ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
हे अग्नि! मुझ द्युम्न ऋषि को उत्तम बल से युक्त एवं शत्रुओं को पराजित करने वाला पुत्र दो, जो स्तुति से युक्त होकर युद्ध में सामने आने वाले शत्रुओं को हरा दे. (१) तमग्ने पृतनाषहं रयिं सहस्व आ भर. त्वं हि सत्यो अद्भुतो दाता वाजस्य गोमतः.. (२) हे बलवान् अग्नि! तुम सत्यस्वरूप एवं महान् तथा गोयुक्त अन्न देने वाले हो. मुझे शत्रु सेनाओं को हराने वाला पुत्र दो. (२) विश्वे हि त्वा सजोषसो जनासो वृक्तबर्हिषः. होतारं सदमसु प्रियं व्यन्ति वार्या पुरु.. (३) हे अग्नि! परस्पर प्रसन्न एवं कुश बिछाने वाले सब ऋत्विज् यज्ञशाला में देवों को बुलाने वाले एवं सर्वप्रिय तुमसे उत्तम धन मांगते हैं. (३) स हि ष्मा विश्वचर्षणिर्भिमाति सहो दधे. अग्न एषु क्षयेष्वा रेवन्नः शुक्र दीदिहि द्युमत्पावक दीदिहि.. (४) हे अग्नि! वे विश्व-चर्षण ऋषि शत्रुहिंसक बल धारण करें. हे तेजस्वी अग्नि! हमारे घरों में तुम धनयुक्त प्रकाश करो. हे पापनाशक अग्नि! तुम दीप्तिशाली होकर प्रकाश करो. (४) सूक्त—२४ देवता—अग्नि अग्ने त्वं नो अन्तम उत त्राता शिवो भवा वरूथ्यः.. (१) वसुरग्निर्वसुश्रवा अच्छा नक्षि द्युमत्तमं रयिं दाः.. (२) हे वरणीय, रक्षक एवं सुखकर अग्नि! तुम हमारे समीपवर्ती बनो. हे निवास एवं अन्नदाता अग्नि! तुम हमें प्राप्त होकर हमें अत्यंत उज्ज्वल धन दो. (१, २) स नो बोधि श्रुधी हवमुरुष्या णो अघायतः समस्मात्.. (३) तं त्वा शोचिष्ठ दीदिवः सुम्नाय नूनमीमहे सखिभ्यः.. (४) हे अग्नि! तुम हमें जानो एवं हमारी पुकार सुनो. सभी पाप चाहने वाले लोगों से हमें बचाओ. हे अपने तेज से दीप्त अग्नि! हम तुमसे सुख एवं पुत्र की याचना करते हैं. (३, ४) सूक्त—२५ देवता—अग्नि अच्छा वो अग्निमवसे देवं गासि स नो वसुः. रासत्पुत्र ऋषूणामृतावा पर्षति द्विषः.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
हे धन के अभिलाषी ऋषियो! तुम रक्षा के लिए अग्नि की स्तुति करो. अग्निहोत्र के निमित्त यजमानों के घर में रहने वाले अग्नि हमारी अभिलाषा पूर्ण करें. ऋषियों के पुत्र एवं सत्ययुक्त अग्नि हमें शत्रुओं से सुरक्षित करें. (१) स हि सत्यो यं पूर्वे चिद्देवासश्चिद्यमीधिरे. होतारं मन्द्रजिह्वमित्सुदीतिभिर्विभावसुम्.. (२) प्राचीन ऋषियों एवं देवों ने देवों को बुलाने वाले, प्रसन्नताकारक जीभ वाले, शोभन दीप्तियों से युक्त एवं प्रभा वाले जिस अग्नि को प्रज्वलित किया था, वे सत्यप्रतिज्ञ हैं. (२) स नो धीती वरिष्ठया श्रेष्ठया च सुमत्या. अग्ने रायो दिदीहि नः सुवृक्तिभिर्विरेण्य.. (३) हे शोभन स्तुतियों द्वारा प्रशंसित एवं वरण करने योग्य अग्नि! तुम हमारे अतिशय प्रशंसनीय एवं श्रेष्ठ सेवारूपी कर्म से एवं स्तुतियों से प्रसन्न होकर हमें धन दो. (३) अग्निद्देवेषु राजत्यग्निर्मर्तेष्वाविशन्. अग्निर्नो हव्यवाहनोऽग्निं धीभिः सपर्यत.. (४) हे यजमान! जो अग्नि देवों के बीच में देवतारूप में प्रकाशित होते हैं, मनुष्यों में आहवानीय आदि रूप से प्रविष्ट हैं एवं जो हमारा हव्य देवों के पास ले जाते हैं, तुम स्तुतियों द्वारा उन्हीं अग्नि की सेवा करो. (४) अग्निस्तुविश्वस्तमं तुविब्रह्माणमुत्तमम्. अतूर्तं श्रावयत्पतिं पुत्रं ददाति दाशुषे.. (५) अग्नि हव्य देने वाले यजमान को ऐसा पुत्र दें जो अनेक प्रकार के अन्नों का स्वामी, विविध स्तोत्रों से युक्त, उत्तम शत्रुओं से पराजित न होने वाला एवं अपने कर्मों से पूर्वजों के यज्ञ को प्रसिद्ध करने वाला हो. (५) अग्निर्दाति सत्पतिं सासाह यो युधा नृभिः. अग्निंरत्यं रघुष्यदं जेतारमपराजितम्.. (६) अग्नि हमें सत्यपालक युद्ध में परिजनों की सहायता से शत्रुओं को पराजित करने वाला, सज्जनों का पालक, शत्रुजयी एवं परम वेगशाली पुत्र दें. (६) यद्वाहिष्ठं तदग्नये बृहदर्च विभावसो. महिषीव त्वद्रयिस्त्वद्वाजा उदीरते.. (७) सर्वश्रेष्ठ स्तोत्र अग्नि के उद्देश्य से बोला जाता है. हे प्रभायुक्त अग्नि! हमें अधिक मात्रा ebook converter DEMO Watermarks*
में अन्न दो, क्योंकि महान् धन एवं अन्न तुम्हीं से उत्पन्न होता है. (७) तव द्युमन्तो अर्चयो ग्रावेवोच्यते बृहत्. उतो ते तन्यतुर्यथा स्वानो अर्त त्मना दिवः.. (८) हे अग्नि! तुम्हारी लपटें प्रकाश वाली हैं. तुम सोमलता कुचलने वाले पत्थर के समान महान् हो. तुम स्वयं द्योतमान हो. तुम्हारा शब्द मेघगर्जन के समान है. (८) एवाँ अग्निं वस्यवः सहसानं ववन्दिम. स नो विश्वा अति द्विषः पर्षन्नावेव सुक्रतुः.. (९) धन की इच्छा करने वाले हम लोग बल का आचरण करने वाले अग्नि की वंदना करते हैं. वे शोभनकर्म वाले अग्नि हमें उसी प्रकार शत्रुओं से पार करें. जिस प्रकार नाव सरिता के पार लगाती है. (९) सूक्त—२६ देवता—अग्नि अग्ने पावक रोचिषा मन्द्रया देव जिह्वया. आ देवान्वक्षि यक्षि च.. (१) हे शोधक एवं दीप्तिशाली अग्नि! तुम अपनी दीप्ति और देवों को प्रसन्न करने वाली जिह्वा से यज्ञ में देवों को बुलाओ तथा उनके निमित्त यज्ञ करो. (१) तं त्वा घृतस्नवीमहे चित्रभानो स्वर्दृशम्. देवाँ आ वीतये वह.. (२) हे घृत प्रेरक एवं अनेक विशाल लपटों वाले अग्नि! तुझ सर्वद्रष्टा की हम याचना करते हैं. हव्य भक्षण करने के लिए तुम देवों को बुलाओ. (२) वीतिहोत्रं त्वा कवे द्युमन्तं समिधीमहि. अग्ने बृहन्तमध्वरे.. (३) हे क्रांतदर्शी, हव्य भक्षण करने वाले, यज्ञ को सुशोभित करने वाले, दीप्तिशाली एवं महान् अग्नि! हम यज्ञ में तुम्हें समिधाओं द्वारा प्रज्वलित करते हैं. (३) अग्ने विश्वेभिरा गहि देवेभिर्हव्यदातये. होतारं त्वा वृणीमहे.. (४) हे अग्नि! तुम सब देवों के साथ हव्य देने वाले यजमान के यज्ञ में आओ. इसीलिए हम देवों को बुलाने वाले तुमसे प्रार्थना करते हैं. (४) ebook converter DEMO Watermarks*
यजमानाय सुन्वत आग्ने सुवीर्यं वह. देवैरा सत्सि बर्हिषि.. (५) हे अग्नि! तुम सोमरस निचोड़ने वाले यजमान को शोभन बल प्रदान करो एवं देवों के साथ कुशों पर बैठो. (५) समिधानः सहस्रजिदग्ने धर्माणि पुष्यसि. देवानां दूत उक्थ्यः.. (६) हे हजारों को जीतने वाले अग्नि! तुम हवियों द्वारा प्रज्वलित, प्रशंसित एवं देवों के दूत बनकर यज्ञकर्मों को बढ़ाते हो. (६) न्य१ग्निं जातवेदसं होत्रवाहं यविष्ठ्यम्. दधाता देवमृत्विजम्.. (७) हे यजमानो! तुम जातवेद, यज्ञ को वहन करने वाले, अतिशय युवा, द्युतियुक्त एवं ऋतु अनुसार यज्ञ करने वाले अग्नि को स्थापित करो. (७) प्र यज्ञ एत्वानुषगद्या देवव्यचस्तमः. स्तृणीत बर्हिरासदे.. (८) आज प्रकाशमान स्तोताओं द्वारा दिया गया हवि लगातार देवों के पास पहुंचे, हे ऋत्विज्! तुम अग्नि के बैठने के लिए कुश बिछाओ. (८) एदं मरुतो अश्विना मित्रः सीदन्तु वरुणः. देवासः सर्वया विशा.. (९) मरुद्गण, अश्विनीकुमार, मित्र, वरुण आदि देव अपने सभी साथियों को लेकर इन कुशों पर बैठें. (९) सूक्त—२७ देवता—अग्नि अनस्वन्ता सत्पतिर्मामहे मे गावा चेतिष्ठो असुरो मघोनः. त्रैवृष्णो अग्ने दशभिः सहस्रैर्वैश्वानर त्र्यरुणश्चिकेत.. (१) हे सकल मानवों के नेता, साधुओं का पालन करने वाले, अतिशय ज्ञानसंपन्न, बलवान् एवं धनस्वामी अग्नि! वृष्ण के पुत्र त्र्यरुण नामक राजर्षि ने गाड़ी सहित दो बैल एवं दस हजार स्वर्ण मुद्राएं मुझे दीं. इस दान से वह प्रसिद्ध हो गया. (१) यो मे शता च विंशतिं च गोनां हरी च युक्ता सुधुरा ददाति. वैश्वानर सुष्टुतो वावृधानोऽग्ने यच्छ त्र्यरुणाय शर्म.. (२)
हे वैश्वानर! जिस त्र्यरुण ने मुझे सौ स्वर्णमुद्राएं, बीस गाएं एवं रथ में जुते हुए दो घोड़े दिए थे, तुम हमारी स्तुतियों द्वारा प्रज्वलित होकर उसे सुख दो. (२) एवा ते अग्ने सुमतिं चकानो नविष्ठाय नवमं त्रसदस्युः. यो मे गिरस्तुविजातस्य पूर्वीर्युक्तेनाभि त्र्यरुणो गृणाति.. (३) हे अग्नि! जिस त्र्यरुण ने बहुत संतान वाले हम लोगों की अनेक स्तुतियां सुनकर प्रसन्नतापूर्वक मन से विभिन्न वस्तुएं ग्रहण करने को कहा था, उसी प्रकार तुझ अतिशय स्तुति योग्य की अति नवीन स्तुतियों की कामना करने वाले त्रसदस्यु ने भी कहा था. (३) यो म इति प्रवोचत्यश्वमेधाय सूरये. ददद्वचा सनिं यते ददन्मेधामृतायते.. (४) हे अग्नि! जो धन का याचक दानी अश्वमेध नामक राजर्षि के पास आकर याचना करता है, उस स्तुतिकारी भिक्षुक को वे धन देते हैं. यज्ञ के इच्छुक उस अश्वमेध को तुम धन दो. (४) यस्य मा परुषाः शतमूद्धर्षयन्त्युक्षणः. अश्वमेधस्य दानाः सोमाइव त्र्याशिरः.. (५) हे अग्नि! अश्वमेध द्वारा की हुई कामना पूर्ण करने वाले बैलों ने मुझे इस प्रकार प्रसन्न किया है, जिस प्रकार दही, दूध एवं सत्तू से मिला हुआ सोम तुम्हें प्रसन्न करता है. (५) इन्द्राग्नी शतदाव्यश्वमेधे सुवीर्यम्. क्षत्रं धारयतं बृहद्दिवि सूर्यमिवाजरम्.. (६) हे इंद्र एवं अग्नि! तुम याचकों को अनगिनत धन देने वाले अश्वमेध के लिए आकाश स्थित सूर्य के समान शोभन बलयुक्त महान् एवं अमर धन दो. (६) सूक्त—२८ देवता—अग्नि समिद्धो अग्निर्दिवि शोचिरश्रेत्प्रत्यङ्ङुषसमुर्विया वि भाति. एति प्राची विश्ववारा नमोभिर्देवाँ ईळाना हविषा घृताची.. (१) प्रज्वलित अग्नि दीप्तियुक्त आकाश में तेज फैलाते हैं एवं उषाकाल में विस्तृत होकर शोभा पाते हैं. स्तोत्रों द्वारा इंद्र आदि की प्रशंसा करती हुई, पुरोडाश आदि से युक्त स्रुच लेकर विश्ववारा पूर्वाभिमुख जाती हैं. (१) समिध्यमानो अमृतस्य राजसि हविष्कृण्वन्तं सचसे स्वस्तये. विश्वं स धत्ते द्रविणं यमिन्वस्यातिथ्यमग्ने नि च धत्त इत्पुरः.. (२)
हे अग्नि! तुम प्रज्वलित होकर जल पर अधिकार करते हो एवं हव्यदाता यजमान के मंगल के लिए रक्षा करते हो. तुम जिस यजमान के पास जाते हो, वह सभी प्रकार की संपत्ति धारण करता है. वह तुम्हारे सामने तुम्हारे सत्कार योग्य हव्य को रखता है. (२) अग्ने शर्ध महते सौभगाय तव द्युम्नान्युत्तमानि सन्तु. सं जास्पत्यं सुयममा कृणुष्व शत्रूयतामभि तिष्ठा महांसि.. (३) हे अग्नि! हमें शोभन धन वाला बनाने के लिए हमारे शत्रुओं का नाश करो. तुम्हारा तेज उत्कृष्ट हो. तुम हम पति-पत्नी के संबंधों को नियमित एवं हमारे शत्रुओं के तेज को नष्ट करो. (३) समिद्धस्य प्रमहसोऽग्ने वन्दे तव श्रियम्. वृषभो द्युमन्वाँ असि समध्वरेष्विध्यसे.. (४) हे प्रज्वलित एवं परम तेजस्वी अग्नि! हम यजमान तुम्हारी स्तुति करते हैं. तुम कामवर्षी एवं धनवान् हो तथा यज्ञों में भली प्रकार प्रज्वलित होते हो. (४) समिद्धो अग्न आहुत देवान्यक्षि स्वध्वर. त्वं हि हव्यवाळसि.. (५) हे यजमानों द्वारा बुलाए गए एवं शोभन यज्ञ से युक्त अग्नि! तुम भली प्रकार प्रज्वलित होकर इंद्रादि देवों का हवन करो. तुम हव्य वहन करने वाले हो. (५) आ जुहोता दुवस्यताग्निं प्रत्यत्यध्वरे. वृणीध्वं हव्यवाहनम्.. (६) हे ऋत्विजो! तुम हमारा यज्ञ आरंभ होने पर हव्य ढोने वाले अग्नि में हवन करो, उनकी सेवा करो, उन्हें प्राप्त करो एवं अपना हव्य देवों के समीप पहुंचाने के लिए उन्हें वरण करो. (६) सूक्त—२९ देवता—इंद्र एवं उशना त्र्यर्थमा मनुषो देवताता त्री रोचना दिव्या धारयन्त. अर्चन्ति त्वा मरुतः पूतदक्षास्त्वमेषामृषिरिन्द्रासि धीरः.. (१) मनु के यज्ञ के तीन तेजों एवं अंतरिक्ष में होने वाले तीन प्रकाशयुक्तों को मरुतों ने धारण किया है. हे इंद्र! पवित्र-शक्ति वाले मरुत् तुम्हारी स्तुति करते हैं. हे धीर इंद्र! तुम इन्हें देखने वाले हो. (१) अनु यदीं मरुतो मन्दसानमार्चन्निन्द्रं पपिवांसं सुतस्य. आदत्त वज्रमभि यदहिं हन्नपो यह्वीरसृजत्सर्तवा उ.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
जब मरुतों ने निचोड़े हुए सोमरस को पीकर प्रसन्न इंद्र की स्तुति की, तब इंद्र ने वज्र उठाया, शत्रु का नाश किया एवं वृत्र द्वारा रोकी गई विशाल जलराशि को बहने के लिए छोड़ा. (२) उत ब्रह्माणो मरुतो मे अस्येन्द्रः सोमस्य सुषुतस्य पेयाः. तद्धि हव्यं मनुषे गा अविन्ददहन्नहिं पपिवाँ इन्द्रो अस्य.. (३) हे महान् मरुतो! तुम इंद्र के साथ मिलकर इस भली प्रकार निचोड़े गए सोम को पिओ. इसी हव्य ने यजमान को गाएं दिलाई हैं एवं इसी को पीकर इंद्र ने अहि को मारा था. (३) आद्रोदसी वितरं वि ष्कभायत्संविव्यानश्चिद्वियसे मृगं कः. जिगर्तिमिन्द्रो अपजगृराणः प्रति श्वसन्तमव दानवं हन्.. (४) इंद्र ने सोमरस पीने के बाद ही विस्तृत धरती-आकाश को स्तंभित किया था एवं गतिशील बनकर हिरन के समान भागते हुए वृत्र को डराया था. इंद्र ने छिपे हुए एवं सांस लेते हुए वृत्र को आच्छादनरहित करके मारा. (४) अध क्रत्वा मघवन्तुभ्यं देवा अनु विश्वे अददुः सोमपेयम्. यत्सूर्यस्य हरितः पतन्तीः पुरः सतीरुपरा एतशे कः.. (५) हे धनस्वामी इंद्र! तुम्हारे इस कार्य के बदले सभी देवों ने तुम्हें पीने के लिए सोम दिया था. तुमने एतश ऋषि के कल्याण के लिए सामने से आते हुए सूर्य के घोड़ों को रोक दिया था. (५) नव यदस्य नवतिं च भोगानत्साकं वज्रेण मघवा विवृश्चत्. अर्चन्तीन्द्रं मरुतः सधस्थे त्रैष्टुभेन वचसा बाधत द्याम्.. (६) जब धन के स्वामी इंद्र ने शंबर के निन्यानवे नगरों को वज्र द्वारा एक साथ नष्ट कर दिया था, तब मरुतों ने युद्धभूमि में ही त्रिष्टुप् छंद द्वारा इंद्र की स्तुति की थी. इंद्र ने मरुतों की स्तुति से शक्तिशाली बनकर शंबर को बाधा पहुंचाई. (६) सखा सख्ये अपचत्तूयमग्निरस्य क्रत्वा महिषा त्री शतानि. त्री साकमिन्द्रो मनुषः सरांसि सुतं पिबद्वृत्रहत्याय सोमम्.. (७) अग्नि ने अपने मित्र इंद्र के लिए शीघ्र ही तीन सौ भैंसों को पकाया था. इंद्र ने वृत्र को मारने के लिए मनु के तीन पात्रों में भरे हुए सोम को एक साथ पी लिया था. (७) त्री यच्छता महिषाणामघो मास्त्री सरांसि मघवा सोम्यापाः. कारं न विश्वे अह्वन्त देवा भरमिन्द्राय यदहिं जघान.. (८) ebook converter DEMO Watermarks*
हे धनस्वामी इंद्र! जब तुमने तीन सौ भैंसों का मांस खाया, सोमरस से भरे तीन पात्रों को पिया एवं वृत्र को मारा, तब सब देवों ने सोमपान से पूर्ण तृप्त इंद्र को उसी प्रकार बुलाया, जिस प्रकार मालिक अपने दास को बुलाता है. (८) उशना यत्सहस्यै३रयातं गृहमिन्द्र जूजुवानेभिरश्वैः. वन्वानो अत्र सरथं ययाथ कुत्सेन देवैरवनोर्ह शुष्णम्.. (९) हे इंद्र! जब तुम और उशना कवि सबको पराजित करने वाले एवं शीघ्र चलने वाले घोड़ों के द्वारा कुत्स ऋषि के घर गए थे, उस समय तुम शत्रुओं की हिंसा करते हुए समस्त देवों एवं कुत्स के साथ एक रथ पर बैठकर चले थे. तुमने शुष्ण असुर को मारा था. (९) प्रान्यच्चक्रमवृहः सूर्यस्य कुत्सायान्धद्विरिवो यातवेऽकः. अनासो दस्यूँरमृणो वधेन नि दुर्योण आवृणङ्मृध्रवाचः.. (१०) हे इंद्र! तुमने सूर्य के रथ के एक पहिए को पहले ही अलग कर दिया था एवं दूसरा पहिया कुत्स को इसलिए दे दिया था कि वह धन पा सके. तुमने शब्द न करने वाले दस्युओं को संग्राम में वज्र द्वारा वाणीरहित करके मारा था. (१०) स्तोमासस्त्वा गौरिवीतेरवर्धन्नरन्धयो वैदथिनाय पिप्रुम्. आ त्वामृजिश्व्रा सख्याय चक्रे पचन्पक्तीरपिबः सोममस्य.. (११) हे इंद्र! गौरिवीति ऋषि के स्तोत्र तुम्हें बढ़ावें. तुमने विदथिन के पुत्र ऋजिश्व्रा के कल्याण के निमित्त पिप्रु नामक असुर को अपने वश में किया था. ऋजिश्व्रा ने तुम्हारी मित्रता पाने के लिए पुरोडाश पकाकर तुम्हारे सामने रखा था एवं तुमने उसका सोमरस पिया था. (११) नवग्वासः सुतसोमास इन्द्रं दशग्वासो अभ्यर्चन्त्यर्कैः. गव्यं चिदूर्वमपिधानवन्तं तं चिन्नरः शशमाना अप व्रन्.. (१२) नौ एवं दस महीनों तक चलने वाले यज्ञों के कर्त्ता अंगिरावंशीय ऋषियों ने सोम निचोड़कर स्तुतियों द्वारा इंद्र की पूजा की थी. स्तुति करते हुए अंगिरावंशीय ऋषियों ने असुरों द्वारा छिपाए हुए गोसमूह को छुटकारा दिलाया था. (१२) कथो नु ते परि चराणि विद्वान्वीर्या मघवन्त्या चक्रर्थ. या चो नु नव्या कृणवः शविष्ठ प्रेदु ता ते विदथेषु ब्रवाम.. (१३) हे धनस्वामी इंद्र! तुमने जो पराक्रम प्रकट किया था, उसे जानते हुए भी हम तुम्हारे सामने किस प्रकार प्रकट करें? हे शक्तिशाली इंद्र! तुम जो भी नया पराक्रम दिखाओगे, हम यज्ञों में उसका वर्णन करेंगे. (१३) एता विश्वा चकृवाँ इन्द्र भूर्यपरीतो जनुषा वीर्येण. ebook converter DEMO Watermarks*
या चिन्नु वज्रिन्कृणवो दधृष्वान्न ते वर्ता तविष्या अस्ति तस्याः.. (१४) हे शत्रुओं द्वारा अपराजित इंद्र! तुमने अपनी निजी शक्ति द्वारा इन अनेक लोकों को बनाया है. हे वज्रधारी इंद्र! शत्रुओं को शीघ्र पराजित करते हुए तुम जो कुछ करोगे, तुम्हारे उस कार्य को कोई अधिक नहीं कर सकता. (१४) इन्द्र ब्रह्म क्रियमाणा जुषस्व या ते शविष्ठ नव्या अकर्म. वसेव भद्रा सुकृता वस्यू रथं न धीरः स्वपा अतक्षम्.. (१५) हे सर्वाधिक बलवान् इंद्र! तुम्हारे निमित्त हमने जो नए स्तोत्र बनाए हैं, उन्हें तुम स्वीकार करो. बुद्धिमान्, शोभन-कर्म करने वाले एवं धन के इच्छुक हम लोगों ने ये स्तोत्र रथ एवं कपड़ों के समान तुम्हें अर्पण किए हैं. (१५) सूक्त—३० देवता—इंद्र एवं ऋणंचय क्व१स्य वीरः को अपश्यदिन्द्रं सुखरथमीयमानं हरिभ्याम्. यो राया वज्री सुतसोममिच्छन्तदोको गन्ता पुरुहूत ऊती.. (१) वज्रधारी एवं बहुतों द्वारा बुलाए गए इंद्र धन के साथ-साथ सोमरस निचोड़ने वाले यजमान की अभिलाषा पूर्ण करते हुए यजमान की रक्षा करने के निमित्त उसके घर में चले जाते हैं. वे वीर इंद्र कहां हैं? हरि नामक घोड़ों द्वारा खींचे जाते हुए सुखदायक रथ पर बैठकर चलने वाले इंद्र को किसने देखा है? (१) अवाचचक्षं पदमस्य सस्वरुग्रं निधातुरन्वायमिच्छन्. अपृच्छमन्याँ उत ते म आहुरिन्द्रं नरो बुबुधाना अशेम.. (२) हमने इंद्र के छिपे हुए एवं भयानक स्थानों को देखा है. हम ढूंढ़ते हुए अपनी स्थापना करने वाले इंद्र के उस स्थान में गए हैं. हमने दूसरे विद्वानों से इंद्र के विषय में पूछा है. उन नेताओं एवं ज्ञानियों ने कहा कि हमने इंद्र को प्राप्त कर लिया है. (२) प्र नु वयं सुते या ते कृतानीन्द्र ब्रवाम यानि नो जुजोषः. वेददविद्वाञ्छृणवच्च विद्वान्वहतेऽयं मघवा सर्वसेनः.. (३) हे इंद्र! तुमने जो कर्म किए हैं, हम स्तोतागण सोम निचोड़ जाने पर उनका उत्तम वर्णन करते हैं. तुमने भी हमारे जिन कर्मों को स्वीकार किया है, उन्हें न जानने वाले लोग जान लें. जानने वाले लोग उन्हें न जानने वालों को सुनावें. धनस्वामी एवं ज्ञानी इंद्र अपनी सभी सेनाओं सहित जानने वाले एवं सुनाने वालों के समीप जावें. (३) स्थिरं मनश्चकृषे जात इन्द्र वेषीदेको युधये भूयसश्चित्.
अश्मानं चिच्छवसा दिद्युतो वि विदो गवामूर्वमुस्रियाणाम्.. (४) हे इंद्र! तुमने जन्म लेते ही अपना मन स्थिर किया एवं अकेले ही अनगिनत राक्षसों से युद्ध करने के लिए चल पड़े. तुमने अपनी शक्ति द्वारा गायों को छिपाने वाले पर्वत को तोड़ डाला था एवं दुधारू गायों को पाया था. (४) परो यत्त्वं परम आजनिष्ठाः परावति श्रुत्यं नाम बिभ्रत्. अतश्चिदिन्द्रादभयन्त देवा विश्वा अपो अजयद्दासपत्नीः.. (५) हे सर्वोच्च एवं सर्वोत्कृष्ट इंद्र! तुमने दूरदूर तक प्रसिद्ध नाम को धारण करते हुए जन्म लिया था. उस समय सभी देव तुमसे डर गए थे एवं तुमने वृत्र द्वारा रोके गए समस्त जलों को जीत लिया था. (५) तुभ्येदेते मरुतः सुशेवा अर्चन्त्यर्कं सुन्वन्त्यन्धः. अहिमोहानमप आशयानं प्र मायाभिर्मायिनं सक्षदिन्द्रः.. (६) हे इंद्र! ये उत्तम सुख देने वाले स्तोता स्तुतियों द्वारा तुम्हारी प्रशंसा करते हैं एवं तुम्हें पिलाने के लिए अन्नरूपी सोम निचोड़ते हैं. इंद्र ने अपनी शक्तियों द्वारा देवों को बाधा पहुंचाने वाले एवं जलसमूह को रोककर सोए हुए मायावी वृत्र राक्षस को हराया था. (६) वि षू मृधो जनुषा दानमिन्वन्नहन्रगावा मघवन्त्सञ्चकानः. अत्रा दासस्य नमुचेः शिरो यद्वर्तयो मनवे गातुमिच्छन्.. (७) हे धनस्वामी इंद्र! हमारी स्तुति सुनकर तुमने देवों को बाधा पहुंचाने वाले वृत्र को वज्र से मारते हुए जन्म से ही उसके अनुचर राक्षस आदि की हिंसा की थी. हे इंद्र! इस युद्ध में तुम मुझ मनु को सुख देने की इच्छा से नमुचि नामक दास का सिर तोड़ दो. (७) युजं हि मामकृथा आदिदिन्द्र शिरो दासस्य नमुचेर्मथायन्. अश्मानं चित्स्वर्यं१ वर्तमानं प्र चक्रियेव रोदसी मरुद्भ्यः.. (८) हे इंद्र! जिस प्रकार तुमने गर्जन करने वाले एवं घूमते हुए बादल को नष्ट किया था, उसी प्रकार नमुचि नामक दास का सिर तोड़कर उसी समय हमारे साथ मित्रता की थी. उस समय मरुतों के भय से धरती और आकाश पहिए की तरह घूमने लगे थे. (८) स्त्रियो हि दास आयुधानि चक्रे किं मा करन्नबला अस्य सेनाः. अन्तर्ह्यख्यदुभे अस्य धेने अथोप प्रैद्युधये दस्युमिन्द्रः.. (९) नमुचि नामक दास ने स्त्रियों को अपने युद्ध का साधन बनाया. इसकी सारी सेना मेरा क्या कर सकती है? यह सोचते हुए इंद्र ने उनके बीच से उसकी प्यारी दो सुंदरियों को अपने घर में रख लिया एवं नमुचि से लड़ने के लिए चल दिए. (९) ebook converter DEMO Watermarks*
समत्र गावोऽभितोऽनवन्तेहेह वत्सैर्वियुता यदासन्. सं ता इन्द्रो असृजदस्य शाकैर्यदीं सोमासः सुषुता अमन्दन्.. (१०) नमुचि द्वारा चुराई गई गाएं अपने बछड़ों से बिछुड़ जाने पर इधर-उधर भटक रही थीं. वभ्रु ऋषि द्वारा निचोड़े गए सोमरस ने इंद्र को प्रसन्न किया, तब इंद्र ने शक्तिशाली मरुतों के साथ मिलकर वभ्रु की गायों को बिछुड़े हुए बछड़ों से मिला दिया था. (१०) यदीं सोमा बभ्रुधूता अमन्दन्नरोरवीद्वृषभः सादनेषु. पुरन्दरः पपिवाँ इन्द्रो अस्य पुनर्गवामददादुस्रियाणाम्.. (११) जब वभ्रु द्वारा निचोड़े गए सोमरस ने इंद्र को प्रसन्न किया था, तब कामवर्षी इंद्र ने युद्ध में अधिक शब्द किया था. पुरंदर इंद्र ने सोमरस पिया एवं वभ्रु की दुधारू गाएं उन्हें वापस दिलवा दीं. (११) भद्रमिदं रुशमा अग्ने अक्रन्गवां चत्वारि ददतः सहस्रा. ऋणञ्चयस्य प्रयता मघानि प्रत्यग्रभीष्म नृतमस्य नृणाम्.. (१२) हे अग्नि! ऋणंचय राजा के सेवकों ने, जो रुशम देश के निवासी थे, मुझे चार हजार गाएं देकर भला काम किया था. सर्वश्रेष्ठ नेता ऋणंचय द्वारा दिए गए गोरूप धन को मैंने स्वीकार किया था. (१२) सुपेशसं माव सृजन्त्यस्तं गवां सहस्रै रुशमानो अग्ने. तीव्रा इन्द्रमममन्दुः सुतासोऽक्तोर्व्युष्टौ परितक्म्यायाः.. (१३) हे अग्नि! रुशम देश की प्रजाओं ने मुझे अलंकार, वस्त्रादि से सुशोभित करके हजारों गाएं दी थीं. रात बीतने पर अर्थात् प्रातः निचोड़े हुए सोमरस ने इंद्र को प्रसन्न किया. (१३) औच्छत्सा रात्री परितक्म्या याँ ऋणञ्चये राजनि रुशमानाम्. अत्यो न वाजी रघुरज्यमानो बभ्रुश्चत्वार्यसनत्सहस्रा.. (१४) रुशम देश के राजा ऋणंचय के समीप ही मेरी वह गतिशील रात बीत गई थी. वेगवान् घोड़े के सामन शीघ्रतापूर्वक आने वाले वभ्रु ऋषि ने चार हजार गाएं प्राप्त की थीं. (१४) चतुःसहस्रं गव्यस्य पश्वः प्रत्यग्रभीष्म रुशमेष्वग्ने. घर्मश्चित्तप्तः प्रवृजे य आसीदयस्मयस्तम्वादाम विप्राः.. (१५) हे अग्नि! हमने रुशम देश की प्रजाओं से चार हजार गाएं प्राप्त की थीं. उनके पास महावीर के समान सोने का जो उत्तम वर्ण कलश यज्ञ के काम आने के लिए था, उसे हमने गायों का दूध काढ़ने के लिए ले लिया. (१५) ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त—३१ देवता—इन्द्र
सूक्त—३१ देवता—इन्द्र इन्द्रो रथाय प्रवतं कृणोति यमध्यस्थान्मघवा वाजयन्तम्. यूथेव पश्वो व्युनोति गोपा अरिष्टो याति प्रथमः सिषासन्.. (१) धन के स्वामी इंद्र, जिस अन्नाभिलाषी रथ पर बैठते हैं, उसे हांकते भी हैं. जैसे ग्वाला पशुओं के समूह को हांकता है, उसी प्रकार इंद्र शत्रुओं को भगाते हैं. अपराजित एवं देवश्रेष्ठ इंद्र शत्रुओं के धन को चाहते हुए चलते हैं. (१) आ प्र द्रव हरिवो मा वि वेनः पिशङ्गराते अभि नः सचस्व. नहि त्वदिन्द्र वस्यो अन्यदस्त्यमेनांश्चिज्जनिवतश्चकर्थ.. (२) हे हरि नामक घोड़ों के स्वामी इंद्र! तुम सबके सम्मुख भली प्रकार गमन करो. तुम हमारे प्रति इच्छारहित मत होना. हे विविध धनों के स्वामी! तुम हमारी सेवा स्वीकार करो. हे इंद्र! तुमसे श्रेष्ठ कोई नहीं है. तुम पत्नीरहितों को पत्नीयुक्त करते हो. (२) उद्यत्सहः सहस आजनिष्ट देदिष्ट इन्द्र इन्द्रियाणि विश्वा. प्राचोदयत्सुदुघा वव्रे अन्तर्वि ज्योतिषा संववृत्वत्तमोऽवः.. (३) जब सूर्य का प्रकाश उषा के प्रकाश से उत्पन्न होकर श्रेष्ठ बनता है, तब इंद्र यजमानों को सभी प्रकार का धन देते हैं. वे पर्वत के मध्य से दुधारू गायों को छुड़ाते हैं एवं अपने प्रकाश से ढकने वाले अंधकार को नष्ट करते हैं. (३) अनवस्ते रथमश्वाय तक्षन्त्वष्टा वज्रं पुरुहूत द्युमन्तम्. ब्रह्माण इन्द्रं महयन्तो अर्कैरवर्धयन्नहये हन्तवा उ.. (४) हे अनेक जनों द्वारा बुलाए गए इंद्र! ऋभुओं ने तुम्हारे रथ को घोड़ों से जुड़ने योग्य बनाया था एवं त्वष्टा ने तुम्हारे वज्र को चमकाया था. अंगिरावंशीय ऋषियों ने अपने स्तोत्रों द्वारा वृत्र को मारने के लिए तुम्हें उत्तेजित किया था. (४) वृष्णे यत्ते वृषणो अर्कमर्चानिन्द्र ग्रावाणो अदितिः सजोषाः. अनश्वासो ये पवयोऽरथा इन्द्रेषिता अभ्यवर्तन्त दस्यून्.. (५) हे कामवर्षी इंद्र! जब वर्षा करने में समर्थ मरुतों ने तुम्हारी स्तुति की, तब सोम निचोड़ने वाले पत्थर भी प्रसन्नतापूर्वक मिल गए थे. बिना रथ एवं बिना घोड़ों वाले मरुतों ने इंद्र की प्रेरणा पाकर असुरों को पराजित किया था. (५) प्र ते पूर्वाणि करणानि वोचं प्र नूतना मघव न्या चकर्थ. शक्तीवो यद्विभरा रोदसी उभे जयन्नपो मनवे दानुचित्राः.. (६)
हे धन के स्वामी इंद्र! हम तुम्हारे पुराने और नए साहसपूर्ण कार्यों की स्तुति करते हैं. तुमने वे कर्म किए थे. हे वज्रवाले इंद्र! तुम धरती-आकाश को वश में करते हुए मनुष्यों के लिए विचित्र जलों को धारण करते हो. (६) तदिन्नु ते करणं दस्म विप्राहिं यद्घन्नोजो अत्रामिमीथाः. शुष्णस्य चित्परि माया अगृभ्णाः प्रपित्वंयन्नप दस्यूँरसेधः.. (७) हे सुंदर एवं बुद्धिमान् इंद्र! तुमने वृत्र को मारकर जो अपनी शक्ति को सब पर प्रकट किया है वह निश्चित रूप से तुम्हारा कर्म था. हे इंद्र! तुमने शुष्ण असुर की युवती पत्नी को अपने अधिकार में किया एवं युद्ध में शत्रुओं को बाधा पहुंचाई. (७) त्वमपो यदवे तुर्वशायारमयः सुदुघाः पार इन्द्र. उग्रमयातमवहो ह कुत्सं सं ह यद्वामुशना्रन्त देवाः.. (८) हे इंद्र! तुमने नदियों के किनारे खड़े होकर यदु और तुर्वश नामक राजाओं को ऐसा जल प्रदान किया जो वनस्पतियों को बढ़ाने वाला था. हे इंद्र! तुम और कुत्स आक्रमणकारी शुष्ण से लड़ने गए थे. भयानक शुष्ण को मारकर तुमने कुत्स को घर पहुंचाया. तब उशना कवि के साथ सभी देवों ने तुम्हारा स्वागत किया था. (८) इन्द्राकुत्सा वहमाना रथेना वामत्या अपि कर्णे वहन्तु. निः षीम॒द्द्रयो धमथो निः षधस्थान्मघोनो हृदो वरथस्तमांसि.. (९) हे इंद्र एवं कुत्स! एक रथ पर बैठे हुए तुम दोनों को घोड़े यजमान के पास ले जावें. तुमने शुष्ण को जल से बाहर निकाला था एवं धनी यजमानों के हृदयों को ढकने वाला अंधकार दूर किया था. (९) वातस्य युक्तान्त्सुयुजश्चिद्वश्वान्कविश्चिद्देषो अजगन्नवस्युः. विश्वे ते अत्र मरुतः सखाय इन्द्र ब्रह्माणि तविषीमवर्धन्.. (१०) अवस्यु नामक विद्वान् ऋषि ने वायु की गति से चलने वाले एवं रथ में ठीक से जुड़े हुए घोड़ों को प्राप्त किया था. हे इंद्र! अवस्यु के सभी मित्र स्तोताओं ने तुम्हारा बल अपनी स्तुतियों द्वारा बढ़ाया. (१०) सूरश्चिद्रथं परितक्म्यायां पूर्वं करदुपंर जूजुवांसम्. भरच्चक्रमेतशः सं रिणाति पुरो दधत्सनष्यिति क्रतुं नः.. (११) इंद्र ने संग्राम में एतश ऋषि के साथ लड़ने वाले सूर्य का तेज चलने वाला रथ गतिहीन कर दिया था. एतश के कल्याण के लिए इंद्र ने पहले सूर्य के रथ का एक पहिया छीन लिया था. उसीसे इंद्र असुरों का नाश करते हैं. (११) ebook converter DEMO Watermarks*
आयं जना अभिचक्षे जगामेन्द्रः सखाय सुतसोममिच्छन्. वदन्ग्रावाव वेदिं भ्रियाते यस्य जीरमध्वर्यवश्चरन्ति.. (१२) हे मनुष्यो! सोम निचोड़ने वाले अपने मित्र यजमानों की इच्छा करते हुए इंद्र तुम्हें धन देने के लिए आते हैं. अध्वर्यु जिस सोमरस निचोड़ने के साधन पत्थर को चलाते हैं, वह शब्द करता हुआ यज्ञवेदी पर पहुंचता है. (१२) ये चाकनन्त चाकनन्त नू ते मर्ता अमृत मो ते अह आरन्. वावन्धि यज्यूँरुत तेषु धेह्योजो जनेषु येषु ते स्याम.. (१३) हे मरणरहित इंद्र! धन-प्राप्ति के लिए जो लोग बार-बार तुम्हारी अभिलाषा करते हैं, उस मरणशील व्यक्ति के पास कोई पाप नहीं जाता. तुम यजमानों पर कृपा करो. जिन लोगों के बीच हम स्तुति कर रहे हैं, उन्हें तुम अपना बनाओ एवं बल दो. (१३) सूक्त—३२ देवता—इंद्र अदर्दरुत्समसृजो वि खानि त्वमर्णवान्बद्धधानाँ अरम्णाः. महान्तमिन्द्र पर्वतं वि यद्वः सृजो वि धारा अव दानवं हन्.. (१) हे इंद्र! तुमने मेघ को विदीर्ण किया एवं जल निकलने का मार्ग खोल दिया. इस प्रकार बाधक मेघों को विसर्जित किया है. तुमने विशाल मेघ को उन्मुक्त करके पानी बरसाया एवं वृत्र दानव को मारा. (१) त्वमृतुसाँ ऋतुभिर्बद्धधानाँ अरंह ऊधः पर्वतस्य वज्रिन्. अहिं चिदुग्र प्रयुतं शयानं जघन्वाँ इन्द्र तविषीमधत्थाः.. (२) हे वज्र के स्वामी इंद्र! तुम वर्षा ऋतु में बंधे हुए मेघों को मुक्त करो एवं पर्वत को शक्तिसंपन्न बनाओ. हे शक्तिशाली इंद्र! तुमने जल में सोए हुए वृत्र को मारा एवं अपनी शक्ति को प्रसिद्ध बनाया. (२) त्यस्य चिन्महतो निर्मृगस्य वधर्जघान तविषीभिरिन्द्रः. य एक इदप्रतिमर्न्यमान आदस्मादन्यो अजनिष्ट तव्यान्.. (३) अद्वितीय इंद्र ने अकेले ही हिरन के समान तेज चलने वाले वृत्र के आयुधों को अपनी शक्ति द्वारा नष्ट किया. उस समय वृत्र के शरीर से दूसरा बलवान् राक्षस उत्पन्न हुआ. (३) त्यं चिदेषां स्वधया मदन्तं मिहो नपातं सुवृधं तमोग़ाम्. वृषप्रभर्मा दानवस्य भामं वज्रेण वज्री नि जघान शुष्णम्.. (४) बरसने वाले मेघ को वज्र से मारने वाले वज्रधारी इंद्र ने शुष्ण असुर को मारा. वह असुर
प्राणियों का अन्न खाकर प्रसन्न था, वर्षा करने वाले मेघ का रक्षक था एवं तमोगुणारूपी अंधकार के प्रति गतिशील था. (४) त्यं चिदस्य क्रतुभिर्निषत्तममर्मणो विददिदस्य मर्म. यदीं सुक्षत्र प्रभृता मदस्य युयुत्सन्तं तमसि हर्म्ये धाः.. (५) हे शक्तिशाली इंद्र! तुमने नशीले सोमरस को पीकर युद्ध की अभिलाषा करने वाले वृत्र को डराकर अंधेरे में छिपने पर विवश किया था. तुमने अपने आपको दुर्बलतारहित समझने वाले वृत्र का मर्म उसके कार्यों से जान लिया था. (५) त्यं चिदित्था कत्पयं शयानमसूर्ये तमसि वावृधानम्. तं चिन्मन्दानो वृषभः सुतस्योच्चैरिन्द्रो अपगूर्या जघान.. (६) निचोड़े हुए सोमरस को पीने से प्रसन्न हुए कामवर्षी इंद्र ने अंतरिक्ष में सुखकारी जल के बीच सोने वाले एवं घने अंधकार में बढ़ते हुए वृत्र को वज्र ऊंचा उठाकर मारा था. (६) उद्यद्दिन्द्रो महते दानवाय वधैर्यमिष्ट सहो अप्रतीतम्. यदीं वज्रस्य प्रभृतौ ददाभ विश्वस्य जन्तोरधमं चकार.. (७) इंद्र ने जब उस महान् दानव वृत्र को मारने के लिए बाधाहीन वज्र उठाया था एवं वज्र का प्रहार करके उसे मारा था, तब वृत्र को विश्व के सभी प्राणियों से नीचे बना दिया था. (७) त्यं चिदर्णं मधुपं शयानमसिन्वं वव्रं मह्याददुग्रः. अपादमत्रं महता वधेन नि दुर्योण आवृणङ्मृध्रवाचम्.. (८) अति बली इंद्र ने बादलों को रोककर सोने वाले, जल के रक्षक, शत्रुओं का नाश करने वाले एवं सबको आच्छादन करने वाले वृत्र को पकड़ा. इसके बाद इंद्र ने चरणरहित, परिमाणहीन एवं विनष्ट-वाणी वाले वृत्र को अपने शक्तिशाली वज्र द्वारा मार डाला. (८) को अस्य शुष्मं तविषीं वरात एको धना भरते अप्रतीतः. इमे चिदस्य ज्रयसो नु देवी इन्द्रस्यौजसो भियसा जिहाते.. (९) इंद्र के शोषण करने वाले बल को कौन रोक सकता है? अप्रतीत इंद्र अकेले ही शत्रुओं की संपत्तियां छीन लेते हैं. शक्तिशाली धरती-आकाश वेगयुक्त इंद्र के बल के कारण भयभीत होकर शीघ्र चलने लगे. (९) न्यस्मै देवी स्वधितिर्जिहीत इन्द्राय गातुरुशतीव येमे. सं यदोजो युवते विश्वमाभिरनु स्वधाव्ने क्षितयो नमन्त.. (१०) दीप्तिशाली एवं स्वयं रुका हुआ स्वर्ग इंद्र के सामने नीचा हो जाता है. धरती कामनापूर्ण ebook converter DEMO Watermarks*
नारी के समान इंद्र को आत्मसमर्पण करती है. इंद्र जब अपनी शक्ति को सभी प्रजाओं में मिला देते हैं, तब लोग बलशाली इंद्र के सामने क्रमपूर्वक झुकते हैं. (१०) एकं नु त्वा सत्पतिं पाञ्चजन्यं जातं शृणोमि यशसं जनेषु. तं मे जगृभ्र आशसो नविष्ठं दोषा वस्तोर्हवमानास इन्दम्.. (११) हे इंद्र! हमने ऋषियों से तुम्हें मानवों में प्रमुख, सज्जनों का पालनकर्त्ता, पंचजनों के कल्याण के लिए उत्पन्न एवं यशस्वी सुना है. रात-दिन स्तुति करने वाले एवं अभिलाषाओं का वर्णन करने वाले हमारे पुत्र-पौत्र अतिशय स्तुतिपात्र इंद्र को प्राप्त करें. (११) एवा हि त्वामृतुथा यातयन्तं मघा विप्रेभ्यो ददतं शृणोमि. किं ते ब्रह्माणो गृहते सखायो ये त्वाया निदधुः काममिन्द्र.. (१२) हे इंद्र! तुम समय-समय पर प्राणियों को प्रेरित करते हो एवं स्तुति करने वाले को धन देते हो, हमने ऐसा सुना है. जो स्तोता अपनी इच्छा तुम में स्थित कर देते हैं, तुम्हारे मित्र वे तुमसे क्या प्राप्त करते हैं? (१२) सूक्त—३३ देवता—इंद्र महि महे तवसे दीध्ये नृनिन्द्रायेत्था तवसे अतव्यान्. यो अस्मै सुमतिं वाजसातौ स्तुतो जने समर्यश्चिकेत.. (१) मैं परम दुर्बल संवरण ऋषि परम शक्तिशाली इंद्र के लिए उत्तम स्तुति बोलता हूं. उससे मेरे समान लोग शक्तिशाली बनेंगे. संग्राम में अन्नलाभ करने के उद्देश्य से स्तुति सुनकर इंद्र मुझ संवरण के स्तोताओं पर कृपा करें. (१) स त्वं न इन्द्र धियसानो अर्कैर्हरीणां वृषन्योक्त्रमश्रेः. या इत्था मघवन्ननु जोषं वक्षो अभि प्रार्यः सक्षि जनान्.. (२) हे कामवर्षी एवं धनस्वामी इंद्र! तुम हमारा ध्यान करते हुए एवं प्रसन्नता उत्पन्न करने वाले स्तोत्रों के कारण रथ में जुते हुए घोड़ों की लगाम पकड़ते हुए अपने शत्रुओं को पराजित करो. (२) न ते त इन्द्राभ्य१स्मदृष्वायुक्तासो अब्रह्मता यदसन्. तिष्ठा रथमधि तं वज्रहस्ता रश्मिं देव यमसे स्वश्वः.. (३) हे महान् इंद्र! जो हम लोगों अर्थात् तुम्हारे भक्तों से भिन्न हैं, तुमसे जो संयुक्त नहीं हैं एवं यज्ञकर्म अर्थात् यज्ञ नहीं करते हैं, वे तुम्हारे मनुष्य नहीं हैं. हे हाथ में वज्र लेने वाले इंद्र! हमारे यज्ञ में आने के लिए तुम रथ को स्वयं हांकते हो. (३) ebook converter DEMO Watermarks*
पुरू यत्त इन्द्र सन्त्युक्था गवे चकर्थोर्वरासु युध्यन्. ततक्षे सूर्याय चिदोकसि स्वे वृषा समत्सु दासस्य नाम चित्.. (४) हे इंद्र! तुम्हारे निजी स्तोत्र बहुत से हैं. तुम उपजाऊ धरती पर वर्षा के जल के निमित्त जल प्रतिबंधकों का नाश करते हो. कामवर्षी इंद्र! तुम सूर्य के स्थान अंतरिक्ष में वर्षा रोकने वाले राक्षसों के साथ युद्ध करके उनका नाम तक मिटा देते हो. (४) वयं ते त इन्द्र ये च नरः शर्धो जज्ञाना याताश्च रथाः. आस्माज्जगम्यादहिशुष्म सत्वा भगो न हव्यः प्रभृथेषु चारुः.. (५) हे इंद्र! हम तुम्हारे सेवक ऋत्विज् और यजमान-यज्ञ करके तुम्हारा बल बढ़ाते हैं एवं हवन करने के लिए तुम्हारे समीप जाते हैं. हे व्यापक बलशाली इंद्र! तुम्हारी कृपा से युद्ध में हमारे पास प्रशंसनीय योद्धा उसी प्रकार आवें, जिस प्रकार भग के समीप गए थे. (५) पपृक्षेण्यमिन्द्र त्वे ह्योजो नृम्णानि च नृतमानो अमर्त्तः. स न एनीं वसव्हानो रयिं दाः प्रार्यः स्तुषे तुविमघस्य दानम्.. (६) हे पूजनीय शक्ति वाले, सर्वव्यापक एवं मरणरहित इंद्र! तुम अपने तेज से जगत् को ढककर हमें उज्ज्वल वर्ण का धन पर्याप्त मात्रा में दो. हम अधिक धन वाले इंद्र के दान की प्रशंसा करते हैं. (६) एवा न इन्द्रोतिभिरव पाहि गृणतः शूर कारून्. उत त्वचं ददतो वाजसातौ पिप्रीहि मध्वः सुषुतस्य चारोः.. (७) हे शूर इंद्र! स्तुतिकर्त्ता एवं ऋत्विज् हम लोगों की तुम रक्षा करो. तुम युद्ध में आच्छादक रूप धारण करके हमारे द्वारा निचोड़ा हुआ सोम पीकर प्रसन्न बनो. (७) उत त्ये मा पौरुकुत्स्यस्य सूरेस्त्रसदस्योर्हिरणिनो रराणाः. वहन्तु मा दश श्येतासो अस्य गैरीक्षितस्य ऋतुभिर्नु सश्चे.. (८) गिरिक्षित गोत्र में उत्पन्न पुरुकुत्स के पुत्र, स्वर्ण के स्वामी एवं प्रेरक त्रसदस्यु द्वारा दिए गए सफेद रंग के दस घोड़े हमारा रथ खींचें. रथ में घोड़े जोड़ने का काम हम शीघ्र कर लेंगे. (८) उत त्ये मा मारुताश्वस्य शोणाः क्रत्वामघासो विदथस्य रातौ. सहस्रा मे च्यवतानो ददान आनूकमर्यो वपुषे नार्चत्.. (९) मरुताश्व के पुत्र विद्ध के द्वारा दिए गए लाल रंग के घोड़े शीघ्र गति से हमें ढोवें. मुझ पूज्य को उन्होंने हजारों संख्या में धन एवं शरीर के गहने दिए हैं. (९) ebook converter DEMO Watermarks*
उत त्ये मा ध्वन्यस्य जुष्टा लक्ष्मण्यस्य सुरुचो यतानाः. मह्ना रायः संवरणस्य ऋषेर्व्रजं न गावः प्रयता अपि ग्मन्.. (१०) लक्ष्मण के पुत्र ध्वन्यक द्वारा दिए हुए दीप्तिशाली एवं वहन करने में समर्थ घोड़े हमें ढोवें? गाएं जिस प्रकार गोचर भूमि में जाती हैं, उसी प्रकार ध्वन्यक द्वारा दिया हुआ धन मुझ संवरण ऋषि के घर में आवे. (१०) सूक्त—३४ देवता—इंद्र अजातशत्रुमजरा स्वर्वत्यनु स्वधामिता दस्ममीयते. सुनोतन पचत ब्रह्मवाहसे पुरुष्टुताय प्रतरं दधातन.. (१) हे ऋत्विजो! अजातशत्रु, शत्रुहंता एवं अक्षीण, स्वर्गदाता तथा अधिक हव्य प्राप्त करने वाले इंद्र के निमित्त पुरोडाश पकाओ तथा सोमरस निचोड़ो. वे इंद्र स्तोत्र धारण करने वाले एवं बहुतों द्वारा स्तुत हैं. (१) आ यः सोमेन जठरमपिप्रातामन्दत मधवा मध्वो अन्धसः. यदीं मृगाय हन्तवे महावधः सहस्रभृष्टिमुशना वधं यमत्.. (२) इंद्र ने सोमरस से अपना पूरा पेट भर लिया था एवं वे मधुर सोमरस पीकर प्रसन्न हुए थे. इंद्र ने मृग असुर को मारने के लिए अपने असीमित तेज वाले महान् वज्र को उठाया था. (२) यो अस्मै घ्रंस उत वा य ऊधनि सोमं सुनोति भवति द्युमाँ अह. अपाप शक्रस्ततनुष्टिमूहति तनूशुभ्रं मघवा यः कवासखः.. (३) जो यजमान महान् इंद्र के लिए रात-दिन सोमरस निचोड़ते हैं, वे दीप्तिशाली बनते हैं. जो लोग धर्मकार्य करना चाहते हैं, शोभन अलंकार आदि धारण करते हैं, किंतु धनवान् होकर भी बुरे लोगों को अपना मित्र बनाते हैं, शक्तिशाली इंद्र ऐसे लोगों का त्याग कर देते हैं. (३) यस्यानधीत्पितरं यस्य मातरं यस्य शक्रो भ्रातरं नात ईषते. वेतीद्वस्य प्रयता यतङ्करो न किल्बिषादीषते वस्व आकरः.. (४) इंद्र ने जिस अयज्ञकर्त्ता के पिता, माता एवं भ्राता का वध किया था, उसके समीप से भी वे दूर नहीं जाते, अपितु उसके द्वारा दिए गए हव्य की कामना करते हैं. शासनकर्त्ता एवं धनस्वामी इंद्र पाप से दूर नहीं भागते. (४) न पञ्चभिर्दशभिर्वष्ट्यारभं नासुन्वता सचते पुष्यता चन. जिनाति वेदमयुा हन्ति वा धुनिरा देवयुं भजति गोमति व्रजे.. (५) इंद्र शत्रुओं का नाश करने के लिए पांच या दस सहायकों की इच्छा नहीं करते. सोम न ebook converter DEMO Watermarks*
निचोड़ने वाले एवं अपने बांधवों का पोषण न करने वाले के साथ इंद्र नहीं मिलते, ऐसे लोगों को वे कष्ट देते हैं अथवा मार डालते हैं एवं अपने भक्त को गायों से पूर्ण गोशाला का अधिकारी बनाते हैं. (५) वित्वक्षणः समृत्तौ चक्रमासजोऽसुन्वतो विषुणः सुन्वतो वृधः. इन्द्रो विश्वस्य दमिता विभीषणो यथावशं नयति दासमार्यः.. (६) इंद्र संग्राम में शत्रुओं को नष्ट करने के लिए अपने रथ के पहिए को तेज चलाते हैं. वे सोम न निचोड़ने वाले से दूर रहते हैं एवं सोम निचोड़ने वाले की वृद्धि करते हैं. विश्व के शिक्षक, डराने वाले एवं स्वामी इंद्र दासकर्म करने वालों को वश में रखते हैं. (६) समीं पणेरजति भोजनं मुषे वि दाशुषे भजति सूनरं वसु. दुर्गे चन ध्रियते विश्व आ पुरु जनो यो अस्य तविषीमचुक्रुधत्.. (७) इंद्र दान न करने वाले का धन चुराने के लिए लोभी बनियों के समान जाते हैं एवं मानवशोभा बढ़ाने वाले उस धन को हव्यदाता यजमान को देते हैं. जो व्यक्ति इंद्र के बल को उत्तेजित करता है वह विपत्ति में पड़ता है. (७) सं यज्जनौ सुधनौ विश्वशर्धसाववेदिन्द्रो मघवा गोषु शुभ्रिषु. युजं ह्य१न्यमकृत प्रवेपन्युदीं गव्यं सृजते सत्वभिर्धुनिः.. (८) धनवान् इंद्र जब शोभन धन वाले एवं सर्वसाधनसंपन्न दो लोगों को उत्तम गायों के लिए झगड़ता देखते हैं तो यज्ञ करने वाले की सहायता करते हैं. बादलों को कंपित करने वाले इंद्र यज्ञकर्त्ता को गाएं देते हैं. (८) सहस्रसामाग्निवेशिं गृणीषे शत्रिमन उपमां केतुमर्यः. तस्मा आपः संयतः पीपयन्त तस्मिन्क्षत्रममवत्त्वेषमस्तु.. (९) हे अग्नि रूप इंद्र! हम अपरिमित धन दान करने वाले अत्रि ऋषि की स्तुति करते हैं जो अग्निवेश के पुत्र एवं उपमा के रूप में प्रसिद्ध हैं. उन्हें जल भली प्रकार संतुष्ट करें एवं उनका धन बल और दीप्ति वाला हो. (९) सूक्त—३५ देवता—इंद्र यस्ते साधिष्ठोऽवस इन्द्र क्रतुष्टमा भर. अस्मभ्यं चर्षणीसहं सस्निं वाजेषु दुष्टरम्.. (१) हे इंद्र! तुम्हारा अतिशय साधक यज्ञकर्म हमारी रक्षा करे. वह कर्म सबको पराजित करने वाला एवं शुद्ध है. युद्ध में दूसरे उसे नहीं हरा सकते. (१)
यदिन्द्र ते चतस्रो यच्छूर सन्ति तिस्रः. यद्वा पञ्च क्षितीनामवस्तस्तु नु आ भर.. (२) हे शूर इंद्र! चार वर्षों, तीन लोकों एवं पांच जनों से संबंधित जो तुम्हारी रक्षा है, वह हमें प्रदान करो. (२) आ तेऽवो वरेण्यं वृषन्तमस्य हूमहे. वृषजूतिर्हि जज्ञिष आभूभिरिन्द्र तुर्वणिः.. (३) हे कामपूरकों में श्रेष्ठ, वर्षा करने वाले एवं शत्रुओं को शीघ्र मारने वाले इंद्र! तुम्हारा रक्षाकार्य उत्तम है. हम उसे पुकारते हैं. तुम सर्वव्यापक मरुतों के साथ हमारी रक्षा करो. (३) वृषा ह्यसि राधसे जज्ञिषे वृष्णि ते शवः. स्वक्षत्रं ते धृषन्मनः सत्राहामिन्द्र पौंस्यम्.. (४) हे इंद्र! तुम कामवर्षी हो, यजमानों को धन देने हेतु उत्पन्न हुए हो एवं तुम्हारा बल अभिलाषापूरक है. तुम्हारा मन शक्तिशाली एवं विरोधियों को हराने वाला है. तुम्हारा पौरुष समूह नष्ट करने वाला है. (४) त्वं तमिन्द्र मर्त्यममित्रयन्तमद्रिवः. सर्वरथा शतक्रतो नि याहि शवसस्पते.. (५) हे वज्रधारी, शतक्रतु एवं शक्ति के स्वामी इंद्र! तुम शत्रुता का आचरण करने वाले के प्रति अपने सर्वत्रगामी रथ द्वारा चलते हो. (५) त्वामिद्वृत्रहन्तम जनासो वृक्तबर्हिषः. उग्रं पूर्वीषु पूर्व्यं हवन्ते वाजसातये.. (६) हे शत्रुओं को मारने वाले इंद्र! यज्ञ में कुश बिछाने वाले यजमान युद्ध में सहायता के लिए वज्र उठाए हुए एवं प्रजाओं के मध्य प्राचीन तुझ इंद्र को ही पुकारते हैं. (६) अस्माकमिन्द्र दुष्टरं पुरोयावानमाजिषु. सयावानं धनेधने वाजयन्तमवा रथम्.. (७) हे इंद्र! तुम हमारे दुस्तर, युद्धों में आगे चलने वाले, अनुचरों सहित व युद्ध में सभी प्रकार के धनों की इच्छा करने वाले रथ की रक्षा करो. (७) अस्माकमिन्द्रेहि नो रथमवा पुरन्ध्या. वयं शविष्ठ वार्यं दिवि श्रवो दधीमहि दिवि स्तोमं मनामहे.. (८) हे इंद्र! तुम हमारे पास आत्मीय बनकर आओ एवं अपनी उत्तम बुद्धि द्वारा हमारे रथ ebook converter DEMO Watermarks*