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शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

२१० * संक्षिप्त शिवपुराण *

तुरंत उनके पास गयी और उसने यथोचित शिष्टाचारके साथ पूछा—'चन्द्रदेव ! आप कहाँ जा रहे हैं? विजयाका यह प्रश्न सुनकर चन्द्रदेवने अपनी यात्राका उद्देश्य आदरपूर्वक बताया। दक्षके यहाँ होनेवाले यज्ञोत्सव आदिका सारा वृत्तान्त कहा। वह सब सुनकर विजया बड़ी उतावलीके साथ देवीके पास आयी और चन्द्रमाने जो कुछ कहा था, वह सब उसने कह सुनाया। उसे सुनकर कालिका सती देवीको बड़ा विस्मय हुआ। अपने यहाँ सूचना न मिलनेका क्या कारण है, यह बहुत सोचने-विचारनेपर भी उनकी समझमें नहीं आया। तब उन्होंने पार्षदोंसे घिरे अपने स्वामी भगवान् शिवके पास आकर भगवान् शंकरसे पूछा।

सती बोलीं—प्रभो! मैंने सुना है कि मेरे पिताजीके यहाँ कोई बहुत बड़ा यज्ञ हो रहा है। उसमें बहुत बड़ा उत्सव होगा। उसमें सब देवर्षि एकत्र हो रहे हैं। देवदेवेश्वर! पिताजीके उस महान् यज्ञमें चलनेकी रुचि आपको क्यों नहीं हो रही है? इस विषयमें जो बात हो, वह सब बताइये। महादेव! सुहृदोंका यह धर्म है कि वे सुहृदोंके साथ मिलें-जुलें। यह मिलन उनके महान् प्रेमको बढ़ानेवाला होता है। अतः प्रभो! मेरे स्वामी! आप मेरी प्रार्थना मानकर सर्वथा प्रयत्न करके मेरे साथ पिताजीकी यज्ञशालामें आज ही चलिये।

सतीकी यह बात सुनकर भगवान् महेश्वरदेव, जिनका हृदय दक्षके वाग्बाणोंसे घायल हो चुका था, मधुर वाणीमें बोले—'देवि! तुम्हारे पिता दक्ष मेरे विशेष द्रोही हो गये हैं। जो प्रमुख देवता और ऋषि अभिमानी, मूढ़ और ज्ञानशून्य हैं, वे ही सब तुम्हारे पिताके यज्ञमें गये हैं। जो लोग बिना बुलाये दूसरेके घर जाते हैं, वे वहाँ अनादर पाते हैं, जो मृत्युसे भी बढ़कर कष्टदायक है। अतः प्रिये! तुमको और मुझको तो विशेषरूपसे दक्षके यज्ञमें नहीं जाना चाहिये (क्योंकि वहाँ हमें बुलाया नहीं गया है)। यह मैंने सच्ची बात कही है।'

महात्मा महेश्वरके ऐसा कहनेपर सती रोषपूर्वक बोलीं—शम्भो! आप सबके ईश्वर हैं। जिनके जानेसे यज्ञ सफल होता है, उन्हीं आपको मेरे दुष्ट पिताने इस समय आमन्त्रित नहीं किया है। प्रभो! उस दुरात्माका अभिप्राय क्या है, वह सब मैं जानना चाहती हूँ। साथ ही वहाँ आये हुए सम्पूर्ण दुरात्मा देवर्षियोंके मनोभावका भी मैं पता लगाना चाहती हूँ। अतः प्रभो! मैं आज ही पिताके यज्ञमें जाती हूँ। नाथ! महेश्वर! आप मुझे वहाँ जानेकी आज्ञा दे दें।

देवी सतीके ऐसा कहनेपर सर्वज्ञ, सर्वद्रष्टा, सृष्टिकर्ता एवं कल्याणस्वरूप साक्षात् भगवान् रुद्र उनसे इस प्रकार बोले।

शिवने कहा—उत्तम व्रतका पालन करनेवाली देवि! यदि इस प्रकार तुम्हारी रुचि वहाँ अवश्य जानेके लिये हो गयी है तो मेरी आज्ञासे तुम शीघ्र अपने पिताके यज्ञमें जाओ। यह नन्दी वृषभ सुसज्जित है, तुम एक महारानीके अनुरूप राजोपचार साथ ले सादर इसपर सवार हो बहुसंख्यक

* रुद्रसंहिता * २११


प्रमथगणोंके साथ यात्रा करो। प्रिये! इस विभूषित वृषभपर आरूढ होओ।

रुद्रके इस प्रकार आदेश देनेपर सुन्दर आभूषणोंसे अलंकृत सती देवी सब साधनोंसे युक्त हो पिताके घरकी ओर चलीं। परमात्मा शिवने उन्हें सुन्दर वस्त्र, आभूषण तथा परम उज्ज्वल छत्र, चामर आदि महाराजोचित उपचार दिये। भगवान् शिवकी आज्ञासे साठ हजार रुद्रगण बड़ी प्रसन्नता और महान् उत्साहके साथ कौतूहलपूर्वक सतीके साथ गये। उस समय वहाँ यज्ञके लिये यात्रा करते समय सब ओर महान् उत्सव होने लगा। महादेवजीके गणोंने शिवप्रिया सतीके लिये बड़ा भारी उत्सव रचाया। वे सभी गण कौतूहलपूर्ण कार्य करने तथा सती और शिवके यशको गाने लगे। शिवके प्रिय और महान् वीर प्रमथगण प्रसन्नतापूर्वक उछलते-कूदते चल रहे थे। जगदम्बाके यात्राकालमें सब प्रकारसे बड़ी भारी शोभा हो रही थी। उस समय जो सुखद जय-जयकार आदिका शब्द प्रकट हुआ, उससे तीनों लोक गूँज उठे।

(अध्याय २८)


यज्ञशालामें शिवका भाग न देखकर सतीके रोषपूर्ण वचन, दक्षद्वारा शिवकी निन्दा सुन दक्ष तथा देवताओंको धिक्कार-फटकारकर सतीद्वारा अपने प्राण-त्यागका निश्चय

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! दक्षकन्या सती उस स्थानपर गयीं, जहाँ वह महान् प्रकाशसे युक्त यज्ञ हो रहा था। वहाँ देवता, असुर और मुनीन्द्र आदिके द्वारा कौतूहलपूर्ण कार्य हो रहे थे। सतीने वहाँ अपने पिताके भवनको नाना प्रकारकी आश्चर्यजनक वस्तुओंसे सम्पन्न, उत्तम प्रभासे परिपूर्ण, मनोहर तथा देवताओं और ऋषियोंके समुदायसे भरा हुआ देखा। देवी सती भवनके द्वारपर जाकर खड़ी हुईं और अपने वाहन नन्दीसे उतरकर अकेली ही शीघ्रतापूर्वक यज्ञशालाके भीतर चली गयीं। सतीको आयी देख उनकी यशस्विनी माता असिक्नी (वीरिणी)-ने और बहिनोंने उनका यथोचित आदर-सत्कार किया। परंतु दक्षने उन्हें देखकर भी कुछ आदर नहीं किया तथा उन्हींके भयसे शिवकी मायासे मोहित हुए दूसरे लोग भी उनके प्रति आदरका भाव

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न दिखा सके। मुने! सब लोगोंके द्वारा तिरस्कार प्राप्त होनेसे सती देवीको बड़ा विस्मय हुआ तो भी उन्होंने अपने माता-पिताके चरणोंमें मस्तक झुकाया। उस यज्ञमें सतीने विष्णु आदि देवताओंके भाग देखे, परंतु शम्भुका भाग उन्हें कहीं नहीं दिखायी दिया। तब सतीने दुस्सह क्रोध प्रकट किया। वे अपमानित होनेपर भी रोषसे भरकर सब लोगोंकी ओर क्रूर दृष्टिसे देखती और दक्षको जलाती हुई-सी बोलीं।

सतीने कहा—प्रजापते! आपने परम मंगलकारी भगवान् शिवको इस यज्ञमें क्यों नहीं बुलाया? जिनके द्वारा यह सम्पूर्ण चराचर जगत् पवित्र होता है, जो स्वयं ही यज्ञ, यज्ञवेत्ताओंमें श्रेष्ठ, यज्ञके अंग, यज्ञकी दक्षिणा और यज्ञकर्ता यजमान हैं, उन भगवान् शिवके बिना यज्ञकी सिद्धि कैसे हो सकती है? अहो! जिनके स्मरण करनेमात्रसे सब कुछ पवित्र हो जाता है, उन्हींके बिना किया हुआ यह सारा यज्ञ अपवित्र हो जायगा। द्रव्य, मन्त्र आदि, हव्य और कव्य—ये सब जिनके स्वरूप हैं, उन्हीं भगवान् शिवके बिना इस यज्ञका आरम्भ कैसे किया गया? क्या आपने भगवान् शिवको सामान्य देवता समझकर उनका अनादर किया है? आज आपकी बुद्धि भ्रष्ट हो गयी है। इसलिये आप पिता होकर भी मुझे अधम जँच रहे हैं। अरे! ये विष्णु और ब्रह्मा आदि देवता तथा मुनि अपने प्रभु भगवान् शिवके आये बिना इस यज्ञमें कैसे चले आये?

ऐसा कहनेके बाद शिवस्वरूपा परमेश्वरी सतीने भगवान् विष्णु, ब्रह्मा, इन्द्र आदि सब देवताओंको तथा समस्त ऋषियोंको बड़े कड़े शब्दोंमें फटकारा।

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! इस प्रकार क्रोधसे भरी हुई जगदम्बा सतीने वहाँ व्यथित हृदयसे अनेक प्रकारकी बातें कहीं। श्रीविष्णु आदि समस्त देवता और मुनि जो वहाँ उपस्थित थे, सतीकी बात सुनकर चुप रह गये। अपनी पुत्रीके वैसे वचन सुनकर कुपित हुए दक्षने सतीकी ओर क्रूर दृष्टिसे देखा और इस प्रकार कहा।

दक्ष बोले—भद्रे! तुम्हारे बहुत कहनेसे क्या लाभ। इस समय यहाँ तुम्हारा कोई काम नहीं है। तुम जाओ या ठहरो, यह तुम्हारी इच्छापर निर्भर है। तुम यहाँ आयी ही क्यों? समस्त विद्वान् जानते हैं कि तुम्हारे पति शिव अमंगलरूप हैं। वे कुलीन भी नहीं हैं। वेदसे बहिष्कृत हैं और भूतों, प्रेतों तथा पिशाचोंके स्वामी हैं। वे बहुत ही कुवेष धारण किये रहते हैं। इसीलिये रुद्रको इस यज्ञके लिये नहीं बुलाया गया है। बेटी! मैं रुद्रको अच्छी तरह जानता हूँ। अतः जान-बूझकर ही मैंने देवर्षियोंकी सभामें उनको आमन्त्रित नहीं किया है। रुद्रको शास्त्रके अर्थका ज्ञान नहीं है। वे उद्दण्ड और दुरात्मा हैं। मुझ मूढ़ पापीने ब्रह्माजीके कहनेसे उनके साथ तुम्हारा विवाह कर दिया था। अतः शुचिस्मिते! तुम क्रोध छोड़कर स्वस्थ (शान्त) हो जाओ। इस यज्ञमें तुम आ ही गयी तो स्वयं अपना भाग (या दहेज) ग्रहण करो।

दक्षके ऐसा कहनेपर उनकी त्रिभुवन-पूजिता पुत्री सतीने शिवकी निन्दा करनेवाले अपने पिताकी ओर जब दृष्टिपात किया, तब उनका रोष और भी बढ़ गया। वे मन-ही-मन सोचने लगीं कि 'अब मैं शंकरजीके

* रुद्रसंहिता * २१३

पास कैसे जाऊँगी। यदि शंकरजीके दर्शनकी इच्छासे वहाँ गयी और उन्होंने यहाँका समाचार पूछा तो मैं उन्हें क्या उत्तर दूँगी ?' तदनन्तर तीनों लोकोंकी जननी सती रोषावेशसे युक्त हो लंबी साँस खींचती हुई अपने दुष्टहृदय पिता दक्षसे बोलीं।

सतीने कहा—जो महादेवजीकी निन्दा करता है अथवा जो उनकी होती हुई निन्दाको सुनता है, वे दोनों तबतक नरकमें पड़े रहते हैं, जबतक चन्द्रमा और सूर्य विद्यमान हैं।* अतः तात ! मैं अपने इस शरीरको त्याग दूँगी, जलती आगमें प्रवेश कर जाऊँगी। अपने स्वामीका अनादर सुनकर अब मुझे अपने इस जीवनकी रक्षासे क्या प्रयोजन। यदि कोई समर्थ हो तो वह स्वयं विशेष यत्न करके शम्भुकी निन्दा करनेवाले पुरुषकी जीभको बलपूर्वक काट डाले। तभी वह शिव-निन्दा-श्रवणके पापसे शुद्ध हो सकता है, इसमें संशय नहीं है। यदि कुछ कर सकनेमें असमर्थ हो तो बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह दोनों कान बंद करके वहाँसे निकल जाय। इससे वह शुद्ध रहता है—दोषका भागी नहीं होता। ऐसा श्रेष्ठ विद्वान् कहते हैं।

इस प्रकार धर्मनीति बतानेपर सतीको अपने आनेके कारण बड़ा पश्चात्ताप हुआ। उन्होंने व्यथित चित्तसे भगवान् शंकरके वचनका स्मरण किया। फिर सती अत्यन्त कुपित हो दक्षसे, उन विष्णु आदि समस्त देवताओंसे तथा मुनियोंसे भी निडर होकर बोलीं।

सतीने कहा—तात ! तुम भगवान् शंकरके निन्दक हो। इसके लिये तुम्हें पश्चात्ताप होगा। यहाँ महान् दुःख भोगकर अन्तमें तुम्हें यातना भोगनी पड़ेगी। इस लोकमें जिनके लिये न कोई प्रिय है न अप्रिय, उन निर्वैर परमात्मा शिवके प्रतिकूल तुम्हारे सिवा दूसरा कौन चल सकता है। जो दुष्ट लोग हैं, वे सदा ईर्ष्यापूर्वक यदि महापुरुषोंकी निन्दा करें तो उनके लिये यह कोई आश्चर्यकी बात नहीं है। परंतु जो महात्माओंके चरणोंकी रजसे अपने अज्ञानान्धकारको दूर कर चुके हैं, उन्हें महापुरुषोंकी निन्दा शोभा नहीं देती। जिनका 'शिव' यह दो अक्षरोंका नाम कभी बातचीतके प्रसंगसे मनुष्योंकी वाणीद्वारा एक बार भी उच्चारित हो जाय तो वह सम्पूर्ण पापराशिको शीघ्र ही नष्ट कर देता है, उन्हीं पवित्र कीर्तिवाले निर्मल शिवसे तुम द्वेष करते हो ? आश्चर्य है। वास्तवमें तुम अशिव (अमंगल)-रूप हो। महापुरुषोंके मनरूपी मधुकर ब्रह्मानन्दमय रसका पान करनेकी इच्छासे जिनके सर्वार्थदायक चरणकमलोंका निरन्तर सेवन किया करते हैं, उन्हींसे तुम मूर्खतावश द्रोह करते हो ? जिन्हें तुम नामसे शिव और कामसे अशिव बताते हो, उन्हें क्या तुम्हारे सिवा दूसरे विद्वान् नहीं जानते। ब्रह्मा आदि देवता, सनक आदि मुनि तथा अन्य ज्ञानी क्या उनके स्वरूपको नहीं समझते। उदारबुद्धि भगवान् शिव जटा फैलाये, कपाल धारण किये श्मशानमें भूतोंके साथ प्रसन्नतापूर्वक रहते तथा भस्म


* यो निन्दति महादेवं निन्द्यमानं शृणोति वा। तावुभौ नरकं यातो यावच्चन्द्रदिवाकरौ ॥
(शि० पु० रु० सं० स० खं० २९।३८)

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एवं नरमुण्डोंकी माला धारण करते हैं— इस बातको जानकर भी जो मुनि और देवता उनके चरणोंसे गिरे हुए निर्माल्यको बड़े आदरके साथ अपने मस्तकपर चढ़ाते हैं, इसका क्या कारण है? यही कि वे भगवान् शिव ही साक्षात् परमेश्वर हैं। प्रवृत्ति (यज्ञ-यागादि) और निवृत्ति—(शम-दम आदि)—दो प्रकारके कर्म बताये गये हैं। मनीषी पुरुषोंको उनका विचार करना चाहिये। वेदमें विवेचनपूर्वक उनके रागी और विरागी—दो प्रकारके अलग-अलग अधिकारी बताये गये हैं। परस्परविरोधी होनेके कारण उक्त दोनों प्रकारके कर्मोंका एक साथ एक ही कर्ताके द्वारा आचरण नहीं किया जा सकता। भगवान् शंकर तो परब्रह्म परमात्मा हैं, उनमें इन दोनों ही प्रकारके कर्मोंका प्रवेश नहीं है। उन्हें कोई कर्म प्राप्त नहीं होता, उन्हें किसी भी प्रकारके कर्म करनेकी आवश्यकता नहीं है। पिताजी! हमारा ऐश्वर्य अव्यक्त है। उसका कोई लक्षण व्यक्त नहीं है, सदा आत्मज्ञानी महापुरुष ही उसका सेवन करते हैं। तुम्हारे पास वह ऐश्वर्य नहीं है। यज्ञशालाओंमें रहकर वहाँके अन्नसे तृप्त होनेवाले कर्मठ लोगोंको जो भोग प्राप्त होता है, उससे वह ऐश्वर्य बहुत दूर है। जो महापुरुषोंकी निन्दा करनेवाला और दुष्ट है, उसके जन्मको धिक्कार है। विद्वान् पुरुषको चाहिये कि उसके सम्बन्धको विशेषरूपसे प्रयत्न करके त्याग दे! जिस समय भगवान् शिव तुम्हारे साथ मेरा सम्बन्ध दिखलाते हुए मुझे दाक्षायणी कहकर पुकारेंगे, उस समय मेरा मन सहसा अत्यन्त दुःखी हो जायगा। इसलिये तुम्हारे अंगसे उत्पन्न हुए सदा शवके तुल्य घृणित इस शरीरको इस समय मैं निश्चय ही त्याग दूँगी और ऐसा करके सुखी हो जाऊँगी। हे देवताओ और मुनियो! तुम सब लोग मेरी बात सुनो। तुम्हारे हृदयमें दुष्टता आ गयी है। तुमलोगोंका यह कर्म सर्वथा अनुचित है। तुम सब लोग मूढ़ हो; क्योंकि शिवकी निन्दा और कलह तुम्हें प्रिय है। अतः भगवान् हरसे तुम्हें इस कुकर्मका निश्चय ही पूरा-पूरा दण्ड मिलेगा।

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! उस यज्ञमें दक्ष तथा देवताओंसे ऐसा कहकर सतीदेवी चुप हो गयीं और मन-ही-मन अपने प्राणवल्लभ शम्भुका स्मरण करने लगीं।

(अध्याय २९)


सतीका योगाग्निसे अपने शरीरको भस्म कर देना, दर्शकोंका हाहाकार, शिवपार्षदोंका प्राणत्याग तथा दक्षपर आक्रमण, ऋभुओंद्वारा उनका भगाया जाना तथा देवताओंकी चिन्ता

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! मौन हुई सतीदेवी अपने पतिका सादर स्मरण करके शान्तचित्त हो सहसा उत्तरदिशामें भूमिपर बैठ गयीं। उन्होंने विधिपूर्वक जलका आचमन करके वस्त्र ओढ़ लिया और पवित्रभावसे आँखें मूँदकर पतिका चिन्तन करती हुईं वे योगमार्गमें स्थित हो गयीं। उन्होंने आसनको स्थिरकर प्राणायामद्वारा प्राण और अपानको एकरूप करके नाभि-चक्रमें स्थित किया। फिर उदान वायुको

* रुद्रसंहिता * २१५

बलपूर्वक नाभिचक्रसे ऊपर उठाकर बुद्धिके साथ हृदयमें स्थापित किया। तत्पश्चात् शंकरकी प्राणवल्लभा अनिन्दिता सती उस हृदयस्थित वायुको कण्ठमार्गसे भृकुटियोंके बीचमें ले गयीं। इस प्रकार दक्षपर कुपित हो सहसा अपने शरीरको त्यागनेकी इच्छासे सतीने अपने सम्पूर्ण अंगोंमें योगमार्गके अनुसार वायु और अग्निकी धारणा की। तदनन्तर अपने पतिके चरणारविन्दोंका चिन्तन करती हुई सतीने अन्य सब वस्तुओंका ध्यान भुला दिया। उनका चित्त योगमार्गमें स्थित हो गया था। इसलिये वहाँ उन्हें पतिके चरणोंके अतिरिक्त और कुछ नहीं दिखायी दिया। मुनिश्रेष्ठ! सतीका निष्पाप शरीर तत्काल गिरा और उनकी इच्छाके अनुसार योगाग्निसे जलकर उसी क्षण भस्म हो गया। उस समय वहाँ आये हुए देवता आदिने जब यह घटना देखी, तब वे बड़े जोरसे हाहाकार करने लगे। उनका वह महान्, अद्भुत, विचित्र एवं भयंकर हाहाकार आकाशमें और पृथ्वीतलपर सब ओर फैल गया। लोग कह रहे थे—‘हाय! महान् देवता भगवान् शंकरकी परम प्रेयसी सतीदेवीने किस दुष्टके दुर्व्यवहारसे कुपित हो अपने प्राण त्याग दिये। अहो! ब्रह्माजीके पुत्र इस दक्षकी बड़ी भारी दुष्टता तो देखो। सारा चराचर जगत् जिसकी संतान है, उसीकी पुत्री मनस्विनी सतीदेवी, जो सदा ही मान पानेके योग्य थीं, उसके द्वारा ऐसी निरादृत हुईं कि प्राणोंसे ही हाथ धो बैठीं। भगवान् वृषभध्वजकी प्रिया सती सदा सभी सत्पुरुषोंके द्वारा निरन्तर सम्मान पानेकी अधिकारिणी थीं। वास्तवमें उसका हृदय बड़ा ही असहिष्णु है। वह प्रजापति दक्ष ब्राह्मणद्रोही है। इसलिये सारे संसारमें उसे महान् अपयश प्राप्त होगा। उसकी अपनी ही पुत्री उसीके अपराधसे जब प्राणत्याग करनेको उद्यत हो गयी, तब भी उस महानरकभोगी शंकरद्रोहीने उसे रोकातक नहीं!’

जिस समय सब लोग ऐसा कह रहे थे, उसी समय शिवजीके पार्षद सतीका यह अद्भुत प्राणत्याग देख तुरंत ही क्रोधपूर्वक अस्त्र-शस्त्र ले दक्षको मारनेके लिये उठ खड़े हुए। यज्ञमण्डपके द्वारपर खड़े हुए वे भगवान् शंकरके समस्त साठ हजार पार्षद, जो बड़े भारी बलवान् थे, अत्यन्त रोषसे भर गये और ‘हमें धिक्कार है, धिक्कार है’, ऐसा कहते हुए भगवान् शंकरके गणोंके वे सभी वीर यूथपति बारंबार उच्चस्वरसे हाहाकार करने लगे। देवर्षे! कितने ही पार्षद तो वहाँ शोकसे ऐसे व्याकुल हो गये कि वे अत्यन्त तीखे प्राणनाशक शस्त्रोंद्वारा अपने ही मस्तक और मुख आदि अंगोंपर आघात करने लगे। इस प्रकार बीस हजार पार्षद उस

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समय दक्षकन्या सतीके साथ ही नष्ट हो गये। वह एक अद्भुत-सी बात हुई। नष्ट होनेसे बचे हुए महात्मा शंकरके वे प्रमथगण क्रोधयुक्त दक्षको मारनेके लिये हथियार लिये उठ खड़े हुए। मुने! उन आक्रमणकारी पार्षदोंका वेग देखकर भगवान् भृगुने यज्ञमें विघ्न डालनेवालोंका नाश करनेके लिये नियत 'अपहता असुराः रक्षांसि वेदिषदः' इस यजुर्मन्त्रसे दक्षिणाग्निमें आहुति दी। भृगुके आहुति देते ही यज्ञकुण्डसे ऋभु नामक सहस्रों महान् देवता, जो बड़े प्रबल वीर थे, वहाँ प्रकट हो गये। मुनीश्वर! उन सबके हाथमें जलती हुई लकड़ियाँ थीं। उनके साथ प्रमथगणोंका अत्यन्त विकट युद्ध हुआ, जो सुननेवालोंके भी रोंगटे खड़े कर देनेवाला था। उन ब्रह्मतेजसे सम्पन्न महावीर ऋभुओंकी सब ओरसे ऐसी मार पड़ी, जिससे प्रमथगण बिना अधिक प्रयासके ही भाग खड़े हुए। इस प्रकार उन देवताओंने उन शिवगणोंको तुरंत मार भगाया। यह अद्भुत-सी घटना भगवान् शिवकी महाशक्तिमती इच्छासे ही हुई। वह सब देखकर ऋषि, इन्द्रादि देवता, मरुद्गण, विश्वेदेव, अश्विनीकुमार और लोकपाल चुप ही रहे। कोई सब ओरसे आ-आकर वहाँ भगवान् विष्णुसे प्रार्थना करते थे कि किसी तरह विघ्न टल जाय। वे उद्विग्न हो बारंबार विघ्न-निवारणके लिये आपसमें सलाह करने लगे। प्रमथगणोंके नाश होने और भगाये जानेसे जो भावी परिणाम होनेवाला था, उसका भलीभाँत विचार करके उत्तम बुद्धिवाले श्रीविष्णु आदि देवता अत्यन्त उद्विग्न हो उठे थे। मुने! इस प्रकार दुरात्मा शंकर-द्रोही ब्रह्मबन्धु दक्षके यज्ञमें उस समय बड़ा भारी विघ्न उपस्थित हो गया। (अध्याय ३०)

आकाशवाणीद्वारा दक्षकी भर्त्सना, उनके विनाशकी सूचना तथा समस्त देवताओंको यज्ञमण्डपसे निकल जानेकी प्रेरणा

ब्रह्माजी कहते हैं—मुनीश्वर! इसी बीचमें वहाँ दक्ष तथा देवता आदिके सुनते हुए आकाशवाणीने यह यथार्थ बात कही— "रे-रे दुराचारी दक्ष! ओ दम्भाचारपरायण महामूढ़! यह तूने कैसा अनर्थकारी कर्म कर डाला? ओ मूर्ख! शिवभक्तराज दधीचिके कथनको भी तूने प्रामाणिक नहीं माना, जो तेरे लिये सब प्रकारसे आनन्ददायक और मंगलकारी था। वे ब्राह्मण देवता तुझे दुस्सह शाप देकर तेरी यज्ञशालासे निकल गये तो भी तुझ मूढ़ने अपने मनमें कुछ भी नहीं समझा। उसके बाद तेरे घरमें मंगलमयी सतीदेवी स्वतः पधारीं, जो तेरी अपनी ही पुत्री थीं; किंतु तूने उनका भी परम आदर नहीं किया! ऐसा क्यों हुआ? ज्ञानदुर्बल दक्ष! तूने सती और महादेवजीकी पूजा नहीं की, यह क्या किया? 'मैं ब्रह्माजीका बेटा हूँ' ऐसा समझकर तू व्यर्थ ही घमंडमें भरा रहता है और इसीलिये तुझपर मोह छा गया है। वे सतीदेवी ही सत्पुरुषोंकी आराध्या देवी हैं अथवा सदा आराधना करनेके योग्य हैं, वे समस्त पुण्योंका फल देनेवाली, तीनों लोकोंकी माता, कल्याणस्वरूपा और

* रुद्रसंहिता *
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भगवान् शंकरके आधे अंगमें निवास करनेवाली हैं। वे सती देवी ही पूजित होनेपर सदा सम्पूर्ण सौभाग्य प्रदान करनेवाली हैं। वे ही महेश्वरकी शक्ति हैं और अपने भक्तोंको सब प्रकारके मंगल देती हैं। वे सतीदेवी ही पूजित होनेपर सदा संसारका भय दूर करती हैं, मनोवांछित फल देती हैं तथा वे ही समस्त उपद्रवोंको नष्ट करनेवाली देवी हैं। वे सती ही सदा पूजित होनेपर कीर्ति और सम्पत्ति प्रदान करती हैं। वे ही पराशक्ति तथा भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाली परमेश्वरी हैं। वे सती ही जगत्को जन्म देनेवाली माता, जगत्की रक्षा करनेवाली अनादि शक्ति और प्रलयकालमें जगत्का संहार करनेवाली हैं। वे जगन्माता सती ही भगवान् विष्णुकी मातारूपसे सुशोभित होनेवाली तथा ब्रह्मा, इन्द्र, चन्द्र, अग्नि एवं सूर्यदेव आदिकी जननी मानी गयी हैं। वे सती ही तप, धर्म और दान आदिका फल देनेवाली हैं। वे ही शम्भुशक्ति महादेवी हैं तथा दुष्टोंका हनन करनेवाली परात्पर शक्ति हैं। ऐसी महिमावाली सतीदेवी जिनकी सदा प्रिय धर्मपत्नी हैं, उन भगवान् महादेवको तूने यज्ञमें भाग नहीं दिया ! अरे! तू कैसा मूढ़ और कुविचारी है।

"भगवान् शिव ही सबके स्वामी तथा परात्पर परमेश्वर हैं। वे समस्त देवताओंके सम्यक् सेव्य हैं और सबका कल्याण करनेवाले हैं। इन्हींके दर्शनकी इच्छासे सिद्ध पुरुष तपस्या करते हैं और इन्हींके साक्षात्कारकी अभिलाषा मनमें लेकर योगीलोग योग-साधनामें प्रवृत्त होते हैं। अनन्त धन-धान्य और यज्ञ-याग आदिका सबसे महान् फल यही बताया गया है कि भगवान् शंकरका दर्शन सुलभ हो। शिव ही जगत्का धारण-पोषण करनेवाले हैं। वे ही समस्त विद्याओंके पति एवं सब कुछ करनेमें समर्थ हैं। आदिविद्याके श्रेष्ठ स्वामी और समस्त मंगलोंके भी मंगल वे ही हैं। दुष्ट दक्ष ! तूने उनकी शक्तिका आज सत्कार नहीं किया है। इसीलिये इस यज्ञका विनाश हो जायगा। पूजनीय व्यक्तियोंकी पूजा न करनेसे अमंगल होता ही है। तूने परम पूज्य शिवस्वरूपा सतीका पूजन नहीं किया है। शेषनाग अपने सहस्र मस्तकोंसे प्रतिदिन प्रसन्नतापूर्वक जिनके चरणोंकी रज धारण करते हैं, उन्हीं भगवान् शिवकी शक्ति सतीदेवी थीं। जिनके चरणकमलोंका निरन्तर ध्यान और सादर पूजन करके ब्रह्माजी ब्रह्मत्वको प्राप्त हुए हैं, उन्हीं भगवान् शिवकी प्रिय पत्नी सतीदेवी थीं। जिनके चरणकमलोंका निरन्तर ध्यान और सादर पूजन करके इन्द्र आदि लोकपाल अपने-अपने उत्तम पदको प्राप्त हुए हैं, वे भगवान् शिव सम्पूर्ण जगत्के पिता हैं और शक्तिस्वरूपा सतीदेवी जगत्की माता कही गयी हैं। मूढ़ दक्ष ! तूने उन माता-पिताका सत्कार नहीं किया, फिर तेरा कल्याण कैसे होगा।

"तुझपर दुर्भाग्यका आक्रमण हो गया और विपत्तियाँ टूट पड़ीं; क्योंकि तूने उन भवानी सती और भगवान् शंकरकी भक्ति-भावसे आराधना नहीं की। 'कल्याणकारी शम्भुका पूजन न करके भी मैं कल्याणका भागी हो सकता हूँ' यह तेरा कैसा गर्व है? वह दुर्वार गर्व आज नष्ट हो जायगा। इन देवताओंमेंसे कौन ऐसा है, जो सर्वेश्वर शिवसे विमुख होकर तेरी सहायता करेगा?

२१८ * संक्षिप्त शिवपुराण *

मुझे तो ऐसा कोई देवता नहीं दिखायी देता। यदि देवता इस समय तेरी सहायता करेंगे तो जलती आगसे खेलनेवाले पतंगोंके समान नष्ट हो जायँगे। आज तेरा मुँह जल जाय, तेरे यज्ञका नाश हो जाय और जितने तेरे सहायक हैं वे भी आज शीघ्र ही जल मरें। इस दुरात्मा दक्षकी जो सहायता करनेवाले हैं, उन समस्त देवताओंके लिये आज शपथ है। वे तेरे अमंगलके लिये ही तेरी सहायतासे विरत हो जायँ। समस्त देवता आज इस यज्ञमण्डपसे निकलकर अपने-अपने स्थानको चले जायँ, अन्यथा सब लोगोंका सब प्रकारसे नाश हो जायगा। अन्य सब मुनि और नाग आदि भी इस यज्ञसे निकल जायँ, अन्यथा आज सब लोगोंका सर्वथा नाश हो जायगा। श्रीहरे! और विधातः! आपलोग भी इस यज्ञमण्डपसे शीघ्र निकल जाइये।''

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! सम्पूर्ण यज्ञशालामें बैठे हुए लोगोंसे ऐसा कहकर सबका कल्याण करनेवाली वह आकाशवाणी मौन हो गयी। (अध्याय ३१)


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गणोंके मुखसे और नारदसे भी सतीके दग्ध होनेकी बात सुनकर दक्षपर कुपित हुए शिवका अपनी जटासे वीरभद्र और महाकालीको प्रकट करके उन्हें यज्ञविध्वंस करने और विरोधियोंको जला डालनेकी आज्ञा देना

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! वह आकाशवाणी सुनकर सब देवता आदि भयभीत तथा विस्मित हो गये। उनके मुखसे कोई बात नहीं निकली। वे इस तरह खड़े या बैठे रह गये, मानो उनपर विशेष मोह छा गया हो। भृगुके मन्त्रबलसे भाग जानेके कारण जो वीर शिवगण नष्ट होनेसे बच गये थे, वे भगवान् शिवकी शरणमें गये। उन सबने अमित तेजस्वी भगवान् रुद्रको भलीभाँति सादर प्रणाम करके वहाँ यज्ञमें जो कुछ हुआ था, वह सारी घटना उनसे कह सुनायी।

गण बोले—महेश्वर! दक्ष बड़ा दुरात्मा और घमंडी है। उसने वहाँ जानेपर सतीदेवीका अपमान किया और देवताओंने भी उनका आदर नहीं किया। अत्यन्त गर्वसे भरे हुए उस दुष्ट दक्षने आपके लिये यज्ञमें भाग नहीं दिया। दूसरे देवताओंके लिये दिया और आपके विषयमें उच्चस्वरसे दुर्वचन कहे। प्रभो! यज्ञमें आपका भाग न देखकर सतीदेवी कुपित हो उठीं और पिताकी बारंबार निन्दा करके उन्होंने तत्काल अपने शरीरको योगाग्निद्वारा जलाकर भस्म कर दिया। यह देख दस हजारसे अधिक पार्षद लज्जावश शस्त्रोंद्वारा अपने ही अंगोंको काट-काटकर वहाँ मर गये। शेष हमलोग दक्षपर कुपित हो उठे और सबको भय पहुँचाते हुए वेगपूर्वक उस यज्ञका विध्वंस करनेको उद्यत हो गये; परंतु विरोधी भृगुने अपने प्रभावसे हमें तिरस्कृत कर दिया। हम उनके मन्त्रबलका सामना न कर सके। प्रभो! विश्वम्भर! वे ही हमलोग आज आपकी शरणमें आये हैं। दयालो! वहाँ प्राप्त हुए भयसे आप हमें बचाइये,

* रुद्रसंहिता * २१९

निर्भय कीजिये। महाप्रभो! उस यज्ञमें दक्ष आदि सभी दुष्टोंने घमंडमें आकर आपका विशेषरूपसे अपमान किया है। कल्याणकारी शिव! इस प्रकार हमने अपना, सतीदेवीका और मूढ़ बुद्धिवाले दक्ष आदिका भी सारा वृत्तान्त कह सुनाया। अब आपकी जैसी इच्छा हो, वैसा करें।

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! अपने पार्षदोंकी यह बात सुनकर भगवान् शिवने वहाँकी सारी घटना जाननेके लिये शीघ्र ही तुम्हारा स्मरण किया। देवर्षे! तुम दिव्य दृष्टिसे सम्पन्न हो। अतः भगवान्‌के स्मरण करनेपर तुम तुरंत वहाँ आ पहुँचे और शंकरजीको भक्तिपूर्वक प्रणाम करके खड़े हो गये। स्वामी शिवने तुम्हारी प्रशंसा करके तुमसे दक्षयज्ञमें गयी हुई सतीका समाचार तथा दूसरी घटनाओंको पूछा। तात! शम्भुके पूछनेपर शिवमें मन लगाये रखनेवाले तुमने शीघ्र ही वह सारा वृत्तान्त कह सुनाया, जो दक्षयज्ञमें घटित हुआ था। मुने! तुम्हारे मुखसे निकली हुई बात सुनकर उस समय महान् रौद्र पराक्रमसे सम्पन्न सर्वेश्वर रुद्रने तुरंत ही बड़ा भारी क्रोध प्रकट किया। लोकसंहारकारी रुद्रने अपने सिरसे एक जटा उखाड़ी और उसे रोषपूर्वक उस पर्वतके ऊपर दे मारा। मुने! भगवान् शंकरके पटकनेसे उस जटाके दो टुकड़े हो गये और महाप्रलयके समान भयंकर शब्द प्रकट हुआ। देवर्षे! उस जटाके पूर्वभागसे महाभयंकर महाबली वीरभद्र प्रकट हुए, जो समस्त शिवगणोंके अगुआ हैं। वे भूमण्डलको सब ओरसे व्याप्त करके उससे भी दस अंगुल अधिक होकर खड़े हुए। वे देखनेमें प्रलयाग्निके समान जान पड़ते थे। उनका शरीर बहुत ऊँचा था। वे एक हजार भुजाओंसे युक्त थे। उन सर्वसमर्थ महारुद्रके क्रोधपूर्वक प्रकट हुए निःश्वाससे सौ प्रकारके ज्वर और तेरह प्रकारके संनिपात रोग पैदा हो गये। तात! उस जटाके दूसरे भागसे महाकाली उत्पन्न हुईं, जो बड़ी भयंकर दिखायी देती थीं। वे करोड़ों भूतोंसे घिरी हुई थीं। जो ज्वर पैदा हुए, वे सब-के-सब शरीरधारी, क्रूर और समस्त लोकोंके लिये भयंकर थे। वे अपने तेजसे प्रज्वलित हो सब ओर दाह उत्पन्न करते हुए-से प्रतीत होते थे। वीरभद्र बातचीत करनेमें बड़े कुशल थे। उन्होंने दोनों हाथ जोड़कर परमेश्वर शिवको प्रणाम करके कहा।

वीरभद्र बोले—महारुद्र! सोम, सूर्य और अग्निको तीन नेत्रोंके रूपमें धारण करनेवाले प्रभो! शीघ्र आज्ञा दीजिये।

२२०* संक्षिप्त शिवपुराण *

मुझे इस समय कौन-सा कार्य करना होगा ? ईशान ! क्या मुझे आधे ही क्षणमें सारे समुद्रोंको सुखा देना है? या इतने ही समयमें सम्पूर्ण पर्वतोंको पीस डालना है? हर ! मैं एक ही क्षणमें ब्रह्माण्डको भस्म कर डालूँ या समस्त देवताओं और मुनीश्वरोंको जलाकर राख कर दूँ? शंकर ! ईशान ! क्या मैं समस्त लोकोंको उलट-पलट दूँ या सम्पूर्ण प्राणियोंका विनाश कर डालूँ ? महेश्वर ! आपकी कृपासे कहीं कोई भी ऐसा कार्य नहीं है, जिसे मैं न कर सकूँ। पराक्रमके द्वारा मेरी समानता करनेवाला वीर न पहले कभी हुआ है और न आगे होगा। शंकर ! आप किसी तिनकेको भेज दें तो वह भी बिना किसी यत्नके क्षणभरमें बड़े-से-बड़ा कार्य सिद्ध कर सकता है, इसमें संशय नहीं है। शम्भो ! यद्यपि आपकी लीलामात्रासे सारा कार्य सिद्ध हो जाता है, तथापि जो मुझे भेजा जा रहा है, यह मुझपर आपका अनुग्रह ही है। शम्भो ! मुझमें भी जो ऐसी शक्ति है, वह आपकी कृपासे ही प्राप्त हुई है। शंकर ! आपकी कृपाके बिना किसीमें भी कोई शक्ति नहीं हो सकती। वास्तवमें आपकी आज्ञाके बिना कोई तिनके आदिको भी हिलानेमें समर्थ नहीं है, यह निस्संदेह कहा जा सकता है। महादेव ! मैं आपके चरणोंमें बारंबार प्रणाम करता हूँ। हर ! आप अपने अभीष्ट कार्यकी सिद्धिके लिये आज मुझे शीघ्र भेजिये। शम्भो ! मेरे दाहिने अंग बारंबार फड़क रहे हैं। इससे सूचित होता है कि मेरी विजय अवश्य होगी। अतः प्रभो ! मुझे भेजिये। शंकर ! आज मुझे कोई अभूतपूर्व एवं विशेष हर्ष तथा उत्साहका अनुभव हो रहा है और मेरा चित्त आपके चरणकमलमें लगा हुआ है। अतः पग-पगपर मेरे लिये शुभ परिणामका विस्तार होगा। शम्भो ! आप शुभके आधार हैं। जिसकी आपमें सुदृढ़ भक्ति है, उसीको सदा विजय प्राप्त होती है और उसीका दिनोंदिन शुभ होता है।

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद ! उसकी यह बात सुनकर सर्वमंगलाके पति भगवान् शिव बहुत संतुष्ट हुए और 'वीरभद्र ! तुम्हारी जय हो' ऐसा आशीर्वाद देकर वे फिर बोले।

महेश्वरने कहा—मेरे पार्षदोंमें श्रेष्ठ वीरभद्र ! ब्रह्माजीका पुत्र दक्ष बड़ा दुष्ट है। उस मूर्खको बड़ा घमंड हो गया है। अतः इन दिनों वह विशेषरूपसे मेरा विरोध करने लगा है। दक्ष इस समय एक यज्ञ करनेके लिये उद्यत है। तुम याग-परिवारसहित उस यज्ञको भस्म करके फिर शीघ्र मेरे स्थानपर लौट आओ। यदि देवता, गन्धर्व, यक्ष अथवा अन्य कोई तुम्हारा सामना करनेके लिये उद्यत हों तो उन्हें भी आज ही शीघ्र और सहसा भस्म कर डालना। दधीचिकी दिलायी हुई मेरी शपथका उल्लंघन करके जो देवता आदि वहाँ ठहरे हुए हैं, उन्हें तुम निश्चय ही प्रयत्नपूर्वक जलाकर भस्म कर देना। जो मेरी शपथका उल्लंघन करके गर्वयुक्त हो वहाँ ठहरे हुए हैं, वे सब-के-सब मेरे द्रोही हैं। अतः उन्हें अग्निमयी मायासे जला डालो। दक्षकी यज्ञशालामें जो अपनी पत्नियों और सारभूत उपकरणोंके साथ बैठे हों, उन सबको जलाकर भस्म कर देनेके पश्चात् फिर शीघ्र लौट आना। तुम्हारे वहाँ जानेपर विश्वदेव आदि देवगण भी यदि सामने आ तुम्हारी सादर स्तुति करें तो भी तुम उन्हें शीघ्र आगकी ज्वालासे जलाकर

* रुद्रसंहिता * २२१

ही छोड़ना। वीर! वहाँ दक्ष आदि सब लोगोंको पत्नी और बन्धु-बान्धवोंसहित जलाकर (कलशोंमें रखे हुए) जलको लीलापूर्वक पी जाना।

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! जो वैदिक मर्यादाके पालक, कालके भी शत्रु तथा सबके ईश्वर हैं, वे भगवान् रुद्र रोषसे लाल आँखें किये महावीर वीरभद्रसे ऐसा कहकर चुप हो गये।
(अध्याय ३२)
~~ ० ~~

प्रमथगणोंसहित वीरभद्र और महाकालीका दक्षयज्ञ-विध्वंसके लिये प्रस्थान, दक्ष तथा देवताओंको अपशकुन एवं उत्पातसूचक लक्षणोंका दर्शन एवं भय होना

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! महेश्वरके इस वचनको आदरपूर्वक सुनकर वीरभद्र बहुत संतुष्ट हुए। उन्होंने महेश्वरको प्रणाम किया। तत्पश्चात् उन देवाधिदेव शूलीकी उपर्युक्त आज्ञाको शिरोधार्य करके वीरभद्र वहाँसे शीघ्र ही दक्षके यज्ञमण्डपकी ओर चले। भगवान् शिवने केवल शोभाके लिये उनके साथ करोड़ों महावीर गणोंको भेज दिया, जो प्रलयाग्निके समान तेजस्वी थे। वे कौतूहलकारी प्रबल वीर प्रमथगण वीर-भद्रके आगे और पीछे भी चल रहे थे। कालके भी काल भगवान् रुद्रके वीरभद्र-सहित जो लाखों पार्षदगण थे, उन सबका स्वरूप रुद्रके ही समान था। उन गणोंके साथ महात्मा वीरभद्र भगवान् शिवके समान ही वेश-भूषा धारण किये रथपर बैठकर यात्रा कर रहे थे। उनके एक सहस्र भुजाएँ थीं। शरीरमें नागराज लिपटे हुए थे। वीरभद्र बड़े प्रबल और भयंकर दिखायी देते थे। उनका रथ बहुत ही विशाल था। उसमें दस हजार सिंह जोते जाते थे, जो प्रयत्नपूर्वक उस रथको खींचते थे। उसी प्रकार बहुत-से प्रबल सिंह, शार्दूल, मगर, मत्स्य और सहस्रों हाथी उस रथके पार्श्वभागकी रक्षा करते थे। काली, कात्यायनी, ईशानी, चामुण्डा, मुण्डमर्दिनी, भद्रकाली, भद्रा, त्वरिता तथा वैष्णवी—इन नव दुर्गाओंके साथ तथा समस्त भूतगणोंके साथ महाकाली दक्षका विनाश करनेके लिये चलीं। डाकिनी, शाकिनी, भूत, प्रमथ, गुह्यक, कूष्माण्ड, पर्पट, चटक, ब्रह्मराक्षस, भैरव तथा क्षेत्रपाल आदि—ये सभी वीर भगवान् शिवकी आज्ञाका पालन एवं दक्षके यज्ञका विनाश करनेके लिये तुरंत चल दिये। इनके सिवा चौंसठ गणोंके साथ योगिनियोंका मण्डल भी सहसा कुपित हो दक्षयज्ञका विनाश करनेके लिये वहाँसे प्रस्थित हुआ। इस प्रकार कोटि-कोटि गण एवं विभिन्न प्रकारके गणाधीश वीरभद्रके साथ चले। उस समय भेरियोंकी गम्भीर ध्वनि होने लगी। नाना प्रकारके शब्द करनेवाले शंख बज उठे। भिन्न-भिन्न प्रकारकी सींगें बजने लगीं। महामुने! सेनासहित वीरभद्रकी यात्राके समय वहाँ बहुत-से सुखद शकुन होने लगे।

इस प्रकार जब प्रमथगणोंसहित

२२२ * संक्षिप्त शिवपुराण *

वीरभद्रने प्रस्थान किया, तब उधर दक्ष तथा देवताओंको बहुत-से अशुभ लक्षण दिखायी देने लगे। देवर्षे यज्ञ-विध्वंसकी सूचना देनेवाले त्रिविध उत्पात प्रकट होने लगे। दक्षकी बायीं आँख, बायीं भुजा और बायीं जाँघ फड़कने लगी। तात! वाम अंगोंका वह फड़कना सर्वथा अशुभसूचक था और नाना प्रकारके कष्ट मिलनेकी सूचना दे रहा था। उस समय दक्षकी यज्ञशालामें धरती डोलने लगी। दक्षको दोपहरके समय दिनमें ही अद्भुत तारे दीखने लगे। दिशाएँ मलिन हो गयीं। सूर्यमण्डल चितकबरा दीखने लगा। उसपर हजारों घेरे पड़ गये, जिससे वह भयंकर जान पड़ता था। बिजली और अग्निके समान दीप्तिमान् तारे टूट-टूटकर गिरने लगे तथा और भी बहुत-से भयानक अपशकुन होने लगे।

इसी बीचमें वहाँ आकाशवाणी प्रकट हुई जो सम्पूर्ण देवताओं और विशेषतः दक्षको अपनी बात सुनाने लगी।

आकाशवाणी बोली—ओ दक्ष! आज तेरे जन्मको धिक्कार है! तू महामूढ़ और पापात्मा है। भगवान् हरकी ओरसे आज तुझे महान् दुःख प्राप्त होगा, जो किसी तरह टल नहीं सकता। अब यहाँ तेरा हाहाकार भी नहीं सुनायी देगा। जो मूढ़ देवता आदि तेरे यज्ञमें स्थित हैं, उनको भी महान् दुःख होगा—इसमें संशय नहीं है।

ब्रह्माजी कहते हैं—मुने! आकाशवाणीकी यह बात सुनकर और पूर्वोक्त अशुभसूचक लक्षणोंको देखकर दक्ष तथा दूसरे देवता आदिको भी अत्यन्त भय प्राप्त हुआ। उस समय दक्ष मन-ही-मन अत्यन्त व्याकुल हो काँपने लगे और अपने प्रभु लक्ष्मीपति भगवान् विष्णुकी शरणमें गये। वे भयसे अधीर हो बेसुध हो रहे थे। उन्होंने स्वजनवत्सल देवाधिदेव भगवान् विष्णुको प्रणाम किया और उनकी स्तुति करके कहा।

(अध्याय ३३-३४)


### दक्षके यज्ञकी रक्षाके लिये भगवान् विष्णुसे प्रार्थना, भगवान्‌का शिवद्रोहजनित संकटको टालनेमें अपनी असमर्थता बताते हुए दक्षको समझाना तथा सेनासहित वीरभद्रका आगमन

दक्ष बोले—देवदेव! हरे! विष्णो! दीनबन्धो! कृपानिधे! आपको मेरी और मेरे यज्ञकी रक्षा करनी चाहिये। प्रभो! आप ही यज्ञके रक्षक हैं, यज्ञ ही आपका कर्म है और आप यज्ञस्वरूप हैं। आपको ऐसी कृपा करनी चाहिये, जिससे यज्ञका विनाश न हो।

ब्रह्माजी कहते हैं—मुनीश्वर! इस तरह अनेक प्रकारसे सादर प्रार्थना करके दक्ष भगवान् श्रीहरिके चरणोंमें गिर पड़े। उनका चित्त भयसे व्याकुल हो रहा था। तब जिनके मनमें घबराहट आ गयी थी, उन प्रजापति दक्षको उठाकर और उनकी पूर्वोक्त बात सुनकर भगवान् विष्णुने देवाधिदेव शिवका स्मरण किया। अपने प्रभु एवं महान् ऐश्वर्यसे युक्त परमेश्वर शिवका स्मरण करके

* रुद्रसंहिता * २२३

शिवतत्त्वके ज्ञाता श्रीहरि दक्षको समझाते हुए बोले।

श्रीहरिने कहा—दक्ष! मैं तुमसे तत्त्वकी बात बता रहा हूँ। तुम मेरी बात ध्यान देकर सुनो। मेरा यह वचन तुम्हारे लिये सर्वथा हितकर तथा महामन्त्रके समान सुखदायक होगा। दक्ष! तुम्हें तत्त्वका ज्ञान नहीं है। इसलिये तुमने सबके अधिपति परमात्मा शंकरकी अवहेलना की है। ईश्वरकी अवहेलनासे सारा कार्य सर्वथा निष्फल हो जाता है। केवल इतना ही नहीं, पग-पगपर विपत्ति भी आती है। जहाँ अपूज्य पुरुषोंकी पूजा होती है और पूजनीय पुरुषकी पूजा नहीं की जाती, वहाँ दरिद्रता, मृत्यु तथा भय—ये तीन संकट अवश्य प्राप्त होंगे।* इसलिये सम्पूर्ण प्रयत्नसे तुम्हें भगवान् वृषभध्वजका सम्मान करना चाहिये। महेश्वरका अपमान करनेसे ही तुम्हारे ऊपर महान् भय उपस्थित हुआ है। हम सब लोग प्रभु होते हुए भी आज तुम्हारी दुर्नीतिके कारण जो संकट आया है, उसे टालनेमें समर्थ नहीं हैं। यह मैं तुमसे सच्ची बात कहता हूँ।

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! भगवान् विष्णुका यह वचन सुनकर दक्ष चिन्तामें डूब गये। उनके चेहरेका रंग उड़ गया और वे चुपचाप पृथ्वीपर खड़े रह गये। इसी समय भगवान् रुद्रके भेजे हुए गणनायक वीरभद्र अपनी सेनाके साथ यज्ञस्थलमें जा पहुँचे। वे सब-के-सब बड़े शूरवीर, निर्भय तथा रुद्रके समान ही पराक्रमी थे। भगवान् शंकरकी आज्ञासे आये हुए उन गणोंकी गणना असम्भव थी। वे वीरशिरोमणि रुद्रसैनिक जोर-जोरसे सिंहनाद करने लगे। उनके उस महानादसे तीनों लोक गूँज उठे। आकाश धूलसे ढक गया और दिशाएँ अन्धकारसे आवृत हो गयीं। सातों द्वीपोंसे युक्त पृथ्वी अत्यन्त भयसे व्याकुल हो पर्वत, वन और काननोंसहित काँपने लगी तथा सम्पूर्ण समुद्रोंमें ज्वार आ गया। इस प्रकार समस्त लोकोंका विनाश करनेमें समर्थ उस विशाल सेनाको देखकर समस्त देवता आदि चकित हो गये। सेनाके उद्योगको देख दक्षके मुँहसे खून निकल आया। वे अपनी स्त्रीको साथ


* ईश्वरावज्ञया सर्वं कार्यं भवति सर्वथा। विफलं केवलं नैव विपत्तिश्च पदे पदे॥
अपूज्या यत्र पूज्यन्ते पूजनीयो न पूज्यते। त्रीणि तत्र भविष्यन्ति दारिद्र्यं मरणं भयम्॥
(शि० पु० रु० सं० स० खं० ३५। ८-९)

२२४
* संक्षिप्त शिवपुराण *

ले भगवान् विष्णुके चरणोंमें दण्डकी भाँति गिर पड़े और इस प्रकार बोले।

दक्षने कहा—विष्णो ! महाप्रभो ! आपके बलसे ही मैंने इस महान् यज्ञका आरम्भ किया है। सत्कर्मकी सिद्धिके लिये आप ही प्रमाण माने गये हैं। विष्णो ! आप कर्मोंके साक्षी तथा यज्ञोंके प्रतिपालक हैं। महाप्रभो ! आप वेदोक्त धर्म तथा ब्रह्माजीके रक्षक हैं। अतः प्रभो ! आपको मेरे इस यज्ञकी रक्षा करनी चाहिये; क्योंकि आप सबके प्रभु हैं।

ब्रह्माजी कहते हैं—दक्षकी अत्यन्त दीनतापूर्ण बात सुनकर भगवान् विष्णु उस समय शिवतत्त्वसे विमुख हुए दक्षको समझानेके लिये इस प्रकार बोले।

श्रीविष्णुने कहा—दक्ष! इसमें संदेह नहीं कि मुझे तुम्हारे यज्ञकी रक्षा करनी चाहिये; क्योंकि धर्म-परिपालनविषयक जो मेरी सत्य प्रतिज्ञा है, वह सर्वत्र विख्यात है। परंतु दक्ष ! मैं जो कुछ कहता हूँ, उसे तुम सुनो। इस समय अपनी क्रूरतापूर्ण बुद्धिको त्याग दो। देवताओंके क्षेत्र नैमिषारण्यमें जो अद्भुत घटना घटित हुई थी, उसका तुम्हें स्मरण नहीं हो रहा है। क्या तुम अपनी कुबुद्धिके कारण उसे भूल गये? यहाँ कौन भगवान् रुद्रके कोपसे तुम्हारी रक्षा करनेमें समर्थ है। दक्ष! तुम्हारी रक्षा किसको अभिमत नहीं है? परंतु जो तुम्हारी रक्षा करनेको उद्यत होता है, वह अपनी दुर्बुद्धिका ही परिचय देता है। दुर्मते! क्या कर्म है और क्या अकर्म, इसे तुम नहीं समझ पा रहे हो। केवल कर्म ही कभी कुछ करनेमें समर्थ नहीं हो सकता। जिसके सहयोगसे कर्ममें कुछ करनेकी सामर्थ्य आती है, उसीको तुम स्वकर्म समझो। भगवान् शिवके बिना दूसरा कोई कर्ममें कल्याण करनेकी शक्ति देनेवाला नहीं है। जो शान्त हो ईश्वरमें मन लगाकर उनकी भक्तिपूर्वक कार्य करता है, उसीको भगवान् शिव तत्काल उस कर्मका फल देते हैं। जो मनुष्य केवल ज्ञानका सहारा ले अनीश्वरवादी हो जाते या ईश्वरको नहीं मानते हैं, वे शतकोटि कल्पोंतक नरकमें ही पड़े रहते हैं।* फिर वे कर्मपाशमें बँधे हुए जीव प्रत्येक जन्ममें नरकोंकी यातना भोगते हैं; क्योंकि वे केवल सकाम कर्मके ही स्वरूपका आश्रय लेनेवाले होते हैं।

ये शत्रुमर्दन वीरभद्र, जो यज्ञशालाके आँगनमें आ पहुँचे हैं, भगवान् रुद्रकी क्रोधाग्निसे प्रकट हुए हैं। इस समय समस्त रुद्रगणोंके नायक ये ही हैं। ये हमलोगोंके विनाशके लिये आये हैं, इसमें संशय नहीं है। कोई भी कार्य क्यों न हो; वस्तुतः इनके लिये कुछ भी अशक्य है ही नहीं। ये महान् सामर्थ्यशाली वीरभद्र सब देवताओंको अवश्य जलाकर ही शान्त होंगे—इसमें संशय नहीं जान पड़ता। मैं भ्रमसे महादेवजी-की शपथका उल्लंघन करके जो यहाँ ठहरा रहा, उसके कारण तुम्हारे साथ मुझे भी इस कष्टका सामना करना ही पड़ेगा।

भगवान् विष्णु इस प्रकार कह ही रहे थे कि वीरभद्रके साथ शिवगणोंकी सेनाका समुद्र उमड़ आया। समस्त देवता आदिने उसे देखा।
(अध्याय ३५)


* केवलं ज्ञानमाश्रित्य निरीश्वरपरा नराः। निरयं ते च गच्छन्ति कल्पकोटिशतानि च॥
(शि० पु० रु० सं० स० खं० ३५। ३१)

  • रुद्रसंहिता * २२५

देवताओंका पलायन, इन्द्र आदिके पूछनेपर बृहस्पतिको रुद्रदेवकी अजेयता बताना, वीरभद्रका देवताओंको युद्धके लिये ललकारना, श्रीविष्णु और वीरभद्रकी बातचीत तथा विष्णु आदिका अपने लोकमें जाना एवं दक्ष और यज्ञका विनाश करके वीरभद्रका कैलासको लौटना

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! उस समय देवताओंके साथ शिवगणोंका घोर युद्ध आरम्भ हो गया। उसमें सारे देवता पराजित हुए और भागने लगे। वे एक-दूसरेका साथ छोड़कर स्वर्गलोकमें चले गये। उस समय केवल महाबली इन्द्र आदि लोकपाल ही उस दारुण संग्राममें धैर्य धारण करके उत्सुकतापूर्वक खड़े रहे। तदनन्तर इन्द्र आदि सब देवता मिलकर उस समरांगणमें बृहस्पतिजीको विनीतभावसे नमस्कार करके पूछने लगे।

लोकपाल बोले—गुरुदेव बृहस्पते! तात! महाप्राज्ञ! दयानिधे! शीघ्र बताइये, हम जानना चाहते हैं कि हमारी विजय कैसे होगी?

उनकी यह बात सुनकर बृहस्पतिने प्रयत्नपूर्वक भगवान् शम्भुका स्मरण किया और ज्ञानदुर्बल महेन्द्रसे कहा।

बृहस्पति बोले—इन्द्र! भगवान् विष्णुने पहले जो कुछ कहा था, वह सब इस समय घटित हो गया। मैं उसीको स्पष्ट कर रहा हूँ। सावधान होकर सुनो। समस्त कर्मोंका फल देनेवाला जो कोई ईश्वर है, वह कर्ताका ही आश्रय लेता है—कर्म करनेवालेको ही उस कर्मका फल देता है। जो कर्म करता ही नहीं, उसको फल देनेमें वह भी समर्थ नहीं है (अतः जो ईश्वरको जानकर उसका आश्रय लेकर सत्कर्म करता है, उसीको उस कर्मका फल मिलता है, ईश्वरद्रोहीको नहीं)। न मन्त्र, न ओषधियाँ, न समस्त आभिचारिक कर्म, न लौकिक पुरुष, न कर्म, न वेद, न पूर्व और उत्तरमीमांसा तथा न नाना वेदोंसे युक्त अन्यान्य शास्त्र ही ईश्वरको जाननेमें समर्थ होते हैं—ऐसा प्राचीन विद्वानोंका कथन है। अनन्यशरण भक्तोंको छोड़कर दूसरे लोग सम्पूर्ण वेदोंका दस हजार बार स्वाध्याय करके भी महेश्वरको भलीभाँति नहीं जान सकते—यह महाश्रुतिका कथन है। अवश्य भगवान् शिवके अनुग्रहसे ही सर्वथा शान्त, निर्विकार एवं उत्तम दृष्टिसे सदाशिवके तत्त्वका साक्षात्कार (ज्ञान) हो सकता है। सुरेश्वर! क्या कर्तव्य है और क्या अकर्तव्य, इसका विवेचन करना अभीष्ट होनेपर मैं जो इसमें सिद्धिका उत्तम अंश है, उसीका प्रतिपादन करूँगा। तुम अपने हितके लिये उसे ध्यान देकर सुनो। इन्द्र! तुम लोकपालोंके साथ आज नादान बनकर दक्ष-यज्ञमें आ गये। बताओ तो, यहाँ क्या पराक्रम करोगे? भगवान् रुद्र जिनके सहायक हैं, ऐसे ये परम क्रोधी रुद्रगण इस यज्ञमें विघ्न डालनेके लिये आये हैं और अपना काम पूरा करेंगे—इसमें संशय नहीं है। मैं सत्य-सत्य कहता हूँ कि इस यज्ञके विघ्नका निवारण करनेके लिये वस्तुतः तुममेंसे किसीके पास भी सर्वथा कोई उपाय नहीं है।

बृहस्पतिकी यह बात सुनकर वे इन्द्र-


789 संक्षिप्त शिवपुराण—8 A

२२६ * संक्षिप्त शिवपुराण *


सहित समस्त लोकपाल बड़ी चिन्तामें पड़ गये। तब महावीर रुद्रगणोंसे घिरे हुए वीरभद्रने मन-ही-मन भगवान् शंकरका स्मरण करके इन्द्र आदि लोकपालोंको डाँटा और इसके पश्चात् रुद्रगणोंके नायक वीरभद्रने रोषसे भरकर तुरंत ही सम्पूर्ण देवताओंको तीखे बाणोंसे घायल कर दिया। उन बाणोंकी चोट खाकर इन्द्र आदि समस्त सुरेश्वर भागते हुए दसों दिशाओंमें चले गये। जब लोकपाल चले गये और देवता भाग खड़े हुए तब वीरभद्र अपने गणोंके साथ यज्ञशालाके समीप गये। उस समय वहाँ विद्यमान समस्त ऋषि अत्यन्त भयभीत हो परमेश्वर श्रीहरिसे रक्षाकी प्रार्थना करनेके लिये सहसा नतमस्तक हो शीघ्र बोले—'देवदेव! रमानाथ! सर्वेश्वर! महाप्रभो! आप दक्षके यज्ञकी रक्षा कीजिये। आप ही यज्ञ हैं, इसमें संशय नहीं है। यज्ञ आपका कर्म, रूप और अंग है। आप यज्ञके रक्षक हैं। अतः दक्ष-यज्ञकी रक्षा कीजिये। आपके सिवा दूसरा कोई इसका रक्षक नहीं है।'

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! ऋषियोंका यह वचन सुनकर मेरे सहित भगवान् विष्णु वीरभद्रके साथ युद्ध करनेकी इच्छासे चले। श्रीहरिको युद्धके लिये उद्यत देख शत्रुमर्दन वीरभद्र, जो वीर प्रमथगणोंसे घिरे हुए थे, कड़े शब्दोंमें भगवान् विष्णुको डाँटने लगे।

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! वीरभद्रकी यह बात सुनकर बुद्धिमान् देवेश्वर विष्णु वहाँ प्रसन्नतापूर्वक हँसते हुए बोले।

श्रीविष्णुने कहा—वीरभद्र! आज तुम्हारे सामने मैं जो कुछ कहता हूँ, उसे सुनो—मैं भगवान् शंकरका सेवक हूँ, तुम मुझे रुद्रदेवसे विमुख न कहो। दक्ष अज्ञानी है। कर्मकाण्डमें ही इसकी निष्ठा है। इसने मूढ़तावश पहले मुझसे बारंबार अपने यज्ञमें चलनेके लिये प्रार्थना की थी। मैं भक्तके अधीन ठहरा, इसलिये चला आया। भगवान् महेश्वर भी भक्तके अधीन रहते हैं। तात! दक्ष मेरा भक्त है। इसीलिये मुझे यहाँ आना पड़ा है। रुद्रके क्रोधसे उत्पन्न हुए वीर! तुम रुद्र-तेजःस्वरूप हो, उत्तम प्रतापके आश्रय हो, मेरी प्रतिज्ञा सुनो। मैं तुम्हें आगे बढ़नेसे रोकता हूँ और तुम मुझे रोको। परिणाम वही होगा, जो होनेवाला होगा। मैं पराक्रम करूँगा।

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! भगवान् विष्णुके ऐसा कहनेपर महाबाहु वीरभद्र हँसकर बोला—'आप मेरे प्रभुके प्रिय भक्त हैं, यह जानकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है।' इतना कहकर गणनायक वीरभद्र हँस पड़ा और विनयसे नतमस्तक हो बड़ी प्रसन्नताके साथ श्रीविष्णुदेवसे कहने लगा।

वीरभद्रने कहा—महाप्रभो! मैंने आपके भावकी परीक्षाके लिये कड़ी बातें कही थीं। इस समय यथार्थ बात कहता हूँ, सावधान होकर सुनो। हरे! जैसे शिव हैं, वैसे आप हैं। जैसे आप हैं, वैसे शिव हैं। ऐसा वेद कहते हैं और वेदोंका यह कथन शिवकी आज्ञाके अनुसार ही है।* रमानाथ! भगवान् शिवकी आज्ञासे हम


* यथा शिवस्तथा त्वं हि यथा त्वं च तथा शिवः। इति वेदा वर्णयन्ति शिवशासनतो हरे॥
(शि० पु० रु० सं० स० खं० ३६। ६६)


789 संक्षिप्त शिवपुराण—8 B

* रुद्रसंहिता * २२७

सब लोग उनके सेवक ही हैं; तथापि मैंने जो बात कही है, वह इस वाद-विवादके अवसरके अनुरूप ही है। आप मेरी हर बातको आपके प्रति आदरके भावसे ही कही गयी समझिये।

ब्रह्माजी कहते हैं—वीरभद्रका यह वचन सुनकर भगवान् श्रीहरि हँस पड़े और उसके लिये हितकर वचन बोले।

श्रीविष्णुने कहा—महावीर! तुम मेरे साथ निःशंक होकर युद्ध करो। तुम्हारे अस्त्रोंसे शरीरके भर जानेपर ही मैं अपने आश्रमको जाऊँगा।

ब्रह्माजी कहते हैं—ऐसा कहकर भगवान् विष्णु चुप हो गये और युद्धके लिये कमर कसकर डट गये। महाबली वीरभद्र भी अपने गणोंके साथ युद्धके लिये तैयार हो गये।

नारद! तदनन्तर भगवान् विष्णु और वीरभद्रमें घोर युद्ध हुआ। अन्तमें वीरभद्रने भगवान् विष्णुके चक्रको स्तम्भित कर दिया तथा शार्ङ्गधनुषके तीन टुकड़े कर डाले। तब मेरे द्वारा एवं सरस्वतीद्वारा बोधित हुए श्रीविष्णुने उस महान् गणनायक वीरभद्रको असह्य तेजसे सम्पन्न जानकर वहाँसे अन्तर्धान होनेका विचार किया। दूसरे देवता भी यह जान गये कि सतीके प्रति जो अन्याय हुआ है, उसीका यह सब भावी परिणाम है। दूसरोंके लिये इस संकटका सामना करना अत्यन्त कठिन है। यह जानकर वे सब देवता अपने सेवकोंके साथ स्वतन्त्र सर्वेश्वर शिवका स्मरण करके अपने-अपने लोकको चले गये। मैं भी पुत्रके दुःखसे पीड़ित हो सत्यलोकमें चला आया और अत्यन्त दुःखसे आतुर हो सोचने लगा कि अब मुझे क्या करना चाहिये। मेरे तथा श्रीविष्णुके चले जानेपर मुनियोंसहित समस्त यज्ञके आधार रहनेवाले देवता शिवगणोंद्वारा पराजित हो भाग गये। उस उपद्रवको देखकर और उस महामखका विध्वंस निकट जानकर वह यज्ञ भी अत्यन्त भयभीत हो मृगका रूप धारण करके वहाँसे भागा। मृगके रूपमें आकाशकी ओर भागते देख वीरभद्रने उसे पकड़ लिया और उसका मस्तक काट डाला। फिर उन्होंने मुनियों तथा देवताओंके अंग-भंग कर दिये और बहुतोंको मार डाला।

प्रतापी मणिभद्रने भृगुको उठाकर पटक दिया और उनकी छातीको पैरसे दबाकर तत्काल उनकी दाढ़ी-मूँछ नोच ली। चण्डने बड़े वेगसे पूषाके दाँत उखाड़ लिये; क्योंकि पूर्वकालमें जिस समय महादेवजीको दक्षके द्वारा गालियाँ दी जा रही थीं, उस समय वे दाँत दिखा-दिखाकर हँसे थे। नन्दीने भगको रोषपूर्वक पृथ्वीपर दे मारा और उनकी दोनों आँखें निकाल लीं; क्योंकि जब दक्ष शिवजीको शाप दे रहे थे, उस समय वे आँखोंके संकेतसे अपना अनुमोदन सूचित कर रहे थे। वहाँ रुद्रगणनायकोंने स्वधा, स्वाहा और दक्षिणा देवियोंकी बड़ी विडम्बना (दुर्दशा) की। वहाँ जो मन्त्र-तन्त्र तथा दूसरे लोग थे, उनका भी बहुत तिरस्कार किया। ब्रह्मपुत्र दक्ष भयके मारे अन्तर्वेदीके भीतर छिप गये। वीरभद्र उनका पता लगाकर उन्हें बलपूर्वक पकड़ लाये। फिर उनके दोनों गाल पकड़कर उन्होंने उनके मस्तकपर तलवारसे आघात किया। परंतु योगके प्रभावसे दक्षका सिर अभेद्य हो गया था, इसलिये कट नहीं सका। जब वीरभद्रको

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२२८ * संक्षिप्त शिवपुराण *

ज्ञात हुआ कि सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंसे इनके मस्तकका भेदन नहीं हो सकता, तब उन्होंने दक्षकी छातीपर पैर रखकर दबाया और दोनों हाथोंसे गर्दन मरोड़कर तोड़ डाली। फिर शिवद्रोही दुष्ट दक्षके उस सिरको गणनायक वीरभद्रने अग्निकुण्डमें डाल दिया। तदनन्तर जैसे सूर्य घोर अन्धकारराशिका नाश करके उदयाचलपर आरूढ़ होते हैं, उसी प्रकार वीरभद्र दक्ष और उनके यज्ञका विध्वंस करके कृतकार्य हो तुरंत ही वहाँसे उत्तम कैलास पर्वतको चले गये। वीरभद्रको काम पूरा करके आया देख परमेश्वर शिव मन-ही-मन बहुत संतुष्ट हुए और उन्होंने उन्हें वीर प्रमथ-गणोंका अध्यक्ष बना दिया।
(अध्याय ३६-३७)


श्रीविष्णुकी पराजयमें दधीचि मुनिके शापको कारण बताते हुए दधीचि और क्षुवके विवादका इतिहास, मृत्युंजय-मन्त्रके अनुष्ठानसे दधीचिकी अवध्यता तथा श्रीहरिका क्षुवको दधीचिकी पराजयके लिये यत्न करनेका आश्वासन

सूतजी कहते हैं—महर्षियो! अमित बुद्धिमान् ब्रह्माजीकी कही हुई यह कथा सुनकर द्विजश्रेष्ठ नारद विस्मयमें पड़ गये। उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक प्रश्न किया।

नारदजीने पूछा—पिताजी! भगवान् विष्णु शिवजीको छोड़कर अन्य देवताओंके साथ दक्षके यज्ञमें क्यों चले गये, जिसके कारण वहाँ उनका तिरस्कार हुआ? क्या वे प्रलयकारी पराक्रमवाले भगवान् शंकरको नहीं जानते थे? फिर उन्होंने अज्ञानी पुरुषकी भाँति रुद्रगणोंके साथ युद्ध क्यों किया? करुणानिधे! मेरे मनमें यह बहुत बड़ा संदेह है। आप कृपा करके मेरे इस संशयको नष्ट कर दीजिये और प्रभो! मनमें उत्साह पैदा करनेवाले शिवचरितको कहिये।

ब्रह्माजीने कहा—नारद! पूर्वकालमें राजा क्षुवकी सहायता करनेवाले श्रीहरिको दधीचि मुनिने शाप दे दिया था, जिससे उस समय वे इस बातको भूल गये और वे दूसरे देवताओंको साथ ले दक्षके यज्ञमें चले गये। दधीचिने क्यों शाप दिया, यह सुनो। प्राचीनकालमें क्षुव नामसे प्रसिद्ध एक महातेजस्वी राजा हो गये हैं। वे महाप्रभावशाली मुनीश्वर दधीचिके मित्र थे। दीर्घकालकी तपस्याके प्रसंगसे क्षुव और दधीचिमें विवाद आरम्भ हो गया, जो तीनों लोकोंमें महान् अनर्थकारीके रूपमें विख्यात हुआ। उस विवादमें वेदके विद्वान् शिवभक्त दधीचि कहते थे कि शूद्र, वैश्य और क्षत्रिय—इन तीनों वर्णोंसे ब्राह्मण ही श्रेष्ठ है, इसमें संशय नहीं है। महामुनि दधीचिकी वह बात सुनकर धन-वैभवके मदसे मोहित हुए राजा क्षुवने उसका इस प्रकार प्रतिवाद किया।

क्षुव बोले—राजा इन्द्र आदि आठ लोकपालोंके स्वरूपको धारण करता है। वह समस्त वर्णों और आश्रमोंका पालक


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  • रुद्रसंहिता * २२९

एवं प्रभु है। इसलिये राजा ही सबसे श्रेष्ठ है। राजाकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन करनेवाली श्रुति भी कहती है कि राजा सर्वदेवमय है। मुने! इस श्रुतिके कथनानुसार जो सबसे बड़ा देवता है, वह मैं ही हूँ। इस विवेचनसे ब्राह्मणकी अपेक्षा राजा ही श्रेष्ठ सिद्ध होता है। च्यवननन्दन! आप इस विषयमें विचार करें और मेरा अनादर न करें; क्योंकि मैं सर्वथा आपके लिये पूजनीय हूँ।

राजा क्षुवका यह मत श्रुतियों और स्मृतियोंके विरुद्ध था। इसे सुनकर भृगुकुलभूषण मुनिश्रेष्ठ दधीचिको बड़ा क्रोध हुआ। मुने! अपने गौरवका विचार करके कुपित हुए महातेजस्वी दधीचिने क्षुवके मस्तकपर बायें मुक्केसे प्रहार किया। उनके मुक्केकी मार खाकर ब्रह्माण्डके अधिपति कुत्सित बुद्धिवाले क्षुव अत्यन्त कुपित हो गरज उठे और उन्होंने वज्रसे दधीचिको काट डाला। उस वज्रसे आहत हो भृगुवंशी दधीचि पृथ्वीपर गिर पड़े। भार्गववंशधर दधीचिने गिरते समय शुक्राचार्यका स्मरण किया। योगी शुक्राचार्यने आकर दधीचिके शरीरको, जिसे क्षुवने काट डाला था, तुरंत जोड़ दिया। दधीचिके अंगोंको पूर्ववत् जोड़कर शिवभक्तशिरोमणि तथा मृत्युंजय-विद्याके प्रवर्तक शुक्राचार्यने उनसे कहा।

शुक्र बोले—तात दधीचि! मैं सर्वेश्वर भगवान् शिवका पूजन करके तुम्हें श्रुतिप्रतिपादित महामृत्युंजय नामक श्रेष्ठ मन्त्रका उपदेश देता हूँ।

‘त्र्यम्बकं यजामहे’—हम भगवान् त्र्यम्बकका यजन (आराधन) करते हैं। त्र्यम्बकका अर्थ है—तीनों लोकोंके पिता प्रभावशाली शिव। वे भगवान् सूर्य, सोम और अग्नि—तीनों मण्डलोंके पिता हैं। सत्त्व, रज और तम—तीनों गुणोंके महेश्वर हैं। आत्मतत्त्व, विद्यातत्त्व और शिवतत्त्व—इन तीन तत्त्वोंके; आहवनीय, गार्हपत्य और दक्षिणाग्नि—इन तीनों अग्नियोंके; सर्वत्र उपलब्ध होनेवाले पृथ्वी, जल एवं तेज—इन तीन मूर्त भूतोंके (अथवा सात्त्विक आदि भेदसे त्रिविध भूतोंके), त्रिदिव (स्वर्ग)-के, त्रिभुजके, त्रिधाभूत सबके ब्रह्मा, विष्णु और शिव—तीनों देवताओंके महान् ईश्वर महादेवजी ही हैं। (यहाँतक मन्त्रके प्रथम चरणकी व्याख्या हुई।) मन्त्रका द्वितीय चरण है—'सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्'—जैसे फूलोंमें उत्तम गन्ध होती है, उसी प्रकार वे भगवान् शिव सम्पूर्ण भूतोंमें, तीनों गुणोंमें, समस्त कृत्योंमें, इन्द्रियोंमें, अन्यान्य देवोंमें और गणोंमें उनके प्रकाशक सारभूत आत्माके रूपमें व्याप्त हैं, अतएव सुगन्धयुक्त एवं सम्पूर्ण देवताओंके ईश्वर हैं। (यहाँतक 'सुगन्धिम्' पदकी व्याख्या हुई। अब 'पुष्टिवर्धनम्' की व्याख्या करते हैं—) उत्तम व्रतका पालन करनेवाले द्विजश्रेष्ठ! महामुने नारद! उन अन्तर्यामी पुरुष शिवसे प्रकृतिका पोषण होता है—महत्तत्त्वसे लेकर विशेष-पर्यन्त सम्पूर्ण विकल्पोंकी पुष्टि होती है तथा मुझ ब्रह्माका, विष्णुका, मुनियोंका और इन्द्रियोंसहित देवताओंका भी पोषण होता है, इसलिये वे ही 'पुष्टिवर्धन' हैं। (अब मन्त्रके तीसरे और चौथे चरणकी व्याख्या करते हैं।) उन दोनों चरणोंका स्वरूप यों है—उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्यो-र्मुक्षीयमामृतात्—अर्थात् 'प्रभो! जैसे खरबूजा पक जानेपर लताबन्धनसे छूट जाता है, उसी तरह मैं मृत्युरूप बन्धनसे मुक्त हो