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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

सुशेव्यं नमसा रातहव्याः शिशुं मृजन्त्यायवो न वासे.. (१४) यजमान के होता, हव्यपात्र उठाने वाले ऋत्विज् मातारूपी धरती के विशाल एवं उज्ज्वल वेदीरूप स्थान पर बैठते हैं. सांसारिक लोग पैदा हुए बालक की शरीर वृद्धि के निमित्त जिस प्रकार उसकी मालिश करते हैं, उसी प्रकार उत्पन्न अग्नि का पोषण स्तुतियों से किया जाता है. (१४) बृहद्वयो बृहते तुभ्यमग्ने धियाजुरो मिथुनासः सचन्त. देवोदेवः सुहवो भूतु मह्यं मा नो माता पृथिवी दुर्मतौ धात्.. (१५) हे महान् अग्नि! यज्ञकर्म करते हुए बुढ़ापे को प्राप्त स्त्रीपुरुष तुम्हें अधिक मात्रा में अन्न भेंट करते हैं. सभी देव हमारे लिए शोभन आह्वान वाले हों. धरती माता हमें दुर्बुद्धि में न डाले. (१५) उरौ देवा अनिबाधे स्याम.. (१६) हे देवगण! हम असीम सुख प्राप्त करें. (१६) समश्विनोरवसा नूतनेन मयोभुवा सुप्रणीती गमेम. आ नो रयिं वहतमोत वीराना विश्वान्यमृता सौभगानि.. (१७) हम अश्विनीकुमारो की परम नवीन सुख देने वाली रक्षा का अनुभव करें. हे मरणरहित अश्विनीकुमारो! तुम हमें धन, वीर पुत्र एवं समस्त सौभाग्य दो. (१७) सूक्त—४४ देवता—विश्वेदेव तं प्रत्नथा पूर्वथा विश्वथेमथा ज्येष्ठतातिं बर्हिषदं स्वर्विदम्. प्रतीचीनं वृजनं दोहसे गिराशुं जयन्तमनु यासु वर्धसे.. (१) हे अंतरात्मा! पुराने यजमान, हमारे पूर्वज, समस्त प्राणी एवं आधुनिक लोग जिस प्रकार देवों में श्रेष्ठ, कुश पर विराजने वाले, सर्वज्ञ, हमारे सामने उपस्थित, शक्तिशाली, शीघ्रगामी एवं सबको हराने वाले इंद्र की स्तुति करके सफल मनोरथ हुए थे, उसी प्रकार तुम भी बनो. (१) श्रिये सुदृशीरुपरस्य याः स्वर्वरोचमानः ककुभामचोदते. सुगोपा असि न दभाय सुक्रतो परो मायाभिर्ऋत आस नाम ते.. (२) हे स्वर्ग में दीप्तिशाली इंद्र! गतिहीन-मेघ के भीतर के शोभन-जल को तुम सभी प्राणियों के हित के लिए समस्त दिशाओं में पहुंचाओ. हे शोभन-कर्म करने वाले इंद्र! तुम प्राणियों के रक्षक बनो, उनकी हिंसा मत करो. तुम आसुरी मायाओं से परे हो, इसलिए

सत्यलोक में तुम्हारा नाम है. (२) अत्यं हविः सचते सच्च धातु चारिष्टगातुः स होता सहोभरिः. प्रसर्साणो अनु बर्हिर्वेषा शिशुर्मध्ये युवाजरो विसुहा हितः.. (३) अग्नि सत्य, फलसाधक एवं सबको धारण करने वाले हव्य को सदा स्वीकार करते हैं. अग्नि बाधाहीन गति वाले, होम-निष्पादक एवं शक्तिदाता हैं. वे कुशों पर बैठने वाले, वर्षकारी, ओषधियों में स्थित, शिशु, युवा एवं जरारहित हैं. (३) प्र व एते सुयुजो यामन्निष्टये नीचीरमुष्मै यम्य ऋतावृधः. सुयन्तुभिः सर्वशासैरभीशुभिः क्रिविर्नामानि प्रवणे मुषायती.. (४) यज्ञ में जाने की इच्छुक, निम्न गतिशील, यजमानों द्वारा प्राप्त करने योग्य, यज्ञ बढ़ाने वाली, शोभन गमनशील एवं सब पर शासन करने वाली किरणों द्वारा सूर्य निचले स्थान में भरे जल को चुराता है. (४) सज्जर्भुराणस्तरुभिः सुतेगृहं वयाकिनं चित्तगर्भासु सुस्वरुः. धारवाकेष्वृजुगाथ शोभसे वर्धस्व पत्नीरभि जीवो अध्वरे.. (५) हे शोभन स्तुतियों वाले अग्नि! लकड़ी के बने पात्र में रखे एवं निचोड़े हुए सोमरस को पीकर एवं मनोहर स्तुतियों को सुनकर जब तुम प्रसन्न होते हो, तब तुम ऋत्विजों से विशेष शोभा पाते हो. तुम यज्ञ में सबको जीवन देने वाली एवं सबका रक्षण करने वाली ज्वालाओं को बढ़ाओ. (५) याद्गेव ददृशे ताद्गुच्यते सं छायया दधिरे सिध्रयाप्स्वा. महीमस्मभ्यमुरुषामुरु ज्रयो बृहत्सुवीरमनपच्युतं सहः.. (६) यह समस्त देवों का समूह जैसा दिखाई देता है वैसा ही वर्णन किया जाता है. अभिलाषा पूर्ण करने वाली उस दीप्ति से वे जल में अपना रूप स्थिर करते हैं. वे महान् एवं बहुत देने वाला धन महान् वेग, वीरतायुक्त पुत्र एवं समाप्त न होने वाला बल दें. (६) वेत्यग्रुर्जनिवान्वा अति स्पृधः समर्यता मनसा सूर्यः कविः. घ्रंसं रक्षन्तं परि विश्वतो गयमस्माकं शर्म वनवत्स्वावसुः.. (७) सर्वज्ञ, असुरों के साथ युद्ध के इच्छुक, आगे चलने वाले, अपनी पत्नी उषा के साथ आगे बढ़ने के अभिलाषी एवं धन के स्वामी सूर्य हमारे लिए दीप्तिशाली एवं समस्त रक्षासाधनों वाला घर और संपूर्ण सुख दें. (७) ज्यायांसमस्य यतुनस्य केतुन ऋषिश्वरं चरति यासु नाम ते. याद्ग्श्मिन्धायि तमपस्यया विदद्य उ स्वयं वहते सो अरं करत्.. (८) ebook converter DEMO Watermarks*

हे अतिशय वृद्ध ऋषियों द्वारा स्तुत एवं गमनशील सूर्य! जिन स्तुतियों में तुम्हारे प्रति श्रद्धा भाव है, तुम्हें प्रसिद्ध करने वाले कर्मों से युक्त उन स्तुतियों द्वारा यजमान तुम्हारी सेवा करते हैं. वे जिस बात की कामना करते हैं, उसे वास्तविक रूप से जान लेते हैं. अपनी इच्छा से तुम्हारी सेवा करने वाले पर्याप्त फल पाते हैं. (८) समुद्रमासामव तस्थे अग्रिमा न रिष्यति सवनं यस्मिन्नायता. अत्रा न हार्दि क्रवणस्य रेजते यत्रा मतिर्विद्यते पूतबन्धनी.. (९) हमारा प्रधान स्तोत्र उसी प्रकार सूर्य को प्राप्त हो, जिस प्रकार सरिताएं सागर के पास जाती हैं. यज्ञशाला में की गई सूर्यस्तुति कभी समाप्त नहीं होती, जिस स्थान में सूर्य के प्रति पवित्र भावना रहती है, वहां यजमानों की अभिलाषा कभी अपूर्ण नहीं रहती. (९) स हि क्षत्रस्य मनसस्य चित्तिभिरेवावदस्य यजतस्य सध्रे:. अवत्सारस्य स्पृणवाम रण्वभिः शविष्ठं वाजं विदुषा चिदर्ध्यम्.. (१०)

यो जागार तमयं सोम आह तवाहमस्मि सख्ये न्योकाः.. (१४) जो देव यज्ञशाला में सदा जाग्रत रहते हैं, ऋचाएं उनकी कामना करती हैं. स्तोत्र जागने वाले देव को ही प्राप्त होते हैं, जागने वाले देव से सोम ने कहा—“मैं तुम्हारा हूं, मैं तुम्हारे नियत स्थान में तुम्हारे साथ रहूं.” (१४) अग्निर्जागार तमृचः कामयन्तेऽग्निर्जागार तमु सामानि यन्ति. अग्निर्जागार तमयं सोम आह तवाहमस्मि सख्ये न्योकाः.. (१५) अग्नि देव यज्ञशाला में सदा जागने वाले हैं, ऋचाएं उनकी कामना करती हैं. सदा जागने वाले अग्नि देव को ही स्तोत्र प्राप्त होते हैं. जागने वाले अग्नि देव से सोमरस कहे —“मैं तुम्हारा हूं. हे अग्नि! मैं तुम्हारे निश्चित स्थान में तुम्हारे साथ रहूं.” (१५) सूक्त—४५ देवता—विश्वेदेव विदा दिवो विष्यन्नद्रिमुक्थैरायत्या उषसो अर्चिनो गुः. अपावृत व्रजिनीरुत्स्वर्गार्द्धि दुरो मानुषीर्देव आवः.. (१) इंद्र ने अंगिरागोत्रीय ऋषियों की स्तुति सुनकर वज्र फेंका. इससे आने वाली उषा की किरणें सभी जगह फैल गईं. अंधकार के समूह को समाप्त करके सूर्य प्रकाशित होते हैं एवं मानवों के द्वार खोल देते हैं. (१) वि सूर्यो अमतिं न श्रियं सादोर्वाद् गवां माता जानती गात्. धन्वर्णसो नद्य१ः खादोअर्णाः स्थूणेव सुमिता दृंहत द्यौः.. (२) सूर्य पदार्थों के भिन्न रूप के समान ही परिवर्तितरूप धारण करते रहते हैं. किरणों की माता उषा सूर्योदय की बात जानती हुई आकाश से उतरती है. किनारों को तोड़ने वाली नदियां जल से भरकर बहती हैं. स्वर्ग घर में गड़े हुए लकड़ी के खंभे के समान स्थिर हो जाता है. (२) अस्मा उक्थाय पर्वतस्य गर्भो महीनां जनुषे पूर्व्याय. वि पर्वतो जिहीत साधत द्यौराविवासन्तो दसयन्त भूम.. (३) महान् स्तुतियों का निर्माण करने वाले प्राचीन ऋषियों के समान हम स्तुति करते हैं तो बादलों से जल बरसता है. आकाश अपना कार्य पूर्ण करता है इसलिए पानी बरसता है. यज्ञकर्म करने वाले अंगिरागोत्रीय ऋषि बहुत अधिक थक जाते हैं. (३) सूक्तेभिर्वो वचोभिर्देवजुष्टैरिन्द्रा न्वाग्नी अवसे हुवध्यै. उक्थेभिर्हि ष्मा कवयः सुयज्ञा आविवासन्तो मरुतो यजन्ति.. (४)

हे इंद्र एवं अग्नि! हम लोग अपनी रक्षा के लिए तुम दोनों को देवों द्वारा स्वीकार करने योग्य उत्तम स्तुतियों से बुलाते हैं। शोभन यज्ञ करने वाले ज्ञानीजन मरुतों के समान यज्ञसेवा करते हुए तुम दोनों को प्रसन्न करने का प्रयत्न करते हैं। (४) एतो न्विद्य सुध्यो३ भवाम प्र दुच्छुना मिनवामा वरीयः. आरे द्वेषांसि सनुतर्दधामायाम प्राञ्चो यजमानमच्छ.. (५) हे देवो! यज्ञ के दिन तुम विशेष रूप से हमारे समीप आओ. इस दिन हम शुभकर्मों वाले बनते हैं, शत्रुओं को पराजित करते हैं, छिपे हुए शत्रुओं को समाप्त करते हैं एवं यजमानों के सामने जाते हैं. (५) एता धियं कृणवामा सखायोऽप या माताँ ऋणुत व्रजं गोः. यया मनुर्विशिशिप्रं जिगाय यया वणिग्वङ्कुरापा पुरीषम्.. (६) हे मित्रो! आओ. हम लोग मिलकर स्तुति करें. इन स्तुतियों से चुराई गई गायों के भवन का द्वार खुलता है. इन्हीं से मनु ने विशिशिप्र नामक असुर को जीता था एवं इन्हीं की सहायता से वणिक तुल्य कक्षीवान् ने वन में जाकर जल पाया था. (६) अनूनोदत्र हस्तयतो अद्रिरार्चन्येन दश मासो नवग्वाः. ऋतं यती सरमा गा अविन्दद्विश्वानि सत्याङ्गिराश्चकार.. (७) इस यज्ञ में ऋत्विजों द्वारा सोमलता कूटने के लिए काम में आने वाले पत्थर शब्द करते हैं. इन्हीं पत्थरों की सहायता से निचुड़े हुए सोम द्वारा नवग्व एवं दशग्व यज्ञ करने वाले अत्रिवंशी ऋषियों ने इंद्र की पूजा की थी. सरमा ने यज्ञ में आकर गायों को प्राप्त कराया एवं अंगिरागोत्रीय ऋषियों के स्तोत्र सफल हुए. (७) विश्वे अस्या व्युषि माहिनायाः सं यद् गोभिरङ्गिरसो नवन्त. उत्स आसां परमे सधस्थ ऋतस्य पथा सरमा विदद्गाः.. (८) इस पूजनीया उषा का प्रकाश फैलते ही अंगिरागोत्रीय ऋषियों ने गायों को प्राप्त किया. गोशाला में दूध दुहा जाने लगा, क्योंकि सत्य मार्ग से सरमा ने गायों को देख लिया था. (८) आ सूर्यो यातु सप्ताश्वः क्षेत्रं यदस्योर्विया दीर्घयाथे. रघुः श्येनः पतयदन्धो अच्छा युवा कविर्दीदयद्गोषु गच्छन्.. (९) सात घोड़ों के स्वामी सूर्य हमारे सामने आवें. सूर्य की लंबी यात्रा का क्षेत्र दीर्घ-गमन अपेक्षित करता है. सूर्य तीव्रगामी श्येन के समान हव्य के समीप आते हैं. अतिशय युवा एवं ज्ञानी सूर्य अपनी किरणों के साथ चलते हुए विशेषरूप से प्रकाशित होते हैं. (९) आ सूर्यो अरुहच्छुक्रमर्णोऽयुक्त यद्धरितो वीतपृष्ठाः. ebook converter DEMO Watermarks*

उद्ना न नावमनयन्त धीरा आशृण्वतीरापो अर्वागतिष्ठन्.. (१०) सूर्य दीप्तिशाली जल पर आरूढ़ होते हैं. सूर्य जब अपने रथ में सुंदर पीठ वाले घोड़ों को जोड़ते हैं, तब धीर यजमान उन्हें जल पर चलने वाली नाव के समान ले आते हैं एवं सूर्य की आज्ञा मानने वाली जलराशि झुक जाती है. (१०) धियं वो अप्सु दधिषे स्वर्षा ययातरन्दश मासो नवग्वा:. अया धिया स्याम देवगोपा अया धिया तुतुर्यामात्यंह:.. (११) हे देवो! हम तुम्हारी सब कुछ देने वाली स्तुति को जलप्राप्ति निमित्त बोल रहे हैं. नवग्व यज्ञ करने वाले अत्रिगोत्रीय ऋषियों ने इन्हीं के सहारे दस महीने बिताए थे. इन्हीं स्तुतियों के कारण हम देवों द्वारा रक्षित हों एवं पापों को लांघ सकें. (११) सूक्त—४६ देवता—विश्वेदेव आदि हयो न विद्वाँ अयुजि स्वयं धुरि तां वहामि प्रतरणीमवस्युवम्. नास्या वश्मि विमुचं नावृतं पुनर्विद्वान्पथ: पुरएत ऋजु नेषति.. (१) सब कुछ जानने वाले प्रतिक्षत्र ऋषि ने यज्ञ में अपने आपको इस तरह लगा दिया है, जैसे घोड़ा गाड़ी में जुत जाता है. हम अध्वर्यु एवं होता भी उस उद्धार करने वाले एवं रक्षाकारक कार्य का बोझा ढोते हैं. हम इससे छूटना नहीं चाहते और न इसे बार-बार ढोना चाहते हैं. मार्ग को जानने वाले देव आगे चलते हुए सरलतापूर्वक लोगों को ले चलें. (१) अग्न इन्द्र वरुण मित्र देवा: शर्ध: प्र यन्त मारुतोत विष्णो. उभा नासत्या रुद्रो अध ग्ना: पूषा भग: सरस्वती जुषन्त.. (२) हे इंद्र, अग्नि, वरुण एवं मित्र देव! हमें बल दो. मरुद्गण एवं विष्णु भी हमें बल दें. दोनों अश्विनीकुमार, रुद्र, समस्त देवों की पत्नियां, पूषा, भग एवं सरस्वती हमारी स्तुति को स्वीकार करें. (२) इन्द्राग्नी मित्रावरुणादितिं स्व: पृथिवीं द्यां मरुतः पर्वताँ अप:. हुवे विष्णुं पूषणं ब्रह्मणस्पतिं भगं नु शंसं सवितारमूतये.. (३) हम रक्षा के निमित्त इंद्र, अग्नि, मित्र, वरुण, अदिति, धरती, आकाश, मरुद्गण, पर्वत, जल, विष्णु, पूषा, ब्रह्मणस्पति एवं भग को बुलाते हैं. (३) उत नो विष्णुरुत वातो अस्रिधो द्रविणोदा उत सोमो मयस्करत्. उत ऋभव उत राये नो अश्विनोत त्वष्टोत विभ्वानु मंसते.. (४) विष्णु अथवा अहिंसक वायु अथवा धन देने वाले सोम हमें सुख दें. ऋभुगण,

अश्विनीकुमार, त्वष्टा एवं विभु हमें धन देने के लिए प्रसन्न हों. (४) उत त्यन्नो मारुतं शर्ध आ गमद्दिविक्षयं यजतं बर्हिरासदे. बृहस्पतिः शर्म पूषोत नो यमद्वरूथ्यं१ वरुणो मित्रो अर्यमा.. (५) स्वर्गलोक में रहने वाले तथा पूजा के योग्य मरुद्गण बिछे हुए कुशों पर बैठने के लिए हमारे पास आवें. बृहस्पति, पूषा, वरुण, मित्र तथा अर्यमा हमें घर से संबंधित सभी सुख दें. (५) उत त्ये नः पर्वतासः सुशस्तयः सुदीतयो नद्य१ स्त्रामणे भुवन्. भगो विभक्ता शवसावसा गमदुरुव्यचा अदितिः श्रोतु मे हवम्.. (६) शोभन स्तुतियों वाले पर्वत एवं उत्तम दान वाली नदियां हमारी रक्षा का कारण बनें. धनों को बांटने वाले भग अन्न के साथ हमारे पास आवें. सर्वत्र व्याप्त अदिति मेरी स्तुति को सुनें. (६) देवानां पत्नीरुशतीरवन्तु नः प्रावन्तु नस्तुजये वाजसातये. याः पार्थिवासो या अपामपि व्रते ता नो देवीः सुहवाः शर्म यच्छत.. (७) देवपत्नियां हमारी स्तुतियों की अभिलाषा करती हुई हमारी रक्षा करें. वे बलवान् पुत्र एवं अन्न पाने के लिए हमारी रक्षा करें. हे देवियो! आप धरती पर रहो अथवा आकाश में, पर हमें सुख प्रदान करो. (७) उत ग्ना व्यन्तु देवपत्नीरिन्द्राण्य१ग्नाय्यश्विनी राट्. आ रोदसी वरुणाणी शृणोतु व्यन्तु देवीर्य ऋतुर्जनीनाम्.. (८) देवपत्नियां हमारे हव्य को खाएं. इंद्राणी, अग्नायी, दीप्तियुक्त अश्विनी, रोदसी एवं वरुणाणी देवी हमारा हव्य भक्षण करें. देवपत्नियों के मध्य ऋतुओं की देवी हमारा हव्य भक्षण करें. (८) सूक्त-४७ देवता-विश्वेदेव प्रयुञ्जती दिव एति ब्रुवाणा मही माता दुहितुर्बोधयन्ती. आविवासन्ती युवतिर्मनीषा पितृभ्य आ सदने जोहुवाना.. (१) सेवा करती हुई, नित्यतरुणी व स्तुति वाली उषा बुलाने पर स्वर्ग से देवों के साथ यज्ञशाला में आती हैं, मानवों को यज्ञकार्य में लगाती हैं और धरती को इस प्रकार चेतन बनाती हैं, जैसे कोई माता कन्या को बोध देती है. (१) अजिरासस्तदप ईयमाना आतस्थिवांसो अमृतस्य नाभिम्. ebook converter DEMO Watermarks*

अनन्तास उरवो विश्वतः सीं परि द्यावापृथिवी यन्ति पन्थाः.. (२) अपरिमित, व्याप्त एवं प्रकाशनरूप कर्म करती हुई सूर्यकिरणें सूर्य मंडल के साथ एकत्र होकर स्वर्ग, धरती एवं आकाश में गतिशील होती हैं. (२) उक्षा समुद्रो अरुषः सुपर्णः पूर्वस्य योनिं पितुरा विवेश. मध्ये दिवो निहितः पृश्निरश्मा वि चक्रमे रजसस्पत्यन्तौ.. (३) अभिलाषाएं पूर्ण करने वाले, देवों को प्रमुदित करने वाले, दीप्तिशाली व शोभन- गतियुक्त रथ ने अंतरिक्ष की पूर्व दिशा में प्रवेश किया था. इसके बाद स्वर्ग के बीच में छिपे हुए, विविध रंगों वाले एवं सर्वव्यापक सूर्य आकाश के पूर्व और पश्चिम भाग में विचरण करके रक्षा करते रहें. (३) चत्वार ईं बिभ्रति क्षेमयन्तो दश गर्भं चरसे धापयन्ते. त्रिधातवः परमा अस्य गावो दिवश्चरन्ति परि सद्यो अन्तान्.. (४) अपने कल्याण की अभिलाषा वाले चार ऋत्विज् स्तुतियों एवं हव्य द्वारा सूर्य को धारण करते हैं. दश-दिशाएं सूर्य को चलने के लिए प्रेरित करती हैं. सूर्य की तीन प्रकार की किरणें उत्तमतापूर्वक आकाश के अंत तक शीघ्रतापूर्वक गमन करती हैं. (४) इदं वपुर्निवचनं जनासश्चरन्ति यन्नद्यस्तस्थुरापः. द्वे यदीं बिभृतो मातुरन्ये इहेह जाते यम्या३ सबन्धू.. (५) हे ऋत्विजो! सामने दिखाई देता हुआ यह मंडल अतिशय स्तुति योग्य है. इसमें शोभन नदियां बहती हैं एवं हमारा पालन करती हैं. अंतरिक्ष के अतिरिक्त माता-पिता के समान धरती और आकाश स्थित रात-दिन इसीसे उत्पन्न होते हैं एवं इसे धारण करते हैं. (५) वि तन्वते धियो अस्मा अपांसि वस्त्रा पुत्राय मातरो वयन्ति. उपप्रक्षे वृषणो मोदमाना दिवस्पथा वध्वो यन्त्यच्छ.. (६) इसी सूर्य के लिए बुद्धिमान् यजमान यज्ञकर्म आरंभ करते हैं. उषारूपी माताएं इसी के लिए तेजस्वी कपड़े बुनती हैं. वर्षाकारी सूर्य के मिलन से प्रसन्न पत्नीरूपी किरणें आकाश मार्ग से हमारे पास आती हैं. (६) तदस्तु मित्रावरुणा तदग्ने शं योरस्मभ्यमिदमस्तु शस्तम्. अशीमहि गाधमुत प्रतिष्ठां नमो दिवे बृहते सादनाय.. (७) हे मित्र व वरुण! यह स्तोत्र हमारे सुख का कारण हो. हे अग्नि! यह स्तोत्र हमें सुख दें. हम लंबी आयु एवं प्रतिष्ठा का अनुभव करें. दीप्तिशाली, महान् एवं सबको सुख देने वाले सूर्य को नमस्कार है. (७) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—४८ देवता—विश्वेदेव

सूक्त—४८ देवता—विश्वेदेव कदु प्रियाय धाम्ने मनामहे स्वक्षत्राय स्वयशसे महे वयम्. आमेन्यस्य रजसो यदभ्र आँ अपो वृणाना वितनोति मायिनी.. (१) हम सबके प्रिय विद्युत्-संबंधी तेज की स्तुति कब करेंगे? बल एवं यश उसका आधार हैं एवं वह सबका पूज्य है. वह शक्ति सब ओर से परिमित लगने वाले आकाश में वर्षा का विस्तार करती है. वह प्रज्ञावती एवं आकाश को ढकने वाली है. (१) ता अतन्त वयुनं वीरवक्षणं समान्या वृतया विश्वमा रज:. अपो अपाचीरपरा अपेजते प्र पूर्वाभिस्तिरते देवयुर्जन:.. (२) क्या उषाएं ऋत्विजों द्वारा धारण करने योग्य ज्ञान का विस्तार करती हैं? वे एक रूप वाली आवरण शक्ति से सारे संसार को ढक लेती हैं. देवों की अभिलाषा करने वाले लोग पूर्ववर्तिनी एवं भविष्य में आने वाली उषाओं को छोड़कर सामने उपस्थित वर्तमान उषाओं से अज्ञान को लांघते हैं. (२) आ ग्रावभिरहन्येभिरक्तुभिर्वरिष्ठं वज्रमा जिघर्ति मायिनि. शतं वा यस्य प्रचरन्त्स्वे दमे संवर्तयन्तो वि च वर्तयन्नहा.. (३) पत्थरों द्वारा रात एवं दिन में तैयार किए गए सोमरस से प्रसन्न होकर इंद्र मायावी वृत्र को मारने के लिए वज्र को तेज बनाते हैं. इंद्ररूपी सूर्य की सैकड़ों किरणें दिनों को लाती एवं विदा करती हुई आकाश में घूमती हैं. (३) तामस्य रीतिं परशोरिव प्रत्यनीकमख्यं भुजे अस्य वर्पस:. सचा यदि पितुमन्तमिव क्षयं रत्नं दधाति भरहूतये विशे.. (४) अपने स्वामी का अभिमत पूरा करने वाले परशु के समान हम अग्नि की दीप्ति को देखते हैं. इस रूपवान् सूर्य की किरणों का वर्णन हम सुख पाने के निमित्त करते हैं. अग्नि देव हमारे सहायक होकर यज्ञशाला में आते हैं एवं यजमान को अन्न से भरा हुआ घर तथा उत्तम धन देते हैं. (४) स जिह्वया चतुरनीक ऋञ्जते चारु वसानो वरुणो यतन्नरिम्. न तस्य विद्म पुरुषत्वता वयं यतो भग: सविता दाति वार्यम्.. (५) अग्नि रमणीय तेज को धारण करते हुए अंधकाररूपी शत्रु का नाश करते हैं एवं चारों दिशाओं में ज्वालारूपी लपटें फैला कर सुशोभित होते हैं. हम पुरुष के समान आचरण करने वाले अग्नि को नहीं जानते, क्योंकि भगरूपी महान् सविता हमें उत्तम धन देते हैं. (५) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—४९ देवता—विश्वेदेव देवं वो अद्य सवितारमेषे भगं च रत्नं विभजन्तमायोः. आ वां नरा पुरुभुजा ववृत्यां दिवेदिवे चिदश्विना सखीयन्.. (१) तुम यजमानों के कल्याण के लिए हम आज सविता एवं भग के समीप जाते हैं. ये दोनों यजमानों को धन देते हैं. हे नेता एवं बहुत भोग करने वाले अश्विनीकुमारो! तुम्हारी मित्रता की अभिलाषा करते हुए हम प्रतिदिन तुम्हारे सामने जाते हैं. (१) प्रति प्रयाणमसुरस्य विद्वान्सूक्तैर्देवं सवितारं दुवस्य. उप ब्रुवीत नमसा विजानञ्ज्र्यैषं च रत्नं विभजन्तमायोः.. (२) हे अंतरात्मा! तुम शत्रुओं का नाश करने वाले सूर्यदेव को वापस आया जानकर स्तुतियों द्वारा प्रशंसा करो. उन्हें मानवों को उत्तम रत्न एवं धन बांटने वाला जानकर हव्य एवं स्तुतियां समर्पित करो. (२) अदत्रया दयते वार्याणि पूषा भगो अदितिर्वस्त उस्रः. इन्द्रो विष्णुर्वरुणो मित्रो अग्निरहानि भद्रा जनयन्त दस्माः.. (३) पोषणकर्त्ता, सेवा करने योग्य एवं टुकड़े न होने वाले अग्नि अपनी ज्वालाओं द्वारा उत्तम लकड़ी को खाते हैं एवं तेज का विस्तार करते हैं. इंद्र, विष्णु, वरुण, मित्र, अग्नि आदि दर्शनीय देवगण हमारे दिवसों को कल्याणमय बनाते हैं. (३) तन्नो अनर्वा सविता वरूथं तत्सिन्धव इषयन्तो अनु ग्मन्. उप यद्द्वोचे अध्वरस्य होता रायः स्याम पतयो वाजरत्नाः.. (४) सविता देव का कोई तिरस्कार नहीं कर पाया. वे हमें उत्तम धन दें. बहती हुई नदियां उसी धन के लिए गतिशील हों. हम यज्ञ के होता बनकर इसलिए स्तोत्र बोलते हैं कि हम धनों के स्वामी बनें एवं हमारे पास उत्तम अन्न हो. (४) प्र ये वसुभ्य ईवदा नमो दुर्ये मित्रे वरुणे सूक्तवाचः. अवैत्वभ्वं कृणुता वरीयो दिवस्पृथिव्योरवसा मदेम.. (५) जिन यजमानों ने वसुओं को गतिशील अन्न भेंट किया है एवं मित्र वरुण के प्रति जिन्होंने स्तुतियां बोली हैं, उन्हें महान् तेज प्राप्त हो. हे देवो! तुम उन्हें श्रेष्ठ सुख दो. हम धरती और आकाश की रक्षा पाकर प्रसन्न हों. (५) सूक्त—५० देवता—विश्वेदेव ebook converter DEMO Watermarks*

विश्वो देवस्य नेतुर्मर्तो वुरी॑त स॒ख्यम्. विश्वो राय इषुध्यति द्यु॒म्नं वृणीत पुष्यसे.. (१) सभी मनुष्य सविता देव से मित्रता की याचना करें, सब लोग उनसे धन की कामना करें एवं पुष्टि के लिए धन पावें. (१) ते ते देव नेतर्ये चेमाँ अनुशसे. ते राया ते ह्मा३पृचे सचेमहि सचथ्यैः.. (२) हे सविता देव! हम यजमान तथा होता आदि अन्य लोग जो स्तुतियां करते हैं, वे सब तुम्हारी ही हैं. तुम हमारी अभिलाषाएं पूर्ण करो एवं दोनों प्रकार के लोगों को धनी बनाओ. (२) अतो न आ नूनतिथिंनतः पत्नीर्दशस्यत. आरे विश्वं पर्थेष्ठां द्विषो युयोतु यूयुविः.. (३) अतः इस यज्ञ के नेता एवं अतिथि के समान पूज्य देवों की सेवा करो एवं देवपत्नियों की सेवा करो. सबको विभक्त करने वाले सविता दूरवर्ती भागों में उपस्थित बैरियों को हमसे दूर रखें. (३) यत्र वह्निरभिहितो दुद्रवद्द्रोण्यः पशुः. नृमणा वीरपस्त्योऽर्णा धीरेव सनिता.. (४) जिस यज्ञ में यज्ञ को धारण करने वाला एवं यूप से बांधने योग्य पशु यूप के पास जाता है. उस यज्ञ में यजमान वीर पत्नियां, पुत्र, घर, धरती, धन आदि पाता है. (४) एष ते देव नेता रथस्पतिः शं रयिः. शं राये शं स्वस्तय इषः स्तुतो मनामहे देवस्तुतो मनामहे.. (५) हे सविता देव! तुम्हारा यह रथ धन से युक्त एवं सबका पालन करने वाला है. यह हमारे लिए सुख प्रदान करे. हम सुख, धन एवं अन्न पाने के लिए स्तुतियां करते हैं. हम स्तुति योग्य सविता की स्तुति करते हैं. (५) सूक्त—५१ देवता—विश्वेदेव अग्ने सुतस्य पीतये विश्वैरूमेभिरा गहि. देवेभिर्हव्यदातये.. (१) हे अग्नि! तुम समस्त देवों के साथ सोमरस पीने के लिए हव्यदाता यजमान के पास आओ. (१) ebook converter DEMO Watermarks*

ऋतधीतय आ गत सत्यधर्माणो अध्वरम्. अग्नेः पिबत जिह्वया.. (२) हे सच्ची स्तुतियों वाले देवो! तुम सत्यधारण करते हो. तुम हमारे यज्ञ में आओ और अग्निरूपी जीभ से सोमरस पिओ. (२) विप्रेभिर्विप्र सन्त्य प्रातर्यावभिरा गहि. देवेभिः सोमपीतये.. (३) हे मेधावी एवं सेवा करने योग्य अग्नि! तुम प्रातःकाल आने वाले के साथ सोमरस पीने हेतु आओ. (३) अयं सोमश्चमू सुतोऽमत्रे परि षिच्यते. प्रिय इन्द्राय वायवे.. (४) ये सोमरस एवं उसे निचोड़ने वाले पत्थर हैं. सोमरस निचोड़कर पात्र भरा गया है. यह इंद्र एवं वायु के लिए प्रिय है. (४) वायवा याहि वीतये जुषाणो हव्यदातये. पिबा सुतस्यान्धसो अभि प्रयः.. (५) हे वायु! तुम हव्य दान करने वाले यजमान के प्रति प्रसन्न होकर सोमरस पीने हेतु आओ एवं आकर निचोड़ा हुआ सोमरस पिओ. (५) इन्द्रश्च वायवेषां सुतानां पीतिमर्हथः. ताञ्जुषेथामरेपसावभि प्रयः.. (६) हे वायु! तुम और इंद्र इस सोमरस को पीने की योग्यता रखते हो. तुम निर्बाध होकर सोमरस का सेवन करो एवं इसी के उद्देश्य से यहां आओ. (६) सुता इन्द्राय वायवे सोमासो दध्याशिरः. निम्नं न यन्ति सिन्धवोऽभि प्रयः.. (७) इंद्र एवं वायु के लिए दही मिला सोमरस तैयार किया है. वह सोम तुम्हारी ओर नीचे बहने वाली सरिताओं के समान पहुंचे. (७) सजूर्विश्वेभिर्देवैभिरश्विभ्यामुषसा सजूः. आ याह्यग्ने अत्रिवत्सुते रण.. (८) हे अग्नि! तुम समस्त देवों के साथ आओ एवं अश्विनीकुमारों तथा उषा के साथ मित्रता स्थापित करो. तुम यज्ञ में आकर सोमरस द्वारा उसी प्रकार प्रसन्न बनो, जिस प्रकार अत्रि ebook converter DEMO Watermarks*

ऋषि प्रसन्नता प्राप्त करते हैं. (८) सजूर्मित्रावरुणाभ्यां सजूः सोमेन विष्णुना. आ याह्यग्ने अत्रिवत्सुते रण.. (९) हे अग्नि! तुम मित्र, वरुण, सोम एवं विष्णु के साथ आओ तथा यज्ञ में निचोड़ा हुआ सोमरस पीकर अत्रि ऋषि के समान प्रसन्न बनो. (९) सजूरादित्यैर्वसुभिः सजूरिन्द्रेण वायुना. आ याह्यग्ने अत्रिवत्सुते रण.. (१०) हे अग्नि! तुम आदित्य, वसुओं, इंद्र एवं वायु के साथ आओ एवं यज्ञ में निचोड़ा हुआ सोमरस पीकर अत्रि ऋषि के समान प्रसन्न बनो. (१०) स्वस्ति नो मिमीतामश्विना भगः स्वस्ति देव्यदितिरनर्वणः. स्वस्ति पूषा असुरो दधातु नः स्वस्ति द्यावापृथिवी सुचेतुना.. (११) अश्विनीकुमार, भग एवं अदितिदेवी हमारा कल्याण करें. सत्यशील एवं बलदाता पूषा हमारा कल्याण करें. शोभन ज्ञानसंपन्न धरती-आकाश भी हमारा कल्याण करें. (११) स्वस्तये वायुमुप ब्रवामहै सोमं स्वस्ति भुवनस्य यस्पतिः. बृहस्पतिं सर्वगणं स्वस्तये स्वस्तय आदित्यासो भवन्तु नः.. (१२) हम कल्याण के लिए वायु की स्तुति करते हैं. सब लोकों के पालक सोम की भी हम प्रार्थना करते हैं. हम देवसमूह के साथ बृहस्पति की स्तुति कल्याण के लिए करते हैं. आदित्यगण हमारा कल्याण करें. (१२) विश्वे देवा नो अद्या स्वस्तये वैश्वानरो वसुरग्निः स्वस्तये. देवा अवन्त्वृभवः स्तस्तये स्वस्ति नो रुद्रः पात्वंहसः.. (१३) इस यज्ञ के पवित्र दिन सभी देव हमारा कल्याण करें. सभी मनुष्यों के नेता एवं घर देने वाले अग्नि हमारा कल्याण करें. दीप्तिशाली ऋभुगण हमारी रक्षा एवं कल्याण करें. रुद्र हमारा कल्याण करें एवं हमें पाप से बचावें. (१३) स्वस्ति मित्रावरुणा स्वस्ति पथ्ये रेवति. स्वस्ति न इन्द्राश्चाग्निश्च स्वस्ति नो अदिते कृधि.. (१४) हे मित्रवरुण! हमारा कल्याण करो. हे धन की स्वामिनी एवं मार्ग को हितकर बनाने वाली देवी! तुम हमारा कल्याण करो. इंद्र तथा अग्नि हमारा कल्याण करें. हे अदिति तुम हमारा कल्याण करो. (१४) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—५२ देवता—मरुद्गण

स्वस्ति पन्थामनु चरेम सूर्याचन्द्रमसाविव. पुनर्ददताघ्नता जानता सं गमेमहि.. (१५) जिस प्रकार सूर्य और चंद्र निर्बाधरूप से अपने मार्ग पर चलते हैं, उसी प्रकार हम भी कल्याण मार्ग पर चलें. ऐसे बंधुमित्रों से हमारा मिलन हो, जो बहुत दिन से बिछुड़कर भी क्रोधित नहीं हैं एवं हमारा स्मरण करते हैं. (१५) सूक्त—५२ देवता—मरुद्गण प्र श्यावाश्व धृष्णुयार्चा मरुद्भिर्ऋक्वभि:. ये अद्रोधमनुष्वधं श्रवो मदन्ति यज्ञिया:.. (१) हे ऋषि श्यावाश्व! तुम धीरतापूर्वक स्तुतिपात्र मरुतों की पूजा करो. वे यज्ञ के पात्र हैं एवं प्रतिदिन हविरूपी अन्न को निर्बाध रूप में पाकर प्रसन्न होते हैं. (१) ते हि स्थिरस्य शवस: सखाय: सन्ति धृष्णुया. ते यामन्ना धृषद्विनस्तमना पान्ति शश्वत:.. (२) वे धीर हैं एवं स्थिर शक्ति के मित्र हैं. वे मार्ग में भ्रमण करने वाले हैं एवं अपने आप हमारी संतान की रक्षा करते हैं. (२) ते स्पन्द्रासो नोक्षणोऽति ष्कन्दन्ति शर्वरी:. मरुतामधा महो दिवि क्ष्मा च मन्महे.. (३) गतिशील एवं जल बरसाने वाले मरुद्गण रात्रियों को लांघते हुए हमारे पास आते हैं, इसी कारण मरुतों का तेज धरती एवं आकाश में व्याप्त तथा स्तुति योग्य है. (३) मरुत्सु वो दधीमहि स्तोमं यज्ञं च धृष्णुया. विश्वे ये मानुषा युगा पान्ति मर्त्यं रिष:.. (४) हे अध्वर्यु एवं होताओ! तुम लोग धीरतापूर्वक मरुतों की स्तुति करते एवं हव्य देते हो. इसका क्या कारण है? केवल यही कारण है कि वे मनुष्यों को हिंसक शत्रुओं से बचाते हैं. (४) अर्हन्तो ये सुदानवो नरो असामिशवस:. प्र यज्ञं यज्ञियेभ्यो दिवो अर्चा मरुद्द्रय:.. (५) हे होताओ! पूजा योग्य, शोभन दान वाले, यज्ञकर्म के नेता, पर्याप्त शक्तिशाली यज्ञ के पात्र एवं दीप्तिशाली मरुतों की अर्चना यज्ञ साधनों द्वारा करो. (५) ebook converter DEMO Watermarks*

आ रुक्मैरा युधा नर ऋष्वा ऋष्टीरसृक्षत. अन्वेनाँ अह विद्युतो मरुतो जङ्झतीरिव भानुरर्त त्मना दिवः.. (६) वर्षा करने वाले महान् मरुद्गण चमकने वाले आभरणों एवं आयुधों से सुशोभित हैं तथा मेघ का भेदन करने के लिए आयुध चलाते हैं. कल-कल बहने वाले जल के समान बिजली मरुतों के पीछे चलती है एवं उसका प्रकाश स्वयं ही इधर-उधर फैलता है. (६) ये वावृधन्त पार्थिवा य उरावन्तरिक्ष आ. वृजने वा नदीनां सधस्थे वा महो दिवः.. (७) जो मरुद्गण धरती एवं आकाश में वृद्धि प्राप्त करते हैं, वे नदियों की धाराओं एवं महान् स्वर्ग के स्थान में उन्नति करें. (७) शर्धो मारुतमुच्छंस सत्यशवसमृभ्वसम्. उत स्म ते शुभे नरः प्र स्पन्द्रा युजत त्मना.. (८) हे स्तोताओ! मरुतों के अत्यंत विस्तृत एवं सत्य पर आधारित उत्तम बल की स्तुति करो. वर्षा करने वाले मरुद्गण जल बरसाने के लिए अपने आप सबकी रक्षा के विचार से परिश्रम करते हैं. (८) उत स्म ते परुष्ण्यामूर्णा वसत शुन्ध्यवः. उत पव्या रथानामद्रिं भिन्दन्त्योजसा.. (९) परुष्णी नामक नदी में रहने वाले मरुद्गण सबको शुद्ध करने वाले प्रकाश से घिरे रहते हैं. वे रथ के पहिए की नेमि एवं अपनी शक्ति द्वारा बादल को भेदते हैं. (९) आपथयो विपथयोऽन्तस्पथा अनुपथाः. एतेभिर्मह्यं नामाभिर्यज्ञं विष्टार ओहते.. (१०) अभिमुख चलने वाले, विमुख चलने वाले, प्रतिकूल मार्ग में चलने वाले एवं अनुकूल मार्ग में चलने वाले इन चारों नामों वाले मरुद्गण विस्तृत होकर हमारे यज्ञ को धारण करें. (१०) अधा नरो न्योहतेऽधा नियुते ओहते. अधा पारावता इति चित्रा रूपाणि दर्शया.. (११) वर्षा आदि इष्ट कार्यों के नेता देवगण संसार को धारण करते हैं. सबको मिलाने वाले जगत् को धारण करते हैं. दूरवर्ती आकाश के ग्रह, तारों आदि को धारण करने वाले देवों का रूप विचित्र एवं दर्शनीय है. (११) ebook converter DEMO Watermarks*

छन्दः स्तुभः कुभन्यव उत्समा कीरिणो नृतुः. ते मे के चिन्न तायव ऊमा आसन्दृशि त्विषे.. (१२) छंदों द्वारा स्तुति करने वाले एवं जल के अभिलाषी स्तोताओं ने मरुतों की प्रार्थना की एवं प्यासे गोतम के लिए कुआं बनवाया. मरुतों में से कुछ ने चोर के समान छिपकर हमारी रक्षा की थी एवं कुछ स्पष्ट रूप से हमारी शक्ति बढ़ाने में कारण बने थे. (१२) य ऋष्वा ऋष्टिविद्युतः कवयः सन्ति वेधसः. तमृषे मारुतं गणं नमस्या रमया गिरा.. (१३) हे श्यावाश्व ऋषि! तुम दर्शनीय, विद्युतरूपी आयुध धारण करने वाले, बुद्धिमान् एवं सबके निर्माता मरुद्गणों की रमणीय वाक्यों द्वारा स्तुति करो. (१३) अच्छ ऋषे मारुतं गणं दाना मित्रं न योषणा. दिवो वा धृष्णव ओजसा स्तुता धीभिरिषण्यत.. (१४) हे ऋषि! तुम हव्य देते हुए एवं स्तुतियां करते हुए मरुतों के समीप आदित्य के समान जाओ. हे शक्ति द्वारा शत्रुओं को हराने वाले मरुतो! तुम हमारी स्तुतियां सुनकर स्वर्गलोक से हमारे यज्ञ में आओ. (१४) नू मन्वान एषां देवाँ अच्छा न वक्षणा. दाना सचेत सूरिभिर्यामश्रुतेभिरज्जिभिः.. (१५) स्तोता मरुतों को स्तुति द्वारा शीघ्र प्राप्त करके अन्य देवों को पाने की अभिलाषा नहीं करते. वे ज्ञानी, शीघ्रगतिशील के रूप में प्रसिद्ध एवं फल देने वाले मरुतों से दान पाते हैं. (१५) प्र ये मे बन्ध्वेषे गां वोचन्त सूरयः पृश्निं वोचन्त मातरम्. अधा पितरमिष्मिणं रुद्रं वोचन्त शिक्वसः.. (१६) जब मैं अपने बंधुओं को खोज रहा था, तब समर्थ मरुतों ने मुझे बताया कि पृश्नि उनकी माता है. उन्होंने अन्न के स्वामी रुद्र को अपना पिता बताया. (१६) सप्त मे सप्त शाकिन एकमेका शता ददुः. यमुनायामधि श्रुतमुद्राधो गव्यं मृजे नि राधो अश्व्यं मृजे.. (१७) उनचास संख्या वाले शक्तिशाली मरुतों ने एकत्र होकर मुझे सैकड़ों गाएं दीं. मरुतों द्वारा दिए गए गोरूप अथवा अश्वरूप धन को हमने गंगा तट पर प्राप्त किया. (१७) सूक्त—५३ देवता—मरुद्गण ebook converter DEMO Watermarks*

को वेद जानमेषां को वा पुरा सुम्नेष्वास मरुताम्. यद्युयुञ्जे किलास्यः.. (१) इन मरुतों का जन्म कौन जानता है? मरुतों का सुख सर्वप्रथम किसने अनुभव किया? जब इन्होंने रथ में पृश्नि को जोड़ा था, तब इनकी शक्ति किसने जानी? (१) ऐतान्नथेषु तस्थुषः कः शुश्राव कथा ययुः. कस्मै ससुः सुदासे अन्वापय इळाभिर्वृष्टयः सह.. (२) मरुतों को रथ पर बैठा हुआ किसने सुना था? इनके गमन का ढंग कौन जानता है? बंधुरूप एवं वर्षाकारक मरुद्गण अन्न लेकर किस दानशील के लिए अवतीर्ण होते हैं? (२) ते म आहुर्य आययुरप द्युभिर्विभिर्मदे. नरो मर्या अरेपस इमान्पश्यन्निति ष्टुहि.. (३) तेजस्वी घोड़ों पर सवार होकर जो मरुद्गण सोमरस का आनंद प्राप्त करने आए थे, उन्होंने मुझसे कहा कि वे नेता, मानव हितकारी एवं आसक्तिरहित हैं. हे ऋषि! इस प्रकार के मरुतों को देखकर उनकी स्तुति करो. (३) ये अञ्जिषु ये वाशीषु स्वभानवः स्रक्षु खादिषु. श्रया रथेषु धन्वसु.. (४) हे मरुतो! तुम्हारे आभरणों, आयुधों, मालाओं, सीने पर पहने जाने वाले गहनों, हाथ- पैरों एवं उन में पहने जाने वाले कंकणों, रथों एवं धनुषों में जो बल आश्रित है, उसकी हम स्तुति करते हैं. (४) युष्माकं स्मा रथाँ अनु मुदे दधे मरुतो जीरदानवः. वृष्टी द्यावो यतीरिव.. (५) हे शीघ्र दान करने वाले मरुतो! वर्षा के निमित्त सभी जगह जाने वाली दीप्ति के समान तुम्हारे रथ को देखकर हम प्रमुदित होते हैं. (५) आ यं नरः सुदानवो ददाशुषे दिवः कोशमचुच्यवुः. वि पर्जन्यं सृजन्ति रोदसी अनु धन्वना यन्ति वृष्टयः.. (६) नेता एवं शोभन दान वाले मरुद्गण हवि देने वाले यजमान के कल्याण के लिए आकाश से बादल को बरसाते हैं. वे धरती एवं आकाश के कल्याण के लिए बादल को छोड़ते हैं. वर्षा करने वाले मरुत् सभी जगह जाने वाले जल के साथ गमन करते हैं. (६) तत्प्रदानाः सिन्धवः क्षोदसा रजः प्र सस्रुर्धेनवो यथा. ebook converter DEMO Watermarks*

स्यन्ना अश्वा इवाध्वनो विमोचने वि यद्वर्तन्त एन्यः.. (७) भेदन किए गए बादल से निकली हुई जल-धाराएं वेग के साथ आकाश में इस प्रकार गमन करती हैं, जिस प्रकार दुधारू गाय दूध देती है. शीघ्रगामी अश्व जिस प्रकार मार्गों पर चलते हैं, उसी प्रकार नदियां तेजी से बहती हैं. (७) आ यात मरुतो दिव आन्तरिक्षादमादुत. माव स्थात परावतः.. (८) हे मरुतो! तुम अंतरिक्ष, स्वर्ग अथवा इहलोक से यहां आओ. तुम दूरवर्ती स्थान में मत रहो. (८) मा वो रसानितभा कुभा क्रुमुर्मा वः सिन्धुर्नि रीरमत्. मा वः परि ष्ठात्सरयुः पुरीषिण्यस्मे इत्सुम्नमस्तु वः.. (९) हे मरुतो! रसा, अनितभा एवं कुभा नाम की नदियां एवं सभी जगह जाने वाली सिंधु तुम्हें न रोके. जलपूर्ण सरयू नदी तुम्हें न रोके. तुम्हारे आने का सुख हमें प्राप्त हो. (९) तं वः शर्धं रथानां त्वेषं गणं मारुतं नव्यसीनाम्. अनु प्र यन्ति वृष्टयः.. (१०) हे मरुतो! तुम्हारे नवीन रथों के वेग एवं दीप्ति की हम प्रशंसा करते हैं. वर्षा मरुतों के पीछे-पीछे चलती है. (१०) शर्धंशर्धं व एषां व्रातंव्रातं गणङ्गणं सुशस्तिभिः. अनु क्रामेम धीतिभिः.. (११) हे मरुतो! हम सुंदर स्तुतियों एवं हव्य देने आदि कर्मों द्वारा तुम्हारे बलों, समूहों एवं गणों के पीछे चलते हैं. (११) कस्मा अद्य सुजाताय रातहव्याय प्र ययुः. एना यामेन मरुतः.. (१२) मरुद्गण आज किस उत्तम हवि देने वाले यजमान के पास अपने रथ द्वारा जाएंगे? (१२) येन तोकाय तनयाय धान्यं१ बीजं वहध्वे अक्षितम्. अस्मभ्यं तद्धत्तन यद्व ईमहे राधो विश्वायु सौभाग्यम्.. (१३) हे मरुतो! तुम जिस कृपालु मन से हमारे पुत्र-पौत्रों के लिए नष्ट न होने वाले अन्नों के बीज देते हो, उसी मन से हमें भी अन्नों के बीज दो. हम तुमसे पूर्ण आयु एवं सौभाग्ययुक्त धन ebook converter DEMO Watermarks*

मांगते हैं. (१३) अतीयाम निदस्तिरः स्वस्तिभिर्हित्त्वावद्यमरातीः. वृष्ट्वी शं योराप उस्रि भेषजं स्याम मरुतः सह.. (१४) हे मरुतो! हम कल्याणों द्वारा पाप को त्यागकर निंदक-शत्रुओं पर विजय प्राप्त करें. तुम्हारे द्वारा की गई वर्षा से हम सुख, पापों का नाश, जल, गायों एवं ओषधियों को पावें. (१४) सुदेवः समहासति सुवीरो नरो मरुतः स मर्त्यः. यं त्रायध्वे स्याम ते.. (१५) हे पूजित एवं नेता मरुतो! तुम जिस मनुष्य की रक्षा करते हो, वह अन्य देवों का कृपापात्र एवं उत्तम पुत्र-पौत्रों वाला बनता है. हम तुम्हारे सेवक इसी प्रकार बनें. (१५) स्तुहि भोजांत्स्तुवतो अस्य यामनि रणन्गावो न यवसे. यतः पूर्वाँ इव सखीँरनु ह्वय गिरा गृणीहि कामिनः.. (१६) हे ऋषि! स्तुति करने वाले इस यजमान के यज्ञ में तुम फल देने वाले मरुतों की स्तुति करो. गाएं जैसे घास चरने के लिए चलती हुई प्रसन्न होती हैं, उसी प्रकार मरुत् प्रसन्न हों. तेज चलने वाले मरुतों को पुराने मित्र के समान बुलाओ एवं स्तुति की अभिलाषा करने वाले मरुतों की वचनों से स्तुति करो. (१६) सूक्त—५४ देवता—मरुद्गण प्र शर्धाय मारुताय स्वभानव इमां वाचमनजा पर्वतच्युते. घर्मस्तुभे दिव आ पृष्टयज्वने द्युम्नश्रवसे महि नृम्णमर्चत.. (१) स्वायत्त, तेज वाले, पर्वतों को च्युत करने वाले, धूप का शोषण करने वाले, स्वर्ग से आने वाले, रथ के उपरिभाग पर विराजमान एवं तेजस्वी अन्न वाले मरुतों के बल की प्रशंसा करो तथा उन्हें पर्याप्त अन्न दो. (१) प्र वो मरुतस्तविषा उदन्यवो वयोवृधो अश्वयुजः परिज्ग्रयः. सं विद्युता दधति वाशति त्रितः स्वरन्त्यापोऽवना परिज्ग्रयः.. (२) हे मरुतो! तुम्हारे दीप्त, जगत् की रक्षा के लिए जल के इच्छुक, अन्न की वृद्धि करने वाले, चलने के लिए रथ में जोड़ने वाले सभी ओर गमनशील, बिजली के साथ संगत होने वाले व तीन स्थानों में शब्द करने वाले गण प्रकट होते हैं एवं जलराशि धरती पर गिरने लगती है. (२) ebook converter DEMO Watermarks*

विद्युन्महसो नरो अश्मदिद्यवो वातत्विषो मरुतः पर्वतच्युतः.

विद्युन्महसो नरो अश्मदिद्यवो वातत्विषो मरुतः पर्वतच्युतः. अब्दया चिन्मुहुरा हादुनीवृतः स्तनयदमा रभसा उदोजसः.. (३) बिजलीरूपी तेज वाले, वर्षा आदि के नेता, पत्थरों के आयुध वाले, दीप्ति प्राप्त करने वाले, पर्वतों को च्युत करने वाले, बार-बार जल देने वाले, वज्र को प्रेरित करने वाले, मिलकर गर्जन करने वाले एवं उद्धृत बलसंपन्न मरुद्गण वर्षा के निमित्त प्रकट होते हैं. (३) व्य१क्तून्रुद्रा व्यहानि शिक्वसो व्य१न्तरिक्षं वि रजांसि धूतयः. वि यदज्राँ अजथ नाव ईं यथा वि दुर्गाणि मरुतो नाह रिष्यथ.. (४) हे रुद्रो! तुम रात्रि एवं दिन को प्रकट करो. हे सर्वथा समर्थ मरुतो! तुम अंतरिक्ष तथा अन्य लोकों को विस्तृत करो. हे कंपाने वाले मरुतो! सागर जिस प्रकार नाव को हिलाता है, उसी प्रकार तुम बादलों को चंचल बनाओ एवं शत्रुनगरों को नष्ट करो. हे मरुतो! हमारी हिंसा मत करना. (४) तद्गीर्यं वो मरुतो महित्वनं दीर्घं ततान सूर्यो न योजनम्. एता न यामे अगृभीतशोचिषोऽनश्वदां यन्नययातना गिरिम्.. (५) हे मरुतो! जिस प्रकार सूर्य अपना प्रकाश फैलाते हैं अथवा देवों के घोड़े दूर-दूर तक जाते हैं, उसी प्रकार स्तोता तुम्हारे बल एवं महत्त्व को दूर तक प्रसिद्ध बनाते हैं. हे मरुतो! तुमने उस पर्वत को तोड़ा था, जिस में पणियों ने चुराए हुए घोड़े छिपाए थे. (५) अभ्राजि शर्धो मरुतो यदर्णसं मोषाथ वृक्षं कपनेव वेधसः. अध स्मा नो अरमतिं सजोषसश्चक्षुरिव यन्तमनु नेषथा सुगम्.. (६) हे वर्षा करने वाले एवं वृक्षों के समान बादलों को कंपित करने वाले मरुतो! तुम्हारी शक्ति सुशोभित हो रही है. हे परस्पर प्रीतिसंपन्न मरुतो! जिस प्रकार आंखें मार्ग प्रदर्शन करती हैं, उसी प्रकार तुम हमें सरल मार्ग से रमणीय धन के समीप पहुंचाओ. (६) न स जीयते मरुतो न हन्यते न स्रेधति न व्यथते न रिष्यति. नास्य राय उप दस्यन्ति नोतय ऋषिं वा यं राजानं वा सुषूदथ.. (७) हे मरुतो! तुम जिस ऋषि या राजा को यज्ञकर्म में लगाते हो, वह दूसरों द्वारा न हारता है और न मारा जाता है. वह न क्षीण होता है, न कष्ट पाता है और न उसे कोई बाधा पहुंचा सकता है. उसका धन एवं रक्षा साधन भी कभी समाप्त नहीं होते. (७) नियुत्वन्तो ग्रामजितो यथा नरोऽर्यमणो न मरुतः कवन्धिनः. पिन्वन्त्युत्सं यदिनासो अस्वरन्युन्दन्ति पृथिवीं मध्वो अन्धसा.. (८) नियुत नाम वाले घोड़ों के स्वामी, संयुक्त पदार्थों को पृथक् करने वाले तथा नेता, सूर्य ebook converter DEMO Watermarks*