ठंडे हो गये हों तथा श्वास बड़ी कठिनाई से आनेवाला हो तो इसके प्रयोग से सब उपद्रव नष्ट होकर रोगी बच जाता है। उक्त लक्षणयुक्त अर्थात्-संज्ञानाश, श्वासकृच्छ्रता, इन्द्रियशैथिल्य, नाड़ी-अवरोध आदि लक्षण- युक्त सन्निपात को या शीतांग सन्निपात को यह नष्ट करता है और नाड़ी की गति को उत्तेजित करता है। सन्निपातज्वरों के अतिरिक्त शीतांग, श्वासकष्ट, नाड़ीलोप आदि सन्निपात के जैसे लक्षणों से युक्त, अन्य महाभयंकर नूतन रोगों के होने पर इस विष को प्रयोग में लाने से शीघ्र लाभ होता है। इसी तरह उन रोगों में जिनमें कुचलायोग तथा कस्तूरी के योग जैसे कस्तूरीभैरव वृहत् कस्तूरीभैरव आदि योगों से कोई लाभ नहीं हुआ हो अथवा जहाँ पर मृतसञ्जी- वनी सुरा का प्रयोग भी निष्फल हो तो ऐसी अवस्थाओं में भी कृष्णसर्पविष को बड़ी सावधानी के साथ योगों में मिलाकर प्रयोगों में लाना चाहिए ॥५३८-५४६॥

चतुर्विंशस्तरङ्गः ७४६ कृष्णसर्पविषस्य निषेधः न बालेषु न वृद्धेषु न तथा राजयक्ष्मिषु । न संन्यासे न मूर्च्छायां न जीर्णज्वरजर्जरे ॥५४७॥ जीर्णामयप्रजीर्णेषु रक्तपित्तिषु नैव च । न क्षीणेषु प्रयुञ्जीत कृष्णसर्पविषं भिषक् ॥५४८॥ सर्वविषप्रयोगनिषेधे—जीर्णामयप्रजीर्णेष्विति जीर्णव्याधिभिः क्षीणमल- मांसादिषु ॥५४७,५४८॥ भा.टी.—कृष्णसर्पविष का सेवन बालकों, वृद्धों तथा राजयक्ष्मा के रोगियों को नहीं करना चाहिए। इसी तरह संन्यासरोग, मूर्च्छा तथा जीर्णज्वर के कारण अत्यन्त दुर्बल कृशशरीर रोगी को इसका सेवन नहीं करना चाहिए। ऐसे रोगियों को भी जो पुराने रोग के कारण बहुत जीर्णशरीर हो गये हों, जिनको रक्तपित्तरोग हो अथवा जो अतिव्यवाय (मैथुन) आदि से क्षीणशरीर हो चुके हों उनको भी कृष्णसर्पविष सेवन नहीं करना चाहिए ॥५४७,५४८॥ कृष्णसर्पविषस्य आमयिकः प्रयोगः । सूचिकाभरणरसः कृष्णसर्पविषं शुद्धं माषकद्वयसंमितम् । रसाहिगन्धकविषं पृथङ् माषद्वयात्मकम् ॥५४६॥ छागमायूरवाराहमात्स्यपित्तैस्तु पेषयेत् । संमर्द्यार्द्रकतोयेन यामैकमितयत्नतः ॥५५०॥ कारयेद्वटिका वैद्यः क्षुद्रसर्षपसंमिताः । समाख्यातो रसोऽयं तु सूचिकाभरणाह्वयः ॥५५१॥ सन्निपातसमाक्रान्तलोकानुग्रहकाम्यया । आविष्कृतो रसोऽयं तु भैरवेण महात्मना ॥५५२॥ क्षतादिवर्जितकरस्तथा नीचनखः पटुः । वटीनिर्मापकश्चास्य कर्तव्यः परिचारकः ॥५५३॥ रसं नखान्तरलग्नमपनीय शलाकया । प्रक्षालयेत्करौ कामं भूयो भूयो मलारिणा ॥५५४॥ सूचिकाभरणरसः—रसः पारदः, अहिः नागः, विषं अमृतम् । भैरवेण तदाख्येन रससिद्धेन । क्षतादिवर्जितकर इति विषसंचारो यथा न स्यात् शरीरे मलारिणा फेनकेन ‘Soap’ इत्याङ्गलभाषाप्रसिद्धेन ॥५४६-५५४॥

७५० रस्तरङ्गिणी भा.टी.- शुद्ध कृष्णसर्पविष दो मासा, शुद्ध पारद, नागभस्म, शुद्ध गन्धक, शुद्ध वत्सनाभ, दो-दो मासा लेवें । पहिले पारे और गन्धक की अच्छी तरह कज्जली करलें । अब इसमें अन्य द्रव्यों को मिलाकर इसको बकरी के पित्त, मोर के पित्त, सूअर के पित्त तथा मछली के पित्त से पृथक्-पृथक् तीन घंटे मर्दन करें, अन्त में तीन घंटे अदरक के रस के साथ मर्दन करें । जब गोली बनाने योग्य हो जाय तो इसकी बड़ी सावधानी से छोटी सरसों के बरा- बर गोलियाँ बनालें । इसको सूचिकाभरणरस कहते हैं । इस रस को महात्मा भैरव ने सन्निपातरोग पीड़ित सांसारिक लोगों के कष्टनिवारणार्थ आविष्कृत किया है । इस रस को घोटनेवाला तथा गोली बनानेवाला परिचारक (औषधिनिर्माता) बहुत समझदार होना चाहिए । उसके हाथों में कहीं भी किसी प्रकार का क्षत (घाव) नहीं होना चाहिए और इसके निर्माण के समय उसके नाखून बढ़े हुए न होने चाहिये । क्योंकि क्षत में सर्पविष पहुँचकर सर्पदंश के लक्षण उदय करके गोली बनानेवाले की मृत्यु कर सकता है । अतः गोली बनाने के बाद नाखूनों के भीतर लगे हुए इस रस को किसी सींक से अच्छी तरह निकालकर हाथों को अच्छी तरह साबुन से कई बार धोकर साफ कर लेना चाहिए ॥५४६-५५४॥ अस्य गुणाः सूचिकाभरणो ह्येष सन्निपातविनाशनः । विषूचिकाहरः कामं श्वासकृच्छ्रापहः परम् ॥५५५॥ कृष्णस्याहेर्विषगुणनिर्दिष्टेषु च लद्मसु । प्रयुञ्जीत विशेषेण रसतन्त्रात्रिचक्षणः ॥५५६॥ रसोऽयं खलु दातव्यः शृङ्गवेरस्य वारिणा । आरक्तास्यश्च रक्ताक्षस्तीव्रतापयुतो यदि ॥५५७॥ न स्याद्रोगी तु होरार्द्धे वटीं दद्यात्ततोऽपराम् । दध्योदनं च दातव्यं पथ्यमत्र विजानता ॥५५८॥ आरक्ताक्षं रक्तवक्त्रं तीव्रतापसमन्वितम् । विज्ञाय रोगिणं वैद्यः स्नपयेच्छीतलाम्बुना ॥५५९॥ शीताम्बुसिक्तवस्त्रेण भूयो भूयः प्रयत्नतः । आच्छादयेन्मस्तकं तु व्यथादाहप्रणुत्तये ॥५६०॥ कृष्णसर्पविषशायत्र तीव्रतापादिकेषु तु । समुत्पन्नेषु चिह्नेषु न युञ्जीत पुन रसम् ॥५६१॥

चतुर्विंशस्तरङ्गः ७५१ कृष्णसर्पविषोपेतरसेषु तु विशेषतः । एष एव विधिः कार्यो रसतन्त्रविशारदैः ॥५६२॥ भा.टी.—यह सूचिकाभरण-रस सन्निपातज्वरनाशक, विसूचिकारोगहर और श्वासकृच्छ्रतानिवारक है। काले सर्प के काटनेपर होनेवाले विष लक्षणयुक्त अव- स्थाओं में वैद्य को इस रस का विशेष रूप से प्रयोग करना चाहिए । इस रस को अदरख के स्वरस के साथ देना चाहिए। यदि इस रस की एक वटी सन्निपात पीड़ित रोगी को देनेपर वह आधे घंटे में रक्तवर्णमुख, रक्तनेत्र तथा तीव्र तापयुक्त न हो तो इस रस की दूसरी गोली अदरख के साथ देनी चाहिए । इस रस के सेवन में रोगी को दही और भात पथ्य में देना चाहिए। यदि इस रस के प्रयोग से रोगी तीव्रताप, रक्तमुख तथा रक्तनेत्रयुक्त हो जाय तो पित्त को शान्त करने के लिये उसे ठण्डे पानी से स्नान कराना चाहिए । इसके सेवन से होनेवाली व्यथा तथा गरमी को शान्त करने के लिये रोगी के मस्तक पर ठण्डे जल में कपड़ा निचोड़कर बार-बार रखना चाहिए । इस रस के प्रयोग करने पर यदि कृष्ण- सर्पविष के लक्षण तीव्रताप, रक्तमुख, रक्तनेत्र आदि उदय हो जायँ तो फिर इस रस की मात्रा नहीं देनी चाहिए। इसी तरह कृष्णसर्पविषयुक्त अन्य रसों के प्रयोग में भी यही अनुपान पथ्य तथा शीत उपचार करना चाहिए ॥५५५-५६२॥ द्वितीयः सूचिकाभरणरसः विषं सर्पविषं शङ्खविषं माषमितं पृथक् । विशोधितं हिङ्गुलञ्च माषकत्रयसंमितम् ॥५६३॥ सम्पेथ्य पञ्चपित्तेन वटिकाः सर्षपोन्मिताः । निर्माय विनियुञ्जीत सावधानतया भिषक् ॥५६४॥ रसोऽयं तु समाख्यातः सूचिकाभरणाह्वयः । तत्तन्निर्दिष्टरोगेषु पूर्ववद् गुणकारकः ॥५६५॥ अथापरः सूचिकाभरणः—विषं वत्सनाभः, शङ्खविषं श्वेतमल्लविषम् । पञ्चपित्तेनेति। पञ्चपित्तं यथा—"वराहच्छागमहिषमत्स्यमायूरपित्तकम् । पञ्चपित्त- मिति ख्यातं सर्वेष्वेव हि कर्मसु” ॥५६३–५६५ ॥ भा.टी.—शुद्ध वत्सनाभविष, सर्पविष, शुद्ध संखिया, प्रत्येक एक-एक मासा, शुद्ध हिंगुल तीन मासा लेवें । इन सब को एक खरल में डालकर पञ्च- पित्तों के साथ अच्छी तरह मर्दन करें। जब गोली बनाने योग्य हो जाय तो इसकी सरसों के बराबर गोलियाँ बना लें। इस रस को सूचिकाभरण रस कहते

[९२] रसतरङ्गिणी हैं। पूर्वोक्त सूचिकाभरणवाले रोगों अथवा अवस्थाओं में यह रस गुणकारक माना जाता है ॥५६३-५६५॥ विषूचीध्वंसनरसः कृष्णसर्पविषं शुद्धं विषं पारदगन्धकम् । सौभाग्यं नागरं ताप्यं मृतं माषमितं पृथक् ॥५६६॥ विशोधितं च दरदं सर्वेषां समभागिकम् । समादाय ततः खल्वे मर्दयेन्निम्बुकाम्भसा ॥५६७॥ वटिकाः कारयेद्वैद्यः श्वेतसर्षपसंमिताः । रसोऽयं तु समाख्यातो विषूचीध्वंसनाह्वयः ॥५६८॥ विषूचीध्वंसनरसो विषूचीविनिषूदनः । शीतपादकरायग्रलक्षणेषु सुखावहः ॥५६६॥ सूचिकाभरणोद्दिष्टविधानेन भिषग्वरः । विषूचीध्वंसनरसं प्रयुञ्जीत प्रयत्नतः ॥५७०॥ विषूचीध्वंसनरसः—ताप्यं माक्षिकम्, दरदं हिंगुलम् । स्पष्टमन्यत् ॥ भा.टी—शुद्ध कृष्णसर्पविष, शुद्ध वत्सनाभ,, शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, सुहागा, सोंठ का चूर्ण, स्वर्णमाक्षिकभस्म, प्रत्येक एक-एक मासा और शुद्ध हिंगुल, इन सब के बराबर भाग लें । पहिले पारे गन्धक तथा हिंगुल को एकत्र घोंटकर उसकी कज्जली बना लें । फिर इसमें अन्य द्रव्यों का चूर्ण मिलाकर एक खरल में नींबू के रस के साथ खूब अच्छी तरह से मर्दन करें । जब गोली बनाने योग्य हो जाय तो इसको सफेद सरसों के बराबर गोलियाँ बनाकर रख लें । इसको विषूचीध्वंसन रस कहते हैं । यह विसूचिका (हैजा) रोग को नष्ट करता है । यह रस विसूचिका की उस अवस्था में विशेष लाभदायक है जब कि रोगी के हाथ पैर ठण्डे हो गये हों, मुख पीला पड़ गया हो और नाड़ी नहीं मिलती हो । वैद्य को इस रस का प्रयोग सूचिकाभरणरस के समान ही करना चाहिए । अर्थात् पथ्य तथा उपचार सब शीत करने चाहिए ॥५६६-५७०॥ मृतसञ्जीवनरसः कृष्णसर्पविषं शुद्धं विषं ताप्यं च टङ्कणम् । दरदं रसगन्धं च तालं माषमितं पृथक् ॥५७१॥ छागमायूरवाराहमात्स्यपित्तेन भावयेत् । निर्मापयेत्तु वटिकाः क्षुद्रसर्षपसंमिताः ॥५७२॥