संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
कल्याण
(चित्र)
राजा सिन्धुका राज्याभिषेक (उत्पत्ति-प्रकरण सर्ग ५१)
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उत्पत्ति-प्रकरण ] * जगत्की असत्ता या भ्रमरूपताका प्रतिपादन * १७७
स्मृति-वाक्यके अनुसार जो देह आदिमें अहंभावका अनुभव नहीं करता, ऐसा कौन मनुष्य जन्म-मरणरूपी भ्रमको प्राप्त होगा । परब्रह्ममें व्यष्टि जीव-रूपसे प्रकट हुई जो अद्वितीय चित्-सत्ता है, वह जलकी तरलताके भीतर व्यक्त हुई आवर्त (भँवर) की रेखाके समान है। वही अहंभावसे युक्त होकर इन तीनों लोकोंको धारण करती है। वास्तवमें तो परमात्माके भीतर न सद्रूप जगत् है और न असद्रूप । (सर्ग ६१)
जगत्की असत्ता या भ्रमरूपताका प्रतिपादन तथा नियति और पौरुषका विवेचन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! ये वर्तमान, भविष्य और भूतकालकी सृष्टि-परम्पराएँ अपनी सत्ताको उसी प्रकार धारण करती हैं, जैसे जलकी तरलता अपने भीतर स्पष्ट रूपसे आवर्तोंकी परम्परा धारण करती हैं। जैसे महती मरुभूमिमें तटवर्ती वृक्षों और लताओंसे झड़ती हुई पुष्प-राशिसे परिपूर्ण लहराती नदी मिथ्या ही प्रतीत होती है,उसी प्रकार सच्चिदानन्दघन परमात्मामें यह सृष्टि-सुषमा सर्वथा मिथ्या ही है । जैसे स्वप्नका संसार-इन्द्रजालका नगर और संकल्प या मनोरथद्वारा कल्पित जगत्—ये सब सत्य न होनेपर भी प्रतीतिके विषय होते हैं, उसी प्रकार सृष्टियोंके अनुभवकी भूमि असत्य होनेपर भी प्रतीतिगोचर हो रही है ।
श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—ज्ञानवानोंमें श्रेष्ठ गुरुदेव ! पूर्वोक्त प्रकारसे भलीभाँति विवेक-विचार करनेपर जब एकमात्र अद्वितीय परब्रह्म परमात्माके साथ अपनी एकता-का पूर्ण निश्चय हो जानेसे उत्कृष्ट एवं संशयरहित आत्म-विज्ञान प्रकाशित हो जाता है, तब तत्त्वज्ञानियोंके भी शरीर यहाँ किसलिये टिके रहते हैं ? यदि कहें वे दैवके ही अधीन होकर रहते हैं तो ठीक नहीं जान पड़ता, क्योंकि उन तत्त्वज्ञानियोंपर दैवका प्रभाव कैसे रह सकता है ।*
* श्रुति कहती है—'तस्य ह न देवाश्च नाभूत्या ईशते । आत्मा ह्येषां स भवति' अर्थात् तत्त्वज्ञानीके पराभवमें देवता भी समर्थ नहीं; क्योंकि वह उनका आत्मा ही हो जाता है । (बृहदारण्यक० १ । ४ । १० )
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! ब्रह्मा आदि तत्त्वज्ञानियोंने अज्ञानियोंके बोधके लिये यह बताया है कि जो ब्रह्म है, वही नियति है और वही यह सर्ग है। स्फटिक-शिलाके भीतर प्रतिबिम्बित चित्रसमूहकी भाँति परमात्मामें स्थित हुए ब्रह्माने नियति (जीवोंके अदृष्ट)-रूपी भावी सृष्टिको उसी तरह देखा है, जैसे सोया हुआ पुरुष अपनेमें स्वप्न-जगत्की कल्पनाके आधारभूत आकाशको देखता है। जैसे चेतन-स्वभाव होनेके कारण अङ्गी (देहधारी पुरुष) को शरीरमें अङ्ग आदि दिखायी देते हैं, उसी तरह 'कमलोद्भव' रूपसे प्रसिद्ध चिन्मय ब्रह्माको भी नियति आदि अङ्गोंके दर्शन होते हैं। यह नियति (प्रारब्ध) ही दैव नामसे कही गयी है, जो शुद्ध चेतन परमात्माकी शक्तिरूप है। यही भूत, भविष्यत् एवं वर्तमानकालमें सम्पूर्ण पदार्थोंको अपने अधीन करके जगत्की व्यवस्थारूपसे स्थित है। 'भविष्यमें अमुक पदार्थमें इस प्रकारकी स्फूर्ति होनी चाहिये, अमुकको मोक्षका पद प्राप्त होना चाहिये, इसके द्वारा इस प्रकार और उसके द्वारा इस प्रकार अवश्य होना चाहिये' ऐसा विचार दैव ही करता है। यह दैव या नियति ही सम्पूर्ण भूत आदि अथवा काल-क्रिया आदि जगत् है। इस नियति या प्रारब्धसे ही पुरुषार्थकी सत्ता लक्षित होती है और पुरुषार्थसे ही इस प्रारब्धकी सत्ता सूचित होती है। जबतक तीनों भुवन हैं, तबतक प्रारब्ध और पुरुषार्थ—ये दोनों सत्ताएँ परस्पर अभिन्न-रूपसे स्थित हैं। मनुष्यको अपने पौरुषसे ही दैव और
१७८ -* अविच्छिन्नान्मचिदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
पुरुषार्थ दोनोंको बनाना चाहिये। प्रारब्धके अनुसार अवश्य होनेवाला भोग होकर ही रहेगा—ऐसा निश्चय करके बुद्धिमान् पुरुष कभी पौरुषका त्याग न करे; क्योंकि प्रारब्ध पौरुषरूपसे ही नियामक होता है अर्थात् पूर्वजन्मोंमें किया गया पुरुषार्थ ही वर्तमान जन्ममें प्रारब्ध होकर यह नियम करता है कि अमुकको ऐसा ही होना चाहिये।
जो प्रारब्धके भरोसे मूक बनकर पौरुषशून्य एवं अकर्मण्य हो जाता है, वह कभी सुखी नहीं हो सकता। जो अकर्मण्य होकर बैठेगा, उसकी प्राण-वायुकी चेष्टा कहाँ चली जायगी। यदि निर्विकल्प समाधिमें चित्तको शान्ति प्रदान करनेवाला प्राणनिरोध करके पुरुष साधु होकर मुक्ति पा ही गया तो वह भी उसके पुरुषार्थका ही फल है। बिना पुरुषार्थके किस फलकी प्राप्ति बतायी जा सकती है ? एकमात्र शास्त्रीय पुरुषार्थमें तत्पर होना कल्याणकारी श्रेष्ठ साधन है और कर्तृत्वका अत्यन्त अभावरूप मोक्ष सर्वश्रेष्ठ कल्याणमय फल है।
इन साधन और फलोंकी अपेक्षा ज्ञानियोंका पक्ष सबल है; क्योंकि उन ज्ञानी महात्माओंका प्रारब्ध-भोग दुःखरहित है। जो दुःखरहित प्रारब्ध-भोग है, वह यदि ब्रह्मसत्ताके प्रकाशमें स्थिर हो जाय तो निश्चय समझना चाहिये कि वह परम शुद्ध ब्रह्म, जिसे परम गति कहते हैं, प्राप्त हो ही गया। (सर्ग ६२)
ब्रह्मकी सर्वरूपता तथा उसमें भेदका अभाव, परमात्मासे जीवकी उत्पत्ति और उसके स्वरूपका विवेचन, परमात्मासे ही मनकी उत्पत्ति, मनका भ्रम ही जगत् है—इसका प्रतिपादन तथा जीव-चित्त आदिकी एकता
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! यह जो ब्रह्म-तत्त्व है, वह सर्वथा, सर्वदा, सब ओरसे सर्वशक्तिमान्, सर्वरूप, सर्वेश्वर, सर्वव्यापी और सर्वमय ही है। वह जब, जहाँ, जिसकी, जिस प्रकारसे भावना करता है, तब वहाँ उसीको प्रत्यक्ष देखता है। सर्वशक्तिमान् परमात्मासे जो-जो शक्ति जैसे उदित होती है, वह उसी प्रकार रहती है। ऐसी स्थितिमें वह शक्ति स्वभावसे ही नाना प्रकारके रूपवाली है। परमार्थ-दृष्टिसे ये सारी शक्तियाँ यह आत्मा ही है अर्थात् शक्ति और शक्तिमान् परमात्मामें कोई भेद नहीं है। बुद्धिमानोंने लौकिक व्यवहारकी सिद्धिके लिये इस प्रकार भेदरूप संसार-जालकी कल्पना की है। वस्तुतः परमात्मामें भेद नहीं है। जैसे समुद्रमें छोटी-बड़ी लहरोंका और समुद्रका; कंगन, बाजूबंद और केयूरके साथ सोनेका तथा अवयव और अवयवीका भेद वास्तविक नहीं है, उसी प्रकार आत्मामें द्वैत अथवा भेद वास्तविक नहीं है, कल्पना करनेवाले पुरुषकी बुद्धिसे कल्पित है। परमार्थ-दृष्टिसे देखा जाय तो यह सम्पूर्ण आकारोंसे युक्त विस्तृत प्रपञ्च सर्वव्यापी ब्रह्म ही है। मिथ्या ज्ञानवाले लोगोंने ही शक्ति और शक्तिमान्के तथा अवयव और अवयवीके भेदकी कल्पना कर रक्खी है। यह भेद यथार्थ नहीं है। सत् हो या असत्, सच्चिदानन्दघन परमात्मा जिस सदसद्-वस्तुका संकल्प अथवा अभिनिवेश करता है, उसी-उसीको देखता है। वास्तवमें सब वस्तुओंके रूपमें वह सच्चिदानन्दघन परमात्मा ही भासित हो रहा है।
श्रीराम ! यह जो सर्वव्यापी, स्वयम्प्रकाश, आदि-अन्तसे रहित, सबका महान् ईश्वर, स्वानुभावानन्दस्वरूप, शुद्ध, सच्चिदानन्दघन परमात्मा है, इसीसे पहले जीव उत्पन्न हुआ है। वही उपाधिकी प्रधानतासे चित्त कहलाता है और चित्तसे यह जगत् उत्पन्न हुआ है।
रघुनन्दन ! जिसमें प्रतीत होनेवाला दृश्य-प्रपञ्च असत्
उत्पत्ति-प्रकरण ] * चित्तका विलास ही द्वैत है, त्याग और ज्ञानसे ही मनका क्षय होता है * १७९
है, वह शुद्धस्वरूप ब्रह्म यहाँ सर्वत्र व्यापक है। वह बृहद् ब्रह्म अनात्मयोगी पुरुषोंके लिये भीषण है और आत्मवेत्ताओंके लिये अविनाशी सच्चिदानन्दघन है। उसका जो सर्वत्र सम, परिपूर्ण, शुद्ध, चिह्नहित सत्-स्वरूप है, वही शान्त परमपद है। ज्ञानी भी उसके स्वरूपका इदमित्थंरूपसे निर्देश नहीं कर सकते। उसीका चेतन अंश, जो स्वभावतः स्पन्दनशील (प्राण धारण करनेवाला) है, जीव कहलाता है। उत्तम दर्पणरूपी उस चेतन आकाशमें ये असंख्य जगत्-जालकी परम्पराएँ प्रतिबिम्बित होती रहती हैं। जैसे चलना या गतिशील होना वायुका स्वभाव है, उष्णता अग्निका स्वभाव है अथवा शीतलता हिमका स्वभाव है, उसी प्रकार जीवत्व आत्मा (व्यष्टि-चेतन) का स्वभाव है। व्यष्टिचेतनघन जो आत्मतत्त्व है, उसकी स्वयं अपने स्वरूपके अज्ञानके कारण जो अल्पज्ञता है, उसीको जीव कहा गया है। कोई पुण्यात्मा पुरुष दिव्य देह आदिकी भावना करनेसे शीघ्र ही देवता आदिके शरीरको प्राप्त होता है। उस देहमें रहकर वह गन्धर्वों या अन्य देवताओंसे सुरक्षित नगर (अमरावती आदि) में निवास करता है। अपने संकल्पके अनुसार कोई पुरुष वृक्ष आदि स्थावर योनिको प्राप्त होता है, कोई जङ्गम योनिमें जन्म ग्रहण करता है तथा कोई पक्षी आदि खेचर प्राणियोंका रूप धारण करता है। इस प्रकार जन्म और मृत्युके कारण बने हुए अपने कर्मोंसे जीव ऊपर या नीचे जाते हैं (ऊँच-नीच योनियोंमें जन्म ग्रहण करते हैं)।
श्रीराम ! परम कारणरूप परमात्मासे ही पहले मन उत्पन्न हुआ है। मनन ही उसका स्वरूप है। भोगोंसे भरा हुआ जो यह विस्तृत जगत् है, वह मनमें ही है। वह मन भी उस परम कारणरूप परमात्मामें ही स्थित है। वह भाव और अभावके झूलेमें झूलता रहता है। जैसे पहले अनुभवमें आयी हुई सुगन्ध याद करनेपर मनोरथके द्वारा देखी जाती है, उसी प्रकार उस मनके द्वारा सत् और असत्रूपसे प्रतीत होनेवाली यह सृष्टि देखी जाती है। परमात्माका यथार्थ ज्ञान हो जानेपर ब्रह्म, जीव, मन, माया, कर्त्ता, कर्म और जगत्की प्रतीतियोंका कोई भेद नहीं रह जाता। सब द्वैतोंके एकमात्र आश्रय परमात्मा ही स्थित रहते हैं। जिसके विस्तारका कहीं आर-पार नहीं है, उस संविद्रूपी जलके असीम प्रसारोंसे चिन्मय एकार्णवरूप यह आत्मा स्वयं विस्तारको प्राप्त होता है। क्षणिक होनेके कारण असत्य तथा प्रतीत होनेके कारण सत्य यह मनोमय जगत् स्वप्नके समान सदसद्रूप है। वास्तवमें यह जगत् न तो सत् है, न असत् है और न उत्पन्न ही हुआ है। यह तो केवल चित्तका भ्रम है। जैसे अच्छी तरह न देखनेके कारण ठूंठे काठमें झूठे ही पुरुषकी प्रतीति होती है, उसी प्रकार अविद्यायुक्त मनके प्रभावसे यह संसार नामक दीर्घकालीन स्वप्न अज्ञानियोंको स्थिर-सा प्रतीत होता है। जैसे चेतन परमात्मा और जीवमें भेद नहीं है, उसी तरह जीव और चित्तमें भी भेद नहीं है और जैसे जीव तथा चित्तमें भेद नहीं है, उसी तरह देह और कर्ममें भी भेद नहीं है। वस्तुतः कर्म ही देह है; क्योंकि देहसे ही कर्म होते हैं। देह ही चित्त है, चित्त ही अहंकारविशिष्ट जीव है। वह जीव ही चेतन परमात्मा है तथा वह परमात्मा सर्वस्वरूप एवं कल्याणमय है। यह शास्त्रका सारा सिद्धान्त एक पद्यमें ही कह दिया गया है। (सर्ग ६३-६५)
चित्तका विलास ही द्वैत है, त्याग और ज्ञानसे ही अज्ञानसहित मनका क्षय होता है—इसका प्रतिपादन तथा भोक्ता जीवके स्वरूपका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! जैसे एक दीपकसे सैकड़ों दीपक जल जाते हैं, उसी तरह एक ही परम वस्तु चेतन आत्मा अपने संकल्पसे मानो नानात्वको प्राप्त हुआ है। मनुष्य चित्तमात्र ही है। चित्तके हट जानेपर
१८० * अविच्छिन्नसच्चिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
यह जगत् शान्त हो जाता है। जिस पुरुषके पैर जूतेसे ढके होते हैं, उसके लिये मानो सारी पृथ्वीपर ही चमड़ा बिछा हुआ है; इसी प्रकार जिसका चित्त शान्त है, उसके लिये सारा जगत् ही शान्त हो गया। जैसे केलेके वृक्षमें पत्तोंको छोड़कर और कुछ भी सार नहीं रहता, उसी प्रकार जगत्में भ्रमके सिवा और कुछ भी सार तत्त्व नहीं है। जीव जन्म लेता है; फिर क्रमशः बाल्यावस्था, युवावस्था, वृद्धावस्था तथा मृत्युको प्राप्त होता है। तत्पश्चात् वह शुभाशुभ कर्मोंके अनुसार स्वर्ग और नरकमें पहुँचता है। यह सब भ्रमवश चित्तका नृत्य अर्थात् संकल्पमात्र है। जैसे मलदोषसे मलिन नेत्र चन्द्रमा आदिमें दो-दो आकृतियाँ देखता है, वैसे ही भ्रमसे आक्रान्त हुआ जीवात्मा परमात्मामें द्वैत देखता है (जीव और ईश्वरमें भेदका दर्शन करता है)। जैसे मदिरा पीकर मतवाला हुआ मनुष्य नशेके कारण वृक्षोंको घूमते देखता है, उसी प्रकार जीवात्मा चित्तद्वारा कल्पित संसारोंका दर्शन करता है। जैसे बालक खेल-कूदमें वेगसे घूमनेके कारण सारे जगत्को कुम्हारके चाककी भाँति घूमता देखते हैं, उसी प्रकार जीव चित्तके भ्रमसे ही इस दृश्य-जगत्को देखते हैं—यों समझो। जिस पदार्थका चेतन अनुभव करता है, वह चेतनसे अतिरिक्त दूसरा कुछ नहीं है। इस प्रकार दृश्यकी शान्ति होनेपर विषय न रहनेसे ईंधनरहित अग्निके समान चित्त स्वयं शान्त हो जाता है। जब पुरुष सच्चिदानन्दघन परमात्मासे एकताको प्राप्त होकर निश्चल स्थितिमें स्थित हो जाता है, तब वह शान्त होकर बैठे या व्यवहारमें लगा रहे—दोनों ही अवस्थाओंमें भलीभाँति शान्त कहा जाता है। व्यष्टि-चेतन अज्ञानी जीव विषयका अनुभव करता है, परंतु सच्चिदानन्दघनमें एकीभावको प्राप्त ज्ञानी महात्मा विषयका आस्वादन नहीं करता।
परमपदमें आरूढ़ और सच्चिदानन्दघन परब्रह्ममे एकीभावको प्राप्त हुए पुरुषका 'देहके भानसे शून्य' और 'निर्विषय' आदि समानार्थक शब्दोंद्वारा वर्णन होता है। जीवात्मा चित्तके संकल्पद्वारा ही स्थूलताको प्राप्त होता है और 'मैं उत्पन्न हूँ, जीवित हूँ, देखता हूँ तथा (जन्म-मृत्युरूप) संसारको प्राप्त होता हूँ' इत्यादि रूपसे मिथ्या-भ्रमका दर्शन करता है। चेतनके द्वारा जिस किसीका अनुभव होता है, वही स्थूल जगत् है। रज्जुमें सर्पकी भाँति प्रतीत होनेवाले उस आभासको अविद्या—भ्रम कहते हैं। इस संसार नामक व्याधिकी चिकित्सा एवं निवारण केवल ज्ञानमात्रसे ही सम्भव है। यह संसार चित्तका एक संकल्पमात्र है। इसके बाधमें किसी प्रकारका आयास नहीं है। जैसे अच्छी तरह देखभाल करनेसे रस्सीमें साँपका भ्रम मिट जाता है, उसी प्रकार परमात्माके यथार्थ ज्ञानसे यह संसार-रूपी भ्रम अवश्य नष्ट हो जाता है।
श्रीराम! जिस वस्तुकी अभिलाषा हो, उसीका निश्चित रूपसे त्याग करके यदि रहा जा सके, तब तो मोक्ष प्राप्त ही है। इतना करनेमें कौन-सी कठिनाई है। परमात्माकी प्राप्ति-रूप महान् उद्देश्यसे सम्पन्न पुरुष जब इस संसारमें अपने प्राणोंका भी मोह तिनकेके समान त्याग देते हैं, तब जिस सांसारिक वस्तुकी इच्छा की गयी है, केवल उसीका त्याग करनेमें कंजूसी कैसे की जा सकती है। जैसे हाथमें रक्खा हुआ बेलका फल अथवा सामने खड़ा हुआ पर्वत प्रत्यक्ष ही दिखायी देता है, उसी प्रकार उस तत्त्वज्ञ महात्माके लिये परमात्माका जन्म आदि विकारोंसे रहित होना प्रत्यक्ष ही है। जैसे प्रलयकालका अनन्त अपार एकार्णव अपनी असंख्य तरङ्गोंके कारण अनेक-सा प्रतीत होता है, उसी प्रकार अप्रमेय परमात्मा ही अज्ञानके कारण जगद्रूपसे प्रतीत हो रहा है। उसके स्वरूपका यथार्थ ज्ञान हो जाय तो वही मोक्षरूप सिद्धि प्रदान करता है; परंतु जो उसे तत्त्वतः जान नही लेता, उसका मन सदा बन्धनमें ही पड़ा रहता है।
रघुनन्दन! ब्रह्म सदा सम्पूर्ण शक्तियोंसे सम्पन्न तथा सब कुछ करनेमें समर्थ हैं। वह जहाँ जिस शक्तिसे
उत्पत्ति-प्रकरण ] * चित्तका विलास ही द्वैत है, त्याग और ज्ञानसे ही मनका क्षय होता है * १८१
स्फुरित होता है, वहाँ अपनेमें उसी शक्तिको प्राप्त हुई देखता है। सबका आत्मा ब्रह्म अनादिकालसे जिस व्यष्टि-चेतनको स्वयं जानता है, वही यहाँ जीव नामसे कहा गया है और वह जीव ही संकल्प करनेवाला है। जीव-ईश्वरका अनादिकालसे जो स्वाभाविक भेद है, वही जीवके जन्म-मरणमें कारण है। जैसे आकाशमें क्रियाशील और अक्रिय वायु ही है, उससे अतिरिक्त कुछ नहीं है, उसी तरह यहाँ सर्वत्र क्रियाशील और अक्रिय सच्चिदानन्दघन ब्रह्म ही है। उससे अतिरिक्त और कुछ नहीं है। उस ब्रह्मके क्रियाशील होनेपर सृष्टिका प्रादुर्भाव होता है और अक्रिय रहनेपर सबका प्रलय हो जाता है। उस अवस्थामें ब्रह्म ही शान्तभावसे स्थित रहता है। जिसने जीव-ईश्वरके भेदकी कल्पना कर रखी है, ऐसे जीवात्माको ही देहकी प्राप्ति होती है। वह जीवात्मा ही संसारमें संकल्पसे नाना प्रकारके विषयोंको प्राप्त होता है। यही नाना योनियोंको प्राप्त जीवात्मा ज्ञान होनेपर शीघ्र मुक्त हो जाता है। उनमेंसे कोई मन्द अभ्यासी तो साधन करते-करते हजारों जन्मोंमें मुक्ति प्राप्त करता है और कोई तीव्र अभ्यास करनेवाला पुरुष एक ही जन्ममें मुक्ति लाभ कर लेता है। स्वभावके कारण ही जीवात्मा ब्रह्म और जीवके भेदभावको प्राप्त हो रहा है। इसीसे वह गुणोंका सङ्ग पाकर कर्मानुसार स्वर्ग, मोक्ष, नरक और बन्धन आदिके हेतुभूत देहभावको क्रमशः प्राप्त होता है। वास्तवमें यह संसार न तो उत्पन्न हुआ है और न यह सत्तावान् होकर स्थित ही है, तथापि मनका भ्रम इसे देखता है। जैसे गोलाकार घूमने या नृत्य करनेसे भ्रमपीड़ित पुरुष नगरको भी घूमता हुआ-सा देखता है, उसी तरह मनके भ्रमसे युक्त जीवात्मा 'मैं उत्पन्न हुआ, स्थित रहा और मरा' इत्यादि भावोंका अनुभव करता है। परमार्थ-वस्तुका दर्शन न होनेके कारण आशा-तृष्णाके वशीभूत हुआ चित्त 'अहं-मम' इत्यादि रूपसे अनुभवमें आनेवाले असत् संसारको ही देखता (और उसे सद् मानता) है।
श्रीराम ! जैसे जल तरङ्गरूपसे स्फुरित होता है, उसी तरह केवल मनकी भ्रान्तिके उल्लास (उत्कर्ष) से विस्तारको प्राप्त हुआ यह सभी दृश्य-प्रपञ्च जगत्रूपसे भासित होता है। व्यष्टि-चेतन ही बुद्धि-वृत्तिके संयोगसे जीव कहलाता है। वह जीव ही सङ्कल्प करनेसे मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार तथा मायाके रूपमें परिणत हो जाता है। जैसे स्वप्नमें जो नगर आदिका भान होता है, वह मनका भ्रम ही है, उसी तरह यह संसार भी चित्तका भ्रम ही है। व्यष्टि-चेतनको जो संसारका ज्ञान है, वही जागरण कहा गया है। सूक्ष्म शरीरमें जो उसका अहंभाव है, उसीको स्वप्न माना गया है। मनका जो प्रकृतिमें विलीन हो जाना है, वही सुषुप्ति है तथा केवल सच्चिदानन्दघन ब्रह्ममें जो एकीभावसे तन्मय हो जाना है, उसीको तुरीयावस्था कहते हैं। अत्यन्त शुद्ध सच्चिदानन्दघन परमात्मामें जो अविचल स्थिति है, वही परिणाममें विकार-रहित तुरीयातीत पद है। उस पदमें स्थित पुरुष कभी शोक नहीं करता (वहाँ शोकका सर्वथा अभाव है)। उस परमात्मामें ही यह सब जगत् सम्पन्न होता है (उसीमें स्थित रहता है) और उसीमें लीन हो जाता है। वास्तवमें न तो यह ब्रह्म जगत्रूप है और न उस ब्रह्ममें जगत् ही है। जैसे नेत्रदोषके कारण आकाशमें भ्रमसे मोतीके दाने-से दीखते हैं, वैसे ही ब्रह्ममें भ्रमसे इस जगत्का दर्शन होता है। जैसे स्फटिकके भीतर प्रतिबिम्बित वन आदि उसके यथार्थ ज्ञानके बिना सत्य-से दीखते हैं, उसी तरह यथार्थ ज्ञान न होनेके कारण अद्वितीय ब्रह्मरूप होता हुआ भी यह जगत् शुद्ध ब्रह्मके भीतर नाना-सा प्रतीत होता है। ब्रह्मासे लेकर कीट-पतंग-पर्यन्त बुद्धिवृत्तिका भ्रमरूप जगत् असत् ही है; क्योंकि परमात्माका यथार्थ ज्ञान होनेपर इसका बाध हो जाता है। यह जगत् मिथ्या ही उत्पन्न हुआ है, मिथ्या ही बढ़ता है, मिथ्या ही रुचिकर प्रतीत होता है और मिथ्या ही लयको प्राप्त होता है; शुद्ध सर्वव्यापी ब्रह्म अनन्त और
१८२ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
अद्वितीय है। अज्ञानसे ही वह अशुद्ध-सा, असत्-सा, नाना-सा और असर्वव्यापी-सा (सीमित-सा) ज्ञात होता है। जैसे जल भिन्न है और तरङ्ग उससे भिन्न है—ऐसी जो बालकों अथवा मूर्खोंकी कल्पना है, उसीसे जल और तरङ्गमें मिथ्या भेदकी प्रतीति होती है, उसी तरह जो यह जगत्का भेद प्रतीत होता है, वह भी वास्तविक नहीं है। केवल अज्ञानियोंने उसकी कल्पना कर रखी है। जैसे रस्सीमें सर्पकी स्थिति है, वैसे ही ब्रह्ममें शत्रु और मित्रके समान विरुद्ध और अविरुद्ध भेदाभेद शक्तियों-की स्थिति सम्भव है। (सर्ग ६६–७९)
परमात्मसत्ताका विवेचन, बीजमें वृक्षकी भाँति परमात्मामें जगत्की त्रैकालिक स्थितिका निरूपण तथा ब्रह्मसे पृथक् उसकी सत्ता नहीं है—इसका प्रतिपादन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! नामरहित तथा मन और नेत्र आदि छः ज्ञानेन्द्रियोंसे अगम्य होनेके कारण आकाशसे भी सूक्ष्म चिन्मात्र परमात्मा ही 'अणु' शब्दसे कहा गया है। अणुके भी अणु सच्चिदानन्दघन परमात्माके अंदर अज्ञानियोंकी दृष्टिसे सत्-सा और ज्ञानियोंकी दृष्टिसे असत्-सा स्थित हुआ यह जगत् बीजके भीतर वृक्षकी सत्ताके समान स्फुरित होता है। सम्पूर्ण वस्तुओंकी सत्ता वास्तविक सत्ताके अधीन है; उसको यदि और किसीके अधीन मानें तो भूल होगी। अतः स्वतःसिद्ध वास्तविक सत्तासे ही सबकी सत्ता है। यह परम आकाशरूपी परमात्मा सूक्ष्म होनेके कारण नेत्रेन्द्रियका विषय नहीं है। सर्वात्मक होता हुआ भी वह मनसहित पाँचों इन्द्रियोंसे अतीत होकर स्थित है, अतः अणुका भी अणु है। सर्वात्मक होनेके कारण ही वह कभी शून्य नहीं हो सकता। क्योंकि 'वह है, नहीं है'—ऐसा कहने और मनन करनेवाला पुरुष आत्मा ही तो है; फिर उसकी असत्ता कैसे कही जा सकती है। किसी भी युक्तिसे यहाँ सत् वस्तुकी असत्ता नहीं सिद्ध की जा सकती। जैसे कपूर अपनी सुगन्धसे प्रतीत होता है, वैसे ही सर्वात्मा सर्वव्यापीरूपसे अनुभवमें आता है। अणुका-भी-अणु चेतन परमात्मा ही सब कुछ है। मन और इन्द्रियों-की वृत्तिसे नानात्वकी प्रतीति होनेके कारण मनः-परिच्छिन्नरूपसे ही वह सर्वात्मक है और इन्द्रियातीत होनेके कारण वह निर्मल परमात्मा नित्य सत्तावान् होकर भी कुछ प्रतीत नहीं होता—इन्द्रियों-का विषय नहीं होता। वही एक है और सम्पूर्ण जीवोंके अन्तःकरणमें आत्मारूपसे अनुभूत होनेके कारण अनेक भी है। वही अपने संकल्पसे इस सम्पूर्ण जगत्को धारण करता है। अतः जगतरूपी रत्नोंका कोष भी वही है।
जैसे जिसका मुँह बंद है, ऐसे घड़ेको अन्य देशमें ले जानेपर उसमें स्थित आकाशका गमन और आगमन नहीं होता, उसी प्रकार देहरूपी उपाधिके गमनागमनसे आत्माका गमनागमन नहीं हो सकता। चिन्मय परमात्मा अपनी चेतनसे सूर्य आदिके प्रकाशका भी प्रकाशक है और महाकल्पके प्रलयकालीन मेघोंसे भी वह नष्ट नहीं होता; क्योंकि वह स्वयम्प्रकाशरूप एवं अविनाशी है। वह सच्चिदानन्दघन परब्रह्म नेत्रोंसे नहीं देखा जा सकता; क्योंकि वह अनुभवरूप, हृदय-मन्दिरको प्रकाशित करने-वाला, सबको सत्ता देनेवाला, अनन्त और परम प्रकाश-स्वरूप बताया गया है। आकाश आदि देश, काल और क्रिया आदिकी सत्ता एवं जगत् उसी ज्ञानस्वरूप परमात्मामें प्रतीत होते हैं। वही सबका स्वामी, कर्ता, पिता और भोक्ता है। वास्तवमें परमात्मा होनेके कारण उसका किसीसे कुछ भी सम्बन्ध नहीं है। न निमेष है न कल्प है, न सामीप्य है और न दूरी ही है। चेतन परमात्माका संकल्प ही अन्यान्य वस्तुओंके रूपमें
उत्पत्ति-प्रकरण ] * परमात्माके स्वरूपका विवेचन, बीजमें वृक्षकी भाँति परमात्मामें जगत्की स्थिति ॐ १८३
स्थित है, इसके अतिरिक्त कुछ नहीं है। इस प्रकार जगत्के मिथ्यात्वका उपपादन करनेवाले न्यायों (युक्तियों) की बारंबार भावनारूप अभ्यासके द्वारा निर्मल हुए मनसे जिसने पारमार्थिक वस्तु ब्रह्मका दर्शन कर लिया है, उस पुरुषकी अविद्याका नाश हो जानेके कारण चिदाकाशमें उसे फिर संसारकी प्रतीति नहीं होती। जैसे बीजके भीतर स्थित हुए वृक्षकी सत्ता अत्यन्त सूक्ष्म होनेके कारण आकाशके तुल्य है, उसी तरह ब्रह्मके भीतर स्थित हुए जगत्का परमात्मा साक्षी है; इसलिये जगत्का साक्षीसे पृथक् प्रतीति न होनेके कारण सच्चिदानन्दरूपसे ही उसकी स्थिति है। शान्त, सर्वात्मक, जन्मरहित, अद्वितीय, आदि और मध्यसे शून्य, निर्द्वन्द्व, मायाके कार्यसे रहित, जगद्रूपमें नाना-सा प्रतीत होता हुआ भी वास्तवमें एक, विशुद्ध, ज्ञानस्वरूप, अजन्मा, सच्चिदानन्दघन ब्रह्म ही है। उसमें किसी प्रकारकी कोई कल्पना किसी तरह भी सम्भव नहीं है।
जगत्की प्रतीतिका अभाव ही जिस (परमात्मा) के स्वरूपका परम अनुभव है, सम्पूर्ण संकल्पोंका त्याग ही चित्तके द्वारा जिसका संग्रह (चिन्तन) है, जिसके संकोचसे संसारका प्रलय और विकाससे उसकी सृष्टि होती है, जो वेदान्त-वाक्योंका परम तात्पर्य एवं वाणीका अविषय है, यह चराचर जगत् जिसकी चिन्मयी लीला है तथा विश्वरूप होनेपर भी जिसकी अखण्डता कभी खण्डित नहीं होती, वही सन्मात्र शाश्वत ब्रह्म कहा गया है। वह अणुसे भी अणु परमात्मा अपने संकल्पसे वायु होता है। किंतु उसकी वह भ्रमरूपता भ्रान्तदृष्टिमूलक है, अतः वास्तवमें वह वायु आदि कुछ भी नहीं है, केवल शुद्ध चेतन ही है। वही परमात्मा शब्दके संकल्पद्वारा शब्द बनता है; किंतु उसकी शब्दरूपताका दर्शन भ्रममूलक है। वास्तवमें तो वह शब्द और शब्दार्थकी दृष्टिसे बहुत दूर है। उस परमात्माकी प्राप्तिके सैकड़ों साधन हैं। उसके प्राप्त होनेपर कुछ भी पाना शेष नहीं रहता। वही परम ज्ञातव्य हैं। उसके सिवा कुछ भी नहीं है।
जो अणुका भी अणु, केवल चिन्मय और अत्यन्त सूक्ष्मतम है, उस परमात्मासे यह सम्पूर्ण विश्व सब ओरसे परिपूर्ण है। अणुरूप होता हुआ भी यह परमात्मा सैकड़ों—अनन्त योजनोंमें नहीं समाता; क्योंकि वह सर्वव्यापी, अनादि और रूपरहित होनेके कारण निराकार है। जैसे मेरु पर्वतकी सरसोंके साथ तुलना करना उचित नहीं, उसी तरह शुद्ध ज्ञानमय चेतनाकाशरूप परमात्माकी परमाणुके साथ तुलना करना शोभा नहीं देता। जैसे प्रतिबिम्ब दर्पणमें ही पड़ता है, उसी प्रकार जलमें जो कोई भी सम्पूर्ण रस है, वह परमात्माका ही आश्रय लेकर स्थित है। परमात्माके बिना स्वतः उसकी कोई सत्ता नहीं है। जिसने सकल्प-रहित होनेपर इस जगत्को त्याग दिया—इसका अभाव कर दिया है और अपने संकल्पसे ही पुनः सम्पूर्ण जगत्को उत्पन्न किया है, जगत्का अभाव करनेवाले उस अणुसे भी अणु चिन्मय परमात्माने इस समस्त विश्वको व्याप्त कर रखा है। जैसे सपनेमें एक ही निमेषमें बाल्यावस्थासे लेकर बुढ़ापेतकका बोध होता है, उसी प्रकार उस सूक्ष्म चिन्मय परमात्मामें निमेषका ज्ञान ही सहस्रों कल्पोंके समान प्रतीत होता है। इसलिये वह सूक्ष्म परमात्मा निमेषरूप होता हुआ ही शतकोटि कल्पोंका समूह है। अणुसे-भी-अणु सच्चिदानन्दघन परमात्मामें सम्पूर्ण जगत् स्थित हैं और उसीसे जगत्की सारी प्रतीतियाँ होती हैं।
जैसे बीजमें भावी वृक्ष रहते हैं, वैसे ही चिन्मय परमात्मामें भूत, वर्तमान और भविष्य—तीनों कालोंके प्राणी सदा विद्यमान रहते हैं। वह परमात्मा सम्पूर्ण जगत्में उदासीनकी भाँति स्थित है। कर्तापन और भोक्तापनसे उसका थोड़ा-सा भी स्पर्श या सम्बन्ध नहीं है। परमात्मा इस जगत्के बाहर भी स्थित है और
१८४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
भीतर भी—यह बात तीनों लोकोंमें अधिकारी प्राणियोंके उपदेशके लिये कही जाती है। यह बाह्य और आन्तरिक स्थितिका भेद 'शब्द'तक ही सीमित है, वस्तुमें नहीं है; क्योंकि वस्तु चेतनरूप है, अतः उसमें उक्त भेदका होना कदापि सम्भव नहीं। द्रष्टा परमात्मा दृश्य जगत्का रूप नहीं धारण कर सकता; क्योंकि दृश्यत्व असत् एव वास्तविक हैं। जो कोई भी वस्तु परमात्मामें हैं ही नहीं, परमात्मा उसका स्वरूप कैसे धारण कर सकता है। व्यवहारदृष्टिसे द्रष्टा ही दृश्यभावको प्राप्त होता है। जैसे पिताके बिना पुत्र और भोक्ताके बिना भोग्य नहीं हैं, उसी प्रकार दृश्यके बिना द्रष्टापन नहीं है।
जैसे विशुद्ध सुवर्णमें यह सामर्थ्य है कि उसका कगन आदि बन सके, उसी प्रकार चिन्मय होनेके कारण द्रष्टामें यह शक्ति है कि वह दृश्यका निर्माण कर सके। जैसे सोनेका कड़ा यह सामर्थ्य नहीं रखता कि वह सुवर्णका निर्माण कर सके, उसी प्रकार जड होनेके कारण दृश्यमें यह शक्ति नहीं है कि वह द्रष्टाका निर्माण कर सके। जैसे सुवर्ण कंगनके भ्रमको उत्पन्न करता है, उसी प्रकार चिन्मय परमात्मा दृश्यका निर्माण करता है। उक्त दृश्य असत् होता हुआ भी अज्ञानवश सत्-सा प्रतीत होता है। दृश्य अज्ञानमात्रसे उत्पन्न है। जबतक कारणभूत अज्ञान रहता है तभीतक उसकी स्थिति रहती है। जैसे कड़े और कगन आदिकी प्रतीतिके समय सुवर्णकी सुवर्णता सत्य होनेपर भी स्फुटरूपसे स्फुरित नहीं होती, क्योंकि मूढ़ पुरुषकी बुद्धि उक्त आभूषणके नाम-रूपमें ही उलझी रहती है, उसी प्रकार द्रष्टाके दृश्यरूपमें स्थित होनेपर उसके वास्तविक स्वरूपकी स्फूर्ति नहीं होती। जैसे कगनके रूपमें प्राप्त होनेपर सुवर्ण अपनी पूर्वसिद्ध सुवर्णताको लक्ष्य कराता है, वैसे ही दृश्यरूपमें स्थित हुआ द्रष्टा अपने द्रष्टापनको लक्षित कराता है। द्रष्टा जब अज्ञानवश अपनेको दृश्यरूपमें देखता है, तब अपने वास्तविक स्वरूपको नहीं देख पाता। द्रष्टामें दृश्यत्वकी प्राप्ति होनेपर उसकी सत्ता भी असत्ता-सी हो जाती है अर्थात् वह सद्रूप होनेपर भी असत्-सा भासित होने लगता है। परंतु जब ज्ञानसे दृश्य गलित हो जाता है, तब केवल द्रष्टाकी ही सत्ता रह जाती है। जैसे कड़े और कंगनको गला देनेपर जब उसके नाम-रूपकी प्रतीति नहीं रहती, तब केवल सुवर्णकी सुवर्णता ही रह जाती है।
जैसे जल, भूमि आदि पाँच भूतोंसे भौतिक पदार्थ तनिक भी पृथक् नहीं हैं, उसी प्रकार इस स्वभावसिद्ध परमात्मारूप अणुसे कुछ भी पृथक् नहीं है। परमात्मा सर्वव्यापी अनुभवरूप है तथा सबका अनुभव भी उसीका स्वरूप है; अतः एकत्वके यथार्थ अनुभवकी युक्ति जब सुदृढ़ हो जाती है, तब इस परमात्माकी सबके साथ एकता समझमें आती है। परमात्मा दिशा, काल आदिसे सीमित नहीं है। वह एकमात्र, अद्वितीय है। सबका आत्मा होनेके कारण सबसे अभिन्न है। स्वतः तो वह सर्वानुभवरूप ही है, जड नहीं है।
जैसे कड़े या कंगनकी सत्ता सुवर्णसे पृथक् नहीं हैं, उसी प्रकार द्वैत भी ब्रह्मसे अलग नहीं है—जिसे भलीभाँति ऐसा ज्ञान हो चुका है, उसका वह ज्ञान ही द्वैत है और वह ज्ञान सत् नहीं है। जैसे जलकी द्रवता जलसे, वायुका स्पन्दन वायुसे तथा आकाशकी शून्यता आकाशसे अलग नहीं है, वैसे ही द्वैत परमात्मासे पृथक् नहीं है। द्वैत और अद्वैतकी प्रतीति दुःखस्वरूप प्रवृत्तिकी सिद्धिके लिये ही है, निवृत्तिके लिये नहीं। वास्तवमें जो इन दोनोंकी अनुपलब्धि या अप्रतीति है, वह यदि अच्छी तरह समझमें आ जाय तो ज्ञानी पुरुष उसीको परमपद मानते हैं। प्रमाता, प्रमाण और प्रमेय-रूप तथा द्रष्टा, दर्शन और दृश्यरूप जो यह सम्पूर्ण जगत् है, वह अणुसे-भी-अणु चेतन परमात्माके स्वरूपमें ही स्थित है। जैसे वायु अपने शरीरमें ही स्पन्दनको उत्पन्न करती और लीन भी कर लेती है,
उत्पत्ति-प्रकरण ] * जगत्की ब्रह्मसे पृथक् सत्ताका खण्डन और भेदकी व्यावहारिकताका प्रतिपादन * १८५
उसी प्रकार अणुसे भी अणु परमात्माने अपने स्वरूपमें इस जगत्रूपी अणुको अनेक बार उत्पन्न और विलीन किया है। जैसे बीजके भीतर फल और पल्लवोंसहित समूचे वृक्षका विस्तार निहित है और वह अत्यन्त सूक्ष्म दृष्टिसे देखा जाता है, उसी तरह चेतन परमात्मामें अनेक शाखा-प्रशाखाओंसे युक्त जगत् स्थित है और वह परमार्थ-दृष्टिसे उन्हींमें देखनेमें आता है (इसलिये जगत् वास्तवमें परमात्मासे अभिन्न ही है)। जैसे बीजके भीतर अपने शाखा, फल, फूल आदिका त्याग न करता हुआ वृक्ष स्थित है, वैसे ही चेतन परमात्मामें यह शाखा-प्रशाखाओं-सहित विशाल जगत् विद्यमान है। जैसे बीजके भीतर वृक्ष है, उसी प्रकार चेतन परमात्माके भीतर स्थित हुए द्वैतरूप जगत्को जो अद्वैत देखता है, उसीका देखना तत्त्वदर्शन है। वास्तवमें तो न द्वैत है न अद्वैत; न बीज है न अङ्कुर; न स्थूल है न सूक्ष्म; न जात है न अजात; न सत्ता है न असत्ता और न यह सौम्य है न क्षुब्ध। उस चेतन परमात्माके भीतर तीनों लोक, आकाश और वायु आदि भी कुछ नहीं हैं। न जगत् है, न उसका अभाव। केवल एक सर्वोत्कृष्ट उत्तम चेतन परमात्मा ही है।
( सर्ग ८०-८३ )
जगत्की ब्रह्मसे पृथक् सत्ताका खण्डन, भेदकी व्यावहारिकता तथा चित्तकी ही दृश्यरूपताका प्रतिपादन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! परमकारणभूत, आदि, अन्त और मध्यसे रहित, एक परमपदसे यद्यपि यह जगत् उत्पन्न नहीं हुआ है, तथापि उत्पन्न हुआ-सा प्रतीत होता है। जैसे जलराशिमें उठती हुई तरङ्गें जलसे भिन्न न होकर भी भिन्न-सी स्थित हैं, उसी प्रकार परब्रह्म परमात्मामें सारी सृष्टियाँ अभिन्न होकर भी भिन्न-सी जान पड़ती हैं। जो नित्य उदित एवं नित्य प्रतिष्ठित है, वह ब्रह्म ही कर्ता-सा होकर इस जगत्का अनेक रूपोंमें निर्माण करता है। फिर भी वह अपनी समता और सौम्यता आदिका त्याग नहीं करता। जैसे बीजमें वृक्ष एवं फल आदि अभिन्नरूपसे ही स्थित हैं, तथापि वे उससे इस तरह प्रकट होते हैं मानो भिन्न हों, उसी तरह चेतन परमात्मामें यह चेत्य (स्थूलजगत्) अनन्य-भावसे स्थित होनेपर भी अन्य-सा प्रकट हुआ प्रतीत होता है। जैसे बीजसे लेकर फलपर्यन्त जो एक ही द्रव्य-सत्ता है, उसका विच्छेद न होनेके कारण फल और बीजमें कोई भेद नहीं है, जैसे जल और तरङ्गमें कोई भेद नहीं है, उसी प्रकार चित् और चेत्य (ब्रह्म और जगत्) में कोई भेद नहीं है। अविचार (विवेक-शून्यता) के कारण जो इनमें भेदकी कल्पना की जाती है, उसकी सिद्धि नहीं हो सकती; क्योंकि जिस किसी कारणसे भ्रान्तिवश उत्पन्न हुआ भेद विचारसे नष्ट हो जाता है। सारा जगत् ब्रह्मसे ही उत्पन्न हुआ है और सब-का-सब ब्रह्ममें ही लीन होता है।
श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! 'तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः' ( निश्चय ही सर्वत्र प्रसिद्ध इस परमात्मासे पहले-पहल आकाश-तत्त्व उत्पन्न हुआ ) इत्यादि श्रुतियोंमें जो 'तस्माद्' आदि पदोंमें पञ्चमी विभक्ति है, वह भेदका प्रतिपादन करनेवाली है अर्थात् जो वस्तु जिससे उत्पन्न होती है, वह उससे भिन्न है—इस बातको सूचित करती है। ऐसी दशामें आप यह कैसे समझते हैं कि देवेश्वर परमात्मासे उत्पन्न हुआ यह सारा जगत् उससे अभिन्न है ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! उपदेशके लिये जो शास्त्रीय शब्द है अथवा लोकसिद्ध अर्थजनित व्यावहारिक भेदका उपपादक जो लौकिक-शब्द है, वह प्रतियोगी, व्यवच्छेद (अभाव), संख्या, लक्षण और पक्षसे युक्त होता है। जो भेद दिखायी देता है, यह व्यवहारदृष्टिसे
१८६ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
ही है, वास्तविक नहीं। अज्ञानियोंको समझानेके लिये ही कार्य-कारणभाव, सेवक-स्वामिभाव, हेतु-हेतुमद्भाव अवयवावयविभाव, भेदाभेद अथवा अन्वयव्यतिरेक, परिणाम आदिका विश्रम, भावोंके विचित्र विलास, विद्या-अविद्या और सुख-दुःखइत्यादि रूपसे मिथ्या संकल्पोंकी संकलना की गयी है। वास्तवमें जो सत्य वस्तु है, उसमें कोई भेद नहीं है। यह भेदवाद परम तत्त्वको न समझनेके कारण ही है। परमार्थ वस्तुके ज्ञात हो जानेपर द्वैत नहीं रह जाता। उस समय सारी कल्पनाएँ अथवा संकलनाएँ शान्त हो जाती हैं। फिर तो मौनस्वरूप परमार्थ-तत्त्व ही शेष रहता है। वह परमतत्त्व परमात्मा आदि और अन्तसे रहित, अविभक्त, एक, अखण्ड और सर्वरूप है। जिन्हें तत्त्वका ज्ञान नहीं हुआ है, ऐसे अज्ञ पुरुष अपने विकल्पोंसे उत्पन्न हुए तर्कोंद्वारा अद्वैतके विषयमें विवाद करते हैं। उपदेशसे तत्त्वज्ञान प्राप्त हो जानेपर यह वाद और द्वैत नहीं रह जाता। द्वैतके बिना वाच्य-वाचकका बोध नहीं सिद्ध होता। परंतु द्वैत किसी तरह भी सम्भव नहीं है। इसलिये मौनरूप परमात्मा ही पूर्णतया सिद्ध होता है।
रघुनन्दन ! 'तत्त्वमसि' आदि महावाक्योंके अर्थमें अपनी बुद्धिको प्रतिष्ठित करके वचनभेदकी उपेक्षा कर दो और जो मैं कहता हूँ, इसे ध्यान देकर सुनो। चित्त ही विकासरूपसे जगत्को प्राप्त हुआ है। जैसे बालूके भीतर तेल नहीं है, उसी तरह ब्रह्ममें शरीर आदिकी सत्ता नहीं है। राग-द्वेष आदि क्लेशोंसे कलुषित यह चित्त ही संसार है। उन राग आदि दोषोंसे जभी छुटकारा मिल जाता है, तभी इस संसार-बन्धनका नाश हो गया, —यह कहा जाता है। चित्त ही साधन, पालन, विचार श्रेष्ठ पुरुषकी भाँति कर्तव्यका अनुष्ठान, आहार-व्यवहार, संचरण और आदरपूर्वक धारण करनेके योग्य है। तीनों लोकोंकी कल्पनाका आकाशरूप चित्त सम्पूर्ण दृश्यको अपने भीतर धारण करता है। सृष्टिके आरम्भमें पृथ्वी-आदिरूप यह सारा प्रपञ्च अविद्यमान—असत् ही था। अव्यक्तरूप अजन्मा ब्रह्म स्वप्नके समान इसे देखता हुआ भी वास्तवमें नहीं देखता। हृदयंगम दृष्टान्त और युक्तिसे तथा मधुर एवं युक्तियुक्त पदार्थवाली वाणीसे जो कुछ कहा जाता है, वह श्रोताके हृदयमें उसकी शङ्काको दूर करके सब ओर व्याप्त हो जाता है—ठीक उसी तरह, जैसे जलमें डाला हुआ तेल उसमें सब ओर फैल जाता है। जिसमें दृष्टान्त और मनोहर पद नहीं होते, जो दुर्बोध होता है, जिससे क्षोभ प्रकट होता है तथा जिसका प्रत्येक अक्षर अपने स्थानसे च्युत होता है और जिसके कई वर्ण मुँहमें ही रह जाते हैं---स्पष्टतः उच्चारित नहीं होते, ऐसा उपदेशवाक्य श्रोताके हृदयतक नहीं पहुँच पाता। वह राखमें आहुतिके रूपमें डाले गये घीके समान व्यर्थ हो जाता है। साधो! इस भूतलपर जो-जो महाभारत आदि आख्यान तथा छोटी-छोटी कथाएँ हैं, जो-जो प्रमाणोंद्वारा जाननेयोग्य प्रमेय ग्रन्थ हैं, जो औचित्यसे युक्त तथा शब्द और अर्थ दोनों ही दृष्टियोंसे मधुर एवं कोमल हैं, वे सभी लोकप्रसिद्ध दृष्टान्तों तथा प्रमाणयुक्त दर्शनोंके प्रतिपादनपूर्वक वर्णित होनेपर उसी प्रकार श्रोताके हृदयमें शीघ्र प्रकाशित हो जाते हैं, जैसे श्वेत किरणवाले चन्द्रमाके प्रकाशसे सारा विश्व प्रकाशित हो उठता है।
(सर्ग ८४)
यह दृश्य-प्रपञ्च मनका विलासमात्र है, इसका ब्रह्माजीके द्वारा अपने अनुभवके अनुसार प्रतिपादन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं — निष्पाप रघुनन्दन ! पूर्व-कालमें ब्रह्माजीने मुझे जो उपदेश दिया था, वह सब उनकी कही हुई कथाके साथ मैं तुम्हें बता रहा हूँ। पहलेकी बात है, मैंने कमलयोनि भगवान् ब्रह्माजीसे पूछा—'ब्रह्मन् !
३७—मनका स्वरूप तथा उसकी विभिन्न संज्ञाओंपर विचार
उत्पत्ति-प्रकरण ] * यह दृश्य-प्रपञ्च मनका विलासमात्र है, इसका ब्रह्माजीके द्वारा प्रतिपादन * १८७
ये सृष्टिके समुदाय ( ब्रह्माण्ड ) कैसे प्रकट होते हैं !' मेरे इस प्रश्नको सुनकर लोकपितामह भगवान् ब्रह्माने मुझसे यह महत्त्वपूर्ण बात कही ।
ब्रह्माजी बोले—वत्स ! यह मन जगत्-भावको धारण करनेकी शक्तिसे सम्पन्न है, अतः यही इस तरह सब पदार्थोंके रूपमें स्फुरित होता है, जैसे जल ही जलाशयमें फैले हुए विचित्र आवर्तोंके रूपमें स्फुरित ( भासित ) होता है । पहलेके किसी कल्पकी बात है । मैं अपने दिनके आरम्भमें जब सोकर उठा और संसारकी सृष्टिकी इच्छा करने लगा, उस समय कैसी घटना घटित हुई, यह बताता हूँ; सुनो । एक दिन संध्याके समय ( कल्पके अन्तमें ) सारी सृष्टिका संहार करके मैंने एकाग्र एवं स्वस्थचित्त हो अकेले ही वह रात बितायी। रात्रिके अन्तमें मैं जाग उठा और विधिपूर्वक संध्या करके प्रजाकी सृष्टि करनेके लिये मैंने अपनी फैली हुई आँखें आकाशमें लगायीं—मैं एकटक दृष्टिसे आकाशकी ओर देखने लगा। ज्यों ही दृष्टि डाली, त्यों ही मुझे आकाश अत्यन्त विस्तृत, अन्तरहित और शून्य दिखायी दिया । वह न तो अन्धकारसे व्याप्त था और न तेजसे ही ।
'अब मैं सृष्टिके लिये संकल्प करूँ' ऐसा निश्चय करके मैंने सूक्ष्म चित्तसे विशुद्ध भावके साथ उस स्रष्टव्य ( सृष्टिके योग्य ) वस्तुकी समीक्षा—पर्यालोचना आरम्भ की । इतनेमें ही उस विशाल आकाशके भीतर मैंने मनसे अनेक बड़े-बड़े ब्रह्माण्ड देखे, जो पृथक्-पृथक् विद्यमान थे । उन सबकी स्थिति व्यवस्थित थी । कहीं कोई प्रतिबन्ध नहीं था । उन ब्रह्माण्डोंमें दस पद्मयोनि ब्रह्मा विराजमान थे, जो मेरे ही प्रतिबिम्ब-से प्रतीत होते थे । वे सभी कमलकोशके निवासी थे और राजहंसोंपर चढ़े हुए थे । पृथक्-पृथक् स्थित हुए उन ब्रह्माण्डोंमें जरायुज आदि चार प्रकारके प्राणी उत्पन्न हो रहे थे । उन सभी ब्रह्माण्डोंमें जल देनेवाले, विशुद्ध ( अनग्रह आदि दोषोंसे रहित ) मेघ-समुदाय छा रहे थे । बड़ी-बड़ी नदियाँ बहती थीं और समुद्रोंके समान गर्जना करती थीं। आकाशमें अनेक सूर्य तपते थे तथा मरुद्गण इधर-उधर संचरण करते थे। स्वर्गमें देवता, भूतलपर मनुष्य तथा पातालोंमें रहकर दानव एवं नाग यथेष्ट क्रीडाएँ करते थे। कालचक्रमें गुँथी हुई तथा सर्दी, गरमी और वर्षाके स्वभाववाली सब ऋतुएँ यथासमय प्रकट हो फल-फूलोंसे सम्पन्न होकर भूमण्डलकी सब ओरसे शोभा बढ़ाती थीं। प्रत्येक दिशामें स्वर्ग और नरकरूपी फल देनेवाले शुभाशुभ आचारका प्रतिपादन करनेवाली स्मृतियाँ सर्वत्र प्रौढ़ताको प्राप्त थीं—उनका सब ओर प्रचार और प्रसार था। भोग और मोक्षरूपी फल चाहनेवाले विभिन्न जातिके समस्त प्राणी क्रमशः अपनी अभीष्ट वस्तु पानेके लिये यथासमय प्रयत्न करते थे । सात लोक, सात द्वीप, सातों समुद्र और सातों पर्वत, जो कालद्वारा नष्ट होनेवाले हैं, बड़े कोलाहलसे युक्त प्रतीत होते थे। उन ब्रह्माण्डोंमें अन्धकार कहीं ( खुले स्थानोंमें ) क्षीण हो गया था, कहीं ( पर्वतकी गुफा आदिमें ) अधिक स्थिर होकर छा रहा था और कहीं सब झाड़ियों एवं कुञ्जोंमें लेशमात्र तेजसे मिश्रित होकर विद्यमान था। नभरूपी नील कमलके भीतर मेघरूपी भ्रमर मँडरा रहे थे तथा तारक-समूहरूपी केसरोंसे वह परिपूर्ण था । मेरु पर्वतके कुक्षोंमें कल्पान्तकालके मेघोंकी भाँति घनीभूत कुहासा छा रहा था, जो सेमलके फलके भीतर रहनेवाली सफेद रूईके समान दिखायी देता था । लोकालोक पर्वत ही जिसकी करधनी है, गर्जते हुए समुद्र ही जिसके आभूषणोंकी झनकार हैं तथा जो अपने ही रत्नोंसे विभूषित है, वह पृथ्वी उन ब्रह्माण्डोंमें उसी प्रकार विराजमान थी जैसे कोई कुलाङ्गना अपने अन्तःपुरमें निवास करती हो ।
भुवनरूपी गड्ढोंमें रहनेवाले बहुत-से प्राणी जिनमें बीजके समान जान पड़ते थे, वे पृथक्-पृथक् ब्रह्माण्ड-गोलक अरुण तेजसे प्रकाशित हो अनारके फलोंके समान दिखायी देते थे । चन्द्रमाकी कलाके समान निर्मल
१८८ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ कान्तिवाली, तीन प्रवाहवाली तथा ऊपर-नीचे एवं मध्य —तीन मार्गोंपर विचरनेवाली गङ्गा जगद्रूपी पुरुषके यज्ञो- पवीतकी भाँति सुशोभित हो रही थीं। दिशारूपी लताओंमें विद्युद्रूपी फूलोंसे युक्त मेघरूपी पल्लव वायुसे टकराकर इधर-उधर झोंके खाते, बिखर जाते और फिर नये पैदा हो जाते थे। विभिन्न भुवनोंके भीतर समूह-के-समूह बसे हुए देवता, असुर, मनुष्य और नाग गूलरके फलोंमें रहनेवाले मच्छरोंके समान जान पड़ते थे। उन लोकोंमें युग, कल्प, क्षण, लव, कला और काष्ठा आदिसे युक्त एवं सबके अतर्कित विनाशकी प्रतीक्षा करनेवाला काल प्रवाहरूपसे स्थित था। अपने शुद्ध एवं उत्तम चित्तके द्वारा ऐसा दृश्य देखकर मैं बड़े विस्मयमें पड़ गया कि यह क्या है और कैसे प्रकट हुआ है। इस स्थूल नेत्रसे जो मुझे कुछ भी नहीं दिखायी देता, उसी अनुपम मायाजालको मैं मनसे आकाशमें स्पष्ट देख रहा हूँ-यह कैसे सम्भव हुआ है ? उसके बाद देरतक उस मायाजालको देखनेके पश्चात् मैंने मनसे ही उस ब्रह्माण्डके आकाशसे एक सूर्यको अपने समीप बुलाकर पूछा- 'देवदेवेश्वर ! महातेजस्वी सूर्य ! आओ, तुम्हारा स्वागत है' यों कहकर मैंने पहले तो उनका स्वागत किया। फिर उनके सामने अपना प्रश्न इस प्रकार रखा- 'भगवन् ! तुम कौन हो ? तुम्हारा यह जगत् कैसे उत्पन्न हुआ ? इसके अतिरिक्त जो और जगत् दिखायी देते हैं, इनकी उत्पत्ति भी किस प्रकार हुई है ? निष्पाप देव ! यदि जानते हो तो यह सब बताओ।' मेरे इस प्रकार पूछनेपर उन्होंने मेरी ओर देखा और पहचान लिया। फिर मुझे नमस्कार करके उत्तम पदोंसे युक्त वाणीद्वारा इस प्रकार कहा । सूर्य बोले-जगदीश्वर ! आप इस दृश्य-प्रपञ्चके नित्य कारण हैं, फिर भी इसे जानते कैसे नहीं ? और यदि जानते हैं तो मुझसे पूछते क्यों हैं ? सर्वव्यापी देव ! यदि मेरी बातें सुननेके लिये आपके मनमें कौतूहल हो तो सुनिये। महात्मन् ! आप परम महान् परमात्मा हैं (आपसे कुछ भी अज्ञात नहीं है)। 'सत्-असत्' का बोध न होनेसे जो मोहमें डालनेवाली हैं तथा जिनसे अनवरत नाना प्रकारकी सृष्टियाँ होती रहती हैं, उन सदसत् कलाओं (संकल्पों) से जो विस्तारको प्राप्त हुआ है, वह मन ही यहाँ विविध पदार्थोंके रूपमें विलसित हो रहा है। तात्पर्य यह कि यह सारा दृश्य-प्रपञ्च मनका ही विलास या संकल्प है। (सर्ग ८५-९१) स्थूल-शरीरकी निन्दा, मनोमय शरीरकी विशेषता, उसे सत्कर्ममें लगानेकी प्रेरणा, ब्रह्मा और उनके द्वारा निर्मित जगत्की मनोमयता, जीवका स्वरूप और उसकी विविध सांसारिक गति तथा सृष्टिके दोष एवं मिथ्यात्वका उपदेश श्रीवसिष्ठजी कहते हैं- रघुनन्दन ! इस संसारमें ब्रह्मासे लेकर स्थावरपर्यन्त सभी जातिके प्राणियोंके सदा दो-दो शरीर होते हैं। एक तो मनोमय शरीर होता है, जो शीघ्रतापूर्वक सब कार्य करनेवाला और सदा चञ्चल है। दूसरा मांसका बना हुआ स्थूलशरीर है, जो मनके बिना कुछ नहीं कर सकता। उक्त दोनों शरीरोंमेंसे जो मांसमय स्थूलशरीर है, वह सभी लोगोंको प्रत्यक्ष दिखायी देता है। उसीपर सब प्रकारके शापों, विद्याओं (आभि- चारिक कृत्यों) तथा विष, शस्त्र आदि विनाशके साधन- समूहोंका आक्रमण होता है। यह मांसमय शरीर असमर्थ, दीन, क्षणभङ्गुर, कमलके पत्तेपर पड़े हुए जलके समान चञ्चल तथा प्रारब्ध आदिके अधीन है। देहधारियोंका जो यह मन नामक दूसरा शरीर है, वह तीनों लोकोंमें प्राणियोंके अधीन होकर भी प्रायः अधीन नहीं रहता
३८—मनके द्वारा जगत्के विस्तार तथा अज्ञानीके उपदेशके लिये कल्पित त्रिविध आकाशका निरूपण एवं मनको परमात्मचिन्तनमें लगानेकी आवश्यकता
उत्पत्ति-प्रकरण ] * स्थूलशरीरकी निन्दा, मनोमय शरीरकी विशेषता, उसे सत्कर्ममें लगानेकी प्रेरणा * १८९ वह यदि सदा बने रहनेवाले धैर्यका अवलम्बन करके अपने पौरुषके सहारे स्थित होता है, तो दुःखोंकी पहुँचसे बाहर हो जाता है-दुःखके हेतुभूत जो दोष हैं, वे उसे दूषित नहीं करते । प्राणियोंका मनोमय शरीर जैसे-जैसे चेष्टा करता है, वैसे-ही-वैसे वह अपने निश्चयके एकमात्र फलका भागी होता है । मांसमय देह (पाञ्चभौतिक स्थूलशरीर ) का कोई भी पौरुष-क्रम सफल नहीं होता, परंतु मनोमय शरीरकी प्रायः सभी चेष्टाएँ सफल होती हैं ( क्योंकि मन ही प्रधान है ) । माण्डव्य ऋषिने मानसिक पुरुषार्थसे मनको रागरहित और दुःखशून्य बना शूलीपर चढ़कर भी सम्पूर्ण क्लेशोंपर विजय प्राप्त कर ली थी ।* अन्धकारपूर्ण कुएँमें गिरे होनेपर भी दीर्घतपा ऋषिने मानसिक यज्ञोंका ही अनुष्ठान करके देवताओंका पद (स्वर्गलोक) प्राप्त कर लिया था । दूसरे भी जो सावधान धीर देवता और महर्षि हैं, वे मनसे की जानेवाली उपासना अथवा ध्यानका तनिक भी त्याग नहीं करते । संसारमें सावधान चित्तवाला कोई भी पुरुष कभी स्वप्न अथवा जागरणमें भी दोष-समूहोंसे थोड़ा-सा भी अभिभूत नहीं होता । इसलिये पुरुषको चाहिये कि वह इस संसारमें पुरुषार्थके साथ अपनी बुद्धिके द्वारा ही अपने मनको पवित्र मार्गमें लगाये । जैसे कुम्हारके घट-निर्माण-सम्बन्धी व्यापारके अनन्तर घड़ा अपने मृत्पिण्डावस्थाको त्याग देता है, उसी प्रकार पुरुष उत्तर पदार्थकी वासनाके पश्चात् पूर्वकी स्थितिका त्याग कर देता है ( तात्पर्य यह है कि आगेकी दृढ़ वासनासे पिछली वासना नष्ट हो जाती है ) । श्रीवसिष्ठजी कहते हैं- रघुनन्दन ! भगवान् ब्रह्माने पूर्वकालमें मुझसे ये बातें कही थीं, उन्हींका आज मैंने तुम्हारे समक्ष वर्णन किया है। नाम और रूपसे रहित उस सर्वात्मा ब्रह्मसे सम्पूर्ण प्रपञ्च उत्पन्न होता है। वह समय पाकर स्वयं ही घनताको प्राप्त हो संकल्प-विकल्परूप मनकी सामर्थ्यसे मनोरूप बन जाता है । इसलिये श्रीराम ! जो ये परमेष्ठी ब्रह्मा हैं, इन्हें तुम परमात्माका समष्टि मन ही समझो । समष्टि मनरूप तत्त्व ही जिनका आकार है, वे भगवान् ब्रह्मा संकल्पमय होनेके कारण जिस वस्तुका संकल्प करते हैं, उसीको देखते हैं । तदनन्तर उन्होंने इस अविद्याकी कल्पना की। अनात्मामें आत्माका अभिमान होना ही इस अविद्याका स्वरूप है । फिर उन ब्रह्माने क्रमशः पर्वत, तृण और समुद्ररूप इस जगत्की कल्पना की । इस प्रकार यद्यपि क्रमशः परब्रह्म-तत्त्वसे यह सृष्टि आयी है, तथापि कुछ लोगोंको यह और ही किसीसे उत्पन्न हुई दिखायी देती है । अतः श्रीराम ! तीनों लोकोंके भीतर वर्तमान सम्पूर्ण पदार्थोंकी उत्पत्ति ब्रह्मासे ही हुई है-ठीक उसी तरह, जैसे तरङ्गोंकी उत्पत्ति समुद्रसे होती है । जो अन्य व्यष्टि-चेतन शक्तियाँ अर्थात् प्राणी हैं, वे सब वास्तवमें सर्वशक्तिमान् ब्रह्मसे अभिन्न ही हैं-साक्षात् ब्रह्मस्वरूप ही हैं। जब यह जगत् विस्तारको प्राप्त होता है, तब वे ही प्राणी समष्टि-मनरूप ब्रह्मासे पूर्वकर्मानुसार विकासको प्राप्त होते हैं । ये सब सहस्रो व्यष्टि चेतन संसरणशील जीव कहे जाते हैं । वे जीव सच्चिदानन्दघन परमात्मासे ही प्रकट होकर आकाशमें तन्मात्राओंके साथ संयुक्त होते हैं । फिर आकाशस्थित वायुओंके मध्यवर्ती जो चौदह श्रेणियोंमें विभक्त जीव हैं, उनमेंसे जिस प्रकारकी जीव-जातिमें रहनेसे जो जीव जैसी वासना और कर्मके अभ्यासमें प्रवृत्त होते हैं, उसी जीव-जातिकी प्राणशक्तिद्वारा वे स्थावर अथवा जङ्गम शरीरमें प्रविष्ट हो रज-वीर्यरूपी बीजभावको प्राप्त होते हैं । तत्पश्चात् योनिसे जगत्में जन्म ग्रहण करते हैं । तदनन्तर वासना-प्रवाहके अनुसार अपने कर्मफलके भागी होते हैं । फिर शुभ और अशुभ
- माण्डव्य ऋषिकी कथा महाभारत, आदिपर्व, अध्याय १०६ में है।- १. जीवोंकी 'इदम्प्रथमता' आदि चौदह श्रेणियाँ आगे बतायी जायेंगी।
१९० * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
वासनाओंसे युक्त पुण्य-पाप कर्मरूपी रस्सियोंसे जिनका लिङ्गशरीर बँधा है, ऐसे वे जीव घूमते हुए कभी उत्तम लोकोंमें जाते हैं और कभी नरकोंमें गिरते हैं।
जीवोंकी ये सब जातियाँ वासनारूप ही हैं। कितने ही जीव हजारों जन्मोंतक कर्मरूपी बवंडरमें पड़कर चक्कर काटते हुए जंगलके पत्तोंकी भाँति झड़ जाते हैं और पर्वतके कुक्षिभागमें लुढ़कते फिरते हैं। कितने ही जीव जिन्हें सच्चिदानन्दघन परमात्माका ज्ञान नहीं है, अतएव जो मोहित रहते हैं, वे असंख्य जन्म धारण करते हैं। चिरकालसे जन्म लेकर इस संसारमें सैकड़ों कल्पोंतक जन्म और मरणकी परम्परामें बँधे रहते हैं। कतिपय जीव, जिनके कई असुन्दर जन्मान्तर व्यतीत हो चुके हैं, वर्तमान जन्ममें शुभकर्मपरायण हो इस जगत्में विचरण करते हैं। कई जातिके जीव तत्त्वज्ञान प्राप्त करके उसी तरह परमपदको प्राप्त हो गये हैं, जैसे वायुसे उड़ाये हुए समुद्रके जलबिन्दु पुनः समुद्रके ही जलमें प्रवेश कर जाते हैं। इस प्रकार यहाँ परमपदरूप ब्रह्मसे सम्पूर्ण जीवोंकी गुण और कर्मके अनुसार उत्पत्ति (सृष्टि) हुई है। यह सृष्टि आविर्भाव और तिरोभावके कारण क्षणभङ्गुर है तथा जन्म-मरणकी परम्पराको प्रकट करनेवाली है। वासनारूपी विषकी विषमतासे उत्पन्न हुए नाना प्रकारके दुःखरूपी ज्वरको धारण करती है। अनन्त संकटोंसे भरे हुए अनर्थकारी कार्योंका समादर करनेवाली है। अनेक दिशाओं, देशों, कालों तथा विविध पर्वतोंकी कन्दराओंमें घुमानेवाली—कर्मफलका भोग करानेवाली है। स्वयं निर्मित उत्तम विचित्रताओंसे इसने चारों ओर भ्रमका जाल बिछा रक्खा है। परमार्थदृष्टिसे यह सृष्टि असत् ही है। वत्स रामभद्र ! विक्षुब्ध मन ही जिसका शरीर है, वह संसाररूपी जंगलकी जीर्ण-शीर्ण लता यदि तत्त्वज्ञानरूपी कुल्हाड़ीसे जड़सहित काट दी जाय तो फरसेसे काटी गयी बेलके समान यह फिर पनप नहीं सकती।
(सर्ग ९२-९३)
जीवोंकी चौदह श्रेणियाँ तथा परब्रह्म परमात्मासे ही उत्पन्न होनेके कारण सबकी ब्रह्मरूपता
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! सात्त्विक, राजस और तामस भेदसे सभी पदार्थ उत्तम, मध्यम और अधम—इन तीन श्रेणियोंमें विभक्त होते हैं। इनकी जो इधर-उधर विभिन्न भुवनोंमें उत्पत्तियाँ बतायी गयी हैं, उनका विभाग इस प्रकार है—बताता हूँ, सुनो। जिस जीवको अपने पूर्वजन्ममें शम, दम आदि समस्त साधन तथा गुण-सम्पत्ति प्राप्त होनेपर भी ज्ञान नहीं हुआ, वह जीव इसी जन्ममें ज्ञान-लाभके योग्य बनकर उत्पन्न होता है; अतः यही उसका प्रथम जन्म है। उस श्रेणीके जीवका वह जन्म 'इदं प्रथम' नामसे विख्यात होता है। यह इदम्प्रथमता पूर्व-जन्मके शुभ अभ्याससे प्रकट होती है। वही इदम्प्रथमता यदि पूर्वजन्ममें वैराग्यकी कमीके कारण शुभ लोकोंका आश्रय लेनेवाली रही हो अर्थात् उत्तम लोकोंकी प्राप्ति-के लिये किये गये शुभ कर्मोंसे संयुक्त हो और इसीलिये विचित्र संसार-वासनाके कारण भोग-व्यवहारवाली हो तो भोगोंसे वासनाका क्षय होनेपर वह कुछ ही जन्मोंमें मोक्षकी प्राप्ति करा देती है। अतः शान्ति आदि गुणोंसे युक्त होनेके कारण उस दूसरी जीव-जातिको 'गुण-पीवरी' कहते हैं।
श्रीराम ! नाना प्रकारके सुख-दुःखरूपी फलोंको देनेमें मुख्य कारणभूत पूर्वजन्मके पुण्य और पापका अनुमान करानेवाली जो जीवोंकी श्रेणी है, उसे पुण्यात्मा पुरुषोंने 'ससत्त्वा' कहा है (क्योंकि वह सत्त्वगुणकी वृद्धिके द्वारा मोक्षकी भागिनी होती है)। जो जीव-श्रेणी विचित्र संसारकी वासनाओंसे युक्त होकर अत्यन्त कलुषित हो गयी हो अर्थात् पूर्वजन्ममें संचित किये गये अधिक दुष्कर्मजनित दुर्वासनाओंसे मलिन हो गयी
उत्पत्ति-प्रकरण] * जीवोंकी चौदह श्रेणियाँ तथा परमात्मासे ही उत्पन्न होनेके कारण सबकी एकरूपता * १९१
हो और भाँति-भाँतिके भले-बुरे फल प्रदान करनेवाले मुख्य कारणभूत पूर्वजन्मके धर्म और अधर्मका अनुमान करनेवाली हो, वह सहस्रों जन्मोंमें ज्ञानकी भागिनी होती है। इसलिये साधुपुरुष उसे 'अधमसत्त्वा' कहते हैं। वही जीवश्रेणी, यदि अध्यात्म-शास्त्रसे विमुख होनेके कारण असंख्य, अनन्त जन्मोंके पश्चात् वर्तमान जन्ममें भी उसके मोक्ष होनेमें संदेह ही रह जाय तो उसे 'अत्यन्त तामसी' कहते हैं। नृपश्रेष्ठ श्रीराम ! जीवकी जो उत्पत्ति पूर्वजन्मकी वासनाओंके अनुरूप एवं वैसे ही आचार-व्यवहारवाली हो तथा दो-तीन जन्मोंके अनन्तर जिसे मनुष्य-जन्म प्राप्त हुआ हो और वैसे ही कार्य कर रही हो, वह लोकमें 'राजसी' कही गयी है। जिसके लिये ज्ञान-प्राप्तिके योग्य जन्मका मिलना दूर नहीं है, जब जीवको ऐसी उत्पत्ति सुलभ हो जाती है, तब उस जन्ममें मृत्यु होनेमात्रसे उसमें मोक्ष-प्राप्तिकी योग्यता आ जाती है। उस जन्ममें उसके द्वारा वैसे ही कार्य होनेसे जो अनुमान होता है, उसके आधारपर ही मुमुक्षुओंने उस अवस्थाको 'राजस-सात्त्विकी' कहा है। वही उत्पत्ति यदि पूर्वोक्त मनुष्य-जन्मोंसे भिन्न, थोड़े-से ही (देवता आदि) जन्मोंमें क्रमशः ज्ञान-प्राप्तिके द्वारा मोक्षकी भागिनी हो तो वैसी उत्पत्तिको उसके ज्ञाता विद्वान् 'राजस-राजसी' कहते हैं। वही यदि राजस-राजसीकी अपेक्षा चिरकालमें मोक्षकी इच्छासे सम्पन्न होकर सैकड़ों जन्मोंके पश्चात् मोक्ष-प्राप्तिकी अधिकारिणी हो और ऐसे कार्योंका आरम्भ करे, जिनसे राजस एवं तामस कर्मजनित फलोंकी प्राप्ति हो तो वह जीव जाति या जीव-श्रेणी सज्जन पुरुषोंद्वारा 'राजस-तामसी' कही गयी है। यदि वही उत्पत्ति ऐसे कार्योंका आरम्भ करे, जिनसे सहस्रों जन्मोंके पश्चात् भी मोक्ष मिलनेमें संदेह ही रहे, उसे 'राजसात्यन्ततामसी' कहा गया है।
सर्गके आदिमें हिरण्यगर्भ ब्रह्मासे मनुष्योंकी उत्पत्ति हुई है। तभीसे सहस्रों जन्म भोग लेनेके पश्चात् भी यदि बहुत जन्मोंके बाद चिरकालमें मोक्ष मिलनेकी सम्भावना हो तो महर्षियोंने उसे 'तामसी' उत्पत्ति कहा है। वह तामस उत्पत्ति यदि तामस योनि होनेपर भी मोक्षकी सम्भावनासे युक्त हो और वैसे ही कर्मोंके आयोजनसे सुशोभित होती हो तो उसे विद्वान् पुरुष 'तामससत्त्वा' कहते हैं। तामस-राजस गुणोंसे सम्पन्न कतिपय जन्मोंमें ही जहाँ मोक्ष-प्राप्तिकी सम्भावना हो, उस उत्पत्तिको 'तमोराजसरूपिणी' कहा गया है तथा जो उत्पत्ति पहलेके हजारों जन्मोंसे लेकर आगे होनेवाले सैकड़ों जन्मोंतक मोक्ष-प्राप्तिकी योग्यतासे रहित हो, उसे उत्पत्तिकी श्रेणीका विभाजन करने और जाननेवाले विद्वानोंने 'तामस-तामसी' कहा है। जिस उत्पत्तिमें अतीतकालके लाखों जन्मोंसे लेकर भविष्यत्कालके लाखों जन्मोंतक मोक्ष मिलनेमें संदेह ही रहे, उसे 'अत्यन्त तामसी' कहते हैं।
प्राणियोंकी ये सारी जातियाँ पूर्व-कर्मानुसार ब्रह्मसे उत्पन्न होती हैं—ठीक उसी तरह जैसे कुछ चञ्चल हुए समुद्रसे तरङ्गें उठती रहती हैं। जीवोंकी ये सभी श्रेणियाँ उसी तरह ब्रह्मसे उत्पन्न हुई हैं, जैसे प्रज्वलित अग्निसे चिनगारियाँ प्रकट होती हैं। जैसे सुवर्णसे कड़े, बाजूबंद और केयूर आदि आभूषण प्रकट होते हैं, उसी प्रकार ब्रह्मसे सारी जीव-श्रेणियाँ पूर्व-वासना और कर्मोंके अनुसार उत्पन्न होती हैं। श्रीराम ! जैसे घटाकाश, स्थाल्याकाश और छिद्राकाश आदि आकाशके ही कल्पित रूप हैं, उसी तरह अजन्मा परब्रह्मकी ही सम्पूर्ण प्राणिवर्गके रूपमें कल्पना हुई है। अतः वे सब प्राणी ब्रह्मके ही रूप हैं। जैसे जलसे फुहारें, भँवरें, लहरें और बूँदें प्रकट होती हैं, अतः सब जलरूप ही हैं, उसी तरह सम्पूर्ण लोक-रचनाएँ परब्रह्म पदसे ही प्रकट हुई हैं, अतः वे सब ब्रह्म-स्वरूप ही हैं।
श्रीराम ! जैसे सूर्यके तेजसे ही मृग-तृष्णारूपिणी
१९२ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
सरिताओंकी प्रतीति होती है, उसी प्रकार सम्पूर्ण दृश्य-दर्शन ब्रह्मके ही संकल्पसे प्रकट हुए हैं। ये सारे दृश्य-दर्शन द्रष्टा ब्रह्मके स्वरूपसे भिन्न नहीं हैं—ठीक वैसे ही, जैसे चाँदनी चन्द्रमासे और प्रकाश तेजसे पृथक् नहीं है। इस तरह जो नाना प्रकारकी जीवोंकी श्रेणियाँ हैं, ये जिस ब्रह्मसे उत्पन्न होती हैं, उसीमें लीन भी हो जाती हैं। रघुनन्दन ! इस प्रकार भगवान् परब्रह्म परमात्माकी इच्छासे व्यवहारमें लगे हुए जो विचित्र आकारवाले रूप-वैभवसे सम्पन्न पूर्वोक्त प्राणिवर्ग हैं; वे आगसे प्रकट होनेवाली चिनगारियोंके समान विभिन्न लोकोंमें आते, जाते और ऊँची-नीची योनियोंमें जन्म लेकर भ्रमण करते हैं। (सर्ग ९४)
कर्ता और कर्मकी सहोत्पत्ति एवं अभिन्नता तथा चित्त और कर्मकी एकताका प्रतिपादन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जैसे वृक्षसे फूल और उसकी गन्ध दोनों साथ ही उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार सृष्टिके आदिमें परम-पदरूप ब्रह्मसे परस्पर अभिन्न कर्म और कर्ता दोनों स्वयं (स्वभाववश) ही एक साथ प्रकट हुए। जैसे अज्ञानी लोगोंकी दृष्टिमें सर्वत्र फैले हुए निर्मल आकाशके भीतर नीलिमा प्रतीत होती है, उसी तरह समस्त संकल्पोंसे रहित सर्वव्यापी विशुद्ध ब्रह्ममें अज्ञ पुरुषोंकी दृष्टिसे ही जीवोंका प्राकट्य प्रतीत होता है। राघव ! जहाँ अज्ञानी लोगोंका ही आचार-व्यवहार दिखायी देता है, वहींपर 'जीव ब्रह्मसे उत्पन्न हुए हैं' ऐसी उक्तियाँ टिक पाती हैं। किंतु जहाँपर ज्ञानी पुरुषोंका व्यवहार है, वहाँ यह कहना शोभा नहीं देता कि 'यह वस्तु तो ब्रह्मसे उत्पन्न हुई है और यह नहीं हुई है।' अतः भेददृष्टिसे जो शोचनीय द्वैत-कल्पना की गयी है, उसे व्यवहारमात्रके लिये स्वीकार करके यह उपदेश दिया जाता है कि 'यह ब्रह्म है और ये जीव हैं।' वास्तवमें यह कथन केवल वाणी-का विलासमात्र है। ये सब जीवराशियाँ सदा उस परमात्मामें स्थित रहती हैं, उसीसे उत्पन्न होती हैं और उसीमें लीन हो जाती हैं। रघुनन्दन ! जैसे फूल और गन्ध एक दूसरेसे अभिन्न हैं, उसी तरह पुरुष (कर्ता) और कर्म परस्पर अभिन्न हैं। ये परमात्मासे प्रकट होते और धीरे-धीरे उसीमें लीन हो जाते हैं। ये दैत्य, नाग, मनुष्य और देवता इस जगत्में वस्तुतः उत्पन्न हुए बिना ही वासनाओंके साथ उत्पन्न होते-से प्रतीत होते हैं और तुरंत गमन आदि क्रियासे युक्त हो जाते हैं। साधो ! उन दैत्य, नाग, मनुष्य और देवता आदिके संसार-भ्रमणमें आत्माके यथार्थ ज्ञानके अभावके अतिरिक्त दूसरा कोई कारण नहीं दिखायी देता। वह आत्मविस्मरण ही जन्मान्तररूपी फल प्रदान करनेवाला है।
श्रीरामचन्द्रजीने कहा—भगवन् ! श्रुति, स्मृति-रूप प्रामाणिक दृष्टिवाले, वीतराग ऋषियोंद्वारा अर्थमें श्रुतिसे विरोध न रखनेवाले जो-जो स्मृति, पुराण एवं इतिहास आदि ग्रन्थ सिद्धान्त-निर्णयपूर्वक रचे गये हैं, वे सब शास्त्र कहलाते हैं। जो महान् सत्त्वगुणसे सम्पन्न, धीर (ज्ञानी) और समदर्शी हैं तथा जिन्हें अनिर्वचनीय ब्रह्मका साक्षात्कार हो चुका है, वे पुरुष साधु (श्रेष्ठ संत) कहे गये हैं। जिन्हें तत्त्वज्ञान नहीं हुआ है, उन पुरुषोंके सम्पूर्ण कर्मोंकी सिद्धिके लिये (उन्हें धर्म और ब्रह्मतत्त्वका साक्षात्कार करानेके लिये) श्रेष्ठ पुरुषोंका सदाचार और श्रुति-स्मृतिरूप शास्त्र—ये ही दो नेत्र हैं।
उनकी दृष्टि सदा इन (दोनों—सदाचार और शास्त्र) का ही अनुसरण करती है। जो पुरुष श्रेष्ठ व्यवहारके लिये शास्त्रका अनुसरण नहीं करता, उसका सभी शिष्टजन बहिष्कार कर देते हैं और वह दुःखमें निमग्न
उत्पत्ति-प्रकरण ] * मनका स्वरूप तथा उसकी विभिन्न संज्ञाओंपर विचार * १९३
हो जाता है। प्रभो ! इस लोकमें और वेदमें भी ऐसा सुना जाता है कि कर्म और कर्ता यहाँ क्रमशः एकके-बाद-एक उत्पन्न होकर कार्य-कारणभावसे परस्पर मिले हुए हैं । कर्मके द्वारा कर्ताका निर्माण होता है और कर्तासे कर्मका, जैसे बीजसे अङ्कुर होता है और अङ्कुरसे बीज । यह न्याय लोक और वेदमें भी प्रसिद्ध है । जिस वासनाके कारण जीव इस संसाररूपी पिंजड़ेमें डाला जाता है, उसी वासनाके अनुसार उसे फल भी भोगना पड़ता है । भगवन् ! जाननेयोग्य तत्त्वके ज्ञाताओंमें श्रेष्ठ महर्षे ! मुझे ठीक-ठीक बताइये कि जीवका किया हुआ कर्म फलरूपमें अवश्य परिणत होता है या नहीं । यदि कर्मका फल अवश्य मिलता है, तब प्राणियोंके जन्म आदिमें वही हेतु हुआ । फिर आपने उत्पत्तिको अकारण या अज्ञानकल्पित कैसे बताया ? मेरे इस महान् संशयका निवारण कीजिये ।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! मैं तुम्हें साधुवाद देता हूँ, तुमने मेरे सामने यह बड़ा सुन्दर प्रश्न रक्खा है । सुनो, मैं तुम्हें इसका उत्तर देता हूँ, जिससे पूर्णतया ज्ञानका उदय हो जाता है । यह संकल्प-विकल्पात्मक मनका विकास ही कर्मोंका कारण है—उसीके अनुसार फल प्राप्त होता है । मनके संयोगके बिना किये हुए कर्म फलदायक नहीं होते । सृष्टिके आरम्भमें परम-पदरूपी ब्रह्मसे जब मनरूपी तत्त्व उत्पन्न हुआ, तभी उस मनके संकल्पके अनुसार जीवोंका कर्म भी उत्पन्न हुआ और जीव पूर्ववासनाके अनुसार देहवाला होनेके कारण देहमें अहंभावसे स्थित है । (मनसे ही कर्मकी उत्पत्ति हुई; इसलिये बीज और वृक्षकी भाँति कारण-कार्यरूप मन और कर्म परस्पर अभिन्न हैं ।) जैसे अभिन्नरूपसे स्थित हुए पुष्प और सुगन्धमें यहाँ भेद नहीं है, उसी प्रकार परस्पर अभिन्न मन और कर्ममें भी भेद नहीं है । इस जगत्में क्रियाका होना ही विद्वानोंद्वारा कर्म बताया गया है । उस क्रियाका आश्रयभूत देह भी पहले मन ही था अर्थात् यह देह भी मनका ही संकल्प होनेके कारण मनोरूप ही है । इसी प्रकार क्रिया भी मनका ही संकल्प होनेसे मनका ही स्वरूप है। न ऐसा कोई पर्वत है, न आकाश है, न समुद्र है और न ऐसा कोई लोक ही है, जहाँ किये हुए अपने कर्मोंका फल नहीं प्राप्त होता । तात्पर्य यह कि कर्मोंका फल अवश्यम्भावी है । ज्ञानपूर्वक किया हुआ कर्म चाहे पूर्वजन्मका हो या इस जन्मका, वह क्रियारूप पुरुषार्थ ही पुरुषका परम प्रयत्न है । वह कभी निष्फल नहीं होता । जो मुक्त पुरुष है, उसीके कर्मका नाश होनेपर मनका नाश होता है मनका नाश ही कर्मका अभाव है। जो मुक्त नहीं है, उसके कर्म और मनका नाश कदापि नहीं होता । अग्नि और उष्णताकी भाँति सदा परस्पर मिले हुए चित्त और कर्म--इन दोनोंमेंसे एकका अभाव होनेपर दोनोंका ही अभाव हो जाता है । (सर्ग ९५)
मनका स्वरूप तथा उसकी विभिन्न संज्ञाओंपर विचार
श्रीरामचन्द्रजीने कहा—ब्रह्मन् ! जो जड होकर भी अजड (चेतन-) के समान आकार धारण किये हुए है, उस मनके सङ्कल्पारूढ़ स्वरूपका आप मेरे समक्ष विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये ।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! सर्वशक्तिमान्, असीम, महान् विज्ञानानन्दघन परमात्मतत्त्वकी शक्तिसे रचित जो संकल्पमय रूप है, उसको विद्वान् पुरुष मन समझते हैं । वह मन स्वयं भी संकल्पकी सामर्थ्यसे युक्त है । इस लोकमें जैसे गुणीका गुणसे हीन होना सम्भव नहीं, उसी प्रकार मनका कल्पनात्मक क्रियाशक्तिसे रहित होना असम्भव है । एकमात्र संकल्प ही जिसका शरीर है तथा जो नाना प्रकारके विस्तारसे सुशोभित होनेवाला
१९४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ
एवं फलधर्मी (फलका जनक) है, उस चित्तरूपी कर्मने अपने ही स्वरूपसे इस नानाविध विश्वका, जो मायामय, निष्कारण (हेतु एवं प्रयोजनसे रहित), विन्यासशून्य तथा वासनाकी कल्पनाओंसे व्याप्त है, विस्तार कर रक्खा है। जिसने जहाँ लताकी भाँति जिस वासनाको जिस प्रकार आरोपित किया है, वहाँपर कर्मानुसार फल देनेवाली वह वासना ही उसे तदनुरूप फलरूपमें प्राप्त होती है। मन जिसका अनुसंधान करता है, उसीका सम्पूर्ण कर्मेन्द्रिय वृत्तियाँ सम्पादन करती हैं; इसलिये मनको कर्म कहा गया है। मन, बुद्धि, अहंकार, चित्त, कर्म, कल्पना, संसृति, वासना, अविद्या, प्रयत्न, स्मृति, इन्द्रिय, प्रकृति, माया, क्रिया तथा इनके सिवा और भी विचित्र शब्दोक्तियाँ संसारभ्रमकी ही हेतुभूत हैं। चित्तभावको प्राप्त हो प्रस्तुत संसार-पदवीको पहुँचे हुए शुद्ध चेतनके अपने ही सैकड़ों संकल्पोंद्वारा ये भिन्न-भिन्न नाम अत्यन्त रूढ़ि (प्रसिद्धि) को प्राप्त हुए हैं। वह शुद्ध चेतन परमात्मा ही लोकमें जीव कहलाता है। मन, चित्त और बुद्धि भी उसीके नाम हैं।
जैसे नाटकमें नट अनेक प्रकारके रूप धारण करता है, उसी प्रकार मन भी भिन्न भिन्न कर्मोंका आश्रय ले अनेक प्रकारके नाम धारण करता है। जैसे एक ही मनुष्य भोजन बनानेसे पाचक और पढ़ानेसे पाठक कहलाता है--विभिन्न एवं विलक्षण अधिकारोंके कारण विचित्र तथा विकृत (उन-उन कर्मोंके प्रकाशक) नाम पाता है, उसी प्रकार मन भी कर्मवश उक्त नाम धारण करता है रघुनन्दन! मैंने चित्तकी जो ये अनेक संज्ञाएँ बतायी हैं, इन्हींको अन्यान्य वादियोंने अपनी सैकड़ों कल्पनाओंद्वारा अन्य प्रकारसे कहा है। अपने भावोंके अनुरूप बुद्धिका मनमें आरोप करके उन वादियोंने मनके द्वारा स्वेच्छासे मन, बुद्धि और इन्द्रिय आदिके विचित्र-विचित्र नामभेद किये हैं। एक वादीके मतसे मन जड है तो दूसरेके मतसे वह जीवसे भिन्न है। तीसरेके मतसे वह अहंभावनाका प्रतीक है तथा चौथे वादीके मतानुसार उसका नाम बुद्धि है।
रघुनन्दन! अन्तःकरणके एकरूप होनेके कारण उसकी संकल्प आदि भिन्न-भिन्न वृत्तियोंके भेदसे निर्मित जो अहंकार, मन और बुद्धि आदि नाम मैंने बताये हैं, उनकी नैयायिकोंने अन्य प्रकारसे कल्पना की है। सांख्यों और चार्वाकोंने भी उनकी विभिन्न रूपोंमें कल्पना की है। मीमांसक, जैन, बौद्ध, वैशेषिक तथा पाञ्चरात्र आदि अन्य विभिन्न वादियोंने भी अपनी-अपनी मान्यताके अनुसार उन नामोंकी भिन्न-भिन्न प्रकारसे कल्पना कर रक्खी है। जैसे बहुत-से राहगीरोंका एक ही नगरमें जाना होता है, उसी प्रकार उन सभी वादियोंका गन्तव्य स्थान एकमात्र पारमार्थिक पद ही है। परम पदमें आरूढ़ होनेकी इच्छावाले वे जिज्ञासु-जन परमार्थ-वस्तुको न समझने तथा विपरीत बुद्धिको अपनानेके कारण अनेक प्रकारके विकल्पोंद्वारा केवल विवाद या तर्क-वितर्क करते हैं। जैसे विचित्र देश-कालमें उत्पन्न हुए पथिक अपनी विभिन्न दृष्टिके अनुसार अपने-अपने गन्तव्य मार्गकी प्रशंसा करते हैं, उसी प्रकार भिन्न-भिन्न देशों और कालोंमें पैदा हुए वे सभी वादी दृष्टिभेदके कारण अपने-अपने मार्ग (मत) का समर्थन करते हैं। यह सब कुछ चित्त ही है, ऐसा अनुभव प्रायः सभी लोगोंको होता है; क्योंकि यदि चित्तका सहयोग न हो तो मनुष्य इस संसारको देखकर भी नहीं देख पाता। मनको साथ रखनेपर ही पुरुष भली-बुरी वस्तुको सुनकर, छूकर, देखकर, आस्वादन-कर और सूँघकर अपने भीतर हर्ष तथा विषादका अनुभव करता है। जैसे विभिन्न रूपोंके दर्शनमें प्रकाश कारण है, उसी प्रकार विभिन्न विषयोंके अनुभवमें मन ही कारण है।
जिस पुरुषका चित्त विषयोंमें बँधा हुआ है, वह बन्धनमें पड़ता है तथा जिसका चित्त कर्मवासनाके