श्री राम कथा में भारत की सभी समस्याओं का समाधान
Shri Ram Katha Mein Bharat Ki Sabhi Samasyaon Ka Samadhan
राजीव दीक्षित / रोबिन बसराना द्वारा
स्रोत: Rashtraniti & Ram Katha Discourse · Swadeshi Robin Basrana · 2017 (उद्गम)
और सुग्रीव को राजा बनाया था, आपके यहाँ अन्याय तो नहीं है, अधर्म भी नहीं है, क्या बाली का वध न्याय था? तो राम पूछ रहे हैं कि इतने बाद क्यों पूछ रहे हो तुम?
अभी तो सब कहानी खत्म हो गई है, तो वह कह रहे हैं कि अभी तक हिम्मत नहीं पड़ी पूछने की।
तो वो कह रहे हैं सुग्रीव आपका सहयोगी है और उसके सामने मैं अब यह पूछूँ तो मुश्किल हो जाएगी क्या पता आपके और सुग्रीव के बीच में मनभेद हो जाए हमारा लक्ष्य रावण को खत्म करना है वह आपको पहले पूरा करना था इसलिए मैं प्रश्न पूछ रहा हूँ तो राम कहते हैं देखो बाली अधर्मी ही था धर्मी नहीं था।
विभीषण कहते हैं की “कहानी सुनाओ” -
तो सुग्रीव कहता है, “मैं और बाली सगे भाई थे और भाई हर समय मेरा अपमान करता था बारबार मेरी पत्नी का- अपमान करता था, और मेरी पत्नी का अपमान करना इतना ही नहीं राज्यों के विद्वानों की पत्नियों का भी अपमान करता रहता था, रावण के जैसा बनने की कोशिश करता रहता था, जितना ज्यादा शोषण रावण करता था, वैसा ही वह करता था, जब यह सब कहानी सुनते हैं सुग्रीव के मुंह से तब विभीषण कहते हैं बात तो आपकी सही है, बाली अधर्मी में ही था।
राम कहते हैं “मैंने उसको मारने का संकल्प लिया था लेकिन बाली के लिए नहीं सुग्रीव के लिए अगर सुग्रीव को राजा बनाना है तो बाली को हटाना बहुत आवश्यक था, वरना बाली, सुग्रीव को मार डालता और सुग्रीव अगर मर जाता तो हनुमान के रहने का स्थान नहीं रहता और हनुमान तो भगवान के भेजे हुए कोई दूत है, जिनके हाथों बहुत बड़े काम इस देश में होने वाले हैं। आपको मालूम है कि किशकिन्धा राज्य का जो मालिक था बाली उसने हैरान कर दिया था कि इनमें से मैं किसी को नहीं रहने दूंगा ना सुग्रीव को, न हनुमान को, न नल और नील को। यह नल नील भी भगवान के भेजे हुए हैं, इनके हाथों कोई विशेष काम होना है, आप जानते हैं अगर बाली के हाथों यह लोग मरे होते तो भारत में बहुत सारे इतिहास लिखने से वंचित हो जाता यदि हनुमान के विषय में हम यह कल्पना करें कि बाली ने उनको मरवा दिया होता, तो हनुमान का जो सबसे बड़ा चरित्र आता है वह यह कि वह भारत के नागरिकों को भारत की जड़ी बूटियों से परिचित कराने वाले आदि वैद्य थे। क्योंकि श्री राम को पता ही नहीं था, जब लक्ष्मण को अचेत स्थिति आई, तो उन्हें कौन सी जड़ी बूटियां दी जाएगी तो वैद्य सुषेण ने हनुमान जी को समझाया कि हिमालय जाओ और वहां से कुछ जड़ी बूटी ले आओ तो हनुमान जी को लगा इस जड़ी बूटी से काम ना चले तो पूरा पर्वत ही उठा कर ले आए और उन जड़ी बूटियों का परिचय श्री राम को कराया, लक्ष्मण को कराया, और पूरी सेना को कराया ”, तो राम कहते हैं “यह काम वंचित हो जाता। फिर विभीषण ने नल नील के विषय में पूछा तब श्री राम कहते हैं “नल-नील तो अन्दुत है, इन्होंने सेना को रावण के राज्य में भेजने के लिए पुल बनाया”। अब तक तो सब हम यह मानते थे कि रामचंद्र जी की सेना जो रावण के राज्य में पहुंची उसके लिए कोई पुल बना तो बना होगा हमारे दिमाग में नहीं
बैठता था कोई कल्पना नहीं आती थी लेकिन अब अमेरिका की सबसे बड़ी संस्था नासा ने उस पुल के चित्र निकाल कर जब सब को दिखाएँ और उसकी कार्बन डेटिंग हुई तो पता चला कि वह पुल 5 लाख 13 साल पुराना है और कुछ 100 वर्ष पुराना है और राम से रावण का युद्ध भी उतना ही पुराना है तो सिद्ध हो गया कि यह पुल उनके समय में बना और श्री राम, विभीषण को कह रहे हैं "देखो मुझे नहीं पता यह पुल कैसे बनाया जाता है? यह नल नील दोनों जानते हैं , नल और नील दोनों कंस्ट्रक्शन के बहुत बड़े इंजीनियर थे जो पुल बनाया वो पत्थरों का पुल समुंदर के बीच में बनाय उसकी कल्पना भी मुश्किल है। समुद्र में पत्थरों को ले जाने के लिए, नाव में पत्थरों को रखना और नाव में किसी तीर को मार कर उसको डुबो देना यह काम वह कर रहे हैं, भगवान श्री राम के साथ पत्थरों को डुबो-डुबो कर फिर एक ऊंचाई तक लाए, फिर कंस्ट्रक्शन हुआ है और उस पुल का कंस्ट्रक्शन पत्थर और पत्थर को जोड़ने वाले चूने के साथ इतना मजबूत बन गया है कि आज तक वह सुरक्षित है 5 लाख 13 साल पुराना पुल सुरक्षित है जो कभी भारत में नल नील ने भगवान श्रीराम के लिए बनाया था और अब अमेरिका के वैज्ञानिक जानते हैं कि भारत का साइंस और टेक्नोलॉजी बहुत ऊंचे स्तर की रही है वरना कैसे संभव है? पत्थरों से समुद्र के बीच में पुल बनाना । नदी के बीच में पुल बनाना तो समझ में आता है, क्योंकि नदी की गहराई निश्चित होती है लेकिन समुंदर की गहराई निश्चित नहीं है कभी कहीं पर 100 किलोमीटर गहरा हो सकता है कभी कहीं 40 किलोमीटर गहरा हो सकता है कभी कहीं 200 किलोमीटर गहरा हो सकता है इतने गहरे समुद्र में पुल बांध दिया और वह पुल के फोटोग्राफ मैंने देखे हैं मेरे पास मेरे कंप्यूटर में वह पड़े हुए हैं बहुत अच्छे से सेव किए हुए हैं, कभी मौका मिला तो प्रोजेक्टर की सहायता से आपको दिखाऊंगा कि कैसे एक पत्थर से दूसरे पत्थर को जोड़ा गया है, उसके अंदर के जो चित्र निकालें हैं पुल के पत्थरों को एक दूसरे से जोड़ा है, बीच में चूना लगाकर । लेकिन पत्थर बिखर ना जाए तो लोहे कील लगी हुई है दोनों तरफ जोड़ों में । यह विज्ञान उस समय था और पुल को जब ऊपर से देखते हैं सेटलाइट से जब देखते हैं , तो सेटलाइट से जो उसके फोटोग्राफ खींचे गए हैं वह शायद दैनिक भास्कर अखबार में तो छप चुके हैं मेरे पास तो उसके ओरिजिनल फोटोग्राफ है और उन फोटोग्राफ को जब हम ऊपर से देखते हैं तो दिखाई देता है कि पुल जेड शेप में बना हुआ है स्टेट लाइन नहीं है, बहुत दिन तक मैं सोचता रहा ऐसी शेप में पुल कैसे बनाया और क्यों बनाया क्या जरूरत थी जैसे आजकल डैम(बाँध) बनाते हैं तो बिल्कुल सीधी लाइन में बनाते हैं, तो शायद भारत की तकनीकी नहीं है सीधी लाइन में पुल बनाया जाए यह यूरोप की टेक्नोलॉजी है । यदि पुल एक सीधी रेखा में होगा तो उस पर पानी का दबाव सबसे ज्यादा पड़ेगा क्योंकि समतल चीज होती है तो उस पर दबाव ज्यादा पड़ता है पानी का दबाव ज्यादा आएगा तो टूट जाएगा । इसलिए 5 लाख 13 साल पहले, नल-नील ने ऐसा पुल बनाया जिस पर पानी का दबाव कम पड़े, उसे एक दूसरे के ऊपर डिस्टीब्यूट कर दे इसलिए उसको जेड शेप दे दी । आजकल के जो जल विज्ञान के वैज्ञानिक है उनसे मैं कहता हूँ जरा ऐसे डिजाइन की कल्पना करो तो वह एक ही शब्द कहते हैं अद्भुत ! वह यह कहते हैं 5 लाख 13 साल पुराने दो व्यक्ति ऐसे हुए जिन्होंने एक कल्पना थी । कि इसका माने कि वे बहुत बड़े वैज्ञानिक रहे होंगे, यह तभी हो
सकता है, साधारण लोगों के दिमाग में कल्पना कभी नहीं आ सकती कि पानी के प्रेशर को बराबर डिसेटीब्यूट करना है और उसमें जेड शेप को देना है ,ताकि वह ज्यादा दिन सुरक्षित रहे पहले जब हम चर्चा करते थे तो कुछ आधुनिक पढ़े लिखे लोगों से सुना है कि भारत बहुत महान था ” सुना है, लेकिन इसकी महानता क्या थी? यह अब दिखाई देती है 5 लाख 13 साल पहले इस तरीके के पुल का डिजाइन कर देना और इतने साल तक टिके रहना और इसके बीच में कहीं भी टूट-फूट नहीं, क्रैक नहीं है अब वह तो भला हो दक्षिण भारत के जयललिता का जिसने जिद पकड़ ली थी कि इस पुल को तोड़ ही देना है, क्योंकि यह चेन्नई के रास्ते में आने वाले बड़े जहाजों को रोककर ,जहाजों के लिए बाधा डालता है अच्छा हुआ जयललिता अपने पद से निकल गई इसलिए पुल बच गया वरना वह तोड़ने की तैयारी में थी, तो नेता कैसे हैं हमारे? इस से अंदाजा लगा लो और राम के जमाने में कितनी मेहनत से बना होगा उसका अंदाजा लगा लो इस तरह की कालिटी और इस तरह के के काम और अब समझ में आता है कि जब पुल सत्य था तो सब कुछ सत्य रहा होगा अब तक हमारे देश में कुछ ऐसे ही इतिहासकार हो गये, जो वामपंथी हैं, वह मानते ही नहीं हैं कि भगवान राम की कहानी सत्य है वे कहते हैं हाइपोथिसिस हैं , हाइपोथिसिस माने कल्पना में गढ़ी हुई बातें, और अभी यह जो पुल का हो जाना और उसी समय का हो जाना जो राम का समय है तो यह सिद्ध कर देता है कि यह सत्य है इसमें काल्पनिक कुछ नहीं है और अगर इसी विषय पर आगे हम खोज करें तो बहुत कुछ ऐसा निकल आएगा क्योंकि वैज्ञानिकों ने अभी यह माना है यह पुल जो नीचे गया है इसके साथ पूरी सभ्यता नीचे गई होगी और यह पुल अकेला ही नीचे नहीं गया होगा हो सकता है लंका भी नीचे चली गई हो उसके साथ मिलकर । द्वारिका के बारे में तो वैज्ञानिकों ने सिद्ध कर दिया है कि द्वारिका तो पूरी समुंदर में समा गई थी जो अभी भी मिलती है समुंदर के नीचे । तो हो सकता है लंका भी चली गई हो, क्योंकि सुनामी आने से पहले मेरी भी कल्पना काम नहीं करती थी, कि यह नीचे गई कैसे होगी लेकिन सुनामी पर मैंने अपनी आंखों से देखा है कि 20 -20 मंजिला बिल्डिंग नीचे चली गई तो यह भी चला गया होगा और पता नहीं पिछले कितने लाख वर्षों में कितनी बार सुनामी आई है, कोई कैलकुलेशन नहीं है । अब डूबी हुई सभ्यता पर कोई काम करें कोई करोड़ों का बजट निकले तो और भी बहुत कुछ निकल आएगा क्योंकि यह पुल अकेले में नहीं है, इस पुल की बहुत विशेषता है नल और नील को राम पूछ रहे है कंब रामायण में, “कि तुम ने पुल निर्माण की जोड़ी बनाई है उसकी डिजाइन दिखाओ” नल-नील – “जो हमने डिजाइन बनाई है वह आपको हम जरूर स्पष्ट करेंगे” तो वह कह रहे हैं “इस पर से अपनी सेना तो जाएगी लेकिन दुश्मन की सेना इधर नहीं आ पाएगी ऐसा डिजाइन हमने बनाया है अपनी सेना तो जाएगी लेकिन दुश्मन की सेना इधर नहीं आ पाएगी” । तो राम पूछ रहे हैं कि “इसमें ऐसी क्या विशेषता है कि दुश्मन की सेना इधर नहीं आ पाएगी तो नलनील- कहते हैं कि अपनी सेना में ज्यादातर बंदर है और बंदर में वजन में बहुत हल्के होते हैं और इनके शरीर का सारा वजन पैरों में नहीं आता है चार पैरों में आता है वह डिसेटीब्यूट हो जाता है इसलिए इनका जाना तो आसान है और रावण की सेना में सब दो पैरों वाले हैं, हमारी सेना में सब चार पैर वाले हैं तो यह जो चार पैर वाले हैं इनका चलना बहुत आसान है, यह दो पैर वाले आए तो यह पुल
डुबो देगा यह पक्का है, हमने ऐसा डिजाइन किया है, इतने माइक्रो लेवल का डिजाइन करके पुल बनाया है, मैं एक इंजीनियर का विद्यार्थी इसलिए मैं समझ सकता हूँ कि चार पैर का जो वजन होता है वह जब डिस्टीब्यूट होता है, और दो पैरों का जो वजन होता है वह डिस्टीब्यूट नहीं होता है, तो धरती पर वजन दो पैरों का ज्यादा होता है चार पैर का बहुत कम, और बंदर दुनिया में बहुत अद्भुत चार पैर वाला है जिसका वजन सबसे कम पड़ता है। बंदर के अलावा जितने भी चार पैर वाले हैं जैसे शेर है चीता है, बब्बर शेर है, जिनमें वजन कई गुना ज्यादा है तो आप कहेंगे कि बंदर का साइज तो बहुत कम है बंदर के बराबर जितने भी जानवर हैं, उनका भी वजन धरती पर ज्यादा पड़ता है लेकिन बंदर का नहीं पड़ता क्योंकि बंदर पूरा पंजा कभी नहीं रखता है उंगलियों के पोरों से जंप लगाता है, और उसमें लगातार क्षमता है कूदने की, तो नल नील कहते हैं हमारी सेना में तो वानर ज्यादा है इसलिए चिंता मत करो यह पार जाएंगे लेकिन उधर से आएंये तो डूब जाएंगे, ऐसी डिजाइन हमने तैयार की है”।
श्री राम पूछ रहे हैं “इसकी दूसरी विशेषता बताओ”
नल-नील – “दूसरी विशेषता यह है कि अगर यह पुल बनेगा तो जब तक आप नहीं कहेंगे तब तक यह टूटेगा नहीं तो”
श्री राम – “मेरे कहने से मतलब”
नल-नील - “आपके जो बाण हैं इनमें एक ही बाण ऐसा है जो इसको तोड़ने की शक्ति रखता है बाकी से टूटने वाला नहीं, वह जब तक आप नहीं चलाएंगे तब तक टूटने वाला नहीं” तो पूछ रहे हैं क्यों? तो नल नील कह रहे हैं “हमने जो केमिकल लगाया है इसमें वह एक कैलकुलेशन करके लगाया है कि उसका रिएक्शन राम के बाण से ही हो बाकी किसी बाण से नहीं हो। तो खोज कर ऐसा केमिकल लाए।
आप जानते हैं कि बाण के सामने जो तीर की नोक होती है उसमें केमिकल लगाकर ही चलाए जाते हैं तो उनको मालूम है कि राम के बाण में किस तरीके के केमिकल है और पुल में किस तरीके के केमिकल इस्तेमाल करने हैं और किस तरीके के नहीं करने हैं, फिर वह कहते हैं कि हां हम इस पुल से जाएंगे और वापस जब आएंगे तो यह कितने दिन टिकने वाला है, तो वह कहते जब तक आप चाहे तब, अगर आप चाहेंगे तो हम लोग लौटने के बाद इसको खत्म कर देंगे, इस तरीके की विशेषताओं वाला पुल बनाकर वह गए हैं लंका में, और रावण को मार कर लौटे हैं, लौटने के बाद विभीषण को को बात कहकर जा रहे हैं उनमें से एक यह है, कि यह तुम्हारी इच्छा है इस पुल को चाहो तो तुम रखो, चाहो तो इस पुल को तोड़ दो, बाण मेरा यह है जब चाहे जब मेरा स्मरण करके इसको तोड़ दो। विभीषण को राजा बना दिया उसको उसकी गद्दी सौंप दी, अब विदा ले रहे हैं तो विभीषण पूछ रहा है कि “इसको कैसे चलाऊं अपने राज्य को? तो भगवान राम एक ही बात कहते हैं, “देखो, अभी मैंने सत्ता का हस्ताक्षरण करवाया है, प्रशासन व्यवस्था वही है, जो रावण के जमाने की है, जब तक तुम इस पूरी प्रशासनिक व्यवस्था को नहीं बदलोगे, तो तुम्हारे राज्य की किसी समस्या का समाधान नहीं होगा। ट्रांसफर ऑफ पॉवर हुआ है रावण की
सत्ता, विभीषण को मिली, लेकिन रावण का राज्य वैसा का वैसा ही है इसके मंत्री, इसके महामंत्री, इसके बाद इसके खजांची, इसके अधिकारी, इसकी सेना, इसका सेनापति, यह सब वैसे के वैसे ही है, अगर तुम चाहो तो इनको बदलो तो तुम्हारे राज्य की समस्याएं हल होगी अगर तुमने इन प्रशासनिक व्यवस्था को नहीं बदला तो एक भी समस्या का समाधान नहीं होगा ,और मैं यह कह सकता हूँ कि समस्याएं बढ़ेंगी, तो वह पूछ रहे हैं कि यह आप कैसे कह रहे हैं? तो उन्होंने कहा कि देखो रावण ने अपना राज्य स्थापित किया उसके आधार पर है धर्म को अधर्म बनाया और धार्मिक कार्य को अधार्मिक बनाकर उसने परिवर्तन करा दिया अगर यही कानून कायदे चलाये गए तो तुम्हारी प्रजा को कोई लाभ नहीं मिलेगा, तुम मजा कर सकते हो लेकिन प्रजा की समस्या वैसे ही रहेगी, अब तुम फैसला करो कि तुम्हें प्रजा का राजा होना है या गद्दी का । तो विभीषण कह रहे हैं कि मैं तो प्रजा का राजा होना चाहता हूँ, तो राम कह रहे हैं कि सबसे पहला काम करो रावण के बनाये हुए कायदे कानून और नियम सब खत्म करो, जला दो, नए नियम कानून बनाओ और ऐसे नियम कानून बनाओ जो सनातन पर आधारित हो, ऐसा सत्य नहीं जो आज है और कल बदल जाए, ऐसा सत्य है जो हजारों साल पहले था हजारों साल रहेगा और राम कहते हैं किसी भी राज्य की सत्ता का हस्ताक्षरण हो और राज्य की व्यवस्था ना बदले तो उस राज्य या उस देश की समस्या का समाधान नहीं होता ।
भारत की समस्याओं को मैं भी इसी तरह देखता हूँ अब श्री राम जी की बात करें 15 अगस्त 1947 को भारत में सत्ता का हस्तांतरण हुआ लॉर्ड माउंटबेटन के हाथ से सत्ता निकलकर पंडित जवाहरलाल नेहरू के हाथ में आ गए, बाकी क्या बदला? अंग्रेजों ने भारत का जो लूटमार करने के 34735 कानून बनाए वह सब के सब भारत की आजादी के बाद भी चल रहे हैं, तो श्री राम जी के शब्दों के अनुसार भारत की किसी भी समस्या का समाधान नहीं होगा, क्योंकि व्यवस्था वही है जो रावण के समय थी रावण का समय, माने अंग्रेजों का समय, और रावण का ही राज्य था, एक भी कानून नहीं बदला अंग्रेज माने रावण, मैं बिल्कुल स्पष्ट कह रहा हूँ रावण और अंग्रेजों में कोई अंतर नहीं था, तो रावण ने और अंग्रेजो ने जो कानून बनाए सीआरपीसी, सीपीसी, सब के सब वैसे के वैसे ही चल रहे हैं, अंग्रेजों ने कानून बनाये इंडियन पुलिस एक्ट, वो वैसा का वैसा ही चल रहा है, अंग्रेजों ने कानून बनाया लैंड रेवेन्यू एक्ट, वैसे ही आज चल रहा है ,और अंग्रेजों के बनाए राज्य स्तर पर वह सब कानून वैसे के वैसे ही चल रहे इसलिए भारत की कोई भी समस्या का समाधान आजादी मिलने के 60 साल बाद भी नहीं हो रहा है । गरीबी आजादी के साल में जितनी थी उससे बढ़ी है कम नहीं हुई । 1947 में हम आजाद हुए तो भारत में चार करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे थे अब सन 2006 में 40 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे है।
अब आप कहोगे की जनसंख्या बढ़ गई है जनसंख्या तो बहुत थोड़ी बड़ी है 1947 में हम 34 करोड़ थे अब हम 108 करोड़ हो गए जनसंख्या पर 3 गुना बढ़ी है और गरीबी 10 गुना बढ़ी है आजादी के साल में हमारे देश में बेरोजगारों की संख्या 2 करोड़ थी अब 2006 में 20 करोड़ हुई है, तो बेरोजगारी भी बढ़ी है, गरीबी भी बढ़ी है, आजादी के साल में जितना भ्रष्टाचार था उससे हजारों गुना भ्रष्टाचार बढ़ा है, यह हम सब मानते हैं आजादी के
साल में जितनी महंगाई थी, उससे हजारों गुणा महंगाई बढ़ी है, आजादी के साल के कुछ आंकड़े बताता हूँ आजादी के साल में 1 रुपये में 50 किलो गेहूँ मिलता था, आज 50 किलो गेहूँ 300 रुपये में मिलेगा या 350 रुपये में । आजादी के साल में एक रुपये में 2 किलो शुद्ध गाय का घी मिलता है अब 2 किलो घी ढूँढने जाओ तो 800 रुपये तक से नीचे नहीं मिलेगा मिलावट वाला 400 रुपये का । आजादी के साल में किसी के भी घर में 20 रुपये इकट्ठा हो जाए तो सोना खरीद लेते थे, अब 10 ग्राम सोना खरीदने के लिए कम से कम 10000 रुपये हो तब कल्पना हो सकती है, आजादी के साल में किसी भी कर्मचारी की पगार 20 रुपये होती थी तो 12 रुपये में घर का खर्चा चलता था और 8 रुपये बचा लेता था और सुखी रहता था अब आजादी के 50 साल बाद 10000 रुपये महीने की पगार मिल जाए तो भी उसका खर्च नहीं चलता महंगाई बहुत बढ़ी है, गरीबी बहुत बढ़ी, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार बहुत बढ़ा और आजादी के साल में भारत की सरकार बोलती है 33% भारतीय जमीन पर जंगल था, अब आजादी के 60 साल के बाद 17% पर ही जंगल रह गया, मतलब आधे जंगल खत्म हो गए आजादी के बाद यह सच्चाई के साथ भारत में इंडियन फॉरेस्ट है फिर भी जंगल साफ होते चले जा रहे हैं, फॉरेस्ट डिपार्टमेंट है जिस पर करोड़ों रुपए खर्च होते हैं हर साल सरकार के, लेकिन जंगल नहीं बढ़ रहे, कम हो रहे हैं । आजादी के बाद पर्यावरण का प्रदूषण बढ़ा है, आजादी के बाद पानी का प्रदूषण बढ़ा है, आजादी के साल में जो गंगा पथ गामिनी होती थी जिसका गंगाजल पीकर हम पवित्र मानते थे, आज उस गंगा की हालत कही-कही ऐसी है कि आप पानी छूने की हिम्मत ना करें नहाना तो दूर की बात है, इतना मैला कर दिया, और जमुना तो इतनी मैली हो गई है कि कीचड़ ही कीचड़ दिखाई देता है पानी नहीं है नदियों का नाश हुआ है, समुंदरों का नाश हुआ है, आजादी के साल में भारत में लगभग लगभग 6 लाख तालाब और तलैया थे आज आजादी के 60 साल के बाद उसमें आधे से ज्यादा बंद हो गए हैं या सरकारों ने उनकी जमीन हड़प ली है, और बिल्डिंग खड़ी कर दी है, या लैंड माफिया वाले लोगों के अधिकार में वह तालाब चले गए, किसी भी शहर में देख लो एक भी समस्या हल नहीं हो रही है हर समस्या का रूप बढ़ता ही जा रहा है, शायद श्री राम जी जो विभीषण को कह रहे हैं देखो सत्ता हस्ताक्षर मात्र किसी भी राज्य का समाधान नहीं होता व्यवस्था बदलने चाहिए तब राज्य की व्यवस्था समस्या खत्म होती है यदि श्रीराम से हमने इतना ही सीख लिया होता की सत्ता हस्ताक्षर ही नहीं है व्यवस्था भी बदलो तो शायद भारत की समस्याओं का समाधान 60 साल में हो गया होता और अब श्री राम जी की कथा से बार-बार यह स्पष्ट हो गया है कि भारत की कोई भी समस्या का समाधान करना है तो सत्ता बदलने से नहीं होगा व्यवस्था बदलने से होगा, हम एक पार्टी को चुनकर लाए उसको हटाकर दूसरी लाए, दूसरे को हटाकर तीसरी लाए, तीसरी से चौथी को लाए, कुछ होने वाला नहीं । बड़े-बड़े महान लोगों को प्रधानमंत्री बनाए कुछ फायदा नहीं जब तक व्यवस्था नहीं बदलेगी । कितना भी अच्छा कोई प्रधानमंत्री बिठा दो उसमें से कुछ निकलने वाला नहीं, क्योंकि यह मैंने नहीं कहा लाखों साल पहले श्री राम जी बोलकर गए हैं । रामराज्य की बात हम करें कि रामराज्य स्थापित करना है तो पहला ही सूत्र शुरू होगा कि भारत का व्यवस्था परिवर्तन करना होगा, तब भारत में राम राज्य
आएगा वरना यह रावण राज यही चलता जाएगा जो अंग्रेजों ने चलाया था अब वही काले अंग्रेज चला रहे हैं बस इतना ही अंतर है, पहले गोरे अंग्रेज चला रहे थे, अब काले अंग्रेज चला रहे हैं, अभी इसके बाद मैं श्री राम जी की कथा में एक ऐसे अंश पर आता हूँ जो बीच का अंश है जिसको मैंने बाद के लिए रखा था, राम जी की कथा में एक स्थान पर ऐसा है जब वह वन चले गए और उनके पिताजी का स्वर्गवास हो गया तो उनके छोटे भाई भरत राम जी के पास आए और उनसे कहे कि चलो भाई वापस आपकी गद्दी, आप संभालो पिता जी का स्वर्गवास हो गया है, तो राम और भरत का संवाद है और मेरा मानना यह है कि भारत की सभी राम कथाओं का सबसे केंद्रीय स्थान अगर कोई है, तो वह राम भरत संवाद है इसमें आप सब कुछ समझ सकते हैं पूरी दुनिया पूरा ब्रह्मांड पूरी व्यवस्था है, सब इसी में समाहित है भरत राम का संवाद अगर रामचरितमानस में पढ़ना हो तो अयोध्या कांड में है वाल्मीकि रामायण में पढ़ना हो तो वहां भी है, रघुवंशम जो कालिदास की सबसे सुंदर कृति है उसमें एक सर्ग है 12 नंबर का सर्ग, उसमें भरत राम संवाद है और 12वीं सर्ग का एक उपसर्ग है, जिसको श्री कालिदास ने नाम दिया है कश्चित् सर्ग अद्भुत है, कंबन रामायण में बहुत विस्तार से है, कालिदास का रघुवंशम बहुत विस्तार से है, राम चरित्र मानस में थोड़ा संक्षेप में है, वाल्मीकि रामायण में थोड़ा विस्तार में है, यह जो सर्ग है बहुत ही अद्भुत है। मैं मानता हूँ की राम कथा में इससे अच्छा कोई अंश नहीं है। इसमें राम से मिलने के लिए जब भरत आते हैं, और बताते हैं कि पिताजी की मृत्यु हो गई है, राज्य को चलाना मेरे लिए तो मुश्किल है, आपको चलना पड़ेगा, तो राम जी उनसे कई प्रश्न पूछ रहे हैं, और सारे प्रश्न हमें बताते हैं कि राम राज्य कैसा होता है? और महात्मा गाँधी ने इसी राम-राज्य की बात कही है, तो भरत आये, हाल-चाल पूछा, गले लगकर रोये, फिर शान्ति के साथ बैठे हैं भरत। और राम जी का पहला प्रश्न जो भरत से पूछ रहे हैं वो यह कि “तुम जिस राज्य से आये हो आयोध्या का राज्य, तुम कहते हो कि राम का राज्य है, मेरा राज्य है, तो मैं पूछता हूँ, कि इस राज्य को चलाने के लिए, नीति, नियम, कानून के बारे में मैं प्रश्न करता हूँ, तुम उनका उत्तर ‘हाँ’ में देते हो तो मैं मानूंगा, कि वो राम राज्य है और ‘ना’ में दे रहे तो मैं नहीं मानता कि वो राम-राज्य है।
भरत – “आप प्रश्न पूछिए, जितनी मेरी हैसियत है, क्षमता है, मैं दूंगा”
श्री राम – “तुम अपने राज्य के आचार्यों का, गुरुओं का, वैद्यों का, पुरोहितों का, अग्रजों का ऐसा ही सम्मान करते हो, जैसा मैं करता था”?
भरत – “हाँ, मेरी कोशिश तो यही है, कि मैं सभी अग्रजों का सम्मान करूँ, मेरी कोशिश तो यही है, मैं मेरे गुरुओं का सम्मान करूँ, मैं कोशिश यही करता हूँ कि आचार्य का सम्मान करूँ, लेकिन पुरोहित के बारे में मुझे थोड़ी आशंका रहती है”
श्री राम – “क्यों इसमें आशंका क्या है? पुरोहितो तो कर्मकांड ही कराते हैं, तो तुमने क्या मान लिया वह गुरुओं से नीचे है? क्या वह आचार्यों से कम है”?
भरत – “मेरे मन में कभी कभी ऐसा प्रश्न आता है कि पुरोहितों को इतना ही सम्मान क्यों देना जितना आचार्य को जितना गुरुओं को जितना किसी और, क्योंकि हम मानते हैं भगवान तो घट-घट में हैं, ईश्वर तो हर कण में व्याप्त है पुरोहित कर्मकांड की तरफ लेकर जाते हैं और तरीके बता देते है पूजा के, जबकि ईश्वर तो कण-कण में हैं, घट-घट में है, भावना से ईश्वर है, पुरोहिताई में क्या है”?
रामजी का उत्तर सुनिए वह कहते हैं।
श्री राम – “देखो भरत यह पुरोहित तुम्हारे राज्य की अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी है जरा समझो इस बात को रीढ़ की हड्डी है, पूरी अर्थव्यवस्था इन पुरोहितों के दम से चलती है”
भरत कहते हैं “समझ में नहीं आ रहा” तब राम कह रहे हैं “धर्मस्य मूलम अर्थम, अर्थस्य मूलं कामम” और इसी बात को राम जी के जाने के कुछ लाख साल के बाद चाणक्य बोल कर गए ‘धर्मस्य मूलम अर्थम, अर्थस्य मूलं कामम’। पहले मुझे ऐसा लगता था जब तक मैंने कंब रामायण नहीं पढ़ी थी, और यह रघुवंशम नहीं पढ़ी थी तो मैं मानता था धर्मस्य मूलम अर्थम, अर्थस्य मूलं कामम, इसके मूल रचयिता चाणक्य है, जो बड़े अर्थशास्त्री रहे इस देश में। लेकिन अब पता चला है कि चाणक्य से लाखों साल पहले रामचंद्र जी यह कह रहे हैं वह कहते हैं कि अगर तुम्हारी अर्थव्यवस्था मजबूत है तो धर्म मजबूत होगा और अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में पुरोहितों का सबसे बड़ा योगदान है तो फिर भी भरत को समझ में नहीं आ रहा तो रामचंद्र जी और उदाहरण देकर कहते हैं कि “देखो पुरोहित क्या करता है पुरोहित पूजा करता है और पूजा करवाता है किसी कथा की, सत्यनारायण की, जो भी करवाता है, लेकिन एक लिस्ट बनाता है, कि 10 घंटे ले आना एकदम कोरे होने चाहिए, 20 मीटर कपड़ा ले आना एकदम नया होना चाहिए, इतनी चूड़ियां ले आना बिना पहनी हुई होनी चाहिए, 10 किलो घी ले आना, यह सामग्री ले आना, यह ले आना, ऐसा-वैसा कर लेना”। मैंने यह एक रामायण में लिस्ट देखी तो कम से कम 108 थी, राम समझा रहे देखो “जब पूजा भगवान की कराएगा वह तो भावना से भी हो सकती है लेकिन जान पूछ कर वह वही चीजें बताएगा क्योंकि कारीगर जो इन चीजों को बनाएगा वह भी तो चाहिए”, उस दिन मेरे समझ में आया श्री राम जी की परिभाषा की पुरोहित मार्केटिंग मैनेजर होते हैं। अब समझ में आया इनसे बड़ा मार्केटिंग मैनेजर कौन होगा? अब देखो वह कह रहे हैं घंटे ले आना कुम्हार का काम बढ़ा कि नहीं, फिर घंटे के ऊपर ढकने के लिए ढक्कन और ले आना, तो कुम्हार का काम और बढ़ा, बिक्री बढ़ी, फिर कहते हैं कुल्लड़ ले आना उस पर प्रसाद रखेंगे तो मिट्टी में पवित्रता होती है, पवित्रता तो हर चीजों में होती है लेकिन मिट्टी के नए-नए बर्तन पूजा में लाएगा और ऐसी और सैकड़ों पूजा होती जाएगी तो कुम्हारों का काम जिंदगी भर चलता रहेगा, तो कारीगरों को जिंदा रखना है तो वह पुरोहित ही है वह नए-नए कपड़े मंगाते हैं तो जुलाहो का काम चलेगा, बुनकरों का काम चलेगा, धुनकरो का काम चलेगा, वह बांस मगवायेगा, नया-नया घी मगवाया जायेगा, जिससे यज्ञ कराना है तो घी बनाने वालों का काम चलेगा, उनकी गाय की संख्या बढ़ेगी
क्योंकि घी बिकेगा और घी को जलाकर फूँक देना है ताकि नया घी हमेशा बनता रहेगा”, यह बहुत दूर की बात है तो राम जब इस बात को बहुत विस्तार से समझाते हैं, तब भरत कहते हैं, “क्षमा करना भाई मुझे यह समझ में नहीं आता था, अब पता चल गया है कि पुरोहित राज्य व्यवस्था के अर्थ को समझते हैं, इसलिए वह भी आचार्य और गुरुओं के समकक्ष हैं, तो राम कहते हैं “देखो कभी कभी ऐसा हो जाए कि गुरुओं का सम्मान कुछ कम हो या आचार्यों का कम हो जाए लेकिन पुरोहितों का कम नहीं होने देना है, क्योंकि यह है तो राज्य की अर्थव्यवस्था है, अर्थव्यवस्था मजबूत है तो धन टिकेगा, धन टिकेगा तो राज्य बढेगा”। यह प्रसंग हमारी आंखें खोलने वाला है आज तक हमारे देश में पुरोहितों को गाली देने का काम आधुनिक पढ़े-लिखे लोगों ने बहुत किया है कि यह पौगा है ऐसे शंख बजाते हैं, ऐसे घंटे बजा देते हैं, यहाँ हमको इतना ही दिखाई देता है इसके आगे का कुछ दिखाई नहीं देता, कि वह कितनी बड़ी इकोनॉमी चला रहे हैं और राम आगे का प्रश्न पूछ रहे हैं कि “पुरोहित का सम्मान करो उनका ध्यान रखना कि वे कभी पैसें के लिए कुछ ना करते हो”, एक पुरोहित ऐसे आए जो पैसा लेकर पूजा कराते हैं तो राम कहते हैं कि “ऐसा पुरोहित है तो उनका सम्मान करने की जरूरत नहीं है क्योंकि जो ज्यादा पैसा देगा वह उसी का माल की बिक्री बढ़ जाएगी इसलिए पुरोहित उन्हीं का सम्मान करना है, जब पैसा खुद ना लेते हो और कारीगरों का माल भी बिकवाने में मदद करें, तो बिना पैसे लिए जो पूजा कराएँ वह पुरोहित है, पैसे लेकर जो कराएँ राम उसको अच्छा नहीं मानते तो अगला ही प्रश्न वह कहते हैं कि क्या तुम्हारे राज्य के पुरोहित पैसा लेकर पूजा कराते हैं अगर कराते हैं तो उनको किनारे रख दो तो भरत कह रहे हैं कि “मैं यहाँ से लौटकर ऐसे ही व्यवस्था कर लूँगा जो बिना पैसे के पूजा कराएँ” तो राम कह रहे हैं कि “पुरोहित को तो जिस घर में पूजा करानी है वहाँ का पानी भी ग्रहण नहीं करना चाहिए, क्योंकि जो बड़ा काम वह करने जा रहा है और घर का पानी-पीने लगे खाना ही खाना लगे तो लालच भाव आएगा और वह अपनी पुरोहिताई से दूर हो जाएगा अब इसको जरा समझे थोड़े विस्तार में की पुरोहित पूजा कराने वाले के घर खाना ना खाए, पानी ना पिए, अंग्रेजों ने इसी को प्रचार किया है कि छुआछूत मचाते हैं पानी भी नहीं पीते, मूर्ख अंग्रेजों को पता नहीं था कि वह श्रीराम की किसी बात का पालन करते हैं जिसके घर पूजा कराते उसके घर पानी भी नहीं पीना, पानी कहीं और जाकर पीना है। अंग्रेजों ने इसको छुआछूत से जोड़ दिया और हिंदुस्तान के कुछ मूर्ख इतिहासकारों ने उस पर पुस्तकों पर पुस्तक लिख डाली कि ये छुआछूत मचाते हैं, यह तो गरीबों के घर का पानी नहीं पीते, यह तो नीची जाति और ऊँची जाति करते रहते हैं, यह ऊँची-नीची जाति का प्रश्न नहीं, था जिनके घर पूजा कराने गये हैं, वह कोई भी जाति का हो, कोई भी संप्रदाय का हो, वहाँ पर पानी नहीं पीना है, भोजन नहीं ग्रहण करना है, दक्षिणा नहीं लेनी है, प्रसाद नहीं लेना है, यह श्री राम बोल कर गए तो उनका पालन करते हैं, फिर आगे का प्रश्न वह पूछते हैं “भरत तुम सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठते हो”? तो भरत कहते “हां”
श्री राम – “वही काम करते हो जो मैं करता हूँ, प्रजा के बीच जाते हो वहां जाकर उनका दुख-दर्द सुनते हो उनका हाल-चाल लेते हो लौट कर आ कर मंत्री मंडल की मीटिंग बुलाकर उसमें बात करते हो या नहीं करते”।
भरत – “हां मैं नियमित रूप से करता हूँ लेकिन कोई-कोई दिन प्रमाद आ जाता है मैं सुबह नहीं उठ पाता क्योंकि मेरे कुछ पुराने संस्कार है जो नाना के यहां से आए हैं तो उनके चलते कभी-कभी होता है तो राम कहते हैं “अब तुम राजा हो सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठना बिना अवरोध के प्रजा के बीच जाकर दुख दर्द सुनना” तो श्री राम कहते हैं, “तुम राम राज्य के अधिकारी हो तो राम राज्य की परिभाषा है, कि राजा हमेशा प्रजा के बीच में जाकर दुख-दर्द ले”।
भारत का कौन सा प्रधानमंत्री सुबह-सुबह प्रजा के बीच में जाता है? कोई जो प्रतिदिन प्रजा के बीच जाकर उनका दुख दर्द सुनकर आए, गलती से कोई हेलीकॉप्टर में बैठकर आते हैं तो बाढ़ राहत का काम देखने के लिए, जो दिखाई नहीं देता इतनी ऊंचाई से। अभी मैंने सुना है कि राजस्थान में 100 साल का रिकॉर्ड टूटा है बाढ़ का तो यहां के जो राजा है मुख्यमंत्री वह हेलीकॉप्टर में बैठकर ऐसे-ऐसे स्थानों में गए जहां बाढ़ ही नहीं आई थी, तो पत्रकार को पूछा गया कि तुम भी तो बैठे थे मुख्यमंत्री के साथ, तो कहा कि हां बैठे था, तो तुमने क्यों नहीं बताया, तो उसने कहा जो बताने के लिए कहा गया था उतना ही बताया, तो हमारे मंत्री महोदय, मुख्यमंत्री महोदय, प्रधानमंत्री महोदय, राज्यपाल महोदय, प्रजा के बीच में तो नहीं जाते, वो तो उड़न खटोले पर बैठे रहते हैं कहीं धूम टहल के चक्कर लगाते आ जाते हैं जहाँ बाढ़ राहत का काम होता रहता है। साल भर ऐसे ही चलता रहता है, राम कहते हैं कि “राजा को हमेशा प्रजा के बीच में ब्रह्म मुहूर्त में उठकर जाना चाहिए”, कौन प्रधानमंत्री ब्रह्म मुहूर्त में उठता है? हिंदुस्तान का पता नहीं कितने प्रधानमंत्री आए थे, रात भर दारू पीते सुबह उठने का तो प्रश्न ही नहीं है, कितने मुख्यमंत्री है जो दारू में ही डूबे रहते हैं, फिर वह आगे का प्रश्न पूछ रहे हैं कि “तुम तुम्हारे जो एडवाइजर(सलाहकार) है इनमें से किस पर भरोसा करते हो जो पैसे लेकर काम करते हैं या जो अवैतनिक सेवाएं करते हैं”। एडवाइजर दो तरीके के हैं एक तो वह जिनको पगार देते हैं, एक ऐसे हैं जो बिना पगार के काम करते हैं, तो भरत कहते हैं, “मैं तो ज्यादा भरोसा उन पर करता हूँ जो बिना पगार के कार्य करते हैं”। तो श्रीराम कहते हैं कि, “वही सही सलाह देंगे, जो तुमसे धन ले गए या संपत्ति ले गए वह तुम्हारा मूड देखेंगे, कि तुम क्या चाहते हो वही बोलेंगे।”,
तो आजकल हमारे देश में कोई प्रधानमंत्री अवैतनिक सलाहकार रखता ही नहीं है, सब वैतनिक सलाहकार है, मंत्रियों की सुविधाएं सभी सलाहकारों को है। तो प्रधानमंत्री को ऐसी सलाह देते हैं, जो प्रधानमंत्री चाहते हैं वैसे ही देश चलता है।
फिर राम जी आगे कह रहे हैं कि “जब तुम मंत्रिमंडल की बैठक करते हो तो कोई मंत्री ऐसा तो नहीं जो अंदर की बात बाहर जाकर बोलता हो,
तो भरत कह रहे हैं कि “नहीं! मेरे राज्य के मंत्रिमंडल में तो नहीं”।
तो राम कहते हैं कि “ध्यान रखना अगर मंत्रिमंडल के अंदर की बात बाहर गई तो राज्य चल नहीं पायेगा”।
जब हमारे हिंदुस्तान में कैबिनेट की मीटिंग चल रही होती है तो अंदर से कोई आ जाता है और न्यूज़ पेपर वालों को खबर देकर चला जाता है। एकदम से खबर अगले दिन हेड लाइन में आ जाती है, सब एक दूसरे पर आरोप लगाते हैं की खबर कहाँ से ली हुई? हमें तो नहीं मालूम।
तो राम कहते हैं कि “अंदर के कोई फैसले बाहर लीक होते हैं तो ऐसे मंत्रियों को रखना नहीं तुरंत निकाल कर बाहर कर देना” फिर आगे वह पूछते हैं कि “तुम कभी भी कोई योजना बनाते हो तो धन की व्यवस्था कैसे करते हो? क्या प्रजा के ऊपर टैक्स लगाते हो नहीं? कर लगाते हो या अपने राज्य का फालतू खर्च कम करके उससे योजना बनाते हो?” तो भरत कह रहे हैं कि “मैं कोशिश करता हूँ कि मेरे राज्य के फालतू खर्च कम करके और इसी से प्रजा की भलाई के काम करूँ, नए टैक्स लगाने में मुझे विश्वास नहीं है, क्योंकि आप मानते हो ज्यादा टैक्स अच्छे नहीं है”।
आजादी के समय में सरकार 12-13 तरह के टैक्स लेती थी, अब आजादी के 60 साल बाद 63 टैक्स हो चुके हैं और फिर भी वित्त मंत्री का पेट नहीं भरता, हर समय कहते हैं और टैक्स लाओ और टैक्स लाओ, हर दिन उनका स्टेटमेंट होता है, ज्यादा से ज्यादा लोगों को इनकम टैक्स में फंसा दो, 7.5 लाख करोड़ रुपए हम हर साल टैक्स में भरते हैं, फिर भी सरकार का पेट नहीं भरता।
राम जी कहते हैं कि “फालतू खर्च कम करो उससे प्रजा का विकास करो।”
आज की सरकार के 90% खर्च फालतू है, यह सरकार खुद कहती है। फालतू खर्च माने प्रधानमंत्री की पगार, प्रधानमंत्री का वेतन, प्रधानमंत्री के मंत्रिमंडल का वेतन, राष्ट्रपति का वेतन, मुख्यमंत्रियों का वेतन, राज्यपालों का वेतन, सरकारी अधिकारियों का वेतन, कर्मचारियों का वेतन, जिससे विकास का कोई काम नहीं। हमारी सरकार के कुल खर्च का 90% यही खर्च है, मात्र 10% खर्च उपयोग किया जाता है।
राम जी उल्टा कह रहे हैं वह भरत को कह रहे हैं कि “10% खर्च तो अपना होना चाहिए और 90% खर्च प्रजा के ऊपर होना चाहिए”।
अब श्री राम जी की कल्पना में मैं बजट बना रहा हूँ राम राज्य का बजट और अगले साल उस पर बात करूँगा, ऐसा बजट होना चाहिए जिसमें 10% खर्च फालतू का हो, सरकार का हो, बाकी 90% खर्च विकास पर हो, तो बजट ऐसा होना चाहिए, बजट ऐसा तो नहीं कि उनके राज्य में बचत नहीं होता होगा, तब समझ में आएगा कि राम राज्य का बजट कैसा होगा? फिर वह कहते हैं कि “तुम्हारी जो सुरक्षा व्यवस्था है वह तुम्हारे कुल खर्च से 15% के ज्यादा नहीं होनी चाहिए, अधिक से अधिक और कम से कम 5% रहना चाहिए फिर वह आगे कह रहे हैं कि “तुम तुम्हारे राज्य के अधिकारियों और मंत्रियों में कालिटी देखते हो या चापलूसी गुण देखते हो, या उनकी चापलूसी वह तुम्हारे आगे पीछे हां जी -
हां जी करते घूमते हैं, ऐसे लोगों को मंत्री बनाते हो या जो तुम्हारे गलत को गलत कहे सही को सही कहे और तुम्हें सही सलाह दे ऐसे लोगों को मंत्री बनाते हो? तो भरत कहते हैं “हां मैं कोशिश तो करता हूँ बिना चापलूसी करने वालों को मंत्री बनाता हूँ।”
फिर वह आगे पूछ रहे हैं कि “तुम्हारे राज्य में भ्रष्टाचार कितना है”?
तब भरत कह रहे हैं “मेरे राज्य का कुल खर्चा का 1% या उससे कम भ्रष्टाचार है”।
तो राम कहते हैं कि “3% से ऊपर नहीं जाना चाहिए अगर गया तो राज्य व्यवस्था पूरी बदलनी पड़ेगी करप्शन है, लेकिन 3% के ऊपर नहीं।” आज हमारे देश में कुल खर्च का 70% करप्शन है, आज की तारीख में।
फिर राम जी पूछ रहे हैं कि “तुम तुम्हारे राज्य में जो लोग चोरी करते हैं अपराध करते हैं, बेईमानी करते हैं, उनको दण्ड देते हो या नहीं?
तो भरत कहते हैं “दण्ड तो देता हूँ, लेकिन जेल में देता हूँ”।
तो राम जी कह रहे हैं, “दण्ड जेल में नहीं खुले में मिलना चाहिए, मुकदमा जेल में चलना चाहिए”। वह कह रहे हैं जिसको भी दण्ड दो खुले में दो, ताकि प्रजा को मालूम हो कि इस बेईमानी का, इस चोरी का यह दंड है, मुकदमा जेल में चलाओ।”
अभी यहां क्या होता है? दण्ड जेल में होता है, मुकदमा खुले में चलता है। माने रामराज्य का बिल्कुल उल्टा, रावण राज्य का इंसाफ।
राम पूछ रहे हैं कि “तुम प्रजा से सुझाव मांगते हो, अपने बारे में या अपने राज्य के बारे में? तो प्रजा क्या कहती है”?
भरत कहते हैं कि “नियमित रूप से सुझाव लेता हूँ”
राम कहते हैं तो “ठीक है! तो फिर वह पूछ रहे हैं तुम तुम्हारे मंत्रियों का ज्यादा समय प्रमाद में मनोरंजन में, या मौज मस्ती में, तो नहीं बीतता”
भरत कह रहे हैं कि “नहीं! मेरे सब मंत्री मेहनत से काम करते हैं, कोई मनोरंजन नहीं करता, कोई मौज मजा नहीं लेता”,
राम जी ने कहा “यह आपके लिए नहीं है, यह प्रजा के लिए है, राजा को नहीं करना”।
फिर वह आज हमारे यहां क्या होता है? प्रधानमंत्री महीने-महीने भर की छुट्टी पर चले गए यूरोप के यात्रा पर चले गए, राष्ट्रपति चले गए, मुख्यमंत्री चले गए, राज्यपाल चले गए।
राम जी बोल कर गए कि राजा को नहीं करना यह काम प्रजा करें तो ठीक, राजा तो कर ही नहीं सकता, सोच भी नहीं सकता,
फिर वह आगे प्रश्न पूछ रहे हैं कि “क्या तुम्हारी सेना तुम्हारे पूरे अधिकार में है? क्या तुम्हारी सेना तुम्हारे सभी आदेशों को मानती है? क्या सेना में तुम्हारे यहां कोई विद्रोह तो नहीं है?
तो भरत कहते हैं “नहीं है!”
श्री राम कहते हैं, “फिर तुम निश्चित हो सकते हो”।
फिर श्री राम कहते हैं की “सेना में जो सैनिक वीरता दिखाते हैं उनको तुम पुरस्कृत करते हो या नहीं”?
भरत – “हां करता हूं”
श्री राम – “तो यह दूसरों के लिए अच्छा है”, फिर वो पूछ रहे हैं कि “जब तुम फैसला लेते हो तो तुम्हारे सब मंत्री एकमत होते हैं या नहीं, आम राय होती है या नहीं”।
तो भरत कह रहे हैं, “नहीं! कभी-कभी ऐसा भी होता है, कि 50 मंत्री एक तरफ होते हैं और 51 एक तरफ, या 49 एक तरफ 51 एक तरफ, तो फिर मैं 51 वालों की बात मान लेता हूं”।
तो राम कहते हैं “यह अच्छा नहीं है, सबको एक राय होना चाहिए, तभी तुम्हारा राज्य ज्यादा दिन तक चल पायेगा”।
हमारी संसद इसी पर चल रही है जो 51 कह दे वह कानून जो 49 कहे वह कानून नहीं, चाहे वह कितना भी सत्य हो। अभी संसद में ज्यादा सांसदों ने कहा “वेतन भत्ते बढ़ाओ”, तो बढ़ा दिया, कुछ अल्पसंख्यक थे जिन्होंने मना किया, तो उनकी किसी ने सुना नहीं।
राम जी कहते हैं “यह माइनॉरिटी या मैजोरिटी नहीं, एक राय होनी चाहिए, आम राय होनी चाहिए, और जब तक आमराय नहीं बने, तब तक फैसला मत करो, बार-बार बैठो बार-बार बैठो, हमारे यहां प्रजातंत्र के सभी सिद्धांतों को श्री राम जी कह कर चले गए, अब यह हमारा दुर्भाग्य है हमने उनको देखा नहीं, रघुवंशम में बहुत सारे प्रिंसिपल है, हमारी सरकार ने अंग्रेजों की नकल करके पार्लियामेंट डेमोक्रेसी लाए, यदि श्री राम की डेमोक्रेसी लाए होती तो सभी शहीदों की आत्मा को शांति मिल गई होती।
ऐसे-ऐसे बहुत अच्छे प्रश्न किए और यह सारे प्रश्न इतने अद्भुत है, कि एक-एक प्रश्न पर मैं आधे घंटे, 1 घंटे बात कर सकता हूं, लेकिन मैं केवल ध्यान में लाना चाहता हूं, कि श्री राम के राज्य की व्यवस्था कैसी है? रामराज्य कैसा है? और रामराज्य कोई कपोल कल्पना नहीं है, ठोस धरातल पर खड़ी हुई एक धारणा है, जिसमें गणतंत्र है प्रजा का, और राम जी यह सब प्रश्नों का उत्तर जब ले लेंते हैं, भरत से फिर कहते हैं कि “तुम यह सब कर ही रहे हो तो रामराज्य ही चला रहे हो, मेरे आने की जरूरत नहीं है, तुम जाओ मेरी जरूरत जब पड़ेगी, जब तुम रास्ते से भटक जाओगे तब वह कहते हैं कि “कम से कम अपनी खड़ाऊ तो दे दो, वही लेकर जाता हूं, तो ठीक है ले जाओ, लेकिन विचार यह है, इसके हिसाब से राज्य चलाओ इससे अलग मत चलाओ।
तो गांधीजी बार-बार बार-बार रामराज्य की कल्पना कर रहे हैं तो यही कल्पना कर रहे हैं, मैंने कोशिश किया है कि यह जो रामराज्य की कल्पना छुटी पड़ी है, क्योंकि इस पर बात नहीं हुई है, चर्चा नहीं हुई है, मैंने तो जितने भी राम कथा कहने वाले सब से बात की किसी ने मुझे संतुष्ट नहीं किया, हर जगह निराशा हाथ लगी, और राम के दूसरे दूसरे रूपों की बहुत चर्चा करते हैं, राम बड़े कोमल है, राम बड़े दयालु है, उनकी आंखें बहुत सुंदर है, उनके हाथ बहुत सुंदर है, और अजान बाहू है, इन बातों में घंटो-घंटो निकाल सकते हैं, आपको रुला सकते हैं, आपके साथ वह भी रो सकते हैं, लेकिन राम की जिंदगी का जो असली कर्म है उस पर बात नहीं करते। कई राम कथा सुनाने वालों के यहां मैं चुपचाप बैठा हूं कि अब कहेंगे अब कहेंगे, लेकिन बात ही नहीं आती, भरत राम संवाद की बात आती है, तो राम ने गले से लगा लिया और राम के आंसू बहने लगे भरत के भी आंसू बहने लगे, लेकिन यह जो मूल बात कर रहे हैं यह सब बोल कर जाते हैं, शायद उनके मन में
इसको कहने की नैतिकता नहीं हो या हिम्मत नहीं हो, क्योंकि आदमी दूसरे को कहता है, उससे ज्यादा अपने को कहता है, जब मैं बोलता हूँ तो मुझे लगता है कि मैं दूसरों से नहीं अपने से बात कर रहा हूँ, क्योंकि कोई भी बोलने से पहले आदमी अपने से बोलता है, शायद वह नहीं बोल पाते और मैं पूरी विनम्रता से कहता हूँ, आज हिंदुस्तान में जो राम कथा हो रही है और राम की कथा नहीं है, वह व्यापार की कथाएं हैं, उसमें कोई आएगा, आपसे डील करेगा, भैया मुझको इतने लाख चाहिए, आप दे सकते हो तो आप कराओ, आप नहीं दे सकते तो मैं दूसरे से बात करता हूँ, यह सुविधाएं चाहिए, यह सुख चाहिए, इतना पैसा चाहिए, इतना चढ़ावा आना चाहिए, उसके बाद ऐसा होना चाहिए, वैसा होना चाहिए, ऐ.सी. होना चाहिए।
फिर रामचंद्र जी के वन गमन की कहानी ऐ.सी. मंच से सुनाएंगे, दुख का पहाड़ टूट पड़ा श्रीराम पर और हम ए.सी. में बैठ कर उनकी कहानी सुनेंगे, कि रामचंद्र जी को यह दुख है, कि रामचंद्र जी को वह दुख है, तो मुझे लगता है कि हम रामराज्य की तरफ तो बढ़ नहीं पा रहे हैं, राम की कथा का व्यवसाय जरूर इस देश में चल पड़ा है, धंधा भी चल पड़ा है, मेरी ऐसी मान्यता है कि इस देश को रामकथा के व्यवसाय से निकाला जाए और इसको राम के राज्य की तरफ ले जाने वाला कोई प्रेरणा पुंज बनाया जाए। मेरा यह मानना है कि 60 साल से राम कथा सुनने के बाद राम जी का चरित्र प्रवेश नहीं करता है, तो इसको सुनने सुनाने से कोई फायदा नहीं है, और मेरा यह मानना है अगर राम कथा सुनाने से देश रामराज्य की ओर बढ़ने की ओर एक कदम उठता है, तो इसमें बहुत सार्थकता है तो मैं राम जी की कथा को इस दृष्टि से देखता हूँ, कि भारत की आज की सभी समस्याओं का समाधान यह करेगी और इस देश में राम राज्य की स्थापना करेगी, तब जाकर इसकी सार्थकता सिद्ध होगी और शायद राम भी यही चाहते थे। अगर वह व्यवसाय और व्यापार वाले व्यक्ति होते तो यह प्रश्न नहीं पूछते कि तुम ऐसे पुरोहितों को सम्मान नहीं करना, जब पैसे के लिए काम करें उनको बाहर करें, ऐसे ही पुरोहितों का सम्मान करना जो किसी के घर का पानी भी ना पिए निस्वार्थ भाव से काम करें, राम आदर्श बने हैं, मर्यादा पुरुषोत्तम बने हैं, तब जब उन्होंने महल छोड़ा सुख छोड़े हैं और अपनी सुविधाएं छोड़ी, साधारण व्यक्ति के कष्टों को सहकर जीवन का अनुभव किया है, और उनके बीच में से ऐसे-ऐसे लोगों को तपस्वी बनाकर खड़ा किया है, जिन्होंने चक्रवर्ती का पद संभाला है, तब वह मर्यादा पुरुषोत्तम बने जब तक उनका महलों का जीवन है, कोई उनको मर्यादा पुरुषोत्तम नहीं कहता, महल छोड़कर वन में चले गए हैं और आदर्श की स्थापना करने में लगे हुए हैं, तब वह मर्यादा पुरुषोत्तम बने हैं, तो हम मर्यादा पुरुषोत्तम राम की बात करें, उनके रामराज्य की बात करें और कुछ कोशिश करें कि कम से कम कुछ सपना तो देखें इस देश में रामराज्य लाना है, जो हमारे शहीदों का अधूरा है, गांधी जी तो कहते थे कि आजादी के बाद कुछ करना है, तो राम राज्य ही लाएंगे तो मैं मानता हूँ कि यदि हम सब मिलकर इस रामराज्य को लाने में थोड़ा भी लग जाए तो कोई मुश्किल नहीं है कि अगले 3-5 वर्षों में राम राज्य नहीं आयेगा, और इस देश के हर नेता से, प्रधानमंत्री से, मुख्यमंत्री से, राज्यपाल से, एक ही प्रश्न पूछें, तुम राम राज्य के लिए कर क्या रहे हो? रामराज्य में 10% खर्चा फालतू, 90% खर्चा प्रजा के लिए होता है, क्या तुम कर रहे हो? नहीं कर रहे हो तो
छोड़ दो कुर्सी, हम किसी ऐसे को लायेगे, राम-राज्य स्थापित करने में मदद करे, तो मैं मानता हूँ इसको, अभियान के रूप में चलाना है, हम लोग कोशिश कर रहे हैं, स्वदेशी अभियान इस देश में चलाने की, लेकिन एक अभियान ऐसा भी चले, जो राम-राज्य की स्थापना इस देश में कराये, मैं राम जी की आखिरी बात आपसे कहता हूँ, जब विभीषण को राम जी राजा बना रहे हैं, सोने की लंका विभीषण को सौंप कर जा रहे हैं, तो विभीषण उनको कहते हैं, कि “आप यही रह सकते हैं, मैं आपके नीचे काम कर सकता हूँ, मुझे कोई तकलीफ नहीं है, आप सम्राट रहे, राजा रहे”।
श्री राम कहते हैं, मेरी जो मातृभूमि है, वह स्वर्ग से भी महान है, इसलिए मुझे लौटना तो मातृभूमि में है, तुम्हारी ये सोने की लंका तुम्हें मुबारक है, मेरे लिए तो ये मिट्टी के समान है, मेरी तो मातृभूमि स्वर्ग से भी महान है, ये बात हम कभी ना भूलें, श्री राम जी की ये बात हमारे हृदय में रहें, हमारी मातृभूमि स्वर्ग से भी महान है, अमेरिका, यूरोप चाहे सोने की लंका हो, वो हमारे लिए मिट्टी की धूल के बराबर हैं, यदि ये बात हमें समझ में आ जाये, श्री राम जी की, तो भारत से गये, 2 करोड़ NRI, एक क्षण में अमेरिका यूरोप छोड़ देगे, और उनकी बुद्धि और पैसे का सारा उपयोग, इस देश के विकास के लिए हो जायेगा, और ये देश सच में सोने की चिट्ठिया बन जायेगा, इसी के साथ मैं सबको प्रणाम करता हूँ, और श्री राम आप सभी को ऐसी प्रेरणा दे, हम सब मिलकर उनके राज्य की स्थापना करने में लग जाये।
धन्यवाद
- राजीव दीक्षित जी
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