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सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished222 पृष्ठ

आकाश चक्र में शिव सायुज्य अथवा अलख निरंजन परम ज्योति स्वरूप स्वसंवेद्य परमेश्वर के साक्षात्कार का वर्णन किया है । स्रवत् पीयूषसम्पूर्णे लम्बिकाचन्द्रमण्डले । नासाग्रदृष्टिरात्मानं ध्यात्वा मृत्युं विमुञ्चति ॥ ( विवेकमार्तण्ड १७३ ) लम्बिका-स्थान में स्थित चन्द्रमण्डल से स्रवित पीयूष में आत्मा का ध्यान कर योगी नासा के अग्रभाग पर दृष्टि स्थिर करता है और मृत्यु के भय से रहित हो जाता है । सप्तमं भ्रूचक्र मध्यममंगुष्ठमात्रं ज्ञाननेत्रं दीपशिखाकारं ध्यायेद् वाचां सिद्धिर्भवति ॥ ७ ॥ सातवाँ भ्रूचक्र है । ( यही आज्ञाचक्र कहा जाता है । यह दोनों भौंहों के मध्य में स्थित है, इसलिये मध्यम चक्र कहा गया है । ( यह दो दलों वाला कमल है । ) इस भ्रूचक्र के मध्य में दीपशिखा के आकार वाला एक अंगुल का ज्ञाननेत्र ( तृतीय नेत्र ) है । इस ज्ञाननेत्र का ध्यान करने से योगी वाक्सिद्ध हो जाता है, वह जो कुछ कहता है, वह व्यर्थ नहीं होता ॥ ७ ॥ गोरक्षसंहिता में महायोगी गोरखनाथजी ने आज्ञाचक्र में माणिक्य की शिखा के समान आत्मा में नासाग्रदृष्टि से ध्यान करने का फल आनन्दमय होना बताया है । इस आज्ञाचक्र में नीलवर्ण के शिव का ध्यान कर योगी प्राण को वश में कर जीव-शिव का ऐक्य सम्पादित करता है। नासिका के अग्र भाग में निर्गुण, शान्त, विश्वतोमुख, आकाश के समान व्याप्त शिव का ध्यान कर ब्रह्ममय हो जाता है । आज्ञाचक्र की स्थिति भौंहों के मध्य में है । भौंहों के मध्य के स्थान को आकाश कहा जाता है, इस चक्र के देवता शिव हैं; उनका ध्यान कर योगी मुक्ति प्राप्त करता है । भ्रुवोरन्तर्गतं देवं सन्माणिक्यशिखोपमम् । नासाग्रदृष्टिरात्मानं ध्यात्वानन्दमयो भवेत् । ध्यायन्नीलनिभं नित्यं भ्रूमध्ये परमेश्वरम् । आत्मानं विजितप्राणो योगी योगमाप्नुयात् ॥ सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ४३

आकाशे यत्र शब्दः स्यात्तदाज्ञाचक्रमुच्यते । तत्रात्मानं शिवं ध्यात्वा योगी मुक्तिमवाप्नुयात् ॥ ( गोरक्षसंहिता २।७०,७१, ७३) आज्ञाचक्र के सम्बन्ध में शिवसंहिता में बड़े विस्तार से विचार किया गया है । आज्ञाचक्र कमल के दोनों दलों पर हं, क्षं बीजाक्षर अंकित हैं । ये दोनों दल श्वेत रंग के हैं । यहाँ के महाकाल सिद्ध हैं और हाकिनी देवी अधि- ष्ठात्री रूप में स्थित रहती हैं । इस आज्ञापद्म के मध्य में शरद् के चन्द्रमा की आभा के सदृश चन्द्रबीज ('ठ' बीज) स्थित रहता है, इसे जान लेने पर परमहंस पुरुष को किसी प्रकार का अवसाद नहीं रहता है । आज्ञापद्मं भ्रुवोर्मध्ये हक्षोपेतं द्विपत्रकम् । शुक्लाभं तन्महाकालः सिद्धो देव्यत्र हाकिनी ॥ शरच्चन्द्रनिभं तत्राक्षरबीजं विजृम्भितम् । पुमान् परमहंसोऽयं यज्ज्ञात्वा नावसीदति ॥ ( शिवसंहिता ५ । १२२-१२३ ) इस आज्ञा-चक्र में तुरीय तृतीय लिंग के रूप में मुक्तिदायक शिव विराजमान हैं । इस लिंग का ध्यान करने से योगी शिवस्वरूप हो जाता है । शरीर की इडा- पिंगला नाड़ियाँ वरणा और असी कही जाती हैं, इन्हीं वरणा-असी ( वाराणसी ) के मध्य में विश्वनाथ अभिव्यक्त हैं । इस वाराणसी को परमतत्व माना गया है । मेरु दण्ड के सहारे सुषुम्ना नाडी ब्रह्मारन्ध्र तक गयी है । इडा नाड़ी सुषुम्ना के परा- वृत होती हुई आज्ञाचक्र के दक्षिण भाग से होकर बायें नासापुट को जाती है, इसलिये गंगा कही गयी है । इडा नाड़ी के समान पिंगला नाड़ी आज्ञा-चक्र के वाम भाग से चलकर दाहिने नासांपुट को जाती है, इसलिये इसको असी कहा गया है । महेश्वर इस आज्ञाचक्र के देवता हैं, इस चक्र के ऊपर तीन पीठ हैं, जिन्हें नाद, बिन्दु और शक्ति कहा जाता है । इस आज्ञापद्म का ध्यान करने वाले साधक के पहले जन्म में किये गये कर्म के फल नष्ट हो जाते हैं । इस आज्ञाचक्र में जिस साधक का मन क्षणमात्र के लिये भी स्थिर हो जाता है, उसके सभी पाप उसी क्षण में नष्ट हो जाते हैं । वासना का महाबन्धन समाप्त हो जाता है । जो योगी मृत्यु के समय इस आज्ञाचक्र का ध्यान करता है, वह परमात्मस्वरूप हो जाता है । इस कमल का ध्यान करने वाला साधक राजयोग का अधिकारी होता है । ४४ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

राजयोगाधिकारोस्याद्देतच्चिन्तंनततो ध्रुवम् । यागो बन्धाद् विनिर्मुक्तः स्वीयया प्रभयास्वयम् ॥ ( शिवसंहिता ५ । १४८ ) इस आज्ञाचक्र को तीसरा नेत्र, त्रिकुटी, त्रिवेणी, शिवनेत्र, गुरुचक्र आदि भी कहा जाता है । इस चक्र का रंग हल्का भूरा भी कहा गया है । दलों पर हं, क्षं अक्षर प्राणशक्ति के ऋणात्मक तथा धनात्मक प्रवाह के प्रतिनिधि हैं । पद्म के मध्य में ॐ बीज मन्त्र है । सामान्यतः ध्यान तो भ्रूमध्य में किया जाता है, पर चक्र का स्थान मस्तिष्क में है । शरीर के वाम भाग से इड़ा, दक्षिण भाग से पिंगला तथा मेरुदण्ड के माध्यम से ऊर्ध्व भाग से सुषुम्ना आकर मिलती है, इसी से इसका नाम त्रिवेणी भी है । इस स्थान पर ३००० श्वास के आने के समय ( ३ घंटे २० मिनट ) तक ध्यान केन्द्रित करने पर वृत्तियाँ अन्तर्मुखी होती हैं । मन की चंचलता मिट जाती है । नेत्रों के प्रकाश में बाहर-भीतर के अंग प्रकाशित हो उठते हैं । अन्तः प्रदेश की रचना का ज्ञान सुलभ होता है । आत्मसाक्षात्कार होता है । ब्रह्मरन्ध्रमुखे तासां सङ्गमः स्यादसंशयः । तस्मिन्स्नानेस्नातकानां मुक्तिः स्यादविरोधतः ॥ गङ्गायमुनयोर्मध्ये वहत्येषा सरस्वती । तासान्तु सङ्गमे स्नात्वा धन्यो याति परां गतिम् ॥ ( शिवसंहिता ५ १६३-१६४ ) इस त्रिवेणी में ध्यान करनेवाला ( स्नान करने वाला ) साधक परमगति को प्राप्त करता है । महायोगी गोरखनाथ का कथन है कि इस आज्ञाचक्र में सुषुम्ना अंगुष्ठमात्र दीपशिखाकार हो जाती है । योगसाधक का इस चक्र में ध्यान करने से सम्पूर्ण अस्तित्व सत्य की अभिव्यक्ति करता है और वह सहज गति से सत्य भाषण ही किया करता है, वाक्सिद्ध हो जाता है । अष्टमं ब्रह्मरन्ध्रं निर्वाणचक्रं सूचिकाग्रभेद्यं धूमशिखाकारं ध्यायेत् तत्र जालन्धरपीठं मोक्षप्रदं भवति । ८ ॥ आठवाँ निर्वाणचक्र है । ( इसमें ध्यान करने से ब्रह्म अभिव्यक्त होता है, जिसका फल है मोक्ष) इसका नाम ब्रह्मरन्ध्र भी है । यह सूई के अग्रभाग के सिद्धसिद्धान्तपद्धति । [ ४५

सदृश धूम की शिखा के आकार वाला है, इसका योगी को ध्यान करना चाहिये । यहीं मुक्ति की प्राप्ति कराने वाला जालन्धर पीठ है । ( धूम सदृश तेज का इस चक्र में ध्यान करने से समस्त प्रपञ्चजाल का नाश करने वाला-उन्मूलन करने वाला परमात्मा-जालन्धर अभिव्यक्त होता है । सहस्रार के मूल में सूई की नोंक के समान एक धूमशिखाकार छिद्र है, यही ब्रह्मरन्ध्र-निर्वाणचक्र है । ) इस चक्र में जालन्धर पीठ मोक्षप्रद होता है ॥ ८ ॥ विशेष ब्रह्मरन्ध्र चक्र-निर्वाण चक्र सहस्रार के मूल में स्थित है, इसका ध्यान कर साधक नासा के अग्रभाग पर दृष्टि स्थिर कर अपने आत्मस्वरूप - शिव स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जा जाता है । ब्रह्मरन्ध्र महाचक्रे सहस्रारे च पङ्कजे । नासाग्रदृष्टिरात्मानं ध्यात्वा सिद्धो भवत्स्वयम् ॥ ( विवेकमार्तण्ड १७५ ) सिद्ध होने का आशय है परमात्मस्वरूप की प्राप्ति । यदि योगी ब्रह्मरन्ध्र ( निर्वाण चक्र ) में मन लगाकर आधे क्षण तक भी स्थिर रहता है, तो वह समस्त पापों से मुक्त होकर परम गति को प्राप्त हो जायेगा । इस ब्रह्मरन्ध्र में लीन मन वाला योगी अणिमादि सिद्धियों से प्राप्त सुख-सुविधा का उपभोग करता हुआ शिवस्वरूप हो जाता है। वह परमेश्वर शिव को प्रिय हो जाता है और अनेक मुमुक्षुओं को उपदेश देकर संसार-सागर से पार उतार देता है । ब्रह्मरन्ध्रे मनो दत्त्वा क्षणार्धं यदि तिष्ठति । सर्वपापविनिर्मुक्तः स याति परमां गतिम् ॥ अस्मिन् लीनं मनो यस्य स योगी मयि लीयते । अणिमादिगुणान् भुक्त्वा स्वेच्छया पुरुषोत्तमः ॥ एतद्रन्ध्रध्यानमात्रेण मर्त्यः संसारेऽस्मिन् वल्लभो मे भवेत्सः । पापान् जित्वा मुक्तिमार्गाधिकारी ज्ञानं दत्वा तारयत्यद्भुतं वै ॥ ( शिवसंहिता ५ । १७३-७५ ) निर्वाणचक्र व्यष्टि चेतना द्वारा अनन्त शाश्वत ब्रह्म की सिद्धि का श्रेष्ठतम केन्द्र है । व्यष्टि चेतना इस स्तर पर सच्चिदानन्दस्वरूप में तल्लीन हो जाती है । ४६ ] । सिद्धसिद्धान्तपद्धति

इस चक्र में कुण्डलिनी महाशक्ति परमात्मा शिव से तादात्म्य प्राप्त कर ज्योतित रहती है। इसके ध्यान से प्रकाश-अन्धकार, असीम-ससीम, गति-विराम आदि द्वन्द्वात्मक प्रपञ्च समाप्त हो जाते हैं। यह चक्र प्रापंचिक ब्रह्माण्ड-व्यवस्था के भव्य जाल के चरम नियन्ता ( जालन्धर ) परमात्मा, जिससे यह ब्रह्माण्डजाल उत्पन्न होता है, जिसके द्वारा यह धारण किया जाता है तथा शासित और व्यवस्थित होता है, जिसकी यह लीला है, जो इन सबका अन्तर्यामी प्रकाशक है—की आत्माभिव्यक्ति का स्थान है। व्यक्ति तबतक जालबद्ध रहता है, जबतक वह स्वयं और जगत् में जालन्धर ( परम जाल-नियन्ता ) को पहचान नहीं लेता है। जब वह जालन्धर ( परमात्मा ) से पूर्ण तादात्म्य अनुभव करने लगता है, तब समस्त बन्धनों और दुःखों से मुक्त होकर इस संसार में स्वच्छन्दता— स्वाधीनता का अनुभव करता है, जीवन्मुक्त हो जाता है। इस चक्र में जालन्धर पीठ की यही मोक्षप्रदता है। नवममाकाशचक्रं षोडशदलकमलमूर्ध्वमुखं तन्मध्ये कर्णिकायां त्रिकूटाकारां तदूर्ध्वशक्तिं तां परमशून्यां ध्यायेत् तत्रैव पूर्णगिरिपीठं सर्वेच्छासिद्धिर्भवति । इति नवचक्रस्य विचारः ॥ ६ ॥ नौवाँ आकाश चक्र है। ( सहस्रार के ऊपरी भाग में ) एक ऊर्ध्वमुख सोलहदलों का कमल है। उसकी कर्णिका में त्रिकूटाकार ( त्रिकोण आकार वाली ) ऊर्ध्वमुखी शक्ति है। वह सच्चिदानन्दस्वरूपा निराकार शक्ति है। यह परमशून्य है। इस शक्ति का ध्यान करना चाहिये। यहीं पूर्णगिरिपीठ है, यह समस्त पदार्थों से परिपूर्ण है, समस्त संकल्पों की सिद्धि होती है। इस पूर्णगिरिपीठ वाले आकाशचक्र का ध्यान करने से संसार-जन्य भय की निवृत्ति हो जाती है और समस्त प्राणी-पदार्थ योगसाधक के वशीभूत हो जाते हैं। यही नवचक्रों का विचार ( निरूपण ) - क्रम है ॥ ६ ॥ विशेष —यह आकाश चक्र सहस्रार के ऊपरी भाग में स्थित है और इसके मूल भाग में उपर्युक्त निर्वाण चक्र है, इसलिये सहस्रार के सम्बन्ध में भी विचार करना आवश्यक है। सहस्रार योगसाधना की सिद्धि की दिशा में उच्चतम चेतना का केन्द्र है, सहस्रदल वाले ज्योतिर्मय कमल के रूप में इसका दर्शन होता है। इन दलों पर समस्त वर्ण अङ्कित हैं, इसके केन्द्र में उज्ज्वल शिवलिंग है, सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ४७

यह पवित्रतम चैतन्य का प्रतीक है, यहाँ शिव-शक्ति का ऐक्य होता है । प्रबुद्ध कुण्डलिनी इस सहस्रार में परम शिव से अभिन्न हो जाती है । शिवसंहिता में भगवान् शिव का कथन है कि सहस्रार में योनिमण्डल है, इसी के नीचे चन्द्रमा का स्थिति है । योगी इस चन्द्रमण्डल का ध्यान कर संसार में पूज्य हो जाता है । वह देवता और सिद्धों के समान ऐश्वर्य शाली हो जाता है । यह सहस्रार पद्म दिव्य रूप वाला है, यह ब्रह्माण्डरूपी देह के बाहर विद्यमान रहता है ओर मोक्ष देता है । अत ऊर्ध्वं दिव्यरूपं सहस्रारं सरोरुहम् । (शिवसंहिता ५.१८६। यद्यपि गोरखनाथजी ने आकाश चक्र को ही कैलास कहा है तथापि सहस्रार ही कैलासरूप में प्रसिद्ध है । इस सहस्रदल पद्म का ज्ञान प्राप्त होने पर चित्तवृत्ति लय को प्राप्त हो जाती है, इसके फलस्वरूप अखण्डज्ञानस्वरूप निरंजन का साक्षात्कार होता है । यज्ज्ञात्वा प्राप्तविषय चित्तवृत्तिर्विलीयते । तस्मिन् परिश्रमं योगी करोति निरपेक्षतः । चित्तवृत्तिर्यदा लीना तस्मिन् योगी भवेद्ध्रुवम् । तदा विज्ञायतेऽखण्डज्ञानरूपी निरञ्जनः ॥ ( शिवसंहिता ५ । १६४-६५ ) यह सहस्रार पद्म शिखरलोक, अमरलोक, भँवरगुफा आदि नामों से भी प्रसिद्ध है । नाभिकमल से उठे श्वास का यह विश्राम-स्थान है । महाकुण्डलिनी आधार पद्म से जागरित होती हुई इसी सहस्रार में प्रवेश कर शिवरूपिणी हो जाती है । यह शरीररूपी वृक्ष का मूल है, यह अमृत का ऊर्ध्वमुख कूप है, इसे औंधा कूप भी कहा जाता है । इस स्थान पर वृत्ति-सुरति का स्थिर हो जाना ही निर्विकल्प या सहज समाधि है । गगन मंडल में ऊँधा कूबा तहां अमृत का वासा । ( गोरखबानी सबदी २३ ) आकाश चक्र ही महायोगी गोरखनाथ की योगदृष्टि में नौवाँ चक्र है । भगवान् शिव का कथन है कि सहस्रार ही कैलास है और परमेश्वर, क्षयवृद्धिवि- वर्जित अकुल, अविनाशी शिव का ही यहाँ निवास है । ४८ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

कैलासो नाम तस्यैव महेशो यत्र तिष्ठति । अकुलाख्योऽविनाशी च क्षयवृद्धिविवर्जितः ॥ ( शिवसंहिता ५ । १८७ ) यह आकाशचक्र सहस्रार के सुमेरु पर स्थित है। इस आकाशचक्र ( कमल ) को सोलह दलों से युक्त कहा गया है, इसका मुख ऊपर की ओर है । इस कमल के केन्द्र में त्रिकूटाकार सच्चिदानन्दमयी महाशक्ति परमात्मा शिव से परमोच्च आत्माभिव्यक्ति प्रकट करती है । इसे आत्मानुभव का चरम स्थान पूर्णगिरि पीठ भी कहा गया है। यहाँ प्रापंचिक चेतना पूर्णतया रूपान्तरित होकर स्वयं को सर्वसमाहारी, सर्वसमायोजक, सर्वातिक्रामक चरम चेतना के रूप में अनुभव करने लगती है । मूलाधार चक्र से कुण्डलिनी शक्ति को अपने सर्वाधिक प्रियतम शिव से पुनर्मिलन की पवित्र यात्रा इस चक्र में पहुँच कर अपना ध्येय प्राप्त कर लेती है । योगी आत्मपूर्णता प्राप्त कर लेता है । गोरक्षशतक में गोरखनाथजी ने षट् चक्र ही निरूपित किये हैं । चतुर्दलं स्यादाधारं स्वाधिष्ठानं च षट्दलम् । नाभौ दशदलं पद्मं सूर्यसंख्यादलं हृदि ॥ कण्ठे स्यात् षोडशदलं भ्रूमध्ये द्विदलं तथा । सहस्रदलमाख्यातं ब्रह्मरन्ध्रे महापथे ॥ ( गोरक्षशतक १५, १६ ) भ्रू मध्य में स्थित आज्ञा चक्र के ऊपर ब्रह्मरन्ध्र के महापथ में सहस्रार कमल स्थित है । मत्स्येन्द्र नाथ ने भी छः चक्र बताये हैं और कंठचक्र के ऊपर छठां चक्र ज्ञानचक्र कहा है । इस चक्र में योगी विश्राम करता है । ग्यांनं चक्रै लीजै विश्राम । ( मच्छीन्द्रगोरषबोध ५४ ) 'गोरखबानी' में अष्टचक्र ही महायोगी गोरखनाथ द्वारा वर्णित हैं । अष्टचक्र नामक लघु रचना में चक्रसाधना का स्वारस्य निरूपित है । यह पूरी रचना इस तरह है— सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ४६

ॐ गोरष देव अष्ट चक्र वोलिये घट भीतर । ये कौण-कौण वोलिये । अवधू प्रथमें आधार चक्र वोलिये । गुदा अस्थांने, चत्र दल कंवल, षटसै साँस । तिस चक्र ऊपरि द्रिष्ट चक्र, लिंग अस्थांने, षट् दल कंवल षटसै साँस । तिस चक्र ऊपरि मणिपुर चक्र, नाभि अस्थांने, दस दल कंवल, षटसै साँस । तिस चक्र ऊपरि अनहद चक्र, हिरदा सथांने, द्वादश कंवल, षट सै साँस । तिस चक्र ऊपरि विसुध चक्र, कंठसथांने, षोडश कंवल, एक सहंसर साँस । अजपा गायत्री पारब्रह्म ध्यान । तिस चक्र ऊपरि अगनि चक्र, नेत्र सथांने षोडश दल कंवल एक सहस्त्र साँस, अजपा गायत्री पारब्रह्म ध्यान । तिस चक्र ऊपरि गिनांन चक्र, ब्रह्मं'ड सथांने, एक सहंस्र दल कंवल एक सहस्र साँस । अजपा गायत्री पारब्रह्म ध्यान । तिस चक्र ऊपरि सुछिम चक्र, विग्यांन सथांने एक बीस सहस्र दल कंवल । ए अष्ट कमल का जांणौ भेव । आपै करता आपै देव । ( गोरखबानी अष्टचक्र ) स्पष्ट है कि महायोगी गोरखनाथ ने चक्र-साधना का परमफल स्वरूपाव- स्थानपूर्वक परम शून्य में परमात्मा शिव का साक्षात्कार बताया है । चक्र साधना की अन्तर्ज्योति से सम्पूर्ण अखण्ड, अनन्त, निरञ्जन सच्चिदानन्द में आत्मा प्रतिष्ठित होकर परमात्मस्वरूप हो जाता है । सोलह आधार अथ षोडशाधारः कथ्यते तत्र प्रथमं पदाङ्गुष्ठाधारं तत्राग्रतस्तेजोमयं ध्यायेत् । दृष्टिः स्थिरा भवति ॥ १० ॥ अब यथाक्रम सोलह आधारों का निरूपण किया जाता है । पहला पादांगुष्ठाधार है । उसके अग्रभाग में तेजोमय स्वरूप का ध्यान करना चाहिये, इस ध्यान से दृष्टि स्थिर होती है ॥ १० ॥ विशेष—हमारे शरीर के भीतर अनेक तेजोमय स्थान अथवा केन्द्र हैं, जिन का ध्यान करने से योगसाधक को अपने प्राण, मन और विन्दु के लय में बड़ी सुविधा होती है । महायोगी गोरखनाथजी ने ऐसे प्रधान केन्द्रों को चक्र कहा है और उपर्युक्त तेजोमय स्थानों को आधार कहा है, जो सोलह हैं । आधार ५० ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

का शाब्दिक अर्थ है धारण करने वाला। आधार के माध्यम से जैविक तथा मानसिक कार्यों के मुख्य स्थानों का संकेत मिलता है, जिन्हें स्वेच्छा से वश में कर योगी आन्तरिक साधना में आगे बढ़ता है। प्रत्येक पद के अंगूठे में जैविक कार्य का केन्द्र है। इस पर ध्यान केन्द्रित करने से नेत्र और पैर के अंगूठे तक प्रवाहित तेज पर दृष्टि एकाग्र होती है। पैर के अंगूठे के तन्तुओं में और नेत्र के स्नायुओं में तेजोमय सम्बन्ध है। द्वितीयं मूलाधारसूत्रं वामपाष्णिाना निःपीडयितव्यम् । तत्राग्निदीपनं भवति ॥ ११ ॥ दूसरा मूलाधार है। इसके सीवन को बायें पैर की एड़ी से दबा कर बैठना चाहिये। इससे शरीर में तेज की वृद्धि होती है। शरीर में स्थित अग्नि प्रदीप्त होती है ॥ ११ ॥ विशेष—यह कुण्डलिनी शक्ति प्रथम आधार और सुषुम्ना नाड़ी का उद्गम स्थान है। इसी स्थान पर सबसे पहले मानसिक और जैविक शक्ति को एकाग्र कर सुषुम्ना मार्ग से ऊपर चढ़ाने—ऊर्ध्वमुखी करने का अभ्यास किया जाता है। अपने बायें पैर की एड़ी से मूलाधार के सीवन को दबा कर बैठने से अग्निदीपन होता है और शक्ति नीचे की ओर प्रवाहित न होकर ऊर्ध्वमुखी हो उठती है। शक्ति का जागरण आरम्भ हो जाता है और वह आध्यात्मिक अथवा आत्ममुखी हो जाती है, उसमें परमेश्वर शिव से मिलने की अभिलाषा तीव्र हो उठती है। तृतीयं गुदाधारं विकाससंकोचनेन निराकुञ्चयेत् । अपान- वायुः स्थिरो भवति ॥ २२ ॥ तीसरा गुदाधार है। इस स्थान पर गुदा का संकोच-विकास—आकुञ्चन और संकोचन करना चाहिये । इस क्रिया से अपानवायु स्थिर हो जाती है ॥ १२ ॥ विशेष—गुदाधार की स्थिति गुदास्थान में बतायी जाती है। इस आधार के द्वारा अपान वायु शरीर के मल और दोषपूर्ण गन्दगी को शरीर से बाहर निकाल कर उदर को निर्मल करती है और प्राणवायु से ऐक्य स्थापित कर जैविक और मानसिक शक्ति को विकसित करती है। इस कार्य की पूर्णता के लिये साधक को गुदा का आकुञ्चन और संकोच करना—उसे सिकोड़ना और फैलाना सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ५१

आवश्यक होता है। इससे अनेक उदरसम्बन्धी रोग दूर होते हैं तथा सहज रूप से मूलबन्ध और उड्डियान बन्ध के अभ्यास का फल प्राप्त होता है, कुण्डलिनी शक्ति ऊर्ध्वमुखी होती है और प्राणायाम की साधना संयत होती है। चतुर्थं मेढ्राधारं लिङ्गसंकोचनेन ब्रह्मग्रन्थित्रयं भित्त्वा भ्रमरगुहायां विश्रम्य तत ऊर्ध्वमुखे विन्दुस्तम्भनं भवति । एषा वज्रोली प्रसिद्धा ॥ १३ ॥ चौथा मेढ़ ( लिंग )—आधार है। यहाँ लिंग का संकोचन कर ( योनि मुद्रा की सहायता से ) वीर्य को ऊर्ध्वगामी करते हुए योगी ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र— तीन ग्रन्थियों का भेदन कर (मेरुदण्ड के सामने ग्रीवा के ऊपरी भाग में विद्यमान) भ्रमर गुफा में वीर्य का स्तम्भन कर विश्राम करता है। ( वीर्य अधः पतित नहीं होने पाता है।) यही वज्रोली क्रिया है। ( इसके प्रभाव से योगी अखण्ड ब्रह्म- चर्य में स्थित होकर प्राण, मन और वीर्य—बिन्दु का पारस्परिक लय कर परम पद में स्वस्थ हो जाता है।) यह वज्रोली क्रिया विशेष रूप से प्रसिद्ध है ॥ १३ ॥ विशेष—योनि-मुद्रा के अभ्यास से सुप्त कुण्डलिनी शक्ति जाग कर ऊपर उठती है और वीर्य ऊर्ध्वगामी होता है। इस योनि मुद्रा का विवरण महर्षि घेरण्ड ने अपनी घेरण्डसंहिता में दिया है। सिद्धासन में स्थित होकर दोनों हाथ के अंगूठों से कानों को, दोनों तर्जनी से नेत्रों को, मध्यमा से मुख को तथा अनामिका अंगुली से नाक के छिद्र बन्द करना चाहिये। प्राण को काकीमुद्रा ( कौए की चोंच के समान मुख को जिह्वा बाहर कर आकारित करना चाहिये और धीरे-धीरे वायु का पान करना चाहिये।) से खींचकर अपान वायु से मिलाना चाहिये। देहस्थ षट्चक्रों का ध्यान कर 'हूं' या 'हंस'—इन दोनों मन्त्रों से सुप्त कुण्डलिनी शक्ति को जगाकर सहस्रार में स्थापित करना चाहिये । ऐसी भावना करनी चाहियेकि मैं शिव के साथ शक्तिमय होकर परम सुख का आस्वादन कर रहा हूँ। यही योनिमुद्रा है। सिद्धासनं समासाद्य कर्णाचक्षुर्नासोमुखम् । अंगुष्ठतर्जनीमध्यानामाभिश्चैव साधयेत् ॥ काकोभिः प्राणं संकृष्य अपाने योजयेत् ततः। ५२ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

षट्चक्राणि क्रमाद् ध्यात्वा हूं हंसमनुना सुधीः ॥ चैतन्यमानयेद् देवीं निद्रितां यां भुजङ्गिनीम् । जीवेन सहितां शक्तिं समुत्थाप्य कराम्बुजे ॥ शक्तिमयः स्वयं भूत्वा परशिवेन सङ्गमम् । नानासुखं विहारं च चिन्तयेत् परमं सुखम् ॥ ( घेरण्डसंहिता ३।३७-४० ) गुदा से उपस्थ—मेढ्रपर्यन्त योनिदेश कहा जाता है। इसी का संकोचन कर योनि-मुद्रा की क्रिया की जाती है। इस योनिमुद्रा तथा लिङ्ग के संकोच से साधक तीन ग्रन्थियों-ब्रह्मग्रन्थि, विष्णुग्रन्थि और रुद्रग्रन्थि का भेदन कर सहस्रार में बिन्दु को ऊर्ध्वमुख कर शिव-शक्ति के तादात्म्य के आनन्द का उपभोग करता है। तीनों ग्रन्थियों का भेदन कुण्डलिनी-जागरण की प्रक्रिया का एक अंग है। अधोगतिमपानं वै ऊर्ध्वंगं कुरुते बलात् ॥ आकुञ्चनेन तं प्राहुर्मूलबन्धोऽयमुच्यते । अपानश्चोर्ध्वगो भूत्वा वह्निना सह गच्छति ॥ प्राणस्थानं ततो वह्निः प्राणापानौ च सत्वरम् । मिलित्वा कुण्डलींयाति प्रसुप्ता कुण्डलाकृतिः ॥ तेनाग्निना च संतप्ता पवनेनैव चालिता । प्रसार्य स्वशरीरं तु सुषुम्नावदनान्तरे ॥ ब्रह्मग्रन्थिं ततो भित्वा रजोगुणसमुद्भवम् । सुषुम्नावदने शीघ्रं विद्युल्लेखेवसंस्फुरेत् ॥ विष्णुग्रन्थिं प्रयात्युच्चैः सत्वरंहृदि संस्थिता। ऊर्ध्वंगच्छति यच्चास्ते रुद्रग्रन्थिं तदुद्भवम् ॥ ( योगकुण्डल्युपनिषत् १।६३-६८ ) अपानवायु का लिङ्गसंकोचन द्वारा सुषुम्ना नाड़ी में प्रवेश करना ही ब्रह्मग्रन्थि का भेदन है, अपानका उठकर हृदयस्थ प्राण के आकर्षण से ऊर्ध्वमुख होना विष्णुग्रन्थि का भेदन है और इस प्राणमयी महाशक्ति कुण्डलिनी के रूप में आज्ञाचक्र का भेदन कर सहस्रार में पहुँचना ही रुद्रग्रन्थिका भेदन है। आज्ञाचक्र में ही रुद्रग्रन्थि की स्थिति बतायी गयी है । बिन्दु को वज्रोली मुद्रा के अभ्यास द्वारा सहस्रार में भ्रमरगुफा में पहुँचाने में मेढ्राधार की महती भूमिका है। वज्रोली मुद्रा की सिद्धि के सम्बन्ध में सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ५३

हठयोगप्रदीपिका में निरूपण है कि बिन्दु को क्षरित होने से रोकने के लिए उसे लिङ्ग के संकोच द्वारा ऊर्ध्वमुख करना चाहिये। मेहनेन शनैः सम्यगूर्ध्वाकुञ्चनमभ्यसेत् । पुरुषोऽप्यथवा नारी वज्रोलीसिद्धिमाप्नुयात् ॥ ( हठयोगप्रदीपिका ३।८५ ) वज्रोली के अभ्यास से योगी मृत्यु को जीत लेता है। वीर्य का स्खलन अथवा क्षरण ही मृत्यु है और उसे शरीर में धारण करना ही जीवन है। योगाभ्यास में निपुण योगी को उपस्थ—लिंग इन्द्रिय के छिद्र से ( वज्रोली की विधि से ) वीर्य का ऊपर की ओर आकर्षण करना चाहिये अथवा योनिमुद्रा के द्वारा अभ्यास करना चाहिये। वीर्य प्राण से संयुक्त है, इसलिये जैविक शक्ति, मानसिक और बौद्धिक विकास तथा शारीरिक कान्ति की वृद्धि के लिये वज्रोली के द्वारा वीर्य के ऊर्ध्वाकर्षण का अभ्यास सिद्ध होने पर योगी संकल्पसिद्ध हो जाता है। मेढ्राधार में स्वाधिष्ठान चक्र अवस्थित है। स्व का अर्थ ही प्राण होता है। भोगवासना की तृप्ति द्वारा वीर्य को स्खलित होने से बचाने के लिये वज्रोली मुद्रा का अभ्यास करना अत्यावश्यक है। इससे प्राण-शक्ति ब्रह्मग्रन्थि, विष्णुग्रन्थि और रुद्रग्रन्थि का भेदन कर शरीर को सौन्दर्य, बल और तेज प्रदान करती है । पञ्चममोड्याणाधारयोर्बन्धनान्मलमूत्रसंकोचनं भवति ॥ १४ ॥ पाँचवां उड्डियाण आधार है। ( यह लिङ्ग मूल तथा नाभिमूल के मध्य में स्थित है।) इस आधार के बन्ध—नियन्त्रण से मलमूत्र का संकोचन ( अल्पता ) होता है ॥ १४ ॥ विशेष--उड्डियाण आधार का नियन्त्रण करने से योगी अपनी आँतड़ियों और मूतेन्द्रिय पर नियन्त्रण कर सकता है, इनके कष्टों का उपचार कर सकता है। प्राण-शक्ति इस आधार की क्रिया और नियन्त्रण से ऊपर की ओर तेजी से उठती है, मानो उड़ती है। इसके अभ्यास से नाभि-शुद्धि होती है, वायु की शुद्धि होती है, जठरानल बढ़ता है, शरीर को पोषण मिलता है, रस का संचार होता है। वृद्ध भी उड्डियान के बन्धाधार से तरुण हो जाता है। इस आधार पर ही उड्डियान बन्ध की क्रिया पूरी होती है। नाभि के ऊपर-नीचे के भाग ५४ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

में आकर्षण—तान करना चाहिये । छः मास में ही मृत्यु पर साधक विजय प्राप्त कर लेता है । बद्धो येन सुषुम्नायां प्राणस्तूड्डीयते यतः । तस्मादुड्डीयनाख्योऽयं योगिभिः समुदाहृतः । ( हठयोगप्रदीपिका ३ । ५५ ) जिस बन्ध से बद्ध प्राण उड़कर ( सहज ऊर्ध्वमुख होकर ) सुषुम्ना नाड़ी में पहुँच जाता है, वही योगियों द्वारा उड्डियान बन्ध कहा जाता है । उदरे पश्चिमं तानं नाभेरुर्ध्वं च कारयेत् । उड्डीयानो ह्यसौ बन्धो मृत्युमातङ्गकेसरी ॥ ( हठयोगप्रदीपिका ३ । ५७ ) नाभि में ऊपर और नीचे उदर में पीछे की ओर इसतरह आकर्षण करे कि दोनों भाग पीछे पीठ तक पहुँच जायं, यह बन्ध मृत्युरूपी हाथी के लिये साक्षात् सिंह के समान है । षष्ठे नाभ्याधार ओङ्कारमेकचित्तेनोच्चारिते नादलयो भवति ॥ १५ ॥ छठाँ नाभि-आधार है । इसमें एकाग्रचित्त से ॐकार के उच्चारण से नादलय होता है ॥ १५ ॥ विशेष—नाभि के मूल में एकाग्र मन से प्रणव का ध्यान करने से नादलय उत्पन्न होता है । मूलाधार में स्थित बिंदुरूपा पराशक्ति से उद्भूत शब्द ही नाद है । यह बीजांकुर के समान सूक्ष्म है । नाभि-आधार मणिपुर चक्र का स्थान है । जैविक कार्य का यह एक प्रमुख केन्द्र है । यहाँ सूक्ष्म नाद की अभिव्यक्ति ही शब्द ब्रह्म है । यह नाद ही अपरिवर्तनीय ( शाश्वत ) पारमार्थिक परम चैतन्य है । यही शब्द ब्रह्म है, जो मूलाधार में सूक्ष्म नादरूप में अभिव्यक्त होता है, यह शक्ति से अभिन्न होता है, यह विन्दु या बीज से तादात्म्य प्राप्त कर लेता है । मूलाधार में नादशक्ति से तदाकार रहता है । स्वाधिष्ठान में यह विन्दु या बीज से तद्रूप होता है और मणिपुर चक्र या नाभि-आधार में सूक्ष्म-क्रमिक सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ५५

नाद के रूप में प्रकट होता है। योगी इसे योगदृष्टि से देख सकता है। यह प्रणव, ॐ की शाश्वत और मधुर एकरस ध्वनि है। अक्षरः परमो नादः शब्दब्रह्मेति कथ्यते। मूलाधारगता शक्तिः स्वाधारा विन्दुरूपिणी तस्यां उत्पद्यते नादः सूक्ष्मबोजादिवाङ्कुरः। तां पश्यन्तीं विदुर्विश्वं यया पश्यन्ति योगिनः । ( योगशिखोपनिषद् ३ १२-३) महायोगी गोरखनाथजी ने नाभि आधार में शुद्ध नाद पर ध्यान केन्द्रित करने पर विशेष बल दिया है। इसका अभ्यास कान के छिद्र अंगुलियों से बन्द कर ॐ के उच्चारण द्वारा किया जा सकता है। सप्तमे हृदयाधारे प्राणं निरोधयेत् कमलविकासो भवति ॥ १६ ॥ सातवाँ हृदयाधार है। इसमें प्राणवायु के निरोध ( संयमन ) से अष्टदल कमल ( अनाहत चक्र ) का विकास होता है ।। १६ ।। विशेष—प्राणवायु का स्थान हृदय है। हृदय-आधार में प्राणशक्ति को संयमित करने से अनाहत चक्र, जो अधोमुख अष्टदल कमल है, ऊर्ध्वमुख होकर खिल जाता है। अधोमुख कमल का तात्पर्य है जीवात्मा साधक की संसार के विषय-सुख की कामनापूर्ति की आसक्ति और इस अष्टदल कमल के ऊर्ध्वमुख खिलने का तात्पर्य है जीवात्मा साधक की परमात्ममुखी आध्यात्मिक उन्नति। ( महायोगी गोरखनाथजी ने 'गोरक्षशतक' आदि रचनाओं में इस अनाहत चक्र को द्वादशदल कमल कहा है ।) हृदयाधार में प्राणशक्ति कुण्डलिनी विष्णुग्रन्थि का भेदन कर ऊपर उठ जाती है। हृदय-आधार जैविक कार्य का महत्वपूर्ण स्थान है, यह प्राण-अपान वायुओं के ऐक्य का स्थान है। समस्त ध्वनियों से ध्यान को हटाकर यदि इस हृदय-आधार पर केन्द्रित किया जाय तो अनाहत नाद का स्पष्ट श्रवण होता है। कुम्भक प्राणायाम की विधि से इस आधार में प्राण को केन्द्रित करने से योगी की लोकोत्तरानन्दप्राप्ति की यात्रा विशेष गतिमयी हो जाती है। ५६ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

अष्टमे कण्ठाधारे कण्ठमूलं चिबुकेन निरोधयेदिडापिङ्गल- योर्वायुः स्थिरो भवति ॥ १७ ॥ आठवाँ कण्ठाधार है। कण्ठमूल को चिबुक ( ठोडी ) से निरुद्ध कर ( जालन्धरबन्ध के अभ्यास द्वारा ) इडा और पिंगला - चन्द्रनाड़ी और सूर्यनाड़ी में वायु को स्थिर किया जाता है। ( यही कुम्भक प्राणायाम की सिद्धि है। ) इस अभ्यास से वायु स्थिर होती है ॥ १७ ॥ विशेष-चिबुक से कण्ठमूल का निरोध होने पर सहस्रार से द्रवित चन्द्रामृत नाभिस्थानीय अग्नि ( सूर्य के मुख ) में गिरकर नष्ट नहीं होता और योगसाधक उस अमृत का स्वयं पान कर शरीर को जीर्ण-शीर्ण होने से बचा लेता है। इस तरह कण्ठमूल के निरोधपूर्वक चिबुक के वक्षःस्थल पर लग जाने से जालन्धर बन्ध सिद्ध होता है। मूल बन्ध, उड्डियान बन्ध और जालन्धर बन्ध के अभ्यास हठयोग की साधना में अथवा प्राणायाम की सिद्धि में अमित उपयोगी हैं। कण्ठमाकुञ्च्य हृदये स्थापयेच्चिबुकं दृढम् । बन्धो जालन्धराख्योऽयं जरामृत्युविनाशकः ॥ बध्नाति हि शिरोजालमधोगामिनभोजलम् । ततो जालन्धरो बन्धः कण्ठदुःखौघनाशनः ॥ जालन्धरे कृते बन्धे कण्ठसंकोचलक्षणे । न पीयूषं पतत्यग्नौ न च वायुः प्रकुप्यति ॥ कण्ठसंकोचनेनैव द्वे नाड्यो स्तम्भयेद् दृढम् ॥ मध्यचक्रमिदं ज्ञेयं षोडशाधारबन्धनम् ॥ ( हठयोगप्रदीपिका ३।७०-७३ ) कंठ ( गले के विवर ) को संकुचित कर ( सिकोड़ कर ) साधक को हृदय-देश में ( वक्ष के समीप चार अंगुल की दूरी पर ) ठोड़ी को दृढ़तापूर्वक स्थापित ( स्थित ) करना चाहिये। यह जरा ( बुढ़ापा ) और मृत्यु (के भय) को नष्ट कर देनेवाला जालन्धर नामक बन्ध है। यह नाड़ियों के समूह और नीचे की ओर गिरनेवाले कपालकुहर के जल-अमृत को बाँधता ( रोकता ) है, इसलिये यह जालन्धरबन्ध गले के रोगों--विकारों को नष्ट करता है। जालन्धर बन्ध के अभ्यास से और गले को सिकोड़ने से न तो ( कपाल-कुहर का ) अमृत अग्नि ( जठरानल ) में गिरता है और न वायु ही दूषित होती है। कंठ का सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ५७

संकोच करने से इड़ा और पिंगला नाड़ियों का स्तम्भन हो जाता है, प्राण सुषुम्ना से प्रवाहित होते हुए ऊर्ध्वमुख होता है। यह कण्ठाधार सोलहों आधारों के बन्धनकर्ता मध्यचक्र-अथवा विशुद्धचक्र का स्थान है। जालन्धर बन्ध के अभ्यास द्वारा साधक इड़ा-पिंगला में प्राणवायु के संचालन पर नियन्त्रण कर मानसिक-जैविक शक्ति को सुषुम्ना-मार्ग से ऊर्ध्वमुखीकर सकता है। नवमे घण्टिकांधारे जिह्वाग्रं धारयेदमृतकला स्रवति ॥ १८ ॥ नौवां घण्टिका आधार है। ( मुख के भीतर तालु में लटकनेवाले काग का नाम घण्टिका है । ) घण्टिका-आधार के मूल भाग में जिह्वा के अग्रभाग को लगाना चाहिये । वहाँ ( सहस्रार कमल में स्थित चन्द्रमण्डल से ) अमृत का स्राव होता है--( उस अमृत का पान करने से शरीर नीरोग और पुष्ट होता है ) ॥ १८ ॥ ब्रह्मारन्ध्रे हि यत् पद्मं सहस्रारं व्यवस्थितम् । तत्र कन्दे हि या योनिस्तस्यां चन्द्रो व्यवस्थितः ॥ त्रिकोणाकारतस्तस्याः सुधा क्षरति सन्ततम् । इडायाममृतं तत्र समं स्रवति चन्द्रमा ॥ ( शिवसंहिता ५ । १२६-१३० ) ब्रह्मारन्ध्र में सहस्रदल कमल है, इसके कन्द की योनि में चन्द्रमा है। इस त्रिकोणाकार योनि से चन्द्रमा से सुधा का स्राव होता रहता है, जो सदा अमृत धारा के रूप में इडा नाड़ी से प्रवाहित होता हैं। जिह्वा के मूल में एक सूक्ष्म मार्ग है, उसी से यह अमृतकला टपकती है। यह इडा-पिंगला के द्वारा शरीर में निम्न स्तर पर उतर कर नष्ट हो जाती है। जिह्वा को मोड़कर इस अमृत का संस्पर्श कराना ही अमृतपान है, इससे घण्टिका आधार में जिह्वा के अग्र भाग से साधक निरन्तर प्रवाहित अमृत का पान करता रहता है । दशमे ताल्वाधारे ताल्वन्तर्गर्भे लम्बिकां चालनदोहनाभ्यां दीर्घीकृतवा विपरीतेन प्रवेशयेत् काष्ठी भवति ॥ १९ ॥ ५८ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

दसवाँ तालु आधार है। यह घण्टिका (घाँटी) से ऊपर है। तालु के भीतर छिद्र-मार्ग से जीभ को चालन-दोहन-क्रिया से लम्बी कर उस छिद्र में उलट कर प्रविष्ट करना चाहिये। (इससे खेचरी मुद्रा की सिद्धि होती है।) साधक काठ के समान निश्चल हो जाता है। (इससे अमृतपान और खेचरी मुद्रा का अभ्यास, दोनों सिद्ध होते हैं।) योगसाधक का काठ के समान निश्चल हो जाना ही जड़समाधि है ॥ १६॥ विशेष—तालु आधार को तालुचक्र, दसवाँ द्वार, शंखिनी-विवर अथवा अमृतस्राव-केन्द्र कहा जाता है। यह तालु आधार जीभ के अधिक गहरे क्षेत्र में स्थित है। यह आन्तरिक रूप से आज्ञाचक्र और सहस्रार से जुड़ा है। खेचरी मुद्रा के अभ्यास की सिद्धि के लिये जीभ को विधिपूर्वक कोमल बना कर बाहर खींचते हुए लम्बा करना चाहिये, इसके बाद जीभ के अग्रभाग को जिह्वा के मूल के कोमल छिद्र में प्रवेश कराया जाता है। साधक इस क्रिया के द्वारा समस्त बाह्य चञ्चलता से रहित होकर काठ के समान जड़—निश्चल हो जाता है। यह जड़- समाधि है और इस संज्ञा-शून्य स्थिति में भी सहस्रार से स्रवित अमृत के निरन्तर पान से उसकी चेतना रसमयी—आनन्दमयी बनी रहती है। खेचरी मुद्रा का लक्षण यह है कि कपाल के मध्यवाले छिद्र में जीभ उलटी प्रविष्ट करनी चाहिये और साधक की दृष्टि दोनों भौंहों के मध्य स्थित रहनी चाहिये। जीभ को इस मुद्रा की सिद्धि के लिये चालन-दोहन क्रिया से लम्बा किया जाता है। अँगूठे और तर्जनी अँगुली से जीभ को दायें-बायें चालित करना चालन-क्रिया है और जिस तरह गाय के स्तन में अँगुलियों को लगा कर दूध दुहा जाता है, उसी तरह अंगूठे और तर्जनी अँगुली से जीभ को धीरे-धीरे बाहर की ओर खींचकर बढ़ाया जाता है, यह दोहन-क्रिया है। अँगुलियों में इस क्रिया के लिये मक्खन या घी लगा लेना चाहिये। निरन्तर अभ्यास करने से जीभ इतनी लम्बी हो जाती है कि वह भ्रू-मध्य तक पहुँचकर कपाल-रन्ध्र से लग जाती है। भ्रुवोरन्तर्गतां दृष्टिं विधाय सुदृढ़ां सुधीः ॥ उपविश्यासने वज्रे नानोपद्रववर्जितः। लम्बिकोर्ध्वस्थितेगर्ते रसनां विपरीतगाम् ॥ संयोजयेत् प्रयत्नेन सुधाकूपे विचक्षणः। मुद्रैषा खेचरीप्रोक्ता भक्तानामनुरोधतः॥ (शिवसंहिता ४। ५१-५३) सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ५६

जीभ को उलट कर इड़ा, पिंगला, सुषुम्णा वाले संगम-त्रिपथ में लगाना चाहिये, यह व्योमचक्र है, यही खेचरी मुद्रा है। कलां पराङ्मुखीं कृत्वा त्रिपथे परियोजयेत् । सा भवेत्खेचरी मुद्रा व्योमचक्रं तदुच्यते ॥ चित्तं चरति खे यस्माज्जिह्वा चरति खे गता। तेनैषा खेचरी नाम मुद्रा सिद्धैर्निरूपिता ॥ ऊर्ध्वजिह्वः स्थिरो भूत्वा सोमपानं करोति यः। मासार्धेन न सन्देहो मृत्युं जयति योगवित् ॥ ( हठयोगप्रदीपिका ३। ३७, ४१, ४४ ) तालु के ऊपर विवर में ऊर्ध्वमुखी जीभ से सहस्रार से क्षरित चन्द्रामृत का तालु-आधार में पान कर योगी पन्द्रह दिनों में ही मृत्यु के भय से रहित हो जाता है। एकादशमथ जिह्वाधारं तत्र जिह्वाग्रं धारयेत् सर्वरोग- नाशो भवति ॥ २० ॥ ग्यारहवाँ जिह्वाधार है। जिह्वामूल में जिह्वा के अग्रभाग को लगाना (स्पर्शपूर्वक स्थिर करना) चाहिये। इस अभ्यास से (साधक के) समस्त रोगों का नाश होता है ॥ २० ॥ द्वादशं भ्रूमध्याधारं तत्र चन्द्रमण्डलं धारयेत्, शीतलतां याति ॥ २१ ॥ बारहवाँ भ्रूमध्याधार है। वहाँ चन्द्रमण्डल का ध्यान करना चाहिये, उसकी धारणा करने से-ध्यान करने से साधक का अङ्ग शीतल-हृष्टपुष्ट और प्रसन्नतायुक्त होता है ॥ २१ ॥ विशेष—दोनों भृकुटियों का मिलन-स्थान ही भ्रूमध्याधार है, यह आज्ञा चक्र का स्थान है। यहाँ दृष्टि एकाग्र कर जब साधक शुभ्र, स्वच्छ-निर्मल चन्द्र-, मण्डल का ध्यान करता है, तब उसका शरीर सौम्य, शान्त और स्थिर हो जाता है। इस स्थान से मन विशेष रूप से अमनस्क की भूमिका में पहुँच जाता है, ६० ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

इस आधार में दृष्टि की स्थिरता से साधक परम दिव्य ज्योति का दर्शन करता है। त्रयोदशं नासाधारं तस्याग्रं लक्षयेन्मनः स्थिरं भवेत् ॥ २२ ॥ तेरहवाँ नासिकाधार है, इसके अग्रभाग में दृष्टि एकाग्र कर ध्यान केन्द्रित करने से मन स्थिर होता है—अपने चञ्चल स्वभाव को छोड़ कर आत्मस्वरूप में स्थिर हो जाता है ॥ २२ ॥ विशेष—नासाधार का स्थान नासिका में होता है। नासिका जैविक कार्यों का महत्वपूर्ण केन्द्र है। योगसाधना की सिद्धि के लिये नासाग्रदृष्टिस्थिरता और नासाग्रध्यान का योगशास्त्र में विशद विवेचन उपलब्ध होता है। इससे मन की उद्विग्नता नष्ट हो जाती है और वह गहन समाधि के योग्य हो जाता है। चतुर्दशं नासामूलक कपाटाधारं तत्र दृष्टिं धारयेत् षण्मासाज्ज्योतिःपुञ्जं पश्यति ॥ २३ ॥ चौदहवाँ नासामूलक कपाटाधार है, वहाँ दृष्टि स्थिर करनी चाहिये, इससे छः मास में साधक को (परमात्म) ज्योतिपुञ्ज का दर्शन होता है ॥ २३ ॥ विशेष—कपाटाधार की स्थिति नासामूल में है। यह स्थान भ्रू चक्र— आज्ञाचक्र के समीप है। इस आधार में दृष्टि और ध्यान को केन्द्रित करने से सम्पूर्ण मनोमय जगत् प्रकाशित हो उठता है और विज्ञानमय कोष में मन के विलीन अथवा तल्लीन होने पर परमात्म-ज्योति-पुञ्ज का साधक दर्शन करता है, यह अन्तर्ज्योति का दर्शन है। पञ्चदशं ललाटाधारं तत्र ज्योतिःपुञ्जं लक्षयेत् तेजस्वी भवति ॥ २४ ॥ पन्द्रहवाँ ललाट-आधार है। उसमें ज्योतिः पुञ्ज को लक्ष्य बनाकर उसका ध्यान करना चाहिये। इस ध्यान से योगी तेजस्वी होता है—दिव्यता को प्राप्त होता है ॥ २४ ॥ विशेष—ललाटाधार ललाट के मध्य में है। यहाँ स्वतः प्रकाशित ज्योतिः- पुञ्ज पर ध्यान केन्द्रित करने के लिये साधक को समाधि लगानी होती है। इस सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ६१

ध्यान के फलस्वरूप उसकी जैविक और मानसिक शक्ति विकसित होती है, उसका शरीर तेजोमय और कान्तियुक्त हो जाता है । अवशिष्टे षोडशे ब्रह्मरन्ध्र आकाशचक्रं तत्र श्रीगुरुचरणा- म्बुजयुग्मं सदावलोकयेदाकाशवत्पूर्णो भवति । इति षोडशा- धारः ॥ २५ ॥ शेष सोलहवाँ ब्रह्मरन्ध्र आधार है । यह आकाशचक्र का स्थान है । इसमें श्रीगुरुके दोनों चरण-कमलों का ध्यान करना चाहिये । इससे साधक आकाश की तरह पूर्ण रूप से ( निरवच्छिन्न सच्चिदानन्दस्वरूप गुरुतत्व का ध्यान करने से ) व्यापक—मुक्त हो जाता है ॥ २५ ॥ विशेष—ब्रह्मरन्ध्र आधार में आकाशचक्र ही गुरु-स्वरूप के ध्यान के लिये उपयुक्त स्थान स्वीकार किया गया है, इस आधार में गुरु के चरण का ध्यान करने से उनकी प्रसन्नता से परमात्म-ज्योति अभिव्यक्त हो उठती है । इस स्थान में जब मानसिक और जैविक शक्तियों का उच्च से उच्चतर स्तर की समाधि द्वारा साधक पूर्ण न्यास ( संस्थापन ) करता है, तब उसे गुरु का प्रसाद ( प्रसन्नता ) प्राप्त होता है । गुरु अपने स्वरूप में सच्चिदानन्दविग्रह है और व्यष्टिरूप में शिवशक्ति का रूप है । योगसाधक गुरु के प्रसाद से शाश्वत, सनातन, अलख- निरञ्जन, कैवल्यपद-स्वरूपावस्थित हो जाता है । आकाशचक्र पूर्ण-गिरि-पीठ है, इसमें साधक परमशून्य परमात्मरूप में तादात्म्य-लाभ कर गुरु के प्रसाद से साक्षात् शिवस्वरूप हो जाता है । गुरु के चरण-कमल का ध्यान करने से उसका सदुपदेशामृत सहज प्राप्त होता है । भवेद् वीर्यवती विद्या गुरुवक्त्रसमुद्भवा । ( शिवसंहिता ३ । ११ ) गुरु का स्वरूप नादविन्दु-कलातीत होने पर सम्पूर्ण स्वानन्द-विग्रह होता है और रूप नादविन्दुकलात्मा होने पर शिवस्वरूप होता है । दोनों स्वरूपों में पूर्ण तादात्म्य है । गुरु के चरण-कमल का ध्यान ब्रह्मरन्ध्राधार में पूर्ण विहित है, इससे साधक निरञ्जन पद प्राप्त करता है । नमः शिवाय गुरवे नादविन्दुकलात्मने । निरञ्जनपदं याति नित्यं यत्र परायणः ।। ( हठयोगप्रदीपिका ४ । १ ) ६२ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति