रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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विषय-सूची आलोचना भाग १. रीतिकाल का परिचय १ २. रसखान का जीवन-वृत्त १४ ३. रसखान की रचनायें २६ ४. रसखान का प्रेम दर्शन ५६ ५. रसखान की भक्ति-पद्धति ६८ ६. रसखान की रस-योजना ८१ ७. रसखान के कृष्ण ६५ ८. रसखान का सौन्दर्य-चित्रण १०५ ९. रसखान की अलंकार-योजना ११५ १०. रसखान की भाषा १२६ ११. स्वच्छन्द काव्यधारा और रसखान १४५ व्याख्या-भाग [पद-सूची अकारादि क्रमानुसार पृष्ठ-संख्या सहित] अखियां अखियाँ सो सकाइ ३०१ अगनि अग मिलाई दोऊ २६६ अंजन मजन त्यागौ ३१३ अंग अभूत लगाव ३५१ अत ते न आयौ याही २१८ अकथ कहानी प्रेम की ३०३ अति लाल गुलाल दुकूल १२० अति लोक की लाज २६८ अति सुन्दर री ब्रजराज १८२ अति सूछम कोमल ३०५
( VI ) अधर लगाई रस प्याइ । २६८ अवहिं खरिक गई गाइ के २०० अरपी श्रीहरि चरन ३३५ अरी अनोखी बाम २६८ अलबेली विलोकनि बोलनि १८४ अली पगे रंगे २४४ आइ सबै व्रज गोप लली २४५ आई खेलि होरी व्रज २७४ आई हौ आज नई ३३६ आज अचानक राधिका ३०० आजु बरसाने बरसाने २६६ आज गई व्रजराज के २०२ आज भटू मुरली-वट के २७० आज महूँ दधि वेचन २२० आज होरी रे मोहन ३४४ आजू गई हुती भोर ही १७८ आजु भटू इक गोप कुमार २७० आजु भटू इक गोप वधू २३० आजु री नदलला निकस्यौ २६७ आजु सवारति नेकु भटू २८२ आजु सखी नदनंदन री १०८ आनंद अनुभव होत ३२३ आपनो सो ढोटा हम २३३ आये कहा करिकै ३०५ आयो हुतौ नियरे रसखानि २११ आली लला घन सो २०१ आवत लाल गुलाल लिए २७६ आवत है वन ते मनमोहन १८१ आवत हौ रस के चसके ३३६ इक अगौ विनु कारनहिं ३२६
( VII ) कारज-कारन रूप ३३५ काल्हि पर्यौ मुरलि-धुनि मैं २३८ काल्हि भटू मुरली-धुनि मैं २२६ काह कहूँ रतियाँ की कथा ३०४ काह कहूँ सजनी सग की ३०५ काहू को माखन चाखि २२३ काहे कूँ जाति जसोमति के २६१ कीजै कहा जु पै लोग २७१ कु जगली मे अली निकसी २१७ कुंजनि कुंजनि गुंज के २४१ केसरिया पट केसरि २५७ कैसा यह देश निगोरा ३५२ कैधो रसखान रस २७८ कैसो मनोहर वानक १६१ काइ सौ माई कहा करिये ३११ कोउ याहि फासी ३२६ कौन की आगरि रूप की २१३ कौन को लाल सलोनो २४३ कौन ठगोरी भरी हरि आजु २११ खंजन नैन फदे पिजरा २१७ खजन मीन सरोजन को १६७ खेलत फाग सुहाग २७३ खेलत काग लख्यो २७३ खेलिये फाग निसंक ३५० खेलै अलीजन के गन मैं २५५ गाड दुहाई न या पै कहू १६६ गारी के देवैया वनवारी ३३८ गारी खाइयो अरे गवार ३४३ गावै गुनी गनिका गधरव्व १६१ गुंज गरे सिर मोर पखा १६२ गोकुल को ग्वाल काल्हि २७५ गोरज विराजै भाल १८१ गोकुल के विछुरे को सखी ३०७ गोकुल नाथ वियोग प्रलै ३०८
( VIII )
इक ओर किरीट लसै ३१७ उन्ही के सनेहन सानी २४२ एक ते एक लौ कानन २१६ एक समै इक ग्वालिनि २५७ एक समै जमुना जल-मे २३५ एक सू तीरथ डोलत १७२ एरी कहा वृषभानपुरा की ३३७ एरी चतुर सुजान २६६ एरी तोहूँ पहचानीं ए सजनी जबते ३०८ ए सजनी लोनो लला २०६ ए सजनी मनमोहन नागर १६५ औचक दृष्टि परे कहूँ २५० कंचन के मदिरनि दीठि १७१ कंचन मदिर ऊचे बनाइ १६६ कस के क्रोध की फैलि ३१२ कँस कुढ्यो सुनि वानी १८३ कबहूँ न जा पथ ३२२ कमल ततु सो छीन ३२१ कल काननि कु डल मोरपखा २२६ कहा करै रसखानि को १५८ कहा रसखानि सुख संपति १७० कातिग क्वार के प्रात २०४ कान परे मृदु बैन २५६ कानन दै अंगुरी रहिबो २०८ कान्ह भए बस बाँसुरी के २३१ काम क्रोध मद मोह ३२४ काटे लटै की लटी लुकटी १६०
( IX ) गोरस गाँव ही मैं बिचिबो २६३ ग्वालिन संग जैबौ वन ३१६ ग्यान ध्यान विद्या ३२७ ग्वालिन द्वै क भुजान गहँ २६० घर ही घरु घेरु घनो २५२ चन्दन खोर पै बिन्दु २४३ चन्द सो आनन मैन २२५ चीर की चटक औ लटक ३४७ छूट्यौ गृहराक लोक २४६ छीर जो चाहत चीर गहैं २२२ जाको लसै मुख चन्द समान २८४ जग मे सब जान्यौ ३२५ जग मे सब ते अधिक ३२८ जदपि जसोदा-नद अरु ३३१ जमना तट वीर गई २५० जल की न घट भरै २२४ जात हुती जमुना जल कौ १६४ जाते उपजत प्रेम सोइ ३३३ जाते पलपल बढत ३३३ जा दिन ते निरख्यौ १६४ जा दिन ते वह नन्द को २१० जा दिन ते मुस्कान चुभी २०७ जानै कहा हम मूढ ३१० जाहु न कोई सखी जमुना जल २६७ जेहि पाए वैकुं ठ ३२८ जेहि बिनु जाने कछुहि ३२५ जो कवहूँ मग पाँव न देत २८८ जोग सिखावत आवत है ३१३ जो जाते जार्मे बहुरि ३३३ जो रसना रस न विलसै १५६ जोहन नन्दकुमार को २०६
( x ) जोहीं मैं तिहारी ओर ३३६ डरै सदा चाहे न कुछ ३२७ डहडही बौरी मजु डार २८८ डोरि लियौ मन मोरि २२७ डोलिवो कु जनि कु जनि को २१४ तट की न घट भरै ३४८ तुम चाहो सो कहौ २४० तू गरवाड कहा भगरै २८६ तू ऐसी चतुराई ठाने ३४३ तेरी गलीन मैं जा दिन तें २६६ तैं न लख्यौ जब १८३ तीरथ भीर मे भूल परी २४८ तोरि मानिनी तैं हियौ ३३४ तौ पहिराइ गई चुरियाँ २६८ तोहू पहिचानौं ३३८ 'ता' जसुदा कहयो धेनु १७७ दपति सुख अरु ३२६ दमकै रवि कु डल दामिनी से १८८ दान पै न कान सुने ३४० दानी नए भए माँगत २२१ दूध दुह्यौ सीरो पर्यौ २२३ दूर ते आड दुरे ही २६० दृग दूने खिंचे रहैं १८५ देखत सेज विछी ही अच्छी २७२ देखन को सखी नैन भए २३६ देखि कै रास महावन को १८८ देखि गदर हित-साहिबी ३३४ देखिहौं आँखिन सो पिय २३६ देख्यौ रूप अपार २१८ देस विदेस के देखे १६८ दोउ कानन कुंडल १६०
( XI ) दो मन इक होते ३३० द्रौपदी और गनिका गज १७६ नन्द की न दासी हम ३४० नन्द को नन्दन है दुख कंदन २४८ नद महर कै वगर ३५० नाह वियोग वढ्यौ रसखानि १६६ नैन दलालनि चौहटै १८४ नौ लख गाय सुनी ३४२ परम चतुर पुनि रसिकवर ३४२ पहिले दधि लै गई गोकुल २२० प्यारी की चारु सिंगार २८२ प्यारी पै जाई कितो २५४ पीय से तुम मान कर्यौ कत २८७ पूरव पुन्यनि ते चितई २६७ पै एतो हूँ हम ३२६ पै मिठास या मार । ३२६ प्रान वही जु रहै रीझि २३६ प्रीतम नन्दकिसोर १६६ प्रेम अगम अनुपम ३२० प्रेम अयनि श्री राधिका ३२० प्रेम कथानि की बात चलै २८५ प्रेम निकेतन श्री वनहिं ३३४ प्रेम प्रेम सब कोऊ कहत ३२० प्रेम प्रेम सब कोऊ कहै ३२७ प्रे म फास मै फंसि ३२८ प्रे म वारुनि छानिकै ३२१ प्रे म मरोरि उठै तबहीं २६५ प्र म रूप दर्पण अहो ३२१ प्रे म हरि को रूप है ३२७ फागुन लाग्यो जबते २७४ फूलत फूल सबै वन ३०२
( XII )
वृषभान के गेह दिवारी २५८ वक विलोचन है दुख २०५ बंसी बजावत आनि कठौ २२८ बजी है बजी रसखानि २३२ वन बाग तडागन कु ज गली २३८ बाँक मरोर गई भृकुटीन २८२ वाँकी धरै कलगी सिर २१२ वाँकी वड़ी अखियाँ १८५ वाँकी विलोकनि रगभरी २२६ बाँके कटाछ चितैबो सिख्यो २६२ वागन मे मुरली २६५ वार ही गोरस वेचि री २६४ वागन काहे को जाग्रो ३०१ बात सुनी न कहूँ हरि की २५६ बाल गुलाब के नीर असीर ३०४ वासर तूं जू कहूँ निकरै २८३ विविध सागर रस इंदु ३३५ विरहा की जु आँच लगी ३०३ बिनु गुन जोवन रूप ३२४ विमल सरल रसखानि १५८ विहरै पिय प्यारी सनेह २६८ वेद मूल सब धर्म ३३१ बेनु बजावत आवत है नित २६३ वैद की औषध खाई ३१८ बैन वही उनको गुन १५७ बैरिनि तूँ बरजी न रहै २६२ ब्याही अनब्याही ब्रजमाँही २६५ ब्रज की वनिता सब घरि २३२ ब्रह्म मैं ढूंढ्यो पुरानन गानन १६३ भई बावरी ढूँढ़त काहि २६३
- र. अ. ३. पृ. ५७४ – ५/२१३
( XIV ) मोहन रुप छकी वन २०२ मोहन सो अटक्यौ मनु २६३ मोहनी मोहन सो रसखानि १७५ यह देखि धतूरे के पात ३१८ याही तैं सब मुक्ति ३३० रग भर्यौ मुसकात लला २१६ रसमय स्वाभाविक विना ३३२ रसखान सुनाय वियोग ३०३ राधा माधव सखिन ३३५ लगर छैलहि गोकुल मैं २२२ लाय समाधि रहे ब्रह्मादिक १६१ लाज के लेप चढाइ कै ३१४ लाडली लाल लसै १७६ लाल लसै पगिया सबके १८६ सीने अबीर भरे पिचका २७६ लोक की लाज तज्यौ २०३ लोक वेद मरजाद सब ३२२ लोग कहै ब्रज के २३४ लाल की आज छठी १७६ वह गोधन गावत गोधन मैं २६१ वह घेरनि धेनु अबेर १८६ वह नन्द को साँवरो छैल २०१ वह सोई हुती परजंक ३००
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( XVI ) सेष सुरेस दिनेस गनेस १६६ सोई हुती पिय की छतियाँ २६६ सोई हे रास मैं नैमुक २८६ सोहत हे चन्दवा सिर ४१५ स्याम सघन घन घेरि कै ४५३ स्रवन कीरतन दरसनौह ३३२ स्रुति पुरान आगम ३२३ स्वारथ मूल असुद्ध त्यौ ३३२ हरि के सब आधीन ३३१ हेरत कु ज भुजा धरैं स्याम ३४७ हेरति वारही वार २६२ है छल की अप्रतीत की १७४ श्री मुख यो न वखान ४७६ श्री वृष भान की छान घुजा २४४ ज्ञान करम रु उपासना ३२३
: १ : रीतिकाल का परिचय हिन्दी-साहित्य मे रीतिकाल का आविर्भाव संवत् १७०० से १६०० तक माना जाता है। इस काल मे दो साहित्यिक धाराएँ युगपद् प्रवाहित होती हुई भी एक-दूसरी से नितान्त भिन्न है। एक धारा है रीतिबद्धमार्गी, जो काव्य- शास्त्रीय नियमो का अनुसरण करती है। इस धारा के दो वर्ग है। एक वर्ग तो उन लोगो का है जिनके कवित्व के साथ आचार्यत्व का गठबधन है। केशव, जसवंतसिंह, चिन्तामणि, देव, भूषण, कुलपति मिश्र आदि इसी वर्ग के अन्तर्गत आते है। दूसरा वर्ग उन लोगो का है जिन्होन काव्यशास्त्रीय विवेचन तो नही किया, पर उसके आधार पर अपने ग्रन्थो की रचना की है। बिहारी, मधु- सूदन, रसलीन, सेनापति आदि इसी वर्ग के अन्तर्गत आते है। इस काल मे जो काव्यशास्त्रीय विवेचन हुआ है, वह प्राय. सस्कृत काव्य- शास्त्र की सीमाओ मे ही आबद्ध रहा है । रीतिकालीन आचार्यों मे, इसी कारण, नगण्य मौलिकता परिलक्षित होती है। जहाँ तक उद्देश्य का प्रश्न है, रीतिकालीन आचार्यों का उद्देश्य सस्कृत-आचार्यों से भिन्न था। सस्कृत का काव्यशास्त्र समय-समय पर रसवाद, अलंकारवाद, रीतिवाद, ध्वनिवाद तथा वक्रोक्तिवाद का समर्थन एवं खडन-मडन प्रस्तुत करता रहा है। हिन्दी के रीति- कालीन आचार्य खंडन-मडन के इन पचडो मे नही पडे है। इन आचार्यों में से कुछ आचार्यों ने नायिका-भेद निरूपण किया है, कुछ ने अलकार ग्रथो का निर्माण किया है और कुछ आचार्यों ने इन दोनो का सृजन किया है। नायक- नायिका-भेद के निरूपण का आधार प्राय भानुमिश्र रहे है और अलकारो के लिए अप्पय दीक्षित । संस्कृत के ये दोनो आचार्य भानुमिश्र और अप्पय दीक्षित किसी भी काव्यशास्त्रीय वाद से आबद्ध नही थे। हिन्दी के कुछ आचार्य, जो
२ रसखान-ग्रन्थावली
सर्वांग निरूपक हैं, आचार्य मम्मट और आचार्य विश्वनाथ के ऋणी हैं। ये दोनों आचार्य काव्यशास्त्रीय वादों एवं सम्प्रदायों से पूर्णतया परिचित थे, पर उन्होंने किसी वाद का वाद की दृष्टि से अनुकरण नहीं किया। हिन्दी के आचार्य अलंकारवाद, रीतिवाद तथा ध्वनिवाद से पूर्णरूपेण परिचित नहीं थे, अतः उनका किसी एक सम्प्रदाय को अपनाकर चलना असम्भव था। रीतिकाल में जो काव्यशास्त्रीय विवेचन हुआ है, उसे देखकर यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि ये कवि लक्षणबद्ध साहित्य-निर्माण की ओर क्यों आकृष्ट हुए ? क्या इसलिए कि ये हिन्दी साहित्य में सम्यक् काव्यशास्त्र का निर्माण करना चाहते थे, अथवा इसलिए कि ये हिन्दी में संस्कृत काव्यशास्त्र का अनुवाद प्रस्तुत करना चाहते थे ? इन दोनों सम्भावनाओं में से दूसरी सम्भावना अधिक उचित है। क्योंकि यदि इनका उद्देश्य काव्यशास्त्र की रचना करना होता तो ये भी संस्कृत आचार्यों की भाँति किसी काव्यशास्त्रीय नियम के उदा- हरण में अपने पूर्ववर्ती कवियों के उदाहरण प्रस्तुत करते। संस्कृत काव्यशास्त्र को आधार मानकर ही हिन्दी आचार्यों ने अपने विवेचन को प्रस्तुत किया है। फिर भी हिन्दी में ऐसे अनेक आचार्य हुए हैं जिन्होंने हिन्दी की विकासशील प्रवृत्तियों का भी ध्यान रखा है। आचार्य भिखारीदास ने 'तुक' का विवेचन हिन्दी-प्रवृत्तियों के आधार पर ही किया है। देव और भिखारीदास दोनों ने ही नायिका-भेद में अपनी मौलिकता का परिचय दिया है और अनेक ऐसी नायिका तथा दूतियों का उल्लेख किया है जो संस्कृत काव्यशास्त्र में नहीं मिलतीं। अब प्रश्न यह हो सकता है कि इन आचार्यों को संस्कृत काव्यशास्त्र के अनुवाद की क्या आवश्यकता थी ? इसका उत्तर स्पष्ट है—आचार्यत्व प्राप्ति का प्रलोभन। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि आचार्य के पद पर प्रतिष्ठित होने वाले रीतिकालीन आचार्यों में आचार्यत्व की अपेक्षा कवि प्रतिभा का अंश ही अधिक है। इसके अतिरिक्त रीतिकाल में कुछ ऐसे भी कवि हुए हैं, जिनमें आचार्यत्व का प्रलोभन जागृत नहीं हुआ। इन्होंने अपनी प्रतिभा को काव्य तक ही सीमित रखा, अर्थात् लक्षण-ग्रन्थों की अपेक्षा लक्ष्य-ग्रन्थों का निर्माण किया। बिहारी आदि कवि इसी वर्ग के अन्तर्गत आते हैं। काव्य-दृष्टि से यदि रीतिकाल का मंथन किया जाए तो इसमें पच्चीस
समीक्षा भाग ३ रीतिबद्धमार्गी शाखा की निम्नलिखित विशेषताएँ परिलक्षित होती है— १. शृंगारिकता २. आलंकारिकता ३. भक्ति और नीति ४ काव्यरूप ५. ब्रजभाषा की प्रधानता ६. जीवन-दर्शन का अभाव १. शृंगारिता—रीतिकाल मे शृंगार-वर्णन की प्रधानता रही है । इसी प्राधान्य के कारण कतिपय विद्वान् इस काल को ‘शृंगार काल’ कहना उप- युक्त समझते है । शृंगार-रस का जितना सूक्ष्म विवेचन इस काल मे हुआ है, उतना किसी काल मे नही हुआ । इस प्रवृत्ति का मुख्य कारण तत्कालीन राज- नीतिक और सामाजिक परिस्थितियाँ है । कवियो का ध्येय अपने आश्रयदाता का मनोरजन करना होता था और मनोरजन के लिए शृंगार के अलावा और क्या विषय उपयुक्त हो सकता है । भक्तिकाल मे माधुर्य भक्ति का जो अबाध स्रोत बहा और उसमे जिस शृंगार को अलौकिक रूप दिया गया, वही रीति- काल मे आकर लौकिक और मांसल बन गया । प्रथम दर्शन से लेकर सुरतांत तक के चित्रों का इस काल के कवियो ने बडे मनोयोग से चित्रण किया । इसी कारण इनकी दृष्टि मे प्रेम और नारी का स्वस्थ स्वरूप न आ सका । डॉ० भागीरथ मिश्र के शब्दो मे— ‘शृंगारिकता के प्रति उनका (रीतिकालीन कवियो का) दृष्टिकोण मुख्यतः भोगपरक था, इसीलिए प्रेम के उच्चतर सोपानो की ओर वे न जा सके । प्रेम की अनन्यता, एकनिष्ठता, त्याग, तपश्चर्या आदि उदात्त पक्ष भी उनकी दृष्टि मे बहुत कम आए है । उनका विलासोन्मुख जीवन और दर्शन सामान्यतः प्रेम या शृंगार के बाह्य पक्ष शारीरिक आकर्षण तक ही सीमित रहकर रूप को मादक बनाने वाले उपकरण ही जुटाता रहा । यह प्रवृत्ति नायिका-भेद, नख- शिख वर्णन, ऋतु-वर्णन, अलंकार निरूपण सभी जगह देखी जा सकती है ।’ २. आलंकारिकता—रीतिकालीन कवियो के काव्य के दो प्रमुख उद्देश्य थे—मनोरंजन और पांडित्य-प्रदर्शन । आलंकारिकता का प्राधान्य इन दोनो ही कारणो से रीतिकालीन काव्य मे समाविष्ट हुआ ।, यह सच है कि काव्य मे
४ रसखान-ग्रन्थावली
अलंकारों को उसकी शोभा के आधार पर धर्म माना गया है और यदि उनका समुचित प्रयोग किया जाए तो काव्य प्रभाव एवं भावप्रेषणीयता में बहुत सीमा तक सहायक सिद्ध होते हैं। किन्तु रीतिकालीन कवियों ने अलंकारों का प्रयोग प्राय चमत्कार-प्रदर्शन के लिए ही किया, इसलिए इस काल में श्लेष और यमक जैसे श्रमसाध्य अलंकारों का बोलबाला रहा। उन कवियों ने चमत्कार के प्रति अपना इतना गहन प्रलोभन दिखाया है कि यदि रस और चमत्कार में से उन्हें एक को ग्रहण करने का अवसर आया है तो उन्होंने चमत्कार को ही ग्रहण किया है। ३. भक्ति और नीति - जो भक्ति भक्तिकाल में कवियों का साध्य थी, वही इस काल में आकर साधन बन गई। इन्होंने राधा और कृष्ण को लौकिक धरातल पर ला खड़ा किया और तब ये साधारण नायिका और नायक बनकर रह गए। भक्ति के प्रति इस काल के कवियों का कोई रुझान नहीं था और न ये ऐसे वातावरण में ही थे जो भक्ति के अनुकूल पड़ता है। फलतः राधा और कृष्ण के माध्यम से इन्होंने शृंगारिकता की ही अभिव्यक्ति की है। डॉ० नगेन्द्र के शब्दों में - 'यह भक्ति भी उनकी शृंगारिकता का अंग थी। जीवन की अतिशय रसिकता से जब ये लोग घबड़ा उठते होंगे तो राधा-कृष्ण का यही अनुराग उनके धर्मभीरु मन को आश्वासन देता होगा। इस प्रकार रीतिकालीन भक्ति एक ओर सामाजिक कवच और दूसरी ओर मानसिक शरणभूमि के रूप में इनकी रक्षा करती थी। तभी तो ये किसी तरह उनका अंचल पकड़े हुए थे। रीतिकाल का कोई भी कवि भक्तिभावना से हीन नहीं है-- हो भी नहीं सकता था, क्योंकि भक्ति उसके लिए एक मनोवैज्ञानिक आवश्यकता थी। भौतिक रस की उपासना करते हुए उसके विलास-जर्जर मन में इतना नैतिक बल नहीं था कि भक्तिरस में अनास्था प्रकट करने का उसका सैद्धांतिक निषेध करते। इसलिए रीतिकाल के सामाजिक जीवन और काव्य में भक्ति का आभास अनि- वार्यत वर्तमान है और नायक-नायिका के लिए बार-बार हरि और राधिका शब्दों का प्रयोग किया गया है।' जहाँ तक नीति का सम्बन्ध है, इस विषय में इन लोगों ने जो कुछ लिखा है, वह यथार्थ और व्यावहारिक है। वस्तुतः इनका वातावरण भक्ति की
समीक्षा भाग ५ अपेक्षा नीति के अधिक निकट था। ४. काव्यरूप—इस काल का वातावरण मुक्तकों के ही अधिक अनुरूप था, क्योंकि मनोरंजन इस काल के काव्य का मुख्य प्रयोजन था। ऐसे वातावरण में किसी प्रबंधकाव्य की आशा करना अनुचित ही है। काव्य का मूल्यांकन उसके चमत्कार में निहित था। अतः कवि मुक्तक पदों में ही अपनी कवि-प्रतिभा और पाण्डित्य प्रदर्शन कर सकते थे। प्रबंध और मुक्तक के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए आचार्य शुक्ल मुक्तक के लिए उपयुक्त वातावरण का निर्देश करते हुए लिखते हैं — 'मुक्तक में प्रबंध के समान रस की धारा नहीं रहती जिसमें कथा-प्रसंग की परिस्थिति में अपने आपको भूला हुआ पाठक मग्न हो जाता है और हृदय में एक स्थायी प्रभाव ग्रहण करता है। इसमें रस के ऐसे छींटे पड़ते हैं जिनमें हृदय-कलिका थोड़ी देर के लिए खिल उठती है। यदि प्रबंधकाव्य वनस्थली है तो मुक्तक एक चुना हुआ गुलदस्ता है। इसीसे वह सभा-समाजों के लिए अधिक उपयुक्त होता है। उसमें उत्तरोत्तर अनेक दृश्यों द्वारा संघटित पूर्ण जीवन या उसके किसी एक पूर्ण अंग का प्रदर्शन नहीं होता, कोई एक रमणीय खंडदृश्य इस प्रकार सामने ला दिया जाता है कि पाठक या श्रोता कुछ क्षणों के लिए मन्त्र-मुग्ध-सा हो जाता है। इसके लिए कवि को मनोरम वस्तुओं या व्यापारों का एक छोटा-सा स्तवक कल्पित करके उन्हें अत्यन्त संक्षिप्त और सशक्त भाषा में प्रदर्शित करना पड़ता है।' कहने की आवश्यकता नहीं कि शुक्ल जी का यह विवेचन रीतिकालीन काव्यरूप पर भी उतना ही फिट बैठता है जितना स्वतंत्र रूप से। रीतिकाल में कुछ प्रबंधकाव्य भी लिखे गये हैं, पर मुक्तक काव्यों की तुलना में उनकी संख्या नगण्य ही है। ५. ब्रजभाषा की प्रधानता—इस काल में ब्रजभाषा के प्रयोग को ही कवियों ने अधिक महत्त्व दिया और समूचे रीति-कालीन काव्य में इसी भाषा का बोलबाला रहा। इस प्रयोगाधिक्य से ब्रजभाषा को भी नई शक्ति, नई सजीवता एवं नई प्राणवत्ता मिली। ६. जीवन-दर्शन का अभाव—रीतिकालीन कवियों के समक्ष यथार्थ जीवन का कोई महत्त्व नहीं था और न जीवन की सम्पूर्णता ही उन्हें वांछित
६ रसखान-ग्रन्थावली थी । वे तो जीवन के केवल उसी भाग को ग्रहण करते थे जिसमें कल्पनाओ की उड़ाने और वासना की थिरकनें थी, युवावस्था से युक्त जीवन ही रीतिकालीन कवियो का प्रतिपाद्य था । प्रो० भगीरथ मिश्र के शब्दो मे— 'ऐसे लगता है कि रीति कविता के रचियता यौवन और वसन्त के कवि है । जीवन का फूलता हुआ सुघर रूप ही उन्हें प्रिय है । पतझड, सघर्ष और विनाश सम्भवत स्वतः जीवन मे इतने घोर रूप मे विद्यमान था कि कवि काव्य मे भी उसको उतारकर नैराश्य और निवृत्ति की भावना को जगाना नही चाहता है । वह तो फूलते-फलते जीवन का भ्रमर है । उसने जीवन का एक ही स्वरूप लिया, एक ही पक्ष लिया, यह इस धारा के कवि की संकीर्णता है, दुर्बलता है, और एकागिता है, परन्तु जिस पक्ष को उसने लिया है उसके चित्रण मे उसने कोई कसर उठा नही रखी । उसके समस्त वैभव और विलास के चित्रण मे उसने कलम तोड़ दी है ।' यही कारण है कि रीतिकालीन कवि के पास न तो कोई स्वस्थ जीवन है और न कोई जीवन-दर्शन है । रीतिकाल की दूसरी काव्यधारा रीतिमुक्त कवियो की है । घनानंद, आलम, बोधा, रसखान आदि इस धारा के प्रमुख कवि है । ये कवि न तो किसी परम्परा से सबद्ध है और न किसी काव्यशास्त्रीय नियमन से । ये भावावेश के कवि है। इनके मन मे जो भी भाव स्फुरित होता है, उसे ये अत्यन्त सबल एव प्रभावोत्पादक अभिव्यंजना के माध्यम से प्रकट करते है । इनके अपने सिद्धात, अपनी रीति और अपनी अभिव्यंजना शैली है । इनको तो वही व्यक्ति समझ सकता है जो ब्रजभाषा का अधिकारी विद्वान् होने के साथ-साथ महास्नेही हो । रसखान का सम्बन्ध इसी धारा से है, अतः इस धारा का परि- चय प्राप्त करना आवश्यक है । भक्ति के युग के पवित्र ब्रह्मद्रव की धारा को पार कर जब हिन्दी के कवियो ने तनिक सामने की ओर अपनी दृष्टि दौड़ाई तो हरे-हरे लता-कुंजो, कदम्ब के घने वृक्षों तथा हरियाली से भरे फूलों वाली निर्मल जल की धारा ने उनके मन को अपनी ओर आकर्षित कर लिया, फिर क्या था, वही उनका मन "श्याम ह्वै समान्यो, यमुना यमुन जल तरंग मे" कवियो के लिए कविता का एक नया सुन्दर मार्ग मिल गया । यहाँ कविता की शैली में एक
समीक्षा भाग ७ नूतन परम्परा का आविष्कार हुआ । आगे चलकर इस नवीन परम्परा को रीतिकाल के नाम से अभिहित किया गया । हिन्दी-साहित्य का यह रीतिकाल सभी दृष्टियो से ऊँचा और आदर्श माना जाता है । इस युग मे कविता करने की एक ऐसी प्रणाली बन गई, जिसका अवलम्ब सभी परवर्ती कवियो ने लिया । सच पूछा जाए तो भाषा, शैली और विषय तीनो दृष्टियो से यह काल एक ऐसा राजमार्ग बना, जिस पर चलकर तत्कालीन कवियो को कविता करने मे विशेष सुविधाएँ मिली । इस युग मे कविता-पद्धति के हम दो विभिन्न रूप देखते हैं । एक रीतियुक्त और दूसरा रीतिमुक्त । रीतियुक्त कवियो ने काव्य के लक्षण-ग्रन्थो के आधार पर कविताएँ लिखी पर रीतिमुक्त कवियो ने स्व- तन्त्र रूप से अपनी रचनाएँ उपस्थित की । इन कवियो मे से प्रमुख कवि घनानन्द थे । सच पूछा जाए तो इन कवियो की स्थिति रीतिकाल मे उसी प्रकार की थी जिस प्रकार कमल की स्थिति जल मे होती है । सूक्ष्म रूप से इनके काव्य का अध्ययन करने से इस बात की प्रामाणिकता स्पष्ट हो जाती है । रीतिकालीन कविता का राजमार्ग आद्योपान्त शृंगार रस से अभिसिंचित है, इसमे संभवत तो किसीको भी सन्देह नही, पर रीतिमुक्त कवियो ने इस पथ पर जहाँ तक सचरण किया भक्ति के, अगर, धूप, चन्दन से उसे पवित्र कर दिया । इनकी कविता केवल शृंगार की वशी-ध्वनि ही नही, अपितु भक्ति की खञ्जडी भी मुखरित सुनाई पडती है । इन्होने शृंगार के साथ भक्ति का मिश्रण करके बिहारी के 'श्याम हरित द्युति होय' से कुछ कम कमाल नही किया । दो शब्दो मे यदि हम रीतिमुक्त कवियो को रीति पर- म्परावादी कवियो मे भक्त कवि मान ले तो अधिक युक्तिसंगत होगा । इस परम्परा के अन्तर्गत घनानन्द, बोधा, आलम, निवाज, ठाकुर आदि प्रमुख हैं । इस धारा के कवियो के काव्य की प्रमुख विशेषताएँ या सामान्य प्रवृत्तियाँ निम्नलिखित हैं:— १. काव्य-रचना का प्रेरणा स्रोत निजी जीवन :—यद्यपि इन कवियों मे से कुछ का संबंध विभिन्न राजाओं के दरबार से भी रहा । किन्तु फिर भी इन्होंने केवल अपने आश्रयदाताओं को प्रसन्न करने के