सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 4
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
१३४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड
वर्ष प्रवेश दिन का है इस कारण दिन का गणित करते हैं ।
(१) पुण्य सहम
चन्द्र = १रा.-१६९-४४'-२०” शोधक
-सूर्य- ११- ५-३३ - ९ शोध्य
शेष = २- ११-११-११
- लग्न ५- ४-१३ -१६
७- १५-२४-२७
शु० न १
= ८- १५-२४-२८
(२) गुरु और ज्ञान सहम
= विद्या सहम
सूये ११- ५-३३- ९ शोधक
चन्द्र १-१६-४४२० शोध्य
दोष = ९-१८-४८४९
- क्ण्न ५- ४-१३-१६
= २-२३- २- ५
(३) यश सहम
बृहस्पति ५- २-१८-३०
पुण्य सह॑म८-१ ५-२४-२७
रोपः ८-१६-५४- ३
लर्न ५- ४-१३-१६
=१-२१- ७-१९
शु०+ १
२-२१- ७-१९ (४) मित्र सहम
गुरु सहम २-२३- २- ५
पुण्य सहम ८०१५-२४-१८
शेंष = ६- ७-३७-३५
जशक्न ०= ७-१९-४१
' 3 ६०१४-५६-१९
(५) महात्म सहम = शोय सहम
यहाँ चन्द्र वृष का है । इसमें से मीन
का सूर्यं घटाना है । लग्न कन्या है जो
बुष के आगे और मीन के भीतर है।
इस कारण दोनों के वीच लग्न होने से
१ राशि को जोड़ा या शोध्य मीन के
सूर्यं के आगे शोधक वप के चन्द्र तक
लग्न कन्या नहीं आती इस कारण १
राशि को जोड़ा गया ।
=यहाँ सूर्यं के आगे चंद्र तक लग्न नहीं है
अर्थात् चन्द्र शोध्य-१६-४४-२० से आगे
बढो तो शोधक सूर्यं ११-५-३३-९ तक
जाने में बीच में लग्न ५४-१३-१६ पड़ती
है । इससे १ राशि को नहीं जोड़ना पड़ा ।
=यहाँ शोधक बृहस्पति ५-२-1८३० के
आगे शोध्य पुण्य सहम ८-१५-२४२७
के भीतर लग्न ५४-१३-१६ आती है।
इस कारण १ राशि को जोड़ना पड़ा ।
प्यहाँ गुरु सहम और पुण्य सहम के वीच
शक्र नहीं पडता । इस कारण १ नहीं जोड़ना
पड़ा शुक्र तो पुण्य सहम शोध्य के आगे
चलने पर गुरु सहम शोधक के वीच पड़ता
है । इस कारण १ नहीं जोड़ना पड़ा ।
=्यहाँ भी लग्न पुण्य सहम ओर मंगळ के
बोच नहीं पड़ता । इससे १ नहीं जोड़ा ।
I,
छा
सहम विचार : १३५
पुण्य सहम ८-१५४५-२४-२७ इसी प्रकार आगे भी समझ लेना !
"मंगल १०- २-४६-२१
दोष-१०-१२-३८- ६
+छर्न ५ ¬ ४-१३-१६
८३ -१६-५१-२२
(६) आशा सहम (७) राज सहम
=इच्छा सहम =पितृ सहम -शनि २-१९-११ शनि २-१२-११
-शुक्न ०७-१९-३१ “सूर्यं ११-४-३३-९
दोष २-४४१-२० दोष ३-६-२४-५२
- लग्न ५४-१३-१६ न लग्न ५-४१३-१६
=७-८-५४-३६ =५—१०-४९-८
_शुश्+१ _ शु०--१
=८-८-५.४-३६ =९-१०-४।-५
(९) जीवित सहम (१०) कर्म सहम
उपाय=ऐक्वर्य सहम
शनि २-१२-१-१
` बृहस्पति ५२-१८-३०
दोष ९-९४२-३१
- लग्न ५-४१३-१६
=२-१३-५५-७७
. (१२) शास्त्र सहम
बृहस्पति ५-२-८५३०
-शनि_ _ २-१२-१-१
शेष २-२०-१७-२९
- बुध११-२०-२३-१४
= २-१०-४०-४३
शु०__ ०१
= ३-१०-४०--४३
मंगल १०-२-४६-२१
-बुध ११-२०-२२-१४
दोष १०-१२-२ ३-७
नी रूरन ५-४-१३-१६
=३-१६-३६-२३
(१३) बंदक सहम
चंद्र १-१६-४४२०
-बुध ११-२०-२३१४
हेष १-२६-२१-६
त लग्न ५-४-१३१६
= ७०-३४-२२
2 CBS +१ re
= ८-०३४-२२
(८) मातृ सहम
_ =जल सहम
चंद्र १-१६-४४२०
शुक्र ७-१९-४१ ७०१९०४१
रोष=१- ८-२४-३९
--लग्त५- ४-१३-१५
=६-१२-३७-५%
शु०--१
.७-१२-३२७-५*
(११) कलि सहम जकलह सहम
वृहस्पति ५-२-१८-०३०
"मंगल १0२० २
दोष ६-२५-३२-९
+लग्न ५-४-१३-१६
__ ८००-३-४५-२५ नुः, ०१
ह =१- ३-४५-२५
(३४) पटकमं सहम
=अन्य कर्म
चंद्र १-१६-४४२०
श्नि २-१२-१-१
होप ११-४-४३-१%
` ।- लगन ५४-१३-१६
= ४-८५६-३५
यहाँ बृहस्पति के आगे शनि
के बीच में बुध पड़ा है इस कारण १ जोड़ा
Sa IETO Sd Ii Ro °> Rf 2% | छ
१३६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थं वषेफल खण्ड
(१५) पानीय पतन (१६) प्रसूत सहम (१७) जाडच सहम
=हस्त सहम वृहस्पति ५- २-१८-३० मंगल १०- २-४६-२१
इति २-१२- १- १ -बुध ११-१०-२३-१४ शनि २-१२- १- १
-चन्द्र १-१६-४४-२० “शेष ५-११-५५-१६ रेष ७- २-४५-२०
रेष ०=२५-१६-४१ पलग्न ५- ४-१३-१६ +वुध ११-२०-२३-१४
फल्न ५- ४-१३-१६ योग १०-१६- ८-३२ योग ६-२३ ८-३४
योग= ५-२९-२९५७ शु० + १ झु०+ १
हु०--१ ११-१६- ८-३२ ७-२१३- ८-३४
। =६-२९-२९-५७ यहाँ मं० के आगे श० के भीतर वुध है इसमें १ जोडा
(१८) शत्रु सहम (१९) बन्धन सहम (२०) दरिद्र सहम
मंगल १०- २-४६-२१ पुण्यसहम ८-१५-२४-२७ पुण्यसहम ८-१५-२४-२७
-शनि २-१२- १- १ -शनि २-१२- १- १ -वुध ११-२०-२३-१४
शेष ७- २-४५-२० दोष ६- ३-२३-२६ शेष ८-२५- १-१३
नलरत ५ ४-१३-१६ छगन ५- ४-१३-१६ "बुध ११-२०-२३-१४
योग ०- ६-५८-३६ योग ११- ७-३६-४२ योग ८-१५-२४२७ शु० + १
९-१५-२४-२७
(२१) गुरुता सहम (२२) जल मागं ऐसी परिस्थिति में पुण्य सहम सूयं उच्च ०- १- ०-० कर्काद्धं २-१५ ०- ९ और वुध के वीच वुध समझ --सू्यं ११- ५-३३- ९ -शनि २-१२ १- १ १ जोड़ा ।
शोष ०-२५-२६-५१ शेष १- २-५८-५९ (२३) सामर्थ सहम
मलग ५- ५-१३-१६ भछग्न ५- ४-१३-१६ मगल १०- २-४६-२१
योगः ५-२९-४० ७ योग ६- ७-११-१५ छग्नेशवृध ११-२०-२३-१४
शु० +१ शु०न १ दोष १०-१२-२३- ७
६-२९-४०- ७ ७- ७-१२-१५ क्लग्न ५- ४-१३-१६
नट ३-१६-३६-२ ३
- (२४) काम सहम (२५) गौरव सहम (२६) कार्य सिद्ध
चंद्र. १-१६-४४-२० वृहस्पति ५- २-१८-३० शनि २-१२- १० १
*लरने शबुध११-२०-२३-१४ “चंद्र. १०१६-४४-२० सूर्य ११- ५-३३- ९
` शेष १=२६-११- ६ शेष ३-१४-३४-१० रोष ३- ६-२७-५२ कलन ५- ४-१३-१६ +सूर्यराशि११- ५-३३- ९ +सूर्यराशि५-२-१८-१०
र मीनेश गुरु
योगः 5० ०२४-२२ योगः ८-४६-२२ ८- योग ८- ८-४६-२२
शु? १ शु० +१ शु० +१
सप" ०२४-२२ =३-२१- ७-।९ ९- ८-४६-२२
सहम विचार : १३७
वृहस्पति के आगे सुर्यं राशि ये
चंद्र के भीतर पड़ती है इस
कारण १ जोड़ा
(२८) बुद्धि सहम (२९) चतुष्पद सहम
_ पुण्य सहम ८ १५ २४ २७ वृहस्पति ५ १२ १८ ३० १२ भाव ४ ४ १५ १७
(२७) अस्व सहम
सूयं ११ ५२३ ९
शेष ९ ९ ५१ १८
१११ भाव ३ ४ १० १९
सयं११ ५ ३३ ९ -६ भाव१० ४ १५ १७ RSS)
दोष ५ २६ ४४ २१ दोष ६ ०
कलगन ५ ४ १३ १६ +लग्न ५ ४ १३ १६
'योग ० १४ १ ३७ योग११ ० ५७ ३७ योग११ ४ १३ १६
शु ०१-१ शु०+१
=° “२०-४५ ९-३७ ८०-४-१३-१६
(३०) गज सहम (३१) देशान्तर (परदेश) (३२) भ्रातृ सहम
चंद्र १-१६-४४२०
“गुरु ५" २-१८-३०
शेष ८-१४-२५५०
नरूग्न ५- ४-१३-१६
योग १-१८-३ ६
न्य ३) पुत्र सहम
बृहस्पति ५- २-१८-३०
धर्मे भाव १- ४-१७-१९ बृहस्पति ५- २-१८-३०
-धर्मेशशुक्र ०० ७-१९-४१ “शनि २-१२- १- १
शेष २-२०- ७-२९
नलग्तन ५- ४-१३-१६
दोष ०-२६-५७-३८
औलग्न ५- ४-१३-१६
योग ६- १-१०-५४ योग ७-२४-३०४५
शु०+१ शु०+१
=७— १-१०-५४ =८—२४-३०-४५
(३४) रोग सहम (चोर) (३५) बन्धु सहम
लग्न ५- ४-१३-१६ बुध ११-२०-२३०१४
-चंद्र -१६-४४-२० -चंद्र १-१६-४४-२० -चंद्र १-१६-४४-२०
दोष .. ३-१५-३४-१० रोष ३-१७-२७-५६ शेष १०- ३-३८-५४
भग्न ५- ४-१३-१६ तलग्न ५० ४-१३-१६ पल शा ४-१३-१६
योग ८-१९-४७-२६ योग ८-२१-४१-१२ योग ३- ७-५२-१०
शु०+१ शु०न-१
=९-१९-४७-२६ =९-२१-४१-१२
ऐसी परिस्थिति में लग्न और
चंद्र के बीच लग्न होना समझ
कर १ बढ़ाया गया ।
१३८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड
(३६) मृत्यु सहम
मृत्यु भाव ०-४-१५-१७ -चंद्र _ १--१६-४४-२० घनभावेशशुक्र ०-७-१९-४१
शेप १०-१७-३०-५७
शनि २-१२- १- १
योग ०-२९-३१-५८
- उपरोक्त दोनों के वीच शनि
नहीं है इससे १ नहीं जोड़ना पड़ा
(३९) वाणिज्य सहम
चन्द्र १-१६-४४-२० "जप 10-२०-२३-१४ दोष १-१६-२१- ६
न लग्न ५० ४-२३-१६
योग= ७- ०-२४-२२
शु०+ १
=¬ ०-३४-२२
(४२) श्रद्धा सहम
(३७) धन (अर्थ) सहम (३८) पर स्त्री हरण
धन भाव ६-४-१५-१७ शुक्र ०-७--१ ९-४१
-सूर्य११-५-३३-९
रेष ५-२६-५५३६ शेष १-१-४६-३२
लग्न SPLEEN ५- ४-१३-१६ वि
योग ११-१ ८-५२ योग ६-५-५९४८
शु०+१
(४०) विवाह (स्त्री) सहम
शुक्र ०- ७-१९-४१
“शनि २-१२- १- १
दोष ९-२५-१८-४०
(४१) संताप सहम
शनि २-१२- २- १
शेष ०-२५-१६-४१
+-छूग्न ५० ४-१२-१६ + रिपुभाव१०-४-१५-१७
योग=१०-२९-३१-५८
शु०--१
=११-२९-३१-५८
शनि और चन्द्र के वीच रिपु
(षष्ठ)भाव होने से १ जोड़ा
(४४) व्यापार सहम
योग=२-२९-३१-५५
(४३) प्रीति सहम
शुक्र ०- ७-१९-४१ विद्या(गुरु) सं २-२३- २-२५ मंगल १०- २-४६-२१ Sui)
शेष २-४३३-२०
ॐ लग्न ५-४१३-१६
योग ७-८-४६३६
(४५) कन्या सहम
थुक्क ०- ७-१९-४१
"चंद्र १-१६-४४-२०
दोष १०-२०-३५-२१
नी छरन ५- ४-१३-१६
योग ३-२४-४८-३७
“पुण्य सहम ८-१५-२४-२७ -बुध ११-२१-२ ३-१४
दोष ६- ७-३७-३८ दोष १०-१२-२३- ७
- लग्न ५- ४-१३-१६ + लग्न ३१- ४-१ ३-१६
योग ११-१९-५०-५४ योग ३-१६-३६-२३
शु० + १
०-११-५०-५४
(४६) जलघात सहम
वृहस्पति ५- २-१८-३०
-पुण्यस ० ८-१२-२४-२७
रोष ८-१९-५४-२१ न लग्न ५- ४-१३-१६
योग १-२४- ७-१९
लग्न ५-४१३-१६
त ०४ =७-५-५९-४८
-चंद्र १-१६-४४२०
$
क्रमानुसार सहम चक्र सहम
क्रम सहम का नाम
र८ बुद्धि सहम
२९ चतुष्पद सहम
प८ शतु सहम
४३ प्रीति सहम
२७ अश्व सहम
१६ प्रसूत सहम
३६ मृत्यु सहम
११ कलि सहम
३० गज सहम
४६ जळ घात सहम
९ जीवित (उपाय) सहम
३ यश (वल) सहम
२ गुरु (विद्या) सहम
४० विवाह सहम
३५ वंधु सहम
१२ शास्त्र सहम
१० कर्म सहम
२३ सामर्थ सहम
४४ व्यापार सहम
५ महात्म (शौर्य) सहम
२५ गौरव सहम ४५ कन्या सहम
१४ पर कमे सहम
१५ पानीय पतन सहम
२१ गुरुता सहम
३१ देशान्तर (यात्रा) सहम
३८ परस्त्री हरण सद्दम
२२ जल मार्ग सहम
४२ श्रद्धा सहम
८ मातृ (जल) सहम
१७ जाडघ सहम
२४ काम सहम
4 20
०
- ० -८० .८७ ०७८ ,%२०० “० ० ७6-06 -० ,७0 ०
०
७
सहम स्पष्ट
अश [श कला वि०
५७ ३०
१६
३६
३४
३७
३२
LE]
१५
६
१९
४७
१९
शू
५५
१०
४३
२३
२२३
२३
२२
१९
सहम विचार : १३९.
सहम सहम सहमकाः
राशि स्वामी भाव
मेष मंगल अष्टमः
मेप १1 1
वृष शुक्र 1s
(1) गा गर
07 कं दशमः
मिथुन वुध गर
गर गा गा
गर डर शा
14 गा गा
कर्के चंद्र गा
गर गर 72.
rr गर aT,
21 गर a
71 7) 11
- गा गा
12 170) द्वादशः र
FF) गर 7
सिह सूर्य ॥71 तुला शुक्र तृतीयः
का 14 12
वृद्चिक मंगल कर
11 गर गा
गर 7 1)
| 12 गा
- कर र?
Fy) FT) 3
धनु गुरु चतुर्थ
"१४० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड
सहम सहम नाम सहम स्पष्ट सहम सहम सहम का
क्रम राशि अंश कला विकला राशि स्वामी भाव
३९ वाणिज्य सहम षु ० ३४ २२ धनु गुरु चतुर्थ
“१३ बंदक सहम द ० ३४ २२ » (0 गर
६ आशा सहम द द ५४ ३६ १: १7 २
१ पुण्य सहम पावरी करड २७ १. 0? (0
३२ भ्रातु सहम द २४ ३० ४५ ,, 1 पंचम
“२६ काये सिद्ध सहम ९ ८ ४६ २२ मकर शनि १
७ पितृ (राज) सहम ९ १० ४१ दा) श्र ग
“२० दारिद्र सहम ९ १९ २४ २७ ,, 0) गर
३३ पुत्र सहम 0 ९0७ 90 छु > | षष्ठ आरंभ संधि
“३४ रोग सहम A १२. १ 7 पष्ठ ३७ धन (धर्थ) सहम ११ १ ८ ५२ मीन गुरु सात "१९ बंधन सहम AMR NR श्र
१६ प्रसूत सहम ११ १६ दु ३२ „ गर १7 “४१ संताप सहम ११ २९ ३१ ५५ „» ४ अष्टम आरंभ संधि
सहम की राशि का स्वामी सहमेश कहलाता है ।
सहम पर उस के स्वामी की दृष्टि है या नहीं इसका विचार करना पड़ता है ।
“इस कारण इन ग्रहों का दृष्टि साधन कर लेना चाहिए। जिस सहम के सम्बन्ध में
विचारना है उस पर ही उसके स्वामी की दृष्टि का विचार करना चाहिए
“क्योंकि प्रत्येक सहम पर प्रत्येक की दृष्टि का विचार करने में बहुत समय लगेगा ।
ताजोक्त दृष्टि गणित द्वारा साधन करना पहिले बता चुके हैं मान लो (४) विवाह
सहम २ रा--२९९--३१--५६” का विचार करना है । इसका स्वामी बुध है । बुध की दृष्टि का विचार करना है। “दृश्य विवाह सहम २--रा २९०-३१५६” दोष ३ रा०=१५न+भंश -द्रष्टा सहमेश बुध ११-- २० -- ८ -_४२ १५- ०-०
शेष=३- ९-- ८-४२ +९५४२
=२४--८--४२=द्ष्टि २४-5८
चलित भाव कुण्डली में लाभ भाव में विवाह सहम है और वुध अष्टम में आ “जाता है । सहमेश बुध की विवाह सहम पर गुप्तवैरा दृष्टि है।
ऽसहमों का अर्थ
किसी २ सहमों के अथं में भ्रम हो जाता है जैसे गुरु, बल, महात्म, आशा, राज
“आदि । इस कारण उन्हें नीचे समझाया है--(१) गुरु-उपदेश करने वाला, विज्ञान,
सहम विचार : १४१
विद्या मात्र विषयक बुद्धि विद्या जानना। (२) बलप्सेना। देहुन्हाथ पेर आदि
पिंडदेह । (५) महात्म=मन्त्र गांभीय का नाम है। डति = बुद्धिमानी का नाम
है। (६) आशा=इच्छा का नाम है। दिशा का भी नाम है। (७) राजाऱ्यगुरुता,.
मंडलेशत्व, सामान्य राजा गौरव, श्रेष्ठ ज्ञानी, निग्रह कारागार, बन्धन सामथं, द्रव्य
दान समर्थं तथा छत्र चामर आदि राज चिह्न धारी को राजा कहते हँ । (८) जल=
क्रांति हीरक आदि मणि कांतिवत्, जल पथ मागें इत्यादि । (१२) शास्त्र-श्रुति स्मृति
ज्ञान । (१४) पर कर्म-दासत्व का पर्याय है । (१५) पानीय पतननका तात्पर्ये वृष्टिः
आदि ऊपर से गिरने वाला पानी । जल में डूबने का भी अर्थ है । (१६) प्रसव=
गर्भाधान सन्तान उत्पत्ति। (१७) जाडचसअज्ञान, ग्रन्थविस्मरण आदि। (२३) सामर्थ८
शारीर आदि बल । (३४) मांच-आधि, मानसी व्यथा,व्याधि, रोग, ताप, सन्ताप ।
(३५) बांधव=्सपिड सात पुरुष पर्यन्त । (४२) श्रद्धान्धम कार्यं की मति । यहाँ
विश्वासता का मुख्य अर्थ लेना । (१३) वंधक=पराश्रय ।
दोष सहम पुण्य, विवाह आदि का अर्थं स्पष्ट है ।
सहम का फळ निकालना
(१) = (सहम--सहमेदा) = (दोष के अंश बना > सहम राशि का उदय) -- ३००:
इसमें राशि का स्थानीय स्वोदय लेना ।
उदाहरंण
रा ० 7 का ० 4 डा
विवाह सहम २--२९--३१--५६ दोष ९९--५-०४२ ६०)१२८५२(२१४
--पम्रहमेश बुध११--२०--२३--१४ > सहम राशि ३०६ _१२०
दोष ३-- ९-- ८-०४२ मिथुन स्वोदय ८५
= ९९०८-४२” २७५४ २४४८ ६१२ ६०
सहम राशि मिथुन का स्वोदय ३०६ २७५४ १२२४ २५२
३००)३०३३८-२२-१२(१०१ दिन ३०१९४ २४४८ १२८५२ २४०
“३०० +४४ ०२१४ =१२ १२
३३ ३०३३८ २६६२ ६०)२६६२(४४
३०० =२२ २४०
३८% ६० =३०३३८-२२-१२-= ३०० २६२
२२८०+ २२ =दिन-घ-प २४०
३००)२३०२(७ घ. १०१-७४० २२
२१०० =मास--दिन--घ-प
२०१२ ६० +१२ AOS
३००)१२१३२(४० प. वर्ष प्रवेश के दिन से इतने समय के बाद विवाह
१२०० सहम का फल होगा । वर्ष प्रवेश की तारीख में उतना
टि १३२ समय जोड़ देने से फल समय प्राप्त होगा ।
*१४२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड
जिस सहम का फल समय विचारना हो इसी प्रकार विचार लेना । परन्तु समय
“निकालने के प्रथम सहम के स्वामी की दृष्टि, पाप या शुभ ग्रहों की दृष्टि और बल
'एवं भाव आदि सम्बन्ध से पहिले अच्छी प्रकार विचार लेना कि उस सहम का फल “होगा या नहीं या कितना फल होगा । यदि पूर्ण रूप से फल होने का भाव दृष्टि “आदि से प्रगट हो तब फल का समय निकालना अन्यथा नहीं। सहम निर्वल हो फल
“देने की सामर्थ न हो तो उनको चक्र में स्थापन भी नहीं करना अर्थात् छोड़ देना । (२) मतांतर-पूर्व प्राप्त दिन <- ३०=छब्धि राशि ।
इसे वर्ष प्रवेश कालिक सूर्य राशि में कला पर्यंत जोड़ना तब फल के समय का -सूयं स्पष्ट निकलेगा । यह सूर्य स्पष्ट जिस समय आवे तब उस सहम का पाक समय जानना ।
जैसे पूर्व प्राप्त दिन १०१ दिन ७ घ० ४० प० ३०)१०१(३ राशि
२३ रा० ११° ७' ४७” ९०
“वर्ष प्रवेश का सूर्यं ११ रा० ५० ३३” ९” ११ अंश +प्राप्त समय ३ ११ ७ ४० जब वर्ष प्रवेश के पस्चात् स्सूयें स्पष्ट-२ १६ ४० ४९ २--१६--४०--४९ पर
सूर्यं आयगा तब सहम का
फल मिलेगा । (३) अन्य फल
2 कोई कहते हैं कि हीनांश पत्यांश क्रम से जब सहमेश की दशा होगी तव फल
प्होगा ।
अधिकांश मत है कि उपरोक्त प्रथम बताई रीति से जो दिन मिळे उसके भीतर
सहमेश की' दशा में उस सहम का फल होगा ।
जब जन्म कुण्डली से विवाह संतान आदि का योग प्रकट हो तब समय "निकालना । जब योग न हो तो उसका सहम या सहम का फल समय निकालने की
आवश्यकता नहीं है ।
सहम का फल विचारने के रिए कि सहम पर सहमेश की दृष्टि है या नहीं किन शुभ या पाप ग्रहों की दृष्टि सहम लग्न या सहम पर है। कौन-कौन शुभ या पाप ग्रह सहम लग्न पर हैं । सहम लग्नेश का बल क्या है निर्बेल या पूर्ण बली आदि है । वर्षं कुण्डली में सहम और सहमेश ६-८-१२ घर में नहीं हैं । सहमेश और लग्नेश ६-८-१२ के स्वामियों के साथ तो नहीं हैं । ये शुभ ग्रहों से युक्त दुष्ट होने से शुभ और पाप ग्रहों से युक्त दृष्ट होने से अशुभ हो जाते हैं । इसी प्रकार ६-५-१२ भाव या इनके भावेश से सम्बन्ध होने से बुरा फल होता है । इन सब पर विचार कर फल निर्णय करना । परन्तु कुछ ऐसे सहम हैं जिनका फल उल्टा है जैसे मृत्यु रोग सहम आदि बुरे सहम हैं जो बलवान हों तो रोग बढ़े निर्बेल हों तो रोग घटा देंगे ।
®
अध्याय १६
सास प्रवेश साधन का उदाहरण
दिनांक १९--३--१९४५ सम्वत २००२ चैत्र शुक्ल ६ सोमवार वर्ष प्रवेश का सूर्य ११रा.-५०--३३'--९/ और इष्ट २९--४४--२२॥ पर वर्ष प्रवेश है। यही पहिला मास प्रवेश का सूर्य हुआ । इसके आगे प्रतिमास १-१ राशि जोडते जाने से अगले मास के मास प्रवेश का सूय हो जाता है जैसा यहाँ बताया है ।
अब इस मास के समीप का सूर्य पंचांग मास प्रवेश का सूर्य
(१) पहिला मास-११र-५९-३३/-९” द्वारा खोज कर उसकी गति पर से गणित
हारा निकालेंगे कि यहाँ बताया हुआ
मास प्रवेश का सूर्य किस २ समय पर
(११)
मास रा.
२
३
¥
शर
१
र
३
[71 :२०-५-३२३-९
» =१-५-३३-९
9 =२-५-३३-९
=» =३-५-३३-९
प्र =४-५-३३-९
29 =५-५-३३-९
» =६-५-३३-९
॥॥ =७-५-३३-५
» =८-५-३३-९
» =९-५-३३-०
,» =१०-५-३३-०
अं. क. वि. क. वि. दिन
५ ३५ ४७ ५८ ३२ गुरुवार
५ ३३ ३ ५७ ३६ इतवार ५ % ५७ ५७ ३ बुधवार
५ २७ ० ५७ ५ इतवार
आयगा ।
रीति-
(१) इष्ट सूर्यं और पंक्तिस्थ सूरय में जो जिस से घटे घटाकर अंतर निका-
लना । यदि पंक्ति से इष्ट सूयं घट गया
तो ऋण चालन होगा । यदि इष्ट सूर्य में
से पंक्ति घट गया तो धन चालन होगा ।
क्योकि पंक्ति से इष्ट पहिले हो तो घटा
कर (ऋण) और पंक्ति के आगे सूर्यं है तो
(घन) जोड़कर इष्ट काल निकाला जायगा ।
(२) अमुक गति एक दिन में है तो इतना (उक्त) मंतर होने को कितना समय
लगेगा ? अंतर में गति का भाग देने से उत्तर दिन घड़ी पल विपल में आयगा । वह
चालन ऊ॑ (धन या ऋण) उपरोक्त होगा ।
(३) पंक्ति का बार और घड़ी पल में वह चालन ॐ के अनुसार जोड़ने या
घटाने से इष्ट समय निकल आयगा ।
मास प्रवेश के सूयं-के समीप. का सूर्य पंचांग से खोज कर नीचे दिया है-
पंक्ति इष्ट० गति पंचांग में दिया हुआ समय सम्वत २००२
समय मास तिथि
द्वितीय चेत्र शुक्ल ८
बैशाख शुदी ९
ज्येष्ठ शुक्ल १०
आषाढ, शुक्ल १२
तारीख
१९४-१९४५ २०-५४१५
२०-६-४५्
२२-७४५
१४४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थं वर्षफल खण्ड
मास रा. अं. क. वि. क. वि. दिन समय मास तिथि तारीख
४ ५ ३ ४३ ५७४४ वुधवार श्रावण शुक्ल १४ २२-८०४५
५ ५ ७ ३६ ५८४३ शनिवार आरिविन कुष्ण १ २२-८-४५
८ ६ ५ ४७ १४ ५९ ४४ मंगलवार कातिक कुष्ण २ २३-१०-४५
७
८
९
९ ५ ५९ ५० ६०४५ गुरुवार मार्ग शीर्ष कृष्ण ३ २२-११-४५
१० ५ ३२ २७ ६१ १५ शनिवार पोष कृष्ण ३ २१-१२-४५
११ ५ १२ १४ ६१ १३ शनिवार माघ कृष्ण २ १९-१-१९४६
१२१० ५ ४२ १२ ६० ३६ सोमवार फाल्गुन कृष्ण २ १८-२-४६
गणित (पंक्ति का इष्ट ० है)
(२) द्वितीय मास प्रवेश
सूयं पंक्ति ० रा-५९-३५/-४७” अन्तर १ ३८” _ ९८ _वारघ.पःवि.
इष्ट ० —५ -३३ -९ गति ५८-३२ इ ३५१२ ०१-४०-२७
अंतर ० -५= १-३८ ऋण चालन ऋण
वार० घ० प० वि०
१-३६-९८” पंक्तिवार गुरु=श- ०- ०८ ०
गति ५८-३२ चालन ऋण -०- १-२०-२७
९ ६० शेष=४-५८-१९-३३
३४८० + ३२८३५१२ द्वितीय मास प्रवेश का इष्ट
४ वार बुधवार इष्ट ५८घ० १०५० ३३वि० पर
३५१२) ९८(० दिन
< ६०
३५१२)५८८०(१ घड़ी
३५१२
२३६८ 2८ ६०
३५१२)१४२०८०(४० पल
१४०४८
१६०० १८ ६०
३५१२)९६०००(२७ विप
७०२४
२५७५०
२४५८४
११७६
मास प्रवेश साधन का उदाहरण : १४५
(३) तृतीय मास प्रवेश साधन दि.घ. प. मि.
इष्ट सूर्य=१-५-३३-९ अंतर ०-६” ६ _ ०-० -६ -१४
पक्ति =१-५-३३-३ गत्ति,७-३६ ˆ ३४५६” चालन+
अंतर =०-०-०-६-+ वार घ० प० वि०
पंक्ति इतवार=१ -० -० -०
गति ५७.-३५'” चालन ० -० -६-१५
=१ -० -६-१५
तृतीय मास प्रवेश का इष्ट घ० प० वि०
१ वार=इतवार को इष्ट ० -६ -१% पर
(४) चतुर्थ मास प्रवेश साधन इष्ट सूर्यं ररा-५°-३३'-९” अंतर=२७-१२ _ १६३२” _ दि. घ. प. वि.
पक्ति २-५- ५-५७ गति-५७-३ ३४२३” ०-२८-३६-२१
भंतर >०-०-२७-१२-- ३ चालन +-
पंक्ति बुधवार-वार घ. प. वि.
४-- 0- ०- ०
गति ५७-३” चालन०-२८-३६-३१
=४-२८-३६-३१
=चतुर्थं मास प्रवेश-वार ४ बुधवार को इष्ट २८ घ. ३६प. ३१वि. पर होगा
"(५) पंचम मास प्रवेश साधन
इष्ट सूर्य ३-५-३३-९ अंतर६'-९”_ ३६८ _ दिन घ. प. वि.
पक्ति ३-५_२७-० गति ५७-५ ३४२५ ०- ६ =२७-५१+
अन्तर =०-०-३-९+ पंक्ति इतवार वार घ. प. वि. चारून +
गति ५७-५'” १ -० -० -०
चालन + ०६-२७-५१
१-६२७-५१
पंचम मास प्रवेश-वार १ इतवार को इष्ट ६घ. २७प. ५१वि. पर होगा ।
(६) छठा मास प्रवेश
इष्ट सूयं ४-५-३३-९ अन्तर २६-२९” _ १७६६” _ दिन घ. प. वि.
पक्ति ४-५- ३-४३ ५७-४४ ३४६४ ०- ३०-३५-२०
अंतर= ०-०-२९-२६-- पंक्ति इतवार वार घ. प. वि. चालन +-
गति ५७-४४” Y¥—o—o-—o
- चारून ०-३०-३५२०
=४—३०-३५-२०
छठा मास प्रवेश-वार ४ बुधवार को इष्ट ३०घ. ३५प. २०वि. पर होगा ।
१०
१४६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड
(७) सातवां मास प्रवेश
इष्ट सूयं ५-५-३३-९ अन्तर २५-३३” _ १५३३” __दिन घ. प. वि.
पंक्ति ५-५- ७-३६ गति Pr २५२३ “7 ५० २६- ६- ३०
अन्तर= ००-२५-३३ पंक्ति शनिवार=्वार घ. प. वि चालन
गति ५८-४३” ७- ०- ०० ०
चालन, ०~२६- ६-३० .
\७-२६- ६-३०
सप्तम मास प्रवेश-वार ७-शनिवार को इष्ट २६घ. ६प. ३०वि. पर होगा ।
(८) अष्टम मास प्रवेश
अंतर १४-५” __८४५__दि. घ. प.वि,
गति ५९-५४ ३५९४ ००१४-६२४
पंक्ति सूयं ६-५-४७-१४ चालन ऋण
इष्ट सूर्यं ६-५-३३ पंक्ति मंगलवार=वार घ. प. वि.
अन्तर ०-०-१४- ५ ऋण १- ०- ०० ०
चालन ऋण ०-१४-६-२४
गति ३९-५४ ` शेष २-४५-५३-३६ अष्टम मास प्रवेश=वार र=्सोमवार को इष्ट घ. प. वि. पर होगा ४५-५३-३६ (९) नवम मास प्रवेश
पंक्तिस्थ सूयं ७-५-५९-५० अंतर २५-४१” १५४१” दि. घ. प. वि
इष्ट सुय ७-५-३३- ९ गति ६०-४५ ३६४५ = ०-२५-२१-५७
अन्तर ०-०२५-४१ ऋण चालन ऋण
गति ६०-४५ पंक्ति गुदवारऱवार घ. प. वि.
चालन ऋण -५ -० "० -०
०-१५-२१-५ शेष =४-३४-३८-२
नवम मास प्रवेश-वार ४=बुधवार को इष्ट ३४-३८-२ पर होगा ।
(१०) दशम मास प्रवेश
इष्ट सूर्यं ८-५-३३- ९ अंतर ०-४२” _ ४२” __ दि. घ. प. वि.
पंक्ति ८-५-३२-२७ गति ६१-१५ ३६७५ ० ०- ४१- ८
मंतर ०-०- ०-४२ + चालन+-
गति ६१-१५ पंक्ति शुक्रवार-वार घ. प. वि.
- चालन + ६-०- ०- ८
०-०-४१- ८
=६-०-४१- ८ दशम मास प्रवेश-वार ६-शुक्रवार को इष्ट ०-४१-८ पर होगा ।
मास प्रवेश साधन का उदाहरण : १४७
(११) एकादश मास प्रवेश इष्ट सूर्यं ९-५-३३- ९ अंतर २०-५५ _१२५५” दिन घ. प. वि. पंक्ति ९५-१२-१४ गति ६१-१३ ३६७२ ०-२०-३० ३ अंतर ०-०-२०-५५+ चारून +
नाति ६१-१३ पंक्ति शनिवार=्वार घ. प. वि.
चालन + ७» ०" ०००
०-२०-३०-३
=:७-२०-३०-३
मास प्रवेश वार ७-शनिवार को इष्ट २०-३०-३ पर होगा ।
(१२) द्वादश मास प्रवेश
'पंक्तिस्थ सूयं १०रा.-५९-४२/-१२” अंतर ९-३” _५४३” दिन घ, प. वि.
इष्ट , १० -५-३३- ९ गति ६०-३६ ३६३६ ०- ८-५७-३७
अंतर = ० -०- ९- ३ ऋण चालन ऋण
गति ६०-३६ पंक्ति सोमवार=वार. घ. प. वि.
चालन ऋण २- ८-०-० |
-०- ८-५७-३७
शेष=१-५१-२-२३
द्वादश मास प्रवेश वार १=इतवार को इष्ट घ. प. वि.
५१-२-२३ पर होगा ।:
लाग्रतमिक कोष्टक L०हarithmic 7४७6 से भी मास प्रवेश का चालन
सरलता से निकल आता है । ज्योतिष शिक्षा भाग २ गणित खण्ड के अध्याय ७ के
'पृष्ठ १३४ क,ख,ग,घ,च,छ,ज,झ में ८ चक्र सारिणी अंक के दिये हैं उनके सहारे भी
सरलता से पंक्ति और इष्ट के अंतर में गति का भाग देने के विना इस सारिणी से
'उत्तर चालन प्राप्त हो जाता है ।
परन्तु सूर्यं की गति यदि ६०” से अधिक हुई तो यह सारिणी काम नहीं देगी ।
“क्योंकि यह सारिणी ६० के अंक के आधार पर वनी है । इस कारण ६० से अधिक
“गति में पहिले बताये हुए गणित द्वारा निकाल लेना अर्थात् अंतर की विकला में गति
की विकला बनाकर गति का भाग देने से यह इष्ट समय चालत का प्राप्त हो
जाता है । उदाहरण
(१) द्वितीय मास प्रवेश का सारिणी अंक
(पंक्ति-इष्ट) अंतर १'-३८=१-५६५०७६४ इस शेष के समीप का कुछ
सूर्यगति=५८-३२=०-०१९७४८० बड़ा सारिणी अंक
=१-५५४३२८४ १.५५६३०२५ मिला ।
इसके ऊपर १ और नीचे वाजू से ४०=चालन १ घ० ४० प० हुआ ।
१४८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्ष फल खण्ड
(३) तृतीय मास प्रवेश का
(इष्ट-पंदित) अंतर-०“-६”-२-७७८१५१२ समीप का कुछ बड़ा अंक
गति=५७-३६=०-०१७७२८८ २.७७८१५१२=२ घ० ६ प०
शेष=२-७६०४२२४
(३) चतुथं मास प्रवेश का
(इष्ट सूर्य-पंक्ति) अंतर २७-१४-०-३३३ ५८१३ शेप के समीप का कुछ बड़ा बंक
गति ५७-३ =०-०२१८९५६ ०:३२१७३४२=२८घ. ३६१.
शेष =०-३२१६८५८
(४) पंचम मास प्रवेश का ८
. (सूर्य इष्ट-पंवित)- ६-९-०"९८९२७६१ शेष के समीप का कुछ बड़ा अंक
गति-५७-५८-०"०२१६४१९ ०"९६८५९१५-६घ० २७१०
| दोष-०'९६७६३४२
(५) षष्ठ मास प्रवेश का - र
(इष्ट सूर्य-पंकिति)=२९-२६=०३०९३११८ शेष के समीप का कुछ बड़ा अंक
. गति=५७-४४०:०१६७२४६ ०.२९२६६६४-३०घ० २३प०
४; शेष=०"२९२५८७२
(६) सप्तम मास प्रवेश का. : * -
(इष्ट सूर्य-पंक्ति)-२५-२३-०"३७०७६०३ शेष के समीप का कुछ बड़ा अंक
गति-५८-ढ ३८० ००९३८९९ ०३६१५१०७-२६घ० ६प०
शेष--०"३६१२७०४
(७) अष्टम मास प्रवेश का
(पंक्ति-सूर्यं इष्ट) १४- ५८०.६२९४८४५८ शेष के समीप का
गति ५९-५४--०"०००७२४४ कुछ बडा अंक
झेष=०.६२८७२१४ ०६२८९३२१
अ रघ. प.
१४-६
नवम, दशम, एकादश एवं द्वादश मास प्रवेश में सूर्य की गति ६० से अधिक होने
से यह सारिणी काम नहं देगी ।
यदि भाज्य मंतर से भाजक गति अल्प हो तो उसकी दूसरी रीति है। जव
भाजक गति, अंतर से छोटा हो तो अंतर भाज्य में से भाजक गति को घटा देना ।
जितने बार घट सके उतने दिन होंगे और शेष के सारिणी अंक में भाजक का सारिणी
अंक घटाने पर जो मंक प्राप्त हो सारिणी में उस शेष के समीप का जो उससे कुछ
बड़ा अंक सारिणी में मिले उसे लेना ओर उससे जो घड़ी पल प्राप्त हो वह लेना ।
मास प्रवेश साधन का उदाहरण : १४९
जितनी' बार गति घट जाय उतने दिन और इतने घड़ी पल उत्तर चालन प्राप्त
हुआ । उदाहरण--
मान लो पंक्ति और इष्ट का अंतर भाज्य ५७८४ है और सूर्य की गति भाजक
छोटा ५६-३० है ।
यहाँ ५७-४ में भाजक ५६-३० घटायो=१ वार घटा=१ दिन ५
मंतर ५७-४ शेष ०-३४=२०१४८२२६ इसके समीप का कुछ बड़ा
गति ५६-३० गति५६-३०=००२६१०२८ अंक=२.०००००००
शेष ०-३४ शेष=१.९९८७२०८ घ. प.
घ. प, ०-३६
यहाँ १ बार घटाया था तो १ दिन ओर ०-३६ चालत प्राप्त हुआ ।
यहाँ गति और छोटी होती तो अंतर से घटाने पर जो दोष बचता है यदि वहू
गति से बड़ी बचती तो पहिले घटाये हुए शेप में फिर उसी गति को घटाना बारंबार
घटाते जाना जब तक कि दोष अंक गति से छोटा अंक न प्राप्त हो जाय । यहाँ
जितनी वार गति घटाई गई उतने दिन और शेष के सारिणी अंक से गति के सारिणी
अंक घटाने पर उससे जो घटी पल प्राप्त हो वह लेना ।
अब इसी उपरोक्त उदाहरण को गणित द्वारा करते हैं--
५७.४ ___३४२४ __दिन घ. प. ३३९०)३४४४(१दिन ५६-३० ३३९० १ ०-३७ ३३९०
३४ > ६०
२०४०(०घड़ी'
१०१७०
२०७००
२०३४० `
३६०
डिप्पणो--पंक्ति के बार के आगे घड़ी पल ०-०दिया है क्योंकि पंक्तिस्थ सूरये
का इष्ट ० है। यदि मिश्र कालीन पंक्ति सूर्ये हो तो वार के आगे मिश्र काळ की
घड़ी पल भी देनी चाहिए ।
प्रत्येक मास प्रवेश का इष्ट निकाल चुके हैं। अब उस इष्ट पर से लग्न सारिणी
के. सहारे लग्न निकाल कर नीचे दिया है । F
ब
१५० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड
मास प्रवेश का इष्ट लग्न दिन समय मुन्था'
घ. प. वि.
(२) द्वितीय मा. प्रवेश ५८-१९-३३ मीन बुधवार चैत्र शुक्ल७ सं० २००२ मकर
(३) तृतीय ,, ०- ६-१५ मेष इतवार वैशाख शुक्ल, , मकर
(४) चतुर्थ ,, २८-३६-२१ वृश्चिक बुधवार ज्येष्ठ शुक्ल १० ,, मकर
(५) पंचम , ६-२७-५१ सिह इतवार आषाढ़ शुक्ल १२ ,, कुम्भः
(६) षष्ठ ,, ३०-३५-२० मकर बुधवार श्रावण शुक्ल १४ ,, कुम्भ
(७) सप्तम ,, २६- ६-३० कुम्भ शनिवार आश्विन कृष्ण १ ,, कुम्भ
(८) अष्टम , ४५-३१-३६ ककं सोमवार कातिक कु० १ ,, कुम्भ
(९) नवम ,, ३४-३८- २ मिथुन बुधवार मार्ग शीषं कृ० २ ,, कुम्भ
(१०) दशम ,, ०-४१- ८ धन शुक्रवार पौष क० ३ „ कुम्भ
(११) एकादश , २०-१०- १ मिथुन शनिवार माघ कु०२ ,, कुम्भ
(१२) द्वादश ,, ५१- २-२३ धनं इतवार फाल्गुन कु० १ ,, कुम्भ
सास प्रवेशा की मुन्या स्पष्ट करना
वर्ष आरम्भ के मुंया स्पष्ट में प्रति मास २॥ अंश जोडते जाने से आगे के मास
की मुंथा स्पष्ट होती है जैसा पहिले बता चुके हैं ।
(१) गत वर्षे ५५-१२=४६-श्ेष ७+ जन्म लग्न ३:१० राशि मुंथा
(२) जन्म लूग्न २रा-२०९-२१” वर्ष प्रवेश के समय मुंथा स्पष्ट
+यताब्द ५५ ९२००-१६-२१” यह प्रथम मास की
१२) ५७-२०-१६-२१(४ मुंथा हुई ।
४८ ड
पोष. ९-३०-१६३१
इसमें २॥ अंश जोड़ा तो दूसरे मास की मुंथा हुई। इसी प्रकार प्रत्येक मास में
२॥ अंशच जोडते जाने से प्रत्येक मास की मुंथा निकळ आयगी जैसा आगे दिया है ।
मुंया स्पष्ट चक्र (प्रत्येक मास प्रवेश के समय का)
मडळ २. ३४ ५ ६ ७ ८ ९ १० ११ १२
सुया मास मास मास मास मास मास मास मास मास मास मास मास
राशि ९ ९ ९ ९ १० १० १० १० १० १० १० १० अंश २० २२ २५ २७ ० २ ५ ७ १० १२ १५ १७ कला १६ ४६ १६ ४६ १६ ४६ १६ ४६ १६ ४६ १६ ४६ विकला २१ २१ २१ २१ २१ २१ २१ २१ २१ २१ २१ २१
SS 305, Mr ar dS 25 ° IS जरा क
मास प्रवेश साधन का उदाहरण : १५१
मुंथा का स्थान लग्न कुण्डली से वर्ष प्रवेश ( ५५ गताव्द ) की कुण्डली में जन्म लग्न कुण्डली वपं लग्न कुंडली ५५ गताब्द की
- (२) द्वितीय मास प्रवेश सं० २००२ चैत्र शुक्ल ७ बुधवार इष्ट ५८-२९-३३ मीन लग्न
मास के ६ अधिकारी
१ जन्म छग्नेश=बुध
र वर्ष , च्युध
३ मास , च्बुध
४ मुंथेश ,, =शनि `
(०2) ५ त्रिराशि पति 52. रात्रि>मीन } न
६ समय पति .. 00 0 ‘~ ` रात्रि चंद्रराशीश }
हे लग्न पर बुध और गुरु की दृष्टि नहीं है। शनि व चंद्र की १० गुप्त बैरा दृष्टि हैं दोनों में शनि बली है तो मासेश शनि हुआ ।
(३) तृतीय मास प्रवेश कुंडली । वैशाख शु० ९ रविवार इष्ट ०-६-१५ मेष लग्न
षड अधिकारी - (१) जन्म र्ने च्बुध
(३) वर्ष , च्बुध (३) मास ,, =मंगल
(४) मुंयेश ,, ऱ्झनि (५) त्रिराशीश छ दिन, भेष इं
(६) समय पति
दिन, सूये, राशीश } ति
केवल शनि की ११ गुप्त वैरा दृष्टि है मर किसी की दृष्टि नहीं है। इससे
मासेश शनि हुआ ।
१५२ :-सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड
(४) चतुर्थ मास प्रवेश की कुण्डली । ज्येष्ठ शु० १० बुधवार २८-३६-३१ वृश्चिक लग्न
84 ५/ षड्धिकारी
१ जन्म लग्नेश=बुध २वर्ष , =बुंध
३ मास ,, =मंगलं ४ मुंयेश ,, शनि
५ त्रिराशीश दिन लग्न वृश्चिक लग्न-मंगल
६ समय पति दिन सूर्य राशीश=्वुध
« लग्न पर किसी. की दष्टि नहीं हैं
जम्म लग्न ३ पर शनि की गुप्त स्नेहा
दृष्टि है । इससे मांसेश शनि हुआ ।
(५) पंचम मास प्रवेश कुंडली । आषाढ़ शु० १२ इतवार इष्ट ६-२७-५१ सिंह लग्न
वळ षडधिकारी
३श,रा| २ वर्षे ,, च्बुध ३ मास ,, स्पूरय.
४ (टा » शनि शर दिन सिह .छग्न-चंद्र ६ समय पति दिन सूर्य राशीश=चंद्र
लग्न पर सूर्य बुध की दृष्टि नहीं है ।
शनि की ३ गुप्त स्नेहा दृष्टि और चंद्र
की ५ प्रत्यक्ष स्नेहा दृष्टि ४५ की है । जों
शनि से बलवान दृष्टि है । इससे मासेश
शनि हुआ । चंद्र मासेश नहीं होगा ।
(६) षष्ठ मास प्रवेश कुण्डली । श्रावण शुक्ल १४ बुधवार इष्ट ३०-३५-२० मकर लग्न ।
षड़धिकारी ` १ जन्म छग्नेश-बुध २ वर्ष ,, च्बुध ३ मास ,, =शनि
४ मुंथेश ,, ¦ =शनि ५ तिराशीश दिन मकर लग्न-मंगल ६ समय पति दिन सूयं राशीश=सूये
लग्न पर शनि और मूर्यं की दृष्टि नहीं है । बुध की प्रत्यक्ष बैरा दृष्टि है
और मंगळ की प्रत्यक्ष स्नेहा दृष्टि है।
बुध मासेश हुआ क्योंकि उसकी ६०” दृष्टि है ।
मास प्रवेश साधन का उदाहरण : १५३
(७) सप्तम मास प्रवेश कुंडली । आदिवन कृ० १ शनिवार इष्ट २६-६-कुंम लग्न
पड़धिकरारी
१ जन्म ळग्नेश=वृघ २:वपं ,,. च्बुध ३ मास ,, =शनि
४ मुंयेश , = शनि ५ त्रिराशीश दिन कुंभ लग्न-गुरु
६ समय पति दिन सूयं राशीश-बुध
केवल बुध की लग्न पर प्रत्यक्ष वैरा
दृष्टि है । मासेश बुध हुआ ।
(८) अष्टम मास प्रवेश कुण्डली । कातिक कृ० १ सोमवार इष्ट ४५-५३-३६ ककं लग्न
३ मास ,, न्चंद्र
४ मुंथेश ,, =षानि ५ त्रिराशिपति रात्रि ककं लग्न=मं गछ
६ समय पति रात्रि चंद्र राशीश=मंगल
लग्ने-पर शनि व मंगळ की दृष्टि
नहीं है । बुध अर र चंद्र की लग्न पर गुप्त
बैरा दृष्टि'है । इसमें चन्द्र बलवान है ।-
चन्द्र मासेश नहीं होगा बुध मासेश होगा ।
(९) नवम मा० प्र० कुण्डली । मार्गशीर्षं कृ० २ बुध वार इष्ट ३४-३८-२ मिथुन लग्न
¥ १ / ` पड़धिकारी न . 4 जन्म रूग्नेश=्बुध
२वर्ष ,, च्बुध ३ मास ,, च्बुध ४ मुंथेश ,, =शनि
५ त्रिराशीश मिथुन लग्न=बुघ ६ समय पति राविऱ्बुध
लग्न पर किसी की दृष्टि नहीं है ।
जन्म लग्न को भी कोई नहीं देखता
इससे मुधेश शनि मासेश हुआ ।