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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

हैं एवं समस्त शत्रुओं को मारते हैं. (२)
अग्निह्र त्यं जरतः कर्णमावाग्निरद्भ्यो निरदहज्जरूथम्.
अग्निरत्रिं घर्म उरुष्यदन्तरग्निर्नृमेधं प्रजयासृजत्सम्.. (३)
अग्नि ने उस प्रसिद्ध ऋषि जरत्कर्ण की रक्षा की एवं जल से निकलकर जरुथ नामक
शत्रु को जलाया. अग्नि ने अग्निकुंड में पड़े हुए अत्रि ऋषि की रक्षा की तथा नृमेध ऋषि को
संतान वाला बनाया. (३)
अग्निर्दद् द्रविणं वीरपेशा अग्निॠषिं यः सहस्रा सनोति.
अग्निर्दिवि हव्यमा ततानाग्नेर्धामानि विभृता पुरत्रा.. (४)
प्रेरक ज्वालाओं वाले अग्नि धन देते हैं. वे हजारों गायों वाले ऋषियों को पुत्र देते हैं,
यजमानों का दिया हुआ हवि द्युलोक में पहुंचाते हैं एवं धरती पर अनेक रूप धारण करते हैं.
(४)
अग्निमुक्थैॠषयो वि ह्वयन्तेऽग्निं नरो यामनि बाधितासः.
अग्निं वयो अन्तरिक्षे पतन्तोऽग्निः सहस्रा परि याति गोनाम्.. (५)
ऋषि मंत्रों के द्वारा अग्नि को बुलाते हैं. युद्ध में शत्रुओं द्वारा बाधित मनुष्य विजय पाने
के लिए अग्नि को बुलाते हैं. आकाश में उड़ते हुए पक्षी अग्नि की स्तुति करते हैं. वे हजारों
गायों से घिरकर जाते हैं. (५)
अग्निं विश ईळते मानुषीर्या अग्निं मनुषो नहुषो वि जाताः.
अग्निर्गान्धर्वीं पथ्यामृतस्याग्नेर्गव्यूतिर्घृत आ निषत्ता.. (६)
मानव प्रजाएं अग्नि की स्तुति करती हैं. राजा नहुष से उत्पन्न संतान अग्नि की स्तुति
करती है. अग्नि यज्ञ के लिए हितकारक गंधर्ववचन सुनते हैं. अग्नि का मार्ग घी में डूबा हुआ
है. (६)
अग्नये ब्रह्म ऋभवस्ततक्षुरग्निं महामवोचामा सुवृक्तिम्.
अग्ने प्राव जरितारं यविष्ठाग्ने महि द्रविणमा यजस्व.. (७)
बुद्धिमान् ऋभुओं ने अग्नि के लिए स्तुतियां बनाई हैं. हमने भी महान् अग्नि की स्तुति
की है. अतिशय युवा अग्नि! स्तोता की रक्षा करो एवं हमें विशाल धन दो. (७)
सूक्त—८१ देवता—विश्वकर्मा
य इमा विश्वा भुवनानि जुह्वदृषिर्होता न्यसीदत् पिता नः.
स आशिषा द्रविणमिच्छमानः प्रथमच्छदवराँ आ विवेश.. (१)
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अग्नि का आह्वान करने वाले हमारे पिता विश्वकर्मा सारे संसार को अग्नि में हवन के
लिए डालकर स्वयं भी उसीमें बैठ गए. वे स्तुतियों द्वारा धन की कामना करते हुए पहले
अग्नि का आच्छादन बने और बाद में उसीमें प्रवेश कर गए. (१)
किं स्विद्वासीदधिष्ठानमारम्भणं कतमत्स्वित्कथासीत्.
यतो भूमिं जनयन्विश्वकर्मा वि द्यामौर्णोन्महिना विश्वचक्षा:.. (२)
सृष्टि बनाते समय विश्वकर्मा का आधार क्या था? उन्होंने सृष्टि का आरंभ कहां और
किस प्रकार किया? विश्व को देखने वाले विश्वकर्मा के किस स्थान पर स्थित होकर धरती के
बाद आकाश को बनाया? (२)
विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्पात्.
सं बाहुभ्यां धमति सं पतत्रैर्द्यावाभूमी जनयन्देव एक:.. (३)
विश्वकर्मा की आंखें, मुख, बाहु एवं चरण सब ओर फैले हुए हैं. उस देव ने अकेले ही
बाहुओं और चरणों से भली-भांति गति करके द्यावा और भूमि को बनाया. (३)
किं स्विद्वनं क उ स वृक्ष आस यतो द्यावापृथिवी निष्टतक्षु:.
मनीषिणो मनसा पृच्छतेदु तद्यदध्यतिष्ठद्भुवनानि धारयन्.. (४)
वह कौन सा वन एवं वृक्ष है, जिसने द्यावा-पृथिवी को निष्पादित किया. हे विद्वानो!
अपने से यह पूछो कि ईश्वर भुवनों को धारण करके किस पर स्थित होता है? (४)
या ते धामानि परमाणि यावमा या मध्यमा विश्वकर्मन्नुतेमा.
शिक्षा सखिभ्यो हविषि स्वधाव: स्वयं यजस्व तन्वं वृधान:.. (५)
हे हव्यरूप अन्न धारण करने वाले विश्वकर्मा! तुम्हारे जो परम धाम अथवा उत्तम,
मध्यम एवं साधारण शरीर हैं, उन्हें हव्य प्राप्त करके हमें दो. तुम अपने शरीर को बढ़ाते हुए
स्वयं यज्ञ करो. (५)
विश्वकर्मन् हविषा वावृधान: स्वयं यजस्व पृथिवीमुत द्याम्.
मुह्यन्त्वन्ये अभितो जनास इहास्माकं मघवा सूरिरस्तु.. (६)
हे विश्वकर्मा! तुम हव्य से बढ़कर स्वयं धरती एवं द्यौ को पूजित करो, इस यज्ञ में यज्ञ न
करने वाले लोग मूर्च्छित हों एवं धनस्वामी विश्वकर्मा स्वर्गफल देने वाले हों. (६)
वाचस्पतिं विश्वकर्माणमूतये मनोजुवं वाजे अद्या हुवेम.
स नो विश्वानि हवनानि जोषद्विश्वशम्भूरवसे साधुकर्मा.. (७)
हम मंत्रों की रक्षा करने वाले विश्वकर्मा को आज यज्ञ में अपनी रक्षा के लिए बुलाते हैं.
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सूक्त—८२ देवता—विश्वकर्मा

वे हमारे सभी हवनों को स्वीकार करें एवं हमारी रक्षा के लिए सबके सुखोत्पादक एवं भले
काम करने वाले बनें. (७)
सूक्त—८२ देवता—विश्वकर्मा
चक्षुषः पिता मनसा हि धीरो घृतमेने अजनन्नम्नमाने.
यदेदन्ता अददृहन्त पूर्व आदिद् द्यावापृथिवी अप्रथेताम्.. (१)
शरीर को उत्पन्न करने वाले, स्वयं को अद्वितीय समझने वाले एवं धीर विश्वकर्मा ने
सबसे पहले जल को उत्पन्न किया. इसके पश्चात् जल में इधर उधर चलने वाले द्यावा-पृथिवी
का निर्माण किया. विश्वकर्मा ने द्यावा-पृथिवी के प्राचीन एवं अंतिम भागों को दृढ़ करके
प्रसिद्ध किया. (१)
विश्वकर्मा विमना आद्विहाया धाता विधाता परमोत संदृक्.
तेषामिष्टानि समिषा मदन्ति यत्रा सप्तऋषीन्यर एकमाहुः.. (२)
विशाल मन वाले विश्वकर्मा स्वयं महान् हैं. वे सृष्टि का निर्माण करने वाले वृष्टिकर्त्ता,
श्रेष्ठ एवं सब कुछ देखने वाले हैं. विद्वान् लोग कहते हैं कि सप्तर्षियों से भी ऊंचे स्थानों को वे
अकेले ही देखते हैं. उन सप्तर्षियों की अभिलाषाएं हव्यान्न द्वारा पूर्ण होती हैं. (२)
यो नः पिता जनिता यो विधाता धामानि वेद भुवनानि विश्वा.
यो देवानां नामधा एक एव तं सम्प्रश्नं भुवना यन्त्यन्या.. (३)
जो विश्वकर्मा हमारा पालन करने वाले, उत्पन्न करने वाले व विश्व के उत्पादक हैं तथा
देवों के तेज एवं सभी भुवनों को जानते हैं. जो एकमात्र देवों का नाम रखने वाले हैं, सब
प्राणी उन्हीं के विषय में जानना चाहते हैं. (३)
त आयजन्त द्रविणं समस्मा ऋषयः पूर्वे जरितारो न भूना.
असूर्ते सूर्ते रजसि निषत्ते ये भूतानि समकृण्वन्निमानि.. (४)
जिन ऋषियों ने स्थावर और जंगमरूप विश्व का निर्माण हो जाने पर सभी प्राणियों को
बनाया, उन्हीं ऋषियों ने प्राचीन स्तोताओं के समान धन व्यय करके यज्ञ किया. (४)
परो दिवा पर एना पृथिव्या परो देवेभिरसुरैर्यदस्ति.
कं स्विद्गर्भं प्रथमं दध्र आपो यत्र देवाः समपश्यन्त विश्वे.. (५)
वह ईश्वर द्युलोक, धरती, देवों व असुरों से महान् हैं. जलों ने वह कौन सा गर्भ धारण
किया था, जहां सभी देवों ने स्वयं को परस्पर मिला हुआ देखा. (५)
तमिद्गर्भं प्रथमं दध्र आपो यत्र देवाः समगच्छन्त विश्वे.

अजस्य नाभावध्येकमर्पितं यस्मिन्विश्वानि भुवनानि तस्थुः.. (६)
जल ने उन्हीं विश्वकर्मा को गर्भ में धारण किया था. वहीं सब देव एक-दूसरे से मिले.
उस जन्मरहित की नाभि में ब्रह्मांड स्थित है. उसीमें सारा संसार स्थित है. (६)
न तं विदाथ य इमा जजानान्यद्युष्माकमन्तरं बभूव.
नीहारेण प्रावृता जल्प्या चासुतृप उक्थशासश्चरन्ति.. (७)
जिस विश्वकर्मा ने उन सब प्राणियों को उत्पन्न किया था, उसे तुम नहीं जानते. तुम्हारा
हृदय उसे जानने की योग्यता नहीं रखता. लोग अज्ञान रूपी पाले से ढक कर तरह-तरह की
बातें करते हैं. वे भोजन करते हुए भांति-भांति की स्तुतियां करते हैं और स्वर्ग में जाने का
प्रयत्न करते हैं. (७)
सूक्त—८३ देवता—मन्यु
यस्ते मन्योऽविधद्वज्र सायक सह ओजः पुष्यति विश्वमानुषक्.
साह्याम दासमार्यं त्वया युजा सहस्कृतेन सहसा सहस्वता.. (१)
हे वज्र के समान सारपूर्ण एवं बाण के समान शत्रुनाशक मन्यु! जो यजमान तुम्हारी
पूजा करता है, वह ओज एवं बल धारण करता है एवं संग्राम में सभी शत्रुओं को जीतता है.
तुम्हारी सहायता से हम दास और आर्य दो प्रकार के शत्रुओं को हरावें, तुम शक्ति के उत्पादक
एवं शक्तिशाली हो. (१)
मन्युरिन्द्रो मन्युरेवास देवो मन्युर्होता वरुणो जातवेदाः.
मन्युं विश ईळते मानुषीर्याः पाहि नो मन्यो तपसा सजोषाः.. (२)
मन्यु इंद्र है. मन्यु ही देव है. मन्यु वरुण, होता और जातवेद अग्नि हैं. सभी मानव प्रजाएं
मन्यु की स्तुति करती हैं. हे मन्यु! तुम हमारे पिता तप के साथ मिलकर हमारी रक्षा करो. (२)
अभीहि मन्यो तवसस्तवीयान्तपसा युजा वि जहि शत्रून्.
अमित्रहा वृत्रहा दस्युहा च विश्वा वसून्या भरा त्वं नः.. (३)
हे अतिशय शक्तिशाली मन्यु! तुम हमारे यज्ञ में आओ. तुम मेरे पिता तप से मिलकर
शत्रुओं को मारो. हे शत्रुनाशक वृत्रवधकर्त्ता एवं राक्षसों को मारने वाले मन्यु! तुम सब प्रकार
का धन हमारे लिए लाओ. (३)
त्वं हि मन्यो अभिभूत्योजाः स्वयम्भूर्भामो अभिमातिषाहः.
विश्वचर्षणिः सहुरिः सहावानस्मास्वोजः पृतनासु धेहि.. (४)
हे मन्यु! तुम शत्रुओं को हराने वाली शक्ति से संपन्न स्वयं ही उत्पन्न क्रुद्ध
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शत्रुपराभवकारी सबको देखने वाले, सहनशील एवं शक्तिशाली हो. तुम संग्राम में हमें ओज
प्रदान करो. (४)
अभागः सन्नप परेतो अस्मि तव क्रत्वा तविषस्य प्रचेतः.
तं त्वा मन्यो अक्रतुर्जिहीळाहं स्वा तनूर्बलदेयाय मेहि.. (५)
हे उत्तम ज्ञान वाले मन्यु! तुम्हारे यज्ञकर्म में भाग न लेने के कारण मैं युद्ध में शत्रुओं से
हारकर दूर आ गया हूं. मुझ यज्ञरहित ने तुमको क्रुद्ध कर दिया है. तुम शक्ति देने के निमित्त
मेरे शरीर में आओ. (५)
अयं ते अस्म्युप मेह्यर्वाङ् प्रतीचीनः सहुरे विश्वधायः.
मन्यो वज्रिन्नभि मामा ववृत्स्व हनाव दस्यूँरुत बोध्यापेः.. (६)
हे शत्रुओं को सहनशील एवं विश्व के धारक मन्यु! मैं तुम्हारा यज्ञ करने वाला सेवक हूं.
तुम मेरे पास आओ. हे वज्रधारी मन्यु! तुम मेरे पास आकर बढ़ो. तुम मुझे अपना बंधु
समझो. हम दोनों शत्रुओं को मारें. (६)
अभि प्रेहि दक्षिणतो भवा मेऽधा वृत्राणि जङ्घनाव भूरि.
जुहोमि ते धरुणं मध्वो अग्रमुभा उपांशु प्रथमा पिबाव.. (७)
हे मन्यु! मेरे पास आओ और मेरे दाहिनी ओर खड़े होओ. इस प्रकार हम दोनों बहुत से
शत्रुओं को मार सकेंगे. मैं तुम्हारे निमित्त मधुर धारक और उत्तम सोमरस का होम करता हूं.
हम दोनों एकांत स्थान में सबसे पहले सोमरस पिएं. (७)
सूक्त—८४ देवता—मन्यु
त्वया मन्यो सरथमारुजन्तो हर्षमाणासो धृषिता मरुत्वः.
तिग्मेषव आयुधा संशिशाना अभि प्र यन्तु नरो अग्निरूपाः.. (१)
हे मरुतों से युक्त मन्यु! तुम्हारे साथ एक रथ पर बैठकर जाते हुए प्रसन्न, धृष्ट, तीखे
बाणों वाले, आयुधों को तेज करते हुए एवं अग्नि के समान शत्रुओं को जलाने वाले नेता देव
हमारी सहायता के लिए युद्ध में आवें. (१)
अग्निरिव मन्यो त्विषितः सहस्व सेनानीर्नः सहुरे हूत एधि.
हत्वाय शत्रून्वि भजस्व वेद ओजो मिमानो वि मृधो नुदस्व.. (२)
हे मन्यु! तुम अग्नि के समान प्रज्वलित होकर शत्रुओं को जलाओ. हे सहनशील एवं
बुलाए गए मन्यु! संग्राम में हमारे सेनापति बनो. तुम युद्ध में शत्रुओं को मारकर उनका धन
हमें दो तथा हमें शक्ति प्रदान करते हुए शत्रुओं को मारो. (२)
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सहस्व मन्यो अभिमातिमस्मे रुजन्पृणन्प्रमृणन् प्रेहि शत्रून्.
उग्रं ते पाजो नन्वा रुरुध्वे वशी वशं नयस एकज त्वम्.. (३)
हे मन्यु! हम पर आक्रमण करने वाले शत्रु को हराओ. तुम शत्रुओं को मारते हुए,
विशेषरूप से उनकी हिंसा करते हुए एवं सदा के लिए समाप्त करते हुए उनके पास जाओ.
तुम्हारा उग्र बल रोका नहीं जा सकता. तुम अकेले ही शत्रुओं को वश में कर लेते हो. (३)
एको बहूनामसि मन्यवीळितो विशंविशं युधसे सं शिशाधि.
अकृत्तरुक्त्वया युजा वयं द्युमन्तं घोषं विजयाय कृण्महे.. (४)
हे प्रशंसित मन्यु! तुम अकेले ही बहुत से शत्रुओं को हरा सकते हो. तुम हमारे प्रत्येक
व्यक्ति को युद्ध के लिए तीखा बनाओ. हे अच्छिन्न दीप्ति वाले मन्यु! तुमसे मिलकर हम
विजय के लिए सिंह के समान शक्तिशाली गर्जन करते हैं. (४)
विजेषकृदिन्द्रइवानवब्रवोऽस्माकं मन्यो अधिपा भवेह.
प्रियं ते नाम सहुरे गृणीमसि विद्मा तमुत्सं यत आबभूथ.. (५)
हे मन्यु! तुम इंद्र के समान विजय प्राप्त करने वाले एवं अनिंदित वचन हो. तुम इस यज्ञ
में हमारे विशेष रक्षक बनो. हे शत्रुओं को सहन करने वाले मन्यु! हम तुम्हारी प्रिय स्तुति करते
हैं. हम उस शक्ति के उद्गमरूप स्तोत्र को जानते हैं जिससे तुम बढ़ते हो. (५)
आभूत्या सहजा वज्र सायक सहो बिभर्ष्यभिभूत उत्तरम्.
क्रत्वा नो मन्या सह मेद्येधि महाधनस्य पुरुहूत संसृजि.. (६)
हे वज्र के समान सारयुक्त एवं बाण के समान शत्रुनाशक एवं शत्रुपराभवकारी मन्यु!
शत्रु को पराजित करना तुम्हारा स्वाभाविक गुण है तथा तुम उत्तम तेज धारण करते हो. तुम
यज्ञकर्म के कारण युद्ध में हमारे प्रति स्नेहपूर्ण बनो. बहुत से लोग तुम्हें बुलाते हैं. (६)
संसृष्टं धनमुभयं समाकृतमस्मभ्यं दत्तां वरुणश्च मन्युः.
भियं दधाना हृदयेषु शत्रवः पराजितासो अप नि लयन्ताम्.. (७)
वरुण और मन्यु दोनों ही हमें भली प्रकार लाया हुआ एवं विभक्त न होने वाला अन्न दें.
हमारे शत्रु अपने मन में भयभीत एवं पराजित होकर भाग जावें. (७)
सूक्त—८५ देवता—सोम
सत्येनोत्तभिता भूमिः सूर्येणोत्तभिता द्यौः.
ऋतेनादित्यास्तिष्ठन्ति दिवि सोमो अधि श्रितः.. (१)
देवों में सत्यरूप ब्रह्मा ने धरती को ऊपर रोक लिया है एवं सूर्य ने द्युलोक को धारण
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किया है. यज्ञ के द्वारा देवता स्थित हैं एवं सोम द्युलोक में स्थित हैं. (१)
सोमेनादित्या बलिनः सोमेन पृथिवी मही.
अथो नक्षत्राणामेषामुपस्थे सोम आहितः.. (२)
देवगण सोम के कारण ही शक्तिशाली बनते हैं एवं सोम से ही धरती महान् बनी है.
सोम इन नक्षत्रों के समीप स्थित हैं. (२)
सोमं मन्यते पपिवान्यत्संपिंषन्त्योषधिम्.
सोमं यं ब्रह्माणो विदुर्न तस्याश्नाति कश्चन.. (३)
लोग जब सोमलता को पीसते हैं तभी समझ लेते हैं कि हमने सोमरस पी लिया. ब्राह्मण
लोग जिसे सोम समझते हैं, उसे कोई भी नहीं पी सकता. (३)
आच्छाद्विधानैर्गृपितो बार्हतैः सोम रक्षितः.
ग्राव्णामिच्छृण्वन्तिष्ठसि न ते अश्नाति पार्थिवः.. (४)
हे सोम! छिपाने के साधन जानने वाले स्तोता लोग तुम्हें छिपाकर सुरक्षित रखते हैं. तुम
पत्थरों का शब्द सुनते हो. धरती पर रहने वाला कोई भी मनुष्य तुम्हें नहीं पी सकता. (४)
यत्त्वा देव प्रपिबन्ति तत आ प्यायसे पुनः.
वायुः सोमस्य रक्षिता समानां मास आकृतिः.. (५)
हे सोम! लोग तुम्हें तीनों सवनों में पीते हैं, इससे तुम बार-बार बढ़ते हो. वायु उसी
प्रकार सोम की रक्षा करते हैं, जिस प्रकार वायु के समान आकार वाले मास, वर्ष की रक्षा
करते हैं. (५)
रैभ्यासीदनुदेयी नाराशंसी न्योचनी. सूर्याया भद्रमिद्वासो गाथयैति परिष्कृतम्.. (६)
सूर्यपुत्री सूर्या के विवाह के समय रेभी नामक ऋचाएं उसकी सखियां बनी थीं तथा
नाराशंसी नामक ऋचाएं उसकी दासियां बनीं. सूर्या का पूरा कल्याणकारी वस्त्र गाथा के द्वारा
ही बनाया गया था. (६)
चित्तिरा उपबर्हणं चक्षुरा अभ्यञ्जनम्. द्यौर्भूमिः कोश आसीद्यदयात्सूर्या पतिम्.. (७)
विवाह के बाद विदा होते समय दिव्यता उसकी चादर एवं आंखें ही अंजन बनी थीं. इस
समय द्यावा-पृथिवी उसके खजाने थे. (७)
स्तोमा आसन-प्रतिधयः कुरीरं छन्द ओपशः.
सूर्याया अश्विना वराग्निरासीत्पुरोगवः.. (८)
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स्तोत्र सूर्या के रथ के पहियों के अरे थे. कुरीर नामक छंद उस रथ का भीतरी भाग था.
अश्विनीकुमार सूर्या के वर एवं अग्नि उसके आगे चलने वाले थे. (८)
सोमो वध्यूरभवदश्विनास्तामुभा वरा. सूर्या यत्पत्ये शंसन्तीं मनसा सविताददात्.. (९)
सूर्या ने जब पति की कामना की और सविता ने मन से अपनी कन्या सोम को दी थी,
उस समय सोम वधू की कामना करने वाले वर थे. अश्विनीकुमार ही सूर्या के वर बने. (९)
मनो अस्या अन आसीद् द्यौरासीदुत च्छदि:.
शुक्रावनड्वाहावास्तां यदयात्सूर्या गृहम्.. (१०)
सूर्या जिस समय पति के घर गई उस समय उसका मन ही उसकी गाड़ी थी, आकाश
परदा था तथा सूर्य एवं चंद्र बैल थे. (१०)
ऋक्सामभ्यामभिहितौ गावौ ते सामनावित:.
श्रोत्रं ते चक्रे आस्तां दिवि पन्थाश्चराचर:.. (११)
ऋग्वेद और सामवेद द्वारा वर्णित सूर्य एवं चंद्रमारूपी दो बैल सूर्या की गाड़ी को खींच
रहे थे. हे सूर्या! तुम्हारे कान ही गाड़ी के पहिए थे एवं आकाश उस रथ का मार्ग था. (११)
शुची ते चक्रे यात्या व्यानो अक्ष आहत:. अनो मनस्मयं सूर्यारोहत्प्रयती पतिम्.. (१२)
हे सूर्या पतिगृह के लिए चलते समय दोनों कान तुम्हारी गाड़ी के पहिए थे एवं वायु उन
में अरों के समान थे. सूर्या इस प्रकार की मनरूपी गाड़ी पर सवार हुई. (१२)
सूर्याया वहतु: प्रागात्सविता यमवासृजत्. अघासु हन्यन्ते गावोऽर्जुन्यो: पर्युह्यते..
(१३)
गाय आदि के रूप में दिया गया दहेज सूर्या के आगे-आगे चला. वह दहेज सूर्य ने दिया
था. मघा नक्षत्र में दी गई गाएं डंडे से हांकी जा रही थीं. पूर्वा फाल्गुनी और उत्तरा फाल्गुनी
नक्षत्रों में सूर्या एवं उसका दहेज पतिगृह ले जाया गया. (१३)
यदश्विना पृच्छमानावयातं त्रिचक्रेण वहतुं सूर्याया:.
विश्वे देवा अनु तद्वामजानन्पुत्र: पितराववृणीत पूषा.. (१४)
हे अश्विनीकुमारो! जिस समय तुम सूर्या के विवाह के विषय में पूछने के लिए तीन
पहियों वाले रथ से गए थे, उस समय सभी देवों ने तुम्हारा समर्थन किया था और पूषा ने तुम्हें
माता-पिता के रूप में स्वीकार किया था. (१४)
यदयातं शुभस्पती वरेयं सूर्यामुप.
क्वैकं चक्रं वामासीत्क्व देष्ट्राय तस्थथु:.. (१५)
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हे जल के स्वामी अश्विनीकुमारो! जिस समय तुम सूर्या का वरण करने उसके समीप
गए, उस समय तुम्हारा एक रथचक्र कहां था एवं तुम दान के लिए कहां स्थित थे? (१५)
द्वे ते चक्रे सूर्ये ब्रह्माण ऋतुथा विदुः. अथैकं चक्रं यद्गुहा तद्धातय इद्विदुः.. (१६)
हे सूर्या! ब्राह्मण लोग जानते हैं कि तुम्हारे शकट के सूर्यचंद्र दोनों पहिए समय के
अनुसार चलते हैं. तुम्हारा संवत्सररूप पहिया जो गुफा में छिपा हुआ है, उसे मेधावी लोग
जानते हैं. (१६)
सूर्यायै देवेभ्यो मित्राय वरुणाय च. ये भूतस्य प्रचेतस इदं तेभ्योऽकरं नमः.. (१७)
सूर्या, देवगण, मित्र, वरुण एवं प्राणियों को अभीष्ट फल देने वालों को मैं नमस्कार
करता हूं. (१७)
पूर्वापरं चरतो माययैतौ शिशू क्रीळन्तौ परि यातौ अध्वरम्.
विश्वान्यन्यो भुवनाभिचष्ट ऋतूँरन्यो विदधज्जायते पुनः.. (१८)
दोनों बालक अर्थात् सूर्य-चंद्र अपनी शक्ति से पूर्व और पश्चिम में घूमते हैं. क्रीड़ा करते
हुए यज्ञ में आते हैं. इन में से पहला अर्थात् सूर्य सब लोकों को देखता है तथा दूसरा अर्थात्
चंद्र वसंत आदि ऋतुओं का निर्माण करता हुआ बार-बार जन्म लेता है. (१८)
नवोनवो भवति जायमानोऽह्नां केतुरुषसामेत्यग्रम्.
भागं देवेभ्यो वि दधात्यायन्प्र चन्द्रमास्तिरते दीर्घमायुः.. (१९)
दिन के सूचक सूर्य उत्पन्न होने पर नए होते हैं एवं उषाओं के सामने जाते हैं. सूर्य आते
हुए देवों में यज्ञ का भाग बांटते हैं एवं चंद्रमा लोगों को चिरजीवन देता है. (१९)
सुकिंशुकं शल्मलिं विश्वरूपं हिरण्यवर्णं सुवृतं सुचक्रम्.
आ रोह सूर्ये अमृतस्य लोकं स्योनं पत्ये वहतुं कृणुष्व.. (२०)
हे सूर्या! तुम शोभन पलाश एवं शाल्मली वृक्षों द्वारा निर्मित नाना रूप वाले सुनहरे
आभूषणों से युक्त संगठित एवं सुंदर पहियों वाले रथ पर चढ़ो. तुम अपने पति से सुखकर
एवं अमृत स्थान पर प्राप्त होओ. (२०)
उदीर्ष्वातः पतिवती ह्ये३षा विश्वावसुं नमसा गीर्भिरीळे.
अन्यामिच्छ पितृषदं व्यक्तां स ते भागो जनुषा तस्य विद्धि.. (२१)
हे विश्वावसु! कन्या के पास से उठो, क्योंकि यह कन्या पति वाली हो चुकी है. मैं
नमस्कार और स्तुतियों द्वारा तुम्हारी स्तुति करता हूं. पिता के घर में विवाह योग्य दूसरी कन्या
हो तो उसकी इच्छा करो. यह समझ लो कि तुम्हारे भाग के रूप में वही उत्पन्न हुई है. (२१)
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उदीर्ष्वातो विश्वावसो नमसेळामहे त्वा. अन्यामिच्छ प्रफर्व्यं१ सं जायां पत्या सृज..
(२२)
हे विश्वावसु! यहां से उठो. मैं नमस्कारपूर्वक तुम्हारी पूजा करता हूं. विशाल नितंबों
वाली अन्य कन्या को चाहो एवं उसे पत्नी बनाकर स्वयं से मिलाओ. (२२)
अनृक्षरा ऋजवः सन्तु पन्था येभिः सखायो यन्ति नो वरेयम्.
समर्यमा सं भगो नो निनीयात्सं जास्पत्यं सुयममस्तु देवाः.. (२३)
हे देवो! जिस मार्ग से हमारे मित्र कन्या के पिता के पास जाते हैं, वह मार्ग कंटकरहित
एवं सरल हो. अर्यमा एवं भग नामक देव हमें भली प्रकार ले चलें. पति एवं पत्नी भली प्रकार
मिलकर रहें. (२३)
प्र त्वा मुञ्चामि वरुणस्य पाशाद्येन त्वाबध्नात्सविता सुशेवः.
ऋतस्य योनौ सुकृतस्य लोकेऽरिष्टां त्वा सह पत्या दधामि.. (२४)
हे वधू! सुंदर मुख वाले सूर्य देव ने तुम्हें जिस बंधन से बांधा था, मैं तुम्हें वरुण के उस
पाश से छुड़ाता हूं. मैं तुम्हें पति के साथ सत्य के आधार एवं सत्कर्म के लोकरूप स्थान में
निर्विघ्नरूप से स्थापित करता हूं. (२४)
प्रेतो मुञ्चामि नामुतः सुबद्धाममुतस्करम्. यथेयमिन्द्र मीढ्वः सुपुत्रा सुभगासति..
(२५)
मैं कन्या को पिता के कुल से छुड़ाता हूं, पति के कुल से नहीं. मैं पति के घर से इसे
भली-भांति बांधता हूं. हे अभिलाषापूरक इंद्र! यह सौभाग्य एवं शोभन पुत्र वाली हो. (२५)
पूषा त्वेतो नयतु हस्तगृह्याश्विना त्वा प्र वहतां रथेन.
गृहान्गच्छ गृहपत्नी यथासो वशिनी त्वं विदथमा वदासि.. (२६)
हे कन्या! पूषा तुम्हारा हाथ पकड़कर यहां से ले जावें. अश्विनीकुमार तुम्हें रथ द्वारा ले
जावें. तुम गृहपत्नी बनने के लिए पति के घर जाओ एवं पति के वश में रहकर घर की
व्यवस्था करो. (२६)
इह प्रियं प्रजया ते समृध्यतामस्मिन् गृहे गार्हपत्याय जागृहि.
एना पत्या तन्वं१सं सृजस्वाधा जिव्री विदथमा वदाथः.. (२७)
हे वधू! तुम इस पतिगृह में प्यारी संतान के साथ समृद्ध बनो. इस घर में तुम गृहस्थी
चलाने के लिए सावधान रहना. इस पति के साथ अपने शरीर का संयोग करो. तुम दोनों बूढ़े
होने तक इस घर को अपना कहना. (२७)
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नीललोहितं भवति कृत्यासक्तिर्व्यज्यते. एधन्ते अस्या ज्ञातयः पतिर्बन्धेषु बध्यते..
(२८)
पाप की देवी कृत्या क्रोध से लालपीले रंग की हो रही है. कृत्या को इस स्त्री पर संबद्ध
करके छोड़ा जाता है. इसकी जाति के लोग बढ़ रहे हैं एवं इसका पति बंधन में है. (२८)
परा देहि शामुल्यं ब्रह्मभ्यो वि भजा वसु.
कृत्यैषा पद्द्वती भूत्व्या जाया विशते पतिम्.. (२९)
मैला कपड़ा उतार दो. ब्राह्मणों को धन दान करो इस प्रकार कृत्या चली जाती है और
पत्नी पति में प्रवेश करती है. (२९)
अश्रीरा तनूर्भवति रुशती पापयामुया. पतिर्यद्वध्वो३ वाससा स्वमङ्गमभिधित्सते..
(३०)
पति यदि वधू के वस्त्र से अपना शरीर ढकना चाहता है तो पति का तेजस्वी शरीर
पापधारिणी कृत्या के कारण श्रीहीन हो जाता है. (३०)
ये वध्वश्चन्द्रं वहतुं यक्ष्मा यन्ति जनादनु. पुनस्तान्यज्ञिया देवा नयन्तु यत आगताः..
(३१)
वधू को प्राप्त स्वर्णरूप दहेज को वहन करने के लिए जो व्याधियां हमारे विरोधियों के
पास से आती हैं. यज्ञभाग को ग्रहण करने वाले देव उन्हें वहीं लौटा दें, जहां से वे आई हैं.
(३१)
मा विदन्परिपन्थिनो य आसीदन्ति दम्पती. सुगेभिर्दुर्गमतीतामप द्रान्तवरातयः.. (३२)
इन पतिपत्नी के समीप जो विघ्नकारी आते हैं, वे समाप्त हो जावें. ये दोनों सुविधाओं
के द्वारा असुविधाओं को नष्ट कर दें एवं इनके शत्रु इनसे दूर रहें. (३२)
सुमङ्गलीरियं वधूरिमां समेत पश्यत. सौभाग्यमस्यै दत्त्वायाथास्तं वि परेतन.. (३३)
यह वधू सौभाग्यशालिनी हो. सब लोग एकत्र होकर इसे देखें. सब लोग इसे सौभाग्य
का आशीर्वाद देकर अपने-अपने घर जावें. (३३)
तृष्टमेतत्कटुकमेतदपाष्ठवद्विषवन्नैतदत्तवे. सूर्या यो ब्रह्मा विद्यात्स इद्वाधूयमर्हति..
(३४)
यह कपड़ा दाहजनक, कठोर, ग्रहण न करने योग्य, मैला और विषयुक्त है. सूर्या को
जानने वाला ब्राह्मण ही इस वधूवस्त्र को पाने का अधिकारी है. (३४)
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आशसनं विशसनमथो अधिविकर्तनम्.
सूर्यायाः पश्य रूपाणि तानि ब्रह्मा तु शुन्धति.. (३५)
सूर्या का रूप देखो. इसके वस्त्र के लपेटने वाले भाग का रंग अलग है और सिर पर
ओढ़ने वाला भाग अलग रंग का है. यह तीन जगह से फटा हुआ है. ब्रह्मा ही इस वस्त्र को
शुद्ध कर सकते हैं. (३५)
गृभ्णामि ते सौभगत्वाय हस्तं मया पत्या जरदष्टिर्यथासः.
भगो अर्यमा सविता पुरन्धिर्महां त्वादुर्गार्हपत्याय देवाः.. (३६)
मैं तुम्हारा हाथ सौभाग्य के लिए पकड़ रहा हूं. मुझ पति के साथ तुम वृद्ध शरीर वाली
बनो. भग, अर्यमा, सविता एवं पूषा आदि देवों ने तुम्हें इसलिए दिया है कि मैं तुम्हारे साथ
गृहस्थ धर्म का पालन कर सकूं. (३६)
तां पूषञ्छिवतमामेरयस्व यस्यां बीजं मनुष्या३ वपन्ति.
या न ऊरू उशती विश्रयाते यस्यामुशन्तः प्रहराम शेपम्.. (३७)
हे पूषा! मनुष्य जिस नारी के गर्भ में बीज बोते हैं, उसे तुम अतिशय कल्याणी बनाकर
भेजो. यह हमारी जंघाओं की कामना करती हुई अपनी जंघाओं को फैलावे एवं हम कामना
करते हुए इसकी विस्तृत जंघाओं में अपनी पुरुषेंद्रिय का प्रवेश करावें. (३७)
तुभ्यमग्रे पर्यवहन्सूर्यां वहतुना सह. पुनः पतिभ्यो जायां दा अग्ने प्रजया सह.. (३८)
हे अग्नि! सूर्या को चादर ओढ़ाकर सबसे पहले तुम्हारे ही समीप लाया जाता है. तुम
पत्नी को संतानसहित पति के लिए देते हो. (३८)
पुनः पत्नीमग्निरदादायुषा सह वर्चसा. दीर्घायुरस्या यः पतिर्जीवाति शरदः शतम्..
(३९)
अग्नि ने आयु और तेज के साथ पत्नी पुनः पति को प्रदान की. इसका पति दीर्घ
अवस्था वाला बनकर सौ बरस जिए. (३९)
सोमः प्रथमो विविदे गन्धर्वो विविद उत्तरः.
तृतीयो अग्निष्टे पतिस्तुरीयस्ते मनुष्यजाः.. (४०)
हे कन्या! सबसे पहले सोम ने तुम्हें पत्नीरूप में प्राप्त किया. इसके बाद तुम्हें गंधर्व ने
प्राप्त किया. तेरा तीसरा पति अग्नि और चौथा मानव है. (४०)
सोमो ददद् गन्धर्वाय गन्धर्वो दददग्नये.
रयिं च पुत्राँश्चादादग्निर्मह्यमथो इमाम्.. (४१)
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सोम ने उस बालिका को गंधर्व को दिया. गंधर्व ने अग्नि को दिया. अग्नि ने यह मुझे
पत्नी रूप में धन एवं पुत्रों सहित प्रदान की. (४१)
इहैव स्तं मा वि यौष्टं विश्वमायुर्व्यश्नुतम्.
क्रीळन्तौ पुत्रैर्नप्तृभिर्मोदमानौ स्वे गृहे.. (४२)
हे वर और वधू! तुम दोनों यहीं रहो, एक-दूसरे से अलग मत होओ एवं पूरी अवस्था
प्राप्त करो. तुम पुत्रों और नातियों के साथ खेलते हुए अपने घर में प्रसन्न रहो. (४२)
आ नः प्रजां जनयतु प्रजापतिराजरसाय समनक्त्वर्यमा.
अदुर्मङ्गलीः पतिलोकमा विश शं नो भव द्विपदे शं चतुष्पदे.. (४३)
प्रजापति हमें संतान दें एवं हमें बुढ़ापे तक साथ-साथ रखें. हे वधू! तुम अमंगलरहित
होकर पति के घर में प्रवेश करो. तुम हमारे मानवों एवं पशुओं के लिए कल्याण कारक बनो.
(४३)
अघोरचक्षुरपतिघ्न्येधि शिवा पशुभ्यः सुमनाः सुवर्चाः.
वीरसूर्देवकामा स्योना शं नो भव द्विपदे शं चतुष्पदे.. (४४)
तुम क्रोधरहित आंखों वाली होकर बढ़ो तथा पति का घात न करने वाली बनो. तुम
पशुओं के लिए कल्याणकारिणी, शोभन मन युक्त एवं तेजपूर्ण बनो. तुम वीरजननी, देवों की
भक्त एवं सुखकारिणी बनो तथा हमारे मानवों और पशुओं का कल्याण करो. (४४)
इमां त्वमिन्द्र मीढ्वः सुपुत्रां सुभगां कृणु.
दशास्यां पुत्राना धेहि पतिमेकादशं कृधि.. (४५)
हे अभिलाषापूरक इंद्र! तुम इस वधू को शोभन पुत्रों-वाली एवं सौभाग्यशालिनी
बनाओ. तुम इसमें मुझे दस पुत्रों को दो एवं मेरे पति को ग्यारहवां करो. (४५)
सम्राज्ञी श्वशुरे भव सम्राज्ञी श्वश्र्वां भव.
ननान्दरि सम्राज्ञी भव सम्राज्ञी अधि देवृषु.. (४६)
हे वधू! तुम ससुर, सास, ननद और देवर के प्रति महारानी बनो. (४६)
समञ्जन्तु विश्वे देवाः समापो हृदयानि नौ.
सं मातरिश्वा सं धाता समु देष्ट्री दधातु नौ.. (४७)
हे विश्वदेव! तुम हमारे हृदयों को आपस में मिलाओ. वायु, धाता और सरस्वती हमें
मिलावें. (४७)
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सूक्त—८६ देवता—इंद्र आदि

सूक्त—८६ देवता—इंद्र आदि
वि हि सोतोरसृक्षत नेन्द्रं देवममंसत.
यत्रामदद्वृषाकपिरर्यः पुष्टेषु मत्सखा विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (१)
इंद्र का स्वागतकथन—
मैंने स्तोताओं से सोमरस निचोड़ने को कहा, पर उन्होंने मेरी बात नहीं मानी. उन्होंने मेरे
स्थान पर मेरे पुत्र वृषाकपि की स्तुति की, सोमरस वाले यज्ञ में स्वामी वृषाकपि मेरे मित्र
बनकर प्रसन्न हुए. मैं सबसे श्रेष्ठ हूं. (१)
परा हीन्द्र धावसि वृषाकपेरति व्यथिः.
नो अह प्र विन्दस्यन्यत्र सोमपीतये विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (२)
हे इंद्र! तुम स्वयं चलकर वृषाकपि के समीप जाते हो. तुम सोमरस के लिए दूसरी जगह
नहीं जाते हो. इंद्र सबसे श्रेष्ठ हैं. (२)
किमयं त्वां वृषाकपिश्चकार हरितो मृगः.
यस्मा इरस्यसीदु न्वर्यो वा पुष्टिमद्वसु विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (३)
हरे रंग के हिरण के तुल्य वृषाकपि ने तुम्हारा क्या प्रिय किया है कि तुम उदार बनकर
उसके लिए पुष्टिकारक अन्न देते हो. इंद्र सबसे श्रेष्ठ हैं. (३)
यमिमं त्वां वृषाकपिं प्रियमिन्द्राभिरक्षसि.
श्वा न्वस्य जम्भिषदपि कर्णे वराहयुर्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (४)
हे इंद्र! जिस प्रिय वृषाकपि की तुम रक्षा करते हो उसके कान को कुत्ते की अभिलाषा
करने वाला कुत्ता काटे. इंद्र सबसे श्रेष्ठ हैं. (४)
प्रिया तष्टानि मे कपिर्व्यक्ता व्यदूदुषत्.
शिरो न्वस्य राविषं न सुगं दुष्कृते भुवं विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (५)
इंद्राणी ने कहा—“यजमानों द्वारा मेरे लिए निर्मित प्रिय हवि वृषाकपि ने दूषित कर
दिए. मैं शीघ्र ही इसका सिर काट डालूंगी. मैं इस दुष्कर्म करने वाले का सुख नहीं चाहती. इंद्र
सबसे श्रेष्ठ हैं. (५)
न मत्स्त्री सुभसत्तरा न सुयाशूतरा भुवत्.
न मत्प्रतिच्यवीयसी न सक्थ्युद्यमीयसी विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (६)
कोई भी स्त्री मेरे समान सौभाग्यशालिनी एवं उत्तम पुत्र वाली नहीं है मेरे समान कोई
भी स्त्री न तो पुरुष को अपना शरीर अर्पित करने वाली है और न संभोग के समय जांघों को

फैलाने वाली है. इंद्र सबसे उत्तम हैं.” (६)
उवे अम्ब सुलाभिके यथेवाङ्ग भविष्यति.
भसन्मे अम्ब सक्थि मे शिरो मे वीव हृष्यति विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (७)
वृषाकपि ने कहा— “हे सुंदर लाभ प्रदान करने वाली माता! जैसे तुमने कहा है कि
तुम्हारी जंघाएं शिर आदि अंग उसी प्रकार के हो जाएंगे. तुम कोयल के समान प्रिय वचन
बोलकर पिता को प्रसन्न करो. इंद्र सबसे श्रेष्ठ हैं.” (७)
किं सुबाहो स्वङ्गुरॆ पृथुष्टो पृथुजाघने.
किं शूरपत्नि नस्त्वमभ्यमीषि वृषाकपिं विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (८)
इंद्र ने कहा— “हे सुंदर भुजाओं, शोभन उंगलियों, लंबे बालों व विस्तृत जंघाओं वाली
एवं वीरपत्नी इंद्राणी! तुम वृषाकपि के प्रति व्यर्थ क्यों क्रोध कर रही हो? इंद्र सबसे श्रेष्ठ हैं.”
(८)
अवीरामिव मामयं शरारुरभि मन्यते.
उताहमस्मि वीरिणीन्द्रपत्नी मरुत्सखा विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (९)
इंद्राणी ने कहा— “यह घातक वृषाकपि मुझे पतिहीना के समान समझता है. मैं
इंद्रपत्नी वीर पुत्रों वाली एवं मरुतों की सखा हूं. इंद्र सबसे श्रेष्ठ हैं.” (९)
संहोत्रं स्म पुरा नारी समनं वाव गच्छति.
वेधा ऋतस्य वीरिणीन्द्रपत्नी महीयते विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (१०)
“नारी सत्य की विधात्री व वीरमाता इंद्रपत्नी यज्ञ या युद्ध के समय वहां जाती है एवं
सबका आदर पाती है. इंद्र सबसे श्रेष्ठ हैं.” (१०)
इन्द्राणीमासु नारिषु सुभगामहमश्रवम्.
नह्यस्या अपरं चन जरसा मरते पतिर्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (११)
इंद्र ने कहा— “मैंने इन सब स्त्रियों में इंद्राणी को सौभाग्य वाली सुना है. इसका पति
अन्य नारियों के समान बुढ़ापे से नहीं मरता. इंद्र सबसे श्रेष्ठ हैं.” (११)
नाहमिन्द्राणि रारण सख्युर्वृषाकपेर्ऋते.
यस्येदमप्यं हविः प्रियं देवेषु गच्छति विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (१२)
“हे इंद्राणी! मैं अपने मित्र वृषाकपि के बिना प्रसन्न नहीं रह सकता. उसीको प्रसन्न
करने वाला हवि देवों के समीप जाता है. इंद्र सबसे श्रेष्ठ हैं.” (१२)
वृषाकपायि रेवति सुपुत्र आद् सुस्नुषे.
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घसत्त इन्द्र उक्षणः प्रियं काचित्करं हविर्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (१३)
“हे वृषाकपि की पत्नी! तुम धनवाली, शोभनपुत्रयुक्त एवं शोभन पुत्रवधू हो. तुम्हारे
बैल को इंद्र खा जावें एवं तुम्हारे सुखकर प्रिय हवि का भक्षण करें. इंद्र सबसे उत्तम हैं.”
(१३)
उक्षणो हि मे पञ्चदश साकं पचन्ति विंशतिम्.
उताहमद्मि पीव इदुभा कुक्षी पृणन्ति मे विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (१४)
इंद्राणी द्वारा प्रेरित याज्ञिक मेरे लिए पंद्रह या बीस बैल पकाते हैं. उन्हें खाकर मैं मोटा
बनता हूं. याज्ञिक लोग मेरी दोनों कोखें सोमरस से भर देते हैं. इंद्र सबसे श्रेष्ठ हैं. (१४)
वृषभो न तिग्मशृङ्गोऽन्तर्यूथेषु रोरुवत्.
मन्थस्त इन्द्र शं हृदे यं ते सुनोति भावयुर्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (१५)
इंद्राणी ने कहा—“हे इंद्र! तीखे सीगों वाला बैल जिस प्रकार गर्जन करता हुआ गायों में
रमण करता है, उसी प्रकार तुम मेरे साथ रमण करो. दधिमंथन का शब्द तुम्हारे लिए
कल्याणकारी हो. प्रेम की अभिलाषिणी इंद्राणी का सोमरस निचोड़ना तुम्हारा कल्याण करे.
इंद्र सबसे श्रेष्ठ हैं. (१५)
न सेशे यस्य रम्बतेऽन्तरा सक्थ्या३ कपृत्.
सेदीशे यस्य रोमशं निषेदुषो विजृम्भते विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (१६)
“वह व्यक्ति मैथुन करने में समर्थ नहीं हो सकता जिसकी पुरुषेंद्रिय जांघों के बीच
लटकती है. वह व्यक्ति मैथुन करने में समर्थ हो सकता है, जिसकी बालों से युक्त पुरुषेंद्रिय
सोते समय विस्तृत होती है. इंद्र सबसे उत्तम हैं.” (१६)
न सेशे यस्य रोमशं निषेदुषो विजृम्भते.
सेदीशे यस्य रम्बतेऽन्तरा सक्थ्या३ कपृद्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (१७)
इंद्र ने कहा—“वह पुरुष मैथुन करने में समर्थ नहीं हो सकता जिसकी बालों वाली
पुरुषेंद्रिय उसके सोते समय विस्तृत होती है, वही व्यक्ति मैथुन करने में समर्थ हो सकता है
जिसकी पुरुषेंद्रिय जांघों के बीच में लटकती है. इंद्र सबसे श्रेष्ठ हैं.” (१७)
अयमिन्द्र वृषाकपिः परस्वन्तं हतं विदत्.
असिं सूनां नवं चरुमाधेश्स्यान आचितं विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (१८)
हे इंद्र! यह वृषाकपि पराए नष्ट धन को प्राप्त करे. वह तलवार वध का स्थल नया चरु
एवं काठ की गाड़ी प्राप्त करे. इंद्र सबसे श्रेष्ठ हैं. (१८)
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अयमेमि विचायकशद्विचिन्वन्दासमार्यम्.
पिबामि पाकसुत्वनोऽभि धीरमचाकशं विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (१९)
मैं यजमानों को देखता हुआ एवं दासों तथा आर्यों को अलग-अलग करता हुआ यज्ञ
की ओर जाता हूं. मैं हवि पकाने वाले एवं सोमरस निचोड़ने वाले का सोमरस पीता हूं तथा
बुद्धिशाली यजमान को देखता हूं. इंद्र सबसे श्रेष्ठ हैं. (१९)
धन्व च यत्कृन्तत्रं च कति स्वित्ता वि योजना.
नेदीयसो वृषाकपेऽस्तमेहि गृहाँ उप विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (२०)
मरुभूमि और वन में कितने योजन की दूरी है? हे वृषाकपि! तुम समीप के घर में ही
आओ और यज्ञशाला में पहुंचो. इंद्र सबसे श्रेष्ठ हैं. (२०)
पुनरेहि वृषाकपे सुविता कल्पयावहै.
य एष स्वप्नंनशनोऽस्तमेषि पथा पुनर्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (२१)
हे वृषाकपि! तुम पुनः हमारे पास आओ. मैं और इंद्राणी तुम्हारे लिए प्रीति कर कार्य
करते हैं. यह सूर्य जिस मार्ग से आते हैं, उसीसे तुम घर में आओ. इंद्र सबसे श्रेष्ठ हैं. (२१)
यदुदञ्चो वृषाकपे गृहमिन्द्राजगन्तन.
क्व१ स्य पुल्वघो मृगः कमगञ्जनयोपनो विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (२२)
हे इंद्र एवं वृषाकपि! तुम ऊपर को मुंह करके मेरे घर आओ. अनेक रसमय पदार्थों को
खाने वाला तथा मनुष्यों को प्रसन्न करने वाला मृग कहां है? इंद्र सबसे श्रेष्ठ हैं. (२२)
पर्शुहं नाम मानवी साकं ससूव विंशतिम्.
भद्रं भल त्यस्या अभूद्यस्या उदरमामयद्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः.. (२३)
हे इंद्र द्वारा छोड़े गए बाण! मनु की पुत्री पर्शु ने एक साथ बीस पुत्रों को जन्म दिया.
जिसका पेट मोटा था, उसका कल्याण हुआ. इंद्र सबसे श्रेष्ठ हैं. (२३)
सूक्त—८७ देवता—राक्षसहंता अग्नि
रक्षोहणं वाजिनमा जिघर्मि मित्रं प्रथिष्ठमुप यामि शर्म.
शिशानो अग्निः क्रतुभिः समिद्धः स नो दिवा स रिषः पातु नक्तम्.. (१)
मैं राक्षसों के हंता शक्तिशाली यजमानों के मित्र और अधिक स्थूल अग्नि का घृत से
हवन करता हूं एवं अग्नि के घर के पास जाता हूं. ज्वालाओं को तेज करने वाले अग्नि
यजमानों द्वारा प्रज्वलित होते हैं. वे हमें हिंसक राक्षसों से रात-दिन बचावें. (१)
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अयोदंष्ट्रो अर्चिषा यातुधानानुप स्पृश जातवेदः समिद्धः.
आ जिह्वया मूरदेवान्रभस्व क्रव्यादो वृक्त्व्यपि धत्स्वास्न्.. (२)
हे जातवेद! तुम प्रज्वलित होकर एवं लोहे के समान तेज दांतों वाले बनकर अपनी
ज्वालाओं से राक्षसों को जलाओ. तुम अपनी जीभ के समान ज्वालाओं से हिंसक राक्षसों
को मारो एवं मांसभक्षी राक्षसों को काटकर अपने मुंह में रख लो (२)
उभोभयाविन्नुप धेहि दंष्ट्रा हिंस्रः शिशानोऽवरं परं च.
उतान्तरिक्षे परि याहि राजञ्जम्भैः सं धेह्यभि यातुधानान्.. (३)
हे दोनों जबड़ों में दांतों वाले एवं राक्षसहिंसक अग्नि! तुम अपनी दोनों ओर की दाढ़ें
तेज करते हुए वधयोग्य राक्षसों पर जमा दो. हे दीप्त अग्नि! तुम आकाश में स्थित राक्षसों के
समीप जाओ एवं अपने दांतों से भक्षण करो. (३)
यज्ञैरिषूः संनममानो अग्ने वाचा शल्यां अशनिभिर्दिहानः.
ताभिर्विध्य हृदये यातुधानान् प्रतीचो बाहूनप्रति भङ्ग्ध्येषाम्.. (४)
हे अग्नि! तुम हमारे यज्ञों और स्तुतियों के द्वारा बाणों को झुकाते हुए एवं उनके फलों
को वज्रों के द्वारा तेज करते हुए उन बाणों से राक्षसों के हृदयों को बेधो तथा उनकी भुजाओं
को तोड़ दो. (४)
अग्ने त्वचं यातुधानस्य भिन्धि हिंस्राशनिर्हरसा हन्त्वेनम्.
प्र पर्वाणि जातवेदः शृणीहि क्रव्यात्क्रविष्णुर्वि चिनोतु वृक्णम्.. (५)
हे जातवेद अग्नि! राक्षसों की खाल को काट डालो. हिंसक वज्र उन्हें ताप से मारे. तुम
राक्षसों के शरीर के भाग अलग-अलग कर दो. मांस की इच्छा करने वाले मांसाहारी जंतु
इनके छिन्न-भिन्न शरीरों को खावें. (५)
यत्रेदानिं पश्यसि जातवेदस्तिष्ठन्तमग्न उत वा चरन्तम्.
यद्वान्तरिक्षे पथिभिः पतन्तं तमस्ता विध्य शर्वा शिशानः.. (६)
हे जातवेद अग्नि! तुम राक्षस को खड़ा हुआ, घूमता हुआ, आकाश में स्थित, मार्ग में
चलता हुआ—किसी भी अवस्था में देखो तो बाण फेंककर उसे बेध दो. (६)
उतालब्धं स्पृणुहि जातवेद आलेभानादृष्टिभिर्यातुधानात्.
अग्ने पूर्वो नि जहि शोशुचान आमादः क्ष्वेङ्कास्तमदन्त्वेनीः.. (७)
हे जातवेद अग्नि! तुम मुझ स्तोता को आक्रमणकारी राक्षस के हाथ से अपनी ऋष्टियों
द्वारा बचाओ. तुम प्रमुख एवं प्रज्वलित होकर राक्षस को मारो. ये पक्षी उस राक्षस को खावें.
(७)
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इह प्र ब्रूहि यतमः सो अग्ने यो यातुधानो य इदं कृणोति.
तमा रभस्व समिधा यविष्ठ नृचक्षसंश्कक्षुषे रन्धयैनम्.. (८)
हे अग्नि! उस राक्षस को भगाओ जो यज्ञ में विघ्न डालता है. हे अतिशय युवा अग्नि!
तुम समिधाओं द्वारा प्रज्वलित होकर राक्षस को मारो. हे मानवों को देखने वाले अग्नि! तुम
राक्षस को अपने तेज के वश में करो. (८)
तीक्ष्णेनाग्ने चक्षुषा रक्ष यज्ञं प्राञ्चं वसुभ्यः प्र णय प्रचेतः.
हिंस्रं रक्षांस्यभि शोशुचानं मा त्वा दभन्यातुधाना नृचक्षः.. (९)
हे अग्नि! तुम अपने तीखे तेज से हमारे यज्ञ की रक्षा करो. हे उत्तम ज्ञान वाले अग्नि!
इस यज्ञ को धन के अनुकूल बनाओ. हे प्रदीप्त एवं मानवदर्शक अग्नि! तुम राक्षसों को मारो.
वे तुम्हें न मार सकें. (९)
नृचक्षा रक्षः परि पश्य विक्षु तस्य त्रीणि प्रति शृणीह्यग्रा.
तस्याग्ने पृष्टीर्हरसा शृणीहि त्रेधा मूलं यातुधानस्य वृश्च.. (१०)
हे मानवदर्शक अग्नि! तुम मानवहिंसक राक्षस को देखो तथा उसके तीन मस्तकों को
काट डालो. (१०)
त्रियातुधानः प्रसितिं त एत्वृतं यो अग्ने अनृतेन हन्ति.
तमर्चिषा स्फूर्जयञ्जातवेदः समक्षमेनं गृणते नि वृङ्धि.. (११)
हे अग्नि! राक्षस तीन बार तुम्हारी लपटों में जावे. जो राक्षस असत्य से सत्य को मारता
है, उसे तुम अपने तेज से भस्म कर दो. हे जातवेद अग्नि! इस राक्षस को मेरे सामने ही
टुकड़े-टुकड़े कर दो. (११)
तदग्ने चक्षुः प्रति धेहि रेभे शफारुजं येन पश्यसि यातुधानम्.
अथर्ववज्ज्योतिषा दैव्येन सत्यं धूर्वन्तमचितं न्योष.. (१२)
हे अग्नि! गर्जन करते हुए इस राक्षस पर वह दृष्टि डालो जो तुम खुरों के समान नाखूनों
द्वारा सज्जनों को भग्न करने वाले राक्षस पर डालते हो. दध्यङ् अथर्वा ऋषि जिस प्रकार
अपने तेज से राक्षसों को मारते हैं, उसी प्रकार तुम अपने तेज से असत्य द्वारा सत्य का हनन
करने वाले राक्षस को मारो. (१२)
यदग्ने अद्य मिथुना शपातो यद्वाचस्तृष्टं जनयन्त रेभाः.
मन्योर्मनसः शरव्या३ जायते या तया विध्य हृदये यातुधानान्.. (१३)
हे अग्नि! आज स्त्रीपुरुष आपस में लड़ रहे हैं और स्तोता कड़वी बातें कह रहे हैं. इस
कारण मन में क्रोध होने पर जो बाण फेंका जाता है, उसी बाण से तुम राक्षसों का हृदय बेध
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दो. (१३)
परा शृणीहि तपसा यातुधानान्पराग्ने रक्षो हरसा शृणीहि.
पराचिंषा मूरदेवाञ्छृणीहि परासुतृपो अभि शोशुचानः.. (१४)
हे अग्नि! तुम अपनी गरमी से राक्षसों को जलाओ तथा अपने तेज से राक्षसों को
समाप्त करो. मूढ़ राक्षसों को तुम अपने परम तेज से नष्ट करो. जो राक्षस दूसरों के प्राण
हरण करके तृप्त होते हैं, उन्हें तुम शोकमग्न करो. (१४)
पराद्य देवा वृजिनं शृणन्तु प्रत्यगेनं शपथा यान्तु तृष्टाः.
वाचास्तेनं शरव ऋच्छन्तु मर्मन्विश्वस्यैतु प्रसितिं यातुधानः.. (१५)
आज महान् देव पापी राक्षस को समाप्त करें. हमारी बुरी उक्तियां इस राक्षस को लगें.
हमारे बाण इस असत्यवादी राक्षस को लगें. राक्षस व्याप्त अग्नि के जाल में फंसे. (१५)
यः पौरुषेयेण क्रविषा समङ्क्ते यो अश्व्येन पशुना यातुधानः.
यो अघ्न्याया भरति क्षीरमग्ने तेषां शीर्षाणि हरसापि वृश्च.. (१६)
हे अग्नि! जो राक्षस पुरुष का मांस अपने पास लाता है. जो अश्व आदि उपयोगी पशुओं
का मांस एकत्र करता है अथवा जो गाय का दूध चुराता है, उसके सिर को काट दो. (१६)
संवत्सरीणं पय उस्रियायास्तस्य माशीद्यातुधानो नृचक्षः.
पीयूषमग्ने यतमस्तितृप्सात्तं प्रत्यञ्चमर्चिषा विध्य मर्मन्.. (१७)
हे मानवदर्शक अग्नि! गाय के एक वर्ष तक के दूध को राक्षस न पी सकें. जो राक्षस
इस अमृततुल्य गोदुग्ध को पीने के लिए आगे आवे, उसके मर्म को तुम अपनी ज्वालाओं द्वार
छिन्न-भिन्न कर डालो. (१७)
विषं गवां यातुधानाः पिबन्त्वा वृश्च्यन्तामदितये दुरेवाः.
परैनान्देवः सविता ददातु परा भागमोषधीनां जयन्ताम्.. (१८)
हे अग्नि! राक्षसों द्वारा दिया हुआ गोदुग्ध विष हो जाए एवं राक्षस काटकर अग्नि को
भेंट किए जावें. सूर्य इन राक्षसों को हिंसकों को सौंप दें. राक्षस ओषधियों का असार अंश
प्राप्त करें. (१८)
सनादग्ने मृणसि यातुधानान्न त्वा रक्षांसि पृतनासु जिग्युः.
अनु दह सहमूरान्क्रव्यादो मा ते हेत्या मुक्षत दैव्यायाः.. (१९)
हे अग्नि! तुम बहुत समय से राक्षसों को बाधा पहुंचा रहे हो. राक्षस तुम्हें युद्ध में नहीं
जीत पाए. तुम मांसभक्षक राक्षसों को समूल नष्ट करो. वे तुम्हारे दिव्य आयुधों से बच न
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