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साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

तृतीयोऽध्यायः १५

तृतीयोऽध्यायः १५

तासामथोत्थितानां तु वासुदेवस्त्वपश्यत। भित्वा वासांसि शुक्लानि पत्रेषु पतितं मदम् ॥४४॥ तं दृष्ट्वा तु हरिः क्रुद्धस्तां शशाप तदा स्त्रियः। यस्माद् गतानि चेतांसि मां मुक्त्वान्यत्र वः स्त्रियः ॥४५॥ तस्मात् पतिकृतांल्लोकान्नायुषोऽन्ते न यास्यथ। पतिलोकात् परिभ्रष्टाः स्वर्गं चापि गते मयि। भूत्वा ह्यशरणा यूयं दस्युहस्तं गमिष्यथ ॥४६॥

तब वासुदेव ने देखा कि उठने पर उनके शुक्ल वस्त्र को भेदकर पत्र के ऊपर (योनि के ऊपर) मद पतित हो रहा है। यह देखकर हरि ने क्रुद्ध होकर उन रमणीगण को अभि- शाप दिया—हे स्त्रीगण! मेरा परित्याग करके तुम्हारा चित्त अन्यत्र धृत हो गया है, अतः परलोक में तुम्हें पतिलोक (आयु समाप्त होने पर) नहीं मिलेगा। मेरे स्वर्गारोहण के पश्चात् तुम परिभ्रष्ट होगी तथा अरक्षित होकर डाकुओं के हाथ में पड़ जाओगी।।४४-४६।।

वशिष्ठ उवाच

शापदोषात्ततस्तस्मात् स्त्रियः स्वर्गं गते हरौ। हृताः पाञ्चनदैश्चौरैरर्जुनस्य तु पश्यतः ॥४७॥ ततस्तास्तुल्यशापत्वादेवं संदूषिताः स्त्रियः। प्राप्तवत्यो महच्छापं मुक्त्वा तिस्रः पतिव्रताः ॥४८॥ रुक्मिणीं सत्यभामां च तथा जाम्बवतीमपि। शप्त्वैवं ताः स्त्रियः कृष्णः साम्बमप्यशपत्ततः ॥४९॥

ऋषि वशिष्ठ देव कहते हैं कि तदनन्तर अभिशाप के कारण ही जब हरि ने स्वर्गगमन कर लिया था तब अर्जुन के सामने ही उन स्त्रीगण को पञ्चनद प्रदेश में चोरों ने अपहृत कर लिया था। पतिव्रता रुक्मिणी, सत्यभामा तथा जाम्बवती के अतिरिक्त सभी को यह अभिशाप लगा था। इस प्रकार से इन स्त्रीगण को शाप देकर भगवान् कृष्ण ने साम्ब को भी इस प्रकार शाप दिया था।।४७-४९।।

वासुदेव उवाच

यस्मादतीव कान्तं ते दृष्ट्वा रूपमिमाः स्त्रियः। क्षुब्धाः सर्वास्तु तस्मात्त्वं कुष्ठरोगमवाप्स्यसि ॥५०॥

वासुदेव कहते हैं—जिस कारण से सभी रमणीगण तुम्हारा अतीव सुन्दर रमणीय रूप देखकर क्षुब्ध हो गयीं, इसलिये तुम अब कुष्ठरोग से ग्रसित होगे।।५०।।

वशिष्ठ उवाच

यस्मिन् शप्तः क्षणे चासौ पित्रा पुत्रः स्वसम्भवः। प्राप्तवान् कुष्ठरोगित्वं विरूपत्वं च दुःसहम् ॥५१॥

१६श्रीसाम्बपुराणम्

ऋषि वशिष्ठ देव कहते हैं—जब पिता ने अपने पुत्र को इस प्रकार शाप दिया, तभी उसे कुष्ठरोग हो गया तथा वह कुरूप हो गया।।५१।।

साम्बेन पुनरप्येवं दुर्वासां कोपिता मुनिः।
भाव्येनार्थेन चात्यर्थं पूर्वानुस्मरणेन वै ॥५२॥
प्राप्तवान् सुमहच्छापं साम्बो वै मनुजोत्तमः।
तच्छापान्मुसलं जातं कुलं येनाऽस्य पातितम् ॥५३॥

इसी प्रकार एक बार साम्ब से दुर्वासा मुनि कुपित हो गये थे और भवितव्यता के चलते पूर्व वृत्तान्त का स्मरण न रहने से नरश्रेष्ठ साम्ब ने सुमहत् शाप पाया था। उस शाप से उनके पेट से मूसल उत्पन्न हुआ था, जिसके द्वारा यदुवंश का संहार हो गया था।।५२-५३।।

श्रुत्वा दुर्विनयाद्दोषानेवमादीन् विपश्चिता।
नित्यं भाव्यं विनीतेन गुरुदेवद्विजातिषु ॥५४॥

दुर्विनय के इस प्रकार के दोष को सुनकर विज्ञजनों को गुरु, देवता तथा ब्राह्मणों के सम्मुख विनीत हो जाना चाहिये।।५४।।

ततः शापाभिभूतेन साम्बो नाराध्य भास्करम्।
पुनः सम्प्राप्य तद्रूपं स्वनाम्नार्को निवेशितः ॥५५॥
नारदो दर्शयित्वा तु स्त्रीणां भावविपर्ययम्।
साम्बं शापेन संयोज्य तत्रैवान्तरधीयत ॥५६॥

इति श्रीसाम्बपुराणे साम्बशापो नाम तृतीयोऽध्यायः

तदनन्तर अभिशप्त साम्ब ने भास्कर की आराधना से पुनः अपना रूप प्राप्त किया और अपने नाम से सूर्य की स्थापना (चन्द्रभागा के तट पर) किया। इधर नारद भी स्त्रीगण के भावविपर्यय को दिखलाकर तथा साम्ब को शाप दिलवाकर वहाँ से अन्तर्धान हो गये।।५४-५६।।

श्री साम्बपुराण का साम्बशाप नामक तृतीय अध्याय समाप्त

चतुर्थोऽध्यायः

(द्वादशमूर्त्युपाख्यानम्)

बृहद्वल उवाच
स्थापितो यदि साम्बेन सूर्यश्चन्द्रसरित्तटे।
तस्मान्नाद्यमिदं स्थानं यथैतद् भाषितं त्वया ॥१॥

राजा बृहद्वल पूछते हैं—यदि साम्ब ने चन्द्रभागा नदी के तट पर सूर्य के मूर्त्ति की स्थापना की थी, तब उसे आपने जिस प्रकार कहा है (उससे प्रतीत होता है कि) यह सूर्य का आद्य स्थान नहीं है॥१॥

वशिष्ठ उवाच
आद्यं स्थानमिदं भानोः पश्चात् साम्बेन निर्मितम्।
विस्तरेणास्य चाद्यत्वं कथ्यमानं निबोध मे ॥२॥

ऋषि वशिष्ठ देव कहते हैं—यही सूर्य का आद्य स्थान है। बाद में साम्ब ने यहाँ निर्माण कराया। मैं विस्तार से इस आद्यत्व का वर्णन करता हूँ, तुम सुनो॥२॥

अनाद्यो लोकनाथः स विश्वमाली जगत्पतिः।
मित्रत्वेऽवस्थितो देवस्तपस्तेपे नराधिपः ॥३॥

अनादि लोकनाथ जगत्पति नरगण के अधिपति मित्ररूपेण अवस्थित देवता ने पूर्व में एक बार तपस्या किया था॥३॥

अनादिनिधनो ब्रह्मा नित्यश्चाक्षर एव च।
सृष्ट्वा प्रजापतीन् सर्वान् सृष्ट्वा च विविधाः प्रजाः ॥४॥

जिनकी उत्पत्ति तथा विनाश नहीं है, ऐसे नित्य अक्षररूप (क्षररहित) ब्रह्मा ने समस्त प्रजापतियों एवं विविध प्रजा की सृष्टि की॥४॥

ततः स च सहस्त्रांशुरव्यक्तपुरुषः स्वयम्।
कृत्वा द्वादशधात्मानमदित्यमुदपद्यत ॥५॥

तदनन्तर उन अव्यक्त पुरुष सहस्त्रांशु (सूर्य) स्वयं द्वादश रूपों में देवमाता अदिति के गर्भ से उत्पन्न हुये॥५॥

इन्द्रो धाताथ पर्जन्यः पूषा त्वष्टाऽर्यमा भगः।
विवस्वान् विष्णुरंशुश्च वरुणो मित्र एव च ॥६॥

१८ | श्रीसाम्बपुराणम्

आभिर्द्वादशभिस्तेन सूर्येण परमात्मना।
सर्वं जगदिदं व्याप्तं मूर्त्तिभिस्तु नराधिपः॥७॥

इन्द्र, धाता, पर्जन्य, पूषा, त्वष्टा, अर्यमा, भग, विवस्वान्, विष्णु, अंशु, वरुण तथा मित्र। हे नराधिप! परमात्मा सूर्य अपनी इन द्वादश मूर्तियों से समस्त जगत् को व्याप्त करके स्थित हैं॥६-७॥

तस्या या प्रथमा मूर्त्तिरादित्यस्येन्द्रसंज्ञिता।
स्थिता सा देवराजत्वे देवानामनुशासिनी ॥८॥

आदित्य की प्रथम मूर्त्ति इन्द्र के नाम से विख्यात है। यह मूर्त्ति देवगण के शासक देवराजरूप में वर्त्तमान है॥८॥

द्वितीयार्कस्य या मूर्त्तिर्नाम्ना धातेति कीर्त्तिता।
स्थिता प्रजापतित्वे सा विविधाः सृजते प्रजाः ॥९॥

सूर्य की द्वितीय मूर्त्ति का नाम है—धाता। यह प्रजापति रूप से नानाविध प्रजा की सृष्टि करती है॥९॥

तृतीयार्कस्य या मूर्त्तिः पर्जन्य इति विश्रुता।
मेघे व्यवस्थिता सा तु वर्षते च गभस्तिभिः ॥१०॥

सूर्य की तृतीय मूर्त्ति पर्जन्य के नाम से ख्यात है। यह मेघमण्डल में स्थित होकर अपनी किरणों से वर्षा करती है॥१०॥

चतुर्थी तस्य या मूर्त्तिर्नाम्ना पूषेति विश्रुता।
अन्ने व्यवस्थिता सा तु प्रजाः पुष्णाति नित्यशः ॥११॥

इनकी चतुर्थ मूर्त्ति पूषा नाम से विख्यात है। यह अन्न में स्थित होकर नित्य समस्त प्रजा का पोषण करती है॥११॥

पञ्चमी तस्य या मूर्त्तिर्नाम्ना त्वष्टेति विश्रुता।
स्थिता वनस्पतौ सा तु ओषधीषु च सर्वशः ॥१२॥

इनकी पञ्चम मूर्त्ति त्वष्टा के नाम से प्रसिद्ध है। यह वनस्पति तथा औषधियों में सर्वतोभावेन स्थित है॥१२॥

मूर्त्ति षष्ठी रवेर्या तु अर्यमा इति विश्रुता।
वायोः सञ्चरणार्था सा देहेष्वेव समाश्रिता ॥१३॥

इनकी षष्ठ मूर्त्ति को अर्यमा कहते हैं। यह वायु के संचरण के कारण सभी देह में स्थित है॥१३॥

चतुर्थोऽध्याय ९९

चतुर्थोऽध्याय ९९

भानोर्या सप्तमी मूर्त्तिर्नाम्ना भग इति श्रुता।
भूमौ व्यवस्थिता सा तु शरीरेषु च देहिनाम्॥१४॥

सूर्य की सप्तम मूर्त्ति का नाम है—भग। यह भूमि में स्थित होकर सभी देहधारियों के शरीर में स्थित है॥१४॥

मूर्त्तिर्या चाष्टमी वास्य विवस्वानिति विश्रुता।
अग्नौ व्यवस्थिता सा तु पचत्यन्नं शरीरिणाम्॥१५॥

अष्टम मूर्त्ति विवस्वान् कहलाती है। यह अग्नि में स्थित होकर शरीरधारियों का अन्नपाक करती है॥१५॥

नवमी मित्रभानोर्या मूर्त्तिविष्णुश्च नामतः।
प्रादुर्भवति सा नित्यं देवानामरिसूडनी॥१६॥

सूर्य की नवम मूर्त्ति का नाम है—विष्णु। देवगण के शत्रुओं का नाश करने के लिये यह मूर्त्ति (विष्णु) नित्य प्रादुर्भूत होती है॥१६॥

दशमी तस्य या मूर्त्तिरंशुमानिति विश्रुता।
वायौ प्रतिष्ठिता सा तु प्रह्लादयति वै प्रजाः॥१७॥

इनकी दशम मूर्त्ति को अंशुमान कहा गया है। यह वायु में प्रतिष्ठित होकर सभी प्रजावर्ग का आनन्दवर्धन करती है॥१७॥

मूर्त्तिस्त्वेकादशी या तु भानोर्वरुणसंज्ञिता।
सा जीवयति वै कृत्स्नं जगदप्सु प्रतिष्ठितम्॥१८॥

इनकी एकादश मूर्त्ति 'वरुण' कहलाती है। यह जल में प्रतिष्ठित होकर जगत् को जीवनदान देती है॥१८॥

अपां स्थानं समुद्रस्तु वरुणोऽप्सु प्रतिष्ठितः।
तस्माद्वै प्रोच्यते नाम्ना सागरो वरुणालयः॥१९॥

जल का स्थान है—समुद्र। वरुण जल में प्रतिष्ठित होकर समस्त जगत् को जीवनदान देते हैं। तभी तो सागर को वरुणालय कहा गया है॥१९॥

मूर्त्तिर्या द्वादशी भानोर्नामितो मित्रसंज्ञिता।
लोकानां सा हितार्थाय स्थिता चन्द्रसरित्तटे॥२०॥

सूर्य की बारहवीं मूर्त्ति का नाम है—मित्र। यह लोकालय का हित चाहती है, तभी तो चन्द्रभागा नदी के तट पर अवस्थित है॥२०॥

वायुभक्षस्तपस्तेपे स्थितो मैत्रेण चक्षुषा॥२१॥

२० श्रीसाम्बपुराणम्

वह मित्र वायुभक्षण करता है और वह बन्धु के समान चक्षु में स्थित होकर तपस्या कर रहे हैं।।२१।।

अनुगृह्णन् सदा भक्तान् वरैर्नानाविधैस्तु सः।
एवमाद्यमिदं स्थानं पश्चात् साम्बेन निर्मितम् ।।२२।।

वे सर्वदा नानाविध वरों से भक्तों पर अनुग्रह करते हैं। यही है—सूर्य का आदि स्थान (चन्द्रभागा नदी का तट); जिसका निर्माण साम्ब ने कराया था।।२२।।

तत्र मित्रस्थितो यस्मात् तस्मान्मित्रवनं स्मृतम्।
एवं द्वादशभिस्तेन सवित्रा परमात्मना ।।२३।।

मित्र जहाँ अवस्थान करते हैं, उसे मित्रवन कहा गया है। इस प्रकार से सविता द्वादश मूर्तियों में स्थित हैं।।२३।।

इत्येवं द्वादशादित्यं जगद् ज्ञात्वा तु मानवः।
नित्यं श्रुत्वा पठित्वा च सूर्यलोके महीयते ।।२४।।

इति श्रीसाम्बपुराणे द्वादशमूर्त्युपाख्यानं नाम चतुर्थोऽध्यायः

मनुष्यस्वरूप द्वादश आदित्य लोक को जानकर, नित्य सुनकर तथा पाठ करके साधक सूर्यलोक में पूजनीय हो जाता है।।२४।।

श्री साम्बपुराण का द्वादश मूर्त्ति-वर्णन नामक चतुर्थ अध्याय समाप्त

पञ्चमोऽध्यायः

(मित्रवरुणयोस्तपः)

बृहद्वल उवाच
यदि तावदसौ सूर्यश्चादिदेवः सनातनः।
तत् किमर्थं तपस्तेपे वरैस्तु प्राकृतो यथा ॥१॥

बृहद्वल जिज्ञासा करते हैं—यदि सूर्य सनातन आदिदेव हैं, तब वर-प्राप्ति हेतु प्राकृत व्यक्ति के समान उन्होंने तप क्यों किया?॥१॥

वशिष्ठ उवाच
एतत्तेऽहं प्रवक्ष्यामि परं गुह्यं विभावसोः।
पुरा मित्रेण यत् प्रोक्तं नारदाय महात्मने ॥२॥

ऋषि वशिष्ठ देव कहते हैं—सूर्य के इस परम रहस्य की कथा तुमसे कहता हूँ। पहले मित्र ने महात्मा नारद से इसे कहा था॥२॥

प्राङ् मयोक्ताश्च यास्तुभ्यं रवेर्द्वादशमूर्त्तयः।
मित्रश्च वरुणश्चोभौ तासां तु तपसि स्थितौ ॥३॥

पहले मैंने तुमसे सूर्य की जिस द्वादश मूर्ति की कथा कही है, उनमें से मित्र तथा वरुण तपस्या में लगे थे॥३॥

अब्भक्षौ वरुणस्ताभ्यां तस्थौ पश्चिमसागरे।
मित्रो मित्रवने चास्मिन् वायुभक्षोऽचरत्तपः ॥४॥

उनमें से वरुण केवल जल पीकर (तप करते हुये) पश्चिम सागर में अवस्थित थे तथा मित्र इस मित्रवन में वायुभक्षण करके तप कर रहे थे॥४॥

अथ मेरोगिरिशृङ्गात् प्रच्युतो गन्धमादनात्।
नारदः सुमहद्भूतः सर्वलोकानचीवरत् ॥५॥
आजगामाथ तत्रैव यत्र मित्रोऽचरत्तपः।
तद्दृष्ट्वा तु तपस्यन्तं तस्य कौतूहलं ह्यभूत् ॥६॥

तदनन्तर मेरुपर्वत के शृङ्ग गन्धमादन से सभी लोकों से होते हुये विचरण करते नारद (देवर्षि) वहाँ आये, जहाँ मित्र तपस्या कर रहे थे। उनको तप करते देखकर नारद को अत्यन्त कुतूहल हो गया॥५-६॥

२२ श्रीसाम्बपुराणम्

योऽक्षयश्चाव्ययश्चैव व्यक्ताव्यक्तः सनातनः।
धृतं चैकात्मना येन त्रैलोक्यमिदमात्मना ॥७॥
यः पिता सर्वदेवानां दैवतं चापि यः परम्।
यजते देवतां कास्तु पितॄन् कान् यजते च सः ॥८॥

जो अक्षय, अव्यय, प्रकट-अप्रकट, सनातन हैं; जिनके एक रूप से यह त्रिभुवन धृत है, जो सभी देवताओं के पिता तथा परम देवता हैं, वे स्वयं किस देवता का यजन कर रहे हैं? किस पितृगण का पूजन कर रहे हैं॥७-८॥

इति सञ्चिन्त्य मनसा तं देवं नारदोऽब्रवीत्।
वेदेषु च पुराणेषु साङ्गोपाङ्गेषु गीयते ॥९॥

नारद मन ही मन ऐसा चिन्तन करके मित्र से पूछने लगे—साङ्गोपाङ्ग वेद तथा पुराणों में कहा गया है कि॥९॥

नारद उवाच

त्वमजः शाश्वतो धाता महाभूतमनुत्तमः।
भूतं भव्यं भविष्यं च त्वयि सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥१०॥

आप ही शाश्वत, अज, धाता (सृष्टिकर्त्ता-धारणकर्त्ता) अनुत्तम महाभूत हैं। भूत-भविष्य-वर्त्तमान सब आपके अन्दर प्रतिष्ठित है॥१०॥

चत्वारो ह्याश्रमा देव गृहस्थाद्यास्तथैव च।
यजन्ते त्वामहरहः नानामूर्त्तिसमाश्रितम् ॥११॥
पिता माता च सर्वस्य दैवतं त्वं हि शाश्वतम्।
यजसे पितरं कं त्वं देवं चापि न वेद्यहम् ॥१२॥

हे देव! गृहस्थ प्रभृति चारो आश्रम दिन-रात नाना मूर्तियों में विद्यमान आपकी पूजा करते रहते हैं। आप ही सभी के पिता, माता तथा नित्य देवता हैं। आप किस पिता अथवा देवता का यजन कर रहे हैं, यह मैं नहीं जानता॥११-१२॥

मित्र उवाच

अवाच्यमेतद् वक्तव्यं परं गुह्यं सनातनम्।
त्वयि भक्तिमति ब्रह्मन् प्रवक्ष्यामि यथातथम् ॥१३॥

मित्र कहते हैं—यह अकथनीय कथा है, परम गोपनीय है। हे ब्रह्मन्! तुझ भक्तिमान से मैं वह यथायथ रूपेण बतलाता हूँ॥१३॥

यत्तत् सूक्ष्ममविज्ञेयमव्यक्तमचलं ध्रुवम्।
इन्द्रियैरिन्द्रियार्थैश्च सर्वभूतैश्च वर्जितम् ॥१४॥

पञ्चमोऽध्यायः २३

पञ्चमोऽध्यायः २३

स ह्यन्तरात्मा भूतानां क्षेत्रज्ञश्चैव कथ्यते।
त्रिगुणव्यतिरिक्तोऽसौ पुरुषश्चेति विश्रुतः ॥१५॥

जो सूक्ष्म, अविज्ञेय, अव्यक्त (अप्रकाश), अचल, ध्रुव (नित्य) हैं; इन्द्रिय, इन्द्रियार्थ तथा सभी प्राणियों से जो बहिर्भूत हैं, सभी प्राणीगण की अन्तरात्मा तथा क्षेत्रज्ञ हैं। वे त्रिगुणातिरिक्त पुरुषरूपेण विश्रुत हैं॥१४-१५॥

हिरण्यगर्भो भगवान् स वै बुद्धिरिति स्मृतः।
धृतेनैकात्मना येन त्रैलोक्यमिदमात्मना ॥१६॥

वे हिरण्यगर्भ भगवान् जो बुद्धिस्वरूप कहे जाते हैं, जो अपने एक रूप से त्रिलोक को धारण करते हैं॥१६॥

अशरीरः शरीरेषु सर्वेषु निवसत्यसौ।
वसन्नपि शरीरेषु न स लिप्यति कर्मभिः ॥१७॥

सभी देव-देवियों के शरीर में वे अशरीरी रूपेण निवास करते हैं। सभी शरीर में वास करने पर भी वे कर्मों से लिप्त नहीं होते॥१७॥

ममान्तरात्मा तव च ये चान्ये देहसंज्ञिताः।
सर्वेषां साक्षिभूतोऽसौ न ग्राह्यः केनचित्क्वचित् ॥१८॥
सगुणो निर्गुणो विश्वो ज्ञानगम्यो ह्यसौ स्मृतः ॥१९॥

वे हम सबकी अन्तरात्मा हैं तथा सभी देहधारियों के साक्षी-स्वरूप हैं। वे कभी भी किसी के द्वारा ग्रहण करने योग्य नहीं हैं। वे सगुण-निर्गुण विश्वरूप तथा ज्ञानगम्य कहे जाते हैं॥१८-१९॥

सर्वतः पाणिपादोऽसौ सर्वतोऽक्षिशिरोमुखः।
सर्वतः श्रुतिमांल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥२०॥

वे सर्वतः पाणि-पादयुक्त, चक्षु, मस्तक तथा मुखयुक्त हैं। वे सर्वतः (सबके) कर्ण हैं तथा समस्त लोक के सब कुछ को घेर कर अवस्थित हैं॥२०॥

सर्वेन्द्रियगुणावासः सर्वेन्द्रियमथो ह्यसौ।
यथा दीपसहस्राणि स च एकः प्रसूयते ॥२१॥
बुध्यते स यदात्मानं तदा भवति केवलः।
एकत्वं प्रलये चास्य बहुत्वं च प्रवर्त्तनात् ॥२२॥
नित्यं हि नास्ति जगति भूतं स्थावरजङ्गमम्।
ऋते तमेकमीशानं भूतं स्थावरजङ्गमम् ॥२३॥

२४ श्रीसाम्बपुराणम्

समस्त इन्द्रियों के गुणाश्रय वे सकल इन्द्रियरूप हैं। जैसे एक ही दीपक से हजारों दीपक प्रज्वलित होते हैं, वैसे ही वे अकेले ही बहुरूपेण प्रकाशित हो रहे हैं। जब उन्हें जाना जाता है, तब वे केवल आत्मरूपेण अवस्थान करते हैं। प्रलय में इनका एक-रूपत्व रहता है एवं सृष्टिकाल में इनका बहुरूपत्व हो जाता है। यह एक एवं नित्यस्वरूप हैं। इन एक ईश्वर के अतिरिक्त इस जगत् में कोई भी स्थावर-जंगम प्राणी नित्य नहीं है॥२१-२३॥

अक्षयश्चाप्रमेयश्च सर्वगश्च स उच्यते।
तस्मादव्यक्तमुत्पन्नं त्रिगुणं द्विजसत्तम॥२४॥

वे अक्षय, अप्रमेय (अतुलनीय), सर्वग (सर्वत्र गमनशील) एवं अव्यक्त हैं। हे द्विजोत्तम! उनसे ही त्रिगुण उत्पन्न हुआ है॥२४॥

अव्यक्तव्यक्तभावस्था या सा प्रकृतिरुच्यते।
तां योनिं ब्रह्मणो विद्धि नित्यं योऽसौ मदात्मकः॥२५॥

जो अव्यक्त तथा व्यक्तभावरूप हैं, उन्हें प्रकृति कहा गया है। वह ब्रह्मयोनि (प्रकाश स्थान) है। वह नित्य तथा मेरा ही स्वरूप है॥२५॥

लोके च पूज्यते योऽसौ दैवे पित्र्ये च कर्मणि।
नास्ति तस्मात्परो ह्यन्यः पिता देवोऽपि सात्त्विकः॥२६॥

जगत् में वे दैव तथा पितृकर्म में पूजित होते हैं, उनकी अपेक्षा अन्य कोई पिता अथवा सात्त्विक देवता नहीं है॥२६॥

आत्मा हि नः स विज्ञेयस्ततस्तं पूजयाम्यहम्।
स्वर्गस्था अपि ये केचित्तं नमस्यन्ति देहिनः॥२७॥
ते तत्प्रसादाद् गच्छन्ति तेनोद्दिष्टफलाद् गतिम्।
तं देवाश्चाश्रमस्थाश्च नानामूर्तिसमाश्रिताः॥२८॥
भक्त्या सम्पूजयन्त्याद्यगतिं चैषां ददाति सः।
स हि सर्वगतश्चैव निर्गुणश्चैव कथ्यते॥२९॥

वे हमारी आत्मारूप से विज्ञेय हैं, अतएव मैं उनकी पूजा करता हूँ। स्वर्गस्थ कोई-कोई देहधारी उनको नमस्कार करते हैं। वे उनकी कृपा से उनके द्वारा प्रदत्त गति प्राप्त करते हैं। नाना मूर्तियुक्त देवता तथा आश्रमस्थ साधकादि जो उनकी अर्चना करते हैं, भक्तियुक्त पूजनादि करते हैं, वे उन्हें उत्तमा गति प्रदान कर देते हैं। वे सर्वत्र, सर्व प्राणीगण में गमनशील तथा निर्गुण कहे जाते हैं॥२७-२९॥

एवं ज्ञात्वा तमात्मानं पूजयामि सनातनम्।
ये तु तद्भाविता लोका एकत्वञ्च समाश्रिताः॥३०॥

पञ्चमोऽध्यायः २५

पञ्चमोऽध्यायः २५

तमेव चैव ते सर्वे विशन्त्यक्षयमव्ययम्। एतदभ्यधिकं तेषां यदैनं प्रविशन्ति ते॥३१॥

ऐसा जानकर मैं उन आत्मस्वरूप सनातन तत्त्व का पूजन करता हूँ। जो उनके भाव से सराबोर, भावित तथा तन्मय हैं एवं एकत्व से युक्त हैं, वे सभी इस अक्षय-अव्ययस्वरूप में प्रवृष्ट हैं। यह उनकी प्राप्ति है। वे उनमें ही प्रवेश करते हैं॥३०-३१॥

इति गुह्यसमुद्देशस्तव नारद कीर्त्तितः। अस्मद् भक्त्या तु देवर्षे त्वयापि परमं श्रुतम्॥३२॥

हे नारद! यह गोपनीय रहस्य तुमको मैंने बतलाया। हे देवर्षि! मेरी भक्ति के कारण तुमने भी इस परम तत्त्व को सुना॥३२॥

सुरैर्वा मुनिभिर्वापि पुराणं यैरिदं स्मृतम्। ते सर्वे परमात्मानं पूजयन्ति दिवाकरम्॥३३॥

देवगण अथवा मुनिगण जो इस पुराण का स्मरण करते हैं, वे सभी परमात्मा दिवाकर का पूजन करते हैं॥३३॥

इदमाख्यानमार्षेयं यन्मया कीर्त्तितं तव। न ह्यनादित्यभक्ताय त्वया देयं कथञ्चन॥३४॥

यह ऋषियों द्वारा कथित आख्यान है, जिसे मैंने तुमसे कहा। इसे आदित्यभक्त के अतिरिक्त किसी को भी नहीं बतलाना चाहिये॥३४॥

यश्चैतच्छावयेन्नित्यं यश्चैतत् शृणुयान्नरः। स सहस्रार्चिषं देवं प्रविशेन्नात्र संशयः॥३५॥

जो नित्य इसको सुनते हैं तथा सुनाते हैं, वे सहस्र किरणों वाले देवता सूर्य में प्रवेश करते हैं; यह निःसंदिग्ध है॥३५॥

मुच्येत्तार्त्तस्तथा रोगान्मुने श्रुत्वा कथामिमाम्। जिज्ञासुर्लभते ज्ञानं गतिमिष्टां तथैव च॥३६॥ क्षेमेन ब्रजतेऽध्वानमिदं यः पठते पथि। यो यं कामयते कामं स तं प्राप्नोत्यसंशयः॥३७॥

इसका श्रवण करके आर्त्त व्यक्ति रोगमुक्त हो जाता है, जिज्ञासु ज्ञानलाभ करता है और अभीप्सित गति को प्राप्त करता है। जो मार्ग में इसे पढ़ता है, वह निर्विघ्न अपने गन्तव्य तक पहुँच जाता है। इस प्रकार जो जिस कामना को करते हैं, वे उसे निःसंदेह प्राप्त कर लेते हैं॥३६-३७॥

२६ | श्रीसाम्बपुराणम्

वशिष्ठ उवाच

एवमेतन्मयाख्यातं नारदेन महात्मना।
मयापि च तवाख्यातं भक्त्या भानोरिदं नृप ॥३८॥

ऋषि वशिष्ठदेव कहते हैं—महात्मा नारद ने मुझसे यह कहा था। हे राजन्! सूर्य की भक्ति के कारण मैंने इसे तुमसे कहा।।३८।।

त्वया तत् सततं राजन्नभ्यर्च्यो भगवान् रविः।
स हि धाता विधाता च सर्वस्य जगतो गुरुः ॥३९॥

इति श्रीसाम्बपुराणे मित्रवरुणयोस्तपोनाम पञ्चमोऽध्यायः

अतएव हे राजन्! तुम सर्वदा भगवान् सूर्य की अर्चना करो। वे ही धाता, विधाता तथा समस्त जगत् के गुरु हैं।।३९।।

श्री साम्ब पुराणान्तर्गत मित्र-वरुणतपस्या नामक पञ्चम अध्याय समाप्त

षष्ठोऽध्यायः

( भक्त्युपस्थानम्)

बृहद्वल उवाच
कथं साम्बः प्रपन्नोऽर्कं केन वा प्रतिपादितः।
उग्रं शापं च सम्प्राप्य पितरं स किमुक्तवान् ॥१॥

बृहद्वल कहते हैं—साम्ब किसलिये सूर्य के शरणापन्न हुये? वह कैसे सम्पन्न हुआ तथा उग्र शाप पाकर उन्होंने पिता से क्या कहा।।१।।

वशिष्ठ उवाच
ततः शापाभिभूतश्च साम्बः पितरमब्रवीत्।
किं मयापकृतं देव येन शप्तो ह्यहं त्वया ॥२॥

ऋषि वशिष्ठदेव कहते हैं—तदनन्तर साम्ब शाप से अभिभूत होकर पिता से बोले—हे देव! मैंने क्या अपराध किया था, जो आपके शाप द्वारा मैं अभिशप्त हो गया?।।२।।

अहं त्वदाज्ञया देव त्वरमाण इहागतः।
कथं निपातितः शापो मयि तेऽनपकारिणी ॥३॥

मैंने तो आपका कोई अपराध नहीं किया था। आप की आज्ञा पाकर ही यहाँ आया था। आप प्रसन्न हो जायँ। हे देवेश! शाप लौटा लीजिये। हे प्रभु! आप मुझ पर प्रसन्न होईये।।३।।

न तेऽपकुर्मेऽहं किञ्चित् प्रसीद जगतः पते।
शापं नियच्छ देवेश प्रसादं कुरु मे प्रभो ॥४॥

मैंने आपका कोई अपराध नहीं किया है। हे जगत् के पति! आप प्रसन्न हो जाईये। शाप लौटा लीजिये। प्रसन्न हो जाईये।।४।।

तमुवाच ततः कृष्णः साम्बं बुद्ध्वा ह्यनागसम् ॥५॥
तस्मात्त्वमेव पृच्छस्व प्रसाद्य ऋषिसत्तमम्।
आख्यास्यति स ते देवः शापं यस्ते विनेष्यति ॥६॥

तदनन्तर कृष्ण ने बुद्धि द्वारा साम्ब को निरपराध जानकर उससे कहा—तुम ऋषि-श्रेष्ठ (नारद) को प्रसन्न करके पूछो। वे ही तुमको बतायेंगे कि कौन देवता इस शाप का अपनोदन कर सकते हैं।।५-६।।

२८ श्रीसाम्बपुराणम्

अथैतत् स पितुर्वाक्यं श्रुत्वा जाम्बवतीसुतः ।
दीनः शापपरीताङ्गस्ततः सञ्चिन्त्य वै पुनः ॥७॥
द्वारवत्यां स्थितं विष्णुं कदाचिद्द्रष्टुमागतम् ।
विनयादुपसङ्गम्य साम्बः पप्रच्छ नारदम् ॥८॥

अब जाम्बवती-पुत्र साम्ब पिता का वाक्य सुनकर और अतिदीन भाव से कुष्ठ रोगाक्रान्त होकर रहने लगे। तदनन्तर एक बार द्वारका में विष्णुदर्शनार्थ आये नारद के पास जाकर सविनय जिज्ञासा करने लगे।।७-८।।

साम्ब उवाच

भगवन् ब्रह्मणः पुत्र सर्वज्ञः सर्वलोकगः ।
दयां हि कुरु विप्रेन्द्र प्रणतस्य ममानघ ॥९॥
त्वत्तोऽहं श्रोतुमिच्छामि निश्चयं ब्रूहि तन्मम ।
कः स्तुत्यः सर्वदेवानां कः परः पुरुषोऽव्ययः ॥१०॥
दीनस्यार्तिहरः कश्च शरणं कं व्रजाम्यहम् ।
पितृशापसमुत्थेन कश्मलेन महामुने ॥११॥
अतिभूतस्य मोक्षो मे किं प्रपन्नस्य वै भवेत् ।

साम्ब कहते हैं—हे भगवन् ब्रह्मपुत्र, सर्वज्ञ, सर्वलोक-गमनकारी, विप्रेन्द्र, निष्पाप! मैं प्रणत हूँ, मुझ पर दया करिये। मैं आपसे जो सुनना चाहता हूँ, वह आप अवश्य कहिये। सभी देवताओं में कौन स्तुत्य है? कौन अव्यय पुरुष है? कौन दीनों का हितकारी है? हे महामुने! पिता द्वारा शापोद्भूत पाप के क्षालनार्थ मैं किसकी शरण ग्रहण करूँ?।।९-११।।

वशिष्ठ उवाच

एवं सम्पृच्छते तस्मै साम्बायोवाच नारदः ॥१२॥

ऋषि वशिष्ठदेव कहते हैं—इस प्रकार का प्रश्न पूछने पर नारद ने साम्ब से कहा।।१२।।

नारद उवाच

कदाचित् पर्यटँल्लोकान् सूर्यलोकमहं गतः ।
तत्र दृष्ट्वा मया सूर्यः सर्वदेवगणैर्वृतः ॥१३॥
गन्धर्वैरप्सरोभिश्च नागैर्यक्षैः सराक्षसैः ।
गायन्ति तत्र गन्धर्वा नृत्यन्तोऽप्सरसस्तथा ॥१४॥
रक्षन्त्युद्यतशस्त्रास्त्रा यक्षराक्षसपन्नगाः ।
ऋचो यजूंषि सामानि मूर्तिमन्ति हि तत्र च ॥१५॥

षष्ठोऽध्यायः <span style="float: right;">२९</span>

नारद कहते हैं—किसी समय मैं नाना स्थानों में पर्यटन करते-करते सूर्यलोक में गया था। वहाँ देखा कि देवता, गन्धर्व, अप्सरा, नाग, यक्ष, राक्षस सभी सूर्यदेव को घेरे हुए हैं। वहाँ गन्धर्वगण गायन कर रहे थे तथा अप्सरायें नृत्य कर रहीं थी। यक्ष, राक्षस तथा सर्पगण उद्यत शस्त्र-अस्त्र द्वारा सूर्यदेव की रक्षा कर रहे थे एवं ऋक्, यजुः तथा सामवेद मूर्त्तिमान होकर वहाँ विराजित थे॥१३-१५॥

तत्कृतैर्विविधैः स्तोत्रैः स्तुवन्ति ऋषयो रविम्।
मूर्त्तिमन्तः शुभास्तत्र तिस्रः सन्ध्याः शुभाननाः॥१६॥

ऋषिगण ऋक् आदि स्तोत्रों से उनकी स्तुति का गायन कर रहे थे। मंगलमयी शुभानना प्रातः, मध्याह्न तथा सायं सन्ध्या मूर्त्ति धारण करके वहाँ स्थित थीं॥१६॥

गृहीतैर्वज्रनाराचैः परिचर्य रविं स्थिताः।
आदित्या वसवो रुद्रा मरुतश्चाश्विनौ तथा॥१७॥

वज्र, नाराच प्रभृति अस्त्र धारण किये अदिति के पुत्रगण, वसुगण, मरुद्गण तथा अश्विनीकुमारद्वय वहाँ सूर्य की परिचर्या करते हुये विद्यमान थे॥१७॥

त्रिसन्ध्यं पूजयत्यर्कं तत्रान्यं च दिवौकसः।
ईरयन् जयशब्दं तु शक्रस्तत्रैव तिष्ठति॥१८॥

वहाँ तीनों सन्ध्या में सूर्य का पूजन हो रहा था तथा जय-जयकार शब्द का उद्घोष करते हुये इन्द्र भी वहाँ उपस्थित थे॥१८॥

ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च प्रयुञ्जन्त्याशिषः शुभाः।
रथं हि वाहते तस्य अरुणो नाम सारथिः॥१९॥
हरितैः सप्तभिर्युक्तं छन्दोभिर्वाजिरूपिभिः।
द्वे भार्ये पार्श्वयोस्तस्य ते राज्ञीनिक्षुभे शुभे॥२०॥

ब्रह्मा-विष्णु तथा रुद्र शुभाशीष दे रहे थे। अरुण नामक सूर्य का सारथी सप्तवर्ण अश्वरूप छन्दों से युक्त रथ चला रहा था। उसके दोनों पार्श्व में दो भार्या मंगलमयी राज्ञी तथा निक्षुभा बैठीं थी॥१९-२०॥

अन्यैश्च नामभिर्देवाः परिचर्यविधिं स्थिताः।
पिङ्गलो देवकस्तत्र ततोऽन्यो दण्डनायकः॥२१॥
राज्ञस्तोषौ च तद्द्वारे ततः कल्माषपक्षिणौ।
ततो व्योमचतुःशृङ्गं मेरोः सदृशलक्षणम्॥२२॥

३० श्रीसाम्बपुराणम्

दण्डिर्नग्नोऽग्रतस्तस्य दिक्षु चान्ये स्थिताः सुराः । एवं सर्वगतं नित्यं प्रदीप्तं जगतः शुभम् । ब्रह्माद्यैः संस्तुतं देवैरादित्यं शरणं व्रज ॥२३॥ इति श्रीसाम्बपुराणे भक्त्युपस्थानो नाम षष्ठोऽध्यायः


अन्य विविध नामों के देवगण उनकी परिचर्या कर रहे थे। उनमें पिङ्गल, देवक, दण्डनायक सूर्य के द्वारदेश पर विद्यमान थे। स्तोषनामक कल्माष पक्षीद्वय मेरुतुल्य व्योम के चार शृङ्गरूप थे। उनके सामने नग्न तथा दण्डि एवं चतुर्दिक अन्य देवता अवस्थित थे। इस प्रकार सर्वगत, नित्य, प्रदीप्त (उज्ज्वल), जगत् का शुभ करने वाले ब्रह्मादि देवताओं से संस्तुत आदित्य की शरण ग्रहण करो।।२१-२३।।

श्रीसाम्बपुराण का भक्त्युपस्थान नामक षष्ठ अध्याय समाप्त

सप्तमोऽध्यायः

(रवेः सर्वव्यापित्वनिरूपणम्)

साम्ब उवाच

तत्त्वतः श्रोतुमिच्छामि कथं सर्वगतो रविः।
कतिधा रश्मयस्तत्र मूर्त्तयश्च कति स्मृताः ॥१॥
का राज्ञी निक्षुभा का च कश्चायं दण्डनायकः।
पिङ्गलश्चापि कः प्रोक्तः किं चासौ लिखने सदा ॥२॥

साम्ब ने नारद से पूछा—मैं यह तत्त्वतः सुनना चाहता हूँ कि रवि सर्वगत क्यों हैं? उनकी कितनी किरणें तथा कितनी मूर्तियाँ कही गयी हैं? (तत्त्वविभाग का निरूपण सुनना चाहता हूँ) राज्ञी कौन हैं? निक्षुभा कौन है तथा वे दण्डनायक कौन हैं? पिङ्गला किसे कहा गया है? वे सदा क्या लिखने में व्यापृत रहते हैं? ।।१-२।।

राज्ञस्तोषौ च कौ द्वारे कौ च कल्माषपक्षिणौ।
किं दैवतञ्च तद्व्योम मेरोः सदृशलक्षणम् ॥३॥
को दण्डिर्नग्नको यश्च के देवा दिक्षु ये स्थिताः।
तत्त्वतो निगमञ्चैव विस्तरेण वदस्व मे ॥४॥

(सूर्य के) राजद्वार पर स्तोषद्वय कौन हैं? कल्माष पक्षिद्वय कौन हैं? मेरुशृङ्ग के समान उस व्योम में कौन देवता है? नग्नक नामक दण्डि कौन है? चारो ओर स्थित देवगण कौन हैं? कृपया इनका तत्त्वतः स्वरूप कहिये।।३-४।।

नारद उवाच

विस्तरेणानुपूर्व्या च सूर्यं निगदितं शृणु।
ततः शेषं प्रवक्ष्यामि नमस्कृत्य विवस्वते ॥५॥

नारद कहते हैं—विस्तृत रूप से मैं आनुपूर्वीक सूर्य का तत्त्व कहता हूँ, सुनो। तदनन्तर सूर्य को नमस्कार करके शेष तत्त्व कहूँगा।।५।।

अव्यक्तं कारणं यत्तत् नित्यं सदसदात्मकम्।
प्रधानं प्रकृतिश्चेति तमाहुस्तत्त्वचिन्तकाः ॥६॥
गन्धवर्णरसैर्हीनं शब्दस्पर्शविवर्जितम्।
जगद्योनिं समुद्भूतं परं ब्रह्म सनातनम् ॥७॥

३२ श्रीसाम्बपुराणम्

जो अव्यक्त कारणस्वरूप, नित्य सत् तथा असदात्मक है, उन्हें तत्त्वविद् गण प्रधान एवं प्रकृति कहते हैं। वे गन्ध, वर्ण, रस, शब्द, स्पर्श से रहित एवं जगत् के कारण के रूप में समुद्भूत सनातन परम ब्रह्म हैं॥६-७॥

विग्रहः सर्वभूतानामव्यक्तमभवत् पुरा ।
अनाद्यन्तमजं सूक्ष्मं त्रिगुणप्रभवाप्ययम् ॥८॥
जो सभी प्राणिगण के विग्रहस्वरूप हैं, वे पूर्व में अव्यक्त थे। वे आदि-अन्तरहित, अज, सूक्ष्म, त्रिगुणात्मक, सृष्टि-प्रलयरूप हैं॥८॥

असाम्प्रतमति ज्ञेयं तमाहुः परमं पदम्।
तेनात्मना सर्वमिदं जगद् व्याप्तं महात्मना ॥९॥
जो बुद्धि से भी अतीत तथा दुर्विज्ञेय हैं, उन्हें (विद्वान्) परमपद कहते हैं। उन महात्मा के आत्मस्वरूप के द्वारा यह समस्त जगत् व्याप्त है॥९॥

तस्येश्वरस्य प्रतिमा ज्ञानवैराग्यलक्षणा ।
धर्मैश्वर्यकृता बुद्धिर्ब्राह्मी तस्याभिमानिता ॥१०॥
उन ईश्वर की प्रतिमा ज्ञान-वैराग्यरूप है। धर्म में ऐश्वर्यकृता बुद्धि है। ब्राह्मी है—उनकी अभिमानिता॥१०॥

अव्यक्ताज्जायते तस्य मनसा यद् यदिच्छति ।
चतुर्मुखस्य ब्रह्मत्वे कालत्वे चान्तकृद्भवः ॥११॥
वे जो इच्छा मन ही मन करते हैं, वह अव्यक्त से उत्पन्न हो जाता है। चतुर्मुख में ब्रह्मत्व, कालत्व एवं विनाशकारित्व तथा उत्पन्नत्व है॥११॥

सहस्रमूर्धा पुरुषः तिस्रोऽवस्थाः स्वयम्भुवः ।
सत्त्वं रजश्च ब्रह्मत्वे कालत्वे च रजस्तमः ॥१२॥
वे सहस्र मस्तक वाले पुरुष जो विशिष्ट हैं तथा स्वयम्भु हैं, उनकी तीन अवस्था हैं। ब्रह्मरूप से सत्त्व एवं रजोगुण तथा कालरूप से रजः एवं तमोगुण॥१२॥

सात्त्विकं पुरुषत्वे च गुणावृत्तं स्वयम्भुवः ।
ब्रह्मत्वे सृजते लोकान् कालत्वे स क्षिपत्यपि ॥१३॥
पुरुषरूप से उनके सात्त्विक गुण का प्रकाश होता है। स्वयम्भु ब्रह्मा रूप से वे जगत् की सृष्टि करते हैं तथा कालरूप से वे निक्षेप (विनाश) करते हैं॥१३॥

पुरुषत्वे ह्युपासीने तिस्रोऽवस्थाः स्वयम्भुवः ।
त्रिधा विभज्य चात्मानं त्रैकाल्यं सम्प्रवर्त्तते ॥१४॥

सप्तमोऽध्यायः ३३

सप्तमोऽध्यायः ३३

पुरुषरूप से पालन करते हैं (स्थिति); यह है—स्वयम्भु की तीन अवस्था। वे स्वयं को तीन भाग करके भूत-भविष्य-वर्त्तमान अथवा सृष्टि-स्थिति-संहार का प्रवर्त्तन करते हैं।।१४।।

सृज्यते ग्रसते चैव वीक्ष्यते च त्रिभिः स्वयम्।
अग्रे हिरण्यगर्भस्तु प्रादुर्भूतः स्वयम्भुवः ॥१५॥

स्वयं ही तीन गुणों से सृष्टि, विनाश तथा दर्शन (सृष्टि, स्थिति, प्रलय) करते हैं। स्वयम्भु ही हिरण्यगर्भ रूप से प्रादुर्भूत हैं।।१५।।

आदित्यस्त्वादिवेदत्वादाजातत्वादजः स्मृतः।
देवेषु च महादेवो महादेवस्ततः स्मृतः ॥१६॥
सर्वेशत्वाच्च लोकस्य ह्यवश्यत्वात् स चेश्वरः।
बृंहित्वाच्च स्मृतो ब्रह्मा भूतत्वाद्भव उच्यते ॥१७॥

वे आदिदेव आदित्य हैं (आदिदेव होने के कारण आदित्य हैं)। अजात होने के कारण अज हैं। देवों में वे महान् देव होने के कारण महादेव हैं। समस्त जगत् के सत्त्वरूप होने के कारण तथा उन्हें कोई वश में नहीं कर सकता, इस कारण वे ईश्वर हैं। बृहत् होने से वे ब्रह्मा हैं तथा भूतरूप (उत्पन्नरूप) होने से वे भव हैं।।१६-१७।।

यान्ति यस्मात् प्रजाः सर्वाः प्रजापतिरिति स्मृतः।
पुर्यां तु शेते यस्माच्च तस्मात् पुरुष उच्यते ॥१८॥

जिससे समग्र प्रजा की उत्पत्ति होती है, वे प्रजापति यही हैं। वे पुरी में (प्रत्येक देह में) शयन करने के कारण पुरुष कहलाते हैं।।१८।।

नोत्पादनत्वात् पूर्वत्वात्स स्वयम्भुरिति स्मृतः।
हिरण्येन तु गर्भस्थो यस्मादेव समावृतः ॥१९॥
तस्माद्धिरण्यगर्भेति सूर्यो देवो निगद्यते।

वे कभी भी उत्पन्न नहीं होते अर्थात् उनका उत्पादक, जनक कोई भी नहीं है तथा वे सबसे पूर्व के होने के कारण स्वयम्भु कहलाते हैं। हिरण्य द्वारा गर्भस्थ होकर समावृत होने के कारण वे हिरण्यगर्भ कहलाते हैं।।१९।।

आपो नारा इति प्रोक्ता ऋषिभिस्तत्त्वदर्शिभिः ॥२०॥
अयनं तस्य तत्पूर्वं तेन नारायणः स्मृतः।

तत्त्वदर्शी ऋषिगण 'नारा' जल को कहते हैं, उसके अयन होने के कारण इनको नारायण कहा जाता है।।२०।।

३४ श्रीसाम्बपुराणम्

अरमित्येष सिद्धार्थे निपातः करिभिः स्मृतः ॥२१॥ कविगण अर शब्द का अर्थ सिद्धार्थ निपात कहते हैं॥२१॥

एकार्णवे पुरा तस्मिन् नष्टे स्थावर-जङ्गमे । नारायणाख्यः पुरुषः सुष्वाप सलिले स्मृतः ॥२२॥ स्थावर एवं जंगम के नष्ट हो जाने पर अर्थात् प्रलय में सृष्टि का विनाश हो जाने पर इसी एकार्णव सलिल में नारायण नामक पुरुष शयन करते हैं॥२२॥

सहस्रशीर्षा सुमहान् सहस्रपात् सहस्रचक्षुर्वदनः सहस्रभुक् । सहस्रबाहुः प्रथमः प्रजापतिः सूर्याख्यतेजाः पुनरुच्यते रविः ॥२३॥ आदित्यवर्णो भुवनस्य गोप्ता ह्यपूर्व एकः पुरुषः पुराणः । हिरण्यगर्भः पुरुषो महात्मा स ईष्यते वै तमसः परस्तात् ॥२४॥ वह महान् पुरुष सहस्र मस्तकों से युक्त है (सहस्र = असंख्य)। वह सहस्र पैरों से युक्त है। सहस्र चक्षु तथा मुखयुक्त है। वह हजारों बार (असंख्य बार) भोजन करने वाला है। उसके हजारों बाहु हैं। वह प्रथम प्रजापति सूर्य नामक तेजयुक्त है; अतः उसे रवि कहते हैं। वह आदित्यवर्ण (सूर्य के समान उज्ज्वल कान्ति वाला), भुवनों का पालक, अपूर्व, पुराणपुरुष, हिरण्यगर्भ है। तमोलोक के पश्चात् उसे प्राप्त किया जाता है॥२३-२४॥

तुल्यं युगसहस्रस्य नैशं कालमुपास्यतः । संवर्त्तन्ते प्रकुरुते ब्रह्मत्वं सर्गकारणात् ॥२५॥ सलिलेनाप्लुतां भूमिं दृष्ट्वा कार्यं विचिन्त्य सः । भूत्वा वै स तु वाराहो ह्यपः संविशते प्रभुः ॥२६॥ वे हजारों युगों के तुल्य नैश (रात्रि) अन्धकार को दूर करके प्रलयान्त में सृष्टि के लिये ब्रह्मारूप से आविर्भूत हो जाते हैं। वह प्रभु भूमि को जल से आप्लुत देखकर सृष्टिकार्य की विवेचना करके वराह रूप से जल में प्रवेश करते हैं॥२५-२६॥

सञ्चिन्त्यैवं च देवोऽसौ भूमेरुद्धरणं क्षमः । महीं महार्णवे मग्नामुद्धर्तुमुपचक्रमे ॥२७॥ पृथ्वी के उत्तरण में सक्षम वह देव इस प्रकार की चिन्तना करके महार्णव में डूबी पृथ्वी का उद्धार करने का उपक्रम करने लगे॥२७॥

उत्तिष्ठतस्तस्य जलार्द्रकुक्षेर्महावराहस्य महीं निधाय । विधुन्वतो वेदमयं शरीरं लोमान्तरस्था मुनयो जयन्ति ॥२८॥ पृथ्वी को धारण करके जल से उत्थित जलसिक्त कुक्षियुक्त महावराह के विकम्पन से प्रकटित वेदमय शरीर की उनके लोमों में स्थित मुनिगण आराधना करने लगे॥२८॥