शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
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पति आदि भी, कोई तत्काल ही और कोई कुछ समय के बाद, शक्तिहीन हो जाते हैं।
राज्यवृक्षस्य नृपतिर्मूलं स्कन्धाश्च मन्त्रिणः ॥ १२ ॥
शाखाः सेनाधिपाः सेनाः पल्लवाः कुसुमानि च ।
प्रजाः फलानि भूभागा बीजं भूमिः प्रकल्पिता ॥ १३ ॥
राज्य को वृक्ष की समता का निर्देश— राज्यरूपी वृक्ष का मूल (जड़) राजा होता है, स्कन्ध (मोटी डालें)—मन्त्री लोग, शाखायें—सेनापति लोग, पल्लव—सेनायें, फूल—प्रजायें, फल—भूमि से प्राप्त होनेवाले कर (मालगुजारी) एवं बीज—राज्य की भूमि ये सब मानी गई हैं।
विश्वस्तान्न्यनृपस्यापि न विश्वासं समाप्नुयात् ।
नैकान्ते न गृहे तस्य गच्छेदल्पसहायवान् ॥ १४ ॥
राजा को अवश्य पालन करने योग्य नियमों का निर्देश— विश्वास के योग्य अपने को व्यवहार द्वारा सिद्ध करनेवाले भी शत्रु राजा का विश्वास नहीं करना चाहिये। अतः उसके साथ एकान्त में अथवा उसके गृह पर थोड़े सहायकों के साथ न जावे।
स्ववेषरूपसदृशान् निकटे रक्षयेत् सदा ।
विशिष्टचिह्नगुप्तः स्यात् समयेऽन्यादृशो भवेत् ॥ १५ ॥
अपने निकट सदा अपने समान वेष तथा स्वरूपवाले अन्य लोगों को रक्खे, जिससे कोई न पहचान सके कि कौन इनमें से राजा है? और स्वयं अपना राजचिह्न गुप्त रखे और समय पर दूसरे के समान बन जाय।
वेश्याभिश्च नटैर्मद्यैर्गायकैर्मोहयेदरिम् ।
और वेश्याओं, नटों, मद्य तथा गायकों द्वारा शत्रु को मुग्ध बना दें (कर्त्तव्याकर्त्तव्य ज्ञानशून्य कर दें)।
सुवस्त्राभरणैर्नैव न कुटुम्बेन संयुतः ॥ १६ ॥
विशिष्टचिह्नितो भीतो युद्धे गच्छेन्न वै क्वचित् ।
किसी भी युद्ध में सुन्दर-वस्त्र तथा आभूषणों से या कुटुम्ब से युक्त होकर या विशिष्ट राजचिह्न धारण किये हुये या डरा हुआ न जाय।
क्षणं नासावधानः स्याद् भृत्यस्त्रीपुत्रशत्रुषु ॥ १७ ॥
जीवन् सन् स्वामिता पुत्रे न देयाप्यखिलं क्वचित् ।
भृत्य, स्त्री तथा पुत्र के विषय में क्षणभर के लिये भी असावधान न रहें। किसी दशा में भी जीवित रहते हुये पुत्र को अपनी सारी प्रमुखशक्ति (अख्तियार) न प्रदान कर दे।
स्वभावसद्गुणे यस्मान्महानर्थमदावहा ॥ १८ ॥
पञ्चमाध्याये खिलनीतिनिरूपणप्रकरणम् १६६
पञ्चमाध्याये खिलनीतिनिरूपणप्रकरणम् १६६
विष्णुब्राह्मौरपि नो दत्ता स्वपुत्रे स्वाधिकारता । स्वभाव से सद्गुणयुक्त पुत्र में भी पूर्ण अधिकार दे देना महान अनर्थ तथा मद पैदा कर देनेवाला हो जाता है, इसीसे विष्णु आदि ने भी अपने पुत्रों को अपना पूर्ण अधिकार नहीं दिया था। स्वायुषः स्वल्पशेषे तु सत्पुत्रे स्वाम्यमादिशेत् ॥ १९ ॥ नाराजकं क्षणमपि राष्ट्रं धर्तुं क्षमाः किल । युवराजादयः स्वाम्यलोभचापलगौरवात् ॥ २० ॥
पुत्र को राज्य देने के समय का निर्देश—यदि अपनी आयु का अन्त अत्यन्त समीप आ गया हो तो उस समय यदि सत्पुत्र हो तो उसे पूर्ण अधिकार प्रदान कर दे, क्योंकि अधिकार-लोभ से होनेवाली चञ्चलता की अधिकता से युवराजादि बिना राजा के राज्य को क्षण भर भी संभालने के लिये नहीं समर्थ हो सकते हैं।
प्राप्योत्तमं पदं पुत्रः सुनीत्या पालयन् प्रजाः । पूर्वामात्येषु पितृवद् गौरवं सम्प्रधारयेत् ॥ २१ ॥ राज्य पाने पर राजपुत्र के आचरणों का निर्देश—पुत्र उत्तम राजपद को प्राप्त कर सुन्दर नीतिपूर्वक प्रजा का पालन करता हुआ, पिता के समय के मन्त्रियों में पिता के तुल्य गौरव रखे।
तस्यापि शासनं तैस्तु प्रधार्यं पूर्वतोऽधिकम् । युक्तं चेदन्यथा कार्ये निषेध्यं काललम्बनैः ॥ २२ ॥ मन्त्रियों का राजपुत्र के साथ करने योग्य व्यवहार का निर्देश—और वे मन्त्री गण भी यदि राजकुमार की आज्ञा उचित हो तो उसे राजा के समय से भी अधिक रूप से माने, यदि अनुचित हो तो 'दूसरे समय में इसका पालन होगा' ऐसा कहकर उस समय टाल देवें।
तदनीत्या न वर्तेयुस्तेन साकं धनाशाया । वर्तन्ति यदनीत्या ते तेन साकं पतन्त्यरात् ॥ २३ ॥ नवीन राजा के साथ मन्त्रियों को भी अनीतिपूर्ण व्यवहार करने का निषेध—और धन की आशा से उस नवीन राजा के साथ स्वयं भी उसकी अनीति के अनुसार व्यवहार न करे। क्योंकि यदि वे (मन्त्रीगण) भी अनीति-पूर्ण व्यवहार करने लगेगें तो उस (नवीन राजा) के साथ स्वयं भी नष्ट हो जावेगें।
कुलभक्तांश्च यो द्वेष्टि नवीनं भजते जनम् । स गच्छेच्छत्रुसाम्राज्ञा धनप्राणैर्वियुज्यते ॥ २४ ॥ नवीन राजा को राजभक्त मन्त्री आदि के मतानुसार न रहने का
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दुष्परिणाम—जो नवीन राजा राजकुल के भक्त मन्त्री आदियों के साथ द्वेष करता है और नवीन लोगों के कथनानुसार कार्य करता है वह शत्रु के अधीन हो जाता है और अपने धन तथा प्राणों को भी खो बैठता है।
गुणी सुनीतिर्नवोऽपि परिपाल्यस्तु पूर्ववत्।
प्राचीनैः सह तं कार्ये ह्यनुभूय नियोजयेत् ॥ २५ ॥
नवीन मन्त्री आदि की नियुक्ति की व्यवस्था—और यदि कोई नवीन होता हुआ भी गुणवान तथा सुन्दर नीतिकुशल अधिकारी हो तो उसका पालन प्राचीनों की तरह करना चाहिये। और भली भांति से अनुभव करने के बाद उसे प्राचीनों के साथ राजकार्य में नियुक्त करना चाहिये।
अतिमृदुस्तुतिनतिसेवादानप्रियोक्तिभिः ।
मायिकैः सेव्यते यावत् कार्यं नित्यं तु साधुभिः ॥ २६ ॥
प्रत्यक्षं वा परोक्षं वा सत्यवाग्भिर्नृपोऽपि च ।
याथार्थ्यतस्तयोरिहगन्तरं खभुवोर्यथा ॥ २७ ॥
धूर्त्त तथा साधु जन के अन्तर ज्ञात करने का निर्देश—जो धूर्त्त होते हैं वे जब तक अपना कार्य सिद्ध करना रहता है तभी तक अत्यन्त मृदु व्यवहार, स्तुति (प्रशंसा), नमन, सेवा, दान तथा प्रियवचन आदि से राजा की सेवा करते हैं और जो सज्जन हैं वे सत्यवचनों से प्रत्यक्ष या परोक्ष में सदा राजा की सेवा करते हैं यथार्थ में उन दोनों (धूर्त्त तथा सज्जन) में इतना अधिक अन्तर है जितना कि आकाश तथा पृथ्वी में है।
मायाया जनका धूर्त्ता जारचोरबहुश्रुताः ।
प्रतिष्ठितो यथा धूर्त्तो न तथा तु बहुश्रुताः ॥ २८ ॥
धूर्त्त, जार (व्यभिचारी) और चोर में धूर्त्त की माया करने में श्रेष्ठता का निर्देश—माया के उत्पन्न करनेवाले धूर्त्त, जार और चोर होते हैं, यह बात अत्यन्त प्रसिद्ध है। किन्तु जिस प्रकार से धूर्त्त इसमें श्रेष्ठ माना जाता है। उस प्रकार से जार और चोर नहीं माने जाते हैं।
परस्वहरणं लोके जारचोरौ तु निन्दितौ ।
तावप्रत्यक्षं हरतः प्रत्यक्षं धूर्त एव हि ॥ २९ ॥
धूर्त्तो की धूर्त्तता का वर्णन—दूसरे की वस्तु या धन हरण करने में प्रवृत्त होने से जार और चोर ये दोनों लोक में निन्दित माने जाते हैं। किन्तु वे दोनों तो सामने नहीं धनादि हरते हैं, पर धूर्त तो सामने ही हर लेता है।
हितं स्वहितवच्चान्ते अहितं हितवत् सदा ।
धूर्त्ताः सन्दर्शयित्वाऽज्ञं स्वकार्यं साधयन्ति ते ॥ ३० ॥
वे धूर्त्त लोग मूर्ख लोगों के समक्ष हितकर को अहितकर की भांति पूर्व
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अहितकर को हितकर की भांति दिखाकर अन्त में सदा अपने कार्य को सिद्ध करते हैं ।
विस्रम्भयित्वा चात्यर्थं मायया घातयन्ति ते ।
और वे चालाकी से प्रथम अपने ऊपर अत्यन्त विश्वास पैदा कराके अन्त में उसका नाश कर देते हैं ।
यस्य चाप्रियमन्विच्छेत्तस्य कुर्यात् सदा प्रियम् ॥ ३१ ॥
व्याधो मृगवधं कर्तुं गीतं गायति सुस्वरम् ।
और वे जिसका अप्रिय (बुराई) करना चाहते हैं उसका प्रथम सदा प्रिय कार्य करते हैं। जैसे बहेलिया मृग का वध करने के लिये प्रथम सुन्दर स्वर के साथ उसके सामने गाते हैं बाद में मार डालते हैं।
मायां विना महाद्रव्यं द्राङ् न सम्पाद्यते जनैः ॥ ३२ ॥
विना परस्वहरणान्न कश्चित् स्यान्महाधनः ।
मायया तु बिना तद्धि न साध्यं स्याद्यथेप्सितम् ॥ ३३ ॥
बिना धूर्त्तता के अत्यन्त धन न मिलने का निर्देश— बिना धूर्त्तता के लोग बहुत धन शीघ्र नहीं पा सकते हैं। और बिना दूसरे का धन हरण किये कोई बड़ा धनी नहीं हो सकता है। और बिना माया के जो ईप्सित कार्य है वह सिद्ध नहीं हो सकता है।
स्वधर्मं परमं मत्वा परस्वहरणं नृपाः ।
परस्परं महायुद्धं कृत्वा प्राणांस्त्यजन्त्यपि ॥ ३४ ॥
राजा लोगों को दूसरे का धन हरण करने को स्वधर्म समझने का निर्देश— राजा लोग दूसरे का धन हरण करना परम स्वधर्म समझ कर परस्पर महायुद्ध करके प्राण भी दे डालते हैं।
राज्ञो यदि न पापं स्याद्दस्यूनामपि नो भवेत् ।
सर्वं पापं धर्मरूपं स्थितमाश्रयभेदतः ॥ ३५ ॥
आश्रयभेद से सभी पापों का धर्म रूप में स्थित होने का निर्देश— यदि राजा को वैसा करने से पाप नहीं लगता है तो डाकुओं को भी दूसरे का धन हरण करने में पाप नहीं लगे क्योंकि आश्रयभेद से सभी पाप धर्मरूप हो जाते हैं, अर्थात् दूसरे का धन हरण करना डाकुओं के लिये पाप हो जाता है किन्तु राजाओं के लिये वही धर्म हो जाता है।
बहुभिर्यः स्तुतो धर्मो निन्दितोऽधर्म एव सः ।
धर्मेतत्त्वं हि गहनं ज्ञातुं केनापि नोचितम् ॥ ३६ ॥
बहुतों द्वारा प्रशंसित धर्म और निन्दित अधर्म मानने का निर्देश— जो व्यापार बहुतों के द्वारा प्रशंसित होता है, वह धर्म गिना जाता है और जो
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निन्दित होता है वह अधर्म गिना जाता है। अतः धर्म का तत्त्व गहन है, उसका किसी के द्वारा समझ सकना असंभव है।
अतिदानंतपःसत्ययोगो दारिद्र्यकृत्त्विह ।
धर्मार्थों यत्र न स्यातां तद्वाक् कामं निरर्थकम् ॥ ३७ ॥
अत्यंत दानादि करने की निषिद्धता का निर्देश — संसार में अतिदान, तपस्या तथा सत्य का संसम्बन्ध ये तीनों दरिद्रता उत्पन्न करने वाले होते हैं अर्थात् अतिदान से दरिद्र हो जाना जगतप्रसिद्ध ही है, इसी तरह तपस्या में भी धर्मानुष्ठानुष्ठान के द्वारा धन-व्यय होने से एवं धनप्राप्ति धूसंतता करने से होतो है उसमें यदि सत्य का संबन्ध हो तो धनप्राप्ति के असम्भव होने से दरिद्रता होना उचित ही है। जिस वाणी में धर्म और अर्थ न हों तो वह (वाणी) अत्यन्त निरर्थक समझी जाती है।
अर्थे वा यदि वा धर्मे समर्थो देशकालवित् ।
निःसंशयो नरः पूज्यो नष्टः संशयिता सदा ॥ ३८ ॥
धर्मानुसार अर्थार्जन करने वाले की पूज्यता का निर्देश — यदि कोई मनुष्य धर्म तथा अर्थ में समर्थ है अर्थात् धर्मानुसार अर्थार्जन करने में निपुण है और देश-काल का ज्ञाता अर्थात् तदनुसार कार्य करने वाला एवं संशय-रहित है तो वही सदा पूज्य होता है। और जो संशय करने वाला है वह नहीं माननीय होता है।
अर्थस्य पुरुषो दासो दासस्त्वर्थो न कस्यचित् ।
अतोऽर्थाय यतेतैव सर्वदा यत्नमास्थितः ॥ ३६ ॥
अर्थाद्धर्मश्च कामश्च मोक्षश्चापि भवेन्नृणाम् ।
अर्थ के लिये अवश्य यत्न करने का निर्देश — अर्थ का दास पुरुष ही होता है न कि पुरुष का दास अर्थ होता है। अतः अर्थ के लिये सर्वदा प्रयत्न-पूर्वक यत्नशील रहना चाहिये। और मनुष्यों के अर्थ से ही धर्म, काम और मोक्ष सभी पुरुषार्थ प्राप्त होते हैं।
शस्त्रास्त्राभ्यां बिना शौर्यं गार्हस्थ्यं तु श्रियं विना · ४० ॥
ऐकमत्यं विना युद्धं कौशल्यं ग्राह्यकं विना ।
दुःखाय जायते नित्यं सुसहायं बिना विपत् ॥ ४१ ५
न विद्यते तु विपदि सुसहायं सुहृत्-समम् ।
शौर्यादिकों का शस्त्रास्त्रादि के बिना दुःखदायी होने का निर्देश — शस्त्र और अस्त्र के बिना शूरता, स्त्री के बिना गार्हस्थ्य (गृहस्ती), सैनिकों की एकता के बिना युद्ध, समझने वाले के बिना चतुराई, और सुन्दर सहायक के बिना
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विपत्ति नित्य दुःख देने के लिये ही होती है । और विपत्ति में सुन्दर मित्र के समान अन्य कोई सच्चा सहायक नहीं होता है ।
अविभक्तधनान् मैत्र्या भृत्या भक्तधनान् सदा ॥ ४२ ॥
मित्रं स्वसदृशैर्भोगैः सत्यैश्च परितोषयेत् ।
अविभक्त और विभक्त ज्ञातिवर्ग तथा मित्र के साथ व्यवहार के प्रकार का निर्देश— जिनके साथ धन का बँटवारा नहीं हुआ है अर्थात् एक साथ रहनेवाले जो ज्ञाति-वर्ग के हैं, उन्हें सौहार्द भाव से, और जिनके साथ धन का बटवारा हो चुका है, ऐसे लोगों को मासिक या वार्षिक वृत्ति-प्रदान द्वारा, एवं मित्रों को अपने सदृश भोग ( भोजनादि ) का प्रबन्ध तथा सत्य व्यवहार द्वारा सदा राजा सन्तुष्ट रखे ।
नृपसम्बन्धिस्त्रीपुत्रसुहृद्भृत्याविदस्युभिः ॥ ४३ ॥
अतो विभागं दत्त्वैषां भुङ्क्ते यस्तु स्वकं धनम् ।
अपने सम्बन्धी स्त्री-पुत्रादि को सन्तुष्ट रखते हुये धनोपभोग करने का निर्देश— जो राजा अपने सम्बन्धी, स्त्री, पुत्र, मित्र भृत्य तथा दस्यु गणों को जिस प्रकार से ये संतुष्ट हो सकें वैसा प्रबन्ध करके अपने धन का उपभोग करता है, वस्तुतः वही सुखी होता है ।
त्यक्त्वा तु दर्पकार्पण्यमानोद्वेगभयानि च ॥ ४४ ॥
कुर्वीत नृपतिर्नित्यं स्वार्थसिद्धयै तु नान्यथा ।
विशेषभृतितो भृत्यं प्रेममानाधिकारतः ॥ ४५ ॥
स्वकार्य-सिद्ध्यर्थ भृत्य को सर्वथा संचय रखने का निर्देश— राजा अपने कार्य की सिद्धि के लिये ही दर्प ( अहङ्कार ), कृपणता, मान, उद्वेग और भय को छोड़कर विशिष्ट जीविका का प्रदान, प्रेम तथा संमान-प्रदर्शन एवं अधिकार-प्रदान से भृत्य को नित्य युक्त करता रहे, इससे अन्यथा न करे ।
ब्राह्मणाग्निजलैः सर्वैर्धनवान् भक्ष्यते सदा ।
स सुखी मोदते नित्यमन्यथा दुःखमश्नुते ॥ ४६ ॥
ब्राह्मणादि द्वारा यज्ञादि करने में धन का व्यय करने से ही सुखी होने का निर्देश— दान करने से ब्राह्मण द्वारा, यज्ञ करने से अग्नि द्वारा, पौंसला आदि का प्रबन्ध करने से जल द्वारा जिस धनी का धन व्यय होता रहता है । वह धनी नित्य सुखी होने से प्रसन्न रहता है अन्यथा रीति से व्यय होने पर दुःखी रहता है ।
दर्पस्तु परहासेच्छा मानोऽहं सर्वतोऽधिकः ।
कार्पण्यं तु व्यये दैन्यं भयं स्वोच्छेदशङ्कनम् ॥ ४७ ॥
| ४०४ | शुक्रनीतिः |
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मानसस्यानवस्थानमुद्वेगः परिकीर्तितः ।
दर्पं, मान, कार्पण्य, भय तथा उद्वेग के लक्षण— दूसरे के हास की इच्छा को 'दर्प', मैं सबसे अधिक गुणादि में हूँ इसे 'मान', व्यय में कंजूसी करने को 'कार्पण्य', अपने उच्छेद होने की शङ्का को 'भय' और मन का स्थिर न रहने को 'उद्वेग' कहते हैं ।
लघोरप्यपमानस्तु महावैराय जायते ॥ ४८ ॥
दानमानसत्यशौर्यमार्दवं सुसुहृत्करम् ।
महान वैर तथा मित्रता के कारणों का निर्देश— क्षुद्रजन के लिये भी किया हुआ अपमान महावैर को पैदा करने में समर्थ होता है । किसी को कुछ देना, संमान करना, सत्य व्यवहार करना, शूरता और मृदुता ये सब अत्यन्त मित्रता पैदा करनेवाले होते हैं ।
सर्वानापदि सदसि समाहूय बुधान् गुरून् ॥ ४९ ॥
भ्रातॄन् बन्धूंश्च भृत्यांश्च ज्ञातीन् सभ्यान् पृथक् पृथक् ।
यथार्हं पूज्य विनतः स्वामीष्टं याचयेन्नृपः ॥ ५० ॥
आपत्ति पड़ने पर राजा के कर्त्तव्य का निर्देश— राजा आपत्ति पड़ने पर विनम्र होकर पण्डित, गुरु, भाई, बन्धु, भृत्य, जाति के लोग और सभासद् इन सबों को राज्यसभा में बुलाकर यथायोग्य सम्मान करने के बाद अपना अभीष्ट सिद्ध करने के लिये इस रीति से प्रार्थना करे । अर्थात् उपाय पूछे ।
आपदं प्रतरिष्यामो यूयं युक्त्या वदिष्यथ ।
भवन्तो मम मित्राणि भवत्सु नास्ति भृत्यता ॥ ५१ ॥
मैं आपत्ति को पार कर जाऊं इसके लिये आप लोग युक्ति बतायें । आप लोग मेरे मित्र हैं आप लोगों को मैं अपना केवल भृत्य नहीं मानता हूँ ।
न भवत्सदृशास्त्वन्ये सहायाः सन्ति मे ह्यतः ।
तृतीयांशं भृतेर्माह्यमर्धं वा भोजनार्थकम् ॥ ५२ ॥
दास्याम्यापत्समुत्तीर्णः शेषं प्रत्युपकारवित् ।
आप लोगों के समान मेरा कोई दूसरा सहायक नहीं है । अतः इस समय केवल भोजन के लिये वेतन का तृतीयांश या अर्द्धांशमात्र ही आप लोग ग्रहण करें । क्योंकि इस समय व्यय अधिक होने से मैं समग्र वेतन देने में असमर्थ हूँ और जब मैं आपत्ति को पार कर लूंगा तब आप लोगों के उपकार का बदला चुकाना उचित जानकर शेष भी वेतन चुका दूंगा ।
भृतिं विना स्वामिकार्यं भृत्यः कुर्यात् समाष्टकम् ॥ ५३ ॥
षोडशाब्दं धनी यः स्यादितरोऽर्थानुरूपतः ।
आपत्ति में विना वेतन के भी स्वामि-कार्य करने की कालमर्यादा का
पञ्चमाध्याये खिलनीतिनिरूपणप्रकरणम् ४०५
**निर्देश—**जो भृत्य ऐसा धनी हो कि अपने पास से १५ वर्ष तक बिना वेतन लिये जीविका चला सकता है वह बिना वेतन लिये ८ वर्ष तक स्वामी का कार्य करे, और जो इससे भिन्न हों वे अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार जितना समय तक बिना वेतन के हो सके स्वामिकार्य करें।
निर्धनैरन्नवस्त्रं तु नृपाद् ग्राह्यं न चान्यथा ॥ ५४ ॥
यतो भुक्तं सुखं सम्यक् तद्दुःखैर्दुःखितो न चेत् ।
विनिन्दति कृतघ्नस्तु स्वामी भृत्योऽन्यएव वा ॥ ५५ ॥
और जो निर्धन हों वे राजा से अन्न-वस्त्र मात्र ग्रहण करें। इससे अन्यथा होने पर न ग्रहण करें। जिस स्वामी से आजतक जिसने भलीभांति सुख का उपभोग किया, आज यदि उसके दुःख से वह दुःखी न हो तो वैसे कृतघ्न भृत्य की स्वामी या अन्य कृतज्ञ भृत्य भी निन्दा करते हैं।
सकृत् सुभुक्तं यस्यापि तदर्थं जीवितं त्यजेत् ।
भृत्यः स एव सुश्लोको नापत्तौ स्वामिनं त्यजेत् ॥ ५६ ॥
स्वामी स एव विज्ञेयो भृत्यार्थं जीवितं त्यजेत् ।
**प्रशंसायोग्य भृत्य और स्वामी का वर्णन—**जो भृत्य जिसका सम्मान-पूर्वक दिया हुआ अन्न एक बार भी भोजन करले तो उसके रक्षार्थ समय पड़ने पर जीवन का भी त्याग कर दे। वही भृत्य सुन्दर यश वाला माना जाता है जो आपत्ति पड़ने पर भी स्वामी का साथ नहीं छोड़ता है और वही वस्तुतः स्वामी है जो आवश्यकता पड़ने पर भृत्य के रक्षार्थ अपना जीवन भी त्याग कर देता है।
न रामसदृशो राजा पृथिव्यां नीतिमानभूत् ॥ ५७ ॥
सुभृत्यता तु यन्नीत्या वानरैरपि स्वीकृता ।
**योग्य स्वामी तथा भृत्य का उदाहरण—**इस पृथिवी पर राम के समान कोई दूसरा नीतिमान राजा नहीं हुआ, क्योंकि जिसकी नीति के द्वारा वानरों ने भी भलीभांति से भृत्यता स्वीकार कर ली थी।
अपि राष्ट्रविनाशाय चोराणामेकचित्तता ॥ ५८ ॥
शक्ता भवेन्न किं शत्रुनाशाय नृपभृत्ययोः ।
**एकचित्तता के भाव का वर्णन—**जब चोरों का मिल कर एकचित्त हो जाना राष्ट्र-विनाश करने में समर्थ हो जाता है, तब भला राजा और भृत्य का एकचित्त हो जाना क्या शत्रुविनाश करने के लिये समर्थ नहीं हो सकता है, अपितु अवश्य हो सकता है।
न कूटनीतिरभवच्छ्रीकृष्णसदृशो नृपः ॥ ५६ ॥
अर्जुनाद् ग्राहिता स्वस्य सुभद्रा भगिनी छलात् ।
४०६ | शुक्रनीतिः
श्रीकृष्ण की कूटनीति का वर्णन—श्रीकृष्ण भगवान के समान कोई दूसरा राजा कूटनीति का प्रयोग करनेवाला नहीं हुआ, जिन्होंने कूटनीति द्वारा जबर-दस्ती अपनी बहन सुभद्रा अर्जुन को दिला दी (ब्याह दी)
नीतिमत्तान्तु सा युक्तिर्या हि स्वश्रेयसेऽखिला ॥ ६० ॥
नीतिमानों की वही युक्ति वस्तुतः युक्ति (उपाय) है जो उनके संपूर्ण कल्याण करने में उचित हो।
आदौ तद्धितकृत्स्नेहं कार्यं स्नेहमनन्तरम् ।
कृत्वा सधर्मवादं च मध्यस्थः साधयेद्धितम् ॥ ६१ ॥
हित सिद्ध करने में मध्यस्थ पुरुष के व्यवहार का निर्देश—मध्यस्थ (उदासीन) पुरुष प्रथम किसी के हितैषी मित्र के साथ स्नेह, तदनन्तर कर्त्तव्य कर्म और धर्मकथनपूर्वक स्नेह-प्रदर्शन करके हित सिद्ध करे।
परस्परं भवेत् प्रीतिस्तथा तद्गुणवर्णनम् ।
इष्टान्नधनवसनैर्लोभनं कार्यसिद्धिदम् ॥ ६२ ॥
परस्पर जैसे प्रीति हो वैसे उसके प्रेम के गुणों का वर्णन करे। और अभीष्ट अन्न-वस्त्र का लोभ दिखाये। यह कार्य-सिद्धि करने वाला होता है।
दिव्यावलम्बनं मिथ्या संल्लापं धैर्य्यवर्धनम् ।
इमे उपाया मध्यस्थ-कुट्टिनीकारिणां मताः ॥ ६३ ॥
मध्यस्थ (उदासीन), कुट्टिनी और धूर्त्त लोगों को दिव्य (शपथ) का अवलम्बन, झूठमूठ (मनगढन्त) बात करना और धैर्य बँधाना ये सब उपाय इष्ट होते हैं। इससे वे लोग कार्य सिद्ध करते हैं।
नात्मसङ्गोपने युक्तिं चिन्तयेत् स पशोर्जडः ।
जारसङ्गोपने छद्म संश्रयन्ति स्त्रियोऽपि च ॥ ६४ ॥
अपनी रक्षा की युक्ति का विचार न करनेवाले की निन्दा का निर्देश—जो अपनी रक्षा करने के लिये उपाय नहीं सोचता है वह पशु से भी बढ़कर जड़ है। और स्त्रियां भी अपने जार पति को छिपाने में छल का आश्रय लेती हैं।
युक्तिश्छलात्मिका प्रायस्तथान्या योजनात्मिका ।
यच्छद्माचारी भवति तेन छद्मा समाचरेत् ॥ ६५ ॥
अन्यथा शीलनाशाय महतामपि जायते ।
कार्यसिद्धयर्थ दो प्रकार की युक्तियों का निर्देश—कार्यसिद्धि के लिये युक्ति (उपाय) दो प्रकार की होती है, उसमें प्रायः करके छलरूपा पहली और सत्यरूपा दूसरी होती है। जो छल करनेवाले हैं, उनके लिये छलरूपा युक्ति का प्रयोग करना चाहिये। अन्यथा छल करना बड़े लोगों के चरित्र को बिगाड़ देनेवाली हो जाती है।
पञ्चमाध्याये खलनीतिनिरूपणप्रकरणम् ४०७
अस्ति बुद्धिमतां श्रेणिर्न त्वेको बुद्धिमानतः ॥ ६६ ॥
देशे काले च पुरुषे नीतिं युक्तिमनेकधाम् ।
कल्पयन्ति च तद्विद्या दृष्ट्वा रुद्धां तु प्राक्तनीम् ॥ ६७ ॥
और बुद्धिमानों की श्रेणी होती है न कि सिर्फ एक ही कोई बुद्धिमान होता है अतः चतुर लोग जहां पर सत्यरूपा युक्ति निष्फल देखते हैं वहां पर देश, काल तथा पात्र के अनुसार अनेक प्रकार की नीति तथा युक्ति की कल्पना करते हैं ।
मन्त्रौषधिपृथग्वेष-कालवागर्थसंश्रयात् ।
छद्म सञ्जनयन्तीह तद्विद्याकुशला जनाः ॥ ६८ ॥
छल का वर्णन— इस संसार में माया (छल) करने में निपुण लोग मन्त्र, औषध, नाना प्रकार के वेष, काल, वचन और अर्थ, इन सबों का आश्रय लेकर छल-प्रयोग करते हैं ।
लोकेऽधिकारिप्रत्यक्षं विक्रीतं दत्तमेव वा ।
वस्त्रभाण्डादिकं क्रीतं स्वचिह्नैरङ्कयेच्चिरम् ॥ ६९ ॥
लोक में बेंची हुई (वस्त्र-पात्र आदि), दी हुई (किसी को दान में दे दी गई) तथा खरीदी हुई वस्तुओं पर उनके अधिकारी (बेंचने, देने तथा खरीदनेवाले) लोगों के सामने उनको अपनी २ मुहरों से ऐसा चिह्न बना देना चाहिये, जो बहुत दिन तक न मिट सके ।
स्तेनकूटनिवृत्त्यर्थं राज्ञातं समाचरेत् ।
जडान्धबालद्रव्याणां दद्याद् वृद्धिं नृपः सदा ॥ ७० ॥
चोरों की जालसाजी रोकने के लिये अर्थात् चोरी का माल न बिकने पावे, इसके लिये उन बिकी हुई वस्तुओं की सूचना राजा को दे देनी चाहिये अर्थात् लिखा देनी चाहिये । और जड़, अन्ध तथा लड़कों के जो धन हों, उनको यदि राजा के पास रक्खा जाय तो राजा उसका सूद बराबर उन सबों को दे ।
स्वीया तथा च सामान्या परकीया तु स्त्री यथा ।
त्रिविधो भृतकस्तद्वदुत्तमो मध्यमोऽधमः ॥ ७१ ॥
तीन प्रकार के भृत्यों का निर्देश— जैसे स्त्री स्वीया (अपनी), सामान्या (वेश्या आदि) और परकीया (दूसरे की) भेद से ३ प्रकार की होती है। वैसे भृत्य भी उत्तम, मध्यम तथा तथा अधम भेद से तीन प्रकार का होता है ।
स्वामिन्येवानुरक्तो यो भृतकस्तूत्तमः स्मृतः ।
सेवते पुष्टवृत्तीदं प्रकरं स च मध्यमः ॥ ७२ ॥
४०८ | शुक्रनीतिः
पुष्टोऽपि स्वामिनाऽव्यक्तं भजतेऽन्यं स चाधमः ।
**उत्तमादि भृत्यों के लक्षण—**जो स्वामी में अनुरक्त रहे, वह भृत्य 'उत्तम' और जो पर्याप्त वेतन देनेवाले स्वामी की सेवा अधिक वेतन पाने के लोभ से करता है, वह 'मध्यम' एवं जो स्वामी से भलीभांति पालित होने पर भी छिपे रूप से दूसरे की भी सेवा करता है, वह 'अधम' भृत्य कहलाता है।
उपकरोत्यपकृतो ह्युत्तमोऽप्यन्यथाऽधमः ॥ ७३ ॥
मध्यमः साम्यमन्विच्छेदपरः स्वार्थतत्परः ।
**प्रकारान्तर से उत्तमादि भृत्यों के लक्षण—**जो अपकार करने पर भी स्वामी का उपकार करता है वही 'उत्तम' है इससे अन्यथा अर्थात् उपकार करने पर जो अपकार करता है, वह 'अधम' कहलाता है। और मध्यम 'भृत्य' तुल्य व्यवहार को पसन्द करता है अर्थात् उपकार करनेवाले के प्रति उपकार तथा अपकार करनेवाले के प्रति अपकार करना चाहता है, और इसके बाद का दूसरा जो अधम है वह केवल अपना स्वार्थ साधने में तत्पर रहता है।
नोपदेशं विना सम्यक् प्रमाणैर्ज्ञायतेऽखिलम् ॥ ७४ ॥
बाल्यं वाऽप्यथ तारुण्ये प्रारम्भितसमाप्तिदम् ।
**उपदेश के बिना सबका ज्ञान न होने का तथा बाल्य व युवा अवस्था में प्रारम्भ किये हुये कार्य की समाप्ति का निर्देश—**उपदेश के बिना केवल प्रमाणों से सभी बातें भलीभांति नहीं जानी जा सकती हैं। और बाल्य तथा युवा ये दो अवस्थायें प्रारम्भ किये हुये की समाप्ति देनेवाली अर्थात् इनमें जो आरम्भ किया जाता है उसकी समाप्ति भी हो जाती है।
प्रायो बुद्धिमतो ज्ञेयं न वार्धक्यं कदाचन ॥ ७५ ॥
आरम्भं तस्य कुर्याद्धि यत्समाप्तिं सुखं व्रजेत् ।
**आरम्भ किये हुये की समाप्ति होने में वृद्धावस्था की अयोग्यता का निर्देश—**किन्तु वार्द्धक्य (वृद्धावस्था) को प्रायः बुद्धिमान उक्त भांति का कदापि नहीं मानते हैं। इसमें प्रारम्भ किये हुये कार्य की समाप्ति नहीं हो पाती, क्योंकि उसी कार्य का आरम्भ करना चाहिये। जिसकी समाप्ति बिना क्लेश के हो जाय।
नारम्भो बहुकार्याणामेकदैव सुखावहः ॥ ७६ ॥
नारम्भितसमाप्तिं तु विना चान्यं समाचरेत् ।
**बहुत कार्यों का एक साथ आरम्भ करने का निषेध—**बहुत कार्यों का एक साथ ही आरम्भ करना सुखावह नहीं होता है और आरम्भ किये हुये कार्य की बिना समाप्ति हुये किसी दूसरे कार्य को नहीं करना चाहिये।
पञ्चमाध्याये खिलनीतिनिरूपणप्रकरणम् ४०९
पञ्चमाध्याये खिलनीतिनिरूपणप्रकरणम् ४०९
सम्पाद्यते न पूर्वं हि नापरं लभ्यते यतः ॥ ७७ ॥
कृती तत् कुरुते नित्यं यत् समाप्तिं व्रजेत् सुखम् ।
**समाप्त होने योग्य कार्य का प्रारम्भ करने का निर्देश—**क्योंकि आरम्भ किये हुये कार्य की बिना समाप्ति किये दूसरा कार्य प्रारम्भ करने से पूर्व का कार्य तो संपन्न नहीं हो पाता और दूसरा भी नहीं हो पाता । अतः बुद्धिमान को चाहिये कि—वह सदा उसी कार्य का प्रारम्भ करे जो सुखपूर्वक समाप्त हो जाय ।
यदि सिद्ध्यति येनार्थः कलहेन वरस्तु सः ॥ ७८ ॥
अन्यथाऽऽयुर्धनसुहृद्-यशोधर्महरः सदा ।
**प्रयोजन की सिद्धि होने की संभावना में कलह करने का निर्देश—**जिस कलह के करने से यदि अपना कोई प्रयोजन सिद्ध होता हो तो वह अच्छा होता है अन्यथा वह (कलह) आयु, धन, मित्र, यश और धर्म का सदा केवल हरनेवाला होता है ।
ईर्ष्या लोभो मदः प्रीतिः क्रोधो भीतिश्च साहसम् ॥ ७६ ॥
प्रवृत्तिच्छिद्रहेतूनि कार्ये सप्त बुधा जगुः ।
**कार्ये में प्रवृत्ति तथा छिद्र (दोष) के कारणों का निर्देश—**ईर्ष्या, लोभ, मद, प्रीति, क्रोध, भय तथा साहस ये ७ कार्य में प्रवृत्ति तथा छिद्र (दोष) के हेतु पण्डितों द्वारा कहे हुये हैं ।
यथाच्छिद्रं भवेत् कार्यं तथैव हि समाचरेत् ॥ ८० ॥
अविसंवादि विद्वद्भिः कालेऽतीतेऽपि चापदि ।
**निर्दोष तथा अभिमत ही कार्य करने का निर्देश—**जिस प्रकार से कार्य निर्दोष हो, उसी प्रकार से करना चाहिये । आपत्ति न रहने पर समय बीत जाने पर भी पण्डितों को जो अभिमत हो उसी कार्य को करना चाहिये ।
दशग्रामी शनानीकः कपरीचारकसंयुतौ ॥ ८१ ॥
अश्वस्थौ विचरेयातां ग्रामपो ह्यपि चाश्वगः ।
**दशग्रामाधिपादिकों का विचरण करने के प्रकारों का निर्देश—**दश ग्रामों का स्वामी और १०० सैनिकों का नायक अपने २ भृत्यों के साथ घोड़े पर सवार होकर विचरण करें । और एक ग्राम के स्वामी भी घोड़े पर सवार होकर विचरण करें ।
साहस्रिकः शतग्रामी एकाश्वरथवाहनौ ॥ ८२ ॥
दशशस्त्रास्त्रिभिर्युक्तौ गच्छेतां वाऽश्वसङ्गतौ ।
१००० हजार सैनिकों के अधिपति और १०० ग्रामों के जो अधिपति हों, वे शस्त्र धारण किये हुये १० सैनिकों से युक्त होकर एक घोड़े जुते हुये रथ पर अथवा केवल घोड़े पर सवार हुये विचरण करें ।
४१० | शुक्रनीतिः
सहस्रग्रामपो नित्यं नराश्वद्वयश्वयानगः ॥ ८३ ॥ आयुतिको विंशतिभिः सेवकैर्हस्तिना व्रजेत् । १००० ग्रामों का या १०००० सैनिकों का अधिपति नित्य २० सैनिकों के साथ पालकी, घोड़ा या दो घोड़े जुते हुये रथ या हाथी पर सवार होकर विचरण करें ।
अयुतग्रामपः सर्वयानैश्च चतुरश्वगः ॥ ८४ ॥ पञ्चायुतो सेनपोऽपि सञ्चरेद् बहुसेवकः । १०००० ग्रामों का और ५०००० हजार सैनिकों का अधिपति ये दोनों बहुत से भृत्यों (सैनिकों) से युक्त होकर सभी प्रकार की सवारियों से या चार घोड़े जुते हुये रथ पर सवार होकर विचरण करें ।
यथाधिकाधिपत्यं तु धीट्याधिक्यं प्रकल्पयेत् ॥ ८५ ॥ कल्पयेच्च यथाधिक्यं धनिकेषु गुणिष्वपि । जैसी अधिक संख्या वाले ग्रामों या सैनिकों के ऊपर आधिपत्य हो उसी के अनुसार संमान की अधिकता की कल्पना करनी चाहिये । इसी प्रकार से धनिकों तथा गुणियों में भी उनकी जैसी धन तथा गुण की अधिकता हो उसी के अनुसार उनके सम्मान की कल्पना करनी चाहिये ।
श्रेष्ठो न मानहीनः स्यान्न्यूनो मानाधिकोऽपि न ॥ ८६ ॥ राष्ट्रे नित्यं प्रकुर्वीत श्रेयोऽर्थी नृपतिस्तथा । श्रेष्ठ तथा हीन पुरुष के संमान में न्यूनाधिक्य का निषेध—कल्याण के चाहने वाले राजा को अपने राज्य में इस तरह की व्यवस्था करनी चाहिये कि जिसमें श्रेष्ठ पुरुष—उचित सम्मान से हीन, न्यून पुरुष—उचित सम्मान से अधिक सम्मान न प्राप्त करे, अर्थात् सबका यथोचित सम्मान हो, उसमें न्यूनाधिक्य न होने पावे ।
हीनमध्योत्तमानां तु ग्रामभूमिं प्रकल्पयेत् ॥ ८७ ॥ कुटुम्बिनां गृहाऽर्थं तु पत्तनेऽपि नृपः सदा । उत्तमादि गृह-भूमि के प्रमाणों का निर्देश—राजा ग्राम में हीन, मध्यम तथा उत्तम लोगों के लिये तथा कुटुम्बियों के लिये नगर में घर बनाने के योग्य सदा उचित भूमि की व्यवस्था करे ।
द्वात्रिंशत्प्रमितैर्हस्तैर्दीर्घाऽर्द्धा विस्तृताधमे ॥ ८८ ॥ उत्तमा द्विगुणा मध्या सार्धमाना यथार्हतः । कुटुम्बसंस्थितिसमा न न्यूना वाऽधिकाऽपि न ॥ ८९ ॥ ३२ हाथ लम्बी तथा १६ हाथ चौड़ी अधमा, ६४ हाथ लम्बी तथा ३२ हाथ चौड़ी उत्तमा और ४८ हाथ लम्बी तथा २४ हाथ चौड़ी मध्या-
पञ्चमाध्याये खिलनीतिनिरूपणप्रकरणम् ४११
संज्ञक भूमि वासार्थ देनी चाहिये। और जैसी कुटुम्ब की स्थिति न्यून या अधिक हो उसी के समान भूमि-व्यवस्था करनी चाहिये। उससे न न्यून और न अधिक होनी चाहिये।
ग्रामाद् बहिर्वसेयुस्ते ये ये त्वधिकृता नृपैः ।
नृपकार्ये बिना कश्चिन्न ग्रामं सैनिको विशेत् ॥ ६० ॥
अधिकारी पुरुषों को ग्राम के बाहर रहने एवं सैनिकों को बिना राजकार्य के ग्राम-प्रवेश के निषेध का निर्देश— राजा द्वारा जो २ अधिकारी नियुक्त किये गये हों उन सबों को ग्राम से बाहर की भूमि में निवास करना चाहिये। बिना किसी राज-कार्य के किसी सैनिक को ग्राम के अन्दर नहीं प्रवेश करना चाहिये।
तथा न पीडयेत् कुत्र कदापि ग्रामवासिनः ।
सैनिकैर्न व्यवहरेन्नित्यं ग्राम्यजनोऽपि च ॥ ६१ ॥
सैनिकों को ग्रामवासियों को पीड़ा न पहुँचाने एवं ग्रामवासियों को सैनिक के साथ व्यवहार न करने का निर्देश— और सैनिक कहीं किसी ग्रामवासी को कभी पीड़ा न पहुँचावे और ग्रामवासी भी कभी किसी सैनिक के साथ किसी प्रकार का व्यवहार न रक्खे।
श्रावयेत् सैनिकान्नित्यं धर्मं शौर्यविवर्धनम् ।
सुवाद्यनृत्यगीतानि शौर्यवृद्धिकराण्युपि ॥ ९२ ॥
सैनिकों के शौर्यवर्धक उपायों को करने का निर्देश— राजा सैनिकों को नित्य शूरता को बढ़ानेवाले युद्ध-धर्म सुनवावे और उनके लिये सुन्दर बाजा, नृत्य-गीत आदि का भी प्रबन्ध रखे जो कि शूरता को बढ़ाने वाले हों अर्थात् अश्ली-लता युक्त न हों।
युद्धक्रियां विना सैन्यं योजयेन्नान्यकर्मणि ।
युद्धकार्य से अन्य में सैनिकों की नियुक्ति का निषेध— युद्धकार्य के अतिरिक्त अन्य कार्यों को करने के लिये सेना की नियुक्ति न करे।
सत्याचारास्तु धनिका व्यवहारे हता यदि ॥ ९३ ॥
राजा समुद्धरेत्तांस्तु तथाऽन्यांश्च कृषीबलान् ।
व्यवहार में विपन्न होने पर धनिक या किसान की रक्षा करने का निर्देश— सत्य (ईमानदारी) आचरण रखनेवाला कोई धनिक या किसान यदि व्यवहार (लेन-देन) के नाते बिगड़ गया हो (हीन अवस्था में पड़ गया हो) तो राजा उसकी सहायता कर उद्धार करे।
ये सैन्यधनिकास्तेभ्यो यथार्हा भृतिमावहेत् ॥ ९४ ॥
पारदेश्यं च त्रिंशांशमधिकं तद्धनव्ययात् ।
धनी सैनिक का वेतन व भत्ता के विषय में विचार— जो सेना के अन्दर धनी सैनिक हों उनको योग्यता के अनुसार उचित वेतन दे। और राजधानी
४१२ | शुक्रनीतिः
से बाहर परदेश में जाने पर उनका जो धन-व्यय हो उससे तीसवां भाग अधिक मिलाकर राजा उनको द्रव्य दे ।
धनं संरक्षयेत्तेषां यत्नतः स्वात्मकोशवत् ॥ ६५ ॥
संहरेद्धनिकात् सर्वं मिथ्याचाराद्धनं नृपः ।
**सैनिकों के धन की आत्मवत् रक्षा करने का एवं जालसाज धनिकों का धन हरण करने का निर्देश—**और सैनिकों के धन को अपने खजाने की भांति यत्न-पूर्वक रक्षा करे । यदि कोई धनिक जालसाजी का व्यवहार कर धन पैदा करे तो उसका संपूर्ण धन छीन ले ।
यदा चतुर्गुणा वृद्धिर्गृहीता धनिकेन च ॥ ६६ ॥
अधमर्णान्न दातव्यं धनिने तु धनं तदा ।
इति शुक्रनीतौ खिलनीतिनिरूपणं नाम पञ्चमोऽध्यायः ।
इति शुक्रनीतिः समाप्ता ।
**मूल से चौगुना सूद के चुकने पर धनी को कुछ न देने का निर्देश—**और जब मूल धन से चौगुनी वृद्धि (सूद) धनिक ने ऋण लेनेवाले से ले ली हो तब उससे अधिक धन लेने के लिये धनिक को रोक दे । अर्थात् ऋण पट गया इससे ऋण लेनेवाला धनी को कुछ न दे ।
इति शुक्रनीतिभाषाटीकायां खिलनीतिनिरूपणं नाम पञ्चमोऽध्यायः समाप्तः ।
टीकाकार-परिचयः—
श्रीभार्गवीभर्तुरनुग्रहेण श्रीभार्गवीये ननु नीतिशास्त्रे ।
भर्गप्रियायामथिकाशि टीका समाप्ति राष्ट्रस्य गिराऽभ्युपेता ॥
वेदेन्दुशून्याक्षिमितोऽब्दमध्ये श्रीविक्रमादित्यप्रवर्त्तितेऽत्र ।
पौषे सितावाद्यतिथाविनेऽह्नि श्रीमद्ब्रह्मयुक्-शंकरनामकेन ॥
गोस्वामिदामोदरपादपद्म-सत्प्रमत्तेन च गौतमेन ।
राजेश्वरीताततया ब्रजेश्व-र्यात्मेश्वरत्वेन च विश्रुतेन ॥
'बस्ती' पुरीमध्यगत-प्रसिद्ध 'मिश्रौलिया' ग्रामसमुद्भवेन ।
विद्याविलासाख्यधिया सुधेन द्राक्षपद्यनिर्माणकृतश्रमेण ॥
टीकादिसम्पादनतः सदायूर्वेदागमग्रन्थविचारणायाम् ।
कृतश्रमेण प्रणयेन शश्वच्छब्दद्युनद्यम्ब्ववगाहनेन ॥
समाप्तश्चाऽयं ग्रन्थः
शुक्रनीति-श्लोकानुक्रमणिका
अ
| श्लोक/पाद | पृष्ठ | श्लोक/पाद | पृष्ठ | श्लोक/पाद | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|
| अंगानि वेदाश्चत्वारो | २४ | अतिमृदुस्तुतिनति | ४०० | अधिकृतो दशग्रामे | २९ |
| अंगानां क्रमशो बह्र्ये | १० | अतोऽन्यथा विनाशाय | ६१ | अधीते सुस्वरं गाति | २९० |
| अकर्तुं यद्धितमपि | ७० | अतो यतेत तत्प्राप्त्यै | १३८ | अधोगमा सदा कार्या | ३३५ |
| अकृष्यबालस्थविर | २८५ | अतो यतेत तत्प्राप्त्यै | १५५ | अनन्यस्वस्वकामत्य | १८१ |
| अकृत्वाद्योऽपि शनैः | २८६ | अतो विभागं दत्त्वैषां | ४०३ | अनन्याः स्वामिभक्ताश्च | ८४ |
| अकातरत्वं शस्त्रास्त्र | ४८ | अल्पटनं चानशनं | १७६ | अनर्थमप्यभिप्रेतं | १४० |
| अकीर्ति लभते सोऽत्र | १७९ | अत्यन्तविशदं वस्त्रं | २०८ | अनागमं तु यो भुङ्क्ते | १०४ |
| अकुटुम्ब्यं कति च | ७२ | अत्यन्तविषयासक्तं | ३६६ | अनागमादपि या मुक्तिः | ॥ |
| अकोपोऽपि सकोपाभः | ९२ | अल्पायासो हि विद्यासु | १७६ | अनाचाराद्धर्महानि | १६२ |
| अगाधसलिले मग्नो | १७ | अत्यावश्यं त्वसद्वेऽपि | ११९ | अनियुक्तो न वै ब्रूयात् | १७९ |
| अग्निदो गरदश्चैव | १३२ | अत्युग्रदण्डरूपः स्यात् | १९१ | अनियुक्तो नियुक्तो वा | २७३ |
| अग्निदो गरदो वैश्या | १९७ | अथ कोशप्रकरणं | २०१ | अनिषिद्धोपायकार्यः | ३७२ |
| अग्नारस्यैव गन्धस्य | ३५९ | अथ मित्रप्रकरणं | १८१ | अनिष्टवाक् परुषवाग् | १९७ |
| अङ्गीकर्तुं योग्यमिति | ११३ | अथ मित्रे तृतीयं तु | २२१ | अनीतिरेव सच्छिद्रं | ३ |
| अङ्गीकृतं यथार्थं यद् | २१२ | अथर्वणां चोपवेदः | २२७ | अनीतिस्ते तु मनसि | ९० |
| अङ्गीकृतमिति लिखेन् | ११३ | अथ साधारणं नीति | १२५ | अनुक्रमेण संयोज्यो | ७३ |
| अङ्गीकृतापराधेन | ३८४ | अदत्तं यश्च गृह्णाति | ३२१ | अनुच्छेद्यमनाहार्यं | १०३ |
| अचिरात्तं दुरात्मानं | २७० | अदानेनापमानेन | २२ | अनुनीय यथाशक्ति | १६४ |
| अजायाश्च गवांश्चैव स्यान् | २१६ | अदीर्घसूत्रः सत्कार्ये | ६५ | अनुभूतस्मारकं तु | २९६ |
| अजायाश्चैव शङ्घर्णं | २०९ | अदुष्टऋत्विजं याज्यो | ३२० | अनुयायात्प्रतिपदं | १३५ |
| अजाविगोमहिष्यश्च | २१९ | अदेयं यस्य वै नास्ति | ४७ | अनुरागं सुस्वरं च | ८५ |
| अजाविगोमहिष्येन | ७८ | अद्रोहसमयं कृत्वा | ३६५ | अनूपे तु तृणाधानां | ३५३ |
| अतः सदानीतिशास्त्र | २ | अधमर्णस्थितं चापि | १५९ | अनेकतन्तुसंयोगैः | २३५ |
| अतत्परनरस्यैव | १८ | अधमर्णात् दातव्यं | ४१२ | अनेकासनसन्धाने | २३२ |
| अतिकामक्रोधलोभै | ३१३ | अधमा धनमिच्छन्ति | १२१ | अनेन कर्मणा वेते | २७७ |
| अतिदण्डाच्च गुणिनि | १८४ | अधरोष्ठोऽनुचिबुकं | ३३७ | अन्तःपुरं वासगृहं | २८० |
| अतिदानतपःसत्य | ४०२ | अधर्मतः प्रवृत्तं तं | ३१३ | अन्तःपुंमविपकार्तं | ३५८ |
| अतिदानेन दारिद्र्यं | १६२ | अधर्मशीलन्नृपतेः | २०२ | अन्त्यजश्वादिपरिधि | ३३५ |
| अतिदुष्टाञ्छठमिता | ३४१ | अधर्मशीलो नृपतिः | १९९ | अन्त्यौ द्वौ पञ्चमाब्दे तु | ३५१ |
| अतिमौढ्यमतिदीर्घं | २२ | अधिकान् कृषिकृत्स्यै वा | २४३ | अन्नं न निन्द्यात् सुस्वस्थ | १४४ |
| अतिमद्यं हि पिबतो | १८ | अधिकारमदं पीत्वा | ७३ | अन्नं मुक्त्वा जलं | १४८ |
| अतो नृपः सूचितोऽपि | १९२ | अधिकारिगणैः कार्य | ५४ | अन्नसंस्कारदोषेषु | ३७७ |
| अधिकारिणमेकं वा | ७४ | अन्यगृद्धदारविदं | ३५ |
२७ शु०
४१४ | शुक्रनीतिः
| चरण / प्रतीक | पृष्ठ | चरण / प्रतीक | पृष्ठ | चरण / प्रतीक | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|
| अन्यथा दुःखमाप्नोति | १६१ | अभावे क्षत्रिया योज्या | १२३ | अवाहितो भवेन्मन्दः | ३४५ |
| अन्यथा दुःखमाप्नोति | १७८ | अभावे वीथिनो माता | ३१५ | अविचिन्त्य नृपस्त्वर्यं | ३१३ |
| अन्यथा मृतिगुह्यन्तं | २८७ | अभिमानाच्च लोभाच्च | २९९ | अविमर्देऽपि विमर्दे | १४६ |
| अन्यथाऽऽसुर्धनमुद्धर् | ४०९ | अभियुक्तनिरुद्धैर्वा | ३९ | अविवेकी यत्र राजा | १३३ |
| अन्यथाऽऽसुर्धनमुद्धृद् | १४५ | अभियुक्तस्तथाऽन्येन | २८५ | अविसंवादि विद्वद्भिः | ४०९ |
| अन्यथाऽऽसुर्धनहरा | २४८ | अभियुक्ताय दातव्यं | ३०९ | अव्यक्तमेव क्रीणाति | ३२० |
| अन्यथा योजितास्ते तु | ३९० | अभियोगानुरूपेण | २८८ | अभ्यास्यागम्यमित्येतत् | २९१ |
| अन्यथा शक्तितान्सन्ध्यान् | ३०३ | अभेद्यं व्यूहविद्वीर | १२४ | अभ्याहताशः संतुष्ये | ५० |
| अन्यथा शीलनाशाय | ४०६ | अमात्यः प्राङ्विवाकश्च | ६७ | अभ्याहताङ्गस्तेजस्वी | २७ |
| अन्यथा स्वप्रजातापो | २०५ | अमात्यः प्राड्विवाको | ३१४ | अभ्यङ्क्तिनक्षमो येन | ४७ |
| अन्यथा ह्यभियोक्तारं | ३१४ | अमात्यमपि संवीक्ष्य | ५४ | अशक्यो निर्णयो ह्यन्यैः | २७१ |
| अन्यद्रजोधिकं तेज | १७१ | अमात्यो दूत इत्येता | ६७ | अशिक्षितमसारं वा | ३६२ |
| अन्यस्यावर्तकस्त्वारम् | १०५ | अमितस्य प्रदातारं | २४२ | अशीतिवत्सरं यावद् | ३५० |
| अन्यान् सूनृतया तस्यै | १२१ | अयं सहस्रापराधी | १३१ | अशीत्यश्वान् रथे चैकं | ३३१ |
| अन्यायकारो कलह | १९७ | अयुक्तं यत् कृतं चोक्तं | १३१ | अशुभं चातिसंलग्न | २४२ |
| अन्यायगामिनि पत्न्यौ | ६५ | अयोग्यः पुरुषो नास्ति | ७५ | अशोधकनृपान्नैव | ४९ |
| अन्यायवर्तिनां राज्यं | ५४ | अरक्षितारं नृपतिं | १९ | अशोधयित्वा पक्षं ये | २८३ |
| अन्यायेनाभितो यस्माद् | २०२ | अरिमेदश्च पीतद्रुः | २४६ | अशौचं निर्दया दर्पः | १५३ |
| अन्यार्थमर्थहीनं च | २८९ | अरेद्विषत्गुणाम् ज्ञात्वा | १७८ | अश्वः सन्ताड्यते प्राज्ञैः | १४६ |
| अन्येषांमन्यधीनाञ्च | २३७ | अर्जने तु महद्दुःखं | २०६ | अश्वत्थो विचरेद्यातां | ४०९ |
| अन्योदवासहिष्णुश्च | १६७ | अर्जुनाद् ग्राहिता स्वस्य | ४०५ | अश्वस्य षट् सिता दन्ता | ३५१ |
| अन्योदयासहिष्णुश्च | १९७ | अर्थमपहुते वादी | ३०५ | अश्वानां च गजानां च | ३६९ |
| अन्योन्ययोः समक्षं तु | २९३ | अर्थशास्त्रं कामशास्त्रं | २२५ | अश्वे जयो वृषे धैर्यं | १६५ |
| अपराधं मातृस्नुषा | १५३ | अर्थस्य पुरुषो दासो | ४०२ | अष्टतालप्रमाणस्य | २६६ |
| अपशब्दाश्च नो वाच्या | १७८ | अर्थाद् धर्मश्च कामश्च | ४०२ | अष्टतालवपुस्त्यैव | २१६ |
| अपसृत्याक्षसिद्धयर्थं | ३७० | अर्थानर्थों तु वार्तायां | २४ | अष्टताला द्वापरे तु | २५१ |
| अपाणयः पाणिमता | ३७६ | अर्थिना लिखितो ह्यर्थः | २९२ | अष्टप्रकृतिभिर्युक्तो | ६७ |
| अपि ज्ञेयस्करं नृणां | २४९ | अर्थिनः पूरयेद्दीनं | २८३ | अष्टमांशं पारितोष्यं | १२० |
| अपि स्यात्तुमुदासीत | ९१ | अर्थिप्रत्यर्थिसाक्षिभ्यो | ३०० | अष्टमे पतितोत्पन्नौ | ३५२ |
| अपृष्टो नैव कथयेद् | १३५ | अर्थो वा यदि वा धर्मे | ४०२ | अष्टाङ्गुलं ललाटं स्याद् | २५३ |
| अप्रयत्नेन च स्त्रिया | २९८ | अर्धचन्द्रां वर्तुलां वा | ३२ | अष्टादशाब्दतस्तो हि | ३५१ |
| अप्रशस्तं तयोर्नैव | २९५ | अर्धशेनारमभोगश्च | ४६ | असंमतं विरुद्धं वा | ६३ |
| अप्रधानः प्रधानः स्याद् | ९४ | अर्धाङ्गुलाधिका वापि | ३३६ | असंवलितपद्म्यां तु | ३४९ |
| अप्रवासी गृही नित्यं | १८० | अर्ध्य शतधनुः प्रोक्त | ३४७ | असत्यं कार्यघातित्वं | १६६ |
| अप्रसिद्धं निराधारं | २९० | अल्पायुर्मूत्रकृच्छ्रार्थं | १ | असाहाय्यं च तत्कार्ये | १५९ |
| अप्रेरितहितकरं | ४ | अस्वीकृतं विभागेन | ५० | असिद्धस्तं परासेध | २८६ |
| अडाका मध्यवयसः | ७७ | अवश्यंभाविभावानां | ९ | असूयकः शत्रुसेवी | १९७ |
| अशक्यमक्षणे चैव | २८८ | अवश्यपोष्यभरणा | ११८ | अस्तीति न च मिथ्ये | २८९ |
| असमर्थं च वरं दद्याद् | २५८ | अवश्यमेव भोक्तव्ये | १४ | अस्त्रं तु द्विविधं ज्ञेयं | ३५६ |
श्लोकानुक्रमणिका
४१५
| अक्षाद्यैः स्वार्थसिद्धयर्थं | ३६१ | आन्वीक्षिक्षात्मविज्ञाना | २५ | ई | |
| अस्मिन्नर्थे समानेन | २१२ | आपत्कालेऽन्यदुर्गाणा | ३२५ | ईर्ष्यास्ते चोपसन्धाने | ३७७ |
| अस्य क्षिप्यते यत्तु | ३५६ | आपत्स्वपि न देयानि | ३१९ | ईशता चाधिकतरा | २२१ |
| अस्वतन्त्राः प्रजाः सर्वाः | ३१५ | आपदं प्रतरिष्यामो | ४०४ | ईषत्कुटिलदण्डाग्र | २६३ |
| अस्वामिकं कति प्राहुं | ७२ | आपद्युन्मार्गगमने | ९० | ईषदूत्प्लुत्य गमन | ३४९ |
| अहिंसेवासाधुहिंसा | १८९ | आपन्नः सन्धिमन्विच्छेत् | ३६४ | उ | |
| आ | आप्तवाक्यमनादृत्य | १९१ | उक्तं राष्ट्रप्रकरणं | ३२३ | |
| आकुञ्चिताम गदाभ्यां | ३४९ | आयः साहसिकः सैव | १०७ | उक्तं संक्षेपतो लक्ष्म | २२५ |
| आचारप्रेरको राजा | ४ | आयव्ययप्रविज्ञाता | ६९ | उक्ते तु साक्षिणा साध्ये | ३०१ |
| आचार्यः सर्वचेष्टासु | १३१ | आयुक्तिको विंशतिभिः | ४१० | उचितं तु व्ययं काले | १५८ |
| आज्ञापयामतश्चाहं | १६ | आयुर्बीजहरी राज्ञा | २७० | उच्चैः पदण्यासगतिः | ३४४ |
| आशामुलंघयन्ति स्म | १०० | आरम्भं तस्य कुर्याद्धि | ४०८ | उच्चैः प्रहसनं कासं | ८९ |
| आशामग्रस्तु महतां | १४५ | आरामकृत्रिमवन | ८६ | उत्फतिंतुं समर्थोपि | १७ |
| आशाशुकांश्च भूनकान् | ८७ | आर्जकस्यैव दुःखं स्यात् | २०६ | उत्कृती सस्यघाती वा | २८२ |
| आशोल्लङ्घनकारित्वं | २८२ | आवर्तकविहीनौ तु | ११० | उत्कृष्टमातिशीतानां | २७२ |
| आततायित्वमापन्नो | ३७८ | अनुक्तार्थं स्मृतं मान | १२१ | उत्कोचं नैव गृह्णीयात् | ९८ |
| आत्मनो विपरीतश्च | ३६२ | आवर्तौ जायते येषां | ३३९ | उत्कोचग्रहणं नैव | ४३ |
| आत्मपितृभ्रातरश्च | १८१ | आवेदयति यत्कार्यं | ४८ | उत्तमा द्विगुणा मध्या | ४१० |
| आत्मपितृमातृगुणैः | १५९ | आवेदयति यत्पूर्वं | २८० | उत्तमाऽधममध्यानां | २७४ |
| आत्मवत् सततं पश्ये | १२६ | आशीविषमिव क्रुद्धं | ८९ | उत्तमार्थं तदर्धं | २१२ |
| आत्मशुद्धिपराणां च | ३०९ | आसमन्ताच्चतुर्दिक्षु | १८४ | उत्तमैरननुज्ञातं | १४९ |
| आत्मस्त्रीधनगुह्यानां | १३ | आसिंधुनौगमाकूले | ३२ | उत्तमो नीचसंसर्गाद् | २२३ |
| आत्मस्त्रीधनगुह्यानां | १८१ | आसीनः स्याद्विमुक्ताक्षः | ३७० | उत्तमो मध्यमो नीचो | १५९ |
| आत्मस्त्रीपुत्रमित्राणि | १५६ | आसेधकाल आसिद्ध | २८४ | उत्तरे मद्यपा नार्यः | २७६ |
| आत्मानं गोपयेत् काले | ३६५ | आसेधयेद्विवादार्थी | ३१ | उत्थाप्य शयनीयानि | २३८ |
| आत्मानं प्रथमं राजा | १५ | आ स्तनात् पृष्ठदेशान्ता | २५५ | उत्थाय पश्चिमे यामे | ४० |
| आत्मैव ह्यात्मनः साक्षी | ३०१ | इ | उत्पन्नोत्पत्स्यमानानां | १९३ | |
| आदानमाशुकारित्वं | २३६ | इङ्गितं चेष्टितं यत्नात् | ४८ | उत्सगार्थं गुहान्कुर्यां | ३३ |
| आदौ तद्धितकृत्स्नेहं | ४०६ | इङ्गिताकारचेष्टाभ्य | ९२ | उत्सृष्टं रिपुणा वापि | ३२९ |
| आदौ वरं निर्धनत्वं | १७३ | इङ्गिताकारतत्त्वज्ञो | ६७ | उत्सृष्टा वृषभाद्या | ४५ |
| आद्यः पुनस्त्वदन्तिमांशं | ३९२ | इच्छ्या ताडितं कृत्वा | ११५ | उदग्गृहान् प्रकुर्वीत | ३४ |
| आधर्यकेभ्यश्चोरेभ्यो | ८२ | इच्छया स्थितरः कुर्यात् | ३०९ | उदग्गच्छतहस्तां प्राक् | ३७ |
| आधपणं न कुर्वेन्तु | ४५ | इज्याध्ययनदानानि | २२३ | उदरं च तथा बस्ति | २६६ |
| आधराधेयरूपौ वा | ११४ | इतरः कीर्तितस्तज्ज्ञै | १०८ | उदुम्बराश्वत्थवट | २४४ |
| आधिः सीमा बालधनं | १०४ | इति ज्ञेयं निराबाधं | २९० | उद्धृतेषुमयो शृङ्गा | ३७८ |
| आनृशंस्यं परो धर्मः | २५ | इति शक्तिमयोगेन | ३०३ | उद्धम्य शस्त्रमायान्तं | ३७८ |
| आन्वीक्षिकी त्रयी वार्ता | २४ | इन्द्रनीलं पुष्परागो | २०८ | उद्वेजते जनः कौर्याद् | १६२ |
| आन्वीक्षिक्यां तर्कशास्त्रं | २५ | इन्द्राग्नौ तावुभौ शस्तौ | ३४० | उपदेशो हि मूर्खाणां | १८४ |
| इन्द्रानिलयमार्काणा | १२ |
४१६ | शुक्रनीतिः
| पाद/विषय | पृष्ठ | पाद/विषय | पृष्ठ | पाद/विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|
| उपभोगाय च धनं | २८ | एकस्यैव हि योऽशक्तो | १६ | कन्याया अपि विक्रेता | १९७ |
| उपमानेन तज्ज्ञानं | १८० | एकशीलवयोविद्या | १८४ | कफोणिपातोऽप्यसकृत् | ३८० |
| उपहारस्य भेदास्तु | ३६४ | एकार्थचर्यां साहित्ये | ९२ | करदाश्च मवन्त्यन्ये | १८८ |
| उपहारादृते यस्मात् | ३६४ | एकेनैकश्च श्लोकेन | १८४ | करदीकरणं राज्ञा | २० |
| उपायनञ्च गृह्णाति | ९३ | एकैकं वादयेत्तत्र | ३०० | करत्रयात्मिका पथ्या | ३९ |
| उपायान्तरनाशे तु | ३६६ | एकैकशो दिशो वाऽपि | ३७० | कराग्रे परिधिर्ज्ञेयः | २६४ |
| उपायान् षड्गुणं मन्त्रं | ३६१ | एकैकशो विनिर्घ्नन्ति | २७ | करिष्यामीति ते कार्यं | ९१ |
| उपायान् षड्गुणं मन्त्रं | १८२ | एकोदरा अपि प्रायो | १५८ | करैः पंचसहस्रैर्वा | ३० |
| उपायान् षड्गुणान् वीक्ष्य | ३७४ | एणो गजः पतङ्गश्च | १२८ | करैर्वा प्रमितेर्माने | १८६ |
| उपायेन पदं मूर्ध्नि | ३७३ | एतावती भृतिं तेऽहं | ११७ | करोति निष्फलं कर्म | १७१ |
| उपायेन यथा व्यालो | १८४ | एते वश्यकरोपाया | १५१ | करोति विविधान् पन्थान् | ३४० |
| उपेक्षया च निपुणैः | ३६६ | एनमर्थि दापयिष्ये | २८८ | करोति स नृपः श्रेष्ठो | २०४ |
| उपेक्षेत प्रनष्टं यत् | १४१ | एवं परिचरन्ती सा | २४० | करोत्यकार्यं साशोऽन्यं | १६७ |
| उपेक्ष्य तस्मिन् तद्धानं | २६७ | एवंविधानमाधूंश्च | १९९ | करोत्याथर्वणं नैव | १८८ |
| उभयं दुर्बलं प्रोक्तं | ३२९ | एवंविधान् नृपो राष्ट्रे | २६८ | कर्णचूर्णाग्निदानेन | ३५९ |
| उभयानुमतः साक्षी | २८९ | एवंविधा राजसभा | ३७ | कर्णनेत्रान्तरं नित्यं | २६४ |
| उभयोः प्रतिभूग्राह्यः | २८९ | एवं विग्रोऽनिष्टगमो | ३३२ | कर्णयोरन्तरे व्यासो | २६४ |
| उभौ तत्र स्थिरा लक्ष्मी | १५ | एवंविधो रथो राज्ञा | ३३१ | कर्णग्रन्ध्यन्तरं तु | २५४ |
| ऊ | एवं विहरतो राज्ञः | ४२ | कर्णे श्यामः श्यामकणैः | ३४१ | |
| ऊढया कन्यया वापि | ३१८ | एवमादिषु जातेषु | १८२ | कर्णौ च भूसमी ज्ञेयौ | २५४ |
| ऊनविंशत्यङ्गुलः स्यात् | २५५ | एषां लङ्घनैर्विमिश्रितो | ३३२ | कर्तव्यं यामिकैरेवं | ४३ |
| ऊरुमूलस्य परिधिः | २६४ | एषां संख्या निकृष्टानां | १०८ | कर्तव्याः प्रागुदक्श्वेता | ३७ |
| ऊरुपु च शुभागतौं | ३४२ | एषु स्पर्शो वरस्त्रीणां | १२८ | कर्मणा विग्रदस्तं तु | ३६३ |
| ऋ | ऐ | कर्मणोत्तमनीचत्वं | २२३ | ||
| ऋग्यजुः साम चाथर्व | २२५ | ऐकमर्त्यं विना युद्धं | ४०२ | कर्मशीलगुणाः पूज्या | ६५ |
| ऋग्रूपा यत्र ये मन्त्राः | २२६ | औ | कर्मैव कारणं चात्र | ६ | |
| ए | औषधं तु मुखमानेन | ३३४ | कर्ममात्रॉस्तण्डुलांश्च | १०८ | |
| एकं शास्त्रमधीयानो | २७४ | क | कलहे न सहायः स्यात् | १५२ | |
| एकं शास्त्रमधीयानो | १४७ | कटिश्लक्ष्णानुमुष्क | ३४२ | कलादशकमैतद्धि | २३३ |
| एकः स्वादु न भुञ्जीत | १३४ | कठाधोमुखमानेन | २६५ | कलाऽभिलाक्षीते देशे | २३४ |
| एकद्वित्रिचतुर्हस्तं | २५७ | कथं वसेत्तदुद्वृत्तं | १५८ | कल्पयित्वोदरं सम्यै | २१४ |
| एकभूमिं समारोप्य | २५७ | कथा विचित्राः कुर्वाणाः | ३७७ | कल्पयेच्च यथायिक्यं | ४१० |
| एकवारमप्यशितं | ९४ | कथितं प्राड्विवाकादौ | २८३ | कल्पयेन्मध्यमं मध्ये | ३९ |
| एकवासास्तथाऽन्यञ्चो | २८० | कदापि नोग्रदण्डः स्यात् | १३९ | कल्पयेत्सावनं नित्यं | ११७ |
| एकविंशाङ्गुलं सन्धि | २६६ | कनिष्ठिकानामिकातो | २५२ | कश्चितस्त्वविमूढो वा | २३१ |
| एकस्मिन्नधिकारे तु | २०७ | कनिष्ठिकायाः परिधिः | २५६ | कवचं सशिरस्त्राण | ३६० |
| एकस्यैकेन वा द्वाभ्यां | ३६१ | कन्यां दद्यादुत्तमं चेन् | १५४ | कश्चित्तु तद्गिलोऽस्तीति | १६२ |
| एकस्यैव न पर्याप्ता | १६७ | कन्याभिका पालनीया | १५३ | कस्यापि नेश्वरः कर्त्ता | २३० |
| कांचित् सुकुशलप्रश्ने | १३१ |
श्लोकानुक्रमणिका
४१७
| श्लोकार्ध / पाद | पृष्ठ | श्लोकार्ध / पाद | पृष्ठ | श्लोकार्ध / पाद | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|
| काचपात्रादिकरण | २३६ | कुटुम्बिनां गृहार्थं तु | ४१० | कोपं करोति दौरात्म्या | २१ |
| का जातिः किं कुलं नाम | ४० | कुडाको लवली धात्री | २४४ | कोशभूतस्य द्रव्यस्य | ४० |
| कामः प्रजापालने च | २९ | कुनृपस्य छलं नित्यं | १७० | कोशवृद्धिं सदा कुर्यात् | ३१४ |
| कामः क्रोधस्तथा मोहो | २३ | कुमार्गगं नृपमपि | ५८ | कोष्ठकानां च भूमीर्वा | ३७ |
| कामक्रोधौ तु संयम्य | ३१५ | कुम्भकर्णोऽथ नमुचिः | २५० | कोष्ठविस्तारषष्ठांश | ३४ |
| कामक्रोधौ मदस्तमौ | १९२ | कुम्भकाराः शौल्विकाश्च | ८६ | कौटिल्येन प्रदानेन | ३५५ |
| कामादिनेकशयने | १८३ | कुर्यात्संशयं सीमान्तं | ४० | कौशेयेन कलामिश्र | १५० |
| कारणात् पूर्वपक्षोऽपि | २९४ | कुर्याद्धि विग्रहे पुंसां | ३६६ | कौसीदवृद्धया पण्येन | १५६ |
| कारणादिसमायोगाव | १११ | कुर्याद्यथा समीक्षेतत | १५२ | क्रमश्रो वा नृपा ज्ञेया | १८४ |
| कारुशिल्पिगणाल्पत्वे | २१९ | कुर्याद्विहारमाहारं | १४४ | क्रमात्स्वदशगुणिताः | १२६ |
| कार्य न चिन्तयेद्राजा | ३०२ | कुर्वन्ति लेखपत्रं यत् | १०४ | क्रमादभावे दौहित्र | ५१ |
| कार्यं पृथक् पृथक् सम्यै | २७४ | कुर्वन्त्यन्यत् तद्विधं वा | २१९ | क्रमादर्थं रक्षयेद्वा | २०५ |
| कार्यं निवेद्यते येन | १०२ | कुर्वीत नृपतिर्नित्यं | ४०३ | क्रमाद्वन्दे च भवतश्च | १५२ |
| कार्यं हि साध्यमित्युक्तं | २९१ | कुलगुणशीलवृद्धान् | ५८ | क्रयं वा विक्रयं वापि | ४४ |
| कार्यक्षमश्च प्राचीनः | ७० | कुलटा पतिपुत्रघ्नी | १९७ | क्रयविक्रयकुशला ये | ७ |
| कार्यमादिश्यते येन | १०२ | कुलमर्क्षाञ्च यो द्वेष्टि | १९९ | क्रयविक्रयातिखिप्सां | १३५ |
| कार्या व्यापकमाप्यानां | ११२ | कुलादिभ्योऽधिकाः | २७४ | क्रियतेऽन्यर्हणीयाय | २६ |
| कार्येऽप्यावश्यके प्राप्ते | ३६२ | कुलोद्भवं सत्यमार्यं | ३७२ | क्रियया कार्यिकं वीक्ष्य | २९२ |
| कार्यो द्वौ सर्वदा तो तु | ३७३ | कुबेरामङ्गलाशोच | १९७ | क्रियाफलमभिधाय | १३७ |
| कालं नियम्य कार्याणि | १७५ | कुशलादिपरिमश्नी | ९३ | क्रियावसानबिरसे | १६ |
| काष्ठं मृत्यव्यये देयं | ३८९ | कुसन्तत्या कुलं चात्मा | १७४ | क्रीडयेन्नृपत्यां कुर्याद् | ४८ |
| कालमानं त्रिधा ज्ञेयं | ११७ | कुसीदं कृषि बाणिज्यं | २४ | क्रूरकर्मा सदोषुक्को | ५५ |
| कालस्य कारणं राजा | १० | कूटपण्यस्य विक्रेता | ३२१ | कश्चित् बालस्तुरङ्गं | २६८ |
| कालानुकूल्ये विस्पष्टं | ९ | कूटसाक्ष्यं कूटलेख्य | ४४ | कञ्चित्तेवोचमा वृत्तिः | १७२ |
| कालेऽतीते विस्मृतिर्वा | १०२ | कूटेन निहतो वाजिः | १८४ | कञ्चिन्मेवासकृच्छुल्कं | २१७ |
| काले यदुचितं कर्तुं | ९४ | कूपवापी पुष्करिण्यः | २४६ | खगं युद्धाय सञ्जेत | १८६ |
| काले विपन्ने पूर्वोक्ते | ३०५ | कूर्मपृष्ठा मार्गभूमिः | ३९ | क्षणे क्षणे यामिकानां | ३९२ |
| काले वृष्टिः सुपोपाय | ४२ | कृतं चेत्क्षम्यते देवाद | १६१ | क्षत्रियादीनांन्यथा | १७१ |
| काले हितमिताहार | १४४ | कृतगुल्मं स्वयं गुल्मं | ३२९ | क्षत्रियो नास्य तद् कर्म | ३७५ |
| किं पुनर्मनुजा नित्यं | २२ | कृतपूर्वाऽहृकाभ्यर्थे | २३८ | क्षमते योऽपराधं स | १३ |
| किमल्पसाधनोऽशूरः | ३५४ | कृतो तत् कुरुते नित्यं | ४०९ | क्षमया यत्तु पुण्यं स्यात् | १८९ |
| किमाश्चर्यमतो लोके | ६२ | कृत्वा तु यौवराज्यार्हान् | ६० | क्षमाच्छिद्रानि चान्यानि | २९७ |
| किमुच्येत कुटुम्बीति | १९ | कृत्वा स्वस्य तुलासाम्यं | ३०७ | क्षमाशीलस्य वै राज्ञो | १९६ |
| कीनाशाः कारुकाः शिल्प | २७१ | कृतोत्सर्गे तु विष्णुं हि | ८८ | क्षमिणं बलिनं साधुः | १७७ |
| कीर्तनं चार्थशास्त्राणां | २२९ | कृष्णं सितं क्रमाद् रक्तं | २११ | क्षिपन्ति चाग्निसंयोगाद् | ३५९ |
| कीर्तिमन्त्यनृपाणां वा | ९० | कृष्णं सितं पीतरक्तं | २१० | क्षुभ्यस्तनोति मर्माणि | २३ |
| कीटकोडे तु स्वर्णादि | ३९२ | कृष्णतालुः कृष्णजिह्व | १४४ | क्षुरधारेण मनसो | १८४ |
| कुटीकन्दुकानेपम्य | ७१ | कृष्णपादो ऽरिनिन्द्यः | " | क्षुरप्रान्तो नाभिसमो | ३६० |
| कुटुम्बपोषणे स्वामी | १५३ | केवलैः साक्षिभिर्नैव | ३०३ |