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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

हे सोम! तुम पवित्र, अनेक पात्रों में भरे हुए एवं दूध-दही से मिश्रित हो. तुम शूर इंद्र को सबसे अधिक प्रसन्न करते हो. (९) इमे त इन्द्र सोमास्तीव्रा अस्मे सुतासः. शुक्रा आशिरं याचन्ते.. (१०) हे इंद्र! ये तीखे सोम तुम्हारे लिए हैं. हमारे द्वारा निचोड़े हुए एवं दीप्तिशाली दूध-दही से मिले हुए सोम तुम्हारी अभिलाषा करते हैं. (१०) ताँ आशिरं पुरोळाशमिन्द्रेमं सोमं श्रीणीहि. रेवन्तं हि त्वा शृणोमि.. (११) हे इंद्र! तुम सोमों तथा दूध-दही आदि को मिलाओ. इस प्रकार मैं तुम्हें धन वाले के रूप में समझूं. (११) हृत्सु पीतासो युध्यन्ते दुर्मदासो न सुरायाम्. ऊधर्न नग्ना जरन्ते.. (१२) हे इंद्र! जिस प्रकार पी हुई शराब अतःकरण में परस्परविरोधी भाव उठाकर युद्ध कराती है, उसी प्रकार पिया हुआ सोम भी हृदय में युद्ध करता है. स्तोता सोमपूर्ण इंद्र की रक्षा गाय के थन के समान करते हैं. (१२) रेवाँ इद्रेवतः स्तोता स्यात्त्वावतो मघोनः. प्रेदु हरिवः श्रुतस्य.. (१३) हे हरि नामक घोड़ों के स्वामी इंद्र! तुम धनवान् हो. तुम्हारा स्तोता भी धनवान् हो, तुम्हारे समान धनी एवं प्रसिद्ध व्यक्ति का स्तोता भी धन वाला ही होता है. (१३) उक्थं चन शस्यमानमगोररिरा चिकेत. न गायत्रं गीयमानम्.. (१४) स्तुति न करने वाले के शत्रु इंद्र गाए जाते हुए उक्थ को जान लेते हैं. उस समय गाने योग्य गान गाया जाता है. (१४) मा न इन्द्र पीयत्नवे मा शर्धते परा दाः. शिक्षा शचीवः शचीभिः.. (१५) हे इंद्र! तुम मुझे हिंसा करने वाले शत्रु के हाथ में मत सौंपना. तुम मुझे पराजित करने वाले के अधिकार में भी मत सौंपना. हे शक्तिशाली इंद्र! तुम अपने कर्मों द्वारा हमें शक्तिशाली बनाओ. (१५) वयमु त्वा तदिदर्था इन्द्र त्वायन्तः सखायः. कण्वा उक्थेभिर्जरन्ते.. (१६) हे इंद्र! हम तुम्हारे मित्र एवं तुम्हारी कामना करने वाले हैं. हम स्तोताओं का प्रयोजन तुम्हारी स्तुति करना है. हम कण्वगोत्रीय उक्थ मंत्रों द्वारा तुम्हारी स्तुति करते हैं. (१६) न घेमन्यदा पपन वज्रिन्नपसो नविष्ठौ. तवेदु स्तोमं चिकेत.. (१७) ebook converter DEMO Watermarks*

हे वज्रधारी एवं कर्मयुक्त इंद्र! तुम्हारे इस अभिनव यज्ञ में मैं किसी अन्य का स्तोत्र नहीं बोलता. मैं केवल तुम्हारी स्तुतियां ही जानता हूं. (१७) इच्छन्ति देवाः सुन्वन्तं न स्वप्नाय स्पृहयन्ति. यन्ति प्रमादममन्द्राः.. (१८) देवता सोमरस निचोड़ने वाले यजमान को चाहते हैं. सोए हुए व्यक्ति को कोई नहीं चाहता. देव तंद्राहीन होकर नशीला सोम प्राप्त करते हैं. (१८) ओ षु प्र याहि वाजेभिर्मा हृणीथा अभ्य१ स्मान्. महाँ इव युवजानिः.. (१९) हे इंद्र! तुम अन्नसहित हमारे सामने भली-भांति आओ. जिस प्रकार गुणी व्यक्ति युवति पत्नी पर क्रोध नहीं करता, उसी प्रकार तुम हम पर क्रोध मत करो. (१९) मो ष्व१द्य दुर्हणावान्त्सायं करदारे अस्मत्. अश्रीरइव जामाता.. (२०) हे शत्रुओं द्वारा असह्य इंद्र! आज बुलाने पर हमारे पास आना. जैसे बुरा जमाई बुलाए जाने पर शाम को पहुंचता है, ऐसा तुम मत करना. (२०) विद्मा ह्यस्य वीरस्य भूरिदावरीं सुमतिम्. त्रिषु जातस्य मनांसि. (२१) हम इस वीर इंद्र की अधिक धन देने वाली कल्याणबुद्धि को जानते हैं. हम तीनों लोकों में उत्पन्न इंद्र को जानते हैं. (२१) आ तू षिञ्च कण्वमन्तं न घा विद्म शवसानात्. यशस्तरं शतमूतेः.. (२२) हे अध्वर्यु! कण्वगोत्रीय ऋषियों से युक्त इंद्र के लिए सोमरस अर्पित करो. हम अतिशय शक्तिशाली एवं सैकड़ों रक्षासाधनों से युक्त इंद्र की अपेक्षा यशस्वी किसी अन्य को नहीं जानते. (२२) ज्येष्ठेन सोतरिन्द्राय सोमं वीराय शक्राय. भरा पिबन्नर्याय. (२३) हे सोमरस निचोड़ने वाले अध्वर्यु! मानवहितकारी, वीर एवं बलशाली इंद्र के लिए प्रमुख रूप में सोमरस दो. इंद्र सोमरस पिएं. (२३) यो वेदिष्ठो अव्यथिष्वश्वावन्तं जरितृभ्यः. वाजं स्तोतृभ्यो गोमन्तम्.. (२४) जो इंद्र सुखकारक स्तोताओं को भली प्रकार जानते हैं, वे यज्ञों और स्तोताओं को घोड़ों और गायों से युक्त अन्न दें. (२४) पन्यंपन्यमित्सोतार आ धावत मद्याय. सोमं वीराय शूराय.. (२४) हे सोमरस निचोड़ने वालो! तुम प्रमत्त करने योग्य, वीर एवं शूर इंद्र के लिए सब जगह ebook converter DEMO Watermarks*

स्तुतियोग्य सोमरस दो. (२५) पाता वृत्रहा सुतमा घा गमन्नारे अस्मत्. नि यमते शतमूतिः.. (२६) सोमरस पीने वाले एवं वृत्रनाशक इंद्र आवें. वे हमसे दूर न जावें. सैकड़ों रक्षासाधनों वाले इंद्र शत्रुओं को वश में करें. (२६) एह हरी ब्रह्मयुजा शग्मा वक्षतः सखायम्. गीर्भिः श्रुतं गिर्वणसम्.. (२७) हव्य अन्न से युक्त एवं सुखकारक घोड़े स्तुतियों द्वारा प्रसिद्ध एवं सेवा करने योग्य मित्र इंद्र को यहां ले आवें. (२७) स्वादवः सोमा आ याहि श्रीताः सोमा आ याहि. शिप्रिन्नृषीवः शचीवो नायमच्छा सधमादम्.. (२८) हे शिरस्त्राण वाले, ऋषियों से युक्त एवं शक्तिशाली इंद्र! यह सोम स्वादिष्ट है. तुम आओ. सोम में दूध-दही को मिला दिया गया है. तुम आओ. ये स्तोता इस समय तुम्हें अपने सामने बुलाते हैं. (२८) स्तुतश्च यास्त्वा वर्धन्ति महे राधसे नृम्णाय. इन्द्र कारिणं वृधन्तः.. (२९) हे इंद्र! यज्ञकर्म करने वालों को बढ़ाते हुए स्तोता एवं स्तोत्र धन एवं बल पाने के लिए तुम्हारी वृद्धि करते हैं. (२९) गिरश्च यास्ते गिर्वाह उक्था च तुभ्यं तानि. सत्रा दधिरे शवांसि.. (३०) हे स्तुतियों द्वारा वहन करने योग्य इंद्र! तुम्हारे निमित्त जो स्तुतियां एवं उक्थ हैं, वे सब एकत्र होकर तुम्हारी शक्ति को धारण करते हैं. (३०) एवेदेष तुविकूर्मिर्वाजाँ एको वज्रहस्तः. सनादमृक्तो दयते.. (३१) इंद्र अनेक कर्म करने वाले, अद्वितीय एवं वज्रधारी हैं. शत्रुओं द्वारा सदा अपराजेय इंद्र स्तोता को अन्न देते हैं. (३१) हन्ता वृत्रं दक्षिणेनेन्द्रः पुरू पुरुहूतः. महान्महीभिः शचीभिः.. (३२) बहुत से लोगों द्वारा अनेक बार बुलाए गए एवं महान् कर्मों द्वारा महान् इंद्र अपने दाहिने हाथ से वृत्र का नाश करते हैं. (३२) यस्मिन् विश्वाश्चर्षर्णय उत च्यौत्ना ज्ययांसि च. अनु घेन्मन्दी मघोनः.. (३३) सभी प्रजाएं जिनके अधीन हैं, जिन में च्युत न होने वाली शक्ति एवं जो शत्रु को हराने ebook converter DEMO Watermarks*

वाले हैं, वे ही इंद्र अपने यजमानों के अनुकूल बनते हैं. (३३) एष एतानि चकारेन्द्रो विश्वा योऽति शृण्वे. वाजदावा मघोनाम्.. (३४) सर्वत्र प्रसिद्ध एवं हव्य धारणकर्त्ताओं को अन्न देने वाले इंद्र ने ये सारे काम किए हैं. (३४) प्रभर्ता रथं गव्यन्तमपाकाच्चिद्यमवति. इनो वसु स हि वोळ्हा.. (३५) प्रहार करने वाले इंद्र जिस गतिशील एवं गाय की कामना करने वाले स्तोता को अपक्वबुद्धि वाले स्तोता के चक्कर से बचाते हैं, वह स्तोता धन का स्वामी बनकर हव्य वहन करता है. (३५) सनिता विप्रो अर्वद्भिर्हन्ता वृत्रं नृभिः शूरः. सत्योऽविता विधन्तम्.. (३६) बुद्धिमान् इंद्र घोड़ों की सहायता से इच्छित स्थान पर जाते हैं. शूर इंद्र नेता मरुतों की सहायता से वृत्र को मारते हैं. वे अपने यजमान के सच्चे रक्षक हैं. (३६) यजध्वैनं प्रियमेधा इन्द्रं सत्राचा मनसा. यो भूत्सोमैः सत्यमद्धा.. (३७) हे प्रियमैध ऋषि! इंद्र के प्रति श्रद्धा रख कर यज्ञ करो. सफल कृपा वाले इंद्र सोमरस पीकर प्रसन्न होते हैं. (३७) गाथश्रवसं सत्पतिं श्रवस्कामं पुरुत्मानम्. कणवासो गात वाजिनम्.. (३८) हे कण्वगोत्रीय ऋषियो! तुम गाने योग्य यश वाले, सज्जनों के पालक, अन्न के इच्छुक, अनेक प्रदेशों में जाने वाले एवं गतिशील इंद्र की स्तुति करो. (३८) य ऋते चिद्गास्पदेभ्यो दात् सखा नृभ्यः शचीवान्. ये अस्मिन्कामश्रियन्.. (३९) मित्र व शोभनकर्म वाले इंद्र ने गायों के पैरों के निशान न होने पर भी गाएं खोजकर देवों को दी थीं. देवों ने इंद्र के द्वारा अपनी अभिलाषा पूर्ण की. (३९) इत्था धीवन्तमद्रिवः काण्वं मेध्यातिथिम्. मेषो भूतोऽभि यन्नयः.. (४०) हे वज्रधारी इंद्र! तुमने बादल के रूप में गति करते हुए सामने जाकर कण्व के पुत्र मेधातिथि ऋषि को प्राप्त किया था. (४०) शिक्षा विभिन्दो अस्मै चत्वार्ययुता ददत्. अष्टा परः सहस्रा.. (४१) हे राजा विभिंदु! तुमने दाता बनकर मुझे चालीस हजार गाएं दी हैं. तुमने मुझे बाद में आठ हजार और दी हैं. (४१) ebook converter DEMO Watermarks*

उत सु त्ये पयोवृधा माकी रणस्य नप्त्या. जनित्वनाय मामहे.. (४२) मैंने धन उत्पत्ति के लिए सर्वत्र प्रसिद्ध, जल बढ़ाने वाले, प्राणियों के निर्माता एवं स्तुतिकर्त्ता के प्रति दयालु द्यावा-पृथिवी की स्तुति की थी. (४२) सूक्त—३ देवता—राजा पाकस्थामा व इंद्र पिबा सुतस्य रसिनो मत्स्वा न इन्द्र गोमत:. आपिर्नो बोधि सधमाद्यो वृधे३स्माँ अवन्तु ते धिय:.. (१) हे इंद्र! हमारे निचोड़े हुए सरस एवं गोदुग्धयुक्त सोमरस को पीकर प्रसन्न बनो. हे हमारे साथ प्रसन्न होने योग्य इंद्र! तुम हमारे मित्र के रूप में हमें उन्नत बनाने के लिए बढ़ो. तुम्हारी कृपा हमारी रक्षा करे. (१) भूयाम ते सुमतौ वाजिनो वयं मा न: स्तरभिमातये. अस्माञ्चित्राभिरवतादभीष्टिभिरा न: सुम्नेषु यामय.. (२) हम तुम्हारी कृपा के कारण अन्नों के स्वामी बनें. तुम शत्रु का पक्ष लेकर हमें मत मारना. अपने विविध रक्षासाधनों द्वारा हमें बचाओ एवं सदा सुखी बनाओ. (२) इमा उ त्वा पुरुवसो गिरो वर्धन्तु या मम. पावकवर्णा: शुचयो विपश्चितोऽभि स्तोमैरनूषत.. (३) हे अनेक संपत्तियों के स्वामी इंद्र! मेरे ये स्तुतिवचन तुम्हारी वृद्धि करें. अग्नि के समान तेजस्वी एवं पवित्र विद्वान् लोग तुम्हारी स्तुति करते हैं. (३) अयं सहस्रमृषिभि: सहस्कृत: समुद्र इव पप्रथे. सत्य: सो अस्य महिमा गृणे शवो यज्ञेषु विप्रराज्ये.. (४) ये इंद्र हजारों ऋषियों की शक्ति के सहारे उन्नति को प्राप्त हुए हैं. इंद्र की वास्तविक महिमा का वर्णन ब्राह्मणों के राज्यरूप यज्ञ में किया जाता है. (४) इन्द्रमिद्देवतातय इन्द्रं प्रयतध्वरे. इन्द्रं समीके वनिनो हवामह इन्द्रं धनस्य सातये.. (५) हम इंद्र को यज्ञ के प्रारंभ में एवं समाप्ति पर बुलाते हैं. हम सेवा करते हुए इंद्र को बुलाते हैं. (५) इन्द्रो मह्ना रोदसी पप्रथच्छव इन्द्रः सूर्यमरोचयत्. ebook converter DEMO Watermarks*

इन्द्रे ह विश्वा भुवनानि येमिर इन्द्रे सुवानास इन्दवः.. (६) इंद्र ने अपनी शक्ति की महत्ता से द्यावा-पृथिवी का विस्तार किया है एवं सूर्य को चमकीला बनाया है. समस्त भुवन इंद्र के नियमों में बंधे हैं. सोमरस इंद्र के अधिकार में है. (६) अभि त्वा पूर्वपीतय इन्द्र स्तोमेभिरायवः. समीचीनास ऋभवः समस्वरन् रुद्रा गृणन्त पूर्व्यम्.. (७) हे इंद्र! स्तोता लोग सबसे पहले सोमरस पीने को स्तुतियों द्वारा तुम्हें बुलाते हैं. ऋभुगण परस्पर मिलकर तुम्हारी स्तुति करते हैं. रुद्रों ने भी तुझ प्राचीन की स्तुति की थी. (७) अस्येदिन्द्रो वावृधे वृष्ण्यं शवो मदे सुतस्य विष्णवि. अद्या तमस्य महिमानमायवोऽनु ष्टुवन्ति पूर्वथा.. (८) सोमरस पीने के बाद जब सारे शरीर में नशा चढ़ता है तब इंद्र इसी यजमान की शक्ति और ओज बढ़ाते हैं. स्तोता जिस प्रकार पहले इंद्र की महिमा की स्तुति करते थे, उसी प्रकार आज भी करते हैं. (८) तत्त्वा यामि सुवीर्यं तद् ब्रह्म पूर्वचित्तये. येना यतिभ्यो भृगवे धने हिते येन प्रस्कण्वमाविथ.. (९) हे शोभनशक्ति वाले इंद्र! मैं सबसे पहले उत्तम अन्न पाने के लिए तुमसे याचना करता हूं. मैं तुमसे वह शक्ति एवं अन्न मांगता हूं, जिसके द्वारा तुमने यज्ञहीन लोगों का हितकारी धन भृगु को दिया एवं प्रस्कण्व की रक्षा की. (९) येना समुद्रमसृजो महीरपस्तदिन्द्र वृष्णि ते शवः. सद्यः सो अस्य महिमा न सन्नशे यं क्षोणीरनुचक्रदे.. (१०) हे इंद्र! तुम्हारा वह बल अभिलाषापूरक है, जिसने सागर का पर्याप्त जल बनाया. तुम्हारी महिमा की सीमा नहीं है. धरती उसी महिमा के पीछे चलती है. (१०) शग्धी न इन्द्र यत्त्वा रयिं यामि सुवीर्यम्. शग्धि वाजाय प्रथमं सिषासते शग्धि स्तोमाय पूर्व्य.. (११) हे इंद्र! मैं तुमसे जो शोभनबल वाला धन मांगता हूं, मुझे वह धन प्रदान करो. सेवा करने को इच्छुक एवं हव्य धारण करने वाले यजमान को सबसे पहले धन दो. हे प्राचीन इंद्र! स्तोता को इसके बाद धन देना. (११) शग्धी नो अस्य यद्भू पौरमाविथ धिय इन्द्र सिषासतः. ebook converter DEMO Watermarks*

शग्धि यथा रुशमं श्यावकं कृपमिन्द्र प्रावः स्वर्णरम्.. (१२) हे इंद्र! स्तोत्रों के द्वारा सेवा करने वाले हमारे यजमान को वह धन दो, जिस धन के द्वारा तुमने राजा पुरु की रक्षा की थी. तुमने जिस प्रकार रुशम, श्यावक एवं कृप की रक्षा की थी, वैसे ही शोभन हवि वाले यजमान की रक्षा करो. (१२) कन्नव्यो अतसीनां तुरी गृणीत मर्त्यः. न ही न्वस्य महिमानमिन्द्रियं स्वर्गुणन्त आनशुः.. (१३) वह कौन नया व्यक्ति है जो सदा गतिशील एवं प्रेरणाप्रद स्तुतियों द्वारा इंद्र की स्तुति करे. इंद्र की स्तुति करने वाले स्तोता इंद्र की महिमा एवं पहचान को नहीं पा सकते. (१३) कदु स्तुवन्त ऋतयन्त देवत ऋषिः को विप्र ओहते. कदा हवं मघवन्निन्द्र सुन्वतः कदु स्तुवत आ गमः.. (१४) हे इंद्र देव! कौन स्तुति करने वाला तुम्हारे लिए यज्ञ पूर्ण करने की अभिलाषा करता है? कौन बुद्धिमान् ऋषि तुम्हारी स्तुति करने की सामर्थ्य रखता है? हे धनस्वामी इंद्र! तुम सोमरस निचोड़ने वाले की पुकार पर कब आते हो? तुम स्तोता के बुलाने पर कब आते हो? (१४) उदु त्ये मधुमत्तमा गिरः स्तोमास ईरते. सत्राजितो धनसा अक्षितोतयो वाजयन्तो रथा इव.. (१५) प्रसिद्ध एवं अतिशय मधुर स्तुतिवचन एवं स्तोत्र शत्रुविजयी, धनस्वामी, विनाशहीन- रक्षासाधन वाले एवं अन्नाभिलाषी रथ के समान बोले जाते हैं. (१५) कण्वाइव भृगवः सूर्या इव विश्वमिद्धीत्मानशुः. इन्द्रं स्तोमेभिर्महयन्त आयवः प्रियमेधासो अस्वरन्.. (१६) कण्वगोत्रीय ऋषियों के समान भृगुगोत्रीय ऋषियों ने भी प्रसिद्ध एवं सर्वत्र व्याप्त इंद्र को पाया है. प्रियमेध नामक लोगों ने इंद्र की महिमा बढ़ाते हुए स्तुतियों द्वारा पूजा की थी. (१६) युक्ष्वा हि वृत्रहन्तम हरी इन्द्र परावतः. अर्वाचीनो मघवन्सोमपीतय उग्र ऋष्वेभिरा गहि.. (१७) हे वृत्रहनन में परमकुशल इंद्र! तुम अपने दोनों घोड़ों को रथ में जोतो. हे धनस्वामी एवं शक्तिशाली इंद्र! तुम सोमरस पीने के लिए दर्शनीय मरुतों के साथ दूर के स्थान से हमारे सामने आओ. (१७)

इमे हि ते कारवो वावशुर्धिया विप्रासो मेधसातये. स त्वं नो मघवन्निन्द्र गिर्वणो वेनो न शृणुधी हवम्.. (१८) हे इंद्र! यज्ञकर्म करने वाले एवं बुद्धिमान् ये यजमान यज्ञ में सम्मिलित होने के लिए तुम्हारी स्तुतियां बोलते हैं. हे धनस्वामी एवं स्तुतियोग्य इंद्र! जिस प्रकार अभिलाषी व्यक्ति ध्यान से सुनता है, उसी प्रकार तुम हमारी पुकार सुनो. (१८) निरिन्द्र बृहतीभ्यो वृत्रं धनुभ्यो अस्फुरः. निरर्बुदस्य मृगयस्य मायिनो निः पर्वतस्य गा आजः.. (१९) हे इंद्र! तुमने विशाल धनुषों द्वारा वृत्र को मारा था. तुमने मायावी अर्बुद एवं मृग को मारा था. तुमने पर्वतों से गायों को बाहर निकाला था. (१९) निरग्नयो रुरुचुर्निरु सूर्यो निः सोम इन्द्रियो रसः. निरन्तरिक्षादधमो महामहिं कृषे तदिन्द्र पौंस्यम्.. (२०) हे इंद्र! तुमने अंतरिक्ष से विशाल एवं हिंसक वृत्र को हटाकर अपनी शक्ति को प्रकाशित किया. उस समय सभी अग्नियां, सूर्य एवं इंद्र को प्रसन्न करने वाले सोमरस प्रकाशित हुए थे. (२०) यं मे दुरिन्द्रो मरुतः पाकस्थामा कौरयाणः. विश्वेषां त्मना शोभिष्ठमुपेव दिवि धावमानम्.. (२१) इंद्र एवं मरुतों ने मुझे जो कुछ प्रदान किया, वही कुरुयान के पुत्र पाकस्थामा ने दिया. वह धन समस्त संपत्तियों के बीच इस प्रकार शोभा पाता है, जिस प्रकार स्वर्ग में गति करता हुआ तेजस्वी सूर्य. (२१) रोहितं मे पाकस्थामा सुधुरं कक्ष्यप्राम्. अदाद्रायो विबोधनम्.. (२२) पाकस्थामा ने मुझे लाल रंग वाला, शोभन पीठ वाला, लगाम से युक्त एवं भांति-भांति की संपत्तियों का ज्ञान कराने वाला घोड़ा दिया था. (२२) यस्मा अन्ये दश प्रति धुरं वहन्ति वह्नयः. अस्तं वयो न तुग्र्यम्.. (२३) उस घोड़े के आगे चलने वाले दस घोड़े मुझे वहन करते हैं. इसी तरह तुग्र के पुत्र भुज्यु को घोड़ों ने वहन किया था. (२३) आत्मा पितुस्तनूर्वास ओजोदा अभ्यञ्जनम्. तुरीयमिद्रोहितस्य पाकत्थामानं भोजं दातारमब्रवम्.. (२४) अपने पिता के उपयुक्त पुत्र, निवास हेतु घर एवं ओजस्वी पदार्थ देने वाले, शत्रुओं के ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—४ देवता—इंद्र आदि

नाशक एवं उपभोग करने वाले तथा लाल रंग का घोड़ा प्रदान करने वाले पाकस्थामा की स्तुति मैं करता हूं. (२४) सूक्त—४ देवता—इंद्र आदि यदिन्द्र प्रागपागुदङ् न्यग्वा हूयसे नृभिः. सिमा पूरू नृषूतो अस्यानवेऽसि प्रशर्ध तुर्वशे.. (१) हे इंद्र! यद्यपि तुम पूर्व, पश्चिम, उत्तर एवं दक्षिण के देशों में रहने वाले स्तोताओं द्वारा बुलाए जाते हो, तथापि स्तोताओं द्वारा राजा अनु के पुत्र के पास जाने को प्रेरित होते हो. स्तोता तुम्हें तुर्वश के पास जाने के लिए भी प्रेरित करते हैं. (१) यद्वा रुमे रुशमे श्यावके कृप इन्द्र मादयसे सचा. कण्वासस्त्वा ब्रह्मभिः स्तोमवाहस इन्द्रा यच्छन्त्या गहि.. (२) हे इंद्र! जैसे तुम रुम, रुशम, श्यावक एवं कृप नामक राजाओं के साथ प्रसन्न होते हो, फिर भी स्तोत्र स्मरण रखने वाले कण्वगोत्रीय ऋषि तुम्हें स्तोत्र सुनाते हैं. तुम आओ. (२) यथा गौरो अपा कृतं तृष्यन्नेत्यवेरिणम्. आपित्वे नः प्रपित्वे तूयमा गहि कण्वेषु सु सचा पिब.. (३) हे इंद्र! जैसे गौर मृग पानी के लिए प्यासा होने पर बिना घास वाले एवं जलपूर्ण स्थान पर आता है, उसी प्रकार हम कण्वगोत्रीय ऋषियों की मित्रता पाकर तुम शीघ्र आओ और हमारे साथ सोमरस पिओ. (३) मन्दन्तु त्वा मघवन्निन्द्रेन्दवो राधोदेयाय सुन्वते. आमुष्या सोममपिबश्चमू सुतं ज्येष्ठं तद्दधिषे सहः.. (४) हे धनस्वामी इंद्र! सोमरस तुम्हें इस प्रकार मत्त करे कि तुम उसे निचोड़ने वाले को धन दो. तुमने यह सोमरस पिया है. तुमने इसी महान् एवं प्रशंसायोग्य सोमरस के लिए अधिक मात्रा में शक्ति धारण की है. (४) प्र चक्रे सहसा सहो बभञ्ज मन्युमोजसा. विश्वे त इन्द्र पृतनायवो यहो नि वृक्षाइव येमिरे.. (५) इंद्र ने अपनी शक्ति द्वारा शत्रुओं को वश में किया है एवं अपने ओज से दूसरों का क्रोध समाप्त किया है. हे महान् इंद्र! तुम्हारे सभी शत्रु वृक्ष के समान धराशायी हो गए हैं. (५) सहसेणेव सचते यवीय्युधा यस्त आनळ्पस्तुतिम्. पुत्रं प्रावर्गं कृणुते सुवीर्ये दाश्रोति नम उक्तिभिः.. (६) ebook converter DEMO Watermarks*

हे इंद्र! जो तुम्हारी स्तुति करता है, वह युद्ध में वज्र के समान विक्रम दिखने वाले हजार वीर प्राप्त करता है. जो नमस्कार शब्द के साथ तुम्हें हव्य देता है वह शोभन वीर्ययुक्त पुत्र प्राप्त करता है. (६) मा भेम मा श्रमिष्मोग्रस्य सख्ये तव. महत्ते वृष्णो अभिचक्ष्यं कृतं पश्येम तुर्वशं यदुम्.. (७) हे उग्र इंद्र! तुम्हारी मित्रता पाकर हम न भयभीत हों और न थकें. हे अभिलाषापूरक इंद्र! तुम्हारे महान् कार्य कहने योग्य हैं. हमने तुर्वश एवं यदु राजाओं को देखा है. (७) सव्यामनु स्फिग्यं वावसे वृषा न दानो अस्य रोषति. मध्वा सम्पृक्ताः सारघेण धेनवस्तूयमेहि द्रवा पिब.. (८) अभिलाषापूरक इंद्र ने अपने शरीर के वामभाग से सभी प्राणियों को ढक लिया है. हवि देने वाला इंद्र को क्रोधित नहीं करता है. हे इंद्र! शहद मिले हुए एवं आनंद देने वाले सोमरस के सामने जल्दी आओ एवं उसे पिओ. (८) अश्वी रथी सुरूप इद् गोमाँ इदिन्द्र ते सखा. श्वात्रभाजा वयसा सचते सदा चन्द्रो याति सभामुप.. (९) हे इंद्र! तुम्हारा मित्र घोड़ोंवाला, रथवाला, गोवाला एवं सौंदर्ययुक्त बनता है. वह शीघ्र प्राप्त होने वाला धन पाता है एवं सबके लिए प्रसन्नता उत्पन्न करता हुआ सभा में जाता है. (९) ऋश्यो न तृष्यन्नवपानमा गहि पिबा सोमं वशा अनु. निमेघमानो मघवन्दिवेविव ओजिष्ठं दधिषे सहः.. (१०) जैसे प्यासा ऋश्य मृग जल के पास आता है, उसी प्रकार तुम पात्र में रखे गए सोमरस के सामने आओ एवं उसे इच्छा के अनुसार पिओ. हे धनस्वामी इंद्र! तुम प्रतिदिन नीचे की ओर वर्षा करते हुए अत्यंत ओजवाला बल धारण करो. (१०) अध्वर्यो द्रावया त्वं सोममिन्द्रः पिपासति. उप नूनं युयुजे वृषणा हरी आ च जगाम वृत्रहा.. (११) हे अध्वर्युगण! तुम सोमरस पीने के इच्छुक इंद्र के लिए सोम निचोड़ो. दोनों अभिलाषापूरक घोड़े रथ में जोते गए हैं एवं वृत्रनाशक इंद्र आए हैं. (११) स्वयं चित्स मन्यते दाशुरिर्जनो यत्रा सोमस्य तृम्पसि. इदं ते अन्नं युज्यं समुक्षितं तस्येहि प्र द्रवा पिब.. (१२) ebook converter DEMO Watermarks*

हे इंद्र! तुम जिस हव्यदाता का सोम पीकर संतोष पाते हो, इस बात को वह अपने आप ही जानता है. तुम्हारे योग्य सोमरस पात्र में रखा है. तुम उसके पास आकर उसे पिओ. (१२) रथेष्ठायाध्वर्यवः सोममिन्द्राय सोतन. अधि ब्रध्नस्याद्रयो वि चक्षते सुन्वन्तो दाश्वध्वरम्.. (१३) हे अध्वर्युगण! रथ पर बैठे इंद्र के लिए सोमरस निचोड़ो. चमड़े के ऊपर एक पत्थर पर दूसरा पत्थर रखा है. यजमान यज्ञ पूरा करने वाले सोमरस को निचोड़ता हुआ सुशोभित है. (१३) उप ब्रध्नं वावाता वृषणा हरी इन्द्रमपसु वक्षतः. अर्वाञ्चं त्वा सप्तयोऽध्वरश्रियो वहन्तु सवनेदुप.. (१४) अभिलाषापूरक एवं अंतरिक्ष में बार-बार चलने वाले हरि नामक घोड़े इंद्र को हमारे यज्ञ में लावें. यज्ञ की शोभा बढ़ाने वाले एवं गतिशील घोड़े तुम्हें यज्ञों के पास ले जावें. (१४) प्र पूषणं वृणीमहे युज्याय पुरूवसुम्. स शक्र शिक्ष पुरुहूत नो धिया तुजे राये विमोचन.. (१५) हम अधिक पाने के लिए पूषा का वरण करते हैं. हे बहुतों द्वारा बुलाए गए एवं पाप से छुटकारा दिलाने वाले इंद्र! तुम और पूषा ऐसी इच्छा करो कि हम अपनी बुद्धि से धन पाने और शत्रुनाश के लिए योग्य बनें. (१५) सं नः शिशीहि भुरिजोरिव क्षुरं रास्व रायो विमोचन. त्वे तन्नः सुवेदमूस्त्रियं वसु यं त्वं हिनोषि मर्त्यम्.. (१६) हे इंद्र! नाई के हाथ में रहने वाला छुरा जितना तेज होता है, हमारी बुद्धि उतनी ही तेज करो. हे पाप से छुड़ाने वाले इंद्र! हमें धन दो. तुम्हारी गाएं हमारे लिए सरलता से मिल जावें. वही धन तुम स्तोता को देते हो. (१६) वेमि त्वा पूषन्नृञ्जसे वेमि स्तोतव आघृणे. न तस्य वेम्यरं हि तद्वसो स्तुषे पज्राय साम्ने.. (१७) हे पूषा! मैं तुम्हें प्रसन्न करना चाहता हूं. हे दीप्तिसंपन्न पूषा! मैं तुम्हारी स्तुति करना चाहता हूं. मैं किसी अन्य देवता की स्तुति नहीं करना चाहता, क्योंकि वे सुख नहीं देते. हे निवास देने वाले पूषा! स्तोता एवं साममंत्र जानने वाले पज्र को वह धन दो. (१७) परा गोवा यवसं कच्चिदाघृणे नित्यं रेक्णो अमर्त्य. अस्माकं पूषन्नविता शिवो भव मंहिष्ठो वाजसातये.. (१८)

हे दीप्तिशाली एवं मरणरहित पूषा! हमारी गाएं किस समय चरकर लौटती हैं? हमारा गोधन नित्य हो. हे अभिलाषापूरक पूषा! तुम हमारे रक्षक और कल्याणकर्त्ता बनो. तुम हमें अन्न देने के लिए महान् बनो. (१८) स्थूरं राधः शताश्वं कुरुङ्गस्य दिविष्टिषु. राज्ञस्त्वेवषस्य सुभगस्य रातिषु तुर्वशेष्वमन्महि.. (१९) दीप्तिशाली एवं सौभाग्ययुक्त राजा कुरंग ने स्वर्ग पाने के लिए यज्ञ किया. उस में हमने बहुत से मनुष्यों के साथ सौ घोड़ों के अतिरिक्त बहुत सा धन पाया. (१९) धीभिः सातानि काण्वस्य वाजिनः प्रियमेधैरभिद्युभिः. षष्टिं सहस्रानु निर्मजामजे निर्यूथानि गवामृषिः.. (२०) मुझ मेधातिथि ने कण्वपुत्र तथा हव्य धारण करने वाले मेधातिथि ऋषि द्वारा तथा उनके स्तोताओं द्वारा सेवा करने योग्य और तेजस्वी प्रियमेध नामक ऋषियों द्वारा सेवित परम पवित्र साठ हजार गायों को यज्ञ के अंत में पाया. (२०) वृक्षाश्चिन्मे अभिपित्वे अरारण्युः. गां भजन्त मेहनाऽश्वं भजन्त मेहना.. (२१) मुझे गायरूपी धन मिला तो घोड़ों ने भी प्रसन्नता प्रकट की थी. उनका तात्पर्य यह था कि मेधातिथि ने उत्तम गाएं और घोड़े पाए हैं. (२१) सूक्त—५ देवता—अश्विनीकुमार दूरादिहेव यत्सत्यरुणप्सुरशिश्वितत्. वि भानुं विश्वधातनत्.. (१) दूर रहकर भी पास दीखने वाली एवं दीप्तिशाली उषा जब सब कुछ सफेद कर देती है, तब प्रकाश को अनेक प्रकार से फैलाती है. (१) नृवद्दस्रा मनोजुजा रथेन पृथुपाजसा. सचेथे अश्विनोषसम्.. (२) हे नेताओं के समान एवं दर्शनीय अश्विनीकुमारो! तुम अपने रथ द्वारा उषा से मिलो. तुम्हारे पर्याप्त अन्न वाले रथ में तुम्हारे द्वारा इच्छा करते ही घोड़े जुड़ जाते हैं. (२) युवाभ्यां वाजिनीवसू प्रति स्तोमा अदृक्षत. वाचं दूतो यथोहिशे.. (३) हे अन्नस्वामी अश्विनीकुमारो! तुम उन स्तुतियों पर ध्यान दो जो तुम्हारे लिए बनाई गई हैं. जैसे दूत अपने मालिक की बात सुनने के लिए प्रार्थना करता है, उसी प्रकार हम आपसे प्रार्थना करते हैं. (३) ebook converter DEMO Watermarks*

पुरुप्रिया ण ऊतये पुरुमन्द्रा पुरूवसू. स्तुषे कण्वासो अश्विना.. (४) हे बहुतों के प्रिय, बहुतों को आनंद देने वाले एवं बहुत धन वाले अश्विनीकुमारो! हम कण्वगोत्रीय ऋषि अपनी रक्षा के लिए तुम्हारी स्तुति करते हैं. (४) मंहिष्ठा वाजसातमेषयन्ता शुभस्पती. गन्तारा दाशुषो गृहम्.. (५) हे अतिशय महान्, अन्न देने वालों में उत्तम, स्तोताओं को अन्न देने वाले एवं शोभनधन के स्वामी अश्विनीकुमारो! तुम हव्यदाता के घर जाते हो. (५) ता सुदेवाय दाशुषे सुमेधामवितारिणीम्. घृतैर्गव्यूतिमुक्षतम्.. (६) हे अश्विनीकुमारो! सुंदर देवों का यजन करने वाले हव्यदाता के लिए शोभनयज्ञ का साधन एवं नाशरहित भूमि को सींचो. (६) आ नः स्तोममुप द्रवत्तूर्यं श्येनेभिराशुभिः. यातमश्वेभिरश्विना.. (७) हे अश्विनीकुमारो! अपने प्रशंसनीय चाल वाले घोड़ों पर चढ़कर हमारा स्तोत्र सुनने बहुत जल्दी आओ. (७) येभिस्तिस्रः परावतो दिवो विश्वानि रोचना. त्रीँरक्तून्परिदीयथः.. (८) हे अश्विनीकुमारो! तीन दिन और तीन रात तक तुम घोड़ों की सहायता से दीप्ति वाले स्थानों पर आओ. (८) उत नो गोमतीरिष उत सातीरहर्विदा. वि पथः सातये सितम्.. (९) हे प्रातःकाल स्तुतियोग्य अश्विनीकुमारो! हमें गायों से युक्त अन्न एवं उपभोग के योग्य धन दो. हमें उपभोग के लिए मार्ग भी दो. (९) आ नो गोमन्तमश्विना सुवीरं सुरथं रयिम्. वोळ्हमश्वावतीरिषः.. (१०) हे अश्विनीकुमारो! हमारे लिए गायों, घोड़ों, शोभनपुत्रों, सुंदर रथों एवं अन्न से युक्त धन दो. (१०) वावृधाना शुभस्पती दस्रा हिरण्यवर्तनी. पिबतं सोम्यं मधु.. (११) हे शोभन पदार्थों के स्वामी, दर्शन के योग्य व सोने के मार्ग वाले अश्विनीकुमारो! तुम वृद्धि प्राप्त करके मधुर सोम पिओ. (११) अस्मभ्यं वाजिनीवसू मघवद्भयश्च सप्रथः. छर्दैर्यन्तमदाभ्यम्.. (१२) हे यज्ञरूप धन वाले अश्विनीकुमारो! हम धनवानों का सब प्रकार से विस्तृत एवं ebook converter DEMO Watermarks*

हानिरहित घर हो. (१२) नि षु ब्रह्म जनानां याविष्टं तूयमा गतम्. मोष्व१न्याँ उपारतम्.. (१३) हे अश्विनीकुमारो! तुम शीघ्र आकर मनुष्यों की स्तुतियों की रक्षा करो. तुम किसी दूसरे के पास मत जाओ. (१३) अस्य पिबतमश्विना युवं मदस्य चारुण:. मध्वो रातस्य धिष्ण्या.. (१४) हे स्तुतियोग्य अश्विनीकुमारो! तुम हमारे द्वारा दिया हुआ, नशीला, शोभन एवं मधुर सोमरस पिओ. (१४) अस्मे आ वहतं रयिं शतवन्तं सहस्रिणम्. पुरुक्षुं विश्वधायसम्.. (१५) हे अश्विनीकुमारो! हमें सैकड़ों और हजारों प्रकार का, बहुतों द्वारा प्रशंसनीय एवं सबको धारण करने वाला धन वहन करके लाओ. (१५) पुरुत्रा चिद्धि वां नरा विह्वयन्ते मनीषिण:. वाघद्भिरश्विना गतम्.. (१६) हे नेता अश्विनीकुमारो! विद्वान् लोग तुम्हें अनेक स्थानों में बुलाते हैं. तुम अपने वहनसाधन अश्व द्वारा आओ. (१६) जनासो वृक्तबर्हिषो हविष्मन्तो अरङ्कृत:. युवां हवन्ते अश्विना.. (१७) हे अश्विनीकुमारो! कुश उखाड़ने वाले, हव्य-संपन्न एवं अधिक यज्ञ करने वाले लोग तुम्हें बुलाते हैं. (१७) अस्माकमद्य वामयं स्तोमो वाहिष्ठो अन्तम:. युवाभ्यां भूत्वश्विना.. (१८) हे अश्विनीकुमारो! हमारा यह स्तुतिसमूह तुम्हें सबसे अधिक वहन करने वाला एवं तुम्हारा समीपवर्ती हो. (१८) यो ह वां मधुनो दृतिराहितो रथचर्षणे. तत: पिबतमश्विना.. (१९) हे अश्विनीकुमारो! तुम्हारे रथ के मध्य भाग में जो सोमरस से भरा हुआ चर्मपात्र रखा है, उससे तुम सोम पिओ. (१९) तेन नो वाजिनीवसू पश्वे तोकाय शं गवे. वहतं पीवरीरिष:.. (२०) हे अन्नरूप धन वाले अश्विनीकुमारो! हमारे पशुओं, पुत्रों एवं गायों के हेतु उस रथ की सहायता से पर्याप्त अन्न सरलतापूर्वक लाओ. (२०) उत नो दिव्या इष उत सिन्धूॅरहर्विदा. अप द्वारेव वर्षथ:.. (२१) ebook converter DEMO Watermarks*

हे प्रातःकाल जानने योग्य अश्विनीकुमारो! हमारे लिए दिव्य जल मेघों के छिद्र से दो एवं हमारे लिए सरिताओं को बहाओ. (२१) कदा वां तौग्र्यो विधत्समुद्रे जहितो नरा. यद्वां रथो विभिष्पतात्.. (२२) हे नेता अश्विनीकुमारो! समुद्र में फेंके हुए तुग्रपुत्र भुज्यु ने स्तुति द्वारा तुम्हें न जाने कब बुलाया था? इसीसे अश्वों सहित तुम्हारा रथ वहां पहुंच गया. (२२) युवं कणवाय नासत्यापिरिप्ताय हर्म्ये. शश्वदूतीर्दशस्यथ:.. (२३) हे अश्विनीकुमारो! तुमने महल के निचले भाग में राक्षस शत्रुओं द्वारा बांधे गए कण्व ऋषि को अनेक प्रकार की रक्षाएं प्रदान की थीं. (२३) ताभिरा यातमूतिभिर्नव्यसीभिः सुशस्तिभिः. यद्वां वृषण्वसू हुवे.. (२४) हे अभिलाषापूरक एवं धनसंपन्न अश्विनीकुमारो! मैं तुम्हें जब बुलाऊं, तब तुम अपने नवीन एवं प्रशंसनीय रक्षासाधनों के साथ आओ. (२४) यथा चित्कण्वमावतं प्रियमधमुपस्तुतम्. अत्रिं शिञ्जारमश्विना.. (२५) हे अश्विनीकुमारो! तुमने जिस प्रकार कण्व, आवत, उपस्तुत एवं स्तुतिकर्त्ता अत्रि की रक्षा की थी, उसी प्रकार हमारी रक्षा करो. (२५) यथोत कृत्व्ये धनेऽशुं गोष्वगस्त्यम्. यथा वाजेषु सोभरिम्.. (२६) हे अश्विनीकुमारो! तुमने जिस प्रकार अंशु के धन, अगस्त्य की गायों और सौभरि के अन्न की रक्षा की थी, उसी प्रकार हमारी रक्षा करो. (२६) एतावद्वां वृषण्वसू अतो वा भूयो अश्विना. गृणन्तः सुम्नमीमहे.. (२७) हे अभिलाषापूरक एवं धनयुक्त अश्विनीकुमारो! हम तुम्हारी स्तुति करते हुए तुमसे सीमित एवं सीमा से अधिक धन मांगते हैं. (२७) रथं हिरण्यवन्धुरं हिरण्याभीषुमश्विना. आ हि स्थाथो दिविस्पृशम्.. (२८) हे अश्विनीकुमारो! सोने द्वारा निर्मित सारथिस्थान वाले एवं सुनहरी लगामों वाले अपने रथ पर बैठकर आओ. (२८) हिरण्ययी वां रभीरीषा अक्षो हिरण्ययः. उभा चक्रा हिरण्यया.. (२९) हे अश्विनीकुमारो! तुम्हें ढोने वाले रथ का जुआ सोने का है, धुरी सोने की है एवं पहिए सोने के हैं. (२९) ebook converter DEMO Watermarks*

तेन नो वाजिनीवसू परावतश्चिदा गतम्. उपेमां सुष्टुतिं मम.. (३०) हे अन्न एवं धन के स्वामी अश्विनीकुमारो! इस रथ पर बैठकर तुम दूर से भी आओ. तुम हमारी शोभनस्तुति के समीप आओ. (३०) आ वहेथे पराकात्पूर्वीरुश्नन्तावश्विना. इषो दासीरमर्त्या.. (३१) हे मरणरहित अश्विनीकुमारो! तुम दासों की नगरियों को भग्न करते हुए दूर से हमारे लिए अन्न लाओ. (३१) आ नो द्युम्नैरा श्रवोभिरा राया यातमश्विना. पुरुश्चन्द्रा नासत्या.. (३२) हे बहुतों के मित्र अश्विनीकुमारो! तुम हमारे पास अन्न, यश और धन लेकर आओ. (३२) एह वां प्रुषितप्सवो वयो वहन्तु पर्णिनः. अच्छा स्वध्वरं जनम्.. (३३) हे अश्विनीकुमारो! स्वाभाविक रूप से चिकने एवं पंखों वाले पक्षियों के समान शीघ्रगामी घोड़े तुम्हें शोभनयज्ञ वाले यजमान के पास ले जावें. (३३) रथं वामनुगायसं य इषा वर्तते सह. न चक्रमभि बाधते.. (३४) हे अश्विनीकुमारो! तुम्हारा अन्न लेकर चलने वाला एवं स्तोताओं द्वारा प्रशंसा किया हुआ रथ एवं रथ का पहिया शत्रुसेना द्वारा बाधित नहीं होता. (३४) हिरण्ययेन रथेन द्रवत्पाणिभिरश्वैः. धीजवना नासत्या.. (३५) हे मन के समान तेज चलने वाले अश्विनीकुमारो! आगे पैर बढ़ाने वाले घोड़ों से युक्त, स्वर्णनिर्मित रथ द्वारा हमारे पास आओ. (३५) युवं मृगं जागृवांसं स्वदथो वा वृषण्वसू. ता नः पृङ्क्तमिषा रयिम्.. (३६) हे अभिलाषापूरक धन वाले अश्विनीकुमारो! तुम सदा जगाने वाला एवं खोजने योग्य सोमरस पीते हो. तुम हमें अन्न दो. (३६) ता मे अश्विना सनीनां विद्यातं नवानाम्. यथा चिच्चैद्यः कशुः शतमुष्ट्रानां ददत्सहस्रा दश गोनाम्.. (३७) हे अश्विनीकुमारो! तुम मुझे देने के लिए श्रेष्ठ एवं भोगयोग्य धन को जानो. चेदिवंश में उत्पन्न राजा कशु ने मुझे सौ ऊंट और हजार गाएं दी हैं. तुम उन्हें जानो. (३७) यो मे हिरण्यसन्दृशो दश राज्ञो अमंहत. ebook converter DEMO Watermarks*

अधस्पदा इच्छैद्यस्य कृष्टयश्चर्मम्ना अभितो जनाः.. (३८) जिस कशु राजा ने मेरी सेवा में सोने के रंग के दस राजाओं को नियुक्त किया, उसी राजा कशु के पैरों के तले सब प्रजाएं रहती हैं. (३८) माकिरेना पथा गाद्येनेमे यन्ति चेदयः. अन्यो नेत्सूरिरोहते भूरिदावत्तरो जनः.. (३९) चेदिवंशीय राजा जिस मार्ग से जाते हैं, उससे दूसरा कोई नहीं जा सकता. कशु की अपेक्षा कोई अधिक दान देने वाला एवं विद्वान् व्यक्ति नहीं है. (३९) सूक्त—६ देवता—इंद्र महाँ इन्द्रो य ओजसा पर्जन्यो वृष्टिमाँ इव. स्तोमैर्वत्सस्य वावृधे.. (१) वर्षा करने वाले मेघ के समान महान् शक्ति वाले इंद्र पुत्रतुल्य स्तोता की स्तुतियों से बढ़ते हैं. (१) प्रजामृतस्य पिप्रतः प्र यद्भरन्त वह्नयः. विप्रा ऋतस्य वाहसा.. (२) आकाश को पूर्ण करने वाले घोड़े जिस समय इंद्र को वहन करते हैं, उस समय विद्वान् स्तोता यज्ञधारण करने वाले स्तोत्रों द्वारा इंद्र की स्तुति करते हैं. (२) कण्वा इन्द्रं यदक्रत स्तोमैर्यज्ञस्य साधनम्. जामि ब्रुवत आयुधम्.. (३) कण्वगोत्रीय ऋषियों ने स्तोत्रों द्वारा इंद्र को यज्ञ का साधन बनाया है. इसीलिए उन्हें यज्ञ का भाई कहा जाता है. (३) समस्य मन्यवे विशो विश्वा नमन्त कृष्टयः. समुद्रायेव सिन्धवः.. (४) इंद्र के क्रोध से भयभीत होकर सभी प्रजाएं इंद्र को इस प्रकार प्रणाम करती हैं, जिस प्रकार नदियां सागर के सामने झुकती हैं. (४) ओजस्तदस्य तित्त्विष उभे यत्समवर्तयत्. इन्द्रश्चर्मेव रोदसी.. (५) इंद्र जिस शक्ति द्वारा द्यावा-पृथिवी को चमड़े के समान लपेटकर रखते हैं, वह शक्ति स्पष्ट है. (५) वि चिद्वृत्रस्य दोधतो वज्रेण शतपर्वणा. शिरो बिभेद वृष्णिना.. (६) इंद्र ने सौ धारों वाले वज्र द्वारा कांपते हुए वृत्र का सिर काट डाला था. (६) ebook converter DEMO Watermarks*

इमा अभि प्र णोनुमो विपामग्रेषु धीतयः. अग्नेः शोचिर्न दिद्युतः.. (७) हे इंद्र! हम अग्नि के समान तेजस्वी इन स्तोत्रों को स्तोताओं के आगे रहकर बार-बार पढ़ेंगे. (७) गुहा सतीरुप त्मना प्र यच्छोचन्त धीतयः. कण्वा ऋतस्य धारया.. (८) बुद्धि में स्थित जो स्तुतियां अपने आप इंद्र के पास जाकर प्रकाशित होती हैं, उन्हें कण्वगोत्रीय ऋषि सोम की धारा से मिलाते हैं. (८) प्र तमिन्द्र नशीमहि रयिं गोमन्तमश्विनम्. प्र ब्रह्म पूर्वचित्तये.. (९) हे इंद्र! हम गायों एवं घोड़ों से युक्त धन प्राप्त करें. हम दूसरों से पहले ज्ञान पाने के लिए अन्न पावें. (९) अहमिद्धि पितुष्परि मेधामृतस्य जग्रभ. अहं सूर्य इवाजनि.. (१०) मैंने ही सच्चे पिता इंद्र की कृपादृष्टि प्राप्त की है. मैं सूर्य के समान प्रकाशयुक्त होकर उत्पन्न हुआ हूं. (१०) अहं प्रत्नेन मन्मना गिरः शुम्भामि कण्ववत्. येनेन्द्रः शुष्ममिद्दधे.. (११) मैं अपने पिता कण्व के समान वेदरूप स्तोत्र से अपनी वाणी को अलंकृत करता हूं. इस स्तोत्र द्वारा इंद्र बल धारण करते हैं. (११) ये त्वामिन्द्र न तुष्टुवुर्ऋषयो ये च तुष्टुवुः. ममेद्वृधस्व सुष्टुतः.. (१२) हे इंद्र! जो ऋषि तुम्हारी स्तुति करते हैं अथवा जो तुम्हारी स्तुति नहीं करते हैं, इन दोनों प्रकार के ऋषियों में मेरी स्तुति प्रशंसा पाकर बढ़े. (१२) यदस्य मन्युरध्वनीद्वि वृत्रं पर्वशो रुजन्. अपः समुद्रमैरयत्.. (१३) इंद्र के क्रोध ने जिस समय वृत्र को टुकड़े-टुकड़े करके काटते हुए ध्वनि की थी, उस समय जल को सागर की ओर भेजा था. (१३) नि शुष्ण इन्द्र धर्णिंसं वज्रं जघन्थ दस्यवि. वृषा ह्युग्र शृण्विषे.. (१४) हे इंद्र! तुमने शुष्ण नामक दस्यु पर अपना धारण करने योग्य वज्र चलाया था. हे उग्र इंद्र! तुम अभिलाषापूरक सुने जाते हो. (१४) न द्याव इन्द्रमोजसा नान्तरिक्षाणि वज्रिणम्. न विव्यचन्त भूमयः.. (१५) द्युलोक, अंतरिक्ष एवं धरती वज्रधारी इंद्र को अपनी शक्ति से व्याप्त नहीं कर सकते हैं.

(१५) यस्त इन्द्र महीरपः स्तभूयमान आशयत्. नितं पद्यासु शिश्रथः.. (१६) हे इंद्र! जो वृत्र तुम्हारे महान् जल को रोक कर अंतरिक्ष में सोया था, उसे तुमने गतिशील जल के मध्य मारा था. (१६) य इमे रोदसी मही समीची समजग्रभीत्. तमोभिरिन्द्र तं गुहः.. (१७) हे इंद्र! जिस वृत्र ने विस्तृत एवं परस्पर मिलित द्यावा-पृथिवी को ढक लिया था, उसे तुमने अंधकार में विलीन कर दिया था. (१७) य इन्द्र यतयस्त्वा भृगवो ये च तुष्टुवुः. ममेदुग्र श्रुधी हवम्.. (१८) हे उग्र इंद्र! जो संयमी अंगिरागोत्रीय ऋषि एवं भृगुगोत्रीय ऋषि तुम्हारी स्तुति करते हैं, उनके मध्य में मेरी स्तुति सुनो. (१८) इमास्त इन्द्र पृश्नयो घृतं दुहत आशिरम्. एनामृतस्य पिप्युषीः.. (१९) हे इंद्र! ये यज्ञ को पूर्ण करने वाली गाएं घी तथा दूध देती हैं. (१९) या इन्द्र प्रस्वस्तवासा गर्भमचक्रिरन्. परि धर्मेव सूर्यम्.. (२०) हे इंद्र! इन प्रसव वाली गायों ने मुख से अन्न खाकर इस प्रकार गर्भ धारण किया है, जिस प्रकार सूर्य के चारों ओर जल रहता है. (२०) त्वामिच्छवसस्पते कण्वा उक्थेन वावृधुः. त्वां सुतास इन्दवः.. (२१) हे शक्ति के स्वामी इंद्र! कण्वगोत्रीय ऋषियों ने तुम्हें उक्थ द्वारा बढ़ाया. निचोड़े हुए सोम ने तुम्हें बढ़ाया. (२१) तवेदिन्द्र प्रणीतिषूत प्रशस्तिरद्रिवः. यज्ञो वितन्तसाय्यः.. (२२) हे वज्रधारी इंद्र! जब तुम मार्गदर्शक बनते हो, तब उत्तम स्तुति एवं विशाल यज्ञ किया जाता है. (२२) आ न इन्द्र महीमिषं पुरं न दर्षि गोमतीम्. उत प्रजां सुवीर्यम्.. (२३) हे इंद्र हमारे लिए महान्, गायों सहित अन्न एवं शोभनवीर्य वाला पुत्र देने की इच्छा करो. (२३) उत त्यदाश्वश्व्यं यदिन्द्र नाहुषीष्वा. अग्रे विक्षु प्रदीदयत्.. (२४)

हे इंद्र! तुमने राजा नहुष की प्रजाओं के सामने शीघ्रगामी घोड़े के समान जो जल दिया था, वह हमें दो. (२४) अभि व्रजं न तत्निषे सूर उपाकचक्षसम्. यदिन्द्र मृळयासि नः.. (२५) हे विद्वान् इंद्र! तुम हमारी गोशाला को पास से देखने में गायों से पूर्ण करो एवं हमें सुखी बनाओ. (२५) यदङ्ग तविषीयस इन्द्र प्रराजसि क्षितीः. महाँ अपार ओजसा.. (२६) हे इंद्र! तुम अपने बल का प्रदर्शन करके धरती के राजा बनते हो. तुम अपने बल के कारण ही महान् एवं अपराजेय हो. (२६) तं त्वा हविष्मतीर्विश उप ब्रुवत ऊतये. उरुज्जयसमिन्दुभिः.. (२७) हे परम व्यापक इंद्र! हव्य धारणकर्त्ता लोग तुम्हें सोमरस द्वारा प्रसन्न करके अपनी रक्षा के लिए स्तुति करते हैं. (२७) उपह्वरे गिरीणां सङ्गथे च नदीनाम्. धिया विप्रो अजायत.. (२८) यज्ञकर्म के कारण इंद्र पर्वत के भागों में एवं नदियों के संगम पर उत्पन्न होते हैं. (२८) अतः समुद्रमुद्वतश्चिकित्वाँ अव पश्यति. यतो विपान एजति.. (२९) जो व्यापक इंद्र सूर्यरूप में संसार में विहार करते हैं, वे ही ऊपर के लोक में स्थित रहकर नीचे की ओर मुंह करके सागर को देखते हैं. (२९) आदित्प्रत्नस्य रेतसो ज्योतिष्पश्यन्ति वासरम्. परो यदिध्यते दिवा.. (३०) इंद्र जिस समय द्युलोक के ऊपर दीप्ति प्राप्त करते हैं, उसी समय लोग प्राचीन एवं जल बरसाने वाले इंद्र की निवासस्थान देने वाली दीप्ति को देखते हैं. (३०) कण्वास इन्द्र ते मतिं विश्वे वर्धन्ति पौंस्यम्. उतो शविष्ठ वृष्ण्यम्.. (३१) हे इंद्र! सब कण्वगोत्रीय ऋषि तुम्हारी बुद्धि एवं पुरुषार्थ को बढ़ाते हैं. हे परम शक्तिशाली इंद्र! वे तुम्हारी शक्ति को भी बढ़ाते हैं. (३१) इमां म इन्द्र सुष्टुतिं जुषस्व प्र सु मामव. उत प्र वर्धया मतिम्.. (३२) हे इंद्र! हमारी इस शोभनस्तुति को स्वीकार करो एवं हमारी भली प्रकार रक्षा करो. तुम हमारी बुद्धि को भी बढ़ाओ. (३२) उत ब्रह्मण्या वयं तुभ्यं प्रवृद्ध वज्रिवः. विप्रा अतक्ष्म जीवसे.. (३३) ebook converter DEMO Watermarks*