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श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

८०) (श्री भक्तमाल रघुकुल सदृश सुभाव, श्रेष्ठ गुण सदा धर्मरत। सूर धीर ऊदार, दया पर दक्ष अनन्य व्रत॥ पद्मखण्ड पद्मा पद्धति, प्रफुलित कर सविता उदित। तत्त्वा जीवा दक्षिण देश, वंशोद्धर राजत विदित॥ ६६॥ तत्त्वा जीवा भाई उभै विप्र साधु सेवा पन, मन धरी बात तातैं शिष्य नहीं भये हैं। गाड्यौ एक ठूंठ द्वार होय अहो! हरी डार, सन्त चरनामृत को लै कै डारि दये हैं॥ जबही हरित देखैं ताकौं गुरु करि लेखैं, आये श्रीकबीर पूजी आस पाँव लये हैं। नीठ-नीठ नाम दियौ, दियौ परिचाय धाम, काम कोऊ होय जोपै आवौ कहि गये हैं॥ ३१२॥ कानाकानी भई द्विज जानी जाति गई पाँति, न्यारी करि दई कोऊ बेटी नहीं लेत है। चल्यो एक काशी जहाँ बसत कबीर धीर, जाय कही पीर जब पूछ्यौ कौन हेत है॥ दोऊ तुम भाई करौ आपु में सगाई होय, भक्ति सरसाई न घटाई चित चेत है। आय वहै करी परी ज्ञाति खरभरी कहैं, कहा उर धरी कछू मतिहूँ अचेत है॥ ३१३॥ 'करैं यही बात हमें और न सुहात' आये, सबै हा-हा खात यह छाँड़ि हठ दीजिये। पूछिवे कौं फेरि गये करौ ब्याह जोपै नये, दण्ड करि नाना भाँति भक्ति दृढ़ कीजिये॥ तब दई सुता लई पाँति में प्रसन्न ह्वै कै, पाँति हरि भक्तनि सौं सदा मति भीजिये। विमुख समूह देखि सबही बड़ाई करैं, धरैं हिय माँझ कहैं पन पर रीझिये॥ ३१४॥ www.malookpeeth.com श्रीमाधवदासजी बिनै व्यास मनो प्रगट ह्वै, जग को हित माधौ कियौ॥ पहिले वेद विभाग, कथित पुरान अष्टादस। भारतादि भागौत, मथित उद्धार्यौ हरि जस॥ अब सोधे सब ग्रन्थ, अर्थ भाषा विस्तार्यौ। लीला जै-जै जैति, गाय भवपार उतार्यौ॥ जगन्नाथ इष्ट वैराग्य सींव, करुणा रस भीज्यो हियौ। बिनै व्यास मनो प्रगट ह्वै जग को हित माधौ कियौ॥ ७०॥

श्रीमाधवदासजी) (८१ माधौदास द्विज निज तिया तन त्याग कियौ, लियौ इन जानि जग ऐसोई व्योहार है। सुत की बढ़नि जोग लियें नित चाहत हो, भई यह औरैं लै दिखाई करतार है।। ताते तजि दियौ गेह वेई अब पालैं देह, करै अभिमान सोई जानिये गँवार है। आये नीलगिरि धाम रहे गिरिसिन्धु तीर, अति मतिधीर भूख-प्यास न विचार है।। ३१५।। भये दिन तीन एतो भूख के अधीन, नाहिं रहें हरि लीन प्रभु सोच पर्यो भारियै। दियौ सैनभोग आप लक्ष्मी जू लै पधारीं, हाटक की थारी झनझन पाँव धारियै।। बैठे हैं कुटी में पीठ दिये हिये रूप रँगे, बीजुरी-सी कौंधि गई नीके न निहारियै। देखि सो प्रसाद बड़ौ मन अह्लाद भयौ, लयौ भाग मानि पात्र धर्योइ विचारियै।। ३१६।। खोलैं जो किवार थार देखियै न सोच पर्यो, कर्यो लै जतन ढूँढ़ि वाही ठौर पायौ है। ल्याये बाँधि मारी बेंत धारी जगन्नाथदेव, भेव जब जान्यौ पीठ चिह्न दरसायौ है।। कही पुनि आप मैं ही दियौ जब लियौ याने, माने अपराध पाँव गहिकै छिमायौ है। भई यों प्रसिद्ध बात कीरति न माँत कहूँ, सुनिकै लजात साधु शील यह गायौ है।। ३१७।। देखत सरूप सुधि तन की बिसरी जात, रहि जात मन्दिर में जानै नहीं कोई है। लग्यौ सीत गात सुनौ बात प्रभु काँपि उठे, दई सकलात आनि प्रीति हिये भोई है।। लागे जब बेगि-बेगि जाय परे सिन्धु तीर, चाहें जब नीर लिये ठाढ़े देहँ धोई है। करिकै विचार और निहारि कही जानी मैं तो, देत हौ अपार दुख ईशता लै खोई है।। ३१८।। 'कहा करौं अहो! मोपै रह्यो नहीं जात नेकु, मेटौ विथा गात' 'मोकौं विथा बहु भारी है'। रहै भाग शेष और तन में प्रवेस करै, ताते नहीं दूर करौं ईशता लै टारी है।। बहू बात साँच याकी गाँस एक और सुनौ, साधु को न हँसै कोऊ यह मैं विचारी है। देखत ही देखत में पीड़ा सो विलाय गई, नई-नई कथा कहि भक्ति बिसतारी है।। ३१९।। कीरति अभंग देखि भिक्षा कौ अरम्भ कियौ, दियौ काहू बाई पोता खीजत चलायकै। देवो गुन लियौ नीके जल सौं प्रछाल करि, करी दिव्य बाती दई दिये में बरायकै।। मन्दिर उँजारौ भयौ हिये को अन्ध्यारौ गयौ, गयो फेरि देखन कौं परी पाँय आयकै। ऐसे हैं दयाल दुख देत में निहाल करैं, करैं लै जे सेवा ताको सकै कौन गायकै।। ३२०।। पण्डित प्रबल दिग्गिवजै करि आयौ आय, वचन सुनायौ 'जू ! विचार मोसों कीजिये'। दई लिखि हारि काशी जायकै निहारि पत्र, भयौ अति खार लिखि जीति वाकी खीजियै।। फेरि मिलि माधौ जू कौं वैसे ही हरायौ एक, खर कौ मँगायौ कही 'चढ़ौ जब धीजियै'। बोल्यौ 'जूती बाँधो कान' गयो सुनि न्हान आन, जगन्नाथ जीते लै चढ़ायौ वाको रीझियै।। ३२१।।

८२) (श्री भक्तमाल ब्रज ही की लीला सब गावैं नीलाचल माँझ, मन भई चाह 'जाय नैननि निहारियै'। चले वृन्दावन मग लग एक गाँव जहाँ, बाई भक्त भोजन कौं ल्याई चाव भारियै।। बैठे ये प्रसाद लेत, लेत दृग भरि 'अहो ! कहो कहा बात दुख हिये को उघारियै'। 'साँवरौ कुँवर यह कौन को भुराय ल्याये? माय कैसें जीवै' सुनि मति लै बिसारियै ।। ३२२ ।। चले और गाँव जहाँ महाजन भक्त रहै, गहे मन माँझ आगे विनती हूँ करी है। गये वाके घर वह गयौ काहू और घर, भाय भरी तिया आनि पाँयन में परी है।। ऊपर महन्त कही 'अजू एक सन्त आये' 'इहाँ तौ समाई नाहिं' आई अरबरी है। कीजिये रसोई 'जोई सिद्ध सोई ल्यावो', दूध नीके कै पिवायो नाम माधौ आस भरी है।।३२३।। गये उठि पाछे भक्त आयो सो सुनायौ नाम सुनि अभिराम दौरे संग ही महन्त है। लिये जाय पाँय लपटाय सुखपाय मिले, झिले घर माँझ 'तिया धन्य तो सो कन्त है'। सन्तपति बोले 'मैं अनन्त अपराध किये ! जिये अब' कही 'सेवौ सीत मानि जन्त है'। आवत मिलाप होय यही राखौ बात गोय, आये वृन्दावन जहाँ सदाई बसन्त है।। ३२४।। देखि-देखि वृन्दावन मन में मगन भये, गये श्रीबिहारी जू के चना तहाँ पाये है। कहि रह्यो द्वारपाल नेकु में प्रसाद लाल, यमुना रसाल तट भोग कौं लगाये है।। नाना विधि पाक धरैं स्वामी आप ध्यान करें, बोले हरि भावैं नाहिं वेई लै खवाये है। पूछ्यो सो जनायौ ढूँढ़ि ल्यायौ आगे गायौ, सब तुम तौ उदार हास रस समझाये है।। ३२५ ।। गये ब्रज देखिवे कौं भाण्डीर में "खेम" रहै, निसि को दुराय खाय कृमि लै दिखाये हैं। लीला सुनिवे कौं हरियाने गाँव रहे, जाय गोबरहूँ पाथि पुनि नीलाचल धाये हैं।। घर हूँ को आये सुत सुखी सुनि माता वानी, मारग में स्वप्न दैकै बनिक मिलाये हैं। याही विधि नाना भाँति चरित अपार जानौ, जिते कछु जाने तिते गायकै सुनाये हैं।। ३२६ ।। मास परायण चौदह विश्राम श्रीरघुनाथदास गोसाँईजी (श्री) रघुनाथ गुसाँई गरुड़ ज्यौं, सिंहपौरि ठाढ़े रहैं।। सीत लगत सकलात, विदित पुरुषोत्तम दीनी। शौच गये हरि संग, कृत्य सेवक की कीनी।। जगन्नाथ पद प्रीति, निरन्तर करत खवासी। भगवत् धर्म प्रधान, प्रसन्न नीलाचल वासी।।

श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभुजी) (८३ उत्कल देश उड़ीसा नगर बैनतेय सब कोउ कहैं। (श्री) रघुनाथ गुसाँई गरुड़ ज्‍यों, सिंहपौरि ठाढ़े रहैं।।७१।। अति अनुराग घर सम्पति सौं रह्‍यो पागि, ताहू करि त्याग कियौ नीलाचल वास है। धन को पठावै पिता ऐपै नहीं भावै कछू, देखिवो महाप्रभुजी कौ पास है।। मन्दिर के द्वार रूप सुन्दर निहार्यो करैं, लग्यौ सीत गात सकलात दई दास है। शौच संग जायवे की रीति कौं प्रमान वहै, वैसे सब जानौ माधौदास सुखरास है।। ३२७ ।। महाप्रभु कृष्ण चैतन्य जू की आज्ञा पाइ, आये वृन्दावन राधाकुण्ड वास कियौ है। रहनि कहनि रूप चहनि न कहि सकैं, थकैं सुनि तन भाव रूप करि लियौ है।। मानसी में पायौ दूध-भात सरसात हिये, लिये रस नारी देखि बैद कहि दियौ है। कहाँ लौं प्रताप कहौं आप ही समझि लेहु, देहु वही रीझि जासौँ आगे पाय जियौ है।। ३२८ ।। श्रीनित्यानन्दजी, श्रीकृष्णचैतन्यजी नित्यानन्द (कृष्ण) चैतन्य की, भक्ति दसों दिशि विस्तरी ।। गौड़ देश पाखण्ड, मेटि कियौ भजन परायण। करुणासिन्धु कृतज्ञ, भये अगतिन गति दायन।। दसधा रस आक्रान्ति, महत जन चरण उपासे। नाम लेत निहपाप, दुरित तिहिं नर के नासे।। अवतार विदित पूरव मही, उभै महन्त देही धरी। नित्यानन्द(कृष्ण)चैतन्य की, भक्ति दसों दिशि विस्तरी ।।७२।। श्रीनित्यानन्दजी आप बलदेव सदा वारुणी सौं मत्त रहैं, चहैं मन मान्यो प्रेम मत्तताई चाखियै। सोई नित्यानन्द प्रभु महन्त की देही धरी, भरी सब आनि तऊ पुनि अभिलाखियै।। भयो बोझ भारी किहूँ जात न सँभारी, तब ठौर-ठौर पारषद माँझ धरि राखियै। कहत-कहत और सुनत-सुनत जाके, भये मतवारे बहु ग्रन्थ ताकी साखियै।। ३२६ ।। श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभुजी गोपिन के अनुराग आगे आप हारे श्याम, जान्यौ यह लाल रंग कैसे आवै तन में। ये तौ सब गौर तनी नख-सिख बनी-ठनी, खुल्यौ यों सुरंग अंग-अंग रँगे वन में।।

८४) (श्री भक्तमाल श्यामताई माँझ सो ललाई हूँ समाइ जाय, ताते मेरे जान फिरि आई यहै मन में। जसुमति सुत सोई शची सुत गौर भये, नये-नये नेह चोज नाचैं निज गन में।। ३३०।। आवै कभूँ प्रेम हेमपिण्डवत तन होत, कभूँ सन्धि-सन्धि छूटि अंग बढ़ि जात है। और एक न्यारी रीति आँसू पिचकारी मानौं उभै लाल प्यारी भावसागर समात है।। ईशता बखान कही करौ सो प्रमान याको, 'जगन्नाथ क्षेत्र नेत्र निरखि साक्षात है'। चतुर्भुज षट्भुज रूप लै दिखाय दियो, दियो जो अनूप हित बात पात-पात है।। ३३१।। श्रीकृष्णचैतन्य नाम जगत प्रगट भयौ, अति अभिराम लै महन्त देही धरी है। जितो गौड़ देश भक्ति लेशहूँ न जानै कोऊ, सोऊ प्रेमसागर में बोर्यो कहि 'हरी' है।। भये सिरमौर एक-एक जग तारिवे कौं, धारिवे कौं कौन साखि पोथिन में धरी है। कोटि कोटि अजामील वारि डारै दुष्टता पै, ऐसेहूँ मनन किये भक्ति भूमि भरी है।। ३३२।। श्रीसूरदासजी सूर कवित सुनि कौन कवि, जो नहिं सिर चालन करै।। उक्ति चोज अनुप्रास, वरन अस्थिति अति भारी। वचन प्रीति निर्वाह, अर्थ अद्भुत तुक धारी।। प्रतिबिम्बित दिवि दृष्टि, हृदय हरि लीला भासी। जनम करम गुन रूप, बसै रसना परकासी।। विमल बुद्धि गुन और की, जो यह गुन श्रवननि धरै। सूर कवित सुनि कौन कवि, जो नहिं सिर चालन करै ।।७३।। श्रीपरमानन्ददासजी ब्रजबधू रीति कलियुग विषैं, परमानन्द भयौ प्रेमकेत।। पौगण्ड बाल कैशोर, गोप लीला सब गाई। अचरज कहा यह बात, हुतौ पहिलौ जु सखाई।। नैननि नीर प्रवाह, रहत रोमांच रैन दिन। गद्गद् गिरा उदार, श्याम शोभा भीज्यौ तन।।

श्रीकेशवभट्टजी काश्मीरी) (८५ 'सारंग' छाप ताकी भई, श्रवण सुनत आवेश देत। ब्रजबधू रीति कलियुग विषैं परमानन्द भयौ प्रेमकेत।।७४।। श्रीकेशवभट्टजी काश्मीरी केशवभट नरमुकुटमणि, जिनकी प्रभुता विस्तरी।। काश्मीरि की छाप, पाप तापन जग मण्डन। दृढ़ हरिभक्ति कुठार, आन धर्म बिटप विहण्डन।। मथुरा मध्य मलेच्छ, वाद करि बरबट जीते। काजी अजित अनेक, देखि परचै भय भीते।। विदित बात संसार सब, सन्त साखि नाहिन दुरी। केशवभट नरमुकुटमणि, जिनकी प्रभुता विस्तरी।। ७५।। (चार कवित्त अन्य कवि कृत हैं) करि दिग विजै सब पण्डित हराय दिये, लिये बड़े-बड़े जीति भीति उपजाई है। फिरत चौडौल चढ़े गज बाजि लोग संग, प्रतिभा कौ रंग आये नदिया प्रभाई है।। डरे द्विज भारी महाप्रभु जू विचारी तब, लीला विस्तारी गंगा तीर सुखदाई है। बैठे ढिंग आय बोले नम्रता जनाय रह्यो, जग जसु छाय नेकु सुनै मनभाई है।। 'लरिकान संग पढ़ौ बातें बड़ी-बड़ी गढ़ौ, ऐपै रढ़ौ कहौं सोई सीलता पै रीझियै'। 'गंगा कौ सरूप कहौ' 'चाहौ दृग आगे सोई', नये सौ श्लोक किये सुनि मति भीजियै।। तामें एक कण्ठ करि पढ़िकै सुनायौ 'अहो! बड़ो अभिलाष याकी व्याख्या करि दीजियै'। अचरज भारी भयौ कैसे तुम सीखि लयो?, 'दयौ लै प्रभाव तुम्हें ताने दयौ जीजियै'। दूषन औ भूषन हूँ कीजियै बखान याके, सुनि दुख मानि कही दोष कहाँ पाइयै। 'कविता प्रबन्ध मध्य रहै खोटि गन्ध अहो ! आज्ञा मोकौं देउ कह्यो 'कहिकै सुनाइयै'।। व्याख्या करि दई नई औगुन सुगुनमई, आये निज धाम 'भोर मिले' समुझाइयै। सरस्वती ध्यान कियौ आई ततकाल बाल, बाल पै हरायो सब जग जितवाइयै। बोली सरस्वती 'मेरे ईश भगवान वेतौ मान मेरौ कितौ सम्मुख बतराइयै'। भयौ दरसन तुम्हें मन परसन होत, सुनि सुख सोत वानी आये प्रभु पाइयै।।

८६) (श्री भक्तमाल विनै बहु करी, करी कृपा आप बोले 'अजू ! भक्तिफल लीजै कहू भूलि न हराइयै'। हिये धरि लई भीर-भार छोड़ि दई पुनि, नई यह भई सुनि दुष्ट मरवाइयै।। आपु काश्मीर सुनी बसत विश्रान्त तीर, तुरक समूह द्वार जन्त्र इक धारियै। सहज सुभाय कोऊ निकसत आय ताको, पकरत जाय तातें सुन्नत निहारियै।। संग लै हजार शिष्य भरे भक्तिरंग महा, अरे वाही ठौर बोले नीच पट टारियै। क्रोध भरि झारे आय सूबा पै पुकारे वे तौ, देखि सबै हारे मारे जल बोरि डारियै ।। ३३३ ।। गये सब दौरि जहाँ काजी की जु पौरि हुती, कियौ तिन सोई अजू कीजिये पुकार है। आजु कोऊ ऐसो एक आयो है जु मथुरा में, संग हैं हजार शिष्य तेज को न पार है।। लैकै झरकारे धिरकारे मति भाँति कह्यौ, क्यों रे अधरमी हिन्दूधर्म कियौ खार है। होहु तुम राँड कियौ पुरुषार्थ भाँड़ जोई, हरि सौं विमुख ताको नहीं पारावार है।। ३३४।। काजी अति डर्यौ हिये पर्यौ खरभर्यौ, यह कौन आय अर्यौ अब करौं का उपाय मैं। रचे भूत बयताल मूठि दीठि मायाजाल, सुदर्शन किये ख्याल सहज सुभाय मैं।। असुर के तन में सो अगिनि लगाइ दई, दई कहो दई कहा, कहा कियो हाय मैं। ये तो हैं बड़े प्रतापी मैं तो अहौं महापापी, अहो! मति थापी आवैं परौं धाय पाय मैं।। ३३५ ।। आय पाँय पर्यौ नीर नैननि ते ढर्यौ बैन, कहै मर्यौं-मर्यौ प्रभु मेरी रक्षा कीजिये। तब स्वामी कह्यौ तोहि लैहौं मैं बचाय पुनि, एक है उपाय सीख मेरी सुनि लीजिये।। फेरिकै अधर्म ऐसो करौगे न कर्म अब, मेटौ सब गर्व सदा सीतल ह्वै जीजिये। और जिते वादी हरि विमुख प्रमादी तिन्हें, लीये सत मारग में नौधा रस पीजिये ।। ३३६ ।। जिते हिन्दु तुरकनि सैक़रान मारे हारे, भरे दुख भारे वेतौ स्वामी जू पै आये हैं। प्रभु कह्यौ आवौ अब दुख जनि पावौ, केशौराय गुन गावौ जल जमुना के न्हाये हैं।। झीन एक वस्त्र लाय तिन कहँ पहिराय, हिन्दू केर चिह्न पाय जग जस गाये हैं। तुर्क तिया कान धरीं आइ सब पाँय परीं, करी प्रभु दया नर-नारी दरसाये हैं।। ३३७।। मास परायण पन्द्रहवाँ विश्राम श्रीश्रीभट्टजी श्रीभट्ट सुभट प्रगट्यौ अघट, रस रसिकन मनमोद घन ।। मधुर भाव सम्मिलित, ललित लीला सु बलित छवि । निरखत हरखत हृदै, प्रेम बरषत सु कलित कवि ।।

श्रीदिवाकरजी) (८७ भव निस्तारन हेतु, देत दृढ़ भक्ति सबनि नित। जासु सुजस ससि ऊदै, हरत अति तम भ्रम श्रम चित।। आनंद कंद श्रीनन्द सुत श्रीवृषभानु सुता भजन। श्रीभट्ट सुभट प्रगट्यौ अघट, रस रसिकन मनमोद घन।।७६।। श्रीहरिव्यासदेवजी हरिव्यास तेज हरिभजन बल, देवी को दीक्षा दई।। खेचर नर की शिष्य, निपट अचरज यह आवै। विदित बात संसार, सन्त मुख कीरति गावै।। वैरागिन के वृन्द, रहत सँग स्याम सनेही। ज्यौं जोगेश्वर मध्य, मनो सोभित वैदेही।। श्रीभट्ट चरण रज परस तैं सकल सृष्टि जाकौं नई। हरिव्यास तेज हरिभजन बल, देवी को दीक्षा दई।।७७।। चटथावल गाँव बाग देखि अनुराग भयौ, लयौ नित्त नेम करि चाहें पाक कीजियै। देवी को स्थान काहू बकरा लै मार्यो आनि देखत गलानि 'इहाँ पानी नाहिं पीजियै'। भूखे निसि भई भक्ति तेज मिड़ गई नई, देह धरि लई आय लखि मति भीजियै। 'करौ जू रसोई' 'कौन करै कछु औरै भोई' 'सोई मोकौं दीजै दान शिष्य करि लीजियै' ।।३३८।। करी देवी शिष्य सुनि नगर को सटकी यों, पटकी लै खाट जाकी बड़ौ सरदार है। चढ़ी मुख बोलै 'हौं तो भई हरिव्यास दासी, जो न दास होहु तो पै अभी डारौं मार है'। आये सब भृत्य भये मानौं नये तन लये, गये दुख पाप ताप किये भव पार है। कोऊ दिन रहे नाना भोग सुख लहे एक, श्रद्धा कै स्वपच आयो पायौ भक्ति सार है।।३३६।। श्रीदिवाकरजी अज्ञान ध्वांत अन्तहिं करन, दुतिय दिवाकर अवतर्यौ ।। उपदेशे नृपसिंह, रहत नित आज्ञाकारी। पक्व वृक्ष ज्यौं नाय, सन्त पोषक उपकारी।।

८८) (श्री भक्तमाल

वानी भोलाराम, सुहृद सबहिन पर छाया। भक्त चरणरज जाँचि, विशद राघौ गुण गाया।। करमचन्द कश्यप सदन, बहुरि आय मनो वपु धर्यौ। अज्ञान ध्वांत अन्तर्हिं करन दुतिय दिवाकर अवतर्यौ।।७८।।

श्रीविट्ठलनाथ गोसाँईजी

विट्ठलनाथ ब्रजराज ज्यौं लाल लड़ायकै सुख लियौ।। राग भोग नित विविध, रहत परिचर्या तत्पर। सय्या भूषन वसन रचित रचना अपने कर।। वह गोकुल वह नन्दसदन दीच्छित को सौहे। प्रगट विभौ जहाँ घोष, देखि सुरपति मन मौहै।। वल्लभ सुत बल भजन कें, कलियुग में द्वापर कियौ। विट्ठलनाथ ब्रजराज ज्यौं लाल लड़ायकै सुख लियौ।।७९।।

श्रीत्रिपुरदासजी

कायथ त्रिपुरदास भक्ति सुख रासि भर्यो, कर्यौ ऐसो पन सीत दगला पठाइयै। निपट अमोल पट हियें हित जटि आवै, तातें अति भावै नाथ अंग पहिराइयै।। आयो कोऊ काल नरपति नैं विहाल कियौ, भयौ ईश ख्याल नेकु घर में न खाइयै। वही ऋतु आई सुधि आई आँखि पानी भरि, आई एक द्वाति दीठि आई बेंच ल्याइयै।।३४०।। बेंचिकै बजार यों रुपैया एक पायौ ताकौ, ल्यायौ मोटौ थान मात्र रंग लाल गाइयै। भीज्यो अनुराग पुनि नैन जलधार भीज्यो-भीज्यो दीनताई धरि राख्यो और आइयै।। कोऊ प्रभुजन आय सहज दिखाई दई, भई मन दियौ लै भण्डारी पकराइयै। काहू दास दासी के न काम कौ पै जाउँ लैकै, विनती हमारी जू गुसाँई न सुनाइयै।।३४१।। दियो लै भण्डारी कर राखे धरि पट वापै, निपट सनेही नाथ बोले अकुलायकै। 'भये हैं जड़ाये कोऊ वेगि ही उपाय करो', विविध उढ़ाये अंग वसन सुहायकै।। आज्ञा पुनि दई यों अँगीठी बारि दई, फेर वही भई सुनि रहे अति ही लजायकै। सेवक बुलाय कही 'कौन की कबाय आई?' सबै की सुनाई एक वही ली बचायकै।।३४२।।

श्रीकृष्णदासजी) (८६ सुनी न 'त्रिपुरदास !' बोल्यौ 'धन नास भयौ, मोटो एक थान आयौ राख्यो है बिछायकै'। 'ल्यावौ वेगि याही छिन' मन की प्रवीन जानि, ल्यायो दुख मानि व्यौंति लई सो सिंवायकै।। अँग पहिराई सुखदाई कापै गाई जात कही तब बात 'जाड़ौ गयौ भरि भायकै'। नेह सरसाई लै दिखाई उर आई सबै ऐसी रसिकाई हृदै राखी है बसायकै।। ३४३।। श्रीविट्ठलनाथजी के सुत (श्री) विट्ठलेश सुत सुहृद् श्रीगोवरधनधर ध्याइयै।। श्रीगिरिधर जू सरस शील, गोविन्द जु साथहिं। बालकृष्ण जसवीर, धीर श्रीगोकुल नाथहिं।। श्रीरघुनाथ जु महाराज, श्रीजदुनाथहिं भजि। श्रीघनश्याम जु पगे, प्रभु अनुरागी सुधि सजि।। ए सात प्रगट विभु भजन जग, तारन तस जस गाइयै। (श्री) विट्ठलेश सुत सुहृद श्रीगोवरधनधर ध्याइयै।।८०।। श्रीकृष्णदासजी गिरिधरन रीझि कृष्णदास कौं, नाम माँझ साझौ दियौ।। श्रीवल्लभ गुरुदत्त भजन, सागर गुन आगर। कवित नोख निर्दोष, नाथ सेवा में नागर।। वानी वन्दित विदुष, सुजस गोपाल अलंकृत। ब्रजरज अति आराध्य, वहै धारी सर्वसु चित।। सान्निध्य सदा हरिदासवर्य, गौरश्याम दृढ़ व्रत लियौ। गिरिधरन रीझि कृष्णदास कौं नाम माँझ साझौ दियौ॥८१॥ प्रेम रसरासि कृष्णदास जू प्रकास कियौ, लियौ नाथ मानि सो प्रमान जग गाइकै। दिल्ली की बाजार में जलेबी सो निहारि नैन, भोग लै लगाई लगी विद्यमान पाइयै।। राग सुनि भक्तिनी को भये अनुराग बस, ससिमुख लाल जू कौं जाइकै सुनाइयै। देखि रिझवार रीझि निकट बुलाइ लई, लई संग चले जग लाज को बहाइयै।। ३४४।।

६०) (श्री भक्तमाल

नीके अन्हवाय पट आभरन पहिराय, सौंधौ हूँ लगाय हरि मन्दिर में ल्याये हैं। देखि भई मतवारी कीनी लै आलापचारी, कह्यो 'लाल देखे?' बोली 'देखे में ही भाये हैं'।। नृत्य गान तान भाव भरि मुसक्यान, दृग रूप लपटान नाथ निपट रिझाये हैं। ह्वै कैं तदाकार तन छूट्यौ अंगीकार करी, धरी उर प्रीति मन सबके भिजाये हैं।।३४५।। आये सूर सागर सो कही बड़े नागर हौ, कोऊ पद गावौ मेरी छाया न मिलाइयै। गाये पाँच सात सुनि जान मुसुकात कही, भलें जू प्रभात आनि करिकै सुनाइयै।। पर्यौ सोच भारी गिरिधारी उर धारी बात, सुन्दर बनाय सेज धर्यो यो लखाइयै। आयकै सुनायौ सुख पायौ पच्छपात लै बतायौ औ मनायौ रंग छायौ अभू गाइकै।।३४६।। कुँवा में खिसिल देह छूटि गई नई भई, भई यों अशंका कछु औरै उर आई है। रसिकन मन दुख जानि सो सुजान नाथ, दियो दरसाय तन ग्वाल सुखदाई है।। गोवर्द्धन तीर कही 'आगे बलवीर गये, श्रीगुसाँई धीर सौं प्रनाम' यों जनाई है। धनहूँ बतायो खोदि पायो विसवास आयो, हिये सुख छायो शंक पंक लै बहाई है।।३४७।।

श्रीवर्द्धमानजी, श्रीगंगलजी

वर्द्धमान गंगल गम्भीर, उभै थंभ हरिभक्ति कै।। श्रीभागौत बखानि, अमृतमय नदी बहाई। अमल करी सब अवनि, ताप हारक सुखदाई।। भक्तन सौं अनुराग, दीन सौं परम दयाकर। भजन जसोदानन्द, सन्त संघट के आगर।। भीषमभट्ट अंगज उदार, कलियुग दाता सुगति के। वर्द्धमान गंगल गम्भीर उभै थंभ हरिभक्ति के।।८२।।

श्रीखेम गोसाँईजी

रामदास परताप तें, खेम गुसाँई खेमकर।। रघुनन्दन को दास, प्रगट भू-मण्डल जानै। सर्वसु सीताराम, और कछु उर नहिं आनै।।

श्रीविट्ठलदासजी) (६१ धनुष बान सौं प्रीति, स्वामि के आयुध प्यारे। निकट निरन्तर रहत, होत कबहुँ नहिं न्यारे॥ सूरवीर हनुमत् सदृश, परम उपासक प्रेम भर। रामदास परताप तैं खेम गुसाईं खेमकर॥ ८३॥ श्रीविट्ठलदासजी विट्ठलदास माथुर मुकुट, भयौ अमानी मानदा॥ तिलक दाम सौं प्रीति, गुनहिं गुन अन्तर धार्यौ। भक्तन को उत्कर्ष, जनम भरि रसन उच्चार्यौ॥ सरल हृदै सन्तोष, जहाँ तहँ पर उपकारी। उत्सव में सुत दान, कर्म कियो दुसकर भारी॥ हरि गोविन्द जै-जै गोविन्द गिरा सदा आनन्ददा। विट्ठलदास माथुर मुकुट भयौ अमानी मानदा॥ ८४॥ भाई उभै माथुर सु राना के पुरोहित हे, लरि मरे आपस में जियो एक जाम है। ताको सुत विट्ठल सु दास सुखरासि हिये, लिये वैस थोरी भयौ बड़ौ सेवै श्याम है॥ बोल्यौ नृप सभा मध्य 'आवत विप्र सुत, छिप लै कै आवौ' कही कह्यौ 'पूजै काम है'। फेरिकै बुलायौ 'करौ जागरन याही ठौर' काहू समझायौ 'गावै नाचै प्रेमधाम है'॥ ३४८॥ गये संग साधुनि लै बिनै रंग रँगे सब, राना उठि आदर दै नीके पधराये हैं। किये जा बिछौना तीनि छतनि के ऊपर लै, नाचि गाय आये प्रेम गिरे नीचे आये हैं॥ राजा मुख भयौ सेत दुष्टनि कौं गारी देत, सन्त भरि अंक लेत घर मधि ल्याये है। भूप बहु भेंट करी देह वाही भाँति परी, पाछे सुधि भई दिन तीसरे जगाये है॥ ३४६॥ उठे जब माय ने जनाय सब बात कही, सही नहीं जात निसि निकसे विचारिकै। आये यों छटीकरा में गरुड़ गोविन्द सेवा, करत मगन हिये रहत निहारिकै॥ राजा के जे लोग सु तौ ढूँढ़ि करि रहे बैठि, तिया मात आई करें रुदन पुकारिकै। किये लै उपाय रही कितौ हा-हा खाय ये तौ, रहे मँडराय तब बसी मन हारिकै॥ ३५०॥

६२) (श्री भक्तमाल

देख्यो जब कष्ट तन प्रभू जू स्वप्न दियौ, 'जावौ मधुपुरी' ऐसे तीन बार भाषियै। आये जहाँ जाति-पाँति छाये कछु औरे रंग, देख्यो एक खाती साधु संग अभिलाषियै।। तिया रहे गर्भवती सती मति सोच रती, खोदि भूमि पाई प्रतिमा सुधन राषियै। खाती को बुलाय कही लही यहु लेहु तुम, उन पाँय परि कह्यौ रूप सुख चाषियै।। ३५१।। करें सेवा-पूजा और काम नहिं दूजा तब, फैलि गई भक्ति भये शिष्य बहु भायकै। बड़ोई समाज होत मानौँ सिन्धु सोत आये, विविध बधाये गुनीजन उठे गायकै।। आई एक नटी गुण रूप धन जटी वह, गावै तान कटी चटपटी-सी लगायकै। दिये पट भूषण लै भूख न मिटत किहूँ, चहुँ दिसि हेरि पुत्र दियो अकुलायकै।। ३५२।। रंगीराय नाम ताकी शिष्या एक राना सुता भयो दुख भारी नेकु जलहूँ न पीजियै। कहिकै पठाई वासौं 'चाहौ सोई धन लीजै', 'मेरो प्रभुरूप मेरे नैननि कूँ दीजियै'।। 'द्रव्य तो न चाहौँ रीझि चाहौँ तन मन दियौ', फेरिकै समाज कियौ विनती कौ कीजियै। जिते गुनीजन तिनै दिये अनगन दाम पाछे नृत्य कर्यो आप देत सो न लीजियै।। ३५३।। ल्याई एक डोला में बैठाय रंगीराय जू कौं, सुन्दर सिंगार कही बार तेरी आइयै। कियौ नृत्य भारी जो विभूति सो तौ वारी, लिये भरि अँकवारी भेंट किये द्वार गाइयै।। 'मोहन न्योछावर में भयौ मोहि लेहु मति, लियौ उन शिष्य तन तज्यौ कहाँ पाइयै। कह्यौ जू चरित्र बड़े रसिक विचित्रनि कौ, जोपै लाल मित्र कियौ चाहौ हिये ल्याइयै।। ३५४।।

श्रीहरिरामजी हठीले

हरिराम हठीले भजनबल, राणा को उत्तर दियौ।। उग्र तेज ऊदार, सुघर सुथराई सींवा। प्रेमपुंज रसरासि सदा, गद्गद सुर ग्रीवा।। भक्तन को अपराध करै, ताकौ फल गायौ। हिरण्यकशिपु प्रह्लाद, प्रगट दृष्टान्त दिखायौ।। सस्फुट वक्ता जगत् में, राजसभा निधरक हियौ। हरिराम हठीले भजनबल, राणा को उत्तर दियौ।। ८५।। राणा सौं सनेह सदा चौपर कौं खेल्यौँ करै, ऐसो सो संन्यासी भूमि सन्त की छिनाई है। जायकै पुकार्यौ साधु झिरकी बिडार्यौ पर्यौ, विमुख के वश बात साँची लै झुठाई है।।

श्रीनारायणभट्टजी) (६३ आये हरिराम जू पै सबही जताई रीति, प्रीति करि बोले चलौ आगे आवौं भाई है। गये बैठे आयो जन मन में न ल्यायौ नृप, तब समुझायौ झार्यौ फेरि भू दिवाई है॥ ३५५॥ श्रीकमलाकरभट्टजी कमलाकर भट्ट जगत् में, तत्त्ववाद रोपी धुजा॥ पण्डित कला प्रवीन, अधिक आदर दे आरज। सम्प्रदाय सिर छत्र, द्वितीय मनौ मध्वाचारज॥ जेतिक हरि अवतार, सबै पूरन करि जानै। परिपाटी ध्वजविजै, सदृश भागौत बखानै॥ श्रुति स्मृति सम्मत पुरान, तप्तमुद्रा धारी भुजा। कमलाकर भट्ट जगत् में तत्त्ववाद रोपी धुजा॥ ८६॥ श्रीनारायणभट्टजी ब्रजभूमि उपासक भट्ट सो, रचि पचि हरि एकै कियौ॥ गोप्य स्थल मथुरा मण्डल जिते वाराह बखाने। ते किये नारायण प्रगट, प्रसिद्ध पृथ्वी में जाने॥ भक्तिसुधा कौ सिन्धु, सदा सतसंग समाजन। परम रसज्ञ अनन्य, कृष्णलीला कौ भाजन॥ ज्ञान स्मारत पच्छ कौं, नाहिन कोउ खण्डन बियौ। ब्रजभूमि उपासक भट्ट सो रचि पचि हरि एकै कियौ॥ ८७॥ भट्ट श्रीनारायन जू भये ब्रज परायन, जायँ जाही ग्राम जहाँ व्रत करि ध्याये हैं। बोलिकै सुनावैं इहाँ अमुकौ सरूप हैं जू, लीला कुण्ड धाम श्याम प्रगट दिखाये हैं॥ ठौर–ठौर रास के विलास लै प्रकास किये, जिये यों रसिकजन कोटि सुख पाये हैं। मथुरा ते कही ‘चलौ वेनी’ पूछैं ‘वेनी कहाँ?’ ‘ऊँचे गाँव’ आय खोदि सोत लै लखाये हैं। ३५६॥

६४) (श्री भक्तमाल श्रीब्रजवल्लभजी ब्रजवल्लभ वल्लभ सुवन, दुर्लभ सुख नैननि दिये ।। नृत्य गान गुन निपुन, रास में रस बरषावत। अब लीला ललितादि, बलित दम्पतिहिं रिझावत ।। अति उदार निस्तार, सुजस ब्रजमण्डल राजत। महा महोत्सव करत, बहुत सबही सुख साजत ।। श्रीनारायण भट्ट प्रभु, परम प्रीति रस बस किये। ब्रजवल्लभ वल्लभ सुवन, दुर्लभ सुख नैननि दिये ।। ८८ ।। श्रीरूप-सनातन गोसाँईजी संसार स्वाद सुख बांत ज्यौं, दुहुँ रूप-सनातन त्यागि दियौ ।। गौड़देश बंगाल हुते, सबही अधिकारी। हय गय भवन भण्डार, विभौ भू-भुज उन हारी ।। यह सुख अनित्य विचारि, वास वृन्दावन कीन्हौ। यथा लाभ सन्तोष कुँज, करवा मन दीन्हौ ।। ब्रजभूमि रहस्य राधाकृष्ण, भक्त तोष उद्धार कियौ। संसार स्वाद सुख बांत ज्यौं, दुहुँ रूप-सनातन त्यागि दियौ ।। ८६ ।। कहत वैराग गये पागि नाभा स्वामी जू पै, गई यों निवर तुक पाँच लागी आँच है। रही एक माँझ धर्यौ कोटिक कवित्त अर्थ, याही ठौर लै दिखायो कविता कौ साँच है।। राधाकृष्ण रस की आचारजता कही यामें, सोई जीवनाथभट्ट छपै वानी नाँच है। बड़े अनुरागी ये तो कहिवौ बड़ाई कहा, अहो! जिन कृपादृष्टि प्रेम पोथी बाँच है।। ३५७ ।। वृन्दावन ब्रजभूमि जानत न कोऊ प्राय, दई दरसाय जैसी शुक मुख गाई है। रीति हूँ उपासना की भागवत अनुसार, लियौ रससार सो रसिक सुखदाई है।। आज्ञा प्रभु पाय पुनि गोपीश्वर लगे आय, किये ग्रन्थ भाय भक्ति भाँति सब पाई है। एक-एक बात में समात मन बुद्धि जब, पुलकित गात दृग झरी-सी लगाई है।। ३५८ ।। रहैं नन्दगाँव रूप आये श्रीसनातन जू, महासुख रूप भोग खीर कौ लगाइये। नेकु मन आई सुखदाई प्रिया लाड़िली जू, मानौ कोऊ बालकी सुसौज सब ल्याइये ।।

श्रीहितहरिवंश गोसाँईजी) (६५ करिकै रसोई सोई लै प्रसाद पायौ भायो, अमल सो आयो चढ़ि पूछी सो जिताइये। 'फेरि जिनि ऐसी करौ यही दृढ़ हिये धरौ, ढरौ निज चाल' कहि आँखें भरि आइये।। ३५६।। रूप गुण गान होत कान सुनि सभा सब, अति अकुलान प्रान मूरछा-सी आई है। बड़े आप धीर रहे ठाढ़े न सरीर सुधि, बुधि में न आवै ऐसी बात लै दिखाई है।। श्रीगुसाईं कर्णपुर पाछे आय देखे आछे, नेकु ढिंग भये स्वांस लग्यौ तब पाई है। मानौ आगि आँच लागी ऐसो तन चिह्न भयौ, नयौ यह प्रेम रीति कापै जात गाई है।। ३६०।। श्रीगोविन्दचन्द आय निसि कौ स्वप्न दियौ, दियौ कहि भेद सब जासौँ पहिचानियै। रहौं मैं खिरक माँझ पोषैं निसि भोर साँझ, सीचैं दूध धार गाय जाय देखि जानियै।। प्रगट लै कियौ रूप अति ही अनूप छबि, कवि कैसे कहै थकि रहे लखि मानियै। कहाँ लौं बखानौं भरै सागर न गागर में, नागर रसिक हिये निसिदिन आनियै।। ३६१।। रहैं श्रीसनातन जू नन्दगाँव पावन पै, आवन दिवस तीन दूध लैके प्यारियै। साँवरौ किशोर आप पूछें 'किहिं ओर रहो?' 'कहे चारि भाई' पिता रीतिहूँ उचारियै।। गये ग्राम बूझी घर हरि पै न पाये कहूँ, चहुँ दिसि हेरि-हेरि नैन भरि डारियै। अबकै जो आवै फेर जान नहीं पावै सीस, लाल पाग भावै निसिदिन उर धारियै।। ३६२।। कही व्याली रूप वेनी निरखि सरूप नैन, जानी श्रीसनातन जू काव्य अनुसारियै। राधासर तीर द्रुम डार गहि झूलैं-फूलैं, देखत लफलफात गति मति वारियै।। आये यों अनुज पास फिरे आस-पास देखि, भयौ अति त्रास गहे पाउँ उर धारियै। चरित अपार उभै भाई हितसार पगे, जगै जग माहिं मति मन में उचारियै।। ३६३।। श्रीहितहरिवंश गोसाँईजी (श्री) हरिवंश गुसाँई भजन की, रीति सकृत् कोउ जानिहै।। (श्री) राधाचरण प्रधान, हृदै अति सुदृढ़ उपासी। कुँजकेलि दम्पत्ति तहाँ, की करत खवासी।। सर्वसु महा प्रसाद, प्रसिद्ध ताके अधिकारी। विधि निषेध नहिं दास, अनन्य उतकट व्रतधारी।। व्यास सुवन पथ अनुसरै, सोई भले पहिचानिहै। (श्री)हरिवंश गुसाँई भजन की रीति सकृत् कोउ जानिहै ॥६०॥

६६) (श्री भक्तमाल) हित जू की रीति कोऊ लाखनि में एक जानै, राधा ही प्रधान मानै पाछे कृष्ण ध्याइयै। निपट विकट भाव होत न सुभाव ऐसो, उनहीं की कृपादृष्टि नेकु क्यौं हूँ पाइयै।। विधि औ निषेध छेद डारे प्रान प्यारे हिये, जिये निज दास निसिदिन वहै गाइयै। सुखद चरित्र सब रसिक विचित्रन के, जानत प्रसिद्ध कहा कहिकै सुनाइयै॥ ३६४॥ आये घर त्याग राग बढ़यौ प्रिया-प्रियतम सौं, विप्र बड़भाग हरि ओझा दई जानियै। तेरी उभै सुता ब्याहि देवौ लेवौ नाम मेरौ, इनकौ जो वंस सो प्रशंस जग मानियै।। ताही द्वार सेवा विस्तार निज भक्तन की, अगतिन गति सो प्रसिद्ध पहिचानियै। मानि प्रिय बात ग्रहगयौ सुख लह्यौ तब, कह्यौ कैसे जात यह मन, मन आनियै॥ ३६५॥ राधिकावल्लभ लाल आज्ञा सो रसाल दई, सेवा मो प्रकास औ विलास कुंज धाम कौ। सोई विस्तार सुखसार दृग रूप पियौ, दियौ रसिकानि जिन लियौ पच्छ बाम कौ।। निसिदिन गान रस माधुरी कौ पान उर, अन्तर सिहान एक काम स्यामा-स्याम कौ। गुन सो अनूप कहि कैसे कै सरूप कहै, लहै मनमोद जैसे और नहीं नाम कौ॥ ३६६॥ स्वामी श्रीहरिदासजी (श्री) आसुधीर उद्योतकर, रसिक छाप हरिदास की।। जुगल नाम सौं नेम, जपत नित कुंजविहारी। अवलोकत रहैं केलि, सखी सुख के अधिकारी।। गान कला गन्धर्व, स्याम-स्यामा कौं तोषैं। उत्तम भोग लगाय, मोर मरकट तिमि पोषैं।। नृपति द्वार ठाढ़े रहैं, दरसन आसा जास की। (श्री) आसुधीर उद्योतकर, रसिक छाप हरिदास की॥६१॥ स्वामी हरिदास रसरासि को बखान सकै, रसिकता छाप जोई जाप मधि पाइयै। ल्यायो कोऊ चोवा वाकौ अति मन भोवा वामें, डार्यौ लै पुलिन यह खोवा हिये आइयै।। जानिकै सुजान कही 'लै दिखावौ लाल प्यारे', नैसुकु उघारे पट सुगंध बुड़ाइयै। पारस पाषान करि जल डरवाय दियौ, कियौ तब शिष्य ऐसे नाना विधि गाइयै॥ ३६७॥ मास परायण सोलहवाँ विश्राम

श्रीहरिराम व्यासजी) (६७

श्रीहरिराम व्यासजी

उतकर्ष तिलक अरु दाम को, भक्त इष्ट अति व्यास के। काहू के आराध्य मच्छ, कच्छ नरहरि सूकर। वामन परसाधरन, सेतबन्धन जु सैलकर॥ एकन कें यह रीति, नेम नवधा सौं लाये। सुकुल सुमोखन सुवन, अच्युत गोत्री जु लड़ाये॥ नौगुण तोरि नूपुर गुह्यौ, महत सभा मधि रास के। उत्कर्ष तिलक अरु दाम कौ भक्त इष्ट अति व्यास के।।६२।।

आये गृह त्यागि वृन्दावन अनुराग करि, गयौ हियौ पागि होय न्यारो तासौं खीजियै। राजा लैन आयो ऐपै जायवौ न भायो, श्रीकिशोर उरझायौ मन सेवा मति भीजियै।। चीरा जरकसी सीस चीकनौ खिसिलि जाय, 'लेहु जू बँधाय नहीं आप बाँध लीजिये'। गये उठि कुंज सुधि आई सुखपुंज आये, देख्यौ बँध्यौ मंजु कही कैसे मोपै रीझियै।।३६८।।

सन्त सुखदैन बैठे संग ही प्रसाद लेन, परोसति तिया सब भाँतिन प्रवीन है। दूध बरताई लै मलाई छिटकाई निज, खीझि उठे जानि पति पोषति नवीन है।। सेवा सौं छुटाय दई अति अनमनी भई, गई भूख बीते दिन तीन तन छीन है। सब समझावैं तब दण्ड को मनावैं अँग, आभरन बेंच साधु जेंवैं यों अधीन हैं।। ३६९।।

सुता कौ विवाह भयौ बड़ौ उतसाह कियौ, नाना पकवान सब नीके बनि आये हैं। भक्तनि की सुधि करी खरी अरबरी मति, भावना करत भोग सुखद लगाये है।। आय गये साधु सो बुलाय कही पावौ जाय, पोटनि बँधाय चाय कुंजनि पठाये है। वंसी पहिराई द्विज भक्ति लै दृढ़ाई सन्त, सम्पुट में चिरिया दै हित सौं बसाये हैं।। ३७० ।।

शरद उज्यारी रास रच्यौ पिया प्यारी तामें, रंग बढ़्यौ भारी कैसे कहिकै सुनाइयै। प्रिया अति गति लई बिजुरी-सी कौंधि गई, चकचौंधी भई छबि मण्डल में छाइयै।। नूपुर सी टूटि छूटि पर्यौ अरबर्यौ मन, तोरिकै जनेऊ कर्यौ वाही भाँति भाइयै। सकल समाज में यों कह्यौ 'आज काम आयौ, ढोयो हौं जनम' ताकी बात जिय आइयै।।३७१।।

गायौ भक्त इष्ट अति सुनिकै महन्त एक, लैन कौं परीक्ष्या आयौ संग सन्त भीर है। भूख कौं जतावै वानी व्यास कौ सुनावै सुनि, कही भोग आवै इहाँ मानै हरि धीर है।।

६८) (श्री भक्तमाल तब न प्रमान करी शंक धरी लै प्रसाद, ग्रास दोय चार उठे मानौं भई पीर है। पातरि समेटि लई सीत करि मोकौं दई, पावै तुम और पाँव लिये दृग नीर है।। ३७२।। भये सुत तीन बाँट निपट नवीन कियौ, एक ओर सेवा एक ओर धन धर्यौ है। तीसरी जु ठौर श्यामवन्दनी और छाप धरी, करी ऐसी रीति देखि बड़ौ सोच पर्यौ है।। एक ने रुपैया लिये एक ने किशोर जू कौं, श्रीकिशोरदास भाल तिलक लै कर्यौ है। छापे दिये स्वामी हरिदास निसि रास कीनौ, वही रास ललितादि गायो मन हर्यौ है।। ३७३।। श्रीजीव गोसाँईजी (श्री) रूप सनातन भक्तिजल, जीवगुसाँई सर गँभीर।। बेला भजन सुपक्व, कषाय न कबहुँ लागी। वृन्दावन दृढ़वास, जुगल चरननि अनुरागी।। पोथी लेखन पान, अंघट अक्षर चित दीनौ। सद्ग्रन्थनि कौ सार, सबै हस्तामल दीनौ। सन्देह ग्रन्थि छेदन समर्थ, रस रास उपासक परम धीर। (श्री) रूप सनातन भक्तिजल जीवगुसाँई सर गँभीर ।।६३।। किये नाना ग्रन्थ हृदै ग्रन्थि दृढ़ छेदि डारैं, डारैं धन यमुना में आवै चहुँओर तें। कही दास 'साधुसेवा कीजै' कहैं 'पात्रता न', करौं नीके करी बोल्यौ कटु कोप जोर तें।। तब समझायौ सन्त गौरव बढ़ायौ यह, सबकों सिखायौ बोलौ मीठौ निसि भोर तें। चरित अपार भाव-भक्ति कौ न पारावार, कियोऊ वैराग सार कहै कौन छोर तें ।। ३७४ ।। श्रीवृन्दावनवासी भक्त वृन्दावन की माधुरी, इन मिलि आस्वादन कियौ।। सर्वसु राधारमन, भट्ट गोपाल उजागर। हृषीकेश भगवान, विपुलबीठल रससागर।। थानेश्वरी जगन्नाथ, लोकनाथ महामुनि मधु श्रीरंग। कृष्णदास पण्डित, उभै अधिकारी हरि अंग।।

श्रीलोकनाथ गोसाँईजी) (६६ घमण्डी युगलकिशोर भृत्य, भूगर्भ जीव दृढ़व्रत लियौ। वृन्दावन की माधुरी इन मिलि आस्वादन कियौ॥६४॥ श्रीगोपालभट्ट गोसाँईजी श्रीगोपाल भट्ट जू के हिये वै रसाल बसे, लसे यों प्रगट राधारवन सरूप हैं। नाना भोग राग करैं अति अनुराग पगे, जगे जग माहिं हित कौतुक अनूप हैं॥ वृन्दावन माधुरी अगाध कौ सवाद लियौ, जियौ जिन पायौ सीथ भये रस रूप हैं। गुन ही कौ लेत जीव अवगुन को त्यागि देत, करुनानिकेत धर्मसेत भक्तभूप हैं॥३७५॥ श्रीअलि भगवान् अलि भगवान रामसेवा सावधान मन, वृन्दावन आये कछु औरै रीति भई है। देखे रासमण्डल में विहरत रस रास, बाढ़ी छबि प्यास दृग सुधि-बुधि गई है॥ नाम धरि रास औ विहारी सेवा प्यारी लागी, खगी हिय माँझ गुरु सुनी बात नई है। विपिन पधारे आप जाय जग धारे सीस, 'ईश मेरे तुम' सुख पायौ कहि दई है॥३७६॥ नवाह परायण पंचम विश्राम श्रीबीठलविपुलजी स्वामी हरिदास जू के दास नाम बीठल है, गुरु के वियोग दाह उपज्यौ अपार है। रास के समाज में विराज सब भक्तराज, बोलिकै पठाये आये आज्ञा बड़ी भार है॥ युगल सरूप अवलोकि नाना नृत्य भेद, गान तान कान सुनि रही न सँभार है। मिलि गये वाही ठौर पायौ भाव तन और, कह्यौ रससागर सो ताकौं यों विचार है॥३७७॥ श्रीजगन्नाथजी थानेश्वरी महाप्रभु पारषद थानेश्वरी जगन्नाथ, नाथ कौ प्रकास घर दिना तीनि देख्यो है। भये शिष्य जान आप नाम कृष्णदास धर्यौ, कृष्ण जू कहत सबै आदर बिसेख्यो है॥ सेवा मनमोहन जू कूप में जनाइ दई, बाहर निकालि करी लाड़ उर लेख्यो है। सुत रघुनाथ जू कौं स्वप्न में श्लोक दान, दया के निधान पुत्र दियौ प्रेम पेख्यो है॥३७८॥ श्रीलोकनाथ गोसाँईजी महाप्रभु कृष्णचैतन्य जू के पारषद, लोकनाथ नाम अभिराम सब रीति है। राधाकृष्ण लीला सौं रंगीन में नवीन मन, जैसे जल मीन तैसें निसि दिन प्रीति है॥ भागवत गान रसखान सो तौ प्रान तुल्य, अति सुख मान कहैं गावै जोई मीति है। रसिक प्रवीन मग चलत चरन लागि, कृपा कै जताय दई जैसी नेह नीति है॥३७६॥