सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १
Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
२०४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
कुछ निकाले हुए सन् के नम्बर
सन् के नं. १ २ ३
१७९८ १७९९ १८००
१८०४ १८०५ १५०६
१८१० १८११ +
- १८१६ १24
१८२१ १८२२ १८२३
१२२७ + १८२८
१८३२ १८३३ १८३४
१८३८ १५३९ +
- १८४४ १८४५
१८४९ १८५० १८५१
१८५५ -F- १८५६
१८६० १८६१ १८६२
१८६६ १८६७ +
पे + १८७२ १८७३
FE १८७७ १८७८ | पृ८७९
[प्र 1००३ + १८८४
१८८८ १८८९ १८९०
१८९४ १८९५ +
१९०० १९०१ १९०२
१९०६ १९०७ +
- १९१२ १९१३
१९१७ १९१८ १९१९
१९२३ + १९२४
१९२८ १९२९ १९३०
१९३४ १९३५ पः
- १९४० १९४१
१९४५ १९४६ १९४७
१९५१ + १९५२
१९५६ १९५७ १९५३
१९६२ १९६३ +
तारीख से तिथि निकालना : २०५
| सप्ताह सं. क्र. सं. | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सप्ताह सं. क्र. सं. | + | १९६८ | १९६९ | १९७० | १९७१ | + | १९७२ |
| १९७३ | १९७४ | १९७५ | + | १९७६ | १९७७ | १९७८ | |
| १९७९ | + | १९८० | १९८१ | १९८२ | १९८३ | + | |
| १९८४ | १९८५ | १९८६ | १९८७ | + | १९८८ | १९८९ | |
| १९९० | १९९१ | + | १९९२ | १९९३ | १९९४ | १९९५ |
- | १९९६ | १९९७ | १९९८ | १९९९ | + | २००० २००१ | २००२ | २००३ | + | २००४ | २००५ | २००६ २००७ | + | २००८ | २००९ | २०१० | २०११ | + २०१२ | २०१३ | २०१४ | २०१५ | + | २०१६ | २०१७
जंत्री बनाने की रीति
यह जंत्री बनाना कठिन नहीं है स्वतः बना सकते हो। इस ढंग से यह बनाई गई है जिससे अपनी स्मरण शक्ति से ही जब आवश्यकता हो वड़ी सरलता से कोई भी इसे बना सके।
आरम्भ में मास के अंक उलटे क्रम से बाईं ओर रखो अर्थात् पहिले ७ फिर उसके नीचे ६ फिर ५ इत्यादि और उस मासांक के आगे उस नम्बर के महीने लिख दो। पहिले बता चुके हैं कि कौन महीने का क्या नम्बर होता है। उनको कटस्थ कर लेना कोई कठिन नहीं है। इस प्रकार ७ पंक्तियों में सब १२ महीने (लीप जनवरी और लीप फरवरी भी) आ जाते हैं।
महीने की पंक्ति के आगे दाहिनी ओर सन् के नम्बर की पंक्तियाँ हैं। इसका भरना बहुत सरल है। खड़ी पंक्ति में ऊपर से नीचे १, २, ३, ४ आदि क्रम पूर्वक ७ अंक तक लिख लो। फिर सबसे ऊपर की पंक्ति में भी बाईं ओर से १ के आगे २, ३, ४ आदि क्रम पूर्वक लिखते जाओ और ७ अंक तक लिख लो। शेष कोठों में उसके आगे के अंक लिख कर सब कोठे भर दो। ७ अंक के बाद फिर १ अंक लिख कर उसके आगे के अंक क्रमानुसार लिखना पड़ता है।
सन् के नम्बर के कोठों के नीचे दिन की पंक्तियाँ हैं। इसमें रविवार से आरम्भ कर शनिवार तक आड़े ओर खड़े कोठों में दिन भर दो। जिस प्रकार सन् का नम्बर भरा था उसी रीति से क्रमानुसार दिन सब कोठों में लिख दो।
इसके बाईं ओर महीने की पंक्ति के नीचे तारीख की पंक्तियाँ हैं, उनमें १ से लेकर ३१ तक क्रमानुसार तारीख के अंक भर दो। वस, इस प्रकार अन्त बर्यो की जंत्री तैयार हो गई। जंत्री बनाने की इतनी सरल रीति और कहीं न मिलेगी।
सन् का नम्बर निकालने का भी चक्र बनाना बहुत सरल है। पंक्ति ४ में १ से लेकर ७ कोठों में क्रमानुसार ७ अंक लिख लो, और उसके ऊपर तीसरी पंक्ति में
२०६ : सचिव ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
प्रत्येक अंक में २ जोड़ कर लिख दो, ७ के बाद १ अंक लिखना न नहीं लिखना। इसी प्रकार दूसरी और पहली पंक्ति में सबमें क्रम से २-२ अंक बढ़ा कर लिख दो तो पंक्ति के अनुसार सन् के नम्बर के अंक सब पंक्तियों में लिख जायेंगे।
१०० के भीतर पहिली पंक्ति की शेष सदी, २०० के भीतर दूसरी पंक्ति, ३०० के भीतर तीसरी, और ४०० के भीतर चौथी पंक्ति सन् ईस्वी की शेष सदी की होती है।
शेष वर्ष चक्र बनाना भी सरल है। पंक्ति ४ के सीधे में १ से ७ तक सन् के नम्बर के अंक लिखें हैं। उसके नीचे ० से लेकर १, २, ३ आदि शेष वर्ष के अंक भरना आरम्भ करो। ४-४ अंक लिख लेने पर लीप वर्ष आता है। लीप अंग्रेजी शब्द है। इसका अर्थ है कुदना। इससे एक कोठा कुद कर अर्थात् लीप इयर को १ कोठा छोड़ कर आगे लिखो। जैसे सन् के नम्बर के नीचे, ० फिर २ के नीचे १, ३ के नीचे २, और ४ के नीचे ३ क्रमानुसार ४ अंक शेष वर्ष के लिख चुके। इसके उपरान्त चौथा वर्ष ४ लीप इयर का होता है। इस कारण एक कोठा आगे का छोड़ कर अर्थात् सन् का नम्बर ५ के नीचे X चिह्न लगाकर आगे के कोठे में ( सन् का नम्बर ६ के नीचे ) ४ शेष वर्ष लिखो, आगे क्रमानुसार ४, ५, ६, ७ तक लिखने के बाद १ कोठा छोड़ कर न लिखो क्योंकि न लीप वर्ष है। इसी प्रकार सब कोठों में क्रमानुसार ९९ तक अंक अपने मन में भरते चले जाओ। जिस वर्ष के पहिले X ढ़ेरा का चिह्न खाली जगह में है उसे लीप वर्ष समझना।
दो सदी के सन् के नम्बर इसी प्रकार निकाल कर आगे चक्र में दिये हैं, जिससे सन् के नम्बर खोजने में कोई अड़चन न हो। इसी प्रकार इसके आगे के सन् के नम्बर निकालने का चक्र बना सकते हो। केवल लीप वर्ष का ध्यान रखना। यदि लीप वर्ष है तो आगे नम्बर के नीचे खाली ढ़ेरे का चिह्न लगा कर उसके आगे के नम्बर के नीचे वह लीप वर्ष लिखना। इस चक्र के देखने से ही सब समझ में आ जायगा। सन् १८०० में ४०० का भाग नहीं गया तो यह लीप वर्ष नहीं माना गया, क्योंकि पूरी सदी में ४०० का भाग पूरा-पूरा लगने से लीप वर्ष माना जाता है। परन्तु साधारण वर्ष में पूरा ४ का भाग लग जाय तब लीप वर्ष माना जाता है।
मुसलमानों सन् हिजरी के महीनों की तारीख जानना
मुसलमानों महीना
सन् का नम्बर
| मोहर्रम १। सम्वाल १० | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| जमादिलल अब्बल ५ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | १ |
| रविउल आखिर ४। रमजान ९ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | १ | २ |
| सावान ८ | ४ | ५ | ६ | ७ | १ | २ | ३ |
| रविउल अब्बल ३। जिलहिज १२ | ५ | ६ | ७ | १ | २ | ३ | ४ |
| सफर २। रज्जब ७ | ६ | ७ | १ | २ | ३ | ४ | ५ |
| जमादिलल आखिर ६। जीकैद ११ | ७ | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ |
तारीख से तिथि निकालना : २०७
१ ८ १५ २२ २९ शनि. रवि. सोम. मंगल, बुध. गुरु शुक्र.
२ ९ १६ २३ ३० रवि. सोम. मंगल वुध. गुरु: शुक्र. शनि.
३ १० १७ २४ -- सोम. मंगल. वुध. गुरु. शुक्र, शनि. रवि.
४ ११ १८ २५ -- मंगल. वुध. गुरु. शुक्र. शनि. रवि. सोम.
५ १२ १९ २६ -- बुध, गुरु. शुक्र, शनि. रवि. सोम. मंगल,
६ १३ २० २७ -- गुरु. शुक्र. शनि. रवि. सोम. मंगल. बुध.
७ १४ २१ २८ -- शुक्र. शनि. रवि. सोम, मंगल, बुध. गुरु
जंत्री देखने की रीति-पहिले नीचे बताई विधि से हिंजरी सन् का नम्बर खोज
"छो । वह नम्बर वर्ष भर काम देगा । फिर इष्ट मास के सामने की पंक्ति में प्राप्त
सन् का नम्बर जहाँ मिळे उस नम्बर के नीचे जिस दिन की खड़ी पंक्ति मिले उसके
सामने बांई ओर दी हुई तारीख खोज लो या इष्ट तारीख का दिन उसी प्राप्त दिन
की पंक्ति से खोज लो ।
जैसे हिजरी सन् १३७३ के दूसरे महीने सफर की पहिली तारीख किस दिन
होगी जानना है नीचे वताई रीति से हिजरी १३७३ का नम्वर खोजा तो ६ मिला ।
अब सफर महोने के आगे सन् का नम्वर ६ खोजा, वह पहिली पंक्ति में भिला । उस
६ के नीचे दिन की पंक्ति जो शनिवार से आरम्भ होती है, ली । शनिवार के आगे
बाई ओर १ तारीख दी है। तो प्रगट हुआ कि शनिवार को मुसलमानी सफर की
यहिली तारीख होगी ।#
हिजरी सन् का नंबर निकालने का चक्र
हिजरी. सन् का नम्वर सदी
२ द् दै १ ६ ३ ७ ५ अ
द ३ ७ गर र ६ डड एत
० १ २ ३ है शर द् ७
८ ९ १० ११ १२ १३ १४ १५
१६ १७ १८ १९ २० २१ २२ २२
रद २५ २६ २७ रुन , २६ ३० ३१ ह
३२ ३३ ३४ ३५ ३६ ३७ ३८ ३९ ॐ
४० ४१ ४२ ४३ R25 अप् ह. ४७ £
४८ ४९ ५० ५१ ५२ ५३ ४ शण 7
५६ ४७ ४५८ ४५९ ६० ६१ देरे दरे. जू,
६४ ६५ , ६६ ६७ ६८ ६९ ७० ७१ 2
७२ ७३ ७४ ७५ ७६ ७७ ऽऽ ७९ द.
८० ८१ ८२ ८३ ८४ यप दद ८७
षद ८९ ९० ९१ ९२ ९३ ९४ ९५
९६ ९७ ९८ ९९ ° ° ° ° FR न नल का स त्मात ता
#--इसमें तिथि के कारण कभी-कभी एक दिन का अन्तर पड़ जाता है ।
२०८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
सन् का नंबर निकालने की रीति
हिजरी } \div ४०० = शेष १०० या ३०० = अ सदी सदी } = शेष २०० या ० = ब सदी
हिजरी के इकाई दहाई के अंक = शेष वर्ष
हिजरी के इकाई दहाई के अंक छोड़ कर पूरी सदी लो, उसमें ४०० का भाग दो। यदि शेष १०० या ३०० बचे तो = अ = सदी होगी। यदि शेष २०० या ० बचे तो = ब = सदी होगी।
वह हिजरी अ या ब जिस प्रकार की सदी हो, उस पंक्ति में और शेष वर्ष के ऊपर जो सन् का नम्बर मिले वह इष्ट सन् का नम्बर होगा।
जैसे हिजरी सन् १३७३ में इकाई दहाई के अंक ७३ शेष वर्ष हुए। इनको छोड़ कर सदी १३०० ली \div ४०० = शेष १०० = अ = सदी हुई। अब शेष वर्ष ७३ के ऊपर और अ पंक्ति में खोजा तो ६ मिला। यही १३७३ के हिजरी सन् का नम्बर हुआ।
हिजरी सन् के नम्बर खोजने का अन्य प्रकार का चक्र
हिजरी सन् का नम्बर हिजरी की सदी के शेष वर्ष
| हिजरी का नम्बर | २ | ६ | २ | ६ | ० | ८ | १६ | २४ | ३२ | ४० | ४८ | ५६ | ६४ | ७२ | ८० | ८८ | ९६ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ६ | ३ | ३ | १ | १ | ९ | १७ | २५ | ३३ | ४१ | ४९ | ५७ | ६५ | ७३ | ८१ | ८९ | ९७ | |
| ४ | ६ | ४ | ७ | २ | १० | १८ | २६ | ३४ | ४२ | ५० | ५८ | ६६ | ७४ | ८२ | ९० | ९८ | |
| १ | ५ | १ | ५ | ३ | ११ | १९ | २७ | ३५ | ४३ | ५१ | ५९ | ६७ | ७५ | ८३ | ९१ | ९९ | |
| ६ | २ | ६ | २ | ४ | १२ | २० | २८ | ३६ | ४४ | ५२ | ६० | ६८ | ७६ | ८४ | ९२ | ० | |
| ३ | ६ | ३ | ६ | ५ | १३ | २१ | २९ | ३७ | ४५ | ५३ | ६१ | ६९ | ७७ | ८५ | ९३ | ० | |
| ७ | ४ | ७ | ४ | ६ | १४ | २२ | ३० | ३८ | ४६ | ५४ | ६२ | ७० | ७८ | ८६ | ९४ | ० | |
| ५ | २ | ५ | १ | ७ | १५ | २३ | ३१ | ३९ | ४७ | ५५ | ६३ | ७१ | ७९ | ८७ | ९५ | ० |
सदी अ ब अ ब हिजरी का नम्बर खोजने की रीति— १०० २०० ३०० ४०० कोई हिजरी के इकाई दहाई के अंक ५०० ६०० ७०० ८०० छोड़कर पूरी सदी लो। सदी के ऊपर और ९०० १००० ११०० १२०० शेष वर्ष (हिजरी के इकाई दहाई के अंक) १३०० १४०० १५०० १६०० के सामने जो नम्बर मिले वही सन् का नंबर १७०० १८०० १९०० २००० होगा। जैसे हिजरी १३७३ की सदी १३०० २१०० २२०० ३३०० २४०० हुई और शेष वर्ष ७३ हुए। अब १३०० २५०० २६०० २७०० २८०० सदी के ऊपर देखो यह सदी अ प्रकार की २९०० ३००० ३१०० ३२०० है। इसके ऊपर और शेष वर्ष ७३ के सामने ३३०० ३४०० ३५०० ३६०० बाईं ओर देखो तो ६ मिला। यही ६ सन् ३७०० ३८०० ३९०० ४००० का नम्बर हिजरी १३७३ का हुआ।
हिजरी १२११ = १२०० सदी के ऊपर और ११ के सामने बाईं ओर देखा ५ मिला यही ५ सन् का नम्बर हुआ। यह सदी २
तारीख से तिथि निकालना : २०९
प्रकार की है। वस इस प्रकार प्राप्त सन् के नम्बर से इष्ट मास की तारीख ऊपर बताई रीति से खोज लो। पहले बताई हुई सन् के नम्बर खोजने की रीति और यह रीति एक ही है। यहाँ उदाहरण के लिए ५००० हिजरी तक देकर सन् का नम्बर खोजना बताया गया है।
राष्ट्रीय जंजी National calendar ( Gragarion calender )
अभी तक सन् ईसवी का दिनांक प्रचलित था, परन्तु यह राष्ट्रीय नहीं है, इस विचार से भारत सरकार ने दिनांक २२ मार्च ईसवी सन् १९५३ से राष्ट्रीय जंजी प्रचलित की है।
दिनांक २१ मार्च को वसन्त नम्यात Vernal equinox होता है, जब दिन रात बराबर होती है और नूर्ध ६ बजे उदय होता है। उस दिन राष्ट्रीय वर्ष का अन्त समझ कर दूसरे दिन २२ मार्च से राष्ट्रीय चैत्र मास आरम्भ होता है। उस दिन राष्ट्रीय चैत्र की १ तिथि ( दिनांक ) माका १ म०३९ से यह राष्ट्रीय वर्ष की तिथि आरम्भ होती है।
यह राष्ट्रीय दिनांक अर्द्ध रात्रि से अर्द्ध रात्रि तक ईसवी सन के दिनांक के अनुसार ही माना जायगा। राष्ट्रीय वर्ष दिन ३६५ घण्टा ५ मिनट ८ से०४८ का माना गया है। लीप इयर ( जून बर्ष ) में हर चौथि वर्ष ( सन् ईसवी के अनुसार ही ) चैत्र मास ३१ दिन का होगा। साधारण वर्ष में चैत्र ३० दिन का ही होगा। इसी देशाष्ट्र से साइप्रस तक ५ महीने ३९ दिन की ओप ६ महीने ३० दिन की होगी।
| आरम्भ का | | आरम्भ का ---|---|---|--- राष्ट्रीय मास | अंग्रेजी दिनांक | राष्ट्रीय मास | अंग्रेजी दिनांक लीप चैत्र | ३१ २२ मार्च से | आश्विन | ३० २३ सितम्बर से साधारण चैत्र | ३० .. | कात्तिक | ३० २३ अक्टूबर .. बैशाख | ३१ २१ अप्रैल .. | ज्येष्ठ | ३० २२ जून २४ .. ज्येष्ठ | ३१ २२ मई .. | श्रावण | ३० २२ अगस्त .. श्रावण | ३१ २२ जून .. | भाद्र | ३० २१ सप्टेम्बर .. भाद्रपद | ३१ २३ जुलाई .. | सातपुन | ३० २० अक्टूबर .. साइप्रस | ३१ २० अगस्त .. | |
लीप वर्ष में राष्ट्रीय देशाष्ट्र सप्ताह और इसमें वर्ष के मास आरम्भ होने की तारीख से एक दिन अधिक बढ़ जाता है। परन्तु दूसरे २२ दिन की रीति से ३०० के अनुमान की ३० तिथि दिनांक २१ मार्च को ही यह बताता है इसमें २३ मार्च के दिन चैत्र आरम्भ होगा।
पंचांगी १४ अक्टूबर में राष्ट्रीय दिनांक के प्रतिपादन सन् १९५३ का दिनांक ही दिया जाता है।
पंचांग में ही हुई तिथि और राष्ट्रीय दिनांक ऐतिहासिक अन्त के आस कर पंचांगों में तिथि और अंग्रेजी दिनांक के प्रतिपादन राष्ट्रीय दिनांक की दिशा देता है।
१४
२१० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
अध्याय ३८
दिनमान जानना
यहाँ स्थूल रूप से दिनमान जानने की रीति बताई जाती है। सूक्ष्म रूप से दिनमान जानना गणित खण्ड में बताया गया है।
अयन संक्रान्ति से (अर्थात् सायन कर्क और सायन मकर संक्रान्ति से) गत दिन कितने हुए निकालो। गत दिन को ३ से गुणा कर १५३० जोड़ो और ६० का भाग दो। जो लब्धि मिले वह कर्क संक्रान्ति की गणना करने से रात्रिमान और मकर संक्रान्ति से गणना करने पर दिनमान निकलेगा।
जैसे सम्बत् २००० में २२ दिसम्बर की रात को सायन मकर की संक्रान्ति हुई थी। २३ मई का दिनमान जानना है तो दिसम्बर के शेष दिन ३१-२२=९+जनवरी ३१ के, + फरवरी २८ के, + मार्च ३१ के, + अप्रैल ३० के + मई २३ के=सर्व दिन १५२। १५२ दिन X ३ = ४५६ + १५३० = १९८६ \div ६० = ३३ घ. ६ पल. \therefore दिनमान ३३ घ. ६ प. हुआ।
६० ) १९८६ ( ३३ घड़ी
१८०
१८६
१८०
६ पल
रात्रिमान = (६० - दिनमान) = ६० - (३३ - ६) = २६ घ. ५४ प. रात्रिमान
२१ दिसम्बर को सायन मकर संक्रान्ति और २९ जून को सायन कर्क संक्रान्ति प्रायः होती है।
दिनमान से सूर्योदय जानना पञ्चांग देखने के प्रकरण में बता चुके हैं।
चन्द्रोदय अस्त ज्ञान (स्थूल रूप से)
चन्द्रोदय—पूणिमा के उपरान्त, प्रतिदिन २० घड़ी=५४ मिनट के उपरान्त चन्द्रोदय होता है। अर्थात् कृष्ण पक्ष आरम्भ होने पर इतनी देर बाद प्रतिदिन चन्द्र उदय होगा। तिथि में २० घड़ी का गुणा कर जान सकते हो कि उस तिथि में (कृष्ण पक्ष में) कितनी घड़ी उपरान्त चन्द्रोदय होगा।
यदि शुक्ल पक्ष है तो उतने घड़ी पल (या घण्टा मिनट) गये पर चन्द्र अस्त होगा। यह बहुत मोटा हिसाब है। दिनमान के अनुसार इसमें अन्तर पड़ता है।
चन्द्रोदय का समय जानना—
रात्रिमान को वर्तमान तिथि से गुणा करो। कृष्ण पक्ष हो तो गुणनफल में २ घटा दो। शुक्ल पक्ष हो तो गुणनफल में २ जोड़ दो। उपरान्त १५ का भाग दो,
दिनमान जानना : २११
लक्ष्मि चन्द्रोदय की घड़ी निकलेगी। १५ का भाग देने से जो बच्चे उसमें ६० का गुणा कर १५ का भाग देने से पल निकलता है।
जैसे ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्थी को दिनमान ३३ घ. ६ प. है तो रात्रिमान २६ घण्टा ५४ प. हुआ।
[रात्रिमान तिथि] २६-५४×४ | —२ | कृष्ण पक्ष होने से | घ. प. (१०७-३६) | —२ | घ. प. घ. प. १०५-३६ ७-२ | = ---|---|---|---|---|---|--- १५ | | = | १५ | = | १५ | =
रात्रिमान २६ घ. ५४ प.
×४
१०७—३६ —२
कृष्ण पक्ष होने से घटाया।
१५ ) १०५-३६ ( ७ घड़ी
१०५
०
१५° ) ३६ ( २ पल
३०
६
अस्त जानना
पीष शुक्ल ७ दिनमान २६-३० रात्रिमान ३३-३० को चन्द्र के अस्त का समय जानना है।
| रात्रिमान ३३-३० | १५) २३६-३० (१५ | =१५ घ. ४६ प. रात्रि गये |
|---|
| ×७ तिथि | १५ | घड़ी | उपरान्त |
|---|
| २३४-३० | ८६ |
|---|
+ २° शुक्ल पक्ष ७५
चन्द्र अस्त होगा।
| २३६-३० होने से | ११ × ६०= |
|---|
६६०
+३०
१५ ) ६९० ( ४६
६०
९० पल
९०
२१२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
तारा देखकर रात्रिमान जानना
(१) सूर्य नक्षत्र से, सिर के ऊपर जो नक्षत्र हो उस तक गिनो, गिनने से जो संख्या आवे उसमें ७ घटा कर २० का गुणा करना और ९ का भाग देना तो जो अंक शेष रहे वह गत रात्रि स्पष्ट होगी।
(२) या सूर्य नक्षत्र से, सिर के ऊपर जो नक्षत्र हो उस तक गिनने में जो संख्या आवे उसमें ७ घटाकर २ का गुणा कर २ घटा दो तो रात्रि स्पष्ट होगी।
पूर्वाषाढ़ा, अनुराधा, ज्येष्ठा, आश्लेषा, रेवती और विशाखा सिर के ऊपर हों तो अष्टम में उदय होता है। मृगशिर और मूल नक्षत्र में हो तो नवम में उदय होता है और जब कोई नक्षत्र सिर के ऊपर हो तो अष्टम में उदय होता है। सूर्य नक्षत्र जो होता है वह सूर्योदय के साथ उदय होता है और सूर्य अस्त के समय वही नक्षत्र अस्त स्थान पर आ जाता है। इस कारण सूर्य नक्षत्र से सिर के ऊपर तक जो नक्षत्र हों उनको यहाँ गिनना बताया है और सिर के नक्षत्र से पूर्व की ओर गिनो तो ऊपर बताये अनुसार अष्टम या नवम नक्षत्र उदय स्थान में रहेगा।
मान लो सूर्य मूल नक्षत्र पर है और रात्रि को देखा अश्विनी नक्षत्र सिर पर है। मूल से अश्विनी तक गिना तो १० नक्षत्र हुए। इनमें ७ घटा कर २० का गुणा कर ९ का भाग दिया।
(१०—६) X २० ÷ ९ = (२ X २०) ÷ ९ = ६० ÷ ९ = ६ \frac{३}{९} = ६ बड़ी ४० पल इतनी रात्रि गत हुई ऐसा जानना।
दिनमान में गत रात्रि जोड़ने से उस समय का इष्ट काल होगा, जैसे उस दिन २६-४ दिनमान में ६-४० गत रात्रि जोड़ा तो ३२-४४ इष्ट काल हुआ।
दूसरी रीति से सूर्य नक्षत्र से सिर के ऊपर का नक्षत्र अश्विनी तक १० हुए। इसमें ७ घटाये ३ बचे, २ से गुणा किया=६ हुए। इसमें से २ घटाये ४ बड़ी रहे। इस रीति से कुछ अन्तर पड़ जाता है।
सिर पर नक्षत्र अश्विनी है इससे आठवां नक्षत्र पुष्य हुआ। इस कारण इस समय पुष्य नक्षत्र या कर्क रात्रि उदय हो रही है अर्थात् कर्क लगन होगी।
रात्रि का समय जानना
पहिले देखो सिर पर कौन तारा है और उस तारे का क्या विपुर्बांध है। नाक्षत्र काल से १ घण्टा कम या अधिक जिस तारे का विपुर्बांध है वह तारा उस रात्रि को विलकुल नहीं दिखाएगा। जिस तारे का विपुर्बांध ६ घण्टा अधिक हो वह तारा सूर्य अस्त होने के समय सूर्य के ६ घण्टा आगे होने से सिर पर उस समय होगा। उससे अधिक १२ घण्टा विपुर्बांध जिस तारे का है वह रात्रि को और कभी सिर पर आयेगा।
जो तारा सिर पर दिखे उसका विपुर्बांध आगे दिए हुए चक्र में से देख कर लिख लो। उसमें से उस दिन का नाक्षत्र काल घटा दो। जो घण्टा मिनट बचे उतने घण्टा
दिनमान जानना : २१३
मिनट आगे वह तारा मध्यम रवि के आगे हैं ऐसा समझना। अर्थात् उतने बजे होंगे समझना। क्योंकि मध्यम रवि १२ बजे सिर पर आता है और इसके उतने घण्टा मि० आगे वह तारा है। इस कारण समझ लेना कि उतने बजे होंगे।
जैसे १ जनवरी को रात्रि में यह जानना है कि घड़ी में क्या बजा होगा। ५ जनवरी को दोपहर को मध्यम रवि का विषुवांश १९ घण्टा है। जैसा पहिले चक्र में दे चुके हैं अपने को १ जनवरी की रात्रि को जानना है। (ता० ५-१ ता०) = ४ अन्तर दिन। इसमें दोपहर रात तक ३ दिन घटाया तो = ३३ हुए। अर्थात् ४ दिन से आधा दिन इस कारण घटाया कि अपना समय ५ ता० के पहिले का है। ३३ दिन X ४ मि० गति = ० ० १४ मि० ता० ५ को १९ घण्टा विषुवांश था। इसमें से ०-१४ मि० घटा दिये तो शेष १८ घण्टा ४६ मि० बचे—यह उस दिन का नाक्षत्र काल था मध्यम रवि का विषुवांश हुआ।
मान लो उस दिन सिर पर अश्विनी नक्षत्र है। अश्विनी का विषुवांश चक्र में १ घण्टा ४९ मि० दिया है। इसमें से नाक्षत्र काल १८ घं० ४६ मि० घटाया तो नहीं
| घं० मि० | घटता, २४ घण्टा जोड़ कर घटाया तो शेष ७ घं० ३ मि० |
|---|---|
| १-४९ | रहे। अर्थात् १२ बजे दोपहर को जब मध्यम रवि मध्याह्न पर |
| —१८—४६ | था उससे ७ घं० ३ मि० आगे यह तारा है अर्थात् ७ घं० ३ मि० |
| शेष ७—३ | रात के बजे हैं। |
समय देखते समय सिर के ऊपर कोई पहचान का तारा न मिले तो कुछ समय ठहरो, जब कोई पहचान का तारा सिर पर आवे तो उससे गणित कर अपनी घड़ी मिला लो।
ऊपर के उदाहरण में नाक्षत्रकाल १८—४६ आया है। यदि इससे १ घण्टा कम या अधिक जिस तारा का नाक्षत्र काल हो अर्थात् १७-४६ या १९-४६ हो तो वह तारा इस रात को बिलकुल नहीं दिखेगा। जैसे १ जनवरी को पूर्वाषाढा उत्तराषाढा और श्रवण नहीं दिखेंगे, क्योंकि जनवरी में मकर संक्रान्ति होती है तो धन और मकर के नक्षत्र नहीं दिखेंगे। जिस तारे का विषुवांश इससे ६ घण्टा आगे हो अर्थात् (१८-४६)+६=२० घण्टा ४६ मि० हो तो वह तारा सूर्यास्त के समय ६ घण्टा आगे होगा जैसे उ० भाद्रपद नक्षत्र, उससे १२ घण्टा अधिक हो (०-४६)+१२-४६ तो विषुवांश का तारा रात्रि को कभी सिर पर आवेगा जैसे हस्त।
तारों का होरात्मक विषुवांश
इनमें स्थिति के अनुसार बहुत थोड़ा अन्तर पड़ता है, क्योंकि प्रतिवर्ष इनकी गति ३-४ सेकण्ड के लगभग है।
२७४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
| नक्षत्र | घं | मि० | से० | नक्षत्र | घं | मि० | से० | नक्षत्र | घं | मि० | से० |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १ अश्विनी | १ | १४ | २३.४ | ११ पूर्वा फाल्गुनी | ११ | ९ | १५.४ | २१ उत्तराषाढ़ा | १८ | ३६ | ४३.३ |
| २ भरणी | २ | ४४ | २६.६ | १२ उत्तराफाल्गुनी | ११ | ४४ | १२.९ | २२ अभि० | १८ | ३३ | ४३.३ |
| ३ कृत्तिका | ३ | ४१ | ५०.१ | १३ हस्त | १२ | २४ | ५६.९ | २३ श्रवण | १९ | ४६ | ८.९ |
| ४ रोहिणी | ४ | ३० | २८.१ | १४ चित्रा | १३ | २० | ११.२ | २४ धनि० | २० | ३५ | १३.५ |
| ५ मृग० | ५ | २९ | ५४.१ | १५ स्वाती | १४ | ११ | १९.७ | २५ शत० | २२ | ४७ | ३९.५ |
| ६ आर्द्रा | ६ | ०२ | १३.५ | १६ विशाखा | १५ | ४५ | ३७.३ | २६ पूर्वा भाद्रपद | ३३ | ०० | १.७ |
| ७ पुनर्वसु | ७ | ३९ | १७.६ | १७ अनुराधा | १५ | ३४ | ४२.८ | २७ उत्तरा भाद्रपद | ० | ८ | २०.६ |
| ८ पुष्य | ८ | ३९ | १७.६ | १८ ज्येष्ठा | १६ | २३ | ६४.५ | २८ रेवती | १ | ८ | ४६.० |
| ९ अश्लेषा | ८ | ५० | २२.४ | १९ मूल | १७ | १७ | ९.४ | १ | २५ | १२.२ | |
| १० मघा | १० | ३ | १८.८ | २० पूर्वाषाढ़ा | १८ | २२ | ६.५ |
स्थूल रीति से छाया से दिन का इष्ट जानना— परस दिन जो २१ जूत को होता है। पहिले बता चुके हैं कि किस अक्षांश पर कितना परम दिन [ बड़े से बड़ा दिन ] होता है।
( १ ) (परसदिन—अपना दिनमान ) + ५ = ( अ ) = दिन मध्य छाया ( बड़ी पल में )।
अपना दिनमान ५६
( १२ अंगुल संकु की छाया )—( अ=दिन मध्य छाया ) + १२ अंगुल संकु=दिन की गत या मध्य घटी पल अर्थात दोपहर के पहिले इतना दिन चढ़ा या दोपहर के बाद का इष्ट है तो इतना दिन शेष रहू जानना।
दिनमान जानना : २१५
गत=इतने घड़ी पल बीत गया ।
गम्य= , , बीतने को है ।
(२) दूसरा प्रकार
१२१ \div \left[ \begin{array}{l} \text{इष्ट छाया का} \\ \text{१२ का नाप} \end{array} + ६ \right] = \text{लब्धि घड़ी पल} \\ \text{( दिन की गत, गम्य घटी पल )}
(३) व=मेष से तुला संक्रान्ति तक=१ घटना तीसरा प्रकार—
\begin{array}{lll} \text{तुला व मीन} & ,, & \text{मैं=३} ,, \quad १०५ \div [ ( \text{छाया नाप}+७) - व ] \\ \text{वृश्चिक व कुम्भ} & ,, & \text{मैं=४} ,, \quad = \text{गत गम्य घटी} \\ \text{धन व मकर} & ,, & \text{मैं=५} ,, \end{array}
गत दिन=दिनाब्द के पूर्व में इतने घड़ी पल दिन चढ़ा ।
गम्य=दिन के उत्तरार्द्ध में इतने घड़ी पल शेष रहा ।
उदाहरण—
(१) मान लो अपना अक्षांश २३ अंश है । यहाँ का परम दिन १३ घं० २० मि० =३३ घ० २० पल का होता है जैसा पहिले समझा चुके हैं ।
अपने स्थान का परम दिन ३३ घड़ी २० पल है । इष्ट दिन का दिनमान
( \text{माल लो} ) \quad २६-१७ \text{ है}
\begin{array}{r} \text{अन्तर} \quad ७ \quad १७ \\ \hline \end{array}
अब १ शंकु (सलाका) १२ अंगुली का लिया, उसको सीधा खड़ा कर छाया नापी तो २५ अंगुली छाया निकली ।
\text{शंकु छाया} \quad २५ \text{ अंश-०}
\text{—दिन मध्य छाया} \quad १०--११
\text{अन्तर ( शेष )} = \quad १४--४९
+ \text{ शंकु नाप} \quad १२--०
\text{योग} \quad २६--४९
\text{अन्तर } ७-१७ \times ६ = \text{दिन} \\ \text{मध्य छाया}
७-१७=१० \text{ घ० } ११ \text{ प०}
\begin{array}{r} \times ७ \\ \hline ५ ) ५०-५९ ( १० \text{ घड़ी} \end{array}
\begin{array}{r} ५० \\ \hline ० \\ ५ ) ५९ ( ११ \text{ पल} \end{array}
\begin{array}{r} ५ \\ \hline ९ \\ \hline ५ \\ \hline ४ \end{array}
दिनमान
२६-१७ \times ६ = १५७ \text{ घ. } ४२ \text{ प.} = ९४६२ \text{ पल}
योग २६-४९ २९-४९ १६०-९ पल =५ घ. ५२ प. दिन शेष रहा मध्याह्न के बाद होने के कारण
२१६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
(२) दूसरीरीति
\begin{aligned} & १२१ \div (छाया + ६) \\ & = १२१ \div (१४ \text{ छाया} + ६) \\ & = १२१ \div २० = ६ \text{ घ. ३ प.} \\ & = ६ \text{ घ. ३ प. दिन शेष रहा।} \end{aligned}
मान लो इष्ट काल में अपनी छाया को अपने पैर से नापा तो, नाप में १४ पैर निकली। यह छाया मध्याह्न के उपरान्त की है।
२० ) १२१ ( ६ घड़ी
\underline{१२०}
१ \times ६०
२० ) ६० ( ३ पल
\underline{६०}
(३) तीसरी रीति
\begin{aligned} & १०५ \div [ (छाया + ७) - ४ ] \\ & = १०५ \div [ (१४ \text{ छाया} + ७) - ५ ] \end{aligned}
= १०५ \div (२१ - ५)
= १०५ \div १६ = ६ \text{ घ. ३३ प.}
= ६ \text{ घ. ३३ प. दिन शेष रहा।}
यह सब स्थूल रीति है इसका ध्यान रहे।
मान लो छाया का नाप वही १४ पांव है और धन संक्रान्ति होने से धन के ५ घटाना पड़ेगा तो व=५ हुआ।
१६ ) १०५ ( ६ घड़ी
\underline{९६}
२ \times ६०
१६ ) ५४० ( ३३ पल
\underline{४८}
\underline{६०}
\underline{४८}
१२
अध्याय ३६
केवल कुण्डली पर से जन्म समय मास-पक्ष आदि का ज्ञान
केवल कुंडली चक्र किसी का देख कर उस जातक की आयु, जन्म मास, अयन, ऋतु, पक्ष, जन्म तिथि, नक्षत्र, योग, करण, जन्म दिन में या रात में हुआ, जन्म का समय आदि स्थूल रूप से जान सकते हो। इन सबको जानने की रीति पृथक २ समझाते हैं।
केवल कुंडली पर से जन्म समय मास-पक्ष आदि का ज्ञान : २१७
(१) वर्ष ज्ञान—
कुंडली में शनि की राशि और वर्तमान सम्बत् में शनि की राशि देखो। शनि॥ वर्ष में एक राशि पूरी करता है। कुण्डली की शनि की राशि से शनि की वर्तमान राशि तक गिन कर २॥ से गुणा करो तो गत आयु आयगी। वर्तमान सम्बत् में वह संख्या घटा दो तो लगभग जन्म का सम्बत् निकल आवेगा। शनि लगभग ३० वर्ष में १२ राशि घूम लेता है। इसके भीतर की आयु इससे प्रगट हो जायगी। यदि जातक देखने में ३० से अधिक आयु का जान पड़े तो शनि के फेरे के अनुसार ३०-३० वर्ष जोड़ते जाय तो आयु निकल आयगी। इस कारण पहिले देखकर अनुमान लगा लेना चाहिए कि कितनी आयु होगी और शनि के कितने फेरे हो गये होंगे। यदि जातक पास नहीं है तो पूछ सकते हो कि जातक बाल, युवा, अर्धेड़ या वृद्ध है तब जन्म समय बताना।
इस कुण्डली में शनि सिंह का है। सम्बत् २००० में वृष का शनि है। सिंह के आगे कन्या से वृष तक गिना ९ राशि हुई ९ × २॥ = २२॥ वर्ष हुए। अब इस का आयु २२॥ वर्ष या २२॥ + ३० = ५२॥ वर्ष, या ५२॥ + ३० = ८२॥ वर्ष की होगी। अब जातक को देखकर आयु का अनुमान कर बता दो। या पूछने से
प्रगट हुआ कि अर्धेड़ से और कुछ उमर हो गई है तो ५२॥ वर्ष की आयु होगी। इसे इण्ट सम्बत् में घटाया (सम्बत् २०००—५२३=१९४७ आया) तो कह सकते हैं कि सम्बत् १९४७ के लगभग का जन्म होगा। इसमें एकाध वर्ष का अन्तर पड़ सकता है।
इसी प्रकार कुंडली में गुरु की राशि से इस समय के गुरु की राशि तक गिन कर आयु जान सकते हो। गुरु १२ वर्ष में पूरा भगन (१२ राशि) घूम लेता है। १ महीने में १ राशि घूमता है।
कुंडली में गुरु मकर का था। सम्बत् २००० में मिथुन का गुरु है। मकर के आगे कुम्भ से गिना मिथुन तक ५ राशियाँ हुई=५ वर्ष। शनि के साथ ही साथ इस का विचार करना चाहिए। जैसे शनि से तो ५२॥ वर्ष की आयु निकली थी तो इस में गुरु के ४ फेरे हो चुके। ४ आवृत्ति × १२ वर्ष=४८ वर्ष + ५ वर्ष=५३ वर्ष वर्तमान सम्बत् तक आया। सम्बत् २००० सम्बत् १९४७ का जन्म निकालना है। अब इस में इन के अंशों—५३ का विचार करो तो और भी ठीक हिसाब आयु का जम
२१८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
जाता है। १९४७में जन्म के समय गुरु १४ वंश पर है अर्थात् आधी राशि भुक्त हो चुकी है तो ५३ में आधा वर्ष घटा दिया तो वही ५२॥ वर्ष आ जाते हैं।
इसी के साथ २ राहु का भी विचार करना चाहिए। राहु सदा बकी रहता है और १८ वर्ष में पूरा भ्रमर घूम लेता है। कुण्डली के राहु से वर्तमान राहु तक उल्टे क्रम से गिनो, जो संख्या हो उसे १॥ से गुणा करो, क्योंकि राहु १॥ वर्ष में १ राशि पार करता है। जो गुणन फल आवे उस पर से आयु विचारना।
जैसे कुण्डली में राहु मियुन का है सम्बत् २०००में कर्क का है। मियुन से उल्टे क्रम से आगे वृष फिर मेष आदि गिना तो ११ राशि हुई। ११ X १॥ = १६३ वर्ष + ३६ वर्ष ( राहु के २ फेरा ) = ५२१॥ वर्ष आयु। यदि कुण्डली में ग्रह स्पष्ट दिये हों तो इन ग्रह के अंशों पर से ठीक विचार करने पर आयु का हिसाब ठीक जम सकता है।
जिस सम्बत् की आयु कुण्डली देखकर अनुमान करने से निकले उस वर्ष का पंचांग ( यदि पुराने पंचांग पास हों तो ) या एकाध वर्ष आगे पीछे का पंचांग देखो। जिसमें ग्रहों की ठीक स्थिति कुण्डली के अनुसार मिले ठीक उसी समय का जन्म जानना।
(२) कुण्डली से अयन जानना
अयन—मकर के सूर्य के कुछ पहिले उत्तरायण और कर्क के सूर्य के कुछ पहिले दक्षिणायन होता है। कुण्डली में जिस राशि का सूर्य हो उससे जन्म समय का अयन जानना
जैसे कुण्डली में मीन का सूर्य है तो उत्तरायण जानना और उस जातक का जन्म उत्तरायण में हुआ है कहना।
(३) जन्म की ऋतु और मास जानना
जन्म मास—सूर्य की राशि से चन्द्रमास का अनुमान इस प्रकार करना सूर्य की
राशि मेष वृष मियुन कर्क सिंह कन्या तुला वृश्चिक धन मकर कुंभ मीन मास वैशाख ज्येष्ठ असाढ़ श्रावण भादों कुआँर कार्तिक अगहन पूस माघ फागुन चैत जैसे मीन का सूर्य कुण्डली में है तो चैत्र में जन्म हुआ होगा।
(४) ऋतु
चन्द्र मास के अनुसार इस प्रकार ऋतु होती हैं—
| ऋतु | वसन्त १ | शीत २ | वर्षा ३ | शरद ४ | हेमन्त ५ | शिशिर ६ |
|---|---|---|---|---|---|---|
| मास | चैत्र | जेठ | सावन | कुआँर | अगहन | माघ |
| वैशाख | असाढ़ | भादों | कार्तिक | पुस | फागुन |
सूर्य मीन का होने से चैत्र मास हुआ। चैत्र में वसन्त ऋतु होती है। इस कारण जातक का जन्म वसन्त ऋतु में हुआ है कहना।
केवल कुण्डली पर से जन्म समय मास-पक्ष आदि क' ज्ञान : २१९
(५) जन्म का पक्ष जानना
कुण्डली में ७ राशि के भीतर चन्द्र हो तो शुक्ल पक्ष और ७ राशि के बाहर चन्द्र हो तो कृष्ण पक्ष जानना ।
जैसे ऊपर कुण्डली में मीन का का सूर्य है और चन्द्र कुम्भ का है । मीन गिना तो ७ राशि कन्या हुई । इसके आगे कुम्भ का चन्द्र है, इससे ज्ञान पड़ा कि सूर्य से चन्द्र ७ राशि के बाहर है, इस कारण ज्ञातक का जन्म कृष्ण पक्ष होगा कहना ।
(६) जन्म की तिथि जानना
कुण्डली में जहाँ सूर्य हो वहाँ अमावस्या जानो, क्योंकि अमावस्या को सूर्य और चन्द्र एकत्र रहते हैं । उसके आगे जैसे जैसे तिथि बढ़ती है, चन्द्रमा आगे बढ़ते जाता है । इस कारण कुण्डली में देखो चन्द्र कहाँ है और सूर्य से कितने घर के अंतर पर चन्द्र है । एक कोठे में ( १ राशि में ) २॥ तिथि के हिसाब से तिथि होती है । क्योंकि मोटे हिसाब से चन्द्र ३० दिन में १२ राशि घूमता है तो १ राशि में २॥ दिन पड़ा । १ दिन में १ तिथि होती है इस कारण १ राशि में २॥ तिथि होती है ।
यहाँ पर कुण्डली में मीन का सूर्य है और चन्द्र कुम्भ का है । दोनों के बीच ११ राशि का अन्तर हुआ । ११ × २॥ = २२॥ तिथियाँ हुई । अमावस्या को ३० तिथि कहते हैं । ( २७॥ — १५ ) = शेष १२॥ तिथि । २७॥ में पूर्णिमा तक की १५ तिथि घटा दिया तो शेष १२॥ तिथि कृष्ण पक्ष की निकल आई । अर्थात् कृष्ण पक्ष की १३ तिथि का जन्म होगा ।
यदि चन्द्र और सूर्य के अंशों का विचार किया जाय तो और भी ठीक तिथि निकल आती है । यहाँ सूर्य मीन के ५° में हैं ( ११ रा-५° ) और चन्द्र कुम्भ के ३° ( १० रा-३° ) पर है अर्थात् लगभग बराबर अंश दोनों के हैं । जब सूर्य और चन्द्र के बीच १२° का अन्तर पड़ता है तो १ तिथि होती है । यहाँ दोनों का अन्तर निकाला ।
\begin{aligned} \text{सूर्य } ११ \text{ रा-} ५ \text{ अंश} &= \text{शेष } १ \text{ रा-} २^\circ \\ \text{— चन्द्र } १० \text{—} ३ &= ३२^\circ \div २१ \text{ अंश} \\ \text{शेष} &= १ \text{—} २ = २॥ \text{ लगभग तिथि} \end{aligned}
हुई अर्थात् २॥ तिथि चन्द्र और चलता तो अमावस्या हो जाती । इस कारण अमावस होने को २॥ तिथि शेष है । पूरी १५ तिथि से २॥ घटाये तो १२॥ तिथि हुई । अर्थात् १२ तिथि पूरी हो चुकी है तेरहवीं तिथि वर्तमान है तो जन्म कृष्ण पक्ष की १३ तिथि का हुआ ।
चन्द्र में से सूर्य घटाने से स्पष्ट तिथि ज्ञात होती है । यहाँ चन्द्र १०—रा०—३° में से सूर्य ११—रा०—५° घटाया तो शेष १०—रा०—५ अंश रहे, इसके ३२४° हुए । १२° की एक तिथि होती है, इसमें १२ का भाग दिया तो २७३° तिथि हुई । इसमें से १५ घटाया तो कृष्ण पक्ष की १२३° तिथि हुई तिथि अर्थात् जन्म तिथि १३ हुई ।
२२० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
| चन्द्र १०—रा०—३° | १२ ) | ३२८° ( २७ |
|---|---|---|
| सूर्य ११—५ | २४ | |
| शेष १०—२८ | ८८ | |
| ८४ | ||
| ४ |
यदि सूर्य के आगे चन्द्र ७ घर के भीतर है तो समझना अमावस्या को पार कर चन्द्र आगे बढ़ रहा है और अमावस्या के आगे शुक्ल पक्ष की तिथि आरम्भ हो गई है। सूर्य के ठीक सममुख सातवें घर में चन्द्र हो तो पूर्णिमा समझना। इसके आगे चन्द्र जाने पर कृष्ण पक्ष का आरम्भ होता है और चन्द्र जब सूर्य के पास आ जाता है तो अमावस्या होती है।
(७) कुण्डली से जन्म का वार जानना
कुण्डली से जो जन्म का मास जान पड़े चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से गिन कर ढेढ़ गुना करो। गत पक्ष के दिन जोड़ कर ७ का भाग दो। जो शेष रहे उसे जन्म वर्ष के राजा से गिन कर जन्म का वार कहना। पहले बता चुके हैं कि चैत्र शुक्ल १ तिथि को जो वार होता है वही उस वर्ष का राजा कहलाता है। वर्ष के राजा का चक्र पहिले दे चुके हैं। जैसे जन्म चैत्र कृष्ण १३ का है जैसा ऊपर निकाल चुके हैं। चैत्र शुक्ल १ से फागुन कृष्ण ३० तक ११ महीने हुए। ११ × ११ = १२१। दिन + फागुन शुक्ल पक्ष के १५ दिन + और चैत्र कृष्ण १३ तक गत दिन १२ हुए। १२१ + १५ + १२ = ४३१। ÷ ७ शेष ११। बचा। इस वर्ष का राजा सोमवार था तो सोमवार से ११ गिना, मंगलवार हुआ। जन्म दिन मंगलवार कहना।
(८) कुण्डली से जन्म नक्षत्र जानना
कुण्डली में जो जन्म मास निकले कार्तिक से उस मास तक गिन कर दूना करो और गत पक्ष के दिन भी जोड़ कर एक और मिला दो। इसमें २७ का भाग दो, शेष जो बचे अश्विनी से गिन कर नक्षत्र जानना।
जैसे कुण्डली से प्रगट हुआ चैत्र का जन्म है तो गत मास फागुन हुआ। कार्तिक को १ गिना। इस प्रकार कार्तिक से फागुन तक गिना ५ मास हुए। ५ × २ = १० + गत १३ + १ = १० + १४ = २४, अश्विनी से गिना चौबीसवाँ नक्षत्र शतभिषक का जन्म हुआ।
(९) कुण्डली से जन्म का योग जानना
पुष्प नक्षत्र से सूर्य नक्षत्र तक गिनो और श्रवण नक्षत्र से चन्द्र नक्षत्र तक गिनो। दोनों संख्या जोड़कर २७ का भाग दो, जो शेष बचे उसी क्रम से गिन कर योग जानना।
केवल कुण्डली पर से जन्म समय मास-पक्ष आदि का ज्ञान : २२१
सूर्य चन्द्र की राशि अंश पर से पहले बताये होइ। चक्र में दिए हुए अंशों पर से इनका नक्षत्र जान सकते हो जैसा सूर्य ११-२०-५° है अर्थात् मीन के ५° पर है। होइ। चक्र में ११-२२-३°-२०° तक पूर्वा भाद्रपद का चौथा चरण दिया है। इष्ट सूर्य ११-२०-५° है इससे ज्ञात गया कि सूर्य पूर्वा भाद्रपद का चौथा चरण पार करके उत्तरा भाद्रपद नक्षत्र में गया है। उत्तरा भाद्रपद का पहिला चरण ११-२०-६-४० तक होता है, इस कारण सूर्य जन्म समय उत्तरा भाद्रपद नक्षत्र पर था।
पुष्य नक्षत्र से उत्तरा भाद्रपद ( सूर्य नक्षत्र ) तक गिना १९ हुए। जन्म नक्षत्र ( चन्द्र नक्षत्र ) शतभिषक है ( ऊपर निकाल चुके हैं )। श्रवण से चन्द्र नक्षत्र शतभिषक तक गिना ३ हुए। १९+३=२२ वां योग=साध्य योग आया। यदि योग २७ से अधिक आवे तो २७ का भाग देने पर जो शेष रहता उसे लेते। यहाँ जन्म का योग साध्य निकला।
(९०) कुण्डली से जन्म का कारण जानना
कुण्डली में जो जन्म की तिथि मिले उस तिथि तक शुक्ल प्रतिपदा से गिनो और उस संख्या में २ का गुणा कर १ घटाकर ७ का भाग दो जो शेष बचे वही कारण पराद्ध में जानना।
स्थिर करण। शुक्ल प्रतिपदा के पूर्वार्द्ध में किस्तुन्न और पराद्ध में बव, कृष्ण १४ को, पराद्ध में शकुनि। अमावस्या के पूर्वार्द्ध में शकुनि। अमावस्या के पूर्वार्द्ध में चतुष्पद और पराद्ध में नाग सदा रहते हैं। यदि इनमें से कोई तिथि का जन्म हो तो इसी के अनुसार करण जानना। शेष का उपरोक्त रीति से जानना।
जैसे कृष्ण १३ का जन्म है। शुक्ल प्रतिपदा से पूर्णिमा तक १५ दिन कृष्ण पक्ष के १३ दिन। १५+१३=२८ X २=५६-१=५५-७=शेष ६। छठा करण बणिज हुआ। यह त्रयोदशी के पराद्ध में हुआ। इसके पूर्वार्द्ध में इसके पहिले का अर्थात् पांचवा गर करण जानना।
इतनी खटपट न करके पहिले जो करण चक्र दे चुके हैं उससे इष्ट तिथि का ठीक करण जान सकते हो।
(९१) दिन या रात का जन्म है कुण्डली देखकर जानना
कुण्डली में जहाँ सूर्य हो वहाँ से जन्म लगन ६ घर के भीतर हो तो दिन का जन्म कहना और सातवें स्थान में हो तो संध्या का जन्म, ७ से १२ स्थान तक लगन हो तो रात्रि का जन्म कहना। लगन में सूर्य हो तो प्रातःकाल का जन्म, दशम में सूर्य हो तो दोपहर का जन्म और चतुर्थ में सूर्य हो तो अद्वैरात्रि का जन्म कहना जैसा यहाँ सूर्य के समय चक्र में बताया गया है। लगन कुण्डली देखा तो सूर्य दशम स्थान
२२२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
सूर्य का समय चक्र
में है यहाँ से लग्न चौथे घर में है अर्थात् ६ घर के भीतर ही है, इस कारण दिन
का जन्म कहना । सूर्य दशम स्थान में है जिससे प्रगट होता है कि मध्याह्ञं काल का
जन्म है ।
(१२) कुण्डली से जन्म समय जानना
ऊपर जो सूर्य का समय चक्र दिया है उसमें केन्द्र में सूर्य रहने से जो समय होता
है वतला दिया गया है। अब उनके बीच के स्थान से भी समय जानना बतलाते हैं ।
दिन रात की ६० घड़ी में सूर्य, कुण्डली में १२ राशि ( लग्न के अनुसार ) घूम
लेता है । १ राशि में ५ घड़ी या २ घण्टा पडा ।
कुण्डली में सूर्य से लग्न जितने घर दूर हो उसका ५ गुना करो तो इष्ट काल की
घडी निकल आयगी ।
अपनी कुण्डली में सूयं दशम भाव में है वहाँ से लग्न ३ घर अन्तर पर है । ३०८५
-१५ घड़ी अपना इष्ट हुआ । अर्थात् कुण्डली से प्रगट हुआ कि जातक का जन्म
लगभग १५ घडी इष्ट पर हुआ होगा ।
यहां ध्यान रहे कि १ राशि में ३०° होते हँ। ३०० में ५ घडी का अन्तर पडता
है तो ६? में १ घड़ी या १? में १० पल का अन्तर पड़ता है । सूर्य से लग्न जितने
राशि अश के आगे है देख कर इष्ट घडी का विचार कर लो । जसे सूर्य ११ रा ४५? ( मीन के ५० ) पर और लग्न २ रा २२° ( मिथुन के २२ अश) पर है तो सूर्य
को आगे २५ अश और चलना पड़ेगा तव मीन राशि का अन्त होगा । इस कारण
(२ रा २२अ ) रूग्त११ ( ० रा २५ अश )-३ रा १७ अ श= यह सूर्य और
लग्न का अन्तर हुआ। ३ राशि 5 (३३४५ ) 5१५ घड़ी और १७ अंश = ( १७३८ १० ) = १७० पल = २ घ. ५० प. । सब मिल कर १७ घड़ी ५० पल के
लगभग इष्ट हुआ । यह जन्म का इष्ट हुआ । परन्तु यह भी स्थूल मान है इसका
ध्यान रहे ।
ग्रहों का बल विचार : २२३
कुण्डली पर से जन्म समय आदि का ज्ञान कैसे किया जाता है यह बता चुके। इस पर से जान सकते हो कि यह कुण्डली चक्र कितने महत्त्व का है और इस कुण्डली चक्र से कितनी महत्वपूर्ण बातें जानी जा सकती हैं। जिसके पास कुण्डली है और वह शुद्ध बनाई गई है तो उससे जन्म समय के सम्बन्ध की बहुत सी उपयोगी बातों का ज्ञान हो सकता है। इस कारण जितनी शुद्धता पूर्वक कुण्डली तैयार की जायगी उतना शुद्ध फल निकलेगा।
यहाँ केवल प्रारम्भिक ज्ञान करने के निमित्त ही कुंडली सम्बन्धी सम्पूर्ण बातें स्थूल रूप से बता दी गई हैं। इससे स्थूल रूप से कुण्डली बनाना आ जायगा और फल विचारने का अनुभव बढ़ेगा।
सूक्ष्म रूप से गणित द्वारा कुंडली आदि तैयार करना और तत्सम्बन्धी पूरा गणित खण्ड में उदाहरण देकर समझाया गया है, जिससे इतना ज्ञान होने के उपरान्त आगे की सब बातें सरलता पूर्वक समझ में आने लगेगी।
अध्याय ४०
ग्रहों का बल विचार
कुण्डली में सब ग्रहों में कौन बलवान है कौन बलहीन है यह जानने की आवश्यकता पड़ती है। इस कारण ग्रहों के बल का विचार करना संक्षेप में बतलाते हैं।
ग्रहों का बल ६ प्रकार से विचारते हैं और उन सबको मिलाकर प्रत्येक ग्रह के बल का विचार करते हैं। क्योंकि बलवान ग्रह पूर्ण फल देता है। बलहीन ग्रह फल देने में असमर्थ होता है। ग्रहों का बल ६ प्रकार का है।
( १ ) स्थान बल, ( २ ) दिग्बल, ( ३ ) कालबल, ( ४ ) चेष्टा बल, ( ५ ) नैसर्गिक बल, ( ६ ) दृग् बल।
( १ ) स्थान बल—५ प्रकार के बल के योग से यह बल बना है।
( १ ) उच्च बल, ( २ ) सप्तवर्गी बल, ( ३ ) युग्मायुग्म बल, ( ४ ) द्वेष्काण बल, ( ५ ) केन्द्रादि बल।
( १ ) उच्च बल—जो ग्रह अपने उच्च में होता है वह पूर्ण बली होता है। जो अपने नीच में होता है वह शून्य बली होता है। इसके बीच में ग्रह हो तो अनुपात से बल निकालना पड़ता है।
( २ ) सप्तवर्गी बल—ग्रहों के गृह, होरा, द्वेष्काण आदि सप्तवर्गीबल साधन करना गणित खण्ड में बताया है। जो ग्रह अपने मिश्र के घर में अपने मूल त्रिकोण