ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पितुं नु स्तोषं महो धर्माणं तविषीम्. यस्य त्रितो व्योजसा वृत्रं विपर्वमर्दयत्.. (१) मैं सबके धारणकर्त्ता एवं बलरूप पालक अन्न की शीघ्र स्तुति करता हूं. अन्न की शक्ति से इंद्र ने वृत्र असुर के टुकड़े कर दिए थे. (१) स्वादो पितो मधो पितो वयं त्वा ववृमहे. अस्माकमविता भव.. (२) हे स्वादिष्ट एवं मधुर पितः! हम तुम्हारी स्तुति करते हैं. तुम हमारे रक्षक बनो. (२) उप नः पितवा चर शिवः शिवाभिरूतिभिः. मयोभुरद्विषेण्यः सखा सुशेवो अद्वयाः.. (३) हे मंगलरूप पितः! कल्याणकारी रक्षा साधनों के साथ हमारे पास आओ और हमें सुख दो. तुम हमारे लिए प्रिय रस वाले मित्र एवं अनोखे सुखदाता बनो. (३) तव त्ये पितो रसा रजांस्यनु विष्ठिताः. दिवि वाताइव श्रिताः.. (४) हे पितः अर्थात् अन्न! जिस प्रकार आकाश में हवा व्याप्त है, उसी प्रकार तुम्हारा रस सारे संसार में फैला हुआ है. (४) तव त्ये पितो ददतस्तव स्वादिष्ठ ते पितो. प्र स्वाद्मानो रसानां तुविग्रीवाइवेरते.. (५) हे परम स्वादिष्ट पितः! तुम्हारी प्रार्थना करने वाले मनुष्य तुम्हारा भोग करते हैं. तुम्हारी कृपा से ही वे तुम्हारा दान करते हैं. तुम्हारे रस का भोग करने वाले मनुष्य गरदन ऊंची करके चलते हैं. (५) त्वे पितो महानां देवानां मनो हितम्. अकारि चारु केतुना तवाहिमवसावधीत्.. (६) हे पितः! महान् देवों का मन तुम्हीं में लगा हुआ है. इंद्र ने तुम्हारी रक्षा एवं बुद्धि का सहारा लेकर ही वृत्र का वध किया था. (६) यददो पितो अजगन्विवस्व पर्वतानाम्. अत्रा चिन्नो मधो पितोऽरं भक्षाय गम्याः.. (७) हे मधुर पितः! जब बादल प्रसिद्ध जल बरसाने को लावें, उस समय तुम पर्याप्त भोजन के रूप में हमारे समीप आना. (७) यदपामोषधीनां परिंशमारिशामहे. वातापे पीव इद्भव.. (८) हे शरीर! हम जौ आदि वनस्पतियों को पर्याप्त मात्रा में खाते हैं, इसलिए तुम मोटे बनो. ebook converter DEMO Watermarks*
(८) यत्ते सोम गवाशिरो यवाशिरो भजामहे. वातापे पीव इद्भव.. (९) हे सोमरूप अन्न! हम तुम्हारे यव एवं गोदुग्ध से बने पदार्थों को भक्षण करते हैं. हे शरीर! तुम मोटे बनो. (९) करम्भ ओषधे भव पीवो वृक्क उदारथिः. वातापे पीव इद्भव.. (१०) हे सत्तू के बने हुए गोले! तुम मोटापा लाने वाले एवं रोगनाशक बनो. हे शरीर! तुम मोटे बनो. (१०) तं त्वा वयं पितो वचोभिर्गावो न हव्या सुषूदिम. देवेभ्यस्त्वा सधमादमस्मभ्यं त्वा सधमादम्.. (११) हे पितः! गायों से जिस प्रकार हव्यरूप दूध ग्रहण करते हैं, उसी प्रकार हम स्तुतियां बोलकर तुमसे रस ग्रहण करते हैं. तुम समस्त देवों के साथ-साथ हमें भी आनंद देते हो. (११) सूक्त—१८८ देवता—आप्रिय (अग्नि) समिद्धो अद्य राजसि देवो देवैः सहस्रजित्. दूतो हव्या कवीर्वह.. (१) हे अग्नि! तुम ऋत्विजों द्वारा भली प्रकार उदीप्त होकर सुशोभित हो. हे सहस्रजित्! तुम कवि और दूत हो तुम हमारे हव्य को ले आओ. (१) तनूनपादृतं यते मध्वा यज्ञः समज्यते. दधत्सहस्रिणीरिषः.. (२) हे पूज्य तनूनपात् अग्नि! हजारों प्रकार के अन्न धारण करते हुए यजमान के कल्याण के लिए मधुर आज्य द्रव्यों से मिलते हैं. (२) आजुह्वानो न ईड्यो देवाँ आ वक्षि यज्ञियान्. अग्ने सहस्रसा असि.. (३) हे ईड्य अग्नि! हम तुम्हें बुलाते हैं. तुम यज्ञ के योग्य देवों को यहां लाओ. तुम हजारों प्रकार का अन्न देते हो. (३) प्राचीनं बर्हिरोजसा सहस्रवीरमस्तृणन्. यत्रादित्या विराजथ.. (४) हजारों वीरों वाले एवं पूर्व की ओर मुंह किए हुए अग्निरूपी कुश पर आदित्य बैठते हैं. ऋत्विज् उसे मंत्रों द्वारा फैलाते हैं. (४) ebook converter DEMO Watermarks*
विराट् सम्राड्विभ्वीः पृथ्वीर्बह्वीश्च भूयसीश्च याः. दुरो घृतान्यक्षरन्.. (५) यज्ञशाला में विराट्, सम्राट्, विप्र, प्रभु, बहु और भूयान् अग्नि घृतरूप जल गिराते हैं. (५) सुरुक्मे हि सुपेशसाधि श्रिया विराजतः. उषासावेह सीदताम्.. (६) सुंदर आभरण वाले एवं शोभनरूपसंपन्न अग्निरूपी रात और दिन अत्यंत शोभित होते हुए यहां बैठें. (६) प्रथमा हि सुवाचसा होतारा दैव्या कवी. यज्ञं नो यक्षतामिमम्.. (७) अग्नि देव अति श्रेष्ठ और प्रिय वचन होता एवं दिव्य कवि इन दो रूपों में हमारे यज्ञ में उपस्थित हों. (७) भारतीळे सरस्वति या वः सर्वा उपब्रुवे. ता नश्चोदयत श्रिये.. (८) हे भारती, सरस्वती और इला! तुम सब अग्नि के रूप हो. मैं तुम्हारा आह्वान करता हूं. तुम मुझे संपत्तिशाली बनने की प्रेरणा दो. (८) त्वष्टा रूपाणि हि प्रभुः पशून्विश्वान्समानजे. तेषां नः स्फातिमा यज.. (९) त्वष्टा रूपनिर्माण में समर्थ हैं. वे समस्त पशुओं को रूप देते हैं. वे हमारे पशुओं की वृद्धि करें. (९) उप त्मन्या वनस्पते पाथो देवेभ्यः सृज. अग्निहव्यानि सिष्वदत्. (१०) हे वनस्पति! तुम अपने आप देवों के लिए पशुरूप अन्न उत्पन्न करो. इस प्रकार अग्नि सभी हव्यों को स्वादिष्ट बनावेंगे. (१०) पुरोगा अग्निर्देवानां गायत्रेण समज्यते. स्वाहाकृतीषु रोचते.. (११) देवों के अग्रगामी अग्नि गायत्री छंद द्वारा जाने जाते हैं. स्वाहा शब्द बोलने पर वे जल उठते हैं. (११) सूक्त—१८९ देवता—अग्नि अग्ने नय सुपथा राये अस्मान्विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्. युयोध्य१ स्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नमउक्तिं विधेम.. (१) हे द्योतमान अग्नि! तुम सभी प्रकार के ज्ञानों को जानते हो, इसलिए हमें धन की ओर ebook converter DEMO Watermarks*
ले जाने वाले उत्तम मार्ग पर ले जाओ. कुटिलता उत्पन्न करने वाला पाप हमसे दूर करो. हम तुम्हें बार-बार नमस्कार कहते हैं. (१) अग्ने त्वं पारया नव्यो अस्मान्त्स्वस्तिभिरति दुर्गाणि विश्वा. पूश्च पृथ्वी बहुला न उर्वी भवा तोकाय तनयाय शं यो:.. (२) हे अति नवीन अग्नि! तुम अतिपूजित यज्ञादि साधनों का सहारा लेकर हमें दुर्गम पापों के पार पहुंचाओ. हमारी नगरी और धरती अत्यंत विस्तृत हो. हमारी संतान को तुम सुख दो. (२) अग्ने त्वमस्मद्युयोध्यमीवा अनग्नित्रा अभ्यमन्त कृष्टी:. पुनरस्मभ्यं सुविताय देव क्षां विश्वेभिरमृतेभिर्यजत्र.. (३) हे अग्नि! तुम समस्त रोगों के साथ-साथ अग्निहोत्र न करने वाले लोगों को भी हमसे दूर कर दो. हे प्रकाशमान एवं यज्ञ के योग्य अग्नि! तुम अन्य समस्त देवों के साथ आकर हमें यज्ञ में उत्तम फल दो. (३) पाहि नो अग्ने पायुभिरजस्रैरुत प्रिये सदन आ शुशुक्वान्. मा ते भयं जरितारं यविष्ठ नूनं विदन्मापरं सहस्व:.. (४) हे अग्नि! सदैव आश्रय देकर हमारा पालन करो एवं अपने प्रिय यज्ञस्थल में सब ओर से प्रकाशित बनो. हे अतिशय एवं शक्तिशाली अग्नि! तुम्हारे स्तोता मुझको आज या इसके बाद कभी भी भय न लगे. (४) मा नो अग्नेऽव सृजो अघायाविष्यवे रिपवे दुच्छुनायै. मा दत्वते दशत मादते नो मा रीषते सहसावन्परा दा:.. (५) हे अग्नि! हमें हिंसक, भूखे और दुःखदाता शत्रु के अधीन मत होने दो. हमें दांत वाले कटखने सर्पादि, बिना दांत के, सींग वाले पशुओं एवं हिंसक राक्षसों को भी मत सौंपो. (५) वि घ त्वावां ऋतजात यंसद्गृणानो अग्ने तन्वे३ वरूथम्. विश्वाद्विरिक्षोरुत वा निनित्सोरभिहुतामसि हि देव विष्पट्.. (६) हे यज्ञ से उत्पन्न एवं वरणीय अग्नि देव! जो लोग शरीर की पुष्टि के लिए तुम्हारी स्तुति करते हैं, उन्हें तुम हिंसक, चोर आदि एवं निंदक लोगों से बचाते हो. तुम अपने सामने कुटिल आचरण करने वाले के बाधक बनो. (६) त्वं ताँ मन उभायान्वि विद्वांन्वेषि प्रपित्वे मनुषो यजत्र. अभिपित्वे मनवे शास्यो भूर्म्मर्मृजेन्य उशिग्निभर्नाक:.. (७) ebook converter DEMO Watermarks*
हे यज्ञ के योग्य अग्नि! तुम यज्ञ करने वाले एवं न करने वाले दोनों को जानते हुए यज्ञकर्त्ताओं की ही कामना करो. हे आक्रमणकारी अग्नि! यज्ञ की अभिलाषा करने वाले यजमान को जिस प्रकार ऋत्विज् शिक्षा देते हैं, उसी प्रकार तुम यजमान की शिक्षा के पात्र बनो. (७) अवोचाम निवचनान्यस्मिन्मानस्य सूनुः सहसाने अग्नौ. वयं सहस्रमृषिभिः सनेम विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्.. (८) मंत्रों के पुत्र और शत्रुओं के नाशक अग्नि को लक्ष्य करके ये सब स्तोत्र बनाए गए हैं. हम इंद्रियों से परे रहने वाले अर्थ के प्रकाशक इन मंत्रों से हजारों प्रकार के धन के अतिरिक्त अन्न, बल और दीर्घ आयु प्राप्त करें. (८) सूक्त—१९० देवता—बृहस्पति अनर्वाणं वृषभं मन्द्रजिह्वं बृहस्पतिं वर्धया नव्यमर्कैः. गाथान्यः सुरुचो यस्य देवा आशृण्वन्ति नवमानस्य मर्ताः.. (१) हे होता! न त्यागने वाले, फलदायक, मधुरभाषी एवं स्तुति के योग्य बृहस्पति को मंत्रों द्वारा बढ़ाओ. शोभन दीप्ति एवं स्तुति किए जाते हुए बृहस्पति को गाथा नामक मंत्रों का पाठ करने वाले मनुष्य और देव स्तुतियां सुनाते हैं. (१) तमृत्विया उप वाचः सचन्ते सर्गो न यो देवयतामसर्जि. बृहस्पतिः सह्यञ्जो वरांसि विभ्वाभवत्सम्ऋते मातरिश्वा.. (२) वर्षा ऋतु संबंधी स्तुतियां जल की सृष्टि करने वाले एवं देवभक्त यजमानों को फल देने वाले बृहस्पति के समीप जाती हैं. वे आकाश रूपी व्यापी मातरिश्वा के समान सभी उत्तम फलों को उत्पन्न करके यज्ञ के निमित्त प्रकट करते हैं. (२) उपस्तुतिं नमस उद्यतिं च श्लोकं यंसत्सवितैव प्र बाहू. अस्य क्रत्वाहन्यो३ यो अस्ति मृगो न भीमो अरक्षसस्तुविष्मान्.. (३) जिस प्रकार सूर्य अपनी किरणों से प्रकाश देता है, उसी प्रकार बृहस्पति यजमानों के समीप जाकर उनकी स्तुतियां, अन्नदान एवं स्तुतिमंत्रों को स्वीकार करते हैं. विरोधहीन इन बृहस्पति की शक्ति से दिन के सूर्य, भयानक सिंह आदि के समान शक्तिशाली बनकर घूमते हैं. (३) अस्य श्लोको दिवीयते पृथिव्यामत्यो न यंसद्यक्षभृद्विचेताः. मृगाणां न हेतयो यन्ति चेमा बृहस्पतेरहिमायाँ अभि द्यून्.. (४) ebook converter DEMO Watermarks*
बृहस्पति की कीर्ति धरती और आकाश में फैली है. वे आदित्य के समान हव्य धारण करते हुए प्राणियों में बुद्धि संचार के साथ-साथ उन्हें फल भी देते हैं. बृहस्पति के आयुध मायावियों की ओर शिकारी लोगों के आयुधों के समान तेजी से चलते हैं. (४) ये त्वा देवोस्रिकं मन्यमानाः पापा भद्रमुपजीवन्ति पज्राः. न दूह्ये३ अनु ददासि वामं बृहस्पते चयस इत्पियारुम्.. (५) हे बृहस्पतिदेव! तुम कल्याणकारक हो. जो पापी लोग तुम्हें बूढ़ा बैल समझकर तुम्हारे समीप जाते हैं, उन्हें मनचाहा उत्तम धन मत देना. तुम सोमयाग करने वाले पर अवश्य कृपा करना. (५) सुप्रैतुः सूयवसो न पन्था दुर्नियन्तुः परिप्रीतो न मित्रः. अनर्वाणो अभि ये चक्षते नोऽपीवृता अपोर्णुवन्तो अस्थुः.. (६) हे बृहस्पति! तुम शोभन मार्ग वाले एवं उत्तम धन से युक्त यजमान के लिए मार्ग के समान सरल एवं दुष्टों के नियंत्रण करने वाले राजा के प्रसन्न मित्र बनो. जो विरोधी हमारी निंदा करते हैं और सुरक्षित रहते हैं, उन्हें रक्षाहीन करो. (६) सं यं स्तुभोऽवनयो न यन्ति समुद्रं न स्रवतो रोधचक्राः. स विद्वाँ उभयं चष्टे अन्तर्बृहस्पतिस्तर आपश्च गृध्रः.. (७) जिस प्रकार सभी मनुष्य राजाओं एवं किनारों को तोड़ने वाली नदियां सागर के पास जाती हैं, उसी प्रकार स्तुतियां बृहस्पति को प्राप्त होती हैं. वे सब जानते हैं और आकाशचारी पक्षी के रूप में जल और तट दोनों को देखते हैं तथा वर्षा करने के इच्छुक होकर दोनों को उत्पन्न करते हैं. (७) एवा महस्तुविजातस्तुविष्मान्बृहस्पतिर्वृषभो धायि देवः. स नः स्तुतो वीरवद्धात्तु गोमद्विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्.. (८) महान्, बहुतों के उपकार के लिए उत्तम, बलवान्, जलवर्षक एवं दीप्तिमान् बृहस्पति की स्तुति इसी रूप में की जाती है. वे हमारी स्तुति सुनकर हमें विविध फल दें और हम अन्न, बल तथा दीर्घ आयु प्राप्त करें. (८) सूक्त—१९१ देवता—जल आदि कङ्कतो न कङ्कतोऽथो सतीनकङ्कतः. द्वाविति प्लुषी इति न्य१दृष्टा अलिप्सत.. (१) अल्पविष, महाविष, जलचारी अरूपविष, दो प्रकार के जलचर एवं थलचर प्राणी,
दाहक एवं अदृश्य प्राणी मुझे घेरे हैं. (१) अदृष्टान्हन्त्यायत्यथो हन्ति परायती. अथो अबघ्नती हन्त्यथो पिनष्टि पिंषती.. (२) विषधर जीवों से काटे हुए के पास आकर ओषधि विष का प्रभाव नष्ट करती है एवं दूर जाती हुई भी नष्ट करती है. उसे जब उखाड़ते हैं एवं पीसते हैं, तब भी वह विष का प्रभाव नष्ट करती है. (२) शरासः कुशरासो दर्भासः सैर्या उत. मौञ्जा अदृष्टा बैरिणाः सर्वे साकं न्यलिप्तत.. (३) शर, कुश, दर्भ, सैर्य, मुंज एवं वीरण नामक घासों में छिपे हुए विषधर मुझसे एक साथ लिपट जाते हैं. (३) नि गावो गोष्ठे असदन्नि मृगासो अविक्षत. नि केतवो जनानां न्य१दृष्टा अलिप्तत.. (४) जब गाएं गोशाला में बैठती हैं, हरिण निवासस्थान में बैठते हैं एवं मनुष्य निद्रा के कारण ज्ञानशून्य होते हैं, उस समय अदृष्ट विषधर आकर मुझसे लिपट जाते हैं. (४) एत उ त्ये प्रत्यदृश्रन्प्रदोषं तस्करा इव. अदृष्टा विश्वदृष्टाः प्रतिबुद्धा अभूतन.. (५) वे चोरों के समान रात में देखे जाते हैं. वे किसी को दिखाई नहीं देते, पर सारे संसार को देखते रहते हैं. सब लोग उनसे सावधान रहें. (५) द्यौर्वः पिता पृथिवी माता सोमो भ्रातादितिः स्वसा. अदृष्टा विश्वदृष्टास्तिष्ठतेलयता सु कम्.. (६) हे सर्पो! आकाश तुम्हारा पिता, धरती माता, सोम भ्राता और अदिति तुम्हारी बहिन है. तुम्हें कोई नहीं देख पाता, पर तुम सबको देखते हो. तुम अपने स्थान में रहो एवं सुखपूर्वक गमन करो. (६) ये अंस्या ये अङ्ग्याः सूचीका ये प्रकङ्कताः. अदृष्टाः किं चनेह वः सर्वे साकं नि जस्यत.. (७) जो जंतु स्कंध वाले, अंग वाले, सूची वाले एवं अत्यंत विषधारी हैं, ऐसे अदृष्ट विषधरों का यहां कोई काम नहीं है. तुम सब यहां से एक साथ चले जाओ. (७) उत्पुरस्तात्सूर्य एति विश्वदृष्टो अदृष्टहा. अदृष्टान्सर्वाञ्जम्भयन्त्सर्वाश्च यातुधान्यः.. (८) ebook converter DEMO Watermarks*
सारे संसार को देखने वाले एवं अदृष्ट विषधरों को नष्ट करने वाले सूर्य पूर्व दिशा में निकलते हैं. वे सभी अदृष्ट विषधारियों एवं राक्षसों को भयभीत करके भगा देते हैं. (८) उदपप्तदसौ सूर्यः पुरु विश्वानि जूर्वन्. आदित्यः पर्वतेभ्यो विश्वदृष्टो अदृष्टहा.. (९) सारे संसार को देखने वाले एवं अदृष्ट विषधारियों को नष्ट करने वाले सूर्य विषैले जंतुओं को अत्यंत दुर्बल बनाते हुए उदयगिरि से निकलते हैं. (९) सूर्ये विषमा सजामि दृति सुरावतो गृहे. सो चिन्नु न मराति नो वयं मरामारे अस्य योजनं हरिष्ठा मधु त्वा मधुला चकार.. (१०) सुरा बनाने वाला जिस प्रकार चमड़े के पात्र में शराब डालता है, उसी प्रकार मैं विष सूर्य मंडल की ओर फेंकता हूं. जिस प्रकार सूर्य नहीं मरते, उसी प्रकार हम भी न मरें. घोड़ों द्वारा लाए गए सूर्य दूरवर्ती विष को नष्ट कर देते हैं. हे विष! सूर्य की मधुविद्या तुम्हें अमृत बना देती है. (१०) इयत्तिका शकुन्तिका सका जघास ते विषम्. सो चिन्नु न मराति नो वयं मरामारे अस्य योजनं हरिष्ठा मधु त्वा मधुला चकार.. (११) छोटी सी चिड़िया ने तुम्हारा विष खा लिया और नहीं मरी. उसी प्रकार हम भी नहीं मरेंगे. हे विष! घोड़ों द्वारा गमन करने वाले सूर्य दूर से ही विष को नष्ट कर देते हैं. उनकी मधुविद्या तुम्हें अमृत बना देती है. (११) त्रिः सप्त विष्पुलिङ्गका विषस्य पुष्यमक्षन्. ताश्चिन्नु न मरन्ति नो वयं मरामारे अस्य योजनं हरिष्ठा मधु त्वा मधुला चकार.. (१२) अग्नि की सातों जिह्वाओं में सफेद, लाल और काले इस प्रकार मिलकर इक्कीस वर्ण पक्षी के रूप में विष का नाश करते हैं. जब वे नहीं मरते तो हम भी नहीं मरेंगे. अपने घोड़ों द्वारा गमनशील सूर्य दूर रखे विष का नाश करते हैं. हे विष! सूर्य की मधुविद्या तुझे अमृत बना देती है. (१२) नवानां नवतीनां विषस्य रोपुषीणाम्. सर्वासामग्रभं नामारे अस्य योजनं हरिष्ठा मधु त्वा मधुला चकार.. (१३) निन्यानवे नदियां विष नष्ट करने वाली हैं. मैं सबका नाम पुकारता हूं. घोड़ों द्वारा चलने वाले सूर्य दूर रखे विष को भी नष्ट कर देते हैं. हे विष! मधु-विद्या तुझे अमृत बना देगी. (१३) त्रिः सप्त मयूर्यः सप्त स्वसारो अग्रुवः. तास्ते विषं वि जभ्रिर उदकं कुम्भिनीरिव.. (१४)
हे शरीर! जिस प्रकार नारियां घड़ों में जल भरकर ले जाती हैं, उसी प्रकार इक्कीस मयूरियां एवं सात नदियां तुम्हारा विष दूर करें. (१४) इयत्तकः कुषुम्भकस्तकं भिनद्म्यश्मना. ततो विषं प्र वावृते पराचीरनु संवतः.. (१५) हे शरीर! छोटा सा नकुल यदि तुम्हारा विष समाप्त नहीं करेगा तो मैं उसे पत्थर से मार डालूंगा. इस प्रकार विष मेरे शरीर से निकलकर दूर दिशाओं में चला जाए. (१५) कुषुम्भकस्तदब्रवीद्गिरेः प्रवर्तमानकः. वृश्चिकस्यारसं विषम़रसं वृश्चिक ते विषम्.. (१६) पर्वत से आने वाले नकुल ने कहा—“बिच्छू का विष बेकार है.” हे बिच्छू! तुम्हारा विष प्रभावहीन है. (१६)
सूक्त—१ देवता—अग्नि
द्वितीय मंडल सूक्त—१ देवता—अग्नि त्वमग्ने द्युभिस्त्वमाशुशुक्षणिस्त्वमद्भ्यस्त्वमश्मनस्परि. त्वं वनेभ्यस्त्वमोषधीभ्यस्त्वं नृणां नृपते जायसे शुचिः.. (१) हे मनुष्यों के पालक एवं पवित्र अग्नि! तुम यज्ञ के दिन जल, पाषाण, वन एवं ओषधियों से दीप्तिशाली रूप में उत्पन्न हो जाओ. (१) तवाग्ने होत्रं तव पोत्रमृत्वियं तव नेष्ट्रं त्वमग्निदृतायतः. तव प्रशास्त्रं त्वमध्वरीयसि ब्रह्मा चासि गृहपतिश्च नो दमे.. (२) हे अग्नि! यज्ञ के होता, पोता, ऋत्विज् और नेष्टा जो कर्म करते हैं, वह तुम्हारा है. तुम अग्नीध्र हो. यज्ञ की इच्छा करने पर तुम प्रशास्ता का काम भी करने लगते हो. तुम्हीं अध्वर्यु एवं ब्रह्मा हो. मेरे इस यज्ञगृह में तुम्हीं गृहपति हो. (२) त्वमग्न इन्द्रो वृषभः सतामसि त्वं विष्णुरुरुगायो नमस्यः. त्वं ब्रह्मा रयिविद्ब्रह्मणस्पते त्वं विधर्तः सचसे पुरन्ध्या.. (३) हे अग्नि! सज्जनों की मनोकामना पूर्ण करने के कारण तुम इंद्र हो. तुम्हीं बहुत से भक्तों द्वारा स्तुत एवं नमस्कार करने योग्य विष्णु हो. तुम मंत्रों के पालक एवं धनों के ज्ञाता ब्रह्मा हो. तुम विविध पदार्थों का निर्माण करते एवं सबकी बुद्धियों में निवास करते हो. (३) त्वमग्ने राजा वरुणो धृतव्रतस्त्वं मित्रो भवसि दस्म ईड्यः. त्वमर्यमा सत्पतिर्यस्य सम्भुजं त्वमंशो विदथे देव भाजयुः.. (४) हे अग्नि! तुम व्रतधारी राजा वरुण एवं स्तुतियोग्य शत्रुनाशक मित्र हो. तुम्हीं सज्जनों के रक्षक एवं व्यापक दान वाले अर्यमा तथा अंश अर्थात् सूर्य हो. तुम सभी का यज्ञ सफल बनाओ. (४) त्वमग्ने त्वष्टा विधते सुवीर्यं तव ग्नावो मित्रमहः सजात्यम्. त्वमाशुहेमा ररिषे स्वश्व्यं त्वं नरां शर्धो असि पुरूवसुः.. (५) ebook converter DEMO Watermarks*
हे अग्नि! तुम सेवा करने वाले के लिए शक्तिशाली त्वष्टा हो. सब स्तुति वचन तुम्हारे ही हैं. तुम हितकारक तेज एवं हमारे बंधु हो. तुम शीघ्र प्रेरणा देने वाले एवं शोभन अश्वयुक्त धन दाता हो. तुम अत्यंत धनवान् हो. तुम मनुष्यों को शक्ति दो. (५) त्वमग्ने रुद्रो असुरो महो दिवस्त्वं शर्धो मारुतं पृक्ष ईशिषे. त्वं वातैररुणैर्यासि शङ्गयस्त्वं पूषा विधतः पासि नु त्मना.. (६) हे अग्नि! तुम विस्तृत आकाश में वर्तमान रुद्र हो. तुम्हीं मरुतों के बल एवं अन्न के स्वामी हो. तुम वायु के समान वेगशाली लाल घोड़ों द्वारा सुखपूर्वक जाते हो. तुम पूषा हो, इसलिए यज्ञ करने वालों की अपने आप रक्षा करो. (६) त्वमग्ने द्रविणोदा अरङ्कृते त्वं देवः सविता रत्नधा असि. त्वं भगो नृपते वस्व ईशिषे त्वं पायुर्र्दमे यस्तेऽविधत्.. (७) हे अग्नि! तुम पर्याप्त यज्ञकर्म करने वाले यजमान को स्वर्ण देने वाले हो. तुम्हीं रत्न धारण करने वाले तेजस्वी सविता हो. हे मनुष्यों के पालनकर्त्ता अग्नि! जो तुम्हारी सेवा करते हैं, उन्हें तुम धन देते हो. यज्ञशाला में जो यजमान तुम्हारी सेवा करता है, उसका तुम पालन करते हो. (७) त्वामग्ने दम आ विशपतिं विशस्त्वां राजानं सुविदत्रमृञ्जते. त्वं विश्वानि स्वनीक पत्यसे त्वं सहस्राणि शता दश प्रति.. (८) हे अग्नि! तुम यजमानों के पालनकर्त्ता हो. वे तुम्हें अपने घर में प्रकाशमान एवं अनुकूल चेतना वाला पाकर सुशोभित करते हैं. हे उत्तम सेवा वाले एवं समस्त हव्यों के स्वामी अग्नि! तुम हजारों, सैकड़ों और दसियों प्रकार के फल लोगों को देते हो. (८) त्वामग्ने पितरमिष्टिभिर्नरस्त्वां भ्रात्राय शम्या तनूरुचम्. त्वं पुत्रो भवसि यस्तेऽविधत्त्वं सखा सुशेवः पास्याधृषः.. (९) हे अग्नि! तुम्हें पिता समझकर लोग यज्ञ द्वारा तृप्त करते हैं. तुम्हारा भ्रातृप्रेम पाने के लिए लोग यज्ञों द्वारा तुम्हें प्रसन्न करते हैं. जो तुम्हारी सेवा करते हैं, तुम उनके पुत्र, सखा, कल्याणकर्त्ता एवं शत्रुनाशक बनकर उनकी रक्षा करो. (९) त्वमग्न ऋभुराके नमस्य१स्त्वं वाजस्य क्षुमतो राय ईशिषे. त्वं वि भास्यनु दक्षि दावने त्वं विशिक्षुरसि यज्ञमातनिः.. (१०) हे अग्नि! तुम सम्मुख स्तुति करने योग्य ऋभु हो. तुम सर्वत्र प्रसिद्ध धन एवं अन्न के स्वामी हो. तुम उज्ज्वल हो एवं अंधकार मिटाने के लिए लकड़ियों को धीरेधीरे जलाते हो. तुम यज्ञ की विशेष शिक्षा देने वाले एवं फल का विस्तार करने वाले हो. (१०) ebook converter DEMO Watermarks*
त्वमग्ने अदितिर्देव दाशुषे त्वं होत्रा भारती वर्धसे गिरा. त्वमिळा शतहिमासि दक्षसे त्वं वृत्रहा वसुपते सरस्वती.. (११) हे अग्नि देव! तुम हव्यदाता के लिए अदिति हो. तुम होता, भारती एवं स्तुतियों से बढ़ने वाले हो. भारती एवं स्तुतियों से बढ़ने वाले हो. तुम अपरिमित कालों वाली भूमि एवं धनदान करने में समर्थ हो. हे धन के पालक तुम ही वृत्रहंता एवं सरस्वती हो. (११) त्वमग्ने सुभृत उत्तमं वयस्तव स्पार्हं वर्ण आ सन्दृशि श्रियः. त्वां वाजः प्रतरणो बृहन्नसि त्वं रयिर्बहुलो विश्वतस्पृथुः.. (१२) हे अग्नि! भली प्रकार पोषित होकर तुम्हीं उत्तम अन्न हो. तुम्हारे मनोहर वर्ण में लक्ष्मी निवास करती है. तुम अन्न, पाप से रक्षा करने वाले, महान् धनरूप सब वस्तुओं की अधिकता वाले एवं सब ओर विस्तृत हो. (१२) त्वामग्न आदित्यास आस्यं१ त्वां जिह्वां शुचयश्चक्रिरे कवे. त्वां रातिषाचो अध्वरेषु सश्चिरे त्वे देवा हविरदन्त्याहुतम्.. (१३) हे अग्नि! आदित्यों ने तुम्हें सुख दिया है. हे कवि! पवित्र देवों ने तुम्हारी जीभ बनाई है. यज्ञ की हवि के कारण एकत्र देव यज्ञ में तुम्हारी प्रतीक्षा करते हैं एवं दिया हुआ हवि तुम्हारे द्वारा ही भक्षण करते हैं. (१३) त्वे अग्ने विश्वे अमृतासो अद्रुह आसा देवा हविरदन्त्याहुतम्. त्वया मर्तासः स्वदन्त आहुतिं त्वं गर्भो वीरुधां जज्ञिषे शुचिः.. (१४) हे अग्नि! मरणरहित एवं दोषहीन समस्त देव तुम्हारे मुख में डाली गई आहुति के भक्षण के रूप में ही हवि ग्रहण करते हैं. मनुष्य भी तुम्हारी सहायता से ही अन्न का स्वाद लेते हैं. तुम लता, वृक्ष आदि में रहते हो एवं पवित्र होकर जन्म लेते हो. (१४) त्वं तान्र्त्सं च प्रति चासि मज्मनाग्ने सुजात प्र च देव रिच्यसे. पृक्षो यदत्र महिना वि ते भुवदनु द्यावापृथिवी रोदसी उभे.. (१५) हे अग्नि! तुम शक्ति द्वारा उन प्रसिद्ध देवों से मिलते एवं अलग हो जाते हो. हे सुंदर उत्पत्ति वाले अग्नि! तुम बल में सभी देवों से आगे हो जाओ. तुम्हारी ही शक्ति से यज्ञ में डाला गया अन्न शब्द करते हुए धरती और आकाश में फैल जाता है. (१५) ये स्तोतृभ्यो गोअग्रामश्वपेशसमग्ने रातिमुपसृजन्ति सूरयः. अस्माञ्च तांश्च प्र हि नेषि वस्य आ बृहद्वदेम विदथे सुवीराः.. (१६) हे अग्नि! जो लोग बुद्धिमान् स्तोताओं को उत्तम गौ और शक्तिशाली अश्व दान करते हैं, उन्हें तथा हमें उत्तम स्थान पर ले चलो. हम उत्तम वीरों से युक्त होकर यज्ञ में बहुत से मंत्र ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त—२ देवता—अग्नि
बोलेंगे. (१६) सूक्त—२ देवता—अग्नि यज्ञेन वर्धत जातवेदसमग्निं यजध्वं हविषा तना गिरा. समिधानं सुप्रयसं स्वर्णरं द्युक्षं होतारं वृजनेषु धूर्षदम्.. (१) हे ऋत्विजो! सभी उत्पन्न पदार्थों को जानने वाले अग्नि को यज्ञ के द्वारा बढ़ाओ तथा हव्य एवं विस्तृत स्तुतियों द्वारा उनकी पूजा करो. अग्नि प्रज्वलित, शोभन अन्न युक्त, यजमान को स्वर्ग में ले जाने वाले, दीप्त, यज्ञपूर्ण करने वाले एवं बल प्रदान करने वाले हैं. (१) अभि त्वा नक्तीरुषसो ववाशिरेऽग्ने वत्सं न स्वसरेषु धेनव:. दिवइवेदरतिर्मानुषा युगा क्षपो भासि पुरुवार संयतः.. (२) हे अग्नि! गाएं जिस प्रकार दिन में बछड़े की इच्छा करती हैं, उसी प्रकार यजमान तुम्हें रात और दिन चाहते हैं. हे सर्वप्रिय! तुम संयमशील रूप में स्वर्ग में व्याप्त हो, मनुष्यों के यज्ञों में निवास करते हो एवं रात में प्रकाशित होते हो. (२) तं देवा बुध्ने रजसः सुदंससं दिवस्पृथिव्योररतिं न्येरिरे. रथमिव वेद्यं शुक्रशोचिषमग्निं मित्रं न क्षितिषु प्रशंस्यम्.. (३) देवता लोग यज्ञ के मध्य भाग में स्थापित, सुदर्शन, धरती-आकाश के ईश्वर, धनपूर्ण रथ के समान दीप्तवर्ण, मित्र के समान कार्यसाधक एवं प्रशंसित अग्नि की स्तुति करते हैं. (३) तमुक्षमाणं रजसि स्व आ दमे चन्द्रमिव सुरुचं ह्रार आ दधुः. पृश्न्याः पतरं चितयन्तमक्षभिः पाथो न पायुं जनसी उभे अनु.. (४) आकाश की जलवर्षा से धरती को सींचने वाले, स्वर्ण के समान चमकीले, आकाशगामी, अपनी ज्वालाओं से लोगों को चैतन्य करने वाले, जल के समान पालनकर्त्ता, सबके जनक एवं धरती-आकाश को व्याप्त करने वाले अग्नि को जनरहित यज्ञशाला में धारण किया गया है. (४) स होता विश्वं परि भूत्वध्वरं तमु इव्यैर्मनुष ऋञ्जते गिरा. हिरिशिप्रो वृधसानासु जर्भुरद्द्यौर्न स्तृभिश्चैतयद्रोदसी अनु.. (५) वे होम पूर्ण करने वाले अग्नि समस्त यज्ञों को चारों ओर से व्याप्त करें. मनुष्य हव्य और स्तुतियों द्वारा उसी अग्नि को सुशोभित करते हैं. जिस प्रकार तारागण आकाश को प्रकाशित करते हैं, उसी प्रकार दीप्त शिखाओं वाले अग्नि बढ़ती हुई ओषधियों में बार-बार जलकर धरती और आकाश के मध्य भाग को प्रकाशित करते हैं. (५) ebook converter DEMO Watermarks*
स नो रेवत्समिधानः स्वस्तये संददस्वान्रयिमस्मासु दीदिहि. आ नः कृणुष्व सुविताय रोदसी अग्ने हव्या मनुषो देव वीतये.. (६) हे अग्नि! तुम हमारे कल्याण के लिए अविनाशी एवं वृद्धिशील धन देते हुए प्रज्वलित होकर प्रकाश फैलाओ तथा आकाश को हमारे लिए फलदाता बनाओ. तुम मेरे यजमान द्वारा दिया हव्य देवों के भक्षण के लिए ले जाओ. (६) दा नो अग्ने बृहतो दाः सहस्रिणो दुरो न वाजं श्रुत्या अपा वृधि. प्राची द्यावापृथिवी ब्रह्मणा कृधि स्वर्ष्ण शुक्रमुषसो वि दिद्युतुः.. (७) हे अग्नि हमें पर्याप्त गौ, अश्व तथा हजारों पुत्र-पौत्र प्रदान करो. हमारी कीर्ति के लिए अन्न प्राप्ति का द्वार खोलो. हमारे उत्तम यज्ञ के कारण धरती और आकाश को हमारे अनुकूल बनाओ. सूर्य जिस प्रकार संसार को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार उषाएं तुम्हें प्रकाशित करें. (७) स इधान उषसो राम्या अनु स्वर्ष्ण दीदेदरुषेण भानुना. होत्राभिरग्निर्मनुषः स्वध्वरो राजा विशामतिथिश्शारुरायवे.. (८) अग्नि रमणीय उषाकाल में जलते हैं और अपनी उज्ज्वल किरणों से सूर्य के समान चमकते हैं. वे अग्नि होता की यज्ञ साधनरूप स्तुतियों के आधार, उत्तम यज्ञ वाले, प्रजाओं के स्वामी होकर यजमान के पास इस प्रकार आते हैं, जैसे प्यारा अतिथि आता है. (८) एवा नो अग्ने अमृतेषु पूर्व्य धीष्पीपाय बृहद्दिवेषु मानुषा. दुहाना धेनुर्वृजनेषु कारवे त्मना शतिनं पुरुरूपमिषणि.. (९) हे अमितप्रभा युक्त एवं देवों के पूर्ववर्ती अग्नि! मनुष्यों में हमारी स्तुति तुम्हें तृप्त करती है. जिस प्रकार दुधारू गाय यज्ञ के स्तोता को दूध देती है, उसी प्रकार तुम्हारी स्तुति असंख्य धन देती है. (९) वयमग्ने अर्वता वा सुवीर्यं ब्रह्मणा वा चितयेमा जनाँ अति. अस्माकं द्युम्नमधि पञ्च कृष्टिषूच्चा स्वर्ष्ण शुशुचीत दुष्टरम्.. (१०) हे अग्नि! हम तुम्हारे दिए हुए अन्न, अश्व आदि से शोभन सामर्थ्य प्राप्त करके सबसे श्रेष्ठ बन जाएंगे. इससे वह हमारा अनंत धन ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, निषाद पांच जातियों के ऊपर प्रकाशित होगा जो दूसरों को प्राप्त होना कठिन है. (१०) स नो बोधि सहस्य प्रशंस्यो यस्मिन्त्सुजाता इषयन्त सूरयः. यमग्ने यज्ञमुपयन्ति वाजिनो नित्ये तोके दीदिवांसं स्वे दमे.. (११) हे शत्रुपराभवकारी एवं स्तुति के योग्य अग्नि! हमारी महान् स्तुतियों को जानो. शोभन ebook converter DEMO Watermarks*
जन्म वाले स्तोता तुम्हारी स्तुति कर रहे हैं. हे अग्नि! यज्ञशाला में प्रकाशित तुम्हारी पूजा हव्य रूपी अन्न हाथ में धारण करने वाले यजमान अपने पुत्र के निमित्त करते हैं. (११) उभयासो जातवेदः स्याम ते स्तोतारो अग्ने सूरयश्च शर्मणि. वस्वो रायः पुरुश्चन्द्रस्य भूयसः प्रजावतः स्वपत्यस्य शग्धि नः.. (१२) हे जातवेद! तुम्हारे स्तोता और यजमान दोनों ही सुख प्राप्ति के लिए तुम्हारी शरण में हैं. हमें निवास-योग्य अतिशय प्रसन्नतादायक एवं बहुत सी प्रजाओं तथा संतान से युक्त धन दो. (१२) ये स्तोतृभ्यो गोअग्रामश्वपेशसमग्ने रातिमुपसृजन्ति सूरयः. अस्माञ्च तांश्च प्र हि नेषि वस्य आ बृहद्वदेम विदथे सुवीराः.. (१३) हे अग्नि! जो लोग बुद्धिमान् स्तोताओं को उत्तम गौ और शक्तिशाली अन्न दान करते हैं, उन्हें तथा हमें उत्तम स्थान पर ले चलो. हम उत्तम वीरों से युक्त होकर यज्ञ में बहुत से मंत्र बोलेंगे. (१३) सूक्त—३ देवता—अग्नि समिद्धो अग्निर्निहितः पृथिव्यां प्रत्यङ्विश्वानि भुवनान्यस्थात्. होता पावकः प्रदिवः सुमेधा देवो देवान्यजत्वग्निरर्हन्.. (१) वेदी पर रखे हुए प्रज्वलित अग्नि समस्त प्राणियों के सामने स्थित हैं. होम निष्पादक, शुद्धिकर्त्ता, पुराने, शोभन बुद्धि वाले, प्रकाशमान एवं यज्ञ के योग्य अग्नि देवों का आदर करें. (१) नराशंसः प्रति धामान्यञ्जन् तिस्रो दिवः प्रति मह्ना स्वर्चिः. घृतप्रुषा मनसा हव्यमुन्दन्मूर्धन्यज्ञस्य समनक्तु देवान्.. (२) मनुष्यों द्वारा स्तुति के योग्य एवं सुंदर ज्वालाओं वाले अग्नि अपनी महिमा से प्रत्येक यज्ञस्थल एवं तीनों प्रकाशित लोकों को प्रकट करते हैं. वे घी बरसाने की अभिलाषा से हव्य को चिकना करते हुए यज्ञ के उच्च भाग में देवों को तृप्त करें. (२) ईळितो अग्ने मनसा नो अर्हन्देवान्यक्षि मानुषात्पूर्वो अद्य. स आ वह मरुतां शर्धो अच्युतमिन्द्रं नरो बर्हिषदं यजध्वम्.. (३) हे हमारे द्वारा स्तुत अग्नि! हम पर प्रसन्न होकर यज्ञ के योग्य बनो एवं आज मनुष्यों से पहले ही देवों के निमित्त यज्ञ करो. हे ऋत्विजो! मरुतों की शक्ति से युक्त अच्युत इंद्र को बुलाओ एवं कुश पर स्थित इंद्र को लक्ष्य करके हवन करो. (३)
देव बर्हिर्वर्धमानं सुवीरं स्तीर्णं राये सुभरं वेद्यस्याम्. घृतेनाक्तं वसवः सीदतेदं विश्वे देवा आदित्या यज्ञियासः.. (४) हे कुशरूप, तेजस्वी, नित्य बढ़ने वाले एवं वीर पुत्रदाता अग्नि! हमें धन देने के लिए वेदी पर फैल जाओ! हे वसुओ, विश्वेदेव एवं यज्ञ के योग्य आदित्यो! तुम घी से गीले किए गए कुश पर बैठो. (४) वि श्रयन्तामुर्विया हूयमाना द्वारो देवीः सुप्रायणा नमोभिः. व्यचस्वतीर्वि प्रथन्तामजुर्या वर्णं पुनाना यशसं सुवीरम्.. (५) हे प्रकाशित-द्वार रूप, विस्तृत मनुष्यों द्वारा नमस्कारयुक्त स्तुतियों से हवन किए जाते हुए तथा लोगों द्वारा सरलता से प्राप्त करने योग्य अग्नि! तुम खुल जाओ. तुम व्यापक, अविनाशी तथा यजमान के लिए शोभन पुत्र वाला रूप धारण करते हुए विशेष रूप से प्रसिद्ध बनो. (५) साध्वपांसि सनता न उक्षिते उषासानक्ता वय्येव रण्विते. तन्तुं ततं संवयन्ती समीची यज्ञस्य पेशः सुदुघे पयस्वती.. (६) हमें उत्तम फल देने वाली दिन एवं रात रूप अग्नि ऐसी दो कुशल नारियों के समान हैं जो कपड़ा बुनने में कुशल हैं. बुनने वाली नारियां जिस प्रकार खड़े होकर धागों को बुनती हैं, उसी प्रकार रात व दिन यज्ञ को पूरा करते हैं. वे जल से युक्त एवं फलदाता हैं. (६) दैव्या होतारा प्रथमा विदुष्टर ऋजु यक्षतः समूचा वपुष्टरा. देवान्यजन्तावृतुथा समज्जतो नाभा पृथिव्या अधि सानुषु त्रिषु.. (७) सबसे अधिक विद्वान्, विशाल शरीर वाले अग्नि रूपी दो सुंदर होता पहले से ही यज्ञ के योग्य होकर मंत्र द्वारा देवों की पूजा एवं यज्ञ करते हैं. वे पृथ्वी की नाभि के समान वेदी के मध्य भाग में ऋतु के अनुसार गार्हपत्य आदि अग्नियों में मिल जाते हैं. (७) सरस्वती साधयन्ती धियं न इळा देवी भारती विश्वतूर्तिः. तिस्रो देवीः स्वधया बर्हिरदमच्छिद्रं पान्तु शरणं निषद्य.. (८) हमारे यज्ञ को पूर्ण करने वाली सरस्वती, इला और सर्वत्र व्यापक भारती—ये तीनों देवियां यज्ञशाला में निवास करें एवं हव्य पाने के लिए हमारे यज्ञ का निर्दोष रूप से पालन करें. (८) पिशङ्गरूपः सुभरो वयोधाः श्रुष्टी वीरो जायते देवकामः. प्रजां त्वष्टा वि ष्यतु नाभिमस्मे अथा देवानामप्येतु पाथः.. (९) त्वष्टा की कृपा से हमारे घर में स्वर्ण के समान उज्ज्वल रंग वाला, शोभन यज्ञकर्त्ता, ebook converter DEMO Watermarks*
अन्नदाता, उन्नत गुणों वाला, वीर तथा देवों को चाहने वाला पुत्र जन्म ले. वह हमें कुल की रक्षा करने वाली संतान दे एवं हमारा अन्न देवों के पास जाए. (९) वनस्पतिरवसृजन्नुप स्थादग्निर्हविः सूदयति प्र धीभिः. त्रिधा समक्तं नयतु प्रजानन्देवेभ्यो दैव्यः शमितोप हव्यम्.. (१०) हमारे कर्मों को जानने वाले वनस्पति रूप अग्नि समीप उपस्थित हैं. वे विशेष प्रकार के कर्मों से हव्य को ठीक से पकाते हैं. शमिता नामक दिव्य अग्नि हव्य को तीन प्रकार से भली- भांति शुद्ध जानकर देवों के समीप ले जावें. (१०) घृतं मिमिक्षे घृतमस्य योनिर्घृते श्रितो घृतम्वस्य धाम. अनुष्वधमा वह मादयस्व स्वाहाकृतं वृषभ वक्षि हव्यम्.. (११) मैं अग्नि की जन्मभूमि, वासस्थल एवं आश्रयदाता काष्ठ को अग्नि में डालता हूं. हे कामवर्षी अग्नि! हव्य देने के समय देवों को बुलाकर प्रसन्न करो तथा स्वाहा के रूप में डाला गया हव्य धारण करो. (११) सूक्त—४ देवता—अग्नि हुवे वः सुद्योत्मानं सुवृक्तिं विशामग्निमतिथिं सुप्रयसम्. मित्रइव यो दिधिषाय्यो भूद्देव आदेवे जने जातवेदाः.. (१) हे यजमानो! मैं तुम्हारे कल्याण के निमित्त अत्यंत तेजस्वी, पापरहित, यजमानों के अतिथि एवं शोभन हवि वाले अग्नि को बुलाता हूं. जातवेद अग्नि मनुष्यों से लेकर देवों तक सब प्राणियों को मित्र के समान धारण करते हैं. (१) इमं विधन्तो अपां सधस्थे द्वितादधुर्भृगवो विश्वा३योः. एष विश्वान्यभ्यस्तु भूमा देवानाम्ग्निररतिर्जीराश्वः.. (२) अग्नि की सेवा करने वाले भृगुओं ने अग्नि को जल के निवासस्थान अंतरिक्ष में एवं मानवों की संतान के बीच धारण किया. शीघ्रगामी अश्वों वाले एवं देवों के ईश्वर अग्नि हमारे सभी शत्रुओं को हरावें. (२) अग्निं देवासो मानुषीषु विक्षु प्रियं धुः क्षेष्यन्तो न मित्रम्. स दीदयदुशतीरूर्य्या आ दक्षाय्यो यो दास्वते दम आ.. (३) देवों ने स्वर्ग को जाते समय अपने प्रिय अग्नि को मनुष्यों के बीच मित्र के रूप में स्थित किया था. वे अग्नि हव्यदाता यजमान के घर में देवों द्वारा स्थापित होकर उसके कल्याण के लिए अपनी प्रिय रातों में प्रकाशयुक्त होते रहते हैं. (३) ebook converter DEMO Watermarks*
अस्य रण्वा स्वस्येव पुष्टिः सन्दृष्टिरस्य हियानस्य दक्षोः. वि यो भरिभ्रदोषधीषु जिह्वामर्त्यो न रथ्यो दोधवीति वारान्.. (४) अपने शरीर को पुष्ट करने के समान अग्नि के शरीर का पोषण एवं लकड़ियों को जलाने के इच्छुक अग्नि का प्रकट होना भी बहुत सुंदर जान पड़ता है. रथ में जुता हुआ घोड़ा मक्खियां उड़ाने के लिए जिस प्रकार बार-बार पूंछ हिलाता है, उसी प्रकार अग्नि अपनी लपटों रूपी जीभ को फेरते हैं. (४) आ यन्मे अभ्वं वनदः पनन्तोशिग्भ्यो नामिमीत वर्णम्. स चित्रेण चिकिते रंसु भासा जुजुर्वाँ यो मुहुरा युवा भूत्.. (५) मेरे स्तोता अग्नि के महत्त्व की स्तुति करते हैं. वे मेरे रूप की कामना करने वाले ऋत्विजों को अपना रंग दिखाते हैं. वे रमणीय हव्य के निमित्त विचित्र दीप्ति से पहचाने जाते हैं एवं बूढ़े होकर भी बार-बार जवान बन जाते हैं. (५) आ यो वना तातृषाणो न भाति वार्ण पथा रथ्येव स्वानीत्. कृष्णाध्वा तपू रण्वश्चिकेत द्यौरिव स्मयमानो नभोभिः.. (६) अग्नि प्यासे के समान वृक्षों को जलाते हैं, जल के समान इधर-उधर जाते हैं तथा घोड़े के समान शब्द करते हैं. अग्नि का मार्ग काला है और वे ताप देने वाले हैं. फिर भी वे तारों भरे आकाश के समान शोभा पाते हैं. (६) स यो व्यस्थादभि दक्षदुर्वी पशुर्नैति स्वयुरगोपाः. अग्निः शोचिष्माँ अतसान्युष्णन्कृष्णव्यथिरस्वदयन्न भूम.. (७) जो अग्नि अनेक प्रकार से धरती पर स्थित हैं, विस्तृत धरती के सामने बढ़ते हैं एवं बिना रखवाले वाले पशु की तरह अपनी इच्छा से इधर-उधर जाते हैं, वे तेजस्वी अग्नि गीले वृक्षों को जलाते हुए, कांटों को भस्म करते हुए सब वस्तुओं का भली प्रकार से स्वाद लेते हैं. (७) नू ते पूर्वस्यावसो अधीतो तृतीये विदथे मन्म शंसि. अस्मे अग्ने संयद्वीरं बृहन्तं क्षुमन्तं वाजं स्वपत्यं रयिं दाः.. (८) हे अग्नि! तुमने पहले सवन में हमारी जो रक्षा की थी, उसे स्मरण करके हम तीसरे सवन में मनोहर स्तुतियां बोल रहे हैं. हे अग्नि! तुम हमें महान् वीरों, विशाल कीर्ति एवं सुंदर संतान से युक्त धन दो. (८) त्वया यथा गृत्समदासो अग्ने गुहा वन्वन्त उपरां अभि ष्युः. सुवीरासो अभिमातिषाहः स्मत्सूरिभ्यो गृणते तद्द्यो धाः.. (९) ebook converter DEMO Watermarks*
हे अग्नि! गृत्समद के वंश में उत्पन्न ऋषि तुम्हारे द्वारा सुरक्षित होकर जिस तरह गुहा में छिपे धनों पर अधिकार कर सके एवं उत्तम संतान पाकर शत्रुओं का सामना कर सके, उसी तरह कृपा करो. तुम बुद्धिमान् एवं स्तुतिकर्त्ता यजमानों को बहुत धन प्रदान करो. (९) सूक्त—५ देवता—अग्नि होताजनिष्ट चेतनः पिता पितृभ्य ऊतये. प्रत्यक्षज्जेन्यं वसु शकेम वाजिनो यमम्.. (१) होता, चेतना प्रदान करने वाले और पालक अग्नि पितरों की रक्षा के लिए उत्पन्न हुए हैं. हम हव्य से युक्त होकर ऐसा धन प्राप्त कर सकेंगे जो अत्यंत पूज्य एवं जीतने योग्य हो. (१) आ यस्मिन्सप्त रश्मयस्तता यज्ञस्य नेतरि. मनुष्यद्दैव्यमष्टमं पोता विश्वं तदिन्वति.. (२) यज्ञ-निर्वाहक अग्नि में सात रश्मियां व्याप्त हैं. वे देवों के पालक अग्नि, मनुष्यों के पालक ऋत्विज् के समान यज्ञ के आठवें स्थान में बैठते हैं. (२) दधन्वे वा यदीमनु वोचद्ब्रह्माणि वेरु तत्. परि विश्वानि काव्या नेमिश्चक्रमिवाभवत्.. (३) यज्ञ में हवि धारण करता हुआ अध्वर्यु जो मंत्र बोलता है अथवा बुद्धिमान् ऋत्विज् जो भी कर्म करता है, उन्हें अग्नि उसी प्रकार धारण करते हैं, जिस प्रकार पहिए को नाभि धारण करती है. (३) साकं हि शुचिना शुचिः प्रशास्ता क्रतुनाजनि. विद्वाँ अस्य व्रता ध्रुवा वयाइवानु रोहते.. (४) शुद्ध प्रशास्ता नामक अग्नि शुद्ध यज्ञ के ही साथ उत्पन्न हुए थे. जिस प्रकार पक्षी फल पाने के लिए एक शाखा से दूसरी शाखा पर जाता है, उसी प्रकार यजमान अग्नि संबंधी यज्ञों को निश्चित फलदायक जानकर बार-बार करता है. (४) ता अस्य वर्णमायुवो नेष्टुःसचन्त धेनवः. कुवित्तिसृभ्य आ वरं स्वसारो या इदं ययुः.. (५) यज्ञकर्म करने वाली उंगलियां गायों के समान नेष्टा नामक अग्नि की सेवा करती हैं. वे ही अग्नि के गार्हपत्य आदि तीन रूपों की भी सेवा करती हैं. (५) यदी मातुरुप स्वसा घृतं भरन्त्यस्थित. तासामध्वर्युरागतौ यवो वृष्टीव मोदते.. (६) ebook converter DEMO Watermarks*
जिस समय माता रूप वेदी के समीप भगिनी के समान जुहू नामक पात्र घी से भरकर रखा जाता है, उस समय अध्वर्युस्वरूप अग्नि उसी प्रकार प्रसन्न होते हैं, जैसे वर्षा होने पर जौ हरे-भरे हो जाते हैं. (६) स्वः स्वाय धायसे कृणुतामृत्विगृत्विजम्. स्तोमं यज्ञं चादरं वनेमा ररिमा वयम्.. (७) ऋत्विज् रूप अग्नि अपना कर्म समझकर ऋत्विज् का काम करते हैं. हम भी अग्नि की ही कृपा से स्तुतियां, यज्ञ और हव्य पर्याप्त मात्रा में देते हैं. (७) यथा विद्वाँ अरंकरद्विश्वेभ्यो यजतेभ्यः. अयमग्ने त्वे अपि यं यज्ञं चकृमा वयम्.. (८) हे अग्नि! ऐसी कृपा करो कि तुम्हारा महत्त्व जानने वाला यजमान सभी देवों को प्रसन्न कर सके. हे अग्नि! हम जिस यज्ञ को करेंगे, वह तुम्हारा ही होगा. (८) सूक्त—६ देवता—अग्नि इमां मे अग्ने समिधमिमामुपसदं वनेः. इमा उ षु शृधी गिरः.. (१) हे अग्नि! यज्ञ में दी गई मेरी समिधा तथा आहुति का उपभोग करो एवं मेरी स्तुतियां सुनो. (१) अया ते अग्ने विधेमोजो नपादश्वमिष्टे. एना सूक्तेन सुजात.. (२) हे अग्नि! इस आहुति के द्वारा हम तुम्हारी सेवा करेंगे. हे बल के नाती, विस्तृत यज्ञ के स्वामी एवं सुंदर जन्म वाले अग्नि! इस सुंदर स्तुति द्वारा हम तुम्हें प्रसन्न करेंगे. (२) तं त्वा गीर्भिर्गिर्वणसं द्रविणस्युं द्रविणोदः. सपर्यैम सपर्यवः.. (३) हे धनदाता, स्तुति योग्य एवं हवि के अभिलाषी अग्नि! हम तुम्हारे सेवक बनकर स्तुतियों द्वारा तुम्हें प्रसन्न करेंगे. (३) स बोधि सूरिर्मघवा वसुपते वसुदावन्. युयोध्य१स्मद् द्वेषांसि.. (४) हे धनस्वामी, विद्वान् एवं धनदाता अग्नि! हमारी स्तुति जानकर हमारे शत्रुओं को भगाओ. (४) स नो वृष्टिं दिवस्परि स नो वाजमनर्वाणम्. स नः सहस्रिणीरिषः.. (५) वे ही अग्नि हमारे कल्याण के लिए आकाश से वर्षा करते हैं एवं पर्याप्त बल तथा हजारों प्रकार के अन्न देते हैं. (५) ebook converter DEMO Watermarks*