संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
| १०८ | * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * | [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ |
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आदि-अन्त नहीं है। वह स्वयं प्रकाशस्वरूप है, दूसरे किसी प्रकाशसे प्रकाशित होने योग्य नहीं है।
श्रीरामजीने पूछा—भगवन् ! अनन्त चेतनस्वरूप उस परमात्मतत्त्वका कैसा रूप है—इस विषयको आप फिर मुझसे कहिये, जिससे उसका भलीभाँति बोध हो जाय।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! महाप्रलय होनेपर सम्पूर्ण कारणोंका भी कारण परब्रह्म परमात्मा ही शेष रहता है। उसका वर्णन किया जाता, है, सुनो। समाधिमें निरोधके द्वारा जब मनकी वृत्तियोंका क्षय हो जाता है, तब मनके अपने स्वरूपका नाश करके जो अनिर्वचनीय स्वप्रकाश सद्रूप अवशिष्ट रहता है, वही उस अनन्त चिन्मय परमार्थ-वस्तुका रूप है। जब दृश्य जगत् नहीं रहता और दृश्यके अभावसे द्रष्टा भी विलीन हुआ-सा प्रतीत होता है, उस समय जो द्रष्टा, दृश्य और दर्शन—इस त्रिपुटीके लयका प्रकाशक साक्षीरूपसे अवशिष्ट रहता है, वह चिन्मय ब्रह्म ही उस परमार्थ-वस्तुका स्वरूप है। जीवरूपा चित्-सत्ताका जो अचिन्तनीय चिन्मय निर्मल एव शान्त स्वरूप है, वही उस परमार्थ वस्तु या परमा त्माका रूप है। आकाशका जो रहस्य (व्यापकत्व) है, शिलाका जो तात्त्विक रूप घनत्व है तथा वायुका जो गूढ़ रूप अन्तर-बाहरमें परिपूर्ण होना है, वही उस चेत्य-भिन्न (दृश्यरहित) चेतन आकाशस्वरूप परमात्माका स्वरूप है वेदन (बुद्धि-वृत्ति) का, प्रकाश (पदार्थोंकी स्फुरणा) का, दृश्य (विषय) का और तम (अज्ञान)-का साक्षीभूत जो अनादि-अनन्त वेदन (ज्ञान) है, वही उस परमात्माका रूप है। ज्ञेय, ज्ञान, और ज्ञाता—सामने प्रतीत होनेवाली यह त्रिपुटी जहाँ उदित होती है, जिसमें स्थित रहती है और जिसमें ही लीन हो जाती है, वही उस परमात्माका परम दुर्लभ रूप है।
श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! जो 'इदम्' रूपसे प्रत्यक्ष दिखायी दे रहा है और जिसका आप ब्रह्ममें अभाव कहते हैं, वह यह दृश्य-जगत् महाप्रलय होनेपर कहाँ स्थित होता है ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! जैसे वन्ध्याके पुत्र और आकाशमें वन कभी नहीं होते, उसी प्रकार यह सम्पूर्ण दृश्यजगत् तीनों कालोंमें कभी अस्तित्वमें नहीं आता। जगत् न कभी उत्पन्न हुआ है और न उसका कभी नाश ही होता है। जिसकी पहले सत्ता ही नहीं है, उसकी उत्पत्ति कैसी, और उसके विनाशकी चर्चा कैसी !
श्रीरामजीने पूछा—वन्ध्यापुत्र और आकाश-वृक्षकी कल्पना तो की ही जाती है। वह कल्पना जैसे उत्पत्ति और विनाशसे युक्त है, उसी प्रकार यह जगत् भी जन्म और नाशसे युक्त क्यो नहीं होगा ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—जैसे सोनेके कड़ेमें सुस्पष्ट दिखायी देनेवाला यह कटकत्व वास्तवमे हैं नहीं, सुवर्ण ही उसकेरूपमे भासित होता है, उसी प्रकार परब्रह्म परमात्मामें जगत् नामकी कोई वस्तु नहीं है (जिसे हम जगत् कहते हैं, वह ब्रह्म ही है)। जैसे आकाशमें जो शून्यता है वह आकाशसे भिन्न नहीं है, उसी प्रकार ब्रह्ममें प्रत्यक्ष उपलब्ध होनेपर भी यह जगत् उससे भिन्न नहीं है। जैसे कालिमा काजलसे भिन्न नहीं है और जैसे शीतलता बर्फसे पृथक् नहीं है, उसी तरह परमपद-परमात्मामें पृथक् प्रतीत होनेवाला जगत् नहीं है। जैसे शीतलता चन्द्रमासे और हिमसे अलग नही होती, उसी प्रकार यह सृष्टि भी ब्रह्मसे पृथक् नहीं है। जैसे मरुभूमिमें प्रतीत होनेवाली मृग-तृष्णाके नदीमें जल नहीं है तथा जैसे नेत्रदोषसे प्रतीत होनेवाले द्वितीय चन्द्रमामें चन्द्रत्व नहीं है, उसी प्रकार निर्मल परमात्मामें प्रत्यक्ष दीखनेपर भी जगत् नामकी कोई वस्तु नहीं है। स्वप्नमें—स्वप्न देखनेवाले पुरुषके अन्तःकरणमें जो स्वाप्निक जगत्की भ्रान्ति होती है, वह जैसे संवित् (ज्ञान) का विकासमात्र है, उसी तरह सृष्टिके
उत्पत्ति-प्रकरण ] * ब्रह्ममें जगत्का अध्यारोप; जीव एवं जगत्के रूपमें ब्रह्मकी ही अखण्ड सत्ताका वर्णन * १०९
प्रारम्भिक कालमें ब्रह्ममें ही इस जगत्का विकास हुआ है। अतः यह उससे भिन्न नहीं है। जैसे द्रवत्व (तरलता) जलरूप ही है, स्पन्दन ( कम्पन ) वायुरूप ही है और जैसे आभास प्रकाशरूप ही है, उसी प्रकार भूत, भविष्य और वर्तमान—तीनों कालोंमें प्रतीत होनेवाला जगत् ब्रह्म-रूप ही है। जिस प्रकार स्वप्न देखनेवाले पुरुषके भीतरका चैतन्य ही ग्राम नगर आदि-जैसा प्रतीत होता है, उसी प्रकार परमात्मामें उसका अपना चिन्मय स्वरूप ही जगत्-सा भासित होता है।
श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! यदि यह दृश्यरूपी विश्व उत्पन्न होकर भी स्वप्नगत जगत्के समान मिथ्या ही है, तो इसकी इतनी सुदृढ़ प्रतीति कैसे हो रही है—यह बताइये।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! यह जगत् सर्वात्मक ( ब्रह्ममय ) ही है, ब्रह्मसे भिन्न कदापि नहीं। जगत्-रूपमें जो इसकी प्रतीति होती है, वह सर्वथा असत् है। रघुनन्दन ! यह प्रसिद्ध परमात्मा एक ही है। उसके विषयमें द्वितीय होनेकी कोई कल्पना नहीं है। उस अद्वितीय परमात्मामें यह जगत् जिस प्रकार उत्पन्न हुआ है, वह तुम्हें आगे चलकर बताऊँगा। प्रिय श्रीराम ! उसीसे ये सारे दृश्य-पदार्थ विस्तारको प्राप्त हुए हैं। वह परमात्मा ही यह व्यष्टि और समष्टिरूप जगत् है। दृश्य वस्तुओंके दर्शन और मननीय वस्तुके मननके जो-जो प्रकार हैं, उनके रूपमें वह स्वयं ही उदित और विलीन होता रहता है—उसीके आविर्भाव और तिरोभाव होते रहते हैं।
( सर्ग १०-११ )
ब्रह्ममें जगत्का अध्यारोप, जीव एवं जगत्के रूपमें ब्रह्मकी ही अखण्ड सत्ताका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जैसे सुषुप्ति ही स्वप्नवत् प्रतीत होती है, उसी प्रकार ब्रह्म ही इस सृष्टिके रूपमें प्रतीतिक विषय हो रहा है। एक पुरुषकी वासना-मात्रका कार्य होनेसे स्वप्नकी घनी ( सुदृढ़ ) प्रतीति नहीं होती; परंतु यह प्रपञ्च समष्टिकी वासनाका कार्य होनेके कारण इसकी सुदृढ़ एवं क्रमबद्ध प्रतीति होती है। सर्वात्मक ब्रह्म ही इस प्रपञ्चका अधिष्ठान है। असीम प्रकाशस्वरूप जो अनन्त चैतन्यमणि ( ब्रह्म ) है, उसका सत्तामात्र रूप ही यह सम्पूर्ण विश्व है।
पञ्चभूतोंकी जो तन्मात्राएँ हैं, वे ही जगत्का बीज हैं। पञ्चतन्मात्राओंका बीज आदिमाया शक्ति है, जिसका परमात्मासे व्यवधान-रहित ( साक्षात् ) सम्बन्ध है तथा वही जगत्की स्थितिमें हेतु है। इस प्रकार वह चिन्मय, अजन्मा एवं सबका आदिभूत परमात्मा ही मायाद्वारा जगत्का बीज होता है। मायाके हट जानेपर वही अपने विशुद्ध रूपसे सदा अनुभवमें आता है। इसलिये यह जगद्-वैभव चिन्मय परमात्मरूप ही है।
जैसे स्वप्नमें बिना बनाये ही नगर बन जाता है उसी प्रकार महाकाशरूपी महान् वनमें जगद्रूपी वृक्ष बारंबार उत्पन्न होकर नष्ट हो जाता है। जैसे स्वप्न देखनेवाला पुरुष अपने लिये नगरका निर्माण-सा कर लेता है, उसी प्रकार यह चेतन आत्मा भी पृथ्वी आदिकी सृष्टि कर लेता है। वास्तवमें उस समय भी वह अहङ् चेतन आत्मा ही रहता है। जगत्का बीज हैं पञ्चतन्मात्राएँ और उनका बीज है अविनाशी चेतन आत्मा। जो बीज है, उसीको फल समझो ( क्योंकि उपादान कारण और कार्यमें भेद नहीं है )। इसलिये सारा जगत् ब्रह्ममय ही है। जो स्वरूप कल्पित है, वह सत्य कैसे हो सकता है। यदि पञ्चभूतोंकी तन्मात्राएँ ब्रह्मस्वरूपा हैं तो उनके कार्यरूप स्थूल पाँच महाभूतोंको भी ब्रह्म ही समझो। इससे यह सिद्ध हुआ कि सदासे दृढ़मूल यह त्रिलोकी ब्रह्म ही है।
इस प्रकार यह जगत् न कभी उत्पन्न होता है न उत्पन्न हुआ दिखायी देता है। जैसे स्वप्न एवं मनोरथ-
११० * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ
द्वारा निर्मित पुर असत् होता हुआ भी सत्-सा प्रतीत होता है, उसी प्रकार ब्रह्माकाशरूपी परम व्योममय चिन्मय आत्मामें जीवाकाशत्व असत् होता हुआ भी सत्-सा प्रतीत होता है, अर्थात् उस ब्रह्ममय महाकाशसे अविभक्त होनेपर भी विभक्त-सा दीखता है । चिदात्मा परमेश्वरमें कल्पित समष्टि-जीवाकाश अत्यन्त विस्तृत होता हुआ भी 'मैं चिनगारीकी भाँति अत्यन्त सूक्ष्म तेजका कण हूँ' ऐसी भावना करनेसे वह अपनेको वैसा ही ( अणुरूप ही ) अनुभव करने लगता है । आकाशमें आत्मरूपसे जिस स्थूलताका चिन्तन करता है, भावनाद्वारा अपनेको वैसा ही स्थूल समझने लगता है । जैसे संकल्पसे कल्पित चन्द्रमा सत् नहीं है, वैसे ही भावनाद्वारा भावित वह रूप भी सत् नहीं है, तथापि सत्-सा प्रतीत होता है । जैसे स्वप्न देखनेवाला मनुष्य सपनेमें अपनेको पथिकके रूपमें देखता है, उसी प्रकार वह चित्तकी कल्पनासे अपनेमें लिङ्ग देह और भावी स्थूल शरीरकी प्रतीतिको भी धारण करता है । जैसे पर्वत बाहर स्थित होनेपर भी दर्पणके भीतर स्थित हुआ-सा प्रतीत होता है, जैसे कुएँके जलमें प्रतिबिम्बित हुआ शरीर वही व्यवहारकर्ता-सा जान पड़ता है, जैसे दूरतक सुनायी देने योग्य शब्द भी सम्पुट ( गुफा आदि ) में अवरुद्ध होकर उसके भीतर ही रह जाता है, बाहर नहीं फैलने पाता तथा जैसे स्वप्न और मनोरथविषयक संवित् देहके भीतर ही स्वप्न आदि देखती है—वे विषय बाहर होनेपर भी अपने बाह्य रूपको त्यागकर ही शरीरके भीतर अन्तःकरणमें भासित होते हैं, उसी प्रकार आगकी चिनगारीके समान अणु उपाधिमें स्वरूपतः कल्पित जो सूक्ष्मशरीर है, उसके भीतर स्थित हुआ यह जीवात्मा वासनामय देहादि-व्यवहारका अनुभव करता है ।
मनोमय शरीरवाला जीव अपने मनोमय देहाकाशमें ही स्थूलताकी भावना करके स्थूल-देहधारी हो गया है । वह अपनी कल्पनाके भीतर ही स्थित हुए ब्रह्माण्डका दर्शन करता है । मनोमय शरीरधारी जीव मनको ही आत्मा समझता है । उस आत्मभूत चित्तसे अपने संकल्पके अनुसार अपने ही लिये गर्भरूपी गृह, देश, काल, कर्म तथा द्रव्य आदिकी कल्पनाओंकी भावना करता हुआ नाम आदिका निर्माता बनकर वह आतिवाहिक देहधारी जीव अपने द्वारा कल्पित विभिन्न नामोंसे उन-उन पदार्थोंको और अपनेको भी असत्य जगत्-रूपी भ्रममें बाँधता है । जैसे मिथ्याभूत स्वप्नमें झूठे ही अपना उड़ना प्रतीत होता है, उसी प्रकार असत्य जगत्-रूपी भ्रममें ही यह जीवात्मा मिथ्या विकासको प्राप्त होता जान पड़ता है । वह कभी उत्पन्न नहीं हुआ है । इस ब्रह्माण्डरूपी भ्रमके उदित होनेपर भी इसमें कभी कुछ उत्पन्न नहीं हुआ । उत्पन्न हुई कोई वस्तु दिखायी नहीं देती; केवल अनन्त, निर्मल ब्रह्माकाश ही सर्वत्र विद्यमान है । संकल्पद्वारा निर्मित नगरके समान यह दृश्य-प्रपञ्च सत्-सा प्रतीत होनेपर भी सत् नहीं है । स्वयं उदित हुआ यह प्रपञ्च उस चित्रके समान है, जिसका किसी चित्रकारने न तो निर्माण किया है और न उसमें रंग ही भरा है । यह बिना बनाये ही बनकर अनुभवमें आ रहा है और सत्य न होकर भी सत्य-सा स्थित है । महाकल्पके अन्तमें ब्रह्मा आदिके मुक्त हो जानेके कारण निश्चय ही वर्तमान कल्पके ब्रह्माको कोई पूर्वजन्मकी स्मृति नहीं रह जाती, अतः वह स्मृति इस जगत्की उत्पत्तिमें कारण नहीं हो सकती । इसलिये वर्तमान कल्पमें जैसे ब्रह्मा संकल्पमय हैं, वैसे ही उनसे उत्पन्न हुआ यह जगत् भी संकल्पजन्य ही माना गया है । इस पृथ्वी आदिकी सृष्टिके विषयमें जो इस तरह साक्षीका अनादिकालका अनुभव है, उसीको यदि कारण माना जाय तो साक्षिपेक्ष स्वप्नदृष्ट पृथ्वी आदि पदार्थ जैसे जागरण-अवस्थामें मिथ्या सिद्ध होते हैं उसी प्रकार अनादि साक्षीके संस्कारसे उत्पन्न जगत् भी मिथ्या ही सिद्ध होगा ।
जैसे जिस किसी भी देश या कालमें द्रवत्व जलसे
उत्पत्ति-प्रकरण] * भेदके निराकरणपूर्वक एकमात्र ब्रह्मकी ही अखण्ड सत्ताका वर्णन * १११
भिन्न नहीं होता, उसी प्रकार किसी भी देश या कालमें यह सृष्टि परमात्मासे भिन्न नहीं है । इस प्रकार यह सृष्टि भ्रमसे ही प्रौढ ( सुदृढ या घनीभूत ) प्रतीत होती है । वास्तवमें यह विषमतारहित परमात्मा ही इसके रूपमें स्थित है । जो ब्रह्माण्ड प्रतीत होता है, वह अत्यन्त निर्मल चिन्मय ब्रह्म ही है ( उससे भिन्न दूसरी कोई वस्तु नहीं है )। इसी तरह यह दृश्य-जगत्, जो आत्मामें सर्वथा कल्पित भ्रमरूप है, शान्त, आधाररहित, आधेय-शून्य, अद्वैत तथा एकत्वके व्यवहारसे भी शून्य ब्रह्मरूप ही है । यद्यपि इस जगत् रूपी भ्रमकी प्रतीति होती है, तथापि उसके रूपमें कोई वस्तु उत्पन्न नहीं हुई है । चारों ओरसे शून्य जो निर्मल चेतनाकाश ( ब्रह्म ) प्रतिष्ठित है, वही सदा सर्वत्र अपने स्वरूपसे स्थित है । उसमें न सम्पूर्ण संसार है, न उसका कोई आधार है, न आधेय है; न दृश्य है न उसमें द्रष्टापन है; न ब्रह्माण्ड है न ब्रह्मा है और न कहीं कोई वितण्डावाद ही है । न जगत् है न पृथ्वी है । यह सम्पूर्ण दृश्य शान्तस्वरूप निर्मल ब्रह्म ही है । इस प्रकार परब्रह्म परमात्मा ही अपनेमें अपनेसे विकासको प्राप्त होता है ।
जैसे तरल होनेके कारण जल ही अपनेमें आवर्त रूपसे प्रतीत होता है, उसी प्रकार चित्-रूप होनेके कारण आत्मा ही अपनेमें जगत्-सा प्रतीत होता है । जगत् इससे कोई भिन्न पदार्थ नहीं है । असत् होता हुआ ही यह प्रतीतिका विषय होता और यहाँ सत्-सा अनुभवमें आता है । अन्तमें ( महाप्रलयके समय ) यह असत् होता हुआ ही नष्ट होता है । जैसे स्वप्नमें जो अपना मरण दिखायी देता है, वह जाग्रत्कालमें असत् ही सिद्ध होता है, उसी प्रकार अज्ञान अवस्थामें प्रतीत होनेवाला यह दृश्य-प्रपञ्च ज्ञान होनेपर असत् ही सिद्ध होता है । ( अथवा प्रलयकालमें जो इसका संहार होता है, वह स्वप्नावस्थामें प्रतीत होनेवाले अपने ही मरणके समान मिथ्या है । ) अथवा ब्रह्मका अपना ही स्वरूप होनेके कारण यह दृश्य-प्रपञ्च सन्मात्र, अनामय, अखण्डित ( परिपूर्ण ), अनादि, अनन्त तथा चेतन आकाशरूप ब्रह्म ही है । ( उससे अतिरिक्त इसकी सत्ता ही नहीं है । ) (सर्ग १२-१३)
भेदके निराकरणपूर्वक एकमात्र ब्रह्मकी ही अखण्ड सत्ताका वर्णन तथा जगत्की पृथक् सत्ताका खण्डन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! इस प्रकार अहंता आदि दृश्यसमूहभूत जगत् वास्तवमें कोई वस्तु नहीं है । कभी उत्पन्न न होनेके कारण इसका अस्तित्व है ही नहीं और जिसका अस्तित्व है, वह तो परब्रह्म परमात्मा ही है । यदि स्वप्नमें दिखायी देनेवाला पर्वत अविनाशी हो तो यह जगत् उसीके समान अविनाशी है । यदि स्वप्नमें प्रतीत होनेवाला नगर स्थिर हो तो उसी तरह यह जगत् भी स्थिर है । ( तात्पर्य यह कि जैसे वे अविनाशी और स्थिर नहीं हैं, वही दशा इस जगत्की भी है ।) यदि चित्रकारका चित्त स्थिर हो और उसमें वासनामय स्थिर चित्र बने तो उस चित्रमें कल्पनाद्वारा अङ्कित सेनाके समान ही इस जगत्की आकृति है अर्थात् जैसे उस चित्रमें अङ्कित सेना अस्थिर एवं असत्य है, उसी तरह यह जगत् भी है । आदि-प्रजापतिकी भी, जो स्वयंभू नामसे पहले-पहल विख्यात हुआ, कोई कारण नहीं है; क्योंकि उसके पूर्वजन्मके कर्म शेष नहीं हैं । महाप्रलय होनेपर पूर्वकालके सभी प्रजापति मुक्त हो जाते हैं, अतः उनमें पूर्वजन्मका कर्म कैसे रह सकता है । ब्रह्म ही सबसे प्रथम होनेवाला हिरण्यगर्भ है । वही विराट् है और विराट् ही सृष्टिरूप है । इस तरह वह चिन्मय परमात्मा ही जीवाकाशरूपसे स्थित है, जिससे पृथ्वी आदि सत् प्रपञ्चकी उत्पत्ति होती है । ( तात्पर्य यह कि समस्त जगत् ब्रह्म ही है, ब्रह्मसे भिन्न दूसरी कोई वस्तु नहीं । )
११२ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
केवल एकमात्र शुद्ध चिद्धन निर्मल एवं सर्वव्यापक ब्रह्म ही सदा सर्वत्र विराजमान है। वह सर्वशक्तिमान् होनेसे जिन-जिन कौशलपूर्ण कल्पनाओंकी भावना करता है, उन्हें स्वयं ही प्राप्त करता है—स्वयं तद्रूप हो जाता है। जैसे हाथमें दीपक लेकर ढूँढ़ा जाय या देखा जाय तो अन्धकार अदृश्य हो जाता है, उसका कहीं पता नहीं लगता, उसी प्रकार ज्ञानका प्रकाश छा जानेपर अज्ञानरूपी अन्धकारका तत्त्व ज्ञात नहीं होता—उसका पता ही नहीं चलता। इसी प्रकार अखण्ड, व्यवधानशून्य, अनादि, अनन्त तथा सर्वशक्तिमान् जीवात्मा जो कभी बाधित न होनेवाले महाचैतन्यरूपी सारभूत अंशसे रूपवान् प्रतीत होता है, ब्रह्म ही है---उससे भिन्न नहीं है। वह ब्रह्म सब प्रकारसे महान् है—देश, काल और परिणामसे परिच्छिन्न नहीं है। इसलिये कहीं उसमें भेद-की कल्पना नहीं है और जो भेदकी कल्पना होती है, वह भी ब्रह्म ही है, उससे भिन्न नहीं; क्योंकि सर्वत्र ऐसा ही अनुभव होता है। चेतनकी जो यह आकाशसे भी सूक्ष्म शक्ति सब ओर फैली है, वह स्वभावसे ही पहले इस अहंता (अहंकार) का दर्शन (अनुसंधान) करती है। जैसे जल अपने आपमें स्वयं ही बुद्बुद और तरङ्ग आदिके रूपमें स्फुरित होता है, उसी प्रकार जब आत्मा अपने आपमें स्वयं ही स्फुरणशील होता है, तब उस चेतन आत्माकी यह चिच्छक्ति उस सूक्ष्म अहंताका दर्शन (अनुसंधान) करती है, जो उत्तरोत्तर स्थूलताको प्राप्त होती हुई अन्तमें ब्रह्माण्डका आकार धारण कर लेती है। चेतनकी चमत्कारकारिणी जो चितिशक्ति है, वह स्वयं अपने आपमें जिस सुन्दर चमत्कारकी सृष्टि करती है, उसीका नाम जगत् रख दिया गया है। रघुनन्दन ! चेत्य (दृश्य) भूत जो अहंकार है, उसकी कल्पना चैतन्यके अधीन है अर्थात् चैतन्यकी ही वह कल्पना है। तथा तन्मात्रा आदि जो जगत् है, उसकी कल्पना अहंकारके अधीन है, इस प्रकार अहंकार और जगत् चैतन्यरूप ही हैं। फिर उस चैतन्यमें द्वैत और अद्वैत कहाँ रहे।
ईहा अर्थात् मनकी चेष्टा (संकल्प)-रूप जो सारा सूक्ष्म जगत् है, वह शून्य ही है तथा इन्द्रिय और उनके अधिष्ठाता देवताओंका निवासभूत जो साकार एवं स्थूल विश्व है, वह भी शून्य ही है; क्योंकि दोनों ही चैतन्य-के चमत्काररूप (चैतन्य ही) हैं। इसलिये वे चैतन्यसे भिन्न नहीं हैं। जो वस्तु जिस वस्तुका विलास होती है, वह उससे कभी भी भिन्न नहीं होती। अवयवयुक्त जल आदिके विलासभूत तरङ्ग आदिमें भी ऐसा देखा गया है। फिर अवयवरहित चेतनके विलासमें अभिन्नता हो, इसके लिये तो कहना ही क्या है। सदा अचेत्य (अदृश्य अथवा रूपसे रहित), नामरहित और सर्वव्यापक चैतन्यशक्तिका जो रूप है, उससे स्फूर्ति प्राप्त करनेवाले जगत्का भी वही रूप है। (चैतन्यकी ही जो भिन्न-भिन्न आकारमें स्फुरणाएँ होती हैं, वे ही जगत् कही गयी हैं; अतः यह जगत् उस चैतन्यशक्ति या चेतन आत्मासे भिन्न नहीं है।) श्रीराम ! चेतन आत्माका जो चैतन्य है, उसीको जगत् समझो। वह चैतन्य जगत्से पृथक् नहीं है। यदि चैतन्यको जगद्भावसे रहित या भिन्न माना जाय तो चित् चित् नहीं रह जायगा—चेतनको चेतन नहीं कहा जा सकेगा। (क्योंकि अपने धर्म या स्वरूपभूत जगत्को चेतित—प्रकाशित करनेके कारण ही उसको 'चित्' या 'चेतन' कहते हैं।) अतः चेतनसे जगत्का प्रतीतिमात्रसे ही भेद है, वास्तवमें भेद नहीं है। ऐसी परिस्थितिमें जगत्की पृथक् सत्ता कैसे सिद्ध हो सकती है।
चैतन्यप्रधान अहंकार कर्ता है और स्पन्दप्रधान (हिलना-चलना आदि चेष्टामय) प्राण कर्म (क्रिया) है। इन दोनोंमें कोई भेद नहीं है; क्योंकि कर्ताका अपनी क्रियासे भेद नहीं देखा जाता। चित्का स्पन्दनमात्र ही क्रिया (प्राण) है, उससे संयुक्त पुरुष ही 'जीव' कहा गया
कल्याण
(चित्र: सुरुचि और देवदूत)
सुरुचि और देवदूत \hfill (वैराग्य-प्रकरण सर्ग १)
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उत्पत्ति-प्रकरण ] * भेदके निराकरणपूर्वक एकमात्र ब्रह्मकी ही अखण्ड सत्ताका वर्णन * ११३
है। इस प्रकार जीव और जगत्में भी भेद नहीं है।) कार्य-कारण आदि भावरूप चेतन जगत् आत्मासे भिन्न नहीं है। वह चैतन्य प्रकाशकी एक झलकमात्र है। अतः जहाँ सब भेदोंका लय हो गया है, वह परमात्मा ही जगत् है, यह सिद्ध हुआ। इस प्रकार तत्त्वज्ञान हो जानेपर यह निश्चय हो जाता है कि मैं अच्छेद्य हूँ (कोई शस्त्र मुझे काट नहीं सकता), मैं अदाह्य हूँ (मुझे आग जला नहीं सकती), मैं अशोष्य हूँ (हवा मुझे सुखा नहीं सकती) तथा मैं नित्य सर्वव्यापी, सुस्थिर और अचल हूँ। जैसे अपने भ्रमसे औरोंको भ्रममें डालते हुए विवादशील मनुष्य परस्पर विवाद करते हैं, उसी प्रकार जो अज्ञानी हैं, वे ही इस परमात्मतत्त्वके विषयमें वाद-विवाद करते हैं। हमलोग तो भ्रमरहित हो गये हैं। अतः हमारे लिये विवादका अवसर ही नहीं है। अज्ञानी लोगोंने जिसकी सत्ताको दृढ़तापूर्वक मान रक्खा है, वह दृश्य जगत् उनकी दृष्टिमें मूर्त एवं सत्य है; अतः उन्हींकी भावनाके अनुसार उसमें पृथक् विकार आदि हो सकते हैं। परंतु आत्मज्ञानीकी दृष्टिसे जो निराकार, असत्य एवं चिन्मय आकाशरूप है, उसमें आत्मासे पृथक् विकार आदिकी प्रतीति कैसे सम्भव है।
चेतन आत्मा स्वयं अपने स्वरूपमें किसी प्रकारका विकार न आने देकर विचित्र आकाशके रूपमें आविर्भूत होता है। तत्पश्चात् वह चेतन स्वयं ही आकाशजनित वायु होकर विलक्षण स्पन्दन (कम्पन) के साथ प्रकट होता है। इसके बाद (जिसकी उत्पत्तिकी चर्चा अभी की जायगी, उस तेजस्तत्त्वके रूपमें प्रादुर्भूत हुआ) चेतन स्वयं जलतत्त्व बनकर विचित्र विकासको प्राप्त होता है। वह जल धरती खोदकर निकाले गये कूप, तड़ाग आदिके जलसे भिन्न होता है (क्योंकि पृथ्वीकी सृष्टिसे पहले उसका उस कूप आदिसे सम्बन्ध होना सम्भव नहीं है)। जलतत्त्वकी सृष्टिके बाद वह चेतन स्वयं ही सुवर्ण, रजत आदि विचित्र धातुओंसे पूर्ण पृथ्वी-तत्त्वको—देवता, असुर एवं मनुष्य आदिके शरीरभावको भी प्राप्त हुआ।
सदा उदित रहनेवाला चेतनरूपी चन्द्रमा स्वयं ही अपने विचित्र रसोल्लाससे युक्त चाँदनी और महान् चिन्मय प्रकाश बनकर प्रकट हुआ। अपने चैतन्यस्वरूपके ज्ञानके आलोकसे दृश्य-प्रपञ्चरूपी अज्ञानान्धकारके नष्ट हो जानेपर वह चेतन आत्मारूपी चन्द्रमा स्वयं ही पूर्णताको प्राप्त होकर उदित एवं प्रकाशित होता है और स्वयं ही जड़तावश स्थावर आदि पदार्थोंमें अहम्भाव करनेसे सुषुप्ति अवस्थाको प्राप्त होता है। चिन्मय महाकाशरूप ब्रह्म स्वयं ही अविचार-दशामें स्पन्दनशील प्राण आदिमें आत्मभावकी कल्पना करनेपर स्पन्दी अर्थात् संसारी हो जाता है। फिर विचार करनेसे 'मैं चेतन ही हूँ' इस प्रकार जब चैतन्य ज्ञानका उदय होता है, तब वह पुनः पूर्ववत् अपने स्वरूपभूत चैतन्यमें ही प्रतिष्ठित होता है। यह जगत् चेतनरूपी तेजका प्रकाश है। अतः ब्रह्मदृष्टिसे तो यह ब्रह्मस्वरूप है, किंतु जगत्-दृष्टिसे यह सर्वथा अस्तित्व-शून्य है। जगत् चेतनरूपी एकमात्र आकाशकी शून्यता है। ब्रह्मरूपसे यह सत् है और जगत्-रूपसे असत्। जगत् चेतनरूपी आलोकका महान् रूप है। ब्रह्मदृष्टिसे वह सत् है और उससे भिन्न रूपमें उसकी सत्ताका सर्वथा अभाव है। जगत् चेतनरूपी वायुका स्पन्दनमात्र है। यह जगन्मयी रेखा चेतनरूपी अग्निकी उष्णता है (जैसे अग्निका उष्णतासे भेद नहीं है, उसी प्रकार चेतनका जगत्से)। यह जगत् चेतनरूपी जलका द्रवत्व (तरलता है, चिन्मय इक्षुदण्डका माधुर्य है, चैतन्यरूप हिमकी शीतलता है, चेतनरूपी ज्वालाकी लपट है, चैतन्यमयी सरिताकी तरङ्ग है और चेतनरूपी सुवर्णका बना हुआ कङ्कण है, चेतनकी सत्ता ही इस जगत्की सत्ता है। जैसे आकाशमें मल नहीं है—वह सर्वथा निर्मल है उसी प्रकार चेतन परमात्मामें भेद और विकार आदि नहीं हैं—वह सर्वथा अखण्ड एवं निर्विकार है।
११४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
इस प्रकार ये तीनों लोक सत् आत्माका स्वरूपभूत होने- से सत् हैं, अन्यथा इनका कोई अस्तित्व नहीं है।
चिन्मय परमात्मामें अवयव और अवयवी—इन दोनों शब्दोंके अर्थ खरगोशके सींगकी भाँति असत् हैं। सम्पूर्ण पदार्थ-समूहोंके अधिष्ठानभूत चेतन आकाशमय परमात्मामें इस भूताकाशजनित वायु आदि जगत्रूपी मलकी प्रतीति होती है; परंतु जब असङ्ग भूताकाशसे ही उसके कार्यभूत वायु आदिका सम्बन्ध नहीं है, तब चेतन महाकाश- स्वरूप परमात्मामें इस प्रपञ्चकी सत्ता, असत्ता तथा तू, मैं आदि भावोंके सम्बन्ध कैसे हो सकते हैं? संसारमें जितने कार्य हैं, उन सबके समस्त कारण-समूहोंका आदिकारण ब्रह्मा है। चित्तसे उत्पन्न मनोरथजनित सारे संकल्प-विकल्प असत् होते हैं, अतः चित्त स्वभावसे ही किसीका कारण नहीं है। वह अकारणरूप ही है और वही ब्रह्मा है। यदि हम कहें कि 'चेत्य जगत्के असत् होनेपर चेतन भी असत् हो जायगा; क्योंकि वह अपने स्वरूपभूत चेत्यसे पृथक् नहीं है', तो यह ठीक नहीं। चेतनकी असत्ता तो वाणीमात्रसे भी सिद्ध नहीं की जा सकती; क्योंकि चेतन आत्मा अनुभवसे सिद्ध है। जो है, उसका अवश्य उदय होता है, जैसे बीजसे अङ्कुरका। यह बात प्रत्यक्ष देखी गयी है। (अतः यह सिद्धान्त स्थिर हुआ कि परमात्माकी सत्तासे ही जगत्की सत्ता है, स्वतन्त्र नहीं।)
महर्षि वसिष्ठ जब इतनी बात कह चुके, तब दिन बीत गया। सूर्य अस्ताचलको चले गये। मुनियोंकी वह सभा सायंकालिक नित्यकर्म करनेके लिये स्नान करनेके उद्देश्यसे महर्षिको नमस्कार करके उठ गयी। फिर जब रात बीती, तब प्रातः कालके सूर्यकी किरणोंके साथ-साथ वह मुनिमण्डली पुनः सभामवनमें आकर बैठ गयी। (सर्ग १४)
जगत्के अत्यन्ताभावका प्रतिपादन, मण्डपोपाख्यानका आरम्भ, राजा पद्म तथा रानी लीलाका परस्पर अनुराग, लीलाका सरस्वतीकी आराधना करके वर पाना और रणभूमिमें पतिके मारे जानेसे अत्यन्त व्याकुल होना
जैसे समुद्रके भीतर जलके स्पन्द (हलन-चलन आदि) जलके स्वभावसे च्युत हुए बिना ही लहरोंके वेगके रूपमें प्रकट होते हैं, उसी प्रकार चेतन परमात्मा- में दृश्यजगत्की प्रतीतियाँ होती रहती हैं। जैसे स्वप्न और संकल्प (मनोरथ) में प्रतीत होनेवाले घट-पट आदि पदार्थ अनुभवमें आनेपर भी वास्तवमें हैं नहीं, उसी प्रकार चेतनाकाशरूपी परब्रह्म परमात्मामें दृष्टिगोचर होनेवाले ये पृथ्वी आदि जगत् इन्द्रियोंके अनुभवमें आनेपर भी वास्तवमें हैं नहीं। जैसे मरुभूमि सूर्यकी किरणोंके अन्तर्गत दीखनेवाली जलकी नदी (मृगतृष्णा) में कहीं भी जलका होना सम्भव नहीं है उसी प्रकार इस विज्ञानाकाशस्वरूप जगत्में मूर्तरूप होना कदापि सम्भव नहीं है। जिसमें मूर्त रूपका ग्रहण नहीं होता तथा जो सङ्कल्पकल्पित नगरके समान मिथ्या है, उस जगत्में जो दृश्यताकी प्रतीति होती है, वह मरुमरीचिकामें दृष्टिगोचर होनेवाली नदी- के समान भ्रान्तिरूप ही है। इस जगत्का जो दर्शनीय-सा दृश्य-वैभव है, उसे साक्षिभूत चैतन्यमयी तराजूके एक पलड़ेमें रक्खा जाय और दूसरी ओर स्वप्नको रखकर सार और असारका विवेचन करनेवाली बुद्धिरूप काँटेसे यदि तौला जाय तो वह दृश्य- वैभव स्वप्नकी भाँति कलनारहित (असत्य) होकर आकाशकी भाँति शून्यरूप अथवा चेतनाकाशमय ब्रह्मरूपमें ही स्थित होता है।
अज्ञानियोंकी जो समझ है, उसीमें 'जगत्' शब्दका ब्रह्मसे भिन्न अर्थ भासित होता है। वास्तवमें जगत्,
उत्पत्ति-प्रकरण ] * जगत्के अत्यन्ताभावका प्रतिपादन तथा मण्डपोपाख्यानका आरम्भ * ११५
ब्रह्म और स्व (आत्मा)—इन शब्दोंके अर्थमें कोई भेद है ही नहीं। इसलिये यहाँ जगत् आदि कोई भी दृश्य उत्पन्न नहीं हुआ है। नाम और रूपसे रहित चेतन ब्रह्म ही ज्यों-का-त्यों (निर्विकार भावसे विराज-मान है। इस रीतिसे मायामय महाकाशमें स्थित यह जगत् आवरणशून्य चेतन आकाशरूप परमात्मा ही है। इस विषयमें मण्डपोपाख्यान सुनाया जाता है, जो कानोंके लिये आभूषणरूप है। तुम ध्यान देकर इसे सुनो।
पूर्वकालमें इस भूतलपर पद्म नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं, जो अपने कुलरूपी सरोवरमें प्रफुल्ल कमलके समान शोभा पाते थे। वे राजलक्ष्मीसे सम्पन्न और अनेक पुत्रोंसे युक्त होते हुए भी विवेक-शील थे। वे मर्यादाका पालन करनेमें समुद्र और दोषरूपी तिनकोंको जला डालनेके लिये अग्निके समान थे। जैसे मेरुपर्वत देवताओंका आश्रम है, वैसे ही वे
विद्वानोंके समुदायको आश्रय देनेवाले थे। जैसे पूर्ण चन्द्रमाके उदयसे महासागर उल्लसित हो उठता है, उसी प्रकार उनके सुयशके विस्तारसे संसारका आनन्द-वर्धन होता था। वे सद्गुणरूपी हंसोंके लिये मान-सरोवर थे। संग्राम-भूमिमें शत्रुरूपी झाड़ियोंको कम्पित कर देनेके लिये प्रचण्ड पवन थे। मनरूपी मतवाले हाथीको वशमें करनेके लिये सिंह थे। समस्त विद्यारूपी वनिताओंके प्राणवल्लभ और सम्पूर्ण आश्चर्यमय गुणोंकी खान थे। देवद्रोही दैत्योंके सैन्य-समुद्रको मथ डालनेके लिये शोभाशाली मन्दराचल थे। भगवान् विष्णुके समान साहस और उत्साहसे सम्पन्न थे। सौजन्यरूपी कुमुदिनीके विकासके लिये शीतरश्मि चन्द्रमा थे तथा दुराचाररूपी विषकी बेलोंको भस्म करनेके लिये धधकती हुई आग थे।
राजा पद्मकी पत्नीका नाम था लीला। वह बड़ी सुन्दरी तथा सब प्रकारके सौभाग्यसे सम्पन्न थी। लीला इस भूतलपर प्रकट हुई लक्ष्मीके समान शोभा पाती थी। पति-सेवाके जितने प्रकार हो सकते हैं, उन सबमें निपुण होनेके कारण उसकी मनोरमता बढ़ गयी थी (अथवा सबके अनुकूल बर्ताव करनेके कारण वह सभीको प्रिय एवं मनोहर जान पड़ती थी)। वह सदा मीठे वचन बोला करती थी और आनन्दमग्न होकर मन्द-मन्द गतिसे चलती थी। जब वह मुस्कराती, उस समय ऐसा लगता, मानो दूसरे चन्द्रमाका उदय हो गया है। उसके अङ्ग गौर वर्णके थे। पतिकी प्राणवल्लभा लीला राजाके खिन्न होनेपर खिन्न हो उठती थी, उनके प्रसन्न होनेपर आनन्दमग्न हो जाती थी और जब वे किसी चिन्तासे व्याकुल होते, तब वह भी चिन्ताके कारण घबरा उठती थी। इस प्रकार सारी बातोंमें तो वह पतिके प्रतिबिम्बकी भाँति उनका अनुकरण एवं अनुसरण करती थी; परंतु उनके कुपित
११६ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
होनेपर वह केवल भयभीत होती थी (क्रोध नहीं करती थी)।
रघुनन्दन ! लीला अपने पतिकी अनन्यप्रिया—एकमात्र वल्लभा थी अथवा उसका अपने पतिमें अनन्य अनुराग था। ऐसी भार्याके पति महाराज पद्मने भूतलकी अप्सरा-सी मनोहर अपनी उस प्रेयसीके साथ स्वाभाविक प्रेम-रसका आस्वादन करते हुए विहार किया। इस प्रकार सुखमें पली हुई राजाकी प्रणयिनी और प्रियतमा, सुन्दर भौंहों और शुभ संकल्पसे सुशोभित होनेवाली लीलाने एक दिन मन-ही-मन विचार किया कि 'ये मेरे प्राणोंसे भी अधिक प्रिय पतिदेव पृथ्वीनाथ महाराज, जो जवानीके उल्लाससे परिपूर्ण और परम कान्तिमान् हैं, किस उपायसे अजर-अमर हो सकते हैं ? मैं तप, जप और यम-नियम आदि चेष्टाओंसे ऐसा प्रयत्न करूँ, जिससे ये चन्द्रमाके समान मनोहर मुखवाले राजा अजर-अमर हो जायें। पहले मैं ज्ञान, तपस्या और विद्यामें बड़े-चढ़े ब्राह्मणोंसे पूछती हूँ कि कौन-सा ऐसा उपाय है, जिससे मनुष्योंकी मृत्यु न हो।' ऐसा विचार करके उसने पूर्वोक्त गुणवाले ब्राह्मणोंको बुलवाया और उनकी पूजा करके नतमस्तक हो बारंबार पूछा—'विप्रगण ! (मुझे और मेरे पतिको) अमरत्व कैसे प्राप्त हो सकता है ?'
ब्राह्मण बोले—देवि ! तप, जप और यम-नियमों-का पालन करनेसे सिद्धोंकी समस्त सिद्धियाँ प्राप्त हो सकती हैं; परंतु उनसे अमरत्व कदापि नहीं मिल सकता।
ब्राह्मणोंके मुखसे यह बात सुनकर अपने प्रियतमके भावी वियोगसे भयभीत हो लीलाने अपनी बुद्धिसे ही फिर तत्काल इस प्रकार सोचना आरम्भ किया—'यदि दैववश पतिके सामने मेरी मृत्यु हो गयी, तब तो मैं सम्पूर्ण दुःखोंसे छूटकर परमात्मामें सुखपूर्वक स्थित हो जाऊँगी; किंतु यदि एक सहस्र वर्षके बाद पहले मेरे पति ही चल बसे तो मैं ऐसा यत्न करूँगी, जिससे उनका जीव घरसे बाहर न जा सकेगा। फिर तो मैं अपने अन्तःपुरके मण्डपमें, जहाँ मेरे पतिदेवका जीव विचर रहा होगा, पतिके दृष्टिपथमें रहकर सदा सुखपूर्वक निवास करूँगी। अपने संकल्पकी सिद्धिके लिये मैं आजसे ही जप, उपवास और नियमोंद्वारा ज्ञानमयी सरस्वती देवीकी तबतक आराधना करती रहूँगी, जबतक कि वे पूर्णरूपसे संतुष्ट न हो जायें।'
ऐसा निश्चय करके उस श्रेष्ठ नारीने अपने स्वामीको बताये बिना ही नियमपरायण हो शास्त्रीय विधिके अनुसार उग्र तपस्या आरम्भ कर दी। तीन-तीन रात बीत जानेपर वह भोजन करती और देवता, ब्राह्मण, गुरु, ज्ञानी एवं विद्वानोंकी पूजामें तत्पर रहती थी। वह अपने शरीरको सदा स्नान, दान, तप और ध्यानमें लगाये रखती थी। सम्पूर्ण शास्त्रीय कर्मोंका फल अवश्य मिलता है, ऐसी आस्तिकतापूर्ण बुद्धिसे युक्त हो वह सदाचारका पालन करती और पतिके क्लेशोंका निवारण
उत्पत्ति-प्रकरण ] * जगत्के अत्यन्ताभावका प्रतिपादन तथा मण्डपोपाख्यानका आरम्भ * ११७
करनेमें दत्तचित्त रहती थी। उन दिनों भी वह पहले-की ही भाँति ठीक समयपर पूरी चेष्टा और लगनके साथ शास्त्रोक्त रीतिसे क्रमशः पतिकी सेवा-शुश्रूषा करके उन्हें संतुष्ट रखती थी । अतः अपनी वर्तमान स्थितिका उसने पतिको पता नहीं लगने दिया । इस तरह नियम-पालनसे सुशोभित होनेवाली उस भोली-भाली लीलाने लगातार तीन सौ रातोंतक कष्टप्रद चेष्टाओंके द्वारा तपस्याका निर्वाह किया। सौ त्रिरात्र व्रतोंकी पूर्ति हो जानेपर उसके द्वारा पूजित और सम्मानित हो गौरवर्णा भगवती वागीश्वरी सरस्वती संतुष्ट हो उसके सामने प्रकट हुईं और बोलीं।
श्रीसरस्वतीजीने कहा—बेटी! तुमने जो निरन्तर तपस्या की है, वह तुम्हारी पति-भक्तिके कारण अधिक उत्कर्ष-शालिनी हो गयी है। उससे मैं तुमपर बहुत संतुष्ट हुई हूँ । अतः तुम मुझसे कोई मनोवाञ्छित वर ग्रहण करो।
रानी बोली—देवि! आप जन्म और जरारूपी अग्निकी ज्वालाओंसे उत्पन्न दाहरूपी दोषका शमन करनेके लिये चन्द्रमाकी प्रभाके समान हैं, आपकी जय हो। आप हृदयको अज्ञानान्धकार-राशिका निवारण करनेके लिये सूर्यदेवकी प्रभाके तुल्य हैं, आपकी जय हो। अम्ब! मातः! जगदम्बिके! इस दीन सेविकाका आप संकटसे उद्धार करें। शुभे! मैं आपसे जो दो वर माँगती हूँ, उन्हें मुझे देनेकी कृपा कीजिये। उनमें पहला वर तो यह है कि जब मेरे पतिदेवका शरीर छूट जाय, तब उनका जीव मेरे इस अन्तःपुरके मण्डपसे बाहर न जाय। और महादेवि! मैं दूसरा वर यह माँगती हूँ कि जब-जब मैं आपसे वर पानेके उद्देश्यसे दर्शन देनेकी प्रार्थना करूँ तब-तब आप मुझे अवश्य दर्शन दें।
लीलाकी यह बात सुनकर जगन्माता सरस्वतीने कहा—'बेटी! तुम्हारी यह अभिलाषा पूर्ण हो।' यह कहकर वे स्वयं वहाँसे अदृश्य हो गयीं—ठीक वैसे ही जैसे महासागरमें लहर उठकर स्वयं ही शान्त हो जाती है। तदनन्तर जिसकी इष्टदेवी संतुष्ट हो गयी थीं, वह राजरानी लीला संगीत सुनकर मस्त हुई मृगीके समान आनन्दमें मग्न हो गयी। इसके बाद पक्ष जिसके नेमिगोलक, मास जिसके मध्यगोलक तथा ऋतु जिसके नाभिगोलक हैं, दिन जिसके अरे हैं, वर्ष जिसका अक्षदण्ड (धुरा) है और क्षण जिसके नाभिका छेद है, ऐसे गतिशील कालचक्रके चलते रहनेसे लीलाके पतिकी चेतना सूखे पत्तेके रसकी भाँति देखते-ही-देखते शरीरमें सहसा अदृश्य हो गयी।
| ११८ | * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * | [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ |
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बात यह हुई कि किसी शत्रुने आक्रमण किया और युद्धमें घायल होकर उनका शरीर धराशायी हो गया। (वे अन्तःपुरमें लाये गये और वहीं मर गये।) इस प्रकार राजाकी मृत्यु हो जानेपर लीला अन्तःपुरके मण्डपमें जलशून्य कमलिनीकी भाँति मुरझा गयी—उसका मुख मलिन हो गया। विपत्तुल्य उस निःश्वाससे उसका सारा अधर-पल्लव सूख गया। वह बेचारी बाणसे बिंधी हुई हरिणीके समान छटपटाती हुई मृत्यु-तुल्य अवस्थाको पहुँच गयी। तत्पश्चात् जलाशयके सूख जानेसे व्याकुल हुई मछलीके ऊपर जैसे आषाढ़की पहली वर्षा अनुकम्पा करती है, उसी प्रकार पतिके वियोगसे अत्यन्त विह्वल हुई लीलाके ऊपर दयामयी सरस्वतींने आकाशवाणीके रूपमें कृपा की।
(सर्ग १५-१६)
सरस्वतीकी आज्ञासे पतिके शवको फूलोंके ढेरमें रखकर समाधिस्थित हुई लीलाका पतिके वासनामय स्वरूप एवं राजवैभवको देखना तथा समाधिसे उठकर पुनः राजसभामें सभासदोंका दर्शन करना
श्रीसरस्वतीजीने कहा—बेटी! अपने पतिके शवको तुम फूलोंके ढेरमें छिपाकर रक्खो। ऐसा करनेसे तुम फिर अपने इस पतिको प्राप्त कर लोगी। न तो ये फूल मुरझायेंगे और न तुम्हारे पतिका यह शव ही सड़-गलकर नष्ट होने पायेगा। फिर थोड़े ही दिनोंमें यह शव पुनः जीवित होकर तुम्हारे पतिका उत्तरदायित्व सँभालेगा। इसका जीव जो आकाशके समान निर्मल है तुम्हारे इस अन्तःपुरके मण्डपसे शीघ्र बाहर नहीं निकल सकेगा।
तब अपने पतिको वहीं अन्तःपुरमें फूलोंके ढेरमें छिपाकर रखनेके पश्चात् रानीको कुछ आश्वासन मिला, परंतु घरमें निधि (खजाने) को रखकर भी उसके उपयोगसे वञ्चित होनेके कारण दरिद्रतापूर्ण जीवन बितानेवाली स्त्रीके समान लीला भी पतिकी सेवाके सुखसे वञ्चित होनेके कारण उस विषयमें दरिद्र ही बनी रही।
उत्पत्ति-प्रकरण ] * लीलाका सरस्वतीकी आज्ञासे पतिके शवको फूलोंकी ढेरीमें रखकर समाधिस्थ होना * ११९
फिर उसी दिन आधीरातके समय जब सभी परिजन (सेवकगण) निद्रासे अचेत हो गये, लीलाने अन्तःपुर-के उस मण्डपमें विशुद्ध ध्यानसे युक्त अन्तःकरणके द्वारा ज्ञानमयी भगवती सरस्वतीदेवीका बड़े दुःखसे आवाहन किया। देवी उसके पास आ गयीं और बोलीं—
'बेटी ! तुमने क्यों मेरा स्मरण किया है ! तुम क्यों अपने मनमें शोकको स्थान देती हो ? जैसे मृगतृष्णामें झूठे ही जलकी प्रतीति होती है, उसी प्रकार ये संसार-रूपी भ्रम मिथ्या ही प्रतीत होते हैं।'
लीलाने कहा—देवि ! मेरे पति कहाँ हैं ? क्या करते हैं और कैसे हैं? मुझे उनके पास ले चलिये। मैं उनके बिना अकेली नहीं जी सकती।
श्रीसरस्वतीजी बोलीं—सुमुखि ! एक शुद्ध चेतन परमात्मरूप आकाश है, दूसरा मनरूप आकाश है और तीसरा यह सुप्रसिद्ध भूताकाश है। चित्ताकाश और भूताकाश—इन दोनोंसे जो सर्वथा शून्य है उसीको तुम चिन्मय आकाश समझो। तुमने जो अपने पतिके रहने आदिका स्थान पूछा है, वह चेतन आकाशमय कोश ही है (उससे अतिरिक्त नहीं है); अतः चेतन आकाशका एकाग्रमनसे जब चिन्तन किया जाता है, तब पृथक् विद्यमान न होनेपर भी वह शीघ्र दिखायी देता और अनुभवमें आता है। भद्रे ! यदि तुम सम्पूर्ण सङ्कल्पोंको त्यागकर उस चेतनाकाशरूप परब्रह्ममें स्थित हो जाओ—उसीमें मनको एकाग्र कर दो तो तुम उस सर्वात्मपदको, जो परम तत्त्वरूप है, अवश्य प्राप्त कर लोगी—इसमें संशय नहीं है। सुन्दरि ! उक्त तत्त्व यद्यपि इस जगत्के अत्यन्ताभावका बोध होनेपर ही सुलभ होता है, दूसरे किसी उपायसे नहीं, तथापि तुम मेरे वरदान-के प्रभावसे उसे शीघ्र प्राप्त कर लोगी।
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! यह कहकर देवी सरस्वती अपने दिव्य धामको चली गयीं और लीला लीलापूर्वक (अनायास) ही निर्विकल्प समाधिमें स्थित हो गयी।
रानीने निर्विकल्प समाधिके द्वारा चेतनाकाशमें स्थित होकर अपने उसी राजप्रासादके आकाशमें राजा पद्मको सिंहासनपर विराजमान देखा। (वे अपनी वासना और
१२८ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
कर्मोंके अनुसार देह-गेह एवं विभवसे सम्पन्न थे।) अनेक राजाओंसे घिरे हुए सभामण्डपमें सिंहासनपर बैठे हुए राजाकी वन्दीजन 'महाराजकी जय हो, हमारे राजाधिराज चिरजीवी हों' इत्यादि कहकर स्तुति करते थे। वे अपने अधीनस्थ जनपद तथा सेनाके कार्यकी देख-भाल करनेमें सादर जुटे हुए थे। पताकारूपिणी मञ्जरियोंसे व्याप्त राजधानीके जिस सुन्दर सभाभवनमें राजा बैठेथे, उसके पूर्व दरवाजेपर असंख्य मुनियों और महर्षियोंकी मण्डली विराज रही थी। दक्षिण द्वारपर असंख्य राजे-महाराजे विद्यमान थे। पश्चिम द्वारपर अगणित सुन्दरी ललनाओंका समूह शोभा पाता था और उत्तर द्वारपर असंख्य रथ, हाथी एवं घोड़ोंकी भीड़ लगी थी। राजाने गुप्तचरकी बातें सुनकर दक्षिण देशके युद्ध-की गतिविधिका निर्णय किया। पंक्तिबद्ध खड़े हुए अगणित भूपालोंकी प्रभासे उस राजभवनका सारा आँगन जगमगा रहा था। यज्ञमण्डपमें वेदमन्त्रोंका उच्चारण करते हुए ब्राह्मणोंकी वेदध्वनिसे श्रेष्ठ वाद्योंका मधुर घोष दब गया था। अनेक सामन्तनरेश आरम्भमें मन्द गतिसे चलनेवाले उत्तम कार्योंमें संलग्न थे। अनेक शिल्पियोंके सरदार वहाँ नाना नगरोंके निर्माणकी तैयारीमें लगे हुए थे। उस समय आकाशस्वरूपा लीला उस आकाशरूपिणी राजसभामें प्रविष्ट हुई। जैसे दूसरेके सङ्कल्पसे निर्मित हुई नगरीको दूसरा नहीं देखता, उसी प्रकार अपने आगे-आगे विचरती हुई लीलाको उस सभामें रहनेवाले लोगोंमेंसे किसीने नहीं देखा। वहाँ उसने अपने उन्हीं सब लोगोंको सभामें बैठे देखा, जो पहले देखे गये थे, मानो वे सब-के-सब राजाके साथ ही एक नगरसे दूसरे नगरमें चले आये हों। जो पहले जहाँपर बैठते थे, वे वहीं बैठे थे। वैसा ही उनका आचरण था। लीला जिन्हें पहले देख चुकी थी, उन्हीं बालकों, उन्हीं मन्त्रियों, उन्हीं सामन्त-नरेशों, उन्हीं विद्वानों, उन्हीं विदूषकों तथा उन्हीं पहले-वाले सेवकोंसे मिलते-जुलते भृत्योंको भी देखा।
तदनन्तर उसने कुछ दूसरे पण्डितों और सुहृदोंको भी देखा, जो सर्वथा नये थे—पहले कभी देखनेमें नहीं आये थे; कुछ व्यवहार भी पहलेसे भिन्न दिखायी दिये। बहुत-से पुरवासी तथा अन्य लोग भी अपरिचित दृष्टिगोचर हुए। पहलेकी सारी जनता और समस्त पुरवासियोंको भी वहाँ देखकर सुन्दरी लीला चिन्ताके वशीभूत हो गयी। वह सोचने लगी—'क्या उस नगरमें रहनेवाले सब-के-सब मर गये।' फिर सरस्वतीदेवीकी कृपासे बोध प्राप्त हुआ। उसकी समाधि टूट गयी और वह क्षणभरमें पहलेके अन्तःपुरमें अवस्थित हो गयी। उसने वहाँ आधीरातके समय सब लोगोंको पूर्ववत् सोते देखा। फिर उसने नींदमें पड़ी हुई सखियोंको उठाया और कहा—'मुझे बड़ा दुःख हो रहा है, अतः तुमलोग सभाभवनमें मुझे स्थान दो। यदि मैं पतिदेवके सिंहासनके पास बैठूँ और समस्त सभासदोंको वहाँ पूर्ववत् उपस्थित देखूँ, तभी जीवित रह सकती हूँ, अन्यथा नहीं।'
रानीके यों कहनेपर सारा-का-सारा राजपरिवार
उत्पत्ति-प्रकरण ] * लीलाका सरस्वतीसे कृत्रिम और अकृत्रिम सृष्टिके विषयमें पूछना * १२१
जाग उठा और क्रमशः सब लोग अपने-अपने सर्वस्व-भूत कार्य-कलापमें जुट गये। जैसे सूर्यकी किरणें लोगोंको अपने-अपने व्यवहारमें लगानेके लिये पृथ्वीपर आती हैं, वैसे ही समूह-के-समूह छड़ीदार राजसेवक पुरवासी सभासदोंको बुलानेके लिये चारों ओर चल दिये। दूसरे-दूसरे सेवक आदरपूर्वक सभाभवनकी उसी तरह सफाई करने लगे, जैसे शरद्-ऋतुके दिन मेघोंसे मलिन हुए आकाशको स्वच्छ कर देते हैं। जैसे महाप्रलयके बाद जब त्रिलोकीकी पुनः सृष्टि होती है, तब सारे लोकपाल अपनी-अपनी दिशाओंमें अधिष्ठित हो जाते हैं, उसी तरह निर्दोष मन्त्री और सामन्तगण उस सभाभवनमें अपने-अपने स्थानपर आ बैठे। राजाके सिंहासनके पास ही रानी लीला एक नूतन सुवर्णमय विचित्र आसनपर विराजमान हुई। उसने पहलेकी ही भाँति यथास्थान बैठे हुए पूर्वपरिचित समस्त नरेशों, गुरुजनों, श्रेष्ठ पुरुषों, मित्रों, सदस्यों, सुहृदों, सम्बन्धियों और बन्धु-बान्धवोंको देखा। राजाके राष्ट्रमें निवास करनेवाले सभी लोगोंको वहाँ पूर्ववत् ही देखकर रानीको बड़ी प्रसन्नता हुई। (सर्ग १७)
लीलाका सरस्वतीसे कृत्रिम और अकृत्रिम सृष्टिके विषयमें पूछना और सरस्वतीका इस विषयको समझानेके लिये लीलाके जीवनसे मिलते-जुलते एक ब्राह्मण-दम्पतिके जीवनका वृत्तान्त सुनाना
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! तदनन्तर रानी लीला सभाभवनसे उठ गयी और अन्तःपुरमें प्रवेश करके रनिवासके पूर्वोक्त मण्डपमें फूलोंसे ढके हुए पतिके पास जा पहुँची तथा मन-ही-मन इस प्रकार विचार करने लगी—'अहो ! यह तो बड़ी विचित्र माया है। ये हमारे पुरवासी मनुष्य इस बाह्य प्रदेशमें और उस अन्तर-देशमें भी विद्यमान हैं। ताल, तमाल और हिंताल आदि वृक्षोंसे घिरे हुए ये पर्वत जैसे वहाँ हैं, उसी तरह यहाँ भी हैं। यह बड़ी ही आश्चर्यजनक माया फैली हुई है। जैसे दर्पणमें पर्वत उसके भीतर और बाहर भी स्थित प्रतीत होता है, उसी प्रकार चेतन-आकाशरूपी दर्पणमें भीतर और बाहर भी यह सृष्टि प्रतीत हो रही है। उनमेंसे कौन सृष्टि भ्रान्तिमयी है और कौन वास्तविक, इस संदेहको मैं वागीश्वरी देवीकी पूजा करके उन्हींसे पूछती हूँ, जिससे उनके उपदेशसे संशयका निवारण हो जाय।' ऐसा निश्चय करके रानीने उस समय देवीका पूजन किया और देखा—देवी सरस्वती कुमारीरूप
१२२ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
धारण करके सामने आ गयी हैं। तब लीला परमार्थ-महाशक्तिस्वरूपा देवीको सिंहासनपर विराजमान करके स्वयं उनके सामने पृथ्वीपर खड़ी हो गयी और इस प्रकार पूछने लगी।
लीलाने कहा—परमेश्वरि ! मैं आपके सामने विनम्र होकर जो कुछ पूछ रही हूँ, उसे बताइये। यह त्रिलोकीका प्रतिबिम्ब-वैभव बाहर भी स्थित है और भीतर भी। इनमेंसे कौन कृत्रिम (झूठा) है और कौन अकृत्रिम (सच्चा) ? देवि अम्बिके ! जैसे मैं यहाँ खड़ी हूँ और आप यहाँ बैठी हैं, देवेश्वरि ! इसीको मैं सच्ची सृष्टि समझती हूँ। परंतु जहाँ इस समय मेरे पतिदेव विराजमान हैं, उस सृष्टिको मैं कृत्रिम समझती हूँ; क्योंकि वह सूना है। उससे देश, काल और व्यवहारकी पूर्ति (सिद्धि) नहीं होती।
देवीने कहा—बेटी ! अकृत्रिम सृष्टिसे कदापि कृत्रिम सृष्टि नहीं उत्पन्न होती। कहीं भी कारणसे विलक्षण (सर्वथा भिन्न) कार्यका उदय नहीं होता।
लीलाने कहा—माताजी ! मुझे तो कारणसे कार्य सर्वथा विलक्षण दिखायी देता है। मिट्टीका लोंदा जल धारण करनेमें असमर्थ है; किंतु उसीसे उत्पन्न हुआ घड़ा जलका आधार बन जाता है।
देवीने कहा—सुमुखि ! बताओ तो सही—इस सृष्टिके अन्तर्गत जो पृथ्वी आदि तत्त्व हैं, उनमेंसे कौन-सा तत्त्व तुम्हारे पतिकी सृष्टिका कारण है ?
लीला बोली—देवि ! मेरे पतिकी वह स्मृति ही उस रूपमें वृद्धिको प्राप्त हुई है, अतः मैं स्मृतिको ही उस सृष्टिका कारण समझती हूँ। उसीसे यह सृष्टि हुई है, ऐसा मेरा निश्चय है।
देवीने कहा—अबले ! स्मृति तो आकाशकी भाँति शून्यरूप है। जैसे स्मृति शून्य है, उसी प्रकार उससे उत्पन्न तुम्हारे पतिकी सृष्टि भी शून्य ही है। वह उस रूपमें अनुभवमें आनेपर भी शून्यके अतिरिक्त कुछ नहीं है।
लीलाने कहा—देवि ! जैसे आपने मेरे पतिकी सृष्टिको स्मृतिमात्र—शून्यरूप बताया है, उसी तरह मैं इस सृष्टिको भी स्मृतिमात्र एवं शून्यरूप ही समझती हूँ। समाधिमें देखी गयी वह सृष्टि ही मेरी ऐसी मान्यतामें उदाहरण है।
देवीने कहा—बेटी ! ठीक ऐसी ही बात है। वह सृष्टि असत् होनेपर भी (उसका आश्रयभूत चेतन आत्मा ही) तुम्हारे पतिके उन-उन भावोंसे उस रूपमें प्रकाशित होता है। इसी तरह यहाँ यह सृष्टि भी मिथ्या ही है (तथापि उसका आश्रय-भूत चेतन आत्मा) जीवके विभिन्न भावोंके अनुसार इस रूपमें भासित होता है।
लीला बोली—देवि ! जैसे इस सृष्टिसे मेरे पतिकी भ्रमरूप अमूर्त सृष्टि हुई, वह प्रकार मुझे बताइये; जिससे मेरा यह जगत्रूपी भ्रम दूर हो जाय।
देवीने कहा—जिस प्रकार पूर्व सृष्टिकी स्मृतिसे उत्पन्न हुई यह भ्रमरूपिणी सृष्टि खम-भ्रमके तुल्य प्रतीत होती है, उस प्रकार मैं तुमसे इस विषयका प्रतिपादन करती हूँ, सुनो। चिन्मय आकाशमें कहीं (अज्ञानसे आवृत भागमें और उसके भी) किसी एक देशमें (विधाताके अन्तःकरणके एक अंशमें) संसाररूपी मण्डप है, उस मण्डपके किसी एक आकाशरूपी कमरेके भीतर एक कोनेमें पर्वतरूपी मिट्टीके ढेलेके नीचे एक छोटा-सा गढ्ढा है, जो पर्वतसम्बन्धी छोटा-सा गाँव है। नदी, पर्वत और वनोंसे घिरे हुए उस ग्रामके भीतर एक धर्मपरायण नीरोग अग्निहोत्री ब्राह्मण अपने स्त्री-पुत्रोंके साथ रहते थे। उन्हें वहाँ गायका दूध सुलभ था। वे राजाके भयसे सर्वथा मुक्त थे तथा वहाँ आनेवाले सभी प्राणियोंका वे आतिथ्य-सत्कार करते थे।
बेटी ! वे ब्राह्मण धन-सम्पत्ति, वेश-भूषा, अवस्था, कर्म,
उत्पत्ति-प्रकरण ] * लीलाका सरस्वतीसे कृत्रिम और अकृत्रिम सृष्टिके विषयमें पूछना * १६३
विद्या, विभव और चेष्टाओंकी दृष्टिसे साक्षात् वसिष्ठ मुनिके समान थे। उनका नाम भी वसिष्ठ ही था। उन्हें चाँद-जैसी भार्या प्राप्त थी, जिसका नाम अरुन्धती था। एक दिन उन ब्रह्मर्षिने, जो उस पर्वतके शिखरपर हरी-हरी घासोंसे ढकी हुई समतल भूमिपर बैठे हुए थे, नीचे एक राजाको देखा, जो अपने सारे परिवारके साथ शिकार खेलनेकी इच्छासे जा रहे थे। वे अपनी उस विशाल सेनाके महान् घोषसे मानो मेरु पर्वतको भी विदीर्ण कर देना चाहते थे। उस सेनाके महान् कोलाहलसे दिग्भ्रम-सा हो जानेके कारण सभी दिशाओंके प्राणियोंके समुदाय भाग रहे थे—जलके भँवरके समान एक-एक स्थानपर चक्कर काट रहे थे। उन भूपालको देखकर ब्राह्मणने मन-ही-मन यह विचार किया—'अहो ! राजाका पद बड़ा
ही रमणीय है। उस पदपर प्रतिष्ठित मनुष्य सम्पूर्ण सौभाग्योंसे उद्भासित हो उठता है। कब ऐसा समय आयेगा जब कि मैं भी पैदल, रथ, हाथी और घोड़ोंसे
संकुल चतुरंगिणी सेना, पताका, छत्र और चँवरसे सम्पन्न हो दस दिशारूपी कुञ्जोंको परिपूर्ण करनेवाला राजा होऊँगा।' उसी दिनसे ब्राह्मणके मनमें इस तरहका संकल्प होने लगा। वे जबतक जीवित रहे, प्रतिदिन आलस्य छोड़कर स्वधर्म-पालनमें लगे रहे। तत्पश्चात् उनके शरीरको जर्जर बना देनेके लिये जर्जरित अङ्गवाली जरावस्था बड़े आदरके साथ उन ब्राह्मण देवताके पास आयी। जब वे मृत्युके निकट पहुँच गये, तब उनकी पत्नीको बड़ी चिन्ता हुई। उस कल्याणमयी ब्राह्मणपत्नीने तुम्हारी ही भाँति मेरी आराधना की। अमरत्वको अत्यन्त दुर्लभ मानकर उसने मुझसे यह वर माँगा—'देवि !
मरनेपर मेरे पतिका जीव अपने मण्डपसे बाहर न जाय।' अतः मैंने उसके उसी वरको स्वीकार कर लिया। तदनन्तर कालवश ब्राह्मणका शरीर छूट गया। फिर उसी घरके आकाशमें वह ब्राह्मणका जीवात्मा स्थित रहा। पूर्व-जन्मके सुदृढ़ एवं महान् संकल्पसे वह ब्राह्मणीका पति स्वयं सर्वशक्तिशाली राजा बन गया। उसने अपने प्रभावसे
१२४ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
भूमण्डलपर विजय प्राप्त कर ली। उसका प्रताप स्वर्ग-लोकतक फैल गया और उसने कृपा करके पाताललोकका भी पालन किया। इस प्रकार वह त्रिलोकविजयी नरेश हो गया। वह याचकोंको मुँहमॉँगा दान देनेके लिये कल्पवृक्षके समान था, धर्मरूपी चन्द्रमाके पूर्ण विकासके लिये पूर्णिमाकी रात्रिके सदृश था। उधर उस ब्राह्मणके मृत्युमुखमें पहुँच जानेपर उसकी पत्नी ब्राह्मणी शोकसे अत्यन्त कृश हो गयी। उड़दकी सूखी छीमीके समान उसके हृदयके दो टुकड़े हो गये। पतिके साथ ही मरकर अपने शरीरको दूर छोड़ वह आतिवाहिक देह (मानस-शरीर) के द्वारा पतिके पास जा पहुँची। जैसे नदी गर्तमें गिरती है, उसी प्रकार पतिका अनुसरण करके उनके पास जा वह वासन्ती लताके समान शोक-रहित हो गयी। उस पर्वत ग्राममें मरे हुए इस ब्राह्मणके घर हैं, भूमि-वृक्ष आदि स्थावर सम्पत्तियाँ हैं तथा मृत्युके बादसे उसका जीव उस पर्वतीय ग्रामके गृह-मण्डपमें विद्यमान है।
(सर्ग १८-१९)
लीला और सरस्वतीका संवाद—जगत्की असत्ता एवं अजातवादकी स्थापना
देवी सरस्वती ने कहा—कल्याणि ! वही ब्राह्मण अब राजा होकर तुम्हारा पति हुआ है और जो अरुन्धती नामवाली ब्राह्मणी थी, वह तुम हो। तुम्हीं दोनों सुन्दर दम्पति यहाँपर राज्य करते हो। तुम्हारे पूर्वजन्मका यही सारा सृष्टिक्रम है, जिसे मैंने कह सुनाया। ब्रह्मरूप आकाशमें जीवभावकी भ्रान्ति होनेसे ही यह सब कुछ प्रतीत होता है। इसलिये कौन सृष्टि भ्रमरूप है और कौन भ्रमसे रहित है ? सुतरां सारी सृष्टि ही अनर्गल अनर्थ-बोधके सिवा दूसरा कुछ नहीं है।
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! देवी सरस्वतीका यह वचन सुनकर लीलाके सुन्दर नेत्र आश्चर्यसे खिल उठे। वह इस प्रकार बोली।
लीलाने कहा—देवि ! आपकी बात तो सत्य ही होगी। मैं उसे मिथ्या कहनेका साहस नहीं कर सकती; परंतु ऐसी विरुद्ध बात कैसे सम्भव हो सकती है ?
उत्पत्ति-प्रकरण ] * लीला और सरस्वतीका संवाद—जगत्की असत्ता एवं अजातवादकी स्थापना * १२५
कहाँ ब्राह्मणका जीव अपने घरमें है और कहाँ इतने बड़े विशाल प्रदेशमें हमलोग स्थित हैं। (फिर वे ब्राह्मण-दम्पति और हमलोग एक कैसे हो सकते हैं?) मेरे स्वामी जहाँ स्थित हैं वैसा वह दूसरा लोक, वह विस्तृत भूमि, वे विशाल पर्वत और वे दसों दिशाएँ एक घरके भीतर कैसे प्रतीत हो सकती हैं ? सर्वेश्वरेश्वरि ! यदि कोई कहे कि एक सरसोंके दानेके भीतर मतवाला ऐरावत हाथी बँधा हुआ है, परमाणुके भीतर बैठे हुए एक मच्छरने सिंह-समूहोंके साथ युद्ध किया, सुमेरु पर्वत कमलगड्ढेके भीतर रक्खा हुआ है तो जैसे ये सारी बातें असम्भव होनेके कारण असमञ्जस प्रतीत होती हैं—ठीक नहीं लगतीं, उसी प्रकार उस घरके अन्दर ये विशाल भूलोक और पर्वत हैं, यह कथन भी असम्भव एवं असंगत ही जान पड़ता है।
देवी सरस्वती बोलीं—सुन्दरि ! मैं यह झूठ नहीं कह रही हूँ। तुम ध्यान देकर यथावत् रूपसे इस विषयको सुनो। दूसरोंके द्वारा तोड़ी जानेवाली धर्मकी जिस मर्यादाको मैं स्वयं ही स्थापित करती हूँ, उसीका यदि मैं भेदन करूँ तो दूसरा कौन पालन करेगा ? उस पर्वतीय गाँवके ब्राह्मणका वह जीवात्मा अपने उसी घरके आकाशमें चिदाकाशरूप होकर ही इस कल्पित महान् राष्ट्रको देख रहा है। कल्याणि ! जैसे स्वप्नमें जाग्रत्कालकी स्मृति लुप्त हो जाती है और दूसरी स्मृति उदित होती है, उसी प्रकार तुम दोनोंकी पूर्वजन्मकी स्मृति नष्ट हो गयी है और उससे विपरीत दूसरी स्मृति उदित हुई है। यही उस शरीरका मरण है। जैसे स्वप्नमें तीनों लोकोंका दीखना, संकल्पमें त्रिलोकीका उदय होना तथा मरु-मरीचिकामें जलका होना असत्य हैं, फिर भी वहाँ उन वस्तुओंकी प्रतीति होती है, उसी प्रकार ब्राह्मणके घरके भीतर पर्वत, वन और नगरोंसहित भूमिका होना यद्यपि असत् है तो भी वहाँ इन सबकी प्रतीति होती है। जो असत्यसे उत्पन्न हुआ है, वह असत् है, जो स्मृतिसे उत्पन्न हुआ है, वह भी असत् है—जैसे मृगतृष्णाकी नदीमें जलका होना मिथ्या है; फिर उस जलमें जो तरङ्गकी प्रतीति होती है, वह सत् कैसे हो सकती है !
बेटी ! उस पर्वतीय गृहके आकाशरूपी कोशमें स्थित तुम्हारा जो यह घर है तथा जो मैं हूँ और तुम हो—यह सब कुछ तुम केवल चिन्मय आकाशरूप ब्रह्म ही समझो। इस विषयको स्पष्टरूपसे समझने और समझानेके लिये स्वप्न, भ्रम, संकल्प और अपने-अपने अनुभवकी परम्पराएँ ही मुख्य प्रमाण (उदाहरण) हैं। ब्राह्मणके उस पर्वतीय घरके भीतर उस ब्राह्मणका जीव है। उस जीवाकाशमें (अर्थात् उस जीवात्माके संकल्पमें) समुद्र और वनोंसे परिपूर्ण यह पृथ्वी है। कृशाङ्गि ! उस ब्राह्मणके घरके भीतर इस नूतन सृष्टिमें जो यह नगर निर्मित हुआ है, यह यद्यपि मनमें बैठ गया है, तथापि ब्राह्मणका वह पहला घर आज भी मौजूद ही है—नष्ट नहीं हुआ। जैसे इस जगत्-सृष्टिकी प्रतीति आभासमात्र है, उसी प्रकार क्षण, कल्प आदिकी प्रतीति भी आभास-मात्र ही है, वास्तविक नहीं। परमात्मामें जो तू-मैं इत्यादि भावोंका अध्यास है, उसके अधीन जो अपने जन्मका भ्रम होता है, ऐसा भ्रम जिन लोगोंको है, उन्हीं पुरुषोंको क्षण, कल्प आदि सम्पूर्ण जगत्की प्रतीति होती है।
उत्तम व्रतका पालन करनेवाली लीले ! मरणकालकी मिथ्याभूत मूर्च्छाका अनुभव करके जब जीव पूर्वजन्मके सभी भावोंको भुला देता और दूसरे नूतन भावको देखने या अनुभव करने लगता है, तभी वह पलक मारते-मारते मनमें यह स्मरण करने लगता है कि मैं आधेय हूँ और इस आधारमें स्थित हूँ। यद्यपि वह उस समय (चेतन) आकाश (परमात्मा) में आकाश (चिदाकाश जीवात्मा)-रूपसे ही स्थित होता है (इसलिये उसमें आधाराधेय-भावकी कल्पना मिथ्या ही है), तथापि उसके चित्तमें वैसा संस्कार प्रकट होता है। उसे यह भान होता है कि हाथ, पैर आदि अवयवोंसे युक्त यह शरीर मेरा ही