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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

आ पञ्चाशता सुरथेभिरिन्द्रा षष्ट्या सप्तत्या सोमपेयम्.. (५) हे इंद्र! सोमपान के लिए उत्तम गति वाले बीस, तीस, चालीस, पचास, साठ अथवा सत्तर घोड़ों द्वारा हमारे सामने आओ. (५) अशीत्या नवत्या याह्यर्वाङा शतेन हरिभिरुह्यमान:. अयं हि ते शुनहोत्रेषु सोम इन्द्र त्वाया परिषिक्तो मदाय.. (६) हे इंद्र! अस्सी, नब्बे एवं सौ हरि नामक अश्वों द्वारा चलकर हमारे सामने आओ. शुनहोत्र नामक पात्रों में तुम्हारे आनंद के लिए सोम रखा हुआ है. (६) मम ब्रह्मेन्द्र याह्यच्छा विश्वा हरी धुरि धिष्वा रथस्य. पुरुत्रा हि विहव्यो बभूथास्मिञ्छूर सवने मादयस्व.. (७) हे इंद्र! मेरी स्तुति को लक्षित करके आओ एवं अपने विश्वव्यापी हरि नामक घोड़ों को रथ के आगे जोड़ो. हे शूर! तुम्हें बहुत से यजमान बुलाते हैं. तुम इस यज्ञ में आकर प्रसन्न बनो. (७) न म इन्द्रेण सख्यं वि योषदस्मभ्यमस्य दक्षिणा दुहीत. उप ज्येष्ठे वरूथे गभस्तौ प्रायेप्राये जिगीवांसः स्याम.. (८) इंद्र से मेरी मित्रता कभी न टूटे. इंद्र की दक्षिणा मुझे मनचाहा फल दे. हम इंद्र के विपत्तिनाशक उत्तम बाहुओं के समीप स्थित हैं. हम प्रत्येक युद्ध में विजय पावें. (८) नूनं सा ते प्रति वरं जरित्रे दुहीयदिन्द्र दक्षिणा मघोनी. शिक्षा स्तोतृभ्यो माति धग्भगो नो बृहद्वदेम विदथे सुवीराः.. (९) हे इंद्र! तुम्हारी जो धनयुक्त दक्षिणा स्तुतिकर्त्ता की अभिलाषा पूर्ण करती है, वह हमें प्राप्त हो. हे सेवनीय इंद्र! हम स्तोताओं को छोड़कर वह दक्षिणा अन्य किसी को मत देना. हम उत्तम पुत्र-पौत्रादि प्राप्त करके इस यज्ञ में तुम्हारी बहुत स्तुति करेंगे. (९) सूक्त—१९ देवता—इंद्र अपाय्यस्यान्धसो मदाय मनीषिणः सुवानस्य प्रयसः. यस्मिन्निन्द्रः प्रदिवि वावृधान ओको दधे ब्रह्मण्यन्तश्च नरः.. (१) इंद्र अपने आनंद के लिए सोमरस निचोड़ने वाले मेधावी यजमान का अन्न भक्षण करें. इस सोमरूपी प्राचीन अन्न में इंद्र बढ़ते हुए निवास करते हैं. इंद्र की स्तुति के इच्छुक ऋत्विज् भी इसी में निवास करते हैं. (१) ebook converter DEMO Watermarks*

अस्य मन्दानो मध्वो वज्रहस्तोऽहिमिन्द्रो अर्णोवृतं वि वृश्चत्. प्र यद्द्वयो न स्वसराण्यच्छा प्रयांसि च नदीनां चक्रमन्त.. (२) इस मदकारक सोमरस के नशे में मग्न होकर इंद्र ने अपने हाथों में वज्र उठाया एवं जल को रोकने वाले अहि नामक असुर को छिन्नभिन्न कर दिया. उस समय जलराशि सागर की ओर इस प्रकार तेजी से जा रही थी, जिस प्रकार प्यासे पक्षी तालाब की ओर जाते हैं. (२) स माहिन इन्द्रो अर्णो अपां प्रैरयदहिहाच्छा समुद्रम्. अजनयत्सूर्यं विदद्गा अक्तुनाह्नां वयुनानि साधत्.. (३) उन पूजनीय एवं अहिनाशक इंद्र ने जल प्रवाह को सागर की ओर प्रेरित किया. उन्होंने सूर्य को उत्पन्न करके गायों को खोजा तथा अपने तेज से दिवसों को प्रकाशित बनाया. (३) सो अप्रतीनि मनवे पुरूणीन्द्रो दाशद्दाशुषे हन्ति वृत्रम्. सद्यो यो नृभ्यो अतसाय्यो भूतस्पृधानेभ्यः सूर्यस्य सातौ.. (४) इंद्र ने हव्य देने वाले यजमान को असंख्य उत्तम धन दिया तथा वृत्र नामक असुर को मार डाला. सूर्य को प्राप्त करने के लिए जब स्तोताओं में परस्पर स्पर्धा हुई तो इंद्र ने उसका कारण बनकर सबको सहारा दिया. (४) स सुन्वत इन्द्रः सूर्यमा देवो रिणङ्मर्त्याय स्तवान्. आ यद्द्रियं गुहदवद्यमस्मै भरदंशं नैतशो दशस्यन्.. (५) स्तुति करने पर इंद्र ने सोम निचोड़ने वाले एतश नामक व्यक्ति के लिए सूर्य को प्रकाशित किया था. जिस प्रकार पिता अपना भाग पुत्र को देता है, उसी प्रकार एतश ने इंद्र को गुप्त एवं अमूल्य सोमरूपी धन दिया था. (५) स रन्धयत्सदिवाः सारथये शुष्णमशुषं कुयवं कुत्साय. दिवोदासाय नवतिं च नवेन्द्रः पुरो व्यैरञ्छम्बरस्य.. (६) तेजस्वी इंद्र ने अपने सारथि कुत्स के कल्याण के लिए शुष्ण, अशुष और कुयव को वश में किया था तथा दिवोदास का पक्ष लेकर शंबर असुर के निन्यानवे नगरों को तोड़ा था. (६) एवा त इन्द्रोचथमहेम श्रवस्या न त्मना वाजयन्तः. अश्याम तत्साप्तमाशुषाणा ननमो वधरदेवस्य पीयोः.. (७) हे इंद्र! हम तुम्हें शक्तिशाली बनाकर अन्नप्राप्ति की इच्छा से तुम्हारी स्तुति करते हैं. हम तुम्हें प्राप्त करके तुम्हारी मित्रता पावें. तुम देव-विरोधी पीयु असुर के नाश के लिए वज्र चलाओ. (७) eBook converter DEMO Watermarks*

एवा ते गृत्समदाः शूर मन्मावस्यवो न वयुनानि तक्षुः. ब्रह्म॑ण्यन्त इन्द्र ते नवीय इषमूर्जं सुक्षितिं सुम्नमश्युः.. (८) हे शूर इंद्र! गृत्समद ऋषि उसी प्रकार तुम्हारी स्तुति करता है, जिस प्रकार जाने का इच्छुक पथिक रास्ता साफ करता है. हे नवीनतम इंद्र! तुम्हारी स्तुति के अभिलाषी हम अन्न, बल, सुख एवं उत्तम निवासस्थान प्राप्त करें. (८) नूनं सा ते प्रति वरं जरित्रे दुहीयदिन्द्र दक्षिणा मघोनी. शिक्षा स्तोतृभ्यो माति धग्भगो नो बृहद्वदेम विदथे सुवीराः.. (९) हे इंद्र! तुम्हारी जो धनयुक्त दक्षिणा स्तुतिकर्त्ता की कामना पूरी करती है, वह दक्षिणा हमें प्राप्त हो. हे भजनीय इंद्र! हमें छोड़कर वह दक्षिणा किसी अन्य को मत देना. हम उत्तम पुत्र-चोत्रादि प्राप्त करके इस यज्ञ में तुम्हारी पर्याप्त स्तुति करेंगे. (९) सूक्त—२० देवता—इंद्र वयं ते वय इन्द्र विद्धि षु णः प्र भरामहे वाजयुर्न रथम्. विपन्यवो दीध्यतो मनीषा सुम्नमियक्षन्तस्तवावतो नॄन्.. (१) हे इंद्र! जिस प्रकार अन्न का इच्छुक व्यक्ति गाड़ी बनाता है, उसी प्रकार हम तुम्हारे लिए सोमरस पर्याप्त मात्रा में तैयार करते हैं. तुम हमें भली प्रकार जानते हो. हम अपनी स्तुतियों से तुम्हें दीप्यमान करते हैं एवं सुख की याचना करते हैं. (१) त्वं न इन्द्र त्वाभिरूती त्वायतो अभिष्टिपासि जनान्. त्वमिनो दाशुषो वरूतेत्थाधीरभि यो नक्षति त्वा.. (२) हे इंद्र! हमारा पालन एवं रक्षण करो. जो लोग तुम्हारे प्रति श्रद्धा रखते हैं, तुम उन्हें शत्रुओं से बचाते हो. जो व्यक्ति हव्य देकर तुम्हारी सेवा करता है, उसके कल्याण के लिए तुम सब कुछ करते हो. (२) स नो युवेन्द्रो जोहूत्रः सखा शिवो नरामस्तु पाता. यः शंसन्तं यः शशमानमूती पचन्तं च स्तुवन्तं च प्रणे षत्.. (३) युवा, आह्वान करने योग्य, मित्रतुल्य एवं सुखकारक इंद्र हम यज्ञकर्त्ताओं की रक्षा करें. इंद्र स्तुति बोलने वाले, हव्य पकाने वाले, स्तुतिरचना करने वाले एवं यज्ञक्रियाओं को पूर्ण करने वाले व्यक्तियों की रक्षा करके इनका यज्ञ पूर्ण करते हैं. (३) तमु स्तुष इन्द्रं तं गृणीषे यस्मिन्पुरा वावृधुः शाशदुश्च. स वस्वः कामं पीपरदियानो ब्रह्म॑ण्यतो नूतनस्यायोः.. (४) ebook converter DEMO Watermarks*

मैं इंद्र की स्तुति एवं प्रशंसा करता हूं. पूर्वकाल में उनके स्तोताओं ने वृद्धि प्राप्त की एवं अपने शत्रुओं का नाश किया. यदि नया यजमान इंद्र के समीप जाकर प्रार्थना करता है तो वे उसकी धन की इच्छा पूरी करते हैं. (४) सो अङ्गि॑रसा॒मुच॑था जुजु॒ष्वान्न॒ब्रह्मा तूतो॒दिन्द्रो॑ गा॒तुमि॑ष्णन्. मु॒ष्णन्नु॒षसः॒ सूर्ये॑ण॒ स्तवा॑न॒श्रस्य॑ चिच्छिथ्रथ॒त्पूर्व्या॑णि.. (५) अंगिरागोत्रीय ऋषियों के मंत्रों से प्रसन्न होकर इंद्र ने उन्हें वह मार्ग दिखाया, जिससे वे पणियों द्वारा छिपाई हुई गाएं ला सकें. इंद्र ने उनकी स्तुति सफल की. स्तोताओं की स्तुति सुनकर इंद्र ने सूर्य द्वारा उषा का हरण किया एवं अश्व के पुराने नगरों को नष्ट कर डाला. (५) स ह श्रुत इन्द्रो नाम देव ऊर्ध्वो भुवनन्मनुषे दस्मतमः. अव प्रियमर्शसानस्य साह्नाञ्छिरो भरद्दासस्य स्वधावान्.. (६) प्रकाशमान, कीर्तिशाली एवं परम सुंदर इंद्र अपने सेवक की कामना पूर्ण करने के लिए सदा तैयार रहते हैं. शत्रुनाशक एवं शक्तिशाली इंद्र ने संसार के अनिष्टकारी दास का मस्तक काटकर नीचे डाल दिया. (६) स वृत्रहेन्द्रः कृष्णयोनीः पुरन्दरो दासीरैरयद्वि. अजनयन्मनवे क्षामपश्च सत्रा शंसं यजमानस्य तूतोत्.. (७) वृत्रहंता एवं पुरंदर इंद्र ने नीच जाति वाले दासों की सेना को नष्ट किया था. मनु के लिए धरती और जल की रचना करने वाले इंद्र यजमान की महती अभिलाषा को पूर्ण करें. (७) तस्मै तवस्य१ मनु दायि सत्रेन्द्राय देवेभिरर्णसातौ. प्रति यदस्य वज्रं बाह्वोर्धुर्हत्वी दस्यून्पुर आयसीर्नि तारीत्.. (८) दानशील स्तोताओं ने जल पाने की इच्छा से इंद्र के लिए सदा शक्ति बढ़ाने वाला अन्न प्रदान किया है. जब इंद्र के हाथों में वज्र रखा गया, तब उन्होंने शत्रुओं की लौह निर्मित नगरी को पूरी तरह नष्ट कर दिया. (८) नूनं सा ते प्रति वरं जरित्रे दुहीयदिन्द्र दक्षिणा मघोनी. शिक्षा स्तेतृभ्यो माति धग्भगो नो बृहद्वदेम विदथे सुवीराः.. (९) हे इंद्र! तुम्हारी जो धनयुक्त दक्षिणा स्तुतिकर्त्ता की अभिलाषा पूरी करती है, वह हमें प्राप्त हो. हे भजनीय इंद्र! हमारे अतिरिक्त वह किसी अन्य को मत देना. हम उत्तम पुत्र-पौत्र प्राप्त करके इस यज्ञ में तुम्हारी स्तुति करेंगे. (९) सूक्त—२१ देवता—इंद्र ebook converter DEMO Watermarks*

विश्वजिते धनजिते स्वर्जिते सत्राजिते नृजित उर्वराजिते. अश्वजिते गोजिते अब्जिते भरेन्द्राय सोमं यजताय हर्यतम्.. (१) हे अध्वर्युजनो! सर्वजयी, धनजयी, स्वर्गविजयी, मनुष्यविजयी, उपजाऊ भूमि को जोतने वाले, अश्वजयी, गोजयी, जलविजयी एवं यज्ञ के योग्य इंद्र के निमित्त अभिलषित सोमरस लाओ. (१) अभिभुवेऽभिभङ्गाय वन्वतेऽषाळ्हाय सहमानाय वेधसे. तुविग्रये वह्नये दुष्टरीतवे सत्रासाहे नम इन्द्राय वोचत.. (२) सबको हराने वाले, सबका अंग-भंग करने वाले, भोक्ता, अजेय, सब कुछ सहन करने वाले, सबके निर्माता, पूर्ण ग्रीवा वाले, सबको वहन करने वाले, शत्रुओं के लिए दुस्तर एवं सदा शत्रुपराभवकारी इंद्र के लिए नमः शब्द का उच्चारण करते हुए स्तुतियां बोलो. (२) सत्रासाहो जनभक्षो जनसहश्च्यवनो युध्मो अनु जोषमुक्षितः. वृतंचयः सहुरिर्विश्ववारित इन्द्रस्य वोचं प्र कृतानि वीर्या.. (३) बहुतों को हराने वाले, मनुष्यों द्वारा सेवनीय, बलवान् लोगों को जीतने वाले, शत्रुओं को स्थान च्युत करने वाले योद्धा, सोम से सिंचित होने के कारण प्रसन्न, शत्रुनाशक, शत्रुओं को पराजित करने वाले एवं प्रजापालनकर्त्ता इंद्र के वीर कर्मों को बार-बार कहो. (३) अनानुदो वृषभो दोधतो वधो गम्भीर ऋष्वो असमष्टकाव्यः. रध्रचोदः श्नथनो वीळितस्पूथुरिन्द्रः सुयज्ञ उषसः स्वर्जनत्.. (४) अद्वितीय दानदाता, अभिलाषा पूर्ण करने वाले, हिंसकों के वधकर्त्ता, गंभीर, दर्शनीय, सर्वाधिक कर्मठ, समृद्ध जनों के प्रेरक, शत्रुओं को काटने वाले, दृढ़ शरीर वाले, विश्वव्याप्त, तेजयुक्त एवं शोभनकर्म करने वाले इंद्र ने उषा से सूर्य को उत्पन्न किया. (४) यज्ञेन गातुमप्तुरो विविद्रिरे धियो हिन्वाना उशिजो मनीषिणः. अभिश्वरा निष्षदा गा अवस्यव इन्द्रे हिन्वाना द्रविणान्याशत.. (५) इंद्र की स्तुतियां करने वाले एवं इंद्र के अभिलाषी मनीषी अंगिरागोत्रियों ने जल को प्रेरणा देने वाले इंद्र से यज्ञ के द्वारा चुराई हुई गायों का मार्ग जाना. इसके पश्चात् इंद्र के द्वारा रक्षा प्राप्त करने के इच्छुक स्तोताओं ने स्तोत्रों एवं यज्ञों द्वारा गोरूप धन प्राप्त किया. (५) इन्द्र श्रेष्ठानि द्रविणानि धेहि चित्तिं दक्षस्य सुभगत्वमस्मे. पोषं रयीणामरिष्टिं तनूनां स्वाद्मानं वाचः सुदिनत्वमह्नाम्.. (६) हे इंद्र! हमें श्रेष्ठ धन, कुशलता की ख्याति एवं सौभाग्य प्रदान करो. तुम हमारे धन की वृद्धि एवं शरीर की पुष्टि करके वचनों को मधुर एवं दिवसों को शोभन बनाओ. (६) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—२२ देवता—इंद्र

सूक्त—२२ देवता—इंद्र त्रिकद्रुकेषु महिषो यवाशिरं तुविशुष्मस्तृपत्सोममपिबद्विष्णुना सुतं यथावशत्. स ईं ममाद महि कर्म कर्तवे महामुरुं सैनं सश्चद्देवो देवं सत्यमिन्द्रं सत्य इन्दुः.. (१) पूज्य, परम शक्तिशाली एवं सबको तृप्त करने वाले इंद्र ने पूर्वकाल में की हुई कामना के अनुसार जौ के सत्तुओं से मिला हुआ सोमरस विष्णु के साथ पिया. महान् सोमरस ने इंद्र को महान् कर्म करने की प्रेरणा दी. सत्य एवं दीप्त सोमरस सच्चे एवं दीप्त इंद्र को व्याप्त करे. (१) अध त्विषीमाँ अभ्योजसा क्रिविं युधाभवदा रोदसी अपृणदस्य मज्मना प्रवावृधे. अधत्तान्यं जठरे प्रेमरिरिच्यत सैनं सश्चद्देवो देवं सत्यमिन्द्रं सत्य इन्तुः.. (२) इंद्र ने अपने बल से किवि असुर को युद्ध के द्वारा पराजित एवं धरती-आकाश को चारों ओर से पूर्ण किया. इंद्र पिए हुए सोमरस के बल से वृद्धि प्राप्त करते हैं. इंद्र ने आधा सोम अपने पेट में रख लिया और आधा अन्य देवों में बांट दिया. सत्य एवं दीप्त सोमरस सच्चे तथा दीप्त इंद्र को व्याप्त करे. (२) साकं जात: क्रतुना साकमोजसा ववक्षिथ साकं वृद्धो वीर्यैः सासहिर्मृधो विचर्षणिः. दाता राधः स्तुवते काम्यं वसु सैनं सश्चद्देवो देवं सत्यमिन्द्रं सत्य इन्दुः.. (३) हे इंद्र! तुम यज्ञ के साथ उत्पन्न हुए हो एवं अपनी शक्ति से विश्व को वहन करना चाहते हो. तुमने वीर कर्मों से वृद्धि प्राप्त करके हिंसकों को हराया एवं भले-बुरे का विचार किया. तुम स्तुतिकर्त्ता को मनोवांछित धन दो. सत्य एवं दीप्त सोमरस सच्चे एवं तेजस्वी इंद्र को व्याप्त करे. (३) तव त्यन्नर्यं नृतोऽप इन्द्र प्रथमं पूर्व्यं दिवि प्रवाच्यं कृतम्. यद्देवस्य शवसा प्रारिणा असुं रिणन्नपः. भुवद्विश्वमभ्यादेवमोजसा विदादूर्जं शतक्रतुर्विदादिषम्.. (४) हे सबको नचाने वाले इंद्र! तुम्हारे द्वारा प्राचीन समय में किया गया मानव हितसाधक कर्म स्वर्ग में प्रसिद्ध हुआ, तुमने अपने बल से वृत्र असुर के प्राण हरण करके उसके द्वारा रोका हुआ जल प्रवाहित किया. इंद्र ने अंधकार रूप से समस्त विश्व को व्याप्त करने वाले असुर को अपने बल से नष्ट किया. वे शतक्रतु इंद्र अन्न एवं हव्य प्राप्त करें. (४) सूक्त—२३ देवता—ब्रह्मणस्पति एवं बृहस्पति ebook converter DEMO Watermarks*

गणानां त्वा गणपतिं हवामहे कविं कवीनामुपमश्रवस्तमम्. ज्येष्ठराजं ब्रह्मणां ब्रह्मणस्पत आ नः शृण्वन्नूतिभिः सीद सादनम्.. (१) हे ब्रह्मणस्पति! तुम देव-समूह में गणपति, कवियों में अप्रतिम कवि, प्रशंसनीय लोगों में सर्वोच्च एवं मंत्रों के स्वामी हो. हम तुम्हारा आह्वान करते हैं. तुम हमारी स्तुतियां सुनते हुए यज्ञशाला में बैठो और हमारी रक्षा करो. (१) देवाश्चित्ते असुर्य प्रचेतसो बृहस्पते यज्ञियं भागमानशुः. उस्राइव सूर्यो ज्योतिषा महो विश्वेषामिज्जनिता ब्रह्मणामसि.. (२) हे असुरनाशक एवं उत्तम ज्ञानसंपन्न बृहस्पति! तुम्हारा यज्ञसंबंधी भाग देवों ने पाया है. तेज के कारण पूज्य सूर्य जिस प्रकार किरणें उत्पन्न करता है, उसी प्रकार तुम मंत्रों के जन्मदाता हो. (२) आ विबाध्या परिरापस्तमांसि च ज्योतिष्मन्तं रथमृतस्य तिष्ठसि. बृहस्पते भीमममित्रदम्भनं रक्षोहणं गोत्रभिदं स्वर्विदम्.. (३) हे बृहस्पति! तुम चारों ओर के निंदकों और अंधकार को समाप्त करके प्रकाशयुक्त, यज्ञ प्राप्त कराने वाले, भयानक शत्रुओं का नाश करने वाले, राक्षसों के हंता, मेघ को भिन्न करने वाले एवं स्वर्ग प्राप्त कराने वाले रथ में बैठते हो. (३) सुनीतिभिर्नयसि त्रायसे जनं यस्तुभ्यं दाशान्न तमंहो अश्नवत्. ब्रह्मद्विषस्तपनो मन्युमीरसि बृहस्पते महि तत्ते महित्वनम्.. (४) हे बृहस्पति! जो तुम्हें हव्य अन्न देता है, उसे तुम न्यायपूर्ण मार्ग से ले जाकर पाप से बचाते हो. तुम्हारा यही महत्त्व है कि तुम यज्ञ का विरोध करने वाले को कष्ट देते एवं शत्रुओं की हिंसा करते हो. (४) न तमंहो न दुरितं कुतश्चन नारातयस्तितिरुर्न द्वयाविनः. विश्वा इदस्मादध्वरसो वि बाधसे यं सुगोपा रक्षसि ब्रह्मणस्पते.. (५) हे ब्रह्मणस्पति! तुम जिसकी रक्षा करते हो, उसे कोई पाप या दुःख बाधा नहीं पहुंचा सकता. हिंसक एवं ठग भी उसे दुःखी नहीं कर सकते. उसे नष्ट करने वाली सभी सेनाओं को तुम रोकते हो. (५) त्वं नो गोपाः पथिकृद्विचक्षणस्तव व्रताय मतिभिर्जरामहे. बृहस्पते यो नो अभि ह्वरो दधे स्वां तं मर्मर्तु दुच्छुना हरस्वती.. (६) हे बृहस्पति! तुम हमारे रक्षक, सच्चा मार्ग बताने वाले एवं कुशल हो. हम तुम्हारा यज्ञ पूर्ण करने के लिए स्तोत्रों द्वारा तुम्हारी प्रार्थना करते हैं. जो व्यक्ति हमारे प्रति कुटिलता ebook converter DEMO Watermarks*

रखता है, उसकी वेगशाली दुर्बुद्धि उसका प्राणनाश करे. (६) उत वा यो नो मर्चयादनागसोऽरातीवा मर्तः सानुको वृकः. बृहस्पते अप तं वर्तया पथः सुगं नो अस्यै देववीतये कृधि.. (७) हे बृहस्पति! जो उन्नत एवं धन छीनने वाला व्यक्ति हमारे सामने आकर हम निर्दोषों की हिंसा करता है, उसे उत्तम मार्ग से हटा दो तथा देवयज्ञ के लिए हमारा मार्ग सरल बनाओ. (७) त्रातारं त्वा तनूनां हवामहेऽवस्पतैरधिवक्तारमस्मयुम्. बृहस्पते देवनिदो नि बर्हय मा दुरेवा उत्तरं सुम्नमुन्नशन्.. (८) हे बृहस्पति! तुम सबको उपद्रवों से बचाने वाले एवं हमारे पुत्र-पौत्रादि का पालन करने वाले हो. तुम हमारे प्रति पक्षपातपूर्ण वचन बोलकर प्रसन्नता व्यक्त करते हो. हम तुम्हें बुलाते हैं. तुम देवनिंदकों का विनाश करो. दुर्बुद्धि के शत्रु उत्तम सुख प्राप्त करें. (८) त्वया वयं सुवृधा ब्रह्मणस्पते स्पार्हा वसु मनुष्या ददीमहि. या नो दूरे तळितो या अरातयोऽभि सन्ति जम्भया ता अनप्रसः.. (९) हे ब्रह्मणस्पति! तुम्हारे द्वारा वृद्धि प्राप्त करके हम अन्य मनुष्यों से चाहने योग्य धन प्राप्त करें. जो शत्रु हमारे समीप या दूर रहकर हमारा पराभव करते हैं, उन दानहीन व्यक्तियों का नाश करो. (९) त्वया वयमुत्तमं धीमहे वयो बृहस्पते पप्रिणा सस्निना युजा. मा नो दुःशंसो अभिदिप्सुरीशत प्र सुशंसा मतिभिस्तारिषिमहि.. (१०) हे कामपूरक एवं शुद्ध बृहस्पति! तुम्हारी सहायता से हम उत्तम अन्न प्राप्त करेंगे. हमें हराने की इच्छा रखने वाले हमारे स्वामी न बनें. हम उत्तम स्तुतियां करते हुए पुण्य लाभ करें एवं सबसे उत्कृष्ट बनें. (१०) अनानुदो वृषभो जग्मिराहवं निष्तप्ता शत्रुं पृतनासु सासहिः. असि सत्य ऋणया ब्रह्मणस्पत उग्रस्य चिद्गमिता वीळुहर्षिणः.. (११) हे ब्रह्मणस्पति! तुम अद्वितीय दाता, मन की इच्छा पूर्ण करने वाले, युद्ध में जाकर शत्रुओं का विनाश करने वाले एवं युद्धभूमि में शत्रुओं को हराने वाले हो. तुम सच्चे पराक्रमी, ऋण चुकाने वाले तथा मतवाले उग्र लोगों के दमनकर्त्ता हो. (११) अदेवेन मनसा यो रिषण्यति शासामुग्रो मन्यमानो जिघांसति. बृहस्पते मा प्रणक्तस्य नो वधो नि कर्म मन्युं दुरेवस्य शर्धतः.. (१२) ebook converter DEMO Watermarks*

हे बृहस्पति! देवों को न मानने वाला जो व्यक्ति मन से हमारी हिंसा करता है एवं असुरों का नाश करने वाले हम लोगों को मारना चाहता है, उसका आयुध हमें छू भी न सके. हम उस शक्तिशाली एवं दुष्ट शत्रु का क्रोध समाप्त कर दें. (१२) भरेषु हव्यो नमसोपसद्यो गन्ता वाजेषु सनिता धनंधनम्. विश्वा इदर्यो अभिदिप्सो३ मृधो बृहस्पतिर्वि ववर्हा रथाँ इव.. (१३) बृहस्पति युद्धकाल में आह्वान करने एवं नमस्कार सहित पूजा करने योग्य हैं. वे संग्राम में भक्त की सहायता के लिए जाते तथा सब प्रकार का धन देते हैं. जिस प्रकार युद्ध में शत्रुओं के रथों को नष्ट कर दिया जाता है, उसी प्रकार बृहस्पति विजय की इच्छुक शत्रु सेनाओं को नष्टभ्रष्ट कर देते हैं. (१३) तेजिष्ठया तपनी रक्षसस्तप ये त्वा निदे दधिरे दृष्टवीर्यम्. आविस्तत्कृष्व यदसत्त उक्थ्यं१ बृहस्पते वि परिरपो अर्दय.. (१४) हे बृहस्पति! जिन राक्षसों ने युद्धों में तुम्हारा पराक्रम देखकर भी तुम्हारी निंदा की है, अत्यंत तीव्र एवं संतापकारिणी तलवार द्वारा उन राक्षसों को संतप्त करो, अपने प्राचीन प्रशंसा योग्य बल को प्रकट करो तथा निंदकों का नाश करो. (१४) बृहस्पते अति यदर्यो अर्हाद्द्युमद्विभाति क्रतुमज्जनेषु. यद्दीदयच्छवस ऋतप्रजात तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम्.. (१५) हे यज्ञ से उत्पन्न बृहस्पति! हमें श्रेष्ठ लोगों द्वारा पूज्य, दीप्त एवं ज्ञान से युक्त, यज्ञकर्त्ताओं में सुशोभित तेज तथा दीप्तियुक्त विचित्र धन प्रदान करो. (१५) मा नः स्तेनेभ्यो ये अभि द्रुहस्पदे निरामिणो रिपवोऽन्नेषु जागृधुः. आ देवानामोहते वि व्रयो हृदि बृहस्पते न परः साम्नो विदुः.. (१६) हे बृहस्पति! हमें चोरों, द्रोह करके प्रसन्न होने वालों, शत्रुओं, पराए धन के इच्छुकों एवं देवस्तुति एवं यज्ञ विरोधियों के हाथ में मत सौंपना. (१६) विश्वेभ्यो हि त्वा भुवनेभ्यस्परि त्वष्टाजनत्साम्नः साम्नः कविः. स ऋणचिदृणया ब्रह्मणस्पतिर्द्रुहो हन्ता मह ऋतस्य धर्तरि.. (१७) हे बृहस्पति! त्वष्टा ने तुम्हें समस्त संसार से उत्तम बनाया है. तुम समस्त साममंत्रों के ज्ञाता हो. बृहस्पति यज्ञ आरंभ करने वाले यजमान का समस्त ऋण स्वीकार करके उसे उतारते हैं. वे यज्ञ के विद्रोही को नष्ट कर देते हैं. (१७) तव श्रिये व्यजिहीत पर्वतो गवां गोत्रमुदसृजो यदङ्गिरः. इन्द्रेण युजा तमसा परीवृतं बृहस्पते निरपामौब्जो अर्णवम्.. (१८) ebook converter DEMO Watermarks*

ब्रह्मणस्पते त्वमस्य यन्ता सूक्तस्य बोधि तनयं च जिन्व.

हे अंगिरावंशोत्पन्न बृहस्पति! गायों को छिपाने वाला पर्वत तुम्हारे कल्याण के लिए खुल गया और गाएं बाहर आ गईं. उस समय तुमने इंद्र की सहायता से वृत्र द्वारा रोकी गई जलधारा को नीचे की ओर बहाया था. (१८) ब्रह्मणस्पते त्वमस्य यन्ता सूक्तस्य बोधि तनयं च जिन्व. विश्वं तद्भद्रं यदवन्ति देवा बृहद्वदेम विदथे सुवीरा:.. (१९) हे संसार के नियामक ब्रह्मणस्पति! इस सूक्त को जानो एवं हमारी संतान की रक्षा करो. देवगण जिसकी रक्षा करते हैं, वह सभी कल्याण प्राप्त करता है. हम शोभन पुत्र एवं पौत्र प्राप्त करके इस यज्ञ में बहुत सी स्तुतियां बोलेंगे. (१९) सूक्त—२४ देवता—बृह्मणस्पति सेमामविद्धि प्रभृतिं य ईशिषेऽया विधेम नवया महा गिरा. यथा नो मीढ्वान्त्स्तवते सखा तव बृहस्पते सीषधः सोत नो मतिम्.. (१) हे ब्रह्मणस्पति! तुम इस विश्व के स्वामी हो. तुम हमारी स्तुति को भली प्रकार जानो. इस नवीन एवं विशाल स्तुति के द्वारा हम तुम्हारी सेवा करते हैं. हम तुम्हारे मित्र हैं, इसलिए हमें मनोवांछित फल प्रदान करो तथा हमारी स्तुति को सफल करो. (१) यो नन्त्वान्यनमन्न्योजसोतादर्दर्मन्युना शम्बराणि वि. प्राच्यावयदच्युता ब्रह्मणस्पतिरा चाविशद्वसुमन्तं वि पर्वतम्.. (२) बृहस्पति ने अपनी शक्ति द्वारा दमनीय राक्षसों को वश में किया, क्रोध करके शंबर असुर का नाश किया, स्थिर जल को नीचे की ओर गिराया एवं गोरूपी धन से पूर्ण पर्वत में प्रवेश किया. (२) तद्देवानां देवतमाय कृत्वमश्रन्थन्दृळ्हाव्रदन्त वीळिता. उद्गा आजदभिनद्ब्रह्मणा वलमगूहत्तमो व्यचक्षयत्स्वः.. (३) इंद्रादि देवों में श्रेष्ठ बृहस्पति के कर्म से दृढ़ पर्वत शिथिल हुए थे एवं स्थिर वृक्ष टूट गए थे. बृहस्पति ने गायों का उद्धार किया, मंत्र रूपी शक्ति द्वारा बल असुर को समाप्त किया एवं अंधकार को समाप्त करके सूर्य को प्रकाशित किया. (३) अश्मास्यमवतं ब्रह्मणस्पतिर्मधुधारमभि यमोजसातृणत्. तमेव विश्वे पपिरे स्वर्दृशो बहु साकं सिसिचुरुत्समुद्रिणम्.. (४) बृहस्पति ने पत्थर के समान दृढ़ मुख वाले एवं झुके हुए मेघ को शक्ति द्वारा नष्ट किया. सूर्य किरणों ने उसका जल पिआ. उन्होंने बादल के साथ ही वर्षा द्वारा अधिक मात्रा में ebook converter DEMO Watermarks*

सिंचन किया. (४) सना ता का चिद्भवना भवीत्वा माद्भिः शरद्भिरुद्नरो वरन्त वः. अयतन्ता चरतो अन्यदन्यदिद्या चकार वयुना ब्रह्मणस्पतिः.. (५) हे ऋत्विजो! तुम्हारे कल्याण के लिए ही बृहस्पति ने नित्य एवं विचित्र ज्ञान से प्रतिमान और प्रतिवर्ष होने वाली जलवर्षा का द्वार भिन्न किया था. बृहस्पति ने इस ज्ञान को मंत्र का विषय बनाया, जिससे धरती और आकाश एक-दूसरे को प्रसन्न करते रहें. (५) अभिनक्षन्तो अभि ये तमानशुर्निधिं पणीनां परमं गुहा हितम्. ते विद्वांसः प्रतिचक्ष्यानृता पुनर्यत उ आयन्तदुदीयुरराविशम्.. (६) अंगिरागोत्रीय विद्वान् ऋषियों ने चारों ओर घूमते हुए पणियों द्वारा गुफा में छिपाए हुए गोरूपी धन को प्राप्त किया. वे असुरों की माया को देखकर जिस स्थान से निकले थे, वहीं प्रवेश कर गए. (६) ऋतावानः प्रतिचक्ष्यानृता पुनरात आ तस्थुः कवयो महस्पथः. ते बाहुभ्यां धमितमग्निमश्मनि नकिः षो अस्त्यरणो जहुर्हि तम्.. (७) सत्यवादी एवं क्रांतदर्शी अंगिरागोत्रीय ऋषि राक्षसों की माया को देखकर वहां आने की इच्छा से फिर प्रधान मार्ग पर पहुंच गए. उन्होंने हाथों द्वारा प्रज्वलित अग्नि को पर्वत पर फेंका. इससे पहले वे अग्नि वहां नहीं थे. (७) ऋतज्येन क्षिप्रेण ब्रह्मणस्पतिर्यत्र वष्टि प्र तदश्नोति धन्वना. तस्य साध्वीरिषवो याभिरस्यति नृचक्षसो दृशये कर्णयोनयः.. (८) ब्रह्मणस्पति सत्यरूप ज्या वाले धनुष से जो चाहते हैं, वही पा लेते हैं. वे कान से उत्पन्न, दर्शनीय एवं कार्य साधन में कुशल बाणों को फेंकते हैं. (८) स संनयः स विनयः पुरोहितः स सुष्टुतः स युधि ब्रह्मणस्पतिः. चाक्ष्मो यद्वाजं भरते मती धनादित्सूर्यस्तपति तप्यतुर्वृथा.. (९) देवों द्वारा आगे स्थापित बृहस्पति अलग-अलग पदार्थों को मिलाते और मिले हुए को भिन्न-भिन्न करते हैं एवं युद्ध में प्रकट होते हैं. वे सर्वद्रष्टा जिस समय अन्न एवं धन धारण करते हैं, उस समय सूर्य अनायास ही चमक उठते हैं. (९) विभु प्रभु प्रथमं मेहनावतो बृहस्पतेः सुविद्त्राणि राध्या. इमा सातानि वेन्यस्य वाजिनो येन जना उभये भुञ्जते विशः.. (१०) वर्षा करने वाले बृहस्पति का धन व्याप्त, प्रौढ़, मुख्य एवं सुलभ है. यह धन सुंदर एवं eBook converter DEMO Watermarks*

अन्नस्वामी बृहस्पति ने प्रदान किया है. स्तोता एवं यजमान दोनों प्रकार के मनुष्य ध्यानमग्न होकर उस धन को भोगते हैं. (१०) योऽवरे वृजने विश्वथा विभुर्महामु रण्वः शवसा ववक्षिथ. स देवो देवान्प्रति पप्रथे पृथु विश्वेदु ता परिभूर्ब्रह्मणस्पतिः.. (११) सब प्रकार व्याप्त एवं स्तुतियोग्य बृहस्पति अति बलवान् एवं निर्बल दोनों प्रकार के स्तोताओं की रक्षा अपनी शक्ति से करते हैं. वे समस्त देवों के प्रतिनिधि रूप में परम प्रसिद्ध हैं एवं सबके स्वामी हैं. (११) विश्वं सत्यं मघवाना युवोरिदापश्न प्र मिनन्ति व्रतं वाम्. अच्छेन्द्राब्रह्मणस्पती हविर्नोऽन्नं युजेव वाजिना जिगातम्.. (१२) हे धनस्वामी इंद्र एवं बृहस्पति! तुम्हारी सभी स्तुतियां सत्य हैं. तुम्हारे व्रत को जल नष्ट नहीं कर सकता, रथ में जुते हुए घोड़े जिस प्रकार घास की ओर दौड़ते हैं, उसी प्रकार तुम हमारे हवि के सम्मुख आओ. (१२) उताशिष्ठा अनु शृण्वन्ति वह्नयः सभेयो विप्रो भरते मती धना. वीळुद्वेषा अनु वश ऋणमाददिः स ह वाजी समिथे ब्रह्मणस्पतिः.. (१३) ब्रह्मणस्पति के शीघ्रगामी घोड़े हमारे स्तोत्र को सुनते हैं. सभ्य एवं बुद्धिमान् अध्वर्यु सुंदर स्तोत्रों द्वारा हव्य प्रदान करते हैं. वह प्रबल राक्षसों से द्वेष करने वाले, अपनी इच्छा से ऋण स्वीकार करने एवं अन्न के स्वामी हैं. वे युद्ध में हमारा हव्य स्वीकार करें. (१३) ब्रह्मणस्पतेरभवद्यथावशं सत्यो मन्युर्महि कर्मा करिष्यतः. यो गा उदाजत्स दिवे वि चाभजन्महीव रीतिः शवसासरात्पृथक्.. (१४) महान् कर्म करने वाले ब्रह्मणस्पति का मंत्र उनकी इच्छा के अनुसार सत्य होता है. उन्होंने गायों को बाहर करके आकाश का विभाग किया है. जिस प्रकार नदियों का जल विभिन्न धाराओं में नीचे की ओर बहता है, उसी प्रकार गाएं अपनी शक्ति के अनुसार विभिन्न देवों के घर गईं. (१४) ब्रह्मणस्पते सुयमस्य विश्वहा रायः स्याम रथ्यो३ वयस्वतः. वीरेषु वीराँ उप पृङ्धि नस्त्वं यदीशानो ब्रह्मणा वेषि मे हवम्.. (१५) हे ब्रह्मणस्पति! हम ऐसे धन के स्वामी बनें जो सदा नियंत्रित एवं अन्नयुक्त हो. तुम सबके ईश्वर हो, इसलिए हमारे वीर पुत्रों को पौत्रयुक्त करो. तुम हवि एवं अन्न के साथ-साथ हमारी स्तुति को जानो. (१५) ब्रह्मणस्पते त्वमस्य यन्ता सूक्तस्य बोधि तनयं च जिन्व. ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—२५ देवता—ब्रह्मणस्पति

विश्वं तद्भद्रं यदवन्ति देवा बृहद्वदेम विदथे सुवीरा:.. (१६) हे ब्रह्मणस्पति! तुम इस विश्व का नियंत्रण करने वाले हो. तुम इस सूक्त को जानो एवं हमारी संतान को प्रसन्न करो. देवगण जिसकी रक्षा करते हैं, वह सभी कल्याण प्राप्त करता है. हम शोभन पुत्र एवं पौत्र प्राप्त करके इस यज्ञ में बहुत सी स्तुतियां बोलेंगे. (१६) सूक्त—२५ देवता—ब्रह्मणस्पति इन्धानो अग्निं वनवद्धनुष्यतः कृतब्रह्मा शूशुवद्वातहव्य इत्. जातेन जातमति स प्र सर्सृते यंयं युजं कृणुते ब्रह्मणस्पति:.. (१) यज्ञ अग्नि को प्रज्वलित करता हुआ यजमान हिंसक शत्रुओं का नाश करे. स्तोत्र पढ़ने वाले एवं हव्य देने वाले यजमान वृद्धि प्राप्त करें. ब्रह्मणस्पति जिस-जिस यजमान को मित्र के रूप में स्वीकार कर लेते हैं, वह अपने पुत्र के पुत्र अर्थात् पौत्र से भी अधिक दिन तक जीता है. (१) वीरेभिर्वीरान्वनवद्वनुष्यतो गोभी रयिं पप्रथद्बोधति त्मना. तोकं च तस्य तनयं च वर्धते यंयं युजं कृणुते ब्रह्मणस्पति:.. (२) यजमान अपने वीर पुत्रों की सहायता से हिंसक शत्रुओं की हिंसा करे. वह गायरूप धन का विस्तार करता है एवं स्वयं ही सब कुछ समझता है. ब्रह्मणस्पति जिस-जिस यजमान को मित्र के रूप में स्वीकार कर लेते हैं, वह अपने पुत्र तथा पौत्र से भी अधिक दिन तक जीता है. (२) सिन्धुर्न क्षोदः शिमीवाँ ऋघायतो वृषेव वध्रीँ रभि वष्ट्योजसा. अग्नेरिव प्रसितिर्नाह वर्तवे यंयं युजं कृणुते ब्रह्मणस्पति:.. (३) बृहस्पति की सेवा करने वाला यजमान किनारों को तोड़ने वाली सरिता एवं साधारण बैलों को हराने वाले सांड के समान शत्रुओं को अपनी शक्ति से पराजित करता है. ब्रह्मणस्पति जिस-जिस यजमान को मित्र कहकर स्वीकार कर लेते हैं, वह प्रज्वलित अग्नि के समान रोका नहीं जा सकता. (३) तस्मा अर्षन्ति दिव्या असश्चतः स सत्वभिः प्रथमो गोषु गच्छति. अनिभृष्टतविषिर्हन्त्योजसा यंयं युजं कृणुते ब्रह्मणस्पति:.. (४) स्वर्गीय जल उसके पास न रुकने वाली सरिता के समान आता है, वह सभी सेवकों से पहले गायें प्राप्त करता है एवं अपने अकरणीय बल से शत्रुओं को नष्ट करता है, जिसे ब्रह्मणस्पति मित्र कहकर स्वीकार कर लेते हैं. (४) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—२६ देवता—ब्रह्मणस्पति

तस्मा इद्विश्वे धुनयन्त सिन्धवोऽच्छिद्रा शर्म दधिरे पुरूणि. देवानां सुप्रे सुभगः स एधते यंयं युजं कृणुते ब्रह्मणस्पतिः.. (५) उसी की ओर सभी नदियां बहती हैं, वह अविच्छिन्न रूप से समस्त सुख प्राप्त करता है एवं सौभाग्यशाली देवों द्वारा प्रदत्त सुख पाकर बढ़ता है. जिसे ब्रह्मणस्पति मित्र कहकर स्वीकार कर लेते हैं. (५) सूक्त—२६ देवता—ब्रह्मणस्पति ऋजुरिच्छंसो वनवद्वनुष्यतो देवयन्निददेवयन्तमभ्यसत्. सुप्रावीरिद्वनवत्पृत्सु दुष्टरं यज्छेदयज्योर्वि भजाति भोजनम्.. (१) ब्रह्मणस्पति का सरल चित्त स्तोता के शत्रुओं का विनाश करे. देवों का वह भक्त देवविरोधियों को पराजित करे. ब्रह्मणस्पति को तृप्त करने वाला याज्ञिक युद्ध में अदमनीय शत्रुओं का नाश करके यज्ञविरोधियों के धन का उपभोग करे. (१) यजस्व वीर प्र विहि मनायतो भद्रं मनः कृणुष्व वृत्रतूर्ये. हविष्कृणुष्व सुभगो यथाससि ब्रह्मणस्पतेरव आ वृणीमहे.. (२) हे वीर! ब्रह्मणस्पति की स्तुति करो. अभिमानी शत्रुओं के प्रति युद्ध के लिए प्रस्थान करो एवं शत्रुनाशक संग्राम में अपना मन दृढ़ करो. ब्रह्मणस्पति के निमित्त हव्य तैयार करो. इससे तुम्हें सौभाग्य मिलेगा. हम उनसे रक्षा की याचना करते हैं. (२) स इज्जनेन स विशा स जन्मना स पुत्रैर्वाजं भरते धना नृभिः. देवानां यः पितरमाविवासति श्रद्धामना हविषा ब्रह्मणस्पतिम्.. (३) जो श्रद्धालु यजमान देवों के पालक ब्रह्मणस्पति की सेवा हव्य द्वारा करता है, वह अपने आत्मीयजनों, पुत्रों एवं परिचारकों सहित अन्न और धन प्राप्त करता है. (३) यो अस्मै इव्यैर्घृतवद्भिर्विधत्प्र तं प्राचा नयति ब्रह्मणस्पतिः. उरुष्यतीमंहसो रक्षती रिषोंऽहोश्चिदस्मा उरुचक्रिरद्भुतः.. (४) जो यजमान घृतयुक्त हव्यों से ब्रह्मणस्पति की सेवा करता है, उसे वे प्राचीन सरल मार्ग से ले जाते हैं, पाप, शत्रुओं तथा दरिद्रता से रक्षा करते हैं और अद्भुत उपकार करते हैं. (४) सूक्त—२७ देवता—आदित्यगण इमा गिर आदित्येभ्यो घृतस्नूः सनाद्राजभ्यो जुह्वा जुहोमि. शृणोतु मित्रो अर्यमा भगो नस्तुविजातो वरुणो दक्षो अंशः.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*

मैं सुंदर आदित्यों के लिए घृत टपकाने वाले ये स्तुति रूपी वचन सदा प्रस्तुत करता हूं. मित्र, अर्यमा, भग, अनेक देशों में उद्भूत वरुण, दक्ष एवं अंश मेरा वचन सुनें. (१) इमं स्तोमं सक्रतवो मे अद्य मित्रो अर्यमा वरुणो जुषन्त. आदित्यासः शुचयो धारपूता अवृजिना अनवद्या अरिष्टाः.. (२) दीप्यमान्, पवित्र, सब पर अनुग्रह करने वाले, अनिंदनीय, दूसरों द्वारा अहिंसित एवं समान कार्य करने वाले मित्र, अर्यमा एवं वरुण नामक अदितिपुत्र आज मेरे इस स्तोत्र को सुनें. (२) त आदित्यास उरवो गभीरा अदब्धासो दिप्सन्तो भूर्यक्षाः. अन्तः पश्यन्ति वृजिनोत साधु सर्व राजभ्यः परमा चिदन्ति.. (३) महान्, गंभीर, शत्रुओं द्वारा अहिंसित, शत्रुनाश के अभिलाषी तथा अमित तेजस्वी अदितिपुत्र प्राणियों के अंतःकरण में रहने के कारण उनके पापपुण्यों को देखते हैं. प्रकाशमान आदित्यों के लिए दूर की वस्तु भी पास ही है. (३) धारयन्त आदित्यासो जगत्स्था देवा विश्वस्य भुवनस्य गोपाः. दीर्घाधियो रक्षमाणा असुर्यमृतावानश्चयमाना ऋणानि.. (४) स्थावर एवं जंगम को धारण करते हुए आदित्य देव संपूर्ण संसार की रक्षा करते हैं. विशाल यज्ञों के स्वामी वे आदित्य प्राण के हेतु जल की रक्षा करते हैं. वे सत्ययुक्त एवं स्तोताओं को ऋणरहित बनाने वाले हैं. (४) विद्यामादित्या अवसो वो अस्य यदर्यमन्भय आ चिन्मयोभु. युष्माकं मित्रावरुणा प्रणीतौ परि श्वभ्रेव दुरितानि वृज्याम्.. (५) हे आदित्यगण! हम तुम्हारी रक्षा प्राप्त करें. तुम्हारा सहारा भय उपस्थित होने पर सुख देता है. हे अर्यमा, मित्र और वरुण! जिस प्रकार रास्ता चलने वाले गड्ढों को छोड़ देते हैं, उसी प्रकार तुम्हारे अनुगामी बनकर हम पापों का त्याग कर दें. (५) सुगो हि वो अर्यमन्मित्र पन्था अनृक्षरो वरुण साधुरस्ति. तेनादित्या अधि वोचता नो यच्छता नो दुष्परिहन्तु शर्म.. (६) हे अर्यमा, मित्र एवं वरुण! तुम्हारा पथ सुगम, निष्कंटक एवं सुंदर है. हे आदित्यगण! हमें उसी मार्ग से ले चलो, मधुर वचन बोलो तथा हमें अविनाशी सुख प्रदान करो. (६) पिपर्तु नो अदिति राजपुत्राति द्वेषांस्यर्यमा सुगेभिः. बृहन्मित्रस्य वरुणस्य शर्मोप स्याम पुरुवीरा अरिष्टाः.. (७) ebook converter DEMO Watermarks*

मित्र आदि सुंदर पुत्रों की माता अदिति हमें शत्रुओं को पराभव करने वाले मार्ग से ले चलें. हम अनेक वीर पुत्रों से युक्त एवं अन्यों द्वारा अहिंसित होकर मित्र तथा वरुण का सुख प्राप्त करें. (७) तिस्रो भूमीर्धारयन् त्रीँरुत द्यून्त्रीणि व्रता विदथे अन्तरेषाम्. ऋतेनादित्या महि वो महित्वं तदर्यमन्वरुण मित्र चारु.. (८) अदितिपुत्र धरती, आकाश, स्वर्ग तीनों लोकों एवं अग्नि, वायु, सूर्य तीनों तेजों को धारण करते हैं तथा इनके यज्ञों में तीन व्रत स्थिर हैं. हे आदित्यो! यज्ञ से तुम्हारी महिमा बढ़ी है. हे अर्यमा, वरुण एवं मित्र! तुम्हारा महत्त्व सुंदर है. (८) त्री रोचना दिव्या धारयन्त हिरण्ययाः शुचयो धारपूताः. अस्वप्नजो अनिमिषा अदब्धा उरुशंसा ऋजवे मर्त्याय.. (९) स्वर्णाभूषण धारण करने वाले, दीप्तियुक्त, पवित्र, निद्रारहित, निमेषहीन, असुरों द्वारा अहिंसित एवं सब लोगों द्वारा स्तुति योग्य अदितिपुत्र सरल मनुष्यों के लिए अग्नि, वायु एवं सूर्य तीन तेज धारण करते हैं. (९) त्वं विश्वेषां वरुणासि राजा ये च देवा असुर ये च मर्ताः. शतं नो रास्व शरदो विचक्षेऽश्यामायूंषि सुधितानि पूर्वा.. (१०) हे वरुण! चाहे असुर हों, देव हों अथवा मनुष्य हों, तुम सबके राजा हो. हमें सौ वर्ष तक देखने की शक्ति दो. हम पूर्वजों द्वारा भोगी हुई अवस्था को प्राप्त करें. (१०) न दक्षिणा वि चिकिते न सव्या न प्राचीनमादित्या नोत पश्चा. पाक्या चिद्वसवो धीर्या चद्युष्मांनीतो अभयं ज्योतिरश्याम्.. (११) हे वासदाता अदितिपुत्रो! हम दायां, बायां, सामने, पीछे कुछ भी नहीं जानते. मुझ अपरिपक्व ज्ञान एवं धैर्यरहित को यदि तुम उत्तम मार्ग से ले जाओगे तो मैं भयरहित ज्योति पाऊंगा. (११) यो राजभ्य ऋतनिभ्यो ददाश यं वर्धयन्ति पुष्टयश्च नित्याः. स रेवान्याति प्रथमो रथेन वसुदावा विदथेषु प्रशस्तः.. (१२) जो यजमान सुशोभित एवं यज्ञ के नेता आदित्यों को हव्य देता है तथा पोषक आदित्य जिसको नित्य बढ़ाते हैं, वही धन का स्वामी, प्रसिद्ध, धन दान करने वाला एवं सब लोगों की प्रशंसा करके रथ के द्वारा यज्ञस्थल में आता है. (१२) शुचिरपः सूयवसा अदब्ध उप क्षेति वृद्धवयाः सुवीरः. नकिष्टं घ्नन्त्यन्तितो न दूराद्य आदित्यानां भवति प्रणीतौ.. (१३) ebook converter DEMO Watermarks*

जो यजमान आदित्यों के मार्ग का अनुसरण करता है, वह शुचि, शत्रुओं द्वारा अहिंसित, अधिक अन्न का स्वामी, शोभन पुत्रों वाला एवं सुंदर फसलों का मालिक बनकर जल के समीप निवास करता है. समीप या दूर रहने वाला कोई भी शत्रु उसकी हिंसा नहीं कर सकता. (१३) अदिते मित्र वरुणोत मृळ यद्वो वयं चकृमा कच्चिदागः. उर्वश्यामभयं ज्योतिरिन्द्र मा नो दीर्घा अभि नशन्तमिस्त्राः.. (१४) हे अदिति, मित्र एवं वरुण! यदि हम तुम्हारे प्रति कोई अपराध करें तो उससे हमारी रक्षा करना. हे इंद्र! हम विस्तृत एवं भयरहित ज्योति प्राप्त करें. अंधेरी रात हमें व्याप्त न करे. (१४) उभे अस्मै पीपयतः समीची दिवो वृष्टिं सुभगो नाम पुष्यन्. उभा क्षयावाजयन्याति पृत्सूभावर्धौ भवतः साधू अस्मै.. (१५) जो यजमान अदितिपुत्रों के मार्ग पर चलता है, उसकी वृद्धि धरती-आकाश दोनों मिलकर करते हैं. वह भाग्यशाली आकाश का जल प्राप्त करके वृद्धि करता है एवं युद्ध में शत्रुओं को हरा कर अपने और उनके दोनों निवासस्थान प्राप्त करता है. संसार के चर और अचर दोनों भाग उसके लिए मंगलकारक होते हैं. (१५) या वो माया अभिद्रुहे यजत्राः पाशा आदित्या रिपवे विचृत्ताः. अश्वीव ताँ अति येषं रथेनारिष्टा उरावा शर्मन्त्स्याम.. (१६) हे यज्ञ योग्य आदित्यो! तुमने जो माया द्रोहकारी राक्षसों के लिए एवं जो पाश शत्रुओं के लिए बनाए हैं, हम उन्हें अश्वारोही के समान रथ से लांघ जावें. हम शत्रुओं द्वारा अहिंसित होकर महान् सुख प्राप्त करें. (१६) माहं मघोनो वरुण प्रियस्य भूरिदाव्न आ विदं शूनमापेः. मा रायो राजन्त्सुयमादव स्थां बृहद्वदेम विदथे सुवीराः.. (१७) हे वरुण! मैं किसी धनी एवं अधिक दानी व्यक्ति के सम्मुख अपनी दरिद्रता की बात न कहूं. हे दीप्तिमान् वरुण! हमें कभी भी आवश्यक धन की कमी न रहे. हम शोभन धन प्राप्त करके इस यज्ञ में बहुत सी स्तुतियां करेंगे. (१७) सूक्त—२८ देवता—वरुण इदं कवेरादित्यस्य स्वराजो विश्वानि सान्त्यभ्यस्तु मह्ना. अति यो मन्द्रो यजथाय देवः सुकीर्तिं भिक्षे वरुणस्य भूरेः.. (१)

यह हव्य क्रांतदर्शी एवं स्वयं शोभित आदित्य के लिए है. वे अपने महत्त्व से सभी प्राणियों को पराजित करते हैं. तेजस्वी वरुण यजमान को प्रसन्न करते हैं. मैं वरुण से अधिक कीर्ति की याचना करता हूं. (१) तव व्रते सुभगासः स्याम स्वाध्यो वरुण तुष्टुवांसः. उपायन उषसां गोमतीनामग्नयो न जरमाणा अनु द्यून्.. (२) हे वरुण! हम भली प्रकार ध्यान, तुम्हारी स्तुति एवं सेवा करते हुए सौभाग्य प्राप्त करें. जिस प्रकार किरणों वाली उषाओं के आने पर अग्नि प्रज्वलित होती है, उसी प्रकार हम प्रतिदिन तुम्हारी स्तुति करते हुए दीप्तिसंपन्न हों. (२) तव स्याम पुरुवीरस्य शर्मन्नुरुशंसस्य वरुण प्रणेतः. यूयं नः पुत्रा अदितेरदब्धा अभि क्षमध्वं युज्याय देवाः.. (३) हे विश्वनायक, अनेक वीरों से युक्त एवं बहुत से लोगों द्वारा स्तुत्य वरुण! हम तुम्हारे गृह में निवास करें. हे शत्रुओं द्वारा अहिंसित अदितिपुत्रो! अपना मित्र बनाते समय हमारे सभी अपराधों को क्षमा कर देना. (३) प्र सीमादित्यो असृजद्विधर्ता ऋतं सिन्धवो वरुणस्य यन्ति. न श्राम्यन्ति न वि मुचन्त्येते वयो न पप्तू रघुया परिज्मन्.. (४) विश्वधारक एवं अदितिपुत्र वरुण ने जल बनाया है. उन्हीं के महत्त्व से नदियां बहती हैं. नदियां न कभी विश्राम करती हैं और न पीछे लोटती हैं. ये शीघ्रगामिनी नदियां पक्षियों के समान वेग से धरती पर बहती हैं. (४) वि मच्छ्रथाय रशनामिवाग ऋध्याम ते वरुण खामृतस्य. मा तन्तुश्छेदि वयतो धियं मे मा मात्रा शार्यपसः पुर ऋतोः.. (५) हे वरुण! पाप ने मुझे रस्सी के समान बांध लिया है. मुझे इससे छुड़ाओ. हम तुम्हारी जलपूर्ण नदी को प्राप्त करें. यज्ञकर्म करते समय मेरा कार्य रुके नहीं. यज्ञ समाप्ति से पहले मेरा शरीर कभी शिथिल न हो. (५) अपो सु म्यक्ष वरुण भियसं मत्सम्राळ्ऋतावोऽनु मा गृभाय. दामेव वत्साद्वि मुमुग्ध्यंहो नहि त्वदारे निमिषश्चनेशे.. (६) हे वरुण! भय को मेरे पास से हटाओ. हे शोभासंपन्न एवं सत्ययुक्त! मुझ पर अनुग्रह करो. जिस प्रकार बंधे हुए बछड़े को रस्सी से छुड़ाते हैं, उसी प्रकार मुझे पाप से छुड़ाओ. तुमसे दूर रहकर कोई एक पल के लिए भी अधिकार प्राप्त नहीं कर सकता. (६) मा नो वधैर्वरुण ये त इष्टावेनः कृण्वन्तमसुर भ्रीणन्ति. ebook converter DEMO Watermarks*

त्वे हि कं पर्वते न श्रितान्यप्रच्युतानि दूळभ व्रतानि.. (८)

मा ज्योतिषः प्रवस्थानि गन्म वि षू मृधः शिश्रथो जीवसे नः.. (७) हे प्राणरक्षक वरुण! तुम्हारे जो आयुध यज्ञविरोधियों का विनाश करते हैं, वे हमें न मारें. हम सूर्य के प्रकाश से दूर न रहें. हमारे जीवन के हिंसकों को हमसे दूर हटाओ. (७) नमः पुरा ते वरुणोत नूनमुतापरं तुविजात ब्रवाम. त्वे हि कं पर्वते न श्रितान्यप्रच्युतानि दूळभ व्रतानि.. (८) हे अनेक प्रदेशों में प्रकट होने वाले वरुण! हमने भूतकाल में तुम्हें नमस्कार किया है, वर्तमान काल में करते हैं और भविष्यत् काल में करेंगे. हे हिंसा के अयोग्य वरुण! तुम में पर्वत के समान अच्युत शक्तियां व्याप्त हैं. (८) पर ऋणा सावीरध मत्कृतानि माहं राजन्नन्यकृतेन भोजम्. अव्युष्टा इन्तु भूयसीरुषास आ नो जीवान्वरुण तासु शाधि.. (९) हे राजा वरुण! हमारे पूर्व पुरुषों द्वारा लिए गए ऋणों से हमें छुटकारा दिलाओ. मैंने वर्तमान काल में जो ऋण लिया है, उससे भी मुझे छुड़ाओ. मैं दूसरे के उपार्जित धन से जीवनयात्रा न करूं. ऋण के कारण ऋणकर्त्ता के लिए मानो उषाओं का उदय होता ही नहीं. ऐसी आज्ञा दो, जिससे हम उन सब उषाओं में जाग्रत रहें. (९) यो मे राजन्युज्यो वा सखा वा स्वप्ने भयं भीरवे मह्यमाह. स्तेनो वा यो दिप्सति नो वृको वा त्वं तस्माद्वरुण पाह्यस्मान्.. (१०) हे राजा वरुण! मुझ भीरु को स्वप्न की भयानक बातें कहने वाले मित्र से बचाओ. मुझे हिंसा करने वाले चोर एवं भेड़िए से बचाओ. (१०) माहं मघोनो वरुण प्रियस्य भूरिदाव्न आ विदं शूनमापेः. मा रायो राजन्त्सुयमादव स्थां बृहद्वदेम विदथे सुवीराः.. (११) हे वरुण! मुझे किसी धनी एवं दानी पुरुष के सामने अपनी निर्धनता न बतानी पड़े. हे राजन्! मेरे पास जीवन के लिए आवश्यक धन की कमी न हो. हम शोभन पुत्र-पौत्रों को प्राप्त करके इस यज्ञ में बहुत सी स्तुतियां करेंगे. (११) सूक्त—२९ देवता—विश्वेदेव धृतव्रता आदित्या इषिरा आरे मत्कर्त रहसूरिवागः. शृण्वतो वो वरुण मित्र देवा भद्रस्य विद्वाँ अवसे हुवे वः.. (१) हे व्रतधारी, सबके प्रार्थनीय एवं शीघ्रगामी अदितिपुत्रो! जिस प्रकार व्यभिचारिणी गुप्तरूप से जन्म लेने वाले बालक को दूर फेंक देती है, उसी प्रकार तुम मेरा पाप मुझसे दूर ebook converter DEMO Watermarks*

हटा दो. हे मित्र और वरुण! मैं तुम्हारे द्वारा किए हुए मंगल कार्यों को जानता हूं. मैं तुम्हें रक्षा के लिए बुलाता हूं. तुम मेरी पुकार सुनो. (१) यूयं देवाः प्रमतिर्यूयमोजो यूयं द्वेषांसि सनुतर्युयोत. अभिक्षत्तारो अभि च क्षमध्वमद्या च नो मृळयतापरं च.. (२) हे देवो! तुम उत्तम बुद्धि एवं बलसंपन्न हो. तुम हमारे विरोधियों को गुप्त स्थान में ले जाओ. हे शत्रुनाशक देवो! तुम भी हमारे शत्रुओं को हराओ एवं आज तथा आने वाले कल में सुखी करो. (२) किमूं नु वः कृणवामापरेण किं सनेन वसव आप्येन. यूयं नो मित्रावरुणादिते च स्वस्तिमिन्द्रामरुतो दधात.. (३) हे देवो! हम आज या आने वाले दिनों में तुम्हारा कौन सा कार्य कर सकते हैं? अर्थात् कोई नहीं. हम सनातन प्राप्तव्य कार्य द्वारा भी कुछ नहीं कर सकते. हे मित्र, वरुण, अदिति, इंद्र एवं मरुद्गण! हमारा कल्याण करो. (३) हये देवा यूयमिदापयः स्थ ते मृळत नाधमानाय मह्यम्. मा वो रथे मध्यमवाळ्ते भून्मा युष्मावत्स्वापिषु श्रमिष्म.. (४) हे देवो! तुम्हीं हमारे बांधव हो. प्रार्थना करने वाले हम लोगों को तुम सुख दो. हमारे यज्ञ में आते समय तुम्हारे रथ की गति मंद न हो. तुम बांधवों के होते हुए हम परेशान न हों. (४) प्र व एको मिमय भूर्यागो यन्मा पितेव कितवं शशास. आरे पाशा आरे अघानि देवा मा माधि पुत्रे विमिव ग्रभीष्ट.. (५) हे देवगण! मैंने मनुष्य होते हुए भी तुम लोगों के बीच रहकर अपने बहुत से पाप नष्ट किए हैं. जिस प्रकार पिता कुमार्गगामी पुत्र को रोकता है, उसी प्रकार तुमने मुझे अनुशासन में रखा है. हे देवो! मुझे बंधन और पाप से दूर रखो. व्याध जिस प्रकार पुत्र के सामने पक्षी पिता को मारता है, उसी प्रकार मुझे मत मारना. (५) अर्वाञ्चो अद्या भवता यजत्रा आ वो हार्दि भयमानो व्ययेयम्. त्राध्वं नो देवा निजुरो वृकस्य त्राध्वं कर्तादवपदो यजत्राः.. (६) हे यज्ञ योग्य देवो! इस समय हमारे सामने आओ. मैं डरता हुआ तुम्हारे हृदय में आश्रय पाऊं. हे देवो! भेड़िए की हिंसा से हमें बचाओ. हे यज्ञपात्रो! हमें विपत्ति में डालने वालों से बचाओ. (६) माहं मघोनो वरुण प्रियस्य भूरिदाव्न आ विदं शूनमापेः. मा रायो राजन्त्सुयमादव स्थां बृहद्वदेम विदथे सुवीराः.. (७) ebook converter DEMO Watermarks*