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सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

त्रयोदशः परिच्छेदः ३०९ ६. मुशल का ध्यान—जो मुशल उदर से कृश है तथा रश्मिज्वाला से चमकीला है । अङ्गार राशि के समान है और अत्यन्त लम्बा तथा महानिष्ठुर (निर्दयी) है ॥ १४ ॥ ७. इषु का ध्यान—जो इषु नीले कमल के समान श्यामवर्ण वाला है, जिसकी आकृति बाण के समान है, उसके अनेक रूप हैं । वह बड़ा तीक्ष्ण है, भुजायें विशाल हैं तथा जो प्रचण्ड पराक्रम से युक्त है ॥ १५ ॥ ८. धनुष का ध्यान—जो कार्मुक सुवर्ण के समान गोरा है, जिसमें अनेक किङ्किणियाँ जड़ी हुई हैं, जो महान् जलद के समान अपने हाथों को स्फोटित कर शब्द करता रहता है ॥ १६ ॥ ९. नन्दक का ध्यान—प्रकाश समूह के व्याप्त नृत्यमान भगवान् के नन्दक का ध्यान करे, जिसकी कान्ति शारदीय आकाश के समान अत्यन्त स्वच्छ है तथा जो क्रोध से उत्कृष्ट होकर अपने दाँतों को पीस रहे हैं ॥ १७ ॥ १०. खेटक का ध्यान—सूर्यमण्डल के समान अत्यन्त तेजस्वी सौम्य स्वरूप खेटक का ध्यान करे जो निरन्तर बलपूर्वक अपने मुख से अस्त्र समूहों को ग्रसते रहते हैं ॥ १८ ॥ ११. दण्ड का ध्यान—लाल वर्ण वाले रक्त एवं नेत्रों वाले मुट्ठी बाँधे हुए भगवान् के उस दण्ड का ध्यान करे जो क्रोध की साक्षात् मूर्ति हैं और अपने दाँतों से अपने ही अधर को चबाते रहते हैं ॥ १९ ॥ १२. परशु का ध्यान—इन्द्र के धनुष के समान वर्ण वाले एवं प्रचण्ड विक्रमयुक्त भगवान् के परशु का ध्यान करना चाहिये, जिनके कनकरूपी नेत्र सदा द्रवीभूत रहते हैं तथा जो जलती हुई ज्वालायुक्त जटा धारण किये हुए हैं ॥ २० ॥ १३. पाश का ध्यान—बिजली के समान देदीप्यमान जिह्वा वाला, महा- भयानक साँप के फणों से सर्वत्र व्याप्त, भगवान् के पाश का स्मरण करे, जो सर्प पङ्क्ति के समान पाण्डर (= पीत) वर्ण का है, जिसका मुख महाभयानक तथा नेत्र अत्यन्त रक्त है ॥ २१ ॥ १४. अङ्कुश का ध्यान—विशीर्ण कज्जल गिरि के समान खण्डित, महा- रौद्र, विकराल मुख वाले, कुशाङ्ग, दीर्घबाहु तथा पीले मुख वाले भगवान् के अङ्कुश का स्मरण करे ॥ २२ ॥ १५. मुद्गर का ध्यान—मोटे-मोटे कन्धों वाले, स्थूल शरीर से युक्त एवं शतधाम (सुवर्ण) के समान आभा वाले भगवान् के मुद्गर का स्मरण करे, जो जटा कलाप धारण किये हुए हैं, सौम्य है तथा जिनके नेत्र कमल के समान दीर्घ है ॥ २३ ॥

३१० सात्वतसंहिता १६. वज्र का ध्यान—वज्रोपल के समान आभा वाले, लम्बे किन्तु श्वेत वर्ण के नखों वाले वज्र का स्मरण करे, जिसका मुख तीक्ष्ण, महाभयानक और दाँतों से महाभयङ्कर है ॥ २४ ॥ १७. सौदामिनी का ध्यान—जिसकी प्रभाशक्ति सौदामिनी है, जिसके मुख और नेत्र शान्ताग्नि के समान लाल हैं उस सौदामिनी का स्मरण करे, जो प्रतिक्षण घन के समान घर्घर निर्घोष करती रहती है ॥ २५-२६ ॥ एतेऽस्त्रनायका सर्वे विभोराज्ञाप्रतीक्षकाः ॥ २६ ॥ प्रोत्थिता विचलन्तश्च सुसमैः स्थानकैः स्थिताः । श्रोणीतटार्पितकराश्चामरव्यजनोद्यताः ॥ २७ ॥ सपद्मं तु किरीटाद्यं वर्जयित्वा चतुष्टयम् । तर्जयन्तं च दुष्टौघमन्येषां दक्षिणं करम् ॥ २८ ॥ स्मर्त्तव्यं ध्यानकाले तु सर्वेषामथ मस्तके । ध्येयं स्वकं स्वकं चिह्नं सुप्रसिद्धं निराकृति ॥ २९ ॥ सर्वेषां सामान्यलक्षणमाह—एतेऽस्त्रनायका इति सार्द्धैस्त्रिभिः । एते किरीटादय इत्यर्थः । अस्त्रनायकाश्चक्रादय इत्यर्थः । श्रोणीतटार्पितकराः श्रोणीतटन्यस्तवामहस्ता इत्यर्थः । चामरव्यजनोद्यताः सचामरव्यजनदक्षिणहस्ता इत्यर्थः । आयुधानां भूष- णानां च किञ्चित् तारतम्यमुक्तम्—सपद्ममित्यादिना । सपद्मं पद्मसहितम्, किरीटाद्यं चतुष्टयं किरीटकौस्तुभश्रीवत्सवनमालाचतुष्टयम्, वर्जयित्वाऽन्येषां चक्रादीनां दक्षिणं करं दुष्टौघं तर्जयन्तं च ध्यायेदिति योजना । चक्रादीनां चामरव्यजनसमर्पणकैङ्कर्य- मात्रोद्योगे दुष्टानामसुर आदीनां यथेच्छं दुष्कृत्येष्ववकाशो भवतीति भिया चामरादि- समर्पणसमयेऽपि दुष्टौघतर्जनमुक्तम् । यद्वा तर्जयन्तं चेत्यत्र चकारो विकल्पनार्थः । चक्रादीनां दक्षिणं करं चामरव्यजनोद्यतं तर्जनीमुद्रान्वितं वा स्मरेदित्यर्थः । चामर- व्यजनोद्यतमिति पाठे तु नैतावान् क्रमः । सपद्मकिरीटादिचतुष्टयस्यैव चामरोद्यत- दक्षिणकरत्वम्, अन्येषां तर्जनीमुद्रान्वितत्वमेवेत्यर्थः सरसो भवति । कस्मिंश्चित् पारमेश्वरप्रयोगे चक्राद्यायुधानामेव चामरव्यजनोद्यतत्वं सपद्मकिरीटादिचतुष्टयस्य तर्जनीमुद्रान्वितत्वमुक्तम् । तदसङ्गतम्, तर्जयन्तमित्यस्य चतुष्टयमित्यस्य चाविभिन्न- लिङ्गकत्वात्, आयुधानामेव दुष्टौघतर्जनसामर्थ्यात्, भूषणानां तदसंभवाच्च । अत एव पद्मस्यायुधकोटिपरिगणितत्वेऽपि तस्य लीलाकमलत्वात् सौम्यत्वाच्च दुष्टौघतर्जनं (न) संभवतीत्यभिप्रायेण सपद्ममिति भूषणैः सह वर्णनं कृतमिति च ज्ञायते । ननु पूर्वं कौस्तुभश्रीवत्सयोर्दण्डयोश्च कार्यान्तरविनियुक्तहस्तत्वमुक्तम्, इदानीं पुनस्तेषामपि श्रोणीतटनिविष्टहस्तत्वं चामरपाणित्वतर्जनीमुद्रान्वितत्वयोरन्यतरत्वं च कथं संभवतीति चेन्न, पूर्वमुक्तस्य लक्षणस्य चतुर्भुजविषयत्वादिदानीमुक्तस्य द्विभुज- विषयत्वात् ॥ २६-२९ ॥

त्रयोदशः परिच्छेदः ३११ सभी आयुधों के सामान्य लक्षण कहते हैं—ये १७ अस्त्र आयुध शिरोमणि कहे जाते हैं, जो भगवान् की आज्ञा की निरन्तर प्रतीक्षा करते रहते हैं ॥ २६ ॥ ये सभी खड़े रहते हैं, चलते भी रहते हैं । सम स्थान में बैठे भी रहते हैं । अपना हाथ नितम्ब स्थल पर रखे रहते हैं तथा हाथ से चामर का व्यजन (= पंखा) डुलाते रहते हैं ॥ २७ ॥ जब चामर व्यजन दाहिने हाथ से डुलाते हैं तब अपना बायाँ हाथ नितम्ब स्थल पर रखते हैं । जब दाहिने हाथ में कमल धारण करते हैं, तब लीला के लिये किरीट, कौस्तुभ, श्रीवत्स और वनमाला का त्याग करते हैं, इस प्रकार इनका ध्यान करे । इसी प्रकार दुष्ट जनों को भयभीत करते समय चक्र के दाहिने हाथ को अपने मस्तक पर ध्यान करे । किन्तु निराकार अवस्था में उनका अपना- अपना केवल चिह्न ही ध्यान करे ॥ २८-२९ ॥ किरीटादीनाम् अधिष्ठातृन् कथनम् किरीटो हुतभुग् वेद्यः कौस्तुभस्तु प्रभाकरः । स्वयं शशाङ्कं श्रीवत्सो माला षण्माधवादयः ॥ ३० ॥ प्राणं पतत्त्रिराड् विद्धि कालचक्रं महामते । अपाम्पतिर्वै कमलं गदा देवी सरस्वती ॥ ३१ ॥ खं शङ्खः सीरमोषध्यो मुसलं नागनायकः । शब्दादयः सायकास्तु धनुर्विद्धि समीकरम् ॥ ३२ ॥ नन्दकं सर्वशास्त्राणि खेटकं वसुधा स्मृता । ज्ञेयो हि दण्डो नियतिर्वैराग्यं परशुः स्मृतः ॥ ३३ ॥ पाशो मायाऽङ्कुशः कामोऽप्यहङ्कारस्तु मुद्गरः । विज्ञानममलं वज्रं समाधिः शक्तिरुच्यते ॥ ३४ ॥ अथ किरीटादीनामधिष्ठातृनाह—किरीट इत्यादिभिः । माधवादयः ... सन्ता ... प? इत्यर्थः । पारमेश्वरेऽपि— अपांपतिर्वै कमलं गदा देवी सरस्वती । चक्रं लोकप्रतिष्ठा वै शब्दब्रह्म तु शङ्खराट् ॥ —(६।२७८-२७९) इति गदापद्मयोरधिष्ठातृदेवौ सात्वतोक्तशब्दाभ्यामेव प्रतिपादितौ, चक्रशङ्खयोर- धिष्ठातारौ तु शब्दान्तराभ्यामुक्तौ । अतस्तत्रापि लोकप्रतिष्ठा काल इत्यर्थः, सर्वाधारः काल इति प्रसिद्धेः । शब्दो (बृ?बृं)हत्यस्मिन्निति शब्दब्रह्म आकाशमित्यर्थश्च बोध्यः । पारमेश्वरव्याख्याने तु लोकप्रतिष्ठा भूमिरित्युक्तम् । तद्विचारणीयम् ॥ ३०-३४ ॥ अब किरीटी इत्यादि के अधिष्ठातृ देवताओं को कहते हैं—किरीटी के अग्नि अधिष्ठातृ देवता हैं । कौस्तुभ के प्रभाकर अधिष्ठातृ देवता समझना

३१२ सात्वतसंहिता चाहिये। श्रीवत्स के शशाङ्क और माला के षण्माधवादि (= सन्ताप) अधिष्ठातृ देवता हैं ॥ ३०॥ पतत्त्रिराट् (गरुड़) के प्राण, चक्र के महाकाल, कमल के समुद्र तथा गदा की अधिष्ठातृ देवता स्वयं सरस्वती हैं ॥ ३१ ॥ शङ्ख के आकाश, हल की औषधियाँ, मुसल के नागनायक (अनन्त), सायक के शब्दादि तथा धनुष के समीकरण देवता हैं ॥ ३२ ॥ नन्दक के सर्वशास्त्र और खेटक की अधिष्ठात्री स्वयं वसुधा (पृथ्वी) देवी हैं। दण्ड के नियति और परशु स्वयं वैराग्य हैं ॥ ३३ ॥ पाश की अधिष्ठात्री माया, अङ्कुश के काम, मुद्गर के अहङ्कार, वज्र के निर्मल विज्ञान एवं शक्ति की समाधि अधिष्ठात्री कही गई हैं ॥ ३४ ॥ चिन्तादिदेवानां वर्णध्यानक्रमकथनम् भिन्नरूपस्य च विभोर्य उक्तः सुन्दरीगणः । साधारश्चाप्यनाधारस्तासां ध्यानं क्रमाच्छृणु ॥ ३५ ॥ चिन्ताऽऽखण्डलचापाभा लक्ष्मी रक्ताम्बुजप्रभा । पुष्टिः कनकगौरा च कीर्तिः कुमुदपाण्डरा ॥ ३६ ॥ जयाऽर्ककान्तिसदृशी मायाऽञ्जननिभा स्मृता । शुद्धिः किंशुकसंकाशा गुञ्जाभा तु निरञ्जना ॥ ३७ ॥ बन्धुजीवोज्ज्वला नित्या ज्ञानशक्तिः सिताऽरुणा । फुल्लेन्दीवरवर्णा च परिज्ञेयाऽपराजिता ॥ ३८ ॥ रक्तोत्पलाभा प्रकृतिः सितपीता सरस्वती । सर्वकामप्रदा सिद्धिस्त्विन्द्रनीलसमप्रभा ॥ ३९ ॥ सिन्दूरपुञ्जवर्णाभा विज्ञेया प्रीतिवर्धनी । यशस्करी च दुग्धाभा शान्तिदा विद्रुमोज्ज्वला ॥ ४० ॥ तुष्टिस्तुहिनसंकाशा दया वैदूर्यसन्निभा । निद्राऽयस्कान्तसदृशी क्षमा पीतारुणप्रभा ॥ ४१ ॥ कान्तिर्दर्पणसंकाशा धृतिर्गोरोचनोज्ज्वला । मैत्री बन्धूकपुष्पाभा रतिर्गैरिकसन्निभा ॥ ४२ ॥ मतिर्मरकताभा वै सर्वाः प्रमुदिताननाः । अथ पूर्वोक्तानां चिन्तादिदेवानां वर्णध्यानक्रममाह — भिन्नरूपस्येत्यादिभिः । चिन्ता नाम पातालशायिनो दक्षिणभागस्था पूर्वोक्ता देवीति ज्ञेया । श्रयादिद्विके श्रयादि-

त्रयोदशः परिच्छेदः ३१३ चतुष्टये शुद्ध्यादिषट्के लक्ष्याद्याष्टके लक्ष्यादिद्विषट्के च चिन्ताया अनन्तर्गतत्वात् प्रथमं तद्ध्यानमुक्तमिति सूक्ष्मदृष्ट्या बोध्यम्। नन्वेकार्णवशायिनः परितःस्थितदेवीचतुष्टयान्तर्गतप्रीतिविद्ययोरप्यत्र द्विका- दिसमूहेष्वनन्तर्गतत्वात् तयोरपि ध्यानं कुतो नोक्तमिति चेत्, पामरोऽसि, विद्या- सरस्वतीशब्दयोः पर्यायत्वं स्तनन्धयोऽपि जानीते ! "तुष्टिदापुष्टिदाष्टकम्" (१२।२१२) इत्यत्र तुष्टिदाशब्देनोक्तायाः "तुष्टिस्तुहिनसंकाशा" इति पुनस्तुष्टि- शब्देनैव ग्रहणाद् यथा तुष्टिदातुष्टिशब्दयोः पर्यायत्वं ज्ञायते, तथा प्रीतिप्रीति- वर्धनीशब्दयोः पुष्टिदापुष्टिशब्दयोः शान्तिदाशान्तिशब्दयोश्च पर्यायत्वं निरङ्कुशम्। अतः प्रीतिविद्ययोरपि द्विकादिसमूहान्तर्गतत्वादेव पृथग् ध्यानं नोक्तमिति सन्तोष- व्यमायुष्मता। लक्ष्मीध्यानस्य प्रथममेवोक्तत्वात् पुनर्द्विके चतुष्टयेऽष्टके द्विषट्के च तद्ध्यानं नोक्तम्। एवमष्टक एव तुष्टेः सरस्वत्याश्च ध्यानस्योक्तत्वात् पुनर्द्विषट्के नोक्तमिति ध्येयम् ॥ ३५-४३ ॥ भिन्न रूप उन परमात्मा विभु के साधार अथवा निराधार जो सुन्दरियाँ कही गई हैं। हे सङ्कर्षण! अब उनका ध्यान सुनिये ॥ ३५ ॥ चिन्ता इन्द्रधनुष के समान हैं, लक्ष्मी रक्त कमल की कान्ति से युक्त हैं, पुष्टि कनक के समान गौर वर्ण वाली हैं और कीर्ति कुमुद के समान स्वच्छ वर्ण वाली हैं ॥ ३६ ॥ जया का स्वरूप सूर्य के समान, माया अञ्जन के सदृश, शुद्धि पलाशपुष्प के समान, निरञ्जना (माया राहित्य) गुञ्जा के सदृश है। नित्या शक्ति बन्धुजीवपुष्प के समान उज्ज्वल हैं और ज्ञानशक्ति सिता और अरुणा है तथा अपराजिता को विकसित कमल के समान आभा वाली समझना चाहिये ॥ ३७-३८ ॥ प्रकृति रक्त कमल के समान कान्तिमती हैं, सरस्वती सितपीता हैं और सिद्धि सर्वकामप्रदा है, जिनका वर्ण इन्द्रनीलमणि के समान है ॥ ३९ ॥ प्रीतिवर्धनी को सिन्दूरपुञ्ज के वर्ण के समान समझना चाहिये। यशस्करी दुग्ध के समान आभा वाली हैं तथा शान्ति विद्रुम के समान उज्ज्वल हैं ॥ ४० ॥ तुष्टि बर्फ के समान उज्ज्वल हैं, दया वैदूर्य के समान है, निद्रा अयस्कान्त मणि के समान है, क्षमा पीत और अरुण कान्ति वाली है ॥ ४१ ॥ कान्ति दर्पण के समान निर्मल है, धृति गोरोचन के समान उज्ज्वल है, मैत्री बन्धूकपुष्प के समान हैं और रति गौरिक के समान हैं ॥ ४२ ॥ मति मरकत के समान कान्ति वाली है, ये सभी उक्त देवियाँ सर्वदा प्रसन्नमुख रहती हैं ॥ ४३ ॥ दिव्यमाल्याम्बरधरा नानालङ्कारभूषिताः ॥ ४३ ॥ दिव्यस्रग्वेष्टनोपेता वीक्षमाणाः स्वकं पतिम्। सा० सं० - 24

३१४ सात्वतसंहिता देवीनां सर्वासामपि सामान्यं लक्षणमाह—दिव्यमाल्येति ॥ ४३-४४ ॥ सभी दिव्य माला धारण किये हुए अनेक अलङ्कारों से विभूषित हैं ये सभी दिव्यमाला तथा दिव्यवस्त्र धारण किये हुए अपने-अपने पतियों की ओर देख रही हैं ॥ ४३-४४ ॥ चतस्रः शक्तयो यास्तु विभोः शयनगस्य तु ॥ ४४ ॥ प्रागुक्तास्तत्र पूर्वाशावस्थिता वीजयन्त्यजम् । त्रयं यद् दिक्त्रयस्थं तु तत्संवाहनतत्परम् ॥ ४५ ॥ पातालशायिनः परितः स्थितस्य लक्ष्म्यादिशक्तिचतुष्टयस्य हस्तव्यापारानाह— चतस्र इति सार्धेन ॥ ४४-४५ ॥ इसके अतिरिक्त भगवान् की चार शक्तियाँ और हैं जो उनके शयनागार में निवास करती हैं। इन देवियों के विषय में पहले कह आये हैं (द्र. १२.१०७- १०८) ये भगवान् का वीजन करती हैं। इसके अतिरिक्त तीन और शक्तियाँ हैं जो तीनों दिशाओं में भगवान् का पदसंवाहन करती हैं ॥ ४५ ॥ यत्रैका श्रीर्विभोस्तत्र सन्निवेशः पुरोदितः । यत्रैका श्रीर्विभोस्तत्र वामे वा दक्षिणेऽपि वा ॥ ४६ ॥ लक्ष्मीमात्रविषयमाह—यत्रेति । पुरोदितः पूर्वम् “पद्मासनादिना चैव केवलं वा श्रियान्वितः” (१२।१९२) इत्यत्र । षष्ठेनालिङ्गिता देवी सारविन्देन बाहुना । तदंसलग्नकरया देव्या तच्चित्तयाऽनिशम् ॥ संवीज्यमानं विनयाच्चामरेण सितेन तु।—(१२।१०७-१०८) इत्यत्र वोक्त इत्यर्थः । तथा च लक्ष्मीतन्त्रे—“श्रीर्नाम द्विभुजस्याहमङ्कस्था वरवर्णिनी” (८।१२) इति ॥ ४६ ॥ उसमें से एक, जिसका नाम श्री है उनका सन्निवेश पहले (१२.१९२) कह आये हैं । एक ओर श्री हैं जो भगवान् के कदाचित् दायें और कदाचित् वाम भाग में निवास करती हैं ॥ ४६ ॥ श्रीपुष्टिद्विकस्य लक्षणकथनम् श्रीपुष्ट्याख्यद्वयं यत्र तत्र तद् दक्षिणोत्तरे । पद्मासनेनोपविष्टा पक्षिपक्षद्वये स्थिता ॥ ४७ ॥ नलिनीनालहस्ताढ्या मृदुकुम्भकराऽपरा । अग्नीषोममयो देह आद्यो यः सर्वगस्य च ॥ ४८ ॥ तस्य शक्तिद्वयं तादृगमिश्रं भिन्नलक्षणम् ।

त्रयोदशः परिच्छेदः ३१५ भोक्तृशक्तिः स्मृता लक्ष्मीः पुष्टिर्वै कर्तृसंज्ञिता ॥ ४९ ॥ भोगार्थमवतीर्णस्य तस्य लोकानुकम्पया । उदितं सह तेनैव शक्तिद्वितयमव्ययम् ॥ ५० ॥ नानात्वेन हि वै यस्य परिणामः प्रकीर्तितः । श्रीपुष्टिद्विकस्य लक्षणमाह—श्रीपुष्ट्याख्यद्वयमिति सार्धैश्चतुर्भिः । यस्य शक्तिद्वयस्य परिणामो नानात्वेन प्रकाशितः, चिन्ताकीर्तिजयामायादिरूपभेदैः प्रदर्शित इत्यर्थः ॥ ४७-५१ ॥ श्री, पुष्टि दो और शक्तियाँ हैं जो क्रमशः नारायण के दक्षिण और उत्तर रहती हैं । ये दोनों ही गरुड़ के पक्ष पर पद्मासन से बैठी रहती हैं ॥ ४७ ॥ एक के हाथ में कमलिनी का नाल है, तो दूसरे के हाथ में कोमल जल कलश है । सर्वत्रव्यापी भगवान् का सर्वप्रथम होने वाला जो अग्नीषोममय देह है । उनकी दो शक्तियाँ हैं । एक परस्पर मिली हुई और दूसरी परस्पर भिन्न हैं । उसमें लक्ष्मी भोक्त्री शक्ति हैं और दूसरी पुष्टि शक्ति हैं, जिन्हें कर्मी शक्ति भी कहा जाता है ॥ ४८-४९ ॥ जब भगवान् लोक पर अनुग्रह करने के लिये भोग के लिये पृथ्वी पर अवतीर्ण होते हैं तो वे अव्यय प्रभु इन्हीं दोनों शक्तियों के साथ अवतरित होते हैं । इनकी इन्ही दो शक्तियों का परिणाम चिन्ता, कीर्ति, दया, जया तथा माया आदि रूपों में अनेक प्रकार से कहा जाता है ॥ ४९-५१ ॥ दिक्पत्रचतुरन्तःस्थं यद् वै देवीचतुष्टयम् ॥ ५१ ॥ शक्तिः परशुपाशास्रमङ्कुशं तत्करे क्रमात् । लक्ष्मीकीर्त्यादिशक्तिचतुष्टयलक्षणमाह—दिक्पत्रेति ॥ ५१-५२ ॥ चारों दिक्पत्रों के अन्त में जो चार शक्तियाँ स्थित हैं उनके हाथ में क्रमशः परशु, पाश, अस्त्र और अङ्कुश है ॥ ५१-५२ ॥ षट्कं केसरजालस्थं तत्र प्राक्पश्चिमे द्वयम् ॥ ५२ ॥ द्वयं द्वयं सौम्ययाम्ये तासां वामकरेषु च । शङ्खं चक्रं गदा सीरमिष्वस्त्रं नन्दकं शिवम् ॥ ५३ ॥ शुद्ध्य्यादिदेवीलक्षणमाह—षट्कमिति सार्धेन । प्राक्पश्चिमे द्वयम् । प्राग्भागे एका शक्तिः, पश्चिमभागे एका शक्तिरित्यर्थः । द्वयं द्वयं सौम्यायाम्ये । उत्तरकोणद्वये शक्तिद्वयम्, दक्षिणकोणद्वये शक्तिद्वयमित्यर्थः । तथा च लक्ष्मीतन्त्रे—"तस्यैव कोणषट्कस्था षोढाऽहं शृणु नाम च" (८।२३) इति ॥ ५२-५३ ॥ अब शुद्ध्य्यादि देवियों के लक्षण कहते हैं—केशर जाल में छह शक्तियाँ

३१६ सात्वतसंहिता है जिसमें पूर्व और पश्चिम में एक-एक क्रम से दो शक्ति, उत्तर और दक्षिण में दो-दो और इनके वाम हस्त में शङ्ख, चक्र, गदा, हल, बाण एवं नन्दक नामक अस्त्र हैं ॥ ५३ ॥ शक्त्यष्टकलक्षणकथनम् पत्रमध्यनिविष्टं तु यत्कान्ताष्टकमुत्तमम् । तस्य वामकराणां च विज्ञेयं त्वादितोऽष्टकम् ॥ ५४ ॥ श्रीफलं चाक्षसूत्रं स्रग् दर्पणः पुष्पमञ्जरी । विष्टरं किङ्किणी चास्त्रसञ्चयः कमलेक्षण ॥ ५५ ॥ शक्त्यष्टकलक्षणमाह—पत्रमध्येति द्वाभ्याम् । श्रीफलं = विल्वफलमित्यर्थः ॥ ५४-५५ ॥ अब शक्त्यष्टक के लक्षण कहते हैं—पत्र के मध्य में जो आठ (शक्तियाँ) कान्तायें सन्निविष्ट की गई हैं, उनके बायें हाथ में भी आठ वस्तुयें इस प्रकार सन्निविष्ट हैं । (१) श्री फल, (२) अक्षसूत्र, (३) माला, (४) दर्पण, (५) पुष्पमञ्जरी, (६) विष्टर, (७) किङ्किणी, (८) अस्त्र सञ्चय । हे कमलेक्षण ऐसा समझो ॥ ५४-५५ ॥ लक्ष्यादिद्विषट्कलक्षणम् विज्ञेयः शान्तिदः पाणिर्द्वादशानां तु साभयः । अन्तरान्तरयोगेन सर्वाश्चामरलाञ्छिताः ॥ ५६ ॥ स्वस्तिकेनोपविष्टाश्चाप्यन्तर्मुदितमानसाः । लक्ष्यादिद्विषट्कलक्षणमाह—विज्ञेय इत्यर्धेन । सर्वसाधारणं लक्षणमाह— अन्तरेति । अन्तरान्तरयोगेन दक्षिणहस्तधारणेनेत्यर्थः ॥ ५६-५७ ॥ अब इन लक्ष्यादि बारहों के सामान्य लक्षण कहते हैं—इन द्वादश महालक्ष्मि‌यों के दाहिने हाथ में स्वास्तिक आदि माङ्गलिक वस्तुओं के धारण करने के कारण इनमें बारह हाथों को भी अभय देने वाला तथा शान्ति प्रदान करने वाला समझना चाहिये । ये सभी चिह्न देवचिह्नों से युक्त है । स्वास्तिक से युक्त है, सभी भीतर से प्रसन्नचित्त रहने वाले हैं ॥ ५६-५७ ॥ द्व्यादिकस्यास्य संघस्य द्वादशान्तस्य लाङ्गलिन् ॥ ५७ ॥ सितादिकेन वर्णेन लाञ्छनव्यत्ययेन तु । तुल्यलाञ्छनयोगेन तन्निरासे च वै सति ॥ ५८ ॥ वराभयाभ्यामन्योन्यपाणिभ्यामथ केवलात् । बहुधा भेदवृन्दं तु परिज्ञेयं तु पूर्ववत् ॥ ५९ ॥

त्रयोदशः परिच्छेदः ३१७ शक्तीशवत् शक्तीनामपि सितादिवर्णपद्मादिलाञ्छनव्यत्ययतुल्यलाञ्छनत्वादि- भेदैर्बहुधा भेदा विज्ञेया इत्याह—द्व्यादिकस्येति सार्धद्वाभ्याम्। द्व्यादिकस्य श्रीपुष्टि- द्विकपूर्वकस्येत्यर्थः । द्वादशान्तस्य लक्ष्मीपुष्ट्यादिद्विषट्कस्येत्यर्थः । संघस्येति जात्येकवचनम् । पञ्चसंघानामित्यर्थः । भवोपकणदेवानां प्रसिद्धत्वात् तल्लक्षणानि सर्वत्र प्रसिद्धानि द्रष्टव्यानीति ॥ ५८-५९ ॥ शेषं भवोपक़रणं देवानां निचयो हि सः । सुप्रसिद्धो महाबुद्धे किन्त्वब्जाद्यैस्तु पूर्ववत् ॥ ६० ॥ ध्यातव्या लाञ्छिताः सर्वे पाणिपादतलेषु च । नास्त्रैर्वस्त्रैर्ध्वजैर्येषां व्यक्तिर्व्यक्ता जगतत्रये ॥ तेऽपि लाञ्छनवृन्दं तु धारयन्त्यङ्घ्रिगोचरे । ललाटे चांसपट्टे तु पृष्ठे पाणितलद्वये ॥ (१२।१६८-१६९) इत्याद्युक्तप्रकारेण शक्तिभूषणास्त्रलाञ्छनानामप्यस्पष्टत्वे तत्पाणिपादतलादिषु तानि द्रष्टव्यानीति चाह—शेषमिति सार्धेन ॥ ६०-६१ ॥ जिस प्रकार भवोपक़रण देवों के प्रसिद्ध लक्षण सर्वत्र प्रसिद्ध देखे जा सकते हैं, उसी प्रकार इनके भी लक्षण सर्वत्र प्रसिद्ध देखे जा सकते हैं । किन्तु जिनके अस्त्र, ध्वज, वस्त्रादि द्वारा लक्षण प्रसिद्ध नहीं है वे भी अपने पैरों में लक्षण धारण करते हैं, अथवा ललाट में, अथवा कन्धों पर, अथवा पीठ में, अथवा दोनों हाथों में धारण करते ही है । बिना लक्षण के नहीं रहते इन लक्षणों के अस्पष्ट होने पर उन्हें हाथों तथा पादतलों में अवश्य देखा जा सकता है इसी बात को स्पष्ट करते हैं—शेषं भवोपक़रणं देवानां निचयों हि सः । सुप्रसिद्धो महाबुद्धे किन्त्वब्जाद्यैस्तु पूर्ववत् ॥ ५७-६१ ॥ भक्तिश्रद्धाव्रतपरः सर्वेषां यः सदैव हि ॥ ६१ ॥ ध्यात्वैवमर्चनं कुर्याद् भोगैः संस्पर्शपूर्वकैः । सोऽचिरान्मोक्षनिष्ठं तु फलं प्राप्नोत्यभीप्सितम् ॥ ६२ ॥ एतेषामर्चनफलमाह—भक्तीति सार्धेन ॥ ६१-६२ ॥ यतः इनके लाञ्छन पाणि पादतल में प्रतिष्ठित हैं । अतः वही साधक उनका ध्यान कर संस्पर्श पूर्वक भोगों (गन्ध, धूपादि, नैवेद्यादि द्वारा) से अर्चन करता है । इस प्रकार वह भक्त शीघ्र ही मोक्ष प्राप्त कर लेता है और शीघ्र ही अपना अभीष्ट भी प्राप्त कर लेता है ॥ ६१-६२ ॥ किरीटाद्यस्त्रनिष्ठेन परिवारेण चावृतम् । भक्त्या ह्यभीप्सितं रूपमर्चनीयमथापि वा ॥ ६३ ॥ निर्मुक्तपरिवारं वा स्वेन ध्यानेन लक्षितम् ।

३१८ सात्वतसंहिता एवं किरीटादिपारिवारध्यानैः सहितं वा तैर्विना केवलतत्तद्भगवन्मूर्त्तिध्यानमात्रेणं वाऽन्वितमर्चनं कार्यमित्याह—किरीटेति सार्धेन ॥ ६३-६४ ॥ इस प्रकार जो किरीटादि परिवारों के साथ, अथवा केवल भगवन्मूर्त्ति के साथ भक्तिपूर्वक परिवार सहित अथवा परिवार रहित ध्यान एवं अर्चन पूजन करता है, भगवान् दोनों प्रकार से उसे चतुर्विध पुरुषार्थ प्रदान करते हैं ॥ ६४ ॥ विदधात्यर्चनान्नूनं स्वपदं फलसंयुतम् ॥ ६४ ॥ ज्ञात्वैवं साधकः कुर्याद् यथाभिमतमर्चनम् । आत्मशक्तिसमैर्भोगैरखिलैः शुद्धविग्रहैः ॥ ६५ ॥ हृदि वेद्यां बहिर्मूर्ती प्रासादे स्वगृहे तु वा । बहुप्राकारनिर्मुक्ते धूमदाहादिनोज्झिते ॥ शरणे रमणीये च निःसम्पर्के तु भाविते ॥ ६६ ॥ ॥ इति श्रीपाञ्चरात्रे श्रीसात्वतसंहितायां भूषणाद्यस्त्रदेवताध्यानं नाम त्रयोदशः परिच्छेदः ॥ १३ ॥ — ❧ ❃ ❧ — उभयथाऽर्चनेऽपि भगवान् चतुर्विधपुरुषार्थानपि प्रयच्छतीति ज्ञात्वा स्वेच्छानु- सारेण यथाशक्त्यार्जितैर्भोगैर्मनसि बहिर्वेद्यां बिम्बे वाऽऽलये स्वगृहे वाऽर्चनं कुर्यादि- त्याह—विदधातीति त्रिभिः ॥ ६४-६६ ॥ ॥ इति श्रीमौज्यायनकुलतिलकस्य यदुगिरीश्वरचरणकमलार्चकस्य योगानन्दभट्टाचार्यस्य तनयेन अलशिङ्गभट्टेन विरचिते सात्वततन्त्रभाष्ये त्रयोदशः परिच्छेदः ॥ १३ ॥ — ❧ ❃ ❧ — यह अर्चन, आत्मशक्ति के अनुरूप तथा आत्मशक्ति के अनुसार शुद्ध विग्रह से हृदय में या वेदी पर, किसी शुद्ध स्थान में, मूर्त्ति में, प्रासाद में, अपने गृह में, बहुत प्राकार से निर्मुक्त स्थान पर, धूम एवं दाह विवर्जित स्थान में, सर्वोत्तम मनोरम गृह में, निर्जन स्थान में तथा अत्यन्त पवित्र स्थान में करना चाहिए ॥ ६४-६६ ॥ ॥ इस प्रकार डॉ० सुधाकर मालवीय कृत सात्त्वत संहिता के भूषणाद्यस्त्रदेवताध्यान नामक त्रयोदश परिच्छेद की हिन्दी समाप्त हुई ॥ १३ ॥ — ❧ ❃ ❧ —

चतुर्दशः परिच्छेदः पवित्रारोपणविधिः नारद उवाच अखण्डनाय नित्यस्य तथा नैमित्तिकस्य च । कर्मणश्चोदयामास हली विष्णुं मुनीश्वराः ॥ १ ॥ अथ चतुर्दशः परिच्छेदो व्याख्यास्यते । इह नित्यनैमित्तिककर्मणामखण्डनावहं कर्म सङ्कर्षणो वासुदेवं पृच्छतीत्याह—अखण्डनायेति ॥ १ ॥ नारद जी ने कहा—हे मुनीश्वरों ! अब इसके बाद सङ्कर्षण, भगवान् वासुदेव से नित्य एवं नैमित्तिक कर्मों में जिस प्रकार किसी प्रकार बाधा न हो, वह अखण्डित रहे, इस विषय में पूछते हैं ॥ १ ॥ सङ्कर्षण उवाच यैराजीवावधिं कालं नित्यमाराधनं प्रति । धीः कृता पुण्डरीकाक्ष श्रद्धापूतेन चेतसा ॥ २ ॥ तेषामाकस्मिकाल्लोपाद् भोगानामप्यसम्भवात् । यः स्यात् तस्योपशमनं ज्ञातुमिच्छामि साम्प्रतम् ॥ ३ ॥ प्रश्नप्रकारमाह—यैरिति द्वाभ्याम् । तेषां भागवतानाम्, आकस्मिकाल्लोपाद् अबुद्धिपूर्वकादाह्निकव्रतादिलोपादित्यर्थः । भोगानामसंभवाद् = औपचारिकादीनां लोपादित्यर्थः । यः स्याद् = यो दोषः संभवेदित्यर्थः । तस्योपशमनं = ज्ञातुमिच्छा- मीति प्रश्नः ॥ २-३ ॥ सङ्कर्षण ने कहा—हे भगवन् ! जिस प्रकार महाभागवतों की नित्य एवं नैमित्तिक क्रिया का लोप न हो, अथवा भोगों के अभाव में या औपचारिकता के अभाव से दोष न पड़े, उसके उपशमन का उपाय बताइये क्योंकि उस महाभागवत ने आजीवन नित्य श्रद्धा युक्त चित्त से आप की आराधना की प्रतिज्ञा की है ॥ २-३ ॥ श्रीभगवानुवाच लोभबुद्धिं विना यस्य भोगानामप्यसम्भवः ।

३२० सात्वतसंहिता सामर्थ्येन विना यस्य कृच्छ्रादीनां परिच्युतिः ॥ ४ ॥ ज्वरादिव्याधिदोषेण जातो यस्याह्निकक्षयः । चातुर्मास्यस्य चाप्राप्तिर्यस्य स्वातन्त्र्यतो विना ॥ ५ ॥ तस्य तस्य महाबुद्धे शृणु यद्विहितं हितम् । सांस्पर्शिकानां भोगानां मात्रावित्तं हि पूरणम् ॥ ६ ॥ हृदयङ्गमसंज्ञानामन्नं च हविषा प्लुतम् । औपचारिकभोगानां बीजानि विहितानि वै ॥ ७ ॥ एवं पृष्टो वासुदेवस्तांस्तान् दोषहेतून् स्वयमपि विविच्य तत्तदुपशामकानाह— लोभबुद्धिमित्यादिभिः । लोभबुद्धिं विना द्रव्यलोभं विना । अनुपपत्तिविनाशादिति भावः । यस्य पुरुषस्य यत्पुरुषकर्तृक इत्यर्थः । भोगानाम् = औपचारिक- सांस्पर्शिकाभ्यवहारिकाणाम्, असम्भवो लोपः संभवति । स्वातन्त्र्यतो विना पार- तन्त्र्याद्यस्य पुरुषस्य चातुर्मास्यस्य व्रतस्य चाप्राप्तिर्लोपः संभवति, तस्य तस्य पुरुषस्य यद्विहितं प्रायश्चित्तरूपं हितं विहितं शास्त्रचोदितं तच्छृण्वित्यर्थः । सांस्पर्शिकानां भोगानां स्रक्चन्दनादीनाम्, मात्रावित्तं प्रत्यहं पूजाकाले दीयमानं सहिरण्‍यशालितण्डुलतिलादि- कम्, पूरणं भोगलोपदोषजनितच्छिद्रपूरकमित्यर्थः । हृदयंगमसंज्ञानाम् = आभ्यव- हारिकाणाम्, हविषा प्लुतम् = आज्याक्तमन्नं पूरकम् । औपचारिकभोगानां = छत्र- चामरादीनाम्, विविधानि बीजानि मात्रार्थं कल्पितानि मुद्गादीनि पूरकाणि ॥ ४-७ ॥ श्री भगवान् ने कहा—हे सङ्कर्षण! द्रव्य लोभ के बिना ही जिस पुरुष के आराधना में औपचारिक, सांस्पर्शिक एवं आभ्यवहारिक भोगों का लोप हो जाता है स्वतन्त्रता के अभाव में या परतन्त्रता के कारण जिस पुरुष के चातुर्मासिक व्रतों में विघ्न पड़ जाता है । अब उसके विषय में जो-जो प्रायश्चित्त हैं, हे सङ्कर्षण ! उसे सुनिये । आराधना में सांस्पर्शिक दोष (स्रक्, चन्दनादि का अभाव), पूजा करने में मात्रावित्त (= सहिरण्‍य, शालि, तण्डुल, तिलादि, दान) से पूर्ण होता है । आभ्यवहारिक दोष आज्य परिप्लुत अन्न के होम से पूर्ण होता है और औपचारिक भोग (छत्र, चामरादि के अभाव का दोष) का विविध बीज (मुद्गादिदान) से पूर्ण होता है ॥ ४-७ ॥ कृच्छ्रचान्द्रायणादीनां व्रतानां परिपूरकः । विशेषार्चनसयुक्तश्चातुर्मास्यस्तु संयमः ॥ ८ ॥ सौत्रं प्रतिसरं चित्रं मुक्ताहारोपमं शुभम् । शमं नयति भक्तानां सर्वदा लोपमाह्निकम् ॥ ९ ॥ एवं भोगलोपप्रायश्चित्तमुक्त्वा कृच्छ्रादिलोपप्रायश्चित्तं दर्शयति—कृच्छ्रचान्द्रा- यणादीनामिति । कृच्छ्रचान्द्रायणादीनां व्रतानां विशेषार्चनसंयुक्तश्चातुर्मास्यस्य संयमः अष्टमपरिच्छेदोक्तचातुर्मास्यव्रतनियमः पूरकः ।

चतुर्दशः परिच्छेदः ३२१ अथ क्रमप्राप्तमाह्निकलोपप्रायश्चित्तं दर्शयति—मुक्ताहारोपमं चित्रं शुभं सौत्रं क्षौमादिसूत्रकृतं प्रतिसरं पवित्राख्यं भूषणं भक्तानामाह्निकं लोपम् = आह्निकलोपजन्यं दोषं शमं नयति शान्तिं प्रापयतीत्यर्थः । चातुर्मास्यव्रतलोपस्यापीदं प्रायश्चित्तमिति ज्ञेयम्, तस्याह्निकेष्वेवान्तर्भूतत्वात्, अत एव तस्य प्रत्येकं प्रायश्चित्तानुक्तेः । एवं च मन्त्रलोपक्रियालोपद्रव्यलोपादिसंभवे हि कृच्छ्रचान्द्रायणादिव्रतान्यनुव्रीयन्ते, तेषामपि पूरकश्चातुर्मास्यव्रतः, तस्यापि पूरकं पवित्रारोपणम् । अतोऽस्य सर्वप्रायश्चित्तत्वमुक्तं भवति । तथा च वक्ष्यति कण्ठरवेण— तपोदानव्रतानां च विहितस्याह्निकस्य च । निःशेषयागभोगानां कृत्वा सम्पूरणक्रियाम् ॥—(१५।१) इति ॥ ८-९ ॥ कृच्छ्रचान्द्रायणादि व्रतों में होने वाले दोषों का प्रायश्चित्त विशेषार्चन संयुक्त चातुर्मास्य का संयम है ॥ ८ ॥ अब क्रम-प्राप्त आह्निक क्रिया के लोप से होने वाले दोषों का प्रायश्चित्त कहते हैं—भक्तों के नित्य आराधन में आह्निक दोष होने पर प्रतिसर (क्षौमादि सूत्र की ग्रथित माला जिसे 'पवित्रा' कहते हैं) उससे उस आह्निक-दोष की शान्ति हो जाती है ॥ ९ ॥ पवित्रारोपणानुष्ठानकालकथनम् तच्च मासचतुष्कस्य मध्ये कुर्याच्छुभे दिने । आषाढपञ्चदश्यास्तु यावद् वै कार्तिकस्य च ॥ १० ॥ सम्पूर्णचन्द्रदिवसं तं कालं चान्द्रमन्तिमम् । आ कर्कटकसंक्रान्तेस्तुलाभोगक्षयावधि ॥ ११ ॥ कालं तं चाष्टपक्षं तु सौरं मध्यमसंज्ञितम् । एकादश्यादि चान्तो यश्चातुर्मास्योपलक्षितः ॥ १२ ॥ कालं तं वैष्णवं विद्धि तूत्तमं सर्वसिद्धिदम् । तस्मादस्य विधानं विस्तरेण दर्शयन् प्रथमं तदनुष्ठानकालमाह—तच्चेत्या- दिभिः । आषाढपञ्चदश्या = आषाढपौर्णमासीमारभ्य कार्तिकस्य मासस्य सम्पूर्ण- चन्द्रदिवसं पौर्णमासीति यावत् । तावन्तं कालं चान्द्रं चान्द्रमानसंज्ञम् अन्तिमम् अधमं सन्नं विद्धि । आ कर्कटकसंक्रान्तेस्तुलाभोगक्षयावधि सूर्यस्य कर्कटकप्रवेशमारभ्य तुलाधिष्ठानभोगावसानपर्यन्तम् । अथवा तुलायां तुलामासे ये भोगाः शालिव्रीह्यादीनां फलानि, तेषां क्षयावधि तल्लवनसंग्रहणपर्यन्तमित्यर्थः । यद्वा तुलामासस्याभोगो विस्तारस्तदवसानपर्यन्तमित्यर्थः । अष्टपक्षम् = अष्टौ पक्षा यस्य तं तथोक्तं कालं सौरं सौरमानसंज्ञं मध्यमं विद्धि । चातुर्मास्योपलक्षितः = एकादश्यादि चान्तो यः काल आषाढशुक्लैकादशीमारम्य कार्तिकशुक्लैकादश्यन्तं मासचतुष्टयात्मक इत्यर्थः । तं

३२२ सात्वतसंहिता कालं वैष्णवं वैष्णवमानसंज्ञम्, उत्तमं तं विद्धि । पारमेश्वरव्याख्याने— "एकादश्यादि चान्तो य इत्यत्र एकादश्यामादिरारम्भस्तत्र तीर्थं वा" इति विलिखितम् । तद्वि- चारणीयम् ॥ १०-१३ ॥ वह पवित्रारोपण चातुर्मास्य काल में पवित्र शुभ तिथि में करे, आषाढ़ की पूर्णिमा से लेकर कार्तिक की पूर्णिमा तक का दिन चातुर्मास्य कहा जाता है ॥ १० ॥ जिस दिन चन्द्रमा सायं से कार्तिक मास के जिस दिन सारा दिन चन्द्रमा हो उस दिन को 'पूर्णमासी' कहा जाता है उतना चान्द्रमान काल 'अधम' कहा जाता है ॥ १०-११ ॥ कर्क की संक्रान्ति से लेकर तुलाभोगक्षयावधि पर्यन्त इस प्रकार कुल आठ पक्ष का सौर काल 'मध्यम' संज्ञक कहा जाता है। अतः आषाढ़ शुक्ल एकादशी से लेकर कार्त्तिक शुक्ल एकादशी के अन्त तक का काल विद्वानों द्वारा चातुर्मास्य 'उत्तम' संज्ञक कहा जाता है ॥ ११-१२ ॥ अप्राप्तेरस्य कालस्य त्वन्तरायेण केनचित् ॥ १३ ॥ निर्वाहणीयोऽप्यपरः कालश्चान्द्रायणादिना । उत्तमकालालाभेऽधमादिकाले वेदनुष्ठेयमित्याह—अप्राप्तेरिति ॥ १३-१४ ॥ यही काल वैष्णव मान के अनुसार चातुर्मास्य समझना चाहिये जो सर्वोत्तम है। यदि इस प्रकार का काल संभव न हो, तब अधमकाल में भी वेदानुष्ठान (पवित्रारोपण) अनुष्ठेय है ॥ १३-१४ ॥ सम्पाद्यं चैव तन्मध्ये विधिवद् यागपूरकम् ॥ १४ ॥ दिनत्रये तु पूर्वोक्ते पूर्णिमाद्युपलक्षिते । सोपवासैः क्रियापूर्वं कर्म प्रातिसरीयकम् ॥ १५ ॥ उत्तमकालेष्वन्यतमे दिनत्रये पवित्रारोपणं कार्यमित्याह—सम्पाद्यमिति । सम्पाद्यं = कर्तव्यमित्यर्थः । तन्मध्ये उत्तमादिकालत्रयमध्ये, यागपूरकं = भगवदाराधनच्छिद्र- पूरकमित्यर्थः, पौर्णिमाद्युपलक्षिते = पौर्णमास्या एकादश्या संक्रान्त्या वाऽन्वित इत्यर्थः । प्रातिसरीयकं = पावित्रकमित्यर्थः ॥ १४-१५ ॥ तीन दिन के उत्तम काल में किसी भी उत्तम दिन पवित्रारोपण विधेय है । इस उत्तमादिकालत्रय के मध्य में भगवदाराधन में होने वाले छिद्र की पूर्ति के लिये याग तथा पौर्णमासी एकादशी अथवा संक्रान्ति काल में प्रतिसरानुष्ठान (पवित्रा- रोपण) भी विधेय है ॥ १४-१५ ॥ पवित्रदिवसाख्य कर्मकथनम् दशम्यामर्चनं कृत्वा हुत्वाग्निं च निशामुखे । आनिमन्त्र्य च देवेशं धूपं दत्त्वाऽर्घ्यपूर्वकम् ॥ १६ ॥

चतुर्दशः परिच्छेदः ३२३ निजानन्दमयैर्भोगैर्नित्यतृप्तस्त्वमव्ययः । तथापि भक्त्या तृप्तोऽहं त्वां यजाम्यात्मसिद्धये ॥ १७ ॥ निवेद्य मुखवासादीनित्युक्त्वा दन्तधावनम् । सम्पूज्याथ सुगन्धैस्तु सितसूत्रसमूहजम् ॥ १८ ॥ शुभं प्रतिसरं त्वेकं तत्तुल्यानि बहूनि वा । कुङ्कुमाद्यैर्यथाशोभं रञ्जयित्वा स्वशक्तितः ॥ १९ ॥ जाम्बूनदमयैः पुष्पैर्नारत्लोपशोभितैः । सनालैर्भूषणीयं च रम्यैर्वा रजतोत्थितैः ॥ २० ॥ धूपितेऽभिनवे भाण्डे कृत्वाच्छाद्यास्तरेण तु । प्रणवेनार्चयित्वा तु संस्थाप्य पुरतो विभोः ॥ २१ ॥ देवागारं बहिश्चान्तर्मन्दिरं यागसंज्ञितम् । संवेष्ट्य सितसूत्रेण चतुर्धा तद्गुणेन तु ॥ २२ ॥ ततोऽभ्यर्च्य समूहं तु पञ्चकालपरायणम् । षट्कर्मनिरतं चापि यतिवृन्दं तु वैष्णवम् ॥ २३ ॥ समक्षं भवतां भक्त्या श्वः प्रभुं पूजयाम्यहम् । सन्निधानमतः कार्यं मदनुग्रहकाम्यया ॥ २४ ॥ स्नानाद्यमेकादश्यां वै सविशेषं समाचरेत् । हवनान्तं क्रियाकाण्डं जपस्तुतिपरस्ततः ॥ २५ ॥ आराध्यस्याग्रतः स्थित्वा जागरेण नयेन्निशाम् । अथ दशम्येकादश्योः कर्तव्यं पवित्रदिवासाख्यं कर्माह—दशम्यामित्यारभ्य जागरेण नयेन्निशामित्यन्तम् । अर्चनं कृत्वा कुम्भमण्डलबिम्बेषु यथाविधि सम्पूज्ये- त्यर्थः । अग्निं च हुत्वा अग्नौ च देवं सन्तर्प्येत्यर्थः, एवमधिवासदिनादिषु चतुःस्थाना- र्चनस्येश्वरपारमेश्वरादिषु प्रतिपादितत्वात् । यद्वाऽर्चनं कृत्वेत्यत्र केवलबिम्बार्चनमेव विवक्षितम्, यदा तु केवलं बिम्बे पवित्रारोपणं भवेत्॥ तदा स्याद् बिम्बकस्यैव अधिवासोक्तपूजनम्। तथा वह्निगतस्यापि वर्जयेत् कुम्भमण्डले॥ —(१२।४७८-४७९) इति पारमेश्वरोक्तेः । इत्थं दिनद्वयेऽप्यधिवासकरणाशक्तस्यैकादश्यामेवाधि- वासनम्, तत्राप्यशक्तस्य सद्योऽधिवासनम्, अधिवासात् पूर्वमङ्कुरार्पणं रक्षाबन्धनं चोक्तमीश्वरे— पूर्वं दशम्येकादश्योः कुर्यात् कर्माधिवासनम्। एकादश्यां वानुकल्पे अधिवासनमाचरेत्॥

३२४ सात्वतसंहिता

सद्योऽधिवासं द्वादश्यां कुर्याद्वा शक्त्यभावतः । अधिवासदिनात् पूर्वदिनं कृत्वाङ्कुरार्पणम् ॥ अधिवासदिने कुर्याद् रक्षाबन्धं च देशिकः । —(१४।१६७-१६९) इति । एवमेवोक्तं पारमेश्वरेऽपि— प्राक्सप्त(मे) दिने कृत्वा प्राग्वदङ्कुररोपणम् । प्राग्वत् कृत्वाधिवासं तु पुरस्ताद् वासरद्वये ॥ —(१२।४७५) इति । द्रव्याभावो द्विजश्रेष्ठ! अशक्तिर्यदि वा भवेत् । सद्योऽधिवासं द्वादश्यां कृत्वा शक्त्यनुसारतः ॥ —(१२।४९८-४९९) इति । अधिवासदिने चतुःस्थानार्चनानन्तरम् ‘‘आनिमन्त्र्य च देवेशम्’’ (१४।१६) इत्यत्रैकैकं पवित्रं समर्पणीयम् । तथा चोक्तमीश्वरे पारमेश्वरे च— प्रणम्य देवदेवेशं ततस्त्वेकं पवित्रकम् । दहनाप्यायसंशुद्धं प्रोक्षितं चार्घ्यवारिणा ॥ वासितं गन्धधूपाभ्यां चतुःस्थानस्थितस्य च । निवेद्य च क्रमेणैव धूपं दत्त्वाऽर्घ्यपूर्वकम् ॥ इति । —(ई०सं० १४।१८०-१८१, पा०सं० १२।२६१-२६२) पवित्रनिर्माणप्रकरणेऽपि— चतुःस्थानावतीर्णस्य विभोरामन्त्रणाय वै । पवित्रमाद्यसदृशमेकैकं वा द्वयं द्वयम् ॥ इति । —(ई०सं० १४।११२-११३, पा०सं० १२।१४१-१४२) अत्र पवित्राणां तन्तुसंख्याग्रन्थिकल्पनगर्भरचनादिकं नोक्तमपीश्वरपारमेश्वराद्युक्तं ग्राह्यम् । अथवा— यथेच्छाकल्पितैः सूत्रैर्ग्रन्थिभिस्तु यथेच्छया । निशारोचनया वापि पवित्राणां च धातुना ॥ केनचिद् ग्रन्थयो विप्रा विधिवत् परिरञ्जयेत् । पुष्पपूर्णानि गर्भाणि कृत्वा वा केवलान्यतः ॥ —(ई०सं० १४।२६७-२६८, पा०सं० १२।५००-५०१) इतीश्वरपारमेश्वरयोर्लघुपक्षस्याप्युक्तत्वात् तन्तुग्रन्थिनियमादीनामन्यतो ग्रहणा- भावेऽपि न प्रत्यवायः । ननु यथेच्छाग्रन्थिकल्पनस्यापि मूलेऽनुक्तत्वात् तदपि वाऽन्यत्र ग्राह्यं खल्विति चेन्न, ‘‘मुक्ताहारोपमम्’’ (१४।९) इत्यनेनैव ग्रन्थिकल्पनसिद्धेः । ‘‘संवेष्ट्य सित- सूत्रेण चतुर्धा तद्गुणेन तु’’ (१४।२२) इत्यत्र तद्गुणेन चतुर्गुणेनेत्यर्थः,

चतुर्दशः परिच्छेदः ३२५ चतुर्गुणेन संवेष्ट्य ह्यन्तराद् यागमन्दिरम् । प्रदक्षिणचतुष्कं तु वर्ममन्त्रं तु संस्मरन् ॥ — (१२।२६९-२७०) इति पारमेश्वरस्यष्टोक्तेः ॥ १६-२६ ॥ यह पवित्रानुष्ठान दशमी अथवा एकादशी को भी किया जा सकता है, प्रतिसर (= पवित्रारोपण) कर्म में उपवास कर्म करे । सायंकाल अग्नि में हवन कर दशमी को भगवान् का अर्चन करे । प्रथम देवेश का आमन्त्रण करे, अर्घ प्रदान करे, फिर धूप देवे ॥ १६ ॥ फिर उनसे प्रार्थना करे—हे भगवन् ! आप स्वयं अपने आनन्दमय भोग से नित्य तृप्त हैं । आप में कोई विकार है ही नहीं, तथापि आप की भक्ति से तृप्त हुआ मैं अपनी सिद्धि की कामना के लिये आप का यजन करता हूँ ॥ १७ ॥ इस प्रकार प्रार्थना कर भगवान् को दन्त धावनादि मुख वास प्रदान करे । फिर श्वेत सूत्र समूह से बने हुए एक अथवा अनेक सूत्र समूहों की सुगन्धित वस्तुओं से पूजा करे । उसे कुङ्कुमादि से यथाशक्ति रञ्जित करे, जिससे वह शोभा सम्पन्न हो जाय । सुवर्णमय पुष्पों से तथा नाना प्रकार के रत्नों से अथवा रजतमय खण्डों से धूपित नाल उसे भूषित करे । इस प्रकार भूषित कर लेने के बाद किसी भूषित अभिनव भाण्ड में अन्तरण पर स्थापित कर प्रणव से अर्चना करे । फिर उसे भगवान् के सामने स्थापित करे ॥ १८-२१ ॥ फिर देवागार, मन्दिर और यज्ञभूमि को श्वेतसूत्र से चार बार लपेट कर उसे सामूहिक रूप से नित्य पूजन करे । फिर पञ्चकाल परायण षट्कर्म निरत यतिवृन्दों तथा वैष्णवों को बुलावे तथा प्रार्थना करे कि मैं आप लोगों के समक्ष कल अपने इन प्रभु की पूजा करूँगा । अतः हे प्रभु ! मेरे ऊपर कृपा करते हुए कल अवश्य पधारियेगा ॥ २२-२४ ॥ इसके बाद एकादशी के दिन स्नानादि कार्य विशेष रूप से सम्पादन करना चाहिए । फिर हवनादि समस्त क्रिया-काण्ड करे तथा साधक जप और स्तुति में तत्पर रहे । अपने आराध्य भगवान् के सामने स्थित होकर जागते हुए रात बितावे ॥ २५-२६ ॥ पुनरभ्यर्च्य देवेशं प्रभाते विधिपूर्वकम् ॥ २६ ॥ भूषयेद् भूषणैर्नैव त्वामूर्ध्नः प्रणवेन तु । यथारूपैश्च बहुभिर्भूयाद् बद्धाञ्जलिस्त्विदम् ॥ २७ ॥ नावलेपान्न मोहाच्च कर्मत्यागो मया कृतः । त्वमेव सर्वं जानासि सर्वेश हृदये स्थितः ॥ २८ ॥ यथाशक्त्या त्वनिच्छातातस्तत्रापि परमेश्वर ।

३२६ सात्वतसंहिता तन्निमित्तमिदं कर्म कृतं त्वत्प्रीतये मया ॥ २९ ॥ एवमुक्त्वा समभ्यर्च्य चतुरः पाञ्चरात्रिकान् । भगवत्प्रतिपत्त्या तु शक्त्या प्रावरणैर्धनैः ॥ ३० ॥ तथा प्रतिसरान्तैस्तु ब्रह्मचारीन् यतीन् गुरून् । तर्पयित्वाऽथ चान्नेन पूतेन विविधेन तु ॥ ३१ ॥ क्षान्त्वाऽनुव्रज्य नैवेद्यपूर्वं कुर्याच्च भोजनम् । अथ द्वादश्यां प्रातर्नित्यार्चनचतुःस्थानार्चनपूर्वकं पवित्रसमर्पणम्, हविर्निवेदना- द्यनन्तरं नावलेपादिति श्लोकद्वयेन प्रार्थनम्, भगवत्प्रतिपत्त्या चतुर्णां कारिणां ब्रह्म- चार्यादीनां भागवतानां च पवित्रसमर्पणहविर्भोजनान्तमर्चनमपराधक्षमापणादिकं स्वानु- यागं चाह—पुनरभ्यर्च्य देवेशमित्यादिभिः । प्रावरणैर्वस्त्रैरित्यर्थः ॥ २६-३२ ॥ फिर प्रभात होने पर विधिपूर्वक देवेश का अभ्यर्चन करे । फिर प्रणव मन्त्र से भगवान् के रूप के अनुसार पैर से शिर तक भगवान् को भली प्रकार से भूषित करे । तदनन्तर हाथ जोड़कर इस प्रकार प्रार्थना करे ॥ २६-२७ ॥ हे भगवन् ! मैंने अहङ्कारवश अथवा अज्ञानवश अपने इस कर्म का त्याग नहीं किया है । आप सबके हृदय में निवास करते हैं और सब कुछ जानते हैं । हे परमेश्वर ! मैंने अनिच्छावश भी अपनी शक्ति के अनुसार उस मूल के कारण यह सारा कार्य आपकी प्रीति के लिये किया है ॥ २८-२९ ॥ साधक इस प्रकार प्रार्थना कर चार अथवा पाँच पाँचरात्र के उपासकों की पूजा करे । इस प्रकार द्वादशी को प्रातः नित्यार्चन चतुःस्थानार्चनपूर्वकभगवान् को पवित्रा समर्पण करे । फिर हवि निवेदन के अनन्तर ‘नावलेपादिति’ (२८-२९) श्लोक द्वय से प्रार्थना करे । फिर भगवद् इष्ट या चार कर्मकारी ब्रह्मचारियों को तथा चार महाभागवत भक्तों को पवित्रा समर्पण कर हविष्य भोजन करावे । पुनः अर्चनपूर्वक अपराध समापन करावे । पुनः उन ब्रह्मचारी तथा महाभागवतों को पीछे अनुगमन कर नैवेद्य पूर्वक भोजन करे ॥ ३०-३२ ॥ अपरेऽहनि संन्यासमाचरेद् वा दिने दिने ॥ ३२ ॥ अपनीय तु माल्यादीन् प्रदद्याद् वा दिने दिने । नो याति म्लानतां यावच्चतुर्थेऽहनि वा त्यजेत् ॥ ३३ ॥ विशेषयागपूर्वं तु कारिभ्योऽवसरे स्वके । तदपरेद्युरेव पवित्रविसर्जनमाह—अपरेऽहनीत्यर्धेन । अथवा पुष्पाणामेव प्रत्यहं विसर्जनं कुर्वन् पवित्राणां विसर्जनं तु चतुर्थेऽहनि विशेषेण कारिपूजनपूर्वकं कुर्यादित्याह—अपनीयेति सार्धेन । एतदूर्ध्वमपि पवित्र- स्थापनमुक्तमीश्वरपारमेश्वर्योः—

चतुर्दशः परिच्छेदः ३२७ एकरात्रं त्रिरात्रं वा पञ्च वा सप्तरात्रकम् । पवित्रकं स्थापयित्वा ततः संन्यासमाचरेत् ॥ अथवार्चागतं विप्र तावत्संस्थाप्य भूषणम् । यावदेकादशी शुक्ला संवृत्ता कार्तिकस्य तु ॥ इति । —(ई०सं० १४।२५०-२५१, पा०सं० १२।४४६-४४७) अन्ये च बहवो विशेषा अत्रापेक्षिता ईश्वरादिषु द्रष्टव्याः ॥ ३२-३३ ॥ फिर दूसरे दिन विधिपूर्वक सन्यास ग्रहण कर लेवे, अथवा पूर्वदिन का समर्पित माल्यादि हटाकर प्रतिदिन नयी-नयी माला समर्पित करे, अथवा यदि माला तीन दिन तक मलिन न हुई हो तो उसे चतुर्थ दिन त्याग करे । इस प्रकार कार्यकारी भक्तों के लिये, अपने अवसर उपस्थित होने पर अन्य भी, बहुत सी विशेषतायें हैं ॥ ३२-३४ ॥ एवं कृते सति तदा सिद्धिर्भवति शाश्वती । सर्वथाऽऽराधकानां तु चेतसोऽभीप्सितं तथा ॥ ३४ ॥ ॥ इति श्रीपाञ्चरात्रे श्रीसात्वतसंहितायां पवित्रारोपणविधिर्नाम चतुर्दशः परिच्छेदः ॥ १४ ॥ — ❧ ✶ ❧ — एतत्फलमाह—एवमिति ॥ ३४ ॥ ॥ इति श्रीमौज्यायनकुलतिलकस्य यदुगिरीश्वरचरणकमलार्चकस्य योगानन्दभट्टाचार्यस्य तनयेन अलशिङ्गभट्टेन विरचिते सात्वततन्त्रभाष्ये चतुर्दशः परिच्छेदः ॥ १४ ॥ — ❧ ✶ ❧ — जो इस प्रकार से आराधना में दोष होने पर, इस प्रकार का प्रायश्चित करता है उसे शाश्वती सिद्धि प्राप्त होती है तथा आराधना करने वाले का सर्वथा अभीष्ट सिद्ध हो जाता है ॥ ३४ ॥ ॥ इस प्रकार डॉ० सुधाकर मालवीय कृत सात्त्वत संहिता के पवित्रारोपणविधि नामक चतुर्दश परिच्छेद की हिन्दी समाप्त हुई ॥ १४ ॥ — ❧ ✶ ❧ —

पञ्चदशः परिच्छेदः पवित्रस्नानविधिः श्रीभगवानुवाच तपोदानव्रतानां च विहितस्याह्निकस्य च । निश्शेषयागभोगानां कृत्वा सम्पूरणक्रियाम् ॥ १ ॥ अपरेऽहनि वै कुर्याच्चतुर्थे सप्तमे तु वा । स्नपनं पूज्यमन्त्रस्य तीर्थोद्देशे च सङ्गमे ॥ २ ॥ नद्यां समुद्रगामिन्यां देवखाते हदे तु वा । प्रीतये परमेशस्य त्वात्मनो दुःखशान्तये ॥ ३ ॥ आह्लादायामराणां च पितॄणां तृप्तये तु वै । आप्यायनार्थं भूतानां भुवनानां च भूतये ॥ ४ ॥ देशदोषप्रशान्त्यर्थं गोब्राह्मणहिताय च । अथ पञ्चदशपरिच्छेदो व्याख्यास्यते । एवं सर्वच्छिद्रपूरकं पवित्रारोपणाख्यं कर्म कृत्वा तदवरोपणदिने तदनन्तरं देवस्यावभृथं कार्यमित्याह—तप इत्यादिभिः ॥ १-५ ॥ श्री भगवान् ने कहा—इस प्रकार सर्वाच्छिद्रपूरक पवित्रारोपण कर्म करने के पश्चात् तप, दान एवं व्रतों को तथा विहित आह्निक कर्मों को सम्पूर्ण याग भोगों के छिद्र पूर्ति की सारी क्रिया सम्पादन करे । दूसरे दिन, अथवा चौथे दिन, अथवा सातवें दिन किसी तीर्थ प्रदेश में, अथवा सङ्गम स्थल में पूज्य मन्त्र के स्नान कराने की क्रिया सम्पादन करे ॥ १-२ ॥ अथवा समुद्रगामिनी नदी में, देवखात में, ह्रद में इस पूज्य मन्त्र का स्नान, परमेश्वर की प्रीति के उद्देश्य से, अथवा अपने दुःख की शान्ति के उद्देश्यों से, अथवा देवताओं को प्रसन्न करने के लिये, अथवा पितरों की तृप्ति के लिये करावे, अथवा प्राणियों के वृद्धि के उद्देश्य से, अथवा समस्त लोकों के कल्याण के लिये कराना चाहिये । देशदोष की प्रशान्ति के लिये, अथवा गौ ब्राह्मण के हित के लिये पूज्यमन्त्र का स्नान कराना चाहिये ॥ ३-४ ॥