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श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ
  • अयोध्याकाण्ड *

३१७

लागि सासु पग कह कर जोरी । छमबि देबि बड़ि अबिनय मोरी ॥ दीन्हि प्रानपति मोहि सिख सोई । जेहि बिधि मोर परम हित होई ॥

सासके पैर लगकर, हाथ जोड़कर कहने लगीं—हे देवि! मेरी इस बड़ी भारी ढिठआईको क्षमा कीजिये। मुझे प्राणपतिने वही शिक्षा दी है जिससे मेरा परम हित हो ॥ ३ ॥

मैं पुनि समुझि दीखि मन माहीं । पिय बियोग सम दुखु जग नाहीं ॥

परन्तु मैंने मनमें समझकर देख लिया कि पतिके वियोगके समान जगत्में कोई दुःख नहीं है ॥ ४ ॥

दो०—प्राननाथ करुनायतन सुंदर सुखद सुजान ।

तुम्ह बिनु रघुकुल कुमुद बिधु सुरपुर नरक समान ॥ ६४ ॥

हे प्राणनाथ! हे दयाके धाम! हे सुन्दर! हे सुखोंके देनेवाले! हे सुजान! हे रघुकुलरूपी कुमुदके खिलावेवाले चन्द्रमा! आपके बिना स्वर्ग भी मेरे लिये नरकके समान है ॥ ६४ ॥

मातु पिता भगिनी प्रिय भाई । प्रिय परिवार सुहृद समुदाई ॥

सासु ससुर गुर सजन सहाई । सुत सुंदर सुशील सुखदाई ॥

माता, पिता, बहन, प्यारा भाई, प्यारा परिवार, मित्रोंका समुदाय, सास, ससुर, गुरु, स्वजन (बन्धु-बान्धव), सहायक और सुन्दर, सुशील और सुख देनेवाला पुत्र— ॥ १ ॥

जहाँ लगि नाथ नेह अरु नाते । पिय बिनु तियहि तरनिहु ते ताते ॥

तनु धनु धामु धरनि पुर राजू । पति बिहीन सबु सोक समाजू ॥

हे नाथ! जहाँतक स्नेह और नाते हैं, पतिके बिना स्त्रीको सभी सूर्यसे भी बढ़कर तपानेवाले हैं। शरीर, धन, घर, पृथ्वी, नगर और राज्य, पतिके बिना स्त्रीके लिये यह सब शोकका समाज है ॥ २ ॥

भोग रोगसम भूषन भारू । जम जातना सरिस संसारू ॥

प्राननाथ तुम्ह बिनु जग माहीं । मो कहँ सुखद कतहुँ कछु नाहीं ॥

भोग रोगके समान हैं, गहने भाररूप हैं और संसार यम-यातना (नरककी पीड़ा) के समान है। हे प्राणनाथ! आपके बिना जगत्में मुझे कहीं कुछ भी सुखदायी नहीं है ॥ ३ ॥

जिय बिनु देह नदी बिनु बारी । तैसिअ नाथ पुरुष बिनु नारी ॥

नाथ सकल सुख साथ तुम्हारें । सरद बिमल बिधु बदनु निहारें ॥

जैसे बिना जीवके देह और बिना जलके नदी, वैसे ही हे नाथ! बिना पुरुषके स्त्री है। हे नाथ! आपके साथ रहकर आपका शरद-[पूर्णमा] के निर्मल चन्द्रमाके समान मुख देखनेसे मुझे समस्त सुख प्राप्त होंगे ॥ ४ ॥

३१८

  • रामचरितमानस *

दो०—खग मृग परिजन नगरु बनु बलकल बिमल दुकूल ।

नाथ साथ सुरसदन सम परनसाल सुख मूल ॥ ६५ ॥

हे नाथ! आपके साथ पक्षी और पशु ही मेरे कुटुम्बी होंगे, वन ही नगर और वृक्षोंकी छाल ही निर्मल वस्त्र होंगे और पर्णकुटी (पत्तोंकी बनी झोंपड़ी) ही स्वर्गके समान सुखोंकी मूल होगी ॥ ६५ ॥

बनदेवी बनदेव उदारा । करिहहिं सासु ससुर सम सारा ॥ कुस किसलय साथरी सुहाई । प्रभु सँग मंजु मनोज तुराई ॥

उदार हृदयके बनदेवी और बनदेवता ही सास-ससुरके समान मेरी सार-सँभार करेंगे, और कुशा और पत्तोंकी सुन्दर साथरी(बिछौना) ही प्रभुके साथ कामदेवकी मनोहर तोशकके समान होगी ॥ १ ॥

कंद मूल फल अमिअ अहारु । अवध सौध सत सरिस पहारु ॥ छिनु छिनु प्रभु पद कमल बिलोकी । रहिहउँ मुदित दिवस जिमि कोकी ॥

कन्द, मूल और फल ही अमृतके समान आहार होंगे और [वनके] पहाड़ ही अयोध्याके सैकड़ों राजमहलोंके समान होंगे। क्षण-क्षणमें प्रभुके चरणकमलोंको देख-देखकर मैं ऐसी आनन्दित रहूँगी जैसी दिनमें चकवी रहती है ॥ २ ॥

बन दुख नाथ कहे बहुतेरे । भय बिषाद परिताप घनरे ॥ प्रभु बियोग लवल्लेस समाना । सब मिलि होहिं न कृपानिधाना ॥

हे नाथ! आपने वनके बहुत-से दुःख और बहुत-से भय, विषाद और सन्ताप कहे। परन्तु हे कृपानिधान! वे सब मिलकर भी प्रभु (आप) के वियोग [से होनेवाले दुःख] के लवल्लेशके समान भी नहीं हो सकते ॥ ३ ॥

अस जियँ जानि सुजान सिरोमनि । लेइअ संग मोहि छाड़िअ जनि ॥ बिनती बहुत करौं का स्वामी । करुनामय उर अंतरजामी ॥

ऐसा जीमें जानकर, हे सुजानशिरोमणि ! आप मुझे साथ ले लीजिये, यहाँ न छोड़िये। हे स्वामी! मैं अधिक क्या विनती करूँ? आप करुणामय हैं और सबके हृदयके अंदरकी जाननेवाले हैं ॥ ४ ॥

दो०—राखिअ अवध जो अवधि लगि रहत न जनिअहिं प्रान ।

दीनबंधु सुंदर सुखद सील सनेह निधान ॥ ६६ ॥

हे दीनबन्धु! हे सुन्दर! हे सुख देनेवाले! हे शील और प्रेमके भण्डार! यदि अवधि (चौदह वर्ष) तक मुझे अयोध्यामें रखते हैं तो जान लीजिये कि मेरे प्राण नहीं रहेंगे ॥ ६६ ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

३११

मोहि मग चलत न होइहि हारी । छिनु छिनु चरन सरोज निहारी ॥ सबहि भाँति पिय सेवा करिहौं । मारग जनित सकल श्रम हरिहौं ॥

क्षण-क्षणमें आपके चरणकमलोंको देखते रहनेसे मुझे मार्ग चलनेमें थकावट न होगी । हे प्रियतम ! मैं सभी प्रकारसे आपकी सेवा करूँगी और मार्ग चलनेसे होनेवाली सारी थकावटको दूर कर दूँगी ॥ १ ॥

पाय परखारि बैठि तरु छाहीं । करिहुउँ बाउ मुदित मन माहीं ॥ श्रम कन सहित स्याम तनु देखें । कहैं दुख समउ प्रानपति पेखें ॥

आपके पैर धोकर, पेड़ोंकी छायामें बैठकर, मनमें प्रसन्न होकर हवा करूँगी (पंखा झलूँगी) । पसीनेकी बूँदोंसहित श्याम शरीरको देखकर—प्राणपतिके दर्शन करते हुए दुःखके लिये मुझे अवकाश ही कहाँ रहेगा ॥ २ ॥

सम महि तून तरुपल्लव डासी । पाय पलोटिहि सब निसि दासी ॥ बार बार मूदु मूरति जोही । लागिहि तात बयारि न मोही ॥

समतल भूमिपर घास और पेड़ोंके पत्ते बिछाकर यह दासी रातभर आपके चरण दबावेगी । बार-बार आपकी कोमल मूर्तिको देखकर मुझको गरम हवा भी न लगेगी ॥ ३ ॥

को प्रभु सँग मोहि चितवनिहारा । सिंधबधुहि जिमि ससक सिआरा ॥ मैं सुकुमारि नाथ बन जोगू । तुम्हहि उचित तप मो कहूँ भोगू ॥

प्रभुके साथ [रहते] मेरी ओर [आँख उठाकर] देखनेवाला कौन है (अर्थात् कोई नहीं देख सकता) ! जैसे सिंहकी स्त्री (सिहनी) को खरगोश और सियार नहीं देख सकते । मैं सुकुमारी हूँ और नाथ बनके योग्य हैं ? आपको तो तपस्या उचित है और मुझको विषय-भोग ? ॥ ४ ॥

दो०—ऐसेउ बचन कठोर सुनि जौं न हृदउ बिलगान । तौ प्रभु बिषम बियोग दुख सहिहहिं पावैँ प्रान ॥ ६७ ॥

ऐसे कठोर वचन सुनकर भी जब मेरा हृदय न फटा तो, हे प्रभु ! [मालूम होता है] ये पामर प्राण आपके वियोगका भीषण दुःख सहेंगे ॥ ६७ ॥

अस कहि सीय बिकल भइ भारी । बचन बियोगु न सकी सँभारी ॥ देखि दसा रघुपति जियँ जाना । हठि राखें नहिं राखिहि प्राना ॥

ऐसा कहकर सीताजी बहुत ही व्याकुल हो गयीं । वे वचनके वियोगको भी न सँभाल सकीं । (अर्थात् शरीरसे वियोगकी बात तो अलग रही, वचनसे भी वियोगकी बात सुनकर वे अत्यन्त विकल हो गयीं) उनकी यह दशा देखकर श्रीरघुनाथजीने अपने जीमें जान लिया कि हठपूर्वक इन्हें यहाँ रखनेसे ये प्राणोंको न रखेंगी ॥ १ ॥

४००

  • रामचरितमानस *

कहेउ कृपाल भानुकुलनाथा । परिहरि सोचु चलहु बन साथा ॥ नहिं बिषाद कर अवसरु आजू । बेगि करहु बन गवन समाजू ॥

तब कृपालु, सूर्यकुलके स्वामी श्रीरामचन्द्रजीने कहा कि सोच छोड़कर मेरे साथ बनको चलो। आज विषाद करनेका अवसर नहीं है। तुरंत वनगमनकी तैयारी करो ॥ २ ॥

कहि प्रिय बचन प्रिया समुझाई । लगे मातु पद आसिष पाई ॥ बेगि प्रजा दुख मेटब आई । जननी निठुर बिसरि जनि जाई ॥

श्रीरामचन्द्रजीने प्रिय वचन कहकर प्रियतमा सीताजीको समझाया। फिर माताके पैरों लगकर आशीर्वाद प्राप्त किया। [माताने कहा—] बेटा! जल्दी लौटकर प्रजाके दुःखको मिटाना और यह निठुर माता तुम्हें भूल न जाय ॥ ३ ॥

फिरिहि दसा बिधि बहुरि कि मोरी । देखिहउँ नयन मनोहर जोरी ॥ सुदिन सुधरी तात कब होइहि । जननी जिअत बदन बिधु जोइहि ॥

हे विधाता! क्या मेरी दशा भी फिर पलटेगी? क्या अपने नेत्रोंसे मैं इस मनोहर जोड़ीको फिर देख पाऊँगी? हे पुत्र! वह सुन्दर दिन और शुभ घड़ी कब होगी जब तुम्हारी जननी जीते—जी तुम्हारा चाँद—सा मुखड़ा फिर देखेगी ॥ ४ ॥

दो०—बहुरि बच्छ कहि लालु कहि रघुपति रघुबर तात । कबहिं बोलाइ लगाइ हियँ हरषि निरखिहउँ गात ॥ ६८ ॥

हे तात! 'वत्स' कहकर, 'लाल' कहकर, 'रघुपति' कहकर, 'रघुबर' कहकर, मैं फिर कब तुम्हें बुलाकर हृदयसे लगाऊँगी और हर्षित होकर तुम्हारे अङ्गोंको देखूँगी ॥ ६८ ॥

लखि सनेह कातरि महतारी । बचनु न आव बिकल भइ भारी ॥ राम प्रबोधु कीन्ह बिधि नाना । समउ सनेहु न जाइ बखाना ॥

यह देखकर कि माता स्नेहके मारे अधीर हो गयी हैं और इतनी अधिक व्याकुल हैं कि मुँहसे वचन नहीं निकलता, श्रीरामचन्द्रजीने अनेक प्रकारसे उन्हें समझाया। वह समय और स्नेह वर्णन नहीं किया जा सकता ॥ १ ॥

तब जानकी सासु पग लागी । सुनिअ माय मैं परम अभागी ॥ सेवा समय दैअँ बनु दीन्हा । मोर मनोरथु सफल न कीन्हा ॥

तब जानकीजी सासके पाँव लगीं और बोलीं—हे माता! सुनिये, मैं बड़ी ही अभागिनी हूँ। आपकी सेवा करनेके समय दैवने मुझे वनवास दे दिया। मेरा मनोरथ सफल न किया ॥ २ ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

४०१

तजब छोभु जनि छाड़िअ छोहू । करमु कठिन कछु दोसु न मोहू ॥ सुनि सिय बचन सासु अकुलानी । दसा कवनि बिधि कहौं बखानी ॥

आप क्षोभका त्याग कर दें, परंतु कृपा न छोड़ियेगा। कर्मकी गति कठिन है, मुझे भी कुछ दोष नहीं है। सीताजीके वचन सुनकर सास व्याकुल हो गयीं। उनकी दशाको मैं किस प्रकार बखानकर कहूँ! ॥ ३ ॥

बारहिं बार लाड़ उर लीन्ही । धरि धीरजु सिख आसिष दीन्ही ॥ अचल होउ अहिवातु तुम्हारा । जब लगि गंग जमुन जल धारा ॥

उन्होंने सीताजीको बार-बार हृदयसे लगाया और धीरज धरकर शिक्षा दी और आशीर्वाद दिया कि जबतक गङ्गाजी और यमुनाजीमें जलकी धारा बहे, तबतक तुम्हारा सुहाग अचल रहे ॥ ४ ॥

दो०—सीतहि सासु असीस सिख दीन्हि अनेक प्रकार।

चली नाड़ पद पदुम सिरु अति हित बारहिं बार ॥ ६९ ॥

सीताजीको सासने अनेकों प्रकारसे आशीर्वाद और शिक्षाएँ दीं और वे (सीताजी) बड़े ही प्रेमसे बार-बार चरणकमलोंमें सिर नवाकर चलीं ॥ ६९ ॥

समाचार जब लछिमन पाए । व्याकुल बिलख बदन उठि धाए ॥ कंप पुलक तन नयन सनीरा । गहे चरन अति प्रेम अधीरा ॥

जब लक्ष्मणजीने ये समाचार पाये, तब वे व्याकुल होकर उदास-मुँह उठ दौड़े। शरीर काँप रहा है, रोमाञ्च हो रहा है, नेत्र आँसुओंसे भरे हैं। प्रेमसे अत्यन्त अधीर होकर उन्होंने श्रीरामजीके चरण पकड़ लिये ॥ १ ॥

कहि न सकत कछु चितवत ठाढ़े । मीनु दीन जुन जल तें काढ़े ॥ सोचु हृदयै बिधि का होनिहारा । सबु सुखु सुकृतु सिरान हमारा ॥

वे कुछ कह नहीं सकते, खड़े-खड़े देख रहे हैं। [ऐसे दीन हो रहे हैं] मानो जलसे निकाले जानेपर मछली दीन हो रही हो। हृदयमें यह सोच है कि हे विधाता! क्या होनेवाला है? क्या हमारा सब सुख और पुण्य पूरा हो गया? ॥ २ ॥

मो कहुँ काह कहब रघुनाथा । रखिहहिं भवन कि लेहहिं साथा ॥ राम बिलोकि बंधु कर जोरें । देह गेह सब सन तूनु तोरें ॥

मुझको श्रीरघुनाथजी क्या कहेंगे? घरपर रखेंगे या साथ ले चलेंगे? श्रीरामचन्द्रजीने भाई लक्ष्मणको हाथ जोड़े और शरीर तथा घर सभीसे नाता तोड़े हुए खड़े देखा ॥ ३ ॥

४०२

  • रामचरितमानस *

बोले बचनु राम नय नागर । सील सनेह सरल सुख सागर ॥ तात प्रेम बस जनि कदराहू । समुझि हृदयँ परिनाम उछाहू ॥

तब नीतिमें निपुण और शील, स्नेह, सरलता और सुखके समुद्र श्रीरामचन्द्रजी वचन बोले— हे तात! परिणाममें होनेवाले आनन्दको हृदयमें समझकर तुम प्रेमवश अधीर मत होओ ॥ ४ ॥

दो०— मातु पिता गुरु स्वामि सिख सिर धरि करहिं सुभायँ ।

लहेउ लाभु तिन्ह जनम कर नतरु जनमु जग जायँ ॥ ७० ॥

जो लोग माता, पिता, गुरु और स्वामीकी शिक्षाको स्वाभाविक ही सिर चढ़ाकर उसका पालन करते हैं, उन्होंने ही जन्म लेनेका लाभ पाया है; नहीं तो जगत्में जन्म व्यर्थ ही है ॥ ७० ॥

अस जियँ जानि सुनहु सिख भाई । करहु मातु पितु पद सेवकाई ॥

भवन भरतु रिपुसूदनु नाहीं । राउ बृद्ध मम दुखु मन माहीं ॥

हे भाई! हृदयमें ऐसा जानकर मेरी सीख सुनो और माता-पिताके चरणोंकी सेवा करो। भरत और शत्रुघ्न घरपर नहीं हैं, महाराज बृद्ध हैं और उनके मनमें मेरा दुःख है ॥ १ ॥

मैं बन जाऊँ तुम्हहि लेइ साथा । होइ सबहि बिधि अवध अनाथा ॥

गुरु पितु मातु प्रजा परिवारु । सब कहँ परइ दुसह दुखु भारु ॥

इस अवस्थामें मैं तुमको साथ लेकर बन जाऊँ तो अयोध्या सभी प्रकारसे अनाथ हो जायगी। गुरु, पिता, माता, प्रजा और परिवार सभीपर दुःखका दुःसह भार आ पड़ेगा ॥ २ ॥

रहहु करहु सब कर परितोषू । नतरु तात होइहि बड़ दोषू ॥

जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी । सो नृपु अवसि नरक अधिकारी ॥

अतः तुम यहीं रहो और सबका सन्तोष करते रहो। नहीं तो हे तात! बड़ा दोष होगा। जिसके राज्यमें प्यारी प्रजा दुःखी रहती है, वह राजा अवश्य ही नरकका अधिकारी होता है ॥ ३ ॥

रहहु तात असि नीति बिचारी । सुनत लखनु भए व्याकुल भारी ॥

सिअरें बचन सूखि गए कैसें । परसत तुहिन तामरसु जैसें ॥

हे तात! ऐसी नीति विचारकर तुम घर रह जाओ। यह सुनते ही लक्ष्मणजी बहुत ही व्याकुल हो गये। इन शीतल वचनोंसे वे कैसे सूख गये, जैसे पालेके स्पर्शसे कमल सूख जाता है! ॥ ४ ॥

दो०— उत्तरु न आवत प्रेम बस गहे चरन अकुलाइ ।

नाथ दासु मैं स्वामि तुम्ह तजहु त काह बसाइ ॥ ७१ ॥

प्रेमवश लक्ष्मणजीसे कुछ उत्तर देते नहीं बनता। उन्होंने व्याकुल होकर श्रीरामजीके चरण पकड़ लिये और कहा—हे नाथ! मैं दास हूँ और आप स्वामी हैं; अतः आप मुझे छोड़ ही दें तो मेरा क्या वश है? ॥ ७१ ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

४०३

दीन्हि मोहि सिख नीकि गोसाईं । लागि अगम अपनी कदराई ॥ नरबर धीर धरम धुर धारी । निगम नीति कहूं ते अधिकारी ॥

हे स्वामी! आपने मुझे सीख तो बड़ी अच्छी दी है, पर मुझे अपनी कायरतासे वह मेरे लिये अगम (पहुँचके बाहर) लगी। शास्त्र और नीतिके तो वे ही श्रेष्ठ पुरुष अधिकारी हैं जो धीर हैं और धर्मकी धुरीको धारण करनेवाले हैं ॥ १ ॥

मैं सिसु प्रभु सनेहँ प्रतिपाला । मंदरु मेरु कि लेहँ मराला ॥ गुर पितु मातु न जानउँ काहू । कहहउँ सुभाउ नाथ पतिआहू ॥

मैं तो प्रभु (आप) के स्नेहमें पला हुआ छोटा बच्चा हूँ! कहीं हंस भी मन्दराचल या सुमेरु पर्वतको उठा सकते हैं! हे नाथ! स्वभावसे ही कहता हूँ, आप विश्वास करें, मैं आपको छोड़कर गुरु, पिता, माता किसीको भी नहीं जानता ॥ २ ॥

जहँ लगि जगत सनेह सगाईं । प्रीति प्रतीति निगम निजु गाईं ॥ मोरें सबड़ एक तुम्ह स्वामी । दीनबंधु उर अंतरजामी ॥

जगत्में जहाँतक स्नेहका सम्बन्ध, प्रेम और विश्वास है, जिनको स्वयं वेदने गाया है—हे स्वामी! हे दीनबन्धु! हे सबके हृदयके अंदरकी जाननेवाले! मेरे तो वे सब कुछ केवल आप ही हैं ॥ ३ ॥

धरम नीति उपदेसिअ ताही । कीरति भूति सुगति प्रिय जाही ॥ मन क्रम बचन चरन रत होई । कृपासिंधु परिहरिअ कि सोई ॥

धर्म और नीतिका उपदेश तो उसको करना चाहिये जिसे कीर्ति, विभूति (ऐश्वर्य) या सद्गति प्यारी हो। किन्तु जो मन, वचन और कर्मसे चरणोंमें ही प्रेम रखता हो, हे कृपासिन्धु! क्या वह भी त्यागनेके योग्य है? ॥ ४ ॥

दो०—करुनासिंधु सुबंधु के सुनि मृदु बचन बिनीत । समुझाए उर लाइ प्रभु जानि सनेहँ सभीत ॥ ७२ ॥

दयाके समुद्र श्रीरामचन्द्रजीने भले भाईके कोमल और नम्रतायुक्त वचन सुनकर और उन्हें स्नेहके कारण डरे हुए जानकर, हृदयसे लगाकर समझाया ॥ ७२ ॥

मागहु बिदा मातु सन जाईं । आवहु बेगि चलहु बन भाईं ॥ मुदित भए सुनि रघुबर बानी । भयउ लाभ बड़ गड़ बड़ि हानी ॥

[और कहा—] हे भाई! जाकर मातासे विदा माँग आओ और जल्दी बनको चलो! रघुकुलमें श्रेष्ठ श्रीरामजीकी वाणी सुनकर लक्ष्मणजी आनन्दित हो गये। बड़ी हानि दूर हो गयी और बड़ा लाभ हुआ! ॥ १ ॥

४०४

  • रामचरितमानस *

हरषित हृदयं मातु पहिं आए । मनहुँ अंध फिरि लोचन पाए ॥ जाइ जननि पग नायउ माथा । मनु रघुनंदन जानकि साथा ॥

वे हर्षित हृदयसे माता सुमित्राजीके पास आये, मानो अंधा फिरसे नेत्र पा गया हो। उन्होंने जाकर माताके चरणोंमें मस्तक नवाया। किन्तु उनका मन रघुकुलको आनन्द देनेवाले श्रीरामजी और जानकीजीके साथ था ॥ २ ॥

पूँछे मातु मलिन मन देखी । लखन कही सब कथा बिसेषी ॥ गई सहमि सुनि बचन कठोरा । मूगी देखि दव जनु चहु ओरा ॥

माताने उदास मन देखकर उनसे [कारण] पूछा। लक्ष्मणजीने सब कथा विस्तारसे कह सुनायी। सुमित्राजी कठोर वचनोंको सुनकर ऐसी सहम गयीं जैसे हिरनी चारों ओर वनमें आग लगी देखकर सहम जाती हैं ॥ ३ ॥

लखन लखेउ भा अनरथ आजू । एहिं सनेह बस करब अकाजू ॥ मागत बिदा सभय सकुचाहीं । जाइ संग बिधि कहिहि कि नाहीं ॥

लक्ष्मणने देखा कि आज (अब) अनर्थ हुआ। ये स्नेहवश काम बिगाड़ देंगी! इसलिये वे विदा माँगते हुए डरके मारे सकुचाते हैं [और मन-ही-मन सोचते हैं] कि हे विधाता! माता साथ जानेको कहेंगी या नहीं ॥ ४ ॥

दो०—समुद्धि सुमित्राँ राम सिय रूपु सुसीलु सुभाउ ।

नृप सनेहु लखि धुनेउ सिरु पापिनि दीन्ह कुदाउ ॥ ७३ ॥

सुमित्राजीने श्रीरामजी और श्रीसीताजीके रूप, सुन्दर शील और स्वभावको समझकर और उनपर राजाका प्रेम देखकर अपना सिर धुना (पीटा) और कहा कि पापिनी कैकेयीने बुरी तरह घात लगाया ॥ ७३ ॥

धीरजु धरेउ कुअवसर जानी । सहज सुहद बोली मृदु बानी ॥ तात तुम्हारि मातु बैदेही । पिता रामु सब भाँति सनेही ॥

परन्तु कुसमय जानकर धैर्य धारण किया और स्वभावसे ही हित चाहनेवाली सुमित्राजी कोमल वाणीसे बोली—हे तात! जानकीजी तुम्हारी माता हैं और सब प्रकारसे स्नेह करनेवाले श्रीरामचन्द्रजी तुम्हारे पिता हैं! ॥ १ ॥

अवध तहाँ जहाँ राम निवासू । तहाँई दिवसु जहाँ भानु प्रकासू ॥ जौं पै सीय रामु बन जाहीं । अवध तुम्हार काजु कछु नाहीं ॥

जहाँ श्रीरामजीका निवास हो वहीं अयोध्या है। जहाँ सूर्यका प्रकाश हो वहीं दिन है। यदि निश्चय ही सीता-राम वनको जाते हैं तो अयोध्यामें तुम्हारा कुछ भी काम नहीं है ॥ २ ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

४०५

गुर पितु मातु बंधु सुर सार्ई । सेइअहिं सकल प्रान की नाई॥ रामु प्रानप्रिय जीवन जी के । स्वार्थ रहित सखा सबही के॥

गुरु, पिता, माता, भाई, देवता और स्वामी, इन सबकी सेवा प्राणके समान करनी चाहिये। फिर श्रीरामचन्द्रजी तो प्राणोंके भी प्रिय हैं, हृदयके भी जीवन हैं और सभीके स्वार्थरहित सखा हैं॥ ३॥

पूजनीय प्रिय परम जहाँ तें । सब मानिअहिं राम के नातें॥ अस जियँ जानि संग बन जाहू । लेहु तात जग जीवन लाहू॥

जगत्में जहाँतक पूजनीय और परम प्रिय लोग हैं, वे सब रामजीके नातेसे ही [पूजनीय और परम प्रिय] मानने योग्य हैं। हृदयमें ऐसा जानकर, हे तात! उनके साथ बन जाओ और जगत्में जीनेका लाभ उठाओ॥ ४॥

दो०—भूरि भाग भाजनु भयहु मोहि समेत बलि जाउँ॥ जौं तुम्हरे मन छाड़ि छलु कीन्ह राम पद ठाउँ॥ ७४॥

मैं बलिहारी जाती हूँ, [हे पुत्र!] मेरे समेत तुम बड़े ही सौभाग्यके पात्र हुए, जो तुम्हारे चित्तेने छल छोड़कर श्रीरामजीके चरणोंमें स्थान प्राप्त किया है॥ ७४॥

पुत्रवती जुबती जग सोई । रघुपति भगतु जासु सुतु होई॥ नतरु बाँझ भलि बादि बिआनी । राम बिमुख सुत तें हित जानी॥

संसारमें वही युवती स्त्री पुत्रवती है जिसका पुत्र श्रीरघुनाथजीका भक्त हो। नहीं तो जो रामसे विमुख पुत्रसे अपना हित जानती है, वह तो बाँझ ही अच्छी। पशुकी भाँति उसका ब्याना (पुत्र प्रसव करना) व्यर्थ ही है॥ १॥

तुम्हरेहिं भाग रामु बन जाहीं । दूसर हेतु तात कछु नाहीं॥ सकल सुकृत कर बड़ फलु एहू । राम सीय पद सहज सनेहू॥

तुम्हारे ही भाग्यसे श्रीरामजी बनको जा रहे हैं। हे तात! दूसरा कोई कारण नहीं है। सम्पूर्ण पुण्योंका सबसे बड़ा फल यही है कि श्रीसीतारामजीके चरणोंमें स्वाभाविक प्रेम हो॥ २॥

रागु रोषु इरिषा मदु मोहू । जनि सपनेहूँ इन्ह के बस होहू॥ सकल प्रकार बिकार बिहाई । मन क्रम बचन करेहु सेवकाई॥

राग, रोष, ईर्ष्या, मद और मोह—इनके वश स्वप्नमें भी मत होना। सब प्रकारके विकारोंका त्याग कर मन, वचन और कर्मसे श्रीसीतारामजीकी सेवा करना॥ ३॥

४०६

  • रामचरितमानस *

तुम्ह कहहुँ बन सब भाँति सुपासू । सँग पितु मातु रामु सिय जासू ॥ जेहिं न रामु बन लहहिं कलेसू । सुत सोड़ करेहु इहड़ उपदेसू ॥

तुमको वनमें सब प्रकारसे आराम है, जिसके साथ श्रीरामजी और सीताजीरूप पिता-माता हैं। हे पुत्र! तुम वही करना जिससे श्रीरामचन्द्रजी वनमें क्लेश न पावें, मेरा यही उपदेश है ॥४॥

छं०— उपदेसु यहु जेहिं तात तुम्हरे राम सिय सुख पावहीं । पितु मातु प्रिय परिवार पुर सुख सुरति बन बिसरावहीं ॥ तुलसी प्रभुहि सिख देड़ आयसु दीन्ह पुनि आसिष दर्ई । रति होउ अबिरल अमल सिय रघुबीर पद नित नित नई ॥

हे तात! मेरा यही उपदेश है (अर्थात् तुम वही करना) जिससे वनमें तुम्हारे कारण श्रीरामजी और सीताजी सुख पावें और पिता, माता, प्रिय परिवार तथा नगरके सुखोंकी याद भूल जायँ। तुलसीदासजी कहते हैं कि सुमित्राजीने इस प्रकार हमारे प्रभु (श्रीलक्ष्मणजी) को शिक्षा देकर [वन जानेकी] आज्ञा दी और फिर यह आशीर्वाद दिया कि श्रीसीताजी और श्रीरघुवीरजीके चरणोंमें तुम्हारा निर्मल (निष्काम और अनन्य) एवं प्रगाढ़ प्रेम नित-नित नया हो!

सो०— मातु चरन सिरु नाड़ चले तुरत संकित हृदयँ।

बागुर बिषम तोराड़ मनहुँ भाग मृगु भाग बस ॥ ७५ ॥

माताके चरणोंमें सिर नवाकर हृदयमें डरते हुए [कि अब भी कोई विघ्न न आ जाय] लक्ष्मणजी तुरंत इस तरह चल दिये जैसे सौभाग्यवश कोई हिरन कठिन फंदेको तुड़ाकर भाग निकला हो ॥७५॥

गए लखनु जहाँ जानकिनाथू । भे मन मुदित पाड़ प्रिय साथू ॥ बंदि राम सिय चरन सुहाए । चले संग नृपमंदिर आए ॥

लक्ष्मणजी वहाँ गये जहाँ श्रीजानकीनाथजी थे, और प्रियका साथ पाकर मनमें बड़े ही प्रसन्न हुए। श्रीरामजी और सीताजीके सुन्दर चरणोंकी वन्दना करके वे उनके साथ चले और राजभवनमें आये ॥१॥

कहहिं परसपर पुर नर नारी । भलि बनाड़ बिधि बात बिगारी ॥ तन कूस मन दुखु बदन मलीने । बिकल मनहुँ माखी मधु छीने ॥

नगरके स्त्री-पुरुष आपसमें कह रहे हैं कि विधाताने खूब बनाकर बात बिगाड़ी! उनके शरीर दुबले, मन दुःखी और मुख उदास हो रहे हैं। वे ऐसे व्याकुल हैं जैसे शहद छीन लिये जानेपर शहदकी मक्खियाँ व्याकुल हों ॥२॥

कर मीजहिं सिरु धुनि पछिताहीं । जनु बिनु पंख बिहग अकुलाहीं ॥ भड़ बड़ि भीर भूप दरबारा । बरनि न जाड़ बिषादु अपारा ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

४०७

सब हाथ मल रहे हैं और सिर धुनकर (पीटकर) पछता रहे हैं। मानो बिना पंखके पक्षी व्याकुल हो रहे हैं। राजद्वारपर बड़ी भीड़ हो रही है। अपार विषादका वर्णन नहीं किया जा सकता ॥ ३ ॥ सचिर्व उठाइ राउ बैठारे । कहि प्रिय बचन रामु पगु धारे ॥ सिय समेत दोउ तनय निहारी । व्याकुल भयउ भूमिपति भारी ॥

‘श्रीरामचन्द्रजी पधारे हैं’, ये प्रिय वचन कहकर मन्त्रीने राजाको उठाकर बैठाया। सीतासहित दोनों पुत्रोंको [वनके लिये तैयार] देखकर राजा बहुत व्याकुल हुए ॥ ४ ॥

दो०—सीय सहित सुत सुभग दोउ देखि देखि अकुलाइ ।

बारहिं बार सनेह बस राउ लेइ उर लाइ ॥ ७६ ॥

सीतासहित दोनों सुन्दर पुत्रोंको देख-देखकर राजा अकुलाते हैं और स्नेहवश बारंबार उन्हें हृदयसे लगा लेते हैं ॥ ७६ ॥

सकड़ न बोलि बिकल नरनाहू । सोक जनित उर दारुन दाहू ॥ नाइ सीसु पद अति अनुरागा । उठि रघुबीर बिदा तब मागा ॥

राजा व्याकुल हैं, बोल नहीं सकते। हृदयमें शोकसे उत्पन्न हुआ भयानक सन्ताप है। तब रघुकुलके वीर श्रीरामचन्द्रजीने अत्यन्त प्रेमसे चरणोंमें सिर नवाकर उठकर विदा माँगी— ॥ १ ॥

पितु असीस आयसु मोहि दीजै । हरष समय बिसमउ कत कीजै ॥ तात किऐ प्रिय प्रेम प्रमादू । जसु जग जाइ होइ अपबादू ॥

हे पिताजी! मुझे आशीर्वाद और आज्ञा दीजिये। हर्षके समय आप शोक क्यों कर रहे हैं? हे तात! प्रियके प्रेमवश प्रमाद (कर्तव्यकर्ममें त्रुटि) करनेसे जगत्में यश जाता रहेगा और निन्दा होगी ॥ २ ॥

सुनि सनेह बस उठि नरनाहाँ । बैठारे रघुपति गहि बाहाँ ॥ सुनहु तात तुम्ह कहूँ मुनि कहहीं । रामु चराचर नायक अहहीं ॥

यह सुनकर स्नेहवश राजाने उठकर श्रीरघुनाथजीकी बाँह पकड़कर उन्हें बैठा लिया और कहा— हे तात! सुनो, तुम्हारे लिये मुनिलोग कहते हैं कि श्रीराम चराचरके स्वामी हैं ॥ ३ ॥

सुभ अरु असुभ करम अनुहारी । ईसु देइ फलु हृदयँ बिचारी ॥ करइ जो करम पाव फल सोई । निगम नीति असि कह सबु कोई ॥

शुभ और अशुभ कर्मोंके अनुसार ईश्वर हृदयमें विचारकर फल देता है। जो कर्म करता है वही फल पाता है। ऐसी वेदकी नीति है, यह सब कोई कहते हैं ॥ ४ ॥

दो०—औरु कऐ अपराधु कोउ और पाव फल भोगु ।

अति बिचित्र भगवंत गति को जग जानै जोगु ॥ ७७ ॥

४०८

  • रामचरितमानस *

[किन्तु इस अवसरपर तो इसके विपरीत हो रहा है,] अपराध तो कोई और ही करे और उसके फलका भोग कोई और ही पावे। भगवान्की लीला बड़ी ही विचित्र है, उसे जाननेयोग्य जगत्में कौन है ? ॥ ७७ ॥

रायँ राम राखन हित लागी । बहुत उपाय किए छलु त्यागी ॥ लखी राम रुख रहत न जाने । धरम धुंधर धीर सयाने ॥

राजाने इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजीको रखनेके लिये छल छोड़कर बहुत-से उपाय किये। पर जब उन्होंने धर्मधुरन्धर, धीर और बुद्धिमान् श्रीरामजीका रुख देख लिया और वे रहते हुए न जान पड़े, ॥ १ ॥

तब नृप सीय लाड़ उर लीन्ही । अति हित बहुत भाँति सिख दीन्ही ॥ कहि बन के दुख दुसह सुनाए । सासु ससुर पितु सुख समुझाए ॥

तब राजाने सीताजीको हृदयसे लगा लिया और बड़े प्रेमसे बहुत प्रकारकी शिक्षा दी। वनके दुःसह दुःख कहकर सुनाये। फिर सास, ससुर तथा पिताके [पास रहनेके] सुखोंको समझाया। ॥ २ ॥

सिय मनु राम चरन अनुरागा । घरु न सुगमु बनु बिषमु न लागा ॥ औरउ सबहिं सीय समुझाई । कहि कहि बिपिन बिपति अधिकाई ॥

परन्तु सीताजीका मन श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें अनुरक्त था। इसलिये उन्हें घर अच्छा नहीं लगा और न वन भयानक लगा। फिर और सब लोगोंने भी वनमें विपत्तियोंकी अधिकता बता-बताकर सीताजीको समझाया ॥ ३ ॥

सचिव नारि गुर नारि सयानी । सहित सनेह कहहिं मृदु बानी ॥ तुम्ह कहुँ तौ न दीन्ह बनबासू । करहु जो कहहिं ससुर गुर सासू ॥

मन्त्री सुमन्त्रजीकी पत्नी और गुरु वसिष्ठजीकी स्त्री अरुन्धतीजी तथा और भी चतुर स्त्रियाँ स्नेहके साथ कोमल वाणीसे कहती हैं कि तुमको तो [राजाने] वनवास दिया नहीं है। इसलिये जो ससुर, गुरु और सास कहें, तुम तो वही करो ॥ ४ ॥

दो० — सिखसीतलि हित मधुर मृदु सुनि सीतहि न सोहानि ।

सरद चंद चंदिनि लगत जनु चकई अकुलानि ॥ ७८ ॥

यह शीतल, हितकारी, मधुर और कोमल सीख सुननेपर सीताजीको अच्छी नहीं लगी। [वे इस प्रकार व्याकुल हो गयीं] मानो शरद-ऋतुके चन्द्रमाकी चाँदनी लगते ही चकई व्याकुल हो उठी हो ॥ ७८ ॥

सीय सकुच बस उत्तरु न देई । सो सुनि तमकि उठी कैकेई ॥ मुनि पट भूषन भाजन आनी । आगें धरि बोली मृदु बानी ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

४०९

सीताजी संकोचवश उत्तर नहीं देतीं। इन बातोंको सुनकर कैकेयी तमककर उठी। उसने मुनियोंके वस्त्र, आभूषण (माला, मेखला आदि) और बर्तन (कमण्डलु आदि) लाकर श्रीरामचन्द्रजीके आगे रख दिये और कोमल वाणीसे कहा— ॥ १ ॥

नृपहि प्रानप्रिय तुम्ह रघुबीरा । सील सनेह न छाड़िहि भीरा ॥ सुकृतु सुजसु परलोकु नसाऊ । तुम्हहि जान बन कहिहि न काऊ ॥

हे रघुवीर! राजाको तुम प्राणोंके समान प्रिय हो। भीरु (प्रेमवश दुर्बल हृदयके) राजा शील और स्नेह नहीं छोड़ेंगे! पुण्य, सुन्दर यश और परलोक चाहे नष्ट हो जाय, पर तुम्हें बन जानेको वे कभी न कहेंगे ॥ २ ॥

अस बिचारि सोड़ करहु जो भावा । राम जननि सिख सुनि सुखु पावा ॥ भूपहि बचन बानसम लागे । करहिं न प्रान पयान अभागे ॥

ऐसा विचारकर जो तुम्हें अच्छा लगे वही करो। माताकी सीख सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने [बड़ा] सुख पाया। परन्तु राजाको ये वचन बाणके समान लगे। [वे सोचने लगे] अब भी अभागे प्राण [क्यों] नहीं निकलते! ॥ ३ ॥

लोग बिकल मुरुछित नरनाहू । काह करिअ कछु सूझ न काहू ॥ रामु तुरत मुनि बेषु बनाई । चले जनक जननिहि सिरु नाई ॥

राजा मूर्च्छित हो गये, लोग व्याकुल हैं। किसीको कुछ सूझ नहीं पड़ता कि क्या करें। श्रीरामचन्द्रजी तुरंत मुनिका वेष बनाकर और माता-पिताको सिर नवाकर चल दिये ॥ ४ ॥

दो०—सजि बन साजु समाजु सबु बनिता बंधु समेत । बंदि बिप्र गुर चरन प्रभु चले करि सबहि अचेत ॥ ७९ ॥

वनका सब साज-सामान सजकर (वनके लिये आवश्यक वस्तुओंको साथ लेकर) श्रीरामचन्द्रजी स्त्री (श्रीसीताजी) और भाई (लक्ष्मणजी)-सहित, ब्राह्मण और गुरुके चरणोंकी वन्दना करके सबको अचेत करके चले ॥ ७९ ॥

निकसि बसिष्ठ द्वार भए ठाढ़े । देखे लोग बिरह दव दाढ़े ॥ कहि प्रिय बचन सकल समुझाए । बिप्र बृंद रघुबीर बोलाए ॥

राजमहलसे निकलकर श्रीरामचन्द्रजी वसिष्ठजीके दरवाजेपर जा खड़े हुए और देखा कि सब लोग विरहकी अग्निमें जल रहे हैं। उन्होंने प्रिय वचन कहकर सबको समझाया। फिर श्रीरामचन्द्रजीने ब्राह्मणोंकी मण्डलीको बुलाया ॥ १ ॥

गुर सन कहि बरषासन दीन्हे । आदर दान विनय बस कीन्हे ॥ जाचक दान मान संतोषे । मीत पुनीत प्रेम परितोषे ॥

४१०

  • रामचरितमानस *

गुरुजीसे कहकर उन सबको वर्षाशन (वर्षभरका भोजन) दिये और आदर, दान तथा विनयसे उन्हें वशमें कर लिया। फिर याचकोंको दान और मान देकर सन्तुष्ट किया तथा मित्रोंको पवित्र प्रेमसे प्रसन्न किया ॥ २ ॥

दासीं दास बोलाइ बहोरी । गुरहि सौँपि बोले कर जोरी ॥ सब कै सार सँभार गोसाईं । करबि जनक जननी की नाईं ॥

फिर दास-दासियोंको बुलाकर उन्हें गुरुजीको सौंपकर, हाथ जोड़कर बोले—हे गुसाईं! इन सबकी माता-पिताके समान सार-सँभार (देख-रेख) करते रहियेगा ॥ ३ ॥

बारहिं बार जोरि जुग पानी । कहत रामु सब सन मूदु बानी ॥ सोइ सब भाँति मोर हितकारी । जेहि तें रहै भुआल सुखारी ॥

श्रीरामचन्द्रजी बार-बार दोनों हाथ जोड़कर सबसे कोमल वाणी कहते हैं कि मेरा सब प्रकारसे हितकारी मित्र वही होगा जिसकी चेष्टासे महाराज सुखी रहें ॥ ४ ॥

दो०—मातु सकल मोरे बिरहैं जेहिं न होहिं दुख दीन । सोइ उपाउ तुम्ह करेहु सब पुर जन परम प्रबीन ॥ ८० ॥

हे परम चतुर पुरवासी सज्जनों! आपलोग सब वही उपाय करियेगा जिससे मेरी सब माताएँ मेरे विरहके दुःखसे दुःखी न हों ॥ ८० ॥

एहि बिधि राम सबहि समुझावा । गुर पद पदुम हरषि सिरु नावा ॥ गनपति गौरि गिरीसु मनाई । चले असीस पाइ रघुराई ॥

इस प्रकार श्रीरामजीने सबको समझाया और हर्षित होकर गुरुजीके चरणकमलोंमें सिर नवाया। फिर गणेशजी, पार्वतीजी और कैलासपति महादेवजीको मनाकर तथा आशीर्वाद पाकर श्रीरघुनाथजी चले ॥ १ ॥

राम चलत अति भयउ बिषादू । सुनि न जाइ पुर आरत नादू ॥ कुसगुन लंक अवध अति सोकू । हरष बिषाद बिबस सुरलोकू ॥

श्रीरामजीके चलते ही बड़ा भारी विषाद हो गया। नगरका आर्तनाद (हाहाकार) सुना नहीं जाता। लङ्कामें बुरे शकुन होने लगे, अयोध्यामें अत्यन्त शोक छा गया और देवलोकमें सब हर्ष और विषाद दोनोंके वशमें हो गये। [हर्ष इस बातका था कि अब राक्षसोंका नाश होगा और विषाद अयोध्यावासियोंके शोकके कारण था।] ॥ २ ॥

गड़ मुरुछा तब भूपति जागे । बोलि सुमंत्रु कहन अस लागे ॥ रामु चले बन प्रान न जाहीं । केहि सुख लागि रहत तन माहीं ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

४११

मूर्छा दूर हुई, तब राजा जागे और सुमन्त्रको बुलाकर ऐसा कहने लगे—श्रीराम वनको चले गये, पर मेरे प्राण नहीं जा रहे हैं। न जाने ये किस सुखके लिये शरीरमें टिक रहे हैं ॥ ३ ॥

एहि तें कवन व्यथा बलवाना । जो दुखु पाइ तजहिं तनु प्राना ॥ पुनि धरि धीर कहइ नरनाहू । लै रथु संग सखा तुम्ह जाहू ॥

इससे अधिक बलवती और कौन-सी व्यथा होगी जिस दुःखको पाकर प्राण शरीरको छोड़ेंगे। फिर धीरज धरकर राजाने कहा—हे सखा! तुम रथ लेकर श्रीरामके साथ जाओ ॥ ४ ॥

दो०—सुठि सुकुमार कुमार दोउ जनकसुता सुकुमारि ।

रथ चढ़ाइ देखराइ बनु फिरेहु गाएँ दिन चारि ॥ ८१ ॥

अत्यन्त सुकुमार दोनों कुमारोंको और सुकुमारी जानकीको रथमें चढ़ाकर, वन दिखलाकर चार दिनके बाद लौट आना ॥ ८१ ॥

जों नहिं फिरहिं धीर दोउ भाई । सत्यसंध दृढ़ब्रत रघुराई ॥ तौ तुम्ह बिनय करेहु कर जोरी । फेरिअ प्रभु मिथिलेसकिसोरी ॥

यदि धैर्यवान् दोनों भाई न लौटें—क्योंकि श्रीरघुनाथजी प्रणके सच्चे और दृढ़तासे नियमका पालन करनेवाले हैं—तो तुम हाथ जोड़कर विनती करना कि हे प्रभो! जनककुमारी सीताजीको तो लौटा दीजिये ॥ १ ॥

जब सिय कानन देखि डेराई । कहेहु मोरि सिख अवसरु पाई ॥ सासु ससुर अस कहेउ सँदेसू । पुत्रि फिरिअ बन बहुत कलेसू ॥

जब सीता वनको देखकर डरें, तब मौका पाकर मेरी यह सीख उनसे कहना कि तुम्हारे सास और ससुरने ऐसा सन्देश कहा है कि हे पुत्री! तुम लौट चलो, वनमें बहुत क्लेश हैं ॥ २ ॥

पितुगृह कबहुँ कबहुँ ससुरारी । रहेहु जहाँ रुचि होइ तुम्हारी ॥ एहि बिधि करेहु उपाय कदंबा । फिरइ त होइ प्रान अवलंबा ॥

कभी पिताके घर, कभी ससुराल, जहाँ तुम्हारी इच्छा हो, वहीं रहना। इस प्रकार तुम बहुत-से उपाय करना। यदि सीताजी लौट आयीं तो मेरे प्राणोंको सहारा हो जायगा ॥ ३ ॥

नाहिं त मोर मरनु परिनामा । कछु न बसाइ भएँ बिधि बामा ॥ अस कहि मुरुछि परा महि राऊ । रामु लखनु सिय आनि देखाऊ ॥

नहीं तो अन्तमें मेरा मरण ही होगा। विधाताके विपरीत होनेपर कुछ वश नहीं चलता। हा! राम, लक्ष्मण और सीताको लाकर दिखाओ। ऐसा कहकर राजा मूर्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ४ ॥

४१२

  • रामचरितमानस *

दो०—पाड़ रजायसु नाड़ सिरु रथु अति बेग बनाइ।

गयउ जहाँ बाहेर नगर सीय सहित दोउ भाइ ॥ ८२ ॥

सुमन्त्रजी राजाकी आज्ञा पाकर, सिर नवाकर और बहुत जल्दी रथ जुड़वाकर वहाँ गये जहाँ नगरके बाहर सीताजीसहित दोनों भाई थे ॥ ८२ ॥

तब सुमंत्र नृप बचन सुनाए। करि बिनती रथ रामु चढ़ाए ॥

चढ़ि रथ सीय सहित दोउ भाई। चले हृदयँ अवधहि सिरु नाई ॥

तब (वहाँ पहुँचकर) सुमन्त्रने राजाके वचन श्रीरामचन्द्रजीको सुनाये और बिनती करके उनको रथपर चढ़ाया। सीताजीसहित दोनों भाई रथपर चढ़कर हृदयमें अयोध्याको सिर नवाकर चले ॥ १ ॥

चलत रामु लखि अवध अनाथा। बिकल लोग सब लागे साथा ॥

कृपासिंधु बहुबिधि समुझावहिं। फिरहिं प्रेम बस पुनि फिरि आवहिं ॥

श्रीरामचन्द्रजीको जाते हुए और अयोध्याको अनाथ [होते हुए] देखकर सब लोग व्याकुल होकर उनके साथ हो लिये। कृपाके समुद्र श्रीरामजी उन्हें बहुत तरहसे समझाते हैं, तो वे [अयोध्याकी ओर] लौट जाते हैं; परन्तु प्रेमवश फिर लौट आते हैं ॥ २ ॥

लागति अवध भयावनि भारी। मानहुँ कालराति अँधिआरी ॥

घोर जंतु सम पुर नर नारी। डरपाहिं एकहि एक निहारी ॥

अयोध्यापुरी बड़ी डरावनी लग रही है। मानो अन्धकारमयी कालरात्रि ही हो। नगरके नर-नारी भयानक जन्तुओंके समान एक-दूसरेको देखकर डर रहे हैं ॥ ३ ॥

घर मसान परिजन जनु भूता। सुत हित मीत मनहुँ जमदूता ॥

बागन्ह बिटप बेलि कुम्हिलाहीं। सरित सरोबर देखि न जाहीं ॥

घर श्मशान, कुटुम्बी भूत-प्रेत और पुत्र, हितैषी और मित्र मानो यमराजके दूत हैं। बगीचोंमें वृक्ष और बेलें कुम्हला रही हैं। नदी और तालाब ऐसे भयानक लगते हैं कि उनकी ओर देखा भी नहीं जाता ॥ ४ ॥

दो०—हय गय कोटिन्ह केलिमृग पुरपसु चातक मोर।

पिक रथांग सुक सारिका सारस हंस चकोर ॥ ८३ ॥

करोड़ों घोड़े, हाथी, खेलनेके लिये पाले हुए हिरन, नगरके [गाय, बैल, बकरी आदि] पशु, पपीहें, मोर, कोयल, चकवे, तोते, मैना, सारस, हंस और चकोर— ॥ ८३ ॥

राम बियोग बिकल सब ठाढ़े। जहाँ तहाँ मनहुँ चित्र लिखि काढ़े ॥

नगरु सफल बनु गहबर भारी। खग मृग बिपुल सकल नर नारी ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

४१३

श्रीरामजीके वियोगमें सभी व्याकुल हुए जहाँ-तहाँ [ऐसे चुपचाप स्थिर होकर] खड़े हैं, मानो तसवीरोंमें लिखकर बनाये हुए हैं। नगर मानो फलोंसे परिपूर्ण बड़ा भारी सघन वन था। नगरनिवासी सब स्त्री-पुरुष बहुत-से पशु-पक्षी थे। (अर्थात् अवधपुरी अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष चारों फलोंको देनेवाली नगरी थी और सब स्त्री-पुरुष सुखसे उन फलोंको प्राप्त करते थे।) ॥ १ ॥

बिधि कैकई किरातिनि कीन्ही । जेहिं दव दुसह दसहुँ दिसि दीन्ही ॥ सहि न सके रघुबर बिरहागी । चले लोग सब व्याकुल भागी ॥

विधाताने कैकेयीको भीलनी बनाया, जिसने दसों दिशाओंमें दुःसह दावाग्नि (भयानक आग) लगा दी। श्रीरामचन्द्रजीके विरहकी इस अग्निको लोग सह न सके। सब लोग व्याकुल होकर भाग चले ॥ २ ॥

सबहिं बिचारु कीन्ह मन माहीं । राम लखन सिय बिनु सुखु नाहीं ॥ जहाँ रामु तहाँ सबुइ समाजू । बिनु रघुबीर अवध नहिं काजू ॥

सबने मनमें विचार कर लिया कि श्रीरामजी, लक्ष्मणजी और सीताजीके बिना सुख नहीं है। जहाँ श्रीरामजी रहेंगे, वहाँ सारा समाज रहेगा। श्रीरामचन्द्रजीके बिना अयोध्यामें हमलोगोंका कुछ काम नहीं है ॥ ३ ॥

चले साथ अस मंत्रु दृढ़ाई । सुर दुर्लभ सुख सदन बिहाई ॥ राम चरण पंकज प्रिय जिन्हही । बिषय भोग बस करहिं कि तिन्हही ॥

ऐसा विचार दृढ़ करके देवताओंको भी दुर्लभ सुखोंसे पूर्ण घरोंको छोड़कर सब श्रीरामचन्द्रजीके साथ चल पड़े। जिनको श्रीरामजीके चरणकमल प्यारे हैं, उन्हें क्या कभी विषयभोग वशमें कर सकते हैं ॥ ४ ॥

दो०—बालक बृद्ध बिहाइ गूँह लगे लोग सब साथ । तमसा तीर निवासु किय प्रथम दिवस रघुनाथ ॥ ८४ ॥

बच्चों और बूढ़ोंको घरोंमें छोड़कर सब लोग साथ हो लिये। पहले दिन श्रीरघुनाथजीने तमसा नदीके तीरपर निवास किया ॥ ८४ ॥

रघुपति प्रजा प्रेमबस देखी । सदय हृदयँ दुखु भयउ बिसेषी ॥ करुनामय रघुनाथ गोसाँई । बेगि पाइअहिं पीर पराई ॥

प्रजाको प्रेमवश देखकर श्रीरघुनाथजीके दयालु हृदयमें बड़ा दुःख हुआ। प्रभु श्रीरघुनाथजी करुणामय हैं। परायी पीड़ाको वे तुरंत पा जाते हैं (अर्थात् दूसरेका दुःख देखकर वे तुरंत स्वयं दुःखित हो जाते हैं) ॥ १ ॥

४१४

  • रामचरितमानस *

कहि सप्रेम मृदु बचन सुहाए। बहुबिधि राम लोग समुझाए॥ किए धरम उपदेस घनैरे। लोग प्रेम बस फिरहिं न फेरे॥

प्रेमयुक्त कोमल और सुन्दर वचन कहकर श्रीरामजीने बहुत प्रकारसे लोगोंको समझाया और बहुतेरे धर्मसम्बन्धी उपदेश दिये; परन्तु प्रेमवश लोग लौटाये लौटते नहीं ॥ २ ॥

सीलु सनेहु छाड़ि नहिं जाई। असमंजस बस भे रघुराई॥ लोग सोग श्रम बस गए सोई। कछुक देवमायाँ मति मोई॥

शील और स्नेह छोड़ा नहीं जाता। श्रीरघुनाथजी असमञ्जसके अधीन हो गये (दुविधामें पड़ गये)। शोक और परिश्रम (थकावट) के मारे लोग सो गये और कुछ देवताओंकी मायासे भी उनकी बुद्धि मोहित हो गयी ॥ ३ ॥

जबहिं जाम जुग जामिनि बीती। राम सचिव सन कहेउ सप्रीती॥ खोज मारि रथु हाँकहु ताता। आन उपायँ बनिहि नहिं बाता॥

जब दो पहर रात बीत गयी, तब श्रीरामचन्द्रजीने प्रेमपूर्वक मन्त्री सुमन्त्रसे कहा—हे तात! रथके खोज मारकर (अर्थात् पहियोंके चिह्नोंसे दिशाका पता न चले इस प्रकार) रथको हाँकिये। और किसी उपायसे बात नहीं बनेगी ॥ ४ ॥

दो०—राम लखन सिय जान चढ़ि संभु चरण सिरु नाइ।

सचिवँ चलायउ तुरत रथु इत उत खोज दुराइ॥ ८५ ॥

शंकरजीके चरणोंमें सिर नवाकर श्रीरामजी, लक्ष्मणजी और सीताजी रथपर सवार हुए। मन्त्रीने तुरंत ही रथको, इधर-उधर खोज छिपाकर चला दिया ॥ ८५ ॥

जागे सकल लोग भएँ भोरू। गे रघुनाथ भयउ अति सोरू॥ रथ कर खोज कतहुँ नहिं पावहिं। राम राम कहि चहुँ दिसि धावहिं॥

सबेरा होते ही सब लोग जागे, तो बड़ा शोर मचा कि श्रीरघुनाथजी चले गये। कहीं रथका खोज नहीं पाते, सब 'हा राम! हा राम!' पुकारते हुए चारों ओर दौड़ रहे हैं ॥ १ ॥

मनहुँ बारिनिधि बूड़ जहाजू। भयउ बिकल बड़ बनिक समाजू॥ एकहि एक देहिं उपदेसू। तजे राम हम जानि कलेसू॥

मानो समुद्रमें जहाज डूब गया हो, जिससे व्यापारियोंका समुदाय बहुत ही व्याकुल हो उठा हो। वे एक-दूसरेको उपदेश देते हैं कि श्रीरामचन्द्रजीने, हमलोगोंको क्लेश होगा, यह जानकर छोड़ दिया है ॥ २ ॥

निंदहिं आपु सराहहिं मीना। धिग जीवनु रघुबीर बिहीना॥ जौँ पै प्रिय बियोगु बिधि कीन्हा। तौ कस मरनु न मागें दीन्हा॥

  • अयोध्याकाण्ड *

४१५

वे लोग अपनी निन्दा करते हैं और मछलियोंकी सराहना करते हैं। [कहते हैं—] श्रीरामचन्द्रजीके बिना हमारे जीनेको धिक्कार है। विधाताने यदि प्यारेका वियोग ही रचा, तो फिर उसने माँगनेपर मृत्यु क्यों नहीं दी!! ३ ॥

एहि बिधि करत प्रलाप कलापा । आए अवध भरे परितापा ॥ बिषम बियोगु न जाइ बखाना । अवधि आस सब राखहिं प्राना ॥

इस प्रकार बहुत-से प्रलाप करते हुए वे सन्तापसे भरे हुए अयोध्याजीमें आये। उन लोगोंके विषम वियोगकी दशाका वर्णन नहीं किया जा सकता। [चौदह सालकी] अवधिकी आशासे ही वे प्राणोंको रख रहे हैं ॥ ४ ॥

दो०—राम दरस हित नेम व्रत लगे करन नर नारि।

मनहुँ कोक कोकी कमल दीन बिहीन तमारि ॥ ८६ ॥

[सब] स्त्री-पुरुष श्रीरामचन्द्रजीके दर्शनके लिये नियम और व्रत करने लगे और ऐसे दुःखी हो गये जैसे चकवा, चकवी और कमल सूर्यके बिना दीन हो जाते हैं ॥ ८६ ॥

सीता सचिव सहित दोउ भाई । सुंगबेरपुर पहुँचे जाई ॥

उतरे राम देवसरि देखी । कीन्ह दंडवत हरषु बिसेषी ॥

सीताजी और मन्त्रीसहित दोनों भाई शृंगवेरपुर जा पहुँचे। वहाँ गङ्गाजीको देखकर श्रीरामजी रथसे उतर पड़े और बड़े हर्षके साथ उन्होंने दण्डवत् की ॥ १ ॥

लखन सचिवै सियै किए प्रनामा । सबहि सहित सुखु पायउ रामा ॥

गंग सकल मुद मंगल मूला । सब सुख करनि हरनि सब सूला ॥

लक्ष्मणजी, सुमन्त्र और सीताजीने भी प्रणाम किया। सबके साथ श्रीरामचन्द्रजीने सुख पाया। गङ्गाजी समस्त आनन्द-मङ्गलोंकी मूल हैं। वे सब सुखोंकी करनेवाली और सब पीड़ाओंकी हरनेवाली हैं ॥ २ ॥

कहि कहि कोटिक कथा प्रसंगा । रामु बिलोकहिं गंग तरंगा ॥

सचिवहि अनुजहि प्रियहि सुनाई । बिबुध नदी महिमा अधिकाई ॥

अनेक कथा-प्रसङ्ग कहते हुए श्रीरामजी गङ्गाजीकी तरङ्गोंको देख रहे हैं। उन्होंने मन्त्रीको, छोटे भाई लक्ष्मणजीको और प्रिया सीताजीको देवनदी गङ्गाजीकी बड़ी महिमा सुनायी ॥ ३ ॥

मज्जनु कीन्ह पंथ श्रम गयऊ । सुचि जलु पिअत मुदित मन भयऊ ॥

सुमिरत जाहि मिटइ श्रम भारू । तेहि श्रम यह लौकिक व्यवहारू ॥

इसके बाद सबने स्नान किया, जिससे मार्गका सारा श्रम (थकावट) दूर हो गया और पवित्र जल पीते ही मन प्रसन्न हो गया। जिनके स्मरणमात्रसे [बार-बार जन्मने और मरनेका] महान् श्रम मिट जाता है, उनको 'श्रम' होना—यह केवल लौकिक व्यवहार (नरलीला) है ॥ ४ ॥

४१६

  • रामचरितमानस *

दो०—सुद्ध सच्चिदानंदमय कंद भानुकुल केतु। चरित करत नर अनुहरत संसृति सागर सेतु ॥ ८७ ॥

शुद्ध (प्रकृतिजन्य त्रिगुणोंसे रहित, मायातीत दिव्य मङ्गलविग्रह) सच्चिदानन्द-कन्दस्वरूप सूर्यकुलके ध्वजारूप भगवान् श्रीरामचन्द्रजी मनुष्योंके सद्गुरु ऐसे चरित्र करते हैं जो संसाररूपी समुद्रके पार उतरनेके लिये पुलके समान हैं ॥ ८७ ॥

यह सुधि गुहँ निषाद जब पाई। मुदित लिए प्रिय बंधु बोलाई॥ लिए फल मूल भेंट भरि भारा। मिलन चलेउ हियँ हरषु अपारा ॥

जब निषादराज गुहने यह खबर पायी, तब आनन्दित होकर उसने अपने प्रियजनों और भाई-बन्धुओंको बुला लिया और भेंट देनेके लिये फल, मूल (कन्द) लेकर और उन्हें भारों (बहँगियों)-में भरकर मिलनेके लिये चला। उसके हृदयमें हर्षका पार नहीं था ॥ १ ॥

करि दंडवत भेंट धरि आगें। प्रभुहि बिलोकत अति अनुरागें॥ सहज सनेह बिबस रघुराई। पूँछी कुसल निकट बैठाई॥

दण्डवत् करके भेंट सामने रखकर वह अत्यन्त प्रेमसे प्रभुको देखने लगा। श्रीरघुनाथजीने स्वाभाविक स्नेहके वश होकर उसे अपने पास बैठाकर कुशल पूछी ॥ २ ॥

नाथ कुसल पद पंकज देखें। भयउँ भागभाजन जन लेखें॥ देव धरनि धनु धामु तुम्हारा। मैं जनु नीचु सहित परिवारा ॥

निषादराजने उत्तर दिया—हे नाथ! आपके चरणकमलके दर्शनसे ही कुशल है [आपके चरणारविन्दोंके दर्शनकर] आज मैं भाग्यवान् पुरुषोंकी गिनतीमें आ गया। हे देव! यह पृथ्वी, धन और घर सब आपका है। मैं तो परिवारसहित आपका नीच सेवक हूँ ॥ ३ ॥

कृपा करिअ पुर धारिअ पाऊ। थापिअ जनु सबु लोगु सिहाऊ॥ कहेहु सत्य सबु सखा सुजाना। मोहि दीन्ह पितु आयसु आना ॥

अब कृपा करके पुर (श्रृंगवेरपुर)-में पधारिये और इस दासकी प्रतिष्ठा बढ़ाइये, जिससे सब लोग मेरे भाग्यकी बड़ाई करें। श्रीरामचन्द्रजीने कहा—हे सुजान सखा! तुमने जो कुछ कहा सब सत्य है। परन्तु पिताजीने मुझको और ही आज्ञा दी है ॥ ४ ॥

दो०—बरष चारिदस बासु बन मुनि ब्रत बेषु अहारु। ग्राम बासु नहिं उचित सुनि गुहहि भयउ दुखु भारु ॥ ८८ ॥