सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
१२२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
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अष्टक वर्ग विचार : १२५
जातक पारिजात के मत से ऐकाधिपत्य शोधन करना त्रिकोण शोधन में कोई अन्तर नहीं है परन्तु ऐकाधिपत्य शोधन में कुछ अन्तर है । यहाँ ऐका० शो० के नियम फिर से दिये जाते हैं । (१) दोनों अग्रह समान अंक-दोनों के अंक लुप्त होंगे ०-० होगा । * (२) दोनों अग्रह अंक भिन्न हों-छोटी के बरावर बड़ी संख्या कर देना । (३) एक अग्रह दूसरा सग्रह-समान अंक=अग्रह ० होगा । सग्रह पूर्ववत् । *$ (४) किसी में ० हो चाहे अग्रह या सग्रह हो परिवर्तन नहीं होगा । # (५) अग्रह बड़ा सग्रह छोटा-छोटी संख्या के बराबर दोनों में रहेगा । (६) सग्रह बड़ा अग्रह छोटा-सग्रहृ पूर्ववत् रहेगा ।अग्रहलुप्त ० होगा । (७) दोंनों सग्रह में परिवर्तन नहीं होगा । + चिल्ल में पूर्व बताये नियम से अन्तर है । ऐकाधिपत्य शोधन चक्र स्वामी मंगल शुक्र बुध गुरु शनि, राशि १८ २७ ३६ ९ १२ १० ११ ग्रहृ . « में. 5३ लग्न, . सू. गु. चं.
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१२६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
यहा सूय में मंगल सग्रह बड़ा अग्रह छोटा तो सग्रह ४ पूर्ववत् रहा अग्रह ० हो
गया । शुक्र एक में ० है । पूर्ववत् रहा । बुध दोनों अग्रह भिन्न अंक तो छोटा ३६
बराबर दोनों में कर दिया । शनि एक में ० है पूर्ववत् रहा ।
चन्द्र मे-मंगकछ एक में ० है पूर्ववत् रहा । शुक्र का भी एक में ० होने से पूर्ववत्
रहा बुध का दोनों अग्रह भिन्न अंक तो छोटी के बरावर दोनों में १ रखा गुरु और
शुक्र दोनों में एक-एक शून्य हीने से पूर्ववत् रहा ।
मंगल में मंगल, शुक्र, बुध, गुरु में एक में ० होने से सब पूर्ववत् रहा शनि
की दोनों राशियाँ सग्रह होने से पूववत् रहा ।
बुध में-सबमें एक-एक शून्य होने से सब अंक पूर्ववत् रहे ।
गुर में-सब में एक-एक शून्य होने से सव अंक पूर्ववत् रहे ।
शुक्र में-मंगछ शुक्र बुध और शनि की राशियों में ° होने से पूर्ववत् रहे गुरु की
राशियों में सग्रह मीन छोटा अग्रह बड़ा है तो छोटी संख्या १ के वरावर दोनोंमें १
कर दिया ।
शनि मे-मंगल का दोनों में समान अग्रह प्रदान अंक होने से दोनों में ० हो गया।
शुक्त मे ० होने से, व शनि में भी एक स्थान ० होने से पूर्ववत् रहा वुध में
दोनों अग्रह समान अंक होने से दोनों में ० हो गया ।
गुरु में मीन सग्रह छोटा अग्रह बड़ा है दोनों में छोटा अंक १ के बराबर १ हो
गया ।
लग्न में-मंगल की राशियों में सग्रह वृश्चिक बड़ा, अग्रह छोटा है तो अग्रह २ का
० हो गया सग्रह का ४ पूर्ववत् रहा । शेप ग्रह की राशियों में १-१ शून्य होने से
पूर्ववत् रहा ।
इन सबको आगे एक चक्र वना कर रखा । इसमें ककं और सिह के अंक पूर्ववत्
जो त्रिठ शो० से प्राप्त हुए थे रख दिये। पश्चात् राशिगुणक ग्रहणुणक निकाल
कर रखा ।
सूर्य का राशिगुणक--मिथुन ३२६ गुणक८-२४। कन्या ३ गुणक५-१५ !
बृश्चिक ४2८ गुणक८-३२ । कुंभ १> गुणक११=११ । वृष २२९ गुणक१०-२० सवका
योग १०२ यह राशिपिंड सूर्य का हुआ ।
सूर्य का ग्रह गुणक--वृश्चिक में मंगळ ४ है > मंगल गुणक ८=३२। कुंभ में
चन्द्र १%गुणक ५--५ । इसी में बुध है १2९ बुध गुणक ५-४ । ११५१० ग्रह गुणक
हुआ और किसी में अंक नहीं हैं । सब का योग ४ ग्रहपिंड हुआ ।
सूर्य का योग--राशि पिंड १०२-प्रह पिंड ४२=१४४ योग पिंड हो गया ।
चन्द्र का राशि गुणक--मिथुन १ > गुणक८-८ «कर्क » गुणक ४-८ । सिंह१ >
गुणक १०८१० । कन्या१ > गुणक ५७५ । बुध१-+ गुणक ७=७। वृश्चिक३ -- गुणकर
२४॥ धन २)(गुणक ९-१८, मकर २>(गुणक ५=१०। सबका योग ९० राशिपिंड ।
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१२८ सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
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१३० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
अष्टक वरग से विचार
१ सूर्य से--आत्मा, स्वभाव, शक्ति और पिता के दुःख सुख का विचार होता है।
२ चन्द्रसे--मन, वुद्धि, प्रसन्नता और माता का विचार ।
` ३ मंगल से--भाई, बल, गुण और भूमि का ।
४ वुध से-वाणिज्य जीविका और मित्र का ।
५ गुरु से--देह की पुष्टि, विद्या, धन सम्पत्ति का ।
६ शुक्र से--विवाह, भोग, वाहन,वेश्या या अपनी पत्नी के भोग का ।
७ शनि से--आयुर्दाय, दुःख, शोक, भय, हानि, जीवन का उपाय, मरण ।
जन्मसमय में ग्रह जिस स्थान में हो वहाँ से गिनने पर स्थान का विचार
१ सूयं से नवम स्थान द्वारा-पिता आदि का विचार करना ।
२: चन्द्र से चतुर्थ स्थान द्वारा-माता आदि का विचार करना ।
३ मंगल से तृतीय स्थान द्वारा--भाई आदि का विचार करना ।
४ बुध से चतुर्थं स्थान द्वारा--पुत्र, धन आदि को विचार करना ।
५ बुध से पंचम स्थान द्वारा--विद्या, वुद्धि आदि का विचार करना ।
६ गुरु से पंचम स्थान द्वारा- पुत्र, धन आदि का विचार करना ।
७ शुक्र से सप्तम स्थान द्वारा - स्त्री आदि का विचार करना । ८ शनि से अष्टम स्थान द्वारा-आयु आदि का विचार करना ।
जिस भाव का फल विचारना हो उस भाव की रेखा संख्या में उस ग्रह के अष्टक- चगे के योग हिंड से गुणाकर २७ का भाग देना जो शेष बचे अश्विनी को आदि लेकर उस संख्या के नक्षत्र पर जब शनि जायगा उस समय उस भाव की हानि होगी या उस
भाव सम्बन्धी बातों का कष्ट होगा ।
या ठस नक्षत्र के त्रिकोण ( १० वाँ या १९ वां नक्षत्र ) में जव शनि जावे तब कष्ट होगा ।
सूर्य के अष्टकवगं से विचार
( १) सूर्य जिस राशि में हो उस राशि को पितु गृह कहते है । सूयं के अष्टकवर्ग से पिता का विचार होता है ।
( २ ) जन्म में सूर्य लग्नगत हो वह नीच या शत्रु गृही हो उसमें सूर्य की २,३रेखा हो तो जातक रोगी हो । ८ परन्तु लग्नस्थ सूर्य उच्च या स्वगृही हो उस राशि में ५ या अधिक रेखा हों तो * चह राजा तुल्य हो और दीर्घायु हो ।
(३) यदि सूर्य केन्द्र या त्रिकोण गत हो उस राशि पर ५ रेखाएं पडी हों तो जातक या उसके पिता की मृत्यु ३४ वें वर्ष में होती है । सूर्य स्थिर राशि में ६ रेखा हो-२२ वर्ष में मृत्यु । ७ रेखा=३० वर्ष में । ८रेखार ३६ वर्ष में मृत्यु हो ।
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अष्टक वर्ग विचार : १३१
छ (४) अन्य मत है कि सूर्य पंचम या नवम घर में हो सूर्य अष्टक० में उस राशि
में जितनी रेखा हों उस संख्या की अवस्था में जातक के पिता की मृत्यु हो जसे १ रेखा
हो तो १ वर्ष में २ रेखा तो २वपं में आदि | द
( ५) सूर्य केन्द्र में मित्रगृही हो और उसकी राशि में केवल ३, ४, ५, रेखाएं हों
तो उसके पिता को १७वें वपं में अति क्लेश होता है कभी मृत्यु भी हो जानी है ।
( ६) सूर्यं पंचम में हो उस राशि में ८ हीं रेखा हों और लग्न से राहु नवम हो
तो जातक के ५ वर्ष की अवस्था में हीं उसके पिता की मृत्यु हो जाती है ।
(७) सूर्य लग्न से तीसरे हो उस राशि में ३ या ४ रेखा हों और यदि लग्न से
नवम स्थान में कोई पाप ग्रह हो तो जातक के२० वपं पूर्व ही उसके पिता की मृत्युह्द ।
( ८ ) सूर्य केन्द्र में हो या ९ वा १२ वीं राशि में हो ओर गुरु सूयं के साथ हो
सूर्य उस सीमा के मध्य द्रेष्काण में हो और उस सूर्य की राशि में ३से ७ तक रेखा
हों तो जातक १०० योजन पृथ्वी का स्वामी होता है ।
( ९ ) सूर्य केन्द्र में हो और शनि बुध चंद्र एक साथ हों और. सूर्य राशि में ५
रेखा हों तो जातक की १० वषं आयु के पश्चात् पिता को राज्य लक्ष्मी प्राप्त हो या
चड़ा अधिकारी हो ।
(१०) सूर्यं राशि में रेखा शून्य हो उस राशि में जब सूर्य जाता है, उस सौर
मास में कोई शुभ कार्य या मंगल कार्य विवाहादि का आरम्भ करना मना है।
ये सब वातें सूर्य अष्टकवगं गोचर के सूर्य की राशि की रेखा से विचारना ।
सूर्य अष्टकवगं से पिता का विचार
जन्म समय जिस राशि में सूर्य हो उससे नवम स्थान पिता का होता है इसलिए
सूये अष्टक में उस राशि की अष्ट० रेखा संख्या में उस ग्रह के योगपिंड से गुणाकर २७
का भाग देना । जो शेष बचे अश्विनी से गिनकर उस नक्षत्र में जब शनि आयगा तब
पिता को कष्ट होगा। या उसके त्रिकोण (१-१०-१९ वें नक्षत्र में जब शनि आयेगा तब
पिता या पितु तुल्य चाचा आदि पालन करने वाळे का मरण या क्लेश होगा । या
अनहोनी वात होगी ।
जैसे सूर्यं मीन राशि में है उसकी नवम राशि वृश्चिक है । अतः सूर्य के अष्ट० में.
वृश्चिक राशि में देखा ७ रेखा हैं इसमें सूर्ये का योगपिंड ९३ का गुणाकर २७ का
भाग दिया । ७% ९३६५१ २७=२४दूङ=शेष ३ कृतिका । इससे कृतिका या उससे
त्रिकोण या १० वां उत्तरा फाल्गुनी या १९ वां उत्तराषाढा नक्षत्र पर जब शनि
आयगा तब पिता को बलेश या मरण होगा । उस समय अशुभ दशा आदि हो तो मरण,
शुभ दशा हो तो क्लेश होगा ।
अन्य प्रकार--सूर्य की उक्त राशि अष्ट० रेखा % योगपिड-:-१२-शैष राशि में या
उससे त्रिकोण में जब शनि जावे तब पिता को कष्ट या मरण होगा जसे उक्त ७ रेखा
योगपिंड ९३८६५१ +- १२=५४३ इ=शेष रेराशि=मिथुन या इसके त्रिकोण की राशि
तुला या कुंभ राशि में जब शनि जायगा तब पिता का मरण या कष्ट होगा ।
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दीर्घायु या राजा हो
१३२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
पिता का अरिष्ट काल
( १ ) उक्त त्रिकोण में जब शनि जायगा उस समय यदि सूर्य से चतुर्थ स्थान में * राहु या वही शनि या मंगल आ जाय तो पिता की मृत्यु हो यदि उसपर गुरु शुक्र की दृष्टि न हो ।
(२) लग्न या चंद्र से नवम स्थान में शनि हो और पाप ग्रह से युक्त या दुष्ट हो तो पिता का निधन हो ।
( ३ ) लग्न से चतुथं भावेश अनिष्ट दशा में हो तो भी पिता का मरण होता है अनुकूल दशा में मरण नहीं होता ।
( ४ ) लग्न से चतुर्थ भाव के स्वामी का जो नवांश हो उसकी दशा में पिता आदि का मरण हो ।
पितु सुख योग-छग्न स्थान से चतुर्थेश की दशा में अधिक सुख लाभ की संभावना रहती है ।
पिता का आज्ञाकारो-सुखेश लग्न या एकादश भाव में होया चंद्र से ११ भाक में हो या दशरव भाव मे हो तो जातक पिता का आज्ञाकारी होता है। पिता के धन का सदुपयोग--पिता के जन्म लग्न या जन्म राशि से तृतीय लग्न या राशि में जन्म हो तो जातक पिता के धन का सदुपयोग करता हैया पिता के धन के आश्रय में रहे ।
पिता तुल्य गुण--पिता की जन्म राशि या लग्न से दसवीं राशि या लग्न में जन्म हो तो जातक पिता के तुल्य गुणवान् होता है ।
पिता से श्रेष्ठ--यदि अपने जन्म लग्न से दशम स्थान का स्वामी लग्न में होतो पिता से श्रेष्ठ होगा ।
शुभ कार्य विचार--सुर्य अष्टकवगं में जिस राशि में अधिक अशुभ बिन्दु हों अर्थात् शुभ रेखा न हो या अल्प रेखा हों उस राशि के मास में ( जब सूर्य उस राशि में जाय ) और उस राशि के सम्वत्सर में ( जब उस राशि में गुरु रहे ) तब विवाह आदि शुभ कार्य नहीं करना ।
जिस राशि में अधिक रेखा हों उस राशि में जबः सूर्य हो या उसमें गुरु रहे तो शुभ कार्य करना । .
पितृहा योग--पिता के जन्म लग्न से अष्टम राशि लग्न में जन्म होया पिता के जन्म लग्न से अष्टमेश अपने जन्म लग्न में हो तो जातक पिता की मृत्यु के बाद उस घर के सव कार्य भार को सम्हाल लेता है। रोगी हो-सूर्य शत्रु राशि या नीच नवांश में होकर लग्न में हो और ३-४ रेखा हों तो जातक रोगी हो ।
दीर्घायु या राजा-सूर्य उच्च स्वगृही आदि का लग्न में हो ५ आदि रेखा हों तो
अष्टक वर्ग विचार : १३३
पिता को लक्ष्मी एवं सिद्धि--त्रिकोण एकाधिपत्य शोधन करने पर २ रेखा युक्त केन्द्र में शनि, चन्द्र, बुध, सूर्य हों तो १० वर्ष के पश्चात् जातक के पिता कों सब प्रकार से सिद्धि से युक्त राजलक्ष्मी प्राप्त हो । पितामरण जानने का अन्य प्रकार कुण्डली में जहाँ सूर्य है उससे नवम स्थान पिता का हुआ । इस नवम स्थान से अष्टम स्थान में जो राशि हो उसकी सूर्य अष्ट० में रेखा लेकर योग पिंड का गुणाकर १२ का भाग देना जो शेष रहे उसके त्रिकोण में जब शनि जायगा तब पिता या पिता न हो तो पिता तुल्य किसी कुटुम्बी को कष्ट होगा । जैसे सूर्य मीन में है उससे नवम वृश्चिक हुई । इस वृश्चिक राशि से अष्टम मिथुन है सूर्य अष्टक० में इस मिथुन राशि मेंशरेखा हैं । सूर्य का योगपिंड ९३ है । ९३ % =
४६५ --१२=३८१३न्शेष ९ धनराशि पर या इसके त्रिकोण की मेष या सिंह राशि में जव गोचर में शनि जायगा तो पिता को या पिता न हो तो पितृ तुल्य कुटुम्बी को
कष्ट होगा । : जातक की मृत्यु
सूर्याष्ट० में छग्न से अष्टम स्थान की रेखाओं को सूर्य योगपिंड से गुणाकर १२ का भाग दो जो शेष रहे उस मास में या उससे त्रिकोण राशि के मास में गतायु होने
पर जातक की मृत्यु होती है।
जसे कु डली में लग्न से अष्टमस्थान में मकर राशि है। मकर राशि में सूर्य अष्ट०
की २ रेखा हैं २% ९३ गोगपिंड=१५६ -- १२=१५६५= शेष ६ कन्या राशि या इसके
त्रिकोण की राशि मकर या वृष में जब सूर्य होगा तब मृत्यु संभव है ।
पिता को मृत्यु का समय
सूर्य केन्द्र या कोण में हो ६, ५, ७, ८ रेखा हों तो क्रमशः २२, २५, ३०, ३६ वर्षो में पिता की मृत्यु हो ।
चन्द्र का अष्टक वर्गानुसार फल
चन्द्रमा के चतुर्थ स्थान से माता घर ग्राम आदि का विचार होता है।
( १ ) चन्द्रमा से चतुर्थं भाव की राशि की शुभ रेखाओं में चन्द्र के योगपिड का
गुणाकर २७ का भाग देना-शेष जो नक्षत्र हो उसमें या उसके त्रिकोण के नक्षत्र में जब
शनि जावे तब माता की हानि या उस त्रिकोण में जहाँ दशा का शुन्य भाग हो माता
की हानि कहना ।
जैसे चन्द्र कुम्भ में है उसके चौथे में वृष राशि है। चंद्र अष्टक० में वृष राशि में ३
रेखा है । चन्द्र का योग पिंड ३६ है । ३६ % ३=१०८ -+- २७-४ ३७८२७ शेप० नक्षत्र= रेवती । रेवती का त्रिकोण १० वां आश्लेषा, १९ वां ज्येष्ठा है इन नक्षत्रों में जव शनि
गोचर में जायगा तब माता की हानि या कष्ट होगा माता के अभाव में माता के तुल्य
को कष्ट होगा ।
(२ ) चन्द्रमा से चतुथं स्थान से अष्टम स्थान मे जो राशि हो उसको रेखा को
१३४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
योगपिंड से गुणाकर १२ का भाग देना जो शेष बचे उस राशि का उसके त्रिकोण में जब
शनि जावे तब माता को कष्ट होता है।
जैसे चन्द्र से चतुर्थ में वृष राशि है । इस वृष राशि से अष्टम में धन राशि है चंद्र
अष्ट० में घन राशि में ७ रेखा हैं । चंद्र का योगपिंड ३६ है ३६% ७८२५२ -+ १२८
२१३६ ६-शेष मीन राशि आई इसके त्रिकोण में ककं और वृश्चिक राशि है । इन
राशियों में गोचर में जब शनि जायगा तब माता को कष्ट होगा ।
( ३ ) यदि उसी समय अभ्यन्तर चन्द्रमा स्थित राशि से या लग्न से चतुर्थ में मंगल
या शनि गोचर में पड़ता हो या चन्द्रमा लग्न से चतुथं स्थान पर मंगल व शनि की
दृष्टि हो तो माती की मृत्यु होती है ।
यदि जातक की माता न हो तो स्वयं जातक को इससे मृत्यु का भय होता है। या
देशान्तर में गमन करने से वहीं मृत्यु होतो है।
(४) जन्म का चन्द्र यदि सप्तम, अष्टम या द्वादश स्थान में हो और चंद्र स्थिति
राशि में चन्द्र अष्ट० में ३ या कम रेखा हों तो वाल्यावस्था में माता की मृत्यु हो या
माता जीवन पर्यन्त रोगी रहे ।
(५) जन्म का चन्द्र केन्द्र में हो या द्वादश स्थान में हो. और चन्द्र स्थित राशि में
चन्द्र अष्ट० में ३ था कम रेखा हों तो जातक के छठे वर्ष माता की मृत्यु होती है ।
(६) चन्द्रमा से ४-८ भाव में मंगल, ५-९ भाव में सूर्य हो तो माता का वियोग
हो लग्न से ऐसा योग हो तो पिता को मरण कहुनां ।
चंद्र का अष्टक वर्ग फल
(१) जन्म का चंद्र लग्न में हो और चन्द्र अष्ट में चन्द्र स्थित राशि में यदि १,२
या ३ रेखा पड़े तो जातक निबंछ और रोगी होता है कभी क्षय रोग भी हो जाता है
(२) चन्द्र लग्न में हो और चन्द्रमा के साथ यदि २ या ३ ग्रह बठ हों तथा उस
चन्द्र स्थित राशि में २ या ३ रेखा चन्द्र अष्ट० में हों तो जातक की मृत्यु ३७ वें
वषं में हो ।
(३) जन्म का चन्द्र त्रिकोण या लाभ भाव गत क्षीण, शत्रुगृही या नीच हो और
चन्द्र अष्ट० में उस राशि की २-३ रेखा हों तो चन्द्र स्थित भाव की हानि होती है
अर्थात् पंचम स्थान में चन्द्र हो तो पुत्र की हानि, लाभ में हो तो लाभ की हानि आदि
होती है। यदि उपरोक्त योग में चन्द्रमा क्षीण न हो और ४ या अधिक रेखा हों तो चंद्र
स्थित राशि का फल अच्छा होगा । भाव फल की वृद्धि होगी ।
(४) लग्न में क्षीण चन्द्र हो चन्द्र स्थित राशि में चन्द्र के अष्ट० में ३ या ३ से
कम रेखा हों तो दमा की बीमारी हो ।
(५) चन्द्र केन्द्र मे हो चन्द्र अष्ट० में उस राशि को ८ रेखा मिली हों तो वह विद्वान्, धनी, माननीय, बली, ख्यातियुक्त नृपतुल्य होता है । (६) चन्द्र अष्ट की किसी राशि में सबसे अधिक रेखा हों । और किसी अन्य
पुरुष का जन्म उसी राशि में हो तो उससे किसी प्रकार का सम्बन्ध करने या मित्रता
अष्टक वर्ग विचार : १३५
करने से अति शुभदायक होता है। ऐसों के साथ व्यापोर आदि करने से लाभ होता है। (७) चन्द्रमा से अष्टम भाव का स्वामी जिस नक्षत्र में हो उसके त्रिकोण के नक्षत्र में रोग दुःख आदि होता है । जेसे चन्द्रमा कुंभ राशि में है उससे अष्टम कन्या राशि हुई । कन्या का स्वामी बुध है यह पूर्वभाद्रपद में है तो इसमें या इसके त्रिकोण के नक्षत्र पुनर्वसु और विशाखा में व्याधि दुःख आदि होंगे । इसमे शुभ काम न करना । (८) चन्द्र से गिनने पर चतुर्थ के स्वामी या अष्टम के स्वामी का नवांश निकालो जब इस स्थान में या इससे त्रिकोण में सूर्यं जावे तब माता की हानि संभव है । इसी प्रकार पिता की मृत्यु का विचार लग्न से करना । मंगल के अष्टकवग से फल विचार
मंगल के अष्टकवर्ग से भाई, पराक्रम और धेय का विचार होता है मंगल जिस राशि में बैठा हो उस राशि से तीसरे स्थान से भाई का विचार होता है। (१) इस तीसरे स्थान से एवं इस तीसरे स्थान के अष्टम स्थान से भाई के कष्ट
का विचार करने को उस स्थान की रेखा से मंगळ के अष्टकवर्ग योगपिड से गुणा कर २७ का भाग देनो शेष नक्षत्र या उसके त्रिकोण में गोचर में जब शनि आवे तब भाई को कष्ट होगा या योगपिंड और उक्त राशि रेखा + १२=शेष राशि या उसके त्रिकोण
में जव शनि आवे तव भ्रातु कष्ट होगा । जैसे वृश्चिक में मंगल है उससे तीसरे स्थान में मकर है । मंगल अष्टक० में मकर में २ रेखः है योग पिंड ५५ है। २% ५५११० ~+ २७=४३३=्शेष २ भरणी नक्षत्र या उसके त्रिकोण के नक्षत्र पू० फा० या पू० षा०
पर जब शनि गोचर में आयेगा तव भाई को कष्ट होगा ।
या भ्रातृ स्थान यहाँ मकर आया उससे अष्टम सिंह हुआ। सिंह में ५ रेखा हैं ५% योग पिंड ५१--२७५-:-१२-२२३१--शेष ११ कुंभ राशि या इसके त्रिकोण की
मिथुन या तुळा राशि में जब शनि आवेगा तव भ्रातृ कष्ट होगा ।
(२) त्रिकोण शोधन के पश्चात् जिस रथान में अधिक रेखा हों उससे पृथ्वी, घर
सत्री एवं परिवार की वृद्धि, भ्रातृ का उत्तम सुख प्रगट होता है जब मंगल उस राशि
में जावे ।
(३) मंगल अष्ट० में जिस राशि में हो उस राशि में ८ रेखा हों तो जिमीदार हो ।
(४) मंगल लग्न, द्वितीय या दशम मों हो और उस स्थान की ८ रेखा हों तो
राजा हो किसी राज वंश का हो तो अवश्य राजा होता है ।
(५) यदि मंगल उच्च या स्वगृही होकर लग्न, चतुर्थ नवम या दशम में हो और
उस राशि पर ८ रेखा हों तो वह लक्षाधीश बहुत धनाढ्य और राजा होता है ।
(६) यदि मंगल केन्द्र में हो ९,५,१०, या ८ राशि का हो और मंगल की ४ रेखा
से अधिक हो तो अतिधनी हो । (७).मंगल दशम या लग्न में हो और मंगल की ८ रेखा हो तो धनी हो । यदि राजकुल का हो तो अवश्य राजा होता है । यदि मंगल उच्च का या स्वक्षेत्री हो तो
महाराजा होता है ।
१३६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
(८) जन्म लग्न ४,५,९ या १० हो उसमें मंगल हो मंगल की ४ रेखा हों तो राजा
तुल्य होता है ।
(९) मंगल हितीयेश होकर षष्ठ स्थान में हो । जहाँ मंगल हो उस राशि की ६
रेखा हों तो शत्रु अधिक हों अल्पायु में ही जातक व्यभिचारी हो ।
(१०) मंगल ६-८ या १२ घर में नीच का या अस्तंगत हो उसके साथ चन्द्रमा
भी हो और जिस राशि में मंगल हो उसमें ६ रेखा हों तो उसका भाई नहीं होता ।
(११) नीच का या अस्तंगत मंगल ६-८ या १२ भाव में हो, मंगल जहाँ हो
उसकी ६ रेखा हों, चन्द्रमा लग्न से केन्द्र में हो, तथा मंगल अष्ट० में चन्द्र जहाँ हो
उस राशि में ६ रेखा हो तो उसका भाई नहीं होता ।
(१२) मंगल केन्द्र में या पंचम में हो मंगल जहाँ हो उस राशि में ४ रेखा हो
तो उसका भाई नहीं होता ।
(१३) मंगल लग्न से तीसरे स्थान में हो वहाँ जो राशि हो उसमें ४ या अधिक
रेखा हो और मंगल पर शुभ ग्रह की दृष्टि भी हो तो कई भाई बहिन हों ।
(१४) मंगल के साथ शनि हो उस राशि में ३ या अधिक रेखा हों तो जातक के
भाइयों की मृत्यु होती है ।
(११) मंगल जहाँ हो या मंगल स्थिति राशि से पंचम या नवम स्थान पर शुभ
ग्रह की दृष्टि हो और मंगल स्थिति राशि या उसके त्रिकोण.की नवम पंचभ राशि पर
जितनी रेखायें हों उतनी संख्या जातक के भाई वहिनो की होगी । जैसे वृश्चिक का
मंगळ है इसके त्रिकोण में मीन और कर्क है । केवल ककं राशि पर उसकी दृष्टि है
ओर किसी पर शुभ दृष्टि पूर्ण नहीं है। मंगल के अष्ट० में कर्क की ३ रेखा हैं तो ३
भाई हैं। यदि शुभ ग्रह की अद्धं पौन आदि दृष्टि हो तो उनका पूर्ण जीवन नहीं रहता ।
(१६) मंगल १, ९ या ९० राशि में नीच या शत्रु गृही न हो। मंगल की उस
राशि में ४ या अधिक रेखा हो तो राज सुख भोगे । र
(१७) मंगल यदि शनि से युक्त या दृष्ट हो मंगल स्थित राशि की ४ या अधिक
रेखा हो तो कई ग्राम का अधिपति हो एवं दण्ड देने का अधिकारी होता है ।
(१८) मंगल बुध से युक्त या दृष्ट होकर लग्न से किसी भाव में हो । मंगल स्थित
राशि में ३ या कम रेखा हों तो आजन्म धन हीन हो।
(१९) मंगल चन्द्र से युक्त या दृष्ट होकर किसी भाव में हो मंगल स्थिति राशि
में ४ या अधिक रेखा हों तो कई ग्रामों का अधिपति हो ।
(२०) मंगल स्वगृही दशम या चतुर्थ में हो और मंगल स्थिति राशि में ४ या
अधिक रेखा हों तो राज्य या किला या दुर्ग का अधिकारी या सेनापति होकर सुखमय
जीवन व्यतीत करता हैः।
(३) उपरोक्त नियम २ का समय जानने का उदाहरण
मंगळ अष्ट० में त्रिकोण शोधनं के पश्चात सबसे अधिक ३ रेखा मिथुन की हैं ।
आम योगपिड ५५ है। ५५ ७८ ३:१६५-- २७-६ईउत्शेष ३ कृतिका नक्षत्र आया
अष्टक वर्ग विचार : १३७
इसमें या इसके त्रिकोण के नक्षत्र के उ० फा और उ० षा० में जब शनि आयगा तब
घर भूमि आदि प्राप्त होगी स्त्री एवं कुटुम्ब की वृद्धि होगी ।
बुध से चौथे भाव में कुटुम्ब धन पुत्रादि एवं मामा का विचार होता है बुध से
पंचम में मन्त्र विद्या, लिपि ( लिखने की शक्ति ) वुद्धि आदि का विचार होता है ।
(१) बुध के चतुर्थ स्थान की रेखा % बुध योर्गपड -:- २७-शेष नक्षत्र में या
उसके त्रिकोण में जव शनि आये तो बंधु मित्रादि को कष्ट होता है जसे बुध कुम्भ में
है इससे चतुर्थं में वृष राशि है । बुध अष्ट० में वृष में ४ रेखा है योगपिड० है ।
४% ०-० -- २७८-० रेवती नक्षत्र आया । इसमें या इससे त्रिकोण की आश्लेषा
और ज्येष्ठा में जव शनि आयगा तब वंधु मित्रादि को कष्ट होगा ।
या योगपिंड > ३ रेखा=०-- १२८० राशि मीन पर या उससे त्रिकोण कर्क या
वुश्चिक पर जब शनि जायेगा तब मित्रादि को कष्ट होगा ।
(२) इसी प्रकार वुध से पंचम स्थान की रेखा % बुध योगपिड -:- २७-शेष नक्षत्र
में या उसके त्रिकोण के नक्षत्र में जव शनि गोचर में जायगा तब बुद्धि आदि सम्बन्ध
के विषयों में कष्ट होगा या रेखा % योगपिंड + १२-शेष राशि या उसके त्रिकोण में
जब शनि जाये तब उपरोक्न्न वुद्धि सम्बन्धी विषयों का कष्ट होगा ।
(३) बुध लग्न से केन्द्र या त्रिकोण में हो और उसमे ८ रेखा हों तो भाग्यशाली होता है । अपने जातीय व्यवसाय या विद्या में ख्याति पाता है ।
(४) बुध उच्च या स्वगृही हो उस भाव में १, २या ३ ही रेखा हों तो बुध
स्थित भाव के फल की वृद्धि होती है ।
(५) बुध अष्ट» में जिस राशि में सबसे अधिक रेखा हो उस राशि के सौर मास .
में विद्या आरम्भ करने से विद्या में पूणं सफलता हो या विद्या सम्बन्धी कार्यों के
- आरम्भ से उसमें सफलता हो ।
(६) बुध अष्ट० में जिस राशि में कोई रेखा न हो उस राशि में गोचर में जब
शनि जावे तब किसी धन वन्धु या ज्ञाति की मृत्यु हो और उस समय जो सुख भोग
रहा हो उसका नाश हो ।
(७) बुध जिस स्थान में हो उससे द्वितीय स्थान में यदि कोई रेखा न हो तो
जातक गू गा होता है। उक्त द्वितीय स्थान में ३ या कम रेखा हो तो यह सारहीन
चक्ता होता है। ४ रेखा-साध।रण वक्ता, ५-६ रेखा=उत्तम वक्ता ही अपने विषय
का पर्ण रूप से समर्थन कर सकता है । ७ रेखा=वार्ताळाप में कुशल ओर प्रिय उच्च»- कोटि का वक्ता हो ।
(८) बुध से द्वितीय भाव में अपग्रह की रेखा हो तो जातक कठोर एवं व्यंग
बोलने वाला हो । सूयं की रेखा हो तो बुद्धिमानी की बांते एवं विचार पूर्वक बातों
का कहने वाळा हो । शनि की रेखा हो-मिथ्यावादी हो उद्दिग्न करने वाली बातें
करे ( मंगल की रेखा हो-झगडा पैदा करने वाला हो । गुरु को रेखा हो-ताकिक
एवं यु क्ति पूर्ण बहस में कुशल । की-मनोहर भाषी, भाषण में प्रमाणों एवं
कहावतों की झड़ी लगा देने वाला हो 1
१३८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
(१) इसी प्रकार कुंडली में जन्म का चन्द्र नीच का हो या शत्रुगृही हो और
ऐसे चन्द्र की वुध अष्टक वर्ग में यदि द्वितीय स्थान में कोई रेखा हो तो वात करने
में लज्जा मानने वाला होता है । बोलने में व्यवस्था रहित होता है ।
(१०) लग्न से द्वितीय स्थान में बुध को रेखा पड़ती हो और शुभ राशि हो तो
जातक प्राय: आनन्द दायक वातों का बोलने वाला होता है ।
(११) बुध ६-८-१२ भाव मे हो उसमें ३ या कम रेखा हों, बुध पर किसी
शुभ ग्रह की दृष्टि न हो तो आलसी और जुआड़ी हो ।
(१२) वृध शुक्र के साथ ६-८ या १२ भाव में हो यदि बुध पर तीन या कम
रेखा हों तो विद्या रहित हो ।
(१३) बुध अ०वगं से चतुर्थ में शुभ रेखाओं से माया आदि की संख्याजानना ।
गुरु के अष्टक वर्ग का फल
गुरु के स्थान से पंचम स्थान द्वारा ज्ञाति, पुत्र, धर्म धनादि का विचार होता है
- एवं इस पंचम से अष्टम स्थान की रेखाओं से भी पूर्वोक्त रीति से जैसा सूर्य आदि में
बताया है विचार करना ।
(१) गुरु अष्टक० के जिस राशि में सबसे अधिक रेखा हो उस राशि गत लग्न
में गर्भाधान होने से पुत्र की प्राप्ति होती है । जिस दिशा की सूचक वह राशि हो
उस दिशा में खजाना, गौशाला, अस्तबल, हथसार, मोटर गैरिज भंडार आदि बनाने
से उस स्थान में सब प्रकार की वृद्धि होती है । जसे गुरु अष्टकवगं में धन में ७ रेखा
तुला में ६, वृश्चिक में ६ रेखा है धन-पूर्व । तुला-पश्चिम। वृश्चिक-उत्तर। यहाँ
३ दिशायें शुभ हैं इनमें विशेष रेखा है। सब में शुभ धन-पूवं दिशा का है।
(र) गुरु अष्टक० में जिसमें सबसे कम रेखा हो उस राशि में जब गोचर का सूरय
जाता है उस मास में कार्थ करने से निष्फलता होती है ।
(३) लग्न से ६-८-१२ भाव में गुरु जिस राशि में हो उसकी ५ या अधिक रेखा
हों तो वह दीर्घायु और धनी हो शत्रु पर विजय पावे ।
(४) ४, ९, १२ राशि का गुरु केन्द्र में या नवम में हो या किसी राशि में हो
परन्तु नीच का या शत्रु गृहीत हो या अस्त न हो जिस राशि में गुरु हो उसकी ८ रेखा
हो तो अपने यत्न से पृथ्वी का स्वामी, धनवान् और राजा तुल्य होता है उसकी
बुद्धिमानी ओर शुभ गुणों की बहुत ख्याति होती है।
इस योग में गुरु के साथ चन्द्र भी हो ओर केवल ७ ही रेखा हों तो धनवान् हो
स्त्री और बहु सन्तान का सुख हो । ६ रेखा-धनवान् वाइन आदि का सुख भोगने
वाला संतान युक्त होता है। ५ रेखा-अयशील, शीलवान् । मतांतर ७-८ रेखा-्त्री'
एवं धन से चिरकाळ सुखी । ६ रेखा-धन-वाहन आदि सुख। ५ रेखा-श्रेष्ठ
स्वभाव वाला ।
(५) गुरु से चन्द्र ६ या ऽ स्थान में हो । गुरु अष्टक वर्ग में चन्द्र स्थिति राशि
पर रे या कम रेखा हों तो राजयोग रहने पर भी सदा ऋण ग्रस्त रहे ।
अष्टक वर्ग विचार : १३९.
(६) त्रिकोण में स्वक्षेत्री गुरु हो उस पर ३ या कम रेखा हों तो संतानों की
मृत्यु हो ।
(७) गुरु जिस राशि पर हो उसका स्वामी उच्च का हो गुरु अ० बग में उच्च ग्रह
पर ५ रेखा हों तो वह राजा या महाराजा होता है ।
(८) लग्न से ६ या ८ घर में गुरु लग्नेश युक्त हो गुरु स्थिति राशि की ३ या
कम रेखा हों तो आजन्म भाग्यहीन रहे ।
(९) ६-८या १२ घर में गुरु हो गुरु से ३ या पांचवें स्थान में गुरु अ० वर्ग
` में जितनी रेखायें हों उतनी संतान होगी ।
(१०) लग्न से पाँचवें घर का स्वामी गुरु से युक्त या दृष्ट हो ओर पंचमेश स्थिति
राशि में ४ या अधिक रेखा हों तो एक संतान, कुल की वृद्धि एवं ख्याति करने
वाला हो ।
(११) लग्न से पञ्चम घर को स्वामी जिस राशि में हो उस राशि का स्वामी यदि गुरु से युक्त या दुष्ट हो । पंचमेश स्थिति राशि पर ३ या कम रेखा हों तो १ संतान जातक के प्रति दुर्व्यवहार करने वाला हो ।
(१२) लग्न से और गुरु के स्थान से पञ्चम स्थान में ३ या कम रेखा हों तो
बहुत कम संतान हो ।
(१३) गुरु से पञ्चम स्थान में जितनी रेखा हों उतनी संतान होना बताया गया
है परन्तु नीच या शत्रु गृही ग्रह से तो फल ठीक नहीं होता ।
(१४) गुरु और लग्न से नवमेश उच्च या स्वगृही होकर केन्द्र में हो उस पर
४ से अधिक रेखा हो तो दंड देने का अधिकारी हो ।
(१५) गुरु अष्टक वर्ग में जब गोचर में उस राशि मे शनि जावे जिसमें सबसे |
कम रेखा हैं तब उस समय जातक की मृत्यु होती है ।
(१६) गुरु से पञ्चम स्थान का स्वामी जितने नवांश में हो उतनी संतान दों ।
(१७) गुरु से पञ्चम भाव की रेखा > गुरु योग पिड-+ २७-गेष नक्षत्र या उसके
त्रिकोण में जब शनि जावे, या रेखा+योगपिड <- १२ शेष राशि या उसके त्रिकोण में
जब शनि जावे तब संतान कष्ट होगा घमं ओर विद्या की हानि होगी ।
(१८) गुरु अ० वगं में गुरु से पाँचवें घर में जितनी शुभ रेखा हों उसमें से नीच
या शत्रु घर में जितनी रेखा हों उनको घटाना जो शेष वचे उतनो संतान होगी ।
शुक्र के अष्टक वग का विचार
शुक्र स्थिति राशि से सप्तम स्थान द्वारा स्त्री का विचार होता है ।
(१) इसी सप्तम स्थान एवं सप्तम से अष्टम स्थान में जो राशि हो उसकी
रेखाओं द्वारा पूर्ववत् रत्री के कष्ट का विचार होता है ।
जैसे शुक्र मीन पर है उससे सप्तम स्थान कन्या राशि है । शुक्र अ० वर्ग कन्या
की ४ रेखा हैं योगपिण्ड ४४ है । ४२ ४४=१७६ -: २७=६ ३ङन्शेष १४ चित्रा में
या इसके त्रिकोण धनिष्ठा और मृग० में जब शनि आयेगा तव स्त्री कष्ट होगा या
१४० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
४ >९ ४४-१७६ ~ १२=१४४=शेष ८ राशि वृश्चिक में या इसके त्रिकोण मीन और
कर्क में जब शनि जायगा तब स्त्री को कष्ट होगा ।
(२) शुक्र अष्ट० में जिस २ राशि में अधिक रेखा हो उस २ राशि में जब शुक्र
गोचर में जायगा तब धन, स्त्री और भूमि का सुख लाभ होगा ।
(३) शुक्र अ० वर्ग की जिस राशि में कम रेखायें हों उस राशि की दिशा में
जातक स्त्री का शयन गृह बनावे तो स्त्री जातक के वशीभूत रहे। अन्यमत जिस राशि
में अधिक रेखा पड़ती हों उस राशि की दिशा में गृह निर्माण करता है ।
(४) केन्द्र या त्रिकोण गत शुक्र स्थिति राशि की ८ रेखा हों तो सेनापति या
खाहनाधिपति हो ७ रेखा-धनाढ्य रत्नादि सम्पन्न या जन्म भर सुखी रहे । ५-६ रेखा दाम्पत्य जीवन सुखमय हो ।
यदि शुक्र नीच का हो या अस्त या ६-८ या १२ भाव में हो तो कोई राजयोग
होने पर भी राजयोग नष्ट हो जाता है ।
(५) शुक्र मेष या वृश्चिक का हो शुभ ग्रह युत या दृष्ट हो ४ से अधिक रेखा हों "तो धनी बहुत वाहन युक्त होता है
(६) शुक्र केन्द्र या त्रिकोण में हो मंगल से दृष्ट न हो शुक्र स्थिति राशि की ४
से अधिक रेखा हों तो अल्प अवस्था में विवाह हो । मंगल से दुष्ट होने में विवाह में
विघ्न होता है । -
(७) शुक्र १० या ११ राशि में हो मंगल से दृष्ट हो ओर शुक्र स्थिति राशि की
३ या अधिक रेखा हों तो उसकी स्त्री कुलटा होती है ।
शनि अष्टक वर्ग फल
शनि के अष्टक वर्ग से आयु का विचार होता है जिस राशि में शनि हो उससे अष्टम स्थान मृत्यु स्थान कहलाता है ।
(१) शनि अ० वर्ग में लग्न से शनि तक जितनी रेखायें हों उतने वर्ष में जातक
हो रोग या झगड़ा होता है।
शनि से लग्न तक जितनी रेखाएं हों उतने वषं में मृत्यु, धनक्षय या कष्ट या
“विदेश गमन होता है ।
लग्न से शनि तक और शनि से लग्न तक जितनी रेखा हों सबको जोड़ने से जो
संख्या आये उतने वर्ष में मृत्यु का भय हो ।
शनि अष्टक वर्ग में कुल ३९ रेखाएं होती हैं उसमें शनि स्थिति राशि एवं लग्न
ड स्थिति राशि की रेखाओं को जोड़ने से ठीक कष्ट प्रद वषं आयगा ।
इसी प्रकार लग्न से शनि तक अर्थात् शनि स्थिति राशि तक जितनी रेखाएं हों
उनको ७ से गुणाकर २७ का भाग दो जो शेष रहे उस संख्या के नक्षत्र में गोचर में
जब शनि आता है तब सुख एवं धन की हानि होती है ।
जसे शनि अ० वर्ग में लग्न से शनि स्थिति राशि तक ९ रेखा हैं । शनि योग `
पिंड ४९ है ४९ > ९=४४१ =- २७-१६६७ शेष ९ श्लेषा नक्षत्र में जव गोचर का
खचि जायगा तब सुख और धन की हानि .होगी ।
अष्टक वर्भ विचार : १४१
(२) शनि अ० वर्ग में जिस राशि में कोई रेखा नहीं है उस राशि में गोचर का शनि आमे से मृत्यु या धन हानि होती है । (३) जन्म में शनि केन्द्र में हो । किसी केन्द्र स्थान में तुला राशि हो पर शनि तुला में न हो ऐसे शनि स्थिति राशि की ४ या कम रेखा हो तो अल्पायु हो । (४) लग्न में बली शनि हो उसमें ५-६ रेखा हों तो धन की हानि होती है जन्म से हो दुःख भोगता है ।
(५) शनि लग्न में हो रेखा न हो तो अल्पायु हो ।
(६) चंद्र शुभ वर्ग शोर शनि नीच या शत्रुगृही हो ऐसे शनि स्थिति राशि में
५-६ रेखा हो तो दीर्घायु हो । (७) शनि नीच या शत्रुगृही हो और शुभ दृष्ट हो, शनि पर ४ रेखा से अधिक हो तो दीर्घायु हो ।
(८) शनि लग्न या पंचम स्थान में हो, नीच शत्रुगृही या अस्त हो और शनि पर ४ या ६ रेखा हो तो बहुत दासियाँ होती हँ ! यह धनी और ऊंटों का मालिक होता है।
(९) शनि लग्न या पंचम में हो और शनि पर ७रेखायें हों तो धनी हो । ८ रेखा
हों तो ग्राम शहर आदि का अधिपति हो । ऐसे शनि पर ७-८ रेखा हों तो व्यापार में अप्रवृत्ति होने से लक्षाधीश हो ।
(१०) शनि मंगल युक्त हो, शनि पर ४-५ रेखा हो तो पुर ग्राम आदि का
स्वामी हो ओर तंत्र मंत्र जानने वाला हो ।
(११) शनि ३-६-११ घर में हो नवमेश या दशमेश हो तो राजा सदुश हो।
(१२) शनि चंद्र युक्त लग्न में हो शनि की चार रेखा हो तो ऋणग्रस्त हो ।
(१३) यदि शनि चंद्र युक्त ४, ७ या १० स्थान में हो ४ रेखा हो तो राजयोग होता है । RR
(१४) शनि कहीं हो उस पर ३ य। कम रेखा हो तो परदेश में मृत्यु हो । (१५) चतुर्थेश से युक्त या दुष्ट शनि द्वितीय में हो शनि पर २, ३ रेखा होतो
तीर्थाटन करता है।
(१६) शनि दशम में दशमेश युक्त हो ३ रेखा हो तो जीवन के विशेष अंश में
परदेशवासी रहता है ।
(१७) शनि अ० वं में जिस स्थान में एक भी रेखा न हो उस राशि में जब
` शनि गोचर में जावे उस समय सूर्य और चंद्र भी गोचर में वहाँ आवें तब बहुत
अनिष्ट कारी होता है । इस समय दशा भी खराव हो तो मृत्यु भी संभव है ।
. (१८) शति अ० वर्ग में जिस राशि में रेखा न हो उसमें सूर्य या शनि या दोनों
जब जाते हैं तो रोग पीड़ा आदि का कष्ट होता है ।
(१९) शनि से अष्टम राशि की रेखा%योगपिड-+ २७=शेष नक्षत्र, या उसके
त्रिकोण में जो रेखा%योगपिंड5-१२=शेष राशि, पर उसके त्रिकोण में जब शनि
जायया तब मृत्यु संभव हैं या सुख एवं धन को हानि हो । जैसे सिंह पर शनि है उससे