शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
श्रृङ्गारशतक
कन्दर्पकलाने, उसे नींदके बशीभूत जान, यारसे मिलनेकी यानी । उसने उठकर सोलह, श्रृंभार किये और सजधज कर यारसे मिलने चली । घरमें चोरी करनेकी गरजसे आया हुआ चोर भी, राहमें उसके क़ीमती जे वरात छीन लेनेकी इच्छासे, उसके पीछे लग लिया ।
Popular Press—Calcutta.
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सब लोग दिनभर काम-काजमें लगे रहे थे । आतन्द्रका दिन था, इसलिए सभीने विजयाका नशा किया और नशेमें खूब खाया । रातको थक जाने और नशेमें गूँक हो जानेसे सभी बेवबर होकर सो रहे । घरमें जाने-आनेकी रोक नहीं थी ; इसलिये मौका पाकर एक चोर घरमें घुस आया । वह अपनी घात लगा रहा था, इतनेमें उसने अपने यारसे मिलनेको जानेवाली कन्दर्पकलाके पैरोंकी पायेजैवोंकी भक्तकार सुनी । वह फ़ौरन ही एक कोनेमें डुबक गया । आधीरातका समय होनेके कारण, पूरब दिशा रूपी प्रमदाका आलिंगन करके बैठा हुआ चन्द्रमा अपने पूर्ण प्रकाशको आम प्रभुति वृक्षोंके पत्तों पर फैला चुका था । चारों ओर चाँदनीकी चादर बिछी हुई थी । कुमुदनी खिल चुकी थी । दिनमें सूरजके तापसे सन्तप्त हुआ आकाश सुधाकरकी शीतल चाँदनी छिटकनेसे सुशीतल हो गया था । मनुष्य और पशुपक्षी सभी निद्रादेवीकी गोदमें अचेत पड़े हुए थे । चारों ओर निस्तम्भताका अखण्ड साम्राज्य था । ऐसे समयमें कन्दर्पकला छम-छम करती हुई घरसे निकली और लताकुञ्जमें अपने उपपति-से मिलने चली । उस चोरने जो एक कोनेमें छिपा हुआ था, इस रमणोंको अकेली जाते देख, एकान्त स्थलमें इसके गहने उतार लेनेका अच्छा मौका समझा और इसके पीछे हो लिया ।
अब जरा कन्दर्पकलाके यारका भी हाल सुनिये । रात बहुत बीत गई ; यहाँतक कि आधी भी ढल गई, पर उस प्रेमीकी प्रिया न आई ; इसलिये वह अपनी प्रियतमाके न मिलनेसे अत्यन्त दुःखी
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हुआ । बारम्बार, पागलकी तरह वृक्षोंसे बातें करने लगा । अगर हवाके चलनेसे पत्ता भी खड़खड़ाता, तो वह धुन बाँधकर देखने लगाता और चौँककर कहने लगाता,—“अबके मेरी प्यारी—हृदयहारिणी सुन्दरी आई ।” पर जब कोई न आता, तो निराश होकर पछताने लगाता । चूँकि शुक्लपक्ष—उजेल पाख था, चन्द्रमाकी चाँदनी अपनी अपूर्व छटा दिखा रही थी । मन्दी-मन्दी हवा चल रही थी, स्थान भी अतीव रमणीय था, चारों ओर सुहावने वृक्ष-ही-वृक्ष थे । चम्पा, चमेली, केतकी और गन्धराजकी सुगन्धसे वन-का-वन महक रहा था । कामोत्तेजक सारे सामान मौजूद थे । इसलिये ज्यों-ज्यों रात बीतती थी, उसका हृदय कामाग्नि और वियोगगनिसे जला जाता था । निदान वह अधीर हो गया । कामके तापको सह न सका । अगर उसकी प्यारीका मुखचन्द्र उसे दीख जाता, तो उसकी अग्नि शान्त हो जाती । पर उस रातको वह न आई, इसलिये घोर दुःखसे दुःखी होकर, एक भाड़से लिपटी हुई लतासे फाँसी खाकर और अपने अमूल्य प्राण त्यागकर यमसदनका राही हुआ । उस प्रेमीके प्राणत्याग कर चुकनेके थोड़ी देर बाद ही, कन्दर्पकला उस उपवनमें पहुँची । उसने अपने हृदयके हार, प्राणप्यारको मोतियोंकी मालाओं और रत्नजटित आभूषणोंसे अलंकृत देखा । चन्द्रमाकी चाँदनीमें सारे जूवर चमाचम चमक रहे थे । उसका सुन्दर शरीर रंगबिरंगे बहुमूल्य वस्त्रोंसे सुशोभित था, परन्तु वह अपूर्व पदार्थ—शरीरका रत्न, समस्त सुखोंको
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भोगनेवाला—चैतन्य-चन्द्र उसकी देहसे सदाके लिए अलग हो चुका था। हँसा उड़ गया था, खाली देह लटक रही थी। घरमें रहनेवाला गायब हो गया था, खाली घर पड़ा था। प्राणविहीन देह लटक रही थी। उस लाशके आस-पास कुछ पशुपक्षी उड़ रहे थे। फाँसी लगाते समयकी आवाज़ सुनकर पक्षी जाग पड़े थे और उस लाशके ईर्ष-गिर्द जमा हो गये थे। इन पशुपक्षियोंको देखकर वह नाना प्रकारकी आशंका करने लगी। उसके चित्तमें एक-पर-एक संकल्प-विकल्प उठने लगे। वह अत्यन्त भयभीत हुई। खैर, अन्तमें वह उसके पास पहुँची और उसके गले लगनेकी आशासे झुकी, तो उसे मरा हुआ पाया। बस, वह कुलटा तत्क्षण ज़मीनपर गिर कर मूर्च्छित हो गई। थोड़ी देर पड़ी रहनेके बाद, उसे स्वतः ही होश हुआ। वह उठकर उस लाशके पास बैठ गई और चिलाप करने लगी। जिस तरह गूँजते हुए भौरोंके बैठनेसे कोमल लता नीचे मुक जाती है; उसी तरह आह ! कहते ही वह फिर पृथ्वी पर गिरकर बेहोश हो गई। इस बार बहुत देरके बाद उसे होश हुआ। होश होते ही वह ज़ार-ज़ार रोने और क्रूकने लगी। उस लाश पर नज़र पड़ते ही वह अचम्बित और दुःखित हो कहने लगी—“हाय ! मेरे प्राणाधार ! हा ! मेरे नयनानन्द ! प्यारे ! आप कहाँ सिधारे ? नाथ ! इस दासीका साथ क्यों छोड़ दिया ? मेरे जीवन-सर्वस्व ! आपका उदार चित्त ऐसा अनुदार क्यों हो गया ? भहाराज ! इस दासीका अपराध क्षमा करते ! प्राणेश ! कुछ तो धीरज धरते। हा ! बिना कुछ कहे,
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बिना बोले, बिना मिले, इस दासीको सदाके लिए अनाथ करके, चले जाना उचित न था। प्यारे! अब यह अभोगिन आपका मुखचन्द्र कहाँ देखेगी? हाय! यह क्या हुआ! मेरे प्यारे! प्रीतम! प्राणवल्लभ! हृदयके हार! सुनो, यह दासी कबकी पुकार रही है? हा! आप ऐसे कठोर कबसे हो गये? हा! प्राणेश! मुझ मन्दभागिनीको रोते-कलपते और तड़फते देख, आपको जरा भी दया नहीं आती! हाय! हाय! कुछ तो मुहब्बत निबाही होती। बिस्चोर! एकवार तो दौड़कर गले लगो। प्यारे! एकवार तो मीठी और रसीली बातें और सुना दो। यह दासी भी आपके पास ही आती है।” यह कहती हुई वह बेहोश होकर गिर पड़ी। इसके कुछ देर बाद धीरज धरकर अपने प्रेमीका मुँह चूमने लगी-मानों उस मुँहमें जान आ गई हो। इसके बाद उसने अपने मुँहका पान भी उसके मुँहमें रख दिया और बारम्बार उसके खूबसूरत चेहरे को देखने लगी। फिर कभी रोने लगती और कभी धीरज धरके कहती—“प्यारेको आँखों-भर देख तो लूँ, जो होना था सो तो हो ही गया।
अब एक नई बात सुनिये :—ईश्वरकी गति बड़ी ही विचित्र है। उस लीलामयकी लीलाका पार नहीं। वह बड़ा विलक्षण है। उसकी रचनाका भेद पाना असम्भव है। कोई नहीं कह सकता कि, थोड़ी ही देरमें क्या होनेवाला है। उस मुर्देके शरीर पर चन्दन-अरगजा चर्बित था। इस प्रभुति 'बुधश्रवदार' चीज़ोंसे उसके कपड़े महक रहे थे। उसके बदन पर के सुगन्धित पदार्थों से
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शुद्धांशतक
हँसा उड़ गया था, खाली देह लटक रही थी। वह नाना प्रकारको आशंका करने लगी। वह उसके गले लगनेकी आशासे मुड़ी, तो उसे मरा हुआ पाया; तब वह अचम्बित और दुःखित हो कहनेलगी—'हाय ! मेरे प्राणाधार ! हा ! मेरे नयनानन्द ! आप कहाँ सिंधारे ? ज्योंही कन्दपकला अपने यारका होट अपने गर्दियों लेकर चलने लगी, त्योंही समू मंदिरमें घुसे हुए घेतने उस दुष्टाकी नाक झूट खाई।
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वह वन-का-वन सुगन्धिभय हो रहा था। कोसों तक सुगन्धि फैल रही थी। उस वनमें एक प्रेत भी रहता था। उसने सुगन्ध पर मोहित होकर, उसके शरीरमें अपना घर बना लिया ; यानी वह मुर्देके भीतर घुस गया। ज्योंही कन्दर्पकलाने अपने यारकी लाशसे आलिङ्गन किया, उसका होट अपने मुँहमें रखकर चूसने लगी, त्योंही उस मुर्दे में घुसे हुए प्रेतने उस डुटाकी नाक काट खाई। इस तरह दुराचारिणी स्त्रीने अपने कुकर्मका फल पाया *। संसारमें जगदीशकी इच्छा बिना एक
❖ बहुसते नई रोयनीवाले बाबू इस घटनाको कल्पित और मनगढ़न्त समझेंगे। उनके लिए हम अभी दस-पाँच दिनकी ऐसी ही प्रकचकानेवाली नई घटना, जो कल-परसों ता० २०१२५ जुलाई सन् १९२५ के हिन्दी प्रवक्वारोंमें छपी है उनाते हैं, उससे मालुम हो जायगा कि ईश्वरको लोहा कैसी विचित्र है। वह पापियोंको किस तरह दण्ड देता है। भागलपुरमें रहनेवाला एक नार्ड अपनी पुत्रीको लिये लानेके लिए पुत्रीकी घरमालमें गया। लड़कीको लेकर वह पेंदल किसी जङ्गलमें होकर आ रहा था। उसकी पुत्री गर्भवती थी और उसका रूप-लावण्य अपूर्ण था। चेहरेसे नूर टपका पड़ता था। पिताकी नीयत पुत्री पर बिगड़ी। उसने पुत्रीकी राजीते या बेराजीते—पता नहीं—उससे भोग किया। उसकी लिंगेन्द्रिय क्षमकी पुत्रीकी योनिमें अटक गई। उसने इन्द्रिय निकालनेकी इज्जतें कोपियों कीं ; मगर वह कामयाब न हुआ। वह दोनों अप्रयत्नाले जाये गये। डाक्टरोंने उन्हें प्रलग किया। गर्भका बन्धा मर गया, वह भी निकाला गया। क्या किसीने आज तक उना है कि, पुरुषकी लिंगेन्द्रिय श्वाकी योनिमें कभी अटक हो? ईश्वरको उस महा ब्रह्म
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पत्ता भी नहीं हिलता, इससे मालूम होता है कि, जगदीशकी ऐसी ही इच्छा थी कि, उस भ्रष्टा कुलटाको दण्ड मिले, और वह जीवन-भर ऐसे कुकर्म करने योग्य न रहे। आगे देखिये क्या-क्या गुल खिलते हैं।
चेहरेकी सुन्दरता नष्ट होने या नाक काट जाने पर, कन्दर्पकला उस लाशको वहीं छोड़कर, वहाँसे नौ दो ग्यारह हुई और घर पहुँचकर चुपचाप अपने पतिके पास सो रही। कुछ देर लेटी रहनेके बाद, उसने त्रिया-चरित्र रचना शुरू किया। सोते-सोते मानो अचानक चौँक उठी हो—इस तरहका भाव बनाकर चिल्लाने लगी—“हायर! हाय! इसने मेरी नाक काट ली, कोई दौड़ो, मुझे बचाओ।” इस तरहकी भयानक चीख सुनकर घरके लोग दौड़े आये। इस आवाज़को सुनकर बेचारा अनजान गुणनिधि भी जाग उठा। वह आँखें खोल कर क्या देखता है कि, लोग उसे चारों ओरसे घेरे हुए खड़े हैं और क्या हुआ ! क्या हुआ ! का शोर कर रहे हैं। उसकी अपनी विवा-हिता स्त्री कन्दर्पकला कह रही है—“आप लोग नहीं देखते, इसने मेरी नाक काट ली है ? मुझे बचाइये, नहीं तो अब मेरी जान भी नहीं बचेगी, यह मुझे मार डालेगा।” ये बात सुनकर गुण-निधिका ससुर और अन्य लोग कहने लगे—“तुमने यह क्या
नाईको सज़ा देनी थी, उसे मुँह दिखाने योग्य न रखना था ; इसीसे ऐसी अपूर्ण-देखी न सुनी-घटना घटी। ईश्वर पापियोंको इसी तरह दण्ड देता है।
श्रृङ्गारशतक
इसने मुझे निरपराधिनीकी नाक काट ली है। मुझे बचाइये, नहीं तो यह मुझे जानसे मार डालीगा।
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किया? अफ़सोस! तुमने इस निरपराधितोकी नाक बुथा ही काट ली! इसका क्या अपराध था?" ये बातें सुनते ही गुणनिधि का चेहरा पीला पड़ गया। वह हक्का-बक्का हो गया। होश-हवास जाते रहे। उसके मुँहसे एक अक्षर भी न निकला। उधर कन्दर्पकला फूट-फूटकर रो रही थी। उसके पिता और चाचा वगैरः गुणनिधिसे नाक काटने की वजह पूछ रहे थे। इतनेमें सबेरा हो गया। गुणनिधिके सुसरालवाले कोतवालीमें दौड़े गये; रिपोर्ट लिखाई। पुलिसने आकर गुणनिधिको गिरफ़्तारकर लिया। फिर वह राजाके सामने पेश किया गया। राजाने सब तरहसे पूछ-ताछ और गवाही वगैरः लेकर गुणनिधिको १ सालकी क़ैद और दस हजार रुपया जुर्माना किया। गुणनिधिनो एक शब्द भी अपनी ज़वानसे नहीं कहा।
यह बात सारे शहरमें फैल गई। हर आदमीके मुँहपर यही चर्चा थी कि, नगरसेठके ज़माईने अपनी स्त्रीकी नाक काट ली। वह कल ही परदेशसे आया था। न्यायके समय वह चोर, जो रातको कन्दर्पकलाके पीछे लगा था, अदालतमें मौजूद था। उसने देखा कि, निरपराध गुणनिधि बुथा मारा जाता है—बेचारेको बुथा इतनी कड़ी सज़ा दी जाती है। उसके दिलमें जोश आया और उसने सारी घटना राजाको कह सुनाई। राजा अपने अब्दमियोकै साथ स्वयं उपवनमें गया। चोरने कन्दर्पकलाके पदचिह्न, अपने छिपनेका स्थान और कन्दर्पके यारकी लाश ये सब दिखा दिये। साथ ही उस मुर्देके मुँहमेंसे कन्दर्पकलाकी नाक
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निकालकर दिखा दी और उस लाशपर पड़ी हुई खूनकी बूँदोंपर भी ध्यान दिलाया । सारी घटना राजाकी समझमें आ गई । राजाने गुणनिधिको दण्ड-मुक्त किया, कन्दर्पकलाको जेलखाने भेजा, चोरको कई लाख रुपये इनाम दिये और गुणनिधिको अपना दीवान बनाकर, उसे अपनी कन्या व्याह दी । बुरेको बुरा और भलेको भला फल मिला ।
नतीजा इस कहानीका यही है कि, अधिकांश स्त्रियाँ अत्यन्त कुटिल, क्रूर-कर्म करनेवाली, लज्जाहीना और चञ्चलमति होती हैं । ये लोग अपने पति, पिता-माता, भाई-बन्धु और अपनी पेटकीओलाद तकसे द्रोह करने और उनका सर्वनाश करनेमें नहीं चूकतीं ।
जिस पतिने कन्दर्पकलाकी मुहब्बतमें, उसे खुश करनेमें, कोई बात उठा न रखी ; जिस पिताने उसे पालने-पोषने और पढ़ाने-लिखानेमें कोई चुटि न की, उसकी शादीमें करोड़ों खर्च कर दिये—उन पिता और पतिकी इज्जतका उसने कुछ भी न्ययाल न किया । इससे बढ़कर और दौरात्म्य क्या हो सकता है ? कुल्ला नारी कुलगौरव-हानि, लोकनिन्दा, जेल और फाँसी किसीकी भी परवा नहीं करती । ऐसी नारीसे जगदीश बचावे ! किसीने कहा है :—
आवर्त्तः संशयानामविनयभवनं पत्तनं साहसानां दोषाणां सन्निधानं कपटशतगृहं क्षेत्रमप्रत्ययानाम् । दुर्प्रबिं यन्महदभिर्नवरवृषभैः सर्वमायाकरगंड व्रीर्यत्र केन लोके विषममृतयुतं धर्मानाशाय सुष्ठम् ? ॥
भुङ्गारशतक
राजाने गुणनिथिका वरदमुक्त किया, कन्दुकलाको जेलखान भेजा, चोरको कड़े लाख रुपये इनीस दिये और गुणनिथिका अपना दोषान बताकर, उसे अपनी कन्या भी ब्याह दी । वुरको दुरा और भलको भला फल मिला । पृष्ठ ३५५।६०
Popular Press—Calcutta.
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( ३६१ )
सन्देहोंका भँवर, अवितयका घर, साहसका नगर, दोषोंका खज़ाना, कपटका शतगृह, अविश्वसका क्षेत्र, बड़े-बड़े नरश्रेष्ठोंके भी क्रावूमें न आनेवाला, सारी मायाको पीटला—स्त्री-रूपी यंत्र, जिसमें विष और अमृत दोनों ही हैं, धर्मनाशार्थ, किसने बनाया ?
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श्रपसर ससे दुरादस्मात्कटाक्षविधानला—
त्यक्तित्विषमायोपित्स्पर्शाद्विलासफलाभूतः ॥
इतरफणिना दृष्टः शक्यश्चिकित्पितुमौषधे—
श्रुतुरवनिताभोगिघ्रस्तं त्यजन्तिहि मन्त्रिणः ॥८३॥
हे मित्र ! सहज ही क्रूर, विलास रूपी फण वाले और कटाक्षरूपी विषाग्नि धारण करनेवाले स्त्री-रूपी सर्पसे दूर भाग ; क्योंकि और सर्पोंका काटा हुआ तो मन्त्र तथा औषधियोंसे अच्छा हो सकता है ; पर चतुर स्त्री-रूपी सर्पके उसे हुए को भाड़-फूँक वाले गारुड़ी भी छोड़ भागते हैं ॥८३॥
खुलासा—स्त्री सर्पके समान है। इसका विलास इसका फण और कटाक्ष विषाग्नि है तथा यह स्वभावसे ही सर्पके समान क्रूर या विषैली है। यह स्त्री-सर्प और सर्पोंसे अधिक भयङ्कर है ; क्योंकि और सर्पोंका खाया हुआ मनुष्य मन्त्र या दवा अथवा भाड़फूँकसे कदाचित अच्छा हो भी जाता है ; पर
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इस सर्पके खायेका तो इलाज ही नहीं । इसका काटा हुआ भी, कालसर्पके काटे हुए की तरह, न खेळता है और न बकरता है ।
उस्ताद ज्ञाक फरमाते हैं :—
इसा हो कालेने जिसको काफिर
तो वह फिर्सेके असरसे खेले ।
दहानो गेसूका तेरा मारा,
न मुँहसे बोले न सरसे खेले ॥
मसल मशहूर है, कालेका काटा हुआ नहीं खेळता— नहीं अच्छा होता । फिर तेरे मुँह और जुलफोंका काटा हुआ आदमी यदि मुँह से नहीं बोलता और सरसे नहीं खेळता, तो क्या आश्चर्य है ?
महात्मा कबोर भी कहते हैं :—
नागिनके तो दोष फन, नारीके फन बीस ।
जाको डस्यो न फिर जिये, मरिहै विश्वा बीस ॥
कामिनि काली नागिनी, तीन लोक मंकार ।
नाम-सनेही ऊबरा, विषिया खाये फार ॥
नारी निरखि न देखिये, निरखि न कीजै दौर ।
देखत ही तैं विष चढ़ै, मन आवै कलु और ॥
खी-मात्र नागिन-स्वरूपिणो हैं । जैसी ही अपनी खी,
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वसी ही पराई । विष तो सभीमें होता है । विषका अपना और पराया क्या ? मनुष्य अपने विषसे भी मरता है और पराये विषसे भी । अपने कूर्प में गिरनेसे भी डूब जाता है और पराये कूर्प में गिरनेसे भी । ख़ियोंसे सुखकी आशा करना, मृगमरीविकामे जल पानेकी आशा करनेके समान है । "भामिनी-चिलास"-रचयिता पण्डितेन्द्र जगन्नाथ महाराज कहते हैं और सच कहते हैं :—
अलकाः फणिशवतुल्यशीला
नयनांता परिपुखितेषुलीलाः ।
चपलोपमिता खलु स्वयं यावत
लोकै सुखसाधनं कथं सा ? ॥
जिस की अलकावलि सौंपके बच्चेके से ख़माव वाली है और जिसकी आँखोंके कटाक्ष सपुखवाणों की तरह लीला करने वाले हैं और जिस की ख़यं विद्युत्तुलतासे उपमा दी जाती है, हा ! वह खी इस लोकमें किस तरह सुखदायी हो सकती है ?
सार्रांश यही है कि, स्त्रियाँ नागिनोंसे भी अधिक भयङ्कर हैं, अतः अपना भला चाहने वालोंको इनसे दूर रहना चाहिये । इनमें सुख नहीं, घोर दुःख है ; अमृत नहीं, हालहाल विष है । सपंके काट्टेकी दवा है, पर इनके काट्टेकी दवा नहीं ।
( ३६४ )
देहा ।
मन्त्र-यन्त्र-शौषधनते, तजत सर्प विष लाग ।
यह क्यों हूँ उतरत नहीं, नारि-नयनको नाग ॥८३॥
सार—स्त्री-रूपी सर्पसे दूर रहो, क्योंकि उसके काटेका इलाज नहीं है ।
83. O my friend, keep yourself aloof from a woman who is like a serpent. Both are crooked and cruel by nature and the oblique glances of the woman are like the flames of an arrow and whose gay activities are her hood, Serpent-bite may be cured by medicine, but even the charmers give them up who are bitten by this serpent-like clever woman.
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विस्तारितं मकरकेतनधीवरेण
स्त्रीसन्नितं बडिशमन भवाम्बुराशौ ॥
तेनाचिरात्तदधराभिषलोलभत्य-
मत्स्यान्विच्छप्य स पचत्यनुरागवहौ ॥८४॥
इस संसार-रूपी समुद्रमें कामदेव-रूपी धीमरने स्त्री-रूपी जाल फैला रक्खा है । इस जालमें वह अचराभिष-लोभी पुरुष-रूपी मछलियों को, शीघ्रतासे, खोंच-खोंच कर, अनुराग-रूपी अग्निमें पकाता है ॥८४॥