सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
कर कुण्डलिनी शक्ति सोती है। वह वह्नियोग से जागृत होकर मन और प्राण के साथ डोर में बँधी सूई के समान ऊपर उठती है। यह भुजङ्गाकृति कुण्डलिनी, जो कमलतन्तु के समान विभासित और शुभ दीप्तियुक्त है, सुषुम्नामार्ग से वह्नि के संयोग से ऊपर उठ जाती है और जिस तरह ताली से तालाबन्द दरवाजा खोला जाता है, उसी तरह कुण्डलिनी महाशक्ति से योगी मोक्षद्वार का भेदन करता है। इस कुण्डलिनी के जागरण की विधि का वर्णन है : कृत्वा सम्पुटितौ करौ दृढतरं बद्धवा तु पद्मासनं गाढं वक्षसि सन्निधाय चिबुकं ध्यात्वा च तत्प्रेरितम् । वारंवारमपानमूर्ध्वमनिलं प्रोच्चारयेत्पूरितं मुञ्चन् प्राणमुपैति बोधमतुलं शक्तिप्रबोधान्नरः । ( गोरक्षशतक ५२ ) योगसाधक दोनों हाथों को एक-दूसरे से सटा कर पद्मासन में अच्छी तरह स्थित होकर वक्षःस्थल पर चिबुक को लगा कर कुण्डलिनी का ध्यान करते हुए बार-बार प्राणायाम द्वारा वायु खींच कर उसे अपानवायु से मिलाकर कुम्भक द्वारा वायु को रोक कर श्वास बाहर निकालने से शक्ति के प्रबोधनद्वारा अतुल बोध प्राप्त करता है । शिवसंहिता, घेरण्डसंहिता, हठयोगप्रदीपिका आदि में उपर्युक्त जागरण विधि को शक्तिचालिनी मुद्रा नाम दिया गया है । विहाय निद्रां भुजगी स्वयमूर्ध्वं भवेत्खलु । ( शिवसंहिता ४ । १०७ ) शक्तिचालन मुद्रा के अभ्यास से कुण्डलिनी जाग कर ऊपर की ओर गति करती है । आकाशादि को कुण्डलिनी से उत्पत्ति ऊर्ध्वमिति सर्वतत्त्वान्यपि स्वस्वरूपमेवेत्यूर्ध्वं वर्तते अतएव सा विमर्शरूपिणी योगिनः स्वस्वरूपमवगच्छन्तीति सुप्रसिद्धा ॥ १५ ॥ आकाश आदि समस्त भौतिक पदार्थ कुण्डलिनी शक्ति से ही उत्पन्न होते हैं, ( कार्यों की कारण से भिन्न सत्ता नहीं है ) समस्त प्रपञ्च कुण्डलिनीस्वरूप ही ११० ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
हैं, वह सभी के ऊपर विराजमान परम सत्ता होने से विमर्शरूपिणी विद्या है । योगियों को ( भगवती कुण्डलिनी की साधना से ) आत्मस्वरूप की प्राप्ति ( अलख निरञ्जन परमात्मा का साक्षात्कार ) सहज ही हो जाती है, यह बात प्रसिद्ध है ॥ १५ ॥ विशेष – हठयोगप्रदीपिका में निर्देश है कि शक्तिबोध से योगी को सहजा- वस्था की प्राप्ति स्वयं हो जाती है । उत्पन्नशक्तिबोधस्य त्यक्तनिःशेषकर्मणः । योगिनः सहजावस्था स्वयमेव प्रजायते ॥ ( हठयोगप्रदीपिका ४ । ११ ) जीवात्मा और परमात्मा का अभेद ज्ञान ही सहज ज्ञान है । यही स्व- विश्रान्तिरूप अद्वैत पद अथवा परम पद है । मध्यशक्तिप्रबोधन मध्यशक्तिप्रबोधेन अधःशक्तिनिकुञ्चनात् । ऊर्ध्वशक्तिनिपातेन प्राप्यते परमं पदम् ॥ १६ ॥ ( नाभिदेशस्थ मणिपुर चक्र में स्थित कुण्डलिनी मध्य शक्ति कही जाती है । मूलाधार में स्थित कुण्डलिनी अधःशक्ति के रूप में प्रसिद्ध है । सहस्रदल में यही शक्ति ऊर्ध्व शक्ति के रूप में विराजमान होती है ।) मध्य शक्ति को जगाने से और अधः शक्ति के ऊपर की ओर आकर्षण से तथा ऊर्ध्व शक्ति ( कुण्डली ) के निपात—संयोजन से परम पद की प्राप्ति होती है ॥ १६ ॥ विशेष — मूलाधार में आधार पद्म है, यह चार दलों वाला है । यह चक्र कुलाभिध कहलाता है, इसमें कुण्डलिनी शक्ति सर्प के समान आकृतिवाली सुप्ता अवस्था में पड़ी रहती है । तत्पद्ममध्यगा योनिस्तत्र कुण्डलिनी स्थिता ॥ ( शिवसंहिता ५ । ८५ ) आधार कमल की कर्णिका में त्रिकोणाकार योनि—कामगिरि पीठ में अधः शक्ति कुण्डलिनी रहती है । इसको अपान वायु के निकुञ्चन—आकर्षण से ऊर्ध्व सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १११
मुख कर जगाया जाता है। ढके हुए सुषुम्ना द्वार को उद्घाटित कर यह ऊर्ध्व- मुखी होती है। नाभिचक्र—मणिपूरक में आठवलयों वाली मध्य कुण्डलिनी की स्थिति बतायी गयी है। यह बन्धत्रय—मूल, उड्डियान और जालन्धर बन्ध के अभ्यास से समुत्थित होती है। प्राण से अपान का ऐक्य स्थापित होना ऊर्ध्व शक्तिपात कहा गया है। शक्ति—कुण्डलिनी ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र ग्रंथि का भेदन कर षट्चक्र से होती हुई सहस्रार में पहुँच जाती है, उस समय शून्य समाधि की स्थिति में साधक अपने स्वरूप में समाहित हो जाता है। एकैव सा मध्योर्ध्वाधः प्रभेदेन त्रिधा भिन्ना शक्तिरभि- धीयते ॥ १७ ॥ यद्यपि कुण्डलिनी महाशक्ति स्वरूपतः एक ही है, तथापि (स्थान और सूक्ष्मस्थूल भेद से) वह अधः, मध्य और ऊर्ध्व शक्ति के रूप में तीन प्रकार की कही जाती है ॥ १७ ॥ विशेष—मूलाधार में रहनेवाली कुण्डलिनी सूक्ष्म, अबोधरूप और सबका कारण कही जाती है। नाभि में मणिपूर चक्र में स्थित कुण्डलिनी बोधरूपा कही जाती है और यही शक्ति जब ऊर्ध्वमुखी होकर ऊपर की ओर गति करती है, तब बोधजनक कल्याणकारिणी ऊर्ध्व शक्ति के रूप में प्रसिद्ध होती है। बाह्येन्द्रियव्यापारनानाचिन्तामया सैवाधः शक्तिरि- त्युच्यते । अतएव योगिनस्तस्या आकुञ्चने रता यस्या आकुञ्चनं मूलाधारबन्धनात्सिद्धं स्यात् ॥ १८ ॥ बाह्य इन्द्रियजन्य कार्यों की चिन्ता का कारण अधः शक्ति—मूलाधार में सुप्त कुण्डलिनी है। (जब तक इसको जगाया नहीं जाता है तब तक साधक सांसारिक कार्यों की चिन्ता से ग्रस्त रहता है)। योगी मूलाधार में स्थित इस शक्ति के आकुञ्चन—संकोचन में तत्पर रहते हैं। मूलाधार बन्ध के अभ्यास (अपान और प्राण का ऐक्य स्थापित होने पर उड्डियान और जालन्धर बन्ध की सिद्धि) से यह शक्ति ऊर्ध्वमुखी होकर जाग जाती है और साधक को परमानन्द की प्राप्ति करा देती है ॥ १८ ॥ ११२ .| [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
विशेष --साधक योनिस्थान --गुदा और मेढ्र के मध्य भाग के स्थान को किसी भी पैर की एड़ी से दवा कर गुदा को सिकोड़े और फैलाये तथा अपान वायु को ऊपर की ओर खींचे । यही मूलवन्ध है । जिससे नीचे की ओर गतिशील अपानवायु को साधक सुपुम्ना में प्रवाहित करता है अथवा ऊपर की ओर उठाता है, वही मूलवन्ध है । जिस बन्ध से प्राण उड़कर सुपुम्ना नाड़ी में पहुँच जाता है, वही उड्डियानवन्ध है । नाभि के ऊपर और नीचे उदर में पीछे की ओर इस तरह आकर्षण करे कि दोनों भाग पीठ तक—पीछे पहुँच जाय । कम-से कम इस तरह तीन वार आकर्षण करना चाहिये । कंठ ( गले के विवर ) को सिकोड़ कर साधक को हृदय-देश में-- वक्ष के समीप चार अंगुल की दूरी पर ठोड़ी को दृढ़ता से स्थापित करना चाहिये । यही जालन्धरवन्ध है । इन तीनों वन्धों के अभ्यास से कुण्डलिनी महाशक्ति क्रमशः सहस्रार में पहुँच जाती है । यस्माच्चराचरं जगदिदं चिदचिदात्मकं प्रभवति तदेव मूलाधारं संवित्प्रसरं प्रसिद्धम् ॥ १६ ॥ जिससे चर-अचर, स्थावर-जंगम, चिद्, अचिद् समस्त जगत् की उत्पत्ति होती है, वह मूलाधार है, जिसके संकोच और प्रसरण से कुण्डलिनी का प्रबोधन होने पर ज्ञान की वृद्धि होती है—यह मूलाधार ही संवित्प्रसारण-भूमि है ॥ १९ ॥ सर्वशक्तिप्रसरसंकोचाभ्यां जगत्सृष्टिः संहृतिश्चभवत्येव न सन्देहस्तस्मात्सा मूलमित्युच्यते । अतः प्रायेण सर्वे सिद्धा मूलाधाररता भवन्ति ॥ २० ॥ समष्टिरूप ( सर्वेश्वरी ) महाशक्ति के व्यापार—कार्य से ही ( संकोच और प्रसरण से ही ) जगत् का सृजन और संहार होता है, इसमें संदेह नहीं है ( कि योगी इस मूल शक्ति का ध्यान कर जगत् की सृष्टि और संहार कर सकता है ) । यही कारण है कि मूलाधार में स्थित यह महेश्वरी शक्ति ही मूल शक्ति है । प्रायः सभी सिद्ध, यही कारण है कि मूलोधारशक्ति—कुण्डलिनी को जगाने में तत्पर रहते हैं ॥ २० ॥ तरङ्गितस्वभावं जीवात्मानं वृथाभ्रमन्तमपि स्वप्रकाश मध्ये स्वस्वरूपतया सदा धारयितुं समर्था या सा कुण्डलिनी सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] - [ ११३
मध्याशक्तिर्गीयते स्थूलसूक्ष्मरूपेण महासिद्धानां प्रतीयत इति निश्चयः ॥ २१ ॥ मध्या शक्ति ( कुण्डलिनी ) का वर्णन किया जाता है। यह कुण्डलिनी चिद्रूप होने से जीवात्मा का वास्तविक स्वरूप है। अविद्यावश संसार-बन्धन में विषयादि मृगतृष्णा में आसक्त जीवात्मा को यह मध्या शक्ति अपने चिद्रूप स्वप्रकाश में धारण करने में सदा समर्थ है। यह कुण्डलिनी स्थूल और सूक्ष्म— दो प्रकार की कही गयी है। इसकी महासिद्ध योगियोंको ही अच्छी तरह जानकारी रहती है, इसमें रञ्चमात्र भी सन्देह नहीं है ॥ २१ ॥ विशेष—महासिद्ध योगियों को यह कुण्डलिनी मूलाधार में सूक्ष्मरूपिणी और मणिपुर चक्र में स्थूल प्रतीत होती है। स्थूल-सूक्ष्म कुण्डलिनी स्थूलेति ।निखिलग्राह्याधारविग्राह्य स्वरूपापि पदार्थान्तरे भ्राम्यमाणा चिद्रूपा या वर्तते सा कुण्डलिनी साकारास्थूला- पुनस्त्वयमेव स्वप्रसारचातुर्यतया वर्तमाना योगिनां परमानन्द- तया कुण्डलिनी या निश्चयभूता वर्तते सा सूक्ष्मा निराकारा प्रबुद्धा महासिद्धानां मते प्रसिद्धा ॥ २२ ॥ यद्यपि मूलाधार में स्थित कुण्डलिनी योगसिद्ध पुरुषों के अतिरिक्त संसार में विषयासक्त बँधे जीवमात्र के लिये सूक्ष्म (अज्ञात) है तथापि यह शब्दात्मक स्थूल जगत् की सृष्टि करने के कारण साकार—स्थूल कही जाती है। वह रूपादि विषयों में भ्रमण—संचार करती रहती है, यही निज विस्तार- कौशल से नाभिस्थान—मणिपूर चक्र में अपने उपर्युक्त विषयसम्बन्धों को छोड़ कर अपने चैतन्यस्वरूप से योगियों को अपने आनन्ददायक व्यापक अखण्ड आत्मा का निश्चय कराती है। जागने पर यह सूक्ष्म रूप से, निराकार और सर्वत्र व्यापक रहती है। योगनिपुण महासिद्ध ही इस बात को अच्छी तरह जानते हैं ॥ २२ ॥ विशेष—जो योगसाधक कुण्डली को संचालित कर लेता है, वह सिद्धियों को प्राप्त कर लेता है और मृत्यु को वश में कर अपने अखण्ड परमानन्द स्वरूप में लीन हो जाता है। ११४ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
सृष्टिकुण्डलिनी ख्याता द्विधा भागवती तु सा । एकधा स्थूलरूपा च लोकानां प्रत्यगात्मिका । अपरा सर्वगा सूक्ष्मा व्याप्ति-व्यापकवर्जिता । तस्या भेदं न जानाति मोहिता प्रत्ययेन तु ॥ २३ ॥ ( प्रत्येक प्राणी के मूलाधार में सूक्ष्म रूप से कुण्डलिनी विद्यमान है, वह प्रत्येक जीवात्मा में व्यापक है । ) यह भगवत्सम्बन्धवाली ( भागवती ) कुण्डलिनी दो प्रकार की है, यह स्थूल और सूक्ष्म है। यह स्थूल जगत् की सृष्टि करती है, इसलिये सृष्टि-कुण्डलिनी के रूप में प्रसिद्ध है । जब यह नाभिचक्र-- मणिपूर में प्रबुद्ध होकर उपाधिसम्बन्ध छोड़कर अखण्ड स्वरूप में ऊर्ध्वमुखी होकर प्रतिष्ठित होती है, तब वह सर्वव्यापक, सूक्ष्म और व्याप्तिव्यापक भाव से रहित होती है । विषयप्रपञ्च में सम्मोहित प्राणी उसके सत्स्वरूप को नहीं जान पाते हैं ॥ २३ ॥ तस्मात् सूक्ष्मापरा संवित्स्वरूपा मध्या शक्ति कुण्डलिनी योगिभिर्देहसिद्ध्यर्थं सद्गुरुमुखाज्ज्ञात्वा स्वस्वरूपदशायां प्रबोधनीया ॥ २४ ॥ इसलिये सूक्ष्म चिद्रूपिणी विषयरहित मध्य कुण्डलिनीशक्ति को देहसिद्धि ( मृत्यु को वश में करने ) के लिये गुरु के सदुपदेश से अपनी आत्मस्वरूप की अभिव्यक्ति के लिये जगाना चाहिये । (गुरु की कृपा से ही उनके मुख से तत्सम्बन्धी प्रबोधन-क्रिया का ज्ञान प्राप्त कर ही योगसाधक मूलाधार में सोयी कुण्डलिनी को जगाकर सहस्रार की ओर ऊर्ध्वमुख करता है । ) यह संवित्स्वरूपा मध्य कुण्डलिनी नितान्त प्रबोधनीय है ॥ २४ ॥ अथ ऊर्ध्वशक्तिनिपातः कथ्यते सर्वेषां तत्त्वानामुपरिवर्त- मानत्वान्निर्नमं परमं पदमेवमूर्ध्वंप्रसिद्धं तस्याः स्वसंवेदन नानासाक्षात्कारसूचनशीलाया सोर्ध्वशक्तिरभिधीयते तस्या निपातनमिति स्वस्वरूपद्विधाभासनिरासः किन्तु स्वस्वरूपा- खण्डत्वेन भवति ॥ २५ ॥ सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ११५
( मध्य कुण्डलिनी शक्ति का सहस्रार में प्रवेश ही ऊर्ध्व-शक्तिनिपात कहा जाता है । ) ऊर्ध्वशक्ति-निपात का वर्णन किया जाता है । समस्त विषयप्रपञ्च— भौतिक पदार्थों के ऊपर वर्तमान रहने की स्थिति ही ऊर्ध्व है । नाम-रूप से रहित आदिनाथ परमेश्वरस्वरूप ही परमपद है । उस अनन्त अखण्ड परमात्मा की स्वरूपाभिव्यक्ति करनेवाली शक्ति ही ऊर्ध्व शक्ति ( परम जाग्रत् परमेश्वरी कुण्डलिनी ) कही जाती है । मूलाधार से मणिपूर चक्रादि का भेदन करती हुई महाकुण्डलिनी सहस्रार में शिव का ऐक्य प्राप्त कर 'यह, तुम, मैं' आदि के भेदभाव का अन्त कर देती है, किंतु ( साथ-ही-साथ ) परमात्मा और जीवात्मा के अखण्ड-अभिन्न व्यापक स्वरूप का ज्ञान करा देती है ॥ २५ ॥ शिवस्याभ्यन्तरे शक्ति शक्तेराभ्यन्तरः शिवः । अन्तरं नैव जानीयाच्चन्द्रचन्द्रिकयोरिव ॥ २६ ॥ ( शक्ति और शक्तिमान्—स्वरूपतः दोनों एक-दूसरे में अभिन्न हैं । कूटस्थ असंग शिव सर्वत्र व्यापक हैं, शिव को धारण करनेवाली शक्ति भी व्यापक है । ) शिव में शक्ति है, शक्ति में शिव हैं, जिस तरह चन्द्रमा और चाँदनी में स्वरूपतः भेद—भिन्नता नहीं है, उसी तरह शिव और शक्ति में भिन्नता नहीं है । ' दोनों में कूटस्थता और असंगता की दृष्टि से व्यवहार में भेद परिलक्षित होता है और पारमार्थिक सत्ता में वे स्वरूपतः अखण्ड और अभेद हैं । ) शिव-शक्ति एक हैं ॥ २६ ॥ अत ऊर्ध्वशक्तिनिपातेन योगिभिः परमं पदं प्राप्यत इति सिद्धम् ॥ २७ ॥ अतएव योगियों द्वारा ऊर्ध्व शक्ति—भगवती कुण्डलिनी महाशक्ति के निपात से सहस्रार में पूर्ण जाग्रत् कर प्रविष्ट कराने पर परम पद की—स्वरूप-स्थिति की प्राप्ति की जाती है, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है । सत्त्वे सत्त्वे सकलरचना राजते संविदेका तत्त्वे तत्त्वे परममहिमा संविदेवावभाति । भावे भावे बहुलतरला लम्पटा संविदेषा भासे भासे भजनचतुरा बृंहिता संविदेव ॥२८॥ ११६ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
अखण्ड शुद्ध चैतन्य सच्चिदानन्दस्वरूप परब्रह्म सर्वत्र विद्यमान है। यह चेतन ही समस्त विश्वप्रपंच का आधार है। प्रकृति, माया आदि तत्वों पर महिमा सहित शक्ति सर्वत्र प्रकाशित हो रही है । समस्त मानसिक व्यापारों में इसी शक्ति की सत्ता अभिव्यक्त है। आशय यह है कि सभी पदार्थों की समस्त व्यवस्थाओं के अंगों और गुणों को एकत्र करने वाला तथा सभी प्रकार की सत्ताओं की व्यवस्थाओं में संवित् ही प्रकाशमान है । वही समस्त व्यावहारिक सत्ताओं के सीमित, परिवर्तनशील तथा अनेक वस्तुरूपों में स्वयं को प्रकट कर रहा है। सभी प्रकार के मानसिक अनुभवों में स्वयं को अनेक आत्मगत रूपों में प्रकट कर कौशल से वह संवित् ही अनेक सीमित विशेषतायें धारण कर लेता है ।। २८ ।। किमुक्तं भवति परापरविमर्शरूपिणी संविन्नानाशक्ति- रूपेण निखिलपिण्डाधारत्वेन वर्त्तते इति सिद्धान्तः ।। २६ ।। इस तरह परासंवित्स्वरूप शिवशक्ति के सामरस्य का स्पष्ट निर्णीत रूप यह है कि व्यष्टि-समष्टिभूत भौतिक समस्त पदार्थों का अनुभवरूप सच्चिदानन्दस्वरूप चेतन ब्रह्म ही निजा, परा सूक्ष्मा शक्ति-रूपों के द्वारा समस्त पिण्डोंका आधार (आश्रय) है ।। २६ ।। इति शिवगोरक्षविरचितसिद्धसिद्धान्तपद्धतौ चतुर्थोपदेशः ।। सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ११७
पाँचवां उपदेश [ पिण्डपदसामरस्य ] महासिद्धयोगिभिः पूर्वोक्तक्रमेण परपिण्डादिस्वपिण्डान्तं ज्ञात्वा परमपदे समरसं कुर्यात् ॥ १ ॥ परासंवित्स्वरूप शिव-शक्ति को नितान्त अभिन्न समझते हुए योगी को मूलाधार में सोयी कुण्डलिनी महाशक्ति को जगाकर मध्य शक्ति के प्रबोधनपूर्वक ऊर्ध्व शक्ति का सहस्रार में निपात करना चाहिये। अपने व्यष्टि पिण्ड और सच्चिदानन्दपरमात्मस्वरूप परपिण्ड का ज्ञान प्राप्त कर परमपद परमात्मा में सामरस्य ( ऐक्य ) स्थापित करना चाहिये,—ऐसा करने से उन्हें परमात्म असंग शिवस्वरूप की प्राप्ति हो जाती है ॥ १ ॥ परमपद परमपदमिति स्वसंवेद्यमत्यन्तभासाभासकमयम् ॥ २ ॥ ( परम पद द्वैताद्वैतविवर्जित है । ) परम पद स्वानुभवैकगम्य है—स्वसंवेद्य है और स्वप्रकाशस्वरूप अभिव्यक्त है—किसी अन्य प्रकाश के माध्यम से यह बोध- गम्य नहीं है ॥ २ ॥ विशेष—स्वसंवेद्य परमपद का आशय यह है कि परमात्मा ही परमात्मा को जानता है अथवा जब कुण्डलिनी के पूर्ण प्रबोधन से जीवात्मा अखण्ड परमात्म- ११८ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
स्वरूप को प्राप्त हो जाता है, तब वह परमपद में स्वस्थ हो जाता है—यही परम- पद की स्वसंवेद्यता है । स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम । ( गीता १० । १५ ) यह परमात्मा स्वप्रकाश से प्रकाशस्वरूप—अत्यन्त भासाभासक है । ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते । ( गीता १३ । १७ ) उपनिषद् में उल्लेख है कि स्वप्रकाशस्वरूप परमात्मा सूर्य-चन्द्र के प्रकाश से नहीं प्रकाशित होता, सूर्य-चन्द्र का तेज उस परमप्रकाश में विलय को प्राप्त हो जाता है । न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकम् । ( कठोपनिषद् २ । ५ । १५ ) यह परमात्मपद सच्चिदानन्दस्वरूप होने से चक्षुरादिइन्द्रियातीत है । यत्र बुद्धिर्मनो नास्ति तत्त्वविन्नापराकला । ऊहापोहौ कर्तव्यौ, वाचा तत्र करोति किम् । वाग्मिनागुरुणा सम्यक् कथं तत्पदमीर्यते । तस्मादुक्तं शिवेनैव स्वसंवेद्यं परपदम् ॥ ३ ॥ उस परम पद के सम्बन्ध में बुद्धि किसी भी तरह का निश्चय नहीं कर सकती है, न मन, जो संकल्परूप है, उसमें प्रवेश पा सकता है, उस परमपद का न तो ( वाणी से ) मण्डन किया जा सकता है, न स्वरूप में स्थित कराने वाली कला भी उसका निर्वचन कर सकती है, न किसी धर्म-विशेष के आश्रय में उसका खण्डन किया जा सकता है । वाग्मी (वाचस्पति) गुरु के द्वारा भी उसका तत्वतः निरूपण नहीं हो सकता है । यही कारण है कि साक्षात् शिव ने उस परम पद को स्वसंवेद्य कहा है ॥ ३ ॥ विशेष—उस परम पद में चक्षुइन्द्रिय का प्रवेश नहीं है, उसमें वागिन्द्रिय की भी पहुँच नहीं है । मन ( अन्तःकरण ) का भी इसमें प्रवेश नहीं है । यह बतलाने से भी तो समझ में नहीं आ सकता है । सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ११६
न तत्र चक्षुर्गच्छति न वाग्गच्छति नो मनो न विद्मो न विजानीमो यथैतदनुशिष्यात् । ( केनोपनिषद् १ । ३ ) साक्षात् शिव के कथन का सन्दर्भ महायोगी गोरखनाथ ने इस परम पद के सम्बन्ध में निरूपित किया है, जिसकी पुष्टि शिवसंहिता में की गयी है । यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह । साधनादमलं ज्ञानं स्वयं स्फुरति तद् ध्रुवम् ॥ ( शिवसंहिता ५ । २१६ ) यह पद न तो वाणी से प्राप्त हो सकता है, न मन से ही । योगाभ्यासरूपी साधन से यह निर्मल ज्ञानस्वरूप स्वयं प्रकाशित होता है । अतएव नानाविध विचार्यचातुर्यचर्चाविस्मयाङ्गत्वाद् गुरुचरणकृपात्तत्त्वमात्रेण, निरुपाधिकत्वेन निर्णोतुं शक्यत्वात् स्वसंवेद्यमेव परमपदं प्रसिद्धमिति सिद्धान्तः ॥ ४ ॥ अतएव उस परम पद का वर्णन करने में अनेक प्रकार के सूक्ष्म विचारों में निपुण विद्वानों को भी विस्मित होना पड़ता है । यह परमपद तो निरुपाधिक है, प्रमाण आदि से इसकी प्राप्ति सम्भव नहीं है, गुरु के चरण में शरणागत होने पर उनकी अहेतुकी कृपा से ही इसका ज्ञान—बोध प्राप्त हो सकता है, यह तो नितान्त निर्विकल्प समाधि में स्थित होने पर स्वानुभव में ही स्वयं प्रकाशस्वरूप अभिव्यक्त होता है, यह स्वसंवेद्य है । श्रुतिस्मृति में इस तरह का सिद्धान्त निर्णीत किया गया है ॥ ४ ॥ गुरु द्वारा सन्मार्गदर्शन गुरुरत्र सम्यक्सन्मार्गसन्दर्शनशीलो भवति सन्मार्गो योगमार्गस्तदितरः पाखण्डमार्गः । तदुक्तमादिनाथेन— योगमार्गेषु तन्त्रेषु दीक्षितास्तांश्च दूषकाः । तेहि पाखण्डिनः प्रोक्तास्तथा तैः सह वासिनः ॥ ५ ॥ १२० ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
परम पद की प्राप्ति में गुरु ही ठीक-ठीक सन्मार्गदर्शन कराने वाला होता है, सन्मार्ग ही योगमार्ग है ( जिसके द्वारा समस्त चित्तवृत्तियों का निरोध होने पर सहज समाधि में साधक को परम पद का साक्षात्कार होता है । योगमार्ग (श्रुतिस्मृतिप्रतिपादित सम्यक् स्वरूपप्राप्ति-मार्ग) के अतिरिक्त दूसरा मार्ग पाखंड मार्ग है ( जिस पर अनात्मवादी चलकर सन्मार्ग की निन्दा और खण्डन करता है) । आदिनाथ शिव का कथन है—जो योगमार्ग और उसके उपायभूत (सहायक) तन्त्र ( दक्षिण मार्ग ) में दीक्षित और गुरुमुख हैं, उनकी निन्दा करने वाले और उन ( निन्दकों ) के सहायक पाखण्डी हैं, क्योंकि वे सत्स्वरूप की प्राप्ति में बाधक और अनभिज्ञ हैं ॥ ५ ॥ विशेष—यह योगमार्ग ही सिद्धमार्ग है, कैवल्यपद—परमपद की प्राप्ति इसों मार्ग के अनुशीलन से सम्भव है । नानामार्गैस्तु दुष्प्राप्यं कैवल्यं परमं पदम् । सिद्धमार्गेण लभ्यन्ते नान्यथा शिवभाषितम् ॥ ( योगबीज-८ ) योग से बड़ा परमपद की प्राप्ति की दिशा में कोई दूसरा बल ही नहीं है । यस्मिन् दर्शिते सति तत् क्षणात् स्वसंवेद्यसाक्षात्कारः समुत्पद्यते ततो गुरुरेवात्र कारणमुच्यते ॥ ६ ॥ जिस समय ( सिद्ध गुरु द्वारा ) परमपद की प्राप्ति के उपायभूत योगमार्ग के उपदेश से परमात्मबोध कराया जाता है, तत्काल ही ( उसी समय ) स्वसंवेद्य अलख-निरञ्जन परमेश्वर का साक्षात्कार हो जाता है । ( यह निर्वि- वाद है कि ) परमपद की प्राप्ति में गुरु ( की कृपा ) ही एकमात्र कारण है ॥ ६ ॥ गुरु और सामरस्य तस्माद् गुरुकटाक्षपातात् स्वसंवेद्यतया च महासिद्ध- योगिभिः स्वकीयपिण्डनिरुत्थानानुभवेन समरसं क्रियत इति सिद्धान्तः ॥ ७ ॥ सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १२१
यही कारण है कि बड़े-बड़े सिद्धयोगी गुरु के कृपाकटाक्ष और अपने ( मनोनिग्रहादि योगसाधना के ) अनुभव से स्वरूप-बोध में समर्थ होकर अपने व्यष्टिशरीर का निरुत्थानानुभव ( व्यापक पर-पिण्ड में अभेदता ) के समाश्रय में सामरस्य करते हैं—परमात्मस्वरूप परमपद की प्राप्ति के द्वारा सच्चिदानन्द स्वरूप हो जाते हैं—जीवात्मा-परमात्मा में पूर्ण अभेदता की प्रतिष्ठा ही यह व्यष्टि पिण्ड से परपिण्ड का सामरस्य है ॥ ७ ॥ विशेष—गुरु की वन्दना में महायोगी गोरखनाथ ने गोरक्षशतक के मांगलिक श्लोक में इसी सामरस्य को परिलक्षित किया है । श्रीगुरुं परमानन्दं वन्दे स्वानन्दविग्रहम् । यस्य सान्निध्यमात्रेण चिदानन्दायते तनुः ॥ ( गोरक्षशतक-१ ) गोरखनाथ का कथन है कि मैं अपने गुरुदेव की वन्दना करता हूँ, जो साक्षात् परमानन्द हैं, जो सच्चिदानन्दस्वरूप—आनन्दविग्रह अथवा मूर्तिमान् आनन्द हैं, जिनके सान्निध्यमात्र से ही—कृपाकटाक्ष से ही यह शरीर चिदानन्द, चिन्मय, परमानन्द, परमात्मस्वरूप हो जाता है । निरुत्थान-प्राप्ति का उपाय निरुत्थानप्राप्त्युपायः कथ्यते । महासिद्धयोगिनः स्वस्व- रूपतथ्यानुसन्धानेन निजावेशो भवति निजावेशान्निःपीडित निरुत्थानदशामहोदयः कश्चिज्जायते ततः सच्चिदानन्दचम- त्काराद्भुताकारप्रकाशप्रबोधो जायते, प्रबोधादखिलमेतद् द्वयाद्वयप्रकटतया चैतन्यभासाभासकं परात्परपरमपदमेव प्रस्फुटं भवतीति सत्यम् ॥ ८ ॥ निरुत्थान ( जीवात्मा-परमात्मा के अभिन्नत्व, एकत्वं अथवा सामरस्य ) की प्राप्ति के उपाय का वर्णन किया जाता है । अभेद रूप परमपद को चाहनेवाले योगी का अपने स्वरूप के अनुसन्धान से ( स्व-परपिण्ड की अभेदता के द्वारा ) निजावेश होता है—वह परमेश्वर को अपने ही स्वरूप में प्रतिष्ठित देखता है । १२२ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
स्वपिण्ड-परपिण्ड की अभेदता के अनुभव से उसे सर्वेश्वर परमात्मा के पिण्ड में आत्माभिव्यक्ति-निजावेश होता है और इस निजावेश के परिणामस्वरूप ही निरुत्थान अथवा सामरस्य का उदय होता है, उसे स्वाभिव्यक्तिपूर्वक इसका अनुभव होता है कि यह परपिण्ड-परमात्मपिण्ड मेरा ही (व्यष्टि-) पिण्ड है। सच्चिदानन्दस्वरूप आत्मा के स्वसंवेद्य अनुभव के चमत्कार से अद्भुत प्रकाश- स्वरूप आत्मबोध होता है। इस बोध से द्वन्द्व-परमात्म पिण्ड और स्वपिण्ड में भेद भाव का अन्त हो जाता है और अखण्ड परमात्मस्वरूप परमपद प्रत्यक्ष हस्तामलक के समान प्रस्फुटित-स्वप्रकाशित अथवा स्वाभिव्यक्त हो जाता है। इसमें तनिक भी संशय नहीं है-यह सत्य है ॥ ८ ॥ अतएव महासिद्धयोगिभिः सम्यग् गुरुप्रसादं लब्ध्वावधान- बलेनैक्यं भजमानैस्तत्क्षणात् परं पदमेवानुभूयते ॥ ६ ॥ व्यष्टि-पिण्ड और परपिण्ड (परमात्मपिण्ड) में सामरस्य की प्राप्ति गुरु के अनुग्रह से ही होती है। सिद्धयोगियों को इसके लिये सबसे पहले गुरु के चरण में शरणागत होकर उसकी प्रसन्नता से चित्तवृत्तियों के निरोधपूर्वक स्वरूप-ध्यान और समाधि से उपासना में-योगसाधना में तत्पर होकर स्वपिण्ड से परपिण्ड पर्यन्त ऐक्य का अनुभव करना चाहिये, इस तरह की साधना से ही तत्क्षण परम- पद-द्वैताद्वैतविवर्जित परमात्म पद का अनुभव होता है ॥ ६ ॥ तदनुभवबलेन स्वकीयं सिद्धं सम्यङ् निजपिण्डं ज्ञात्वा तमेव परमपद एकीकृत्य तस्मिन्प्रत्यावृत्त्या रूढैवाभ्यन्तरे स्वपिण्डसिद्धयर्थे महत्वमनुभूयते ॥ १० ॥ इस तरह अपने योगसाधनापरक अनुभव के प्रकाश में अपने व्यष्टिपिण्ड (परमात्मस्वरूप से अभेदता) का ज्ञान प्राप्त कर उसे परमपद में एकीकृत कर तथा उस परमपद को अपने व्यष्टि-पिण्ड में एकात्मस्वरूप कर अपने पिण्ड को सच्चिदानन्दस्वरूप में अभिव्यक्त कर परपिण्ड की उसमें अभिन्नता-अभेदता का महत्व योगी अनुभव करता है ॥ १० ॥ निजपिण्डपरीक्षा च स्वस्वरूपकिरणानन्दोन्मेषमात्रं यस्योन्मेषस्य प्रत्याहरणमेव समरसकरणं भवति ॥ ११ ॥ सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १२३
निज पिण्डपरीक्षा ( से आशय ) यह है कि अपने शरीर में भी परमात्म- स्वरूपकिरणरूप आनन्द का ही विकास है और इस प्रकाश के उन्मेष को अपने ही ( व्यष्टिपिण्ड के ) भीतर समेट कर परमात्मा से अभिन्न अथवा अभेद अनुभव करना ही सामरस्य है ॥ ११ ॥ अतएव स्वकीयं पिण्डं महद्रश्मिपुञ्जं स्वेनैवाकारेण प्रतीयमानं स्वानुसन्धानेन स्वस्मिन्तुरीकृत्य महासिद्धयोगिनः पिण्डसिद्ध्यर्थं तिष्ठन्तोति प्रसिद्धम् ॥ १२ ॥ परमात्मप्रकाश के अपने व्यष्टि-पिण्ड में प्रत्याहरण के परिणामस्वरूप यह शरीर महाप्रकाशपुञ्जरूप में आकारित ( सच्चिदानन्दस्वरूप ) हो उठता है । इस तरह अपने व्यष्टि-पिण्ड में परमात्म-प्रकाश के प्रत्याहरण—सामरस्यकरण द्वारा सिद्धयोगी देहसिद्धि — चिन्मय स्वरूप-स्वानन्दविग्रह की प्राप्ति से चिरकाल तक अजर-अमर रहते हैं ॥ १२ ॥ पिण्डसिद्धि का वेष अथ पिण्डसिद्धौ वेषः कथ्यते— शङ्खमुद्राधारणं च केशरोमप्रधारण ममरीपानममलं तथा मर्दनमुत्तमम् ॥ १३ ॥ एकान्तवासो दीक्षा च संध्याजपममायया । ज्ञानं भैरवमूर्त्तंस्तु तत्पूजा च यथाविधि ॥ १४ ॥ शङ्खध्मातं सिंहनादं कौपीनं पादुके तथा । अङ्गवस्त्रं बहिर्वस्त्रं कम्बलं छत्रमद्भुतम् ॥ १५ ॥ वेत्रं कमण्डलुञ्चैव भस्मना च त्रिपुण्ड्रकम् । कुर्यादेतान् प्रयत्नेन गुरुवन्दनपूर्वकम् । । १६ । पिण्ड ( देह )-सिद्धि हो जाने पर योगी—योगसिद्ध ( परमात्मपदप्राप्त ) के वेषधारण का वर्णन किया जाता है । उसे ( गले और हाथ में ) शंख और (दोनों कानों में) मुद्रा को धारण करना चाहिये, केश और रोम धारण करना चाहिये १२४ । [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
तथा अमरी की क्रिया के द्वारा उसे सहस्रार से द्रवित अमृत का पान करना चाहिये, प्राणायाम और आसनों के अभ्यास से उत्पन्न पसीने का अंग में लेप करना चाहिये । एकान्तवास का सेवन करते हुए गुरु की दीक्षा के अनुरूप निर्मल चित्त से संध्या-जप आदि के अनुष्ठान में तत्पर रहना चाहिये और योगसाधना मे विघ्नों के निवारण के लिये शास्त्रविधि से भैरव देव का पूजन करना चाहिये । शंखनाद करना चाहिये, वस्त्र के रूप में कौपीन धारण करना चाहिये, पैरों में खड़ाऊँ पहनना चाहिये तथा ओढ़ने-बिछाने के लिये कम्बल तथा पहनने के लिये अँचला अथवा धोती के रूप में वस्त्र रखना चाहिये, पानी के लिये कमण्डलु और जलवृष्टि से बचने के लिये पास में छाता रखना चाहिये । शरीर को स्नान के उपरान्त भस्म से अलंकृत कर ललाट में त्रिपुण्ड्र धारण करना चाहिये । नित्यप्रति गुरु के चरण का ध्यान करते हुए प्रणाम समर्पित कर साधना में तत्पर रहना चाहिये ॥ १३-१६ .। विशेष—अमरीपान (अमरोली) के अभ्यास द्वारा शरीर में साधक वीर्य की अखण्डता सुरक्षित रखता है । हठयोग-प्रदीपिका में अमरीपान पर प्रकाश डाला गया है । पित्तोल्वणत्वात्प्रथमाम्बुधारां विहाय निःसारतयान्त्यधाराम् । निषेव्यते शीतलमध्यधारा कापालिके खण्डमतेऽमरोली ॥ अमरीं यः पिबेन्नित्यं नस्यं कुर्वन् दिने दिने । वज्रोलीमभ्यसेत् सम्यगमरोलीति कथ्यते ॥ अभ्यासान्निःसृतां चान्द्रीं विभूत्या सह मिश्रयेत् । धारयेदुत्तमाङ्गेषु दिव्यदृष्टिः प्रजायते ॥ ( हठयोगप्रदीपिका ३ । ६६-६८ ) अधिक पित्तवाली ( प्रारम्भिक ) बिन्दु-धारा और सार-अंश से रहित अन्तकी धारा को छोड़कर शीतल मध्यधारा ( चन्द्रामृत ) का ही (इस मुद्रा में) पान किया जाता है, खण्डकापालिकमत में यही अमरोली है । साधक नासिका द्वारा अमरी का नित्य पान करते हुए वज्रोली मुद्रा द्वारा वीर्य के ऊर्ध्वाकर्षण का अभ्यास करता है । यही अमरोली है । अमरोली के अभ्यास से निकलती सुधा सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १२५
से अंग में लेप करने से दिव्य दृष्टि प्राप्त होती है। सुधा को भस्म से मिश्रित कर लेप करना चाहिये। परमपद की प्राप्ति तेषां पिण्डसिद्धौ सत्यां सर्वसिद्धय. संनिधाना भवन्ति ॥ १७ ॥ यस्मिञ्ज्ञाते जगत्सर्वसिद्धं भवति लीलया । सिद्धयः स्वयमायान्ति तस्माज्ज्ञेयं परं पदम् ॥ १८ ॥ परं पदं न वेषेण प्राप्यते परमार्थतः । देहमूलं हि वेषः स्याल्लोकप्रत्ययहेतुकः ॥ १६ ॥ इस प्रकार योगसाधना में तत्पर होने पर पिण्डसिद्धि--शरीर में ही परपिण्डस्थ परमात्मा की व्यापकता की अनुभूति होती है और इस सत्स्वरूप में समस्त अणिमादि सिद्धियां प्रत्यक्ष हो जाती हैं ॥ १७ ॥ इस परमपद--परमात्म- तत्व का बोध होने पर जगत् परमात्मस्वरूप में सहज--अनायास अभिव्यक्त हो उठता है। सिद्धियाँ बिना चाहे ही स्वतः उपस्थित हो जाती हैं। साधक को इन सिद्धियों में न उलझ कर परमपद का ही बोध प्राप्त करना चाहिये ॥ १८ ॥ यह परम पद वेष धारण करने से नहीं सिद्ध होता है। वस्तुतः वेषधारण का तात्पर्य तो यह है कि लोकमात्र को—संसार में निवास करने वाले प्राणियों को संन्यासवेष धारण के महत्व का पता चल जाय। यही कारण है कि देह को इस प्रकार वेषादि-चिह्नों से अलंकृत किया जाता है। साधनसहित वेष धारण कर परमपद का बोध प्राप्त करना चाहिये । योगमार्ग लोके निकृष्टमुत्कृष्टं परिगृह्य पृथक्कृतम् । तत्स्वधर्म इति प्रोक्तो योगमार्गे विशेषतः ।.२०।। योगामार्गात्परो मार्गो नास्ति नास्ति श्रुतौ स्मृतौ । शास्त्रेष्वन्येषु सर्वेषु शिवेन कथितः पुरा ॥२१॥ १२६ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
लोक में ऐहिक फलजनक ( सेवादि ) कर्म तथा यज्ञ, दानादि उत्कृष्ट पुण्यकर्म--दोनों ही सकाम बुद्धि से किये जाते हैं और जब भगवत्प्रीत्यर्थ कर्म के सम्पादन द्वारा साधक कर्मफल की लिप्सा का त्याग कर देता है, तब यही विशेष रूप से योगमार्ग में स्वधर्म कहा जाता है ॥ २० ॥ भगवान् शिव ने श्रुति, स्मृति, तन्त्र और पुराण तथा आगमों में यही कहा है कि योगमार्ग से श्रेष्ठ मोक्षप्रद-- परमात्मवोधप्रदायक अन्य कोई मार्ग नहीं है ॥ २१ ॥ महायोगी गोरखनाथजी ने योग को वेदकल्पतरु का परम फल कहा है— द्विजसेवितशाखस्य श्रुतिकल्पतरोः फलम् । शमनं भवतापस्य योगं भजत सत्तमाः ॥ ( गोरक्षशतक-६ ) वेद कल्पतरु हैं। जिस तरह कल्पतरु की शाखायें पक्षियों के आश्रयस्थान हैं, ठीक इसी तरह द्विजों ( पण्डितों, विद्वानों ) द्वारा वेद की शाखाओं, प्रति- शाखाओं का परिशीलन किया जाता है। वेदरूपी कल्पतरु का फल योग है। हे सत्पुरुषो ! इसका सेवन ( साधन ) करो। यह योग संसार के त्रय—आधिदैहिक आधिभौतिक और आधिदैविक ताप का शमन ( नाश ) कर देता है। इस अभ्यास अथवा साधन से सांसारिक दुःख अथवा भववन्धन समाप्त हो जाता है, स्वरूपबोध प्राप्त होता है। योगः संहननोपायो ज्ञानसङ्गतियुक्तिषु ॥ २२ ॥ लोके निकृष्टं सततं यं वा यं वा प्रकुर्वते । तं वा तं वा वर्जयन्ति लोका ज्ञानबलेन तु ॥ २३ ॥ मनुष्याणां च सर्वेषां प्राक् संस्कारवशादिह । शास्त्रयुक्तिसमाचारः क्रमेण भवति स्फुटम् ॥ २४ ॥ दो वस्तुओं को मिलाना ही योग है। लोक में अनित्य फल देने वाली वस्तुओं के योग का जो अर्थ किया जाता है, वह गौण है। यह योग तो ज्ञान- साधनपरक मोक्षप्रदायक है। ( यही योग का मुख्य अर्थ है । ) ज्ञानी लोक में व्यवहृत निकृष्ट अर्थ का परित्याग कर—अनित्य फलदायक गौण अर्थ के स्थान पर मुख्य अर्थ का ग्रहण करते हैं। सभी मनुष्यों की पूर्वजन्म के संस्कार सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १२७
और वासना के अनुरूप इस दिशा में प्रवृत्ति होती है । अतएव क्रमपूर्वक शास्त्र- युक्ति व्यवहार के प्रकट होने पर ही किन्ही-किन्हीं भाग्यशाली प्राणी की प्रवृत्ति योगसाधना में होती है ॥ २२–२४ ॥ एवं पिण्डे संसिद्धे ज्ञानप्राप्त्यर्थं तच्च परमं पद महा- सिद्धानां मतं परिज्ञाय च तस्मिन्नहं भावे जीवात्मा च सहजसंयमसोपायाद्वैतक्रमेणोपलक्ष्यते ॥ २५ ॥ इस तरह योगसाधना के द्वारा पिण्ड के सिद्ध होने पर अखण्ड ज्ञान की प्राप्ति के लिये महासिद्धों के मत में चिद्रूप शक्ति सहित अखण्ड शिवतत्त्व ही परम पद कहा जाता है । उस आत्मस्वरूप अखण्ड शिवतत्त्व में यह भाव स्थापित करे कि मैं ही शिव हूँ, मुझमें और शिव में सम्पूर्ण तादात्म्य है । परम शिव से अभिन्न जीवात्मा — जीव का वास्तविक आत्मस्वरूप ही सहज, संयम, सोपाय और अद्वैत क्रम से लक्षित होता है ॥ २५ ॥ सहजसंयमसोपायाद्वैतज्ञान तत्र सहजमिति विश्वातीतं परमेश्वरं विश्वरूपेणाव- भासमानमिति ज्ञात्वैकमेवास्तीति स्वस्वभावेन यज्ज्ञानं तत्सहजं प्रसिद्धम् ॥ २६ ॥ सहज ज्ञान का वर्णन किया जाता है । यद्यपि ( अलखनिरञ्जन ) परमेश्वर विश्वातींत निराकार और निर्गुण है तथापि वह मायाउपाधिसहित विश्वरूप में अवभासित, प्रतिभासित होता है । ऐसा समझ कर तत्वदृष्टि से परमेश्वर और मुझ ( जीवात्मा ) में पूर्ण अभेदता है । अपने आपको साधक परमात्मस्वरूप, असंग और व्यापक अनुभव करता है । इस तरह का स्वाभाविकं यथार्थ ( तत्व ) ज्ञान ही सहज ज्ञान है ॥ २६ ॥ संयम इति सावधानानां प्रस्फुरद्व्यापाराणां निजवर्तिनां संयमं कृत्वाऽऽत्मनि धीयत इति संयमः ॥ २७ ॥ १२८ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
४. पञ्चम-षष्ठ उपदेश: पिण्ड-ब्रह्माण्ड समरसता, अवधूत-लक्षण एवं ग्रन्थ उपसंहार
सहज ज्ञान के उपरान्त संयम के क्रम का वर्णन किया जाता है । इन्द्रियाँ हमारे शरीर के कार्यों में अपने विषयों के ग्रहण में तत्पर रहती हैं । ( इन्द्रियों की विषयों में प्रवृत्ति स्वाभाविक है । ) निरन्तर विषय-ग्रहण-व्यापार में तत्पर इन्द्रियों तथा मन को विषयाभिमुख होने से निरुद्ध कर उन्हें आत्मा में—अखण्ड परमात्म स्वरूप में लगाना ही संयम कहा जाता है ॥ २७ ॥ सोपायमिति स्वयमेव प्रकाशमयं स्वेनैव स्वात्मन्येकीकृत्य सदा तत्त्वेन स्थातव्यम् ॥ २८ ॥ अब सोपाय का वर्णन किया जाता है । मैं स्वयमेव स्वप्रकाशस्वरूप ( द्वैताद्वैतविवर्जित अखण्ड परमात्मरूप ) हूँ—इस तरह परमात्मा में अपनी आत्मा को तत्त्वतः अभेद कर साधक को आत्मस्वरूप में स्थित रहना चाहिये । जिस ज्ञान से इस अखण्डस्वरूपता का बोध होता है, वही सोपाय ज्ञान है ॥ २८ ॥ अद्वैतमित्यकर्तृत्वेनैव योगी नित्यतृप्तो निर्विकल्पः सदा निरुत्थानत्वेन तिष्ठति ॥ २९ ॥ अब अद्वैत स्वरूपस्थितिका निरूपण किया जाता है । आत्मा न कर्ता है, न भोक्ता है, वह असंग, शून्य, निर्विकल्प है । इस तरह आत्मा की परमात्मा में —अखण्ड निरञ्जन परमेश्वर में अभेदता का स्थापन कर—निरुत्थान भाव से परमात्मस्वरूप में स्थित योगी नित्यतृप्त होता है; उस परमात्मस्वरूप में सदा अच्युत रहता है ॥ २६ ॥ सहजं स्वात्मसंवित्तिः संयमः स्वस्वनिग्रहः सोपायं स्वस्वविश्रान्तिरद्वैतं परमं पदम् ॥ ३० ॥ जीवात्मा और परमात्मा में सम्पूर्ण अभेदता है—इस तरह का ज्ञान ही सहज कहलाता है । इन्द्रियों सहित मन को आत्मा में प्रवृत्त करना—निग्रहीत करना ही संयम है । अपने सत्स्वरूप में स्थिति-—विश्रान्ति ही सोपाय है और अद्वैत स्वरूप ही परम पद है ॥ ३० ॥ सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १२६