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साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

[मुद्रा (Seal):] ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान सम्पादकीय विभाग शान्ति कुंज, हरिद्वार

[हस्तलिखित:] २६/१०५

(इस पृष्ठ पर कोई पाठ्य सामग्री नहीं है / पृष्ठ रिक्त है। केवल एक अस्पष्ट पुस्तकालय की मुहर अंकित है।)

॥ श्रीः ॥
चौखम्बा सुरभारती ग्रन्थमाला

श्रीसाम्बपुराणम्

भाषाटीकासहितम्

भाषाभाष्यकारः
श्री एस० एन० खण्डेलवाल

चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन
वाराणसी

© सर्वाधिकार सुरक्षित। इस प्रकाशन के किसी भी अंश का किसी भी रूप में पुनर्मुद्रण या किसी भी विधि (जैसे-इलेक्ट्रोनिक, यांत्रिक, फोटो-प्रतिलिपि, रिकॉर्डिंग या कोई अन्य विधि) से प्रयोग या किसी ऐसे यंत्र में भंडारण, जिससे इसे पुनः प्राप्त किया जा सकता हो, प्रकाशक की पूर्वलिखित अनुमति के बिना नही किया जा सकता है।


ISBN : 978-93-81484-04-3

प्रकाशक :
चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन
(भारतीय संस्कृति एवं साहित्य के प्रकाशक तथा वितरक)
के 37/117 गोपाल मंदिर लेन, पोस्ट बॉक्स न. 1129
वाराणसी-221001
दूरभाष : (0542) 2335263

© सर्वाधिकार प्रकाशकाधीन
प्रथम संस्करण : 2012
मूल्य : 600.00

अन्य प्राप्तिस्थान :
चौखम्बा पब्लिशिंग हाउस
4697/2, भू-तल (ग्राउण्ड फ्लोर)
गली न. 21-ए, अंसारी रोड़, दरियागंज
नई दिल्ली-110002
दूरभाष: (011) 32996391, टेलीफैक्स: (011) 23286537

*
चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान
38 यू. ए. बंगलो रोड़, जवाहर नगर,
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*
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चौक (बैंक ऑफ बड़ोदा भवन के पीछे)
पोस्ट बॉक्स न. 1069, वाराणसी-221001

मुद्रक
डीलक्स ऑफसेट प्रिंटर्स, दिल्ली

[मुद्रा/सील: ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान, सम्पादकीय विभाग, शान्ति कुञ्ज, हरिद्वार]

निवेदन

अखिल ब्रह्माण्डनायक श्रीकृष्ण की अहैतुक लीला का एक विचित्र आयाम साम्बपुराण में अंकित है। साम्ब श्रीकृष्ण के पुत्र थे। उनकी पट्टमहिषियों में से अन्यतम जाम्बवती के पुत्र अनुपम रूपराशि के स्वामी होकर भी वे अदृष्टवशात् कुष्ठरोग से आक्रान्त हो गये। वे श्रीकृष्ण द्वारा ही शापित होकर इस दुर्गति को प्राप्त हुये थे। यह भगवान् के कठोर शासन का ही एक रूप है, जहाँ अपने प्रिय पुत्र को भी उन्होंने इतना कठोर दण्ड प्रदान किया।

इस शाप से मुक्ति-हेतु देवर्षि नारद की शरण में जाने पर उन्हें सूर्य की उपासना का उपदेश मिला। तन्त्र के ग्रन्थ साम्बपञ्चाशिका में भी यह वृत्तान्त वर्णित है; लेकिन उसमें साम्बपुराण की तरह बाह्य प्रक्रियात्मक उपासना न होकर स्वात्मदेवतारूप सूर्य की अभेद-रूप अद्वय भक्ति का, अहंविमर्शात्मक पराभक्ति का स्वरूप प्रत्यक्षीभूत होता है, जो शाक्तोपाय की चरम स्थिति है। लेकिन वह सर्वजनग्राह्य अथवा सबके मलिन चित्तमुकुर पर प्रतिच्छवित हो सकने वाली स्थिति नहीं है। पराहंतारूप विमर्श के लाखों करोड़ों में एकाध ही अधिकारी हो सकते हैं। जनसामान्य के लिये वह मार्ग सर्वदा अगोचर ही है। अतः साम्बपुराण के रूप में उसी उपासना का सार्वजनीन रूप प्रस्तुत किया गया है, जो सर्वजन-सुलभ है तथा अज्ञानी जीव भी उस मार्ग का अनुसरण करके क्रमशः अग्रसर हो सकते हैं।

आजकल बिहार में जिस ‘छठ पूजा’ का विशेष महत्त्व माना जाता है, उसका उत्स इसी साम्बपुराण में ही है। षष्ठी-पूजन तथा व्रत के अपूर्व माहात्म्य का इस पुराण में विशेष वर्णन प्राप्त होता है—

एकहारपरो भूत्वा षष्ठ्यां योऽर्चयते रविम्।
नियमव्रतधारी च रवेर्भक्तिसमन्वितः।
सप्तम्यां च महाप्राज्ञः सोश्वमेधफलं भवेत्।
अहोरात्रोपवासेन पूजयेद्यस्तु भास्करम्।
सप्तम्यामथ षष्ठ्यां च सूर्यलोकं स गच्छति।। (अध्याय-३८)

जो षष्ठी के दिन एक बार ही आहार करके सूर्यार्चन करते हैं और सप्तमी को भक्तिभाव से व्रतपालन करते हैं, वे अश्वमेध का फल प्राप्त करते हैं। जो सप्तमी अथवा षष्ठी को अहोरात्र उपवासोपरान्त सूर्योपासना करते हैं, उन्हें सूर्यलोक में स्थान मिलता है।

(४)

उपवासेन षष्ठ्यां च सर्वपापैः प्रमुच्यते।
प्रणिधाय शिरो भूम्यां नमस्कारं करोति यः।। (अध्याय-३८)

सूर्यषष्ठी के दिन उपवास द्वारा सभी पापों से मुक्ति मिलती है। साम्बपुराणोक्त यही सूर्यषष्ठी व्रत परम्परागत रूप से बिहार में विशेष रूप से सम्पन्न किया जाता है, जो सर्वथा शास्त्रोक्त है।

इस पुराण की विशेषता यह है कि इसके साधन-विधान की कई श्रेणियाँ हैं। इसमें वैदिक रीति से उपासना के अतिरिक्त तन्त्रोक्त सूर्योपासना का स्वरूप भी दृष्टिगोचर होता है।

मातृका-विज्ञान की साधना से शरीर-साधन का जो प्रसङ्ग इसमें वर्णित है, उसका रहस्यमय स्वरूप इस पुराण के ६१वें अध्याय में दृष्टिगोचर होता है। साथ ही रोगापनयन, मारणाभिचार, देहगत रोग-चिकित्सा आदि प्रकरणों के अध्ययन से इस पुराण का तान्त्रिक स्वरूप प्रतिपन्न हो जाता है। यह ग्रन्थ सूर्योपासकों के लिये अत्यन्त महत्त्वपूर्ण तथा अनुकरणीय है।

सूर्यषष्ठी सन् २०११ ई
एस. एन. खण्डेलवाल

अध्यायानुक्रमः

अध्याया:पृष्ठाङ्का:अध्याया:पृष्ठाङ्का:
प्रथमोऽध्याय:१अष्टाविंशोऽध्याय:१३९
द्वितीयोऽध्याय:५एकोनत्रिंशोऽध्याय:१४३
तृतीयोऽध्याय:९त्रिंशोऽध्याय:१४७
चतुर्थोऽध्याय:१७एकत्रिंशोऽध्याय:१५२
पञ्चमोऽध्याय:२१द्वात्रिंशोऽध्याय:१५६
षष्ठोऽध्याय:२७त्रयस्त्रिंशोऽध्याय:१६५
सप्तमोऽध्याय:३१चतुस्त्रिंशत्तमोऽध्याय:१६८
अष्टमोऽध्याय:४१पञ्चत्रिंशोऽध्याय:१७७
नवमोऽध्याय:४४षट्त्रिंशत्तमोऽध्याय:१८०
दशमोऽध्याय:५२सप्तत्रिंशत्तमोऽध्याय:१८७
एकादशोऽध्याय:५५अष्टत्रिंशत्तमोऽध्याय:१९२
द्वादशोऽध्याय:६४एकोनचत्वारिंशत्तमोऽध्याय:२००
त्रयोदशोऽध्याय:६८चत्वारिंशत्तमोऽध्याय:२१०
पञ्चदशोऽध्याय:७५एकचत्वारिंशत्तमोऽध्याय:२१६
षोडशोऽध्याय:७९द्विचत्वारिंशत्तमोऽध्याय:२२१
षोडशोऽध्याय:७९त्रिचत्वारिंशत्तमोऽध्याय:२२६
सप्तदशोऽध्याय:८४चतुश्चत्वारिंशत्तमोऽध्याय:२३४
अष्टादशोऽध्याय:८७पञ्चचत्वारिंशत्तमोऽध्याय:२४५
एकोनविंशोऽध्याय:९६षट्चत्वारिंशत्तमोऽध्याय:२५०
विंशोऽध्याय:१००सप्तचत्वारिंशत्तमोऽध्याय:२५६
एकविंशोऽध्याय:१०४अष्टचत्वारिंशत्तमोऽध्याय:२५९
द्वाविंशोऽध्याय:११२एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्याय:२६३
त्रयोविंशोऽध्याय:११६पञ्चाशत्तमोऽध्याय:२६५
चतुर्विंशोऽध्याय:१२२एकपञ्चाशत्तमोऽध्याय:२६९
पञ्चविंशोऽध्याय:१२७द्विपञ्चाशत्तमोऽध्याय:२९७
षड्‌विंशोऽध्याय:१२९त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्याय:३०१
सप्तविंशोऽध्याय:१३६चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्याय:३०३

(६)

अध्यायाःपृष्ठाङ्काःअध्यायाःपृष्ठाङ्काः
पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः३०४सप्ततितमोऽध्यायः३६६
षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः३१९एकसप्ततितमोऽध्यायः३६७
सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः३२१द्विसप्ततितमोऽध्यायः३६९
अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः३२४त्रिसप्ततितमोऽध्यायः३७०
एकोनषष्टितमोऽध्यायः३२५चतुःसप्ततितमोऽध्यायः३७२
षष्टितमोऽध्यायः३२६पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः३७६
एकषष्टितमोऽध्यायः३२८षट्सप्ततितमोऽध्यायः३७८
द्विषष्टितमोऽध्यायः३४०सप्तसप्ततितमोऽध्यायः३८१
त्रिषष्टितमोऽध्यायः३४३अष्टसप्ततितमोऽध्यायः३८४
चतुःषष्टितमोऽध्यायः३४५एकोनाशीतितमोऽध्यायः३८६
पञ्चषष्टितमोऽध्यायः३४९अशीतितमोऽध्यायः३८८
षट्षष्टितमोऽध्यायः३५१एकाशीतितमोऽध्यायः३९०
सप्तषष्टितमोऽध्यायः३५३द्व्यशीतितमोऽध्यायः३९५
अष्टषष्टितमोऽध्यायः३५५त्र्यशीतितमोऽध्यायः३९८
एकोनसप्ततितमोऽध्यायः३६२चतुरशीतितमोऽध्यायः४०३

॥ श्रीः ॥

श्रीसाम्बपुराणम्

भाषाटीकासहितम्


प्रथमोऽध्यायः

मङ्गलाचरणम्

नमः सवित्रे जगदेकचक्षुषे जगत्प्रसूतिस्थितिनाशेहेतवे ।
त्रयीमयाय त्रिगुणात्मधारिणे विरिञ्चिनारायणशङ्करात्मने ॥१॥
समस्तप्राणदेहाय सदा विशुद्धबुद्धये ।
त्रयीमयाय देवाय नमो लोकैकसाक्षिणे ॥२॥

मङ्गलाचरण— जगत् के एकमात्र चक्षुस्वरूप, विश्व की सृष्टि-स्थिति तथा विनाश के कारण, त्रयीमय (ऋक्, यजुः, सामवेदात्मक), त्रिगुणरूप—ब्रह्मा, नारायण तथा शंकरस्वरूप (रजोगुण = ब्रह्मा। सत्त्वगुण = नारायण। तमोगुण = शंकर) प्रकटित सविता देव को नमस्कार है।

सबके प्राण तथा देहरूप, सर्वदा विशुद्ध बुद्धियुक्त, सकल लोकसमूह के एकमात्र साक्षी, त्रयीमय देवता को नमस्कार है॥१-२॥

पितामहाय कृष्णाय योगिनेऽव्यक्तरूपिणे ।
भूतभव्यभविष्याय विश्वसंसृष्टये नमः ॥३॥

योगी, अव्यक्तरूपी, भूत-भविष्यत्-वर्त्तमान में भी स्थायी, विश्वसृष्टि करने वाले पितामह कृष्ण को (कृष्णद्वैपायन व्यास को) नमस्कार है (धृतराष्ट्र आदि के जन्म के कारण होने से इन्हें पितामह कहा जाता है)॥३॥

नमस्तस्मै मुनीशाय सन्नताय तपस्विने ।
शान्ताय वीतरागाय तस्मै ज्ञानात्मने नमः ॥४॥

उन प्रसिद्ध मुनीश्वर को नमस्कार है। वे सज्जनों द्वारा प्रणम्य हैं। तपस्वी, शान्त तथा विरक्त ज्ञानस्वरूप को नमस्कार है॥४॥

नमस्तस्मै विधात्रे च स्वव्यक्तप्रभवाय च ।
भूतसंहारतिग्माय भास्कराय गभस्तिने ॥५॥

२ | श्रीसाम्बपुराणम्

उन विधाता, अपने प्रकाश द्वारा प्रभाव-विस्तारकारी, प्राणिगण के संहारार्थ रश्मि-प्रकाशक तेजस्वी सूर्य को नमस्कार है॥५॥

शक्रो वह्निर्यमो रक्षो वरुणोऽथ समीरणः।
धनदश्चेश्वरश्चैव अध ऊर्ध्वं तथैव च।
ये दिशो व्याप्य तिष्ठन्ति तस्मै सर्वात्मने नमः ॥६॥

जो इन्द्र, अग्नि, यम, राक्षस, वरुण, वायु, कुबेर तथा ईश्वररूप से ऊर्ध्व अधः सभी दिशाओं को व्याप्त करके स्थित हैं, उन सर्वात्मस्वरूप सूर्य को नमस्कार है॥६॥

उद्देशानुक्रमणिकाकथनम्

शौनको नैमिषारण्ये पुरा सूतमपृच्छत।
सत्रे द्वादशवार्षिक्ये गते काले च विश्रुते ॥७॥

**अनुक्रमणिका कथन—**पूर्वकाल में नैमिषारण्य क्षेत्र में द्वादशवार्षिक यज्ञ में अधिक समय व्यतीत हो जाने पर शौनक ऋषि ने सूत से इस प्रकार जिज्ञासा की॥७॥

एतस्मिन्नन्तरे काले कथामेतामपृच्छत।
त्वयात्र कथिताः सूत पुराणा बहुविस्तराः ॥८॥
षण्मुखस्य कथा चादौ पुनर्ब्रह्माण्डमेव च।
वायुनापि च यत् प्रोक्तं तथा सावर्णिकेन च ॥९॥
मार्कण्डेयेन यत् प्रोक्तं यद् वैशम्पायनेन च।
दधीचिना च यत् प्रोक्तं यच्च सर्वेण भाषितम् ॥१०॥
हरिणांपि च यत् प्रोक्तमृषिभिः समुदाहृतम्।
बालखिल्यैश्च यत्प्रोक्तं यच्छ्रुतं चर्षिभिः सह ॥११॥

उन्होंने जिज्ञासा किया कि हे सूत! अपने बहुत विस्तृत पुराणों को कहा है। प्रथमतः कार्तिकेय की कथा, तदनन्तर ब्रह्माण्ड की कथा एवं वायु तथा सावर्णि (सूर्यपुत्र) मनु की कथा भी कही। जिसे मार्कण्डेय, वैशम्पायन, दधीचि तथा शर्व (महादेव) ने कहा था, उसे भी कहा। जो हरि ने कहा तथा ऋषियों द्वारा जो कहा गया, बालखिल्यगण ने जो कहा था तथा ऋषियों से जो सुना, वह सब आपने कहा॥८-११॥

हरिपुत्रकृतं चात्र न त्वया कथितं मुने।
न मे कर्णसुखं मौनं प्रीणात्यमृतसस्मितम् ॥१२॥

हे मुने! किन्तु अपने हरिपुत्र साम्बकृत कुछ भी नहीं कहा, जो हमारे कर्णसुखकर मन के लिये प्रीतिकर नहीं है॥१२॥

भास्करस्य पुराणं यत् पृष्टं साम्बेन धीमता।
तदेतद्द्वादशाकारं न तु त्रिंशार्धमूर्तिकम् ॥१३॥

प्रथमोऽध्यायः ३

प्रथमोऽध्यायः ३

पुराणमखिलं चात्र सर्वशास्त्रप्रतिष्ठितम्।
कथयस्व महाभाग यथावच्छ्रुतवानसि ॥१४॥

धीमान् साम्ब ने भास्कर से जिस पुराण की जिज्ञासा की थी, वह द्वादशाकार (विवस्वान्, अर्यमा, पूषा, त्वष्टा, सविता, भग, धाता, विधाता, वरुण, मित्र तथा उरुक्रम—यह द्वादश नामधारी सूर्य) अथवा पञ्चदश मूर्ति (तीस का आधा) से युक्त नहीं है। जिसमें समग्र पुराण तथा सर्वशास्त्र प्रतिष्ठित है, उसे मुझसे कहिये, जैसा कि आपने सुना था॥१३-१४॥

सूत उवाच
प्रश्नभारो महानेष यथा वदसि सुव्रत।
यन्महाभारताख्यानाद् बह्वर्थं श्रुतिविस्तरात् ॥१५॥

सूत कहते हैं—हे सुव्रत! आप जैसा कहते हैं, वह महत् विस्तृत प्रश्न है। यह विस्तार से श्रवण करने के योग्य है। यह महाभारत के आख्यान से भी अधिक अर्थयुक्त है॥१५॥

पुराणानां च सर्वेषां प्रवरः प्रश्न उत्तरः।
कथाश्च विविधाश्चित्राः पुराणाः सम्प्रतिष्ठिता ॥१६॥

समस्त पुराणों में श्रेष्ठ यह पुराण प्रश्नोत्तर तथा अनेक कथायुक्त है तथा अनेक प्रकार के विचित्र पुराण इसमें सम्प्रतिष्ठित हैं॥१६॥

वेदार्थस्मृतिसाराणि वर्णधर्माश्रयाणि च।
भूतं भव्यं भविष्यं च मन्त्रवादस्तथैव च ॥१७॥

इसमें वेदार्थ तथा स्मृति का सार है तथा वर्णाश्रम धर्म का आश्रय लिया गया है। अतीत-वर्त्तमान तथा भविष्यद् मन्त्रवाद भी इसमें समाहित हैं॥१७॥

वश्याकर्षणविद्वेषस्तम्भनोच्चाटनादिकम् ।
प्रतिमालक्षणञ्चैव पूजावासविधानकम् ॥१८॥
मण्डलानि क्रियायागाः सिद्धियागाश्च साधनम्।
महामण्डलयागाश्च सान्निध्यं द्वादशात्मनः ॥१९॥
भूमेर्वा तोषणं चैव पुष्पधूपविधिस्तथा।
सप्तमीकरणं चैव उपवासविधिस्तथा ॥२०॥
प्रोक्षणं यच्च दानस्य फलं यच्च प्रकीर्त्तितम्।
वेलाकालविधानञ्च यच्च धर्मविधिस्तथा ॥२१॥
धूपकर्मविधिश्चैव जयस्यापि तथा विधिः।
प्रयताप्रयतस्यैव तथा स्वप्नानुवर्णनम् ॥२२॥

४श्रीसाम्बपुराणम्

प्रायश्चित्तविधानञ्च तथाचार्यस्य लक्षणम्।
दीक्षां सर्वशिष्याणां मन्त्रेणापि विनिश्चयः ॥२३॥
स्तवाश्च विविधाश्चैवं यस्मिन् ग्रन्थे समासतः।
भविष्यन्ति यथान्यायमाधाय विविधाश्रयाः ॥२४॥

इति श्रीसाम्बपुराणे उद्देशानुक्रमणिकाकथनं नाम प्रथमोऽध्यायः


वशीकरण, आकर्षण, विद्वेषण, स्तम्भन, उच्चाटनादि एवं प्रतिमालक्षण, पूजागृह-विधान, मण्डल, क्रियायाग, सिद्धियाग साधन, महामण्डल याग एवं द्वादशात्मक सूर्य का सान्निध्य, भूमि का तोषण, पुष्प तथा धूपविधि, सप्तमी की विशेष पूजाविधि तथा उपवासविधि कही गयी है। प्रोक्षण (यज्ञार्थ मन्त्रों से शुद्ध किया गया मांसादि) तथा दान का फल भी कहा गया है। वेलाकाल विधान (जिस काल में जिस कार्य को करना होता है) एवं धर्मविधि भी वर्णित है। धूपदान की विधि, जय-प्राप्ति का विधान, संयम, असंयम तथा स्वप्न-वृत्तान्त (स्वप्न-दर्शन का शुभा शुभ फल) भी वर्णित है।

प्रायश्चित्त-विधान, आचार्य-लक्षण, सकल शिष्य-दीक्षा तथा किसके लिये कौन-सा मन्त्र उपयोगी है? इसका निश्चय किया गया है। ग्रन्थ में विविध स्तव भी संक्षेप में कहे गये हैं। यथायथ रूप से भी नाना विधि से विषय का सन्निवेश किया गया है (ऐसा यह साम्बपुराण है)॥१८-२४॥

श्री साम्बपुराण का उद्देशानुक्रमणिका-कथन नामक प्रथम अध्याय समाप्त

द्वितीयोऽध्यायः

(आदित्यमहिमा)

सूत उवाच
वसिष्ठं स्वस्थमासीनं मुनिराजं बृहद्वलः।
रघुवंशोद्भवोऽपृच्छद् गुरुं निःश्रेयसं परम्॥१॥

सूत कहते हैं—रघुवंशोद्भूत राजा बृहद्वल आसन पर आसीन ऋषिश्रेष्ठ अपने गुरु वशिष्ठ से परम निःश्रेयस् की जिज्ञासा करते हैं॥१॥

भगवन् श्रोतुमिच्छामि परं ब्रह्म सनातनम्।
यस्मिन्न पुनरावृत्तिं प्राप्नुवन्ति मनीषिणः॥२॥

हे भगवन्! सनातन परब्रह्म की बात सुनने की इच्छा करता हूँ; जहाँ जाने पर मनीषीगण पुनः जन्मग्रहण नहीं करते॥२॥

गृहस्थो ब्रह्मचारी वा वानप्रस्थोऽथ भिक्षुकः।
य इच्छेन्मोक्षमास्थातुं देवतां कां यजेत्तु सः॥३॥

गृहस्थ, ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ अथवा भिक्षुक (संन्यासी) इत्यादि को मोक्षाभिलाषी होने पर किस देवता की अर्चना करनी चाहिये?॥३॥

कुतो ह्यस्य ध्रुवः स्वर्गः कुतो निःश्रेयसं परम्।
स्वर्गतश्चैव किं कुर्याद् येन न च्यवते पुनः॥४॥
देवतानां हि को देवः पितृणामपि कः पिता।
यस्मात् परतरं नास्ति तस्मै ब्रूहि महामुने॥५॥

मोक्ष चाहने वालों का स्थिर स्वर्ग कहाँ है? परम मंगल कहाँ है? स्वर्ग जाने हेतु क्या करना चाहिये, जिससे कि वहाँ से पतन न हो। देवताओं का कौन देव है? पितृगणों का कौन पिता है, जिससे पर (श्रेष्ठ) कोई नहीं है, हे महामुने! वह मुझसे कहिये॥४-५॥

कुतः सृष्टमिदं ब्रह्मन् विश्वं स्थावरजङ्गमम्।
प्रलयश्च कमभ्येति तद्भवान् वक्तुमर्हसि॥६॥

हे ब्रह्मन्! कहाँ से यह स्थावर-जंगम विश्व सृष्ट हुआ है तथा प्रलय के समय किसका आश्रय लेकर स्थित रहता है? यह आप बतायें॥६॥

६ श्रीसाम्बपुराणम्

वशिष्ठ उवाच

उद्यन् पश्यन् हि कुरुते जगद् वितिमिरं करैः ।
नातः परतरो देवः कश्चिदन्यो नराधिपः ॥७॥

वशिष्ठदेव कहते हैं—जो उदित होकर देखते-देखते ही अपने कर से (किरणों से) जगत् को वितिमिर (अन्धकाररहित) कर देते हैं, हे नराधिप! उनसे परतर कोई भी देवता नहीं है।।७।।

अनादिनिधनो ह्येष पुरुषः शाश्वतोऽव्ययः ।
तापयत्येष लोकांस्त्रीन् भ्रमन् रश्मिभिरुल्बणैः ॥८॥

यह पुरुष आदि-अन्तरहित है। शाश्वत तथा अव्यय है। ये भ्रमण करते-करते अपनी तीक्ष्ण रश्मियों से त्रिभुवन को तापित कर देते हैं।।८।।

सर्वदेवात्मको ह्येष तपसां चानुभावनः ।
सर्वस्य जगतो नाथः कर्मसाक्षी विभावसुः ॥९॥

ये ही सर्वदेवात्मक, तपस्या के अनुभावक, जगत् के नाथ, कर्म के साक्षी तथा प्रभा से युक्त हैं।।९।।

संक्षिपत्येष भूतानि तथा विसृजते पुनः ।
एको भाति तपत्येष कर्षते च गभस्तिभिः ॥१०॥
एष धाता विधाता च भूतानिर्भूतभावनः ।
न ह्येष क्षयमायाति नित्यमक्षयमण्डलः ॥११॥

ये ही समस्त प्राणियों का विनाश करते हैं और पुनः उनकी सृष्टि करते हैं। अकेले प्रकाशित होते हैं, ताप देते हैं तथा रश्मियों द्वारा आकर्षण करते हैं। ये ही धारणकर्त्ता तथा सृष्टिकर्त्ता हैं। समस्त प्राणियों के आदि तथा सभी के उत्पादक हैं। इनका कोई क्षय नहीं है। ये नित्य अक्षय (अविनश्वर) मण्डल में अवस्थित हैं।।१०-११।।

पितॄणां हि पिता ह्येष देवानामेष देवता ।
ध्रुवं स्थानं भजन्नेष यस्मान्न च्यवते पुनः ॥१२॥
सर्गकाले जगत् कृत्स्नमादित्यात् सम्प्रसूयते ।
प्रलये च तमे भाति आदित्यं दीप्ततेजसम् ॥१३॥

ये ही पितृगण के पिता एवं देवताओं के भी देवता हैं। ये ध्रुव (स्थिर) स्थान में अवस्थान करते हैं। उससे इनकी विच्युति नहीं होती। सृष्टिकाल में समस्त जगत् आदित्य से ही उत्पन्न होता है और प्रलय में यह दीप्ततेजा आदित्य में ही प्रवेश कर जाता है।।१२-१३।।

द्वितीयोऽध्यायः ७

द्वितीयोऽध्यायः ७

योगिनश्चान्ते सांख्याश्च देहं त्यक्त्वा पुरातनम्। संशुद्धास्तु विशन्त्यस्मिंस्तेजोराशौ दिवाकरे ॥१४॥

अन्तकाल में योगीगण तथा सांख्यगण पुरातन देह का त्याग करके सम्यक् शुद्ध होकर इस तेजोराशि दिवाकर में ही प्रविष्ट हो जाते हैं।।१४।।

अस्य रश्मिसहस्राणि शाखा इव विहङ्गमाः। वसन्त्राश्रित्य मुनयः ससिद्धा दैवतैः सह ॥१५॥

जैसे पक्षीगण शाखा का सहारा लेकर निवास करते हैं, उसी प्रकार इस सूर्यरश्मिरूपी शाखा का अवलम्बन लेकर सिद्ध मुनिगण देवताओं के साथ वास करते हैं।।१५।।

गृहस्था जनकाद्याश्च राजानो योगधार्मिकाः। बालखिल्यादयश्चैव ऋषयो ब्रह्मचारिणः ॥१६॥ वानप्रस्थाश्च वर्णाद्या भिक्षुः पञ्चशिखस्तथा। योगमास्थाय ते सर्वे प्रविष्टाः सूर्यमण्डले ॥१७॥

गृहस्थ, जनकादि योगधर्माश्रित राजागण, बालखिल्यादि मुनिगण, ऋषिगण, ब्रह्म-चारीगण, वानप्रस्थावलम्बीगण, वर्णश्रेष्ठ ब्राह्मणगण, पञ्चशिख (मुनिगण) तथा संन्यासी गण—सभी योग का अवलम्बन लेकर सूर्यमण्डल में ही प्रविष्ट होते हैं।।१६-१७।।

विशेष—पञ्चशिख = कपिल के शिष्य आसुरि तथा उनकी पत्नी कपिला ने एक बालक को तत्त्वज्ञानोपदेश दिया था। यही बालक पञ्चशिख कहलाया। इसने २२ सूत्रात्मक तत्त्वमास ग्रन्थ से षष्टितन्त्र का प्रणयन किया था।

शुको व्यासात्मजः श्रीमान् योगधर्ममवाप्य सः। आदित्यकिरणान् पीत्वा ह्यपुनर्भवमास्थितः ॥१८॥

व्यासपुत्र शुकदेव ने योगधर्म का अवलम्बन करके सूर्यकिरण का पान करते हुये अपुनर्भव (जिससे पुनरागमन न हो, ऐसा मोक्ष) प्राप्त किया था।।१८।।

शब्दमात्रश्रुतिमुखा ब्रह्मविष्णुशिवादयः। प्रत्यक्षोऽयं परो देवः सूर्यस्तिमिरनाशनः ॥१९॥ तस्मादन्यत्र भक्तिर्हि मा कार्या शुभमिच्छता। दृष्टेन बाध्यते यस्माददृष्टं नित्यमेव हि ॥२०॥ त्वयातः सततं राजन्नभ्यर्च्यो भगवान् रविः। स हि माता पिता चैव कृत्स्नस्य जगतो गुरुः ॥२१॥

इति श्रीसाम्बपुराणे आदित्यमहिमा नाम द्वितीयोऽध्यायः

८ श्रीसाम्बपुराणम्

ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदि देवताओं को केवल श्रुति में (शब्दों में सुना जाता है, देखा नहीं जा सकता) सुना गया है; किन्तु सूर्य तो प्रत्यक्षरूपेण अन्धकार के नाशक परम देवता हैं। इसीलिये शुभ चाहने वाले लोगों के लिये अन्यत्र भक्ति करनी उचित नहीं है। जिन्हें प्रत्यक्ष नहीं देखा जा सकता, उन ब्रह्मादि देवगण की अप्रत्यक्ष में अनिश्चयता विद्यमान है। अतएव हे राजन्! तुम सर्वदा भगवान् सूर्य की आराधना करो। ये ही सम्पूर्ण जगत् के माता-पिता तथा गुरु भी हैं।।१९-२१।।

श्रीसाम्बपुराण का आदित्य-महिमा नामक द्वितीय अध्याय समाप्त

तृतीयोऽध्यायः

(साम्बशापः)

बृहद्वल उवाच

आद्यं स्थानं रवेः कुत्र कस्मिन् द्वीपे महामुने ।
यत्र पूजां विधानोक्तां प्रतिगृह्णात्यसौ स्वयम् ॥१॥

साम्ब को शाप—बृहद्वल पूछते हैं—हे महामुने! रवि का प्रथम पूजास्थान कहाँ है, जहाँ वे प्रथम बार पूजित हुये हैं। किस द्वीप में वे स्वयं यथाविधि की गई पूजा को ग्रहण करते हैं॥१॥

वशिष्ठ उवाच

चन्द्रभागातटे रम्ये पुरं यत् साम्बसंज्ञितम् ।
भूर्लोके शाश्वतं स्थानं तत्र सूर्यस्य नित्यता ॥२॥
प्रीत्या साम्बस्य तत्रार्को जगतोऽनुग्रहाय च ।
स्थितो द्वादशभोगेन मित्रो मैत्रेण चक्षुषा ॥३॥

वशिष्ठ मुनि कहते हैं—पृथ्वी पर चन्द्रभागा नदी के तट पर साम्ब नामक एक पुरी है। वह शाश्वत स्थान है, जहाँ सूर्य की नित्यता है (नित्य विद्यमानता है)। वहाँ सूर्य साम्ब से प्रीति के कारण तथा जगत् पर अनुग्रहार्थ बन्धु के समान दृष्टि के साथ द्वादश भाग में विराजित हैं॥२-३॥

विशेष—चन्द्रभाग हिमालय का एक अंश है। वहाँ से उत्पन्न नदी है—चन्द्रभागा नामक काश्मीर देशीय नदी। यहाँ स्नान करके चन्द्र दक्षशाप से मुक्त हो गये थे। वर्तमान में इसे चेनाब नदी कहते हैं। वेदों में यही असिक्णी नदी कही गई है।

तत्र भक्तिमतः सर्वाननुगृह्णाति भास्करः ।
विधिप्रयुक्तां पूजां च गृह्णाति भगवान् स्वयम् ॥४॥

वहाँ भगवान् भास्कर सभी भक्तों पर अनुग्रह करते हैं और विधि से प्रयुक्त पूजन को स्वयं ग्रहण करते हैं॥४॥

बृहद्वल उवाच

कोऽयं साम्बः कुतः कस्य पुत्रो नाम्ना रवेः प्रियः ।
यस्य चायं सहस्त्रांशुर्वरदः पुण्यकर्मणः ॥५॥

१० श्रीसाम्बपुराणम्

बृहद्वल पूछते हैं—यह साम्ब कौन है? कहाँ से आये अर्थात् कहाँ रहते थे? किसके पुत्र हैं, जो रवि को प्रिय हैं तथा सहस्र किरणयुक्त सूर्य ने जिन्हें घर प्रदान किया है?॥५॥

वशिष्ठ उवाच

अदितेर्द्वादशपुत्रो विष्णुर्यः स पुनस्त्विह।
वासुदेवत्वमापन्नस्तस्य साम्बोऽभवत् सुतः ॥६॥
स तु पित्रा भृशं शप्त्वा कुष्ठरोगमवाप्तवान्।
तेनायं स्थापितः सूर्यः स्वनाम्ना च पुरः कृतः ॥७॥

वशिष्ठ कहते हैं—देवमाता अदिति के बारहवें पुत्र जो विष्णु हैं, वे ही वसुदेव के पुत्ररूप से अवस्थित हैं (वासुदेव हैं)। उनके ही पुत्र हैं—साम्ब।

किन्तु पिता से भीषण अभिशाप पाकर उन्हें कुष्ठ रोग हो गया था। उन्होंने ही इन सूर्य की स्थापना (चन्द्रभागा के तट पर) की और अपने नाम से पुरी का भी निर्माण कराया॥६-७॥

बृहद्वल उवाच

शप्तः कस्मिन्निमित्तोऽसौ पित्रा पुत्रः स्वसम्भवः।
भाव्यं हि कारणेनात्र येनासौ शप्तवान् सुतम् ॥८॥

बृहद्वल पूछते हैं—पिता द्वारा उनके ही आत्मज (पुत्र) क्यों अभिशप्त हुये? अवश्य ही इसमें कोई विशेष कारण है, जिस कारण से पिता ने अपने पुत्र को ही शाप दिया॥८॥

वशिष्ठ उवाच

शृणुष्वावहितो राजंस्तस्य तच्छापकारणम्।
ब्रह्मणो मानसः पुत्रो नारदो नाम यो मुनिः ॥९॥
ब्रह्मलोके मुनेस्तस्य विष्णुलोके तथैव च।
सूर्यलोके च सततं रुद्रलोके तथैव च ॥१०॥

ऋषि वशिष्ठदेव कहते हैं—हे राजन्! तुम सावधान होकर सुनो। उनके शाप का कारण कहता हूँ। ब्रह्मा के मानसपुत्र नारद नामक मुनि हैं। इनकी ब्रह्मलोक, विष्णुलोक, सूर्यलोक तथा रुद्रलोक में अप्रतिहत गति है॥९-१०॥

पितृराक्षसनागानां यमस्य वरुणस्य च।
इन्द्रस्य चामरावत्यां पुर्यां तु धनदस्य च ॥११॥
पृथिव्यां पार्थिवाद्यां ये ये पातालसमुद्भवाः।
सदा वेश्मसु तेषां च तस्याप्रतिहतां गतिः ॥१२॥

तृतीयोऽध्यायः ११

तृतीयोऽध्यायः ११

पितृलोक, राक्षस लोक, नागलोक, यमलोक, वरुणलोक, इन्द्र की अमरावती तथा कुबेर की पुरी में एवं पृथ्वी पर जितने राजागण हैं, जो पाताल में हैं, उन सभी के स्थान पर इनकी बाधाहीन अप्रतिहत गति है।।११-१२।।

वासुदेवं स वै द्रष्टुं नीत्वा द्वारावतीं पुरीम्।
आयान्तं ऋषिभिः सार्द्धं क्रोधनो मुनिसत्तमः ॥१३॥

एक बार वह नारद कोपन स्वभाव ऋषियों के साथ वासुदेव का दर्शन करने के लिये द्वारिकापुरी आये।।१३।।

अथात्रागच्छतस्तस्य सर्वे यदुकुमारकाः।
प्रद्युम्नप्रमुखा ये ते प्रह्वेनावनताः स्थिताः ॥१४॥
अभिवाद्यार्घ्यपाद्यैश्च पूजां कुर्वन्ति यत्नतः।
साम्बस्त्ववश्यम्भावित्वात्तस्य शापस्य मोहितः ॥१५॥

तदनन्तर प्रद्युम्न आदि सभी प्रमुख यदुकुमारगण ने वहाँ आकर तथा सविनय अवनत होकर अभिनन्दन-पाद्य-अर्घ्य प्रभृति द्वारा यत्नपूर्वक उनका पूजन किया। अवश्यम्भावी के कारण साम्ब उस शाप से मोहित हो गया।।१४-१५।।

अवज्ञां कुरुते नित्यं नारदस्य महात्मनः।
ततः क्रीडासु सततं रूपयौवनगर्वितः ॥१६॥
अविनीतं सुतं ज्ञात्वा चिन्तयामास नारदः।
अस्याहमविनीतस्य करिष्ये विनयं भृशम् ॥१७॥

साम्ब अपने रूप एवं यौवन से गर्वित होकर सतत् क्रीड़ा में मत्त रहता था और सर्वदा महात्मा नारद की अवज्ञा किया करता था। इस वासुदेवपुत्र को अविनीत देखकर नारद चिन्तित हो गये और विचार किया कि इस अविनीत को मैं अच्छी तरह संयत करूँगा।।१६-१७।।

एवं सञ्चिन्तयित्वा तु वासुदेवं ततोऽब्रवीत्।
इमाः षोडशसाहस्र्यः पत्न्यो देवस्य यास्तव।
सर्वासां च मनांस्यासां साम्बेन किल केशव ॥१८॥
हृतानि पुण्डरीकाक्ष रूपयौवनशालिना।
रूपेणाप्रतिमः साम्बो लोकेऽस्मिन् सचराचरे।
अतो हीच्छन्ति तास्तस्य दर्शनं ह्यपि ते प्रियः ॥१९॥

ऐसा विचार करके नारद ने वासुदेव से कहा—हे केशव! आपकी जो १६००० पत्नियाँ हैं, उन सबका मन साम्ब ने अपहृत कर लिया है। हे पुण्डरीकाक्ष! रूप-

१२ श्रीसाम्बपुराणम्

यौवनयुक्त साम्ब का रूप चराचर में अतुलनीय है। इसलिये सभी स्त्रीगण उसे देखने की इच्छा करती हैं, यहाँ तक कि आपकी पत्नियाँ भी॥१८-१९॥

वशिष्ठ उवाच
श्रुत्वैतन्नारदाद्वाक्यं भाविनाऽर्थेन मोहितः।
अविचार्र्यैव तत् सर्वं देवः प्रोवाच नारदम्॥२०॥

वशिष्ठ कहते हैं—नारद की यह बात सुनकर भवितव्यता के कारण ही वासुदेव ने विना कोई विचार किये नारद से इस प्रकार कहा॥२०॥

वासुदेव उवाच
न ह्यहं श्रद्दधाम्येवं यदेतद् व्याहृतं त्वया।
ब्रुवाणमेवं देवं तु नारदः प्रत्युवाच ह॥२१॥

वासुदेव ने कहा—(हे नारद!) आपने जो कुछ कहा, उसका मैं तनिक भी विश्वास नहीं करता। वासुदेव का यह उत्तर सुनकर नारद ने प्रत्युत्तर दिया—मैं वैसा करूँगा, जिससे आपको विश्वास हो॥२१॥

वशिष्ठ उवाच
एवमुक्त्वा ययौ भूत्वा नारदस्तु यथागतः।
ततः कतिपये चाह्नि द्वारकां पुनरभ्यगात्॥२३॥
तस्मिन्नहनि देवोऽपि सहान्तःपूरिकाजनैः।
अनुभूय जलक्रीड़ा यानमासेवते रहः॥२४॥

ऋषि वशिष्ठ देव कहते हैं—ऐसा कहकर नारद यथाभिलषित देश को चले गये। तदनन्तर कुछ दिनों के उपरान्त पुनः द्वारिका आये। उस दिन श्रीकृष्ण भी अन्तःपुर की रमणियों के साथ जलक्रीड़ा करके निर्जन में अवस्थित थे॥२३-२४॥

रम्ये रैवतकोद्याने हर्म्यमालोपशोभिते।
सर्वर्तुकुसुमैर्नित्यं वासिते चित्रकानने॥२५॥
नृत्यद्भिर्बर्हिभिर्नित्यं केकाशतनिनादिते।
कोकिलारावसंघुष्टे चक्रवाकोपशोभिते॥२६॥

रैवतक (द्वारका के निकट पर्वत) के रम्य उद्यान में अट्टालिकावली शोभित थी। वह सभी ऋतुओं के पुष्पों द्वारा नित्य आमोदित थी। वह विचित्र कानन नित्य नृत्यरत मयूर तथा १००-१०० केका के शब्द से गूंजा करता था। वह कोकिल के शब्द से शब्दित तथा चक्रवाक पक्षियों द्वारा उपशोभित था॥२५-२६॥

कोकिलामधुरालापे जलकुक्कुटनादिते।
षट्पदोद्गीतमधुरे शुकचातकनादिते॥२७॥