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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

वाले अपने रथ में घोड़े जोड़ो व देवों के माता-पिता द्यावा-पृथिवी को हमारे पास लाओ. तुम देवों को छोड़कर मत जाओ और यहीं रहो. (९) सूक्त—१३ देवता—हविर्धान शकट युजे वां ब्रह्म पूर्व्यं नमोभिर्वि श्लोक एतु पथ्येव सूरे:. शृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्रा आ ये धामानि दिव्यानि तस्थु:.. (१) हे हवि धारण करने वाली गाड़ियों! मैं प्राचीन मंत्रों का उच्चारण करके एवं तुम्हारे ऊपर सोम आदि लादकर पत्नीशाला से ले जाता हूं. स्तोता की आहुति के समान मेरी स्तुतियां देवों के समीप जावें. दिव्यधाम में रहने वाले देव एवं अमरपुत्र इस बात को सुनें. (१) यमे इव यतमाने यदैतं प्र वां भरन्मानुषा देवयन्तः. आ सीदतं स्वमु लोकं विदाने स्वासस्थे भवतमिन्दवे न:.. (२) हे गाड़ियों! जब तुम जुड़वां संतान के समान एक साथ जाती हो, तब देवपूजक लोग तुम्हारे ऊपर बहुत सी हवन की सामग्री लादते हैं. तुम अपने स्थान को जानती हुई वहां रहो एवं हमारे सोम के लिए शोभन स्थान वाली बनो. (२) पञ्च पदानि रुपो अन्वरोहं चतुष्पदीमन्वेमि व्रतेन. अक्षरेण प्रति मिम एतामृतस्य नाभावधि सं पुनामि... (३) हे गाड़ियों! मैं तुम्हारे ऊपर यज्ञ के पांच उपकरणों को रखता हूं, नियमपूर्वक चार छंदों का प्रयोग करता हूं, ओम् का उच्चारण करके यज्ञकार्य पूरा करता हूं एवं यज्ञ की नाभि पर सोमरस को शुद्ध करता हूं. (३) देवेभ्य: कमवृणीत मृत्युं प्रजायै कममृतं नावॄणीत. बृहस्पतिं यज्ञमकृण्वत ऋषिं प्रियां यमस्तन्वं१ प्ररिरेचीत्.. (४) देवों में किसे मृत्यु के पास भेजा जाए एवं प्रजा में से किसे अमर न बनाया जाए? यजमान देवों के पालक एवं फलदाता विशाल यज्ञ को करते हैं. इस कारण यम हमारे शरीर को मौत के पास नहीं भेजते. (४) सप्त क्षरन्ति शिशवे मरुत्वते पित्रे पुत्रासो अप्यवीवतन्नृतम्. उभे इदस्योभयस्य राजत उभे यतेते उभयस्य पुष्यतः.. (५) स्तोतागण पिता के समान एवं प्रशंसायोग्य सोम के लिए सातों छंदों वाली स्तुतियां बोलते हैं. सोम के पुत्र तुल्य ऋत्विज् भी सच्ची स्तुतियां बोलते हैं. हवि ढोने वाली दोनों गाड़ियां देव और मानव दोनों की ईश हैं, यज्ञकर्म पूरा करने का प्रयत्न करती हैं तथा दोनों ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—१४ देवता—पितृलोक आदि

का पोषण करती हैं. (५) सूक्त—१४ देवता—पितृलोक आदि परेयिवांसं प्रवतो महीरनु बहुभ्यः पन्थामनुपस्पशानम्. वैवस्वतं सङ्गमनं जनानां यमं राजानं हविषा दुवस्य.. (१) हे यजमान! तुम पितरों के स्वामी यम की पुरोडाश आदि के द्वारा सेवा करो. यम बहुत से पुण्यकर्म करने वालों को सुख देने वाले स्थानों में ले जाते हैं, बहुतों का मार्ग सरल बनाते हैं एवं सभी मनुष्यों की मंजिल एक है. (१) यमो नो गातुं प्रथमो विवेद नैषा गव्यूतिरपभर्तवा उ. यत्रा नः पूर्वे पितरः परेयुरेना जज्ञानाः पथ्या३ अनु स्वाः.. (२) सबके प्रमुख यम हमारे मार्गों को जानते हैं. यम के मार्ग का नाश कोई नहीं कर सकता. जिस मार्ग से पूर्ववर्ती पितर गए हैं, उसीसे हम सब लोग जावें. (२) मातली कव्यैर्यमो अङ्गिरोभिर्बृहस्पतिर्ऋक्वभिर्वावृधानः. याँश्च देवा वावृधुर्यै च देवान्त्स्वाहान्ये स्वधयान्ये मदन्ति.. (३) इंद्र कव्य नामक पितरों की सहायता से, यम अंगिरा नामक पितरों की सहायता से और बृहस्पति ऋक्व नामक पितरों की सहायता से बढ़ते हैं. देवों की संवर्धना करने वाले एवं देवों द्वारा संबंधित लोग भी बढ़ते हैं. देवों में कोई स्वाहा और कोई स्वधा के द्वारा प्रसन्न होता है. (३) इमं यम प्रस्तरमा हि सीदाङ्गिरोभिः पितृभिः संविदानः. आ त्वा मन्त्राः कविशस्ता वहन्त्वेना राजन्हविषा मादयस्व.. (४) हे यम! अंगिरा नामक पितरों के साथ एकता रखते हुए तुम इस विस्तृत यज्ञ में आकर बैठो. विद्वान् ऋत्विजों द्वारा बोले हुए मंत्र तुम्हें बुलावें. हे स्वामी यम! तुम इस हवि से प्रसन्न बनो. (४) अङ्गिरोभिरा गहि यज्ञियेभिर्यम वैरूपैरिह मादयस्व. विवस्वन्तं हुवे यः पिता तेऽस्मिन्यज्ञे बर्हिष्या निषद्य.. (५) हे यम! नानारूप धारी एवं यज्ञकर्त्ता अंगिराओं के साथ इस यज्ञ में पधारो एवं यजमान को प्रसन्न करो. मैं तुम्हारे पिता विवस्वान् को बुलाता हूं. वे इस यज्ञ में बैठकर यजमान को प्रसन्न करें. (५) अङ्गिरसो नः पितरो नवग्वा अथर्वाणो भृगवः सोम्यासः. ebook converter DEMO Watermarks*

तेषां वयं सुमतौ यज्ञियानामपि भद्रे सौमनसे स्याम.. (६) नवीन आगमन वाले अंगिरा, अथर्वा और भृगु नामक पितर सोमरस के अधिकारी हैं. हम उन यज्ञपात्र पितरों की कृपादृष्टि पावें एवं उनकी कृपादृष्टि के कारण कल्याण प्राप्त करें. (६) प्रेहि प्रेहि पथिभिः पूर्व्येभिर्यत्रा नः पूर्वे पितरः परेयुः. उभा राजाना स्वधया मदन्ता यमं पश्यासि वरुणं च देवम्.. (७) हे मेरे पिता! जिन प्राचीन मार्गों से हमारे पूर्ववर्ती पितर गए हैं, उन्हीं से तुम भी पधारो. तुम वहां स्वधा से प्रसन्न होते हुए यम एवं वरुणदेव—दोनों स्वामियों को देखो. (७) सं गच्छस्व पितृभिः सं यमेनेष्टापूर्तेन परमे व्योमन्. हित्वायावद्यं पुनरस्तमेहि सं गच्छस्व तन्वा सुवर्चाः.. (८) हे मेरे पिता! तुम उत्तम स्वर्ग में जाकर अपने पितरों से, यम से और अपने श्रौत, स्मार्त कर्मों के फलों से मिलो. तुम अपना पाप छोड़कर म्रियमान नामक घर में आओ एवं शोभन दीप्ति वाले शरीर से मिलो. (८) अपेत वीत वि च सर्पतातोऽस्मा एतं पितरो लोकमक्रन्. अहोभिरद्भिरक्तुभिर्व्यक्तं यमो ददात्यवसानमस्मै.. (९) हे श्मशान पर रहने वाले पिशाचो! यहां से चले जाओ, हट जाओ. पितरों ने इस स्थान को हमारे इस मरे हुए यजमान के लिए बनाया है. यम ने दिवसों, जलों और रात्रियों से युक्त यह स्थान इस मरने वाले को दिया है. (९) अति द्रव सारमेयौ श्वानौ चतुरक्षौ शबलौ साधुना पथा. अथा पितृन्त्सुविदत्राँ उपेहि यमेन ये सधमादं मदन्ति.. (१०) हे अग्नि! तुम सरमा के पुत्र, चार आंखों वाले एवं चितकबरे दो कुत्तों को पार करके उत्तम मार्ग के द्वारा जाते हुए यम के साथ प्रसन्न रहने वालों एवं शोभनज्ञानसंपन्न पितरों के समीप जाओ. (१०) यौ ते श्वानो यम रक्षितारौ चतुरक्षौ पथिरक्षी नृचक्षसौ. ताभ्यामेनं परि देहि राजन्त्स्वस्ति चास्मा अनमीवं च धेहि.. (११) हे स्वामी यम! जो तुम्हारे घर के रक्षक, चार आंखों वाले, मार्ग की रक्षा करने वाले एवं मनुष्यों द्वारा प्रशंसित दो कुत्ते हैं, उनसे इस मृत व्यक्ति की रक्षा करो एवं इसे कल्याण एवं रोगहीनता दो. (११) ebook converter DEMO Watermarks*

उरूणसावसुतृपा उदुम्बलौ यमस्य दूतौ चरतो जनाँ अनु. तावस्मभ्यं दृशये सूर्याय पुनर्दातामसुमद्येह भद्रम्.. (१२) लंबी नाक वाले, दूसरों के प्राणों से तृप्त होने वाले, अत्यंत बली एवं यम के दूत जो दो कुत्ते हैं, वे आज हमें सूर्य का दर्शन करने के लिए यहां कल्याणकारी प्राण दें. (१२) यमाय सोमं सुनुत यमाय जुहुता हवि:. यमं ह यज्ञो गच्छत्यग्निदूतो अरङकृत:.. (१३) हे ऋत्विजो! यम के लिए सोमरस निचोड़ो तथा हवि का होम करो. अग्नि को दूत बनाने वाला एवं अलंकृत यज्ञ यम के पास जाता है. (१३) यमाय घृतवद्धविर्जुहोत प्र च तिष्ठत. स नो देवेष्वा यमद्दीर्घमायु: प्र जीवसे.. (१४) हे ऋत्विजो! यम के लिए घी वाला हवि होम करो एवं उनकी सेवा करो. यम देव हमें लंबा जीवन बिताने के लिए अधिक आयु दें. (१४) यमाय मधुमत्तमं राज्ञे हव्यं जुहोतन. इदं नम ऋषिभ्य: पूर्वजेभ्य: पूर्वेभ्य: पथिकृद्भ्य:.. (१५) हे ऋत्विजो! स्वामी यम के लिए अत्यंत मधुर हवि का होम करो. हमारे जिन पूर्वज ऋषियों ने पहले यह मार्ग बनाया है, उनके लिए नमस्कार है. (१५) त्रिकद्रुकेभि: पतति षळुर्वीरिकमिद्बृहत्. त्रिष्टुब्गायत्री छन्दांसि सर्वा ता यम आहिता.. (१६) यम त्रिकद्रुक नामक यज्ञ को प्राप्त करते हैं, छ: स्थानों में रहते हैं एवं एक विस्तृत संसार में घूमते हैं. त्रिष्टुप्, गायत्री आदि सब छंद यम की स्तुति में प्रयुक्त हैं. (१६) सूक्त—१५ देवता—पितृलोक उदीरतामवर उत्परास उन्मध्यमा: पितर: सोम्यास:. असुं य ईयुरवृका ऋतज्ञास्ते नोऽवन्तु पितरो हवेषु.. (१) उत्तम, मध्यम और अधम—तीनों श्रेणियों के पितर कृपा करते हुए हमारा हवि ग्रहण करें. हमारी हिंसा न करने वाले और हमारे यज्ञों को जानने वाले जो पितर हमारी प्राणरक्षा करने आए हैं, वे यज्ञों में हमारी रक्षा करें. (१) इदं पितृभ्यो नमो अस्त्वद्य ये पूर्वांसो य उपरास ईयु:. ये पार्थिवे रजस्या निषत्ता ये वा नूनं सुवृजनासु विक्षु.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*

जो बाबा आदि पितर पहले मरे हैं, जो बड़े भाई आदि पितर बाद में मरे हैं, जो पृथिवी पर जन्म लेकर आ गए हैं अथवा जो शोभन धन वाली प्रजाओं के बीच हैं, उनके लिए यह नमस्कार है. (२) आहं पितॄन्त्सुविदत्राँ अवित्सि नपातं च विक्रमणं च विष्णोः. बर्हिषदो ये स्वधया सुतस्य भजन्त पित्वस्त इहागमिष्ठाः.. (३) मैंने ऐसे पितरों को पाया है जो मेरी भक्ति को भली-भांति जानते हैं. मैंने व्यापक यज्ञ की नित्यता एवं पूरा करने का उपाय भी पाया है. जो पितर कुशों पर बैठकर सोमरस पीते हुए प्रसन्न होते हैं, वे इस कर्म में आवें. (३) बर्हिषदः पितर ऊत्य१र्वागिमा वो हव्या चक्रमा जुषध्वम्. त आ गतावसा शन्तमेनाथा नः शं योररपो दधात.. (४) हे कुशों पर बैठने वाले पितरो! इस समय तुम हमारी रक्षा करो. हमने तुम्हारे लिए ये हव्य तैयार किए हैं, तुम इनका उपभोग करो. तुम आओ और रक्षा करते हुए हमारा कल्याण करो. तुम हमें सुखी करो, हमारा दुःख मिटाओ और हमें पापरहित बनाओ. (४) उपहूताः पितरः सोम्यासो बर्हिष्येषु निधिषु प्रियेषु. त आ गमन्तु त इह श्रुवन्त्वधि ब्रुवन्तु तेऽवन्त्वस्मान्.. (५) कुशों के ऊपर प्रिय द्रव्य रखे जाने के बाद सोमरस के प्रेमी पितर बुलाए गए हैं. वे वहां आवें, हमारी स्तुतियां सुनें, स्तुतियां सुनकर अपनी प्रसन्नता प्रकट करें एवं हमारी रक्षा करें. (५) आच्या जानु दक्षिणतो निषद्योमं यज्ञमभि गृणीत विश्वे. मा हिंसिष्ट पितरः केनचिन्नो यद्व आगः पुरुषता कराम.. (६) हे पितरो! तुम सब मेरी दाहिनी ओर धरती पर घुटने टेककर बैठो और तुम सब इस यज्ञ की प्रशंसा करो. हम पुरुष होने के कारण भूल से पाप कर बैठते हैं. तुम किसी पाप के कारण हमारी हिंसा मत करो. (६) आसीनासो अरुणीनामुपस्थे रयिं धत्त दाशुषे मर्त्याय. पुत्रेभ्यः पितरस्तस्य वस्वः प्र यच्छत त इहोर्जं दधात.. (७) हे लाल ज्वालाओं के समीप बैठने वाले पितरो! हव्य देने वाले मनुष्य को धन दो, तुम यजमान के पुत्रों को धन दो तथा हमारे इस यज्ञ में धन धारण करो. (७) ये नः पूर्वे पितरः सोम्यासोऽनूहिरे सोमपीथं वसिष्ठाः. तेभिर्यमः संरणानो हवींष्युशन्नुशद्भिः प्रतिकाममत्तु.. (८) ebook converter DEMO Watermarks*

हमारे सोमरस तैयार करने वाले, उत्तम वस्त्रधारक एवं नियमपूर्वक देवादि को सोमपान कराने वाले प्राचीन पितर यम के साथ एवं यम उनके साथ हवि आदि का उपभोग करना चाहते हैं. यम उन पितरों के साथ अपनी इच्छाओं के अनुसार हव्य भक्षण करें. (८) ये तातृषुर्देवत्रा चेहमाना होत्राविदः स्तोमतष्टासो अर्कैः. आग्ने याहि सुविद्वेत्रेभिर्वाङ् सत्यैः काव्यैः पितृभिर्घर्मसद्भिः.. (९) हे अग्नि! यज्ञ करने के ज्ञाता, स्तोत्रों और मंत्रों के बनाने वाले एवं क्रम से देवत्व पाने वाले जो पितर प्यासे हैं, उन्हें हमारे सामने लेकर आओ. वे पितर विशेष परिचित, विवादरहित, यज्ञ में बैठने वाले एवं हव्य ग्रहण करने वाले हैं. (९) ये सत्यासो हविरदो हविष्पा इन्द्रेण देवैः सरथं दधानाः. आग्ने याहि सहस्रं देववन्दैः परैः पूर्वैः पितृभिर्घर्मसद्भिः.. (१०) हे अग्नि! जो पितर सच्चे, हव्य भक्षण करने वाले, सोम पीने वाले, इंद्रादि देवों के साथ एक रथ पर बैठने वाले, देवाराधन कर्त्ता, पहले वाले, उनके बाद वाले एवं यज्ञ में बैठने वाले हैं. उन पितरों के साथ आओ. (१०) अग्निष्वात्ताः पितर एह गच्छत सदःसदः सदत सुप्रणीतयः. अत्ता हवींषि प्रयतानि बर्हिष्यथा रयिं सर्ववीरं दधातन.. (११) हे अग्निष्वात्त नामक पितरो! यहां आओ और स्वागत स्वीकार करके अपने-अपने आसनों पर बैठो एवं कुशों पर फैले हुए हव्यों को खाओ. इसके बाद हमें पुत्र-पौत्रों से युक्त धन दो. (११) त्वमग्न ईळितो जातवेदोऽवाढ्ढव्यानि सुरभीणि कृत्वी. प्रादाः पितृभ्यः स्वधया ते अक्षन्नद्धि त्वं देव प्रयता हवींषि.. (१२) हे सबको जानने वाले अग्नि! हमने तुम्हारी स्तुति की है. तुमने हमारा हव्य सुगंधित बनाकर पितरों को दिया है. पितर ‘स्वधा’ शब्द के साथ दिया हुआ हवि भक्षण करें. हे अग्नि देव! तुम हमारे प्रयत्न द्वारा संपादित हव्यों का भक्षण करो. (१२) ये चेह पितरो ये च नेह याँश्च विद्म याँ उ च न प्रविद्म. त्वं वेत्थ यति ते जातवेदः स्वधाभिर्यज्ञं सुकृतं जुषस्व.. (१३) हे जातवेद अग्नि! तुम उन सब पितरों को जानते हो, जो यहां आए हैं, जो यहां नहीं आए हैं, जिन्हें हम जानते हैं और जिन्हें हम नहीं जानते हैं. तुम स्वधा शब्द के साथ किए गए हमारे यज्ञ को स्वीकार करो. (१३) ये अग्निदग्धा ये अनग्निदग्धा मध्ये दिवः स्वधया मादयन्ते. ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—१६ देवता—अग्नि

तेभिः स्वराळसुनीतिमेतां यथावशं तन्वं कल्पयस्व.. (१४) हे स्वयं प्रकाश अग्नि! जो पितर अग्नि द्वारा जलाए गए हैं एवं जो नहीं जलाए गए हैं, वे सब स्वर्ग के बीच में स्वधा शब्द के साथ दिए गए हव्यों से प्रसन्न होते हैं. तुम उन पितरों के साथ मिलकर उनके देव शरीर को उनकी इच्छा के अनुसार बनाओ. (१४) सूक्त—१६ देवता—अग्नि मैनमग्ने वि दहो माभि शोचो मास्य त्वचं चिक्षिपो मा शरीरम्. यदा शृतं कृणवो जातवेदोऽथेमेनं प्र हिणुतात्पितृभ्यः.. (१) हे अग्नि! इस मरे हुए व्यक्ति को पूरी तरह मत जलाओ. इसे कष्ट मत पहुंचाओ. इसके चमड़े और शरीर को इधर-उधर मत बिखेरो. हे जातवेद अग्नि! जब तुम इसे पका चुको, तभी इसे पितरों के पास भेज देना. (१) शृतं यदा करसि जातवेदोऽथेमेनं परि दत्तात्पितृभ्यः. यदा गच्छात्यसुनीतिमेतामथा देवानां वशनीर्भवति.. (२) हे अग्नि! तुम इस मरे हुए शरीर को जब पका लो, तभी इसे पितरों के पास पहुंचा देना. जब यह दोबारा प्राण प्राप्त करेगा, तब देवों के वश में रहेगा. (२) सूर्यं चक्षुर्गच्छतु वातमात्मा द्यां च गच्छ पृथिवीं च धर्मणा. अपो वा गच्छ यदि तत्र ते हितमोषधीषु प्रति तिष्ठा शरीरैः.. (३) हे मरे हुए व्यक्ति! तुम्हारी आंखें सूर्य को और तुम्हारा प्राण वायु को प्राप्त हो. तुम अपने धार्मिक कार्यों के कारण स्वर्ग या धरती पर जाओ. यदि जल में तुम्हारा सुख है तो वहां जाओ. तुम अपने शरीर के द्वारा ओषधियों में स्थित रहो. (३) अजो भागस्तपसा तं तपस्व तं ते शोचिस्तपतु तं ते अर्चिः. यास्ते शिवास्तन्वो जातवेदस्ताभिर्वहैनं सुकृतामु लोकम्.. (४) हे अग्नि! इस मरे हुए व्यक्ति का जो भाग जन्मरहित है, उसीको तुम अपने ताप से तपाओ. तुम्हारी ज्वाला एवं प्रकाश उसे तपावे. हे जातवेद अग्नि! तुम अपने कल्याणकारी रूपों के द्वारा इसे उत्तम कर्म करने वालों के लोकों में ले जाओ. (४) अव सृज पुनरग्ने पितृभ्यो यस्त आहुतश्चरति स्वधाभिः. आयुर्वसान उप वेतु शेषः सं गच्छतां तन्वा जातवेदः.. (५) हे अग्नि! जो मरा हुआ व्यक्ति तुम्हारी आहुति बनकर स्वधा शब्द के साथ ऊपर जाता है, उसे पितरों के समीप जाने की प्रेरणा दो. इसके शरीर का शेष भाग जीवन प्राप्त करे. हे ebook converter DEMO Watermarks*

जातवेद अग्नि! यह व्यक्ति शरीर से पुनः मिले. (५) यत्ते कृष्णः शकुन आतुतोद पिपीलः सर्प उत वा श्वापदः. अग्निष्टद्विश्वादगदं कृणोतु सोमश्च यो ब्राह्मणाँ आविवेश.. (६) हे मृत व्यक्ति! तुम्हारे जिस अंग को कौवे ने नोचा है अथवा चींटी, सांप या अन्य किसी पशु ने काटा है, अग्नि उस सबको रोगरहित करें. ब्राह्मणों के शरीर में प्रवेश करने वाले सोम भी तुम्हें निरोग बनावें. (६) अग्नेर्वर्म परि गोभिर्व्ययस्व सं प्रोर्णुष्व पीवसा मेदसा च. नेत्त्वा धृष्णुर्हरसा जर्हृषाणो दधृग्विधक्ष्यन्पर्यङ्खयाते.. (७) हे प्रेत! तुम गाय के चमड़े के साथ-साथ आग की लपटरूपी कवच को पहनो. तुम चर्बी और मांस से ढक जाओ. ऐसा होने पर अपने तेज से तुम्हें पराभूत करने वाले एवं अत्यंत प्रसन्न अग्नि तुम्हें नहीं जलावेंगे. वे तुम्हें विशेष रूप से जलाने को तैयार हैं. (७) इममग्ने चमसं मा वि जिह्वरः प्रियो देवानामुत सोम्यानाम्. एष यश्चमसो देवपानस्तस्मिन्देवा अमृता मादयन्ते.. (८) हे अग्नि! इस चमस को इधर-उधर मत करना. यह सोमरस पीने वाले देवों का प्रिय है. यह चमस देवों के सोमपान के लिए है. इसे पाकर मरणरहित देव प्रसन्न होते हैं. (८) क्रव्यादमग्निं प्र हिणोमि दूरं यमराज्ञो गच्छतु रिप्रवाहः. इहैवायमितरो जातवेदा देवेभ्यो हव्यं वहतु प्रजानन्.. (९) मैं मांस जलाने वाली तेज आग को दूर करता हूं. पाप को ढोने वाली वह आग यम के देश में जावे. यहां ही ये दूसरे अग्नि हैं, ऐसा जानते हुए हम देवों के लिए हव्य ले जाते हैं. (९) यो अग्निः क्रव्यात्प्रविवेश वो गृहमिमं पश्यन्नितरं जातवेदसम्. तं हरामि पितृयज्ञाय देवं स घर्ममिन्वात्परमे सधस्थे.. (१०) मांस जलाने वाली चिता की अग्नि तुम्हारे इस घर में प्रवेश कर गई है. मैं उन्हें घर से निकालता हूं. मैं दूसरे जातवेद अग्नि को देखता हुआ उत्तम स्थान में यज्ञ के लिए प्राप्त करता हूं. यह अग्नि मेरे यज्ञ को लेकर स्वर्ग में जावें. (१०) यो अग्निः कव्यवाहनः पितॄन्यक्षदृतावृधः. प्रेदु हव्यानि वोचति देवेभ्यश्च पितृभ्य आ.. (११) जो अग्नि श्राद्ध की सामग्री को पितरों तक ढोने वाले, यज्ञ को बढ़ाने वाले एवं देवपितरों का यज्ञ करने वाले हैं, मैं उन्हीं के पास होम की सामग्री ले जाता हूं. (११) ebook converter DEMO Watermarks*

उशन्तस्त्वा नि धीमहुशन्तः समिधीमहि. उशन्नुशत आ वह पितॄन्हविषे अत्तवे.. (१२) हे अग्नि! मैं तुम्हारी कामना करता हुआ तुम्हें स्थापित करता हूं एवं प्रज्वलित करता हूं. तुम भी कामना करते हुए हव्य की अभिलाषा करने वाले देवों के पास होम की सामग्री इसलिए ले जाओ कि वे उसे खा सकें. (१२) यं त्वमग्ने समदहस्तमु निर्वापया पुनः. कियाम्बवत्र रोहतु पाकदुर्वा व्यल्कशा.. (१३) हे अग्नि! तुमने जिसे जलाया है, उसे पुनः बुझाओ. जिस जगह पर कुछ जल भरा हो और अनेक शाखाओं वाली पकी दूब खड़ी हो. (१३) शीतिके शीतिकावति ह्लादिके ह्लादिकावति. मण्डूक्या३ सु सं गम इमं स्व१ग्निं हर्षय.. (१४) हे शीतल एवं वनस्पतियों से युक्त पृथिवी! तुम लोगों को प्रसन्न करती हो. तुम्हारे ऊपर बहुत आह्लादक वनस्पतियां हैं. तुम ऐसी वर्षा लाओ, जिससे मेंढक संतुष्ट हों. तुम अग्नि को प्रसन्न करो. (१४) सूक्त—१७ देवता—सरण्यू आदि त्वष्टा दुहित्रे वहतुं कृणोतीतीदं विश्वं भुवनं समेति. यमस्य माता पर्युह्यमाना महो जाया विवस्वतो ननाश... (१) त्वष्टा अपनी कन्या सरण्यू का विवाह करने वाले हैं. विवाह की तैयारी में सारा संसार सम्मिलित है. यम और यमी की माता का जब सूर्य से विवाह हुआ, तब सूर्य की पत्नी उत्तर कुरु देश से चली गई. (१) अपागूहन्नमृतां मर्त्येभ्यः कृत्वी सवर्णामददुर्विवस्वते. उताश्विनावभरद्यत्तदासीदजहादु द्वा मिथुना सरण्यूः.. (२) मरणरहित सरण्यू को मनुष्यों के बीच छिपाया गया और सरण्यू के समान दूसरी स्त्री बनाकर सूर्य को दी गई. सरण्यू उस समय घोड़ी के रूप में छिपाई गई थी. उसने अश्विनीकुमारों को गर्भ के रूप में धारण किया और दो बालकों को जुड़वां रूप में जन्म दिया. (२) पूषा त्वेतश्च्यावयतु प्र विद्वाननष्टपशुर्भुवनस्य गोपाः. स त्वैतेभ्यः परि ददत्पितृभ्योऽग्निर्देवेभ्यः सुविदत्रियेभ्यः... (३) हमारी भक्ति को जानने वाले, अमर पशुओं से युक्त एवं सारे संसार के रक्षक पूषा तुम्हें

इस लोक में छुड़ावें. अग्नि तुम्हें धन देने वाले देवों को दें. (३) आयुर्विश्वायुः परि पासति त्वा पूषा त्वा पातु प्रपथे पुरस्तात्. यत्रासते सुकृतो यत्र ते ययुस्तत्र त्वा देवः सविता दधातु.. (४) सारे संसार के जीवन पूषा तुम्हारी आयु की रक्षा करें. वे तुम्हारे गंतव्य स्वर्ग में पहले से वर्तमान हैं. पुण्य वाले लोग जहां रहते हैं, वहां वे गए हैं, पूषा तुम्हें वहीं ले जावें. (४) पूषेमा आशा अनु वेद सर्वाः सो अस्माँ अभयतमेन नेषत्. स्वस्तिदा आघृणिः सर्ववीरोऽप्रयुच्छन्पुर एतु प्रजानन्.. (५) पूषा इन सारी दिशाओं को जानते हैं. वे हमें भयरहित दिशाओं से ले चलें. कल्याण करने वाले, दीप्तियुक्त, सब वीरों से युक्त एवं हमें जानने वाले पूषा प्रमादरहित होकर हमारे सामने आवें. (५) प्रपथे पथामजनिष्ट पूषा प्रपथे दिवः प्रपथे पृथिव्याः. उभे अभि प्रियतमे सधस्थे आ च परा च चरति प्रजानन्.. (६) सबसे उत्तम मार्ग में पूषा ने जन्म लिया है. वे धरती और स्वर्ग के उत्तम मार्ग में उत्पन्न हुए हैं. पूषा की दोनों प्रियतमाएं अर्थात् द्यावा-पृथिवी साथ-साथ रहती हैं. पूषा उन्हें विशेष रूप से जानते हुए घूमते हैं. (६) सरस्वतीं देवयन्तो हवन्ते सरस्वटीमध्वरे तायमाने. सरस्वतीं सुकृतो अह्वयन्त सरस्वती दाशुषे वार्यं दात्.. (७) देवों की इच्छा से यज्ञ करने वाले सरस्वती को बुलाते हैं. यज्ञ के विस्तार के समय पुण्यकर्म करने वालों ने सरस्वती को बुलाया. सरस्वती यजमान को धन दें. (७) सरस्वति या सरथं ययाथ स्वधाभिर्देवि पितृभिर्मदन्ती. आसद्यास्मिन्बर्हिषि मादयस्वानमीवा इष आ धेह्यस्मे.. (८) हे सरस्वती! तुम पितरों के साथ स्वधा के उच्चारणपूर्वक दिए गए हव्य से प्रसन्न होती हुई उसके साथ एक रथ पर बैठकर आओ. इस यज्ञ के फैले हुए कुशों पर बैठकर आनंद करो एवं हमें निरोग बनाओ तथा अन्न दो. (८) सरस्वतीं यां पितरो हवन्ते दक्षिणा यज्ञमभिनक्षमाणाः. सहस्रार्घमिळो अत्र भागं रायस्पोषं यजमानेषु धेहि.. (९) हे सरस्वती! पितर लोग दक्षिण की ओर आकर एवं यज्ञ में इधर-उधर चलते हुए तुम्हें बुलाते हैं. तुम इस यज्ञ में यजमान के लिए अनेक जनों द्वारा पूजनीय अन्न एवं धन का भाग

दो. (९) आपो अस्मान्मातरः शुन्धयन्तु घृतेन नो घृतप्वः पुनन्तु. विश्वं हि रिप्रं प्रवहन्ति देवीरुदिदाभ्यः शुचिरा पूत एमि.. (१०) मातारूप जल हमें शुद्ध करे, घृत के समान बहने वाला जल हमें शुद्ध करे एवं दिव्य जल हमारे समस्त पापों को बहाकर ले जावे. हम शुद्ध और पवित्र होकर जल से बाहर आते हैं. (१०) द्रप्सश्चस्कन्द प्रथमाँ अनु द्यूनिमं च योनिमनु यश्च पूर्वः. समानं योनिमनु सञ्चरन्तं द्रप्सं जुहोम्यनु सप्त होत्राः.. (११) निचुड़ता हुआ सोमरस पार्थिव एवं द्युलोक को लक्ष्य करके बहता है. हम सात होता इस स्थान पर और इसके आधार पूर्व स्थान पर विचरण करने वाले सोम का हवन करते हैं. (११) यस्ते द्रप्सः स्कन्दति यस्ते अंशुर्बाहुच्युतो धिषणाया उपस्थात्. अध्वर्योर्वा परि वा यः पवित्रात्तं ते जुहोमि मनसा वषट्कृतम्.. (१२) हे सोम! तुम्हारा जो रस टपकता है, तुम्हारा जो लता भाग पुरोहित के हाथ से रस निचोड़ने वाले पत्थरों के ऊपर स्थित है तथा जो भाग दशापवित्र के ऊपर रखा हुआ है, हम मन से उन सबको नमस्कार करते हुए हवन करते हैं. (१२) यस्ते द्रप्सः स्कन्नो यस्ते अंशुरवश्च यः परः सुचा. अयं देवो बृहस्पतिः सं तं सिञ्चतु राधसे.. (१३) हे सोम! तुम्हारा जो रस बाहर आ गया है अथवा तुम्हारा जो लता भाग सुच के नीचे गिर गया है, हमें धन देने के लिए बृहस्पति देव उन दोनों को जल से मिलावें. (१३) पयस्वतीरोषधयः पयस्वन्मामकं वचः. अपां पयस्वदित्पयस्तेन मा सह शुन्धत.. (१४) हे जल! वनस्पतियां दूध के समान रस से भरी हुई हैं. हमारा स्तुतिवचन भी दूध के समान रस से भरा है. तुम्हारा जो सार अंश दूध के समान है, उससे तुम हमें शुद्ध करो. (१४) सूक्त—१८ देवता—मृत्यु आदि परं मृत्यो अनु परेहि पन्थां यस्ते स्व इतरो देवयानात्. चक्षुष्मते शृण्वते ते ब्रवीमि मा नः प्रजां रीरिषो मोत वीरान्.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*

हे मृत्यु देव! तुम देवयान से भिन्न मार्ग द्वारा यजमान से दूर हट जाओ. हे नेत्र वाले एवं सब कुछ सुनने वाले मृत्यु देव! मैं तुमसे कहता हूं कि हमारी संतान और हमारे वीरों को मत मारना. (१) मृत्योः पदं योपयन्तो यदैत द्राघीय आयुः प्रतरं दधानाः. आप्यायमानाः प्रजया धनेन शुद्धाः पूता भवत यज्ञियासः.. (२) हे मृत व्यक्ति के संबंधियो! तुम मृत्यु के मार्ग अर्थात् पितृयान को छोड़ो. इस प्रकार तुम लंबी आयु प्राप्त करोगे. हे यज्ञ करने वाले यजमानो! तुम संतान एवं गाय आदि धन से संपन्न होकर जन्ममरण के दुःख से शुद्ध एवं पवित्र बनो. (२) इमे जीवा वि मृतैराववृत्रन्नभूद्भद्रा देवहूतिर्नो अद्य. प्राञ्चो अगाम नृतये हसाय द्राघीय आयुः प्रतरं दधानाः.. (३) ये जीते हुए लोग मरे हुए व्यक्तियों के पास से लौट आवें. आज हमारा पितृमेध यज्ञ कल्याणकारी हो. हम नृत्य और हास्य की ओर उन्मुख हों एवं अधिक लंबी अवस्था धारण करें. (३) इमं जीवेभ्यः परिधिं दधामि मैषां नु गादपरो अर्थमेतम्. शतं जीवन्तु शरदः पुरूचीरन्तर्मृत्युं दधतां पर्वतेन.. (४) मैं जीवित पुत्र-पौत्रों की रक्षा के पत्थर के रूप में मृत्यु की सीमा रखता हूं. कोई अन्य इस मरणमार्ग से न जावे. ये लोग सैकड़ों वर्ष जीवित रहें एवं इस पत्थर के द्वारा मृत्यु को अपने से दूर रखें. (४) यथाहान्यनुपूर्वं भवन्ति यथ ऋतव ऋतुभिर्यन्ति साधु. यथा न पूर्वमपरो जहात्येवा धातरायूूंषि कल्पयैषाम्.. (५) हे धाता! जिस प्रकार दिन पर दिन बीतते हैं एवं ऋतुएं ऋतुओं के पश्चात् ठीक से जाती हैं, उसी प्रकार पहले पैदा हुए पिता आदि के सामने बाद में उत्पन्न हुए पुत्र आदि नहीं मरते हैं. हमारे परिवारों की आयु इसी प्रकार स्थिर रखो. (५) आ रोहतायुर्जरसं वृणाना अनुपूर्वं यतमाना यतिष्ठ. इह त्वष्टा सुजनिमा सजोषा दीर्घमायुः करति जीवसे वः.. (६) हे मृतक के पुत्र-पौत्रादि लोगो! बुढ़ापे को धारण करते हुए तुम लोग जीवन में स्थित रहो. तुम क्रम से अर्थात् बड़े के बाद छोटा, कार्य को यत्न से करते रहो. तुम्हारे साथ काम में लगे हुए शोभन-जन्म वाले त्वष्टा देव तुम्हारी आयु लंबी बनावें. (६) इमा नारीरविधवाः सुपत्नीराञ्जनेन सर्पिषा सं विशन्तु. ebook converter DEMO Watermarks*

अनश्रवोऽनमीवाः सुरत्ना आ रोहन्तु जनयो योनिमग्रे.. (७) ये सधवा एवं शोभन पत्नियां-नारियां घृत और अन्न के साथ अपने घर में प्रवेश करें. ये स्त्रियां आंसुओं के बिना रोगरहित और शोभनधन वाली बनकर अपने घर में सबसे पहले पहुंचें. (७) उदीर्ष्व नार्यभि जीवलोकं गतासुमेतमुप शेष एहि. हस्तग्राभस्य दिधिषोस्तवेदं पत्युर्जनित्वमभि सं बभूथ.. (८) हे मृतक की पत्नी! तुम अपने पुत्रों और घर का ध्यान करके यहां से उठो. तुम इस मरे हुए के पास क्यों सोई हो? आओ. तुम इस पुरुष से पाणिग्रहण और गर्भाधान के अनुरूप व्यवहार कर चुकी हो. तुम इसके साथ मरने का विचार छोड़ो. (८) धनुर्हस्तादाददानो मृतस्यास्मे क्षत्राय वर्चसे बलाय. अत्रैव त्वमिह वयं सुवीरा विश्वाः स्पृधो अभिमातीर्जयेम.. (९) मैं प्रजारक्षण, तेज और बलप्राप्ति के लिए मरे हुए क्षत्रिय के हाथ से धनुष लेकर कह रहा हूं. हे मृत व्यक्ति! तुम यहीं रहो. हम शोभन संतान वाले होकर इस लोक में सब शत्रुओं को जीतें. (९) उप सर्प मातरं भूमिमेतामुरुव्यचसं पृथिवीं सुशेवाम्. ऊर्णम्रदा युवतिर्दक्षिणावत एषा त्वा पातु निर्ऋतेरुपस्थात्.. (१०) हे मृत व्यक्ति! तुम इस विस्तृत, व्याप्त एवं सुख देने वाली धरती माता के पास जाओ. हे यज्ञ की दक्षिणा देने वाले मृतक! युवती स्त्री एवं भेड़ के बालों के समूह के समान कोमल तृणों वाली यह धरती तुम्हारी हड्डियों की रक्षा करे. (१०) उच्छ्वञ्चस्व पृथिवि मा नि बाधथाः सूपायनास्मै भव सूपवञ्चना. माता पुत्रं यथा सिचाभ्येनं भूम ऊर्णुहि.. (११) हे पृथिवी! तुम मरे हुए व्यक्ति को ऊंचा रखो. इसे बाधा मत दो. तुम इसके लिए शोभन उपचार एवं शोभन स्थिति वाली बनो. माता जिस प्रकार अपने वस्त्र से पुत्र को ढक लेती है, उसी प्रकार धरती उस मृतक की अस्थियों को ढक लें. (११) उच्छ्वञ्चमाना पृथिवी सु तिष्ठतु सहस्रं मित उप हि श्रयन्ताम्. ते गृहासो घृतश्रुतो भवन्तु विश्वाहास्मै शरणाः सन्त्वत्र.. (१२) धरती इस मृतक व्यक्ति की हड्डियों के ऊपर ऊंचे टीले के रूप में स्थित हो. हजारों धूलिकण इसके ऊपर जम जावें. वे धूलिकण इसके लिए घी टपकाने वाले घर बनें एवं इसको सभी दिनों में सहारा दें. (१२) ebook converter DEMO Watermarks*

उत्त स्तभ्नामि पृथिवीं त्वत्परीमं लोगं निदधन्मो अहं रिषम्. एतां स्थूणां पितरो धारयन्तु तेऽत्रा यमः सादना ते मिनोतु.. (१३) हे हड्डियों से पूर्ण घट! मैं तुम्हारे ऊपर धरती को उठाकर रखता हूं. तुम्हारे ऊपर मैं पत्थर रखता हूं, जिससे मिट्टी गिरकर तुम्हें नष्ट न करे. पितर लोग तुम्हारी इस खूंटी को धारण करें, जिसे गाड़कर मैंने तुम्हें बांधा है. यम यहां तुम्हारा स्थान स्वीकार करें. (१३) प्रतीचीने मामहनीष्वाः पर्णमिवा दधुः. प्रतीचीं जग्रभा वाचमश्वं रशनया यथा.. (१४) हे प्रजापति! जिस प्रकार बाण के पिछले भाग में पंख लगाये जाते हैं, उसी प्रकार मुझ संकुसुक ऋषि को देवों ने संवत्सर के पूज्य दिन के रूप में रखा है. घोड़ों को जिस प्रकार लगाम के सहारे रोका जाता है, उसी प्रकार तुम मेरी पूज्य स्तुति को स्वीकार करो. (१४) सूक्त—१९ देवता—गौ नि वर्तध्वं मानु गातास्मान्तिषिक्त रेवतीः. अग्नीषोमा पुनर्वसू अस्मे धारयतं रयिम्.. (१) हे गायो! तुम हमारे पास लौट आओ. तुम हमारे अतिरिक्त किसी के पास मत जाओ. हे धनयुक्त गायो! तुम हमें दूध से सींचो. हे बार-बार धन देने वाले अग्नि और सोम! तुम हमें धन दो. (१) पुनरेना नि वर्तय पुनरेना न्या कुरु. इन्द्र एणा नि यच्छत्वग्निरेना उपाजतु.. (२) हे मेरी आत्मा! इन गायों को बार-बार अपनी ओर मोड़ो और बार-बार वश में करो. इंद्र इन्हें तुम्हारे वश में करें तथा अग्नि इन्हें उपयोगी बनावें. (२) पुनरेता नि वर्तन्तामस्मिन्पुष्यन्तु गोपतौ. इहैवाग्ने नि धारयेह तिष्ठतु या रयिः.. (३) ये गाएं बार-बार लौटकर मेरे पास आवें एवं मुझ गोपाल के पास आकर पुष्ट हों. हे अग्नि! इन गायों को मेरे पास ही रखो. यह गायरूप धन मेरे पास ही रहे. (३) यन्नियानं न्ययनं संज्ञानं यत्परायणम्. आवर्तनं निवर्तनं यो गोपा अपि तं हुवे.. (४) मैं प्रार्थना करता हूं कि मुझे गायों से भरी हुई गोशाला प्राप्त हो. गाएं मेरे घर आवें. मैं गायों को पहचानूं व गायों को चराने जाऊं. गाएं मेरे घर से वन में जावें और चरने के बाद वापस लौटें. मैं गाय पालने वालों की भी प्रार्थना करता हूं. (४) य उदानड् व्ययनं य उदानट् परायणम्. आवर्तनं निवर्तनमपि गोपा नि वर्तताम्.. (५) ebook converter DEMO Watermarks*

जो गोपाल खोई हुई गायों की सब ओर खोज करता है, जो गायों को घर वापस ले जाता है, जो गायों को घर से चराने ले जाता है और चराकर लौटता है, वह सकुशल लौट आवे. (५) आ निवर्त नि वर्तय पुनर्न इन्द्र गा देहि. जीवाभिर्भुनजामहै.. (६) हे इंद्र! तुम हमारी ओर आओ एवं गायों को हमारी ओर लाओ. तुम हमें गाएं दो. हम अधिक दिन जीने वाली गायों का दूध पिएं. (६) परि वो विश्वतो दध ऊर्जा घृतेन पयसा. ये देवाः के च यज्ञियास्ते रय्या सं सृजन्तु नः.. (७) हे सर्वत्र स्थित देवो! मैं गाय के दूध, दही व घृत से तुम्हारी सेवा करता हूं जो यज्ञ के योग्य देव हैं, वे हमें गायरूप धन से मिलावें. (७) आ निवर्तन वर्तय नि निवर्तन वर्तय. भूम्याश्चतस्रः प्रदिशस्ताभ्य एना नि वर्तय.. (८) हे मेरी आत्मा! गायों को मेरे पास लाओ. हे गायो! तुम मेरे पास आओ. भूमि और चारों दिशाओं से गायों को मेरे पास लाओ. गाएं भी उक्त स्थानों से मेरे पास लौट आवें. (८) सूक्त—२० देवता—अग्नि भद्रं नो अपि वातय मनः.. (१) हे अग्नि! तुम मेरे मन को कल्याण के योग्य बनाओ. (१) अग्निमीळे भुजां यविष्ठं शासा मित्रं दुर्धरीतुम्. यस्य धर्मन्त्स्व१ रेनीः सपर्यन्ति मातुरूधः.. (२) मैं हवि का भोग करने वाले देवों के मध्य सबसे छोटे, अनुशासन के द्वारा मित्र एवं अपराजेय अग्नि की स्तुति करता हूं. बछड़े जिस प्रकार गाय का थन पीकर जीते हैं, उसी प्रकार अग्नि के यज्ञकर्म में समस्त देव, आहुतियां और स्तुतियां सेवा करती हैं. (२) यमासा कृपनीळं भासाकेतुं वर्धयन्ति. भ्राजते श्रेणिदन्.. (३) स्तोता यज्ञकर्म के आधार पर ज्वाला से पहचाने जाने वाले अग्नि को बढ़ाते हैं. स्तोताओं को मनचाहा फल देने वाले अग्नि प्रकाशित होते हैं. (३) अर्यो विशां गातुरेति प्र यदानड् दिवो अन्तान्. कविरभ्रं दीद्यानः.. (४) यजमानों के आश्रययोग्य अग्नि दीप्त होकर जब ऊपर उठते हैं, उस समय मेधावी ebook converter DEMO Watermarks*

अग्नि द्युलोक के अंतिम भाग एवं मेघ को व्याप्त करते हैं. (४) जुषद्धव्या मानुषस्योधर्वस्तस्थावृभ्वा यज्ञे. मिन्वन्सङ्ग पुर एति.. (५) यजमान के यज्ञ में हवि का उपभोग करने वाले अग्नि अनेक ज्वालाओं वाले बनकर ऊपर उठते हैं एवं यज्ञ की उत्तर वेदी को नापते हुए सबके सामने आते हैं. (५) स हि क्षेमो हविर्यज्ञः सृष्टीदस्य गातुरेति. अग्निं देवा वाशीमन्तम्.. (६) वे ही अग्नि सबके पालन के कारण हैं, वे ही हव्य एवं यज्ञ हैं. अग्नि देवों को बुलाने के लिए शीघ्र जाते हैं. देवगण स्तुतिवचन से युक्त अग्नि के पास आते हैं. (६) यज्ञासाहं दुव इषेऽग्निं पूर्वस्य शेवस्य. अद्रेः सूनुमायुमाहुः.. (७) मैं उत्कृष्ट सुख की प्राप्ति के लिए अग्नि की सेवा करना चाहता हूं. अग्नि देवों को बुलाने हेतु जाने वाले, पत्थरों के पुत्र व यज्ञ वहन करने वाले हैं. (७) नरो ये के चास्मदा विश्वेत्ते वाम आ स्युः. अग्निं हविषा वर्धन्तः.. (८) हवि के द्वारा अग्नि को बढ़ाते हुए हमारे जो भी पुत्र-पौत्र हैं, वे सभी पशु आदि धन के पास बैठें. (८) कृष्णः श्वेतोऽरुषो यामो अस्य ब्रध्न ऋज्र उत शोणो यशस्वान्. हिरण्यरूपं जनिता जजान.. (९) अग्नि का रथ काले रंग वाला, श्वेत वर्णयुक्त, चमकीला, महान्, सीधा चलने वाला, लाल एवं यशस्वी है. विधाता ने उसे सुनहरे रंग का बनाया है. (९) एवा ते अग्ने विमदो मनीषामूर्जो नपादमृतेभिः सजोषाः. गिर आ वक्षत्सुमतीरियान इषमूर्जं सुक्षितिं विश्वमाभाः.. (१०) हे शक्ति के नाती अग्नि! हविरूप अमर धनों से युक्त विमद नामक ऋषि ने उत्तम बुद्धि की कामना करते हुए तुम्हारे लिए ये स्तुतिवचन कहे हैं. तुम इन्हें स्वीकार करके विमद को धन, बल, शोभनगृह एवं सभी प्रकार के धन दो. (१०) सूक्त—२१        देवता—अग्नि आग्निं न स्ववृक्तिभिर्होतारं त्वा वृणीमहे. यज्ञाय स्तीर्णबर्हिषे वि वो मदे शीरं पावकशोचिषं विवक्षसे.. (१) हे अग्नि! हम कुश बिछे हुए यज्ञ की पूर्णता के लिए अपनी बनाई हुई स्तुतियों द्वारा देवों ebook converter DEMO Watermarks*

को बुलाने वाले तुम्हारा वरण करते हैं. तुम ओषधियों में सोने वाले, पवित्र दीप्तियुक्त एवं महान् हो. (१) त्वामु ते स्वाभुवः शुम्भन्त्यश्वराधसः. वेति त्वामुपसेचनी वि वो मद ऋजीतिरग्न आहुतिर्विवक्षसे.. (२) हे अग्नि! स्वयं प्रकाश से दीप्त एवं विस्तृत धन वाले यजमान तुम्हारी शोभा बढ़ाते हैं. टपकने वाली एवं सरल गतियुक्त आहुति तुझ महान् अग्नि को प्रसन्न करने के लिए जाती है. (२) त्वे धर्माण आसते जुहूभिः सिञ्चतीरिव. कृष्णा रूपाण्यर्जुना वि वो मदे विश्वा अधि श्रियो धिषे विवक्षसे.. (३) हे अग्नि! यज्ञधारण करने वाले यजमान यज्ञ के जुहू नामक पात्रों से उसी प्रकार तुम्हारी सेवा करते हैं, जिस प्रकार वर्षा का जल धरती को सींचता है. हे महान् अग्नि! देवों की प्रसन्नता के लिए तुम काले और श्वेत रंग की ज्वालाओं के रूप में सब शोभा धारण करते हो. (३) यमग्ने मन्यसे रयिं सहसावन्नमर्त्य. तमा नो वाजसातये वि वो मदे यज्ञेषु चित्रमा भरा विवक्षसे.. (४) हे शक्तिशाली एवं मरणरहित अग्नि! तुम जिस धन को उत्तम मानते हो, उसे अन्नलाभ के लिए हमारे पास ले आओ. हे महान् अग्नि! तुम सब देवों की प्रसन्नता के लिए धन लाओ. (४) अग्निर्जातो अथर्वणा विदद्विश्वानि काव्या. भुवद्दूतो विवस्वतो वि वो मदे प्रियो यमस्य काम्यो विवक्षसे.. (५) अथर्वा ऋषि द्वारा उत्पन्न किए गए अग्नि सभी स्तुतियों को जानते हैं एवं देवों को बुलाने के लिए यजमान के दूत बनते हैं. महान् अग्नि यजमान के प्रिय एवं प्रार्थनीय बनते हैं. (५) त्वां यज्ञेष्वीळतेऽग्ने प्रयत्यध्वरे. त्वं वसूनि काम्या वि वो मदे विश्वा दधासि दाशुषे विवक्षसे.. (६) हे अग्नि! यज्ञ आरंभ होने पर एवं हवि समीप आने पर यजमान तुम्हारी प्रार्थना करते हैं. हे महान् अग्नि! तुम हवि देने वाले विमद ऋषि के लिए सभी उत्तम धन देते हो. (६) त्वां यज्ञेष्वृत्विजं चारुमग्ने नि षेदिरे. घृतप्रतीकं मनुषो वि वो मदे शुक्रं चेतिष्ठमक्षभिर्विवक्षसे.. (७) ebook converter DEMO Watermarks*

हे महान् होता नामधारी, रमणीय, घी की आहुति से पूर्ण मुख वाले, प्रज्वलित व व्याप्त तेजों के कारण ज्ञानयुक्त अग्नि! यजमान आनंद पाने के लिए तुम्हें नियमित रूप से स्थापित करते हैं. (७) अग्ने शुक्रेण शोचिषोरु प्रथयसे बृहत्. अभिक्रन्दन्वृषायसे वि वो मदे गर्भं दधासि जामिषु विवक्षसे.. (८) हे महान् अग्नि! तुम अपने उज्ज्वल तेज के कारण अधिक प्रसिद्ध होते हो. तुम समय- समय पर बैल के समान शब्द करते हो. हे महान् अग्नि! तुम सोम आदि की प्रसन्नता के लिए अपनी बहिनों के समान ओषधियों में गर्भ धारण करते हो. (८) सूक्त—२२ देवता—इंद्र कुह श्रुत इन्द्रः कस्मिन्नद्य जने मित्रो न श्रूयते. ऋषीणां वा यः क्षये गुहा वा चकृषे गिरा.. (१) इंद्र आज कहां प्रसिद्ध हैं? आज वे मित्र के समान किस व्यक्ति के पास सुने जाते हैं? क्या इंद्र की स्तुतियां ऋषियों के निवासस्थानों अथवा गुफाओं में की जाती हैं? (१) इह श्रुत इन्द्रो अस्मे अद्य स्तवे वज्र्युचीषमः. मित्रो न यो जनेष्वा यशश्चक्रे असाम्या.. (२) इंद्र आज इस यज्ञ में प्रसिद्ध हैं. आज हम वज्रधारी एवं स्तुति के योग्य इंद्र की स्तुतियां करते हैं. इंद्र स्तोताओं को मित्र के समान असाधारण यश देने वाले हैं. (२) महो यस्पतिः शवसो असाम्या महो नृम्णस्य तूतुजिः. भर्ता वज्रस्य धृष्णोः पिता पुत्रमिव प्रियम्.. (३) शक्ति के स्वामी, महान्, अनंत गुणयुक्त व स्तोताओं को महान् धन देने वाले इंद्र शत्रुपराभवकारी वज्र धारण करते हैं. पिता जिस प्रकार पुत्र की अभिलषित वस्तु की रक्षा करता है, उसी प्रकार इंद्र हमारी मनचाही वस्तुओं की रक्षा करें. (३) युजानो अश्वा वातस्य धुनी देवो देवस्य वज्रिवः. स्यन्ता पथा विरुकमता सृजानः स्तोष्यध्वनः.. (४) हे वज्रधारी एवं दीप्तिशाली इंद्र! तुम दीप्तिशाली, वायु से भी तेज चलने वाले एवं तेजस्वी मार्ग से जाने वाले हरि नामक घोड़ों को रथ में जोड़कर युद्ध में जाने का मार्ग बनाते हुए प्रशंसित होते हो. (४) त्वं त्या चिद्धातस्याश्वागा ऋज्रा त्मना वहध्यै. ebook converter DEMO Watermarks*

ययोर्देवो न मर्त्यो यन्ता नकिर्विदाय्यः.. (५) हे इंद्र! तुम अपने आप उन वायु वेग से युक्त एवं सरल मार्ग पर चलने वाले घोड़ों को हांकते हुए हमारे सामने आते हो, जिनको हांकने वाला अथवा जिनकी शक्ति जानने वाला देव अथवा मनुष्य कोई भी नहीं है. (५) अध ग्मन्तोशना पृच्छते वां कदर्था न आ गृहम्. आ जग्मथुः पराकाद्दिवश्च ग्मश्च मर्त्यम्.. (६) हे इंद्र एवं अग्नि! अपने स्थान को जाते हुए तुमसे उशना ऋषि ने पूछा— “तुम लोग किस लिए हमारे घर आए हो? तुम इतनी अधिक दूर द्युलोक और धरती से हमारे घर केवल अनुग्रहवश आते हो.” (६) आ न इन्द्र पृक्षेसेऽस्माकं ब्रह्मोद्यतम्. तत्त्वा याचामहेऽवः शुष्णं यद्धन्नमानुषम्.. (७) हे इंद्र! हमारे द्वारा एकत्रित इस यज्ञ सामग्री का तुम तब तक भक्षण करो, जब तक तुम्हें तृप्ति न मिले. हम तुमसे अन्न, रक्षा एवं ऐसी शक्ति चाहते हैं, जिससे तुम राक्षसों का विनाश करते हो. (७) अकर्मा दस्युरभि नो अमन्तुरन्यव्रतो अमानुषः. त्वं तस्यामित्रहन्वधर्दासस्य दम्भय.. (८) हे इंद्र! हमारे चारों ओर यज्ञकर्म से शून्य, किसी को न मानने वाले, वेदस्तुति के प्रतिकूल कर्म करने वाले एवं मानवोचित व्यवहार से रहित दस्यु हैं. हे शत्रुनाशक इंद्र! तुम शूर मरुतों के साथ हमारी रक्षा करो. (८) त्वं न इन्द्र शूर शूरैरुत त्वोतासो बर्हणा. पुरुत्रा ते वि पूर्तयो नवन्तक्षोणयो यथा.. (९) हे शूर इंद्र! तुम शूर मरुतों के साथ हमारी रक्षा करो. तुम्हारे द्वारा रक्षित हम शत्रुविनाश में समर्थ बनें. तुम्हारे दिए हुए अभिलषित पदार्थ स्तोता को इस प्रकार घेरते हैं, जिस प्रकार सेवक अपने स्वामी को घेरते हैं. (९) त्वं तान्वृत्रहत्ये चोदयो नॄन्कार्पणे शूर वज्रिवः. गुहा यदी कवीनां विशां नक्षत्रशवसाम्.. (१०) हे वज्रधारी एवं शूर इंद्र! तुम युद्ध में शत्रुनाश के लिए प्रसिद्ध मरुतों को उस समय प्रेरित करते हो, जिस समय स्तोताओं की नक्षत्रवासी देवों के प्रति बोली हुई स्तुतियां सुनते हो. (१०) मक्षू ता त इन्द्र दानाप्रस आक्षाणे शूर वज्रिवः.

यद्व शुष्णस्य दम्भयो जातं विश्वं सयावभिः.. (११) हे शूर एवं वज्रधारी इंद्र! युद्धक्षेत्र में शीघ्र होने वाले तुम्हारे दान की स्तोता स्तुति करते हैं. तुमने मरुतों को साथ लेकर शुष्ण असुर के पूरे वंश का नाश कर डाला. (११) माकुध्र्यागिन्द्र शूर वस्वीरस्मे भूवन्नभिष्टयः. वयंवयं त आसां सुम्ने स्याम वज्रिवः.. (१२) हे शूर इंद्र! हमारी महान् प्रार्थनाएं निष्फल न हों. हे वज्रधारी इंद्र! तुम्हारी कृपा से हम सब अभिलाषाएं एवं सुख भोगें. (१२) अस्मे ता त इन्द्र सन्तु सत्याहिंसन्तीरुपस्पृशः. विद्याम यासां भुजो धेनूनां न वज्रिवः.. (१३) हे इंद्र! तुम्हारे प्रति की गई हमारी स्तुतियां सच्ची हों एवं तुम्हें कष्ट न दें. हे वज्रधारी इंद्र! लोग जिस प्रकार गायों के दूध का उपभोग करते हैं, उसी प्रकार हम तुम्हारी कृपा से भोगों को प्राप्त करें. (१३) अहस्ता यदपदी वर्धत क्षाः शचीभिर्वेद्यानाम्. शुष्णं परि प्रदक्षिणिद्विश्चायवे नि शिश्रथः.. (१४) हे इंद्र! हाथों और पैरों से विहीन यह धरती देवों की क्रियाओं से ही बढ़ी है. पृथ्वी के चारों ओर स्थित शुष्ण असुर को तुमने इसलिए मारा कि सब लोग चल फिर सकें. (१४) पिबापिबेदिन्द्र शूर सोमं मा रिषण्यो वसवान वसुः सन्. उत त्रायस्व गृणतो मघोनो महश्च रायो रेवतस्कृधी नः.. (१५) हे शूर इंद्र! तुम सोमरस को जल्दीजल्दी पिओ. हे धनस्वामी इंद्र! तुम प्रसिद्ध होकर हमारी हिंसा मत करना तथा स्तुति करने वाले यजमान की रक्षा करना. तुम हमें अधिक धन देकर धनी बनाओ. (१५) सूक्त—२३ देवता—इंद्र यजामह इन्द्रं वज्रदक्षिणं हरीणां रथ्यं१ विव्रतानाम्. प्र श्मश्रु दोधुवदूर्ध्वथा भूद्धि सेनाभिर्देयमानो वि राधसा.. (१) हम दक्षिण हाथ में वज्र धारण करने वाले एवं अनेक कर्मों में कुशल घोड़ों को रथ में जोड़ने वाले इंद्र की पूजा करते हैं. इंद्र सोमपान के बाद अपनी दाढ़ी हिलाते हुए ऊपर प्रकट हुए एवं अपनी सेवाओं द्वारा विविध शत्रुओं को मारते हुए स्तोताओं को धन देते हैं. (१) ebook converter DEMO Watermarks*