शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
२२ [ प्रथम पटल होती हैं । त्रिपुरा का मन्त्र सात वर्णोंसे संयुक्त है और सात वर्णों वाला विनायक मन्त्र है ।८०। सप्तकं व्याहृतीनां सा सप्तवर्णं तुदर्शनम् । लोकान् गिरीन् स्वरान् धातून् मुनीन् द्वीपान् ग्रहानपि ।८१ समिधः सप्त संख्याताः सप्त जिह्वा हविर्भुजः । अन्यत्सप्तविधं यद्यत् तदस्याः समजायत ।८२ अष्टधा गुणिता शक्तिः शैवमष्टाक्षरद्वयम् । विष्णोः श्रीकरनामानं मन्त्रमष्टाक्षरं परम् । ३ अष्टाक्षरं हरेः शक्तेरष्टारयुगलं परम् । भानोरष्ठाक्षरं दौर्गमष्टार्ण परमात्मनः ।८४ अष्टार्णं नीलकण्ठस्य वासुदेवात्मकं मनुम् । यन्त्रं कामार्गलं दिव्य देवीयन्त्रं घटार्गलम् ।८५ वह व्याहृतियों का सप्तक है और सात वर्णों वाला सुदर्शन मन्त्र होता है । सात ही लोक है - पर्वत सात हैं-स्वर सात हैं-धातुएँ सात हैं-मुनि सात हैं—द्वीप सात हैं और ग्रह भी सात हैं ।८१। सात समिधाएं कही गई हैं और अग्नि की सात जिह्वाएं होती हैं । अन्य जो-जो भी सात प्रकार वाले हैं वे इसी से उत्पन्न हुए हैं ।८२। शक्ति आठ प्रकार से गुणित हुई है और शिव का भी अष्टाक्षर द्वय होता है । भगवान् विष्णु का श्रीसुकर नाम वाला मन्त्र आठ अक्षरों वाला श्रेष्ठ होता है । हरि का अष्टाक्षरों वाला मन्त्र होता है और शक्ति का अष्टा- क्षर युगल होता है, जो परमश्रेष्ठ है । भानुका आठ अक्षरसे संयुक्तमंत्र होता है-दुर्गा का परमात्मा नीलकण्ठ का तथा वासुदेव का भी आठ आठ अक्षरों वाला मन्त्र होता है । कामार्गल दिव्य मन्त्र है और देवी का यन्त्र घटार्गल होता है ।८३-८५। गन्धाष्टकं शुभं देवी देवानां हृदयङ्गमम् । ब्राह्मयाद्या भैरवान् सर्वान् मूर्त्तीराशा वसून्पि ।८६
श्री शारदा तिलक ] २३ अष्टपीठं महादेव्या अष्टाष्टकसमन्वितम् । अष्टौ ताः प्रकृतोर्विघ्नान्वक्रतुण्डादिकान्क्रमात् ।८७ अणिमादिगुणांन्नागान् वह्नेमूर्तीयमादिकान् । अष्टात्मकं जगत्यन्यत्सर्वं वितनुते सदा ।८८ गुणिता नवधा नित्या सूते मन्त्रं नवात्मकम् । नवक शक्तितत्वानां तत्त्वरूपा महेश्वरी ।८६ नवकं पीठशक्तीनां शृङ्गारादीन् रसान्नव । माणिक्यादीनि रत्नानि नव वर्गयुतानि सा ।६० देवी और देवों का हृदयङ्गम शुभ अष्ट गन्ध है । ब्रह्मागुणी आदि- भैरव-सर्प मूर्त्तियाँ-दिशाएं और वसुगण अष्टाष्टक आदि से सम- न्वित महादेवी के आठ पीठ है । घे प्रकृतियाँ आठ है—विघ्न क्रम से व ऋ्रतुण्ड आदिक-आणिमादि—गण—नाग—वह्िनकी मूर्ति-यमा- दिक अन्य सब जगत्में सदा विस्तार करते हैं सब अष्टात्मक ही है ।८६। ८७-८८। नित्या नौ प्रकार से गुणित नौ सख्य के स्वरूप वाले मन्त्र को प्रसूत करती है । तत्त्व रूपा महेश्वरी शक्ति तत्त्वों का नवक करती है ।८६। पीठ शक्तियाँ का नवक है और शृङ्गारादि रस नौ होते हैं । वह माणिक्य आदि रत्न भी जो वर्गों से युक्त है नौ ही है ।६०। नवकं प्राणदूतीनां मण्डलं नवक शुभम् । यद्यन्नवात्मकं लोके सर्वमस्या उदञ्चति ।६१ दशधा विकृता शम्भोर्भामिनी भवदुःखहा । दशाक्षरं गणपतेस्त्वरिताया दशाक्षरम् ।६२ दशाक्षरं सरस्वत्या यक्षिण्याः सा दशाक्षरम् । वासुदेवात्मकं मन्त्रमश्वारुढा दशाक्षरम् । ६३ त्रिपुरा दशकूटं स्यात् त्रिपुराया दशाक्षरम् । नाम्ना पद्मावतीमन्त्रं रमामन्त्रं दशाक्षरम् ।६४ दशकं शक्तितत्त्वानां तत्त्वरूपा महेश्वरी । नाडीनां दशकं विष्णोरवतारान् दशा क्रमात् ।६५ प्राणदूतियों का नवक है और परम शुभ मण्डल का नवक होता
२४ । प्रथम पटल है। जो-जो भी लोक में नवात्मक है वह सब इसकीही उदञ्चित करता है ।६१। शम्भु की भामिनी दश प्रकार से विकृत है जो भव के दुख का हरण करने वाली हैं। गणपति का मन्त्र दश अक्षरों वाला है और त्वरिता का दश अक्षरों वाला होता है ।६२। सरस्वती का मन्त्र दश अक्षरों से युत है तथा यक्षिणी का दशाक्षर है। वासुदेवके स्वरूप वाला मन्त्र और अश्वारूढ़ा का मन्त्र दशाक्षर होता है ।६३। त्रिपुरा दशकूट है और त्रिपुरा का दश अक्षरों वाला है। नाम से पदमवती का मन्त्र और रमा का मन्त्र दशाक्षर है ।६४। महेश्वरी तत्त्वरूपा हैं और शक्ति के तत्वों का दशक होता है। क्रम से विष्णु के दश अवतार है और नाड़ियोंका दशक होता है ।६५। दशकं लोकपालानां यद्यदन्यत् सृजत्यसौ । एकादश क्रमात्संविद्गुणिता सा जगन्मयी ।६६ रुद्रैकादशनीमाद्याशक्तेरेकादशाक्षरम् । एकादशाक्षरं वाण्या रुद्रानेकादश क्रमात् ।६७ समुद्धरति सर्वात्मा गुणिता द्वादश क्रमात् । नित्यामन्त्रं महेशान्याः वासुदेवात्मकं मनुम् ।६८ राशीन् मासान् (भानून्) हरेर्मूर्तीर्यन्त्रं सा द्वादशात्मकम् । अन्यदेतादृशं सर्वं यत्तदस्यामजायत ।६६ लोकपालों का दशक होता है और यह जो जो भी अन्य का सृजन करती है। वह जगन्मयी क्रम से गुणिता सम्वित् एकादश हैं ।६६। रुद्र एकादश हैं और नीमादि शक्ति के एकादश अक्षर हैं। वाणी का मन्त्र एकादश अक्षरों वाला है और क्रम से रुद्र एकादश होते हैं ।६७। गुणिता सर्वात्मा क्रम से द्वादश समुद्धरण करती हैं। महेशानी का नित्या मन्त्र-वासुदेव के स्वरूप वाला मन्त्र, राशियाँ—मांस—हरि की मूर्तियाँ आदि द्वादशात्मक ही हैं। अन्य ऐसा सब जो है वह इससे उत्पन्न हुआ है ।६८-६६।
श्री शारदा तिलक ] २५ चतुर्विंशति सत्त्वात्मा यदा भवति शोभना । गायत्रीं सवितुः शम्भोः गायत्रीं मदमात्मिकाम् ॥१०० गायत्रीं विष्णुगायत्रीं गायत्रीं त्रिपदात्मनः । गायत्रीं दक्षिणामूर्त्तेः गायत्रीं शम्भुयोषितः ॥१०१ चतुर्विंशतितत्त्वानि तस्यामासन् परात्मनि । द्वाविंशद्भेदगुणिता सर्वमन्त्रमयी विभुः ॥१०२ सूते मृत्युञ्जयं मन्त्रं नारसिंहं महामनुम् । लवणद्यं मनुं वरुणस्य महात्मनः ॥१०३ हयग्रीवं मनुं दौर्गं वाराहं वह्निनायकम् । गणेशितुर्महामन्त्रं मन्त्रमन्नाधिपस्य। सा (च) ॥१०४ मन्त्रं श्रोदक्षिणामूर्तेर्मालामन्त्रं मनोभवः । त्रैष्टुभं वनवासिन्या अघोराख्यं महामनुम् ॥१०५ चौबीस तत्वों के स्वरूप वाली शोभना होती है। सविता की गायत्री-मदनात्मिका शम्भू की गायत्री-गायत्री-विष्णु की गायत्री त्रिप दात्मा की गायत्री-दक्षिणामूर्त्ति की गायत्री-शम्भयोषित की गायत्री-उस परात्मा में चौबीस तत्त्व होते हैं। द्वाविंशत् (बाईस) भेद गुणिता सर्व- मन्त्रमयो विभु निम्नलिखित मन्त्रों को प्रसूत किया करती है-मृत्युञ्जय मन्त्र, नारसिंह महामन्त्र, लवणाद्य मन्त्र, महात्मा वरुणका मन्त्र, हयग्रीव- मन्त्र, दुर्गा का मन्त्र-बाराह मन्त्र, वन्हिनावक मन्त्र, गणेशका महामन्त्र, अन्नाधिप का मन्त्र-श्री दक्षिणामूर्त्तिका तन्त्र-मनोभव माता मन्त्र-वनवा- सिनीं का त्रैष्टुभ मन्त्र अघोर नामक महा मन्त्र को वह प्रसूत करती है ।१००-१०५। भद्रकालीमनुं लक्ष्म्या मालामन्त्रं यमात्मकम् । मन्त्रं सा देवकीसनोर्मन्त्रं श्रीपुरुषोत्तमम् ॥१०६ श्रीगोपालमन्त्रं भूमेमन्त्रं तारामन्त्रं क्रमात् । महामन्त्रं महालक्ष्म्यामन्त्रं भतेश्वरस्य सा ॥१०७ क्षेत्रपालात्मकं मन्त्रं मन्त्रमापन्निवारणम् । सूते सातङ्गिनों विद्यां सिद्धविद्यां शुभोदयाम् ॥१०८
२६ [ प्रथम पटल अनेन क्रमयोगेन गुणिता शिववल्लभा । षट् त्रिंशतं च तत्त्वानां (नि) शैवानां (न) रचयत्यहौ ॥१०६ अन्यान्मन्त्रांश्च यन्त्राणि शुभदानि प्रसूयते । द्विचत्वारिंशता मूले गुणिता विश्वनायिका ॥११० लक्ष्मीका भद्रकाली मन्त्र, यमात्मकमाया मन्त्र, देवकीसूनुका मन्त्र, श्री पुरुषोत्तम मन्त्र, श्री गोपाय का मन्त्र, भूमि का मन्त्र और क्रम से तारा का मन्त्र, महालक्ष्मी का महामन्त्र और भूतेश्वर के मन्त्र को वह प्रसूत करती है । क्षेत्रपाल के स्वरूप वाला मन्त्र और आपदाओं के निवारक मन्त्र को वह प्रसव किया करती है । वह मातङ्गिनी विद्याको तथा शुभोदय वाली सिद्ध विद्या को प्रसूत करती है ।१०६-१०८। इस क्रम से गुणों के योगसे शिववल्लभा गुणित होती है और यह शैव चौबीस तत्त्वों की रचना किया करती है ।१०६। मूल में बयालीस से गुणिता विश्वनायिका अन्य मन्त्रों को और शुभ पद मन्त्रों को प्रसूत किया करती है ।११०। सा प्रसूते कुण्डलिनी शब्दब्रह्ममयी विभ । शक्तिं ततो ध्वनिस्तस्मात् नादस्तस्मान्निरोधिका ॥१११ ततोऽर्द्धेन्दुस्ततो विन्दुस्तस्मादामीतत्परा ततः । पश्यन्ती मध्यमा वाची वैखरी शब्दजन्मभूः ॥११२ इच्छाज्ञानक्रियात्माऽसौ तेजारूपा गुणात्मिका । क्रमेणानेन सृजति कुण्डली वर्णमालिकाम् ॥११३ अकारादिसकान्तां द्विचत्वारिंशदात्मिकाम् । पञ्चाशद्वारगुणिता पञ्चाशद्वर्णमालिकाम् ॥११४ सूते तद्वर्णतोऽभिन्ना कला रुद्रादिकान् क्रमात् । निरोधिका भवेद्वह्निरर्द्धेन्दुः स्यान्निशाकरः ॥११५ अर्कः स्यादुभयोर्योगे बिन्द्रात्मा तेजसां निधिः । जाता वर्णा यतो बिन्दोः शिवशक्तिभयादतः ।.११६
श्री शारदा तिलक ] २७ अग्निषीमात्मकास्ते स्युः शिवशक्तिमयाद्रवेः । येन संभवमापन्नाः सोमसूर्याग्निरूपिणः ॥११७ वह विभु शब्द ब्रह्ममयी कुण्डलिनीको प्रमूत करती है। उससे निरो- धिका शक्ति होती है फिर उसने ध्वनि होती है और उससे नाद हुआ करता है ।१११। फिर उससे अर्धेन्दु होता है फिर बिन्दु फिर उससे परा होती है। पश्यन्ती मध्यमा, वाणी में वैखरी शब्दों के जन्म का स्थान है। यह इच्छा-ज्ञान और क्रिया के स्वरूप वाली गुणात्मिका तेजके रूप वाली है। इसी क्रम से कुण्डली वर्णों की माला का सृजन किया करती है ।११२-११३। वह अकार के आदि से लेकर सकार के अन्त तक बया- लीस वर्णों के स्वरूप वाली होती है ।११४। उन वर्णों से अभिन्न कला क्रम से रुद्रादिक को प्रसूत करती है । दन्हि निरोधिका होती है और अर्धेन्दु निशाकर होता है ।११५। दोनों के योग में विन्दु के स्वरूप वाला तेजों की निधि सूर्य होता है। क्योंकि इस शिव-शक्ति के भय से वर्ण समुत्पन्न हैं ।११६। वे शिव शक्ति के स्वरूप वाले रवि से अपनी षोमात्मक होते हैं। जिससे सोम-सूर्य और अग्नि के रूप वाले सम्भव हुए हैं ।११७। ॥ द्वितीय पटल ॥ ततो व्यक्तिं प्रवक्ष्यामि वर्णानां वदने नृणाम् । प्रेरिता मरुता नित्यं सुषुम्णारन्ध्रनिर्गताः ॥१ काण्ठादिकरणैर्वर्णाः क्रमादाविर्भवन्ति ते । एषु स्वराः स्मृताः सौम्याः स्पर्शाः सौराः शुभोदयाः ॥२ आग्नेया व्यापकाः सर्वेसोमसूर्याग्निदेवताः । स्वराः षोडश विख्याताः स्पर्शास्ते पञ्चविंशतिः ॥३
२८ [ द्वितीय पटल तत्वात्मनः स्मृताः स्पर्शाः मकारः पुरुष यतः । व्यापका दश ते कामधनधर्मप्रदायिनः ॥४ ह्रस्वः स्वरेषु पूर्वोक्तः परो दीर्घः क्रमादिमे । शिवशक्तिमयास्ते स्युर्बिन्दुसर्गावसानकाः ॥५ इसके अनन्तर मनुष्यों के मुख में वर्णों की अभिव्यक्ति को बतलाया जायगा । नित्य ही वायु के द्वारा प्रेरित हुए सुषुम्णा के रन्ध्र से निर्गत हुए कण्ठ आदि करणों द्वारा क्रम से वर्ण आविर्भूत होते हैं । इनमें सौम्य-शुभोदय-स्पर्श-सौर स्वर कहे गये हैं ।१-२। सब सोम सूर्य और अग्नि देवता आश्रय और व्यापक हैं । स्वर सोलह विख्यात हैं और स्पर्श संज्ञक 'क' से आदि लेकर मकारपर्यन्त पच्चीस हैं । ये सभी स्पर्श संज्ञा वाले वर्ण तत्व के स्वरूप वाले कहे गये हैं मकार पुरुष अर्थात् परमात्मा विश्वरूप होता है । वे दश व्यापक हैं जो धन-धर्म और काम के प्रदान करने वाले होते हैं ।३-४। स्वरो में ह्रस्व पूर्वोक्त है और दीर्घ पर है । क्रम से ये शिव शक्तिमय होते हैं । जिनके अवसान में बिन्दु और विसर्ग हैं ।५। बिन्दुः पुमान् रविः प्रोक्तः सर्गः शक्तिर्निशाकरः । स्वराणां मध्यगं यच्च तच्चतुष्ट नपुंसकम् ॥६ पिङ्गलायां स्थिता ह्रस्वा इडायां सङ्गताः परे । सुषुम्णा मध्यगा ज्ञेयाश्चत्वारो ये नपुंसकाः ॥७ विना स्वरैस्तु नान्येषां जायते व्यक्तिरञ्जसा । शिवशक्तिमयान्प्राहुस्तस्माद्वार्णान्मनीषिणः ॥८ कारणात्पञ्चभूतानामुद्भूता मातृका यतः । ततो भूतात्मका वर्णाः पञ्चपञ्चविभागशः ॥६ वाय्वग्निभूजलाकाशाः पञ्चाशल्लिपयः क्रमात् । पञ्च ह्रस्वः पञ्च दीर्घा बिन्दुन्ता सन्धिसम्भवा ॥ १० पञ्चाशत्कादयः पक्षलसहान्ताः समीरिताः । सोमसूर्याग्निभेदेन मातृकावर्णसम्भवाः ॥११
श्रीशारदा तिलक ] २६ बिन्दु पुमान् है और रवि कहा गया है । विसर्ग शक्ति निशाकर है स्वरों में जो मध्य में स्थित है वह चतुष्क नपुंसक होता है ।६। ह्रस्व पिङ्गला में स्थित होते हैं-दूसरे इड़ा में सङ्गत हैं-मध्य में रहने वाले सुषुम्णा में जानने चाहिये जो चार नपुंसक हैं ।७। स्वरों के बिना अन्य वर्णों की अभिव्यक्ति शीघ्र नहीं हुआ करती है । इस कारण से मनीषी गण वर्णों को शिव शक्ति से परिपूर्ण कहा करते है ।८। क्योंकि पञ्च- भूतोंके कारण से मातृ का समुद्भूत हुई है । इससे पाँच-पाँच के विभाग से वर्ण भूतात्मक होते हैं ।६। वायु, अग्नि, भू, जल और आकाश क्रम से पचास लिपियाँ हैं । पाँच ह्रस्व है और पाँच दीर्घ है-जिनके अन्त में विन्दु है वे सन्धि सम्भव होते हैं । 'कादि ष-क्ष-ल-स' और 'ह' अन्त वाले पचास कहे गये हैं । ये सोम-सूर्य और अग्नि के भेद से मातृका वर्ण से सम्भव होने वाले हैं ।१०-११। अष्टत्रिंशत्कलास्तन्मण्डहेव व्यवस्थिताः । अमृता मानदा पूषा तुष्टिः पुष्टीरतिवृतिः ॥१२ शशिनी चन्द्रिका कान्तिर्ज्योत्स्ना श्रीः प्रीतिरङ्गदा । पूर्णा पूर्णामृता कामदायिन्यः स्वरजाः कलाः ॥१३ तपिनी तापनी धू म्रा मरीचिर्ज्वलिनी रुचिः । सुषुम्णा भोगदा विश्वा बोधिनी धारिणी क्षमा ॥१४ कभाद्या वसुदाः सौयष्ठडान्ता द्वादशेरिताः । धू म्रार्चिरुष्मा ज्वलिनी ज्वालिनी विस्फुलिङ्गिकी ॥१५ उन-उनके मण्डली में अड़तीस कलाएं व्यवस्थित हैं । अमृता, मानदा, पूषा, तुष्टि, पुष्टि, रति, शशिनी, चन्द्रिका, कान्तिज्योत्स्ना, श्री, प्रीति, अङ्गदा, पूर्णा, पूर्णामृत, ये स्वरों मे सात कलायें काम दायिनी हैं ।१२-१३। तपनी, तापना, धूम्रा, मरीचि, ज्वालिनी, रुचि, सुषुम्णा, भोगदा, विश्वा, बोधिनी, धारिणी, क्षमा, कभाद्या, वसुदा, सौर्यष्ठडान्त द्वादश कही गयी है। धूम्रार्चि, ऊष्मा, ज्वालिनी, विस्फु- लिङ्गिनी ।१४-१५।
३० [ द्वितीय पटल सुश्रीः सुरूपा कपिला हव्यकव्यवहा अपि (इमाः) । यादीनां दशवर्णानां कला धर्म प्रदा इमाः (स्मृताः) ॥१६ अभयेष्टकरा ध्येयाः श्वेतपीतारुणाः क्रमात् । तारस्य पञ्चभेदेभ्यः पञ्चाद्वर्णगाः कलाः ॥१७ सृष्टिर्वृ (ऋ) द्धिः स्मृतिर्मेधा कान्तिर्लक्ष्मी धृतिः स्थिरा । स्थितिः सिद्धिरिति प्रोक्ताः कचवर्गकला क्रमात् ॥१८ अकारादु ब्रह्मणोत्पन्नास्तप्तचासीकरप्रभाः । एताः कर धृताक्षस्रक्पङ्कजद्वयकुण्डिकाः ॥१६ जरा च पालनी शान्तिरीश्वरी रतिकामुके । वरदा ह्लादिनी प्रीतिर्दीर्घाः स्पुष्टटवर्गगाः ॥२० सुश्री, स्वरूपा, कपिला, हव्यकव्यवहा और 'यादि' दश वर्णों की ये कलायें धर्म प्रद हैं । १६। क्रम से श्वेत-पीत और अरुण अभय तथा अभीष्ट की करने वाली ध्यान के करने के योग्य है । तार (प्रणव) के प्राप्त भेदों से पचास वर्णों में रहने वाली कलायें । १७। सृष्टि, वृद्धि, स्मृति, मेधा, कान्ति, लक्ष्मी, धृति, स्थिरा, स्थिति, सिद्ध ये क्रम से क च वर्णों की कलाये हैं । १८। ये अकार से ब्रह्मा के द्वारा उत्पन्न, तप्त सुवर्ण के समान प्रभा वाली हैं। ये करों में अक्ष माला, दो कमल और कुण्डिकाको धारण करने वाली हैं । १६। जरा, पालिनी, शान्ति, ईश्वरी, रति, कामुका, वरदा, ह्लादिनी, प्रीति, दीर्घा ये वृत्त वर्गों में रहने वाली हैं ।२०। उकरा विष्णनोत्पन्नास्तमालदलसन्निभाः । अभीति शंख (वर) चक्रेष्टवाहवः परिकीर्त्तिताः ।२१ तीक्ष्णा रौद्रा भया निद्रा तन्द्री क्षुत् क्रोधिनी क्रिया । उत्कारी मृत्युरेताः स्युः कथिताः पयवर्गगाः ।२२ रुद्रेण मारुतादुत्पन्नाः शरच्चन्द्रनिभप्रभाः । उद्वन्त्योऽभय शूलं कपालं बाहुभिर्वरम् ॥२३
श्रीशारदा तिलक ] ३१ ईश्वरेणोदिता बिन्दोः पीता श्वेताऽरुणाऽसिता । अनन्ता च पवर्णस्था जपाकुसुमसान्निभाः ॥२४ अभयं हरिणं टङ्कं दधाना बाहुभिर्वरम् । निवृत्तिः यप्रतिष्ठा स्याद्विद्याशान्तिरनन्तम् ॥२५ उकार भगवान् विष्णु के द्वारा समुत्पन्न है और ये तमाल दल के सदृश हैं । इनके करकमलों में अभयदान शंख, चक्र, वरदान कीर्तित किये गये हैं ।२१। तीक्ष्णा, रौद्रा, भया, निद्रा, क्षुत्, क्रोधिनी, क्रिया, उत्कारी, मृत्यु, ये पय वर्गों में से स्थित कही गयी हैं !२२। ये रुद्रदेव के द्वारा मार्ग से समुत्पन्न हैं और शरत्काल के चन्द्र के समान प्रभा से युक्त है । ये अपनी बाहुओं के द्वारा अभयदान शूल, कपाल और वरदान को उद्वहन करने वाली हैं ।२३। ईश्वर के द्वारा उदित बिन्दु से पीत, श्वेत, करुण और असित और अनन्त है जो पवर्ण में स्थित होती है तथा जपा के पुष्प न सदृश है ।२४। ये अपनी बाहुओं से अभय, हरिण टंक और वरदान को धारण करने वाली हैं । ये निवृत्ति, सप्रतिष्ठा, विद्या और शान्ति हैं ।२५। इन्दिरा दीपका चैव रेचिका मोचिका परा । सूक्ष्मा सूक्ष्मामृता ज्ञानामृता चाप्यायिनी तथा ॥२६ व्यापिनी व्योमरूपा स्युरनन्ताः स्वरसंयुताः सदाशिवेन सहिता नादादेताः सितत्विषः ॥२७ अक्षस्रक् पुस्तकगु णंकपालाढ्यकराम्बुजाः । न्यासे तु योजयेदादौ षोडशस्वरजाःकलाः । २८ इति पञ्चाशदाख्याताः कलाः सर्वसमृद्धिदाः । श्रीकण्ठानन्तसूक्ष्माश्च त्रिमूर्त्तिरमटेश्वरः ॥२६ अधींशोभारभूतिश्चातिथीशः स्थाणुको हरः । झिष्टीशो भौतिकः सद्योजातश्चानुग्रहेश्वरः ॥३० अक्रूरश्च महासेनः षोडशस्वरमूर्त्तयः । पश्चात् क्रोधोश-चण्डीश-पञ्चान्तक-शिवोत्तमाः ॥३१
३२ [ द्वितीय पटल अप्यैकरुद्रकूर्मै कनेत्राङ्कचतुराननाः। अजेयः सर्वसोमेशौतथालांघलितारुका ॥३२ अर्द्धनारीश्वरश्चोमाकान्तश्चाषाढिदण्डिनौ । स्युरद्रिर्मीनमेषाख्यौलोहितश्च शिखी तथा ॥३३ छगलण्डद्विरण्डेशौ महाकालसवालिगौ । भुजङ्गे शापनाकींशखड्गीशाख्या वकस्तथा ॥३४ श्वेतभृग्वीशनक्लिशिवाःसर्व्वर्त्त कस्ततः । एते रुद्राः स्मृता रक्ता धृतशूलकपालकाः ॥३५ इन्द्रिका, दीपका, रेचिका, सूक्ष्मा, सूक्ष्मा, सूक्ष्मामृता, ज्ञानामृता, आप्यायिनी, व्यापिनी, व्यामरूपा, स्वरों से समन्वित अनन्त है। सदाशिव के सहित ये सित कान्ति वाली नाद से हुई है।२६-२७। इनके करकमल अक्षमाला-पुस्तक-गुण और कपाल से युक्त हैं। न्यास करने के समय 'म' आदि में सोलह स्वरों से समुत्पन्न कलाओं को योजित करना चाहिए।२८। ये इस प्रकार से समस्त समृद्धियों के देने वाली पचास कलाये कही गयी हैं। स्वरों की सोलह मूर्त्तियाँ होती हैं-श्रीकण्ठ, अनन्त, सूक्ष्म, त्रिमूर्ति, अमरेश्वर, अर्धीश, भारभूति, अर्धीश, भारभूति, अतिथीश, स्थाणुक, हर, झिष्टीश, भौतिक, सद्योजात, अनुग्रहेश्वर, अक्रूर, महासन, ये ही सोलह मूर्त्तियाँ हैं। पीछे क्रोधीश, चण्डोश, पञ्चान्तक, शिवोत्तम, एक रुद्र, कूर्म, एक नेत्र, चतुरानन, अजेय, शर्व, सोमेश, लाङ्घालिता, रुक, अध नारीश्वर, उमाकान्त, आषाढ़ी, दण्डी, अद्रि, मीन, मेष, लोहित, शिखी, छगलण्ड, द्विरण्डेश, महाकाल, वाणी, भुजङ्गेश, पिनाकी, खङ्गीश, वक, श्वेतभृगु, ईश, नरति, शित्र, संवर्तक, ये रुद्र कहे गये हैं जिनका रक्त वर्ण है। और ये त्रिशूल और कपाल को धारण किये हुए हैं।२६-३५। पूर्णोदरीस्याद्धिरजा शातली तदनन्तरम् । लोलाक्षी वर्त्तुलाक्षी च दीर्घघोणा समीरिताः ।३६
द्वितीय पटल ] [ ३३ सुदीर्घमुखिगोमुख्यौ दीर्घजिह्वा तथैव च । कुण्डोदर्य्यूर्ध्वकशी च तथा विकृतमुख्यपि ।३७ ज्वालामुखी तथा श्रेया पश्चांदुल्कामुखी तथा । सुश्रोमुखी च विद्या तु ख्याताः स्यु स्वरशक्तयः ३८ महाकालोसरस्वत्यौ सर्वसिद्धिमन्विता । गौरी, त्रैलोक्यविद्या च मन्त्रशक्तिस्ततः परम् ।३६ आत्मशक्तिर्भूतमाता तथा लम्बो (म्भो) दरी मता । द्राविणी नागरी भूयः खेचरी चापि मञ्जरी ।४० पूर्णोदरी, विरजा, शाल्मली, लोलाक्षी, वर्तुलाक्षी, दीर्घघोणा, सदीर्घमुखी-गोमुखी,दीर्घ-जिह्वा-कुण्डोदरी-ऊर्ध्वकेशी-विकृत मुखो-ज्व ला मुखी, उल्कामुखी, सुश्री मुखी, विद्या, ये स्वरों की शक्तियों प्रसिद्ध है ।३६-३८। महाकाली, सरस्वती, सर्व सिद्धि गौरी, त्रैलोक्य विद्या, मन्त्र,शक्ति, आत्म, शक्ति,भूतमातां, लम्बोदरी, द्राविणी, नागरी, खेचरी, मंजरी, ।३६-४०। रूपिणी वारिणी पश्चात् काकोदर्यपि पूतना । स्याद्भद्रकाली योगिन्यो शंखिनी गर्जिनी तथा ।४१ कालरात्रिश्चकुब्जिन्या कपर्दिन्यपि वज्रया । जया च सुमुखेश्वर्यौ रेवती माधवी तथा ।४२ वारूणी वायवी प्रोक्ता पश्चाद्रक्षोविदारिणी । ततश्चसहजा लक्ष्मा व्यापिनी माययाऽन्विता ।४३ एता रुद्राङ्गपीठस्थाः सिन्दरारूणविग्रहाः । रक्तोत्पलकपालाभ्यामलं- कृतकराम्बुजाः ।४४ केशवनारायणमाधवगोविन्दविष्णवः । मधुसूदनसंज्ञोऽप्यः स्यात् त्रिविक्रमवामनौ ।४५ रूपिणी, वारिणी, काकोदरी, पूतना, भद्रकाली, योगिनी, शंखिनी,गर्जनी, कालरात्रि, कुब्जिनी, कपर्दिनी, वज्र,जया, सुमुखेश्वरी, रेवती, माधवी, वारूणी, दायवी,रक्षो विदारिणीसहजा,लक्ष्मा, व्यापिनी,
३४ ] [ श्रीशारदा तिलक माया, ये रुद्र देव के पीठ और अंक स्थित है। इनका शरीर सिन्दूर के समान अरुण है। इसके करकमलों में रक्तकमल और कपाल का परम शोभा रहती है ।४१-४४। केशव, नारायण, माधव, गोविन्द, विष्णु, मधुसूदन, त्रिविक्रम, वामन ।४५। श्रीधरश्च हृषीकेशः पद्मनाभस्ततः परम् । दामोदरोवासुदेवः सङ्कर्षण इतीरिताः ।४६ प्रद्युम्नश्चानिरुद्धश्च स्वराणां मूर्त्तयस्त्विमाः । पश्चाच्चक्री गदी शार्ङ्गी खड्गी शंखी हली पुनः ।४७ मुसली शूलिसंज्ञोऽन्यः पाशी स्यादांकुशी पुनः । मुकुन्दो नन्दजो नन्दी नरो नरकजिद्धरिः ।४८ कृष्णः सद्यः सात्वतः (सात्विकः स्यात् शौरिः शूरो जनार्दनः भूधरो विश्वमूर्त्तिश्च वैकुण्ठः पुरुषोत्तमः ।४६ बली बलानुजो बालो वृषघ्नश्च वृषः पुनः । हिंसो (हंसो) वराहो विमलो नृसिंहो मूर्त्तयो हलाम् ।५० श्रीधर, हृषीकेश, पद्मनाभ, दामोदर, वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, ये स्वरों की मूर्तियाँ होती है। चक्री, गदी अर्थात् गदाधारी, शार्ङ्गी, खङ्गी, शंखी, हली अर्थात् हल के धारण करने वाले, मुशली, शूली, पाशी, अंकुशी, मुकुन्द, नन्दल, नन्दी, नर, नरक- जित्, हरि, कृष्ण, सावन्त, शौरि, शूर, जनार्दन, भूधर, विश्व, मूर्ति, बैकुण्ठ, पुरषोत्तम-वली, बलानुज,वाल, वृषघ्न, वृष, हंस, वराह, विमल और नृसिंह ये हलों अर्थात् व्यंजनों की मूर्तियाँ होती है ।४६-५०। केशवाद्या इमे श्यामाश्चक्रशंखलसत्कराः । कीर्तिः कान्तिस्तुष्टिपुष्टी धृतिःक्षान्तिः क्रियाः दया ।५१ मेधा सहर्पा श्रद्धा स्याल्लजा लक्ष्मीः सरस्वती। प्रीती रतिरिमाः प्रोक्ताः क्रमेण स्वरशक्तयः ।५२
द्वितीय पटल ] [ ३५ जया दुर्गा प्रभा सत्या चण्डा वाणी विलासि (शालि) नी । विजया विरजा विश्वा विनदा सुनदा स्मृतिः । ५३ ऋद्धिः समृद्धिः शुद्धिः स्यात् भक्तिबुद्धिः स्मृतिः (१) क्षमा । रमोमा क्लेदिनी क्लिन्ना वसुधा वसुदाऽपरा । ५४ परा परायणी सूक्ष्मा सन्ध्या प्रज्ञा प्रभा निशा । अमोघा विद्युता चेति कीर्त्याद्याः सर्वकामदाः । ५५ केशव से आदि लेकर ये श्याम शंख - चक्र से शोभित करकमलों वाले हैं । कीर्ति कान्ति, तुष्टि, पुष्टि, धृति, श्रान्ति, क्रिया, दया, मेधा सहर्षा, श्रद्धा, लज्जा, लक्ष्मी, सरस्वती, प्रीति, रति, वे क्रम से स्वरों की शक्तियाँ बतलाई गई हैं । ५१-५२। जया] दुर्गा, प्रभा, सत्या, चण्डा, वाणी, विलासिनी, विजया, विरजा, विश्वा, विनदा, सुनदा, स्मृति, ऋद्धि समृद्धि, शुद्धि, भक्ति, वृद्धि, स्मृति, क्षमा, रमा, उमा, क्लेदिनी, क्लिन्ना, वसुधा. वसुदा, अपरा, परा, परायणी, सूक्ष्मा, सन्ध्या, प्रज्ञा, प्रभा, निशा, अमोघा, विद्युता और कीर्ति आदि सब कामनाओंके प्रदान कर ने वाली हैं । ५३-५५। एताः प्रियतमाङ्केषु निष्षणाः सस्मिताननाः । विद्युद्दामसमानाङ्ग्यः पङ्कजाऽभयवाहवाः । ५६ मातृकाकावर्णभेदेभ्यः सर्वे मन्त्राः प्रजज्ञिरे । मन्त्रविद्याविभागेन त्रिविधा मन्त्रजातयः । ५७ मन्त्राः पुंदेवता ज्ञेया विद्याः स्त्रीदेवताः स्मृताः । पुंस्त्रीनपुंसकात्मानो मन्त्राः सर्वे समीरिताः । ५८ पुंमन्त्रा हुफडन्ताः स्युर्द्विठान्ताश्च स्त्रियो मताः । नपुंसका मनोनन्ताः स्युरित्युक्ता मनवस्त्रिधा । ५६ शस्तास्ते त्रिविधा मन्त्रा वश्यशान्त्यभिचारके । अग्नीषोमात्मका पन्त्रा विज्ञेयाः क्रूरसौम्ययो । ६० ये सब अपने प्रियतम की गोद में विराजमान हैं और इनका मुख
३६ ] [ श्री शारदा तिलक मन्दस्मित से समन्वित है। इनके अङ्ग विद्युल्लता के समान हैं और ये पंकज तथा अभय दान को करकमलों के द्वारा वहन करने वाली है। ।५६। मातृका वर्णों के भेदों से ही सब मन्त्र समुत्पन्न हुए हैं। मन्त्र विद्या के द्वारा मन्त्रों की जातियां तीन प्रकार की है ।५७। मन्त्रों के देवता पुमान् होते हैं और विद्याएं स्त्रीदेवता वाली कहींगयी हैं। सभी मन्त्र पुमान् - नपुंसक और स्त्री संज्ञा वाले कहे गये हैं ।५८। जिन मन्त्रों के अन्त में हुँफट् होता है वे मन्त्र पुमान् कहे गये हैं और जिन के अन्त में दो ठकार अर्थात् ठ-ठ होने पर वे मन्त्र स्त्री संज्ञा वाले माने गये हैं। जो मन्त्र नपुंसक होते हैं उसके अन्त में नमः—यह होता है। इस रीति से मन्त्र तीन प्रकार वाले होते हैं ।५६। वे तोनों प्रकार के मन्त्र वश्य कर्म-शान्ति कर्म और अभिचार में प्रशस्त होते हैं। मन्त्र अग्नीषोम के स्वरूप वाले जानने चाहिए, क्रूर और सौम्य कर्मों में ।६०। कर्मणोर्वहिनतारान्त्यवियत्प्रायाः समोरिताः । आग्नेया मनवः सौम्या भूयिष्टेन्द्वमृताक्षराः ।६१ आग्नेयाः संप्रबुध्यन्ते प्राणे चरति दक्षिणे । भागेऽन्यस्मिन् स्थिते प्राणे सौम्या बोधं प्रयान्ति च ।६२ नाडीद्वय गते प्राणे सर्वे बोधं प्रयान्ति च । प्रयच्छन्ति फलं सर्वे प्रवृद्धा मन्त्रिणां सदा ।६३ छिन्नादिदृष्टा ये (१) मन्त्राः पालयन्ति न साधकम् । छिन्नो रुद्धः शक्तिहीनः पराङ् मुख उदीरितः ।६४ बधिरो नेत्रहीनश्च कीलित स्तम्भित स्तथा । दग्धस्त्रस्तश्च भीतश्च मलिनश्च तिरस्कृतः ।६५ जिनके अन्त में वहिनतार और वियत् प्राया होते हैं वे ही बतलाये गये हैं अर्थात् क्रूर और सौम्यकर्मोंमें उनका ही प्रयोग करना चाहिए। आग्नेय मन्त्र सौम्य होते हैं जिसमें विशेष करके अधिकता में इन्दु-अमृत अक्षर होते हैं ।६१। दक्षिण में प्राण के चरण करने पर आग्नेय मन्त्र
द्वितीय पटल ] [ ३७ प्रबुद्ध हुआ करते हैं । दूसरे भाग में प्राण के स्थित रहनेपर सौम्य मन्त्र बोध को प्राप्त हुआ करते हैं ।६२। दोनों नाडियों से प्राण के गत हो जाने पर सभी मन्त्र बोध को प्राप्त होते हैं । मन्त्र धारियों के जब मन्त्र प्रबुद्ध होते हैं तभी सब फल दिया करते हैं ।६३। छिन्नादि दोषों से युक्त हुए मन्त्र साधक का पालन नहीं किया करते । उनके नाम छिन्न, शक्ति से हीन और पराङ्मुख कहे गये हैं ।६४। बधिर, नेत्रहीन, कीलित, स्तम्भित दग्ध, त्रस्त, भीत मलिन, तिरस्कृत ।६५। भेदितश्च सुषूप्तश्च मन्दोन्मतश्च मूर्च्छितः । हतवीर्यश्चहीनश्चप्रध्वस्तो बालकः पुनः ।६६ कमारस्तु युवा प्रोढो वृद्धो निस्त्रंशकस्तथा । निर्बीजः सिद्धहीनश्चय मन्दः कूटस्यथा पुनः ।६७ निरंशः सत्त्वहीनश्चकेकरो बीजहीनकः । धूमितालिङ्गितौ स्यातां मोहितश्चक्षुधार्तकः ।६८ अतिदृप्तोऽङ्गहोमश्च(नःस्याः) अतिक्रुद्धःसमीरितः । अतिक्रूरश्चसब्रीडः शान्तमानस एव च ।६६ स्थानभ्रष्टत विकलः सोऽतिवृद्धः प्रकीर्त्तितः निःस्नेहः पीडितश्चापि वक्ष्यत्येषां च लक्षणम् ।७० भेदित-सुषुप्त-मन्दोन्मत्त-मूर्च्छित-हतवीर्य-और हीन तथा बालक ये प्रध्वस्त हैं ।६६। कुमार, युवा-प्रौढ़-वृद्ध तथा निस्त्रिंशक, निर्बीज सिद्धिहीन, मन्द, कूट, निरंश, सत्वहीन, केकर, बीज, हीनक, भूमित अलिङ्गित, मोहित, क्षुधार्तक, आदिट्प्त, अति क्रुद्ध कहे गये हैं । क्रीड़ा सहित, शान्त मानस-जाति क्रूर है । स्थान भ्रष्ट विफल होता वह अति वृद्ध कहा गया है, जो नि.सन्देह और पीड़ित होता है - इनका लक्षण बताया जायेगा ।६७-७०। सञ्जोर्यस्यादिमध्यान्तेष्वानिलं बोजमुच्यते । संयुक्तं वा वियुक्तं वा स्वराक्रान्तं त्रिधा पुनः ।७१
३८ ] [ श्रीशारदा तिलक चतुर्द्धा पञ्चधा वा स्युः (ऽथ) स मन्त्रश्छिन्नसंज्ञकः । आदिमध्यावसानेषु भूबीजद्वन्द्व लाञ्छितः ।७२ रुद्धमन्त्रः स विज्ञेयो भुक्तिमुक्तिविवर्जितः । मायात्रितत्वश्रीबीजरावहीनस्तु योमनुः ।७३ शक्तिहीनः स कथितो, यस्य मध्ये न विद्यते । कामबीजं मुखे माया शिरस्यङ्कुशमेव वा ।७४ असौ पराङ् मुखः प्रोक्तो, हकारो विन्दुसंयुतः । आद्यन्तमध्येष्विन्दुर्वाद्वौ नाभावेद्वधिरः स्मृतः ।७५ जिस मन्त्र के अन्त में-मध्य में और आदि में अनिल बीज कहा जाता है, संयुक्त हो अथवा वियुक्त हो तीन प्रकार से स्वर क्रान्त होवे अथवा चार या पाँच प्रकार से होवे, वह छिन्न संज्ञा वाला हुआ करता है। जो आदि मध्य और अवसान के भूबीज के इन्द्र से लाञ्छित होता है वह मन्त्ररुद्ध समझना चाहिए। जो भुक्ति और मुक्तिसे रहित हुआ करता है। जो माया-त्रितत्व-श्रीबीज से अवहीन मन्त्र होता है वह शक्तिहीन कहा गया है। जिसके मध्य में काम बीज नहीं होता है- मुख में माया ओर शिर में अंकुश नहीं है वह मन्त्र पराङ्मुख कहा गया है। बिन्दु से संयुक्त हकार अथवा आदि-अन्त और मध्य में इन्दु नहीं होता है, वह बधिर कहा गया है ।७१-७५। पञ्चवर्णोमनुर्यः स्याद्रेफार्केन्दुविवर्जितः । नेत्रहीनः स विज्ञेयोदुःखशोकभयप्रदः ।७६ आदिसध्यावसानेषु हंसः प्रासादवाग्भवौ । हकारो बिन्दुभाञ्जीवो रावश्चापि चतुष्कलम् ।७७ माया नमामि च पदं नास्ति यस्मिन्स कीलितः । एक मध्ये द्वयं मूर्द्धनि यस्मिन्नस्त्रपुरन्दरौ ।७८ न विद्यते, स मन्त्रः स्यात्स्तम्भितः सिद्धिरोधकः । वह्निवायु॑समामुक्तो यस्य मन्त्रस्य मूर्द्धनि ।७९
द्वितीय पटल ] [ ३६ सप्तधा दृश्यते तं तु दग्धं मन्येत मन्त्रवित् । अस्त्रं द्वाभ्यां त्रिभिः षड्भिरष्टाभिर्दृश्यतेऽक्षरैः ।८० जो मन्त्र पाँच वर्णों वाला होवे और रेफ-इन्दु और अर्क से रहित होवे उसे नेत्रहीन समझना चाहिए। वह दुःख, शोक और भय के देने वाला हुआ करता है ।७६। आदि-मध्य और अवसान में चतुष्कल राव भी हो तथा माया और नमामि -यह पद जिसमें नहीं है वह कीलित कहा गया है । मध्य में एक-दो मूर्धा में जिसमें अस्त्र और पुरन्दर नहीं होते हैं वह मन्त्र स्तम्भित और सिद्धि का रोधक होता है । जिस मन्त्र के मूर्धा में वहिन वायु समायुक्त सात प्रकार से दिखलाई दिया करता है, मन्त्रों के ज्ञाता उस मन्त्र को दग्ध मानते हैं। जो दो से अस्त्र और तीन वकारों से ऐसे आठ से अक्षरों युक्त होता है ।७७-८०। त्रस्तः सोऽभिहितो यश्य मुखे न प्रणवः स्थितः । शिवो वा शक्तिरथवा भीताख्यः स प्रकीर्तितः ।८१ आदिमध्यावसानेषु भवेन्तार्र्णचतुष्टयम् । यस्य, मन्त्रः स मलिनो मन्त्रवित्त विवर्जयेत् ।८२ गरु मध्ये दकारोऽथ (वा) क्रोधो वा मूर्द्धनि द्विधाः । अस्त्रं तिष्ठति मन्त्रः स तिरस्कृत उदाहृतः ।८३ भ्योद्वयं हृदये शीर्षे वषठ् वौषट् च मध्यतः । यस्यासौ भेदितो मन्त्रस्त्याज्यः सिद्धिषु सूरिभिः ।८४ त्रिवर्णे हंसहीनो यः सुषुप्तः स उदाहृतः । मन्त्रो वाऽप्यथवाविद्या सप्ताधिकसताक्षरः ।८५ जिसके मुख में प्रणव स्थित नहीं होता है वह मन्त्र त्रस्त समझना चाहिए । शिव अथवा शक्ति न हो वह मन्त्र भीत कहा गया है ।८१। जिसके आदि—मध्य और अवसान में मार्णव चतुष्टय हो अर्थात् चार मवर्ण होवे वह मन्त्र मलिन होता है । मन्त्रों का ज्ञाता उसको वर्जित कर देवे ।८२। जिसके मध्य में हुँकार हो अथवा मूर्धा में क्रोध होवे और दो प्रकार से अस्त्र स्थित होता है वह मन्त्र तिरस्कृत कहागया है ।
४० ] [ श्री शारदा तिलक ।८३। भ्योद्वय हृदय में-शीर्ष में वषट् और मध्य में वौषट् होवे वह मन्त्र भेदित होता है। सूरियों के द्वारा वह मन्त्र सिद्धियों में सर्वदा त्याग करने के योग्य होता है ।८४। जो तीन वर्णों से युक्त और हंस से हीन होता है वह मन्त्र सुषुप्त कहा गया है। मन्त्र हो अथवा विद्या हो सत्रह अक्षरों वाला हो ।८५। फट्कारञ्चकादिर्यो मदोन्मत्तः उदीरि (उदाहृ) तः । तद्वदस्त्वं स्थितं मध्ये यस्य, मन्त्रः स मूर्च्छितः ।८६ विरामस्थानगं यस्य हतवीर्य्यः स कथ्यते । आदौ मध्ये तथा मूर्द्धिन चतुरस्त्रयतो मनुः ।८७ ज्ञातव्यो हीन इत्येषु यः स्यादष्टादशाक्षरः । एकोनविंशत्वर्णो वा यो मनुस्तारसंयुतः ।८८ हल्लेखाङकुशबीजाद्य स्तत्प्रध्वस्तं प्रचक्षते । सप्तवर्णो मनुर्बालः कुमारोऽष्टाक्षरस्तु यः (स्मृतः) ।८६ षोडशार्णो युवा, प्रोक्तश्च वारिंशल्लिपर्मनुः । त्रिशवर्णश्चतृष्पष्टिवर्णी मन्त्रः शताक्षरः ।६० जिसके आदि में फट्कार पञ्चक होवे वह मन्त्र मन्दोमत्त कहा गया है। उसी भाँति जिसके मध्य में अस्त स्थित होवे वह मन्त्र मूर्च्छित कहा गया है ।८६। जिसके विराम के स्थानमें गत हो वह मन्त्र हतवीर्य्यक कहा जाता है। आदि में-मध्य में और मूर्धा में जो चतुः- अस्त्रों से युक्त होवे वह मन्त्र हीन जानना चाहिए। जो अठारह अक्षरों वाला होता है-अथवा जो मन्त्र उन्नीस अक्षरों वाला होवे और तार से अर्थात् प्रणव से समन्वित होवे, जिसके आदि में रहने वाले हृल्लेखा- अंकुश और बीज होवे उस मन्त्र को प्रध्वस्त कहा जाता है। सात वर्णों वाला मन्त्र बाल होता है। आठ अक्षरों वाला मन्त्र कुमार कहा गया है। सोलह वर्णों वाला युवा होता है तथा अड़तालीस का मन्त्र प्रौढ़ दुरता है। तीस वर्णों वाला चौसठ वर्णों वाला शताक्षर मन्त्र- वृद्ध होता है ।८७-६०।
द्वितीय पटल ] [ ४१ चतुः शताक्षरश्चापि वृद्ध इत्यभिधीयते । नवाक्षरो ध्रुवयुतो मनुर्निस्त्रिंश ईरितः । ६१ यस्यावसाने हृदयशिरोमन्त्रौ च मध्यतः । शिखा वर्म च न स्यातां वौषट् फट्कार एव च । ६२ शिवशक्त्यर्णहीनो वा स निर्वोज इति स्मृतः । एष स्थानेषु फट्कारः षोढा यस्मिन्प्रदृश्यते । ६३ स मन्त्रः सिद्धिहीनः स्यात्, मन्दः षड्वत्यक्षरो मनुः । कूट एकाक्षरो मन्त्रः स एवोक्तो निरंशुकः .६४ द्विवर्णः सत्वहीनः स्यात्, चतुर्वर्णस्तु केकरः । षडक्षरो बीजहीन, स्त्वर्द्धसप्ताक्षरो मनुः । ६५ और एक सौ चार अक्षरों वाला भी मन्त्र वृद्ध कहा गया है । नौ अक्षरों वाला ध्रुवसे समन्वित मन्त्र निस्रिंश कहा गया है । ६१। जिसके अवसान में हृदय और शिरोमन्त्र होवे-मध्यमें शिखा होवे और वर्म होवे और वौषट् तथा भट्कार होवे और शिव भक्ति से हीन होवे वह् मन्त्र निर्बीज कहा गया है । जिन स्थानों में छै बार फट्कार दिखलाई दिया करता है वह मन्त्र सिद्धिहीन होता है और षडवत्यक्षर मन्त्र मन्द होता है । एकाक्षर मन्त्र कूट होता है और वह ही निरंशुक कहा गया है । । ६२-६४। दो वर्णों वाला मन्त्र सत्व से हीन हुआ करता है और चार वर्णों वाला मन्त्र केकर होता है । छै अक्षरों का मन्त्र बीज हीन होता है । उसी भाँति अर्ध सात अक्षरों वाला है । ६५। सार्द्धद्वादशवर्णो वा धूमितः स तु निन्दितः । सार्द्धवीसत्रयक्तद्वदेकविंशतिवर्णकः । ६६ विंशत्यर्ण स्त्रिंशवर्णो यः स्यादालिङ्गितस्तु सः । द्वात्रिंशदक्षरो मन्त्रो मोहितः परकीर्त्तितः । ६७ चतुर्विंशतिवर्णो यः सप्तविंशतिवर्णकः । क्षुधार्त्तः स तु विज्ञेयश्चतुर्विंशतिवर्णकः । ६८