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रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

७४४ रसतरङ्गिणी स्नुहीक्षीरस्य शोधनम् पलद्वयं सुधादुग्धं तोलकद्वयसंमिते । चिञ्चादलद्रवे वस्त्रपूते घर्मे विशोषयेत् ॥५१७॥ द्रवं विशुष्कं विज्ञाय सुधादुग्धं समाहरेत् । ततः सर्वत्र योगेषु प्रयुञ्जीत भिषग्वरैः ॥५१८॥ प्रथमशोधनप्रकारे चिञ्चा अम्लिका, तस्याः पत्ररसो ग्राह्यः । केचित्तु “अर्क- सेहुण्डयोर्दुग्धं तत्स्वयं शुद्धमुच्यते” इत्यप्याहुः ॥५१७, ५१८॥ भा.टी.—दो पल थोहर के दूध को, कपड़छान किये इमली के पत्तों के दो तोले रस में धूप में रखकर सुखा लें । जब द्रवांश सूख जाय तो शुद्ध थोहर के दूध को रख लें और सब जगह प्रयोग करें ॥५१७,५१८॥ स्नुहीक्षीरस्य गुणाः सुधादुग्धं वातहरं गुल्मोदरविनाशनम् । विषाध्मानहरं चैव गुदांकुरहरं परम् ॥५१६॥ परं विरेचनकरं पुष्पकृच्चाक्षिमध्यगम् । समाख्यातं विशेषेण क्षारकर्मकरं परम् ॥५२०॥ गुणपाठे—पुष्पकृच्चाक्षिमध्यगमिति । अक्षिमध्यपतितं पुष्पाख्यं "फुला" इतिख्यातं रोगं करोति ॥५१६,५२०॥ भा.टी.—थोहर का दूध वातहर तथा गुल्म और उदररोग नाशक है। विष प्रभाव तथा आध्मान और गुदांकुर (मस्से) को नष्ट करने में उत्तम प्रभाव रखता है । अंतःप्रयोग में यह अत्यन्त विरेचक है। यदि यह आँख में पड़ जाय तो इससे आँख में फूला पड़ जाता है और बाहर किसी स्थान पर लगाने पे क्षारकर्म (जलानेवाला) करता है ॥५१६, ५२०॥ अस्य आमयिकः प्रयोगः सुधादुग्धं निशाकोषातकी सैन्धवसंयुतम् । गोमूत्रेण प्रलिप्तं तु पातयेद् गुदजांकुरान् ॥५२१॥ भा.टी.—हरिद्रा, खेखसा, सेंधानमक के साथ थूहर का दूध गोमूत्र में मिलाकर अर्श पर लेप किया जाय तो अर्शाङ्कुर दूर होता है ॥५२१॥ क्षारवर्तिका चूर्णं दारुहरिद्रायास्तोलकैकमितं हरेत् । मासाद्धं पेषयेद्द्वारा निदाघे खलु शोषयेत् ॥५२२॥

चतुर्विंशस्तरङ्गः ७४५ समांशिके सुधादुग्धे रविदुग्धे च तन्मिते । निक्षिप्य खलु खल्वेऽथ पेषयेदति यत्नतः ॥५२३॥ विज्ञाय वर्तिकायोग्यं रसतन्त्रविशारदः । दीर्घा एषणिकाकारा वर्तिकाः कारयेत्ततः ॥५२४॥ समाख्याता भिषग्वर्यैर्नामतः क्षारवर्तिकाः । भगन्दरमहाघोरनाडीव्रणविशोधिकाः ॥५२५॥ वर्तिकेयं सुविन्यस्ता प्रयत्नेन भगन्दरे । नाडीव्रणान्तराले च खलु शोधयति द्रुतम् ॥५२६॥ रोगयोग्यप्रयोगे क्षारवर्तिका—मासार्धे पञ्चदशदिनानि । एतावत्कालं पेष- णञ्च सुश्लक्ष्णतासम्पादनाय । निगदव्याख्यातमन्यत् ॥५२२-५२६॥ भा.टी.—दारुहल्दी का चूर्ण एक तोला लेकर इसको खरल में डालकर जल के साथ पन्द्रह दिन तक अच्छी तरह मर्दन करके धूप में सुखा लें। अब इसमें एक तोला थोहर का दूध और एक तोला आक का दूध मिलाकर खरल में फिर मर्दन करें, जब बत्ती बनाने योग्य हो जाय तो इसकी लम्बी-लम्बी सींक की तरह की बत्तियाँ बना लें। इनको क्षारवर्ति कहा जाता है और ये भग- न्दर तथा भयंकर नाड़ीव्रण को शुद्ध करने के काम आती हैं। इन वर्त्तियों की भगन्दर में अथवा नाड़ीव्रण के भीतर अच्छी तरह रखा जाय तो इससे शीघ्र ही व्रण शुद्ध हो जाते हैं ॥५२२-५२६॥ क्षारसूत्रम् सुधादुग्धे वस्त्रपूतहरिद्राचूर्णसंयुते । निक्षिप्तेन तु तूलेन स्वल्पेन खलु यत्नतः ॥५२७॥ प्रलिप्तं सुदृढं सूत्रं छायायामथ शोषयेत् । विलिप्य सप्तधा ह्येवं शोषयेद् भिषजां वरः ॥५२८॥ सूत्रमेतत्समाख्यातं क्षारसूत्रं तु नामतः । गुदांकुरच्छेदनार्थममोघास्त्रमिदं मतम् ॥५२६॥ भगन्दरच्छेदनार्थमप्येतद्विनियुज्यते । प्रयोक्तव्यं क्षारसूत्रं सावधानतया सदा ॥५३०॥ क्षारसूत्रम्—वस्त्रपूतहरिद्राचूर्णाक्ते सेहुण्डदुग्धे सिक्तेन स्वल्पेन तूलकेन सुदृढं तनु वर्तितं सूत्रमादाय लेपयेत् । एवं सप्तधा शुष्कं तच्छेदने-समर्थं भवति । प्रयोगकाले सावधानता न्यूनाधिकच्छेदभयात् । क्षारसूत्रबन्धनं च यावच्छेदो न

७४६ रसतरङ्गिणी स्यात् तावत् प्रतितृतीयमहः ईषद्गाढतरीक्रियते ॥५२७-५३०॥ भा.टी.—थोहर के दूध में कपड़छन हल्दी का चूर्ण मिलाकर इसमें एक दृढ़ सूत्र (तागा) भिगोकर छाया में सुखा लें, जब अच्छी तरह सूख जाय तो इसे फिर उक्त हरिद्राचूर्ण युक्त थोहर के दूध से लेप करके छाया में सुखा लें। इस प्रकार सात बार लेपकर सुखा लें। इसे क्षारसूत्र के नाम से कहा जाता है। बवासीर के मस्सों को काटने के लिए यह अचूक साधन है। इसी को भगन्दर के छेदन करने के लिए भी काम में लाया जाता है। परन्तु इसके प्रयोग में बड़ी सावधानी से काम लेना चाहिए ॥५२७-५३०॥ अथ कृष्णसर्पविषस्य नामानि कृष्णसर्पविषं चैव गरलं दारदं तथा। जङ्गमविष इत्येते नामख्याता भिषग्वरैः ॥५३१॥ भा.टी.—कृष्णसर्पविष, गरल, दारद तथा जंगमविष, ये सब नाम साँप के विष के कहे जाते हैं ॥५३१॥ कृष्णसर्पविषस्य आहरणविधिः शुक्तिकां तालपत्रेण खर्जूरस्य दलेन वा। आच्छाद्य सर्वतो दीर्घयष्टिकायां तु बन्धयेत् ॥५३२॥ कृष्णसर्पो यथा रोषात् तालपत्रे दशेत्तथा। विदध्यात् कृष्णसर्पस्य सन्मुखं यष्टिकामिमाम् ॥५३३॥ निदध्यात्तावदेवं तु बहुवारं दशेद्यथा। शुक्तिकासञ्चितं सर्पविषं त्वथ समाहरेत् ॥५३४॥ पुनः पुनः कृष्णसर्पं रोषयन् भिषजां वरः। समाहरेद्विषं त्वेवं सावधानतया सदा ॥५३५॥ विषाहरणप्रकारः शिष्यबुद्धिवैशद्याय। वाग्भटस्तु प्रकारान्तरमामम्नौ। तत्तु बहुलमनुपयुक्तत्वात् उपेक्षितम्। नवीनोद्भावितञ्च बहुगुणसुलभं प्रकटितमिति ॥५३२-५३५॥ भा.टी. - एक शुक्ति (सीप) को ताड़ के पत्ते अथवा खजूर के पत्ते से अच्छी तरह चारों तरफ से ढक कर बाँध लें। अब इस सीप को एक लम्बी लाठी या बाँस में बाँध लें। इस शुक्तिका युक्त लाठी के सामने आने और बँधी हुई सीप को देखने से काला साँप जैसे क्रोध में आवे उसी तरह इस लाठी को साँप के मुख के आगे कर दें। इस तरह जितनी बार काला साँप क्रोध में आकर इस सीप के ऊपर अपना डंक मारे उतनी ही बार इसको उसके आगे कर देना चाहिए।

चतुर्विंशस्तरङ्गः ७४७ इस तरह करने से सीप में सर्प का विष सञ्चित पाया जायगा। इस विष को बड़ी सावधानी के साथ लेकर सुरक्षित कर लें ॥ ५३२-५३५ ॥ वक्तव्य—फण वाले या दर्वीकर सर्प की विषैली दाढ़ में से विष को निकाल कर सुखा लिया जाता है। इसके निकालने की क्रिया सपेरे या गारुड़िये या कञ्जर लोग अच्छी तरह जानते हैं। यह विषद्रव कुछ पीला भूरा-सा होता है। सुखाने पर इसमें से ५० या ७५% प्रतिशत जल का भाग उड़ जाता है और पहिले भूरे रंग का चूर्ण-सा रह जाता है जो कभी नहीं बिगड़ता है। कृष्णसर्पविषस्य शोधनम् तैलाक्तशुक्तिकामध्येसञ्चिते जङ्गमे विषे । पादांशं सार्षपं तैलं न्यस्य घर्मे विशोषयेत् ॥ ५३६ ॥ जायते पीतवर्णं तन्निदाघे परिशोषितम् । कृष्णसर्पविषं त्वेवं शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥ ५३७ ॥ भा.टी.—एक सीप में थोड़ा-सा तेल चुपड़कर उसमें उक्त प्रकार से सञ्चित सर्पविष डाल दें और उसमें सर्पविष के चतुर्थांश सरसों का तैल मिलाकर धूप में सूखने को रख दें। धूप में सूखने पर यह पीले रंग का हो जाता है। इसको सावधानी से रख लें। इस विधि से कृष्णसर्प का विष उत्तम रूप से शुद्ध हो जाता है ॥ ५३६, ५३७ ॥ कृष्णसर्पविषस्य गुणाः कृष्णसर्पविषं तीक्ष्णं महोष्णमतिदारुणम् । पित्तप्रकोपणकरं तथा दाहकरं परम् ॥ ५३८ ॥ आसन्नमृत्युकालोत्थं संज्ञालोपप्रणाशनम् । श्वासकृच्छ्रप्रशमनं तथा श्लेष्मविशोषणम् ॥ ५३६ ॥ हृद्दौर्बल्यसमुद्भूतं महात्ययिक लक्षणम् । अवसादं निहन्त्याशु निश्चितं करणाश्रितम् ॥ ५४० ॥ प्रणश्यन्नाडिकां घोरां शीतपादकरान्विताम् । श्वासकृच्छादिसंयुक्तां विनिहन्ति विषूचिकाम् ॥ ५४१ ॥ निरुक्तलक्षणोपेतं सन्निपातं व्यपोहति । शीतांगसन्निपातोत्थं हृदुत्तेजनकृत्परम् ॥ ५४२ ॥ शीतगात्रश्वासकृच्छ्रप्रणाश्यन्नाडिकादिषु ।

सन्निपातसमाकारलक्षणेषु भवत्सु तु ॥ ५४३ ॥ अन्येष्वपि च रोगेषु नूत्नेष्वात्ययिकेषु च । कारस्करसमायुक्तैः प्रयोगैर्विविधैस्तथा ॥ ५४४ ॥ कस्तूरीभैरवाद्यैश्च न सिद्ध्यन्ति गदा यदा । निष्फला स्याद् यदा चैव मृतसञ्जीवनी सुरा ॥ ५४५ ॥ तदैव कृष्णसर्पस्य विषं योगेषु योजितम् । प्रयुञ्जीत भिषग्वर्यः सावधानतया सदा ॥ ५४६ ॥ कृष्णसर्पविषगुणाः-आसन्ने मृत्युकाले समुत्थो यः संज्ञालोपः तस्य प्रणा- शनम् । करणाश्रितम् इन्द्रियाश्रयम्, निरुक्तलक्षणमिति संज्ञालोपश्वासकृच्छ्रेन्द्रि- यावसादप्रणाश्यन्नाडिकादिकम् । कस्तूरीभैरवस्तन्त्रान्तरेषु प्रसिद्धः । तदैवेति नियमः प्रयोगयोग्यकालनियमज्ञापनार्थ । शिष्टं निगदव्याख्यातम् ॥ ५३८-५४६ ॥ भा.टी.-कृष्णसर्प का विष अत्यन्त तेज और महान् उष्ण (गरम) होता है। यह अन्तःप्रयोग में पित्तप्रकोप तथा अत्यन्त दाहकारी होता है। मृत्यु के समय जब रोगी का संज्ञानाश (बेहोश) होने लगता है तो इसके प्रयोग से वह पुनः चैतन्य लाभ करता है। श्वास निकलने में होनेवाली कठिनाई को शान्त करता और बढ़े हुए कफ को सुखा देता है। हृदय की दुर्बलता के कारण उत्पन्न अत्यन्त भयानक इन्द्रियों के अवसाद (शिथिलता) अर्थात् हृदयकावरोध को वह शीघ्र ही दूर करता है। विसूचिका में जब नाड़ी नहीं चलती हो और हाथ- पैर बिलकुल ठंडे हो गये हों तथा श्वास बड़ी कठिनाई से आनेवाला हो तो इसके प्रयोग से सब उपद्रव नष्ट होकर रोगी बच जाता है। उक्त लक्षणयुक्त अर्थात्-संज्ञानाश, श्वासकृच्छ्रता, इन्द्रियशैथिल्य, नाड़ी-अवरोध आदि लक्षण- युक्त सन्निपात को या शीतांग सन्निपात को यह नष्ट करता है और नाड़ी की गति को उत्तेजित करता है। सन्निपातज्वरों के अतिरिक्त शीतांग, श्वासकष्ट, नाड़ीलोप आदि सन्निपात के जैसे लक्षणों से युक्त, अन्य महाभयंकर नूतन रोगों के होने पर इस विष को प्रयोग में लाने से शीघ्र लाभ होता है। इसी तरह उन रोगों में जिनमें कुचलायोग तथा कस्तूरी के योग जैसे कस्तूरीभैरव वृहत् कस्तूरीभैरव आदि योगों से कोई लाभ नहीं हुआ हो अथवा जहाँ पर मृतसञ्जी- वनी सुरा का प्रयोग भी निष्फल हो तो ऐसी अवस्थाओं में भी कृष्णसर्पविष को बड़ी सावधानी के साथ योगों में मिलाकर प्रयोगों में लाना चाहिए ॥५३८-५४६॥

चतुर्विंशस्तरङ्गः ७४६ कृष्णसर्पविषस्य निषेधः न बालेषु न वृद्धेषु न तथा राजयक्ष्मिषु । न संन्यासे न मूर्च्छायां न जीर्णज्वरजर्जरे ॥५४७॥ जीर्णामयप्रजीर्णेषु रक्तपित्तिषु नैव च । न क्षीणेषु प्रयुञ्जीत कृष्णसर्पविषं भिषक् ॥५४८॥ सर्वविषप्रयोगनिषेधे—जीर्णामयप्रजीर्णेष्विति जीर्णव्याधिभिः क्षीणमल- मांसादिषु ॥५४७,५४८॥ भा.टी.—कृष्णसर्पविष का सेवन बालकों, वृद्धों तथा राजयक्ष्मा के रोगियों को नहीं करना चाहिए। इसी तरह संन्यासरोग, मूर्च्छा तथा जीर्णज्वर के कारण अत्यन्त दुर्बल कृशशरीर रोगी को इसका सेवन नहीं करना चाहिए। ऐसे रोगियों को भी जो पुराने रोग के कारण बहुत जीर्णशरीर हो गये हों, जिनको रक्तपित्तरोग हो अथवा जो अतिव्यवाय (मैथुन) आदि से क्षीणशरीर हो चुके हों उनको भी कृष्णसर्पविष सेवन नहीं करना चाहिए ॥५४७,५४८॥ कृष्णसर्पविषस्य आमयिकः प्रयोगः । सूचिकाभरणरसः कृष्णसर्पविषं शुद्धं माषकद्वयसंमितम् । रसाहिगन्धकविषं पृथङ् माषद्वयात्मकम् ॥५४६॥ छागमायूरवाराहमात्स्यपित्तैस्तु पेषयेत् । संमर्द्यार्द्रकतोयेन यामैकमितयत्नतः ॥५५०॥ कारयेद्वटिका वैद्यः क्षुद्रसर्षपसंमिताः । समाख्यातो रसोऽयं तु सूचिकाभरणाह्वयः ॥५५१॥ सन्निपातसमाक्रान्तलोकानुग्रहकाम्यया । आविष्कृतो रसोऽयं तु भैरवेण महात्मना ॥५५२॥ क्षतादिवर्जितकरस्तथा नीचनखः पटुः । वटीनिर्मापकश्चास्य कर्तव्यः परिचारकः ॥५५३॥ रसं नखान्तरलग्नमपनीय शलाकया । प्रक्षालयेत्करौ कामं भूयो भूयो मलारिणा ॥५५४॥ सूचिकाभरणरसः—रसः पारदः, अहिः नागः, विषं अमृतम् । भैरवेण तदाख्येन रससिद्धेन । क्षतादिवर्जितकर इति विषसंचारो यथा न स्यात् शरीरे मलारिणा फेनकेन ‘Soap’ इत्याङ्गलभाषाप्रसिद्धेन ॥५४६-५५४॥

७५० रस्तरङ्गिणी भा.टी.- शुद्ध कृष्णसर्पविष दो मासा, शुद्ध पारद, नागभस्म, शुद्ध गन्धक, शुद्ध वत्सनाभ, दो-दो मासा लेवें । पहिले पारे और गन्धक की अच्छी तरह कज्जली करलें । अब इसमें अन्य द्रव्यों को मिलाकर इसको बकरी के पित्त, मोर के पित्त, सूअर के पित्त तथा मछली के पित्त से पृथक्-पृथक् तीन घंटे मर्दन करें, अन्त में तीन घंटे अदरक के रस के साथ मर्दन करें । जब गोली बनाने योग्य हो जाय तो इसकी बड़ी सावधानी से छोटी सरसों के बरा- बर गोलियाँ बनालें । इसको सूचिकाभरणरस कहते हैं । इस रस को महात्मा भैरव ने सन्निपातरोग पीड़ित सांसारिक लोगों के कष्टनिवारणार्थ आविष्कृत किया है । इस रस को घोटनेवाला तथा गोली बनानेवाला परिचारक (औषधिनिर्माता) बहुत समझदार होना चाहिए । उसके हाथों में कहीं भी किसी प्रकार का क्षत (घाव) नहीं होना चाहिए और इसके निर्माण के समय उसके नाखून बढ़े हुए न होने चाहिये । क्योंकि क्षत में सर्पविष पहुँचकर सर्पदंश के लक्षण उदय करके गोली बनानेवाले की मृत्यु कर सकता है । अतः गोली बनाने के बाद नाखूनों के भीतर लगे हुए इस रस को किसी सींक से अच्छी तरह निकालकर हाथों को अच्छी तरह साबुन से कई बार धोकर साफ कर लेना चाहिए ॥५४६-५५४॥ अस्य गुणाः सूचिकाभरणो ह्येष सन्निपातविनाशनः । विषूचिकाहरः कामं श्वासकृच्छ्रापहः परम् ॥५५५॥ कृष्णस्याहेर्विषगुणनिर्दिष्टेषु च लद्मसु । प्रयुञ्जीत विशेषेण रसतन्त्रात्रिचक्षणः ॥५५६॥ रसोऽयं खलु दातव्यः शृङ्गवेरस्य वारिणा । आरक्तास्यश्च रक्ताक्षस्तीव्रतापयुतो यदि ॥५५७॥ न स्याद्रोगी तु होरार्द्धे वटीं दद्यात्ततोऽपराम् । दध्योदनं च दातव्यं पथ्यमत्र विजानता ॥५५८॥ आरक्ताक्षं रक्तवक्त्रं तीव्रतापसमन्वितम् । विज्ञाय रोगिणं वैद्यः स्नपयेच्छीतलाम्बुना ॥५५९॥ शीताम्बुसिक्तवस्त्रेण भूयो भूयः प्रयत्नतः । आच्छादयेन्मस्तकं तु व्यथादाहप्रणुत्तये ॥५६०॥ कृष्णसर्पविषशायत्र तीव्रतापादिकेषु तु । समुत्पन्नेषु चिह्नेषु न युञ्जीत पुन रसम् ॥५६१॥

चतुर्विंशस्तरङ्गः ७५१ कृष्णसर्पविषोपेतरसेषु तु विशेषतः । एष एव विधिः कार्यो रसतन्त्रविशारदैः ॥५६२॥ भा.टी.—यह सूचिकाभरण-रस सन्निपातज्वरनाशक, विसूचिकारोगहर और श्वासकृच्छ्रतानिवारक है। काले सर्प के काटनेपर होनेवाले विष लक्षणयुक्त अव- स्थाओं में वैद्य को इस रस का विशेष रूप से प्रयोग करना चाहिए । इस रस को अदरख के स्वरस के साथ देना चाहिए। यदि इस रस की एक वटी सन्निपात पीड़ित रोगी को देनेपर वह आधे घंटे में रक्तवर्णमुख, रक्तनेत्र तथा तीव्र तापयुक्त न हो तो इस रस की दूसरी गोली अदरख के साथ देनी चाहिए । इस रस के सेवन में रोगी को दही और भात पथ्य में देना चाहिए। यदि इस रस के प्रयोग से रोगी तीव्रताप, रक्तमुख तथा रक्तनेत्रयुक्त हो जाय तो पित्त को शान्त करने के लिये उसे ठण्डे पानी से स्नान कराना चाहिए । इसके सेवन से होनेवाली व्यथा तथा गरमी को शान्त करने के लिये रोगी के मस्तक पर ठण्डे जल में कपड़ा निचोड़कर बार-बार रखना चाहिए । इस रस के प्रयोग करने पर यदि कृष्ण- सर्पविष के लक्षण तीव्रताप, रक्तमुख, रक्तनेत्र आदि उदय हो जायँ तो फिर इस रस की मात्रा नहीं देनी चाहिए। इसी तरह कृष्णसर्पविषयुक्त अन्य रसों के प्रयोग में भी यही अनुपान पथ्य तथा शीत उपचार करना चाहिए ॥५५५-५६२॥ द्वितीयः सूचिकाभरणरसः विषं सर्पविषं शङ्खविषं माषमितं पृथक् । विशोधितं हिङ्गुलञ्च माषकत्रयसंमितम् ॥५६३॥ सम्पेथ्य पञ्चपित्तेन वटिकाः सर्षपोन्मिताः । निर्माय विनियुञ्जीत सावधानतया भिषक् ॥५६४॥ रसोऽयं तु समाख्यातः सूचिकाभरणाह्वयः । तत्तन्निर्दिष्टरोगेषु पूर्ववद् गुणकारकः ॥५६५॥ अथापरः सूचिकाभरणः—विषं वत्सनाभः, शङ्खविषं श्वेतमल्लविषम् । पञ्चपित्तेनेति। पञ्चपित्तं यथा—"वराहच्छागमहिषमत्स्यमायूरपित्तकम् । पञ्चपित्त- मिति ख्यातं सर्वेष्वेव हि कर्मसु” ॥५६३–५६५ ॥ भा.टी.—शुद्ध वत्सनाभविष, सर्पविष, शुद्ध संखिया, प्रत्येक एक-एक मासा, शुद्ध हिंगुल तीन मासा लेवें । इन सब को एक खरल में डालकर पञ्च- पित्तों के साथ अच्छी तरह मर्दन करें। जब गोली बनाने योग्य हो जाय तो इसकी सरसों के बराबर गोलियाँ बना लें। इस रस को सूचिकाभरण रस कहते

[९२] रसतरङ्गिणी हैं। पूर्वोक्त सूचिकाभरणवाले रोगों अथवा अवस्थाओं में यह रस गुणकारक माना जाता है ॥५६३-५६५॥ विषूचीध्वंसनरसः कृष्णसर्पविषं शुद्धं विषं पारदगन्धकम् । सौभाग्यं नागरं ताप्यं मृतं माषमितं पृथक् ॥५६६॥ विशोधितं च दरदं सर्वेषां समभागिकम् । समादाय ततः खल्वे मर्दयेन्निम्बुकाम्भसा ॥५६७॥ वटिकाः कारयेद्वैद्यः श्वेतसर्षपसंमिताः । रसोऽयं तु समाख्यातो विषूचीध्वंसनाह्वयः ॥५६८॥ विषूचीध्वंसनरसो विषूचीविनिषूदनः । शीतपादकरायग्रलक्षणेषु सुखावहः ॥५६६॥ सूचिकाभरणोद्दिष्टविधानेन भिषग्वरः । विषूचीध्वंसनरसं प्रयुञ्जीत प्रयत्नतः ॥५७०॥ विषूचीध्वंसनरसः—ताप्यं माक्षिकम्, दरदं हिंगुलम् । स्पष्टमन्यत् ॥ भा.टी—शुद्ध कृष्णसर्पविष, शुद्ध वत्सनाभ,, शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, सुहागा, सोंठ का चूर्ण, स्वर्णमाक्षिकभस्म, प्रत्येक एक-एक मासा और शुद्ध हिंगुल, इन सब के बराबर भाग लें । पहिले पारे गन्धक तथा हिंगुल को एकत्र घोंटकर उसकी कज्जली बना लें । फिर इसमें अन्य द्रव्यों का चूर्ण मिलाकर एक खरल में नींबू के रस के साथ खूब अच्छी तरह से मर्दन करें । जब गोली बनाने योग्य हो जाय तो इसको सफेद सरसों के बराबर गोलियाँ बनाकर रख लें । इसको विषूचीध्वंसन रस कहते हैं । यह विसूचिका (हैजा) रोग को नष्ट करता है । यह रस विसूचिका की उस अवस्था में विशेष लाभदायक है जब कि रोगी के हाथ पैर ठण्डे हो गये हों, मुख पीला पड़ गया हो और नाड़ी नहीं मिलती हो । वैद्य को इस रस का प्रयोग सूचिकाभरणरस के समान ही करना चाहिए । अर्थात् पथ्य तथा उपचार सब शीत करने चाहिए ॥५६६-५७०॥ मृतसञ्जीवनरसः कृष्णसर्पविषं शुद्धं विषं ताप्यं च टङ्कणम् । दरदं रसगन्धं च तालं माषमितं पृथक् ॥५७१॥ छागमायूरवाराहमात्स्यपित्तेन भावयेत् । निर्मापयेत्तु वटिकाः क्षुद्रसर्षपसंमिताः ॥५७२॥

४८ चतुर्विंशस्तरङ्गः ७५३ आसन्नमरणान् मर्त्यान् यतः सञ्जीवनाह्वयः ॥५७३॥ श्वासं प्रलापं बाधिर्यं मूकतां हिमगात्रताम् । रसोऽयं नाशयेत्तूर्णामासन्नमरणाश्रयान् ॥५७४॥ मृतसंजीवनरसः—विषं वत्सनाभः, तालं हरितालम् ।.५७१-५७४॥ भा.टी.-शुद्ध कृष्णसर्पविष, शुद्ध वत्सनाभ, स्वर्णमाक्षिक भस्म, सुहागा, शुद्ध हिंगुल, शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, शुद्ध हरताल, प्रत्येक एक एक मासा लेवें। पहले पारे गन्धक तथा हिंगुल की एकत्र कज्जली बना लें। फिर इसमें अन्य द्रव्य मिलाकर बकरी, मोर, सूअर और मछली के पित्त की पृथक्-पृथक् तीन अथवा सात भावना देवें। गोली बनाने योग्य होने पर छोटी सरसों के बराबर प्रमाण की गोलियाँ बनाकर रखलें। क्योंकि यह रस सेवन करने से बिलकुल मृत्युमुख में गये हुए मनुष्यों के जीवन की रक्षा करता है, अतः इसको मृतसञ्जीवन (मरे हुए को बचानेवाला) रस कहा जाता है। मृत्यु के समय होनेवाले तीव्र श्वास, बहिरापन, तुतलाहट और शरीर का ठण्डा हो जाना आदि उपद्रवों को शीघ्र ही नष्ट कर देता है ॥५७१-५७४॥ रक्तचित्रकशोधनम् रक्तचित्रकमूलं तु चूर्णतोये निमज्जयेत् । ततो निदाघसंशुष्कं शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥५७५॥ रक्तचित्रकमूलादिशोधनपाठाः—स्पष्टार्थाः । केचित्तु एरण्डबीजमरिच- पिप्पलीनामपि शुद्धिं स्मरन्ति--तत्र च एरण्डबीजं नारिकेलोदकेन स्विन्नं, मरिचञ्चाम्लतक्रेण भावितं, पिप्पली च चित्रकरसैः भाविता शुद्ध्यति-इति ॥५७५॥ भा.टी.—लाल चित्रक को चूने के पानी की भावना देकर धूप में सुखा लेने से शुद्धि हो जाती है ॥५७५॥ वृद्धदारकशोधनम् वृद्धदारकबीजानि दोलायन्त्रे तु यामकम् । स्विन्नानि गव्यपयसा विशुद्ध्यन्ति न संशयः ॥५७६॥ भा.टी.—विदहारे के बीजों को एक कपड़े में बांधकर पोटली बनालें, अब इस पोटली को दोलायन्त्र में गोदुग्ध भर उसमें तीन घंटे तक स्वेदन करें तो विदहाराबीज शुद्ध हो जाते हैं ॥५७६॥ वक्तव्य—कई वैद्य एरण्डबीज, कालीमिर्च, पिप्पली तथा चित्रकत्वक् की भी शुद्धि करने को कहते हैं, परन्तु साधारणरूप से इनको शुद्ध नहीं किया

७५४ रसतरङ्गिणी जाता है। यदि इनको शुद्ध करना हो तो इस विधि से शुद्ध कर सकते हैं। एरण्डबीजों को तोड़कर उनका छिलका निकालकर भीतर की मज्जा को नारियल के जल में तीन घंटे स्वेदन कर लें। कालीमिर्च को शुद्ध करना हो तो उसे खट्टे मट्ठे में दो एक दिन भिगोकर निकालकर सुखा लेना चाहिए। पिप्पली को शुद्ध करने के लिए उनको चित्रकस्वरस में भावना देकर सुखा लेना चाहिए। निम्बूकबीजशोधनम् अपामार्गकषायेण दोलायन्त्रे तु यामकम्। स्विन्नानि निम्बूबीजानि विशुद्ध्यन्ति विशेषतः ॥५७७॥ भा.टी.— निम्बू के बीजों को लेकर कपड़े में बाँधकर पोटली बना लें। अब इसको दोलायन्त्र में अपामार्ग का क्वाथ भरकर उसमें तीन घंटे तक स्वेदन करके पोटली को निकाल लें। फिर बीजों का छिलका अलग करके उनको सुखा लें। इस तरह निंबूबीज शुद्ध हो जाते हैं ॥५७७॥ हिंगुशोधनम् रामठं समशुद्धाज्यसंयुतं दर्विकागतम्। विपक्कमग्नितापेन शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥५७८॥ भा.टी.— एक लोहे की बड़ी चम्मच में हींग के टुकड़े और गोघृत दोनों समभाग डालकर उसको अग्नि में पकायें, जब हींग के टुकड़े फूलकर घी के ऊपर तैरने लगें तो नीचे उतारकर घृत से पृथक् कर सुखा लें। इस विधि से हींग शुद्ध हो जाती है ॥५७८॥ गुग्गुलुशोधनम् चतुर्गुणे गव्यदुग्धे गुग्गुलुं स्वेदयेद् भृशम्। वस्त्रपूतं विधायाथ मलं वस्त्रस्थमुत्सृजेत् ॥५७९॥ दुग्धं शीतं तु विज्ञाय दुग्धपात्रतलस्थितम्। समाहरेद् गुग्गुलुं तु सर्वदोषसमुज्झितम् ॥५८०॥ गुग्गुलुशोधनं मन्दाग्निना विधेयम्। स्पष्टमन्यत् ॥५७९, ५८०॥ भा.टी.—एक साफ मोटे कपड़े में गूगल के छोटे-छोटे टुकड़ों को बाँध- कर उसे दोलायन्त्र या एक पात्र में गूगल से चौगुना दूध भरकर तीव्र अग्नि से उबालें। जब गूगल गलकर दूध में मिल जाय तो पोटली को (जिसमें गूगलमें तिनके, पत्ते, पत्थर, कंकड़ आदि न रह जाय) निचोड़कर अलगकर दें। जब दूध ठंडा हो जाय तो पात्र के तलप्रदेश में जमे हुए गूगल को निकाल लें।

चतुर्विंशस्तरङ्गः ७५५ इस विधि से गूगल सर्वदोष रहित होकर शुद्ध हो जाता है ॥५७६,५८०॥ वक्तव्य—गूगल को त्रिफलाक्वाथ और गोदुग्ध में डोलायन्त्र द्वारा भी पूर्वोक्त विधान से शुद्ध किया जाता है, त्रिफलाक्वाथ में शुद्ध करने से गूगल पित्तप्रकोपोयुक्त रोगों में भी दिया जासकता है । यह दस्त भी साफ लाता है । ग्रन्थसमाप्तिकालः खेभग्रहेन्दुप्रमिते श्रीमद्विक्रमवत्सरे । चैत्रे कृष्णत्रयोदश्यां ग्रन्थ एष समग्रन्थि ॥५८१॥ विभासयति मेदिनीं दिनमणिस्तु यावत्परं तथा गगनमण्डले तुहिनदीधितिद्योतते । भिषग्वरमहोदयाः खलु रसागमाध्यायिन- म्तथा रसतरङ्गिणीमिह पठन्तु तावत्परम् ॥५८२॥ इति गढपालमण्डलांतर्गतश्रीनगरनिकटवर्ति-खोला-ग्रामनिवासिना सदानंद- शर्मणा श्रीगुरुवरकविराजनरेन्द्रनाथमित्रमहोदय-साहाय्येन विरचितायां रसतर- ङ्गिण्यां विषोपविषादिविज्ञानीयो नाम चतुर्विंशस्तरङ्गः॥ समाप्ता चेयं रसतरङ्गिणी ॥ ग्रन्थसमाप्तिकालः— खं व्योम शून्यवाचकम् , इभा दिग्गजा अष्टौ, ग्रहा नव, इन्दुश्चन्द्रः एकत्वसंख्यावाचकः, अंकानांक वामतो गतिरिति न्यायात् १६८० वैक्रमवत्सरे चैत्रे कृष्णत्रयोदश्यामेष रसतरङ्गिणीनामको ग्रंथ आचार्यैः समग्रंथि रचित इत्याशयः । विभासयतीत्याशीःप्रार्थनम् । दिनमणिः सूर्यः । तुहिनदी- धितिः चन्द्रः । रसागमाध्यायिनः रसतन्त्रपाठकाः ॥५८१,५८२॥ इति स्फुटतरागमप्रथितसम्प्रदायाध्वना यथामति चलन्नहं गुरुकृपावलम्बीकृताम् । तरङ्गिणीप्रसादनीमुपनयामि श्रद्धाधनः प्रसीदतु निरन्तरं मयि हरः सनारायणः ॥ इति वाराणसेयश्रीपंडितशिवदत्तमिश्राणां शिष्येण जालंधरमण्डलान्तर्गतजाड- लनगरवासिना आयुर्वेदाचार्यश्रीहरिदत्तशास्त्रिणा निर्मिता रसतरङ्गिणीप्रसादनी समाप्ता । आ.टी.—विक्रम सम्वत् १६८० चैत्र कृष्ण त्रयोदशी को यह ग्रन्थ समाप्त हुआ । जब तक भूमि पर सूर्य चमकते रहे और जब तक चन्द्रमा गगन-मण्डल में विराजमान रहे तब तक रस शास्त्र का अध्ययन करनेवाले वैद्यवर महोदय लोग इसे स्वाध्याय करते रहें ॥५८१,५८२॥ यह विषोपविषादिविज्ञानीय नाम चतुर्विंश तरङ्ग समाप्त हुआ ।

७५६ रसतरङ्गिणी ॥ परिशिष्ट ॥ वृश्चिकहारी गुटिका हरताल को समभाग हींग में मिला बिजौरानींबू के रस से मर्दन कर एक- एक मासे की बड़ी गोली बनाकर सुखा लें । इनमें से एक-एक गोली घिसकर बिच्छू के दंश स्थान पर लेप करने और रोगी की आँखों में अञ्जन करने से बिच्छू का जहर नष्ट हो जाता है । पञ्चामृतरस पारदभस्म, अभ्रकभस्म, लोहभस्म, शुद्ध शिलाजीत, शुद्ध वत्सनाभ, गिलोय और त्रिफलाक्वाथ से शुद्ध किया हुआ गूगल, और ताम्रभस्म, इन सब को समभाग में लेकर एकत्र खरल में जल के साथ घोटकर आधी-आधी रत्ती की गोलियाँ बना लें । मात्रा—१ से २ गोली, वासावलेह, बकरी के दूध, शहद, पीपलचूर्ण, कालीमिर्चचूर्ण और घी अथवा जल के साथ दें । गुण—यह रसायन राजयक्ष्मा के ज्वर आदि विविध उपद्रवों को शान्त करता है । इस रस का उपयोग कीटाणुजन्य क्षय में ज्वरवेग तीव्र होने पर किया जाता है । प्रथमावस्था में ज्वर अल्प होने पर जहाँ तक हो नहीं करना चाहिए । द्वितीयावस्था में ज्वरवेग तीव्र होने पर इसका उपयोग अत्यन्त लाभकारी होता है । क्षय में धातुओं की क्षीणता पर बल-मांस क्षीण होने पर कफस्राव अधिक होने पर इसका सेवन अत्यन्त लाभकारी होता है । शुक्रक्षयजन्य शोषरोग में, दीर्घकालीन प्रदरजन्य क्षयरोग में इससे अच्छा लाभ होता है । प्रमेहरोग में भी इसका उपयोग उत्तम कार्य करता है । सदा मूत्र करने की शंका बनी रहना, बराबर मूत्र आना, रात्रि में अधिक मूत्र आने से निद्राभंग होना, क्षीण-कृश हो जाना, मुख में खुश्की रहना, सर्वांग में चिकना पसीना आना, सन्धिस्थानों में दुर्गन्ध आना—आदि लक्षण होने पर इसका उपयोग हितावह होता है । संक्षेप में यह रस धातुओं की क्षीणता कम करता है एवं यह धातुओं को साम्यावस्था में लाना और ज्वरघ्न, बल्य, तथा रसा- यन है और प्रमेह आदि को नष्ट करता है । स्मृतिसागर रस शुद्ध पारद, शुद्धगन्धक, शुद्धहरताल, शुद्धमैनसिल, ताम्रभस्म, इन सबको

परिशिष्ट ७५७ समभाग में लेकर एकत्र खरल में वच और ब्राह्मीकषाय की २१-२१ भावना और मालकांगनीतैल की एक भावना देकर सुखाकर रख लें। पहिले मालकां- गनीतैल की भावना बाद को ब्राह्मी-वचकषाय की भावना देने से गोलियाँ अच्छी तरह बन सकती हैं। कई रसचिकित्सक इसमें स्वर्णमाक्षिकभस्म भी एक भाग मिलाते हैं, जिससे इसमें गुणों की वृद्धि पायी जाती है। मात्रा—आधी रत्ती से एक रत्ती तक मक्खन या घी के साथ देवें। उपयोग—यह रस अपस्मार को दूर करने में अत्यन्त उपयोगी है। यह स्राववाहिनी और वातवाहिनियों पर शामक प्रभाव करता है। चेष्टावाही नाड़ियों के क्षोभ को शान्त करने में विशेष रूप से प्रसिद्ध है। अपस्मार की भाँति यह उन्माद तथा हिस्टीरिया (जो गर्भाशय की विकृति से हो) तथा बाल- 'ग्रह रोग में भी यह अतिलाभकारी है। स्त्रियों को गर्भावस्था में तीव्र यकृत्संकोच और गर्भवात के कारण जड़ता, मन्दता, आलस्य, निद्रा, तन्द्रा, वमन आदि लक्षण होने पर इसके सेवन से लाभ होता है। संन्यास-रोग में निश्चेष्टता, शीतलता, लालास्राव और वातकफात्मक लक्षण होने पर स्मृतिसागर का उत्तम उपयोग होता है। सुषुम्णा तथा मस्तिष्कावरण की विकृति के कारण जिन अपतन्त्रक आदि विकारों में आक्षेप होते हों, यदि इनके साथ कफ का संसर्ग और जड़ता आदि लक्षण हों तो यह रस उत्तम कार्य करता है। अकस्मात् स्मृतिभ्रंश में भी यह लाभदायक है। संक्षेपतः इसका कार्य मनोदेश, सुषुम्णा, आज्ञावाहिनियों और स्नायुओं पर शामक और आक्षेपहर होता है। शिलाञ्जन शुद्ध मैनसिल, पिप्पली, मरिच, वच, सिरस के बीज, लहसुन और सैन्धा- नमक; इन सबको समभाग में लेकर चूर्ण बना इसको बकरी के मूत्र में घोटकर अञ्जन बना लें। इस शिलाञ्जन को आँखों में आँजने से सन्निपात की मूर्च्छा तथा तन्द्रा-उपद्रव में आराम आता है। द्वितीय शिलाञ्जन शुद्ध मैनसिल, लहसुन, पिप्पली, सिरसबीज तथा सैन्धानमक, प्रत्येक सम- भाग लेकर सूक्ष्म चूर्ण कर लें। इसको मधु में मिलाकर आँखों में आँजने से सन्निपात की तन्द्रा में शीघ्र आराम आता है।

[Page Header] ७५८ रसततरङ्गिणी

वृश्चिकविषनाशक गुटिका

सिरसबीज, केसर, करञ्जबीज, कुष्ठचूर्ण और मैनसिल को समभाग प्रमाण में लेकर जल के साथ पीसकर गोली बना लें। इन गोलियों को जल में घिसकर बिच्छू के दंशस्थान पर लगावें तो भयंकर बिच्छू का जहर उतर जाता है।

तन्द्राहरी वर्तिका

शुद्ध मैनसिल को लहसुन के स्वरसं में खूब अच्छी तरह घोट इसकी बत्तियाँ बना लें। इस वर्तिका को वैद्य लोग तन्द्राहरी-वर्तिका कहते हैं; क्योंकि इसके लगाने से शीघ्र ही तन्द्रा दूर हो जाती है। इस वर्तिका को सरसों के तैल अथवा जल के साथ स्वच्छ पत्थर पर घिसकर नेत्रों में आँजने से सन्निपात- ज्वरादि में होनेवाली तन्द्रा दूर हो जाती है।

वातेभकेशरी रस

शुद्ध सोमल कालीमिर्चचूर्ण, लौंगचूर्ण, शुद्ध वत्सनाभचूर्ण, छुहारे की गुठली का चूर्ण, जायफलचूर्ण, और करीर की कोंपलें, प्रत्येक एक-एक तोला, अफीम और मिश्री २-२ तोला लें। सबको एकत्र खरल में बड़ के दूध से मर्दनकर सरसों के बराबर गोलियाँ बना लें। (सि० भै० म०) मात्रा—१ से ३ गोली, दिन में दो-तीन बार दें। उपयोग और अनुपान--इस रस को श्वसनकसन्निपात (Pneumonia) में मिश्री के साथ देने से तत्काल लाभ प्रतीत होता है। श्वास, कास और कफ- प्रधान सन्निपात में शहद के साथ, और मरणासन्न बेहोशी की अवस्था में १- १ रत्ती सफेद कत्था और अकरकरे के साथ देने से कफप्रकोप शान्त होकर रोगी होश में आ जाता है और उसकी रुकी हुई जबान खुल जाती है। हिचकी में मूली के बीज के साथ, अतीसार में छोटी हरड़, सौंफ और जीरे के साथ, रक्तप्रदर में शहद या घी के साथ, सिरदर्द में नकछिकनी के साथ नस्य के रूप में, अफारा में अदरक के रस के साथ सेवन करायें और नाभि पर चूहे की मींगनी का लेप करायें, एकाहिक, तृतीयक, चातुर्थिक आदि विषम ज्वरों में गुड के साथ, पित्तज्वर में शक्कर के साथ, नपुंसकता में दूध की मलाई के साथ, सुजाक में गुलाब के गुलकन्द या शक्कर के शर्बत के साथ, वाजीकरण के लिए जायफल और कस्तूरी के साथ देने से अच्छा काम करता है।

परिशिष्ट ७५६ नयनामृतद्रव गुलाब के एक कर्ष शुद्ध अर्क में दस रत्ती फिटकरी का चूर्ण मिलाकर द्रव (Lotion) बना लें । इसको नयनामृत द्रव कहते हैं । इसको बिन्दुक्षेपक यन्त्र (आइ-ड्रोपर) से आँखों में डालने से अभिष्यन्द (नेत्र दुःखना), नेत्र में चोट लगने से क्षत तथा शोथ आदि रोगों में आराम आता है । टङ्कणादिवटी शुद्ध टंकण, शुद्ध गन्धक, शुण्ठी, कालीमिर्च और शुद्ध वत्सनाभविष, प्रत्येक समभाग लेकर पहिले पारद गन्धक को कज्जली करके उसमें अन्य द्रव्यों का चूर्ण मिलाकर लकुचस्वरस के साथ मर्दन करके दो-दो रत्ती की गोली बना लें । इन गोलियों को भोजन के पूर्व जल के साथ सेवन करने से मन्दाग्नि तथा अजीर्ण रोग में शीघ्र लाभ होता है । शूलाद्रिभञ्जन चूर्ण कालीमिर्चचूर्ण, नौसादरचूर्ण, अजवाइनचूर्ण और सौंफ या सोयाबीजचूर्ण, प्रत्येक समभाग लेकर एकत्र मिला मर्दन करके चूर्ण तय्यार कर लें । इसे शूलाद्रिभञ्जन चूर्ण कहते हैं । यह शूल में बहुत बार परीक्षित चूर्ण है । इसको गरम जल के साथ सेवन करने से उदरशूल और अग्निमान्द्य रोग नष्ट होता है । इसको गरम जल अथवा नींबू के रस के साथ खाने से यह अत्यन्त स्वादिष्ट होता है । अपान वायु ठीक निकलता है तथा विबन्ध नहीं होने पाता है । इसके द्वारा भोजन या पाचन होता है । इसकी मात्रा एक मासा समझनी चाहिए । वह्निप्रदीपन चूर्ण सैन्धानमकचूर्ण, नौसादरचूर्ण, कालीमिर्चचूर्ण बड़ी इलायची के बीजों का चूर्ण, सौंफचूर्ण, प्रत्येक समभाग में लेकर एकत्र पीसकर चूर्ण बना लें । इसको वह्नि प्रदीपनचूर्ण कहते हैं । इसको एक मासा मात्रा में लेकर गरम जल के साथ सेवन करने से चिरकाल की नष्ट हुई पाचक अग्नि दीप्त हो जाती है । खाने में अत्यन्त स्वादिष्ट होता है । इसको भोजन के पूर्व सेवन करने से अपानवायु का अनुलोमन होता है । तीव्र आमशूल शान्त होता है । इसके अतिरिक्त यह चूर्ण दीपक, पाचक, शोधक और रोचक कार्य के लिए प्रसिद्ध है ।

७६० रसतरङ्गिणी कफनिःसारकवटी पिप्पली, वच, दालचीनी, काकड़ासिंगीचूर्ण; प्रत्येक एक-एक भाग छोटी कण्टकारीचूर्ण, मुलैठीचूर्ण दो-दो भाग, नौसादरचूर्ण आठ भाग लेकर सब को एकत्र खरल में डालकर वासा (अड़ूसा) क्वाथ की तीन भावना देकर मर्दन करें। जब गोली बनाने योग्य हो जाय तो इसकी तीन-तीन रत्ती की गोलियाँ बना सुखाकर काँच की शीशी में रखकर बन्द कर लें। इसको वैद्य लोग कफ- निःसारक वटी कहते हैं। खाँसी के समय इसको मुख में रखकर इसका रस चूसते रहने से छाती और कण्ठ में चिपका हुआ कफ शीघ्र ही बाहर निकलने लगता है और इससे कास, श्वास, प्रतिश्याय तथा स्वरभेद आदि रोग नष्ट होते हैं। नवसादर चूर्ण नौसादरचूर्ण, कटुकीचूर्ण तथा हरीतकीचूर्ण प्रत्येक समभाग में लेकर एकत्र पीस लें। इसमें से ६ मासा मात्रा में आंवलों के रस के साथ सेवन करने से भयंकर कामला-रोग नष्ट होता है। सुधांशु द्रव पत्थर बालुका आदि रहित स्वच्छ सैन्धवचूर्ण आधी रत्ती लेकर एक काँच की साफ शीशी में डालकर उसमें सवा तोला परिश्रुत शुद्ध जल डाल दें और शीशी में डाट लगाकर इसको हिलायें, जिससे सैन्धानमक जल में अच्छी तरह घुल जाय। इस प्रकार बनाए हुए द्रव (लोशन) को सुधांशुद्रव कहा जाता है। अब इस द्रव में से बिन्दुक्षेपकयन्त्र (आइड़्रोपर) द्वारा कुकरे, नेत्रकण्डू, नेत्रप- ल्मशोथ युक्त आँखों को अच्छी तरह खोलकर प्रत्येक में दो या तीन बूंद डाल दें। इस द्रव को नेत्रों में डालने से तथा सोरकाम्लीय रजत आदि द्राव (Silver Nitrate) के लगाने से पलकों में होनेवाली लालिमा शीघ्र ही नष्ट हो जाती है। लवणजल (उक्त प्रकार से निर्मित) को, नेत्रपलकों में रजतनत्रित् (Silver- Nitrate) लगाने के बाद इसके अतिप्रभाव को दूर करने के लिए, नेत्रप्रक्षा- लन के काम में लाया जाता है। नेत्रव्रण तथा नेत्राभिष्यन्द के कारण उत्पन्न नेत्रार्जुन, नेत्रपुष्प रोग में भी इस जल को नेत्रों में डाला जाता है। कुछ महीनों तक साधारण लवणजल को १० बूंद से १५ बूंद तक मात्रा में

परिशिष्ट ७६१ सूचीवेध द्वारा नेत्र के रक्त पटल में प्रवेश करने से नेत्रपुष्प अच्छा हो जाता है । चिरस्थायी प्रतिश्याय तथा अन्य साधारण नासारोगों (शोथादि) में लव- णोदक से प्रक्षालन करने पर शोथ आदि शान्त हो जाते हैं । हिक्का को बन्द करने के लिए लवणोदक का नस्य दिया जाता है । गला तथा कण्ठ के शोथ में उष्णलवणोदक के गण्डूष से लाभ होता है । विसूचिका रोग के कारण अथवा किसी कारण अतिरक्तस्राव होने पर शरीर के रक्त में द्रवभाव के कम हो जाने पर इसे (द्रवभाग) पूरा करने के लिए साधारण लवणजल को त्वचा द्वारा, किसी शिरा द्वारा या गुदा द्वारा शरीर में प्रवेश किया जाता है (इसी को सेलाइन इंजेक्शन भी कहते हैं) उक्त कार्य के लिए एक से तीन पाइण्ट तक (डेढ़ सेर तक) लवणजल शरीर में प्रवेश कराना चाहिए । इस क्रिया से रक्त का परिमाण बढ़ जाता है और मूत्र अधिक मात्रा में आने लगता है, जिससे रोगी की दशा अच्छी होने लगती है । उदराध्मानशूल, गुदकृमि तथा अपस्मार के वेगों को रोकने के लिए भी लवणोदक की वस्ति दी जाती है । कर्णपाकज वेदनाहर योग स्वच्छ सैन्धवचूर्ण को बकरे के मूत्र में घोलकर इसको कान में डालने से कर्णनाड़ी में पाक होने के कारण होनेवाली भयंकर वेदना निःसन्देह शीघ्र ही दूर हो जाती है । सैन्धवादि नस्य सैन्धानमक, कूठ, सफेद सरसों, सहंजने के बीज, इन सब को समभाग में लेकर एकत्र अच्छी तरह चूर्ण कर लें । अब इस चूर्ण को बकरी के मूत्र की तीन भावना देकर सुखा करके रख लें । इसको सैन्धवादि नस्य कहते हैं । यह नस्य त्रिदोषप्रकोपजन्य तन्द्रा की अवस्था में नासिका द्वारा सुंघाने से तन्द्रा को हटा देता है । खर्जूरविषहर योग सन्धानमक के चूर्ण को चांगेरीस्वरस में मिलाकर कानखजूरे के काटे हुए या चिपके हुए स्थान पर रगड़ने से उसका विष शीघ्र नष्ट हो जाता है । सर्पविषहर योग एक मासा सैन्धानमक के चूर्ण में समभाग कालीमिर्च, पिप्पली तथा सोंठ

७६२ रसतरङ्गिणी का चूर्ण मिलाकर इसमें शहद, घृत तथा मक्खन मिलाकर तक्षक सर्प के काटने पर भी यदि विष तीव्र लक्षणयुक्त न हो तो इस योग के सेवन कराने से शीघ्र ही विष नष्ट हो जाता है । आखुविषहर योग विषैले चूहे के काटे हुए स्थान पर मंजीठ, हरिद्रा, घर का धुआँ और सैन्धानमक चूर्ण समभाग में लेकर एकत्र जल से पीसकर लेप करने से चूहे का जहर नष्ट हो जाता है । वरटीविषहर योग बर्रें, ततैया या हड्‌डा के तीव्र पीड़ा शोथादियुक्त विष को शान्त करने के लिए कालीमिर्च, सोंठ, सौचलनमक और सैन्धानमक को पान के पत्तों के रस में पीसकर लेप करने से शीघ्र ही विष शान्त हो जाता है । विडलवणादि नस्य विडलवण में सिरसबीज तथा अपामार्ग की जड़ का चूर्ण मिलाकर सूक्ष्म चूर्ण करलें । इस चूर्ण का नस्य लेने से अर्धावभेदक ( आधा सीसी का दर्द ) की पीड़ा शान्त हो जाती है । चतुर्मुख रस शुद्ध पारद शुद्ध गन्धक, लोहभस्म, अभ्रकभस्म प्रत्येक ४ तोला; सुवर्ण- भस्म १ तोला लेकर पहिले पारे और गन्धक की कज्जली बनालें, फिर इसमें अन्य औषधियाँ मिला घीकुआर के रस से ७ दिन मर्दन करें। फिर इसमें सोंठ, हरड़ और पुनर्नवाक्वाथ, कौंचबीज और लौंग का क्वाथ, चित्रकमूल और पद्मकाष्ठ का क्वाथ; इन तीनों वर्गों का क्रमशः ३-३ भावना देकर खूब गाढ़ा करके एक गोला सा बनालें । अब इस गोले को एरण्ड के पत्ते में लपेटकर तीन दिन तक धान्यराशि में रख दें । पश्चात् गोले को निकाल चित्रकमूल और पद्मकाष्ठ क्वाथ में घोटकर आधी रत्ती की गोलियाँ बनालें । मात्रा—१-२ गोली दिन में दो बार त्रिफला और शहद के साथ दें । उपयोग—यह रस राजयक्ष्मा की उत्तम औषधि है । जब क्षय के कीटाणुओं से उत्पन्न सेन्द्रिय विष द्वारा लघु और वृहदन्त्र विकृत होकर यक्ष्मा आरम्भ हुआ हो तो यह रस उत्तम कार्य करता है । इस रस का मुख्य गुण शरीर में

परिशिष्ट ७६३ बल पैदा करना है। बाहर से देखने पर रोगी हृष्ट-पुष्ट दीखता हो, किन्तु भीतर से धीरे-धीरे शक्ति क्षीण हो रही हो और शरीर का भार भी बिना किसी रोग के घट रहा हो तो यह रस उत्तम लाभ करता है। आँतों में शोथ, ग्रन्थिपीड़ा के साथ अग्निमान्द्य, अरुचि, अतीसार, मन्दज्वर आदि लक्षण युक्त आन्त्र क्षय में इसका उपयोग उत्तम कार्य करता है। इसके अतिरिक्त यह रस अग्नि-प्रदीपक, बल्य तथा रसायन माना जाता है। राजयक्ष्मा में जब ज्वर तीव्र हो तो इसे नहीं देना चाहिए, बल्कि पञ्चामृतरस का प्रयोग करके ज्वर शान्त होने पर घी का प्रयोग करना चाहिए। बालचन्द्ररस स्वर्णभस्म १ तोला, शुद्ध सोना गेरू ३ तोला, मुक्तांपिष्टी १२ तोला लें। अब तीनों को एकत्र मिला अच्छी तरह खरल करके रखलें। मात्रा—१-१ रत्ती दिन में २-४ बार मक्खन मिश्री, गिलोयसत, शर्बत, अनार, दाडिमावलेह या वासावलेह के साथ देवें। गुण—यह रसायन राजयक्ष्मा रोग में होने वाली वान्ति, उवाक, अती- सार, अरुचि, श्वासोच्छ्वास में कष्ट, पीनस, शुष्क कास, श्वास और रक्तपित्त आदि उपद्रवों को दूर करता है और कृत्रिम विष तथा दूषित विषजनित दाह आदि का शमन करता है। यह रस रक्तगत कीटाणु और विष का नाश करता है। मस्तक और वात- वाहिनियों पर शामक असर पहुँचाता है। हृदय के लिए बल्य है और पाचन- संस्थानगत सेन्द्रिय विष को नष्ट करता है। सूतशेखर रस शुद्ध पारद, शुद्ध गन्धक, सुहागे का फूला, शुद्ध वत्सनाभ, स्वर्णभस्म, ताम्रभस्म, सोंठ, कालीमिर्च, पीपल, शुद्ध धतूरे के बीज, तेजपत्र, नागकेशर, इलायचीबीज, बेलगिरी, शंखभस्म, कचूर, सबको समभाग लेकर एकत्र घोटकर भांगरे के स्वरस से ७ दिन मर्दन करके एक २ रत्ती की गोलियाँ बनालें। मात्रा—१ से ३ गोली दिन में २ से ३ बार दध-मिश्री, घी और शहद अथवा रोग के अनुसार अनुपान से देवें। उपयोग—संक्षेपतः इस रसायन के सेवन से अम्लपित्त, वमन, शूल, गुल्म, कास, संग्रहणी, दाह, त्रिदोष, अतीसार, श्वास, मन्दाग्नि, भयंकर हिचकी, उदावर्त, ज्वर, क्षय आदि रोग ४० दिन में निस्सन्देह नष्ट हो जाते हैं।