संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
निर्वाण-प्रकरण उ० ] * मोक्षके स्वरूप तथा जाग्रत् और स्वप्नकी समताका निरूपण * ६२१
यह परमात्मबोध संसार-मार्गके भ्रमको हर लेनेवाला है। जो न तो पिताने, न माताने और न शुभ कर्मोंने ही अबतक सिद्ध किया है, वही आपका परम कल्याण यह महारामायण-शास्त्र तत्काल सिद्ध कर देगा, यदि आप अभ्यासपूर्वक इसे भलीभाँति जान लें। साधुशिरोमणे ! यह संसार-बन्धनमयी विषूचिका (हैजा) बड़ी भयंकर है और दीर्घकालतक टिकी रहनेवाली है। आत्मज्ञानके सिवा दूसरी किसी दवासे यह कभी शान्त नहीं होती।
मनुष्यो ! आपातमधुर, शून्य एवं निस्सार विषयोंका आस्वादन करते हुए तुमलोग खाली हवा चाटनेवाले सर्पोंके समान आकाशरूपी अनन्त संसारकी ओर पैर न बढ़ाओ। बड़े कष्टकी बात है कि तुम्हारे दिन केवल लौकिक व्यवहारमें ही इस तरह बीत रहे हैं कि वे कब आये और कब गये, इसका तुम्हें पता ही नहीं लगता। इन्हीं बीतते हुए दिनोंके द्वारा तुमलोग केवल अपनी मौतकी राह देख रहे हो। लोगो ! तुम मान और मोहसे रहित होकर तत्त्वज्ञानके द्वारा उत्तम मोक्ष-पदको प्राप्त करो। अधम संसार-गतिमें न पड़ो। आत्मज्ञानके द्वारा बड़ी-से-बड़ी आपत्तियोंका मूलोच्छेद कर दिया जाता है। जो आज ही मरणरूपी आपत्तिसे बचनेका उपाय नहीं करता है, वह मूढ़ रुग्णावस्थामें, जब मौत सिरपर सवार हो जायगी, तब क्या करेगा ?
आदरणीय सभासदो ! मैं न तो मनुष्य हूँ, न गन्धर्व हूँ, न देवता हूँ, न राक्षस ही हूँ, अपितु आप लोगोंका सूक्ष्म संविद्रूप विशुद्ध आत्मा हूँ और इस प्रकार उपदेश देनेके लिये यहाँ बैठा हूँ। आपलोग भी शुद्ध चैतन्यमात्र ही हैं। अत्यन्त निर्मल चिन्मात्रस्वरूप मैं आपलोगोंके पुण्यसे ही यहाँ उपस्थित हूँ। आपकी आत्मासे भिन्न नहीं हूँ। जबतक मौतके काले दिन नहीं आ रहे हैं, तभीतक सब वस्तुओंमें वैराग्यरूपी पहला सार पदार्थ समेटकर रख लो। जो इस शरीरमें रहते हुए ही नरकरूपी रोगकी चिकित्सा नहीं कर लेता, वह औषधशून्य प्रदेश (परलोक) में पहुँचकर उस रोगसे पीड़ित होनेपर क्या करेगा ? जबतक समस्त पदार्थोंकी ओरसे वैराग्य नहीं प्राप्त होता, तबतक उन पदार्थोंकी वासना क्षीण नहीं होती है। महामते ! आत्माका पूर्णरूपसे उद्धार करनेके लिये वासनाको क्षीण करनेके सिवा दूसरा कोई उपाय कभी सफल नहीं होता। पदार्थोंकी सत्ता होती है, तभी उनमें अनुकूलता बुद्धि होनेसे वासना होती है। किंतु ये पदार्थ तो खरगोशके सींग आदिकी भाँति हैं ही नहीं। (फिर उनमें वासना बनी रहनेका क्या कारण है ?) जगत्के सभी पदार्थ तभीतक मनोहर प्रतीत होते हैं, जबतक कि उनके स्वरूपपर सम्यक् विचार नहीं किया जाता। विचार करनेपर उनकी सत्ता ही सिद्ध नहीं होती। अतः वे जीर्ण-शीर्ण होकर न जाने कहाँ विलीन हो जाते हैं। (सर्ग १०३)
मोक्षके स्वरूप तथा जाग्रत् और स्वप्नकी समताका निरूपण
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—निर्मल आत्मस्वरूपका ज्ञान प्राप्त हो जानेपर जो लौकिक दुःख और सुखसे रहित अक्षय परमानन्दरूपता प्राप्त होती है, वही मोक्ष है। वह शरीरके रहने या न रहनेपर भी समानरूपसे ही उपलब्ध होता है। उसी मोक्ष-सुखमें सबका पूर्ण विश्राम हो।
श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—स्वप्न और जाग्रत्-दोनों एक समान कैसे हो सकते हैं ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! स्वप्न देखनेवाला पुरुष स्वप्नके संसारमें स्वप्नगत बन्धुजनोंके साथ विहार करनेके पश्चात् वहाँ मृत्युको प्राप्त होता है। स्वप्न-शरीरकी निवृत्ति ही स्वप्नद्रष्टाकी मृत्यु है। स्वप्न-संसार
७८—मरे हुए विपश्चितोंके संसार-भ्रमणका तथा उत्तर दिशागामी विपश्चित्के भ्रमणका विशेष रूपसे वर्णन
६२२ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
मरकर जीव जब स्वप्नगत प्राणियोंसे वियुक्त होता है, तब इस जाग्रत्-संसारमें जागता है और निद्रासे मुक्त कहलाता है। जो स्वप्नका द्रष्टा है, वह स्वप्न-संसारमें अनेकानेक सुख-दुःख-दशाओंका, मोहका तथा रात और दिनके उलट-फेरका अनुभव करके वहाँ मरता—स्वप्न-शरीरका त्याग करता है। फिर निद्रा टूट जानेके कारण निद्राके अन्तमें वह यहाँ शयनस्थानमें मानो नया जन्म लेता है और जाग्रत्-शरीरसे सम्बद्ध होता है। तदनन्तर 'ये स्वप्नमें देखे गये बन्धु-बान्धव सत्य नहीं थे' इस विश्वाससे युक्त होता है। जैसे स्वप्न देखनेवाला पुरुष स्वप्नके संसारमें मृत्युको प्राप्त होकर अर्थात् स्वप्न-शरीरका त्याग करके दूसरे जाग्रन्मय स्वप्नको देखनेके लिये पुनः जन्म लेता या जाग्रत्-शरीरसे सम्बद्ध होता है, उसी तरह जाग्रन्मय स्वप्न देखनेवाला पुरुष जाग्रत्-संसारमें मृत्युको प्राप्त होकर दूसरे जाग्रन्मय स्वप्नको देखनेके लिये पुनर्जन्म ग्रहण करता है। जैसे एक जाग्रत्में मरकर दूसरे जाग्रत्में उत्पन्न हुआ पुरुष पूर्व जाग्रत् प्रपञ्चके विषयमें 'वह स्वप्न एवं असत् था' ऐसी प्रतीतिको नहीं प्राप्त होता, उसी तरह एक स्वप्नसे दूसरे स्वप्नको प्राप्त हुआ पुरुष बादवाले स्वप्नमें स्वप्नकी प्रतीतिको नहीं प्राप्त होता, वरं जाग्रत्की ही प्रतीति ग्रहण करता है। यह उसकी बुद्धिकी मूढ़ताका ही परिणाम है। जैसे बादवाले स्वप्नमें जाग्रत्की प्रतीति भ्रममात्र ही है, वैसे ही पूर्व-जाग्रत्को स्वप्न और असत् न समझना भी मूढ़ता ही है। स्वप्नद्रष्टा पुरुष स्वप्नमें भी फिर अन्य स्वप्न-दर्शनका अनुभव करता हुआ उस स्वप्नको ही जाग्रत्-रूपसे ग्रहण करता है। इस प्रकार जाग्रत् और स्वप्न नामकी दो अवस्थाओंमें जीव न तो स्वतः उत्पन्न होता है और न मरता ही है। किंतु उन-उन जाग्रत् और स्वप्नके शरीरोंमें अभिमान करता और छोड़ता है। यही उसका जन्म लेना और मरना है। स्वप्न-द्रष्टा जीव स्वप्नमें मरकर इस जागरण अवस्थामें जागा हुआ कहलाता है और इस जाग्रत्में मरा हुआ जीव अन्यत्र जाग्रत्रूप स्वप्नमें जागा हुआ कहा जाता है, (इस तरह स्वप्न और जाग्रत्की समता ही सिद्ध होती है)। एक स्वप्नसे दूसरे स्वप्नमें स्थिति होनेपर दूसरा स्वप्न ही पहले स्वप्नकी अपेक्षा वर्तमान होनेसे जाग्रत् समझा जाता है। इसी प्रकार जाग्रत्में मरकर दूसरे जाग्रत्रूप स्वप्नमें जगे हुए पुरुषके लिये पहली जाग्रदवस्था अवश्य ही स्वप्न हो जाती है। इस दृष्टिसे जाग्रत् और स्वप्न—दोनों ही अतीत घटनाके समान हैं। वर्तमानकालमें दोनोंमेंसे किसीकी भी सत्ता नहीं है। इस कारण वे परस्पर एक दूसरेके उपमान और उपमेय बने हुए हैं। वर्तमान अवस्थामें तो स्वप्न भी जाग्रत्के समान ही प्रतीत होता है और बीता हुआ जाग्रत् भी स्वप्नके समान ही है। वास्तवमें दोनों ही असत् हैं। केवल चिदाकाश ही स्वप्न और जाग्रत्के रूपमें स्फुरित होता है। सौभाग्यशाली रघुनन्दन ! जैसे स्वप्नमें दीखनेवाले नगर, पर्वत और गृह आदि चिन्मय आकाश ही हैं, उसी तरह जाग्रत्में भी ये नगर, पर्वत आदि चिदाकाशमय ही हैं। स्वप्न और जाग्रत्—दोनों अन्तमें विकल्प-शून्य, शान्त, अनन्त, एक चिन्मात्र ही शेष रह जाते हैं। इस प्रकार तत्त्वके विषयमें वादियोंका विवाद व्यर्थ है। (सर्ग १०४-१०५)
चिदाकाशके स्वरूपका प्रतिपादन तथा जगत्की चिदाकाश-रूपताका वर्णन
श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—ब्रह्मन् ! चेतनाकाशरूप जो परब्रह्म है, वह कैसा है ? यह कृपापूर्वक फिर बताइये। आपके मुखारविन्दसे इस अमृतमय उपदेशको सुनते हुए मुझे तृप्ति नहीं हो रही है।
निर्वाण-प्रकरण उ० ] * राजा विपश्चित्के सामन्तोंका वध * ६२३
| श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! जैसे समान रूप-रंगवाले दो जुडवें भाइयोंके व्यवहारके लिये दो पृथक् नाम रखे जाते हैं, वैसे ही अखण्ड सच्चिदानन्दघन स्फटिक शिलामें प्रतिबिम्बकी भाँति स्थित हुए जो दो प्रपञ्च हैं, उनके व्यवहारके लिये दो नाम रख दिये गये हैं—जाग्रत् और स्वप्न । जैसे दो जलोंमें भेद नहीं होता, उसी प्रकार इन जाग्रत् और स्वप्न अवस्थाओंमें भी वास्तविक भेद नहीं है; क्योंकि वे दोनों ही एक, निर्मल चिन्मात्र आकाशरूप ही हैं। जिसमें सब कुछ लीन होता है, जिससे सबका प्रादुर्भाव होता है, जो सर्वरूप है, जो सब ओर व्याप्त है तथा जो नित्य सर्वमय है, उस परब्रह्म परमात्माको ही चेतनाकाश या चिदाकाश कहते हैं। स्वर्गमें, भूतलमें, बाहर-भीतर तथा दूसरेमें जो सम नामक ज्योतिःस्वरूप परमतत्त्व प्रकाशित हो रहा है, वह चिदाकाश कहलाता है। सम्पूर्ण विश्व जिसका अङ्ग है, जिस नित्य सर्वव्यापी परमात्मामें यह मूर्त और अमूर्त जगत् उसी तरह प्रकट है, जैसे मजबूत तागेमें माला, उसीको चिदाकाश कहते हैं। सुषुप्ति और प्रलयरूप निद्राकी निवृत्ति होनेपर जिससे विश्व प्रकट होता है और जिसकी विक्षेपशक्तिके शान्त होनेपर उसका लय हो जाता है, उस परब्रह्म परमात्माको चिदाकाश कहते हैं। जिसके उन्मेष और निमेषसे (पलकोंके उठाने और गिरानेसे ) जगत्की सत्ताके लय और उदय होते हैं, जो स्वानुभवरूप होकर अपने हृदयमें स्थित है, | उसे चेतनाकाश समझना चाहिये। श्रुतिने 'यह नहीं, यह नहीं' इस प्रकार निषेधमुखसे सबका निराकरण करके जिसे उस निषेधकी अवधि बताकर उसके तटस्थ लक्षणका सर्वथा निर्णय कर दिया है तथा जो सदा सब कुछ होकर भी वस्तुतः कुछ नहीं है, वह सर्वाधार परमात्मा चिदाकाश कहलाता है। बाह्य और आभ्यन्तर त्रिगोंसे युक्त यह इस तरह दृष्टिगोचर होनेवाला सारा विश्व जैसा है, उसी रूपमें चेतनाकाशमय ही है। अतः इन्द्रियोंसे विषयोंका अनुभव करते हुए भी अन्तःकरणको वासनाशून्य रखकर तत्त्वज्ञानद्वारा शुद्ध-बुद्ध एकमात्र सच्चिदानन्दघनरूप हो सुषुप्तिकी भाँति स्थित रहना चाहिये। वासनाशून्य शान्तचित्त हो जीवित रहते हुए भी पाषाणके समान मौन धारणकर सच्चिदानन्दघन परमात्मामें निमग्न रहते हुए ही बोलना, चलना और खाना-पीना चाहिये।<br><br>पृथ्वी आदिसे रहित जो स्वप्न-जगत् है और पृथ्वी आदिसे युक्त जो जाग्रत्कालका जगत् है—ये दोनों ही प्रकारके जगत् चिदाकाशरूप हैं। जैसे स्वप्न आदि अवस्थाओंमें केवल चिन्मयमणि (आत्मा) ही विभिन्न वस्तुओंके रूपमें भासित होती है, उसी प्रकार इस जाग्रत्कालिक दृश्यप्रपञ्चके रूपमें केवल चिदाकाश ही स्फुरित हो रहा है। इस चिदाकाशका जो स्वानुभवैकगम्य निराकार रूप है, वही भूतल आदिके रूपसे दृश्य नाम धारण करके प्रतीतिका विषय हो रहा है। (सर्ग १०६-१०७) |
राजा विपश्चित्के सामन्तोंका वध, उत्तर दिशाके सेनापतिको घायल होकर आना तथा शत्रुओंके आक्रमणसे राजपरिवार और प्रजामें घबराहट
| श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! इस भूतल आदिके रूपसे दृश्यकी प्रतीति होना ही अविद्या है। जिन अज्ञानियोंके अन्तःकरणमें अविद्या विद्यमान रहती है, उनकी उस अविद्याका (ज्ञानके बिना) कोई अन्त नहीं है, जिस प्रकार ब्रह्मका कोई अन्त नहीं है। इस विषयमें मैं तुम्हें एक कथा कहता हूँ, सुनो। लोकालोक पर्वतकी | किसी स्वर्णमयी-सी शिलाके भीतर विद्यमान चिदाकाशके एक कोनेमें किसी प्रदेशके अन्तर्गत एक त्रिलोकी बसी हुई है, जो इसी त्रैलोक्यके समान है और वहाँ भी यहाँकी व्यवस्थाके अनुसार देश, काल आदिकी मर्यादा नियत है। वहाँ जम्बूद्वीप नामक एक भूभाग है, जो सम्पूर्ण भूमण्डलका भूषणरूप है। वहाँकी समतल भूमिपर जहाँ गमनागमनादि |
७९—शेष दो विपश्चितोंके वृत्तान्तका वर्णन तथा मृगरूपमें श्रीरामचन्द्रजीको प्राप्त हुए एक विपश्चित्का राजसभामें लाया जाना
६२४ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
व्यवहार सुगमतापूर्वक होते हैं, एक नगरी थी, जिसका नाम था ततमिति। उस नगरीमें विपश्चित् नामसे विख्यात कोई राजा थे, जो अपनी विद्वत्ताके कारण श्रेष्ठ सभासदोंसे सुशोभित अपनी राजसभामें विशेष शोभा पाते थे। राजा विपश्चित् बड़े स्वाभिमानी नरेश थे। उनकी बुद्धि सदा ब्राह्मणोंके हित-चिन्तनमें लगी रहती थी। इसीलिये वे देवताओंमें ब्राह्मणस्वरूप अग्निदेवका ही भक्तिपूर्वक पूजन करते थे। अग्निके सिवा दूसरे किसी देवताको वे नहीं मानते थे। राजा विपश्चित्के मन्त्रियोंमें चार प्रधान थे, जो चारों दिशाओंमें स्थित चार महासागरोंके समान मर्यादा-पालनके लिये नियुक्त थे। समुद्र मत्स्यों और मगरोंके समूहमे युक्त होते हैं तो वे मन्त्री हाथी और घोड़ोंके समुदायसे सम्पन्न थे। समुद्रोंमें आवर्तो (भँवरों) का व्यूह होता है तो इनके मन्त्रीलोग सैनिकोंके चक्रव्यूहसे युक्त थे। समुद्र तरङ्गमालाओंसे व्याप्त होते हैं तो मन्त्रीलोग सैनिकोंकी श्रेणियोंसे घिरे हुए थे। समुद्रोंमें निष्कम्प पर्वतोंके बलकी अधिकता होती है तो ये मन्त्रीलोग अडिग सैनिकोंकी शक्तिसे सर्वथा बढ़े-चढ़े थे।
एक दिन उनके पास पूर्वदिशासे एक चतुर गुप्तचर आया। उसने एकान्तमें राजासे मिलकर यह बड़ी भयंकर बात सुनायी—'महाराज! पूर्वदिशाके सामन्तकी ज्वरसे मृत्यु हो गयी है, मानो वे शत्रुविजयी आपकी आज्ञा पाकर यमराजको जीतनेके लिये गये हैं। उनके मरनेके बाद आपके दूसरे सामन्त दक्षिण देशके नायक सब ओरसे पूर्व और दक्षिण दिशाको जीतनेके लिये आगे बढ़े, परंतु शत्रुने पूर्व और पश्चिमकी सेनाओंद्द्वारा आक्रमण करके उन्हें भी मार डाला। उनके मरनेपर आपके तीसरे सामन्त जो पश्चिम दिशाके शासक थे, अपनी सेनाके साथ दक्षिण और पूर्व दिशाओंको शत्रुओंसे छुड़ानेके लिये प्रस्थित हुए, इतनेमें ही शत्रुओंने पूर्व और दक्षिण देशके राजाओंके साथ मिलकर बीच रास्तेमें ही युद्ध करके उन्हें भी स्वर्गलोकमें पहुँचा दिया।'
वह गुप्तचर इस प्रकार कह ही रहा था कि एक दूसरा गुप्तचर प्रलयकालके जल-प्रवाहकी भाँति राजमहलमें प्रविष्ट हुआ। वह बड़ी उतावलीके साथ आया था और अत्यन्त पीड़ित जान पड़ता था।
उस नये गुप्तचरने कहा—देव ! उत्तर दिशाके सेनाध्यक्षपर शत्रुओंने आक्रमण कर दिया है। वे बाँध टूटनेपर वेगसे बहनेवाले जल-प्रवाहकी भाँति सेना-सहित इधर ही आ रहे हैं।
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! यह सुनकर राजाने अब समय बिताना व्यर्थ समझा और अपने सुन्दर महलसे बाहर निकलते हुए इस प्रकार कहा—'सामन्त-नरेशों और मन्त्रियोंको कवच आदिसे सुसज्जित करके शीघ्र बुलाया जाय, शस्त्रागार खोल दिये जायँ, भयानक अस्त्र-शस्त्र बाँटे जायँ, समस्त योद्धा अपने-अपने शरीरमें कवच बाँध लें, पैदल सैनिक शीघ्र तैयार होकर आ जायँ, सेनाओंकी तुरंत गणना की जाय, श्रेष्ठ सैनिकोंको प्रोत्साहित किया जाय, सेनापतियोंकी नियुक्ति हो और सब ओर गुप्तचर भेजे जायँ।'
राजा विपश्चित् रोषावेशमें भरे थे। वे बड़ी उतावलीके साथ जब इस प्रकार आज्ञा दे रहे थे, उसी समय द्वारपाल भीतर आकर महाराजको प्रणाम करके घबराये हुए स्वरमें बोला।
द्वारपालने कहा—देव ! उत्तर दिशाके सेनापति दरवाजेपर खड़े हैं और जैसे कमल सूर्यके दर्शनकी इच्छा करता है, उसी प्रकार वे राजाधिराज महाराजका दर्शन चाहते हैं।
राजा बोले—द्वारपाल ! जल्दी जाओ। पहले सेनापतिको ही भीतर ले आओ। उनसे सब वृत्तान्त
निर्वाण-प्रकरण उ० ] * राजा विपश्चित्का अपने मस्तककी आहुतिसे अग्निदेवको संतुष्ट करना * ६२५
सुनकर मैं यह जान सकूँगा कि दिगन्तोंमें कैसी घटना घटित हुई है।
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—राघव ! राजाके इस प्रकार आदेश देनेपर द्वारपालने सेनापतिको तत्काल भीतर भेजा। राजाने देखा, उत्तर दिशाके नायक सामने खड़े होकर मुझे प्रणाम कर रहे हैं। इनका सारा शरीर क्षत-विक्षत हो गया है। प्रत्येक अङ्गमें बाण धँसे हुए हैं, जोर-जोरसे साँस चल रही है, मुँहसे खून निकल रहा है, निर्बल होनेपर ही ये शत्रुसे पराजित हुए हैं। सेनापतिने लगातार साँस लेते हुए भी धैर्यपूर्वक अपने शरीरकी व्यथाको सहन करके महाराजको प्रणाम किया और शीघ्रतापूर्वक इस प्रकार कहना आरम्भ किया।
सेनाध्यक्ष बोले—देव ! आपके तीन दिशाओंके सामन्त बहुत बड़ी सेनाके साथ मानो आपकी आज्ञासे ही यमराजको जीतनेके लिये यमलोकको चले गये। तदनन्तर उनके देशोंकी रक्षा आदि करनेमें मुझे असमर्थ समझकर बहुत-से भूपाल मेरा पीछा करते हुए बलपूर्वक यहाँ आ पहुँचे हैं। महाराजके इस राज्यमें शत्रुओंकी बहुत बड़ी सेना आ गयी है। अब जो कर्तव्य प्राप्त है, उसे कीजिये। शत्रुओंको मार भगाइये। महाराजके लिये किसीपर भी विजय पाना कठिन नहीं है।
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! युद्धस्थलमें क्षत-विक्षत होनेसे अत्यन्त पीड़ित हुए उत्तर दिशाके सेनानायक जिस समय उपर्युक्त बातें कह रहे थे, उसी समय सहसा दूसरा पुरुष भीतर आकर यों बोला—'नरेश्वर ! इस मण्डलके बहुत-से लोग पीपलके पत्तेकी तरह काँप रहे हैं। चारों ओर शत्रुओंकी बड़ी भारी सेनाएँ खड़ी हैं। जैसे लोकालोक पर्वतके तट सारी वसुधाको घेरे हुए हैं, वैसे ही हमारे शत्रुओंने इस भूमिको घेर लिया है। उनके हाथोंमें चक्र, गदा, प्रास और भालोंके समूह चमक रहे हैं। पताकाओं, अस्त्र-शस्त्रों, अन्य चपल सामग्रियोंसे तथा योद्धाओंसे युक्त रथ इधर-उधर दौड़ रहे हैं। वे उड़नेवाले त्रिपुरसमूहोंके समान जान पड़ते हैं।'
यों कहकर प्रणाम करके वह पुरुष तुरंत लौट गया, मानो समुद्रकी लहर कोलाहल करके शान्त हो गयी हो। राजाके महलमें खलबली मच गयी। उसकी दशा प्रचण्ड आँधीसे व्याप्त हुए विशाल वनके समान हो गयी थी। मन्त्री, राजा, योद्धा, आज्ञाकारी सेवक, हाथी, घोड़े, रथ, स्त्रियाँ, परिचारकवर्ग और नागरिकोंके समुदाय सभी घबराये हुए थे। सबने भयके कारण आत्मरक्षाके लिये अपने हाथोंमें हथियार उठा लिये थे।
(सर्ग १०८)
राजा विपश्चित्का अपने मस्तककी आहुतिसे अग्निदेवको संतुष्ट करके चार दिव्यरूपोंमें प्रकट होना
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! इसी बीचमें जिनके अन्तरिक्ष लोकपर दैत्योंने आक्रमण किया हो, उन देवराज, इन्द्रके समीप जैसे मुनि आते हैं, उसी प्रकार राजा विपश्चित्के पास उनके अन्य सब मन्त्री आये और इस प्रकार बोले—'देव ! हमने यही निर्णय किया है कि अब हमारे शत्रु साम, दान और भेद—इन तीन उपायोंद्वारा वशमें किये जाने योग्य नहीं रह गये हैं। इसलिये उनपर दण्डका ही प्रयोग कीजिये।
राजा बोले—अच्छा, अब आपलोग शीघ्र ही युद्धके लिये जाइये और नगररक्षा एवं व्यूहरचना (मोर्चाबंदी) की व्यवस्था कीजिये। मैं स्नान करके अग्निदेवका पूजन करनेके पश्चात् समराङ्गणमें आऊँगा।
ऐसा कहकर राजाने गङ्गाजलसे भरे हुए घड़ोंद्वारा स्नान किया। तत्पश्चात् वे अग्निशालामें गये। वहाँ शास्त्रीय विधिसे अग्निदेवका आदरपूर्वक पूजन करके उन्होंने इस प्रकार विचार किया—'मैं विजय प्रदान करनेवाले
६२६ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
देवता अग्निको यहीं अपने मस्तककी आहुति दे दूँ।'
ऐसा निश्चय करके राजा बोले—देवेश्वर अग्निदेव ! मेरा यह मस्तक आपको आहुतिके रूपमें समर्पित है। आज मेरे द्वारा यह अपूर्व पुरोडाश दिया जा रहा है। भगवन् ! यदि मेरे द्वारा दी हुई मस्तककी इस आहुति-से आप संतुष्ट हों तो आपके इस कुण्डसे मेरे चार शरीर प्रकट हों। वे चारों भगवान् नारायणकी चार भुजाओंके समान बलवान् और शोभासे दीप्तिमान् हों। उन चार शरीरोंद्वारा मै चारों ही दिशाओंमें बिना किसी विघ्न-बाधाके शत्रुओंका वध करूँ। प्रभो ! मेरे मनमें आपके दर्शनकी इच्छा है; अतः आप मुझे दर्शन देनेकी भी कृपा करें।
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! ऐसा कहकर उन महीपालने तलवार हाथमें लेकर अपने मस्तकको उसी प्रकार शीघ्र काट डाला, जैसे किसी बालकने खेल-खेलमें ही कुछ हिलते हुए कमलको तोड़ लिया हो। फिर उन्होंने अग्निदेवके उद्देश्यसे कटे हुए उस मस्तककी ज्यों ही आहुति दी, त्यों ही वे नरेश अपने शरीरके साथ ही अग्निमें गिर पड़े। उस शरीरको अपना आहार बनाकर अग्निदेवने उसे चौगुना करके उन्हें लौटा दिया। सच है, महापुरुषोंके उपयोगमें आयी हुई वस्तु तत्काल ही वृद्धिको प्राप्त हो जाती है। तदनन्तर वे पृथ्वीनाथ चार शरीर धारण करके अग्नि-कुण्डसे बाहर निकले। उस समय वे तेजःपुञ्जसे प्रज्वलित हो रहे थे और क्षीरसागरसे प्रकट हुए तेजस्वी नारायणदेवके समान जान पड़ते थे। राजाके वे चारों शरीर सूर्यकी-सी प्रभासे प्रकाशित हो रहे थे और साथ ही उत्पन्न हुए उत्तम मुकुट, आभूषण, अस्त्र-शस्त्र एवं वस्त्रोंसे सम्पन्न थे। कवच, शिरस्त्राण, किरीट-रत्न, कङ्कण, बाजूबंद, हार और बड़े-बड़े कुण्डलके साथ ही वे चारों शरीर प्रकट हुए थे। वे सबकी रक्षा करनेमें समर्थ और उच्च आशयवाले थे। सबकी आकृति एक-सी थी। वे समान अवयवोंसे सुशोभित थे और सब-के-सब चञ्चल उच्चैःश्रवाके समान उत्तम अश्वोंपर आरूढ़ थे। उन सबके पास सुनहरे बाणोंसे भरे हुए तरकस थे। वे चारों महामनस्वी थे और सभी एक समान डोरीवाले धनुष धारण किये हुए थे। उन सबके शरीरोंमें सर्वथा समानता थी और वे सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न थे। वे पुरुष जिस हाथी, रथ और घोड़ेपर सवार होते थे, वह शत्रुओंद्वारा प्रयुक्त मन्त्र, तन्त्र, ओषधि, यन्त्र तथा अस्त्र-शस्त्र आदि दोषोंका लक्ष्य नहीं होता था। वे चारों चन्द्रमाकी प्रभाके समान अपनी हास्य-छटासे चारों ओर प्रकाश बिखेरते थे और आहुति पाकर प्रज्वलित हुए अग्निदेवसे सुन्दर विग्रहधारी चार विष्णु, चार समुद्र अथवा चार वेदोंके समान प्रकट हुए थे।
(सर्ग १०९)
चारों विपश्चितोंका शत्रुओंके साथ युद्ध, भागती हुई शत्रुसेनाका पीछा करते हुए उनका समुद्रतटतक जाना
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! तदनन्तर नगरके समीप पहुँचे हुए शत्रुओंके साथ चारों दिशाओंमें बड़ा भयंकर युद्ध छिड़ गया। चारों विपश्चित् चारों ओर शत्रुओंसे लोहा लेनेके लिये चतुरङ्गिणी सेनाके साथ समराङ्गणमें जा पहुँचे। उन्होंने शत्रुओंकी सेनाको समुद्रके समान उमड़ती देख उसे पी जानेका विचार किया और सब ओर वायव्यास्त्रका संधान किया, उसके साथ ही पर्जन्यास्त्रको भी छोड़ा। फिर तो उनके भीषण धनुषोंसे बाण आदि अस्त्रोंकी नदियाँ बहने लगीं। साथ ही तलवार आदिकी वर्षा होने लगी। उस महान् युद्धमें शत्रुओंकी सेनाका घोर संहार हुआ। समस्त सैनिक, जो मरनेसे बच गये थे, भागने लगे। वे चारों
निर्वाण-प्रकरण उ० ] * विपश्चित्के अनुचरोंका उन्हें आकाश, पर्वत, पर्वतीय ग्राम, मेघ आदि दिखाना * ६२७
विपश्चित् इस तरह भागते हुए शत्रुओंकी सेनाका पीछा करते-करते बहुत दूर चले गये । सम्पूर्ण शक्तियोंसे परिपूर्ण एकमात्र चेतन परमेश्वरसे प्रेरित हो समान अभिप्रायवाले उन चारों वीरोंने सम्पूर्ण दिशाओंमें विजय प्राप्त कर ली । जैसे नदियोंके प्रवाह समुद्रतक जाते हैं, वैसे ही उन्होंने समुद्रके किनारेतक शत्रुओंका पीछा किया । दूरतक बिना विश्राम किये चलते रहनेसे विपश्चित्के सैनिकोंके जीवन-निर्वाह और युद्ध आदिके सारे साधन प्रतिदिन छोटी-छोटी नदियोंके जलकी भाँति क्षीण होते गये । उनके शत्रुओंका भी यही हाल हुआ । प्रतिदिन दौड़ते हुए उनकी और शत्रुओंकी सारी सेनाएँ मुमुक्षुओंके पुण्य और पापकी भाँति निरन्तर नष्ट होने लगीं । जब सारे सैनिक नष्ट हो गये, तब उनके वे दिव्यास्त्र सफल होकर आकाशमें ही शान्त हो गये, जैसे जलाने योग्य ईंधन आदिका अभाव हो जानेपर आगकी ज्वालाएँ स्वयं ही बुझ जाती हैं । म्यानों, तरकसों तथा रथ, घोड़े, हाथी और वृक्षसमुदाय आदि स्थानोंमें पड़े हुए अस्त्र-शस्त्र सायंकाल घोंसलोंमें छिपकर नींद लेनेवाले पक्षियोंके समान निश्चेष्ट हो गये । उस समय शून्यातारूपी जलसे भरा हुआ निर्मल आकाश बढ़े हुए विस्तृत एकार्णवके समान जान पड़ता था । उसके अस्त्र-शस्त्ररूपी जल-जन्तु मानो शान्त होकर कीचड़में विलीन हो गये थे । बाणरूपी जलकणोंकी वर्षाके कारण फैला हुआ कुहरा वहाँसे हट गया था, चक्ररूपी सैकड़ों आवर्त अब नहीं उठते थे । वहाँ निर्मल सौम्यता विराज रही थी । बादलोंके वेगपूर्वक वर्षा करनेसे उत्तुङ्ग तरङ्गोंकी भाँति ऊँची-ऊँची जलधाराएँ शान्त हो चुकी थीं । नक्षत्ररूपी रत्नराशि अन्दर छिप गयी थी और सूर्यरूपी बड़वानल उसके एक देशमें विद्यमान था । सूर्य आदिके विस्तृत प्रकाशसे युक्त, गम्भीर एवं प्रभापूर्ण, धूलरहित वह स्वच्छ आकाश महात्माओंके रजोगुणरहित, आत्म-प्रकाशसे पूर्ण, गम्भीर एवं प्रसन्न मनकी भाँति शोभा पा रहा था । उन चारों विपश्चितोंने चारों समुद्रोंको आकाशके छोटे भाइयोंके समान देखा, जो विमल, विस्तृत एवं सम्पूर्ण दिशाओंको परिपूर्ण करके स्थित थे। ऊँची-ऊँची तरङ्गैं, जिनमें जल-जन्तु भी ऊपरको उठ जाते थे, इस तरह नीचे गिरती थीं, मानो आकाशके टुकड़े-टुकड़े होकर नीचे गिर रहे हों । अपनी उठती हुई तरङ्गोंद्वारा अगवानी-सी करते हुए क्षारसमुद्रके विशाल तटपर जब विपश्चित्की सेना पहुँची, तब उन्हें अपने सामने गगनचुम्बी पर्वतके शिखरपर भ्रमरोंके समान काली वनपङ्क्ति शोभा पाती दिखायी दी, जो इलायची, लौंग, मौलसिरी, आँवला, तमाल, हिंताल और ताड़के पत्तोंके ताण्डव-नृत्यसे विभक्त-सी जान पड़ती थी ।
( सर्ग ११०-११३ )
विपश्चित्के अनुचरोंका उन्हें आकाश, पर्वत, पर्वतीय ग्राम, मेघ, कुत्ते, कौए और कोकिल आदिको दिखाकर अन्योक्तियोंद्वारा विशेष अभिप्राय सूचित करना
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! तदनन्तर वहाँ पार्श्ववर्ती मन्त्री आदिने उन चारों विपश्चितोंको उस समय भिन्न-भिन्न वन, वृक्ष, समुद्र, पर्वत, ग्राम, मेघ और वन-चर दिखाये ।
तत्पश्चात् उन अनुचरोंने कहा—देव ! देखिये, यहाँ युद्धमें लगे हुए सीमाप्रान्तके राजाओंके अस्त्र-शस्त्रोंकी राशियों चमचमा रही हैं और इनकी चतुरङ्गिणी सेनाएँ इधर-उधर विचर रही हैं। देखिये, देखिये, युद्धमें वीरोंद्वारा सम्मुख मारे गये सहस्रों वीरोंको विमानोंपर चढ़ा-चढ़ाकर स्वर्गीय अप्सराएँ उन विमानोंद्वारा आकाशमें लिये जा रही हैं । जो युद्धमें सामने आये हुए योद्धाको धर्मके अनुकूल चलते हुए योग्य¹ अवस्थामें वध करता है, वही शूरवीर
१. योग्य अवस्थासे तात्पर्य यह है कि यदि विपक्षी पैदल हो तो स्वयं भी उसके साथ पैदल ही लड़ा जाय अथवा उसे
६२८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
तथा स्वर्गका अधिकारी है, दूसरा नहीं। महाराज ! देखिये, आकाश प्रबल मेघरूपी महासागरसे भरा हुआ है। उधर दृष्टिपात कीजिये, उसने चञ्चल तारोंके विशाल हार पहन रखे हैं। यह देखिये, इधर घने अन्धकारके समान वह नीला दिखायी देता है। उधर दृष्टि डालिये, वह चन्द्रमाकी उज्ज्वल किरणोंसे धोया हुआ-सा जान पड़ता है। आकाश यद्यपि जगत्के सम्पूर्ण दोषोंसे पूर्ण है, फिर भी वह सदा ही अविकारी रहता है। मैं समझता हूँ इस आकाशको तत्त्वज्ञानी पुरुषकी भाँति सर्वानर्थ-शून्यताका सुख प्राप्त है। धूम, बादल, धूल, अन्धकार, सूर्य, चन्द्रमा, संध्या, तारावृन्द, विमान, गरुड़, पर्वत, देवता और असुर—इन सबके क्षोभ आकाशमें ही होते हैं तो भी उनसे प्रभावित होकर यह अपने स्वभाव (निर्विकारता एवं शान्ति) का कभी त्याग नहीं करता। अहो! जिसका आशय महान् है, उसकी स्थिति अत्यन्त उन्नत एवं विचित्र दिखायी देती है।
यह जो त्रिभुवनरूपी भवन है, इसमें काल और क्रिया—ये दो दम्पति चिरकालसे रहते और इसकी रक्षा करते हैं, ठीक उसी तरह, जैसे माली और मालिन फूलोंसे भरे हुए उपवनमें रहते और उसकी देख-भाल करते हैं। यद्यपि काल और क्रियाके द्वारा इस त्रिभुवन-भवनकी रक्षा नहीं होती, अपितु प्रतिदिन इनके द्वारा इसके नाशकी ही व्यवस्था होती रहती है तथापि आजतक नष्ट नहीं हो रहा है, यह कैसी आश्चर्यजनक माया है!
मालूम होता है आकाश वृक्ष आदिकी अधिक उन्नतिको रोकता है—उन्हें बहुत ऊँचा नहीं बढ़ने देता। यदि कहें कि आकाशमें कोई निरोधक व्यापार है ही नहीं, फिर वह किसीकी उन्नतिके अवरोधका कर्ता कैसे हो सकता है तो वह ठीक नहीं है। यद्यपि आकाश अकर्ता ही है, तथापि महान् है और महान्में उसकी महिमासे ही कर्तृत्वका उदय हो जाता है। जहाँ लाखों जगत् उत्पन्न और विलीन होते हैं, उस आकाशको शून्य कहा जाता है। शून्यतावादीके इस प्रौढ़ पाण्डित्यको धिक्कार है। समस्त प्राणी आकाशसे ही उत्पन्न होते, आकाशमें ही स्थिर रहते और आकाशमें ही विलीन होते हैं। इसलिये शास्त्रसिद्ध ईश्वरका लक्षण आकाशमें घटित होनेके कारण वह ईश्वररूप ही है। जिसमें इस जगत्रूपी भ्रमका उदय और अस्त होता है, जो असीम होनेके कारण समस्त वस्तुओंको अपने शरीरमें धारण करता है और त्रिलोकीरूपी मणियोंका सुविस्तृत आधार है, वह महाकाश चित्स्वरूप है और परब्रह्म ही है; ऐसा मेरा विश्वास है।
देखिये, यहाँ सुबेल पर्वतके शिखरपर निर्मल कान्तिवाली एक सुवर्णमयी शिला है, जो सारी-की-सारी सूर्यकी किरणोंके पड़नेसे अपनी प्रभासे इस तरह उद्भासित हो रही है, मानो तटतक आनेवाली समुद्रकी चञ्चल लहरोंसे फेंका गया वडवानलका कोई कण प्रकाशित हो रहा हो। इस पर्वतीय ग्रामकी गौओंके झुंडमें तुरंत खिली हुई कलिकाओंके दलोंके भीतर छिपे-छिपे गुञ्जारव करनेवाले मदान्ध भ्रमरोंके दर्शनसे उद्गीत कामनावाले गिरि-गह्वरनिवासी पामर लोगोंको भी जो आनन्द प्राप्त होता है, वह नन्दनवनमें विहार करने-वाले देवताओंको भी सुलभ नहीं है। इस पर्वतराज-के जंगलोंमें बसे हुए ये गाँव अपनी शोभा और महत्तासे चन्द्रमाको भी पराजित कर रहे हैं। जिनके एक बगलमें प्रकाशित मनोहर चन्द्रमण्डल मण्डन (आभूषण) का काम दे रहा है और दूसरी बगलमें जलके भारसे भारे हुए मेघरूपी गजराज विश्राम करते हैं; ऐसे पर्वत-तटोंपर बसे हुए इन
कोई योग्य सवारी दे दी जाय। इसी तरह यदि वह शस्त्ररहित हो तो स्वयं भी शस्त्रहीन होकर उसके साथ युद्ध किया जाय अथवा उसे भी शस्त्र दे दिया जाय।
निर्वाण-प्रकरण उ० ] * विपश्चित्के अनुचरोंका उन्हें आकाश, पर्वत, पर्वतीय ग्राम, मेघ आदि दिखाना * ६२९
गाँवोंमें जो विलासलक्ष्मी लक्षित होती है, वह ब्रह्माजीके वैभवशाली राज्योंमें भी कहाँ सुलभ है ?
देखिये, स्फटिक मणिके खम्भोंकी राशियोंके समान सुरम्य एवं मोटी धारसे गिरनेवाले निर्झर-सलिलसे सुशोभित इस ग्रामगुफामें ये मोरनियाँ कैसा नृत्य कर रही हैं। जहाँ निर्झरोंसे झरते हुए जलका कलकल नाद फैल रहा है, ऐसे इस पर्वतीय ग्रामके कुञ्जोंमें विलासिनी मयूरियों और फूलोंके भारसे झुकी हुई लताएँ भी नाच रही हैं।
(अब मेघके व्याजसे किसी ऐसे दाताको लक्ष्य करके निम्नाङ्कित बात कही जाती है, जो दान करते समय पात्रापात्र और गुण-अवगुणका विचार न करता हो, इसे अन्योक्ति कहते हैं—) मेघ ! तुम्हारा शील-स्वभाव श्रीमानोंके समान है, आशय (हृदय) महान् (उदार) है। तुम आतप (संताप) को हर लेते हो। तुम्हारी आकृतिसे ही उच्चता और गम्भीरता व्यक्त होती है। तुम पर्वतों (अथवा राजाओं) के शिरोभूषण हो और भूतलके लिये रसके एकमात्र आधार हो। इस प्रकार तुममें बहुतसे गुण हैं, परंतु यह एक ही बात हमारे हृदयको छेदे डालती है कि तुम हर्षसे वर्षा (दान) करते समय ऊसर भूमियोंमें, ताल-तलैयोंमें और वहाँके कँटीले वृक्षोंमें भी उसी तरह जलका विभाजन करते हो, जैसा सुन्दर उपजाऊ खेतोंमें किया करते हो (योग्यता-अयोग्यताका कोई विचार नहीं करते हो)।
(अब दान देनेके पूर्व दान लेनेवालोंके प्रति कठोर और कटुवचन सुनानेवाले दाताको लक्ष्य करके निम्नाङ्कित बात कही जाती है, यह भी मेघान्योक्ति ही है—) जलद ! तुम प्रतिदिन समुद्र और गङ्गा आदि उत्तम तीर्थोंकी जलराशिसे स्नान करते हो, ऊँचे स्थानपर बैठे हो, शुद्ध होकर वनभूमिमें निवास करते और मुनियोंके समान मौनव्रतका आश्रय लेते हो। यद्यपि शरत्-कालमें सब कुछ लुटाकर तुम खाली हो जाते हो तो भी तुम्हारे शरीरपर अत्यन्त उत्तम उज्ज्वल कान्ति ही लक्षित होती है। परंतु ऐसे होकर भी जो तुम जलदानके लिये ऊपर उठकर बिजलीके साथ वज्रसी गड़गड़ाहट पैदा करते हो, यह क्या है ? तुम्हारा ऐसा तुच्छ आचरण क्यों होता है !
अयोग्य स्थानमें पड़ जानेपर सारी अच्छी वस्तु भी बुरी हो जाती है। देखो न, मेघरूपी दूषित स्थानको पाकर श्वेत जल भी काला हो गया है। अहो ! मेघने जलकी वर्षा की और उस जलसे सारी पृथ्वी आप्लावित हो गयी। जैसे धनाढ्य पुरुष अपने दीन-दुखी प्रेमियोंको धन-दौलतसे पुष्ट करते हैं, उसी प्रकार जलने भूतपर मुरझायी हुई खेतीको हरी-भरी एवं पुष्ट कर दिया। यह कितने हर्षकी बात है।
• (शूरवीर और कायरमें अन्तर बतानेवाली अन्योक्ति—) सिंह और कुत्ता दोनोंमें समानरूपसे पशुता विद्यमान है—दोनों पशु जातिके ही जीव हैं परंतु मेघगर्जन आदिसे होनेवाले कोलाहलको सिंह और ही प्रकारसे सहता है और कुत्ता और ही प्रकारसे। सिंह उस कोलाहलको सुनकर मनमें क्षोभ या भयका अनुभव नहीं करता। वह उपेक्षासे आँखें बंद करके सहन करता है। परंतु कुत्ता मेघ-गर्जनको सुनकर मन-ही-मन भयसे काँप उठता है और भयसे ही आँखें बंद करके उस कोलाहल-को सहन करता है।
(कुत्ते-जैसे स्वभाववाले मनुष्यको लक्ष्य करके कही गयी अन्योक्ति—) सदा अपवित्र रहनेवाले कुत्ते ! तू अपने प्रियजनों (सजातीय कुत्तों) के ही निकट आने-पर भौं-भौं किया करता है। तेरा सारा समय गली-कूचोंमें मारे-मारे फिरनेमें ही व्यतीत होता है। मालूम होता है तुझे अपनी चित्तवृत्तिके ही अनुरूप मानकर किसी मूर्खने तुझको अपने इन दुर्गुणोंकी शिक्षा दे दी है। जीवके कर्मोंकी विषमतावश विषम जगत्की रचना करनेवाले विधाताने अपनी पुत्री देवशुनी सरमाके पुत्ररूप अपने
६३० * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
दौहित्र कुत्तेमें उसके अनुरूप सभी धर्मोंका एकत्र दर्शन करानेके लिये निम्नाङ्कित सब बातें एक साथ ही रच डालीं। वे सब बातें इस प्रकार हैं—अपने ही बनाये हुए कूड़े-करकटके अपवित्र गड्ढेमें रहना, गूह और पीव खाना, जहाँ सबकी दृष्टि पड़ती हो, ऐसी सड़कों या खुली जगहोंमें कुत्सित मैथुनकी इच्छा तथा सबसे निन्दनीय शरीर। इन सबको विधाताने कुत्तोंके ही हवाले कर दिया।
किसीने कुत्तेसे पूछा—'तुझसे बढ़कर नीच कौन है?' ऐसा प्रश्न करनेवालेसे कुत्तेने हँसकर कहा—'जो मूर्खता (अज्ञान), अपवित्र देहादिका अभिमान तथा अन्धता (विचाररूपी दृष्टिसे वञ्चित होना)—इन दुर्गुणोंका एवं अशुभ वस्तुका सेवन करता है, वह मुझसे भी अधिक नीच है।' प्रश्न करनेवालेने फिर पूछा—'तुझमें कौन-से ऐसे गुण हैं, जिसके कारण तुझे मूर्खसे अच्छा समझा जाय?' कुत्तेने उत्तर दिया—'शूरता, स्वाभाविक स्वामिभक्ति और धृति (थोड़ेमें ही संतोष कर लेनेकी क्षमता)—ये सुन्दर गुण जो मुझमें हैं, लाखों प्रयत्न करके ढूँढ़नेपर भी मूर्खके पास नहीं पाये जा सकते।' कुत्ता सदा अपवित्र वस्तु खाता है, अपवित्र विष्ठाके ढेरमें ही सदा रमता है, नेवले, चूहे आदि जीवित प्राणियोंको भी चुपचाप खा जाता है और निर्बल बकरीके बच्चे आदिको भी बिना किसी अपराधके ही काट खाता है तथा कुतियाके साथ मैथुनमें प्रवृत्त होनेपर सब लोग आकर उसे ढेले मारते हैं। विधाताने संसारमें बेचारे असमर्थ कुत्तेको जन्मभर दुःख भोगनेके लिये ही रचा है।
(कोई अनुचर शिवलिङ्गपर बैठे हुए कौएकी ओर राजाका ध्यान आकृष्ट करता हुआ कहता है—) शिव-लिङ्गके ऊपर बैठकर काँव-काँव करता हुआ यह कौआ अपने आपको ही दृष्टान्तरूपसे दिखाकर कहता है—'लोगो! अधोगतिमें डालनेवाले जितने पातक हैं, उन सबमें श्रेष्ठ है शिव-सम्पत्तिका उपभोग। इस महान् पातकमें स्थित हुए मुझ कौएको प्रत्यक्ष देखो।'
नीच कौए! तू सदा कानोंको कटु प्रतीत होनेवाली काँव-काँवकी आवाज किया करता है और इसके द्वारा तूने मीठी बोली बोलनेवाले हंस आदिके गुणोंको कवलित कर लिया है—मिटा दिया है। अब सरोवरके भीतर कीचड़में घूमता हुआ जो तू अपनी कठोर बोलीसे भ्रमरों-के मधुर गुञ्जारको छिपाये देता है, यह मेरे सिरपर बाणोंके प्रहारकी-सी वेदना पैदा करता है।
कौआ सरोवरमें आनेपर भी जो नरकसमूह (गन्दी चीजों) को ही खाता है और कमलकी नालको छोड़ देता है, इस विषयमें आपको कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिये। जिसको जिस वस्तुके खानेका अभ्यास है, उसे सदा वही स्वादिष्ट प्रतीत होती है।
नाना प्रकारके वन-पुष्पोंके केसर लग जानेसे कौएका शरीर सफेद-सा दिखायी देने लगा। इतनेसे ही लोगोंने उसे हंस समझ लिया; किंतु जब उसने सड़े-गले कीड़ों-मकोड़ोंको निगलना आरम्भ किया, तब उसका असली रूप पहचानमें आ गया—सबने जान लिया कि यह कौआ है।
कौओंके झुंडमें बैठा हुआ कोकिल मौन, चेष्टा, विहार, रूप-रंग और आकार-प्रकारमें कौओके साथ पूरी समानता रखनेपर भी मीठी बोलीके द्वारा दूरसे ही पहचान लिया जाता है कि यह कौआ नहीं, रुचिर कान्तिवाला कोकिल है—ठीक उसी तरह, जैसे मूर्खोंके बीचमें बैठे हुए पण्डितकी पहचान हो जाती है। अपनी आकृतिसे ही भव्य गुणोंको सूचित करनेवाले सभी पुरुष अनुरूप आन्तरिक चमत्कारसे ही विख्यात हो जाते हैं।
भैया कोकिल! इस समय यह मधुर कलरव करनेसे कोई लाभ नहीं। इससे तुम्हारा बहुमूल्य गुण नहीं प्रकट हो रहा है। किसी विशाल वृक्षकी कन्दराके भीतर जीर्ण-शीर्ण पत्तोंसे ढके हुए खोखलेमें चुपचाप बैठे रहो। यह कर्ण-कटु काँव-काँवकी रट लगानेवाले कौओंसे भरा हुआ शिशिरका
निर्वाण-प्रकरण उ० ] * सरोवर, भ्रमर और हंसविषयक अन्योक्तियाँ * ६३१
समय है। सखे ! इस समय यह वसन्तका उत्सव नहीं है।
यह कोयलका बच्चा अपनी माता काकीको छोड़कर जो चला गया, यह एक आश्चर्यकी बात है। फिर यह काकी माँ, जो इस बच्चेको चोंच और पंजोंसे मार रही है, यह दूसरा आश्चर्य है। मै इन बातोंपर क्षणभर ज्यों ही सोच-विचार करने लगा, त्यों ही यह कोयलका बच्चा भी अपनी माँके समान बढ़नेके लिये उत्साहसे सम्पन्न हो गया। यह तीसरा आश्चर्य दृष्टिगोचर हुआ। वास्तवमें स्वभाव-सुभग भाग्यशाली पुरुष जिस दिशामें आता है, वही उसके लिये माहात्म्यदायिनी बन जाती है।
(सर्ग ११४-११६)
सरोवर, भ्रमर और हंसविषयक अन्योक्तियाँ
विपश्चित्के सहचरोंने कहा—राजन् ! देखिये, यहाँ सामने पर्वतके शिखरपर जो सुन्दर सरोवर है, उसमें कह्लार, कमल और उत्पलोंकी नालके लिये छलकते हुए विचित्र कलरव करनेवाले हंस आदि पक्षी सब ओर फैले हुए हैं। इससे वह सरोवर ऐसा जान पड़ता है, मानो नक्षत्रोंसहित आकाश ही उसमें प्रतिबिम्बित हो रहा है। यह सरोवर इस पृथ्वीपर कमलासन ब्रह्माजीका गृह-सा जान पड़ता है। इसमें जो सहस्रदल-कमल खिले हुए हैं, उनकी नालें बहुत ऊपरतक उठी हुई हैं और उनके कोशस्थलोंमें सुन्दर शोभाका भार लिये राजहंस बैठे हुए हैं (ब्रह्मलोकमें भी यही विशेषता है)। इसके सिवा ब्रह्माजीके भवनमें भ्रमरोंके समान काली इन्द्रनीलमणिकी चौकीपर ब्राह्मणलोग विराजमान होते हैं। इस सरोवरमें काले-काले भौंरे ही इन्द्रनीलमणिकी चौकी हैं। उनसे संयुक्त फूलोंपर बैठे हुए पक्षियोंके समूह ही ब्राह्मण-वृन्दका स्थान ग्रहण किये हुए हैं।
पवित्र-हृदयके समान निर्मल कमलोंसे भरा हुआ और हृदयको अत्यन्त आह्लाद प्रदान करनेवाला यह स्वादिष्ट' जलसे परिपूर्ण सरोवर सत्संगके समान सुशोभित होता है। सत्संग भी हृदयारविन्दको पवित्र करनेवाला, मनको आनन्द देनेवाला, अत्यन्त सरस और मधुर होता है। हेमन्तऋतुमें सरस सारसोंसे युक्त यह सरोवर कुहासेसे ढक जानेके कारण कुछ-कुछ दिखायी देता है। बर्फसे ढके रहनेके कारण इसकी श्यामता दूर हो गयी है। यह सफेद-सा दीखने लगा है। अतएव बर्फके बादल-सा जान पड़ता है। इसके जलविन्दुओंको छूकर बहनेवाली वायु बड़ी कठोर जान पड़ती है।
राजन् ! जैसे यह दृश्यजगत् ब्रह्मसे भिन्न नहीं है—विकार आदिसे रहित ब्रह्मरूप ही है, तथापि ब्रह्मसे पृथक्-सा प्रतीत होता है, उसी तरह इस जलमें जो तरङ्ग आदि हैं, वे जलसे भिन्न नहीं हैं तो भी उससे पृथक्-से स्थित हैं। हाय ! अपने ही जलसे बहाये जाकर चक्राकार भँवर प्रकट करनेवाले इन जलाशयोंकी एकके बाद दूसरीके क्रमसे उठनेवाली तरङ्ग-परम्परा बडी विषम है। (इसका दूसरा अर्थ यों समझना चाहिये—) जिनका अन्तःकरण जड या मूढ़ है, वे अपने ही अज्ञानसे संसारके प्रवाहमें बहते हैं और अपने लिये शुभाशुभ कर्मोंके चक्रका निर्माण करते हैं। उनके मनोरथरूपी तरङ्गोंकी परम्परा संकटमें डालनेवाली होती है।
जलमें उत्पन्न होनेवाले कमल, उत्पल आदिके संसर्गसे जीर्ण हुए इस सरोवरकी उपमा विविध जड योनियोंके सम्बन्धसे जर्जर हुए देहधारी जीवके मनसे दी जाती है। सरोवरमें कमल आदिकी तथा मनमें भिन्न-भिन्न योनियोंके शरीरोंकी जर्जर-दशापर्यन्त जो तरङ्गैं (विषय-भोगोंकी अभिलाषाएँ) उठती हैं, उनके वेगसे व्याप्त इच्छा-द्वेष आदि वृत्तियोंके परिवर्तनोंकी भाँति जो असंख्य कमल प्रकट होते हैं, उन्हें कौन गिन सकता है ?
६३२ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
अहो ! जड अथवा जलके संगमका कैसा विचित्र प्रभाव है कि मुकुलावस्थामें कमल भी अपने सौन्दर्य, सौगन्ध्य और माधुर्यादि गुणोंको दोषोंकी तरह गलेके भीतर छिपाये रखता है तथा कुरूप काँटोंको सबके सामने प्रकट करके दिखाता है (यह कुसंगतिका फल है)। जो गुण कमलके तन्तुओंकी भाँति छिद्रयुक्त (सदोष), कमजोर, सूक्ष्म, छिपाये हुए, जडतासे संयुक्त और अधिक होनेपर भी सारहीन हों, उनसे कोई लाभ नहीं है।
भगवान् विष्णुके वक्षःस्थलमें विराजमान, सौन्दर्य-माधुर्यकी देवी भगवती लक्ष्मी भी शोभाके लिये ही हाथमें कमल धारण करती हैं; कमलकी इससे बढ़कर प्रशंसा और क्या हो सकती है ?
जो भ्रमर कमलोंके मधुर मकरन्दके मद और आमोद-से मतवाले हो उन्हीं कमलोंपर गुञ्जारव करते हैं, वे अन्य फूलोंके रसास्वादनसे संतुष्ट हुए दूसरे भौरोंका मानो उपहास करते हैं।
अरे भ्रमर ! तू नाना प्रकारके फूलोंके रसका आस्वादन करता हुआ समस्त पर्वतोंके लताकुञ्जोंमें जो प्रतिदिन चक्कर लगाता रहता है, उससे आजतक संतुष्ट क्यों नहीं हो रहा है ? जान पड़ता है तेरा हृदय शुद्ध नहीं, दूषित है। मालूम होता है अबतक तुझे वनोंसे सारतत्त्व नहीं प्राप्त हुआ (तभी तो तुझमें असंतोष बना रहता है)।
मधुप ! तू कमलकुलके मकरन्दका आस्वादन करनेमें प्रवीण है; अतः कमलोंसे भरे हुए सरोवरमें ही चला जा। मकरन्दसे पुष्ट हुए अपने इस शरीरको बेरोंकी झाड़ियोंमें इनके कण्टकरूपी आरोंसे विदीर्ण न कर।
हंस ! तुम जलकाक, बगुले और कौए आदि हिंसक जन्तुओंसे भरे हुए इस तालाबमें सदा अकेले न रहा करो। आपत्तिकालमें भी समान शील, अवस्था और भाषावाले स्वजनवर्गके साथ रहना ही अच्छा फल देने-वाला होता है। (सर्ग ११७)
बगुले, जलकाक, मोर और चातकसे सम्बन्ध रखनेवाली अन्योक्तियाँ
अब राजाके सहचर-सहचरियोंने कहा—राजन् ! देखिये, बगुला प्रायः गुणहीन होता है, तो भी इसमें एक गुण अवश्य है, यह 'प्रावृट्-प्रावृट्' कहकर सदा वर्षाकालका स्मरण दिलाता है।
ओ बगुले ! तालाबमें बैठनेपर तू अपनी सफेद पाँखों-से हंस-सा ही जान पड़ता है, परंतु मेरी एक सलाह मान ले—जलकाकोंके साथ मैत्री, प्राणिवधकी क्रूरता और कर्णकटु वाणी—इन दोषोंको त्यागकर तू स्पष्ट रूपसे हंस बन जा। (तू अपनेमें रूप-रंगके साथ गुण भी हंसोंके ही संचित कर।)
'इस तरह स्वार्थके लिये लोगोंका गला घोंटा जाता है' इस बातको अपने व्यवहारसे दिखाता हुआ मद्गु (जलकाक) मेरा गुरु बन गया है—ऐसा कहकर दुष्ट लोग उसकी प्रशंसा करते हैं।
गर्दन ऊँची किये और सुन्दर सफेद पंख फैलाये बगुलेको आकाशमें उड़ता देख लोगोंने जाना कि यहाँ हंस ही आ गया, किंतु जब वह तलैयामें उतरकर कीचड़-भरे जलसे मछली पकड़ने लगा तो सब लोगोंको निश्चय हो गया कि यह बगुला ही है।
जो बहुत समयतक अपनी अत्यन्त चपलताका परिचय दे चुके थे, वे ही बगुले जब मछलियोंको पकड़नेके लिये तपस्याका ढोंग रचने लगे—तपस्वीकी तरह ध्यान लगाकर बैठे; तब वहाँ इसी स्वभाववाले धूर्तोंको अन्धकारकी प्रतीक्षामें ध्यान लगाकर बैठा देख तटपर खड़ी हुई एक चतुर नारीको बड़ा विस्मय हुआ।
बगुला, जलकाक और अन्यान्य हिंसक जलजन्तु सदा एक ही स्थानमें रहते हैं तो भी मूर्ख और विद्वानोंकी बुद्धिके समान इनकी बुद्धिका एक-दूसरेसे मेल नहीं है।
निर्वाण-प्रकरण उ० ] * वायु, ताड़, पलाश, कनेर, कल्पवृक्ष, वनस्थली और चम्पकवनका वर्णन * ६३३
वह देखिये, खञ्जनकी चोंचमें पड़ा हुआ कीट किट-किटा रहा है। यह उसके पूर्वसंचित पाप या दुर्भाग्यकी पताका है, जो ऊँचे स्थानमें फहरा रही है।
मोरका हृदय ऊँचा और उदार होता है। वह जब इन्द्रसे जलकी याचना करता है, तब इन्द्र उसके उसी गुणसे संतुष्ट होकर वर्षाद्वारा सारी पृथ्वीको जलसे भर देते हैं।
ये मोर स्तन पीनेवाले बच्चोंकी तरह मेघोंका अनुसरण करते हैं। इससे यह अनुमान होता है कि मलिनका पुत्र मलिन ही होता है।
सत्पुरुषोंके हृदयकी भाँति निर्मल महान् सरोवरको छोड़कर मोर मेघका थूका हुआ पानी क्यों पीता है? मेरी समझमें इसका एक ही कारण है, स्वाभिमानी मयूर किसीके सामने सिर झुकाना नहीं चाहता। मेघका पानी पीते समय उसका सिर ऊँचा रहेगा; किंतु सरोवरका जल पीते समय उसके सामने नतमस्तक होनेका भय है।
राजन् ! देखिये, जिनके पङ्खरूपी मेघ सुशोभित हो रहे हैं तथा जो अपने पङ्खोंके कान्तिमान् चन्द्रचिह्नोंको कम्पित कर रहे हैं, वे मोर वर्षा ऋतुके बच्चोंकी भाँति नाच रहे हैं।
चकित चातक ! तुम गरममें वनप्रान्तके भीतर सूखे वृक्षके खोखलेमें रहनेका जो आग्रह दिखा रहे हो, इससे तुम्हारा अत्यन्त अभिमान सूचित हो रहा है। यह अभिमान दावानलमें जल जानेकी सम्भावनासे दूषित है, अतः तुम्हारे लिये सुखद नहीं हो सकता। भैया ! मेरी सलाह मानो तो कदली-वनके निकटवर्ती शीतल हरित तिनकोंको चरो, नहरोंके पानी पीओ और कदली वनमें विश्राम करो। (मेघसे बरसते हुए जलके सिवा दूसरे किसी जलको नहीं पीऊँगा, इस दुराग्रहको छोड़ दो।)
ओ मयूर ! यह समुद्रकी जलराशिसे भरे हुए पेटवाला और आकाशमें ऊपर उठनेकी इच्छावाला जलधर (मेघ) नहीं है। दावानलसे जले हुए वनवृक्षोंके खोखलेके अग्रभागसे प्रकट होनेवाली धूममालाका मण्डल है, जो इस पर्वतसे अभी-अभी ऊपरको उठा है।
(सर्ग ११८-११९)
वायु, ताड़, पलाश, कनेर, कल्पवृक्ष, वनस्थली और चम्पकवनका वर्णन करते हुए सहचरोंका महाराजसे राजाओंकी भेंट स्वीकार करके उन्हें विभिन्न मण्डलोंकी शासन-व्यवस्था सौंपनेके लिये अनुरोध करना तथा विपश्चितोंका अग्निसे वरदान प्राप्त करके दृश्यकी अन्तिम सीमा देखनेके लिये उद्यत होना
सहचर कहते हैं—राजन् ! यहाँ पुष्प-परागोंसे विभूषित नाना प्रकारकी वायु बह रही है, जो केलेकी कलियोंके स्वच्छ गुच्छको विकसित करनेमें विशेष निपुण हैं।
यह ताड़का पेड़ खम्भेकी तरह सीधा खड़ा है; अतः इसपर किसीका चढ़ना कठिन है। इसीलिये यह किसी याचकको किंचिन्मात्र भी न तो फल देता है और न पत्ता ही। इसकी यह ऊँची आकृति भी याचकोंकी अभिलाषाको पूर्ण न कर सकनेके कारण रूपहीन ही है—शोभा नहीं पाती है।
राजन् ! जो गुणहीन जड़ (वृक्ष अथवा उदारता आदि गुणोंसे रहित मूर्ख) हैं, उनके लिये राग (शृङ्गार) ही शोभावर्द्धक होता है। वह फूला हुआ पलाशका पेड़ राग—फूलोंके शृङ्गारसे ही वनमें राजाकी भाँति सुशोभित होता है।
भैया ! आओ, मैंने कुछ और ही समझा था; परंतु यह कनेर है, विकारका ही भाजन है। इसे देख मनमें यह सोचकर विषाद होता है कि कहाँ-से-कहाँ मैं इसके पास आ गया। इसमें सुगन्ध तो नाममात्रको नहीं है। गुणहीन जन्तुकी भाँति इसका अनुसरण करनेसे क्या लाभ होगा ?
६३४ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
पृथ्वीनाथ ! देखिये, कल्पवृक्षोंके वनकी शीतल छायामें विश्राम करते हुए ये सिद्ध और विद्याधररूप पथिक वीणा आदि वाद्योंके साथ गीत गा रहे हैं। देखिये न, वनमें इस कल्पवृक्षके एक-एक पत्तेपर देव-सुन्दरियाँ विश्राम करती, गाती और हँसती हैं !
उदार बुद्धिवाले ! ये सिद्ध, विद्याधर आदि नन्दनवनमें भी वैसा आनन्द नहीं पाते हैं, जैसा कि इन शुद्ध, शान्त, नीरव वनस्थलियोंमें पाते हैं। ये रमणीय और निर्जन वनस्थलियाँ मुनिके विरागी चित्तको और विषयीके रागी हृदयको समानरूपसे आनन्द प्रदान करती हैं।
देखिये, खिले हुए चम्पाके वन जब हवासे हिलते हैं, तब जलते हुए पर्वतोंके समान जान पड़ते हैं । उस अवस्थामें वहाँसे दूर मँडराते हुए भ्रमर और छाये हुए मेघ धूममालाके समान प्रतीत होते हैं।
महाराज ! देखिये, क्षार समुद्रके तटका यह भूभाग उपहार हाथमें लेकर आये हुए राजाओंसे भर गया है और उन सबका कोलाहल यहाँ व्याप्त हो गया है, जो बड़ा भला मालूम होता है।
देव ! पूर्व, पश्चिम, दक्षिण और उत्तरके क्षार सागरतक इस जम्बूद्वीपमें जो नरेश इस भयंकर युद्धसे जीवित बच गये हैं, उन सबके मस्तकपर अपने चरण रखनेका अनुग्रह कीजिये तथा भिन्न-भिन्न जनपदोंके भूभागकी प्रत्येक दिशामें चिरकालिक रक्षाके लिये नीतिशास्त्रके अनुसार क्षमापूर्वक योग्य व्यक्तियोंको शान्त चित्तसे शासन-व्यवस्थाका अधिकार दीजिये। तत्पश्चात् अस्त्र-शस्त्र और अनुपम सेनाओंका बँटवारा कर दीजिये।
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! तदनन्तर उन चारों विपश्चितोंने समुद्रतटकी भूमिपर बैठकर राज्यका यह सारा प्रयोजन (मण्डलकी सीमा बाँधने आदिका कार्य) सिद्ध किया। इतनेमें ही मेघमालाके समान काली रात आयी और सब ओर फैल गयी। तत्पश्चात् वे सभी विपश्चित् जो दिनका कार्य पूरा कर चुके थे, सोनेके लिये अपनी शय्याओंपर आरूढ़ हुए। वे नदियोंके प्रवाहकी भाँति बहुत दूर समुद्रतक चले आये थे। इसलिये मन-ही-मन आश्चर्यसे चकित हो इस प्रकार विचार करने लगे—'यह सब ओर फैली हुई दृश्य-जगत्की शोभा कितनी विस्तृत होगी ? इस जम्बूद्वीपके बाद खारे पानीका समुद्र है। उसके बाद प्लक्षद्वीपकी भूमि है। तत्पश्चात् क्षार समुद्रसे दुगुना बड़ा इक्षुरसका समुद्र है। उसके बाद कुशद्वीप है। तदनन्तर सुराका सागर है। इसी प्रकार क्रमसे सात समुद्र और सात द्वीपोंके बाद अन्तमें क्या होगा ? फिर उसके बाद भी क्या होगा ? यह दृश्यरूपिणी माया न जाने कितनी बड़ी और कैसी होगी ? इसलिये हमलोग भगवान् अग्निदेवसे प्रार्थना करें। उनके वरदानसे हम अनायास ही इन सम्पूर्ण दिशाओंका अन्तिम सीमातक अवलोकन कर सकेंगे।' ऐसा सोचकर यथास्थान बैठे हुए वे सब विपश्चित् एक साथ ही भगवान् अग्निका आवाहन करने लगे। तब भगवान् अग्निदेव इन चारोंके समक्ष साकार होकर प्रकट हुए और बोले—'पुत्र ! मुझसे वर माँगो।'
विपश्चित् बोले-देव ! सुरेश्वर ! हम इस पञ्चभूतात्मक दृश्यजगत्का अन्त देखना चाहते हैं, जहाँतक इस देहसे जाना सम्भव हो सके, वहाँतक इस देहसे, जहाँ यह न जा सके वहाँ मन्त्रके प्रभावसे संस्कारयुक्त किये गये इसी शरीरसे, तथा जहाँ इस संस्कारयुक्त शरीरकी भी गति न हो सके, वहाँ मनसे जाकर हम दृश्य जगत्का अन्त देखें। जो जिस रूपमें मनसे प्रत्यक्ष होनेयोग्य तथा जाननेयोग्य हो उन सभी पञ्चभूतात्मक पदार्थोंका हम दर्शन कर सकें—यह उत्तम वर आप हमें दें। प्रभो ! सिद्ध योगी अपने योगके प्रभावसे जहाँतक जा सकते हों, वहाँतकका मार्ग हम इसी शरीरसे तै करें। जहाँ योगियोंकी भी पहुँच न हो, उस अगम्य दृश्यको हम मनसे ही देखें। सिद्ध योगियोंके गम्य मार्गपर चलते समय हमारी मृत्यु न
निर्वाण-प्रकरण उ० ] * चारों विपश्चितोंका समुद्रमें प्रवेश * ६३५
हो तथा जिस मार्गमें देहका रहना सम्भव ही न हो, वहाँ हमारा मन ही यात्रा करे।
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! उनके इस प्रकार वर माँगनेपर 'ऐसा ही होगा' यों कहकर अग्निदेव सहसा एक ही क्षणमें अदृश्य हो गये, मानो बडवानलरूपसे समुद्रमें जानेके लिये उन्हें जल्दी लगी रही हो। इस तरह वर देकर अग्निदेव चले गये। तत्पश्चात् रात्रि आयी और कुछ देर ठहरकर वह भी चली गयी। इसके बाद सूर्यदेव आये। साथ ही उन विपश्चितोंके हृदयमें विशाल समुद्रको लाँघनेकी इच्छा भी आयी। (सर्ग १२०-१२१)
चारों विपश्चितोंका समुद्रमें प्रवेश और प्रत्येक दिशामें उनकी पृथक्-पृथक् यात्राका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! तत्पश्चात् प्रातः-काल मुख्य-मुख्य मन्त्रियोंके मना करनेपर भी वे चारों विपश्चित् हठपूर्वक नीतिशास्त्रके अनुसार पृथ्वीके राज्यविभाग और उनके शासनकी भलीभाँति पूरी व्यवस्था करके दिगन्तके दर्शनकी अतिशय उत्कण्ठासे भर गये, मानो उनके शरीर-पर किसी ग्रहका आवेश हो गया हो। उस समय उनका सारा परिवार रोते हुए मुखसे करुणाजनक क्रन्दन कर रहा था। उन चारोंने उन्हें ऐसा करनेसे रोका और स्वयं आसक्ति-शून्य होनेके कारण अभिमान, ईर्ष्या, लोभ, शत्रुओंके पराभवकी इच्छा, राज्य, स्त्री एवं पुत्र आदिको त्यागकर वे यह कहते हुए चल दिये कि 'हमलोग समुद्रके पार जा दिगन्तका दर्शन करके अभी क्षणमें लौटे आ रहे हैं।'
अग्निदेवकी प्रसन्नतासे प्राप्त मन्त्रकी शक्तिसे पाँचों भूतोंपर विजय प्राप्त करके वे उत्तम सिद्ध हो गये थे। अतः उस समय उन्होंने पैदल ही समुद्रमें प्रवेश किया। वे चारों विपश्चित् प्रत्येक दिशामें समुद्रके भीतर प्रविष्ट होकर स्थलकी ही भाँति जलमें भी पैरोंसे ही चलने लगे। जलके भीतर भूपृष्ठकी भाँति तरङ्गसमूहों-पर पैर रखकर अकेले-ही-अकेले जानेको उद्यत वे चारों विपश्चित् अपनी सेनासे बहुत दूर निकल गये। वे एक-एक पग चलकर जब महासागरके भीतर प्रवेश करने लगे, तब तटपर खड़े हुए उनके सम्बन्धी उन्हें तबतक देखते रहे, जबतक कि वे शरत्कालके आकाशमें प्रविष्ट हुए मेघ-खण्डोंके समान अदृश्य नहीं हो गये। यद्यपि उन्हें चञ्चल गजराजोंके समान उठी हुई तरङ्गमालाओंसे टकराना पड़ता था, तथापि वे तटपर बने हुए पथरीले परकोटोंके समान अपना धैर्य नहीं छोड़ते थे। वे चारों विपश्चित् समुद्रकी जलराशिमें आगे बढ़ने लगे। जलके मगर उनके सहचर (साथी) थे। वे शौर्यसम्पन्न नाकों और केकड़ोंसे व्याप्त भँवरोंमें चारों ओरसे घिर जाते थे। बीचमें जानेपर बहु-संख्यक मेघोंके समान रूपवाली और व्यक्ताव्यक्त किरण-राशिसे सुशोभित होनेवाली भ्रान्त मुक्तामणयों तथा वृक्षों-की लताके समान दीखनेवाली जलमय तरङ्गोंके जलकण-रूपी फूलोंद्वारा वे पग-पगपर अपने शरीरको विभूषित एवं सुशोभित करते जा रहे थे।
उन चारों विपश्चितोंमेंसे जो पश्चिम दिशाका अन्त देखनेके लिये प्रस्थित हुआ था, वह अपनेको अमर मानने-वाले एक मत्स्यके द्वारा निगल लिया गया । वह मत्स्य मत्स्यावतारधारी भगवान् विष्णुके कुलमें उत्पन्न हुआ था और उसका वेग झेलमकी प्रखर धारमें बहनेवाली नौकाके समान तीव्र था। किंतु उस मत्स्यके लिये उस राजाको पचाना बड़ा कठिन काम था। इसलिये क्षीरसागरमें पहुँचकर उसने उसे उगल दिया; तब वह क्षीरसागरको लाँघकर दूर दिगन्तमें चला गया।
दक्षिण दिशाका अन्त देखनेके लिये चला हुआ विपश्चित् जब इक्षुरसके समुद्रमें पहुँचा, तब उसके तटवर्ती यक्षनगरमें निवास करनेवाली एक यक्षिणीने, जो वशीकरण विद्यामें अत्यन्त निपुण थी, उसे देखा। देखकर अपने विद्याके बलसे आकृष्ट करके उसे अपना प्रेमी बना लिया।
सं० यो० व० अं० २२—
६३६ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
पूर्व दिशाकी चरम सीमा देखनेके लिये आगे बढ़ा हुआ विपश्चित् जब गङ्गाजीके मुहानेपर पहुँचा, तब उसने एक मगरपर आक्रमण किया, जो उसे निगल जानेके लिये उद्यत था। उसने उस मगरको गङ्गामें खींचकर चीर डाला, तब गङ्गाने विपश्चित्को पीछे लौटाकर कान्यकुब्ज नगरमें छोड़ दिया।
उत्तर दिशाका अन्त देखनेके लिये चले हुए विपश्चित्ने उत्तर कुरुदेशमें श्रीउमा-महेश्वरकी आराधना करके अणिमा आदि सिद्धियोंको प्राप्त कर लिया। उस सिद्धिके कारण दिगन्तमें मरणका भय उसे बाधा नहीं पहुँचाता था। मार्गमें कितने ही मगर और जलहस्ती उसे निगलते और उगलते गये, किंतु उस सिद्धिके प्रभावसे ही उसके शरीरको कोई क्षति नहीं पहुँची। वह बहुतसे द्वीप-द्वीपान्तरों और कुलपर्वतोंको लांघता हुआ आगे बढ़ गया।
पश्चिम दिशामें गये हुए विपश्चित्को जिसकी अङ्ग-कान्ति कुशके ही समान थी, कुशद्वीपमें पक्षिराज गरुड़ने अपनी पीठपर बिठा लिया और बड़े वेगसे अनेक समुद्रोंके पार पहुँचा दिया।
पूर्व दिशावाला विपश्चित् कान्यकुब्ज देशसे चलकर जब क्रौञ्चद्वीपके एक पर्वतपर गया, तब वहाँ वनके भीतर रहनेवाला कोई राक्षस उसे निगल गया। परंतु उस राजाने राक्षसकी अँतड़ियोंको काटकर उसके वक्षःस्थलको विदीर्ण कर दिया।
दक्षिण दिशाकी ओर गया हुआ विपश्चित् दक्षके शापसे क्षणभरमें यक्ष हो गया। फिर सौ वर्षोंके बाद शाकद्वीपमें उसे उस शापसे छुटकारा मिला।
उत्तर दिशाका यात्री विपश्चित् छोटे-बड़े नदी-नाले और समुद्रोंको बड़े वेगसे लांघता हुआ स्वादिष्ठ जलवाले महासागरके उस पार सुप्रसिद्ध सुवर्णमयी भूमिमें जा पहुँचा, किंतु वहाँ एक सिद्धके शापसे शिला हो गया। तदनन्तर सौ वर्षके बाद अग्निदेवके अनुग्रहसे उस सिद्धने विपश्चित्को शापसे मुक्त कर दिया। इससे वह बहुत प्रसन्न हुआ।
पूर्वका यात्री विपश्चित् आठ वर्षोंतक नारियलके वृक्षोंसे भरे हुए एक देशके निवासियोंका राजा होकर रहा। वह बड़ा धर्मात्मा था। इसलिये उसे वहाँ अपने पूर्व-जन्मकी स्मृति हो आयी। वह नारियलके फलोंसे जीवन-निर्वाह करने लगा। मेरु पर्वतके उत्तर एक कल्पवृक्षका वन था, जिसमें एक अप्सराके साथ उसने दस वर्षोंतक निवास किया।
पश्चिम जानेवाला विपश्चित् पक्षियोंपर विश्वास जमाने—उन्हें वशमें कर लेनेकी विद्याका मर्मज्ञ था (अतएव पहले गरुड़ने उसे पीठपर बिठाकर समुद्रके पार पहुँचा दिया था)। फिर वह शाल्मलीद्वीपके सुविख्यात सेमलके वृक्षपर एक मादा पक्षीके घोंसलेमें उसके साथ क्रीड़ा करता हुआ कई वर्षोंतक रहा। फिर कोमल लता-वल्रियोंसे अलंकृत मन्दराचलपर मन्दार वृक्षोंके निकुञ्ज-भवनमें मन्दरी नामवाली एक किन्नरीने विपश्चित्की एक दिन सेवा की।
तत्पश्चात् पूर्व दिशाके विपश्चित्ने क्षीरसागर-तटवर्ती वनके भीतर कल्पवृक्षोंकी वनश्रेणियोंमें नन्दनवनकी देवियों-अप्सराओंके साथ कामासक्त होकर सत्तर वर्ष व्यतीत किये।
(सर्ग १२२-१२३)
विपश्चितोंके विहारका तथा जीवन्मुक्तोंकी सर्वात्मरूप स्थितिका वर्णन
श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! जब वे सभी विपश्चित् एक चैतन्यमय थे और उन सबका शरीर भी एक ही था, तब शरीर एक होते हुए उनकी इच्छाएँ विभिन्न कैसे हो गयीं !
निर्वाण-प्रकरण उ० ] * विपश्चितोंके विहारका तथा जीवन्मुक्तोंकी सर्वात्मरूप स्थितिका वर्णन * ६३७
श्रीवसिष्ठजीने कहा—राघवेन्द्र ! जैसे स्वप्नावस्थामें चित्त स्वयं अपनेमें ही स्वप्न-दृष्ट पदार्थोंके रूपमें नाना प्रकारका हो जाता है, उसी तरह एक चैतन्य घनाकाश सर्वव्यापी अखण्ड होते हुए भी मायावश भिन्न-सा बन जाता है । इसलिये जिस विपश्चित्के समक्ष जो वस्तु आयी, वह उसीमे तन्मयताको प्राप्त होकर उसीके वशमें हो गया । एक देशमें स्थित रहते हुए भी योगी सर्वत्र व्याप्त होकर तीनों कालोंमें सब काम करते और सब पदार्थोंका अनुभव करते हैं। दसों दिशाओंमें स्थित वे विपश्चित् यद्यपि वास्तवमें एक चैतन्यमय थे, तथापि उन्होंने अज्ञानवश वैसा ही व्यवहार किया, जिससे उन्हें सुख-दुःख आदिकी प्राप्ति हुई । जिसके परिणामस्वरूप उन्होंने भूमिपर शयन किया, द्वीप-द्वीपान्तरोंमें सुख-दुःखका उपभोग किया, वन-श्रेणियोंमें विहार किया, मनुष्यलोकी यात्रा की, पर्वतनात्राओंमें निवास किया, सागर-कुक्षियोंमें भ्रमण किया, अनेक द्वीपोंमें विश्राम किया, मेघमालाओंसे आच्छादित पर्वत-शिखरोंपर गुप्तरूपसे वास किया, सागरमालाओंमें जन्म धारण किया तथा ओषधियोंमें, जलतरङ्गोंमें, पर्वतों और समुद्रोंके तटोंपर एव नगरोंमें विविध क्रीड एँ कीं ।
श्रीरामजीने पूछा—भगवन् ! एक देशमें स्थित रहते हुए भी योगीलोग चारों ओर व्याप्त होकर तीनों कालोंमें सम्पूर्ण कार्य कैसे करते हैं ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! इस जगत्में अज्ञानियोंकी दृष्टिमें जो स्थूल वस्तु है, उससे हम ज्ञानियोंका कोई प्रयोजन नहीं है; किंतु ज्ञानियोंकी दृष्टिसे जो चिन्मात्र वस्तु है, उसका वर्णन करता हूँ; सुनो । तत्त्वज्ञोंकी दृष्टिसे चिन्मात्र सत्तासामान्यके अतिरिक्त दूसरी कोई वस्तु है ही नही । दृश्यके अत्यन्ताभावका ज्ञान होनेपर सृष्टि और प्रलयकी दृष्टिका विनाश होनेके पश्चात् चिन्मात्र सत्तासामान्यमें निरन्तर विश्रामको प्राप्त हुए सर्वेश्वरका यहाँ सर्वदा सर्वत्व और सर्वात्मत्व ही वर्तमान है । ऐसी दशामें भला बताओ तो सही, कौन कैसे कहाँ कब और क्योंकर उसका निरोध कर सकता है ? वह सर्वव्यापी सर्वात्मा जब जहाँ जिस रूपमें प्रकट होना चाहता है, तब वहाँ उसी रूपमें प्रकट हो जाता है; क्योंकि उस सर्वात्मामें कौन-सी वस्तु नहीं है ? तुम ऐसा समझो कि अतीत, वर्तमान और भविष्य, स्थूल-सूक्ष्म, दूर निकट तथा निमेष और कल्प आदि जितनी वस्तुएँ हैं, वे सब की सब अपने स्वरूपका त्याग किये बिना ही सत्तासामान्य-स्वरूप सर्वात्मामें सर्वदा ही वर्तमान हैं । किंतु वास्तवमें मायासे उल्लासको प्राप्त हुआ यह दृश्य-प्रपञ्च न उत्पन्न हुआ है और न निरुद्ध हुआ है; बल्कि ज्यों-का-त्यों स्थित है ।
महाबाहु श्रीराम ! वे विपश्चित् पूर्णतया प्रबुद्ध नही थे, बल्कि बोधदृष्टि तथा अबोध-दृष्टिके मध्यमें वे दोलायमान-से स्थित थे । उन अर्धबुद्ध विपश्चितोंमें चारों ओरसे नित्य मोक्ष तथा बन्धनके लक्षण दृष्टिगोचर होते थे । उस पूर्वोक्त संशयग्रस्त धारणासे युक्त होनेके कारण वे विपश्चित् परब्रह्म-प्राप्त योगी न थे, किंतु धारणासे प्राप्त हुए सिद्धिवाले धारणा-योगी थे । राजीवनोचन राम ! जिन्हें परम ज्ञानकी प्राप्ति हो गयी है तथा जिनमें अविद्याका लेशमात्र भी नहीं है, वे विपश्चित् यदि ऐसे ज्ञानयोगी होते तो क्या वे अविद्याकी ओर दृष्टिपात करते ? वे तो अग्निदेवके वरदानसे सिद्धिप्राप्त धारणा-योगी थे । उनमें अविद्या वर्तमान थी, इसी कारण वे आत्मविचारहीन थे । जीवन्मुक्तोंका भी शरीर देहधर्मसे युक्त रहता है; किंतु उस शरीरके भीतर जो उनका चित्त है वह अचल ही रहता है अर्थात् उसमें देहधर्म नहीं व्याप्त होते । अतः जीवन्मुक्त पुरुषके शरीरको चाहे टुकड़े-टुकड़े करके काट डाला जाय अथवा उसे राजसिंहासनपर बैठाया जाय—इस प्रकारकी रोने और हँसनेकी दोनों अवस्थाओंमें उसे न तो कुछ दुःखका अनुभव होता है और न सुखका ही ।
६३८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
जीवन्मुक्त पुरुषोंका शरीर आदि आत्मस्वभावसे कभी पृथक् नहीं है। इसीलिये जीवन्मुक्त पुरुष मरा हुआ भी मरता नहीं, रोता हुआ भी रोता नहीं और हँसता हुआ भी हँसता नहीं अर्थात् वह मरणादि अवस्थाओंमें हर्ष-शोकसे युक्त नहीं होता। तथापि व्यवहारकालमें अज्ञानी और ज्ञानी जीवन्मुक्तके आचरण प्रायः एक-से ही होते हैं। प्रह्लाद, बलि, वृत्र आदि यद्यपि वीतराग जीवन्मुक्त ही थे पर उनके व्यवहार रागियोंके-से होते थे। हाँ, बन्धन तथा मोक्षका कारण तो वासना और वासनाशून्यता ही है।
(सर्ग १२४-१२५)
मरे हुए विपश्चितोंके संसारभ्रमणका तथा उत्तरदिशागामी विपश्चित्के भ्रमणका विशेषरूपसे वर्णन
श्रीरामजीने पूछा—मुनिश्रेष्ठ ! तदनन्तर वे विपश्चित् उन दिगन्तोंमें तथा द्वीपों, सागरों, काननों और पर्वत-भूमियोंमें जाकर क्या करते हुए निवास करते रहे ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—वत्स राम ! उनमेंसे एक विपश्चित् क्रौञ्चद्वीपके सीमा-भूत पर्वतके पश्चिमी तटपर एक हाथीद्वारा दाँतों एवं गण्डस्थलोंसे उस पर्वतकी शिलापर कमलकी तरह पीस डाला गया। दूसरे विपश्चित्को, जिसका शरीर क्षत-विक्षत हो गया था, एक राक्षसने आकाशमार्गसे ले जाकर समुद्रवर्ती वडवानलमें झोंक दिया, जिससे वह वहीं जलकर भस्म हो गया। तीसरेको एक विद्याधर इन्द्र-सभामें ले गया। वहाँ उसने इन्द्रको प्रणाम नहीं किया, जिससे इन्द्रने कुपित होकर उसे शाप दे दिया। उस शापसे वह जलकर भस्म हो गया। चौथा कुशद्वीपकी सीमापर स्थित पर्वतकी तलहटीमें बहनेवाली नदीके कछारमें बड़ी सावधानीसे जा रहा था, परंतु किसी महाबली मगरने उसके आठ टुकड़े कर दिये, जिससे वह मर गया। इस प्रकार वे चारों भूपाल (विपश्चित् ) दिगन्तोंमें जाकर मृत्युको प्राप्त हो गये। मृत्युके पश्चात् उन विपश्चितोंकी संवित्ने पूर्व-संस्कारवश आकाशात्मा बनकर आकाशमें ही पृथ्वीमण्डलको देखा फिर दृश्य और दर्शनके मध्यमें, भूमण्डलका अनुभव ही जिसकी आकृति है, उस अविद्याकी निष्ठा—इयत्ताको देखनेके लिये वे द्वीप-द्वीपान्तरोंमें भटकते रहे।
राघव ! उनमें जो विपश्चित् पश्चिम दिशाकी ओर चला था, वह सातों द्वीपों तथा सातों महासागरोंको लाँघकर घनभूमि (पूर्वोक्त स्वर्णमयी भूमि) में जा पहुँचा। वहाँ उसे भगवान् जनार्दनके दर्शन हुए। फिर उन्हीं भगवान्से अनुपम ज्ञान (ब्रह्मविद्या) प्राप्त करके वह उसी स्थानमें पाँच वर्षतक समाधिस्थ हुआ बैठा रहा। तदनन्तर वह देहका परित्याग करके निर्वाणको प्राप्त हो गया। पूर्व दिशामें गया हुआ विपश्चित् पूर्णिमाके चन्द्रमण्डलके निकट अपने शरीरको स्थापित करके उसमें चन्द्रत्वकी भावना करता रहा। चिरकालके बाद जब उसका पूर्वशरीर नष्ट हो गया, तब वह चन्द्रलोकमें स्थित हो गया। राजकुमार राम ! दक्षिण दिशागामी विपश्चित् शाल्मलीद्वीपमें जाकर अपने शत्रुओंकी जड़ उखाड़ करके आज भी वहाँ राज्य कर रहा है। और उत्तर दिशाको प्रस्थान करनेवाला विपश्चित् सप्तमाम्बुधि—स्वादूदक-सागरमें जा पहुँचा, जिसमें चञ्चल एवं विशाल तरङ्गें किलोल कर रही थीं। वहाँ उसने एक मगरके पेटमें एक हजार वर्षतक निवास किया। उस समय वह उसी मगरके पेटका मांस खाकर जीवन-निर्वाह करता था। इस प्रकार जब वह मगरराज मर गया, तब वह उसके पेटसे निकलकर दूसरे मगरकी तरह समुद्रसे बाहर आया। तदनन्तर हिमके समान स्वच्छ जलसे भरे हुए उस सागरकी अस्सी हजार योजनकी विस्तारवाली घनी भूमिको लाँघकर वह दस हजार योजनके विस्तारवाले एक विशाल मैदानमें जा पहुँचा, जिसकी भूमि स्वर्णमयी थी और मध्यभाग बहुत बड़ा
निर्वाण-प्रकरण उ० ] * मरे हुए विपश्चितोंके संसार-भ्रमणका वर्णन * ६३९
था। उसमें देवतालोग विहार करते थे। वहीं उसकी मृत्यु हो गयी। उस भूमिमें देवगणोंके मध्य मरनेसे उस विपश्चित्को उसी प्रकार उत्तम देवत्वकी प्राप्ति हो गयी, जैसे अग्निके बीच पड़ा हुआ काष्ठ क्षणभरमें ही अग्नि-रूप हो जाता है। फिर वह एक प्रधान देवता होकर उस लोकालोक पर्वतपर गया, जो भूमण्डलरूपी वृक्षका थाला-सा स्थित है।
रामभद्र ! उसका दिगन्तदर्शनरूपी पूर्वसंस्कार उसे पूर्णतया अभ्यस्त था ही, अतः वह उस उत्कृष्ट निश्चयसे प्रेरित होकर ज्यों ही आगे बढ़ा, त्यो ही उस लोकालोक-गिरिके शिखरसे अन्धकारमय गर्तमें जा गिरा। वहाँ उसने देखा कि पर्वत-शिखर-सरीखे विशालकाय मांसभक्षी पक्षी उसके उस देव-शरीरको नोच-नोचकर खा रहे हैं और पूर्वचिन्तित दिगन्तदर्शनके कार्यमें उसका मनोमय शरीर ही प्रसार कर रहा है; क्योंकि जहाँ उसकी मृत्यु हुई थी, वह प्रदेश परम पावन था। इसी कारण उस निर्मल हृदयवाले विपश्चित्को अपने सूक्ष्म शरीरमें आधिभौतिकताका बोध तो नहीं हुआ, परंतु मनके व्यापारसे रहित शान्त स्थितिरूप उत्तम बोधकी प्राप्ति नहीं हुई। उसे तो आतिवाहिक शरीरका ही विशेषरूपसे ज्ञान था, इसी कारण उसने अपने मनको आगे बढ़ते हुए देखा। आतिवाहिकके ज्ञानसे उसे गर्भवास-तुल्य अन्धकार दीख पड़ा। उस अन्धकारकी समाप्तिपर ब्रह्माण्डकटाहरूपी भूखण्ड दृष्टिगोचर हुआ, जो वज्र-सदृश सारवान्, स्वर्णमय और करोड़ों योजन विस्तारवाला हैं। उसके बाद उसे उस भूखण्डसे आठगुना विस्तारवाला जल मिला, जो ब्रह्माण्डकटाहकी भूमिके समान समुद्रकी पीठकी भाँति स्थित था। उसे पार करनेके बाद वह एक तेजयुक्त स्थानमें जा पहुँचा, जो प्रलयाग्निकी घनीभूत लपटोंके पिण्डीभूत कोटरके समान चमकीला था और जहाँ बहुत-से सूर्य अपना प्रकाश फैला रहे थे, जिससे वह अत्यन्त भीषण लग रहा था। उस तैजस आवरणमें वह दाह-शोक आदिसे रहित मनोमय देहसे विचरण कर रहा था। इतनेमें उसे ऐसा भान हुआ कि वह वायुरूप आवरणमें आ पहुँचा। उस समय उसे यह ज्ञात हुआ कि मेरा सूक्ष्म आत्मा ही ले जाया जा रहा है और वह चित्तमात्र आत्मा किस प्रकार ले जाया जा रहा है—यह भी मालूम हुआ। ऐसे ज्ञानके बलसे उस धीरात्माने उस वायुसागरको पार किया। उसके बाद वह उससे भी दसगुने विस्तृत शून्य स्थानमें जा पहुँचा। उसे लाँघकर वह असीम महान् आकाशमें प्रविष्ट हुआ। जिसमें सब कुछ विलीन होता है, जिससे सब कुछ आविर्भूत होता है तथा जो कुछ नहीं हैं और सब कुछ है, उस महान् आकाशमें मनोमय देहसे भ्रमण करता हुआ वह बहुत दूर चला गया। वहाँ उसने पृथ्वी, जल, तेज, वायु, तथा जगत् देखा। फिर संसारकी रचनाएँ, सृष्टियाँ और दिशाएँ दृष्टिगोचर हुईं। तत्पश्चात् पर्वत, आकाश, देवता-मनुष्य और पञ्चमहाभूतोंके अन्तमें घनीभूत आकाश दीख पड़ा। पुनः जगत्, दिशाएँ, आकाश और दूसरी अव्यवस्थित सृष्टियाँ परिलक्षित हुईं। यों दीर्घकालसे विहार करता हुआ वह आज भी वहाँ स्थित है। चिरकालसे अभ्यस्त हुए अपने जगत्-सत्यतारूप निश्चयसे वह विरत नहीं हो रहा है; क्योंकि अविद्याका अन्त तो है नहीं किंतु जब उसकी सत्यता जान ली जाती है, तब वह भी ब्रह्मरूप हो जाती है। वास्तवमें तो पूर्णात्मा ब्रह्ममें अविद्या है ही नहीं। यह दृश्य है, यह अविद्या है, यह तो उसकी कल्पना है। राघव ! वह विपश्चित् आज भी तत्त्वज्ञान न होनेके कारण उन पूर्वदृष्ट स्थानोंमें ही तथा उन्हींके सदृश अन्य सृष्टियों तथा वनखण्डोंमें अपनी वासनाकी उत्कटताके कारण चिरकालसे दूर-से-दूर बार-बार भ्रमण कर रहा है।
(सर्ग १२६-१२८)
६५० * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
शेष दो विपश्चितोंके वृत्तान्तका वर्णन तथा मृगरूपमें श्रीरामचन्द्रजीको प्राप्त हुए एक विपश्चित्का राजसभामें लाया जाना
श्रीरामजीने पूछा—मुनिश्रेष्ठ ! अब यह बतलाइये कि एक विपश्चित् तो भगवत्कृपासे मुक्त हो गया और दूसरा अभीतक अविद्यामें भ्रमण कर रहा है। शेष चन्द्रलोक और शाल्मलिद्वीपमें निरुद्ध हुए उन दोनों विपश्चितोंकी फिर क्या दशा हुई ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! उन दोनों विपश्चितोंमेंसे एक चिरकालसे अभ्यस्त हुई वासनाओंके वशीभूत होकर अनेक प्रकारके शरीरोंसे द्वीप-द्वीपान्तरोंमें भ्रमण करता हुआ उत्तर-दिग्वर्ती विपश्चित्की ही गतिको प्राप्त हुआ। उसीकी तरह परमाकाशरूपी खोखलेमें क्रमशः ब्रह्माण्डके आवरणोंका परित्याग करके लाखों सृष्टियोंको देखता हुआ वह आज भी उसी तरह स्थित है। उन दोनोंमेंसे जो दूसरा था, उसकी चन्द्रमाके निकट अपने शरीरको रखकर अभ्यास करनेके कारण चन्द्रमृगमें पूर्णतया आसक्ति हो गयी, जिससे वह प्रतिमास चन्द्रमा-के साथ भ्रमण करनेवाली देहोंसे युक्त हो गया । तदनन्तर उनका परित्याग करके वह पर्वतपर मृगरूपमें स्थित है।
श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! चारों विपश्चितोंकी एक ही वासना थी, फिर वह उत्तम अधम फल प्रदान करनेवाली भिन्न-भिन्न कैसे हो गयी ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुवीर ! प्राणीकी भलीभाँति अभ्यस्त हुई वासना देश, काल और क्रियाके वशसे कोमल और अत्यन्त परिपाकवश दृढ़मूल होती है। उनमें जो कोमल है, वह अन्यरूपताको प्राप्त होती है, किंतु जो बद्धमूल है, उसमें शीघ्र अन्यरूपता नहीं होती। देश, काल और क्रिया आदिकी जो एकता है, वही वासनाकी एकता है। उन दोनोंमें भिन्नता आ जानेपर जो बलवती होती है, उसीकी विजय होती है । इस प्रकार वे विपश्चित् एक साथ उत्पन्न होकर शरीर-भेदसे चार रूपों-में हो गये । उनमेंसे आदिके दोको तो अविद्याने आकृष्ट कर लिया, एक वासनाके वशीभूत होकर मृग बन गया और एककी मुक्ति हो गयी ।
श्रीराम ! इस प्रकार उन विपश्चितोंका सारा वृत्तान्त मैंने स्पष्टरूपसे तुम्हें कह सुनाया। यह अविद्या कारण ब्रह्मकी भाँति अनन्त ही है; क्योंकि वह तद्रूप ही है। यों वे अज्ञानी विपश्चित् उस ब्रह्माण्ड-मण्डपके अंदर भटकते रहे, परंतु उन्हें अविद्याका ओर छोर नहीं मिला। यह अनन्तरूपा अविद्या ब्रह्मरूप ही है; क्योंकि वह ब्रह्ममयी है। इसीलिये जबतक इसका यथार्थ ज्ञान नहीं हो जाता, तभीतक इसकी सत्ता है; तत्त्वज्ञान हो जानेपर तो इसका अस्तित्व ही मिट जाता है। इसी कारण वे विपश्चित् परब्रह्माकाशमें अत्यन्त दूर पहुँचकर अविद्याद्वारा कल्पित कतिपय अन्य संसार-रूपोंमें भटकते रहे। उनमेंसे एक मुक्त हो गया, एक मृग बन गया। शेष दो अपने प्राक्तन प्रबल संस्कारके वशीभूत होकर आज भी कहीं भटक रहे हैं।
श्रीरामजीने पूछा—मुनिवर ! यह तो आपने हमारे लिये महान् आश्चर्यजनक वृत्तान्त सुनाया है । मेरे ऊपर आपकी विशेष अनुकम्पा है । अच्छा, अब यह बतलानेकी कृपा कीजिये कि वे विपश्चित् जिन लोकोंमें उत्पन्न हुए थे, वे यहाँसे कितनी दूर हैं और वे कितनी दूरीपर कैसे लोकोंमें भ्रमण कर रहे हैं ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! वे दोनों विपश्चित् जिन लोकोंमें स्थित हैं, वे लोक प्रयत्नपूर्वक विचार करनेपर भी मेरी बुद्धिके विषय नहीं हुए । हाँ, मृग-योनिको प्राप्त हुआ तीसरा विपश्चित् जिस लोकमें स्थित है, वह संसार सम्भवतः हमारी बुद्धिमें है। वह विपश्चित्,