ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सात मनुष्यों वाले, सभी नदियों में आश्रित एवं तीन स्थानों वाले अग्नि ने मांधाता के लिए शत्रुओं का अधिक हनन किया था. यज्ञों में प्रमुख अग्नि सभी शत्रुओं को मारें. (८) अग्निखीणि त्रिधातून्या क्षेति विदथा कविः. स त्रीँरैकादशाँ इह यक्षच्च पिप्रयच्च नो विप्रो दूतः परिष्कृतो नभन्तामन्यके समे.. (९) क्रांतदर्शी एवं धरती आदि तीन स्थानों में रहने वाले अग्नि देवों के दूत, प्राज्ञ एवं अलंकृत होकर इस यज्ञ में तैंतीस देवों का यजन करें एवं हमारी अभिलाषा पूरी करें. अग्नि सभी शत्रुओं को मारें. (९) त्वं नो अग्न आयुषु त्वं देवेषु पूर्व्यं वस्व एक इरज्यसि. त्वामापः परिस्रुतः परि यन्ति स्वसेतवो नभन्तामन्यके समे.. (१०) हे अग्नि! तुम अकेले होते हुए भी मानो देवों के स्वामी हो. हे सेतुरूप अग्नि! तुम्हारे चारों तरफ जल रहता है. तुम सभी शत्रुओं को मारो. (१०) सूक्त—४० देवता—इंद्र व अग्नि इन्द्राग्नी युवं सु नः सहन्ता दासथो रयिम्. येन दृळहा समत्स्वा वीळु चित्साहिषीमह्यग्निर्वनेव वात इन्नभन्तामन्यके समे.. (१) हे इंद्र व अग्नि! तुम शत्रुओं को हराते हुए हमें धन दो. अग्नि वायु की सहायता से जिस प्रकार वन को जलाते हैं, उसी प्रकार लोग अग्नि द्वारा दिए धन की सहायता से शत्रुओं को हराते हैं. अग्नि सभी शत्रुओं को मारें. (१) नहि वां वव्रयामहेऽथेन्द्रमिद्याजामहे शविष्ठं नृणां नरम्. स नः कदा चिदर्वता गमदा वाजसातये गमदा मेधसातये नभन्तामन्यके समे.. (२) हे इंद्र व अग्नि! हम तुमसे धन की याचना नहीं करते. हम तो सबके नेता एवं सबसे अधिक शक्तिशाली इंद्र का यज्ञ करते हैं. इंद्र कभी अन्न देने के लिए और कभी यज्ञ प्राप्त करने के लिए घोड़े पर चढ़कर आते हैं. इंद्र एवं अग्नि सभी शत्रुओं को मारें. (२) ता हि मध्यं भराणामिन्द्राग्नी अधिक्षितः. ता उ कवित्वना कवी. पृच्छ्यमाना सखीयते सं धीतमश्रुतं नरा नभन्तामन्यके समे.. (३) प्रसिद्ध इंद्र एवं अग्नि संग्रामों के बीच में निवास करते हैं. हे क्रांतदर्शी नेताओ! कविजनों द्वारा पूछने पर तुम्हीं मित्रता के इच्छुक यजमान द्वारा किए हुए यज्ञकर्म की व्याख्या करते हो. इंद्र एवं अग्नि सभी शत्रुओं का नाश करें. (३) अभ्यर्च नभाकवदिन्द्राग्नी यजसा गिरा. ebook converter DEMO Watermarks*
ययोर्विश्वमिदं जगदियं द्यौः पृथिवी महु१पस्थे बिभृतो वसु नभन्तामन्यके समे.. (४) हे नाभाक! यज्ञ और स्तुति के द्वारा इंद्र और अग्नि की पूजा करो. इन्हीं में सारा संसार स्थित है और इन्हीं की गोद में द्युलोक एवं विशाल धरती धन धारण करते हैं. ये दोनों सभी शत्रुओं को नष्ट करें. (४) प्र ब्रह्माणि नभाकवदिन्द्राग्निभ्यामिरज्यत. या सप्तबुध्नमर्णवं जिह्मबारमपोर्णुत इन्द्र ईशान ओजसा नभन्तामन्यके समे.. (५) नाभाक जैसे ऋषि इंद्र एवं अग्नि की स्तुति करते हैं. वे दोनों सात जड़ों एवं बंद द्वारों वाले सागर को अपने तेज द्वारा ढक लेते हैं. इंद्र अपने तेज के कारण सबके स्वामी हैं. इंद्र एवं अग्नि सभी शत्रुओं को मारें. (५) अपि वृश्च पुराणवद् व्रततेरिव गुष्पितमोजो दासस्य दम्भय. वयं तदस्य सम्भृतं वस्विन्द्रेण वि भजेमहि नभन्तामन्यके समे.. (६) हे इंद्र! पुराना मनुष्य जैसे लता की बाहर निकली हुई शाखा को काटता है, उसी प्रकार तुम हमारे शत्रुओं को काटो एवं दास नामक राक्षस का विनाश करो. हम इंद्र की कृपा से दास द्वारा एकत्रित धन का भोग करेंगे. इंद्र और अग्नि हमारे सभी शत्रुओं को मारें. (६) यदिन्द्राग्नी जना इमे विह्वयन्ते तना गिरा. अस्माकेभिर्नृभिर्वयं सासह्वाम पृतन्यतो वनुयाम वनुष्यतो नभन्तामन्यके समे.. (७) जो लोग धन और स्तुतियों द्वारा इंद्र तथा अग्नि को बुलाते हैं, उनके मध्य हम नाभाकगोत्रीय लोग सेवा की इच्छा करते हुए अपने लोगों को साथ लेकर शत्रुओं को पराजित करेंगे एवं स्तुति करने वालों को अपनाएंगे. इंद्र और अग्नि सभी शत्रुओं को नष्ट करें. (७) या नु श्वेताववो दिव उच्चरात उप द्युभिः. इन्द्राग्न्योरनु व्रतमुहाना यन्ति सिन्धवो यान्त्सीं बन्धादमुञ्चतां नभन्तामन्यके समे.. (८) जो श्वेत वर्ण के इंद्र एवं अग्नि अपनी दीप्ति द्वारा नीचे से द्युलोक से ऊपर जाते हैं, उन्हीं के यज्ञकर्म को अनुष्ठान करते हुए यजमान हव्य धारण करते हैं. उन्होंने नदियों को बंधन से छुड़ाया था. वे सभी शत्रुओं को मारें. (८) पूर्वीष्ट इन्द्रोपमातयः पूर्वीरुत प्रशस्तयः सूनो हिन्वस्य हरिवः. वस्वो वीरस्यापृचो या नु साधन्त नो धियो नभन्तामन्यके समे.. (९) हे हरि नामक घोड़ों वाले, प्रेरणाकर्त्ता, प्रसन्न करने वाले, वीर एवं धनी इंद्र! तुम्हारी समानता करने वाली बहुत सी वस्तुएं हैं. तुम्हारी प्राचीन स्तुतियां हमारी बुद्धि को पूर्ण करें. ebook converter DEMO Watermarks*
इंद्र एवं अग्नि सभी शत्रुओं को नष्ट करें. (९) तं शिशीता सुवृक्तिभिस्त्वेषं सत्वानमृग्मियम्. उतो नु चिद्य ओजसा शुष्णस्याण्डानि भेदति जेषत्स्वर्वतीरपो नभन्तामन्यके समे.. (१०) हे स्तोताओ! दीप्त, धन देने वाले व ऋक् मंत्रों के योग्य इंद्र का संस्कार शोभन-स्तुतियों द्वारा करो. अपनी शक्ति द्वारा शुष्ण असुर की संतान का नाश करने वाले इंद्र स्वर्ग का जल जीतते हैं. इंद्र एवं अग्नि सभी शत्रुओं को मारें. (१०) तं शिशीता स्वध्वरं सत्यं सत्वानमृत्वियम्. उतो नु चिद्य ओहत आण्डा शुष्णस्य भेदत्यजैः स्वर्वतीरपो नभन्तामन्यके समे.. (११) हे स्तोताओ! शोभन-यज्ञ वाले विनाशरहित, धनसंपन्न एवं ऋतुओं के अनुकूल यज्ञ का संस्कार स्तुतियों द्वारा करो. यज्ञ के अभिमुख जाने वाले इंद्र शुष्ण असुर की संतान को मारते हैं एवं स्वर्ग का जल जीतते हैं. इंद्र एवं अग्नि सभी शत्रुओं को मारें. (११) एवेन्द्राग्निभ्यां पितृवन्नवीयो मन्धातृवदङ्गिरस्वदवाचि. त्रिधातुना शर्मणा पातमस्मान् वयं स्याम पतयो रयीणाम्.. (१२) मैंने अपने पिता मांधाता एवं अंगिरा ऋषि के समान नवीन स्तुतियों को बोला है. वे तीन कमरों वाले मकान को देकर हमारी रक्षा करें. हम धनों के स्वामी हों. (१२) सूक्त—४१ देवता—वरुण अस्मा ऊ षु प्रभूतये वरुणाय मरुद्भ्योऽर्चा विदुष्टरेभ्यः. यो धीता मानुषाणां पश्वो गा इव रक्षति नभन्तामन्यके समे.. (१) हे स्तोता! अधिक धन पाने के लिए वरुण एवं अधिक विद्वान् मरुतों की स्तुति करो. वे गायों के समान ही मानवों के पशुओं की रक्षा करते हैं. वरुण हमारे सभी शत्रुओं को मारें. (१) तमू षु समना गिरा पितॄणां च मन्मभिः. नाभाकस्य प्रशस्तिभिर्यः सिन्धूनामुपोदये सप्तस्वसा स मध्यमो नभन्तामन्यके समे.. (२) मैं शोभन-स्तुति द्वारा वरुण तथा स्तोत्रों द्वारा पितरों की प्रशंसा करता हूं. मैं नाभाक ऋषि द्वारा निर्मित प्रशंसाओं से वरुण की स्तुति करता हूं. वरुण नदियों के समीप उदित होते हैं. उनकी सात बहिनें हैं, जिन में वे बीच के हैं. वे सभी शत्रुओं को मारें. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
स क्षपः परि षस्वजे न्यू१सो मायया दधे स विश्वं परि दर्शतः. तस्य वेनीरनु व्रतमूषस्तिस्रो अवर्धयन्नभन्तामन्यके समे.. (३) वरुण रात्रियों का आलिंगन करते हैं. दर्शनीय वरुण उन्नति करते हुए अपनी माया द्वारा संसार को धारण करते हैं. वरुण के व्रत की कामना करने वाले प्रातः, दोपहर एवं संध्या तीनों कालों के यज्ञ को बढ़ाते हैं. वे सभी शत्रुओं को समाप्त करें. (३) यः ककुभो निधारयः पृथिव्यामधि दर्शतः. स माता पूर्व्यं पदं तद्वरुणस्य सप्त्यं स हि गोपा इवेर्यो नभन्तामन्यके समे.. (४) जो वरुण पृथ्वि के ऊपर दर्शनीय बनकर दिशाओं को धारण करते हैं, वे प्राचीन स्वर्ग एवं हमारे विचरणस्थान धरती के निर्माता हैं. वे स्वामी बनकर गायों की रक्षा करते हैं. वे हमारे सभी शत्रुओं को मारें. (४) यो धर्ता भुवनानां य उस्राणामपीच्या३ वेद नामानि गुह्या. स कविः काव्या पुरु रूपं द्यौरिव पुष्यति नभन्तामन्यके समे.. (५) जो वरुण भुवनों को धारण करने वाले एवं रश्मियों तथा गुहा में छिपे नामों को जानते हैं, वे ही बुद्धिमान् वरुण द्युलोक के समान कविकृत काव्यों का पोषण करते हैं. वे सभी शत्रुओं को समाप्त करें. (५) यस्मिन् विश्वानि काव्या चक्रे नाभिरिव श्रिता. त्रितं जूती सपर्यत व्रजे गावो न संयुजे युजे अश्वाँ अयुक्त नभन्तामन्यके समे.. (६) हे मेरे सेवको! तीन स्थानों में रहने वाले वरुण की शीघ्र सेवा करो. जिस प्रकार नाभि में पहिया स्थित रहता है उसी प्रकार सब काव्य वरुण में स्थित रहते हैं. जिस प्रकार गाय को गोशाला में ले जाते हैं, उसी प्रकार हमारे शत्रु घोड़ों को रथ में जोड़ते हैं. वरुण सब शत्रुओं को मारें. (६) य आस्वत्क आशये विश्वा जातान्येषाम्. परि धामानि मर्मृशद्वरुणस्य पुरो गये विश्वे देवा अनु व्रतं नभन्तामन्यके समे.. (७) सारी दिशाओं को व्याप्त करने वाले वरुण चारों ओर फैले हुए शत्रुनगरों को नष्ट करते हैं. सब देवता वरुण के रथ के आगे यज्ञकर्मों का अनुष्ठान करते हैं. वरुण सब शत्रुओं को मारें. (७) स समुद्रो अपीच्यस्तुरो द्यामिव रोहति नि यदासु यजुर्दधे. स माया अर्चिना पदास्तृणान्नाकमरुहन्नभन्तामन्यके समे.. (८) समुद्र का रूप धारण करने वाले वरुण छिपकर शीघ्र ही सूर्य के समान स्वर्ग में पहुंचते ebook converter DEMO Watermarks*
हैं एवं इन दिशाओं में प्रजा को दान देते हैं. वरुण दीप्तिशाली स्थान द्वारा माया का नाश करते हैं एवं स्वर्ग पर आरोहण करते हैं. वरुण सब शत्रुओं का नाश करें. (८) यस्य श्वेता विचक्षणा तिस्रो भूमिरधिक्षितः. त्रिरुत्तराणि पप्रतुर्वरुणस्य ध्रुवं सदः स सप्तानामिरज्यति नभन्तामन्यके समे.. (९) अंतरिक्ष में निवास करने वाले जिस वरुण के तीन श्वेत तेज तीन भूमियों को विस्तृत करते हैं, उस वरुण का स्थान ध्रुव है. वरुण सातों नदियों के स्वामी हैं. वे सभी शत्रुओं को मारें. (९) यः श्वेताँ अधिनिर्णिजश्चक्रे कृष्णाँ अनु व्रता. स धाम पूर्व्यं ममे यः स्कम्भेन वि रोदसी अजो न द्यामधालयन्नभन्तामन्यके समे.. (१०) जो वरुण अपनी किरणों को दिन में श्वेत एवं रात में काली बना देते हैं, उन्होंने अपने कर्मों के उद्देश्यों से द्युलोक, अंतरिक्ष एवं धरती को बनाया है. सूर्य जिस प्रकार द्युलोक को धारण करते हैं, उसी प्रकार वरुण अंतरिक्ष के द्वारा द्यावा-पृथिवी को धारण करते हैं. वरुण सभी शत्रुओं को मारें. (१०) सूक्त—४२ देवता—वरुण आदि अस्तभ्नाद् द्यामसुरो विश्ववेदा अमिमीत वरिमाणं पृथिव्याः. आसीदद्विश्वा भुवनानि सम्राड् विश्वेत्तानि वरुणस्य व्रतानि.. (१) समस्त धन के स्वामी एवं शक्तिशाली वरुण ने द्युलोक को धारण किया, धरती के परिमाण को नापा एवं सभी भुवनों के सम्राट् बनकर बैठे. वरुण के सभी कार्य इसी प्रकार के हैं. (१) एवा वन्दस्व वरुणं बृहन्तं नमस्या धीरममृतस्य गोपाम्. स नः शर्म त्रिवरूथं वि यंसत्पातं नो द्यावापृथिवी उपस्थे.. (२) हे स्तोता! इस प्रकार महान् वरुण की वंदना करो. अमृत के रक्षक एवं धीर वरुण को नमस्कार करो. वरुण हमें तीन मंजिल वाला मकान दें. वरुण की गोद में वर्तमान हम लोगों की रक्षा द्यावा-पृथिवी करें. (२) इमां धियं शिक्षमाणस्य देव क्रतुं दक्षं वरुण सं शिशाधि. ययाति विश्वा दुरिता तरेम सुतर्माणमधि नावं रुहेम.. (३) हे वरुण देव! मुझ अनुष्ठानकर्त्ता के यज्ञकर्म, प्रज्ञान एवं बल को तेज बनाओ. हम ebook converter DEMO Watermarks*
सरलतापूर्वक पार पहुंचने वाली ऐसी नाव पर चढ़ेंगे, जिसके सहारे हम सभी पापों के पार जा सकें. (३) आ वां ग्रावाणो अश्विना धीभिर्विप्र अचुच्यवुः. नासत्या सोमपीतये नभन्तामन्यके समे.. (४) हे सत्य रूप वाले अश्विनीकुमारो! विद्वान् ऋत्विज् एवं सोमरस निचोड़ने के काम आने वाले पत्थर अपने-अपने कर्मों के द्वारा सोमरस पान हेतु तुम्हारे सामने आते हैं. अश्विनीकुमार हमारे शत्रुओं को मारें. (४) यथा वामत्रिरश्विना गीर्भिर्विप्रो अजोहवीत्. नासत्या सोमपीतये नभन्तामन्यके समे.. (५) हे सत्यरूप अश्विनीकुमारो! विद्वान् अत्रि ऋषि ने अपनी स्तुतियों द्वारा तुम्हें जिस प्रकार सोमरस पीने के लिए बुलाया था, उसी प्रकार मैं भी बुलाता हूं. अश्विनीकुमार सभी शत्रुओं को मारें. (५) एवा वामहू ऊतये यथाहूवन्त मेधिराः. नासत्या सोमपीतये नभन्तामन्यके समे.. (६) हे सत्यरूप अश्विनीकुमारो! मेधावियों ने तुम्हें जिस प्रकार सोमरस पीने के लिए बुलाया था, उसी प्रकार मैं अपनी रक्षा के लिए बुलाता हूं. अश्विनीकुमार सब शत्रुओं को मारें. (६) सूक्त—४३ देवता—अग्नि इमे विप्रस्य वेधसोऽग्नेरस्तृतयज्वनः. गिरः स्तोमास ईरते.. (१) हमारे स्तोता बुद्धिमान्, विधाता एवं यजमान की हिंसा न करने वाले अग्नि की स्तुति करते हैं. (१) अस्मै ते प्रतिहर्यते जातवेदो विचर्षणे. अग्ने जनामि सुष्टुतिम्.. (२) हे जातवेद एवं विशेष द्रष्टा अग्नि! तुम मुझे दान देने वाले हो. मैं तुम्हारे लिए शोभन स्तुतियों का निर्माण करता हूं. (२) आरोका इव घेदह तिग्मा अग्ने तव त्विषः. दद्भिर्वनानि बप्सति.. (३) हे अग्नि! तुम्हारी तीखी किरणें आरोचमान पशुओं के समान दांतों से वनों को खाती हैं. (३) ebook converter DEMO Watermarks*
हरयो धूमकेतवो वातजूता उप द्यवि. यतन्ते वृथमग्नयः.. (४) हरणशील, वायु द्वारा प्रेरित एवं धूमरूपी ध्वज वाले अग्नि अंतरिक्ष में अलग-अलग जाते हैं. (४) एते त्ये वृथमग्नय इद्ध्रासः समदृक्षत. उषासामिव केतवः.. (५) अलग-अलग प्रज्वलित ये अग्नियां उषाओं के झंडों के समान दिखाई देती हैं. (५) कृष्णा रजांसि पत्सुतः प्रयाणे जातवेदसः. अग्निर्यद्रोधति क्षमि.. (६) जातवेद अग्नि जिस समय धरती पर सूखी लकड़ियों को जलाते हैं, तब अग्नि के गमन के समय धरती की धूल काली हो जाती है. (६) धासिं कृण्वान ओषधीर्बप्सदग्निर्न वायति. पुनर्यन्तरुणीरपि.. (७) अग्नि ओषधियों को अन्न समझकर भक्षण करते हुए शांत नहीं होते. वे युवा ओषधियों की ओर जाते हैं. (७) जिह्वाभिरह नन्नमदर्चिषा जञ्जणाभवन्. अग्निर्वनेषु रोचते.. (८) अग्नि अपनी ज्वालारूपी जीभों के द्वारा वनस्पतियों को झुकाते हैं एवं अपने तेज के द्वारा उन्हें खाकर वनों में सुशोभित होते हैं. (८) अप्सवग्ने सधिष्टव सौषधीरनु रुध्यसे. गर्भे सञ्जायसे पुनः.. (९) हे अग्नि! जल में तुम्हारे प्रवेश करने का स्थान है. तुम ओषधियों को रोकते हो एवं उन्हीं ओषधियों में गर्भरूप में स्थित होते हो. (९) उदग्ने तव तद् घृतार्ची रोचत आहुतम्. निंसानं जुह्वो३ मुखे.. (१०) हे अग्नि! तुम घृत द्वारा आहुत सुच का मुंह चाटते हो एवं तुम्हारी ज्वाला सुशोभित होती है. (१०) उक्षान्नाय वशान्नाय सोमपृष्ठाय वेधसे. स्तोमैर्विधेमाग्नये.. (११) खाने योग्य हवि वाले, अभिलाषा करने योग्य अन्न वाले, सोम एवं घृत से युक्त पीठ वाले एवं अभिलाषाओं के विधाता अग्नि की सेवा हम स्तुतियों द्वारा करते हैं. (११) उत त्वा नमसा वयं होतर्वरेण्यक्रतो. अग्ने समिद्धिरीमहे.. (१२) हे देवों को बुलाने वाले एवं वरणीय प्रजा वाले अग्नि! हम समिधा एवं नमस्कार के द्वारा तुमसे याचना करते हैं. (१२) ebook converter DEMO Watermarks*
उत त्वा भृगुवच्छुचे मनुष्वदग्न आहुत. अङ्गिरस्वद्धवामहे.. (१३) हे शुद्ध एवं बुलाए गए अग्नि! हम भृगु ऋषि, अंगिरा ऋषि एवं राजा मनु के समान तुम्हें बुलाते हैं. (१३) त्वं ह्यग्ने अग्निना विप्रो विप्रेण सन्सता. सखा सख्या समिध्यसे.. (१४) हे विद्वान्, साधु एवं सखा अग्नि! तुम विद्वान्, साधु एवं सखा अग्नियों की सहायता से जलते हो. (१४) स त्वं विप्राय दाशुषे रयिं देहि सहस्रिणम्. अग्ने वीरवतीमिषम्.. (१५) हे प्रसिद्ध अग्नि! तुम बुद्धिमान् हव्यदाता को हजारों धन एवं वीर संतान से युक्त धन दो. (१५) अग्ने भ्रातः सहस्कृत रोहिदश्व शुचिव्रत. इमं स्तोमं जुषस्व मे.. (१६) हे यजमानों के भ्राता, शक्ति के द्वारा उत्पन्न रोहित नामक अश्व के स्वामी एवं शुद्धकर्म वाले अग्नि! तुम मेरे इस स्तोत्र को स्वीकार करो. (१६) उत त्वाग्ने मम स्तुतो वाश्राय प्रतिहर्यते. गोष्ठं गाव इवाशत.. (१७) हे अग्नि! मेरी स्तुतियां तुम्हारे पास उसी प्रकार जा रही हैं, जिस प्रकार उत्सुक गाएं रंभाती हुई गोशाला में बछड़ों के पास जाती हैं. (१७) तुभ्यं ता अङ्गिरस्तम विश्वाः सुक्षितयः पृथक्. अग्ने कामाय येमिरे.. (१८) हे अंगिराओं में श्रेष्ठ अग्नि! सारी प्रजाएं अपनी अभिलाषापूर्ति के लिए अलग-अलग तुम्हारे पास आती हैं. (१८) अग्निं धीभिर्मनीषिणो मेधिरासो विपश्चितः. अद्मसद्याय हिन्विरे.. (१९) स्वाभिमानी, मेधावी एवं विद्वान् यजमान अन्न पाने के लिए अग्नि को यज्ञकर्मों द्वारा प्रसन्न करते हैं. (१९) तं त्वामज्मेषु वाजिनं तन्वाना अग्ने अध्वरम्. वह्निं होतारमीळते.. (२०) हे शक्तिशाली, हव्यवहन करने वाले, देवों को बुलाने वाले एवं प्रसिद्ध अग्नि! यज्ञशालाओं में यज्ञों का विस्तार करने वाले यजमान तुम्हारी स्तुति करते हैं. (२०) पुरुत्रा हि सदृङ्ङसि विशो विश्वा अनु प्रभुः. समत्सु त्वा हवामहे.. (२१) हे अग्नि! क्योंकि तुम प्रभु एवं बहुत से प्रदेशों में सभी प्रजाओं को समान रूप से देखने ebook converter DEMO Watermarks*
वाले हो, इसलिए हम तुम्हें युद्धों में बुलाते हैं. (२१) तमीळिष्व य आहुतोऽग्निर्विभ्राजते घृतैः. इमं नः शृणवद्धवम्.. (२२) घृत के साथ आहुतियां पाकर विराजमान एवं हमारे इस आह्वान को सुनने वाले अग्नि की स्तुति करो. (२२) तं त्वा वयं हवामहे शृण्वन्तं जातवेदसम्. अग्ने घ्नन्तमप द्विषः.. (२३) हे अग्नि! तुम जातवेद, शत्रुनाशक एवं हमारी पुकार सुनने वाले हो. हम तुम्हें बुलाते हैं. (२३) विशां राजानमद्भुतमध्यक्षं धर्मणामिमम्. अग्निमीळे स उ श्रवत्.. (२४) मैं प्रजाओं के राजा, अद्भुत एवं यज्ञकर्मों के अध्यक्ष अग्नि की स्तुति करता हूं. वे मेरी स्तुति सुनें. (२४) अग्निं विश्वायुवेपसं मर्त्यं न वाजिनं हितम्. सप्तिं न वाजयामसि.. (२५) हम सर्वगत-शक्ति वाले, बलशाली एवं मानवों के समान सबके हितकारी अग्नि को अपनी स्तुतियों द्वारा अश्व के समान शक्तिशाली बनाते हैं. (२५) घ्नमृध्राण्यप द्विषो दहन् रक्षांसि विश्वहा. अग्ने तिग्मेन दीदिहि.. (२६) हे अग्नि! तुम हिंसकों और द्वेषियों को नष्ट करते हुए एवं राक्षसों को जलाते हुए तीक्ष्ण तेज के द्वारा दीप्त बनो. (२६) यं त्वा जनास इन्धते मनुष्वदङ्गिरस्तम. अग्ने स बोधि मे वचः.. (२७) हे अंगिराओं में श्रेष्ठ अग्नि! तुम्हें जिस प्रकार मनु ने प्रज्वलित किया था, उसी प्रकार ये लोग जलाते हैं. तुम मेरी स्तुति जानो. (२७) यदग्ने दिविजा अस्यप्सुजा वा सहस्कृत. तं त्वा गीर्भिर्हवामहे.. (२८) हे अग्नि! तुम स्वर्गलोक में उत्पन्न, अंतरिक्ष में उत्पन्न एवं शक्ति से उत्पन्न हो. हम तुम्हें स्तुति द्वारा बुलाते हैं. (२८) तुभ्यं घेत्ते जना इमे विश्वाः सुक्षितयः पृथक्. धासिं हिन्वन्त्यत्तवे.. (२९) हे अग्नि! ये सब सेवक एवं शोभन प्रजाएं तुम्हारे भक्षण के लिए अलग अन्न देती हैं. (२९) ते घेदग्ने स्वाध्योऽहा विश्वा नृचक्षसः. तरन्तः स्याम दुर्गाहा.. (३०) ebook converter DEMO Watermarks*
हे अग्नि! हम तुम्हारे लिए ही शोभन कर्म वाले एवं सभी दिवसों में तत्त्वद्रष्टा बनकर दुर्गम स्थानों को पार करेंगे. (३०) अग्निं मन्द्रं पुरुप्रियं शीरं पावकशोचिषम्. हृद्भिर्मन्द्रेभिरीमहे.. (३१) हम प्रसन्न, बहुतों के प्रिय, यज्ञों में सोने वाले एवं पवित्र दीप्ति वाले अग्नि से मनोहर तथा मादक स्तोत्रों द्वारा याचना करते हैं. (३१) स त्वमग्ने विभावसुः सृजन्सूर्यो न रश्मिभिः. शर्धन्तमांसि जिघ्नसे.. (३२) हे दीप्तिरूपी धन वाले अग्नि! तुम सूर्य के समान किरणों द्वारा अपनी शक्ति बढ़ाते हुए अंधकारों का नाश करते हो. (३२) तत्ते सहस्व ईमहे दात्रं यन्नोपदस्यति. त्वदग्ने वार्यं वसु.. (३३) हे शक्तिशाली अग्नि! तुम्हारा जो वरण एवं दान योग्य धन क्षीण नहीं होता, हम उसी की याचना करते हैं. (३३) सूक्त—४४ देवता—अग्नि समिधाग्निं दुवस्यत घृतैर्बोधयतातिथिम्. आस्मिन् हव्या जुहोतन.. (१) हे ऋत्विजो! अतिथि के समान प्रिय अग्नि की समिधा द्वारा सेवा करो, उन्हें घृत द्वारा जगाओ. प्रज्वलित अग्नि में हव्यों का हवन करो. (१) अग्ने स्तोमं जुषस्व मे वर्धस्वानेन मन्मना. प्रति सूक्तानि हर्य नः.. (२) हे अग्नि! तुम मेरे स्तुति मंत्रों को स्वीकार करो, इस मनोहर स्तोत्र द्वारा बढ़ो एवं हमारे सूक्तों की कामना करो. (२) अग्निं दूतं पुरो दधे हव्यवाहमुप ब्रुवे. देवाँ आ सादयादिह.. (३) मैं देवों के दूत एवं हव्य वहन करने वाले अग्नि को अपने सामने स्थापित करता हूं तथा उनकी स्तुति करता हूं. वे इस यज्ञ में देवों को बैठावें. (३) उत्ते बृहन्तो अर्चयः समिधानस्य दीदिवः. अग्ने शुक्रांस ईरते.. (४) हे दीप्तिशाली अग्नि! जब तुम प्रज्वलित होते हो, तब तुम्हारी बढ़ी हुई एवं ज्वलंत किरणें ऊपर उठती हैं. (४) उप त्वा जुह्वो३ मम घृताचीर्यन्तु हर्यत. अग्ने हव्या जुषस्व नः.. (५) ebook converter DEMO Watermarks*
हे अभिलाषा करने वाले अग्नि! मेरा घृत धारण करने वाला स्रुच तुम्हारे पास जावे. तुम हमारे हव्यों को स्वीकार करो. (५) मन्द्रं होतारमृत्विजं चित्रभानुं विभावसुम्. अग्निमीळे स उ श्रवत्.. (६) मैं प्रसन्न, देवों को बुलाने वाले, ऋत्विज्, विचित्र प्रकाश वाले एवं दीप्तिरूपी धन से युक्त अग्नि की स्तुति करता हूं. अग्नि मेरी स्तुति सुनें. (६) प्रत्नं होतारमीड्यं जुष्टमग्निं कविक्रतुम्. अध्वराणामभिश्रियम्.. (७) मैं प्राचीन, देवों को बुलाने वाले, स्तुतियोग्य, सेवित, कार्य पूर्ण करने वाले एवं यज्ञों का आश्रय लेने वाले अग्नि की स्तुति करता हूं. (७) जुषाणो अङ्गिरस्तमेमा हव्यान्यानुषक्. अग्ने यज्ञं नय ऋतुथा.. (८) हे अंगिराओं में श्रेष्ठ अग्नि! तुम क्रम से हमारे हव्यों का सेवन करो एवं हमारे यज्ञों को ऋतुओं के अनुसार पूर्ण करो. (८) समिधान उ सन्त्य शुक्रशोच इहा वह. चिकित्वान् दैव्यं जनम्.. (९) हे सेवा स्वीकार करने वाले एवं उज्ज्वल दीप्तियुक्त अग्नि! तुम प्रज्वलित होते हुए एवं देवों के भक्तजनों को जानते हुए इस यज्ञ में आओ. (९) विप्रं होतारमद्रुहं धूमकेतुं विभावसुम्. यज्ञानां केतुमीमहे.. (१०) हम मेधावी, देवों को बुलाने वाले, शत्रुतारहित, धूमरूपी ध्वजा वाले, दीप्तिरूपी धन से युक्त एवं यज्ञों की पताका के समान अग्नि से अपनी अभिलषित वस्तुएं मांगते हैं. (१०) अग्ने नि पाहि नस्त्वं प्रति ष्म देव रीषतः. भिन्धि द्वेषः सहस्कृत.. (११) हे शक्ति द्वारा उत्पन्न अग्नि! हिंसकों से हमारी रक्षा करो एवं शत्रुओं का भेदन करो. (११) अग्निः प्रत्नेन मन्मना शुम्भानस्तन्वं१ स्वाम्. कविर्विप्रेण वावृधे..(१२) बुद्धिमान् अग्नि प्राचीन एवं सुंदर स्तोत्रों द्वारा अपने शरीर को सुशोभित बनाते हुए मेधावियों के साथ बढ़ते हैं. (१२) ऊर्जो नपातमा हुवेऽग्निं पावकशोचिषम्. अस्मिन्यज्ञे स्वध्वरे.. (१३) मैं अन्न के पुत्र एवं पवित्र दीप्ति वाले अग्नि को इस हिंसाशून्य यज्ञ में बुलाता हूं. (१३) स नो मित्रमहस्त्वमग्ने शुक्रेण शोचिषा. देवैरा सत्सि बर्हिषि.. (१४)
हे मित्रों के पूजनीय अग्नि! तुम उज्ज्वल तेज से युक्त होकर देवों के साथ यज्ञ के कुशों पर बैठते हो. (१४) यो अग्निं तन्वो३ दमे देवं मर्तः सपर्यति. तस्मा इद्दीदयद्वसु.. (१५) जो मनुष्य धनप्राप्ति के लिए अपने घर में अग्नि की सेवा करता है, अग्नि उसीको धन देते हैं. (१५) अग्निर्मूर्धा दिवः ककुत्पतिः पृथिव्या अयम्. अपां रेतांसि जिन्वति.. (१६) देवों के मस्तक, द्युलोक के कूबड़ और धरती के पति अग्नि जल के प्राणियों को प्रसन्न करते हैं. (१६) उदग्ने शुचयस्तव शुक्रा भ्राजन्त ईरते. तव ज्योतींष्यर्चयः.. (१७) हे अग्नि! तुम्हारी निर्मल, शुक्लवर्ण और दीप्ति वाली किरणें तुम्हारे तेज को प्रेरित करती हैं. (१७) ईशिषे वार्यस्य हि दात्रस्याग्ने स्वर्पतिः. स्तोता सयां तव शर्मणि.. (१८) हे स्वर्ग के पति अग्नि! तुम वरणीय एवं देने योग्य धन के स्वामी हो. मैं सुख के निमित्त तुम्हारा स्तोता बनूं. (१८) त्वामग्ने मनीषिणस्त्वां हिन्वन्ति चित्तिभिः. त्वां वर्धन्तु नो गिरः.. (१९) हे अग्नि! मनीषी लोग तुम्हारी स्तुति करते हुए यज्ञकर्मों द्वारा तुम्हें प्रसन्न करते हैं. हमारी स्तुतियां तुम्हें बढ़ावें. (१९) अदब्धस्य स्वधावतो दूतस्य रेभतः सदा. अग्नेः सख्यं वृणीमहे.. (२०) हम हिंसारहित, शक्तिशाली, देवों के दूत एवं देवों की स्तुति करने वाले अग्नि की मित्रता चाहते हैं. (२०) अग्निः शुचिव्रततमः शुचिर्विप्रः शुचिः कविः. शुची रोचत आहुतः.. (२१) अतिशय शुद्ध कर्मों वाले, शुद्ध मेधावी, पवित्र व यज्ञकार्य समाप्त करने वाले अग्नि बुलाने पर सुशोभित होते हैं. (२१) उत त्वा धीतयो मम गिरो वर्धन्तु विश्वहा. अग्ने सख्यस्य बोधि नः.. (२२) हे अग्नि! मेरी स्तुतियां एवं यज्ञकर्म तुम्हें सदा बढ़ावें. तुम हमारी मित्रता को सदा जानो. (२२) eBook converter DEMO Watermarks*
यदग्ने स्यामहं त्वं त्वं वा घा स्या अहम्. स्युष्टे सत्या इहाशिषः.. (२३) हे अग्नि! यदि मैं तुम्हारे समान बहुत धन वाला हो जाऊं और तुम मेरे समान दरिद्र बन जाओ, तब तुम्हारा आशीर्वाद सत्य हो. (२३) वसुर्वसुपतिर्हि कमस्यग्ने विभावसुः. स्याम ते सुमतावपि.. (२४) हे अग्नि! तुम दीप्तिरूपी धन वाले, धनस्वामी व निवासस्थान देने वाले हो. हम तुम्हारे अनुग्रह में रहें. (२४) अग्ने धृतव्रताय ते समुद्रायेव सिन्धवः. गिरो वाश्रास ईरते.. (२५) हे यज्ञकर्म धारण करने वाले अग्नि! मेरी स्तुतियां तुम्हारे समीप उसी प्रकार पहुंचती हैं, जिस प्रकार नदियां समुद्र के पास जाती हैं. (२५) युवानं विशपतिं कविं विश्वादं पुरुवेपसम्. अग्निं शुम्भामि मन्मभिः.. (२६) मैं स्तुतियों द्वारा नित्यतरुण, प्रजाओं के स्वामी, कवि, सभी हवियों को खाने वाले एवं बहुत कर्म करने वाले अग्नि को सुशोभित करता हूं. (२६) यज्ञानां रथ्ये वयं तिग्मजम्भाय वीळवे. स्तोमैरिक्षेमाग्नये.. (२७) हम यज्ञों के नेता, तीखी ज्वालाओं वाले एवं शक्तिशाली अग्नि के लिए स्तुतियां करना चाहते हैं. (२७) अयमग्ने त्वे अपि जरिता भूतु सन्त्य. तस्मै पावक मृळय.. (२८) हे सेवा योग्य एवं पवित्रकर्त्ता अग्नि! हमारा स्तोता तुम्हारी स्तुति करे और तुम उसे सुख दो. (२८) धीरो ह्यस्यद्मसद् विप्रो न जागृविः सदा. अग्ने दीदयसि द्यवि.. (२९) हे अग्नि! तुम धीर, हवि में स्थित रहने वाले एवं मेधावी के समान प्रजाओं के हित में सदा जागृत रहते हो एवं सदा अंतरिक्ष में दीप्त रहते हो. (२९) पुराग्ने दुरितेभ्यः पुरा मृध्रेभ्यः कवे. प्र ण आयुर्वसो तिर.. (३०) हे कवि एवं वासदाता अग्नि! हमें पापियों एवं हिंसकों के सामने से बचाकर हमारी उमर बढ़ाओ. (३०) सूक्त—४५ देवता—इंद्र eBook converter DEMO Watermarks*
आ घा ये अग्निमिन्धते स्तृणन्ति बर्हिरानुषक्. येषामिन्द्रो युवा सखा.. (१) युवा इंद्र जिनके मित्र हैं, वे ऋषि मिलकर अग्नि को भली प्रकार जाते हैं एवं कुश बिछाते हैं. (१) बृहन्निदिध्म एषां भूरि शस्तं पृथुः स्वरुः. येषामिन्द्रो युवा सखा.. (२) युवा इंद्र जिनके मित्र हैं, उन ऋषियों की समिधाएं बड़ी हैं, स्तोत्र बहुत हैं और यज्ञ महान् हैं. (२) अयुद्ध इद्युधा वृतं शूर आजति सत्वभिः. येषामिन्द्रो युवा सखा.. (३) युवा इंद्र जिनके मित्र हैं, ऐसे व्यक्ति योद्धा न होने पर भी शत्रुओं द्वारा घिर कर अपनी शक्ति से वीरतापूर्वक उन्हें झुकाते हैं. (३) आ बुन्दं वृत्रहा ददे जातः पृच्छद्वि मातरम्. क उग्राः के ह शृण्विरे.. (४) इंद्र ने उत्पन्न होते ही बाण उठा लिया और अपनी माता से पूछा—“उग्र एवं शक्ति द्वारा प्रसिद्ध कौन है?” (४) प्रति त्वा शवसी वदद् गिरावप्सो न योधिसत्. यस्ते शत्रुत्वमाचके.. (५) हे इंद्र! शक्तिशालिनी माता ने तुम्हें उत्तर दिया—“जो तुम्हारे साथ शत्रुता का आचरण करता है वह पर्वत पर दर्शनीय हाथी के समान युद्ध करता है.” (५) उत त्वं मघवञ्छृणु यस्ते वष्टि ववक्षि तत्. यद्वीळयासि वीळु तत्.. (६) हे धन वाले इंद्र! तुम हमारी स्तुति सुनो. तुम्हारा स्तोता जो चाहता है, उसे तुम वही देते हो. तुम जिसे दृढ़ करते हो, वह अवश्य दृढ़ हो जाता है. (६) यदाजिं यात्याजिकृदिन्द्रः स्वश्वयुरूप. रथीतमॊ रथीनाम्.. (७) युद्धकर्त्ता एवं शोभन अश्व वाले अभिलाषी इंद्र जब युद्ध करने जाते हैं तब वे रथियों में सबसे प्रधान होते हैं. (७) वि षु विश्वा अभियुजो वज्रिन्विष्वग्यथा वृह. भवा नः सुश्रवस्तमः.. (८) हे वज्रधारी इंद्र! तुम इस प्रकार बढ़ो कि तुमसे सारी प्रजा वृद्धि को प्राप्त हो. तुम हमारे लिए सर्वाधिक अन्न देने वाले बनो. (८) अस्माकं सु रथं इन्द्रः कृणोतु सातये. न यं धूर्वन्ति धूर्तयः.. (९) वे इंद्र हमें अभीष्ट फल देने के लिए अपना सुंदर रथ हमारे सामने स्थापित करें, जिनकी
हिंसा हिंसक भी न कर सकें. (९) वृज्याम ते परि द्विषोऽरं ते शक्र दावने. गमेमेदिन्द्र गोमतः.. (१०) हे इंद्र! हम याचना करने के लिए तुम्हारे शत्रुओं के पास न जावें. हे गायों वाले एवं पर्याप्त दाता इंद्र! हम तुम्हारे पास जावें. (१०) शनैश्चिद्यन्तो अद्रिवोऽश्वावन्तः शतग्विनः. विवक्षणा अनेहसः.. (११) हे वज्रधारी इंद्र! तुम धीरे-धीरे जाते हुए इन घोड़ों वाले, अधिक धनसंपन्न, चतुर एवं उपद्रवरहित हो. (११) ऊर्ध्वा हि ते दिवेदिवे सहस्रा सूनृता शता. जरितृभ्यो विमंहते.. (१२) हे इंद्र! यजमान तुम्हारे स्तोता के लिए प्रतिदिन सैकड़ों एवं हजारों उत्तम सुखसाधन देता है. (१२) विद्या हि त्वा धनञ्जयमिन्द्र दृळ्हा चिदारुजम्. आदारिणं यथा गयम्.. (१३) हे इंद्र! हम तुम्हें धन जीतने वाला, दृढ़ शत्रुओं को भी भग्न करने वाला, शत्रुओं का धन छीनने वाला एवं घर के समान रक्षा करने वाला जानते हैं. (१३) ककुहं चित्त्वा कवे मन्दन्तु धृष्णविन्दवः. आ त्वा पणिं यदीमहे.. (१४) हे कवि, शत्रुपराभवकारी एवं वणिक्वृत्ति वाले इंद्र! जब हम तुमसे अभीष्ट वस्तु की याचना करें, उस समय हमारा सोम बैल की ठाट के समान ऊंचा होकर तुम्हें प्रसन्न करे. (१४) यस्ते रेवाँ अदाशुरिः प्रममर्ष मघत्तये. तस्य नो वेद आ भर.. (१५) हे इंद्र! जो व्यक्ति धनवान् होकर तुम धनस्वामी के लिए दान नहीं करता अथवा तुम्हारी निंदा करता है, उसका धन हमारे पास ले आओ. (१५) इम उ त्वा वि चक्षते सखाय इन्द्र सोमिनः. पुष्टावन्तो यथा पशुम्.. (१६) हे इंद्र! सोमरस निचोड़ने वाले मेरे वे मित्र तुम्हें उसी प्रकार देखते हैं, जिस प्रकार घास लाने वाले लोग पशु को देखते हैं. (१६) उत त्वाबधिरं वयं श्रुत्कर्णं सन्तम्मतये. दूरादिह हवामहे.. (१७) हे बधिरतारहित एवं सुनने में सक्षम कान वाले इंद्र! यज्ञ में रक्षा के निमित्त तुम्हें हम दूर से बुलाते हैं. (१७) ebook converter DEMO Watermarks*
यच्छुश्रूया इमं हवं दुर्मर्ष चक्रिया उत. भवेरापिनों अन्तम:.. (१८) हे इंद्र! हमारी यह पुकार सुनो, अपना बल शत्रुओं के लिए असहनीय बनाओ एवं हमारे सर्वाधिक बंधु बनो. (१८) यच्चिद्धि ते अपि व्यथिर्जगन्वांसो अमन्महि. गोदा इदिन्द्र बोधि न:.. (१९) हे इंद्र! जब हम दरिद्रता से परेशान होकर तुम्हारे पास जावें और स्तुति करें, उस समय तुम हमें गाय देने के लिए जागना. (१९) आ त्वा रम्भं न जिब्रयो ररम्भा शवसस्पते. उश्मसि त्वा सधस्थ आ.. (२०) हे बलपति इंद्र! कमजोर बूढ़ा जिस प्रकार लकड़ी का सहारा लेता है, उसी प्रकार हम तुम्हें प्राप्त करें एवं यज्ञ में तुम्हारी कामना करें. (२०) स्तोत्रमिन्द्राय गायत पुरुनृम्णाय सत्वने. नकिर्यं वृण्वते युधि.. (२१) जिस इंद्र को युद्ध में कोई नहीं हरा सकता, उस दानशील व बहुत धन वाले इंद्र के लिए स्तोत्र पढ़ो. (२१) अभि त्वा वृषभा सुते सुतं सृजामि पीतये. तृम्पा व्यश्नुही मदम्.. (२२) हे शक्तिशाली इंद्र! सोमरस निचोड़ जाने पर मैं सोमरस पीने के लिए तुम्हें देता हूं. तुम तृप्त बनो एवं नशीला सोमरस पिओ. (२२) मा त्वा मूरा अविष्यवो मोपहस्वान आ दभन्. माकीं ब्रह्मद्विषो वन:.. (२३) हे इंद्र! बुद्धिहीन लोग अपनी रक्षा की इच्छा से तुम्हारी हिंसा न करें और न तुम्हारी हंसी उड़ावें. उन ब्राह्मणद्वेषियों के पास मत जाना. (२३) इह त्वा गोपरीणसा महे मन्दन्तु राधसे. सरो गौरो यथा पिब.. (२४) हे इंद्र! लोग महान् धन पाने के लिए तुम्हें गाय के दूध से मिले सोमरस द्वारा प्रसन्न करें. तुम गौरमृग के समान सोमरस पिओ. (२४) या वृत्रहा परावति सना नवा च चुच्युवे. ता संसत्सु प्र वोचत.. (२५) वृत्रहंता इंद्र ने दूर देश में जो सनातन एवं नवीन धन दिया है, उसे विद्वान् लोग सभाओं में बतावें. (२५) अपिबत् कद्रुवः सुतमिन्द्रः सहस्रबाह्वे. अत्रादेदिष्ट पौंस्यम्.. (२६) हे इंद्र! तुमने कद्रु ऋषि द्वारा निचोड़ा गया सोमरस पिया एवं उनके शत्रुओं को मारा. ebook converter DEMO Watermarks*
इस अवसर पर इंद्र का पुरुषार्थ उद्दीप्त हुआ. (२६) सत्यं तत्तुर्वशे यदौ विदानो अह्नवाय्यम्. व्यानट् तुर्वणे शमि.. (२७) हे इंद्र! तुमने तुर्वश और यदु नामक राजाओं के प्रसिद्ध यज्ञकर्म को सच्चा जानकर उनकी प्रसन्नता के लिए उनके शत्रु अह्नवाय्य को संग्राम में घेरा था. (२७) तरणिं वो जनानां त्रदं वाजस्य गोमतः. समानमु प्र शंसिषम्.. (२८) हे स्तोताओ! तुम्हारे पुत्र-पौत्रादि के तारक, शत्रुनाशक, गायों से युक्त अन्न देने वाले एवं सबके प्रति समान इंद्र की मैं स्तुति करता हूं. (२८) ऋभुक्षणं न वर्तव उक्थेषु तुग्र्यावृधम्. इन्द्रं सोमे सचा सुते.. (२९) स्तोत्र उच्चारण के साथ सोमरस निचुड़ जाने पर एवं उक्थ मंत्रों का उच्चारण आरंभ होने पर मैं धन पाने के लिए महान् तथा जलवर्षक इंद्र की प्रशंसा करता हूं. (२९) यः कृन्तदिद्वि योन्यं त्रिशोकाय गिरिं पृथुम्. गोभ्यो गातुं निरेतवे.. (३०) जिन इंद्र ने त्रिलोक ऋषि की प्रार्थना पर जल निकलने के द्वार समान एवं विस्तृत मेघ को विच्छिन्न किया था, उन्हीं जलों के निकलने के लिए मार्ग बनाया था. (३०) यद्दधिषे मनस्यसि मन्दानः प्रेदियक्षसि. मा तत्करिन्द्र मृळय.. (३१) हे इंद्र! तुम प्रसन्न होकर जो शुभ वस्तु धारण करते हो, जिसकी पूजा करते हो, जो देते हो, वह हमारे लिए क्यों नहीं करते? तुम हमें सुखी करो. (३१) दभ्रं चिद्धि त्वावतः कृतं शृण्वे अधि क्षमि. जिगात्विन्द्र ते मनः.. (३२) हे इंद्र! तुम्हारे समान थोड़ा भी कर्म करने वाला व्यक्ति धरती पर प्रसिद्ध हो जाता है. तुम्हारा मन मेरे पास आवे. (३२) तवेदु ताः सुकीर्तयोऽसञ्चुत प्रशस्तयः. यदिन्द्र मृळयासि नः.. (३३) हे इंद्र! जिनके द्वारा तुम हमें सुखी करते हो, वे शोभन प्रसिद्धियां एवं स्तुतियां तुम्हारी ही रहें. (३३) मा न एकस्मिन्नागसि मा द्वयोरुत त्रिषु. वधीर्मा शूर भूरिषु.. (३४) हे शूर इंद्र! हमें एक, दो, तीन अथवा बहुत अपराध करने पर मत मारना. (३४) बिभया हि त्वावत उग्रदभिप्रभङ्गिणः. दस्मादहमृतीषहः.. (३५) ebook converter DEMO Watermarks*
हे इंद्र! तुम्हारे समान उग्र, शत्रुओं पर प्रहार करने वाले, पापों को क्षीण करने वाले एवं शत्रुओं की हिंसा करने वाले देव के कारण मैं भयरहित बनूं. (३५) मा सख्युः शूनमा विदे मा पुत्रस्य प्रभूवसो. आवृत्त्वद्भूतु ते मनः.. (३६) हे अधिक धन वाले इंद्र! मैं तुमसे तुम्हारे मित्र एवं पुत्र की वृद्धि की बात कहता हूं. तुम्हारा मन मुझसे न फिरे. (३६) को नु मर्या अमिथितः सखा सखायमब्रवीत्. जहा को अस्मदीषते.. (३७) हे मनुष्यो! इंद्र के अतिरिक्त कौन क्रोधरहित मित्र है जो अपने मित्र से कहे कि मैंने किसे मारा है एवं मुझसे कौन भागता है? (३७) एवारे वृषभा सुतेऽसिन्वन्भूर्यावयः. श्वघ्नीव निवता चरन्.. (३८) हे कामपूरक इंद्र! एवार नामक व्यक्ति द्वारा निचोड़ा गया सोम उसे बहुत धन न देकर धूर्त के समान तुम्हारे पास आता है. सभी देव नीचे मुंह करके निकल गए. (३८) आ त एता वचोयुजा हरी गृभ्णे सुमद्रथा. यदीं ब्रह्मभ्य इददः.. (३९) हे इंद्र! मैं वचनमात्र से रथ में जुड़ने वाले एवं शोभन रक्षायुक्त तुम्हारे हरि नामक अश्वों को अपने सामने लाने के लिए हाथों से खींचता हूं. तुम ब्राह्मणों को धन देते हो. (३९) भिन्धि विश्वा अप द्विषः परि बाधो जही मृधः. वसु स्पार्हं तदा भर.. (४०) हे इंद्र! तुम सभी शत्रुसेनाओं का भेदन करो, शत्रुओं की हिंसा करो, युद्ध को बंद करो एवं हमें अभिलषणीय धन दो. (४०) यद्दीळाविन्द्र यत्स्थिरे यत्पर्शानि पराभृतम्. वसु स्पार्हं तदा भर.. (४१) हे इंद्र! तुमने जो अभिलषणीय धन दृढ़-स्थान, स्थिर-स्थान व संदिग्ध-स्थान में रखा है, वह हमारे लिए लाओ. (४१) यस्य ते विश्वमानुषो भूरेर्दत्तस्य वेदति. वसु स्पार्हं तदा भर.. (४२) हे इंद्र! तुम्हारे द्वारा दिया हुआ जो धन सब मनुष्य जानते हैं, उस अभिलषणीय धन को हमारे पास लाओ. (४२) सूक्त—४६ देवता—इंद्र आदि त्वावतः पुरूवसो वयमिन्द्र प्रणेतः. स्मसि स्थातर्हरीणाम्.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
हे अधिक धन वाले व यज्ञकर्म के पार ले जाने वाले इंद्र! हम तुम्हारे समान व्यक्ति के आश्रित हैं. तुम हरि नामक घोड़ों के स्वामी हो. (१) त्वां हि सत्यमद्रिवो विद्म दातारमिषाम्. विद्म दातारं रयीणाम्.. (२) हे वज्रधारी इंद्र! यह बात सत्य है कि हम तुम्हें अन्नों एवं धनों का दाता जानते हैं. (२) आ यस्य ते महिमानं शतमूते शतक्रतो. गीर्भिर्गृणन्ति कारवः.. (३) हे असंख्य रक्षासाधनों वाले एवं बहुकर्मकर्त्ता इंद्र! स्तोता तुम्हारी महिमा को स्तुतियों द्वारा गाते हैं. (३) सुनीथो घा स मर्त्यो यं मरुतो यमर्यमा. मित्रः पान्त्यद्रुहः.. (४) वही मनुष्य यज्ञसंपन्न होता है, जिसकी रक्षा द्रोहरहित मरुद्गण, अर्यमा एवं मित्र करते हैं. (४) दधानो गोमदश्ववत्सुवीर्यमादित्यजूत एधते. सदा राया पुरुस्पृहा.. (५) आदित्य द्वारा अनुगृहीत यजमान गायों एवं अश्वों से युक्त होकर तथा शोभनवीर्य वाली संतान धारण करता हुआ बहुतों द्वारा अभिलषित धन के साथ बढ़ता है. (५) तमिन्द्रं दानमीमहे शवसानमभीर्वम्. ईशानं राय ईमहे.. (६) हम प्रसिद्ध, शक्तिशाली, भीरुतारहित एवं सबके स्वामी इंद्र से देने योग्य धन मांगते हैं. (६) तस्मिन्हि सन्त्यूतयो विश्वा अभीरवः सचा. तमा वहन्तु सप्तयः पुरूवसुं मदाय हरयः सुतम्.. (७) सब जगह जाने वाली, भीरुतारहित एवं सहायक मरुत्सेना इंद्र की है. गतिशील हरि नामक अश्व बहुत धन वाले इंद्र को निचोड़े हुए सोमरस के निकट प्रसन्नता के लिए ले आवे. (७) यस्ते मदो वरेण्यो य इन्द्र वृत्रहन्तमः. य आददिः स्व१र्नृभिर्यः पृतनासु दुष्टरः.. (८) हे इंद्र! तुम्हारा मद वहन करने योग्य है. जो युद्ध में शत्रुओं का अधिक वध करने वाला है. उसीके द्वारा तुम शत्रुओं से धन छीनते हो. वह मद युद्धों में बड़ी कठिनाई से पार किया जाता है. (८) यो दुष्टरो विश्ववार श्रवाय्यो वाजेष्वस्ति तरुता. ebook converter DEMO Watermarks*
स नः शविष्ठ सवना वसो गहि गमेम गोमति व्रजे.. (९) हे सबके वरण करने योग्य, वासस्थान देने वाले एवं अतिशय शक्तिशाली इंद्र! युद्धों में दुःख से तरने योग्य व शत्रुतारक मद के साथ हमारे यज्ञ में आओ. हम गायों वाली गोशाला में जाएंगे. (९) गव्यो षु णो यथा पुराश्व्योत रथया. वरिवस्य महामह.. (१०) हे महाधन वाले इंद्र! हमारे मन में पहले जिस प्रकार गाय, अश्व एवं रथ की अभिलाषा होने पर तुमने उसे पूरा किया था, उसी प्रकार हमें अब भी देना है. (१०) नहि ते शूर राधसोऽन्तं विन्दामि सत्रा. दशस्या नो मघवन्नू चिदद्रिवो धियो वाजेभिरावित्थ.. (११) हे इंद्र! यह बात सत्य है कि मैं तुम्हारे धन का अंत नहीं जानता हूं. हे धनी एवं वज्र वाले इंद्र! हमें शीघ्र धन दो एवं अन्नों द्वारा हमारे यज्ञकर्मों की रक्षा करो. (११) य ऋष्वः श्रावयत्सखा विश्वेत् स वेद जनिमा पुरुष्टुतः. तं विश्वे मानुषा युगेन्द्रं हवन्ते तविषं यतस्रुचः.. (१२) जो इंद्र दर्शनीय, ऋत्विज् रूपी मित्रों से युक्त, बहुतों द्वारा स्तुत एवं संसार के सभी प्राणियों को जानते हैं, सब लोग हवि हाथ में लेकर उन्हीं शक्तिशाली इंद्र को सदा बुलाते हैं. (१२) स नो वाजेष्वविता पुरूवसुः पुनः स्थाता. मघवा वृत्रहा भुवत्.. (१३) वे बहुत धन वाले, धनसंपन्न एवं वृत्रहंता इंद्र युद्धों में रक्षा एवं आगे स्थित रहने वाले हों. (१३) अभि वो वीरमन्धसो मदेषु गाय गिरा महा विचेतसम्. इन्द्रं नाम श्रुत्यं शाकिनं वचो यथा.. (१४) हे स्तोताओ! तुमसे जिस छंद में संभव हो, उसी में सोम का नशा हो जाने पर वीर, शत्रुओं को हराने वाले, विशिष्ट बुद्धिसंपन्न, सर्वत्र प्रसिद्ध व शक्तिशाली इंद्र की स्तुति महान् वाक्यों द्वारा करो. (१४) ददी रेक्णस्तन्वे ददिर्वसु ददिर्वाजेषु पुरुहूत वाजिनम्. नूनमथ.. (१५) हे बहुतों द्वारा बुलाए गए इंद्र! तुम इसी समय मेरे शरीर को बल देने वाले बनो. तुम युद्धों में अन्नयुक्त धन दो तथा हमारे पुत्र आदि को धन दो. (१५) ebook converter DEMO Watermarks*