शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
तृतीयोऽध्यायः ] नाडीपरीक्षादिविधिः 29 गति या धमन भी भिन्न-भिन्न होता है, जैसा कि उपर्युक्त श्लोकों द्वारा कहा गया है। वस्तुतः धमनी का धड़कना हृदय की धड़कन का सूचक है अर्थात् जितनी बार हृदय रक्त को शरीर की ओर प्रेरित करता है, उतनी ही बार धमनी उभरती हुई मालूम होती है। स्वस्थ एवं आराम से बैठे हुये मनुष्य की धमनी प्रति मिनट (एक मिनट में) निम्न प्रकार फड़कती है। जन्म से 5 मास तक प्रति मिनट 115 से 140 बार फड़कती है।
आयु एक मिनट में
6 मास से 1 वर्ष 115 से 105 बार 2 वर्ष से 6 वर्ष 105 से 90 बार 7 वर्ष से 10 वर्ष 90 से 80 बार 11 वर्ष से 14 वर्ष 80 से 75 बार 15 वर्ष से 60-70 वर्ष प्रायः 75 से 70 बार 70 वर्ष के पश्चात् 85 से 80 बार
आप किसी की धमनी के मन्द, स्थिर अथवा वेगवती होने का निर्धारण इन आँकड़ों को मन में रखकर ही कर सकेंगे। अतः इन्हें स्मरण रखना चाहिये और घड़ी देखते हुये सावधान होकर धमनी की गतियों को गिन लेना चाहिये। अधिकांश चिकित्सक नाड़ी देखकर रोग को पूर्णरूप से जान लेने का प्रयत्न करते हैं और रोगी भी चाहते हैं, कि वैद्य केवल नाड़ी देखकर सर्वथा रोग को जान लें और उनका खाया-पिया भी बतला दें; यह कहाँ तक सम्भव है? इस बात को बुद्धिमान् चिकित्सक तथा रोगी स्वयं समझ सकते हैं। महर्षियों ने रोग-विनिश्चय के लिए अपनी सम्मति इस प्रकार दी है- 'विदितवेदितव्यास्तु, भिषजः सर्वं सर्वथा यथासम्भवं परीक्ष्यं परीक्ष्य अध्यवस्यन्तो, न क्वचिदपि विप्रतिपद्यन्ते यथेष्टमर्थमभिनिर्वर्त्तयन्ति चेति'। अर्थात् विद्वान् वैद्य सम्पूर्ण रोग को यथाशक्ति भली-भाँति निश्चित करते हुये कहीं भी धोखा नहीं खाते और सफलता प्राप्त कर लेते हैं (च० चि० अ० 7)। 'प्रत्यक्षतस्तु खलु रोगतत्त्वं बुभुत्सुः सर्वैरिन्द्रियैः सर्वान् इन्द्रियार्थान् आतुरशरीरगतान् परीक्षेतऽन्यत्र रसज्ञानात्'। (च० चि० अ० 4)। 'तस्योपलब्धिर्निदानपूर्वरूपलिङ्गोपश- यसम्प्रातितः।' (च० नि० अ० 1) अर्थात् रोग को निदान, पूर्वरूप, लक्षण, उपशय एवं सम्प्राप्ति से जानना चाहिये। यही बात सु० सू० अ० 10 में तथा वाग्भट सू० अ० 1 में भी कही गयी है। वस्तुतः कुशल चिकित्सक का कर्तव्य है कि वह पाँचों ज्ञानेन्द्रियों तथा विविध प्रकार के तत्सम्बन्धित प्रश्नों द्वारा रोग का निश्चय करे। नेत्र-परीक्षा (नेत्रं स्यात् पवनादूक्षं धूम्रवर्णं तथाऽरुणम् ।। 9 ।। कोणं गतं प्रविष्टं च तथा स्तब्धविलोकनम्। हरिद्राखण्डवर्णं वा रक्तं वा हरितं तथा ।। 10 ।। दीपद्वेषि सदाहं च नेत्रं स्यात् पित्तकोषतः । चक्षुर्वलासबाहुल्यात् स्निग्धं स्यात् सलिलप्लुतम् ।। 11 ।। तथा धवलवर्णं च ज्योतिर्हीनं मलान्वितम्। नेत्रं द्विदोषबाहुल्यात् स्याद् दोषद्वयलक्षणम् ।। 12 ।। त्रिदोषदूषितं नेत्रमन्तर्मग्नं भृशं भवेत् । त्रिलिङ्गं सलिलस्रावि प्रान्तेनोन्मीलयत्यपि ।। 13 ।। इति नेत्रं परीक्षेत शेषं रोगानुरूपतः ।) नाड़ी के समान नेत्र की भी परीक्षा करे। वायु की वृद्धि से नेत्र रूक्ष, धूमिल तथा अरुण (कालापन लिये लाल) होता है, कोने में गया हुआ तथा धँसा हुआ और स्तब्ध प्रतीत होता है। पित्त के कोप से नेत्र हल्दी के वर्ण वाला, लाल अथवा हरा दीप तथा प्रकाश का द्वेषी और दाहयुक्त होता है। कफ की अधिकता से नेत्र चिकना, जल से भीगा हुआ श्वेत, ज्योति से हीन तथा मैला होता है। दो दोषों की अधिकता से दो दोषों के लक्षणों से युक्त होता है और तीनों दोषों से दूषित नेत्र अत्यन्त धँसा हुआ एवं तीनों दोषों के लक्षणों से युक्त होता है और नेत्रों से पानी जाता है तथा नेत्र खुले ही रहते हैं। यह दोषानुसार नेत्र-परीक्षा कही गयी है। शेष भिन्न-भिन्न रोगों के लक्षणों पर ध्यान देना उचित है। जिह्वा-परीक्षा (शाकपत्रप्रभा रूक्षा स्फुटिता रसनाऽनिलात् ।। 14 ।। रक्ता श्यावा भवेत् पित्ताल्लिप्ताऽऽर्द्रा धवला कफात् । सैव दोषद्वयाधिक्ये दोषद्वितय लक्षणा ।। 15 ।। परिदग्धा खरस्पर्शा कृष्णा दोषत्रयाधिकैः ।) वायु के कोप से जीभ सागवान के पत्ते के समान खुरदरी या सूखी एवं फटी हुई होती है। पित्त के कोप से लाल एवं कुछ काली और कफ के कोप से चिपचिपाहट से युक्त, गीली एवं सफेद होती है। दो-दो दोषों के कोप से दो-दो दोषों के उपर्युक्त लक्षणों से युक्त और तीनों दोषों के कोप से चारों ओर से जली हुई-सी, खुरदरी तथा काली होती है। मूत्र-परीक्षा (वातेन पाण्डुरं मूत्रं पीतं नीलं च पित्ततः ।। 16 ।। रक्तमेवं भवेद् रक्ताद् बहलं फेनिलं कफाद् ।)
30 शार्ङ्गधरसंहिता [पूर्वखण्डे [बायाँ स्तम्भ] वायु की अधिकता से मूत्र कुछ पीला, पित्त की अधिकता से अत्यन्त पीला एवं नीला रक्त की अधिकता से लाल एवं कफ की अधिकता से श्वेत और झाग से युक्त होता है। वक्तव्य— रोगी के शरीर पर वायु आदि दोषों का प्रभाव पड़ने से भिन्न-भिन्न प्रकार के परिवर्तन होते हैं। अतः चिकित्सक का कर्तव्य है कि वह उन परिवर्तनों पर विशेष रूप से ध्यान दे। रोग का निदान करते समय वह रोगी के आँख, जीभ, तथा मल-मूत्र आदि को ध्यानपूर्वक देखकर दोषों के बलाबल का निश्चय करे। दूत-परीक्षा दूताः स्वजातयोऽव्यङ्गाः पटवो निर्मलाम्बराः ।। 17 ।। सुखिनोऽश्ववृषारूढाः शुभ्रपुष्पफलैर्युताः । सुजातयः सुचेष्टाश्च सजीवदिशि संश्रिताः ।। 18 ।। भिषजं समये प्राप्ता रोगिणः सुखहेतवे । (यस्यां प्राणमरुद्वाति सा नाडी जीवसंयुता ।। 19 ।।) जो दूत (रोगी का समाचार लेकर अथवा वैद्य को बुलाने के लिए जो मनुष्य वैद्य के पास जाता है वह 'दूत' कहा जाता है) रोगी के स्वजाति के हों, अंगहीन (काने, लंगड़े आदि) न हों, चतुर हों, निर्मल वस्त्र धारण किये हों, घोड़े अथवा बैल (भारतवर्ष में बैल पर सवारी नहीं की जाती, किन्तु भूटान और तिब्बत आदि देशों में की जाती है) पर चढ़कर आये हों स्वयं सुखी या स्वस्थ हों, वैद्यजी को अर्पण करने के लिए श्वेत पुष्प अथवा फल साथ लिये हों, अच्छी जाति (रोगी की अपेक्षा) के हों, अच्छी चेष्टा (व्यवहार) वाले हों, सजीव दिशा में (सजीव दिशा वह होती है, जिस दिशा या ओर का नासा-स्वर चल रहा हो) आकर बैठे हों और उचित समय (जब वैद्य जी दूसरे कार्य में न लगे हों) पर वैद्य जी के पास आये हों, वे रोगी के लिए सुखदायक होते हैं। वक्तव्य— नासिका द्वारा जो श्वास वायु आता-जाता है वह एक नासापुट से खुलासा और दूसरे से रुककर आता-जाता है, एक समय दाएँ से खुलासा और बाएँ से रुककर, दूसरे समय बाएँ से खुलासा और दाएँ से रुककर आता है; इसे ध्यानपूर्वक देखें। दूत से सम्बन्धित अन्य बातें सु० सू० अ० 29 में तथा च० इ० अ० 12 में देखें। दूत के शकुन वैद्याह्वानाय दूतस्य गच्छतो रोगिणः कृते। न शुभं सौम्यशकुनं प्रदीप्तं च सुखावहम् ।। 20 ।। [दायाँ स्तम्भ] वैद्य जी को बुलाने के लिए जाते हुये दूत को मार्ग में यदि अच्छे सगुन दिखलायी दें तो वे रोगी के लिए अशुभ होते हैं और बुरे सगुन हों तो रोगी के लिए अच्छे होते हैं। वैद्य के शकुन चिकित्सां रोगिणः कर्तुं गच्छतो भिषजः शुभम्। यात्रेयं सौम्यशकुनं प्रोक्तं दीप्तं न शोभनम् ।। 21 ।। रोगी को चिकित्सा करने के लिए जाते हुये वैद्य को मार्ग में यदि शुभ शकुन प्रतीत हों तो (रोगी के लिए और वैद्य जी के लिए भी) अच्छे होते हैं और अशुभ हों तो बुरे होते हैं। चिकित्सा-योग्य रोगी के लक्षण निजप्रकृतिवर्णाभ्यां युक्तः सत्त्वेन संयुतः। चिकित्स्यो भिषजा रोगी वैद्यभक्तो जितेन्द्रियः ।। 22 ।। जो रोगी अपने स्वभाव एवं वर्ण से युक्त हो, सत्त्व (शारीरिक एवं मानसिक बल) से युक्त हो, वैद्य जी का भक्त (आज्ञाकारी और श्रद्धालु) और जितेन्द्रिय (पथ्य रखने वाला) हो, उसकी चिकित्सा करनी चाहिये। वक्तव्य— उक्त श्लोक द्वारा रोगी की साध्यता का वर्णन किया गया है। इसके विपरीत रोगी को असाध्य समझना चाहिये। विशेष जानकारी के लिए-सु० सू० अ० 24, 30, 31, 32 और चरक-इन्द्रियस्थान देखें। वैद्य का लक्षण (तत्त्वाधिगतशास्त्रार्थो दृष्टकर्मा स्वयं कृती। लघुहस्तः शुचिः शूरः सज्जोपस्करभेषजः ।। 23 ।। प्रत्युत्पन्नमतिर्धीमान् व्यवसायी प्रियंवदः। सत्यधर्मपरो यश्च वैद्य ईदृक् प्रशस्यते ।। 24 ।।) जो शास्त्र के अर्थ एवं तात्पर्य को समझता हो, जिसने औषध निर्माण आदि देखा हो, जो स्वयं कार्य करता हो, शीघ्रकारी, पवित्र एवं उत्साही हो, जिसके पास औषधियाँ तैयार हों, जिसको समय पर कार्यप्रणाली सूझ जाये, बुद्धिमान्, लगन वाला, प्रियवादी, सत्यवादी तथा जो धर्मात्मा हो वह वैद्य प्रशंसा के योग्य होता है। परिचारक का लक्षण (स्निग्धोऽजुगुप्सुर्बलवान् युक्तो व्याधितरक्षणे। वैद्यवाक्यकृदश्रान्तो युज्यते परिचारकः ।। 25 ।।) जो रोगी का स्नेही या प्रेमी हो, निन्दक न हो, बलवान् हो, रोगी की सेवा में तत्पर हो, वैद्य के कथनानुसार कार्य करे और थके नहीं, ऐसा 'परिचारक' योग्य होता है।
तृतीयोऽध्यायः ] नाडीपरीक्षादिविधिः 31 भेषज का लक्षण (प्रशस्तदेशे सञ्जातं प्रशस्तेऽहनि चोद्धृतम्। अल्पमात्रं बहुगुणं गन्धवर्णरसान्वितम् ॥ 26 ॥ दोषघ्नमग्लानिकरमधिकं न विकारि यत्। समीक्ष्य काले दत्तं च भेषजं स्याद् गुणावहम् ॥ 27 ॥) उत्तम स्थान में उत्पन्न हुआ हो, उत्तम दिन में उखाड़ा गया हो, मात्रा थोड़ी और गुण बहुत हों, उचित गन्ध, वर्ण तथा रस से युक्त हो, दोषनाशक हो, ग्लानि न करे, अधिक खा लेने पर भी विकारकारी न हो और उचित समय पर दिया गया हो-ऐसी औषधि (दवा) गुणदायक होती है। चिकित्सा के चार पाद (भिषग् द्रव्याण्युपस्थाता रोगी पादचतुष्टयम्। गुणवत्कारणं ज्ञेयं विकारव्युपशान्तये ॥ 28 ॥) भिषक् अर्थात् चिकित्सक, द्रव्य अर्थात् भेषज या औषधियाँ, उपस्थाता अर्थात् परिचारक तथा रोगी-ये चारों चिकित्सा के पाद कहे जाते हैं। यदि ये अपने-अपने उचित गुणों से युक्त हों तो विकार की शान्ति में कारण होते हैं। विविध प्रकार के दुःस्वप्न स्वप्नेषु नग्नान् मुण्डांश्च रक्तकृष्णाम्बरावृतान्। व्यङ्गांश्च विकृतान् कृष्णान्सपाशान्सायुधानपि ॥ 29 ॥ बध्नतो निघ्नतश्चापि दक्षिणां दिशमाश्रितान्। महिषोष्ट्रखरारूढान् स्त्रीपुंसो यस्तु पश्यति ॥ 30 ॥ स स्वस्थो लभते व्याधिं रोगी यात्येव पञ्चताम्। अधो यो निपत्तत्युच्चाज्जलेऽग्नौ वा विलीयते ॥ 31 ॥ श्वापदैर्हन्यते योऽपि मत्स्याद्यैर्गिलितो भवेत्। यस्य नेत्रे विलीयेते दीपो निर्वाणतां व्रजेत् ॥ 32 ॥ तैलं सुरां पिबेद् वापि लोहं वा लभते तिलान्। पक्वान्नं लभतेऽश्नाति विशेत् कूपं रसातलम् ॥ 33 ॥ स स्वस्थो लभते रोगं रोगी यात्येव पञ्चताम्। जो मनुष्य स्वप्न में नंगे, मूँड़े हुये, लाल तथा काले कपड़ों वाले, अंगहीन, विकृत (कोढ़ी आदि), काले, हथकड़ी या जाल लिये हुये, शस्त्रधारी, किसी को बाँधते हुये या मारते हुये दक्षिण दिशा की ओर खड़े हुये भैंसे, ऊँट एवं गधे पर चढ़े हुये स्त्री-पुरुषों को देखता है, वह स्वस्थ हो तो रोग को प्राप्त होता है और यदि रोगी है तो मृत्यु को प्राप्त होता है। जो मनुष्य स्वप्न में ऊँचे स्थान से गिरता है, जल अथवा आग में विलीन हो जाता है, श्वापद (कुत्ते के समान पाँच पाँव वाले सिंह, चीता आदि) जन्तुओं द्वारा मारा या घायल किया जाता है, मत्स्य (मगर, घड़ियाल) एवं अजगर आदि द्वारा निगला जाता है, जिसकी आँखें नष्ट हो जाती हैं, जलाया हुआ दीपक बुझ जाता है, तैल अथवा शराब पीता है, लोहा अथवा तिलों को प्राप्त करता है, पक्वान्न (पूरी, कचौड़ी आदि) खाता है और कुएँ अथवा पृथ्वी के भीतर (दरार आदि में) प्रवेश करता है; वह यदि स्वस्थ है तो रोग को प्राप्त हो जाता है और रोगी है तो मर जाता है। दुःस्वप्नों के प्रायश्चित्त दुःस्वप्नानेवमादींश्च दृष्ट्वा ब्रूयान्न कस्यचित् ॥ 34 ॥ स्नानं कुर्यादुषस्येव दद्याद्धेमतिलानथ। पठेत् स्तोत्राणि देवानां रात्रौ देवालये वसेत् ॥ 35 ॥ कृत्वैवं त्रिदिनं मर्त्यो दुःस्वप्नात् परिमुच्यते। उपर्युक्त बुरे स्वप्नों को देखकर किसी से न कहे (किन्तु वैद्य जी तथा आचार्य के पास तो कहना ही पड़ेगा और कहना भी चाहिये) और प्रातःकाल स्नान (यदि किसी ज्वर आदि रोग से पीड़ित न हो तो उस दशा में मानसिक स्नान कर लेना चाहिये) तथा सोना अथवा तिलों का दान करे। देवताओं के स्तोत्र (विष्णुसहस्रनाम आदि) पढ़े (अनपढ़ मनुष्य केवल ईश्वर का स्मरण ही करे) और रात्रि को देव-मन्दिर में निवास करे। इस प्रकार तीन दिन पर्यन्त करने से दुःस्वप्नों के दोषों से मुक्त हो जाता है। शुभ स्वप्न स्वप्नेषु यः सुरान् भूपाञ्जीवतः सुहृदो द्विजान् ॥ 36 ॥ गोसमिद्धाग्निटीर्थानि पश्येत् सुखमवाप्नुयात्। जो मनुष्य स्वप्न में देवताओं को, राजाओं को, जीवित मित्रों को, ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्यों को, गौओं को, हवनकुण्ड में जलती हुई आग को तथा तीर्थ (काशी आदि अथवा नदियों के घाटों) स्थानों को देखता है, वह सुख को प्राप्त होता है। तीर्त्वा कलुषनीराणि जित्वा शत्रुगणानपि ॥ 37 ॥ आरुह्य सौधगोशैलकरिवाहान् सुखी भवेत्। जो मनुष्य स्वप्न में मैले जलों (नालों या गन्दी नालियों) को तैरकर पार कर जाता है, शत्रुओं के झुण्डों या जत्थों को जीत लेता है और सौध (चूने से पुते हुये घर या हवेली) पर, गाय या बैल, पहाड़, हाथी और घोड़े पर चढ़ता है वह सुखी होता है।
32 शार्ङ्गधरसंहिता [ पूर्वखण्डे शुभ्रपुष्पाणि वासांसि मांसमत्स्यफलानि च।।३८।। प्राप्यातुरः सुखी भूयात् स्वस्थो धनमवाप्नुयात् । सपने में सफेद फूलों, सफेद कपड़ों, मांस, मछली तथा फलों को प्राप्त कर रोगी नीरोग हो जाता है और स्वस्थ मनुष्य धन को प्राप्त करता है। अगम्यागमनं लेपो विष्ठया रुदितं मृतिः।।३९।। आममांसाशनं स्वप्ने धनारोग्याप्तये विदुः । स्वप्न में जो अगम्या (माता, बहिन और पुत्री आदि) से गमन (मैथुन), पुरीष (मल) का लेप, रोना, मृत्यु तथा कच्चे मांस का भक्षण करता है तो वह धन और आरोग्य की प्राप्ति के लिए होता है। जलौका भ्रमरी सर्पो मक्षिका वापि यं दशेत् ।।४०।। रोगी स भूयादुल्लाघः स्वस्थो धनमवाप्नुयात् ।।४१।। इति श्रीदामोदरसूनुना शार्ङ्गधरेण विरचितायां शार्ङ्गधरसंहितायां पूर्वखण्डे नाडीपरीक्षादिविधिर्नाम तृतीयोऽध्यायः ।।३।। स्वप्न में जिस मनुष्य को जोंक, भौंरा, साँप और मक्खियाँ काटती हैं, वह यदि रोगी है तो स्वस्थ हो जाता है और यदि स्वस्थ है तो उसे धन की प्राप्ति होती है। इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी विरचित दीपिका व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से संवलित शार्ङ्गधरसंहिता पूर्वखण्ड का तीसरा अध्याय समाप्त ।। ३ ।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
चतुर्थोऽध्यायः दीपनपाचनादिकथनम् दीपन-पाचन द्रव्यों के लक्षण पचेन्नामं वह्निकृच्च दीपनं तद्यथा मिशिः। पचत्यामं न वह्निं च कुर्याद् यत्तद्धि पाचनम्।।1।। नागकेशरवद् विद्याच्चित्रो दीपन-पाचनः। जो द्रव्य (पदार्थ) आम को नहीं पकाता है, किन्तु अग्नि (पाचनशक्ति या पाचक रसों को) बढ़ाता है, वह 'दीपन' कहा जाता है, जैसे-सौंफ। और जो द्रव्य आम को पकाता है, किन्तु अग्नि को नहीं बढ़ाता है वह 'पाचन' कहा जाता है, जैसे-नागकेसर। जो द्रव्य दोनों कार्य करता है वह 'दीपन- पाचन' कहा जाता है, जैसे-चित्रक। वक्तव्य-जरा विचार कीजिये-जो द्रव्य दीपन अर्थात् अग्निवर्द्धक है, वह आम को अवश्य पकायेगा फिर उसे 'पाचन' क्यों न माना जाये और इसी प्रकार जो द्रव्य 'पाचन' कहा जाता है, वह अग्नि को बढ़ाए बिना कैसे आम को पका सकेगा? ध्यान दें-जो द्रव्य केवल अग्नि को बढ़ाता है, वह भले ही अग्नि को बढ़ाकर उसके द्वारा पाचन करता हुआ 'पाचन' कहा जा सकता है, किन्तु वह 'दीपन' ही कहा जायेगा 'पाचन' नहीं, क्योंकि यदि कोई किसी से किसी काम को करवाता है, तो वह सीधा 'कर्ता' नहीं कहा जा सकता। वह 'कर्ता' तभी कहा जा सकेगा, जब वह स्वयं उस काम को करेगा। अथवा इसे इस प्रकार समझें-चूल्हे में जो लकड़ी डाली जाती है, वह 'दीपन' या 'अग्निवर्धक' कही जा सकती है, वह पाचन नहीं, क्योंकि वह बादाम या सुपाड़ी आदि द्रव्यों को तब तक नहीं पका सकती, जब तक उनमें कोई क्षार न डाला जाये। इसी प्रकार लकड़ी 'दीपन' और क्षार 'पाचन' कहा जायेगा। शमन द्रव्य का लक्षण न शोधयति यद्दोषान् समान्नोदीरयत्यपि।।2।। समीकरोति विषमाञ्छमनं तद्यथाऽमृता। जो द्रव्य सम (प्रकृतिस्थ) दोषों को न तो शरीर से बाहर ही निकालता और न कुपित ही करता है, किन्तु बढ़े हुये अथवा घटे हुये दोषों को जो सम या प्रकृतिस्थ कर देता है, उसे 'शमन' कहते हैं, जैसे-'गुरुच'। वक्तव्य-दोष का शमन सात प्रकार से होता है-1. पाचन, 2. दीपन, 3. लंघन, 4. प्यासा रहने, 5. व्यायाम करने, 5. आतप (धूप) सेवन एवं 7. वायु सेवन से। अनुलोमन द्रव्य का लक्षण कृत्वा पाकं मलानां यद्भित्त्वा बन्धमथो नयेत्।।3।। तच्चानुलोमनं ज्ञेयं यथा प्रोक्ता हरीतकी। जो द्रव्य मलों को पकाकर और उनके बन्ध (गाँठों) को तोड़कर नीचे (गुदमार्ग से अथवा अपने मार्ग से) बाहर निकाल देता है, उसे 'अनुलोमन' कहते हैं, जैसे-हरड़। वक्तव्य-उलटे मार्ग में जाते हुये वातादि दोषों को स्वमार्गगामी बनाने वाला द्रव्य भी 'अनुलोमन' कहा जाता है। संस्रन द्रव्य का लक्षण पक्तव्यं यदपक्त्वैव श्लिष्टं कोष्ठे मलादिकम्।।4।। नयत्यधः संस्रनं तद् यथा स्यात् कृतमालकम्। जो द्रव्य उदर में चिपके हुये पकाने योग्य (आम) मलादि तो पकाये बिना (अपक्व को) ही गुदमार्ग से निकाल देता है, उसे 'संस्रन' (सरकाने वाला) द्रव्य कहा जाता है, जैसे- अमलतास की गुद्दी। भेदन द्रव्य का लक्षण मलादिकमबद्धं यद् बद्धं वा पिण्डितं मलैः ।।5।। भित्त्वाधः पातयति तद् भेदनं कटुकी यथा। जो द्रव्य ढीले अथवा बँधे हुये अथवा वात आदि दोषों द्वारा पिण्डित (गाँठ बने हुये) मल को तोड़-फोड़कर नीचे
34 शार्ङ्गधरसंहिता [पूर्वखण्डे गिरा देता है, उसे 'भेदन' या फोड़ने वाला कहा जाता है, जैसे-कुटकी। रेचन द्रव्य का लक्षण विपक्वं यदपक्वं वा मलादि द्रवतां नयेत् ।। ६ ।। रेचयत्यपि तज्ज्ञेयं रेचनं त्रिवृता यथा। जो द्रव्य पके हुये अथवा न पके हुये, मलादि को पतला कर देता है और उसे निकाल भी देता है, उस द्रव्य को 'रेचन' कहते हैं, जैसे-निसोत। वक्तव्य-अनुलोमक, स्रंसक, भेदक और रेचक ये चारों द्रव्य विरेचन (दस्त) कराते हैं। अतः इस प्रकार के सभी द्रव्य 'दस्तावर' कहे जाते हैं। वमन द्रव्य का लक्षण अपक्वपित्तश्लेष्माणौ बलादूर्ध्वं नयेत् तु यत् ।। ७ ।। वमनं तद्धि विज्ञेयं मदनस्य फलं यथा। जो द्रव्य अपक्व (आमाशय स्थित आम आहार को भी) या न पके हुये पित्त एवं कफ को बलपूर्वक ऊपर (मुखमार्ग) से बाहर निकाल देता है। वह वमन कहा जाता है, जैसे-मैनफल। वक्तव्य-वमन द्रव्य उलटी या कै कराते हैं। शोधन द्रव्य का लक्षण स्थानाद् बहिर्नयेदूर्ध्वमधो वा मलसञ्चयम् ।। ८ ।। देहसंशोधनं तत् स्याद् देवदाली फलं यथा। जो द्रव्य मलों को उनके स्थान से मुखमार्ग अथवा गुदमार्ग द्वारा बाहर निकाल देता है, वह देहसंशोधन या 'शोधन' कहा जाता है, जैसे-देवदाली फल। वक्तव्य-यह द्रव्य उलटी और दस्त दोनों कराता है। शोधन पाँच प्रकार से होता है-1. निरूहण वस्ति से, 2. वमन से, 3. विरेचन से, 4. शिरोविरेचन से तथा 5. सिरावेध आदि विधियों द्वारा रक्त निकालने से। छेदन द्रव्य का लक्षण श्लिष्टान् कफादिकान् दोषानुन्मूलयति यद् बलात् ।। ९ ।। छेदनं तद्यथा क्षारा मरिचानि शिलाजतु। जो द्रव्य सटे या चिपके हुये कफ आदि दोषों को बलपूर्वक उखाड़ देता है, वह 'छेदन' या काटने वाला कहा जाता है, जैसे-जौखार आदि क्षार, काली मिर्च और शिलाजीत। लेखन द्रव्य का लक्षण धातून् मलान् वा देहस्य विशोष्योल्लेखयेच्च यत् ।। १० ।। लेखनं तद्यथा क्षौद्रं नीरमुष्णं वचा यवाः। जो द्रव्य सम्पूर्ण शरीर की धातुओं और मलों को सुखाकर उखाड़ या छील कर निकाल देता है, वह 'लेखन' कहा जाता है, जैसे-शहद, गरम जल, वच और जौ। वक्तव्य-छेदन तथा लेखन ये दोनों द्रव्य शरीर के भीतर जमे हुये दोषों को निकाल कर बाहर कर देते हैं। ग्राही द्रव्य का लक्षण दीपनं पाचनं यत् स्यादुष्णत्वाद् द्रवशोषकम् ।। ११ ।। ग्राहि तच्च यथा शुण्ठी जीरकं गजपिप्पली। जो द्रव्य दीपन (अग्निवर्द्धक) हो, पाचक हो तथा उष्ण होने से द्रव (मल के पतलेपन) को सुखाने वाला हो, उसे 'ग्राही' कहते हैं जैसे-सोंठ, जीरा और गजपीपल। स्तम्भन द्रव्य का लक्षण रौक्ष्याच्छैत्यात् कषायत्वाल्लघुपाकाच्च यद्भवेत् ।। १२ ।। वातकृत् स्तम्भनं तत् स्याद् यथा वत्सकटुण्डुकौ। जो द्रव्य रूक्ष, शीत, कसैला और शीघ्रपाकी होने के कारण वातवर्द्धक होता है, उसे 'स्तम्भन' कहते हैं, जैसे-कुरैया की छाल और सोनापाठा। वक्तव्य-ग्राही तथा स्तम्भन ये दोनों द्रव्य शरीर से बाहर निकलने वाली वस्तुओं को भीतर ही रोक देते हैं। रसायन द्रव्य का लक्षण रसायनं च तज्ज्ञेयं यज्जराव्याधिनाशनम् ।। १३ ।। यथाऽमृता रुदन्ती च गुग्गुलुश्च हरीतकी। जो द्रव्य जरा (बुढ़ापा) और रोगों को नष्ट करता है, वह 'रसायन' कहा जाता है, जैसे-गिलोय, रुद्रवन्ती, गूगल और हरड़। वक्तव्य-कुछ लोगों में युवावस्था में ही बाल सफेद होना, मुख या शरीर पर झुर्रियाँ पड़ना और इन्द्रियों का दुर्बल होना आदि बुढ़ापे के लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं। रसायन औषधियों के सेवन से इसी प्रकार का जरा (बुढ़ापा) भी नष्ट होता है और स्वाभाविक जरा तो स्वाभाविक ही होता है और आकर ही रहता है तथा जाता भी नहीं। 'लाभोपायो हि शस्तानां रसादीनां रसायनम्'। च० चि० अ० 1.8।
चतुर्थोऽध्यायः ] दीपनपाचनादिकथनम् 35 वाजीकरण द्रव्य का लक्षण यस्माद् द्रव्याद्भवेत् स्त्रीषु हर्षो वाजीकरं च तत् ।। 14 ।। यथा नागबलाद्याः स्युर्बीजं च कपिकच्छुजम्। जिस द्रव्य (के सेवन) से स्त्रियों के सहवास (मैथुन-क्रिया) में अधिक हर्ष की प्राप्ति या उत्साह होता है, उसे 'वाजीकर' कहते हैं; जैसे-नागबला (खिरैंटी) तथा किवाँच आदि के बीज। वक्तव्य-ये द्रव्य नपुंसकता को दूर कर वीर्य की वृद्धि भी कर सकते हैं। शुक्रल द्रव्य का लक्षण यस्माच्छुक्रस्य वृद्धिः स्याच्छुक्रलं हि तदुच्यते ।। 15 ।। यथाऽश्वगन्धा मुसली शर्करा च शतावरी। जिस द्रव्य से वीर्य (शुक्रधातु) की वृद्धि होती है, वह 'शुक्रल' कहा जाता है; जैसे-नागौरी असगन्ध, सफेद एवं काली मुसली, खाँड़ या चीनी और शतावर। शुक्र के प्रवर्तक तथा जनक द्रव्यों के लक्षण दुग्धं माषाश्च भल्लातफलमज्जामलानि च ।। 16 ।। प्रवर्तकानि कथ्यन्ते जनकानि च रेतसः। दूध, उड़द, भिलावा (शुद्ध), फलों (बादाम, अखरोट आदि) की मज्जा या गिरी तथा आँवले, ये द्रव्य वीर्य के प्रवर्तक (प्रवृत्त करने वाले) और उत्पन्न करने वाले होते हैं। वक्तव्य-उक्त द्रव्यों के सेवन से मैथुन में शीघ्र तथा अधिक वीर्य निकलता है। प्रवर्तक आदि द्रव्यों के लक्षण प्रवर्तनी स्त्री शुक्रस्य रेचनं बृहतीफलम् ।। 17 ।। जातीफलं स्तम्भकं च शोषणी च हरीतकी। स्त्री (अभीष्ट स्त्री के दर्शन, स्पर्शन आदि) शुक्र को प्रवृत्त या चलित करती है। वनभंटा का फल शुक्र को रिक्त या च्युत करता (गिरा देता) है, जायफल उसे रोकता (स्तम्भन-शक्ति बढ़ाता) है और हरड़ शुक्र को सुखाती है। वक्तव्य-उक्त द्रव्यों के सेवन से शुक्र पर पड़ने वाले ये भिन्न-भिन्न प्रकार के प्रभाव कहे गये हैं। इन्हें भली-भाँति समझ लेना चाहिये। आवश्यकता पड़ने पर उन-उन द्रव्यों का प्रयोग करना चाहिये। कुछ ऐसे मनुष्य देखे गये हैं, जो अपने आपको नपुंसक समझते थे, किन्तु जब उन्हें अभीष्ट स्त्री मिली तो पूर्ण पुरुष सिद्ध हुये। एक ऐसे मनुष्य भी देखे जो परस्त्री में सफल नहीं होता था, किन्तु वह घर में पूर्ण पुरुष था। बहुत से तो प्रथम प्रसंग में असफल, किन्तु स्नेह बढ़ने पर सफल होते हैं, इत्यादि अनेक प्रकार की बातें देखी जाती हैं। बहुतों को प्रयत्न करने पर भी वीर्यपात नहीं होता, बहुत से शीघ्रपतन के कारण स्तम्भन की खोज में लगे रहते हैं और बहुतों का वीर्य पतला होता है। इन तीनों को क्रमशः रेचन, स्तम्भन और शोषण द्रव्यों की आवश्यकता होती है। सूक्ष्म द्रव्य का लक्षण देहस्य सूक्ष्मच्छिद्रेषु विशेद् यत्सूक्ष्ममुच्यते ।। 18 ।। तद्यथा सैन्धवं क्षौद्रं निम्बतैलं रुबूद्भवम्। जो द्रव्य शरीर के सूक्ष्म से सूक्ष्म स्रोतों में प्रवेश करता है, उसे 'सूक्ष्म' कहते हैं। जैसे-सेंधानमक, मधु, नीम और एरण्ड का तैल। वक्तव्य-यों तो सभी द्रव्य पचने पर शरीर में व्याप्त होते ही हैं, परन्तु जो द्रव्य शीघ्र अपना प्रभाव दिखलाता है, वह 'सूक्ष्म' कहा जाता है। नमक खाते ही व्रण आदि में खुजली होने लगती है। एरण्ड के तैल को पेट पर लगाने मात्र से दस्त हो जाता है, इत्यादि। व्यवायी द्रव्य का लक्षण पूर्वं व्याप्याखिलं कायं ततः पाकं च गच्छति ।। 19 ।। व्यवायि तद् यथा भङ्गा फेनं चाहिसमुद्भवम्। जो द्रव्य पहले सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त होकर (अपना प्रभाव दिखलाकर) फिर पाक को प्राप्त होता (पचता) है, उसे 'व्यवायी' कहते हैं; जैसे-भाँग तथा अफीम। वक्तव्य-भाँग आदि के सेवन करने पर पहले ही नशा हो जाता है और पचने पर उतर जाता है। बस यही इनका 'व्यवायी' नामक प्रभाव है। विकासी द्रव्य का लक्षण सन्धिवन्धांस्तु शिथिलान् यत्करोति विकासि तत् ।। 20 ।। विश्लेष्यौजश्च धातुभ्यो यथा क्रमुककोद्रवाः। जो द्रव्य धातुओं से ओज (क्रियाशक्ति) को पृथक् करके सन्धियों के बन्धनों को शिथिल (दुर्बल या ढीले) कर देता है, वह 'विकाशी' कहा जाता है; जैसे-सुपारी एवं कोदों के चावल। वक्तव्य-उक्त द्रव्यों के सेवन से शरीर में शिथिलता और कृशता आती है।
३६ शार्ङ्गधरसंहिता [पूर्वखण्डे मदकारी द्रव्य का लक्षण बुद्धिं लुम्पति यद् द्रव्यं मदकारि तदुच्यते ।। २१ ।। तमोगुणप्रधानं च यथा मद्यं सुरादिकम् । जो द्रव्य तमोगुण की अधिकता के कारण बुद्धि (कर्तव्य- अकर्तव्य के ज्ञान) का लोप कर देता है, वह 'मदकारी' कहा जाता है; जैसे-सुरा, वारुणी आदि अनेक प्रकार के मद्य। वक्तव्य- मद्य के बुद्धिवर्द्धन आदि जो गुण लिखे गये हैं और देखे जाते हैं, वे उचित मात्रा में बहुत दिनों तक मद्यपान का अभ्यास करने पर ही पाये जाते हैं। प्रारम्भ में सब की बुद्धि पर बुरा प्रभाव पड़ता ही है। इसलिये मद्य कभी भी बुद्धिवर्द्धक नहीं कहा जा सकता। विष का लक्षण व्यवायि च विकाशि स्यात् सूक्ष्मं छेदि मदावहम् ।। २२ ।। आग्नेयं जीवितहरं योगवाहि स्मृतं विषम्। जो द्रव्य व्यवायी (कामोद्दीपक), विकाशी, सूक्ष्म (ऊपर २०वाँ श्लोक देखें), छेदी, मदकारी, आग्नेय (अग्निगुणयुक्त या उष्ण), प्राणनाशक और योगवाही (संयोगी द्रव्यों के समान गुण करने वाला) हो, वह 'विष' या 'जहर' कहा जाता है; जैसे-वत्सनाभ और संखिया आदि। वक्तव्य- जिस एक द्रव्य में उक्त सभी गुण हों, वह 'विष' होता है। प्रमाथी द्रव्य का लक्षण निजवीर्येण यद् द्रव्यं स्रोतोभ्यो दोषसञ्चयम् ।। २३ ।। निरस्यति प्रमाथि स्यात् तद्यथा मरिचं वचा। जो द्रव्य अपनी शक्ति से शरीर में से दोषों के सञ्चय को निकाल देता है, वह 'प्रमाथी' कहा जाता है; जैसे-मरिच और वच। अभिष्यन्दी द्रव्य का लक्षण पैच्छिल्याद् गौरवाद् द्रव्यं रुद्ध्वा रसवहाः शिराः ।। २४ ।। धत्ते यद् गौरवं तत् स्यादभिष्यन्दि यथा दधि। जो द्रव्य अपनी पिच्छिलता (चिप-चिपाहट) से तथा गुरुता (भारीपन) से रसवाहिनी शिराओं को रोककर शरीर में भारीपन उत्पन्न करता है, वह 'अभिष्यन्दी' कहा जाता है; जैसे-दही। विदाही द्रव्य का लक्षण (विदाहि द्रव्यमुद्गारमम्लं कुर्यात् तथा तृषाम् ।। २५ ।। हृदि दाहञ्च जनयेत् पाकं गच्छति तच्चिरात्।) जो उद्गार (डकार) को खट्टा करे, प्यास एवं हृदय में दाह को उत्पन्न करे और देर से पचे, वह 'विदाही' द्रव्य होता है। लंघन द्रव्य का लक्षण (लघूष्णतीक्ष्णविशदं रूक्षं सूक्ष्मं खरं द्रवम् ।। २६ ।। कठिनं चैव यद् द्रव्यं प्रायस्तल्लङ्घनं स्मृतम् ।) जो लघु, उष्ण, तीक्ष्ण, विशद, रूक्ष, सूक्ष्म, खर, द्रव एवं कठिन हो, वह द्रव्य लंघन अर्थात् शरीर में लघुता या हल्कापन उत्पन्न करने वाला होता है। देखें-च० सू० अ० 22.12-15। बृंहण द्रव्य का लक्षण (गुरु शीतं मृदु स्निग्धं बहलस्थूलपिच्छिलम् ।। २७ ।। प्रायो मन्दस्थिरं श्लक्ष्णं द्रव्यं बृंहणमुच्यते ।) जो गुरु, शीत, मृदु, स्निग्ध, बहल अर्थात् घन, स्थूल, पिच्छिल, मन्द (चिरकारी), स्थिर एवं श्लक्ष्ण होता है, वह द्रव्य 'बृंहण' (शरीर को बड़ा बनाने वाला) होता है। रूक्षण द्रव्य का लक्षण (रूक्षं लघु खरं तीक्ष्णमुष्णं स्थिरमपिच्छिलम् ।। २८ ।। प्रायशः कठिनं चैव यद् द्रव्यं तद्विद् रूक्षणम्।) रूक्ष, लघु, खर, तीक्ष्ण, उष्ण, स्थिर, अपिच्छिल तथा जो द्रव्य प्रायः कठोर होता है, वह द्रव्य रूक्षण (रूखापन उत्पन्न करने वाला) होता है। स्नेहन द्रव्य का लक्षण (द्रवं सूक्ष्मं सरं स्निग्धं पिच्छिलं गुरु शीतलम् ।। २९ ।। मन्दं मृदु च यत् प्रायस्तद् द्रव्यं स्नेहनं मतम्।) द्रव, सूक्ष्म, सर, स्निग्ध, पिच्छिल, गुरु, शीतल, मन्द तथा जो द्रव्य प्रायः मृदु होता है, वह स्नेहन कहा जाता है। स्वेदन द्रव्य का लक्षण (उष्णं तीक्ष्णं सरं स्निग्धं रूक्षं सूक्ष्मं द्रवं स्थिरम् ।। ३० ।। द्रव्यं गुरु च यत् प्रायः तद्धि स्वेदनमुच्यते।) उष्ण, तीक्ष्ण, सर, स्निग्ध, रूक्ष, सूक्ष्म, द्रव, स्थिर तथा जो द्रव्य प्रायः गुरु गुणों से युक्त होता है, वह द्रव्य 'स्वेदन' या पसीना लाने वाला होता है। श्लक्ष्ण द्रव्य का लक्षण (श्लक्ष्णः स्नेहं विनापि स्यात् कठिनोऽपि हि चिक्कणः ।। ३१ ।।) जो स्निग्धता से रहित तथा कठोर होते हुये भी चिकना होता है, वह 'श्लक्ष्ण' होता है।
चतुर्थोऽध्यायः] दीपनपाचनादिकथनम् 37
स्थिर, सर, पिच्छिल द्रव्य का लक्षण (स्थिरो वातमलस्तम्भी सरस्तेषां प्रवर्त्तकः। पिच्छिलस्तन्तुलो बल्यः सन्धानः श्लेष्मलो गुरुः ।। 32 ।।) 'स्थिर' वायु एवं मल का निरोधक तथा 'सर' उनका प्रवर्त्तक होता है और 'पिच्छिल' चिपचिपा, बलकारक, जोड़ने वाला, कफकारक और गुरु होता है। विशद द्रव्य का लक्षण (क्लेदच्छेदकरः ख्यातो विशदो व्रणरोपणः।) जो क्लेद या आर्द्रता का विनाश करे और व्रण या घाव को भरे वह 'विशद' होता है। स्थूल द्रव्य का लक्षण (स्थूलः स्थौल्यकरो देहे स्रोतसामवरोधकृत् ।। 33 ।।) जो देह में स्थूलता या मोटापा पैदा करे और स्रोतों में रुकावट पैदा करे, वह 'स्थूल' कहा जाता है। द्रव एवं सान्द्र द्रव्य का लक्षण (द्रवः क्लेदकरो व्यापी सान्द्रस्तद् विपरीततः।) जो क्लेदकारक एवं व्याप्तिशील हो, वह 'द्रव' कहा जाता है और जो इसके विपरीत गुणों वाला हो, वह 'सान्द्र' होता है।
तीक्ष्ण एवं मन्द द्रव्य का लक्षण (तीक्ष्णश्चाशुकरी देहे धावत्यम्भसि तैलवत् ।। 34 ।। मन्दः सकलकार्याणि शैथिल्येन करोति हि।) जो शीघ्रकारी हो और जल पर तैल के समान शरीर में फैल जाता हो, वह 'तीक्ष्ण' होता है। जो सब कामों को विलम्ब से करता है, वह 'मन्द' होता है।
मृदु एवं कर्कश द्रव्य का लक्षण (मृदु मार्दवकृद्देहे कर्कशः कर्कशत्वकृत् ।। 35 ।।) इति श्रीदामोदरसूनुना शार्ङ्गधरेण विरचितायां शार्ङ्गधरसंहितायां पूर्वखण्डे दीपनपाचनादिकथनं नाम चतुर्थोऽध्यायः ।। 4 ।। जो देह में मृदुता या कोमलता उत्पन्न करे, वह 'मृदु' कहा जाता है और जो कर्कशता (खुरदरापन) पैदा करे, वह 'कर्कश' होता है।
इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी विरचित दीपिका व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से संवलित शार्ङ्गधरसंहिता पूर्वखण्ड का चौथा अध्याय समाप्त ।। 4 ।।
पञ्चमोऽध्यायः कलादिकाख्यानम्
शरीर-परिचय कलाः सप्ताशयाः सप्त धातवः सप्त तन्मलाः। सप्तोपधातवः सप्त त्वचः सप्त प्रकीर्तिताः ।। 1 ।। त्रयो दोषा नवशतं स्नायूनां सन्ध्यस्तथा। दशाऽधिकं च द्विशतमस्थ्नां च त्रिशतं तथा ।। 2 ।। सप्तोत्तरं मर्मशतं शिराः सप्तशतं तथा। चतुर्विंशतिराख्याता धमन्यो रसवाहिकाः ।। 3 ।। मांसपेश्यः समाख्याता नृणां पञ्चशतं बुधैः। स्त्रीणां च विंशत्यधिकाः कण्डराश्चैव षोडश ।। 4 ।। नृदेहे दश रन्ध्राणि नारीदेहे त्रयोदश। ( असङ्ख्येयानि स्रोतांसि जालानि चैव षोडश ।। 5 ।। षट् च कूर्चा समाख्याताश्चतस्रो रज्जवः स्मृताः। सेवन्यः सप्त सङ्ख्याताः सङ्घाताश्च चतुर्दश ।। 6 ।। चतुर्दशैव सीमन्ता एका जिह्वा प्रकीर्तिता।) एतत् समासतः प्रोक्तं विस्तरेणाधुनोच्यते ।। 7 ।।
मानव-शरीर में कलाएँ सात, आशय सात, धातुएँ सात, धातुओं के मल सात, उप-धातुएँ सात और त्वचाएँ भी सात कही गयी हैं। दोष तीन, स्नायु नौ सौ (900), सन्धियाँ दो सौ दश (210), हड्डियाँ तीन सौ (300), मर्म एक सौ सात (107), सिराएँ सात सौ (700) और रसवाहिनी धमनियाँ चौबीस (24) कही गयी हैं। मांसपेशियाँ पुरुष के शरीर में पाँच सौ (500) तथा स्त्री के शरीर में पाँच सौ बीस (520) कही जाती हैं और कण्डराएँ सोलह (16) (स्त्री-पुरुष दोनों)। रन्ध्र या छिद्र (बहिर्मुखी स्रोत) पुरुष के शरीर में दस (10) और स्त्री के शरीर में तेरह (13) होते हैं। शरीर के भीतरी स्रोतस् असंख्य या अगणित हैं। जाल सोलह हैं, कूर्च छः हैं, रज्जु चार हैं, सेवनी सात हैं, संघात चौदह हैं, सीमन्त भी चौदह हैं और जीभ एक है। यह संक्षेप में (अर्थात् अवयवों की संख्या मात्र) कहा गया है और विस्तार में आगे कहा जायेगा। देखें-सु० शा० अ० 5 सम्पूर्ण ।
कला का वर्णन मांसासृङ्मेदसां तिस्रो यकृत्प्लीह्नोश्चतुर्थिका। पञ्चमी च तथाऽन्त्राणां षष्ठी चाग्निधरा मता ।। 8 ।। रेतोधरा सप्तमी स्यादिति सप्त कलाः स्मृताः।
मांस, रक्त और मेदा की तीन, यकृत् और प्लीहा को चौथी, अँतड़ियों की पाँचवीं, अग्नि, धरा या पित्त को धारण करने वाली छठी और शुक्र को धारण करने वाली सातवीं, इस प्रकार कलाएँ सात कही गयी हैं।
वक्तव्य- माड़ी लगाकर पालिश किये हुये रेशमी कपड़े के जैसी जो झिल्लियाँ शरीर के भीतर पायी जाती हैं, उन्हें 'कला' कहते हैं। मांसधरा कला वह है, जो प्रत्येक मांसपेशी के ऊपर चढ़ी रहती है। उसी प्रकार रक्तवाही स्रोतों की भीतरी दीवार पर रहने वाली कला रक्तधरा कही जाती है। मेदा को धारण करने वाली 'मेदोधरा', यकृत् और प्लीहा की आवरणभूत 'यकृत्प्लीहाधरा', आमाशय से मलाशय तक के स्रोत के भीतर अन्नधरा, अग्निरस या पित्तरस की थैली में 'अग्निधरा' तथा शुक्र स्रोतों में 'शुक्रधरा' कला है। देखें-सु० शा० अ० 4।
कला-परिचय (धात्वाशयान्तरस्थस्तु यः क्लेदस्त्वधितिष्ठति ।। 9 ।। देहोष्मणा विपक्वश्च सा कलेत्यभिधीयते। स्नायुभिश्च प्रतिच्छन्नान् सन्ततांश्र्च जरायुणा ।। 10 ।। श्लेष्मणा वेष्टितांश्चापि कलाभागांस्तु तान् विदुः ।)
धातु एवं आशयों के भीतर जो क्लेद (गीलापन, शरीरोपयोगी होकर) रहता है और शरीरव्यापी ऊष्मा (उष्णता)
पञ्चमोऽध्यायः] कलादिकाख्यानम् 39
[बायाँ स्तम्भ]
से जो पक जाती है, वह 'कला' कही जाती है। कला का स्वरूप-स्नायु सूत्रों से बुने हुये, जरायु से भली-भाँति व्याप्त और श्लेष्मा से लिपटे हुये भागों को 'कला' जानना चाहिये।
**वक्तव्य—**माड़ी लगाकर पालिश किये हुये रेशमी कपड़े की-सी अथवा मोमी कागज की-सी झिल्लियाँ 'कला' कही जाती हैं।
आशय-परिचय
श्लेष्माशयः स्यादाुरसि तस्मादामाशयस्त्वधः ।। 11 ।। ऊर्ध्वमग्न्याशयो नाभेर्वामभागे व्यवस्थितः। तस्योपरि तिलं ज्ञेयं तदधः पवनाशयः ।। 12 ।। मलाशयस्त्वधस्तस्माद् वस्तिर्मूत्राशयस्त्वधः। जीवरक्ताशय्यमुरो ज्ञेयाः सप्ताशयास्त्वमी ।। 13 ।। पुरुषेभ्योऽधिकाश्चान्ये नारीणामाशयास्त्रयः। धरा गर्भाशयः प्रोक्तः स्तनौ स्तन्याशयौ मतौ ।। 14 ।।
मध्यकाय के भीतर सात आशय हैं। यथा-1. उरःस्थल के भीतर श्लेष्माशय (फुफ्फुस)। 2. उसके नीचे आमाशय। 3. आमाशय के ऊपर नाभि के बायीं ओर अग्न्याशय, अग्न्याशय के ऊपर तिल अर्थात् क्लोम है। 4. आमाशय के नीचे पवनाशय है। 5. पवनाशय के नीचे मलाशय है। 6. उसके नीचे मूत्राशय है, जिसका नाम 'वस्ति' है। और 7. जीव तथा रक्त का या जीवरक्त का आशय उर अर्थात् हृदय है। इस प्रकार ये सात 'आशय' हैं, जो पुरुष, स्त्री, नपुंसक सभी में होते हैं और पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों के मध्यकाय में तीन आशय अधिक होते हैं-1. गर्भाशय जिसे धरा कहते हैं और 2. स्तन्याशय जो स्तन कहे जाते हैं। स्तन दो होते हैं, अतः ये तीन आशय कहे जाते हैं।
**वक्तव्य—**आशय का अर्थ है—'आ = आश्रित्य शेते द्रव्यं अस्मिन्, इति आशयः'। अर्थात् जिसमें द्रव्य शयन करे वह 'आशय' कहलाता है। देखें—सु० सू० 21 तथा सु० शा० 5।
धातुओं का उत्पत्ति-क्रम
रसासृङ्मांसमेदोऽस्थिमज्जाशुक्राणि धातवः। जायन्तेऽन्योन्यतः सर्वे पाचिताः पित्ततेजसा ।। 15 ।।
शरीर में रस, रक्त, मांस, मेदा, अस्थि (हड्डी), मज्जा और शुक्र ये सात धातुएँ होती हैं और ये पित्त के तेज (उष्णता) से पके हुये एक-दूसरे से उत्पन्न होते हैं।
**वक्तव्य—**आहार में उक्त सातों ही धातुओं के मूल कारण या उत्पादक तत्त्व विद्यमान होते हैं। आहार के परिपाक होने
[दायाँ स्तम्भ]
पर सारभूत जो पदार्थ आहार से पृथक् होता है, वह रस 'धातु' कहा जाता है। यह रसवाहिनियों द्वारा सम्पूर्ण धातुओं का पोषण करता है। 'धातवः पुनः शारीराः समानगुणैः गुणसमानभूयिष्ठैर्वाप्याहारविहारैरभ्यस्यमानैर्वृद्धिं प्राप्नुवन्ति' तथा 'तस्मान्मांसं मांसेन, लोहितं लोहितेन, मेदो मेदसा, वसा वसया, अस्थि तरुणास्थ्ना, मज्जा मज्ज्ञा, शुक्रं शुक्रेण'। च० शा० अ० 6। रस धातु का जितना भाग रञ्जक, पित्त द्वारा रंग दिया जाता है, वह 'रक्तधातु' कहलाता है। वह भी धमनियों द्वारा सम्पूर्ण धातुओं का पोषण करता है। इसी प्रकार सभी धातु पुष्ट होते रहते हैं। मांस मांसपेशियों के रूप में रहता है, मेदा जमे हुये घी जैसा पदार्थ है, जो त्वचा के नीचे पाया जाता है, अस्थि या हड्डी प्रसिद्ध ही है, मज्जा हड्डियों के भीतर पाया वाला स्नेह है और शुक्र या वीर्य 'रेतस्' नाम से प्रसिद्ध है।
धातुओं के नाम
(रसाद् रक्तं ततो मांसं मांसात् मेदः प्रजायते। मेदसोऽस्थि ततो मज्जा मज्जायाः शुक्रसम्भवः ।। 16 ।।)
रस से रक्त, रक्त से मांस, मांस से मेदा, मेदा से अस्थि, अस्थि से मज्जा और मज्जा से शुक्र उत्पन्न होता है।
**वक्तव्य—**आयुर्वेदिक ग्रन्थों में धातुओं की उत्पत्ति के सम्बन्ध में दो प्रकार के वचन मिलते हैं-1. वे जो उपर्युक्त श्लोक के वक्तव्य में दिखलाये गये हैं और 2. 'पूर्वः पूर्वोऽतिवृद्धत्वात् वर्धयेद्धि परं परम्'। तथा 'रसाद्रक्तं ततो मांसम्' इत्यादि (सु० सू० अ० 15.18) विचार करने पर दोनों ही क्रम युक्तियुक्त प्रतीत होते हैं, क्योंकि सभी धातुओं में सभी धातुओं के मूल कारण विद्यमान रहते हैं। अतएव आचार्य महोदय ने दोनों ही क्रमों को सूत्र रूप से व्यक्त कर दिया है। तथा—'तत्रैतेषां धातूनाम् अन्नपानरसः प्रीणयिता एवं तेषां (धातूनां) क्षयवृद्धी शोणितनिमित्ते'। (सु०सू० अ० 14)।
धातुओं के मुख्य कार्य
प्रीणनं जीवनं लेपः स्नेहो धारणपूरणे। गर्भोत्पादश्च कर्माणि धातूनां कथितानि च ।। 17 ।।
रस का कर्म-सन्तोष या तृप्ति तथा दूसरी सभी धातुओं का पोषण करना है। रक्त का कर्म-जीवन, प्राणी को जीवित रखना है। मांस का कर्म-सिरा, स्नायु तथा अस्थियों का संवरण या आच्छादन करना है। मेदा का कर्म-सम्पूर्ण शरीर को स्निग्ध रखना है। अस्थि का कर्म-शरीर को धारण करना है। मज्जा का कर्म-अस्थियों को पूर्ण रखना और शुक्र का
40 शार्ङ्गधरसंहिता [पूर्वखण्डे कर्म-गर्भ की उत्पत्ति करना है। इस प्रकार सातों धातुओं के सात मुख्य कर्म कह दिये हैं। रस-स्वरूप ( सम्यक् पक्वस्य भुक्तस्य सारो निगदितो रसः। स तु द्रवः सितः शीतः स्वादुः स्निग्धश्चलो भवेत्।। 18।।) भली-भाँति पचे हुये आहार का सारभूत भाग 'रस' कहलाता है और वह द्रव (पतला), श्वेत, शीत, मधुर, स्निग्ध और चल अर्थात् सदा चलनशील होता है। रक्त का स्वरूप ( यदा रसो यकृद् याति तत्र रञ्जकपित्ततः। रागं पाकं च सम्प्राप्य स भवेद् रक्तसंज्ञकः ।। 19 ।।) जब रस यकृत् एवं प्लीहा में पहुँचता है, तो वहाँ रंजक पित्त द्वारा राग (लालिमा) तथा पाक को प्राप्त होकर वह रस 'रक्त' बन जाता है। मांस का स्वरूप ( शोणितं स्वाग्निना पक्वं वायुना च घनीकृतम्। तदेव मांसं जानीयात् पेशीरूपेण संस्थितम् ।। 20 ।।) रक्त अपनी अग्नि द्वारा परिपक्व (होकर) तथा वायु द्वारा घनीभूत हो जाता है, उसी को 'मांस' जानना चाहिये और वह शरीर में पेशी के रूप में रहता है। मेदस् का स्वरूप ( यन्मांसं स्वाग्निना पक्वं तन्मेद इति कथ्यते। तदतीव गुरु स्निग्धं बलकार्यतिबृंहणम् ।। 21 ।।) जो मांस अपनी अग्नि द्वारा परिपक्व हो जाता है, वह 'मेदस्' कहलाता है। वह अत्यन्त गुरु, स्निग्ध, बलकारक एवं शरीर का अत्यन्त वर्द्धक होता है। अस्थि का स्वरूप ( मेदो यत्स्वाग्निना पक्वं वायुना चातिशोषितम्। तदस्थि संज्ञां लभते स सारः सर्वविग्रहे ।। 22 ।।) जो मेदस् अपनी अग्नि द्वारा परिपक्व हो जाता है और वायु द्वारा अत्यन्त सुखा दिया जाता है। वह 'अस्थि' संज्ञा को प्राप्त करता है। ये अस्थियाँ सम्पूर्ण शरीर में सार-स्वरूप हैं। मज्जा का स्वरूप ( अस्थि यत्स्वाग्निना पक्वं तस्य सारो भवेद् घनः। यः स्वेदवत् पृथग्भूतः स मज्जेत्यभिधीयते ।। 23 ।।) जो अस्थि अपनी अग्नि द्वारा परिपक्व हो जाता है और उसका सार स्वेद के समान पृथक् होकर गाढ़ा हो जाता है, वह 'मज्जा' कहा जाता है। शुक्र का स्वरूप ( मज्जातो जायते शुक्रं तस्य व्यक्तिस्तु यौवने। स्फटिकाभं द्रवं स्निग्धं मधुरं मधुगन्धि च।। 24 ।। शुक्रमिच्छन्ति केचित्तु तैलक्षौद्रनिभं तथा।) मज्जा से शुक्र की उत्पत्ति होती है और उसकी व्यक्ति (दर्शन) युवावस्था में होती है तथा वह स्फटिक (बिल्लौर) के समान उज्ज्वल श्वेत, द्रव (तरल), चिकना, मीठा, मधु की-सी गन्ध वाला होता है। कुछ आचार्यों का कथन है कि तैल तथा मधु जैसा शुक्र भी उत्तम होता है। सप्त धातुओं के मल जिह्वानेत्रकपोलानां जलं पित्तं च रञ्जकम्।। 25 ।। कर्णविड्रसनादन्तकक्षामेढ्रादिजं मलम्। नखनेत्रमलं वक्त्रे स्निग्धत्वं पिटिकास्तथा ।। 26 ।। जायन्ते सप्तधातूनां मलान्येवमनुक्रमात् । जीभ, नेत्र और कपोल (गाल का भीतरी भाग) का जल रस धातु का मल है; रञ्जक पित्त (रस को रंगकर रक्त रूप में परिणत करने वाला) रक्त धातु का मल है; कान का मैल मांस धातु का मल है; जीभ, दाँत, काँख एवं लिंग आदि में उत्पन्न होने वाला मैल मेदो धातु का मल है; नाखून अस्थि धातु का मल है; नेत्र का मैल मज्जा धातु का मल है और मुख पर की चिकनाई तथा युवान् पिडिका (जो प्रायः जवानी में मुख निकला करती हैं, जिन्हें कील या मुँहासे कहा जाता है) शुक्र धातु का मल है। इसी प्रकार सातों धातुओं के ये सात मल उत्पन्न होते हैं। धातुमलों का परिगणन कफः पित्तं मलं खेषु प्रस्वेदो नखरोम च ।। 27 ।। नेत्रविट् त्वक्षु च स्नेहो धातूनां क्रमशो मलाः। कफ, पित्त, स्रोतों का मल, पसीना, नख, रोम, नेत्रों की मैल और त्वचा का स्नेह-ये क्रमशः सातों धातुओं के मल हैं। वक्तव्य-आचार्य शार्ङ्गधर ने मल-सम्बन्धी दोनों मत प्रदर्शित किये हैं। देखें-च० चि० 15.18-19। उपधातु स्तन्यं रजश्च नारीणां काले भवति गच्छति ।। 28 ।। शुद्धमांसभवः स्नेहः सा वसा परिकीर्तिता।
पञ्चमोऽध्यायः] कलादिकाख्यानम् 41 स्वेदो दन्तास्तथा केशास्तथैवौजश्च सप्तमम्।। २९।। इति धातुभवा ज्ञेया एते सप्तोपधातवः। 'स्तन्य' (दुग्ध) रसधातु का तथा 'रस' (मासिक स्राव) रक्तधातु का उपधातु है। ये दोनों स्त्रियों को ही होते हैं और समय-समय पर निकलते हैं। 'वसा' मांस में रहने वाला स्नेह है, जो कि मांस का उपधातु कहा जाता है। 'स्वेद' (पसीना) मेदा का उपधातु है। 'दाँत' अस्थि के उपधातु हैं। 'केश' मज्जा का और 'ओजः' शुक्र का उपधातु है। इस प्रकार धातुओं से उत्पन्न होने वाले ये सात पदार्थ 'उपधातु' कहे जाते हैं। वक्तव्य—स्तन्य (दूध) एवं रजस् पुरुषों में भी होते हैं, ध्यान दें—जब कोई पुरुष से स्त्री बन जाता है अथवा ऑपरेशन करके बना दिया जाता है, तब उक्त दोनों उपधातु पुष्ट होकर समय पर प्रवृत्त होते हैं। आजकल अमेरिका आदि देशों में पुरुष को स्त्री तथा स्त्री को पुरुष बना दिया जाता है। और कभी-कभी स्वयं भी धीरे-धीरे उक्त परिवर्तन होते देखा जाता है। कलकत्ता के अस्पताल में 100 वर्ष के भीतर तीन- चार ऐसी घटनाएँ हो चुकी हैं। स्तन्य का स्वरूप (रसप्रसादो मधुरः पक्वाहारनिमित्तजः।। ३०।। कृत्स्नदेहात् स्तनौ प्राप्तः स्तन्यमित्यभिधीयते।) आहार परिपक्व होने पर जो स्वच्छ एवं मधुर रस उत्पन्न होता है, वह सम्पूर्ण शरीर का पोषण करने के लिए पूरे शरीर में भ्रमण करता है। जब माता प्रेमपूर्वक शिशु को दूध पिलाने के लिए उत्सुक होती है, तब सम्पूर्ण शरीर से आकर स्तनों में जो रस प्राप्त होता है, वही 'स्तन्य' या दूध कहा जाता है। रजस् का स्वरूप (शशासृक्प्रतिमं यत्तु यद् वा लाक्षारसोपमम्।। ३१।। तदार्तवं प्रशंसन्ति यद् वासो न विरञ्जयेत्।) जो खरगोश के रक्त जैसा हो अथवा लाही के रस जैसा (गहरा लाल) हो और जो सफेद कपड़े को विरूप न करे अर्थात् रजस् से लिपे हुये वस्त्र को धोने पर उसका दाग या धब्बा न पड़े, वह 'आर्तव' (मासिक स्राव) शुद्ध होता है। वसा का स्वरूप (गोसर्पिर्निभा पीता त्वचोऽधः संस्थिता च या।। ३२।। शीतातपसहा स्निग्धा सा वसा परिकीर्तिता।) गाय के घी जैसी पीली, त्वचा के नीचे पूरे शरीर को आच्छादित किये हुये स्थित ('वस् आच्छादने' धातु का रूप वसा शब्द है) अतएव शीत और धूप को सहनेवाली तथा स्निग्ध द्रव्य को 'वसा' कहा जाता है। स्वेद का स्वरूप (त्वचातो लवणः स्रावो व्यक्तोऽव्यक्तोऽनिशं स्रवेत् ।। ३३ ।। स स्वेदश्च समाख्यातः क्लेदत्वङ्मृदुताकरः।) त्वचा से जो नमकीन-सा स्राव प्रत्यक्ष (गर्मियों में) अथवा अप्रत्यक्ष (शीतकाल में) निरन्तर निकलता है वह 'स्वेद' (पसीना) कहलाता है। वह रोमकूपों को आर्द्र एवं त्वचा को मृदु बनाये रखता है। दाँत का स्वरूप (दन्ताः श्वेता दृढाः श्लक्ष्णा द्वात्रिंशत्सङ्ख्यका मताः।। ३४ ।। बालानान्तु चतुर्विंशत् चर्वणच्छेद्नार्थकाः।) दाँत सफेद, दृढ़ या कठोर तथा चिकने होते हैं। ये संख्या में 32 या 28 होते हैं, किन्तु बालकों के दूध के दाँत केवल 24 ही होते हैं। दाँतों का कार्य चबाना और काटना है। केश का स्वरूप (केशाः शीर्षे मुखे श्मश्रु नेत्रे पक्ष्मध्रुवौ मतौ।। ३५ ।। तनौ रोमाणि जायन्ते करपादतले विना।) हाथ, पाँव, तलुओं के अतिरिक्त मनुष्य के सम्पूर्ण शरीर पर बाल होते हैं। जैसे-सिर पर केश, मुख पर श्मश्रु या दाढ़ी-मोछ, नेत्र पर पक्ष्म तथा भौंहें और शेष शरीर पर रोम होते हैं। ओजस् का स्वरूप ओजः सर्वशरीरस्थं शीतं स्निग्धं स्थिरं सरम्।। ३६ ।। सोमात्मकं शरीरस्य बलपुष्टिकं मतम्। ओजस् सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त रहता है। यह शीत एवं स्निग्ध है और जीवन भर शरीर में रहता है। सर एवं सौम्य है और शरीर को बलवान् और पुष्ट करता है। त्वचाओं का स्वरूप तथा नाम ज्ञेयावभासिनी पूर्वं सिध्मस्थानं च सा मता।। ३७ ।। द्वितीया लोहिता ज्ञेया तिलकालकजन्मभूः। श्वेता तृतीया सङ्ख्याता स्थानं चर्मदलस्य सा।। ३८ ।। ताम्रा चतुर्थी विज्ञेया किलासश्वित्रभूमिका। पञ्चमी वेदनी ख्याता सर्वकुष्ठोद्भवस्थलः।। ३९ ।। विख्याता रोहिणी षष्ठी ग्रन्थिगण्डापचीस्थितिः। स्थूला त्वक्सप्तमी ख्याता विद्रध्यादेः स्थितिश्च सा।। ४० ।। इति सप्त त्वचः प्रोक्ता स्थूला व्रीहिद्विमात्रया।
42 | शार्ङ्गधरसंहिता | [पूर्वखण्डे
42 | शार्ङ्गधरसंहिता | [पूर्वखण्डे
पहली या बाहर की त्वचा का नाम 'अवभासिनी' (कृष्ण, गौर, पीत और रक्त वर्ण को अवभासित करने वाली) है, सिध्म या सेहुँआ इसी में होता है। दूसरी का नाम 'लोहिता' यहाँ तक रक्त-कोशिकाएँ आयी रहती हैं) यह तिल और झांई का स्थान है। तीसरी का नाम 'श्वेता' (सफेद होने के कारण) है, यह चर्मदल या चम्मल का स्थान है। चौथी 'ताम्रा' (अत्यन्त लाल) है, यह किलास (लाल वर्ण का श्वेतकुष्ठ) एवं श्वेतकुष्ठ या फुलबहरी का स्थान है। पाँचवीं 'वेदनी' (स्पर्शज्ञान का विशिष्ट स्थान) है, यहाँ पर सब प्रकार के कुष्ठ होते हैं। छठी 'रोहिणी' (प्ररोहों या अंकुरों वाली होने के कारण) कही जाती है, यह ग्रन्थियों (बिना मुख के फोड़े), गलगण्ड (घेंघा) और अपची (गण्डमाला) का स्थान है और सातवीं 'स्थूला' (मोटी) नामक त्वचा है, जो विद्रधि आदि का स्थान है। इस प्रकार ये सात त्वचाएँ कही गयी हैं। ये सब दो मांसल स्थानों पर जौ के बराबर मोटी होती हैं। वक्तव्य-त्वचा शब्द 'त्वच् संवरणे' धातु से बना है, जिसका अर्थ है-शरीर का संवरण करना या उसे ढँकना। विशेष जानने के लिए देखें-सु० शा० अ० 4.4 और च० शा० अ० 7.4। 'षट् त्वचः'-च० चि० 15.17। दोषों का वर्णन वायुः पित्तं कफो दोषा धातवश्च मलास्तथा ।। 41 ।। तत्रापि पञ्चधा ख्याताः प्रत्येकं देहधारणात् । वायु, पित्त और कफ ये दोष, धातु और मल माने जाते हैं। शरीर के भिन्न-भिन्न अवयवों में रहकर शरीर को धारण करने के कारण ये एक-एक तथा पाँच-पाँच प्रकार के कहे जाते हैं। दोष आदि संज्ञाओं का हेतु (शरीरदूषणाद् दोषा धातवो देहधारणात् ।। 42 ।। वातपित्तकफा ज्ञेया मलिनीकरणान्मलाः ।) ये वात, पित्त तथा कफ शरीर को दूषित (दुःखित) करने के कारण 'दोष' कहे जाते हैं, शरीर को धारण (स्वस्था- वस्था में सुखी) करने के कारण 'धातु' और शरीर को मलिन या मैला (रुग्ण) करने के कारण 'मल' कहे जाते हैं। दोषों में वायु की प्रधानता पित्तं पङ्गुः कफः पङ्गुः पङ्गवो मलधातवः ।। 43 ।। वायुना यत्र नीयन्ते तत्र गच्छन्ति मेघवत् । पित्त पंगु (परतन्त्र) है, कफ पंगु है, मल और धातु भी पंगु हैं। इनको वायु जहाँ ले जाती है, वहीं ये मेघ (बादल) के समान चले जाते हैं। वक्तव्य-इस पाठ से वायु की वह महत्ता बतलायी है, जिसका विस्तृत वर्णन चरकसंहिता सू० अ० 12 तथा सु० नि० अ० 1 में किया गया है। वात के गुण, स्थान तथा नाम पवनस्तेषु बलवान् विभागकरणान्मतः ।। 44 ।। रजोगुणमयः सूक्ष्मः शीतो रूक्षो लघुश्चलः । मलाशये चरेत् कोष्ठे वह्निस्थाने तथा हृदि ।। 45 ।। कण्ठे सर्वाङ्गदेशेषु वायुः पञ्च प्रकारतः । अपानः स्यात् समानश्च प्राणोदानौ तथैव च ।। 46 ।। व्यानश्चेति समीरस्य नामान्युक्तान्यनुक्रमात् । तीनों दोषों में वायु ही बलवान् है, क्योंकि वह शरीर के प्रत्येक अवयवों का विभाग करता है। वह रजोगुणयुक्त है, सूक्ष्म है, शीत है, रूक्ष है, लघु (हल्का) है और चल (गीतशील) है। वह मलाशय में, अग्न्याशय में, हृदय में, कण्ठ (सामीप्यात् फुफ्फुस तक में) तथा समस्त शरीर में विचरता रहता है। अतएव इसके पाँच भेद माने जाते हैं और इन स्थानों में विचरने वाले वायु के क्रमशः पाँच नाम ये हैं-1. अपान, 2. समान, 3. प्राण, 4. उदान और 5. व्यान। वक्तव्य-यद्यपि वायु एक ही है, तथापि स्थान और कर्म के भेद से पाँच प्रकार का कहा गया है। तदनुसार ही इसके पाँच नाम भी रखे गये हैं-वायु शब्द 'वा गतिगन्धनयोः' धातु से बना है, जिसका अर्थ है-'वाति गच्छति इति वायुः' अर्थात् यह सर्वदा चलता रहता है, इसी प्रकार इसके पाँच नाम अत्यन्त विचारपूर्वक रखे गये हैं। यथा-'अप अधस्तात् अनिति प्राणिति गच्छति (अन् प्राणे-अ० प० से०) इति अपानः' अर्थात् जो नीचे की ओर चलता है। यही मल-मूत्रादि का त्याग कराता है और अधोवायु के रूप में निकलता है। समान-'सम्यक् अनिति इति समानः' जो पाचन क्रिया का सम्पादन करता है। प्राण-'प्रकर्षेण अनिति इति प्राणः' अर्थात् जो हृदय का सञ्चालन करता है। उदानः-'उद् ऊर्ध्वम् अनिति इति उदानः' अर्थात् जो ऊपर को प्रश्वास के रूप में आता-जाता है और व्यानः-'विशेषेण आसमन्तात् सर्वतः अनिति इति व्यानः', अर्थात् जो विशेष रूप से सम्पूर्ण शरीर में गति करता है, वह व्यान कहा जाता है। इस प्रकार वायु ही जीवन का प्रधान कारण माना जाता है।
पित्त के गुण, स्थान तथा नाम
पञ्चमोऽध्यायः ] कलादिकाख्यानम् 43
पित्त के गुण, स्थान तथा नाम
पित्तमुष्णं द्रवं पीतं नीलं सत्त्वगुणोत्तरम् ।। 47 ।। कटुतिक्तरसं ज्ञेयं विदग्धं चाम्लतां व्रजेत् । अग्न्याशये भवेत् पित्तमग्निरूपं तिलोन्मितम् ।। 48 ।। त्वचि कान्तिकरं ज्ञेयं लेपाभ्यङ्गादिपाचकम् । दृश्यं यकृति यत् पित्तं तद्रसं शोणितं नयेत् ।। 49 ।। यत् पित्तं नेत्रयुगले रूपदर्शनकारि तत् । यत् पित्तं हृदये तिष्ठेन्मेधाप्रज्ञाकरं च तत् ।। 50 ।। पाचकं भ्राजकं चैव रञ्जकालोचके तथा। साधकं चेति पञ्चैव पित्तनामान्यनुक्रमात् ।। 51 ।।
पित्त उष्ण (गर्म) है, द्रव (पतला या तरल) है, पीला है, नीला है, सत्त्वगुण-प्रधान है, चरपरा और कड़वा है। जब वह विकृत हो जाता है तो खट्टा हो जाता है। अग्न्याशय में जो पित्त है, वह अग्निरूप है और तिलपरिमित है। त्वचा में जो पित्त है, वह शरीर की कान्ति (चमक) का उत्पादक तथा लेप और अभ्यंग (मालिश का स्नेह) का पाचक या शोषक है, यकृत में जो पित्त है, वह वमन (खट्टी और कड़वी कै के रूप) में दिखलायी पड़ता है एवं रस को रक्त बनाता है। जो पित्त दोनों आँखों में है, वह रूप का दर्शन कराता है और जो पित्त हृदय में रहता है, वह मेधा (बुद्धि) तथा प्रज्ञा (सोचने-विचारने को शक्ति) का हेतु है। इसी प्रकार स्थानों के अनुक्रम से पित्त के ये पाँच नाम हैं। यथा-1. पाचक, 2. भ्राजक, 3. रञ्जक, 4. आलोचक और 5. साधक।
वक्तव्य—ताप या सन्तापजनक पदार्थ का नाम पित्त है। देखें अमरकोष-अपि+दो+क्त, वायु के समान एक ही पित्त के कार्यभेद तथा स्थानभेद से पाँच नाम रखे गये हैं जो कि सार्थक हैं। यथा-‘पचति आहारम् इति पाचकम् ’=आहार को पकाता है। ‘भ्राजयति प्रकाशयति वर्णम् इति भ्राजकम्’ = वर्ण को प्रकाशित करता है। ‘रञ्जयति रक्तीकरोति रसम् इति रञ्जकम्’ = रस को रक्त बनाता है। ‘आलोचयति दर्शयति रूपम् इति आलोचकम्’ = रूप को दिखाता है और ‘साधयति कार्याणि इति साधकम्’ = कार्यों को सिद्ध करता है।
कफ के गुण, स्थान तथा नाम
कफः स्निग्धो गुरुः श्वेतः पिच्छिलः शीतलस्तथा। तमोगुणाधिकः स्वादुविदग्धो लवणो भवेत् ।। 52 ।। कफश्चामाशये मूर्ध्नि कण्ठे हृदि च सन्धिषु । तिष्ठन् करोति देहस्य स्थैर्यं सर्वाङ्गपाटवम् ।। 53 ।। क्लेदनः स्नेहनश्चैव रसनश्चावलम्बनः। श्लेष्मकश्चेति नामानि कफस्योक्तान्यनुक्रमात् ।। 54 ।।
कफ या श्लेष्मा स्निग्ध है, गुरु है, श्वेत है, पिच्छिल (चिपचिपा) है, शीतल है, तमोगुणयुक्त है और मीठा है। वह जब विदग्ध या दूषित हो जाता है, तो नमकीन हो जाता है (खखार या बलगम में यही निकलता है)। कफ आमाशय में शिर के भीतर, कण्ठ (और फुस्फुसों) में, हृदय में तथा शरीर की सम्पूर्ण सन्धियों में रहता हुआ शरीर में स्थिरता या सामर्थ्य (जिसके कारण शरीर के सभी अवयव यथास्थान स्थित रहते हैं) और सम्पूर्ण अंगों की पटुता (क्रियाशील या गति) को करता है। वायु और पित्त के समान कफ के भी उक्त स्थानों में क्रम से ये पाँच नाम हैं—1. क्लेदन, 2. स्नेहन, 3. रसन, 4. अवलम्बन और 5. श्लेष्मक।
वक्तव्य—वात और पित्त के समान कफ के भी स्थानभेद से पाँच नाम हैं और वे भी सार्थक हैं। यथा-‘क्लेदयति क्लिद्यते वा अनेन अन्नम् इति क्लेदनः’ = आहार को क्लिन्न या आर्द्र या गीला करता है। ‘स्नेहयति स्निह्यते अनेन वा शिरः, इति स्नेहनः’ = यह शिर या मस्तिष्क को स्निग्ध या तर करता है। ‘रसयति रसं ज्ञापयति अथवा रस्यते रसो मधुरादिः अनेन इति रसनः’ = रस का अनुभव कराता है; इसकी विकृति से ही रसज्ञान का लोप हो जाता है। ‘अवलम्बयति धारयति हृदयम् अथवा अवलम्ब्यते धार्यते वा हृदयम् अनेन इति अवलम्बनः’ = यह हृदय-यन्त्र को धारण करता है; इसके घट जाने से हृदय धड़कने लगता है और ‘श्लेषयति योजयति सन्धीन् इति श्लेष्मकः’ = सन्धियों को सटाता या जोड़ता है। तीनों दोषों का पूर्व विवेचन सु० सू० अ० 21 में देखें।
(स्नायवो बन्धनं प्रोक्ता देहे मांसास्थिमेदसाम्। सन्धीनामपि यत्तास्तु शिराभ्यः सुदृढ़ाः स्मृताः ।। 55 ।।)
‘स्नायु’ शरीर में मांसपेशियों, हड्डियों, मेदस तथा सन्धियों के बन्धन (अर्थात् उन्हें बाँधने वाले) कहे जाते हैं और वे शिराओं की अपेक्षा अधिक दृढ़ होते हैं।
वक्तव्य—‘स्नायु’ डोरी या बटे हुये धागे जैसी अत्यन्त दृढ़ होती हैं, इनसे धनुष की डोरी और शिकार के जाल बनाये जाते हैं।
सन्धि-परिचय
सन्ध्यश्चाङ्गसन्धानाद् देहे प्रोक्ताः कफान्विताः। (अस्थ्नां ते द्विविधाः सन्ति चेष्टावन्तः स्थिरास्तथा ।। 56 ।।
शरीर में जिस स्थान पर अंगों का सन्धान या जोड़ होता
शाखाहनुषु कट्यां च चेष्टावन्तो भवन्ति हि। शेषास्तु सन्धयः सर्वे स्थिरास्तज्ज्ञैरुदाहृताः।। 57।।) शरीर में जिस स्थान पर अंगों का सन्धान या जोड़ होता है, उस स्थान को 'सन्धि' कहते हैं। ये स्थान 'श्लेष्मक' नामक कफ से युक्त होते हैं। प्रायः हड्डियों के जोड़ों को ही सन्धि कहते हैं और वे दो प्रकार की होती हैं-1. चेष्टावान् अर्थात् चल और 2. स्थित अर्थात् अचल। शाखाओं (टांगों और बाहों) में, हनु तथा कमर में 'चेष्टावान्' सन्धियाँ होती हैं और शेष सभी सन्धियाँ 'स्थिर' मानी जाती हैं। वक्तव्य-ये सन्धियाँ केवल हड्डियों की ही हैं। मांसपेशी, स्नायु एवं सिराओं की सन्धियों की संख्या अनन्त होने के कारण वे असंख्येय हैं। अस्थि-परिचय आधारश्च तथा सारः कायेऽस्थीनि बुधा जगुः। (आभ्यन्तरगतः सार आधारो भूरुहां यथा।।58।।) आयुर्वेद के ज्ञाता विद्वान् अस्थियों या हड्डियों को शरीर का वैसा आधार एवं सार (शरीर भर में सबसे ठोस) कहते हैं। जैसे वृक्षों का भीतरी सार उनका आधार होता है। वक्तव्य-अस्थियों की संख्या के सम्बन्ध में शास्त्रकारों का मतभेद है। यथा-वेद, धर्मशास्त्र एवं चरक आदि कायचिकित्सा की संहिताएँ 360, सुश्रुत या शल्यतन्त्र 300, यूनानी चिकित्साशास्त्र 242 तथा आधुनिक प्रत्यक्षाभिमानी 200 (प्रत्यक्षशारीर अ० 3) एवं (हमारे शरीर की रचना वाले) 206 मानते हैं। इसका कारण अपना-अपना दृष्टिकोण ही है। मर्म-परिचय (सन्निपातान् सिरास्नायुसन्धिमांसास्थिसम्भवान्।) मर्माणि जीवाधाराणि प्रायेण मुनयो जगुः।। 59।। सिरा, स्नायु, सन्धि, मांस एवं अस्थियों में होने वाले 'सन्निपातों' या संयोगों को कर्म कहते हैं। माननीय मुनियों का कथन है कि वे जीव के विशिष्ट स्थान हैं। वक्तव्य-विशेष जानने के लिए देखें-सु०शा०अ० 6। सिरा-परिचय सन्धिबन्धनकारिण्यो दोषधातुवहाः सिराः। (नाभ्यां सर्वा निबद्धास्ताः प्रतन्वन्ति समन्ततः ।। 60।।) ये 'सिरा' सन्धियों को बाँधने का कार्य भी करती हैं और दोष तथा धातुओं का वहन या प्रापण (शरीर में पहुँचाना रूपी कार्य) भी करती हैं। वे सब नाभि में उत्पन्न होकर समस्त शरीर में फैली हुई रहती हैं। वक्तव्य-यह 'नाभि' ढूँड़ी या धुत्री नामक उदर के बहिर्भाग का दृश्यमान गढ्ढा नहीं है, अपितु आमाशय एवं पक्वाशय का मध्यभाग अन्न या अँतड़ी नामक अवयव है, जिसमें भुक्त अन्न का पाक (पाक होकर उससे 'रस' पृथक्) हो जाता है। इस 'रस' को उक्त सिराएँ शरीर में पहुँचाती रहती हैं। इस 'रस' में दोष (वातादि) तथा धातुओं (रक्तादि) के उपादान विद्यमान रहते हैं। जिनसे उनकी पुष्टि होती रहती है। अवशिष्ट सारहीन या रसहीन मलद्रव्य पक्वाशय अर्थात् मलाशय में चला जाता है। इसका वर्णन पूर्वखंड अध्याय 6 में देखें। 'आमपक्वाशयोर्मध्यं नाभिनिर्म मर्म' (सु० शा० अ० 6)। धमनी-परिचय धमन्यो रसवाहिन्यो धमन्ति पवनं तनौ। (तदधीनाः क्रियाः सर्वा देहेन्द्रियमनोभवाः ।।61।।) धमनियों के ध्मान के कारण ही रस का 'वहन' होता है, अर्थात् स्थानान्तर में पहुँचता है। वे ही पवन अर्थात् (प्राण, अपान, समान, उदान एवं व्यान नामक) पञ्चविध वायु को शरीर में सञ्चालित करती हैं। अतएव शारीरिक, ऐन्द्रियक एवं मानसिक सभी क्रियाएँ उन्हीं के अधीन हैं। वक्तव्य-'धमनी' नामक पदार्थ प्रत्यक्षगोचर नहीं है। वह 'शव' में नहीं देखी जा सकतीं। अतएव महर्षि सुश्रुत ने (सु० शा० अ० 9 में) 'पञ्चत्वमायान्ति विनाशकाले' कहा है। महर्षि सुश्रुत एवं आचार्य शार्ङ्गधर धमनियों के उत्पत्ति- स्थान नाभि की संख्या 24 एवं उनके कार्य के विषय में एकमत हैं और चरक उनकी संख्या 10 बतलाते हैं तथा उत्पत्ति-स्थान 'हृदय' मानते हैं। इसका कारण भी मात्र दृष्टिकोण का भेद ही है। प्राण के सञ्चार का आदि स्थान 'नाभि' है, अतः महर्षि सुश्रुत तथा तदनुयायी आचार्य शार्ङ्गधर ने 'नाभि' को धमनियों का मूल माना है और महर्षि चरक ने धमनियों के ध्यान को ध्यान में रखकर 'हृदय' को मूल मान लिया है, जो अत्यन्त उपयुक्त एवं युक्तिसंगत है; और आधुनिक प्रत्यक्षवादी 'हृदय' से निकलने वाली रक्तवाहिनी को तथा उसकी शाखा-प्रशाखाओं को 'धमनी' कहते हैं। उनकी इस धारणा का क्या कारण है, इसके लिए देखें-सु० शा० अ० 9, च० सू० अ० 12 तथा 30 और प्रत्यक्षशारीर एवं 'हमारे शरीर की रचना' और सम्पूर्ण आयुर्वेदीय वाङ्मय।
पञ्चमोऽध्यायः] कलादिकाख्यानम् 45 पेशी-परिचय मांसपेश्यो बलाय स्युरवष्टम्भाय देहिनाम्। (पिशितमनुप्रविश्य पेशीर्विभजतेऽनिलः ।। 62 ।।) माँसपेशियाँ शरीर-धारियों के बल (शक्ति) एवं अवष्टम्भ (स्थिति या सहारा) के लिए आवश्यक हैं। मांस में ही प्रविष्ट होकर वायु पेशियों का विभाजन करता है। वक्तव्य-मांसधातु ही मांसपेशियों के रूप में शरीर को आच्छादित किये रहता है। कण्डरा-परिचय प्रसारणाऽऽकुञ्चनयोरङ्गानां कण्डरा मताः। (ग्रीवायां पृष्ठदेशे च करयोः पादयोः स्थिताः ।। 63 ।।) बाहु आदि अंगों के फैलाने तथा सिकोड़ने में 'कण्डराएँ' कारण मानी जाती हैं और वे ग्रीवा, पीठ, बाहु एवं टाँगों में स्थित हैं। रन्ध्र-परिचय नासानयनकर्णानां द्वे द्वे रन्ध्रे प्रकीर्तिते। मेहनापानवक्त्राणामेकैकं रन्ध्रमुच्यते ।। 64 ।। दशमं मस्तके प्रोक्तं रन्ध्राणीति नृणां विदुः। स्त्रीणां त्रीण्यधिकानि स्युः स्तनयोर्गर्भवर्त्मनः ।। 65 ।। सूक्ष्मच्छिद्राणि चान्यानि मतानि त्वचि जन्मिनाम्। नासिका, नयन एवं कान के दो-दो रन्ध्र होते हैं; मेहन (मूत्रमार्ग), अपान (गुद) तथा मुख के एक-एक रन्ध्र होते हैं और दसवाँ रन्ध्र शिर में होता है। ये दस रन्ध्र होते हैं। स्त्रियों के शरीर में तीन रन्ध्र अधिक हैं-2 स्तनों में और 1 गर्भ मार्ग में। वक्तव्य-'नव स्रोतांसि'-सु० शा० अ० 5 तथा 'नव महान्ति छिद्राणि, सप्त शिरसि द्वे चाधः' ।-च० शा० अ० 7। इस प्रकार सुश्रुत एवं चरक में 9 ही छिद्र माने गये हैं तथा गर्भमार्ग और स्तनमार्ग पुरुषों के अव्यक्त एवं स्त्रियों के व्यक्त होते हैं। गर्भमार्ग का नाम 'भग' और वह दोनों को होता है, अतएव पुरुष को भगवान् और स्त्री को भगवती कहते हैं। यह वह अवयव है, जिसकी उत्तेजना से पुरुष स्त्री का तथा स्त्री पुरुष का भजन या सेवन करती है। 'भज सेवायाम्' धातु से भग शब्द का निर्माण होता है। मल तथा स्रोतस्-परिचय (मनः प्राणात्रपानीयदोषधातूपधातवः ।। 66 ।। धातूनां च मला मूत्रं मलमित्र्यादयस्तनी। सञ्चरन्ति च यैर्मार्गैस्तानि स्रोतांसि सञ्जुगुः ।। 67 ।। यथार्थमूष्मणा युक्तो वायुः स्रोतांसि दारयेत्।) शरीर के भीतर मन, प्राण, अन्न, जल, दोष, धातु, उपधातु, धातुओं के मल और मूत्र आदि जिन मार्गों में से होकर सञ्चार करते हैं उनको 'स्रोतस्' कहते हैं। यथायोग्य ऊष्मा से युक्त होकर वायु स्रोतों को बना देता है। वक्तव्य-देखें-च० वि० अ० 5। धन्वन्तरि ने सु० शा० अ० 5 में बहिर्मुख स्रोतस् 9 तथा योगवाही स्रोतस् 10 कहा है। देखें-सु० शा० 9 में। जाल-परिचय (जालानि तु सिरास्नायुमांसास्थानामुद्भवन्ति हि ।। 68 ।। तानि चत्वारि चत्वारि सर्वाण्येव च षोडश । परस्परं निबद्धानि मणिबन्धादिगुल्फयोः ।। 69 ।। गवाक्षितानि जालानि शरीरस्थानि तत्त्वतः।) सिरा, स्नायु, मांस एवं अस्थियों के चार-चार जाल होते हैं और वे सब मिलकर सोलह हैं। ये परस्पर बँधे हुये परस्पर सटे हुये, परस्पर छिद्रयुक्त और शरीर के केवल गुल्फ तथा मणिबन्ध नामक प्रदेशों में आश्रित होते हैं। कूर्च्च-परिचय (कूर्चाः स्युर्हस्तयोर्द्वौ तु तावन्तौ पादयोरपि ।। 70 ।। ग्रीवायामेक एकस्तु मेढ़े सर्वेऽपि षट् स्मृताः।) हाथों में दो, पाँवों में दो, ग्रीवा में एक तथा मेहन में एक-इस प्रकार छः 'कूर्च' होते हैं। रज्जु-परिचय (पार्श्वतः पृष्ठवंशस्य महत्यो मांसरज्जवः ।। 71 ।। चतस्रो मांसपेशीनां बन्धनं तत्प्रयोजनम्।) पृष्ठवंश (रीढ़ या मेरुदण्ड) के दोनों ओर मोटी-मोटी चार रज्जुएँ होती हैं। उनका कार्य मांसपेशियों को बाँधे रखना है। सेवनी-परिचय (सेवन्यः सप्त तासां तु भवेयुः पञ्च मस्तके ।। 72 ।। एका शेफसि जिह्वायामेका विध्येन्न ताः क्वचित्।) सेवनियाँ सात होती हैं। उनमें पाँच मस्तक में, एक शेफस् (मेहन या लिंग) में तथा एक जीभ में होती है। इनका कभी भी वेध न करे। सङ्घात-परिचय (चतुर्दशास्थां सङ्घाता गुल्फे जानुनि वङ्क्षणे ।। 73 ।। द्वितीये सविक्षा बाह्रोश्चाप्येकैकं शिरसि त्रिके।)
46 शार्ङ्गधरसंहिता [पूर्वखण्डे
46 शार्ङ्गधरसंहिता [पूर्वखण्डे अस्थियों के संघात चौदह हैं। एक गुल्फ (एड़ी के ऊपर की गाँठ, टखना का घुट्टी) में, एक जानु में और एक वंक्षण (पेड़ू और जाँघ के बीच का भाग, ऊरुसंधि) में, इसी प्रकार दूसरी सक्थि (टाँग) में तथा दोनों बाहुओं में और एक-एक शिर तथा त्रिकास्थि में होते हैं। सीमन्त-परिचय (सङ्घाताः सीविता यैस्तु सीमन्तास्ते प्रकीर्तिताः ।। 74 ।। चतुर्दशैव सीमन्ताः कथिता मुनिपुङ्गवैः।) सीमन्त भी चौदह होते हैं और उनकी गणना अस्थि-संघात के ही समान होती है, क्योंकि जिनके संघात सीवित (सिये गये) हैं, वे सीमन्त कहे जाते हैं। जिह्वा-परिचय (उदरे पच्यमानानामाध्मानाद् रुक्मसारवत् ।। 75 ।। कफशोणितमांसानां सारो जिह्वा प्रजायते।) जिस प्रकार सुवर्ण को तपाने से स्वर्ण का सार भाग ही बच जाता है, इसी प्रकार शरीर की उष्णता से उदर में पकते हुये कफ, रक्त एवं मांस का सारभूत पदार्थ 'जीभ' बनती है। हृदय-परिचय (उरसि स्तनयोर्मध्ये रक्तश्लेष्मप्रसादजम् ।। 76 ।। मुकुलं पुण्डरीकेण सदृशं स्यादधोमुखम्।) हृदयं चेतनास्थानमोजसश्चाश्रयो मतम् ।। 77 ।। (जाग्रतस्तद् विकसति स्वपतश्च निमीलति । यतो व्यानप्रणुन्नेन शुद्धरक्तेन जन्तवः ।। 78 ।। प्रीणिता वर्तयन्तीह यावज्जीवनसंस्थितिः।) 'हृदय' नामक अवयव उरस् या वक्षस् के भीतर स्तनों (फुप्फुसों) के बीच में स्थित है, जो शरीर-निर्माण के समय रक्त तथा श्लेष्मा के प्रसाद या सारभाग से उत्पन्न होता है, मुकुल (अविकसित या न खिले) कमल के समान उसकी आकृति होती है, उसका मुख नीचे की ओर होता है, वह 'चेतना' का प्रधान स्थान है और 'ओजस्' का आश्रय है। जब प्राणी जागता रहता है, तब वह खिला रहता है और जब प्राणी सोया रहता है, तब वह संकुचित रहता है तथा वहीं से व्यान वायु द्वारा प्रेरित किये हुये शुद्ध रक्त से प्रीणित या तृप्त किये हुये जन्तु जीवन-पर्यन्त जीवित रहते हैं। वक्तव्य—यह रक्त रस-मिश्रित होता है, अतः रक्त से अथवा रस से इन दोनों से शरीर का तर्पण या प्रीणन होता रहता है।
फुप्फुसादि का स्थान तद्वामे फुप्फुसप्लीहौ दक्षिणाङ्गे यकृत् तिलम् ।। 79 ।। हृदय के बाईं ओर फुप्फुस तथा प्लीहा और दाहिनी ओर यकृत् एवं तिल की स्थिति है। फुप्फुस-परिचय (उरो मध्यगतश्चापि श्वासोच्छ्वासप्रसाधनः । ·रक्तफेनभवो ज्ञेयः फेनवद् बहुकोष्ठकः ।। 80 ।।) उदानवायोराधारः फुप्फुसः प्रोच्यते बुधैः । 'फुप्फुस' या फेफड़ा वक्षस् के भीतर रहता है यह श्वास-उच्छ्वास क्रिया का साधक है। गर्भाशय में शरीर-निर्माण के समय यह रक्त की झाग से उत्पन्न होता है। इसलिये उसमें फेन के समान ही अनन्त कोष्ठ होते हैं और विद्वान् लोग उसे उदानवायु का आधार मानते हैं। वक्तव्य-सुश्रुत ने दो भागों में विभक्त होने पर भी 'फुप्फुस' को एक ही माना है, किन्तु महर्षि चरक ने 'द्वौ श्लेष्मभुवौ' (च० शा० अ० 7) दो फुप्फुस माने हैं। इसका कारण मात्र दृष्टिकोण का भेद है। प्लीहा-परिचय (शोणिताच्च समुत्पन्ना रसरञ्जनतत्परा ।। 81 ।।) रक्तवाहिसिरामूलं प्लीहाख्याता महर्षिभिः । शरीरोत्पत्ति के समय प्लीहा रक्त से उत्पन्न होता है और सदैव रस को रक्त बनाने में तत्पर रहती है। इसलिये महर्षियों ने उसे रक्तवाही सिराओं का मूल माना है। यकृत्-परिचय (शोणिताच्च समुत्पन्नं रसरञ्जनतत्परम् ।। 82 ।।) यकृद् रञ्जकपित्तस्य स्थानं रक्तस्य संश्रयः । यकृत् गर्भोत्पत्ति के समय रक्त से उत्पन्न होता है और रस को रंगकर रक्त बनाने में तत्पर रहता है, क्योंकि वह रंजकपित्त का स्थान है और इसलिये वह रक्त का आश्रय माना जाता है। वक्तव्य-'शोणितवहानां स्रोतसां यकृन्मूलं प्लीहा च'। देखें-च० वि० अ० 5। तथा 'स खलु आप्यो रसो यकृत्- प्लीहानौ प्राप्य रागमपुपैति' । देखें-सु० सू० अ० 14। क्लोम-परिचय (रक्तानिलात्समुत्पन्नं कालीयकमिति स्मृतम् ।। 83 ।।) जलवाहिसिरामूलं तृष्णाच्छादनकं तिलम् ।
पञ्चमोऽध्यायः] कलादिकाख्यानम् 47 तिल या क्लोम गर्भोत्पत्ति के समय रक्त तथा वायु से उत्पन्न होता है। उसका एक नाम 'कालीयक' भी है। वह जलवाही सिराओं का मूल है, इसलिये तृष्णा या पिपासा को आच्छादित करता है, अर्थात् उसको व्यवस्थित रखता है। वक्तव्य-'उदकवहानां स्रोतसां तालुमूलं क्लोम च'। देखें-च० वि० अ० 5। वृक्क-परिचय ( उत्पद्येते प्रसादाच्च मेदसः शोणितस्य च ।। 84 ।। ) वृक्कौ पुष्टिकरो प्रोक्तौ जठरस्थस्य मेदसः । मेदस् तथा रक्त के प्रसाद या सार से वृक्क उत्पन्न होते हैं और वे उदर की मेदस् को पुष्ट करते हैं। वक्तव्य-वृक्क दो होते हैं। 'मूत्रवहे द्वे' (सु० शा० अ० 9) तथा 'मूत्रवहानां स्रोतसी वस्तिमूलं वङ्कणौ च' (च० वि० अ० 5) और इन वाक्यों से यह भी ज्ञात होता है कि वृक्क मूत्र का भी वहन करते हैं। मूत्र के साथ पित्त के निकलते रहने से रक्त शुद्ध होता रहता है और लवण के निकलते रहने से मेदस् की पुष्टि होती रहती है। मूत्र मल है, अतः जो जल पिया जाता है, वह शरीर के उन पदार्थों को, जो शरीर को मलिन करते हैं या कर सकते हैं, लेकर मूत्र रूप से बाहर निकल जाता है। वृषण-परिचय ( उत्पद्येते प्रसादाच्च मांसासृक् कफमेदसाम् ।। 85 ।। ) वीर्यवाहिसिराधारौ वृषणौ पौरुषावहौ । 'वृषण' मांस, रक्त, कफ तथा मेदस् के प्रसाद या सारभाग से उत्पन्न होते हैं। वे वीर्यवाहिनी सिराओं के मूल हैं तथा पौरुष या पुरुषत्व या मैथुन-सामर्थ्य का वहन करते हैं। लिंग-परिचय ( ग्रीवाहृदयबद्धाभ्यः कण्डराभ्यः प्रजायते ।। 86 ।। ) गर्भाधानकरं लिङ्गमयनं वीर्यमूत्रयोः । ग्रीवा तथा हृदय से सम्बन्ध रखने वाली कण्डराओं से 'लिंग' का उत्पत्ति होती है। उसी से गर्भाधान होता है और वह वीर्य या शुक्र तथा मूत्र के निकलने का मार्ग है। गर्भाशय-परिचय ( शङ्खनाभ्याकृतिर्योनिस्त्र्यावर्त्ता सा च कीर्तिता ।। 87 ।। तस्यास्तृतीये त्वावर्त्ते गर्भशय्या प्रतिष्ठिता । ) योनि या भग की आकृति शंख की नाभि के समान होती है। उसमें तीन आवर्त्त होते हैं। उसके तीसरे आवर्त्त में 'गर्भशय्या' या गर्भाशय प्रतिष्ठित रहता है। वक्तव्य-लिंग एवं वृषण पुमान् या नर में व्यक्त और स्त्री या नारी में अव्यक्त होते हैं और योनि (भग) तथा गर्भाशय स्त्री में व्यक्त और पुरुष में अव्यक्त होते हैं और नपुंसक में ये चारों अंग अव्यक्त होते हैं। यह सिद्ध है कि यह चारों अंग नर, नारी एवं नपुंसक तीनों में है। अतएव सुश्रुत ने कहा है-'पुंसां पेश्यः पुरस्ताद् याः प्रोक्ता लक्षणमुष्कराः। स्त्रीणामवृत्य तिष्ठन्ति फलमन्तर्गतं हि ताः' ।। (सु० शा० अ० 5)। अर्थात् जो मांसपेशियां नर के लक्षण अर्थात् लिंग तथा मुष्क (वृषण) को बनाती हैं, वे ही नारी के फल अर्थात् गर्भाशय का निर्माण करती हैं। यही कारण है कि नर से नारी और नारी से नर तथा नर से नपुंसक बन जाते हैं। इन अंगों में विशेष प्रकार की उत्तेजना होने पर नर, नारी एवं नपुंसक में एक ही प्रकार की वासना उत्पन्न होती है; एक-सी ही रति तथा एक-सी ही तृप्ति होती है। शरीर-पोषण के प्रकार शिरा धमन्यो नाभिस्थाः सर्वा व्याप्य स्थितास्तनुम् ।। 88 ।। पुष्णन्ति चानिशं वायोः संयोगात् सर्वधातुभिः । शिरा तथा धमनियां नाभि (अर्थात् आमाशय एवं पक्वाशय का मध्य (अन्त्र नामक) स्थान से प्रारम्भ होकर सम्पूर्ण शरीर में फैली हुई रहती हैं और वे वायु के संयोग से सभी धातुओं द्वारा सम्पूर्ण शरीर का निरन्तर पोषण करती रहती हैं। वक्तव्य-प्राणी जो आहार ग्रहण करता है, उसका पाक अन्त्र में होता है। पाक होने पर जो रस बनता है, उसमें सब धातुओं के पोषक पदार्थ विद्यमान रहते हैं और उस रस को सिराएँ सम्पूर्ण शरीर में पहुँचाती रहती हैं, जिससे प्राणी का पोषण होता रहता है। यह क्रिया निरन्तर होती रहती है। स्मरण रहे कि नाभिस्थ प्राणवायु धमनियों के ध्मान से धकेला हुआ रससिराओं द्वारा सम्पूर्ण शरीर में घूमता है और उसे पुष्ट करता रहता है। 'अन्नं वै प्राणाः' (उपनिषद्) तथा 'पुष्यन्ति हि आहाररसात् रसरुधिरमांसमेदोऽस्थिमज्जशुक्रौजंसि' इति। देखें-च० सू० अ० 28। 3 तथा सु० सू० अ० 14। प्राणवायु द्वारा शरीर-पोषण नाभिस्थः प्राणपवनः स्पृष्ट्वा हृत् कमलान्तरम् ।। 89 ।। कण्ठाद् बहिर्निर्याति पातुं विष्णुपदामृतम् ।
48 शार्ङ्गधरसंहिता [ पूर्वखण्डे
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पीत्वा चाम्बरपीयूषं पुनरायाति वेगतः ।। 90 ।। प्रीणयन् देहमखिलं जीवयञ्जठरानलम् । नाभि (पक्वाशय तथा आमाशय के बीच) में रहने वाली प्राणवायु हृदय के भीतरी भाग को स्पर्श करती हुई कण्ठ या श्वास मार्ग से बाहर विष्णुपद (आकाश) के अमृत का पान करने के लिए निकलती है और आकाश के अमृत (प्राणवायु) को पीकर शीघ्र ही फिर शरीर में प्रविष्ट हो जाती है। इस प्रकार जीवन भर सम्पूर्ण शरीर को तृप्त तथा प्रसन्न कर जठराग्नि को प्रदीप्त करती रहती है। वक्तव्य—प्राणवायु नाभि से चलकर हृदय, फुप्फुस और कण्ठ से होता हुआ श्वास के रूप में बाहर निकलता है और आकाश में सदैव व्याप्त रहने वाले अमृत को पीकर फिर प्रश्वास के रूप में शरीर में चला जाता है। यह क्रिया जीवनभर निरन्तर होती रहती है। इस श्वास-प्रश्वास क्रिया से प्राणी प्रसन्न रहता है और अग्नि दीप्त होती है, क्योंकि 'एषः ह वा अग्नेर्योनिः यः प्राणः' (जाबालोपनिषद्) अर्थात् यह प्राण ही अग्नि या जठराग्नि की योनि (कारण) है।
जीवन-मरण परिभाषा शरीरप्राणयोरेवं संयोगादायुरुच्यते ।। 91 ।। कालेन तद्वियोगाच्च पञ्चत्वं कथ्यते बुधैः । उपर्युक्त प्रकार से शरीर तथा प्राणवायु के संयोग को आयुः या जीवन कहा जाता है। काल या समय से उन (शरीर और प्राण) का वियोग होने से विद्वान् लोग उसे 'पञ्चत्व' ('मृत्यु') कहते हैं। वक्तव्य—तात्पर्य यह है कि जितने समय तक शरीर और प्राण का संयोग या मेल रहता है, उतने समय का नाम 'आयु' है। जब शरीर से सदा के लिए प्राणवायु निकल जाता है, तो 'मृत्यु' हो जाती है।
रोग-निवृत्ति का महत्त्व न जन्तुः कश्चिदमरः पृथिव्यां जायते क्वचित् ।। 92 ।। अतो मृत्युरवार्यः स्यात् किन्तु रोगान्निवारयेत् । इस संसार में कहीं भी कोई प्राणी अमर (न मरने वाला) नहीं उत्पन्न होता। मृत्यु तो अवश्यंभावी है। इसलिये रोगों का निवारण अवश्य करना चाहिये। वक्तव्य—'जातस्य हि ध्रुवो मृत्युः' (गीता)। रोगों की चिकित्सा करके अकाल मृत्यु रोकी जाती है, क्योंकि रोगों के कारण प्राणी अकाल में ही मर जाते हैं (सं० वि० अ० 3 तथा
[दायाँ स्तम्भ / Right Column]
च० शा० अ० 6)। तात्पर्य यह है कि सौ वर्ष के भीतर यदि कोई मरता है, तो अकाल में मरता है, क्योंकि 'शतायुर्वे पुरुषः, इति श्रुतिः'।
चिकित्सा का महत्त्व याप्यत्वं याति साध्यस्तु याप्यो गच्छत्यसाध्यताम् ।। 93 ।। जीवितं हन्त्यसाध्यस्तु नरस्याऽप्रतिकारिणः । जो मनुष्य उचित समय पर अपने रोग की चिकित्सा नहीं करवाता है, उसका साध्य (चिकित्सा से दूर हो जाने योग्य) रोग याप्य (जो रोग चिकित्सा करते समय दवा रहता है) हो जाता है और याप्य रोग असाध्य हो जाता है तथा असाध्य रोग जीवन को नष्ट कर देता है। वक्तव्य—जहाँ तक हो सके शीघ्र ही रोग की चिकित्सा करा लेनी चाहिये।
रोगनिवारण-निर्देश धर्मार्थकाममोक्षाणां शरीरं साधनं यतः ।। 94 ।। अतो रुग्ण्यस्तनुं रक्षेन्नरः कर्मविपाकवित् । क्योंकि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का साधन (प्राप्ति का उपाय) शरीर ही है। इसलिये कर्म के परिणाम को जानने वाला मनुष्य रोगों से अपने शरीर की रक्षा करे। वक्तव्य—जब तक मनुष्य स्वस्थ या नीरोग है, तभी तक वह उक्त चारों पदार्थों की प्राप्ति कर सकता है। अन्यथा कर्मण्य भी अकर्मण्य होकर पड़ा रहता है और कष्ट भोगता रहता है। इसलिये प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह सर्वतोभावेन शरीर को स्वस्थ एवं नीरोग बनाये रखें।
समदोष का महत्त्व धातवस्तन्मला दोषा नाशयन्त्यसमास्तनुम् ।। 95 ।। समाः सुखाय विज्ञेया बलायोपचयाय च । रस, रक्त आदि धातुओं उनके मल और वात आदि दोष जब विषम (विकृत) हो जाते हैं, तो शरीर को रुग्ण या नष्ट कर देते हैं। जब वे सम (प्रकृतिस्थ या अविकृत) रहते हैं, तो सुख, बल और पुष्टि के कारण होते हैं। वक्तव्य—'दोषधातुमलमूलं हि शरीरम्'। (सु० सू० अ० 15) अर्थात् दोष (वातादि), धातु (रसादि), एवं मल ये शरीर के कारण हैं। जब ये सभी प्रकृतिस्थ रहते हैं, तो शरीर सुखी रहता है, अन्यथा रोगी हो जाता है अथवा मृत्यु हो जाती है।