भारतकोश
संग्रह पर लौटें

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

Devanagarihipublished544 पृष्ठ

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बिखरे हुए अयालोंवाला भयंकर-मुखाँ केशरी सिंह, अत्यन्त मद्दमत्त थाथो, बुद्धिमान और समर-शूर पुरुष भी स्त्रीके सामने परम कायर—डरपोक हो जाते हैं।

स्त्रीके चाहनेसे पुरुष क्या नहीं दे देता और कौनसा काम नहीं कर बैठता ? स्त्रोंकी इच्छासे पुरुष घोड़े न होने पर भी, घोड़ेकी तरह हींसते और अपनी पीठ पर नारीको चढ़ाकर चलते हैं तथा पर्वके दिन—सिर मुँडाकेकी ममानियत होने पर भी—सिर मुँडाकर स्त्रीके चरणोंमें गिरते हैं।

भाई ! स्त्री जब पुरुषको अपने क़ाबूमें कर लेती है, तब उसे मंदारीके बन्दरकी तरह इच्छानुसार नचाती है। पुरुष भी, कार्य-अकार्यका ज्ञान गँवाकर, उसकी इच्छा पर चलता है। खैर, बहुत हुआ ; आप एक बार मेरे अनुरोधसे भाभीकी परीक्षा अवश्य करें।” यह कह वह अपने घर चला गया। मैंने भी विचार किया, तो उसकी बातें ठीक जान पड़ीं। भगवान् सर्वज्ञ और अन्तर्यामी हैं। वे प्राणिमात्रके घटघटकी जानते हैं। उनसे कुछ भी छिपा नहीं है, इसवास्ते उन्हें अपने भक्तोंकी परीक्षा करनेकी ज़रूरत नहीं। फिर भी ; वे उनकी परीक्षा करते हैं और जो भक्त उनकी परीक्षामें पास या उत्तीर्ण हो जाते हैं, उन्हें वे अपना दास बनाते और सब तरहसे सुखी करते हैं। फिर ; मैं भी भगवान्की तरह अपनी स्त्रीकी परीक्षा क्यों न करूँ ? परीक्षा करनेमें हानि ही क्या है ? परीक्षाका फल मेरे बड़े काम आयेगा। अगर खरा सोना निकला, तो मैं अपने प्यारकी मात्रा

This is a high-contrast, black-and-white photograph of a blank page from a book. The page itself is mostly white, with some very faint, illegible markings that appear to be bleed-through from the other side of the paper. On the right side of the image, a person's hand is visible, with the thumb and part of the index finger holding the edge of the page. The binding of the book is visible on the far right, showing a dark, textured material. The overall lighting is harsh, creating deep shadows and bright highlights.

शृङ्गारशतक

मैं पेड़ पर बैठा ही था कि, इतनेमें किसीने आकर खिड़कीके किवा खटखटाये और धीरेसे कहा—“कुरुणा ! किवाड़ खोल” । कुरुणा का खोका नाम था । कुरुणाने आकर दरवाजा खोल दिया । तब आगन्तुक ने कहा—“मैं थोड़ी देरमें नशोपत्त से टिचन होकर आता तुम खाने-पीने का इन्तज़ाम करो ।”

Popular Press—Calcutta.

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और भी बड़ा दूँगा । लोग भी फिर इस तरह की दिल बिगाड़ने-वाली बातें न बनायेँगे । भगवान् रामचन्द्र जानते थे कि, सीता एकदम निर्दोष है, खरा सोना है ; चन्द्रमा कलङ्गी है, पर सीता निष्कलङ्गी है । इतने पर भी, उन्होंने सीताको अग्नि-परीक्षा की । उसका नतीजा अच्छा ही हुआ । सीताका और उनका—दोनोंका ही मुँह संसारके सामने उज्ज्वल हुआ । मैं भी वैसे हो क्यों न कहूँ ?

इस तरह सोच-विचारकर, एक दिन मैंने अपनी लीसे कहा—“आज मुझे बड़ा ज़रूरी काम है । वह काम बिना बाहर जाये हो नहीं सकता ।” वह मेरी बात सुनते ही मेरे गले लगकर ज़ार-ज़ार रोने लगी और कहने लगी—“स्वामिन् ! आपका एक क्षणभरका वियोग भी मैं सहन नहीं कर सकती । आपके बिना मेरा जीवन ख़तरेमें समझिये । आप मुझे छोड़कर कहीं न जाइये ।” उसका उस समयका रोना-कलपना देखकर मेरा दिल कमज़ोर होने लगा । मैं मन-हो-मन कहने लगा—‘हाय ! मैं ऐसी सतीको क्या क्यों दुःख दे रहा हूँ ? लोगोंकी ऊल-जल्लूल बातोंमें आकर, मैं क्यों अपने सुखको मिट्टा कर रहा हूँ ? अच्छल हिमालय चलायमान हो तो हो सकता है, सुमेरु अपने स्थानसे डिगे तो डिग सकता है, सूर्य पूरबकी जगह पच्छिममें उगे तो उग सकता है, समुद्र अपनी मर्यादा उल्लङ्घन करे तो कर सकता है, अग्नि अपनी दाहक शक्ति त्यागे तो त्याग सकता है ; पर मेरी यह प्राणप्यारी-असती या कुलटा

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नहीं हो सकती। मैं ऐसे ही विचारोंमें गूँते जा रहा था कि, अन्दरसे मेरी अन्तरात्माने कहा—‘कदाचित तुम्हारा ख्याल ठीक हो, पर परीक्षा कर लेनेमें ही कौनसा हर्ज है ? एक बार परीक्षा कर लेनेसे सदाको वहम मिट जायगा। मैंने खीसे कहा—‘काम ज़रूरी न होता, तो मैं तुम्हें इतनी तकलीफ़ न देता। इस बार मुझे जाने दो, भविष्यमें कहीं न जाऊँगा।’ उसने कहा—‘तुम्हारे बिना मैं रातभर अकेली कैसे रहूँगी ? मुझे घर खानेको दौड़ेगा। अपने एकमात्र आश्रय तुम्हें छोड़कर मैं कैसे जीऊँगी ? तुम्हारे बिना मुझे एक पल प्रलयके समान मालूम होता है।’ यह कहते-कहते वह फिर फूट-फूटकर रोने लगी। उसकी कमलसी आँखोंसे गङ्गा-जमुनाकी सी धारें बहने लगीं। आँसुओंके मारे उसका आँचल और मेरा कुर्ता तर हो गये। मैंने कहा—‘बिना जाये काम न चलेगा, बड़ा नुकसान होगा। अब मेरे दिलको कच्चा न करो। श्यामाकी माँसे कहे जाता हूँ। वह आकर रातको तुम्हारे पास सो रहेगी।’ उसने कहा—‘नहीं, नहीं, मैं आपका नुकसान नहीं चाहती, आपका नुकसान भी तो मेरा ही नुकसान है। लाबारी है। आप चिन्ता छोड़िये। श्यामाकी माँको मैं ही बुला लूँगी। आप भगवान्का नाम लेकर यात्रा कीजिये। देखो, राह-बाटमें सब तरहसे होशियार रहना।’

मैं उसे दम-दिलासा देकर घरसे बाहर निकल गया। उस समय सन्ध्याके पाँच-साढ़े पाँच बजे होंगे। थोड़ासा दिन

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बाकी था। कुछ रात होने तक मैं इधर-उधर फिरता रहा। ज्योंही अन्यकारका पूर्ण राज्य हो गया, हाथको हाथ न सुकने लगा, मैं अपनी बिड़कीके सामने खड़े हुए इमलीके पेड़पर चढ़ गया। ध्यान रहे कि, मेरे घरके चारों तरफ एक चहारदीवारी थी। उस वृक्षसे मेरे घरका क़रीब-क़रीब बहुतसा हिस्सा दिखाई देता था। मैं पेड़ पर बैठता ही था कि, इतनेमें किसीने आकर बिड़कीके किवाड़ खटखटाये और धीरेसे कहा—“क़रुणा! किवाड़ खोल।” आनेवालेकी आवाज़ मेरी जानी हुई स्त्री मालूम हुई। क़रुणा मेरी स्त्रीका नाम था। क़रुणाने आकर दरवाज़ा खोल दिया। तब उस मर्दने कहा—‘मैं थोड़ी देरमें नशे-पत्तेसे टिचन होकर आता हूँ। तुम खाने-पीनेका इन्तज़ाम करो।’

यह कहकर वह आदमी चला गया। क़रुणा बिड़कीके किवाड़ बन्द करके, रसोईकी धुनमें लगी। सड़कपर सामने लाल्टेन जल रही थी। जब वह लाल्टेनके नज़दीक पहुँचा, तब मैंने रोशनीमें उसका चेहरा देखकर पहचान लिया। वह और कोई नहीं; हमारे पाड़ेका चौकीदार था। वह कभी-कभी मेरे घर आया-जाया करता था।

‘खाने पीनेका इन्तज़ाम करो’—इस फ़िक्रको सुनते ही मेरे रोंगटे खड़े हो गये। शरीर धर-धर धर-धर कांपने लगा। ज़मीन घूमती हुई मालूम होने लगी। आँखोंके सामने अँधेरा छा गया। ऐसा मालूम होने लगा, मानो मैं अभी पेड़से नीचे

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गिर पड़ूँगा। थोड़ी देरमें अपने दिलको मज़बूत करके, मैं सम्हल बैठा और निश्चय किया कि, देखना चाहिये, आगे क्या होता है। कोई दो घण्टे बाद उसी चौकीदारने आकर फिर आवाज़ दी। आवाज़ सुनते ही कृष्णा दौड़ी आई और दरवाज़ा खोल दिया। दरवाज़ा खुलते ही, उसने कृष्णाको गोदमें उठा, उसका मुँह चूम लिया। इतना ही नहीं ; उसने द्वार पर ही उसे जोरसे छातीके चिपटा लिया और बोसे-पर-बोसे लेने लगा। फिर वह उसे गोदमें लिये हुए ही घरके भीतर दाबिल हो गया। मैं अन्दाज़से समझ गया कि, दोनों मेरे पलंग पर जा बैठे हैं। कुछ देरमें उनकी धीरे-धीरे आनेवाली आवाज़से मालूम हुआ कि, मज़ेमें गाना गाया जा रहा है। कभी-कभी हँसी-मजाक भी होता है। ऐसा मालूम होता था, मानो दोनों बेखटके हैं। उन्हें जरा भी डर या खौफ़ नहीं है।

इधर खिड़की तो बन्द कर दी गई, पर जल्दीमें साँकल बन्द नहीं की गई। उस समय मेरी तुरी हालत थी, कोधके मारे काँप रहा था। दिलमें इतना जोश आया कि, उसी समय उनके सामने जाकर खड़े हो जानेकी इच्छा होने लगी ; पर अकड़ कहती थी, जरा धीरजसे काम लो। इसलिये मनको रोक कर कहा—‘ओह ! यह तो परले सिरकी व्यभिचारिणी है, कुलटा है, नीच है, दूगाबाज़ है, बेवफ़ा है। इस पर क्रोध करने-से क्या फ़ायदा ? पिसेको पीसनेसे क्या लाभ ? जो हो गया

शुद्धाश्रयतक

उसने द्वार पर ही उसे जोरसे छातीसे चिपटा लिया और बोसै पर बोसै लेने लगा। फिर वह उसे गोद में लिये हुए ही अपने मोतर दाखिल हो गया। कुछ देरों, उनकी धीरे-धीरे आनंदाली आवाज से माहसूस हुआ कि सब में गाना गाया जा रहा है।

शृङ्गारशतक

कुछ देर बाद देखा कि कदगा बाहरकी तिनदीमें आकर खड़ी है, उसके सिरके बोला बिखर रहे हैं और धोती बिल्कुल खुली हुई है। उसने मेरे हुक में तमाखू चढ़ाई और उसे भीतर दे आई ; फिर वह रसोईमें घुसी ।

POPULAR PRESS—CALCUTTA.

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है, वह तो अब मिट नहीं सकता । अगर यह आज पहले-पहल ही कीचमें फँसती, तो इसे न फँसने देता ; पर यह तो कबकी अग्र हो चुकी है । मैं बहुत दिनोंसे धोखा खा रहा था । अब क्या ? इसलिये धीरज धरकर देखना चाहिये कि, आगे क्या-क्या होता है ।

इस तरह दिलको समझा-बुझाकर, आगेकी नयी घटना देखनेकी राह देख रहा था । कुछ देर बाद देखा, कि करुणा बाहरकी तिद्रीमें आकर खड़ी है । उसके सिरके बाल बिखर रहे हैं और धोती बिल्कुल खुली हुई है । यह तमाशा देखकर मेरी तबियत फिर भड़क उठी । लेकिन थोड़ी देरमें फिर सम्हल गई । सुभे खूब याद है, उसने धोती पहन कर, मेरे हुक्केमें तमाखू चढ़ाई और उसे भीतर दे आई । फिर वह रसोईमें घुसी । वहाँ जाकर उसने देखा कि, वह जो कुछ चूल्हे पर चढ़ा गई थी वह जलकर खाक हो गया है । उसने जली हुई चीज़को धोकर बर्तन साफ़ किया और उसमें फिर कोई चीज़ पकनेको रखी । इन कामों में उसे एक घण्टेके क़रीब लगा । भोजन तैयार हो जानेपर, उसने आसन बिछा दिया । आसनके सामने चौकी रखकर, बग़लमें जलसे भरा एक चाँदीका लोटा और गिलास रख दिया । फिर वह रसोईमें जाकर थाल सजाने लगी । ये सब—कुछ तो देखकर और कुछ अटकल लगा कर मैंने समझ लिया ।

अब ज़ियादा बर्दाश्त न हुई । एकदमसे जोश आ गया । मैं

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धीरे-धीरे वृक्षसे उत्तरा और चुपचाप बिड़कीकी राह घरमें घुस गया। जाकर क्या देखता हूँ, कि घूलसे भरे हुए पैरोंसे चौकीदार मेरे दूधके समान सफ़ेद और नमॉनर्म पलंग पर बेखबर सो रहा है। भाई, उस समय मेरे दिलको क्या हालत हुई होगी, इस बातका अन्दाज़ा तुम खुद ही कर सकते हो। मैं तो उसे अपने पलंग पर सोते हुए देखते ही जल कर खाक हो गया। पड़ीसे चोटी तक खून गर्म हो गया। क्रोधकी हद न रही। सब तो यह है कि, मैं गुस्सेसे अन्धा हो गया। मुझे जरा भी होश न रहा। सामनेसे देखा कि, चौकी पर चाँदीका थाल रख दिया गया है। सामने ही एक गँडासा पड़ा दीखा। मैंने आव देखी न ताव, चटसे गँडासा उठाकर चौकी-दारकी गर्दन पर मारा और उसका सिर धड़से जुदा कर दिया। इन बातोंके कहनेमें देर लगी है, पर उसका काम तमाम करनेमें देर न लगी। मैं, फौन ही उद्रे पैरों बाहर आकर, उसी वृक्ष पर चढ़ गया।

मेरे वृक्षपर चढ़ जानेके बाद, कहणा रसोईसे निकल कर चौकीदारको भोजनके लिए बुलानेको कमरमें घुसी। वहाँ जाकर उसने देखा कि, बिस्तर खूनसे लथपथ हो रहा है और चौकीदारका सिर धड़से अलग पड़ा हुआ है। वह वहाँका दृश्य देखकर घबरा गई, क्योंकि उसके सरसे पसीना टपक रहा था और होश-हवास फ़ाड़ता थे। बाहर एक शामादान जल रहा था। वह उसके सामने खड़ी होकर, सिरपर हाथ रखकर, कुछ

A high-contrast, black and white photograph of a blank page from a book. The page is held open by a hand, with the thumb and part of the index finger visible on the right side. The page itself is mostly white, with some very faint, illegible markings or shadows that appear to be bleed-through from the other side of the paper. The lighting is harsh, creating deep shadows and bright highlights, which emphasizes the texture of the paper and the skin of the hand. The background to the right of the page is dark and indistinct.

टमासपान

सामने ही एक गंडासा पड़ा देखा । मैंने आव देखा न ताव ; चटपसे गंडासा उठा कर चौकीदार की गल्लन पर मारा और उसका सिर धड़पसे जुटा कर दिया । मैं फौरन ही उलटे पैरों आकर उसी ठुंच पर चढ़ गया । कहूणा रसोई से निकल कर चौकीदार को भोजन के लिये बुलाने को कभरे में पुसी । वह बहों का दृश्य देख कर चक्करा गड़े । उसके सरस्ते पत्तीना टपक रहा था ; होश-हवास फाटला हो गये थे ।

किंग पर दाराज उल्लेख करने के लिये... (faint text at the bottom right)

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सोचने लगी और रह-रहकर लम्बे साँस लेने लगी। फिर वह बैठ गई और कुराब आध घण्टेतक उसी तरह बैठो रही। इसके बाद उसने खानेका सामान चौकीसे उठाकर रसोईमें रख दिया। पीछे उसने एक टाटकी बोरी लाकर, उसमें चौकीदार की लाश रखी और उसका मुँह अच्छी तरहसे बाँधकर उसे स्तर पर उठा लिया और एक कुदाल हाथमें लेकर घरसे बाहर निकली। कहनेकी ज़रूरत नहीं कि, वह घरसे बाहर जाते समय बिड़कीका ताला बन्द करती गई। उसके कुछ दूर चले जानेपर, मैं भी पेड़से नीचे उतर, कुछ फ़ासिलेसे, उसके पीछे हो लिया। वह उस लाशको सरपर रखे हुए, दो कोस दूरके एक इमशान-घाट पर पहुँची। लाशको नीचे पटक कर, उसने एक गहरा खड्डा खोदा और उसमें लाश दफना दी। इसके बाद वह फिर घर लौटी और थोड़ी देरमें घर पहुँच गई। मैं भी उसके पीछे-पीछे आकर उसी पेड़ पर चढ़ गया।

मैं उसी वृक्षसे फिर देखने लगा, कि अब वह क्या करती है। घरमें आकर उसने दरवाज़ा बन्द कर दिया और बिस्तर, चादर और लिहाफ़ वगैरः गोबर और पानीसे मलमलकर धोने लगी; लेकिन खून न छूटा, तब उसने उन्हें एक बड़ी बाल्टीमें भिगो दिया। तत्कृतपोश और ज़मीन पर जो खूनके दाग थे, वे सब उसने गोबर और मिट्टीसे साफ़ कर दिये। ये सब काम करके, वह दालानमें आकर कुछ सोचने लगी।

इस समय मेरा क्रोध कुछ कम हो गया, लेकिन दिल नफ़-

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रतसे भर गया। मैं मन-ही-मन कहने लगा—‘जो खी पतिका गोदमें बैठकर रह-रहकर काँप उठती थी, जो घरमें बूहेके खड़का करनेसे डर जाती थी, वही आज मोटी-ताजी लाशको, जिसे दो आदमी भी आसानीसे उठा नहीं सकते, सिरपर रखकर, अकेली, रातके एक बजे श्मशान पर पहुँची ! जो खी अपना मतलब साधनेके लिए ऐसे-ऐसे काम कर सकती है, उसके लिए ऐसा कौनसा काम है, जिसे वह न कर सकती हो ? यह अबला कुल-कामिनी है या आदमीको कच्चा ही चबा-डालने वाली सबला राक्षसी है ? क्या मेरे आदर और प्यारका यही नतीजा है ? कौन कह सकता है कि, यह किसी दिन मुझे भी न मार डालेगी ? रोशनीके नीचे अँधेरा रहता है, अब यह बात मेरी समझमें अच्छी तरहसे आ गई। अब मेरी आँखें खुल गईं। मेरे मित्रोंने मुझे कितनी ही बार सावधान किया, पर उस समय मेरी आँखों पर पर्दा पड़ा हुआ था। मेरी मति मारी गई थी। मेरे हाथमें चिराग था, इसलिए मुझे कुछ न दीखता था। अब मोहका पर्दा हटते ही, चिराग दूसरेके हाथमें जाते ही—मुझे अपना बुरा-मला दीखने लगा। अब भी मैं सावधान हो सका हूँ, इसके लिए मैं अपने तर्ज धन्यवाद देता हूँ। अस्तु, सवेरा होनेमें विशेष देरी न देखकर, मैं पेड़से नीचे उतर आया और खिड़की के पास जाकर आवाज़ लगाई। मैंने इन्हीं जल्दी दो तीन आवाज़ें लगाईं कि, वह और कुछ सोचनेका मौका न पा सकी। अतः उसने फौरन दरवाज़ा खोल दिया।

शुभारभ्युतक

उसने एक टाटकी बोरीं लाकर उसमें चौकीदारकी लाश रखी और उसका मुँह बन्द करके तुरन्तसे बौधिनर उसे सिर पर उठा लिया और एक छुराला हाथमें लेकर घरमें बाहर निकली। मैं भी कुछ फासलसे उसके पीछे हो लिया। वह, लाशको सिर पर रखे हुए, अस्मान वाट पर पहुँची। लाशको नीचे पटक कर, उसने एक गद्दारा गड्ढा खादा और उसमें लक्ष्मी दफन दी।

LOVE-LAKSHMI PUZZLES—GANGUTTA.

This image shows a blank, off-white page. A person's finger is visible at the bottom left corner, partially obscuring the page. There are some very faint, illegible markings or ghosting of text from the reverse side of the paper, particularly in the center and right-hand areas. The overall appearance is that of a scanned document page that is mostly empty.

( ३२१ )

मेरे घरमें घुसते ही, उसने भटपट बैठनेके लिए आसन बिछा दिया। इसके बाद उसने हुक्का चढ़ाकर मेरे हाथोंमें दे दिया और कहने लगी—“तुम कह गये थे, पता नहीं मैं कितनी रात रहे चला आऊँ, इसलिये अभी तक दिया वाले बैठी हूँ। तुम जैसा कठोर कोई न होगा। श्यामाकी माँको बुलाने आदमी भेजा था, मगर मालूम हुआ कि वह घरमें नहीं है। इसीसे चिराग जलाये बैठी हुई, तुम्हारी राह देख रही हूँ। मालूम होगा है, सवेरा होनेमें अब देर नहीं है।”

हुक्काका जल खराब होनेका बहाना करके, मैंने जेबसे सफ़री हुक्का निकाला और उस पर चिलम रखकर पीने लगा। साथ ही उसकी बातचीतका ढ़ंग और चेहरेका उतार-चढ़ाव देखने लगा। देखा, आज रातको घरमें इतनी गड़बड़ी हो गई है, ऐसी भयङ्कर घटना घटी है, लेकिन उसके चेहरेसे वह बात मालूम नहीं होती। वह पहले जिस तरह प्यार-मुहब्बतसे बातें किया करती थी, आज भी वैसे ही कर रही है। किसी बातमें ज़रा भी फ़र्क नहीं। मैंने पूछा—“बिस्तर चौकमें क्यों पड़ा है ?” उसने भट जवाब दिया—“अकस्मात् विछोने आकर पेशाब कर दिया। क्या करती, लाचार होकर कपड़े पानीमें भिगो दिये हैं। रातको तालाब पर कैसे जा सकती थी ?” मैंने पूछा—“यह आसन किस लिए बिछा हुआ है ?” उसने कहा—“आपके सिवा और किसके लिये ? आप आयेगे, इसलिये सब तरहकी तैयारी कर रखी है। भोजन-भोजन सब तैयार

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है। सिर्फ़ खाने-भरकी देर है। लाऊँ क्या ? आप थके हुए हैं, इसीसे विलम्ब कर रही हूँ।” मैंने कहा—“अभी नहीं खाऊँगा। रातको बहुत खा लिया था, इसलिये पेट भरा हुआ है। ज़रा बड़ी बोरो तो लाओ। कुछ काम है।” उसने कहा—“उस पर बिछीने हग दिया था, इसलिये वह भिगो रखी है।” मैंने कहा—“यहाँ जो कुंदाँल रखो था, वह कहाँ गया ?” उसने कहा—“अमृत बावूका लड़का ले गया था, पर जब उसने लौटा कर दिया तो वह कीचमें सना हुआ था, इसलिये उसे भी पानीमें भिगो रखा है।” उसके ये सब जवाब सुनकर मैंने झुँभलाते हुये कहा—“इस बड़े घेलेमें कुछ रख और फिर उसे दमशान-घाट ले जाकर क्या किया था ?” मेरी यह बात सुनते ही, उसके सम्मुखमें कुछ शेष न रहा। उसने एकदमसे जल-भुनकर कहा—“ओह ! तुही वह कलमुहाँ है ?” यह कहते हुए, उसने सामने रखा हुआ गंडासा उठाकर मेरी पीठ पर मारा। मैं उससे कुछ न कह, अपनी पीठपर पट्टी बाँध, चुपचाप घरसे निकल आया। इस समय सूरज पूरा ऊँचा चढ़ आया था। लोग अपने-अपने काम-धन्वोंमें लग गये थे। मैंने कहा शास्त्रमें ठीक ही लिखा है—

आस्तां तावत्किमन्येन दौरात्म्येनेह योषिताम् ।

विधृतं स्तोद्रेणापि ध्वन्ति पुत्रं स्वर्कं रूपा ॥

स्त्रियोंके दौरात्म्यको हृद नहीं—ये नाराज़ होकर अपने पेटसे निकले हुए पुत्रको भी मार डालती हैं।

शुभारम्भानक

उसने मेरे बैठने के लिए सट्टार खासन बिछा दिया। इसके बाद हुआ जूठा कर मेरे हाथों में दे दिया। मेरी बात सुनते ही वह सब समझ गई और जवा-मुन कर बोली—“खरे! तुझे वह कलसुख है।” यह कहते हुए उसने सामने रखा हुआ

गंगासा उद्यानर मेरी पित्त प्य मारा।

POPLAR PRESS—CALCUTTA