सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
यह आधार चक्र अपने चार दलों से युक्त है, उन दलों में वं, शं, षं, सं, ये चार अक्षर हैं। इस मूलाधार कमल के ध्यान से शरीर की कान्ति बढ़ जाती है जठराग्नि प्रदीप्त होती है, शरीर नीरोग रहता है। साधक तीनों काल का ज्ञाता हो जाता है। इस चक्र के ध्यान से योगी के सभी पाप क्षणमात्र में नष्ट हो जाते हैं। योगी मन, बिन्दु और प्राण, तीनों को अपने वश में कर लेता है। द्वितीयं स्वाधिष्ठानं चक्रं तन्मध्ये पश्चिमाभिमुखलिङ्गं प्रवालाङ्कुरसदृशं ध्यायेत् तत्रैवोड्डियानपीठं जगदाकर्षणं भवति ॥ २ ॥ दूसरा स्वाधिष्ठान चक्र है। उसके बीच में पीछे की ओर मुख वाला प्रवालांकुर मूंगे के अग्रभाग के सदृश ( लाल रंग का ) शिवलिंग है, इसका ध्यान करना चाहिये, यहीं उड्डियान पीठ भी है, इस लिंग का ध्यान करने से समस्त जगत् साधक की ओर सहज खिंच जाता है, शिवलिंग की उपासना से जगत् के प्राणो को साधक अपनी ओर आकृष्ट करने की सामर्थ्य प्राप्त करता है ॥ २ ॥ विशेष --'स्व' शब्द प्राण का वाचक है, इसलिये स्वाधिष्ठान प्राणचक्र है। स्वशब्देन भवेत्प्राणः स्वाधिष्ठानं तदाश्रयः । ( गोरक्षशतक २२ ) यह स्वाधिष्ठान-चक्र मेढ़ में स्थित है।'यह छः दलों का कमल ( चक्र ) है। यह माणिक्य के समान लाल रंग का है। छः दलों पर क्रमशः वं, भं, मं, यं, रं, लं अक्षर अंकित होते हैं। इस चक्र में आत्मा का ध्यान कर योगी सुखी होता है। स्वाधिष्ठाने च षट्पत्रे सन्माणिक्यसमप्रभे । नासाग्रदृष्टिरात्मानं ध्यात्वा योगी सुखो भवेत् ॥ ( गो० संहिता २ । ६५) स्वाधिष्ठान चक्र के ध्यानी को समस्त न सुने शास्त्रों का ज्ञान हो जाता है। उसका शरीर रोगरहित हो जाता है। वह संसार में अभय रहता है। सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ३५
सर्वरोगविनिर्मुक्तो लोके चरति निर्भयः ॥ (शिवसंहिता ५।१०१) स्वाधिष्ठान चक्र का ध्यान करने वाले योगी की शारीरिक दिव्य कान्ति से लोग सम्मोहित हो उठते हैं । उसे अनेकानेक सिद्धियाँ प्राप्त होने लगती हैं, पर वह इन्हें साधना में बाधक मानकर आत्मलीन रहता है । तृतीयं नाभिचक्रं पञ्चावर्तं सर्पवत् कुण्डलाकारं तन्मध्ये कुण्डलिनीशक्तिं बालार्ककोटिसदृशीं ध्यायेत् सा मध्यमा शक्तिः सर्वसिद्धिदा भवति ॥ ३ ॥ तीसरा नाभिचक्र (मणिपूरक) है। यह सर्प के समान कुण्डलाकार नाड़ी से पाँच वलयों में वेष्टित है, इस चक्र के मध्य में अरुणोदयकालीन करोड़ों सूर्य की प्रभा के समान विभासित कुण्डलिनी शक्ति का (योगी को) ध्यान करना चाहिये । यह मध्यमा शक्ति है, इसके ध्यान मात्र से समस्त सिद्धियों की प्राप्ति होती है । (यह मूलाधार में स्थित सूक्ष्म कुण्डलिनी शक्ति की ही ज्योतिर्मयी विशिष्ट अवस्था है। इसके ध्यान से चित्त में सत्वगुण प्रवाहित होता है। मूलाधारस्थ कुण्डलिनी तीन वलयों में वेष्टित होती है ।) मणिपूरक-चक्र में ज्योतित पाँच वलयों में वेष्टित कुण्डलिनी मध्यमा शक्ति है ॥ ३ ॥ विशेष—यह स्वर्ण-वर्ण का कमल है, इसके दस दलों पर क्रमशः ड से फ तक—डं, ढं, णं, तं, थं, दं, धं, नं, पं, फं, वर्णमाला अंकित है। इस चक्र का ध्यान करने से पाताल नाम की सिद्धि प्राप्त होती है, योगी इसका ध्यान कर सदा सुखी रहता है । जगत् में उसकी अभीष्ट कामनायें पूरी होती हैं, दुःख-रोग नष्ट होते हैं, मृत्यु का भय टल जाता है और परकाय-प्रवेश की शक्ति प्राप्त होती है, स्वर्णादि बनाने की सिद्धि प्राप्त होती है, औषधि—जड़ी-बूटी तथा पृथ्वी के भीतर छिपी रत्नादि निधि का ज्ञान होता है । तृतीयं पङ्कजं नाभौ मणिपूरकसंज्ञकम् । दशारण्डादिफान्तार्णं शोभितं हेमवर्णकम् । तस्मिन् ध्यानं सदा योगी करोति मणिपूरके । तस्य पातालसिद्धिः स्यान्निरन्तरसुखावहा ॥ ईप्सितं च भवेल्लोके दुःखरोगविनाशनम् ॥ ३६ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
कालस्य वञ्चनं चापि परदेहप्रवेशनम् ॥ जाम्बूनदादिकरणं सिद्धानां दर्शनं भवेत् । औषधादर्शनं चापि निधीनां दर्शनं भवेत् ॥ ( शिवसंहिता १०४, १०६-१०८ ) विवेक-मार्तण्ड में महायोगी गोरखनाथजी का कथन है कि मणिपूरक चक्र तरुण सूर्य के समान है । नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि स्थिर कर इस चक्र में आत्मा का ध्यान करने से योगी जगत् को संक्षुब्ध कर देता है । तरुणादित्यसंकाशे चक्रे तु मणिपूरके । नासाग्रदृष्टिरात्मानं ध्यात्वा संक्षोभयेज्जगत् ॥ ( विवेकमार्तण्ड १७० ) मणिपूर चक्र का अर्थ है मणि का नगर, यह अग्नि का केन्द्र है, ताप का मध्य बिन्दु है, मणि की भांति चमकदार है । यह चेतनता की शक्ति से प्रदीप्त है । इस पद्म के भीतर उलटा त्रिभुज है, जिसका रंग लाल है । इसका वाहन भेंड़ा है । यह चक्र आत्मिक तथा भौतिक शरीर का प्राण-केन्द्र है, यहाँ प्राण- अपान का संगम होता है, जिसके परिणामस्वरूप ताप की उत्पत्ति होती है । यह ताप जीवन की रक्षा करता है । श्रीगोरखनाथ ने इस चक्र को नाभिचक्र कहा है । यह सुषुम्ना नाड़ी के अन्तर्गत एक केन्द्र के रूप में नाभिक्षेत्र में स्थित अनुभव किया जाता है । एक ऊर्ध्वगामिनी शक्ति योगी की चेतना को आधार चक्र और स्वाधिष्ठान चक्र से ऊपर उठा कर इसमें प्रतिष्ठित करती है । मूलाधार और स्वाधिष्ठान की अपेक्षा शिव-शक्ति के मिलन की आनन्दानुभूति का यह विशिष्ट केन्द्र है । महायोगी गोरखनाथ ने इस चक्र में प्रकट कुण्डलिनी को मध्यमा शक्ति कहा है, जिसका आशय है कि शिव-शक्ति के मूल स्वरूप की आत्माभिव्यक्ति की यह मध्यवर्ती अवस्था है । मणिपूर चक्र में मनरूपी भ्रमर रहता है । यह समय- समय पर विभिन्न दलों-पंखुड़ियों पर विचरण करता है । इस चक्र में चौबीस सौ श्वास लेने के समय ( २ घंटे ४० मिनट ) तक ध्यान करना चाहिये, इस ध्यान से शान्ति, आनन्द, धृति, समता, निर्मोहता, वैराग्य, एकान्तप्रियता आदि की प्राप्ति होती है । सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ३७
चतुर्थं हृदयाधारमष्टदलकमलमधोमुखं तन्मध्ये कर्णिकायां लिङ्गाकारं ज्योतिरूपां ध्यायेत् । सैव हंसकला सर्वेन्द्रियाणि वश्यानि भवन्ति ॥ ४ । हृदय में ( सुषुम्ना नाड़ी में ) स्थित चौथा अनाहत चक्र है। यह आठ दल ( पंखुड़ियों ) वाला कमल है, जो अधोमुख ( नीचे की ओर मुख वाला ) है। उसके मध्य में कर्णिका में स्थित शिव-लिंग के आकार वाली ज्योति का ध्यान करना चाहिये। यही हंसकला नामवाली श्रीशक्ति है। इसकी उपासना से ( साधक की ) सभी इन्द्रियाँ वश में हो जाती हैं ॥ ४ ॥ विशेष—यद्यपि इस सिद्धसिद्धान्तपद्धति में गोरखनाथजी ने अनाहत चक्र को अष्टदल कमल कहा है तथापि अपनी अन्यान्य रचनाओं में उन्होंने अनाहत चक्र को बारह पंखुड़ियों ( दल ) का कमल स्वीकार किया है और उनकी इस स्वीकृति की पुष्टि शिवसंहिता आदि में भी उपलब्ध होती है। बारह दलवाला कमल ही अनाहत महाचक्र है, यह पाप-पुण्य से रहित है, जीवात्मा तब तक संसार-बन्धन में भ्रमित रहता है, जब तक वह इस चक्र में ध्यानस्थ होकर परमतत्व परमात्मा का ज्ञान नहीं प्राप्त करता है, परमात्म साक्षात्कार नहीं कर लेता है। द्वादशारे महाचक्रे पुण्यपापविवर्जिते । तावज्जीवो भ्रमत्येव यावत्तत्त्वं न विन्दति ॥ ( गोरक्षशतक २४ ) गोरखनाथजी का कथन है कि इस अनाहत-चक्र का ध्यान करने वाला साधक अमृतत्व में स्थित हो जाता है, अमर हो जाता है। अनाहते महाचक्रे द्वादशारे च पङ्कजे । नासाग्रदृष्टिरात्मानं ध्यात्वा ध्यातामरो भवेत् ॥ ( विवेकमार्तण्ड १७१) गोरक्षसंहिता में तो स्पष्ट कथन है कि अनाहत चक्र के ध्यान से साधक ब्रह्ममय हो जाता है। यह चक्र प्रचण्ड सूर्य के समान प्रकाशित कहा गया है। ३८ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
नासाग्रे दृष्टिमाधाय ध्यात्वा ब्रह्ममयो भवेत् ॥ ( गोरक्षसंहिता २।६७) हृदय-चक्र—अनाहत कमल के ध्यान से मन जड़ता का परित्याग कर ऊर्ध्वगामी होकर प्रबोध पाता है, जाग जाता है । महायोगीन्द्र मत्स्येन्द्रनाथजी ने गोरखनाथजी को उपदेश दिया है । हिरदा चक्र में मन प्रबोध ॥ ( गोरख वा० मच्छींद्र-गोरखबोध ५४ ) अनाहतचक्र आघातरहित होता है । सृष्टि की समस्त ध्वनियों की उत्पत्ति परस्पर दो वस्तुओं के आघात से होती है, भौतिक जगत् के परे दिव्य ध्वनि ही समस्त ध्वनियों का स्रोत है । यह अनहद ( अनाहत ) नाद है; ये ध्वनियाँ हृदय केन्द्र से उत्पन्न होती हैं । यह चक्र नीले रंग का कमल कहा गया है । इसके मध्य में षट् कोण की आकृति है । इसका बीज मन्त्र यं है । इसकी वाहन द्रुतगामी काला हिरण है । यह वायुतत्व का प्रतीक है । इसके देवता पिनाक धारण करने वाले भगवान शिव हैं। इसकी अधिष्ठात्री देवी काकिनी है । अनेक सिद्धों और योगियों ने इस चक्र का रंग श्वेत भी बताया है । इस चक्र में ४८०० श्वास आने के समय ( ५ घंटे २० मिनट ) तक ध्यान करना चाहिये । ध्यान से निर्लोभता, सत्यता, प्रेम, सावधानता, समदर्शिता, अहिंसकता, वात्सल्य, विवेक- शीलता, जिज्ञासुता, दया, क्षमा और करुणा की शक्ति प्राप्त होती है । शिवसंहिता में इस चक्र को लाल रंग का कहा गया है । यह चक्र आनन्द का स्थान कहा गया है । इस अनाहत (चक्र) कमल में व्याप्त परम तेज को वाणलिंग कहा गया है । इस वाणलिंग के स्मरण मात्र से साधक को दृष्ट-अदृष्ट फल की प्राप्ति होती है । वह दूरस्थ सूक्ष्म पदार्थों को देखने की शक्ति पाता है । वह आकाश में उड़ने में समर्थ हो जाता है । खेचरी-मुद्रा सिद्ध हो जाती है । आकाश में स्थित जीव साधक के वश में हो जाते हैं । हृदयेऽनाहतं नाम चतुर्थं पङ्कजं भवेत् । कादिठान्तार्णसंस्थानं द्वादशारसमन्वितम् ॥ अतिशोणं वायुबीजं प्रसादस्थानमीरितम् । पद्मस्थं तत्पर तेजो वाणलिङ्गं प्रकीर्तितम् । सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ३६
यस्यस्मरणमात्रेण दृष्टादृष्टफलं लभेत् ॥ सिद्धिः पिनाकीयत्रास्ते काकिनी यत्र देवता । ( शिवसंहिता ५ । १०६-१११ ) महायोगी गोरखनाथ का कथन है कि इस ज्योतिपूर्ण कमल के मध्य में शक्ति स्वयं को असाधारण रूप से भव्य, सुन्दर और स्थिर लिंगाकार प्रकाश के रूप में प्रकट करती है। शिवरूपिणी—शिवालिंगन के आनन्द में मग्न कुण्डलिनी के इस रूप को हंसकला कहा जाता है, इस हंसकला को श्रीशक्ति भी कहा जाता है। योगी इसका ध्यान कर इन्द्रियजयी और शान्त हो जाता है। सिद्धियों की प्राप्ति के प्रलोभन नष्ट हो जाते हैं और योगी अपनी जैविक अथवा मानसिक शक्ति को इसमें केन्द्रित कर लेता है। पञ्चमं कण्ठचक्रं चतुरङ्गुलं तत्र वाम इडा चन्द्रनाड़ी दक्षिणे पिङ्गला सूर्यनाड़ी तन्मध्ये सुषुम्णां ध्यायेत् सैवानाहत- कलाऽनाहतसिद्धिर्भवति ॥ ५ ॥ पांचवां चार अंगुल विस्तारवाला कण्ठ ( विशुद्ध ) चक्र है। वहाँ बायीं ओर इडा-चन्द्रनाड़ी है और दाहिनी ओर पिंगला-सूर्यनाड़ी है। ( ये दोनों नाडियाँ मूलकन्द से प्रकट होकर यहाँ आती हैं- निकलतो हैं।) इन दोनों नाड़ियों के मध्य में ( श्वेत वर्ण की ) सुषुम्ना नाड़ी-ब्रह्म नाड़ी का ध्यान करना चाहिये। यह ब्रह्मनाड़ी अनाहत कला कहलाती है, इसकी उपासना ( ध्यान ) से अनाहत सिद्धि—मानसिक संकल्पों की सिद्धि होती है, संकल्पशक्ति सफल होती है ॥ ५ ॥ विशेष—कण्ठस्थान में दीपक की ज्योति के समान प्रभाववाले विशुद्ध चक्र में नासा के अग्र भाग पर दृष्टि स्थिर कर आत्मा का ध्यान करने से साधक के समस्त ( आधिभौतिक, आधिदैहिक और आधिदैविक ) ताप-दुःख नष्ट हो जाते हैं। सततं घण्टिकामध्ये विशुद्धे दीपकप्रभे। नासाग्रदृष्टिरात्मानं ध्यात्वा दुःखं विमुञ्चति ॥ ( विवेकमार्तण्ड १७२ ) महायोगीन्द्र मत्स्येन्द्रनाथजी ने कण्ठचक्र को इष्ट के ध्यान का स्थान कहा है। ४० ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
'कांठे चक्रे धरिये ध्यान । ( मच्छोन्द्रगोरखवोध-५४ ) यह कण्ठचक्र सुनहले रंग का है। यह बड़ा तेजस्वी और सोलहस्वरों ( अक्षरों ) से समलंकृत है । इस कमल में सोलह दल हैं और उन पर यथाक्रम- अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ॠ, ऌ, ॡ, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अः —स्वर अंकित हैं । इस चक्र की अधिष्ठात्री शाकिनो है और इष्ट देवता अर्धनारीश्वर शिव हैं । कण्ठस्थानस्थितं पद्म विशुद्ध नाम पञ्चमम् । सुहेमाभं स्वरोपेतं षोडशस्वरसंयुतम् । ( शिवसंहिता ५ । ११६ ) जो इस कंठचक्र का ध्यान करता है, वह योगीश्वर हो जाता है, चारों वेद का ज्ञानी हो जाता है, इस विशुद्ध चक्र में मन और प्राण का लय होने पर योगी यदि क्रोध करता है तो तीनों लोक भय से कांप उठते हैं। इसका ध्यान कर योगी लम्बी अवधि के लिये वाह्य ज्ञान से शून्य होकर समाधिस्थ हो जाता है । इस चक्र में
शिवशक्ति का नादरूप अथवा ध्वनिरूप है। इस स्तर पर योगी नादों की अनेकता को पार कर शाश्वत शिव-शक्ति के तादात्म्य का अनुभव करता है। षष्ठं तालुचक्रं तत्रामृतधाराप्रवाहः घण्टिकालिङ्गमूल- रन्ध्रराजदन्तं शंखिनोविवर दशमद्वारं तत्र शून्यं ध्यायेत्, चित्तलयो भवति ॥ ६ ॥ छठाँ तालुचक्र है, वहाँ ( सहस्रदलस्थित चन्द्रमण्डल से ) अमृत प्रवाहित होता रहता है । ( उस अमृत की बूंदें तालु की विशेष नाड़ियों में झरती रहती हैं । ) मुख खोलने पर जो मांस खण्ड दीखता है, वही घण्टिका है, जो लिंग के समान है, उसके मूल से लेकर तालुपर्यन्त राजदन्त नाम का बिल है, यही शंखिनी विवर कहा जाता है । ( यहाँ शंखिनी नाड़ी का सम्बन्ध है । ) यह दसवें द्वार का मार्ग है, यहाँ शून्य ( निर्गुण-निराकार अलख-निरञ्जन परमेश्वर ) का ध्यान करना चाहिये । यहाँ शून्य का ध्यान करने से चित्त लय को प्राप्त होता है ॥ ६ ॥ विशेष—महायोगी गोरखनाथ का कथन है कि तालुचक्र तालूमूल में स्थित हैं । इस चक्र में सहस्रार से सतत अमृत की धारा प्रवाहित होती रहती है । योगी अपनी मानसिक जैविक शक्ति को इस चक्र में समुचित प्रणाली से एकाग्र कर इस अमृत का पान कर क्षुधा-पिपासा से मुक्त होकर शरीर दिव्य कर लेता है, भौतिक अमृतत्व प्राप्त कर लेता है, इस चक्र में शून्य पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिये, जिससे चित्तलय की स्थिति की प्राप्ति हो सके । पूर्ण आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने के लिये और चेतना को परमात्ममय कर देने के लिये चित्तलय एक महान् सोपान है । तालूमूल में एक घंटिका लिंग है, जिसके मूल में एक लघु छिद्र है, एक पूर्ण रिक्त स्थान शंखिनी विवर है. यह दसवाँ द्वार है, यहीं शून्य पर धारणा करने से समाधि के फलस्वरूप चित्त विलीन हो जाता है, इसमें ध्यान करने से व्यावहारिक चेतना समाप्त हो जाती है और पारमार्थिक ज्योति आलो- कित हो उठती है । इसी चक्र से योगी को सहस्रार से द्रवित अमृतपान सुलभ होता है । गोरखनाथ ने इस चक्र के ऊपर भ्रूचक्र ( आज्ञा चक्र ) और निर्वाण-चक्र तथा ४२ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
आकाश चक्र में शिव सायुज्य अथवा अलख निरंजन परम ज्योति स्वरूप स्वसंवेद्य परमेश्वर के साक्षात्कार का वर्णन किया है । स्रवत् पीयूषसम्पूर्णे लम्बिकाचन्द्रमण्डले । नासाग्रदृष्टिरात्मानं ध्यात्वा मृत्युं विमुञ्चति ॥ ( विवेकमार्तण्ड १७३ ) लम्बिका-स्थान में स्थित चन्द्रमण्डल से स्रवित पीयूष में आत्मा का ध्यान कर योगी नासा के अग्रभाग पर दृष्टि स्थिर करता है और मृत्यु के भय से रहित हो जाता है । सप्तमं भ्रूचक्र मध्यममंगुष्ठमात्रं ज्ञाननेत्रं दीपशिखाकारं ध्यायेद् वाचां सिद्धिर्भवति ॥ ७ ॥ सातवाँ भ्रूचक्र है । ( यही आज्ञाचक्र कहा जाता है । यह दोनों भौंहों के मध्य में स्थित है, इसलिये मध्यम चक्र कहा गया है । ( यह दो दलों वाला कमल है । ) इस भ्रूचक्र के मध्य में दीपशिखा के आकार वाला एक अंगुल का ज्ञाननेत्र ( तृतीय नेत्र ) है । इस ज्ञाननेत्र का ध्यान करने से योगी वाक्सिद्ध हो जाता है, वह जो कुछ कहता है, वह व्यर्थ नहीं होता ॥ ७ ॥ गोरक्षसंहिता में महायोगी गोरखनाथजी ने आज्ञाचक्र में माणिक्य की शिखा के समान आत्मा में नासाग्रदृष्टि से ध्यान करने का फल आनन्दमय होना बताया है । इस आज्ञाचक्र में नीलवर्ण के शिव का ध्यान कर योगी प्राण को वश में कर जीव-शिव का ऐक्य सम्पादित करता है। नासिका के अग्र भाग में निर्गुण, शान्त, विश्वतोमुख, आकाश के समान व्याप्त शिव का ध्यान कर ब्रह्ममय हो जाता है । आज्ञाचक्र की स्थिति भौंहों के मध्य में है । भौंहों के मध्य के स्थान को आकाश कहा जाता है, इस चक्र के देवता शिव हैं; उनका ध्यान कर योगी मुक्ति प्राप्त करता है । भ्रुवोरन्तर्गतं देवं सन्माणिक्यशिखोपमम् । नासाग्रदृष्टिरात्मानं ध्यात्वानन्दमयो भवेत् । ध्यायन्नीलनिभं नित्यं भ्रूमध्ये परमेश्वरम् । आत्मानं विजितप्राणो योगी योगमाप्नुयात् ॥ सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ४३
आकाशे यत्र शब्दः स्यात्तदाज्ञाचक्रमुच्यते । तत्रात्मानं शिवं ध्यात्वा योगी मुक्तिमवाप्नुयात् ॥ ( गोरक्षसंहिता २।७०,७१, ७३) आज्ञाचक्र के सम्बन्ध में शिवसंहिता में बड़े विस्तार से विचार किया गया है । आज्ञाचक्र कमल के दोनों दलों पर हं, क्षं बीजाक्षर अंकित हैं । ये दोनों दल श्वेत रंग के हैं । यहाँ के महाकाल सिद्ध हैं और हाकिनी देवी अधि- ष्ठात्री रूप में स्थित रहती हैं । इस आज्ञापद्म के मध्य में शरद् के चन्द्रमा की आभा के सदृश चन्द्रबीज ('ठ' बीज) स्थित रहता है, इसे जान लेने पर परमहंस पुरुष को किसी प्रकार का अवसाद नहीं रहता है । आज्ञापद्मं भ्रुवोर्मध्ये हक्षोपेतं द्विपत्रकम् । शुक्लाभं तन्महाकालः सिद्धो देव्यत्र हाकिनी ॥ शरच्चन्द्रनिभं तत्राक्षरबीजं विजृम्भितम् । पुमान् परमहंसोऽयं यज्ज्ञात्वा नावसीदति ॥ ( शिवसंहिता ५ । १२२-१२३ ) इस आज्ञा-चक्र में तुरीय तृतीय लिंग के रूप में मुक्तिदायक शिव विराजमान हैं । इस लिंग का ध्यान करने से योगी शिवस्वरूप हो जाता है । शरीर की इडा- पिंगला नाड़ियाँ वरणा और असी कही जाती हैं, इन्हीं वरणा-असी ( वाराणसी ) के मध्य में विश्वनाथ अभिव्यक्त हैं । इस वाराणसी को परमतत्व माना गया है । मेरु दण्ड के सहारे सुषुम्ना नाडी ब्रह्मारन्ध्र तक गयी है । इडा नाड़ी सुषुम्ना के परा- वृत होती हुई आज्ञाचक्र के दक्षिण भाग से होकर बायें नासापुट को जाती है, इसलिये गंगा कही गयी है । इडा नाड़ी के समान पिंगला नाड़ी आज्ञा-चक्र के वाम भाग से चलकर दाहिने नासांपुट को जाती है, इसलिये इसको असी कहा गया है । महेश्वर इस आज्ञाचक्र के देवता हैं, इस चक्र के ऊपर तीन पीठ हैं, जिन्हें नाद, बिन्दु और शक्ति कहा जाता है । इस आज्ञापद्म का ध्यान करने वाले साधक के पहले जन्म में किये गये कर्म के फल नष्ट हो जाते हैं । इस आज्ञाचक्र में जिस साधक का मन क्षणमात्र के लिये भी स्थिर हो जाता है, उसके सभी पाप उसी क्षण में नष्ट हो जाते हैं । वासना का महाबन्धन समाप्त हो जाता है । जो योगी मृत्यु के समय इस आज्ञाचक्र का ध्यान करता है, वह परमात्मस्वरूप हो जाता है । इस कमल का ध्यान करने वाला साधक राजयोग का अधिकारी होता है । ४४ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
राजयोगाधिकारोस्याद्देतच्चिन्तंनततो ध्रुवम् । यागो बन्धाद् विनिर्मुक्तः स्वीयया प्रभयास्वयम् ॥ ( शिवसंहिता ५ । १४८ ) इस आज्ञाचक्र को तीसरा नेत्र, त्रिकुटी, त्रिवेणी, शिवनेत्र, गुरुचक्र आदि भी कहा जाता है । इस चक्र का रंग हल्का भूरा भी कहा गया है । दलों पर हं, क्षं अक्षर प्राणशक्ति के ऋणात्मक तथा धनात्मक प्रवाह के प्रतिनिधि हैं । पद्म के मध्य में ॐ बीज मन्त्र है । सामान्यतः ध्यान तो भ्रूमध्य में किया जाता है, पर चक्र का स्थान मस्तिष्क में है । शरीर के वाम भाग से इड़ा, दक्षिण भाग से पिंगला तथा मेरुदण्ड के माध्यम से ऊर्ध्व भाग से सुषुम्ना आकर मिलती है, इसी से इसका नाम त्रिवेणी भी है । इस स्थान पर ३००० श्वास के आने के समय ( ३ घंटे २० मिनट ) तक ध्यान केन्द्रित करने पर वृत्तियाँ अन्तर्मुखी होती हैं । मन की चंचलता मिट जाती है । नेत्रों के प्रकाश में बाहर-भीतर के अंग प्रकाशित हो उठते हैं । अन्तः प्रदेश की रचना का ज्ञान सुलभ होता है । आत्मसाक्षात्कार होता है । ब्रह्मरन्ध्रमुखे तासां सङ्गमः स्यादसंशयः । तस्मिन्स्नानेस्नातकानां मुक्तिः स्यादविरोधतः ॥ गङ्गायमुनयोर्मध्ये वहत्येषा सरस्वती । तासान्तु सङ्गमे स्नात्वा धन्यो याति परां गतिम् ॥ ( शिवसंहिता ५ १६३-१६४ ) इस त्रिवेणी में ध्यान करनेवाला ( स्नान करने वाला ) साधक परमगति को प्राप्त करता है । महायोगी गोरखनाथ का कथन है कि इस आज्ञाचक्र में सुषुम्ना अंगुष्ठमात्र दीपशिखाकार हो जाती है । योगसाधक का इस चक्र में ध्यान करने से सम्पूर्ण अस्तित्व सत्य की अभिव्यक्ति करता है और वह सहज गति से सत्य भाषण ही किया करता है, वाक्सिद्ध हो जाता है । अष्टमं ब्रह्मरन्ध्रं निर्वाणचक्रं सूचिकाग्रभेद्यं धूमशिखाकारं ध्यायेत् तत्र जालन्धरपीठं मोक्षप्रदं भवति । ८ ॥ आठवाँ निर्वाणचक्र है । ( इसमें ध्यान करने से ब्रह्म अभिव्यक्त होता है, जिसका फल है मोक्ष) इसका नाम ब्रह्मरन्ध्र भी है । यह सूई के अग्रभाग के सिद्धसिद्धान्तपद्धति । [ ४५
सदृश धूम की शिखा के आकार वाला है, इसका योगी को ध्यान करना चाहिये । यहीं मुक्ति की प्राप्ति कराने वाला जालन्धर पीठ है । ( धूम सदृश तेज का इस चक्र में ध्यान करने से समस्त प्रपञ्चजाल का नाश करने वाला-उन्मूलन करने वाला परमात्मा-जालन्धर अभिव्यक्त होता है । सहस्रार के मूल में सूई की नोंक के समान एक धूमशिखाकार छिद्र है, यही ब्रह्मरन्ध्र-निर्वाणचक्र है । ) इस चक्र में जालन्धर पीठ मोक्षप्रद होता है ॥ ८ ॥ विशेष ब्रह्मरन्ध्र चक्र-निर्वाण चक्र सहस्रार के मूल में स्थित है, इसका ध्यान कर साधक नासा के अग्रभाग पर दृष्टि स्थिर कर अपने आत्मस्वरूप - शिव स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जा जाता है । ब्रह्मरन्ध्र महाचक्रे सहस्रारे च पङ्कजे । नासाग्रदृष्टिरात्मानं ध्यात्वा सिद्धो भवत्स्वयम् ॥ ( विवेकमार्तण्ड १७५ ) सिद्ध होने का आशय है परमात्मस्वरूप की प्राप्ति । यदि योगी ब्रह्मरन्ध्र ( निर्वाण चक्र ) में मन लगाकर आधे क्षण तक भी स्थिर रहता है, तो वह समस्त पापों से मुक्त होकर परम गति को प्राप्त हो जायेगा । इस ब्रह्मरन्ध्र में लीन मन वाला योगी अणिमादि सिद्धियों से प्राप्त सुख-सुविधा का उपभोग करता हुआ शिवस्वरूप हो जाता है। वह परमेश्वर शिव को प्रिय हो जाता है और अनेक मुमुक्षुओं को उपदेश देकर संसार-सागर से पार उतार देता है । ब्रह्मरन्ध्रे मनो दत्त्वा क्षणार्धं यदि तिष्ठति । सर्वपापविनिर्मुक्तः स याति परमां गतिम् ॥ अस्मिन् लीनं मनो यस्य स योगी मयि लीयते । अणिमादिगुणान् भुक्त्वा स्वेच्छया पुरुषोत्तमः ॥ एतद्रन्ध्रध्यानमात्रेण मर्त्यः संसारेऽस्मिन् वल्लभो मे भवेत्सः । पापान् जित्वा मुक्तिमार्गाधिकारी ज्ञानं दत्वा तारयत्यद्भुतं वै ॥ ( शिवसंहिता ५ । १७३-७५ ) निर्वाणचक्र व्यष्टि चेतना द्वारा अनन्त शाश्वत ब्रह्म की सिद्धि का श्रेष्ठतम केन्द्र है । व्यष्टि चेतना इस स्तर पर सच्चिदानन्दस्वरूप में तल्लीन हो जाती है । ४६ ] । सिद्धसिद्धान्तपद्धति
इस चक्र में कुण्डलिनी महाशक्ति परमात्मा शिव से तादात्म्य प्राप्त कर ज्योतित रहती है। इसके ध्यान से प्रकाश-अन्धकार, असीम-ससीम, गति-विराम आदि द्वन्द्वात्मक प्रपञ्च समाप्त हो जाते हैं। यह चक्र प्रापंचिक ब्रह्माण्ड-व्यवस्था के भव्य जाल के चरम नियन्ता ( जालन्धर ) परमात्मा, जिससे यह ब्रह्माण्डजाल उत्पन्न होता है, जिसके द्वारा यह धारण किया जाता है तथा शासित और व्यवस्थित होता है, जिसकी यह लीला है, जो इन सबका अन्तर्यामी प्रकाशक है—की आत्माभिव्यक्ति का स्थान है। व्यक्ति तबतक जालबद्ध रहता है, जबतक वह स्वयं और जगत् में जालन्धर ( परम जाल-नियन्ता ) को पहचान नहीं लेता है। जब वह जालन्धर ( परमात्मा ) से पूर्ण तादात्म्य अनुभव करने लगता है, तब समस्त बन्धनों और दुःखों से मुक्त होकर इस संसार में स्वच्छन्दता— स्वाधीनता का अनुभव करता है, जीवन्मुक्त हो जाता है। इस चक्र में जालन्धर पीठ की यही मोक्षप्रदता है। नवममाकाशचक्रं षोडशदलकमलमूर्ध्वमुखं तन्मध्ये कर्णिकायां त्रिकूटाकारां तदूर्ध्वशक्तिं तां परमशून्यां ध्यायेत् तत्रैव पूर्णगिरिपीठं सर्वेच्छासिद्धिर्भवति । इति नवचक्रस्य विचारः ॥ ६ ॥ नौवाँ आकाश चक्र है। ( सहस्रार के ऊपरी भाग में ) एक ऊर्ध्वमुख सोलहदलों का कमल है। उसकी कर्णिका में त्रिकूटाकार ( त्रिकोण आकार वाली ) ऊर्ध्वमुखी शक्ति है। वह सच्चिदानन्दस्वरूपा निराकार शक्ति है। यह परमशून्य है। इस शक्ति का ध्यान करना चाहिये। यहीं पूर्णगिरिपीठ है, यह समस्त पदार्थों से परिपूर्ण है, समस्त संकल्पों की सिद्धि होती है। इस पूर्णगिरिपीठ वाले आकाशचक्र का ध्यान करने से संसार-जन्य भय की निवृत्ति हो जाती है और समस्त प्राणी-पदार्थ योगसाधक के वशीभूत हो जाते हैं। यही नवचक्रों का विचार ( निरूपण ) - क्रम है ॥ ६ ॥ विशेष —यह आकाश चक्र सहस्रार के ऊपरी भाग में स्थित है और इसके मूल भाग में उपर्युक्त निर्वाण चक्र है, इसलिये सहस्रार के सम्बन्ध में भी विचार करना आवश्यक है। सहस्रार योगसाधना की सिद्धि की दिशा में उच्चतम चेतना का केन्द्र है, सहस्रदल वाले ज्योतिर्मय कमल के रूप में इसका दर्शन होता है। इन दलों पर समस्त वर्ण अङ्कित हैं, इसके केन्द्र में उज्ज्वल शिवलिंग है, सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ४७
यह पवित्रतम चैतन्य का प्रतीक है, यहाँ शिव-शक्ति का ऐक्य होता है । प्रबुद्ध कुण्डलिनी इस सहस्रार में परम शिव से अभिन्न हो जाती है । शिवसंहिता में भगवान् शिव का कथन है कि सहस्रार में योनिमण्डल है, इसी के नीचे चन्द्रमा का स्थिति है । योगी इस चन्द्रमण्डल का ध्यान कर संसार में पूज्य हो जाता है । वह देवता और सिद्धों के समान ऐश्वर्य शाली हो जाता है । यह सहस्रार पद्म दिव्य रूप वाला है, यह ब्रह्माण्डरूपी देह के बाहर विद्यमान रहता है ओर मोक्ष देता है । अत ऊर्ध्वं दिव्यरूपं सहस्रारं सरोरुहम् । (शिवसंहिता ५.१८६। यद्यपि गोरखनाथजी ने आकाश चक्र को ही कैलास कहा है तथापि सहस्रार ही कैलासरूप में प्रसिद्ध है । इस सहस्रदल पद्म का ज्ञान प्राप्त होने पर चित्तवृत्ति लय को प्राप्त हो जाती है, इसके फलस्वरूप अखण्डज्ञानस्वरूप निरंजन का साक्षात्कार होता है । यज्ज्ञात्वा प्राप्तविषय चित्तवृत्तिर्विलीयते । तस्मिन् परिश्रमं योगी करोति निरपेक्षतः । चित्तवृत्तिर्यदा लीना तस्मिन् योगी भवेद्ध्रुवम् । तदा विज्ञायतेऽखण्डज्ञानरूपी निरञ्जनः ॥ ( शिवसंहिता ५ । १६४-६५ ) यह सहस्रार पद्म शिखरलोक, अमरलोक, भँवरगुफा आदि नामों से भी प्रसिद्ध है । नाभिकमल से उठे श्वास का यह विश्राम-स्थान है । महाकुण्डलिनी आधार पद्म से जागरित होती हुई इसी सहस्रार में प्रवेश कर शिवरूपिणी हो जाती है । यह शरीररूपी वृक्ष का मूल है, यह अमृत का ऊर्ध्वमुख कूप है, इसे औंधा कूप भी कहा जाता है । इस स्थान पर वृत्ति-सुरति का स्थिर हो जाना ही निर्विकल्प या सहज समाधि है । गगन मंडल में ऊँधा कूबा तहां अमृत का वासा । ( गोरखबानी सबदी २३ ) आकाश चक्र ही महायोगी गोरखनाथ की योगदृष्टि में नौवाँ चक्र है । भगवान् शिव का कथन है कि सहस्रार ही कैलास है और परमेश्वर, क्षयवृद्धिवि- वर्जित अकुल, अविनाशी शिव का ही यहाँ निवास है । ४८ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
कैलासो नाम तस्यैव महेशो यत्र तिष्ठति । अकुलाख्योऽविनाशी च क्षयवृद्धिविवर्जितः ॥ ( शिवसंहिता ५ । १८७ ) यह आकाशचक्र सहस्रार के सुमेरु पर स्थित है। इस आकाशचक्र ( कमल ) को सोलह दलों से युक्त कहा गया है, इसका मुख ऊपर की ओर है । इस कमल के केन्द्र में त्रिकूटाकार सच्चिदानन्दमयी महाशक्ति परमात्मा शिव से परमोच्च आत्माभिव्यक्ति प्रकट करती है । इसे आत्मानुभव का चरम स्थान पूर्णगिरि पीठ भी कहा गया है। यहाँ प्रापंचिक चेतना पूर्णतया रूपान्तरित होकर स्वयं को सर्वसमाहारी, सर्वसमायोजक, सर्वातिक्रामक चरम चेतना के रूप में अनुभव करने लगती है । मूलाधार चक्र से कुण्डलिनी शक्ति को अपने सर्वाधिक प्रियतम शिव से पुनर्मिलन की पवित्र यात्रा इस चक्र में पहुँच कर अपना ध्येय प्राप्त कर लेती है । योगी आत्मपूर्णता प्राप्त कर लेता है । गोरक्षशतक में गोरखनाथजी ने षट् चक्र ही निरूपित किये हैं । चतुर्दलं स्यादाधारं स्वाधिष्ठानं च षट्दलम् । नाभौ दशदलं पद्मं सूर्यसंख्यादलं हृदि ॥ कण्ठे स्यात् षोडशदलं भ्रूमध्ये द्विदलं तथा । सहस्रदलमाख्यातं ब्रह्मरन्ध्रे महापथे ॥ ( गोरक्षशतक १५, १६ ) भ्रू मध्य में स्थित आज्ञा चक्र के ऊपर ब्रह्मरन्ध्र के महापथ में सहस्रार कमल स्थित है । मत्स्येन्द्र नाथ ने भी छः चक्र बताये हैं और कंठचक्र के ऊपर छठां चक्र ज्ञानचक्र कहा है । इस चक्र में योगी विश्राम करता है । ग्यांनं चक्रै लीजै विश्राम । ( मच्छीन्द्रगोरषबोध ५४ ) 'गोरखबानी' में अष्टचक्र ही महायोगी गोरखनाथ द्वारा वर्णित हैं । अष्टचक्र नामक लघु रचना में चक्रसाधना का स्वारस्य निरूपित है । यह पूरी रचना इस तरह है— सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ४६
ॐ गोरष देव अष्ट चक्र वोलिये घट भीतर । ये कौण-कौण वोलिये । अवधू प्रथमें आधार चक्र वोलिये । गुदा अस्थांने, चत्र दल कंवल, षटसै साँस । तिस चक्र ऊपरि द्रिष्ट चक्र, लिंग अस्थांने, षट् दल कंवल षटसै साँस । तिस चक्र ऊपरि मणिपुर चक्र, नाभि अस्थांने, दस दल कंवल, षटसै साँस । तिस चक्र ऊपरि अनहद चक्र, हिरदा सथांने, द्वादश कंवल, षट सै साँस । तिस चक्र ऊपरि विसुध चक्र, कंठसथांने, षोडश कंवल, एक सहंसर साँस । अजपा गायत्री पारब्रह्म ध्यान । तिस चक्र ऊपरि अगनि चक्र, नेत्र सथांने षोडश दल कंवल एक सहस्त्र साँस, अजपा गायत्री पारब्रह्म ध्यान । तिस चक्र ऊपरि गिनांन चक्र, ब्रह्मं'ड सथांने, एक सहंस्र दल कंवल एक सहस्र साँस । अजपा गायत्री पारब्रह्म ध्यान । तिस चक्र ऊपरि सुछिम चक्र, विग्यांन सथांने एक बीस सहस्र दल कंवल । ए अष्ट कमल का जांणौ भेव । आपै करता आपै देव । ( गोरखबानी अष्टचक्र ) स्पष्ट है कि महायोगी गोरखनाथ ने चक्र-साधना का परमफल स्वरूपाव- स्थानपूर्वक परम शून्य में परमात्मा शिव का साक्षात्कार बताया है । चक्र साधना की अन्तर्ज्योति से सम्पूर्ण अखण्ड, अनन्त, निरञ्जन सच्चिदानन्द में आत्मा प्रतिष्ठित होकर परमात्मस्वरूप हो जाता है । सोलह आधार अथ षोडशाधारः कथ्यते तत्र प्रथमं पदाङ्गुष्ठाधारं तत्राग्रतस्तेजोमयं ध्यायेत् । दृष्टिः स्थिरा भवति ॥ १० ॥ अब यथाक्रम सोलह आधारों का निरूपण किया जाता है । पहला पादांगुष्ठाधार है । उसके अग्रभाग में तेजोमय स्वरूप का ध्यान करना चाहिये, इस ध्यान से दृष्टि स्थिर होती है ॥ १० ॥ विशेष—हमारे शरीर के भीतर अनेक तेजोमय स्थान अथवा केन्द्र हैं, जिन का ध्यान करने से योगसाधक को अपने प्राण, मन और विन्दु के लय में बड़ी सुविधा होती है । महायोगी गोरखनाथजी ने ऐसे प्रधान केन्द्रों को चक्र कहा है और उपर्युक्त तेजोमय स्थानों को आधार कहा है, जो सोलह हैं । आधार ५० ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
का शाब्दिक अर्थ है धारण करने वाला। आधार के माध्यम से जैविक तथा मानसिक कार्यों के मुख्य स्थानों का संकेत मिलता है, जिन्हें स्वेच्छा से वश में कर योगी आन्तरिक साधना में आगे बढ़ता है। प्रत्येक पद के अंगूठे में जैविक कार्य का केन्द्र है। इस पर ध्यान केन्द्रित करने से नेत्र और पैर के अंगूठे तक प्रवाहित तेज पर दृष्टि एकाग्र होती है। पैर के अंगूठे के तन्तुओं में और नेत्र के स्नायुओं में तेजोमय सम्बन्ध है। द्वितीयं मूलाधारसूत्रं वामपाष्णिाना निःपीडयितव्यम् । तत्राग्निदीपनं भवति ॥ ११ ॥ दूसरा मूलाधार है। इसके सीवन को बायें पैर की एड़ी से दबा कर बैठना चाहिये। इससे शरीर में तेज की वृद्धि होती है। शरीर में स्थित अग्नि प्रदीप्त होती है ॥ ११ ॥ विशेष—यह कुण्डलिनी शक्ति प्रथम आधार और सुषुम्ना नाड़ी का उद्गम स्थान है। इसी स्थान पर सबसे पहले मानसिक और जैविक शक्ति को एकाग्र कर सुषुम्ना मार्ग से ऊपर चढ़ाने—ऊर्ध्वमुखी करने का अभ्यास किया जाता है। अपने बायें पैर की एड़ी से मूलाधार के सीवन को दबा कर बैठने से अग्निदीपन होता है और शक्ति नीचे की ओर प्रवाहित न होकर ऊर्ध्वमुखी हो उठती है। शक्ति का जागरण आरम्भ हो जाता है और वह आध्यात्मिक अथवा आत्ममुखी हो जाती है, उसमें परमेश्वर शिव से मिलने की अभिलाषा तीव्र हो उठती है। तृतीयं गुदाधारं विकाससंकोचनेन निराकुञ्चयेत् । अपान- वायुः स्थिरो भवति ॥ २२ ॥ तीसरा गुदाधार है। इस स्थान पर गुदा का संकोच-विकास—आकुञ्चन और संकोचन करना चाहिये । इस क्रिया से अपानवायु स्थिर हो जाती है ॥ १२ ॥ विशेष—गुदाधार की स्थिति गुदास्थान में बतायी जाती है। इस आधार के द्वारा अपान वायु शरीर के मल और दोषपूर्ण गन्दगी को शरीर से बाहर निकाल कर उदर को निर्मल करती है और प्राणवायु से ऐक्य स्थापित कर जैविक और मानसिक शक्ति को विकसित करती है। इस कार्य की पूर्णता के लिये साधक को गुदा का आकुञ्चन और संकोच करना—उसे सिकोड़ना और फैलाना सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ५१
आवश्यक होता है। इससे अनेक उदरसम्बन्धी रोग दूर होते हैं तथा सहज रूप से मूलबन्ध और उड्डियान बन्ध के अभ्यास का फल प्राप्त होता है, कुण्डलिनी शक्ति ऊर्ध्वमुखी होती है और प्राणायाम की साधना संयत होती है। चतुर्थं मेढ्राधारं लिङ्गसंकोचनेन ब्रह्मग्रन्थित्रयं भित्त्वा भ्रमरगुहायां विश्रम्य तत ऊर्ध्वमुखे विन्दुस्तम्भनं भवति । एषा वज्रोली प्रसिद्धा ॥ १३ ॥ चौथा मेढ़ ( लिंग )—आधार है। यहाँ लिंग का संकोचन कर ( योनि मुद्रा की सहायता से ) वीर्य को ऊर्ध्वगामी करते हुए योगी ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र— तीन ग्रन्थियों का भेदन कर (मेरुदण्ड के सामने ग्रीवा के ऊपरी भाग में विद्यमान) भ्रमर गुफा में वीर्य का स्तम्भन कर विश्राम करता है। ( वीर्य अधः पतित नहीं होने पाता है।) यही वज्रोली क्रिया है। ( इसके प्रभाव से योगी अखण्ड ब्रह्म- चर्य में स्थित होकर प्राण, मन और वीर्य—बिन्दु का पारस्परिक लय कर परम पद में स्वस्थ हो जाता है।) यह वज्रोली क्रिया विशेष रूप से प्रसिद्ध है ॥ १३ ॥ विशेष—योनि-मुद्रा के अभ्यास से सुप्त कुण्डलिनी शक्ति जाग कर ऊपर उठती है और वीर्य ऊर्ध्वगामी होता है। इस योनि मुद्रा का विवरण महर्षि घेरण्ड ने अपनी घेरण्डसंहिता में दिया है। सिद्धासन में स्थित होकर दोनों हाथ के अंगूठों से कानों को, दोनों तर्जनी से नेत्रों को, मध्यमा से मुख को तथा अनामिका अंगुली से नाक के छिद्र बन्द करना चाहिये। प्राण को काकीमुद्रा ( कौए की चोंच के समान मुख को जिह्वा बाहर कर आकारित करना चाहिये और धीरे-धीरे वायु का पान करना चाहिये।) से खींचकर अपान वायु से मिलाना चाहिये। देहस्थ षट्चक्रों का ध्यान कर 'हूं' या 'हंस'—इन दोनों मन्त्रों से सुप्त कुण्डलिनी शक्ति को जगाकर सहस्रार में स्थापित करना चाहिये । ऐसी भावना करनी चाहियेकि मैं शिव के साथ शक्तिमय होकर परम सुख का आस्वादन कर रहा हूँ। यही योनिमुद्रा है। सिद्धासनं समासाद्य कर्णाचक्षुर्नासोमुखम् । अंगुष्ठतर्जनीमध्यानामाभिश्चैव साधयेत् ॥ काकोभिः प्राणं संकृष्य अपाने योजयेत् ततः। ५२ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
षट्चक्राणि क्रमाद् ध्यात्वा हूं हंसमनुना सुधीः ॥ चैतन्यमानयेद् देवीं निद्रितां यां भुजङ्गिनीम् । जीवेन सहितां शक्तिं समुत्थाप्य कराम्बुजे ॥ शक्तिमयः स्वयं भूत्वा परशिवेन सङ्गमम् । नानासुखं विहारं च चिन्तयेत् परमं सुखम् ॥ ( घेरण्डसंहिता ३।३७-४० ) गुदा से उपस्थ—मेढ्रपर्यन्त योनिदेश कहा जाता है। इसी का संकोचन कर योनि-मुद्रा की क्रिया की जाती है। इस योनिमुद्रा तथा लिङ्ग के संकोच से साधक तीन ग्रन्थियों-ब्रह्मग्रन्थि, विष्णुग्रन्थि और रुद्रग्रन्थि का भेदन कर सहस्रार में बिन्दु को ऊर्ध्वमुख कर शिव-शक्ति के तादात्म्य के आनन्द का उपभोग करता है। तीनों ग्रन्थियों का भेदन कुण्डलिनी-जागरण की प्रक्रिया का एक अंग है। अधोगतिमपानं वै ऊर्ध्वंगं कुरुते बलात् ॥ आकुञ्चनेन तं प्राहुर्मूलबन्धोऽयमुच्यते । अपानश्चोर्ध्वगो भूत्वा वह्निना सह गच्छति ॥ प्राणस्थानं ततो वह्निः प्राणापानौ च सत्वरम् । मिलित्वा कुण्डलींयाति प्रसुप्ता कुण्डलाकृतिः ॥ तेनाग्निना च संतप्ता पवनेनैव चालिता । प्रसार्य स्वशरीरं तु सुषुम्नावदनान्तरे ॥ ब्रह्मग्रन्थिं ततो भित्वा रजोगुणसमुद्भवम् । सुषुम्नावदने शीघ्रं विद्युल्लेखेवसंस्फुरेत् ॥ विष्णुग्रन्थिं प्रयात्युच्चैः सत्वरंहृदि संस्थिता। ऊर्ध्वंगच्छति यच्चास्ते रुद्रग्रन्थिं तदुद्भवम् ॥ ( योगकुण्डल्युपनिषत् १।६३-६८ ) अपानवायु का लिङ्गसंकोचन द्वारा सुषुम्ना नाड़ी में प्रवेश करना ही ब्रह्मग्रन्थि का भेदन है, अपानका उठकर हृदयस्थ प्राण के आकर्षण से ऊर्ध्वमुख होना विष्णुग्रन्थि का भेदन है और इस प्राणमयी महाशक्ति कुण्डलिनी के रूप में आज्ञाचक्र का भेदन कर सहस्रार में पहुँचना ही रुद्रग्रन्थिका भेदन है। आज्ञाचक्र में ही रुद्रग्रन्थि की स्थिति बतायी गयी है । बिन्दु को वज्रोली मुद्रा के अभ्यास द्वारा सहस्रार में भ्रमरगुफा में पहुँचाने में मेढ्राधार की महती भूमिका है। वज्रोली मुद्रा की सिद्धि के सम्बन्ध में सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ५३
हठयोगप्रदीपिका में निरूपण है कि बिन्दु को क्षरित होने से रोकने के लिए उसे लिङ्ग के संकोच द्वारा ऊर्ध्वमुख करना चाहिये। मेहनेन शनैः सम्यगूर्ध्वाकुञ्चनमभ्यसेत् । पुरुषोऽप्यथवा नारी वज्रोलीसिद्धिमाप्नुयात् ॥ ( हठयोगप्रदीपिका ३।८५ ) वज्रोली के अभ्यास से योगी मृत्यु को जीत लेता है। वीर्य का स्खलन अथवा क्षरण ही मृत्यु है और उसे शरीर में धारण करना ही जीवन है। योगाभ्यास में निपुण योगी को उपस्थ—लिंग इन्द्रिय के छिद्र से ( वज्रोली की विधि से ) वीर्य का ऊपर की ओर आकर्षण करना चाहिये अथवा योनिमुद्रा के द्वारा अभ्यास करना चाहिये। वीर्य प्राण से संयुक्त है, इसलिये जैविक शक्ति, मानसिक और बौद्धिक विकास तथा शारीरिक कान्ति की वृद्धि के लिये वज्रोली के द्वारा वीर्य के ऊर्ध्वाकर्षण का अभ्यास सिद्ध होने पर योगी संकल्पसिद्ध हो जाता है। मेढ्राधार में स्वाधिष्ठान चक्र अवस्थित है। स्व का अर्थ ही प्राण होता है। भोगवासना की तृप्ति द्वारा वीर्य को स्खलित होने से बचाने के लिये वज्रोली मुद्रा का अभ्यास करना अत्यावश्यक है। इससे प्राण-शक्ति ब्रह्मग्रन्थि, विष्णुग्रन्थि और रुद्रग्रन्थि का भेदन कर शरीर को सौन्दर्य, बल और तेज प्रदान करती है । पञ्चममोड्याणाधारयोर्बन्धनान्मलमूत्रसंकोचनं भवति ॥ १४ ॥ पाँचवां उड्डियाण आधार है। ( यह लिङ्ग मूल तथा नाभिमूल के मध्य में स्थित है।) इस आधार के बन्ध—नियन्त्रण से मलमूत्र का संकोचन ( अल्पता ) होता है ॥ १४ ॥ विशेष--उड्डियाण आधार का नियन्त्रण करने से योगी अपनी आँतड़ियों और मूतेन्द्रिय पर नियन्त्रण कर सकता है, इनके कष्टों का उपचार कर सकता है। प्राण-शक्ति इस आधार की क्रिया और नियन्त्रण से ऊपर की ओर तेजी से उठती है, मानो उड़ती है। इसके अभ्यास से नाभि-शुद्धि होती है, वायु की शुद्धि होती है, जठरानल बढ़ता है, शरीर को पोषण मिलता है, रस का संचार होता है। वृद्ध भी उड्डियान के बन्धाधार से तरुण हो जाता है। इस आधार पर ही उड्डियान बन्ध की क्रिया पूरी होती है। नाभि के ऊपर-नीचे के भाग ५४ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति