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सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

११८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

ऐकाधिपत्य शोधन .

अष्टक वगग में प्राप्त प्रत्येक ग्रहों को रेखाओं का त्रिकोण शोधन के पश्चात्‌ ऐका-

धिपत्य शोधन करना पड़ता है। जिन ग्रहों की राशियाँ ( दोस्वगृह ) हैं केवल उन्हीं

का ऐकाधिपत्य शोधन करना पड़ता है। सूर्य चन्द्र को १-१ राशि है इससे उनकी

राशि का शोधन नहीं होता ।

ऐकाघिपत्य शोधन के नियम ये हैं :---

(१) जिस राशि में ग्रह है वह सग्रह राशि हुई । जिस राशि में कोई ग्रह नहीं

हैं वह अग्रह राशि हुई । इसका ध्यान रखकर शोधन करना पड़ता है। किसी ग्रह की २

राशियाँ हैं उनमें ही विचार करना पड़ता है कि अग्रह हैं यहा सग्रह ओर उनके त्रिकोण

शोधन के पश्चात्‌ प्राप्त अंक, दोनों एक बरावर है या छोटा बड़ा अंक हैँ ।

(२ ) जब दोनों अग्रह राशि हो और दोनों के अंक समान हों तो दोनों अंक

लुप्त हो जाथंगे अर्थात्‌ दोनों में ०-० अङ्क रखना पड़ेगा ।

` (३) दोनों राशि अग्रह हों उनमें एक राशि से दूसरी संख्या बड़ी हो तो=

( अधिक-अल्प ) = शेष को बड़ी संख्या के स्थान में रखो छोटी संख्या पूर्ववत्‌ होगी ।

(४ ) एंक सग्रह दूसरा अग्रह दोनों के सभान अंक हों तो अग्रह ० हो जायेगा ।

सग्रह पुर्वेवत्‌ रहेगा ।

(५) दोनों में से चाहे कोई एक अग्रह हो या सग्रह या दोनों सग्रह या अग्रह हों

परन्तु किसी में ० हो तो दोनों ० रख दो ।

(६) अग्रह बड़ा सग्रह छोटा अंक हो तो ( बड़ी संख्या-छोटी संख्या ) शेष संख्या

भंग्रह की होगी: । सग्रह पूर्ववत्‌ रहेगा ।

(७) सग्रह बड़ा अग्रह छोटा अंक हो तो अग्रह ० हो जायगा,सग्रह पूर्ववत्‌ रहेगा ।

(८) दोनों सग्रह हो तो कोई परिवर्तन नहीं होगा ।

(९) यह ध्यान रहे कि सूर्य चन्द्र का ऐकाधिपत्य शोधन नहीं होता क्योंकि इनकी

एक-एक ही स्वराशि हैं । इनका जो अंक त्रिकोण शोधन से प्राप्त हुआ था वहीं अंक

कके और सिंह राशि में ऐकाधिपत्य शोधन चक्र में रख देना चाहिये ।

इसमें कुछ मतान्तर है-जातक पारि० में बताया है कि दोनों में से किसी में शून्य

हो तो दोनों संख्या पूर्ववत्‌ रहेगी यह उपरोक्त ५ के विरुद्ध है जैसे मेष में ० वृश्चिक

में २ हैं चाहे सग्रह या अग्रह हो दोनों पुंवत्‌ रहेंगे अर्थात्‌ मेप ० वृश्चिक में २ ही

ऐका० शो० में रहेगा ।

ऐकाधिपत्य शोधन में मतान्तर

त्रहत्पाराशरी, शंभु होरा प्रकाश आदि के अनुसार ऐकाधिपत्य शोधन करना यहाँ

दिया है परन्तु इसमें कुछ का मत भिन्न है ।

(३) यहाँ दोनों अग्रह राशि हों और संख्या बड़ी छोटी हो तो बड़ी से छोटी को

घटाकर शोष को बड़ी संख्यां के नीचे रखना छोटी पूर्ववत्‌ रहेगी, बताया है। कई छोटी

अष्टक वर्ग विचार : ११९

संख्या को लुप्त कर ० रख देते हैं बड़ी संख्या को छोटी के बराबर कर देते हैं। कोई छोटी के बराबर बड़ी संख्या कर देते हैं ।

(५) दोनों अग्रह या दोनों सग्रह हों या एक अग्रह दसरा सग्रह हो किसी एक में

० हवो तो दोनों में शून्य हो जाना बताया गया है । परन्तु जातक पारिजात आदि में बताया दै कि दोनों में से किसी में शून्य रहे तो ज्यों का त्यो रहेगा । शोधन नहीं |

होगा । चाहे दोनों में से किसी में या दोनों में ग्रह हो या न हो ।

(६) सग्रह छोटी अग्रह बड़ी हो तो बड़े से छोटा घटाकर शेष अग्रह में रहेगा

सग्रह वसा ही रहेगा । परन्तु अन्य का मत है कि छोटी संख्या दोनों में रहेगी अर्थात्‌

सग्रह की संख्यां जो हो वही संख्या अग्रह में रहेगी ।

ऐकाधिंपत्य शोधन चक्र

स्वामी मंगल शुक्र बुध गुरु शनि

राशि १८ ३ ७ ३ ६ १ प १० ११ ग्रह 9 सू० चट

श० गु०

सूयं श्रि शो०

ऐका० शो०

चन्द्र त्रि शो०

ऐ० शोधन

मंगल त्रि० शो०

ऐका० गो०

बुध त्रि० शो०

ऐका० शो०

गुरु० त्रि० शो०

ऐका० शो०

शुक्र त्रि० शो०

ऐका० शो०

शानि०त्रि०्शो ०

ऐका० शो०

लर्न त्रि० शो ०

ऐका० शो०

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यहाँ प्रत्येक ग्रहों की रेखाओं का त्रिकोण शोधन करने के पश्चात्‌ जो अंक प्राप्त

हुए हैं वे दिये है । इन्हीं अंकों का ऐका० शोधन करना है । सूयं में राशि ८ में मंगर है

= मग्र हृ में ४, मेष सग्रह में १ है । यहाँ सग्रह बड़ा, अगह छोटा है तो सम्नह के ४

१२० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फोलत खण्ड

पूर्वेबत्‌ रहेंगे अग्रह का १ लुप्त होकर ० हो गया। २-७ राशि में७ में ० हैतो

दोनों में ० हो गया । ३-६ राशि दोनों अग्रह हैं बड़ी संख्या ४ से छोटी है ३ घटाया

१ रह! यह १ बड़ी संख्या ४ के स्थान में रहा । छोटी ३ पूर्वेवत्‌ रही । ९-१२ राशि

दोनों में ० होने से ० ही रहा है। १०-११ राशि में से ० होने से दोनों शून्य हो गये ।

चन्द्र में १-८ राशि में से १ में ० होने से दोनों में ० हो गया इसी प्रकार २-७

राशि में से १ में शून्य होने से दोनों में ० हो गया। ३-६ राशि दोनों अग्रह हैं एक

बड़ा एक छोटा है बड़ी २ में से १. घटाया १ रहा। बड़ी के स्थान में १ हो गया छोटी

'संख्या १ पूर्ववत्‌ रही । ९-१२ राशि में १ में ० होने से दोनों में ० हो गया इसी `

प्रकार १०-११ राशि में भी ० हो गया ।

मंगळ में १-८ राशि में ० होने से ० हो गया २-७, ३-६, ९-१२ राशि में भी

इसी प्रकार ० हो गया १०-११ राशि दोनों सग्रह हैं पूर्ववत्‌ १-१ ही रहा । बुध

और गुरु में एक में ० होने से सव में शून्य हो गया.। शुक्र में ९-१२ राशि मे १२

सग्रह राशि में एक छोटा अंक है बड़ा २ में छोटा १ घटाया १ बचा वह अग्रह २ के

स्थान में १ हो गया सग्रह एक पूर्ववत्‌ रहा । शनि में १-८ राशि में एक अग्रह, एक

सग्रह है दोनों का १-१ समान अंक है तो अग्रह० हो गया सग्रह १ वहीं रहा । ३-६

राशि दोनों अग्रह है समान अंक ३-३ हैं तो दोनों ० हो गये ९-१२ राशि में १२

राशि सग्रह छोटी, अग्रह बड़ी है । बड़ी २ से छोटी १ संख्या को घटाया तो १ बचा

वह अग्रह संख्या हुई । सग्रह १ पूर्ववत्‌ रही । २-७ राशि और १०-११ राशि में एक

स्थान में शून्य होने से दोनों ० हो गया ।

लग्न में १-८ राशिमें अग्रह २ छोटी सग्रह ४ बड़ी संख्या है तो अग्रह. २ का० हो

गया सग्रह ४ वसा ही रहा । शेष में एक स्थान में शून्य होने से सब स्थानों में शून्य

हो गया । इसमें ककं और सिंह राशि के अंकों को विना शोधन किए रख दिया है।

ऐकाधिपत्य शोधन के पश्चात्‌ बचे हुए अंक में राशि गुणक ओर ग्रह गुणक द्वारा

राशिपिड और ग्रहपिड बनाकर योगपिड बनाना पड़ता है । इसमें ककं व सिंह के भी

अंक लेना ऐका० शो० में जिनको नहीं लिया था:

राशि गुणक

राशि ।१।२।३।४।५।६।७।८।९।१०।११।१२

गुणक ।७।१०।८।४।१०।५।७।८।९।५।११।१२

प्रत्येक राशि को भिन्न-भिन्न बल प्राप्त होता है इसके लिए राशि गुणक द्वारा

जाना जाता है । किसी राशिकी ऐकाधिपत्य शोधन के पश्चात्‌ जो रेखा बच रहे उस

सख्या में उस राशिके गुणक का गुणा करना पड़ता है जिस में ० रेखा बची हों उसका

गुणनफल ० ही आयेगा । जसे मिथुन में सूरय का ऐ० शो० शेष ३ है मिथुन का गुणक

८.है । इससे ३ > ८-२४ आया । इसे उसके नीचे रखा । कन्या का ऐका० शो० १ है

अन्या का गुणक ५ हैं १% ५: ५ आया । वृश्चिक में ४ है गुणक वृश्चिक का ८ है

अष्टक वर्ग बिचार : १२१

४% ८=३२ उसके नीचे लिखा । इसी प्रकार सव अंकों में राशि के अनुसार राशि गुणक

का गुणा कर रखा है। ग्रह गुणक

ग्रह । सूर्य । चन्द्र मंगल । वुध । गुरु । शुक्र । शनि ।

गुणक । ५। ५। ८।५।१०। ७ | ५ ॥

जिस-जिस राशि में ग्रह हो उसके ऐका० शोधन की रेखा में जो-जो ग्रह हो उन-उन

का उस अंक में गुणा कर रखना यदि एक से अधिक ग्रह एक ही राशिमें हों तो प्रत्येक

ग्रह के गुणक से गुणा कर सवका योग वहां रखना । जहाँ रेखा न हो वहाँ ० रखना ।

जैसे राशि ५ में शनि है, १० में गुर, ११ में चन्द्र बुध १२ राशि में सूर्य शुक्र है इनके

नीचे ऐकाधिपत्य शोधन. अंक ० है इससे इन सब के नीचे शून्य रहा । केवल मंगल

वृश्चिक में है जिसकी ऐका० शो० के पश्चात्‌ ४ रेखा बची है । मंगल का गुणक ८ है

४> ८-३२ अंक ग्रह गुणक को वहां रख दिया । शुक्र का देखो मौन राशि में सूर्य

और शुक्र है ऐ का० शो० अंक १ बना था । सूर्य का गुणक ५ है १२ ५-५ । शुक्र

का गुणक ७ है १३ ७- ७, ५+ ७२१२ ग्रह गुणक मीन का शुक्र के अष्ट ० में आया

इसी प्रकार सबका समझ लेना ।

'राशिपिण्ड बनाना

प्रत्येक राशियों के गुणक दिये हैं। यदि किसी राशि में ऐकाधिपत्य शोधन के

पश्चात्‌ जो अंक बचा हो उस अंक में उस राशि का गुणा करना सम्पूर्ण राशियों में

इस प्रकार गुणा करने से जो अंक प्राप्त हो उन सब का योग करना वही राशिपिंड है।

जै>े मंगळ का लो, कर्के में एक का गुणक ४ है १५४४, सिंह में एक बचा है सिंह

का गुणक १० है १»८१०-१० । मकर में १ बचा है गुणक ५ है १३६ ५3५ कुंभ में

१ है कुंभ का गुणक ११ है १९११११ शेष में ० है । इन सब संख्या ४+ १०+*

--११ का योग किया=३० आया यही राशि पिंड हुआ । इसी प्रकार सबका राशि

पिंड बना लेना ।

ग्रहपिंड बनानां

प्रत्येक ग्रहों के गुणक दिये हैं जिन राशियों में प्रह हो और ऐकाधिपत्य शोधन का

अंक बचा हो उस अंक में उस ग्रह के गुणक से गुणा करना। उस राशि में जितने ग्रह

हों सबका पुथक-पृथक गुणा कर सबका योग रखना । पश्चात्‌ सम्पूर्ण राशियों के इस

प्रकार प्राप्त अंकों का योग कर रखना वही ग्रहपिड है । जैसे मंगल का लिया, सिंह

राशि में शनि है उसमें ऐका० शो० का बचा हुआ १ अंक है । शनि का गुणक ५ है।

१)(४८-५ मकर में गुरु है इसमें १ अंक है। गुरु गुणक १० है। १५१०-१० । कुंभ

में २ ग्रह चन्द्र और बुध है । कुंभ में १ अंक बचा हे । चन्द्र गुणक ५ है १२८ ५-५

बुध गुणक ५ है । १२ ५=५ हुआ । दोनों को जोड़ा ५१५९-1० आया । शेष राशियों

भै ऐ० शो० अंक ० है । अव सब का योग किया ५4 १०४।०=२५ यह सर्व योग २५

ग्रह पिंड हुआ । इसी प्रकार प्रत्येक ग्रहों के ग्रह गुणक द्वारा ग्रहपिड बना लेना ।

१२२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

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अष्टक वर्ग विचार : १२५

जातक पारिजात के मत से ऐकाधिपत्य शोधन करना त्रिकोण शोधन में कोई अन्तर नहीं है परन्तु ऐकाधिपत्य शोधन में कुछ अन्तर है । यहाँ ऐका० शो० के नियम फिर से दिये जाते हैं । (१) दोनों अग्रह समान अंक-दोनों के अंक लुप्त होंगे ०-० होगा । * (२) दोनों अग्रह अंक भिन्न हों-छोटी के बरावर बड़ी संख्या कर देना । (३) एक अग्रह दूसरा सग्रह-समान अंक=अग्रह ० होगा । सग्रह पूर्ववत्‌ । *$ (४) किसी में ० हो चाहे अग्रह या सग्रह हो परिवर्तन नहीं होगा । # (५) अग्रह बड़ा सग्रह छोटा-छोटी संख्या के बराबर दोनों में रहेगा । (६) सग्रह बड़ा अग्रह छोटा-सग्रहृ पूर्ववत्‌ रहेगा ।अग्रहलुप्त ० होगा । (७) दोंनों सग्रह में परिवर्तन नहीं होगा । + चिल्ल में पूर्व बताये नियम से अन्तर है । ऐकाधिपत्य शोधन चक्र स्वामी मंगल शुक्र बुध गुरु शनि, राशि १८ २७ ३६ ९ १२ १० ११ ग्रहृ . « में. 5३ लग्न, . सू. गु. चं.

शु. ES सूयं भ्रि०शो० १४ २० TEC

ऐका० शो० ०४ २० ३ ३ ० ० ० १

चन्द्र निण्गो७ ०३ ०१ ५१ ५ २ ० २ ० ऐ० शो० ०३ ०१ १ १ २ ० २ ०

मंगल त्रि शो० ०२ २० २० १ ० १ १ ऐका० शो० OR २6 ३१० सप ? १ बुधभिएगो० ०४ २० जज एका० शो० ०४ ०० ४ ० ० ० ० २

गुरु त्रि0 शो० ०१ ०२ १० ३ ० १ ० ऐका० शो० ०१ ०२ ee १० ३ ० १ ० _ >. गुक्न त्रि शो ४० ०५ २० २ १ 1 o ऐका० शो० ४० ०५ २ ० १ १ १ ० शनि त्रि शो० ११ ०३ ३ ३ २ १ ¥ ० ऐका० शो० ०० ०३ ० ० १ १ ४ ०

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१२६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

यहा सूय में मंगल सग्रह बड़ा अग्रह छोटा तो सग्रह ४ पूर्ववत्‌ रहा अग्रह ० हो

गया । शुक्र एक में ० है । पूर्ववत्‌ रहा । बुध दोनों अग्रह भिन्न अंक तो छोटा ३६

बराबर दोनों में कर दिया । शनि एक में ० है पूर्ववत्‌ रहा ।

चन्द्र मे-मंगकछ एक में ० है पूर्ववत्‌ रहा । शुक्र का भी एक में ० होने से पूर्ववत्‌

रहा बुध का दोनों अग्रह भिन्न अंक तो छोटी के बरावर दोनों में १ रखा गुरु और

शुक्र दोनों में एक-एक शून्य हीने से पूर्ववत्‌ रहा ।

मंगल में मंगल, शुक्र, बुध, गुरु में एक में ० होने से सब पूर्ववत्‌ रहा शनि

की दोनों राशियाँ सग्रह होने से पूववत्‌ रहा ।

बुध में-सबमें एक-एक शून्य होने से सब अंक पूर्ववत्‌ रहे ।

गुर में-सब में एक-एक शून्य होने से सव अंक पूर्ववत्‌ रहे ।

शुक्र में-मंगछ शुक्र बुध और शनि की राशियों में ° होने से पूर्ववत्‌ रहे गुरु की

राशियों में सग्रह मीन छोटा अग्रह बड़ा है तो छोटी संख्या १ के वरावर दोनोंमें १

कर दिया ।

शनि मे-मंगल का दोनों में समान अग्रह प्रदान अंक होने से दोनों में ० हो गया।

शुक्त मे ० होने से, व शनि में भी एक स्थान ० होने से पूर्ववत्‌ रहा वुध में

दोनों अग्रह समान अंक होने से दोनों में ० हो गया ।

गुरु में मीन सग्रह छोटा अग्रह बड़ा है दोनों में छोटा अंक १ के बराबर १ हो

गया ।

लग्न में-मंगल की राशियों में सग्रह वृश्चिक बड़ा, अग्रह छोटा है तो अग्रह २ का

० हो गया सग्रह का ४ पूर्ववत्‌ रहा । शेप ग्रह की राशियों में १-१ शून्य होने से

पूर्ववत्‌ रहा ।

इन सबको आगे एक चक्र वना कर रखा । इसमें ककं और सिह के अंक पूर्ववत्‌

जो त्रिठ शो० से प्राप्त हुए थे रख दिये। पश्चात्‌ राशिगुणक ग्रहणुणक निकाल

कर रखा ।

सूर्य का राशिगुणक--मिथुन ३२६ गुणक८-२४। कन्या ३ गुणक५-१५ !

बृश्चिक ४2८ गुणक८-३२ । कुंभ १> गुणक११=११ । वृष २२९ गुणक१०-२० सवका

योग १०२ यह राशिपिंड सूर्य का हुआ ।

सूर्य का ग्रह गुणक--वृश्चिक में मंगळ ४ है > मंगल गुणक ८=३२। कुंभ में

चन्द्र १%गुणक ५--५ । इसी में बुध है १2९ बुध गुणक ५-४ । ११५१० ग्रह गुणक

हुआ और किसी में अंक नहीं हैं । सब का योग ४ ग्रहपिंड हुआ ।

सूर्य का योग--राशि पिंड १०२-प्रह पिंड ४२=१४४ योग पिंड हो गया ।

चन्द्र का राशि गुणक--मिथुन १ > गुणक८-८ «कर्क » गुणक ४-८ । सिंह१ >

गुणक १०८१० । कन्या१ > गुणक ५७५ । बुध१-+ गुणक ७=७। वृश्चिक३ -- गुणकर

२४॥ धन २)(गुणक ९-१८, मकर २>(गुणक ५=१०। सबका योग ९० राशिपिंड ।

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१३० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

अष्टक वरग से विचार

१ सूर्य से--आत्मा, स्वभाव, शक्ति और पिता के दुःख सुख का विचार होता है।

२ चन्द्रसे--मन, वुद्धि, प्रसन्नता और माता का विचार ।

` ३ मंगल से--भाई, बल, गुण और भूमि का ।

४ वुध से-वाणिज्य जीविका और मित्र का ।

५ गुरु से--देह की पुष्टि, विद्या, धन सम्पत्ति का ।

६ शुक्र से--विवाह, भोग, वाहन,वेश्या या अपनी पत्नी के भोग का ।

७ शनि से--आयुर्दाय, दुःख, शोक, भय, हानि, जीवन का उपाय, मरण ।

जन्मसमय में ग्रह जिस स्थान में हो वहाँ से गिनने पर स्थान का विचार

१ सूयं से नवम स्थान द्वारा-पिता आदि का विचार करना ।

२: चन्द्र से चतुर्थ स्थान द्वारा-माता आदि का विचार करना ।

३ मंगल से तृतीय स्थान द्वारा--भाई आदि का विचार करना ।

४ बुध से चतुर्थं स्थान द्वारा--पुत्र, धन आदि को विचार करना ।

५ बुध से पंचम स्थान द्वारा--विद्या, वुद्धि आदि का विचार करना ।

६ गुरु से पंचम स्थान द्वारा- पुत्र, धन आदि का विचार करना ।

७ शुक्र से सप्तम स्थान द्वारा - स्त्री आदि का विचार करना । ८ शनि से अष्टम स्थान द्वारा-आयु आदि का विचार करना ।

जिस भाव का फल विचारना हो उस भाव की रेखा संख्या में उस ग्रह के अष्टक- चगे के योग हिंड से गुणाकर २७ का भाग देना जो शेष बचे अश्विनी को आदि लेकर उस संख्या के नक्षत्र पर जब शनि जायगा उस समय उस भाव की हानि होगी या उस

भाव सम्बन्धी बातों का कष्ट होगा ।

या ठस नक्षत्र के त्रिकोण ( १० वाँ या १९ वां नक्षत्र ) में जव शनि जावे तब कष्ट होगा ।

सूर्य के अष्टकवगं से विचार

( १) सूर्य जिस राशि में हो उस राशि को पितु गृह कहते है । सूयं के अष्टकवर्ग से पिता का विचार होता है ।

( २ ) जन्म में सूर्य लग्नगत हो वह नीच या शत्रु गृही हो उसमें सूर्य की २,३रेखा हो तो जातक रोगी हो । ८ परन्तु लग्नस्थ सूर्य उच्च या स्वगृही हो उस राशि में ५ या अधिक रेखा हों तो * चह राजा तुल्य हो और दीर्घायु हो ।

(३) यदि सूर्य केन्द्र या त्रिकोण गत हो उस राशि पर ५ रेखाएं पडी हों तो जातक या उसके पिता की मृत्यु ३४ वें वर्ष में होती है । सूर्य स्थिर राशि में ६ रेखा हो-२२ वर्ष में मृत्यु । ७ रेखा=३० वर्ष में । ८रेखार ३६ वर्ष में मृत्यु हो ।

'ऐसे योगों में अग्नि, जळ, पर्वत या श्मशान द्वारा मत्यु होती है ।

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अष्टक वर्ग विचार : १३१

छ (४) अन्य मत है कि सूर्य पंचम या नवम घर में हो सूर्य अष्टक० में उस राशि

में जितनी रेखा हों उस संख्या की अवस्था में जातक के पिता की मृत्यु हो जसे १ रेखा

हो तो १ वर्ष में २ रेखा तो २वपं में आदि | द

( ५) सूर्य केन्द्र में मित्रगृही हो और उसकी राशि में केवल ३, ४, ५, रेखाएं हों

तो उसके पिता को १७वें वपं में अति क्लेश होता है कभी मृत्यु भी हो जानी है ।

( ६) सूर्यं पंचम में हो उस राशि में ८ हीं रेखा हों और लग्न से राहु नवम हो

तो जातक के ५ वर्ष की अवस्था में हीं उसके पिता की मृत्यु हो जाती है ।

(७) सूर्य लग्न से तीसरे हो उस राशि में ३ या ४ रेखा हों और यदि लग्न से

नवम स्थान में कोई पाप ग्रह हो तो जातक के२० वपं पूर्व ही उसके पिता की मृत्युह्द ।

( ८ ) सूर्य केन्द्र में हो या ९ वा १२ वीं राशि में हो ओर गुरु सूयं के साथ हो

सूर्य उस सीमा के मध्य द्रेष्काण में हो और उस सूर्य की राशि में ३से ७ तक रेखा

हों तो जातक १०० योजन पृथ्वी का स्वामी होता है ।

( ९ ) सूर्य केन्द्र में हो और शनि बुध चंद्र एक साथ हों और. सूर्य राशि में ५

रेखा हों तो जातक की १० वषं आयु के पश्चात्‌ पिता को राज्य लक्ष्मी प्राप्त हो या

चड़ा अधिकारी हो ।

(१०) सूर्यं राशि में रेखा शून्य हो उस राशि में जब सूर्य जाता है, उस सौर

मास में कोई शुभ कार्य या मंगल कार्य विवाहादि का आरम्भ करना मना है।

ये सब वातें सूर्य अष्टकवगं गोचर के सूर्य की राशि की रेखा से विचारना ।

सूर्य अष्टकवगं से पिता का विचार

जन्म समय जिस राशि में सूर्य हो उससे नवम स्थान पिता का होता है इसलिए

सूये अष्टक में उस राशि की अष्ट० रेखा संख्या में उस ग्रह के योगपिंड से गुणाकर २७

का भाग देना । जो शेष बचे अश्विनी से गिनकर उस नक्षत्र में जब शनि आयगा तब

पिता को कष्ट होगा। या उसके त्रिकोण (१-१०-१९ वें नक्षत्र में जब शनि आयेगा तब

पिता या पितु तुल्य चाचा आदि पालन करने वाळे का मरण या क्लेश होगा । या

अनहोनी वात होगी ।

जैसे सूर्यं मीन राशि में है उसकी नवम राशि वृश्चिक है । अतः सूर्य के अष्ट० में.

वृश्चिक राशि में देखा ७ रेखा हैं इसमें सूर्ये का योगपिंड ९३ का गुणाकर २७ का

भाग दिया । ७% ९३६५१ २७=२४दूङ=शेष ३ कृतिका । इससे कृतिका या उससे

त्रिकोण या १० वां उत्तरा फाल्गुनी या १९ वां उत्तराषाढा नक्षत्र पर जब शनि

आयगा तब पिता को बलेश या मरण होगा । उस समय अशुभ दशा आदि हो तो मरण,

शुभ दशा हो तो क्लेश होगा ।

अन्य प्रकार--सूर्य की उक्त राशि अष्ट० रेखा % योगपिड-:-१२-शैष राशि में या

उससे त्रिकोण में जब शनि जावे तब पिता को कष्ट या मरण होगा जसे उक्त ७ रेखा

योगपिंड ९३८६५१ +- १२=५४३ इ=शेष रेराशि=मिथुन या इसके त्रिकोण की राशि

तुला या कुंभ राशि में जब शनि जायगा तब पिता का मरण या कष्ट होगा ।

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दीर्घायु या राजा हो

१३२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

पिता का अरिष्ट काल

( १ ) उक्त त्रिकोण में जब शनि जायगा उस समय यदि सूर्य से चतुर्थ स्थान में * राहु या वही शनि या मंगल आ जाय तो पिता की मृत्यु हो यदि उसपर गुरु शुक्र की दृष्टि न हो ।

(२) लग्न या चंद्र से नवम स्थान में शनि हो और पाप ग्रह से युक्‍त या दुष्ट हो तो पिता का निधन हो ।

( ३ ) लग्न से चतुथं भावेश अनिष्ट दशा में हो तो भी पिता का मरण होता है अनुकूल दशा में मरण नहीं होता ।

( ४ ) लग्न से चतुर्थ भाव के स्वामी का जो नवांश हो उसकी दशा में पिता आदि का मरण हो ।

पितु सुख योग-छग्न स्थान से चतुर्थेश की दशा में अधिक सुख लाभ की संभावना रहती है ।

पिता का आज्ञाकारो-सुखेश लग्न या एकादश भाव में होया चंद्र से ११ भाक में हो या दशरव भाव मे हो तो जातक पिता का आज्ञाकारी होता है। पिता के धन का सदुपयोग--पिता के जन्म लग्न या जन्म राशि से तृतीय लग्न या राशि में जन्म हो तो जातक पिता के धन का सदुपयोग करता हैया पिता के धन के आश्रय में रहे ।

पिता तुल्य गुण--पिता की जन्म राशि या लग्न से दसवीं राशि या लग्न में जन्म हो तो जातक पिता के तुल्य गुणवान्‌ होता है ।

पिता से श्रेष्ठ--यदि अपने जन्म लग्न से दशम स्थान का स्वामी लग्न में होतो पिता से श्रेष्ठ होगा ।

शुभ कार्य विचार--सुर्य अष्टकवगं में जिस राशि में अधिक अशुभ बिन्दु हों अर्थात्‌ शुभ रेखा न हो या अल्प रेखा हों उस राशि के मास में ( जब सूर्य उस राशि में जाय ) और उस राशि के सम्वत्सर में ( जब उस राशि में गुरु रहे ) तब विवाह आदि शुभ कार्य नहीं करना ।

जिस राशि में अधिक रेखा हों उस राशि में जबः सूर्य हो या उसमें गुरु रहे तो शुभ कार्य करना । .

पितृहा योग--पिता के जन्म लग्न से अष्टम राशि लग्न में जन्म होया पिता के जन्म लग्न से अष्टमेश अपने जन्म लग्न में हो तो जातक पिता की मृत्यु के बाद उस घर के सव कार्य भार को सम्हाल लेता है। रोगी हो-सूर्य शत्रु राशि या नीच नवांश में होकर लग्न में हो और ३-४ रेखा हों तो जातक रोगी हो ।

दीर्घायु या राजा-सूर्य उच्च स्वगृही आदि का लग्न में हो ५ आदि रेखा हों तो

अष्टक वर्ग विचार : १३३

पिता को लक्ष्मी एवं सिद्धि--त्रिकोण एकाधिपत्य शोधन करने पर २ रेखा युक्त केन्द्र में शनि, चन्द्र, बुध, सूर्य हों तो १० वर्ष के पश्चात्‌ जातक के पिता कों सब प्रकार से सिद्धि से युक्त राजलक्ष्मी प्राप्त हो । पितामरण जानने का अन्य प्रकार कुण्डली में जहाँ सूर्य है उससे नवम स्थान पिता का हुआ । इस नवम स्थान से अष्टम स्थान में जो राशि हो उसकी सूर्य अष्ट० में रेखा लेकर योग पिंड का गुणाकर १२ का भाग देना जो शेष रहे उसके त्रिकोण में जब शनि जायगा तब पिता या पिता न हो तो पिता तुल्य किसी कुटुम्बी को कष्ट होगा । जैसे सूर्य मीन में है उससे नवम वृश्चिक हुई । इस वृश्चिक राशि से अष्टम मिथुन है सूर्य अष्टक० में इस मिथुन राशि मेंशरेखा हैं । सूर्य का योगपिंड ९३ है । ९३ % =

४६५ --१२=३८१३न्शेष ९ धनराशि पर या इसके त्रिकोण की मेष या सिंह राशि में जव गोचर में शनि जायगा तो पिता को या पिता न हो तो पितृ तुल्य कुटुम्बी को

कष्ट होगा । : जातक की मृत्यु

सूर्याष्ट० में छग्न से अष्टम स्थान की रेखाओं को सूर्य योगपिंड से गुणाकर १२ का भाग दो जो शेष रहे उस मास में या उससे त्रिकोण राशि के मास में गतायु होने

पर जातक की मृत्यु होती है।

जसे कु डली में लग्न से अष्टमस्थान में मकर राशि है। मकर राशि में सूर्य अष्ट०

की २ रेखा हैं २% ९३ गोगपिंड=१५६ -- १२=१५६५= शेष ६ कन्या राशि या इसके

त्रिकोण की राशि मकर या वृष में जब सूर्य होगा तब मृत्यु संभव है ।

पिता को मृत्यु का समय

सूर्य केन्द्र या कोण में हो ६, ५, ७, ८ रेखा हों तो क्रमशः २२, २५, ३०, ३६ वर्षो में पिता की मृत्यु हो ।

चन्द्र का अष्टक वर्गानुसार फल

चन्द्रमा के चतुर्थ स्थान से माता घर ग्राम आदि का विचार होता है।

( १ ) चन्द्रमा से चतुर्थं भाव की राशि की शुभ रेखाओं में चन्द्र के योगपिड का

गुणाकर २७ का भाग देना-शेष जो नक्षत्र हो उसमें या उसके त्रिकोण के नक्षत्र में जब

शनि जावे तब माता की हानि या उस त्रिकोण में जहाँ दशा का शुन्य भाग हो माता

की हानि कहना ।

जैसे चन्द्र कुम्भ में है उसके चौथे में वृष राशि है। चंद्र अष्टक० में वृष राशि में ३

रेखा है । चन्द्र का योग पिंड ३६ है । ३६ % ३=१०८ -+- २७-४ ३७८२७ शेप० नक्षत्र= रेवती । रेवती का त्रिकोण १० वां आश्लेषा, १९ वां ज्येष्ठा है इन नक्षत्रों में जव शनि

गोचर में जायगा तब माता की हानि या कष्ट होगा माता के अभाव में माता के तुल्य

को कष्ट होगा ।

(२ ) चन्द्रमा से चतुथं स्थान से अष्टम स्थान मे जो राशि हो उसको रेखा को

१३४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

योगपिंड से गुणाकर १२ का भाग देना जो शेष बचे उस राशि का उसके त्रिकोण में जब

शनि जावे तब माता को कष्ट होता है।

जैसे चन्द्र से चतुर्थ में वृष राशि है । इस वृष राशि से अष्टम में धन राशि है चंद्र

अष्ट० में घन राशि में ७ रेखा हैं । चंद्र का योगपिंड ३६ है ३६% ७८२५२ -+ १२८

२१३६ ६-शेष मीन राशि आई इसके त्रिकोण में ककं और वृश्चिक राशि है । इन

राशियों में गोचर में जब शनि जायगा तब माता को कष्ट होगा ।

( ३ ) यदि उसी समय अभ्यन्तर चन्द्रमा स्थित राशि से या लग्न से चतुर्थ में मंगल

या शनि गोचर में पड़ता हो या चन्द्रमा लग्न से चतुथं स्थान पर मंगल व शनि की

दृष्टि हो तो माती की मृत्यु होती है ।

यदि जातक की माता न हो तो स्वयं जातक को इससे मृत्यु का भय होता है। या

देशान्तर में गमन करने से वहीं मृत्यु होतो है।

(४) जन्म का चन्द्र यदि सप्तम, अष्टम या द्वादश स्थान में हो और चंद्र स्थिति

राशि में चन्द्र अष्ट० में ३ या कम रेखा हों तो वाल्यावस्था में माता की मृत्यु हो या

माता जीवन पर्यन्त रोगी रहे ।

(५) जन्म का चन्द्र केन्द्र में हो या द्वादश स्थान में हो. और चन्द्र स्थित राशि में

चन्द्र अष्ट० में ३ था कम रेखा हों तो जातक के छठे वर्ष माता की मृत्यु होती है ।

(६) चन्द्रमा से ४-८ भाव में मंगल, ५-९ भाव में सूर्य हो तो माता का वियोग

हो लग्न से ऐसा योग हो तो पिता को मरण कहुनां ।

चंद्र का अष्टक वर्ग फल

(१) जन्म का चंद्र लग्न में हो और चन्द्र अष्ट में चन्द्र स्थित राशि में यदि १,२

या ३ रेखा पड़े तो जातक निबंछ और रोगी होता है कभी क्षय रोग भी हो जाता है

(२) चन्द्र लग्न में हो और चन्द्रमा के साथ यदि २ या ३ ग्रह बठ हों तथा उस

चन्द्र स्थित राशि में २ या ३ रेखा चन्द्र अष्ट० में हों तो जातक की मृत्यु ३७ वें

वषं में हो ।

(३) जन्म का चन्द्र त्रिकोण या लाभ भाव गत क्षीण, शत्रुगृही या नीच हो और

चन्द्र अष्ट० में उस राशि की २-३ रेखा हों तो चन्द्र स्थित भाव की हानि होती है

अर्थात्‌ पंचम स्थान में चन्द्र हो तो पुत्र की हानि, लाभ में हो तो लाभ की हानि आदि

होती है। यदि उपरोक्त योग में चन्द्रमा क्षीण न हो और ४ या अधिक रेखा हों तो चंद्र

स्थित राशि का फल अच्छा होगा । भाव फल की वृद्धि होगी ।

(४) लग्न में क्षीण चन्द्र हो चन्द्र स्थित राशि में चन्द्र के अष्ट० में ३ या ३ से

कम रेखा हों तो दमा की बीमारी हो ।

(५) चन्द्र केन्द्र मे हो चन्द्र अष्ट० में उस राशि को ८ रेखा मिली हों तो वह विद्वान्‌, धनी, माननीय, बली, ख्यातियुक्त नृपतुल्य होता है । (६) चन्द्र अष्ट की किसी राशि में सबसे अधिक रेखा हों । और किसी अन्य

पुरुष का जन्म उसी राशि में हो तो उससे किसी प्रकार का सम्बन्ध करने या मित्रता

अष्टक वर्ग विचार : १३५

करने से अति शुभदायक होता है। ऐसों के साथ व्यापोर आदि करने से लाभ होता है। (७) चन्द्रमा से अष्टम भाव का स्वामी जिस नक्षत्र में हो उसके त्रिकोण के नक्षत्र में रोग दुःख आदि होता है । जेसे चन्द्रमा कुंभ राशि में है उससे अष्टम कन्या राशि हुई । कन्या का स्वामी बुध है यह पूर्वभाद्रपद में है तो इसमें या इसके त्रिकोण के नक्षत्र पुनर्वसु और विशाखा में व्याधि दुःख आदि होंगे । इसमे शुभ काम न करना । (८) चन्द्र से गिनने पर चतुर्थ के स्वामी या अष्टम के स्वामी का नवांश निकालो जब इस स्थान में या इससे त्रिकोण में सूर्यं जावे तब माता की हानि संभव है । इसी प्रकार पिता की मृत्यु का विचार लग्न से करना । मंगल के अष्टकवग से फल विचार

मंगल के अष्टकवर्ग से भाई, पराक्रम और धेय का विचार होता है मंगल जिस राशि में बैठा हो उस राशि से तीसरे स्थान से भाई का विचार होता है। (१) इस तीसरे स्थान से एवं इस तीसरे स्थान के अष्टम स्थान से भाई के कष्ट

का विचार करने को उस स्थान की रेखा से मंगळ के अष्टकवर्ग योगपिड से गुणा कर २७ का भाग देनो शेष नक्षत्र या उसके त्रिकोण में गोचर में जब शनि आवे तब भाई को कष्ट होगा या योगपिंड और उक्त राशि रेखा + १२=शेष राशि या उसके त्रिकोण

में जव शनि आवे तव भ्रातु कष्ट होगा । जैसे वृश्चिक में मंगल है उससे तीसरे स्थान में मकर है । मंगल अष्टक० में मकर में २ रेखः है योग पिंड ५५ है। २% ५५११० ~+ २७=४३३=्शेष २ भरणी नक्षत्र या उसके त्रिकोण के नक्षत्र पू० फा० या पू० षा०

पर जब शनि गोचर में आयेगा तव भाई को कष्ट होगा ।

या भ्रातृ स्थान यहाँ मकर आया उससे अष्टम सिंह हुआ। सिंह में ५ रेखा हैं ५% योग पिंड ५१--२७५-:-१२-२२३१--शेष ११ कुंभ राशि या इसके त्रिकोण की

मिथुन या तुळा राशि में जब शनि आवेगा तव भ्रातृ कष्ट होगा ।

(२) त्रिकोण शोधन के पश्चात्‌ जिस रथान में अधिक रेखा हों उससे पृथ्वी, घर

सत्री एवं परिवार की वृद्धि, भ्रातृ का उत्तम सुख प्रगट होता है जब मंगल उस राशि

में जावे ।

(३) मंगल अष्ट० में जिस राशि में हो उस राशि में ८ रेखा हों तो जिमीदार हो ।

(४) मंगल लग्न, द्वितीय या दशम मों हो और उस स्थान की ८ रेखा हों तो

राजा हो किसी राज वंश का हो तो अवश्य राजा होता है ।

(५) यदि मंगल उच्च या स्वगृही होकर लग्न, चतुर्थ नवम या दशम में हो और

उस राशि पर ८ रेखा हों तो वह लक्षाधीश बहुत धनाढ्य और राजा होता है ।

(६) यदि मंगल केन्द्र में हो ९,५,१०, या ८ राशि का हो और मंगल की ४ रेखा

से अधिक हो तो अतिधनी हो । (७).मंगल दशम या लग्न में हो और मंगल की ८ रेखा हो तो धनी हो । यदि राजकुल का हो तो अवश्य राजा होता है । यदि मंगल उच्च का या स्वक्षेत्री हो तो

महाराजा होता है ।

१३६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

(८) जन्म लग्न ४,५,९ या १० हो उसमें मंगल हो मंगल की ४ रेखा हों तो राजा

तुल्य होता है ।

(९) मंगल हितीयेश होकर षष्ठ स्थान में हो । जहाँ मंगल हो उस राशि की ६

रेखा हों तो शत्रु अधिक हों अल्पायु में ही जातक व्यभिचारी हो ।

(१०) मंगल ६-८ या १२ घर में नीच का या अस्तंगत हो उसके साथ चन्द्रमा

भी हो और जिस राशि में मंगल हो उसमें ६ रेखा हों तो उसका भाई नहीं होता ।

(११) नीच का या अस्तंगत मंगल ६-८ या १२ भाव में हो, मंगल जहाँ हो

उसकी ६ रेखा हों, चन्द्रमा लग्न से केन्द्र में हो, तथा मंगल अष्ट० में चन्द्र जहाँ हो

उस राशि में ६ रेखा हो तो उसका भाई नहीं होता ।

(१२) मंगल केन्द्र में या पंचम में हो मंगल जहाँ हो उस राशि में ४ रेखा हो

तो उसका भाई नहीं होता ।

(१३) मंगल लग्न से तीसरे स्थान में हो वहाँ जो राशि हो उसमें ४ या अधिक

रेखा हो और मंगल पर शुभ ग्रह की दृष्टि भी हो तो कई भाई बहिन हों ।

(१४) मंगल के साथ शनि हो उस राशि में ३ या अधिक रेखा हों तो जातक के

भाइयों की मृत्यु होती है ।

(११) मंगल जहाँ हो या मंगल स्थिति राशि से पंचम या नवम स्थान पर शुभ

ग्रह की दृष्टि हो और मंगल स्थिति राशि या उसके त्रिकोण.की नवम पंचभ राशि पर

जितनी रेखायें हों उतनी संख्या जातक के भाई वहिनो की होगी । जैसे वृश्चिक का

मंगळ है इसके त्रिकोण में मीन और कर्क है । केवल ककं राशि पर उसकी दृष्टि है

ओर किसी पर शुभ दृष्टि पूर्ण नहीं है। मंगल के अष्ट० में कर्क की ३ रेखा हैं तो ३

भाई हैं। यदि शुभ ग्रह की अद्धं पौन आदि दृष्टि हो तो उनका पूर्ण जीवन नहीं रहता ।

(१६) मंगल १, ९ या ९० राशि में नीच या शत्रु गृही न हो। मंगल की उस

राशि में ४ या अधिक रेखा हो तो राज सुख भोगे । र

(१७) मंगल यदि शनि से युक्त या दृष्ट हो मंगल स्थित राशि की ४ या अधिक

रेखा हो तो कई ग्राम का अधिपति हो एवं दण्ड देने का अधिकारी होता है ।

(१८) मंगल बुध से युक्त या दृष्ट होकर लग्न से किसी भाव में हो । मंगल स्थित

राशि में ३ या कम रेखा हों तो आजन्म धन हीन हो।

(१९) मंगल चन्द्र से युक्त या दृष्ट होकर किसी भाव में हो मंगल स्थिति राशि

में ४ या अधिक रेखा हों तो कई ग्रामों का अधिपति हो ।

(२०) मंगल स्वगृही दशम या चतुर्थ में हो और मंगल स्थिति राशि में ४ या

अधिक रेखा हों तो राज्य या किला या दुर्ग का अधिकारी या सेनापति होकर सुखमय

जीवन व्यतीत करता हैः।

(३) उपरोक्त नियम २ का समय जानने का उदाहरण

मंगळ अष्ट० में त्रिकोण शोधनं के पश्चात सबसे अधिक ३ रेखा मिथुन की हैं ।

आम योगपिड ५५ है। ५५ ७८ ३:१६५-- २७-६ईउत्शेष ३ कृतिका नक्षत्र आया

अष्टक वर्ग विचार : १३७

इसमें या इसके त्रिकोण के नक्षत्र के उ० फा और उ० षा० में जब शनि आयगा तब

घर भूमि आदि प्राप्त होगी स्त्री एवं कुटुम्ब की वृद्धि होगी ।

बुध से चौथे भाव में कुटुम्ब धन पुत्रादि एवं मामा का विचार होता है बुध से

पंचम में मन्त्र विद्या, लिपि ( लिखने की शक्ति ) वुद्धि आदि का विचार होता है ।

(१) बुध के चतुर्थ स्थान की रेखा % बुध योर्गपड -:- २७-शेष नक्षत्र में या

उसके त्रिकोण में जव शनि आये तो बंधु मित्रादि को कष्ट होता है जसे बुध कुम्भ में

है इससे चतुर्थं में वृष राशि है । बुध अष्ट० में वृष में ४ रेखा है योगपिड० है ।

४% ०-० -- २७८-० रेवती नक्षत्र आया । इसमें या इससे त्रिकोण की आश्लेषा

और ज्येष्ठा में जव शनि आयगा तब वंधु मित्रादि को कष्ट होगा ।

या योगपिंड > ३ रेखा=०-- १२८० राशि मीन पर या उससे त्रिकोण कर्क या

वुश्चिक पर जब शनि जायेगा तब मित्रादि को कष्ट होगा ।

(२) इसी प्रकार वुध से पंचम स्थान की रेखा % बुध योगपिड -:- २७-शेष नक्षत्र

में या उसके त्रिकोण के नक्षत्र में जव शनि गोचर में जायगा तब बुद्धि आदि सम्बन्ध

के विषयों में कष्ट होगा या रेखा % योगपिंड + १२-शेष राशि या उसके त्रिकोण में

जब शनि जाये तब उपरोक्न्न वुद्धि सम्बन्धी विषयों का कष्ट होगा ।

(३) बुध लग्न से केन्द्र या त्रिकोण में हो और उसमे ८ रेखा हों तो भाग्य￾शाली होता है । अपने जातीय व्यवसाय या विद्या में ख्याति पाता है ।

(४) बुध उच्च या स्वगृही हो उस भाव में १, २या ३ ही रेखा हों तो बुध

स्थित भाव के फल की वृद्धि होती है ।

(५) बुध अष्ट» में जिस राशि में सबसे अधिक रेखा हो उस राशि के सौर मास .

में विद्या आरम्भ करने से विद्या में पूणं सफलता हो या विद्या सम्बन्धी कार्यों के

  • आरम्भ से उसमें सफलता हो ।

(६) बुध अष्ट० में जिस राशि में कोई रेखा न हो उस राशि में गोचर में जब

शनि जावे तब किसी धन वन्धु या ज्ञाति की मृत्यु हो और उस समय जो सुख भोग

रहा हो उसका नाश हो ।

(७) बुध जिस स्थान में हो उससे द्वितीय स्थान में यदि कोई रेखा न हो तो

जातक गू गा होता है। उक्त द्वितीय स्थान में ३ या कम रेखा हो तो यह सारहीन

चक्ता होता है। ४ रेखा-साध।रण वक्ता, ५-६ रेखा=उत्तम वक्ता ही अपने विषय

का पर्ण रूप से समर्थन कर सकता है । ७ रेखा=वार्ताळाप में कुशल ओर प्रिय उच्च»- कोटि का वक्ता हो ।

(८) बुध से द्वितीय भाव में अपग्रह की रेखा हो तो जातक कठोर एवं व्यंग

बोलने वाला हो । सूयं की रेखा हो तो बुद्धिमानी की बांते एवं विचार पूर्वक बातों

का कहने वाळा हो । शनि की रेखा हो-मिथ्यावादी हो उद्दिग्न करने वाली बातें

करे ( मंगल की रेखा हो-झगडा पैदा करने वाला हो । गुरु को रेखा हो-ताकिक

एवं यु क्ति पूर्ण बहस में कुशल । की-मनोहर भाषी, भाषण में प्रमाणों एवं

कहावतों की झड़ी लगा देने वाला हो 1