संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
उत्पत्ति-प्रकरण ] * मनकी परमात्मरूपता, ब्रह्मकी विविध शक्ति एवं सबकी ब्रह्मरूपताका प्रतिपादन * १९७
स्थितिमें उनकी भाव ( सत्ता )-शक्ति विद्यमान है। ब्रह्मकी सम्पूर्ण शक्ति दसों दिशाओंमें व्याप्त दिखायी देती है। विनाशकालमें नाशशक्ति, शोकयुक्त प्राणियोंमें शोक-शक्ति, प्रसन्न जीवोंमें आनन्दशक्ति, योद्धाओंमें वीर्यशक्ति, सृष्टिकालमें सर्गशक्ति और प्रलयकालमें उनकी सर्वशक्तिमत्ता दृष्टिगोचर होती है। जैसे वृक्षके बीजमें फल, फूल, लता, पत्र, शाखा-प्रशाखा तथा जड़सहित वृक्ष अव्यक्त-रूपसे विद्यमान रहता है, उसी प्रकार ब्रह्ममें यह सम्पूर्ण जगत् स्थित है।
रघुनन्दन ! अब इस जगत्को और अहंतत्त्व (जीव) को तुम ब्रह्मरूप ही देखो। वह परब्रह्म परमात्मा सर्व-व्यापी है। उसका महान् ( अनन्त ) स्वरूप नित्य प्रकाशमान है। वही ब्रह्म जब किंचित् मननशक्तिको धारण करता है, तब मन कहलाता है। जैसे आकाशमें भ्रमवश मोरके पंखोंकी प्रतीति होती है और जैसे जलमें आवर्त-बुद्धि होती है, उसी तरह मनमें ब्रह्मकी प्रतीति होती है। शत्रुसूदन श्रीराम ! यह जो मनका मननात्मक रूप प्रकट हुआ है, वह ब्रह्मकी शक्ति ही है; इसलिये वह ब्रह्म ही है। 'इदं' ( यह ), 'तत्' ( वह ) और 'अहं' ( मैं )—वह सब भेद प्रतीतिमात्र ही है, वास्तविक नहीं। जैसे निश्चल और निर्मल जलाशयमें अपने-आप स्पन्द ( कम्पन ) होता है, उसी तरह परमात्मामें यह जीव पूर्वकर्म और वासनाके अनुसार प्रकट हुआ है। यही संसारका कारण है। श्रीराम ! जैसे समुद्रका जल ही कल्लोल, ऊर्मि और तरङ्ग-समुदायके रूपमें सब ओर स्थित रहता है, उसी तरह ज्ञानीकी दृष्टिमें यह सारा प्रपञ्च ब्रह्मस्वरूप ही है। जैसे विविध तरङ्गोंसे व्याप्त विशाल महासागरमें जलके अतिरिक्त दूसरी कोई कल्पना या सत्ता नहीं है, उसी तरह परब्रह्म परमात्मामें नाम-रूप क्रियात्मक संसारकी ब्रह्मसे अतिरिक्त सत्ता नहीं है। यह जो कुछ जगत् जन्म लेता, नष्ट होता, गमन करता अथवा स्थित रहता है, वह सब ब्रह्मके द्वारा ब्रह्ममें ब्रह्म ही वर्तता है। करण, कर्म, कर्ता, जन्म, मरण और स्थिति—ये सब ब्रह्म ही हैं। उसके बिना दूसरी कोई कल्पना ही नहीं। यह सारा जगत् परमात्मा ही है। जो कुछ यह संकल्प-क्रम है, वह सब भी परमात्मा ही है। जैसे सुवर्ण बाजूबंदके रूपमें प्रकट होता है, उसी प्रकार परमात्मा मनरूपसे प्रकट हुआ है; इसलिये मन भी परमात्मा ही है।
राघव ! बन्धन और मोक्ष आदिका कोई सम्मोह ज्ञानीको नहीं होता। मोहजनित बन्धन और मोक्ष आदि तो अज्ञानीको ही होते हैं।
निष्पाप श्रीराम ! विकल्प-जालसे परिपूर्ण यह संसार-रचना प्रतीतिमात्र ही है, जो बन्ध, मोक्ष आदिकी कल्पनाओंके रूपमें विस्तारको प्राप्त हो रही है। वास्तवमें यहाँ सङ्कल्पमात्रके सिवा दूसरी कोई वस्तु नहीं है। जो कुछ विकल्परूप प्रतीत होता है, वह संकल्पके कारण ही प्रतीतिका विषय होता है। वह वास्तवमें कुछ नहीं हैं; अथवा कुछ है अर्थात् परमात्माका संकल्पमात्र है। स्वर्ग, पृथ्वी, वायु, आकाश, पर्वत, नदियाँ और दिशाएँ—ये सब अपने स्वप्नके समान मनके सङ्कल्पमात्रमें ही विकसित हुए हैं। जैसे केवल जलमय चञ्चल समुद्र अपने स्वरूपभूत जलमें स्वयं ही स्फुरित होता है, उसी तरह परमात्मामें एकमात्र सङ्कल्प ही सब ओर स्फुरित हो रहा है। पहले परमात्मामें एकमात्र सङ्कल्प ही प्रकट हुआ। वही संकल्प सूर्यके व्यापारोंसे बढ़नेवाले दिनकी भाँति लोगोंके विविध व्यापारोंसे विस्तारको प्राप्त हुआ है।
वस्तुतः भेदरहित परमात्मामें अहंकार नहीं है। जैसे सूर्यकी प्रचण्ड धूपमें भ्रमवश मृगतृष्णारूपिणी नदीकी प्रतीति होती है, उसी प्रकार असम्यक्-दृष्टि ( अज्ञान ) के कारण ही परमात्मामें अहंकारका भान होता है। मनरूपी चिन्तामणिके द्वारा कल्पित जो महान् आरम्भ ( कार्यसमूहकी सृष्टि ) है, वही संसाररूपमें देखा जाता है। जैसे जल अपने स्वरूपका आश्रय लेकर स्वयं ही
१९८ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
तरङ्ग आदिके रूपमें प्रतीत होता है, उसी प्रकार आत्माका आश्रय लेकर मन स्वयं ही संसारके रूपमें स्फुरित होता है। अद्वितीय परमात्मामें अज्ञानके कारण भेद और अभेदकी भ्रान्ति हो रही है। इस भ्रमका बाध होनेपर जब यह सब कुछ ब्रह्मतत्त्वके रूपमें ही अवशिष्ट रह जाता है, तब यहाँ कौन बद्ध है और कौन मुक्त होता है ? जबतक ब्रह्मका साक्षात्कार नहीं होता, तभीतक देह आदिके पीड़ित होनेपर यह पीड़ारहित जीव भी पीड़ासे युक्त-सा प्रतीत होता है। अच्छेद्य होनेपर भी देहके किसी अङ्गके कट जानेपर तमतमा उठता है। परंतु जब परमात्माका साक्षात्कार हो जाता है, तब ये बातें नहीं होतीं; क्योंकि परमात्मामें भेद, अभेद, विकार और पीड़ा—कुछ भी नहीं हैं।
यह शरीर गिर जाय या उठ खड़ा हो अथवा आकाशके भीतर चला जाय, उससे विलक्षण रूपवाले मुझ आत्माकी क्या हानि है ? श्रीराम ! मन ही सम्पूर्ण जगत्का शरीर है। मनकी कारणभूत आद्याशक्ति-रूप चिन्मय परमात्माका कभी नाश नहीं होता। यह वासना इष्ट वस्तुमें राग और अनिष्ट वस्तुमें द्वेषके कारण बन्धनमें डालनेवाली मनकी ही शक्ति है। इसीके द्वारा व्यर्थ भ्रमसे स्वप्नकी भाँति इस जगत्की कल्पना हुई है। यह वासना अविद्या है। ज्ञानके बिना इसका अन्त होना बड़ा कठिन है। यह केवल दुःख देनेके लिये ही बढ़ती है। इसके स्वरूपका ज्ञान न होनेसे ही यह इस मिथ्या प्रपञ्चका विस्तार करती है। इस मानसी-शक्ति वासनाने ही इस विशाल जगत्को दीर्घकालतक रहनेवाले स्वप्नके समान रचा है। यह है तो असत्, किंतु सत्-सा प्रकट हुआ जान पड़ता है। आरम्भमात्र ही इसका फल है अर्थात् यह निस्सार एवं आपात रमणीय है। मनका नाश ही महान् अभ्युदय—परम पुरुषार्थकी प्राप्ति है और वही समस्त दुःखोंके समूल नाशका उपाय है। निरन्तर सुख-दुःखरूपी वृक्ष-समूहोंसे भरपूर और क्रूर कालरूपी विषैले सर्पके निवास-स्थान इस समस्त संसाररूपी वनमें यह विवेकहीन मन ही बड़ी-बड़ी विपत्तियोंका एकमात्र कारण और प्रभु है।
महर्षि वसिष्ठके इतना उपदेश दे लेनेपर दिन बीत गया, सूर्यदेव अस्ताचलको चले गये। उस राजसभामें बैठे हुए ऋषि-मुनि तथा अन्य सभासद् सायंकालिक कृत्य (संध्योपासना और अग्निहोत्र आदि) करनेके लिये स्नानके उद्देश्यसे उन महामुनिको नमस्कार करके चले गये तथा रात बीतनेपर सूर्यकी किरणोंके साथ ही वे सब सभासद् फिर वहाँ आ गये। (सर्ग १००-१०२)
जगत्की चित्स्वरूपता, वासनायुक्त मनके दोष, मनका महान् वैभव तथा उसे वशमें करनेका उपाय
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! जैसे सागरसे उसकी बड़ी-बड़ी लहरें उठती हैं, उसी प्रकार परब्रह्म परमात्मासे इस चित्तरूपी तरङ्गका उत्थान हुआ है। यही अपने संकल्पसे विशालताको प्राप्त होकर चारों ओर इस भुवनका विस्तार करता है। सब प्रकारकी वस्तुओंसे सम्पन्न यह जो कुछ भी चराचर जगत् दृष्टिगोचर हो रहा है, सब-का-सब चित्तके संकल्पसे ही प्रकट हुआ है। श्रीराम ! जैसे छोटा बच्चा घरमें कीचड़ या गीली मिट्टीसे विचित्र खिलौने बनाता है, वैसे ही मन अपने संकल्पसे विकल्परूपी जगत्की सृष्टि करता है। जैसे ऋतुओंका निर्माण करनेवाला काल विभिन्न ऋतुओंमें वृक्षका कुछ और ही विलक्षण रूप कर देता है, उसी प्रकार चित्त भी इन सब पदार्थोंको विलक्षण-सा बना देता है। जैसे वृक्षसे पल्लव प्रकट होते हैं, उसी प्रकार मनके संकल्पसे व्यामोह, सम्भ्रम, अनर्थ, देश, काल, गमन और आगमन—ये सब-के-सब उत्पन्न होते हैं। जैसे जल ही समुद्र है और उष्णता ही अग्नि है, उसी प्रकार चित्त ही विविध व्यापारोंसे पूर्ण संसार है (क्योंकि वह उसीके संकल्पसे उत्पन्न हुआ है)।
उत्पत्ति-प्रकरण ] * जगत्की चित्तरूपता, वासनायुक्त मनके दोष * १९९
कर्ता, कर्म और करणके साथ जो यह द्रष्टा, दर्शन और दृश्यसे सम्पन्न संसार प्राप्त हुआ है, वह सब-का-सब चित्त ही है। जैसे सुवर्ण-तत्त्वकी परीक्षा करनेवाला पुरुष बाजूबंद, मुकुट, कड़ा और हार आदि आकारोंसे सुशोभित उसके विविध रूपोंको छोड़कर एकमात्र सुवर्णमें ही बुद्धिको लगानेपर वास्तविक सुवर्णको देख पाता है, उसी प्रकार विवेकी पुरुष भी विभिन्न लोकों, उनके भीतरके भुवनों और उनके भी भीतर फैले हुए वनान्तर आदि समस्त वस्तुओंको त्यागकर जब यह समझ लेता है कि इन सबके रूपोंमें अपने ही स्वरूप-भेदसे—अपने ही संकल्प-विकल्पोंसे चित्त स्वयं ही प्रकट हुआ है, तब यह सारा जगत् उसे चित्तरूप ही दिखायी देता है; फिर चित्तके सिवा दूसरी कोई वस्तु दृष्टिगोचर नहीं होती ।
जैसे बालिका वेतालोंका विस्तार करती है, उसी प्रकार अत्यन्त तुच्छ वासनारूपी सहस्रों दोषोंसे मलिन हुई मनोवृत्ति, जो नहीं है उस दुःखका भी पूर्णरूपसे विस्तार करती है; किंतु जो वासनारूप कलङ्कसे मलिन नहीं हुई है—निष्कलङ्क है, वह मनोवृत्ति महान् दुःख विद्यमान हो तो भी उसे उसी प्रकार क्षणभरमें मिटा देती है, जैसे सूर्यकी प्रभा अन्धकारको । वासनायुक्त अज्ञानी चित्तको जहाँ भय नहीं है, वहाँ भी भय दिखायी देता है। जैसे भ्रममें पड़े पथिकको ठूंठा काठ दूरसे पिशाच-जैसा जान पड़ता है । कलङ्कसे मलिन हुआ मन मित्रमें भी शत्रुभावकी आशङ्का करता है, जैसे नशेमें चूर हुआ प्राणी इस पृथ्वीको घूमती हुई देखता है । मनके व्याकुल होनेपर चन्द्रमासे भी वज्रपात होता जान पड़ता है। विष-बुद्धिसे भक्षण किया गया अमृत भी विषका काम करता है । मनकी उत्कट वासना ही जीवके लिये एकमात्र मोहका कारण है, अतः यत्नपूर्वक उसीकी जड़ काटकर उसे उखाड़ फेंकना चाहिये । मनुष्योंका मनरूपी हिरन संसाररूपी वनकी झाड़ीमें वासनारूपी जालसे आकृष्ट हो बडी विवशताको प्राप्त हो जाता है । जिस विचारसे जीवकी
सं० यो० व० अं० ८—
ज्ञेय-पदार्थसम्बन्धिनी वासना कट जाती है, उसका प्रकाश बादलोंके आवरणसे रहित सूर्यकी प्रभाके समान प्रकाशित होता है । अतः तुम मनको ही मानव समझो, इस स्थूल देहको नहीं । देह जड है; किंतु इसके भीतर रहनेवाले मनको न जड माना जाता है न अजड । तात ! निष्पाप रघुनन्दन ! मनने जो कर दिया, उसीको किया हुआ समझो और मनने जिसे छोड़ दिया, उसीको छोड़ा हुआ मानो । यह सारा जगत् एकमात्र मन ही है । मन ही सम्पूर्ण भूमण्डल है । मन ही आकाश, मन ही भूमि, मन ही वायु और मन ही महत्तत्त्व है । यदि मन सूर्य आदि पदार्थोंमें प्रकाश आदिरूपसे अपने-आपको योजित न करे तो ये सूर्य आदि भी कभी प्रकाशित न हों । जिसका मन मोहको प्राप्त होता है, वही मूढ कहलाता है; यदि शरीर मोहको प्राप्त हो तो उसके शवको कोई मूढ़ नहीं कहता । मन जब देखता है तब नेत्र बन जाता है, सुनता है तब श्रवण या कान बन जाता है, स्पर्शका अनुभव करनेसे वही त्वगिन्द्रियका रूप ग्रहण करता है, सूँघनेसे घ्राणेन्द्रिय और रसास्वादन करनेसे रसनेन्द्रिय हो जाता है । जैसे नाटकमें एक ही नट अनेक भूमिकाओं (विविध रूपों) में देखा जाता है, उसी प्रकार देहके भीतर इन विचित्र इन्द्रिय-वृत्तियोंमें केवल मनकी ही अनुवृत्ति होती है। मन छोटेको बड़ा बना देता, सत्य पदार्थमें असत्ता स्थापित कर देता, स्वादिष्टको कडुवा बनाता और शत्रुको मित्र बना लेता है ।
यदि भगवत्-स्मरण आदि मनोहर मनोवृत्तिका उदय हो तो रौरव नरकका दुःख भी सुखके रूपमें परिणत हो जाता है। जिसे कल सबेरे राज्य मिलनेका विश्वास है, वह यदि कारागारमे अच्छी तरह बँधा हो तो भी उसका वह बन्धन दुःखद नहीं होता । मनके जीत लिये जानेपर सारी इन्द्रियों स्वतः वशमे हो जाती हैं । श्रीराम ! सर्वत्र विद्यमान, स्वच्छ, निर्विकार, सम, सूक्ष्म, साक्षिरूप, सम्पूर्ण पदार्थोंमें अनुगत, चेत्य पदार्थोंसे अभिन्न तथा चिन्मात्ररूप जो आत्मसत्ता है, उससे उपलक्षित जो
२०० * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
वाग् आदि सब क्रियाओंसे रहित ब्रह्म है, उसे भी यह मन देहके तुल्य और जड बनाकर अन्तःकरणमें काम-संकल्प-रूप भ्रान्तिसे और बाहर पर्वत, नदी, समुद्र, आकाश एवं नगर आदिकी लीलासे युक्त हो व्यर्थ घूमता रहता है।
जिसे चित्तने देखा है, वही वस्तु देखी गयी मानी जाती है। यदि चित्तने नहीं देखा तो सामने रक्खी हुई वस्तु भी नहीं दिखायी देती। जैसे अन्धकारमें नील रूपकी कल्पना की गयी है, उसी तरह मनने अपनेमें ही इन्द्रियोंका निर्माण कर रक्खा है। इन्द्रियोंसे मन साकार होता है और मनसे इन्द्रियाँ। इस प्रकार यद्यपि दोनों समान हैं, तथापि इनमें मन ही उत्कृष्ट है; क्योंकि मनसे इन्द्रियाँ उत्पन्न हुई हैं, इन्द्रियोंसे मन नहीं। इस तरह चित्त और शरीर एक-दूसरेसे अत्यन्त भिन्न होनेपर भी जिनकी दृष्टिमें इन दोनोंकी एकता है अर्थात् जो चित्त और शरीर दोनोंको जड-कोटिमें मानकर उन्हें एक-सा समझते हैं, वे ज्ञेय आत्माके ज्ञाता परम ज्ञानी महात्मा हम सबके लिये वन्दनीय हैं। जब मन अन्यत्र आसक्त होता है—किसी दूसरे काममें उलझा रहता है, तब बड़े यत्नसे कही जाती हुई कथाका क्रम भी टूट जाता है। स्वप्नमें जब मन उल्लासको प्राप्त होता है, तब हृदयके भीतर ही निर्मित हुए नगर एवं पर्वत आदि विस्तृत आकाशमें निर्मित नगर और पर्वत आदिके समान अपने-अपने कार्यको करनेमें समर्थ दिखायी देते हैं। जैसे चञ्चल समुद्र अपने-आपमें ही तरङ्गमालाओंका विस्तार करता है, उसी तरह मन स्वप्नावस्थामें अपनेसे विक्षिप्त हुए हृदयमें ही पर्वत और नगरोंकी श्रेणीको फैला देता है। जैसे समुद्रके भीतर जलसे तरङ्गमालाएँ और छोटी-छोटी लहरें प्रकट होती हैं, उसी तरह देहके भीतर मनसे ही स्वप्नगत पर्वत और नगरोंकी पंक्तियाँ प्रादुर्भूत होती हैं। जैसे पत्र, लता, फूल और फलकी शोभा अङ्कुरका ही स्वरूप है—उससे भिन्न नहीं, उसी प्रकार जाग्रत् और स्वप्नकी विलास-भूमियाँ मनका ही विकास हैं, मनसे भिन्न नहीं। जैसे सुवर्णकी नारी-प्रतिमा सुवर्णसे भिन्न नहीं है, उसी प्रकार जाग्रत् और स्वप्नावस्थाकी क्रिया-लक्ष्मी चित्तसे पृथक् नहीं है। जैसे जलका वैभव ही धारा, जलकण, तरङ्ग और फेन आदिकी शोभाके रूपमें दृष्टिगोचर होता है, उसी प्रकार जगत्के विविध पदार्थोंके रूपमें यह चित्तका ही विचित्र वैभवशाली नानात्व प्रकट हुआ है। जैसे नट शृङ्गार आदि रसके आवेशसे विभिन्न भूमिका (वेश-वैचित्र्य) को ग्रहण करता है, उसी प्रकार अपनी चित्त-वृत्ति ही यहाँ रागके आवेशसे जाग्रत् और स्वप्नगत दृश्य-प्रपञ्चके रूपमें उदित होती है।
सब ओर फैला हुआ वासनारूढ मन विषयोंके मननसे अतिशय मोहको प्राप्त हो अपने संकल्पके अनुसार विभिन्न प्रकारकी योनि (जन्मस्थान), सुख-दुःख तथा भय-अभयको प्राप्त होता है। जैसे तिलमें तेल रहता है, उसी तरह मनमें सुख और दुःख रहते हैं। वे ही देश और कालका प्रभाव पड़नेसे कभी घनभूत हो जाते हैं और कभी अत्यन्त सूक्ष्म। मनःशरीरके संकल्पके सफल होनेपर ही स्थूल-शरीर शान्ति एवं उल्लासको प्राप्त होता है, आता-जाता है और उछलता-कूदता है। वह स्वतन्त्र-रूपसे कुछ नहीं करता। जैसे साध्वी स्त्री अन्तःपुरके आँगनमें ही अपने संकल्पसे उदित विविध एवं विस्तृत उल्लासोंके साथ क्रीड़ा करती है, उसी प्रकार मन इस देहके भीतर अपने संकल्पोंद्वारा कल्पित अनेक प्रकारके बढ़े हुए उल्लासजनक भावोंसे क्रीडा-विलास करता है। इसलिये जो पुरुष अन्तःकरणमें मनको चपलता (विषय-चिन्तन) के लिये अधिक अवसर नहीं देता, उसका वह मन खंभेमें बँधे हुए हाथीके समान स्थिर होकर लयको प्राप्त हो जाता है। निष्पाप रघुनन्दन ! जिसका मन एक लक्ष्यमें स्थिर होकर अपनी चपलताका त्याग कर चुका है, वह ध्यानके द्वारा सर्वोत्तम पद (परब्रह्म परमात्मा) से संयुक्त हो जाता है। जैसे मन्दराचलके स्थिर हो जानेपर क्षीरसागर शान्त हो गया था, उसी प्रकार मनके संयमसे संसाररूपी भ्रान्तिका शमन हो जाता है।
(सर्ग १०३-११०)
उत्पत्ति-प्रकरण ] * चित्तरूपी रोगकी चिकित्साके उपाय तथा मनोनिग्रहसे लाभ * २०१
चित्तरूपी रोगकी चिकित्साके उपाय तथा मनोनिग्रहसे लाभ
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! यह चित्त एक महान् रोग है। इसकी चिकित्साके लिये एक बहुत बड़ी औषध है, जो अभीष्टसाधक, निश्चितरूपसे लाभ पहुँचाने-वाली, परम स्वादिष्ट और अपने ही अधीन है; उसे बताता हूँ, सुनो। रागके विषयभूत बाह्य विषयोंका परित्याग करके परमात्मचिन्तनरूपी अपने ही पुरुषार्थमय प्रयत्नसे चित्तरूपी वेतालपर शीघ्र विजय पायी जाती है। जो अभीष्ट वस्तु (बाह्य विषयभोग) को त्यागकर चित्तके राग आदि रोगोंसे रहित हो स्वस्थ रहता है, उसने अपने मनको उसी प्रकार जीत लिया है, जैसे मजबूत दाँतोंवाला हाथी खराब और कमजोर दाँतवाले हाथीको जीत लेता है। स्वसंवेदन (आत्मा या परमात्माके निरन्तर चिन्तन) रूपी प्रयत्नसे चित्तरूपी बालकका पालन किया जाता है अर्थात् उक्त यत्नसे उसके राग और चपलता आदि रोगोंकी चिकित्सा करके उसे स्वस्थ बनाया जाता है। उसे अवस्तु (मिथ्या अथवा अनात्मवस्तु) से हटाकर वस्तु (सत्य अथवा आत्मतत्त्व) में लगाया जाता है तथा उसे बोधसे सम्पन्न किया जाता है। जैसे बालकको प्यार या भय दिखाकर बिना प्रयत्नके ही इधर-उधर जहाँ चाहे लगाया जा सकता है, उसी प्रकार भावोंसे मनको भी अनायास ही अन्तरात्मामें लगाया जा सकता है। ऐसा करनेमें कठिनाई ही क्या है ?
भविष्यमें अभ्युदयरूपी फलको देनेवाले सत्कर्म (समाधिके अभ्यास) में लगे हुए मनको अपने पुरुषार्थसे ही चेतन परमात्माके साथ संयुक्त करे। जो सर्वथा अपने अधीन और परम हितकर है, वह अभीष्ट वस्तुका त्यागरूपी वैराग्य जिसके लिये कठिन हो गया है, वह मनुष्य नहीं, विषयोंका कीड़ा है। उसे धिक्कार है। जैसे कोई पहलवान किसी बालकको अनायास ही पछाड़ देता है, उसी प्रकार अपनी बुद्धिसे अशेष विषय-समूहमें परम रमणीय परब्रह्म परमात्माकी भावना करके मनको बिना यत्नके ही जीत लिया जा सकता है। पौरुषरूपी प्रयत्नसे चित्तको शीघ्र ही जीत लिया जाता है। जो चित्तको जीतकर उसके प्रभावसे रहित हो गया है, वह बिना किसी प्रयासके परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेता है। अपने चित्तपर आक्रमण करके उसे वशमें कर लेना-मात्र जो सहजसाध्य और स्वाधीन कार्य है, उसे ही जो लोग नहीं कर सकते, वे पुरुष नहीं, गीदड़ हैं। उन्हें धिक्कार है। एकमात्र अपने पौरुषमें ही सिद्ध होनेवाला जो अभीष्ट वस्तुका त्यागरूपी मनोनिग्रहकर्म है, उसके बिना शुभगति नहीं हो सकती। अभीष्ट बाह्य विषयोंका स्मरण न करना अथवा मनोवाञ्छित मोक्ष-सुखकी प्राप्ति कराना जिसका स्वरूप है, उस मुख्य साधन मनोनिग्रहके बिना गुरुका उपदेश, शास्त्रके अर्थका चिन्तन और मन्त्र आदि सारे साधन या युक्तियाँ तिनकोंके समान व्यर्थ हैं*।
संकल्पोंके परित्यागरूपी शस्त्रसे जब चित्तरूपी वृक्षका समूल उच्छेद हो जाता है, तब साधक सर्व-स्वरूप सर्व-व्यापी शान्त ब्रह्मरूप हो जाता है। श्रीराम ! जैसे दिग्भ्रम होनेपर पूर्वमें पश्चिमकी प्रतीति होने लगती है और वह अनुभवके विपरीत बुद्धि उस समय बिल्कुल स्थिर हो जाती है; परंतु विवेकरूपी पुरुष-प्रयत्नसे उस भ्रान्त बुद्धिका भी शीघ्र ही निवारण किया जा सकता है, उसी तरह मनको भी वैराग्यरूपी पुरुष-प्रयत्नसे शीघ्र ही जीता जा सकता है। मनमें उद्वेगका न होना राज्य आदि सम्पत्तिका मूल कारण है। उद्वेग या उकताहट न होनेसे ही जीवको अपने मनपर विजय प्राप्त होती है, जिससे तीनों लोकोंपर विजय पाना तृणके समान सहज हो जाता है। जो नराधम अपने मनके निग्रहमें भी समर्थ
* यह बात मनोनिग्रहकी प्रशंसाके लिये कही गयी है। गुरुके उपदेश और शास्त्रके अभ्यासको व्यर्थ बताना इसका उद्देश्य नहीं है। सद्गुरुके उपदेश और शास्त्रार्थ-चिन्तन कभी व्यर्थ नहीं जाते।
२०२ * अविच्छिन्नचिदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
नहीं हैं, वे व्यवहार-दशाओंमें व्यवहारका निर्वाह कैसे कर सकेंगे। मैं पुरुष हूँ, मरा हूँ, उत्पन्न हुआ हूँ और जी रहा हूँ इत्यादि कुदृष्टियाँ चञ्चल चित्तकी वृत्तियों ही प्रतीत होती हैं, जो बिना हुए ही प्रकट हुई हैं। यहाँ न तो किसीकी मृत्यु होती है और न कोई जन्म ही लेता है। मन स्वयं ही अपने मरणका तथा लोकान्तर-गमनका सङ्कल्पमात्रसे अनुभव करता है। जो नित्य सत्, सबका हितकारी, मायामयी मलिनतासे रहित और सर्व-व्यापी परमात्मा हैं, उनमें चित्तका लय हुए बिना मुक्तिका दूसरा कोई उपाय नहीं है। इस बातका ऊपर-नीचे तथा अगल-बगलके लोकोंमें रहनेवाले तत्त्वदर्शी विद्वानोंने बारंबार विचार किया है और सब-के-सब इसी निश्चयपर पहुँचे हैं कि चित्तकी शान्तिके सिवा मुक्तिका दूसरा कोई उपाय है ही नहीं। ऋत, सत्य, व्यापक और निर्मल ज्ञानका हृदयमें उदय होनेपर मनके लय होनेमात्रसे परम शान्ति प्राप्त हो जाती है। यदि आपातरमणीय विषयोंको तुम-जैसे विद्वानूने अरमणीय वस्तुओंकी कोटिमें समझ लिया है, तब तो मेरा विश्वास है कि तुमने चित्तके सारे अङ्ग काट डाले हैं। यह सामने दिखायी देनेवाला जो वह ( पितासे उत्पन्न ) शरीर है, वह मैं हूँ और यह जो घर, खेत आदि धन है, यह सब मेरा है। यह 'मैं' और 'मेरा' ही मन है। यदि यह मैं और-मेरेपनकी भावना न की जाय तो उससे मन उसी तरह कट जाता है, जैसे हँसियासे तृण। जैसे शरद् ऋतुमें आकाशमें बिखरे हुए बादलोंके टुकड़े वायुद्वारा उड़ा दिये जाते हैं, उसी प्रकार मैं और मेरेपनकी कल्पना या भावना न करनेसे मन भी उड़ा दिया जाता है—नष्ट कर दिया जाता है। इसलिये कोई विज्ञ पुरुष जैसे अपने बालक पुत्रको अच्छे कर्ममें लगाता है, उसी तरह विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वह अपने मनको कल्याणमें लगाये। जिसका नाश होना कठिन है तथा जो नूतन या बालक न होकर सयाना और दर्पसे भरा हुआ है, उस मनरूपी सिंहको, जो संसारका विस्तार करनेवाला है, जो लोग मार डालते हैं, वे निर्वाणपदका उपदेश देनेवाले महात्माजन इस संसारमें धन्य हैं। उनकी सदा ही विजय होती है। भले ही प्रलयकालके प्रचण्ड पवन प्रवाहित हों, चारों समुद्र एकमें मिलकर एकार्णव हो जायें और बारहों सूर्य एक साथ तपने लगें; परंतु जिसका मन शान्त हो गया है, उस पुरुषकी कभी कोई हानि नहीं होती।
(सर्ग १११)
मनोनाशके उपायभूत वासना-त्यागका उपदेश, अविद्या-वासनाके दोष तथा इसके विनाशके उपायकी जिज्ञासा
श्रीवसिष्ठजीने कहा—जैसे बर्फका रूप शीतलता और काजलका रूप कालिमा है, उसी प्रकार मनका रूप अत्यन्त चञ्चलता है।
श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! इस अत्यन्त चञ्चल मनके तीव्र वेग या चपलताका बलपूर्वक निवारण कैसे हो सकता है ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! इस जगत्में कहीं भी चपलतासे रहित मन नहीं देखा जाता। जैसे उष्णता अग्निका धर्म है, वैसे ही चञ्चलता मनका। चेतन तत्त्वमें जो यह चञ्चल क्रियाशक्ति विद्यमान है, उसीको तुम जगत्का आडम्बररूप मानसी शक्ति समझो। जैसे स्पन्दन और अस्पन्दनके बिना वायुके अस्तित्वका पता ही नहीं चलता, वैसे ही चञ्चल स्पन्दन ( चेष्टा ) के बिना चित्तका अस्तित्व ही नहीं है। जो मन चञ्चलतासे रहित है, वही मरा हुआ कहलाता है। वही तप है और वही शास्त्रका सिद्धान्तभूत मोक्ष कहलाता है। मनके विनाशमात्रसे सम्पूर्ण दुःखोंकी शान्ति हो जाती है और मनके संकल्पमात्रसे परम दुःखकी प्राप्ति होती है।
उत्पत्ति प्रकरण] * मनोनाशके उपायभूत वासना-त्यागका उपदेश तथा इसके विनाशके उपायकी जिज्ञासा * २०३
श्रीराम ! मनकी जो यह चपलता है, वह अविद्यासे उत्पन्न होनेके कारण अविद्या कही जाती है। उस अविद्याका ही दूसरा नाम वासनापद है। उसका विचारके द्वारा नाश कर देना चाहिये। विषय-चिन्तनका त्याग कर देनेसे अविद्या और वासनामयी उस चित्त-सत्ताका अन्तःकरणमें लय हो जाता है और ऐसा होनेसे परम श्रेय (मोक्ष-सुख) की प्राप्ति होती है। पौरुष-प्रयत्नके द्वारा मनको जिस वस्तुमें भी लगाया जाता है, उसीको प्राप्त होकर वह अभ्यासवश तद्रूप हो जाता है।
जो संसार-सागरके वेगमें पड़कर तृणारूपी ग्राहकी दाढ़ोंमें फँस गये हैं और भ्रमरूपी आवर्तोंद्वारा दूर बहाये जा रहे हैं, उनके वहाँसे पार जानेके लिये अपना जीता हुआ मन ही नौकारूप है। जिसने परम बन्धनकारी मनरूपी पाशके अपने (जीते हुए) मनके द्वारा ही काटकर आत्माका उद्धार नहीं कर लिया, उसे दूसरा कोई बन्धनसे नहीं छुड़ा सकता। विद्वान् पुरुषको चाहिये कि हृदयको वासित करनेवाली जो-जो वासना, जिसका दूसरा नाम मन है, उदित होती है उस-उसका परित्याग करे—उसे मिथ्या समझकर छोड़ दे। इससे (वासनात्मक मनके साथ ही) अविद्याका क्षय हो जाता है। भावनाकी भावना न करना ही वासनाका क्षय है। इसीको मनका नाश एवं अविद्याका नाश भी कहते हैं।
रघुनन्दन ! भ्रमसे दो चन्द्रमाओंकी प्रतीतिके समान यह वासना नित्य असत्य होती हुई ही सत्यके समान उठ खड़ी हुई है। इसलिये इसका त्याग कर देना ही उचित है। यहाँपर तत्त्व (अद्वितीय परब्रह्म) के सिवा न कोई सद् वस्तु है न असद् वस्तु। जैसे तरङ्ग-मालाओंसे परिपूर्ण विशाल महासागरमें जलराशिके सिवा दूसरी कोई वस्तु नहीं है (उसी तरह संसारमें ब्रह्मके सिवा दूसरा कोई भाव या अभावरूप पदार्थ नहीं है)। यदि कर्मका फल सत्य हो तो कर्म उपादेय (ग्राह्य) होना चाहिये और यदि उसका फल मिथ्या हो तो वह कर्म सर्वथा हेय (त्याज्य) ही होना चाहिये, क्योंकि सब लोग एकमात्र उपादेय वस्तुमें ही आसक्त होते हैं। चूँकि कर्मका फल मिथ्या है, अतः उसमें आसक्त न होना ही उचित है। इन्द्रजालके समान यहाँ सब कुछ मायामय और अवास्तविक है; फिर उसमें क्या आस्था हो सकती है—कैसे हेय और उपादेय दृष्टियाँ हो सकती हैं। रघुकुलतिलक श्रीराम ! संसार-वृक्षकी बीज कणिकारूप जो यह अविद्या है, इसका अस्तित्व नहीं है, तो भी यह सत्तायुक्त वस्तुकी भाँति विस्तारको प्राप्त हुई है।
यह अविद्या मनोराज्यकी भाँति केवल कल्पित आकृति-मात्रसे भासित होती है। सत्यताका इसमें सर्वथा अभाव है। यद्यपि यह सैकड़ों, हजारों शाखाओंसे युक्त जान पड़ती है, तथापि वास्तवमें कुछ भी नहीं है। यह जंगलमें प्रतीत होनेवाली मृगतृष्णाकी भाँति मिथ्या ही है, तो भी इसने व्यर्थ ही आडम्बर फैला रखा है। जैसे मृगतृष्णा उन भोले-भाले मृगोंको ही धोखेमें डालती है—मनुष्योंको नहीं, उसी प्रकार यह अविद्या अज्ञ पुरुषोंको ही धोखा देती है, विज्ञ पुरुषोंको नहीं। जैसे प्रलयकालकी आँधी भीषण रूप धारणकर धूलराशिसे व्याप्त हो बलपूर्वक तीनों लोकोंको आक्रान्त कर लेती है, उसी प्रकार अविद्या भी भयंकर आकार धारणकर विचरती है। रजोगुणके आधिक्यसे वह धूसर जान पड़ती है और हठात् लोक-लोकान्तरोंको पददलित कर देती है। जैसे आकाशमें अकारण ही नीलिमा दिखायी देती है, उसी प्रकार यह अविद्या भी किसी कारणके बिना ही प्रतीतिका विषय होती है। दो चन्द्रमाओंके भ्रमकी भाँति इसकी उत्पत्ति हुई है। यह स्वप्नके समान भ्रम उत्पन्न करती है और जैसे नौकाद्वारा यात्रा करनेवाले लोगोंको तटवर्ती ठूँठ काठमें भी गतिशीलताकी प्रतीति होती है, वैसे ही यहाँ इस अविद्याका उत्थान हुआ है।
२०४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
यह अविद्या जब चित्तको दूषित कर देती है, तब इससे व्याकुल हुए लोगोंको दीर्घकालतक संसाररूपी स्वप्नका भ्रम बना रहता है। विषयरूपी रथपर आरूढ हुई यह उद्भूत वासनारूपिणी प्रबल अविद्या मनको उसी तरह शीघ्र आक्रान्त कर लेती है, जैसे जाल पक्षीको फाँस लेता है। जैसे विवेक-बुद्धिसे विषय-बुद्धिका निरोध किया जाता है, उसी तरह प्रयत्नपूर्वक इस वासना-रूपिणी अविद्याका भी शीघ्र निरोध करना चाहिये। जैसे स्रोतोंको रोक देनेसे नदी सूख जाती है, उसी प्रकार अविद्याके निरोधसे यह मनोमयी नदी भी सूखकर नष्ट हो जाती है।
श्रीरामजी बोले—ब्रह्मन् ! यह अविद्या अविद्यमान (असत्) है, अत्यन्त तुच्छ है और मिथ्या भावनारूप है, तो भी इसने कोमलाङ्गी युवतीकी भाँति सारे जगत्को अंधा बना रक्खा है—यह बड़े आश्चर्यकी बात है। इसका न कोई रूप है न आकार। यह सुन्दर चेतनसे भी रहित है और असत् होकर भी नष्ट नहीं हो रही है। इसने सारे जगत्को अंधा बना रक्खा है, यह कैसा आश्चर्य है ! यह सदा अनन्त दुःखोंसे व्याप्त, मृतकके तुल्य और सज्ञाहीन है; तो भी इसने जगत्को अंधा बना रक्खा है, यह विचित्र बात है। काम और क्रोध ही इसके सुदृढ अङ्ग हैं। तमोगुणकी अधिकतासे यह वक्र जान पड़ती है और ज्ञानका उदय होनेपर यह शीघ्र ही शरीररहित (नष्ट) हो जाती है; तो भी इसने जगत्को अंधा बना रक्खा है, यह कैसी अद्भुत बात है। अपने आत्मस्वरूप परमात्माके विषयमें जो अंधे (मूढ़) हैं, वे ही इस अविद्याके आश्रय हैं। यह जड है, जडतासे जीर्ण-शीर्ण है और दुःखसे अत्यन्त प्रलाप करनेवाली है; तो भी इसने जगत्को अंधा बना रक्खा है, यह कितने आश्चर्यकी बात है! प्रभो ! अनन्त दुश्चेष्टारूप विलास करनेवाली, जन्म-मरण आदि सुख-दुःखका भागी बनानेवाली तथा मनरूपी गुहागृहमें बद्ध वासनावाली यह अविद्या, जिसकी कहीं समता नहीं है, किस उपायसे नष्ट होती है ?
( सर्ग ११२-११३ )
अविद्याके विनाशके हेतुभूत आत्मदर्शनका, विशुद्ध परमात्मस्वरूपका तथा असंकल्पसे वासनाक्षयका प्रतिपादन
श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—ब्रह्मन् ! अविद्याके प्रभावसे उत्पन्न हुआ जो पुरुषका गहन एवं महान् अंधापन है, उसका निवारण कैसे होता है ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! जैसे ओस या पालेकी एक कणिका सूर्यका दर्शन होनेसे क्षणभरमें नष्ट हो जाती है, उसी प्रकार परमात्माका साक्षात्कार होनेसे इस अविद्याका तत्काल नाश हो जाता है। यह अविद्या संसाररूपी पर्वतशिखरोंके तटवर्ती स्थानोंमें, जो गहन दुःखरूपी काँटोंसे सुशोभित होते हैं, अपने साथ देहाभिमानी जीवको तभीतक नीचे गिरानेके लिये आन्दोलित करती रहती है, जबतक उसका विनाश करनेवाली और मोहको क्षीण बना देनेवाली परमात्म-साक्षात्कारकी इच्छा स्वयं ही उत्पन्न नहीं हो जाती। जैसे सभी दिशाओंमें बारह सूर्योंके एक साथ उदित होनेपर छाया अपने-आप नष्ट हो जाती है, उसी प्रकार ज्ञानस्वरूप सर्वव्यापी परमात्माका साक्षात्कार होनेपर यह अविद्या स्वय ही विलीन हो जाती है। रघुनन्दन ! बाह्य विषयोंकी इच्छामात्रको यहाँ अविद्या कहा गया है (क्योंकि अविद्यासे ही इच्छा उत्पन्न होती है)। इच्छा-मात्रका नाश ही मोक्ष कहलाता है। वह मोक्ष सङ्कल्पके अभावमात्रसे सिद्ध होता है। जैसे सूर्यका उदय होनेपर रात न जाने कहाँ चली जाती है, उसी प्रकार परमात्माके
उत्पत्ति-प्रकरण ] * अविद्याके विनाशके हेतुभूत आत्मदर्शनका तथा असंकल्पसे वासनाक्षयका प्रतिपादन * २०५
यथार्थ ज्ञानका उदय होनेपर अविद्या न जाने कहाँ विलीन हो जाती है।
श्रीरामजीने पूछा-ब्रह्मन् ! यह जो कुछ भी दृश्य-प्रपञ्च है, वह (अविद्यासे उत्पन्न होनेके कारण) अविद्या ही है और वह अविद्या परमात्माके चिन्तनसे नष्ट हो जाती है। तब कृपापूर्वक यह बताइये कि वह परमात्मा कैसा है ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! जो विषयोंके संसर्गसे रहित, असाधारण और अनिर्वचनीय चेतन तत्त्व है, वह परमेश्वर ही आत्मा या परमात्मा शब्दसे कहा गया है। निष्पाप श्रीराम ! ब्रह्मासे लेकर कीट-पतंग एव पेड़-पौधों-तक जो यह तृण आदिरूप जगत् है, वह सब सदा परमात्मा ही है। यहाँ अविद्या कहीं नहीं है। यह सब नित्य चैतन्यघन अविनाशी एव अखण्ड ब्रह्म ही है। यहाँ मन नामकी कोई दूसरी कल्पना है ही नहीं। यहाँ तीनों लोकोंमें न कोई जन्म लेता है और न मरता ही है। जन्म-मरण आदि भाव-विकारोंका कहीं अस्तित्व ही नहीं है। इस संसारमें केवल—अद्वितीय एकमात्र ज्ञान-स्वरूप, समानभावसे सबमें व्यापक, अखण्ड और विषय-संसर्गसे रहित सच्चिदानन्दघन परमात्मा ही है। उस नित्य, सर्वव्यापी, शुद्ध, चैतन्यघन, सब प्रकारके उपद्रवोंसे रहित, शान्त, सर्वत्र समभावसे स्थित, निर्विकार, विज्ञान-स्वरूप परमात्मामें जो यह आवरणसहित जीवात्मा चिन्मय स्वभावसे भिन्न—जड विषयरूप जगत्की स्वय कल्पना करके दौड़ता है, वह अविद्यारूप आवरणसे मलिन हुआ चेतन जीवात्मा ही मनके रूपमें परिणत होनेके कारण 'मन' नामसे कहा गया है। जो संसार वास्तवमें कुछ नहीं है, वह एकमात्र—अद्वितीय, सर्वव्यापी, शान्तस्वरूप परमात्मामें संकल्पमात्रसे ही उत्पन्न हुआ है। अतः जैसे अग्निकी ज्वाला जिससे उत्पन्न हुई, उसी वायुसे शान्त हो जाती है, उसी तरह संकल्पसे उत्पन्न हुई यह सृष्टि संकल्पसे ही नष्ट हो जाती है। भोगाभावरूपताको प्राप्त हुई वह अविद्या एकमात्र असंकल्परूप पुरुष-प्रयत्नद्वारा लयको प्राप्त होती है।
'मैं कृश हूँ, अत्यन्त दुखी हूँ, बँधा हुआ हूँ तथा हाथ-पैर आदि अवयवोंसे युक्त हूँ' इस भावनाके अनुरूप व्यवहारसे जीवात्मा बन्धनमें पड़ता है। 'मेरा दुःखसे कोई सम्बन्ध नहीं है, यह शरीर भी मेरा नहीं है; भला, किस आत्माको बन्धन प्राप्त हुआ है—किसीको भी नहीं, आत्मा नित्य-मुक्तस्वरूप है' इस भावनाके अनुरूप व्यवहारसे जीवात्माकी मुक्ति होती है। नेत्रोंकी ही अपनी दर्शन-शक्तिका क्षय होनेपर अर्थात् अत्यन्त दूरताके कारण दर्शनशक्तिके कुण्ठित हो जानेपर जो वस्तुस्वभावसे अदर्शनरूप अन्धकार उदित हुआ है, वही आकाशकी नीलिमाके रूपमें दृष्टिगोचर होता है। यह जान लेनेपर जैसे आकाशमें कालिमा दीखनेपर भी 'यह वास्तवमें कालिमा नहीं है' ऐसी बुद्धि सुदृढ़ हो जाती है, वैसे ही अविद्यारूपी अन्धकारको भी समझना चाहिये।
जैसे स्वप्नमें 'हाय ! मैं दुःखसे नष्ट हो गया' इस संकल्पसे मनुष्य दुःखसे नष्ट-सा होने लगता है और 'मैं जाग गया हूँ' इस संकल्पसे वह स्वप्नके दुःखसे छुटकारा पाकर सुखी हो जाता है, उसी प्रकार मन विषयके संकल्पसे मूढ़ताको प्राप्त होता है और विज्ञानस्वरूप उदार परमात्माके संकल्प या चिन्तनसे वह विज्ञानमय ब्रह्मभावकी ओर अग्रसर होता है। 'मैं अज्ञानी हूँ' ऐसे संकल्पसे यह अनादि अविद्या एक क्षणमें प्रकट होती है और विस्मरण अर्थात् संकल्प-वासनाओंके मूलोच्छेदसे यह विनाशशीला अविद्या सर्वथा नष्ट हो जाती है।
जो दृश्य पहले ही नहीं था, वह आज भी नहीं है और जो यह भासित हो रहा है, वह शान्त, अद्वितीय, निर्विकार एवं निर्दोष ब्रह्म ही है। अतः कभी किसीके लिये किसी तरह और किसी भी कारणसे ब्रह्मके अतिरिक्त दूसरी कोई मननीय वस्तु नहीं है; इसलिये आदि-अन्तसे रहित निर्विकार ब्रह्ममें पूर्णतः स्थित हो जाना चाहिये।
२०६ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
उत्तम बुद्धिके द्वारा परम पुरुषार्थका आश्रय लेकर प्रयत्न-पूर्वक चित्तसे भोगाशाभावनाको जड़-मूलसहित उखाड़ फेंकना चाहिये । महान् मोह ( अज्ञान ) ही जरा और मरण आदिका कारण है । जो-जो वस्तु कार्यरूपसे प्रकट होती है, वह सब सैकड़ों आशापाशोंसे उल्लसित होने-वाली वासनाका ही विस्तार है । 'ये मेरे पुत्र हैं, मेरा धन है, यह मैं हूँ, यह मेरा घर है' इस प्रकारके इन्द्र-जालसे यह वासना ही वृद्धिको प्राप्त होती है । तत्त्वज्ञ श्रीराम ! परमात्मतत्त्वके सिवा दूसरी कोई वस्तु कभी सत्य नहीं है । अतः वास्तवमें 'मेरा' और 'मैं'—ये दोनों ही नहीं हैं । रघुनन्दन ! ज्ञानीकी दृष्टिमें अविद्या नहीं है । आकाश, पर्वत, समुद्र, पृथ्वी और नदीरूप जो यह अविद्या है, वह अज्ञानीकी ही दृष्टिमें है । ज्ञानीकी दृष्टिमें तो आकाश आदिके रूपमें ब्रह्म ही अपनी महिमामें स्थित है । अहो ! यह कितने आश्चर्यकी बात है कि जो सत्य है, उस ब्रह्मको तो लोग भूल गये हैं और जो असत्य अविद्या नामक वस्तु है, उसीका निश्चितरूपसे निरन्तर स्मरण हो रहा है !
( सर्ग ११४ )
अविद्याकी बन्धनकारितापर आश्चर्य; चेष्टा देहमें नहीं, देहीमें है—इसका प्रतिपादन तथा अज्ञानकी सात भूमिकाओंका वर्णन
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! पूज्यपाद महात्मा वसिष्ठके यों कहनेपर कमलनयन श्रीराम प्रफुल्ल पङ्कजके समान शोभा पाने लगे ।
श्रीरामजी बोले—मुनिवर ! जो अविद्या वास्तवमें है ही नहीं, उसने सबको वशमें कर लिया है—यह कैसी विचित्र बात है ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—निष्पाप रघुनन्दन ! इस संसारमें काठ और दीवालके समान जड देह कुछ भी नहीं है—वास्तवमें इसकी सत्ता नहीं है । इस चित्तने ही स्वप्नके संसारकी भाँति इसकी कल्पना कर ली है । श्रीराम ! अज्ञानी जीवात्माको ये अनन्त शारीरिक सुख-दुःख होते हैं । किंतु ज्ञानी महात्मा पुरुषको ये बिल्कुल नहीं होते ( क्योंकि वे परमात्माके यथार्थ स्वरूपको जान गये हैं ) । देह जड है, अतएव वह दुःखका अनुभव नहीं कर सकता । देहाभिमानी जीवात्मा ही अविवेक-के कारण दुखी होता है । यह अविवेक या अविचार अतिशय अज्ञानके कारण है । अज्ञान ही समस्त दुःखोंका हेतु है । एकमात्र अविवेकरूपी दोषके कारण ही जीवात्मा शुभाशुभ कर्मोंके सुख-दुःखादि फलोंका भोक्ता बना है—ठीक उसी तरह, जैसे रेशमका कीड़ा अज्ञान-वश ही रेशमके कोषमें बन्धनको प्राप्त होता है । अविवेकरूपी रोगसे बँधा हुआ, विविध वृत्तियोंसे युक्त मन नाना आकृतियोंमें विचरण करता हुआ चक्रके समान घूमता रहता है । श्रीराम ! जैसे घरका मालिक घरमें अनेक प्रकारकी चेष्टाएँ करता है, किंतु जड गृह स्वयं कुछ भी नहीं करता, उसी तरह शरीरमें जीवात्मा ही विविध चेष्टाएँ करता है, शरीर नहीं ।
श्रीरामजीने पूछा—भगवन् ! आप सम्पूर्ण तत्त्ववेत्ताओं-में श्रेष्ठ हैं । सिद्धि देनेवाली ज्ञानकी सात भूमिकाओंका स्वरूप कैसा है ? यह मुझे संक्षेपसे बताइये ।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! अज्ञानकी सात भूमिकाएँ हैं और ज्ञानकी भी सात ही भूमिकाएँ हैं । फिर गुणोंकी विचित्रतासे इन दोनोंके दूसरे-दूसरे असंख्य भेद हो जाते हैं । आत्मस्वरूपमें अनादिकालसे अज्ञानका आरोप है । उस अज्ञानकी ये सात भूमिकाएँ हैं, जिन्हें सुनो—१ बीज-जाग्रत्, २ जाग्रत्, ३ महा-जाग्रत्, ४ जाग्रत्-स्वप्न, ५ स्वप्न, ६ स्वप्नजाग्रत् और ७ सुषुप्ति । इस तरह अज्ञानके ये सात भेद हैं । ये
उत्पत्ति-प्रकरण ] * ज्ञानकी सात भूमिकाओंका विशद विवेचन * २०७
सातों भेद फिर एक दूसरेसे संयुक्त होकर अनेक नाम धारण करते हैं । अब तुम इस सप्तविध अज्ञानके लक्षण सुनो ।
महासर्गके आदिमें चिन्मय परमात्मासे जो प्रथम, नाम-निर्देशसे रहित एवं विशुद्ध व्यष्टि चेतन प्रकट होता है, वह भविष्यमें होनेवाले 'चित्त' और 'जीव' आदि संज्ञा-शब्दों तथा उनके अर्थोका भाजन होकर जाग्रत् अवस्थाके बीजरूपमें स्थित होता है; (क्योंकि वह महाप्रलयके समय भी परमात्मामें बीजरूपसे ही था) इसलिये 'बीज-जाग्रत्' कहलाता है। यह अज्ञानकी नूतन अवस्था है । अब तुम जाग्रत् संसारका वर्णन सुनो । नवजात बीज जाग्रत्के पश्चात् यह स्थूल देह मैं हूँ, यह देह, यह भोग्य पदार्थ-समूह मेरा है' ऐसी जो अपने भीतर प्रतीति होती है, उसे 'जाग्रत्' कहते हैं । 'यह देह मैं हूँ' 'यह भोग्य-समूह मेरा है' इस जाग्रत् प्रतीतिका उत्पन्न होनेके पश्चात् जन्मान्तरके अभ्याससे दृढ़ हुई जो प्रतीति स्फुरित होती है, उसे 'महाजाग्रत्' कहा गया है।* जाग्रत्-पुरुषका अदृढ़ या दृढ़ जो सर्वथा तन्मयात्मक (जाग्रत्के ही तुल्य) मनोराज्य है, उसीको 'जाग्रत् स्वप्न' कहते हैं। दो चन्द्रमाओंका दर्शन, सीपीमें चाँदीकी प्रतीति और मृगतृष्णा (मरुस्थलमें बिना हुए जलकी प्रतीति) आदि भेदकी तरह अभ्यासवश जाग्रत्भावको प्राप्त स्वप्न-मनोराज्य अनेक प्रकारका होता है । 'उसे मैंने थोड़े ही समयतक देखा, वह सत्य भी नहीं है' नींदके समय (सुषुप्ति-कालके आदि या अन्तमें) अनुभवमें आयी हुई बातोंके विषयमें नींदके अन्तमें जो ऐसी प्रतीति होती है, उसे 'स्वप्न' कहा गया है। वह स्वप्न अज्ञ पुरुषकी महाजाग्रत् अवस्थामें स्थित स्थूल शरीरके कण्ठसे लेकर हृदयपर्यन्त नाड़ी-प्रदेशमें प्रकट होता है । चिरकालतक दर्शनके अभावसे जो विकसित नहीं हुआ, वह महाशरीरवाला दृढ़ अभिमान ही स्वप्न है । सुदृढ़ अभिनिवेशसे या चिरस्थायित्वकी कल्पनासे पुष्ट हो जाग्रत्भावको प्राप्त हुआ स्वप्न महाजाग्रत्की समता प्राप्त कर लेता है । इस अवस्थाको प्राप्त हुआ स्वप्न 'स्वप्न-जाग्रत्' माना गया है । पूर्वोक्त छहों अवस्थाओंका परित्याग करनेपर जो जीवकी जड़ अवस्था है, वही भावी दुःखोंका बोध करानेवाले बीजरूप अज्ञानसे सम्पन्न 'सुषुप्ति' कही जाती है । रघुनन्दन ! इस प्रकार सात प्रकारकी अज्ञान-भूमिकाका मैंने वर्णन किया । यह नाना प्रकारके विकारों तथा लोकान्तरोंके भेदोंसे युक्त होनेके कारण निन्द्य एवं त्याज्य बतायी गयी है ।
( सर्ग ११५--११७ )
ज्ञानकी सात भूमिकाओंका विशद विवेचन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—निष्पाप रघुनन्दन ! अब मैं सात प्रकारकी ज्ञानभूमिकाका वर्णन करता हूँ, इसे सुनो । पहली ज्ञानभूमिका शुभेच्छा बतायी गयी है, दूसरी विचारणा, तीसरी तनुमानसा, चौथी सत्त्वापत्ति, पाँचवीं असंसक्ति, छठी पदार्थाभावना और सातवीं तुर्या—इस प्रकार ये ज्ञानकी सात भूमिकाएँ मानी गयी हैं ।
स्थितः किं मूढ एवास्मि प्रेक्ष्येऽहं शास्त्रसज्जनैः ।
वैराग्यपूर्वमिच्छेति शुभेच्छेत्युच्यते बुधैः ॥
'मैं मूढ होकर ही क्यों स्थित रहूँ, मैं शास्त्रों और सत्पुरुषोंके द्वारा जानकर तत्त्वका साक्षात्कार करूँगा—
* जैसे ब्राह्मण आदि जातियोंमें उत्पन्न हुए लोगोंमेंसे किसी-किसी व्यक्तिका जन्मान्तरके अभ्याससे अपने वर्णोचित कर्मोंमें विशेष आग्रह और नैपुण्य देखा जाता है, सबमें ऐसी बात नहीं पायी जाती; अतः इस जन्मके या जन्मान्तरके दृढ़ अभ्याससे दृढ़ताको प्राप्त हुई जो पूर्वोक्त जाग्रत् प्रतीति है, उसीको महाजाग्रत् कहा गया है ।
| २०८ | * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * | [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ |
|---|
| इस प्रकार वैराग्यपूर्वक केवल मोक्षकी इच्छा होनेको ज्ञानीजनोंने 'शुभेच्छा' कहा है।'*<br><br>शास्त्रसज्जनसम्पर्कवैराग्याभ्यासपूर्वकम् ।<br>सदाचारप्रवृत्तिर्या प्रोच्यते सा विचारणा ॥ | 'शास्त्रोंके अध्ययन, मनन और सत्पुरुषोंके सङ्गतथा विवेक-वैराग्यके अभ्यासपूर्वक सदाचारमें प्रवृत्त होना--<br><br>यह 'विचारणा' नामकी भूमिका कही जाती हैं।' † |
|---|
* अभिप्राय यह कि समस्त (पापमय) अशुभ इच्छाओंका अर्थात् चोरी, व्यभिचार, झूठ, कपट, छल, बलात्कार, हिंसा, अभक्ष्य-भोजन, दुर्व्यसन और प्रमाद (व्यर्थ चेष्टा) आदि शास्त्र-निषिद्ध कर्मोंका मन, वाणी और शरीरसे त्याग करना; नाशवान्, क्षणभङ्गुर, स्त्री-पुत्र और धन आदि प्रिय वस्तुओंकी प्राप्तिके उद्देश्यसे तथा रोग-संकटादिकी निवृत्तिके उद्देश्यसे किये जानेवाले यज्ञ, दान, तप और उपासनादि काम्यकर्मोंको अपने स्वार्थके लिये न करना; मान, बड़ाई, प्रतिष्ठा एवं स्त्री, पुत्र और धनादि जो कुछ भी अनित्य पदार्थ प्रारब्धके अनुसार प्राप्त हुए हों, उनके बढ़नेकी इच्छाका त्याग करना; अपने सुखके लिये किसीसे भी धनादि पदार्थोंकी अथवा सेवा करनेकी याचना न करना और बिना याचनाके दिये हुए पदार्थोंको या की हुई सेवाको स्वीकार न करना तथा किसी प्रकार भी किसीसे अपना स्वार्थ सिद्ध करनेकी मनमें इच्छा न रखना; ईश्वरकी भक्ति, देवताओंका पूजन, माता-पितादि गुरुजनोंकी सेवा, यज्ञ, दान, तप तथा वर्णाश्रमके अनुसार जीविकाद्वारा गृहस्थका निर्वाह और शरीर-सम्बन्धी खान-पान आदि सम्पूर्ण कर्तव्यकर्मोंमें आलस्यका तथा सब प्रकारकी सांसारिक कामनाका त्याग करना एवं 'प्रज्ञानं ब्रह्म' (ऐतरेय-उप० १।३)—ब्रह्म विज्ञानघन है, 'अयमात्मा ब्रह्म' (माण्डूक्य उप०)—यह आत्मा ही परब्रह्म परमात्मा है, तत्त्वमसि, (छान्दोग्य उप० ६।१२। ३)—वह सच्चिदानन्दघन ब्रह्म तू ही है और 'अहं ब्रह्मास्मि' (बृहदा० उप० १।४।१०)—मैं देह नहीं हूँ, ब्रह्म हूँ—इन वेदान्त-वाक्योंका एकमात्र परमात्माके तत्त्व-रहस्य-ज्ञानपूर्वक उनको प्राप्त करनेकी इच्छासे सत्-शास्त्रोंमें अध्ययन करना और सत्पुरुषोंका सङ्ग करके उनसे इन महावाक्योंका श्रवण करना ही 'शुभेच्छा' नामकी प्रथम भूमिका है। इसलिये इस भूमिकाको 'श्रवण'-भूमिका भी कहा जा सकता है।
† उपर्युक्त प्रकारसे सत्पुरुषोंके सङ्ग, सेवा एवं आज्ञा-पालनसे, सत्-शास्त्रोंके अध्ययन-मननसे तथा दैवी सम्पदारूप सद्गुण-सदाचारके सेवनसे उत्पन्न हुआ विवेक (विवेचन) ही 'विचारणा' है। भाव यह कि सत्-असत् और नित्य-अनित्य वस्तुके विवेचनका नाम 'विवेक' है। विवेक इनको भलीभाँति पृथक् कर देता है। सब अवस्थाओंमें और प्रत्येक वस्तुमें प्रतिक्षण आत्मा और अनात्माका विश्लेषण करते-करते यह विवेक सिद्ध होता है।
जिसका कभी नाश न हो, वह 'सत्' है और जिसका नाश होता है, वह असत्' है। भगवान्ने कहा है—
नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः। उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः ॥
( गीता २ । १६ )
'असत् वस्तुकी तो सत्ता नहीं है और सत्का अभाव नहीं है। इस प्रकार इन दोनोंका ही तत्त्व तत्त्वज्ञानी पुरुषों-द्वारा देखा गया है।'
इस नियमके अनुसार जो दृश्य जड़ पदार्थ हैं, वे उत्पत्ति-विनाशशील होनेके कारण असत् हैं और परमात्मा ही एक सत् पदार्थ है। जीवात्मा भी उसका अंश होनेके कारण सत् है। अद्वैत सिद्धान्तके अनुसार जीवात्मा और परमात्मा वस्तुतः एक ही हैं, मायाकी उपाधिके सम्बन्धसे उनका भेद प्रतीत होता है। जैसे महाकाशके एक होते हुए भी घड़ेकी उपाधिके सम्बन्धसे घटाकाश और महाकाश अलग-अलग प्रतीत होते हैं, वस्तुतः घटाकाश, महाकाश एक ही हैं, उसी प्रकार जीवात्मा, परमात्मा वास्तवमें एक ही हैं—इस तत्त्वको समझ लेना 'विवेक' है।
उपर्युक्त विवेकके द्वारा जब सत्-असत् और नित्य-अनित्यका पृथक्करण हो जाता है, तब असत् और अनित्यसे आसक्ति हट जाती है, एवं इस लोक और परलोकके सम्पूर्ण पदार्थोंमें और कर्मोंमें कामना और आसक्तिका न रहना ही 'वैराग्य' है। महर्षि पतञ्जलिने कहा है—
दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम् ।
( योगदर्शन १ । १५ )
उत्पत्ति-प्रकरण ] * ज्ञानकी सात भूमिकाओंका विशद विवेचन * [ २०९
विचारणाशुभेच्छाभ्यामिन्द्रियार्थेष्वसक्तता ।
याऽसा सा तनुताभावात् प्रोच्यते तनुमानसा ॥
'उपर्युक्त शुभेच्छा और विचारणाके द्वारा इन्द्रियोंके विषयभोगोंमें आसक्तिका अभाव होना और अनासक्त हो संसारमें विचरण करना—यह 'तनुमानसा' है। इसमें मन शुद्ध होकर सूक्ष्मताको प्राप्त हो
'स्त्री, धन, भवन, मान, बड़ाई आदि इस लोकके और स्वर्गादि परलोकके सम्पूर्ण विषयोंमें तृष्णारहित हुए चित्तकी जो वशीकार-अवस्था होती है, उसका नाम 'वैराग्य' है।'
समस्त इन्द्रियों और विषयोंके सङ्गसे उत्पन्न होनेवाले जितने भी भोग हैं, वे सब अनित्य हैं, किंतु अज्ञानसे अनित्यमें नित्य-बुद्धि होनेके कारण विषयभोगादि नित्य प्रतीत होते हैं। इसलिये उनको अनित्य मानकर उनसे वैराग्य करना चाहिये। गीतामें भगवान् कहते हैं—
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः । आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥ (२।१४)
'हे कुन्तीपुत्र ! सर्दी-गरमी और सुख-दुःखको देनेवाले इन्द्रिय और विषयोंके संयोग तो उत्पत्ति-विनाशशील और अनित्य हैं, इसलिये हे भारत ! उनको तू सहन कर।'
य हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ । समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥ (गीता २।१५)
'क्योंकि हे पुरुषश्रेष्ठ ! दुःख-सुखको समान समझनेवाले जिस धीर पुरुषको ये इन्द्रिय और विषयोंके संयोग व्याकुल नहीं कर सकते, वह मोक्षके योग्य होता है।'
अतः वैराग्यवान् पुरुषके लिये संसारके विषयभोगोंको अनित्य और दुःखरूप समझकर उनमें आसक्तिरहित होना परम आवश्यक है, यों समझकर ही विवेकी मनुष्य उनमें नहीं रमते। भगवान्ने कहा है—
ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते । आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ॥
(गीता ५।२२)
'जो ये इन्द्रिय और विषयोंके संयोगसे उत्पन्न होनेवाले सब भोग हैं, वे यद्यपि विषयी पुरुषोंको सुखरूप भासते हैं, तो भी दुःखके ही हेतु हैं और आदि-अन्तवाले अर्थात् अनित्य हैं; इसलिये हे अर्जुन ! बुद्धिमान्—विवेकी पुरुष उनमें नहीं रमता।'
इस प्रकार विवेक-वैराग्य हो जानेपर साधकका चित्त निर्मल हो जाता है; उसमें क्षमा, सरलता, पवित्रता तथा प्रिय-अप्रियकी प्राप्तिमें समता आदि गुण आने लगते हैं, उसके मन, इन्द्रिय और शरीर विषयोंसे हटकर वशमें हो जाते हैं। फिर उसे गङ्गातट, तीर्थस्थान, गिरि-गुहा, वन आदि एकान्तदेशका सेवन ही अच्छा लगता है; उसके ममता, राग द्वेष, विक्षेप और मान-बड़ाईकी इच्छाका अभाव-सा हो जाता है; विषयभोगोंसे स्वाभाविक ही उपरति हो जाती है एवं विवेक-वैराग्यके प्रभावसे वह नित्य परमात्माके स्वरूपके चिन्तनमें ही लगा रहता है।
भगवान्ने गीतामें ज्ञानके साधन बतलाते हुए कहा है—
अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् । आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ॥
इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च । जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् ॥
असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु । नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु ॥
मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी । विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि ॥
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् । एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा ॥
(१३।७-११)
श्रेष्ठताके अभिमानका अभाव, दम्भाचरणका अभाव, किसी भी प्राणीको किसी प्रकार भी न सताना, क्षमाभाव, मन-वाणी आदिकी सरलता, श्रद्धा-भक्तिसहित गुरुकी सेवा, बाहर-भीतरकी शुद्धि, अन्तःकरणकी स्थिरता और मन-इन्द्रियोंसहित शरीरका निग्रह, इस लोक और परलोकके सम्पूर्ण भोगोंमें आसक्तिका अभाव और अहङ्कारका भी अभाव; जन्म, मृत्यु,
२१० * अविच्छिन्नमचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ ]
जाता है; इसलिये इसे 'तनुमानसा' कहते हैं।*
| भूमिकात्रितयाभ्यासाच्चित्तेऽर्थे विरतेर्वशात्।<br>सत्यात्मनि स्थितिः शुद्धे सत्त्वापत्तिरुदाहृताः ॥ | 'ऊपर बतायी हुई शुभेच्छा—श्रवण, विचारणा—मनन और तनुमानसा—निदिध्यासन भूमिकाओंके अभ्याससे चित्तके सांसारिक विषयोंसे अत्यन्त विरक्त हो जानेके |
जरा और रोग आदिरूपमें दुःख और दोषोंका बार-बार विचार करना; पुत्र, स्त्री, घर और धन आदिमें आसक्तिका अभाव; ममताका न होना तथा प्रिय और अप्रियकी प्राप्तिमें सदा ही चित्तका सम रहना; मुझ परमेश्वरमें अनन्य योगके द्वारा अव्यभिचारिणी भक्ति तथा एकान्त और शुद्धदेशमें रहनेका स्वभाव और विषयासक्त मनुष्योंके समुदायमें प्रेमका न होना, अध्यात्मज्ञानमें नित्य-स्थिति और तत्त्वज्ञानके अर्थरूप परमात्माको ही देखना—यह सब ज्ञान है और जो इससे विपरीत है, वह अज्ञान है—यों कहा गया है।
दूसरी भूमिकामें परिपक्व हो जानेपर उस साधकमें उपर्युक्त गुण और आचरण आने लगते हैं।
ऊपर प्रथम भूमिकामें बताये हुए महावाक्योंका निरन्तर मनन और चिन्तन करना ही प्रधान होनेके कारण इस दूसरी भूमिकाको 'विचारणा' कहा गया है, अतः इसे 'मनन' भूमिका भी कहा जा सकता है।
* अभिप्राय यह है कि उपर्युक्त कामना, आसक्ति और ममताके अभावसे, सत्पुरुषोंके सङ्ग और सत्-शास्त्रोंके अभ्याससे तथा विवेक-वैराग्यपूर्वक निदिध्यासन—ध्यानके साधनसे साधककी बुद्धि तीक्ष्ण हो जाती है तथा उसका मन शुद्ध, निर्मल, सूक्ष्म और एकाग्र हो जाता है, जिससे उसे सूक्ष्मातिसूक्ष्म परमात्मतत्त्वको ग्रहण करनेकी योग्यता अनायास ही प्राप्त हो जाती है। इसीको 'तनुमानसा' भूमिका कहा गया है।
इस तीसरी भूमिकामें स्थित साधकके अन्तःकरणमें सम्पूर्ण अवगुणोंका अभाव होकर स्वाभाविक ही अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, अनसूया (दोषदृष्टिका अभाव), अमानिता, निष्कपटता, पवित्रता, संतोष, शम, दम, समाधान तेज, क्षमा, दया, धैर्य, अद्रोह, निर्भयता, निरहंकारता, शान्ति, समता आदि सद्गुणोंका आविर्भाव हो जाता है। फिर उसके द्वारा जो भी चेष्टा होती है, वह सब सदाचाररूप ही होती है तथा उस साधकको 'संसारके सम्पूर्ण पदार्थ मायाके कार्य होनेसे सर्वथा अनित्य हैं और एक सच्चिदानन्दघन परमात्मा ही सर्वत्र समभावसे परिपूर्ण हैं' ऐसा दृढ़ निश्चय होकर शरीरसहित संसारके सम्पूर्ण पदार्थों और कर्मोंमें उसकी वासनाका भी अभाव हो जाता है। भाव यह है कि उसके अन्तःकरणमें उनके चित्र संस्काररूपसे भी नहीं रहते एवं शरीरमें अहम्भाव तथा मन, वाणी और शरीरद्वारा होनेवाले सम्पूर्ण कर्मोंमें कर्तापनका अभिमान नहीं रहता; क्योंकि वह परवैराग्यको प्राप्त हो जाता है। परवैराग्यका स्वरूप महर्षि पतञ्जलिने यों बतलाया है—
तत्परं पुरुषख्यातेर्गुणवैतृष्ण्यम् । (योगदर्शन १।१६)
'प्रकृतिसे अत्यन्त विलक्षण पुरुषके ज्ञानसे तीनों गुणोंमें जो तृष्णाका अत्यन्त अभाव हो जाता है, यह परवैराग्य या सर्वोत्तम वैराग्य है।'
पूर्वोक्त दूसरी भूमिकामें स्थित पुरुषकी तो विषयोंका विशेष संसर्ग होनेसे कदाचित् उनमें कुछ आसक्ति हो भी सकती है; परंतु इस तीसरी भूमिकामें पहुँचे हुए पुरुषकी तो विषयोंके साथ संसर्ग होनेपर भी उनमें आसक्ति नहीं होती; क्योंकि उसके निश्चयमें एक सच्चिदानन्दघन परमात्माके सिवा अन्य कोई वस्तु रहती ही नहीं। अतः परवैराग्य हो जानेके कारण उसके अन्तःकरणकी वृत्तियाँ सम्पूर्ण संसारसे अत्यन्त उपरत हो जाती हैं। यदि किसी कालमें कोई स्फुरणा हो भी जाती है, तो भी उसके संस्कार नहीं जमते; क्योंकि उसकी एक सच्चिदानन्दघन परमात्माके स्वरूपमें ही निरन्तर गाढ़ स्थिति बनी रहती है, जिसके कारण उसे कभी-कभी तो शरीर और संसारका विस्मरण होकर समाधि-सी हो जाती है। ये सब लक्षण परमात्माकी प्राप्तिके अत्यन्त निकट पहुँच जानेपर होते हैं।
सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्माका चिन्तन करते-करते उस परमात्मामें तन्मय हो जाना तथा अत्यन्त वैराग्य और उपरतिके कारण परमात्माके ध्यानमें ही नित्य स्थित रहनेसे मनका विशुद्ध होकर सूक्ष्म हो जाना ही 'तनुमानसा' नामकी
उत्पत्ति-प्रकरण ] * ज्ञानकी सात भूमिकाओंका विशद् विवेचन * २११
अनन्तर उसके प्रभावसे आत्माका शुद्ध तथा सत्यस्वरूप परमात्मामें तद्रूप हो जाना 'सत्त्वापत्ति' कहा गया है।'* तीसरी भूमिका है। अतः इसे 'निदिध्यासन' भूमिका भी कह सकते हैं।
ये तीनों भूमिकाएँ साधनरूपा हैं। इनमें संसारसे कुछ सम्बन्ध रहता है, अतः यहाँतक साधककी 'जाग्रत्-अवस्था' मानी गयी है।
* उपर्युक्त श्रवण, मनन और निदिध्यासनके तीव्र अभ्याससे जब साधक सच्चिदानन्दघन परमात्माको प्राप्त हो जाता है, तब उसीको 'सत्त्वापत्ति' नामकी चौथी भूमिका कहते हैं। इसीको गीतामें निर्वाण ब्रह्मकी प्राप्ति कहा गया है—
योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः। स योगी ब्रह्म निर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति॥
(५। २४)
'जो पुरुष आत्मामें ही सुखी है, आत्मामें ही रमण करता है तथा जो आत्मामें ही ज्ञानवान् है, वह सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्माके साथ एकीभावको प्राप्त—'मैं ही ब्रह्म हूँ' इस प्रकार अनुभव करनेवाला ज्ञानयोगी शान्त ब्रह्मको प्राप्त होता है।'
जिस प्रकार गङ्गा-यमुना आदि सारी नदियाँ बहती हुईं अपने नाम-रूपको छोड़कर समुद्रमें ही विलीन हो जाती हैं, उसी प्रकार ज्ञानी महात्मा नाम-रूपसे रहित होकर परम दिव्य पुरुष परात्पर परमात्माको ही प्राप्त हो जाता है, उसीमें विलीन हो जाता है—
यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रेऽस्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय। तथा विद्वान् नामरूपाद् विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम्॥
(मुण्डकोपनिषद् ३।२।८)
गीतामें भगवान् श्रीकृष्णने कहा है—
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति। समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्॥
भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः। ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्॥
(१८। ५४-५५)
'मैं ही ब्रह्म हूँ' इस प्रकारके अनुभवसे सच्चिदानन्दघन ब्रह्ममें एकीभावसे स्थित प्रसन्न मनवाला ज्ञानयोगी न तो किसीके लिये शोक करता है और न किसीकी आकाङ्क्षा ही करता है। ऐसा समस्त प्राणियोंमें समभाववाला योगी मेरी पराभक्ति (ज्ञान-निष्ठा) को प्राप्त हो जाता है। उस ज्ञाननिष्ठारूप पराभक्तिके द्वारा वह मुझ परमात्माको मैं जो हूँ और जितना हूँ, ठीक वैसा-का-वैसा तत्त्वसे जान लेता है तथा उस ज्ञान-निष्ठासे मुझको तत्त्वसे जानकर तत्काल ही मुझमें प्रविष्ट हो जाता है।'
जब साधकको परब्रह्मका यथार्थ ज्ञान हो जाता है, तब वह ब्रह्म ही हो जाता है—
स यो ह वै तत् परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति। (मुण्डकोपनिषद् ३।२।९)
फिर उसका इस शरीर और संसारसे कुछ भी सम्बन्ध नहीं रहता। ब्रह्मवेत्ता पुरुषके अन्तःकरणमें शरीर और अन्तःकरणके सहित यह संसार स्वप्नवत् प्रतीत होता है जैसे स्वप्नसे जगा हुआ पुरुष स्वप्नकी घटनाको मनकी कल्पनामात्र समझता है, वैसे ही उस ब्रह्मवेत्ताके अन्तःकरणमें यह संसार कल्पनामात्र प्रतीत होता है अर्थात् इस संसारकी काल्पनिक सत्ता प्रतीत होती है। स्वप्नमें और इसमें इतना ही अन्तर है कि स्वप्नका समय तो भूतकाल है और संसारकी स्वप्नवत् प्रतीतिका समय वर्तमानकाल है, तथा स्वप्नमें तो जो मन-बुद्धि थे, वे वर्तमानमें भी इस जीवात्माके साथ सम्बन्धित हैं किंतु जब मनुष्य ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है, तब उसके मन-बुद्धि इस शरीरमें ही रह जाते हैं, उस ब्रह्मवेत्ताके साथ ब्रह्ममें सम्बन्धित नहीं होते, इसलिये ब्रह्मकी दृष्टिसे इस संसारका अत्यन्त अभाव है।
वास्तवमें तो ब्रह्मके कोई दृष्टि ही नहीं है, केवल समझानेके लिये उसमें दृष्टिका आरोप किया जाता है। ब्रह्मकी दृष्टिमें तो केवल एक ब्रह्म ही है; उसके सिवा अन्य कुछ भी नहीं। ब्रह्मवेत्ताके शरीरका जो अन्तःकरण है, उसमें इस संसारका अत्यन्त अभाव और सच्चिदानन्दघन ब्रह्मका भाव प्रत्यक्ष है—यह ब्रह्मवेत्ताका अनुभव है। इसी अनुभवके बलपर शास्त्रोंमें यह कहा गया है कि एक सच्चिदानन्दघन ब्रह्मके सिवा अन्य कुछ भी नहीं है।
२१२ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
जो ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है, वह ब्रह्म ही बन जाता है। श्रुतिमें भी कहा गया है—'ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति' ( बृहदारण्यक० ४ । ४ । ६ )—'वह ब्रह्म ही होकर ब्रह्मको प्राप्त होता है।' इसलिये वह लौटकर नहीं आता। श्रुति कहती है— न च पुनरावर्तते । न च पुनरावर्तते । ( छान्दोग्य० ८ । १५ । १ ) 'फिर वह कभी नहीं लौटता, फिर वह कभी नहीं लौटता।' जब ब्रह्मकी दृष्टिमें सृष्टिका अत्यन्त अभाव है, तब ब्रह्म ही हो जानेपर लौटकर कौन कैसे कहाँ आये। गीतामें भी बतलाया गया है— तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः । गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः ॥ 'जिनका मन तद्रूप हो रहा है, जिनकी बुद्धि तद्रूप हो रही है और सच्चिदानन्दघन परमात्मामें ही जिनकी निरन्तर एकीभावसे स्थिति है, ऐसे तत्परायण पुरुष ज्ञानके द्वारा पापरहित होकर अपुनरावृत्तिको अर्थात् पुनः न लौटनेवाली परमगतिको प्राप्त होते हैं।'
भाव यह कि उसका मन तद्रूप—ब्रह्मरूप हो जाता है। पूर्ण आनन्द, अपार आनन्द, शान्त आनन्द, घन आनन्द, अचल आनन्द, ध्रुव आनन्द, नित्य आनन्द, बोधस्वरूप आनन्द, ज्ञानस्वरूप आनन्द, परम आनन्द, महान् आनन्द, एक आनन्द-ही-आनन्द परिपूर्ण है; एक आनन्दके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है—इस प्रकार ब्रह्मके स्वरूपका मनन करते-करते जब मन तन्मय—ब्रह्ममय हो जाता है, तब उसको 'तदात्मा' कहते हैं।
उपर्युक्त प्रकारके विशेषणोंसे विभूषित ब्रह्मका मनन करते-करते जब मन ब्रह्ममें विलीन हो जाता है और उन विशेषणों-की आवृत्तिके प्रभावसे ब्रह्मके विशेष स्वरूपका बुद्धिमें अनुभव हो जाता है, तब बुद्धिके द्वारा अनुमान किये हुए उस ब्रह्मके विशेष स्वरूपको लक्ष्य बनाकर जीवात्मा उस ब्रह्मका ध्यान करता है। यहाँ ब्रह्म तो ध्येय है, ध्यान करनेवाला साधक ध्याता है और बुद्धिकी वृत्ति ही ध्यान है। इस प्रकार ध्यान करते-करते जब बुद्धि उस ब्रह्ममें विलीन हो जाती है, तब उसे 'तद्बुद्धि' कहते हैं। इसके पश्चात् जब ध्याता, ध्यान और ध्येयरूप त्रिपुटी न रहकर साधककी ब्रह्मके स्वरूपमें अभिन्न स्थिति हो जाती है, तब उसे 'तन्निष्ठ' कहते हैं। इसमें ब्रह्मका नाम, रूप और ज्ञान रहता है; इसलिये यह प्रारम्भिक 'सविकल्प समाधि' है। इसीको सवितर्क सम्प्रज्ञात समाधि कहते हैं। महर्षि पतञ्जलिने बतलाया है— तत्र शब्दार्थज्ञानविकल्पैः संकीर्णा सवितर्का समापत्तिः। ( योगदर्शन १ । ४२ ) 'उसमें शब्द, अर्थ और ज्ञान—इन तीनोंके विकल्पोंसे मिली हुई समाधि सवितर्क है।'
इस प्रकार सविकल्प समाधि होनेके बाद जब स्वतः ही साधककी निर्विकल्प समाधि हो जाती है, तब ब्रह्मका नाम ( शब्द ), रूप ( अर्थ ) और ज्ञान—ये तीनों विकल्प भिन्न-भिन्न नहीं रह जाते, एक अर्थमात्र वस्तु—ब्रह्मका स्वरूप ही रह जाता है। इसीको निर्वितर्क सम्प्रज्ञात समाधि कहते हैं। महर्षि पतञ्जलिने कहा है— स्मृतिपरिशुद्धौ स्वरूपशून्येवार्थमात्रनिर्भासा निर्वितर्का। ( योगदर्शन १ । ४३ ) '( शब्द और प्रतीतिकी ) स्मृतिके भलीभाँति लुप्त हो जानेपर अपने रूपसे शून्य हुईके सदृश केवल ध्येयमात्रके स्वरूपको प्रत्यक्ष करानेवाली ( अन्तःकरणकी स्थिति ही ) निर्वितर्क समाधि है।'
इसमें साधक स्वयं ब्रह्मस्वरूप ही बन जाता है। अतः उसको 'तत्परायण' कहते हैं। इस निर्विकल्प समाधिका फल जो निर्बीज असम्प्रज्ञात योग है, वही वास्तवमें ब्रह्मकी प्राप्ति है; उसीको यहाँ गीतामें अपुनरावृत्ति कहा गया है। क्योंकि ब्रह्मज्ञानके द्वारा जिसके मल, विक्षेप और आवरणरूप कल्मषका नाश हो गया है, वह ब्रह्मको प्राप्त पुरुष ब्रह्म ही हो जाता है; वह लौटकर नहीं आता।
यही 'सत्त्वापत्ति' नामकी चौथी भूमिका है। इसमें पहुँचे हुए पुरुषको ब्रह्मवित्—ब्रह्मवेत्ता कहा जाता है। इसमें संसार उस ज्ञानी महात्माके अन्तःकरणमें स्वप्नवत् भासित होता है, इसलिये यह उसके अन्तःकरणकी 'स्वप्नावस्था' मानी जाती है।
श्रीयाज्ञवल्क्यजी, राजा अश्वपति और जनक आदि इस चौथी भूमिकामें पहुँचे हुए माने गये हैं।
यहाँ योगवासिष्ठमें जिस प्रकार ब्रह्मको प्राप्त पुरुषकी चौथी, पाँचवीं, छठी, सातवीं भूमिकाके रूपमें चार भेद बतलाये गये हैं, इस प्रकारके भेद गीता, रामायण, भागवत आदि ग्रन्थोंमें नहीं पाये जाते।
उत्पत्ति-प्रकरण ] * ज्ञानकी सात भूमिकाओंका विशद् विवेचन * २१३
दशाचतुष्टयाभ्यासादसंसङ्गफलेन च।
रूढसत्त्वचमत्कारात् प्रोक्तासंसक्तिनामिका ॥
'शुभेच्छा, विचारणा, तनुमानसा, सत्त्वापत्ति—इन चारोंके सिद्ध हो जानेपर स्वाभाविक अभ्याससे चित्तके बाह्याभ्यन्तर सभी विषय-संस्कारोंसे अत्यन्त असङ्ग (सम्बन्ध-विच्छेद) हो जानेपर अन्तःकरणका समाधिमें आरूढ—स्थिर हो जाना ही 'असंसक्ति' नामकी पाँचवीं भूमिका कहा गया है।' *
भूमिकापञ्चकाभ्यासात् स्वात्मारामतया दृढम्।
आभ्यन्तराणां बाह्यानां पदार्थानामभावनात् ॥
परप्रयुक्तेन चिरं प्रयत्नेनार्थभावनात् ।
पदार्थाभावनामाख्या षष्ठी संजायते गतिः ॥
'उपर्युक्त पाँचों भूमिकाओंके सिद्ध हो जानेपर स्वाभाविक अभ्याससे उस ज्ञानी महात्माकी आत्मारामताके प्रभावसे उसके अन्तःकरणमें संसारके पदार्थोंका अत्यन्त अभाव-सा हो जाता है, जिससे उसे बाहर-भीतरके किसी भी पदार्थका स्वयं भान नहीं होता, दूसरोंके द्वारा प्रयत्नपूर्वक चिरकालतक प्रेरणा करनेपर ही कभी किसी पदार्थका भान होता है; इसलिये उसके अन्तःकरणकी
परमात्माको प्राप्त पुरुषके लक्षण तो गीतामें जगह-जगह आते हैं, किंतु उसके इस प्रकारके अलग-अलग भेद नहीं बताये गये हैं। वास्तवमें ब्रह्मकी प्राप्ति होनेके पश्चात् ज्ञानी महात्मा पुरुषका शरीरसे कोई सम्बन्ध नहीं रहता, क्योंकि वह देहाभिमानसे सर्वथा रहित होकर ब्रह्ममें तल्लीन हो जाता है। अतः यहाँ योगवासिष्ठमें बतलाये गये उन भेदोंको ब्रह्मप्राप्त पुरुषके भेद न समझकर उसके अन्तःकरणके भेद समझने चाहिये।
* परम वैराग्य और परम उपरतिके कारण उस ब्रह्मप्राप्त ज्ञानी महात्माका इस संसार और शरीरसे अत्यन्त सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है, इसलिये इस पाँचवीं भूमिकाको असंसक्ति कहा गया है।
ऐसे पुरुषका संसारसे कोई भी प्रयोजन नहीं रहता। अतः वह कर्म करने या न करनेके लिये बाध्य नहीं है। गीतामें भगवान्ने कहा है—
नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन । न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः ॥
( ३ । १८ )
'उस महापुरुषका इस विश्वमें न तो कर्म करनेसे कोई प्रयोजन रहता है और न कर्मोंके न करनेमें ही कोई प्रयोजन रहता है तथा सम्पूर्ण प्राणियोंमें भी इसका किंचिन्मात्र भी स्वार्थका सम्बन्ध नहीं रहता।'
फिर भी उस ज्ञानी महात्मा पुरुषके सम्पूर्ण कर्म शास्त्रसम्मत और कामना एव संकल्पसे शून्य होते हैं। इस प्रकार जिसके समस्त कर्म ज्ञानरूप अग्निके द्वारा भस्म हो गये हैं, उस महापुरुषको ज्ञानीजन भी पण्डित कहते हैं—
यस्य सर्वे समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः । ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः ॥
( गीता ४ । १९ )
अतः ऐसे पुरुषको उसके सम्मानके लिये 'ब्रह्मविद्वर' कहा जा सकता है। ऐसा महापुरुष जब समाधि-अवस्थामें रहता है, तब तो उसे सुषुप्ति अवस्थाकी भाँति संसारका बिल्कुल भान नहीं रहता और व्युत्थान अवस्थामें—व्यवहार-कालमें उसके द्वारा पूर्वके अभ्याससे सत्ता, आसक्ति, कामना, संकल्प और कर्तृत्वाभिमानके बिना ही सारे कर्म होते रहते हैं। उसके द्वारा जो भी कर्म होते हैं, वे शास्त्रविहित ही होते हैं। उसकी कभी समाधि-अवस्था रहती है और कभी व्युत्थानावस्था, उसकी किसी दूसरेके प्रयत्नके बिना स्वतः ही व्युत्थानावस्था हो जाती है। किंतु वास्तवमें संसारके अभावका निश्चय होनेके कारण उसकी व्युत्थानावस्था भी समाधिके तुल्य ही होती है, इस कारण उसकी इस अवस्थाको 'सुषुप्ति-अवस्था' भी कहते हैं।
श्रीजडभरतजी इस पाँचवीं भूमिकामें स्थित माने जा सकते हैं।
२१४ * अविच्छिन्नचिदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ
'पदार्थाभावना' नामकी छठी भूमिका' हो जाती है।'*
भूमिषट्कचिराभ्यासाद् भेदस्यानुपलम्भतः ।
यत्स्वभावैकनिष्ठत्वं सा ज्ञेया तुर्यगा गतिः ॥
'उपर्युक्त छहों भूमिकाओंके सिद्ध हो जानेपर स्वाभाविक चिरकालतक अभ्यास होनेसे जिस अवस्थामें दूसरोंके द्वारा प्रयत्नपूर्वक प्रेरित करनेपर भी भेदरूप संसारकी सत्ता-स्फूर्तिकी उपलब्धि नहीं होती, वरं अपने आत्मभावमें स्वाभाविक निष्ठा रहती है, उस स्थितिको उसके अन्तःकरणकी 'तुर्यगा' भूमिका जानना चाहिये।'†
यह तुर्यावस्था जीवन्मुक्त पुरुषोंमें इस शरीरमें रहते हुए ही विद्यमान रहती है। इस देहका अन्त होनेपर विदेह-मुक्तिका विषय साक्षात् तुर्यातीत ब्रह्म ही है (अतः भूमिकाओंमें उसकी गणना नहीं है)। श्रीराम ! जो महाभाग सातवीं भूमिकामें पहुँच गये हैं, वे आत्माराम महात्मा महद्-पद (परब्रह्म) को प्राप्त हो चुके हैं। जीवन्मुक्त पुरुष सुख-दुःखमें आसक्त नहीं होते। केवल देहयात्राके लिये छठी भूमिकामें कुछ कार्य करते हैं, अथवा सातवीं भूमिकामें नहीं भी करते। पूर्वोक्त महात्मा पार्श्ववर्ती पुरुषोंद्वारा बोधित होकर उन-उन आश्रमोंमें स्थित पुरुषोंकी आचार-परम्परासे प्राप्त सम्पूर्ण सदाचारोंका ही सावधानीकी भाँति पालन करते हैं। उनका वह आचार फलकी कामना और आसक्ति नामक दोषोंसे रहित होता है। वे अपने आत्मामें ही रमण
* पाँचवीं भूमिकाके पश्चात् जब वह ब्रह्मप्राप्त पुरुष छठी भूमिकामें प्रवेश करता है, तब उसकी नित्य समाधि रहती है; इसके कारण उसके द्वारा कोई भी क्रिया नहीं होती। उसके अन्तःकरणमें शरीर और संसारके सम्पूर्ण पदार्थोंका अत्यन्त अभाव-सा हो जाता है। उसे संसारका और शरीरके बाहर-भीतरका बिल्कुल ज्ञान नहीं रहता, केवल श्वास आते-जाते हैं; इसलिये इस भूमिकाको 'पदार्थाभावना' कहते हैं। जैसे गाढ सुषुप्तिमें स्थित पुरुषको बाहर-भीतरके पदार्थोंका ज्ञान बिल्कुल नहीं रहता, वैसे ही इसको भी ज्ञान नहीं रहता। अतः उस पुरुषकी इस अवस्थाको 'गाढ सुषुप्ति अवस्था' भी कहा जा सकता है। किंतु गाढ सुषुप्तिमें स्थित पुरुषके तो मन-बुद्धि अज्ञानके कारण अपने कारण मायामें विलीन हो जाते हैं, अतः उसकी स्थिति तमोगुणमयी है; पर इस ज्ञानी महापुरुषके मन-बुद्धि ब्रह्ममें तद्रूप हो जाते हैं (गीता ५। १७), अतः इसकी अवस्था गुणातीत है। इसलिये यह गाढ सुषुप्तिसे अत्यन्त विलक्षण है।
गाढ़ सुषुप्तिमें स्थित पुरुष तो निद्राके परिपक्व हो जानेपर स्वतः ही जाग जाता है; किंतु इस समाधिस्थ ज्ञानी महात्मा पुरुषकी व्युत्थानावस्था तो दूसरोंके बारंबार प्रयत्न करनेपर ही होती है, अपने-आप नहीं। उस व्युत्थानावस्थामें वह जिज्ञासुके प्रश्न करनेपर पूर्वके अभ्यासके कारण ब्रह्मविषयक तत्त्व-रहस्यको बतला सकता है। इसी कारण ऐसे पुरुषको 'ब्रह्मविद्वरीयान्' कहते हैं।
श्रीमदृषभदेवजी इस छठी भूमिकामें स्थित माने जा सकते हैं।
† छठी भूमिकाके पश्चात् सातवीं भूमिका स्वतः ही हो जाती है। उस ब्रह्मवेत्ता ज्ञानी महात्मा पुरुषके हृदयमें संसारका और शरीरके बाहर-भीतरके लौकिक ज्ञानका अत्यन्त अभाव हो जाता है। क्योंकि उसके मन-बुद्धि ब्रह्ममें तद्रूप हो जाते हैं, इस कारण उसकी व्युत्थानावस्था तो न स्वतः होती है और न दूसरोंके द्वारा प्रयत्न किये जानेपर ही होती है। जैसे मुर्दा जगानेपर भी नहीं जाग सकता, वैसे ही यह मुर्देकी भाँति हो जाता है; अन्तर इतना ही रहता है कि मुर्देमें प्राण नहीं रहते और इसमें प्राण रहते हैं तथा यह श्वास लेता रहता है। ऐसे पुरुषका संसारमें जीवन-निर्वाह दूसरे लोगोंके द्वारा केवल उसके प्रारब्धके संस्कारोंके कारण ही होता रहता है। वह प्रकृति और उसके कार्य सत्त्व, रज, तम—तीनों गुणोंसे और जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति—तीनों अवस्थाओंसे अतीत होकर ब्रह्ममें विलीन रहता है; इसलिये यह उसके अन्तःकरणकी अवस्था 'तुर्यगा' भूमिका कही जाती है।
ब्रह्मकी दृष्टिमें संसारका अत्यन्त अभाव है। उपर्युक्त महात्मा पुरुष उस सच्चिदानन्दघन ब्रह्मको नित्य ही प्राप्त है। अतः उसके मन-बुद्धिमें भी शरीर और संसारका अत्यन्त अभाव है। इसलिये ऐसे पुरुषको ब्रह्मविद्वरिष्ठ कहते हैं।
ऐसे ही ब्रह्मविद्वरिष्ठ महापुरुषसे वार्तालाप न होनेपर भी उसके दर्शन और चिन्तनसे ही मनुष्यके चित्तमें मल, विक्षेप और आवरणका नाश होनेसे उसकी वृत्ति परमात्माकी ओर आकृष्ट होनेपर उसका कल्याण हो सकता है।
उत्पत्ति-प्रकरण ] * मायिक रूपका निराकरण करके सन्मात्रत्वका प्रदर्शन, अविद्याके स्वरूपका निरूपण * २१५
करनेके कारण बाह्य विषयोंसे विरत होते हैं। अत उन्हें जगत्के व्यवहार उसी तरह सुख नहीं दे पाते, जैसे गाढ नींदमें सोये हुए पुरुषोंको दर्शनीय रूप- सौन्दर्यसे सुशोभित स्त्रियाँ नहीं सुख दे सकतीं। ज्ञानकी ये सात भूमिकाएँ विवेकी पुरुषोंको ही प्राप्त होती हैं। इस ज्ञानदशाको प्राप्त हुए पशु (हनुमान् और नन्दी), अन्त्यज (मूक चाण्डाल, धर्मव्याध, गुह, भील और शबरी) आदि भी सदेह (जीवन्मुक्त) अथवा विदेहमुक्त ही हैं--इसमें संशय नहीं है। चेतन और जडकी ग्रन्थिका विच्छेद ही ज्ञान है। उसके प्राप्त होनेपर मुक्ति हो जाती। क्योंकि मृगतृष्णामें जलबुद्धि अथवा रज्जुमें सर्पबुद्धि आदिका जो बाध है, वैसा ही चेतन और जडकी ग्रन्थिका विच्छेद भी है। कुछ लोग एक ही जन्ममें क्रमशः ज्ञानकी सारी भूमिकाओंको प्राप्त हो जाते हैं। कोई कोई एक, दो या तीन भूमिकाओंतक ही पहुँच पाते हैं। कोई छ भूमिकाओंको प्राप्त होते हैं। कोई एकमात्र सातवीं भूमिकामें ही स्थित रहते हैं। कोई तीन भूमिकाओंतक जाते हैं। कोई अन्तिम भूमिकामें पहुँच जाते हैं। कोई चार भूमिकाओंको प्राप्त होते हैं। कोई दो भूमिकाओंमें स्थित होते हैं। कोई ज्ञानभूमिकाके एक अंशतक ही पहुँच पाते हैं। कोई साढ़े तीन, कोई साढ़े चार और कोई साढ़े छः भूमिकाओंतक पहुँच जाते हैं। जो उन भूमिकाओंमें पहुँचकर उत्तरोत्तर उत्कृष्ट स्थानोंपर विजय पाते जाते हैं, वे महात्मा निश्चय ही वन्दनीय हैं। उन्होंने इन्द्रियरूपी शत्रुओंपर विजय प्राप्त कर ली है। उस चतुर्थ ज्ञानभूमिका (जीवन्मुक्तावस्था) में पहुँच जानेपर सम्राट् (भूमण्डल- का राजा) और विराट् (देवलोकका राजा) भी तिनकेके समान तुच्छ प्रतीत होता है; क्योंकि वे ज्ञानी महात्मा उस अवस्थामें परमपदको प्राप्त हो जाते हैं। (सर्ग ११८)
मायिक रूपका निराकरण करके सन्मात्रत्वका प्रदर्शन, अविद्याके स्वरूपका निरूपण, संक्षेपमें ज्ञानभूमिका एवं जीवात्माके वास्तविक स्वरूपका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—राघव ! जैसे मृगतृष्णाके जलमें, दो चन्द्रमाओंके भ्रममें और शरीर आदिकी अहंतामें मायासे जो रूप परिलक्षित होता है, वह विचारपूर्वक देखनेपर दृष्टिगोचर नहीं होता, उसी प्रकार सुवर्णमें जो कड़े, कुण्डल, अँगूठी आदिका भाव है, वह केवल भ्रान्ति है। वह असत् स्वरूपवाली माया है; क्योंकि उसका वह रूप ही ऐसा है, जो ज्ञानदृष्टिसे देखनेपर कायम नहीं रहता। असद्वस्तु तो सीपमें चाँदी और मरुस्थलमें जलकी भ्रान्तिके समान विचारहीनताके कारण ही सत्-सी प्रतीत होती है। असत् शरीरमें जो अहंताकी भावना है, वही परमा अविद्या है, वही माया है और वही संसृति है। जैसे सुवर्णमें अँगूठीपना आदि वास्तवमें कल्पित हैं, उसी तरह आत्मामें अहंता आदिकी भावना भी कल्पित है। इस प्रकार जो स्वच्छ, शान्त एवं निर्मल है, उस परमो- त्कृष्ट आत्मामें अहंताकी भावना असत् है। वह शुद्ध आत्मा मेरुता, असुरता, मनपना, देहता और महाभूततासे रहित है। उसमें तीनों कालोंकी कल्पना और भावाभाव वस्तुका अभाव है। स्वता, अहंता, आत्मता, तत्ता, सत्ता, असत्ता आदिसे भी वह रहित है। उसमें न कहीं भेदकी कल्पना है, न राग और रञ्जन ही है; क्योंकि ये सब मायामात्र हैं। वह तो सर्वात्मक, शान्त, आश्रयरहित, जगत्का कारण, शाश्वत, कल्याणमय, निर्विकार, इन्द्रियों- द्वारा अग्राह्य तथा नाम एवं कारणरहित ब्रह्म है।
रघुनन्दन ! वासनायुक्त चित्त जिस वस्तुकी पर्याप्त- रूपमें जैसी भावना करता है, वह वस्तु चाहे सत् हो अथवा असत्, उसको उसी समय उसी रूपमें प्रतीत होने
२१६ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
लगती है; क्योंकि अहंता आदि भावोंसे युक्त अविद्याका ज्यों ही अभ्युदय हुआ, त्यों ही आदि, मध्य और अन्तसे रहित अनन्त अंगोंका ताँता लग जाता है। जैसे बहुत-से व्यक्तियोंके मनःकलित वचन बहुधा एक-से होते हैं, उसी तरह स्वप्नमें भी देश, काल और क्रिया भी एक-से दीख पड़ते हैं। परंतु उस व्यवहारकी सत्ता अज्ञानसे ही प्रतीत होती है। वास्तवमें तो चेतन सत्ताके अतिरिक्त सम्पूर्ण पदार्थोंकी कोई अन्य सत्ता है ही नहीं। वह चेतन सत्ता भूत, वर्तमान और भविष्य—तीनों कालोंमें मौजूद रहती है और वही भिन्न-सी प्रतीत होती है—ठीक उसी तरह, जैसे समुद्रमें तरङ्ग और बीजमें वृक्ष भिन्न-से भासित होते हैं। और जैसे बालूमें तेल आदिका होना असम्भव है, वैसे ही अविद्या कोई वस्तु नहीं है। भला, सोनेके बने हुए कङ्कणमें स्वर्णताके अतिरिक्त दूसरी कौन वस्तु हो सकती है ? अर्थात् कोई नहीं। अतः अविद्याके साथ आत्मतत्त्वका सम्बन्ध हो ही नहीं सकता; क्योंकि यह तो अपने अनुभवसे स्पष्ट है कि सभीका अपने समानके साथ ही सम्बन्ध होता है। जब जगत्के सम्पूर्ण पदार्थ चिन्मात्रमय एवं सन्मात्रमय होते हैं, तब वे भाव परस्पर अपने अनुभवके बलपर प्रकाशित होते हैं। विषम पदार्थोंका निरन्तर साक्षात् सम्बन्ध होना असम्भव है और परस्पर सम्बन्ध हुए बिना आपसमें अनुभव भी नहीं हो सकता।
तत्त्ववेत्ताओंमें श्रेष्ठ राम ! वास्तवमें जैसे मिट्टीकी बनी हुई सेना मृद्बुद्धिसे देखनेपर विचित्र होनेपर भी विचार-दृष्टिसे एकमात्र मिट्टी ही है, तरङ्ग आदि एकमात्र जल ही हैं, काठकी बनी हुई पुतलियोंमें एकमात्र काष्ठ ही व्याप्त है और घट आदि केवल मिट्टी ही हैं, उसी प्रकार यह भ्रमसे प्रतीत होनेवाला जगत् एकमात्र ब्रह्म ही है। द्रष्टाका दृश्य और दर्शनके साथ सम्बन्ध होनेपर उसके मध्यमें जो उसका द्रष्टा, दर्शन और दृश्य आदिसे रहित शुद्ध रूप है, वही वह परब्रह्म है।
श्रीराम ! जैसे शिलामें जल और जलमें अग्नि नहीं है, उसी प्रकार जीवात्मामें चित्त नहीं है; फिर वह परमात्मामें कहाँसे हो सकता है। विचारपूर्वक देखनेपर जो स्वयं ही कुछ नहीं है, उसके द्वारा जहाँ-कहीं जो कुछ किया जाता है, वह 'कृत' नहीं कहलाता। जो मूर्ख असत्य स्वरूपवाले चित्तका अनुवर्तन करते हैं, उन्हें धिक्कार है; क्योंकि वे केवल आकाश-ताडनरूपी कर्ममें व्यर्थ ही समय बितानेवाले हैं।
इस प्रकार भूतलपर पैदा हुए पुरुषको बुद्धिके कुछ भी विकसित होनेपर पहले सत्सङ्गपरायण होना चाहिये; क्योंकि अनवरत प्रवाहित होते हुए इस अविद्यारूपी नदियोंके समूहको शास्त्र एवं सज्जनोंके सम्पर्कके अतिरिक्त और किसी उपायसे पार नहीं किया जा सकता। उस सत्सङ्गद्वारा विवेककी प्राप्ति होनेसे पुरुषको 'यह त्याज्य है और यह ग्राह्य है', ऐसा विचार उत्पन्न होता है। तब वह शुभेच्छा नामकी ज्ञानभूमिमें अवतीर्ण होता है। तदनन्तर विवेकवश विचारणा नामकी ज्ञानभूमिमें आता है। वहाँ यथार्थ ज्ञानकी प्राप्ति होनेसे मिथ्या वासनाका परित्याग करनेवाले पुरुषका मन सांसारिक वासनाओंसे रहित हो तनुता (सूक्ष्मता) को प्राप्त होता है। इस कारण वह तनुमानसा नामकी ज्ञानभूमिमें अवतीर्ण होता है। फिर ज्यों ही योगी यथार्थ ज्ञानका उदय होनेसे परमात्मामें तद्रूप हो जाता है, त्यों ही उसे सत्त्वापत्ति नामकी ज्ञानभूमि प्राप्त होती है। तब वासनाका विनाश हो जानेके कारण वह 'अमंस्क' कहलाने लगता है और कर्मफलके बन्धनसे मुक्त हो जाता है। तत्पश्चात् वासनाओंका विनाश हो जानेके कारण स्वाभाविक अभ्यास-से जब वह कार्योंको करता हुआ अथवा उनसे विरत हुआ या संसारकी अनन्य वस्तुओंमें स्थित हुआ भी अपने आत्मामें ही मनके क्षीण हो जानेके कारण बाह्य वस्तुओंका व्यवहार करते हुए भी न तो उन्हें देखता है, न रुचि-पूर्वक उनका सेवन करता है और न स्मरण ही करता